संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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है। इसे मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले स्त्री-समुदाय, शूद्र और वर्णसंकर धारण कर सकते हैं। इस मन्त्रके लिये दीक्षा, होम, संस्कार, तर्पण, समय-शुद्धि तथा गुरुमुखसे उपदेश आदिकी आवश्यकता नहीं है। यह मन्त्र सदा पवित्र है*। 'शिव' यह दो अक्षरका मन्त्र ही बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेमें समर्थ है और उसमें 'नमः' पद जोड़ दिया गया, तब तो वह मोक्ष देनेवाला हो जाता है। जो गुरु निर्मल, शान्त, साधु, स्वल्पभाषी, काम-क्रोधसे रहित, सदाचारी और जितेन्द्रिय हों, उनके द्वारा दयापूर्वक दिया हुआ मन्त्र शीघ्र ही सिद्ध हो जाता है। प्रयाग, पुष्कर, केदार, सेतुबन्ध, गोकर्ण और नैमिषारण्य—ये सब क्षेत्र मनुष्योंको शीघ्र ही सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं।
मथुरापुरीमें दाशार्ह नामसे विख्यात एक राजा हो गये हैं, जो यदुकुलमें श्रेष्ठ, बुद्धिमान्, अत्यन्त उत्साही और महान् बलवान् थे। वे शास्त्रोंके ज्ञाता, नीतियुक्त वचन बोलनेवाले, शूरवीर, धैर्यवान् तथा परम कान्तिमान् थे। अनेक शास्त्रोंके तात्पर्यको जाननेमें राजाने कुशलता प्राप्त की थी। वे उदार, रूपवान्, तरुण तथा शुभ लक्षणोंसे सुशोभित थे। उन्होंने काशिराजकी पुत्री कलावतीके साथ विवाह किया था। ब्याह करके घर आनेपर रात्रिमें पलंगपर बैठी हुई उस स्त्रीको राजाने अपने पास बुलाया। पतिके बुलानेपर भी वह उनके समीप नहीं आयी। तब राजा उसे बलपूर्वक अपनी शय्यापर ले आनेके लिये उठे। यह देख रानीने कहा—'महाराज! मैं कारणका ज्ञान रखनेवाली तथा व्रतमें तत्पर हूँ। मेरा स्पर्श न कीजिये। आप तो धर्म-अधर्मको जानते हैं। अतः मेरे ऊपर बलप्रयोग न कीजिये। पति-पत्नीमें प्रेमपूर्वक जो समागम होता है, वही एक-दूसरेकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला है। बलपूर्वक स्त्रियोंका सम्भोग करनेसे पुरुषोंको क्या प्रसन्नता होती है और कौन-सा सुख मिलता है? जो प्रेम न करती हो, रोगिणी हो, गर्भवती अथवा किसी व्रतका पालन करनेवाली हो, रजस्वला और रतिकी इच्छा न रखनेवाली हो, ऐसी स्त्रीके साथ पुरुषको बलपूर्वक समागमकी इच्छा नहीं रखनी चाहिये।'
रानीके इस प्रकार कहनेपर भी राजा दाशार्हने उसकी बात नहीं मानी। रानीका शरीर तपाये हुए लोहेके पिण्डके समान तप रहा था। उसका स्पर्श करते ही सहसा राजाका अंग-अंग जलने लगा। उन्होंने भयसे विह्वल होकर अपने शरीरको जलानेवाली रानीको छोड़ दिया।
राजा बोले—प्रिये! यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है कि पल्लवके समान कोमल यह तुम्हारा शरीर अग्निके समान तप्त कैसे हो गया।
रानीने उत्तर दिया—राजन्! बचपनमें मुनिवर दुर्वासाने मुझपर दया करके शिवजीके पंचाक्षर मन्त्रका उपदेश किया था। उस मन्त्रके प्रभावसे मेरा शरीर निष्पाप हो गया है। पापी पुरुष इसका स्पर्श नहीं कर सकते। महाराज! आपने स्वभावसे ही मदिरा पीनेवाली कुलटा और वेश्याओंका सेवन किया है। आप पवित्र मन्त्रका जप और भगवान् शंकरकी आराधना भी नहीं करते। फिर मेरा स्पर्श कैसे कर सकते हैं?
राजा बोले—सुन्दरी! तुम मुझे भी भगवान् शंकरके शुभ पंचाक्षर मन्त्रका उपदेश करो।
रानीने कहा—आप मेरे गुरु हैं, मैं आपको उपदेश नहीं कर सकती। आप मन्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ गुरु गर्गाचार्यके समीप जाइये।
* तस्मात् सर्वप्रदो मन्त्रः सोऽयं पञ्चाक्षरः स्मृतः। स्त्रीभिः शूद्रैश्च संकीर्णैर्धार्यते मुक्तिकाङ्क्षिभिः॥
नास्य दीक्षा न होमश्च न संस्कारो न तर्पणम्। न कालो नोपदेशश्च सदा शुचिरयं मनुः॥
(स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० १। २०, २१)
* ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६७१
इस प्रकार बातचीत करते हुए दोनों पति-पत्नी गर्ग मुनिके समीप गये और उनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया। तत्पश्चात् राजाने विनीतभावसे एकान्तमें कहा—'गुरुदेव! आपका हृदय दयासे भरा हुआ है, आप मुझे भगवान् शिवके पंचाक्षर मन्त्रका उपदेश देकर कृतार्थ कीजिये।' राजाके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर विप्रवर गर्गाचार्य दोनों दम्पतिको यमुनाजीके महापुण्यमय उत्तम तटपर ले गये। वहाँ गुरुजी एक पवित्र वृक्षके मूल भागमें बैठ गये। राजाने उपवासपूर्वक उस पुण्य तीर्थके निर्मल जलमें स्नान किया। तब उन्होंने राजाको पूर्वाभिमुख बिठाकर भगवान् शिवके चरणारविन्दोंमें नमस्कार किया और राजाके मस्तकपर हाथ रखकर उन्हें शिवस्वरूप पंचाक्षर मन्त्रका उपदेश दिया। उस मन्त्रको धारण करते ही गुरुजीके हस्तकमलका स्पर्श होनेसे राजा दाशार्हके शरीरसे करोड़ों पाप कौओंका रूप धारण करके बाहर निकल गये।
तब गुरु गर्गाचार्यने कहा—राजन्! भगवान् शिवका पंचाक्षर मन्त्र जब तुम्हारे हृदयमें पहुँचा, तभी तुम्हारे कोटि-कोटि पाप कौओंके रूपमें बाहर निकल गये हैं। सहस्रों कोटि जन्मोंमें जो पापराशि संचित की गयी है, वह शिवके पंचाक्षर मन्त्रको धारण करते ही क्षणभरमें भस्म हो जाती है। राजन्! इस समय तुम्हारे करोड़ों पातक जल गये। अब तुम पवित्रचित्त होकर अपनी इस रानीके साथ सुखपूर्वक विहार करो। ऐसा कहकर मुनिश्रेष्ठ गर्गजी उन दोनों दम्पतिके साथ घरको लौटे। तदनन्तर गुरुजीसे आज्ञा ले राजा और रानी प्रसन्नतापूर्वक महलमें चले गये। यह पंचाक्षर मन्त्र सम्पूर्ण वेद, उपनिषद्, पुराण और शास्त्रोंका आभूषण है, सब पापोंका नाश करनेवाला है। इस प्रकार मैंने पंचाक्षर मन्त्रका महान् प्रभाव संक्षेपसे बताया है।
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शिवरात्रिको शिवपूजनका महत्त्व, राजा मित्रसहका वसिष्ठके शापसे राक्षस होकर ब्राह्मणकी हत्या करना और गौतमजीका उन्हें गोकर्णक्षेत्रकी महिमा सुनाना
सूतजी कहते हैं—माघ (फाल्गुन) मासमें कृष्ण पक्षकी चतुर्दशीका उपवास अत्यन्त दुर्लभ है। उसमें भी शिवरात्रिमें जागरण करना तो मैं मनुष्योंके लिये और दुर्लभ मानता हूँ। उससे भी अत्यन्त दुर्लभ है शिवलिंगका दर्शन। तथा परमेश्वर शिवके पूजनको तो मैं और भी दुर्लभतर मानता हूँ। सौ करोड़ जन्मोंमें उत्पन्न हुई पुण्यराशिके प्रभावसे कभी भगवान् शंकरकी बिल्वपत्रसे पूजा करनेका अवसर प्राप्त होता है। दस हजार वर्षोंतक जिसने गंगाजीके जलमें स्नान किया है, उसको जो फल मिलता है, वही फल मनुष्य एक बार बिल्वपत्रसे भगवान् शंकरकी पूजा करके प्राप्त कर लेता है। प्रत्येक युगमें जो-जो पुण्य इस संसारमें लुप्त हुए हैं, वे सभी फाल्गुन कृष्णा चतुर्दशी (शिवरात्रि) में पूर्णतः विद्यमान रहते हैं। लोकमें ब्रह्मा आदि देवता और वसिष्ठ आदि मुनि इस फाल्गुन कृष्णा चतुर्दशीकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं। इस शिवरात्रिको यदि किसीने उपवास किया तो उसे सौ यज्ञोंसे अधिक पुण्य होता है। जिसने एक बिल्वपत्रसे शिवलिंगका पूजन किया है, उसके पुण्यकी समता तीनों लोकोंमें कौन कर सकता है?
इस विषयमें एक परम सुन्दर पुण्य-कथा कही जाती है। इक्ष्वाकुवंशमें 'मित्रसह' नामसे
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प्रसिद्ध एक परम धर्मात्मा राजा हो गये हैं। वे समस्त धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ, सब अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता, शास्त्रज्ञ, वेदोंके पारंगत विद्वान्, शूरवीर, अत्यन्त बली, उत्साही, नित्य उद्योगी और दयाके निधान थे। राजाको शिकार खेलनेका व्यसन था। एक दिन उन्होंने अपनी बहुत बड़ी सेना साथ लेकर भयंकर वनमें प्रवेश किया और वहाँ बहुतसे व्याघ्र, जंगली सूअर तथा सिंहोंको अपने बाणोंसे बींध डाला। राजा मित्रसह रथपर सवार हो कवचसे सुरक्षित होकर वनमें विचर रहे थे। उसी समय उन्होंने अग्निके समान आकृतिवाले एक निशाचरको मारा। उसका छोटा भाई दूरसे यह देखकर शोकमग्न हो गया और वहीं कहीं छिप गया। भाईको मारा गया देख उसने मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया—'यह राजा बड़ा दुर्धर्ष वीर है, इसे छलसे ही जीतना चाहिये।' ऐसा निश्चय करके वह पापात्मा राक्षस मनुष्यके समान आकृति बनाकर राजाके समीप आया। राजाने सेवा करनेके लिये विनीतभावसे आये हुए उस पुरुषको देखकर अज्ञानवश उसे रसोईघरका अध्यक्ष बना दिया। तत्पश्चात् राजा लौटकर अपनी पुरीको आये। महाराज मित्रसहकी पत्नी मदयन्ती नामसे प्रसिद्ध थी। वह नलकी स्त्री दमयन्तीके समान बड़ी पतिव्रता थी। एक दिन राजा मित्रसहने श्राद्धके दिन मुनिवर वसिष्ठको निमन्त्रित करके अपने घरपर बुलाया। उस समय रसोईयेके रूपमें राक्षसने सागमें मनुष्यका मांस मिला दिया और वही वसिष्ठजीके आगे परोस दिया। उसे देखकर वसिष्ठजी बोले—'राजन्! तुझे धिक्कार है, धिक्कार है। तू इतना दुष्ट और छली है कि मेरे आगे मनुष्यका मांस रख दिया। इस पापके कारण तू राक्षस हो जायगा।' जब मुनिको यह मालूम हुआ कि यह सारी करतूत राक्षसकी है, तब उन्होंने उस शापको बारह वर्षोंकी अवधिमें सीमित कर दिया। तब राजा भी कुपित होकर बोले—'यह मेरी करतूत नहीं थी और न मैं इस विषयमें कुछ जानता ही था, तो भी आपने मुझे अकारण शाप दे दिया। इसलिये गुरु होनेपर भी आपको मैं भी शाप देता हूँ।' ऐसा कहकर राजा अंजलिमें जल ले गुरुको शाप देनेके लिये उद्यत हुए। यह देख रानी मदयन्तीने पतिके चरणोंमें गिरकर उन्हें ऐसा करनेसे रोका। रानीके वचनका मान रखनेके लिये राजा शाप देनेसे निवृत्त हो गये और उस अंजलिके जलको उन्होंने अपने दोनों पैरोंपर डाल दिया। इससे राजाके दोनों पैर कल्मषयुक्त (मलिन) हो गये। तबसे राजाका नाम कल्माषपाद हो गया।
गुरुके शापसे राजा वनमें विचरनेवाले राक्षस हुए। एक दिन वनमें कहीं किशोर अवस्थावाले नवविवाहित मुनि-दम्पति रमण कर रहे थे। उस समय उस नर-भक्षी राक्षसने तरुण मुनिकुमारको खानेके लिये पकड़ लिया। ठीक उसी तरह, जैसे छोटे-से मृगशिशुको कोई व्याघ्र पकड़ लेता है। राक्षसके वशमें पड़े हुए अपने पतिको देखकर उसकी प्यारी स्त्री करुणापूर्वक बोली—'सूर्यवंशयशोधर महाराज! आप ऐसा पाप न कीजिये। आप राक्षस नहीं, अयोध्याके सम्राट् हैं, रानी मदयन्तीके पति हैं। प्रभो! ये मेरे स्वामी मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रियतम हैं, इन्हें न खाइये। शरणमें आये हुए दीन, दुःखी मनुष्योंको आप ही सहारा देनेवाले हैं। इन महात्मा पतिके बिना मेरा यह शरीर मेरे लिये महान् भार है। इस मलिन पापमय पांचभौतिक शरीरसे क्या सुख होगा? ये मुनिकुमार देखनेको बालक हैं; किंतु वेदोंके विद्वान्, शान्त, तपस्वी और अनेक शास्त्रोंके ज्ञाता हैं। इन्हें प्राणदान देकर आपको सम्पूर्ण जगत्के रक्षा करनेका पुण्य होगा। महाराज! मैं ब्राह्मणकी स्त्री हूँ, अभी बालिका हूँ, मुझपर
- ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६७३
कृपा कीजिये। आप-जैसे साधु पुरुष अनाथों, दीनों और पीड़ितोंपर कृपा करनेवाले होते हैं।'
इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भी उस निर्दयी, नर-भक्षी राक्षसने उस ब्राह्मणकुमारकी गर्दन मरोड़ डाली और उन्हें उदरस्थ कर लिया। तब वह पतिव्रता ब्राह्मणी अत्यन्त शोकसे ग्रस्त हो विलाप करने लगी। उसने पतिकी हड्डियोंको एकत्रित करके भयंकर चिता प्रज्वलित की और पतिका अनुसरण करनेके लिये अग्निमें प्रवेश करते समय राक्षसरूपधारी राजाको इस प्रकार शाप दिया—'अरे ओ पापात्मन्! तूने मेरे पतिको खा लिया है, अतः तू भी जब स्त्रीसे समागम करेगा, उसी समय तेरी मृत्यु हो जायगी।' यों कहकर वह पतिव्रता स्त्री चिताकी आगमें प्रवेश कर गयी।
गुरुके शापका उपभोग करके राजा पुनः अपने स्वरूपको प्राप्त हुए और प्रसन्नतापूर्वक घरको गये। रानी मदयन्ती उस पतिव्रता ब्राह्मणीके शापको जानती थीं। इसलिये वैधव्यसे डरकर उन्होंने रतिकी इच्छावाले पतिको अपने पास आनेसे मना कर दिया। राजा मित्रसह राज्यके सुखभोगसे विरक्त हो गये और सम्पूर्ण लक्ष्मीका परित्याग करके पुनः वनमें चले गये। राज्य छोड़कर सम्पूर्ण पृथ्वीपर विचरते हुए राजाने अपने पीछे-पीछे आती हुई एक भयंकर रूपवाली पिशाचीको देखा। वह ब्रह्महत्या थी। श्रेष्ठ मुनियोंके उपदेशसे राजाने उस ब्रह्महत्याको पहचाना। उसके निवारणके लिये विरक्तचित्तवाले राजाने अनेक वर्षोंतक बहुत-से क्षेत्रोंमें विचरण किया। फिर भी जब ब्रह्महत्या निवृत्त नहीं हुई, तब वे मिथिलामें आये। इसी समय उधर आते हुए निर्मल अन्तःकरणवाले गौतम मुनिको उन्होंने देखा और उनके समीप जाकर बार-बार प्रणाम किया। तब मुनिश्रेष्ठ गौतमने राजाको आशीर्वाद दे मन्द-मन्द मुसकराते हुए कहा—'राजन्! तुम्हारे यहाँ कुशल तो है न? तुम्हारे राज्यमें कोई विघ्न-बाधा तो नहीं है?'
राजाने कहा—ब्रह्मन्! आपकी कृपासे हम सब लोग कुशलसे हैं; परंतु यह भयंकर रूपवाली पिशाची हमें बड़ा दुःख देती है। शापग्रस्त होकर हमने जो दुर्लङ्घ्य पाप कर डाला है, उसकी शान्ति सहस्रों प्रायश्चित्तोंसे भी नहीं हो रही है। आप प्रेमपूर्वक सम्भाषण करके मेरे चित्तको आनन्दित कर रहे हैं। महाभाग! आज अपने चरणकमलोंकी शरणमें आये हुए मुझ पापीको शान्ति प्रदान कीजिये, जिससे मुझे सुख मिले।
तब करुणानिधि गौतमजीने कहा—राजेन्द्र! तुम्हें साधुवाद है? अब अपने महान् पापोंसे होनेवाले भयको त्याग दो। जब भगवान् शंकर रक्षा करनेवाले हैं, तब उनकी शरणमें आये हुए भक्तोंको कहाँसे भय हो सकता है? गोकर्ण नामक मनोरम क्षेत्र महापातकोंका संहार करनेवाला है। वहाँ बड़े-से-बड़े पाप भी नहीं टिक सकते। गोकर्ण क्षेत्रमें विद्यमान भगवान् शिव स्मरण करनेमात्रसे समस्त पापोंका नाश कर डालते हैं। जैसे कैलास और मन्दराचलके शिखरपर भगवान् शिवका निश्चित निवास है, उसी प्रकार गोकर्णमण्डलमें भी है। वहाँ महादेवजी महाबल नामसे निवास करते हैं। रावण नामक राक्षसने घोर तपस्या करके जिस शिवलिंगको प्राप्त किया था, उसीको गणेशजीने गोकर्ण क्षेत्रमें स्थापित किया है। सनक-सनन्दन आदि महात्मा तथा मृगचर्ममय वस्त्र धारण करनेवाले साध्य एवं मुनिगण वहाँ बैठकर भगवान् शिवकी उपासना करते हैं। दण्डी, मुण्डी, स्नातक, ब्रह्मचारी तथा तपसे समस्त पातकोंको जला डालनेवाले महात्मा भी देवाधिदेव शिवकी उत्तम भक्तिसे उपासना करते हैं। इस ब्रह्माण्ड-मण्डलमें गोकर्णके समान दूसरा क्षेत्र नहीं है। वहाँ महात्मा अगस्त्य मुनिने घोर तपस्या की है। राजन्! इस तीर्थमें सम्पूर्ण देवताओंके स्थान हैं। देवाधिदेव भगवान् विष्णु,
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परमेष्ठी ब्रह्मा, वीरवर कार्तिकेय तथा गणेशजीके स्थान हैं। गोकर्ण तीर्थमें कोटि-कोटि शिवलिंग विद्यमान हैं। वहाँ पग-पगपर असंख्य तीर्थ मौजूद हैं। सत्ययुगमें महाबल नामक भगवान् शिव श्वेतवर्णके होते हैं, त्रेतामें उनका रंग अत्यन्त लाल हो जाता है, द्वापरमें वे पीत वर्णके और कलियुगमें श्याम वर्णके हो जायँगे। महाबल शिव भयंकर कलियुग प्राप्त होनेपर कोमल भावको प्राप्त होंगे। परम उत्तम गोकर्ण क्षेत्र पश्चिम समुद्रके तटपर है। वह ब्रह्महत्या आदि पापोंको भस्म कर डालता है। इस संसारमें जो ब्रह्मघाती, भूतद्रोही, शठ और अन्यान्य पापी होते हैं, वे सब गोकर्ण तीर्थमें पहुँचकर वहाँके तीर्थोंमें स्नान करके महाबल नामक शिवजीका दर्शन करनेपर शिवलोकको प्राप्त होते हैं। वहाँ पुण्य तिथियोंको पुण्य नक्षत्र एवं पुण्य दिनमें जो महेश्वर शिवकी पूजा करते हैं, वे सब शिवरूप हो जाते हैं। यदा-कदा जो कोई भी मनुष्य गोकर्ण तीर्थमें जाकर भगवान् शंकरकी पूजा करता है, वह ब्रह्मपदको प्राप्त होता है। रविवार, सोमवार तथा बुधवारको जब अमावास्या तिथिका योग हो, तब वहाँ समुद्रमें किया हुआ | स्नान, दान, पितृतर्पण, शिवपूजा, जप, होम, व्रतचर्या और ब्राह्मणोंका सत्कार अनन्त फल देनेवाला होता है। महाप्रदोषकी बेलामें भगवान् शिवका पूजन मोक्ष देनेवाला है। माघ मास (फाल्गुन) में जो परम पुण्यमयी कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी आती है, उस दिन शिवलिंग और बिल्वपत्र इन सबका सुयोग दुर्लभ है। अहो! माया कैसी प्रबल है कि जिससे मूढ़ हुए मनुष्य भगवान् शिवकी इस महातिथिको उपवासतक नहीं करते। शिवरात्रिका उपवास, जागरण, भगवान् शंकरके समीप निवास तथा गोकर्ण क्षेत्रका वास इन सबका सुयोग होना मनुष्योंके लिये शिवलोकमें जानेकी सीढ़ी है। राजन्! मैं भी इस समय गोकर्ण तीर्थसे लौटकर आया हूँ। शिवरात्रिको उपवास करके भगवान् शिवका महोत्सव देखकर लौटा हूँ। शिवरात्रिपर वहाँका महान् उत्सव देखनेके लिये सब देशोंसे चारों वर्णोंके लोग आये थे। स्त्री, बालक, वृद्ध तथा चारों आश्रमोंके निवासी वहाँ आकर देवेश्वर शिवका दर्शन करके कृतकृत्यताको प्राप्त हुए। लौटते समय मार्गमें एक अद्भुत आश्चर्यकी बात देखकर मैं परमानन्दमें निमग्न हो कृतार्थ हो गया हूँ।
गोकर्ण क्षेत्रमें शिवरात्रिके शिव-पूजनके माहात्म्यसे एक चाण्डालीका परमधाम-गमन
राजाने पूछा— ब्रह्मन्! आपने मार्गमें कहाँ कौन-सी आश्चर्यकी बात देखी है, वह मुझे भी बताइये।
| गौतमजीने कहा— राजन्! गोकर्णसे आते समय एक स्थानपर दोपहरके समय मुझे एक स्वच्छ सरोवर दिखायी दिया। वहाँ जल पीकर मैंने रास्तेकी थकावट दूर की और घनी एवं शीतल छायावाले बरगदके नीचे विश्राम किया। | उसी समय थोड़ी ही दूरपर मैंने एक अन्धी, बूढ़ी एवं दुबली-पतली चाण्डालीको देखा। उसका मुँह सूख गया था। उसने कुछ भी भोजन नहीं किया था और वह अनेक प्रकारके रोगोंसे पीड़ित थी। उसके सब अंगोंमें कोढ़का घाव हो गया था तथा उसमें बहुत-से कीड़े पड़ गये थे। उसकी कमरमें पीब और रक्तसे सना हुआ एक फटा-पुराना वस्त्र लिपटा हुआ था। उसे |
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- ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६७५
उस दशामें देखकर मुझे बड़ी दया आयी और उसके मृत्युकालकी प्रतीक्षा करता हुआ मैं क्षणभर वहीं बैठा रहा। इतनेहीमें भगवान् शंकरके पार्षदोंद्वारा लाया जाता हुआ एक विमान देखा, जो अपनी किरणोंसे आकाशमार्गको आलोकित कर रहा था। तब मैंने शीघ्र ही समीप जाकर आकाशमें खड़े हुए उन शिवगणोंसे पूछा—'आपलोगोंको नमस्कार है। मैंने आपलोगोंको पहचान लिया है। आप सभी महादेवजीके चरणोंके सेवक हैं। आपने इस समय जो यहाँ आनेका कष्ट उठाया है, यह आपकी यात्रा सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षाके लिये हुई है या आपलोगोंको कोई विनोद सूझा है? कृपा करके मुझे बतलाइये। आप यहाँ किसलिये पधारे हैं?'
शिवजीके दूत बोले—मुने! यह सामने जो बूढ़ी चाण्डाली मर रही है, इसीको ले जानेके लिये भगवान् शिवने हमें आदेश दिया है।
यह सुनकर मैंने पूछा—अहो! यह महापापात्मा घोर चाण्डाली इस दिव्य विमानपर बैठनेकी अधिकारिणी कैसे हो सकती है? यह तो जन्मसे लेकर जीवनभर प्रायः अपवित्रतामें ही डूबी रही है। पापमग्ना एवं पापका अनुगमन करनेवाली है। इस दुराचारिणीको आपलोग शिवलोकमें क्यों ले जाना चाहते हैं? इसने कभी शिवजीका पंचाक्षर मन्त्र नहीं जपा, शिवजीका पूजन नहीं किया और न कभी भगवान् शंकरका ध्यान ही किया है? सत्संगसे सदा दूर रहनेवाली इस अत्यन्त क्रोधी स्वभाववाली स्त्रीको आपलोग भगवान् शिवके लोकमें कैसे ले जाना चाहते हैं। अहो! ईश्वरकी इस लीलाका रहस्य देहधारियोंकी समझमें आना कठिन है, जिसमें पापात्मा प्राणी भी दया करके परम पदमें पहुँचाये जाते हैं।
मेरे ऐसा कहनेपर देवाधिदेव भगवान् शिवके दूत इस प्रकार बोले—महामते! यह कर्मोंके परिपाकसे प्राप्त होनेवाली गति देखो, जो कि एक नीच-से-नीच नारी भी आज रोग-शोकसे रहित परम धामपर आरूढ़ हो रही है। इसने पूर्वजन्ममें अन्न-दान आदि नहीं किया था, अतः भूख-प्यास आदि क्लेशोंसे यहाँ पीड़ित हो रही है। इसने जो मदिराके नशेमें अन्धी होकर बड़ा भयंकर पाप कर डाला था, उसीके फलसे यह जन्मान्ध हो गयी। पूर्वजन्ममें इसने जान-बूझकर गायके बछड़ेको खाया था, इसलिये इस जन्ममें यह अतिशय निन्दित चाण्डाली हुई। इसने सदाचारका मार्ग त्यागकर पूर्वजन्ममें व्यभिचारके मार्गको अपनाया था, उसी अकथनीय पापसे इस जन्ममें यह दुराचारिणी और दुर्भाग्यवती हुई। विधवा होकर भी इसने दूसरे पतिका आलिंगन किया, उसी महान् पापके कारण इसके शरीरमें कोढ़के बहुत-से घाव हो गये हैं। इसने कामवेदनासे व्याकुल होकर स्वेच्छानुसार शूद्रसे रमण किया, उस पापके कारण इसे महारक्त पीब और कीड़ोंसे पीड़ित होना पड़ा है। इसने कभी उत्तम व्रतोंका पालन नहीं किया, यज्ञपूजा नहीं की, कुआँ आदि खुदवाने या बगीचे लगानेका काम नहीं किया, उसी पापसे यह सब प्रकारके भोग-साधनोंसे रहित होकर दुःख पा रही है। पूर्वजन्ममें इस मूढ़ स्त्रीने मदिरा-पान किया था, उसी पापसे यह महायक्ष्माकी पीड़ा और हृदय-शूलसे तड़प रही है। मुनिश्रेष्ठ! विवेकी महात्मा यहींपर सब मनुष्योंमें उनके सम्पूर्ण पापचिह्न देखते हैं। यहाँ जो बहुतसे रोगोंद्वारा पीड़ित और पुत्र तथा धनसे हीन हैं, जो दुष्ट लक्षणोंसे क्लेश पानेवाले और लाज छोड़कर भीख माँगनेवाले हैं, वस्त्र, अन्न, पान, शय्या, भूषण और अभ्यंग आदिसे वंचित, कुरूप, विद्याहीन, विकल अंगोंवाले (लूले-लँगड़े आदि), कुत्सित भोजन करनेवाले, दुर्भाग्यवान्, निन्दित तथा दूसरोंके सेवक हैं—ये सभी पूर्वजन्ममें बड़े भारी पापी रहे हैं। इस प्रकार यत्नपूर्वक विचार करके और संसारके मनुष्योंकी
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दशा देखकर विद्वान् पुरुष कभी पाप नहीं करता। यदि करे तो वह आत्मघाती है। जीवका यह मनुष्य-शरीर अनेक प्रकारके सत्कर्मोंका एकमात्र साधन है। इसके द्वारा सदा शुभ कर्मोंका ही सेवन करे। पापकर्मोंको सर्वथा एवं सर्वदा त्याग दे। सुखकी इच्छा रखनेवालेको पुण्य करना चाहिये। मनुष्यका यह शरीर अत्यन्त दुर्लभ है। इसे पाकर जो कोई भी अपना हित चाहनेवाला मानव एकमात्र भगवान् शिवकी शरण लेता है, एकचित्त होकर उन्हींका ध्यान करता है, वह समस्त पातकोंसे तर जाता है। पहले इस दुराचारिणी स्त्रीके मुखसे असावधानीमें शिवजीका नाम उच्चारित हुआ है। श्रीगोकर्ण क्षेत्रमें शिवरात्रिको उपवास करके रातमें इसने जागरण किया और शिवजीके मस्तकपर बिल्वपत्र चढ़ाया है। उसीका जो उत्तम फल है, उसे यह आज भोगने जा रही है। यह सब तुम अपनी आँखों देखते हो।
गौतमजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार कहकर उन शिवदूतोंने उस चाण्डालकी योनिसे जीवको खींचकर उसे दिव्य तेजसे सम्पन्न कर दिया। तेजकी राशिसे उद्भासित हो उठी। तत्पश्चात् शिवके दूतोंने प्रसन्न होकर उसे विमानपर बैठाया। वह परम उदाररूप और लावण्यसे सुशोभित तथा दिव्य वस्त्र धारण करनेवाली हो गयी। उसकी देहसे सब ओर दिव्य सुगन्ध और दिव्य प्रकाश फैल रहे थे। वह विमानपर बैठी हुई शिवजीके चरणारविन्दोंका स्मरण कर रही थी। उसे वे पार्षद भगवान् महादेवजीके समीप ले गये। उस समय सब लोकपाल आश्चर्यचकित होकर यह सब देख रहे थे। राजन्! गिरिजापति भगवान् शंकरके प्रति लेशमात्र भक्तिका यह अत्यन्त आश्चर्यजनक माहात्म्य मैंने तुम्हें बताया है, जो समस्त पापराशिका विनाश करनेवाला है।
राजाने पूछा—भगवन्! परमेश्वर शिवका उत्तम लोक कैसा है। यदि आपकी मुझपर दया है तो मुझे शिवलोकका लक्षण बतलाइये।
गौतमजी बोले—ब्रह्मा आदि देवेश्वरोंके लोकोंमें भी जो अत्यन्त दुर्लभ आनन्द है, वह जिस दिव्य धाममें नित्य-निरन्तर विद्यमान रहता है, वही परमेश्वर शिवका लोक है। जहाँ सब लोकोंको लाँघकर जाना होता है, जिसमें दिव्य प्रकाश स्थित है तथा जहाँ अविद्यामय अन्धकारका कहीं लेशमात्र भी संयोग नहीं है, वही परमेश्वर शिवका लोक है। जहाँ काम, क्रोध, लोभ और मद आदि विकार निवास नहीं करते तथा जहाँ जन्म आदि अवस्थाएँ नहीं प्राप्त होतीं, वह परमेश्वर शिवका लोक है। सम्पूर्ण वेदोंका जो एकमात्र प्रधान क्षेत्र कहा जाता है, जिससे अधिक उत्तम वैभव कहीं नहीं है, वह परमेश्वर शिवका धाम है। वहाँ जानेके लिये योगीजन सदा आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार और ध्यान आदि साधनोंसे युक्त योगमार्गका सहारा लेकर प्रयत्न करते रहते हैं। जो लोग भगवान् शिवकी भक्तिसे परिपूर्ण हैं, वे ही
(चित्र-परिचय: उस नारीको दिव्य शरीरकी प्राप्ति हुई और वह)
| * ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * | ६७७ |
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उस दिव्य धाममें जाते हैं। जो भगवान् शंकरकी कथा सुनने और कहनेमें हर्षका अनुभव करते हैं, केवल शान्तिमें जिनकी स्थिति है, जो सब प्राणियोंके अकारण सुहृद् और मोहरहित हैं, वे संसारचक्रको लाँघकर भगवान् शंकरके आनन्दमय धामको पाकर सुखी होते हैं। राजेन्द्र! इसी प्रकार तुम भी गोकर्ण क्षेत्रमें भगवान् शंकरके स्थानपर जाकर उनके दर्शनसे समस्त पापराशिका निवारण करो और कृतकृत्य हो जाओ। वहाँ सब समयमें स्नान करके महाबल शिवकी पूजा करो और शिवचतुर्दशीको एकाग्रतापूर्वक उपवास करके रात्रिमें जागरण तथा बिल्वपत्रद्वारा भगवान् शंकरका पूजन करो। इससे तुम सब पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकको प्राप्त करोगे। ऐसा कहकर मुनिवर गौतम प्रसन्नतापूर्वक मिथिलापुरीको चले गये तथा राजा मित्रसह गोकर्ण क्षेत्रमें आये। वहाँ महाबल नामसे प्रसिद्ध महादेवजीका दर्शन और पूजन करनेसे उनकी समस्त पापराशि धुल गयी। उन्होंने भगवान् शिवके परमधामको प्राप्त कर लिया। जो मनुष्य भगवान् शिवकी इस मनोहर कथाको प्रतिदिन भक्तिपूर्वक सुनता अथवा सुनाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है।
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शिव-पूजाकी महिमाके विषयमें परम शिवभक्त राजा चन्द्रसेन और भक्त श्रीकर गोपकी अद्भुत कथा
सूतजी कहते हैं—भगवान् शिव गुरु हैं, शिव देवता हैं, शिव ही प्राणियोंके बन्धु हैं, शिव ही आत्मा और शिव ही जीव हैं। शिवसे भिन्न दूसरा कुछ नहीं है*। भगवान् शिवके उद्देश्यसे जो कुछ भी दान, जप और होम किया जाता है, उसका फल अनन्त बताया गया है। यह समस्त शास्त्रोंका निर्णय है। जो एकमात्र भगवान् शिवका भजन करता है, वह सब बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। जो प्रीति अपने पुत्र, स्त्री और धनमें की जाती है, वही यदि भगवान् शिवकी पूजामें की जाय तो वह उद्धार कर देती है। इसलिये कितने ही महात्मा पुरुष भगवान् शिवकी पूजाके लिये सम्पूर्ण विषयरूपी मदिराको छोड़ देते हैं। वही जिह्वा सफल है, जो भगवान् शिवकी स्तुति करती है। वही मन सार्थक है, जो शिवके ध्यानमें संलग्न होता है। वे ही कान सफल हैं, जो उनकी कथा सुननेके लिये उत्सुक रहते हैं और वे ही दोनों हाथ सार्थक हैं, जो शिवजीकी पूजा करते हैं। वे नेत्र धन्य हैं, जो महादेवजीकी पूजाका दर्शन करते हैं। वह मस्तक धन्य है, जो शिवके सामने झुक जाता है। वे पैर धन्य हैं, जो भक्तिपूर्वक शिवके क्षेत्रोंमें सदा भ्रमण करते हैं। जिसकी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ भगवान् शिवके कार्योंमें लगी रहती हैं, वह संसारसागरके पार हो जाता है और भोग तथा मोक्ष प्राप्त कर लेता है। शिवकी भक्तिसे युक्त मनुष्य चाण्डाल, पुल्कस, नारी, पुरुष अथवा नपुंसक कोई भी क्यों न हो तत्काल संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है†। जिसके हृदयमें भगवान् शिवकी
* शिवो गुरुः शिवो देवः शिवो बन्धुः शरीरिणाम्। शिव आत्मा शिवो जीवः शिवादन्यन्न किञ्चन॥
(स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० ४। १)
† सा जिह्वा या शिवं स्तौति तन्मनो ध्यायते शिवम्। तौ कर्णौ तत्कथालोलौ तौ हस्तौ तस्य पूजकौ॥
ते नेत्रे पश्यतः पूजां तच्छिरः प्रणतं शिवे। तौ पादौ यौ शिवक्षेत्रं भक्त्या पर्यटतः सदा॥
यस्येन्द्रियाणि सर्वाणि वर्तन्ते शिवकर्मसु। स निस्तरति संसारे भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति॥
शिवभक्तियुतो मर्त्यश्चाण्डालः पुल्कसोऽपि च। नारी नरो वा षण्ढो वा सद्यो मुच्येत संसृतेः॥
(स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० ४। ७—१०)
६७८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
लेशमात्र भी भक्ति है, वह समस्त देहधारियोंके लिये वन्दनीय है।
उज्जयिनीमें चन्द्रसेन नामक एक राजा थे। वे उसी नगरमें निवास करनेवाले भगवान् महाकालका पूजन करते थे। शिवके पार्षदोंमें अग्रगण्य तथा अमंगलोंको जीतनेवाले विश्ववन्दित मणिभद्रजी राजा चन्द्रसेनके सखा हो गये थे। उन्होंने राजापर प्रसन्न होकर एक समय उन्हें दिव्य चिन्तामणि प्रदान की, जो कौस्तुभमणि तथा सूर्यके समान देदीप्यमान थी। वह देखने, सुनने अथवा ध्यान करनेपर भी मनुष्योंको मनोवांछित वस्तु प्रदान करती थी। राजा उस चिन्तामणिको कण्ठमें धारण करके जब सिंहासनपर बैठते थे, तब देवताओंमें सूर्यनारायणकी भाँति उनकी शोभा होती थी। राजा चन्द्रसेनके विषयमें यह सब बात सुनकर समस्त राजाओंके मनमें उस मणिके प्रति लोभकी मात्रा बढ़ गयी और वे क्षुब्ध रहने लगे। एक बार उन सबने बहुत-सी सेना साथ लेकर क्रोधपूर्वक पृथ्वीको कम्पित करते हुए आक्रमण किया और उज्जयिनीके चारों द्वारोंको घेर लिया। अपनी पुरीको घिरी हुई देख राजा चन्द्रसेन भगवान् महाकालकी शरणमें गये और मनको सन्देहरहित करके दृढ़ निश्चयके साथ उपवासपूर्वक दिन-रात अनन्यभावसे भगवान् गौरीपतिकी आराधना करने लगे। उन्हीं दिनों उस नगरमें कोई ग्वालिन रहती थी, जिसके एकमात्र पुत्र था। वह विधवा थी और उज्जयिनीमें बहुत दिनोंसे रहती थी। वह अपने पाँच वर्षके बालकको लिये हुए महाकालके मन्दिरमें गयी और राजा चन्द्रसेनद्वारा की हुई गिरिजापतिकी महापूजाका दर्शन किया। शिवपूजनका वह आश्चर्यमय उत्सव देखकर उसने भगवान्को प्रणाम किया और पुनः अपने निवासस्थानपर लौट आयी। ग्वालिनके उस बालकने भी वह सारी पूजा देखी थी। अतः घर आनेपर उसने कौतूहलवश शिवजीकी पूजा प्रारम्भ की, जो संसारसे वैराग्य प्रदान करनेवाली है। एक सुन्दर पत्थर लाकर उसे घरसे थोड़ी ही दूरपर एकान्त स्थानमें रख दिया और उसीको शिवलिंग माना। फिर अपने हाथसे मिलने लायक जो कोई भी फूल दिखायी दिये, उन सबका संग्रह करके उस बालकने जलसे शिवलिंगको स्नान कराया और भक्तिपूर्वक पूजन किया। तत्पश्चात् कृत्रिम अलंकार, चन्दन, धूप, दीप और अक्षत आदि उपचारोंसे अर्चना करके मनःकल्पित दिव्य वस्तुओंसे भगवान्को नैवेद्य निवेदन किया। सुन्दर-सुन्दर पत्रों और फूलोंसे बार-बार पूजा करके भाँति-भाँतिसे नृत्य किया और बारंबार भगवान्के चरणोंमें सीस झुकाया। इस प्रकार अनन्यचित्त होकर शिवकी आराधनामें लगे हुए अपने पुत्रको ग्वालिनने बड़े प्यारसे भोजनके लिये बुलाया। उसका मन तो पूजामें लगा हुआ था, माताके बहुत बुलानेपर भी उसे भोजन करनेकी इच्छा न हुई। तब उसकी माँ स्वयं उसके पास गयी और उसे शिवके आगे आँख बंद करके ध्यान लगाये बैठा देख हाथ पकड़कर खींचने लगी। इतनेपर भी जब वह न उठा, तब उसने क्रोधमें आकर उसे खूब पीटा। खींचने और मारने-पीटनेपर भी जब उसका पुत्र नहीं आया, तब उसने वह शिवलिंग उठाकर दूर फेंक दिया और उसपर चढ़ायी हुई सारी पूजा-सामग्री नष्ट कर दी। यह देख बालक 'हाय-हाय' करके रो उठा। रोषमें भरी हुई ग्वालिन अपने बेटेको डाँट-डपटकर पुनः घरमें चली गयी। भगवान् शिवकी पूजाको माताके द्वारा नष्ट की हुई देखकर वह बालक 'देव! देव! महादेव!' की पुकार करते हुए सहसा मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। उसके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा प्रवाहित हो रही थी। दो घड़ी बाद जब उसे चेत हुआ, तब उसने
- ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६७९
आँखें खोलीं और देखा—उसका वही निवासस्थान परम सुन्दर शिवालय हो गया था। मणियोंके खम्भे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके द्वार, किवाड़ तथा सदर फाटक सब सुवर्णमय हो गये थे। वहाँकी भूमि बहुमूल्य नीलमणि तथा हीरोंकी वेदिकाओंसे सुशोभित थी। यह सब देखकर वह सहसा उठा और हर्षसे परमानन्दके समुद्रमें निमग्न-सा हो गया। उसने समझ लिया कि यह सब शिवजीकी पूजाका माहात्म्य है। उसीके प्रभावसे यह दिव्य विभूति प्रकट हुई है। तत्पश्चात् उस बालकने अपनी माताके अपराधकी शान्तिके लिये पृथ्वीपर मस्तक रखकर साष्टांग प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'देव! उमापते! मेरी माताका अपराध क्षमा कीजिये। वह मूढ़ है, आपके प्रभावको नहीं जानती है। शंकर! आप उसपर प्रसन्न होइये, यदि मुझमें आपकी भक्तिसे उत्पन्न हुआ कुछ भी पुण्य है, तो उससे मेरी माता आपकी दया प्राप्त करे।'
इस प्रकार भगवान् शंकरको बार-बार प्रसन्न करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाकर सूर्यास्तके समय वह बालक शिवालयसे बाहर निकला और उसने अपने शिविरको देखा। वह इन्द्रनगरके समान शोभा पा रहा था। वहाँ सब कुछ तत्काल सुवर्णमय होकर विचित्र वैभवसे प्रकाशित होने लगा। भवनके भीतर प्रवेश करके बालकने देखा, उसकी माँ बहुमूल्य रत्नमय पलंगपर बिछी हुई श्वेत रंगकी शय्यापर निर्भय होकर सो रही है और उसीको याद करती है। उसने माताको जगाया। ग्वालिन बड़े वेगसे उठी और अपनेको, अपने पुत्रको तथा अपने घरको भी अपूर्व रूपमें देखकर आनन्दसे विह्वल हो गयी। पुत्रके मुखसे गिरिजापति शंकरका वह सब प्रसाद सुनकर ग्वालिनने राजाको सूचना दी, जो निरन्तर भगवान् शिवके भजनमें लगे रहते थे। राजा अपना नियम पूरा करके रातमें सहसा वहाँ आये और ग्वालिनके पुत्रका वह प्रभाव, जो शंकरजीके सन्तोषसे प्रकट हुआ था, देखा। सुवर्णमय शिव-मन्दिर, रत्नमय शिवलिंग तथा सुन्दर मणि-माणिक्योंसे जगमगाता हुआ ग्वालिनका महल देखकर राजा चन्द्रसेन पुरोहित और मन्त्रियोंके साथ दो घड़ीतक आश्चर्य-चकित हो परमानन्दमें डूबे रहे। तत्पश्चात् उन्होंने नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बहाते हुए ग्वालिनके उस बालकको हृदयसे लगा लिया। भगवान् शिवके इस अद्भुत माहात्म्यकी चर्चा समस्त पुरवासियोंमें बड़े वेगसे फैली और यही कहते-सुनते वह रात मानो क्षणभरमें व्यतीत हो गयी।
युद्धके लिये आये हुए और नगरको चारों ओरसे घेरकर खड़े हुए राजाओंने भी प्रातःकाल दूतोंके मुखसे यह परम अद्भुत समाचार सुना। सुनते ही उनके मनसे वैरभाव निकल गया। उन्होंने सहसा हथियार डाल दिये और चकित होकर महाराज चन्द्रसेनकी आज्ञासे नगरमें प्रवेश किया। उस रमणीय नगरीमें प्रवेश करके भगवान् महाकालको प्रणाम करनेके पश्चात् सब राजा उस ग्वालिनके घरपर आये। वहाँ राजा चन्द्रसेनने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया। वे बहुमूल्य आसनोंपर बैठे और प्रीतिपूर्वक विस्मित एवं आनन्दित हुए। गोप-बालकपर कृपा करनेके लिये स्वतः प्रकट हुए शिवालय और शिवलिंगका दर्शन करके सब राजाओंने भगवान् शिवको अपनी उत्तम बुद्धि समर्पित की, उनमें भक्तिपूर्वक मन लगाया।
इसी समय सब देवताओंसे पूजित परम तेजस्वी वानरराज हनुमान्जी वहाँ प्रकट हुए। उनके आते ही सब राजाओंने बड़े वेगसे उठकर भक्तिभावसे विनीत हो उन्हें नमस्कार किया। तब हनुमान्जीने कहा—'राजाओ! भगवान् शिवकी पूजाके सिवा देहधारियोंके लिये दूसरी कोई गति नहीं है। यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि इस गोप-बालकने शनिवारको प्रदोषव्रतके दिन बिना
६८० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
मन्त्रके भी शिवका पूजन करके उन्हें पा लिया। शनिवारको प्रदोषव्रत समस्त देहधारियोंके लिये दुर्लभ है। कृष्ण पक्ष आनेपर तो वह और भी दुर्लभ है। गोपवंशकी कीर्ति बढ़ानेवाला यह बालक संसारमें सबसे अधिक पुण्यात्मा है। इसकी वंश-परम्परामें आठवीं पीढ़ीमें महायशस्वी नन्द उत्पन्न होंगे, जिनके यहाँ साक्षात् भगवान् नारायण उनके पुत्ररूपसे प्रकट हो श्रीकृष्णके नामसे प्रसिद्ध होंगे। आजसे यह गोपालनन्दन संसारमें 'श्रीकर' नामसे विख्यात होगा।'
अंजनिनन्दन हनुमान्जी ऐसा कहकर उस गोपबालकको शिवोपासनाके आचार-व्यवहारका उपदेश दे वहीं अन्तर्धान हो गये। वे सब राजा हर्षमें भरकर महाराज चन्द्रसेनकी आज्ञा ले जैसे आये थे वैसे ही लौट गये। महातेजस्वी श्रीकर भी हनुमान्जीका उपदेश पाकर धर्मज्ञ ब्राह्मणोंके साथ शंकरजीकी आराधना करने लगा। समयानुसार भक्त श्रीकर गोप तथा राजा चन्द्रसेन दोनोंने भक्तिपूर्वक शिवकी आराधना करके परम पद प्राप्त किया। यह परम पवित्र उपाख्यान कहा गया। यह गोपनीय रहस्य है, सुयश एवं पुण्यसमृद्धिको बढ़ानेवाला है तथा गौरीपति भगवान् शिवके चरणारविन्दोंमें भक्तिभावकी वृद्धि और पापराशिका निवारण करनेवाला है।
प्रदोषमें शिवपूजनकी अवहेलनासे दोषकी प्राप्तिके प्रसंगमें विदर्भराज और उसके पुत्रकी कथा
सूतजी कहते हैं— त्रयोदशी तिथिमें सायंकाल प्रदोष कहा गया है। प्रदोषके समय महादेवजी कैलासपर्वतके रजतभवनमें नृत्य करते हैं और देवता उनके गुणोंका स्तवन करते हैं। अतः धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको प्रदोषमें नियमपूर्वक भगवान् शिवकी पूजा, होम, कथा और गुणगान करने चाहिये। दरिद्रताके तिमिरसे अन्धे और भवसागरमें डूबे हुए संसारभयसे भीरु मनुष्योंके लिये यह प्रदोषव्रत पार लगानेवाली नौका है। भगवान् शिवकी पूजा करनेसे मनुष्य दरिद्रता, मृत्यु-दुःख और पर्वतके समान भारी ऋण-भारको शीघ्र ही दूर करके सम्पत्तियोंसे पूजित होता है।
विदर्भ देशमें सत्यरथ नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे, जो सब धर्मोंमें तत्पर, धीर, सुशील और सत्यप्रतिज्ञ थे। धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन करते हुए उनका बहुत-सा समय सुखपूर्वक बीत गया। तदनन्तर शाल्व देशके राजाओंने विदर्भनगरपर आक्रमण करके उसे चारों ओरसे घेर लिया। अपनी पुरीको शत्रुओंसे घिरी हुई देख विदर्भराज विशाल सेना साथ लेकर युद्धके लिये आये। बलोन्मत्त शाल्वदेशीय क्षत्रियोंके साथ राजाका अत्यन्त भयंकर युद्ध हुआ। शाल्वोंकी बहुत बड़ी सेना मारी गयी; परंतु अन्तमें विदर्भराज भी उनके हाथसे मारे गये। मन्त्रियोंसहित उस महारथी वीर राजाके मारे जानेपर मरनेसे बचे हुए सैनिक भाग खड़े हुए। उस समय विदर्भराज सत्यरथकी एक पतिव्रता स्त्री अत्यन्त शोकग्रस्त हो रातके समय राजभवनसे निकलकर पश्चिम दिशाकी ओर चली गयी। वह गर्भवती थी। सबेरा होनेपर धीरे-धीरे मार्गसे जाती हुई उस साध्वी रानीने बहुत दूरका रास्ता तय कर लेनेके पश्चात् एक स्वच्छ तालाब देखा और वह उसके किनारे शोभा पानेवाले एक छायादार वृक्षके नीचे बैठ गयी। भाग्यवश उसी निर्जन स्थानमें वृक्षके ही नीचे पतिव्रता रानीने उत्तम गुणोंसे युक्त शुभ
- ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६८१
मुहूर्तमें एक पुत्रको जन्म दिया। तत्पश्चात् अत्यन्त प्याससे व्याकुल हो वह सुन्दर अंगोंवाली रानी जलाशयमें उतरी। इतनेमें ही एक बड़े भारी ग्राहने आकर उसे अपना ग्रास बना लिया। वह बालक पैदा होते ही माता-पितासे हीन हो गया और भूख-प्याससे पीड़ित हो उस सरोवरके किनारे जोर-जोरसे रोने लगा। वह नवजात शिशु जब इस प्रकार क्रन्दन कर रहा था, उसी समय भाग्यवश वहाँ एक श्रेष्ठ ब्राह्मणी आ पहुँची। वह भी अपने एक वर्षके बालकको गोदमें लिये हुए आयी थी। ब्राह्मणी निर्धन और विधवा थी।
घर-घर भीख माँगकर जीवन-निर्वाह करती थी। उसका नाम उमा था। उसी सती-साध्वी ब्राह्मणीने उस राजकुमारको देखा। उसे अनाथकी भाँति क्रन्दन करते देखकर उसने मन-ही-मन विचार किया—‘अहो! यह तो बड़े आश्चर्यकी बात दिखायी देती है कि यह नवजात शिशु, जिसकी नाल भी अभीतक नहीं कटी है, पड़ा हुआ है। इसकी माता कहाँ चली गयी। न इसका पिता है न और कोई बन्धु-बान्धव है। यह दीन अनाथ बालक बिना बिस्तरके भूमिपर सो रहा है। यह चाण्डालका पुत्र है या शूद्रका, वैश्यका बालक है या ब्राह्मणका अथवा यह क्षत्रियका शिशु है। इसका निश्चय कैसे किया जाय? मैं इस शिशुको उठाकर अपने सगे पुत्रकी तरह अवश्य पालन कर सकती हूँ; परंतु यह किस कुलका है, यह न जाननेके कारण इसे छूनेका साहस नहीं होता।' वह पतिव्रता ब्राह्मणी जब इस प्रकार कह रही थी, उसी समय कोई संन्यासी महात्मा वहाँ आ गये। वे ऐसे जान पड़ते थे, मानो साक्षात् शंकर हों। उन श्रेष्ठ भिक्षुने उस स्त्रीसे कहा—'ब्राह्मणी! खेद न करो, हृदयकी संशयवृत्ति दूरकर इस बालककी रक्षा करो। इससे तुम्हें शीघ्र ही परम कल्याणकी प्राप्ति होगी।' इतना कहकर वे दयालु भिक्षु तुरंत वहाँसे चले गये। उनके जानेके बाद ब्राह्मणीने विश्वासपूर्वक उस बालकको लेकर अपने घरकी ओर प्रस्थान किया। उस राजकुमारका ब्राह्मणीने अपने बेटेके समान ही पालन-पोषण किया। एकचक्रा नामक नगरमें उस ब्राह्मणीका घर था। वह भिक्षाके अन्नसे ही अपने पुत्र और राजकुमारको भी पालने लगी। ब्राह्मणोंने ब्राह्मणीके तथा राजाके भी पुत्रका संस्कार कर दिया। वे दोनों सर्वत्र सम्मानित होकर दिन-दिन बढ़ने लगे। समय आनेपर उनका उपनयन-संस्कार हुआ। अब वे दोनों बालक एक साथ रहकर नियमोंका पालन करने लगे। दोनों माताके साथ प्रतिदिन भिक्षाके लिये जाते थे। एक दिन वह ब्राह्मणी उन दोनों बालकोंके साथ भीख माँगती हुई दैवयोगसे देव-मन्दिरमें गयी। वहाँ बड़े-बूढ़े ऋषि-मुनि रहा करते थे। उन दोनों बालकोंको देखकर परम बुद्धिमान् शाण्डिल्य नामक मुनिने कहा—‘अहो! दैवका बल बड़ा विचित्र है। कर्मोंका उल्लंघन करना किसी भी जीवके लिये अत्यन्त कठिन है। देखो न, यह बालक दूसरी माताकी शरण लेकर भिक्षासे जीवननिर्वाह करता है। इस ब्राह्मणीको
६८२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
ही श्रेष्ठ माताके रूपमें पाकर ब्राह्मण बालकके साथ ब्राह्मणभावको प्राप्त हो गया है।' शाण्डिल्य मुनिका यह वचन सुनकर ब्राह्मणीको बड़ा विस्मय हुआ। उसने भरी सभामें मुनिको प्रणाम करके पूछा—'ब्रह्मन्! एक संन्यासीके कहनेसे मैं इस बालकको अपने घर ले आयी हूँ। यद्यपि अभीतक इसके कुलका पता नहीं लगा, तथापि मैं पुत्रकी भाँति इसका पालन-पोषण करती हूँ। आप ज्ञानके नेत्रोंसे देखते हैं, अतः आपसे मैं यह जानना चाहती हूँ कि यह बालक किस कुलमें उत्पन्न हुआ है और इसके माता-पिता कौन हैं?'
मुनि बोले—यह विदर्भदेशके राजाका पुत्र है।
इतना कहकर मुनिने उस बालकके पिताके युद्धमें मारे जानेका तथा उसकी माताके ग्राहद्वारा ग्रस्त होनेका सब समाचार पूर्णरूपसे बतलाया। यह सुनकर ब्राह्मणीको और भी आश्चर्य हुआ। अतः उसने फिर प्रश्न किया—'महामुने! वे राजा सम्पूर्ण भोगोंको छोड़कर युद्धमें क्यों मरे और इस बालकको दरिद्रता कैसे प्राप्त हुई? अब दरिद्रताको पूर्णतः नष्ट करके यह पुनः राज्य कैसे प्राप्त करेगा? मेरा यह पुत्र भी भिक्षान्नसे ही जीवन-निर्वाह करता है। अतः इसकी दरिद्रताके निवारणका भी क्या उपाय है, यह बतानेकी कृपा करें?'
शाण्डिल्यने कहा—इस राजकुमारके पिता विदर्भराज पूर्वजन्ममें पाण्ड्य देशके श्रेष्ठ राजा थे। वे सब धर्मोंके ज्ञाता थे और सम्पूर्ण पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन करते थे। एक दिन प्रदोषकालमें राजा भगवान् शंकरका पूजन कर रहे थे और बड़ी भक्तिसे त्रिलोकीनाथ महादेवजीकी आराधनामें संलग्न थे। उसी समय नगरमें सब ओर बड़ा भारी कोलाहल मचा। उस उत्कट शब्दको सुनकर राजाने बीचमें ही भगवान् शंकरकी पूजा छोड़ दी और नगरमें क्षोभ फैलनेकी आशंकासे राजभवनसे बाहर निकल गये। इसी समय राजाका महाबली मन्त्री शत्रुको पकड़कर उनके समीप ले आया। वह शत्रु पाण्ड्यराजका ही सामन्त था। उसे देखकर राजाने क्रोधपूर्वक उसका मस्तक कटवा दिया। शिवपूजा छोड़कर नियमको समाप्त किये बिना ही राजाने रातमें भोजन भी कर लिया। इसी प्रकार राजकुमार भी प्रदोषकालमें शिवजीकी पूजा किये बिना ही भोजन करके सो गया। वही राजा दूसरे जन्ममें विदर्भराज हुआ था। शिवजीकी पूजामें विघ्न होनेके कारण शत्रुओंने उसको सुखभोगके बीचमें ही मार डाला। पूर्वजन्ममें जो उसका पुत्र था, वही इस जन्ममें भी हुआ है। शिवजीकी पूजाका उल्लंघन करनेके कारण यह दरिद्रताको प्राप्त हुआ है। इसकी माताने पूर्वजन्ममें छलसे अपनी सौतको मार डाला था। उस महान् पापके कारण ही वह इस जन्ममें ग्राहके द्वारा मारी गयी। मैं सत्य कहता हूँ, परलोकमें हितकी बात कहता हूँ, शास्त्रोंका सार एवं उपनिषदोंका हृदय कहता हूँ, इस भयंकर असार संसारको प्राप्त हुए जीवके लिये ईश्वरके चरणारविन्दोंकी सेवा ही सार वस्तु है। जो प्रदोषकालमें अनन्यचित्त होकर परमेश्वरके चरणारविन्दोंकी पूजा करते हैं, वे इसी संसारमें सदा बढ़नेवाले धन-धान्य, स्त्री-पुत्र, सौभाग्य और सम्पत्तिके द्वारा सबसे बढ़कर होते हैं। ब्राह्मणी! यह तुम्हारा पुत्र पूर्वजन्ममें उत्तम ब्राह्मण था। इसने सारी आयु केवल दान लेनेमें बितायी है। यज्ञ आदि सत्कर्म नहीं किये हैं। इसीलिये यह दरिद्रताको प्राप्त हुआ है। उस दोषका निवारण करनेके लिये अब यह भगवान् शंकरकी शरणमें जाय।
- ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * | ६८३ ---|---
प्रदोषव्रतकी विधि, इसके पालनसे द्विजकुमार और राजकुमारकी दरिद्रताका निवारण तथा राज्यकी प्राप्ति
सूतजी कहते हैं—मुनिके इस प्रकार कहनेपर साध्वी ब्राह्मणीने उन्हें प्रणाम करके शिवपूजनकी विधिका क्रम पूछा।
शाण्डिल्य बोले—दोनों पक्षोंकी त्रयोदशीको मनुष्य जब निराहार रहे, तब सूर्यास्तसे तीन घड़ी पहले स्नान करे। फिर श्वेत वस्त्र धारण करके धीर पुरुष सन्ध्या और जप आदि नित्यकर्मकी विधि पूरी करके मौन हो शास्त्रविधिका पालन करते हुए भगवान् शिवकी पूजा प्रारम्भ करे। भगवद्विग्रहके आगेकी भूमिको नये निकाले हुए शुद्ध जलसे भलीभाँति लीप-पोतकर सुन्दर मण्डल बनावे। धौत-वस्त्र आदिके द्वारा उस मण्डलको सब ओरसे घेर दे। ऊपरसे चाँदौवा आदि लगाकर फल-फूल और नवीन अंकुरोंसे उसको सजावे। मण्डलके मध्यकी भूमिमें पाँच रंगोंसे युक्त विचित्र कमल अंकित करके उसीपर सुस्थिर एवं उत्तम आसन बिछाकर बैठे और हृदयमें भक्तिभावसे युक्त हो पूजाकी सब सामग्री एकत्र करे। फिर पवित्र भावसे शास्त्रोक्त मन्त्रद्वारा देवपीठको आमन्त्रित करे। तत्पश्चात् क्रमशः आत्मशुद्धि और भूतशुद्धि आदि करके तीन प्राणायाम करे। उसके बाद विन्दुयुक्त बीजाक्षरोंके द्वारा विधिपूर्वक मातृकान्यास करे। तदनन्तर परा देवताका ध्यान करके मातृकान्यासकी विधि पूरी करे। फिर परम शिवका ध्यान करके पीठके वाम भागमें गुरुको प्रणाम करे, दक्षिण भागमें गणेशजीको मस्तक झुकावे, दोनों अंशों (कन्धों) और ऊरुओं (जाँघों) में धर्म आदि (धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य) का न्यास करे। नाभि तथा पार्श्वभागोंमें अधर्म (अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्वर्य) आदिका न्यास करे। तत्पश्चात् हृदयमें अनन्त आदिका न्यास करके देवपीठपर मन्त्रका न्यास करे। आधारशक्तिसे लेकर ज्ञानात्मातकका क्रमशः न्यास करके हृदयमें एक कमलकी भलीभाँति भावना करे। वह कमल नौ शक्तियोंसे युक्त एवं परम सुन्दर हो। उसी कमलकी कर्णिकामें कोटि-कोटि चन्द्रमाओंके समान प्रकाशमान उमापति भगवान् शिवका ध्यान करे। भगवान्के तीन नेत्र हैं। मस्तकपर चन्द्रमाका मुकुट शोभा पाता है। जटाजूट कुछ-कुछ पीला हो गया है। उसपर रत्नजटित किरीट सुशोभित है। उनके कण्ठमें नील चिह्न है और अंग-अंगसे उदारता सूचित होती है। सर्पोंके हारसे उनकी बड़ी शोभा हो रही है। उनके एक हाथमें वरद और दूसरेमें अभयकी मुद्रा है। वे फरसा धारण करते हैं। उन्होंने नागोंका कंकण, केयूर, अंगद तथा मुद्रिका धारण कर रखी है। वे व्याघ्रचर्म पहने हुए रत्नमय सिंहासनपर विराजमान हैं। उनके वाम भागमें गिरिराजनन्दिनी उमादेवीका चिन्तन करे। इस प्रकार महादेवजी तथा गिरिजादेवीका ध्यान करके क्रमशः गन्ध आदिसे उनकी मानसिक पूजा करे। पाँच वैदिक मन्त्रोंसे गन्ध आदि द्वारा पूर्वोक्त पाँच स्थानोंमें अथवा हृदयमें पूजा करे। फिर मूलमन्त्रसे तीन बार हृदयमें ही पुष्पांजलि दे। उसके बाद बाह्यपीठ (सिंहासन) पर महादेवजीका पुनः पूजन प्रारम्भ करे। पूजाके आरम्भमें एकाग्रचित्त होकर संकल्प पढ़े। तदनन्तर हाथ जोड़कर मन-ही-मन भगवान् शिवका ध्यान एवं आवाहन करे—‘हे भगवान् शंकर! आप ऋण, पातक, दुर्भाग्य और दरिद्रता आदिकी निवृत्तिके लिये तथा सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेके लिये मुझपर प्रसन्न होइये। मैं दुःख और शोककी आगमें जल रहा हूँ, संसारभयसे पीड़ित हूँ, अनेक प्रकारके रोगोंसे व्याकुल और दीन हूँ। वृषवाहन! मेरी रक्षा कीजिये। देवदेवेश्वर! सबको निर्भय
६८४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
कर देनेवाले महादेवजी! आप यहाँ पधारिये और मेरी की हुई इस पूजाको पार्वतीजीके साथ ग्रहण कीजिये।' इस प्रकार संकल्प और आवाहन करके पूजा आरम्भ करनी चाहिये। तत्पश्चात् मनुष्य एकाग्रचित्त हो रुद्रसूक्तका पाठ करते हुए वहाँ स्थापित किये हुए शंखके जलसे और पंचामृतसे महादेवजीका अभिषेक करके भाँति-भाँतिके मन्त्रोंसे आसन आदि उपचारोंको समर्पित करे। भावनाद्वारा दिव्य वस्त्रोंसे विभूषित स्वर्णसिंहासनकी कल्पना करे और उसीपर भगवान्को विराजमान करके अष्टगुणयुक्त अर्घ्य और पाद्य निवेदन करे। फिर शुद्ध जलसे आचमन कराकर मधुपर्क दे। उसके बाद पुनः आचमनके लिये जल देकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक स्नान करावे। फिर यज्ञोपवीत, वस्त्र और आभूषण अर्पण करे। परम पवित्र अष्टांगयुक्त चन्दन चढ़ावे। बिल्व, मदार, लाल कमल, धतूर, कनेर, सनईका फूल, चमेली, कुशा, अपामार्ग, तुलसी, जूही, चम्पा, भटकटइया और करवीरके फूलोंमेंसे जितने मिल जायँ, उन सबको शिवोपासक भगवान् शिवपर चढ़ावे। इनके अतिरिक्त भी नाना प्रकारके सुगन्धित पुष्प निवेदन करे। तत्पश्चात् लाल चन्दनसे उत्पन्न धूप और निर्मल दीप समर्पित करे। उसके बाद हाथ धोकर घी, नमकीन और साग, मिठाई, पूआ, शक्कर तथा गुड़के बने हुए पदार्थ एवं खीरका नैवेद्य भोग लगावे। मधु, दही और जल भी अर्पण करे। उस खीरका ही मन्त्रद्वारा प्रज्वलित की हुई अग्निमें हवन करे। यह होम शास्त्रोक्तविधिसे आचार्यके कथनानुसार सम्पन्न करना चाहिये। भगवान् शंकरको नैवेद्य देकर मुखशुद्धिके लिये उत्तम ताम्बूल अर्पण करे। धूप, आरती, सुन्दर छत्र, उत्तम दर्पणको वैदिक-तान्त्रिक मन्त्रोंद्वारा विधिपूर्वक समर्पित करे। यदि यह सब करनेकी अपनेमें शक्ति न हो, अधिक धनका अभाव हो, तो अपने पास जितना धन हो, उसीके अनुसार भगवान्की पूजा करे। गौरीपति भगवान् शंकर भक्तिपूर्वक भेंट किये हुए पुष्पमात्रसे भी सन्तुष्ट हो जाते हैं। तदनन्तर स्तोत्रोंद्वारा स्तुति करके भगवान्को साष्टांग प्रणाम करे। फिर परिक्रमा करके पूजा समर्पित करनेके पश्चात् विधिपूर्वक श्रीगिरिजापतिकी प्रार्थना करे।
'देव! जगन्नाथ! आपकी जय हो। सनातन शंकर! आपकी जय हो। सम्पूर्ण देवताओंके अधीश्वर! आपकी जय हो। सर्वदेवपूजित! आपकी जय हो। सर्वगुणातीत! आपकी जय हो। सबको वर देनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। नित्य, आधाररहित, अविनाशी विश्वम्भर! आपकी जय हो, जय हो। सम्पूर्ण विश्वके लिये एकमात्र जानने योग्य महेश्वर! आपकी जय हो। नागराज वासुकिको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। गौरीपते! आपकी जय हो। चन्द्रार्धशेखर शम्भो! आपकी जय हो। कोटि सूर्योंके समान तेजस्वी शिव! आपकी जय हो। अनन्त गुणोंके आश्रय! आपकी जय हो। भयंकर नेत्रोंवाले रुद्र! आपकी जय हो। अचिन्त्य! निरंजन! आपकी जय हो। नाथ! दयासिन्धो! आपकी जय हो। भक्तोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। दुस्तर संसारसागरसे पार उतारनेवाले परमेश्वर! आपकी जय हो। महादेव! मैं संसारके दुःखोंसे पीड़ित एवं खिन्न हूँ, मुझपर प्रसन्न होइये। परमेश्वर! समस्त पापोंके भयका अपहरण करके मेरी रक्षा कीजिये। मैं महान् दारिद्र्यके समुद्रमें डूबा हुआ हूँ। बड़े-बड़े पापोंने मुझे आक्रान्त कर लिया है। मैं महान् शोकसे नष्ट और बड़े-बड़े रोगोंसे व्याकुल हूँ। सब ओरसे ऋणके भारसे लदा हुआ हूँ। पापकर्मोंकी आगमें जल रहा हूँ और ग्रहोंसे पीड़ित हो रहा हूँ। शंकर! मुझपर प्रसन्न होइये*।'
* जय देव जगन्नाथ जय शंकर शाश्वत । जय सर्वसुराध्यक्ष जय सर्वसुरार्चित ॥
जय सर्वगुणातीत जय सर्ववरप्रद । जय नित्य निराधार जय विश्वम्भराव्यय ॥
- ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६८५
निर्धन मनुष्य इस प्रकार पूजाके अन्तमें भगवान् गिरिजापतिकी प्रार्थना करे। धनाढ्य अथवा राजाको इस प्रकार भगवान् शंकरकी प्रार्थना करनी चाहिये— 'हे शंकरजी ! आपके प्रसादसे मेरे सदा आनन्द रहे। मेरे राज्यमें लुटेरे न रहें, सब लोग निरापद होकर रहें। पृथ्वीपर अकाल, महामारी आदिके सन्ताप शान्त हो जायँ। सबकी खेती धन-धान्यसे समृद्ध हो। सम्पूर्ण दिशाओंमें सुखका साम्राज्य छा जाय।' इस प्रकार प्रदोषव्रतके दिन गिरिजापति भगवान् शंकरकी आराधना करे, ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उन्हें दक्षिणा देकर सन्तुष्ट करे। इस प्रकार मैंने सब पापोंका नाश, सब प्रकारकी दरिद्रताका निवारण तथा समस्त मनोवांछित वस्तुओंका दान करनेवाली शिवपूजाका वर्णन किया। यह शिवकी पूजा शिवजीके द्रव्यका हरण करनेके पापको छोड़कर शेष सभी महापातकों और उपपातकोंके महान् समुदायका नाश करती है। यदि ये दोनों बालक इसी प्रकार भगवान् शंकरका पूजन प्रत्येक प्रदोषके दिन करते रहें, तो वर्षभरके भीतर ही इन्हें उत्तम सिद्धिकी प्राप्ति होगी।
शाण्डिल्य मुनिका यह वचन सुनकर उस ब्राह्मणीने दोनों बालकोंके साथ मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'भगवन् ! आज मैं आपके दर्शनमात्रसे कृतार्थ हो गयी। ये दोनों बालक आजसे आपकी शरणमें हैं। ब्रह्मन् ! यह मेरा पुत्र है और इसका नाम शुचिव्रत है और यह राजकुमार है, जिसका नाम मैंने धर्मगुप्त रख दिया है। ये दोनों बालक और मैं सभी आपके चरणोंके दास हैं। इस घोर दारिद्र्यसागरमें गिरे हुए हम सबका आप उद्धार कीजिये।'
इस प्रकार शरणमें आयी हुई ब्राह्मणीको अमृतके समान मधुर वचनोंद्वारा आश्वासन देकर मुनिने उसके दोनों बालकोंको भगवान् शंकरके आराधनकी मन्त्र-विद्याका उपदेश दिया। तत्पश्चात् दोनों बालक और ब्राह्मणी मुनिकी आज्ञा ले वहाँसे चले गये। मुनिवरके उपदेशानुसार दोनों बालक प्रत्येक प्रदोषव्रतके दिन पार्वतीवल्लभ शिवकी आराधना करने लगे। इस प्रकार शिवपूजा करते हुए द्विजकुमार और राजकुमारके चार महीने सुखपूर्वक बीत गये। एक दिन द्विजकुमार राजकुमारको साथ लिये बिना ही नदीके तटपर स्नान करनेके लिये गया और वहाँ मौजसे देरतक इधर-उधर घूमता रहा। वहाँ झरनेके जलके आघातसे खाईंकी भूमि कट जानेसे उसमें गड़ा हुआ एक बड़ा भारी खजानेका कलश चमक रहा था, जिसपर ब्राह्मणकुमारकी दृष्टि पड़ी। उसे देखकर वह सहसा हर्ष और कौतूहलमें भरकर उसके समीप गया और उसे देवताके प्रसादसे प्राप्त हुआ मानकर सिरपर लेकर घरको चल दिया तथा घरके भीतर उस घड़ेको रखकर मातासे कहा—'माँ! यह भगवान् शंकरका प्रसाद तो देखो, उन्होंने दया करके घड़ेके रूपमें यह खजाना दिखला दिया।' तब उस पतिव्रता ब्राह्मणीने राजकुमारको भी बुलाकर कहा—'पुत्रो ! इस खजानेके घड़ेको तुम दोनों आपसमें बराबर-बराबर बाँट लो।' माताकी बातको सुनकर ब्राह्मणके पुत्रको प्रसन्नता हुई। किंतु राजपुत्रने उससे कहा—'माँ! यह तुम्हारे ही पुत्रके पुण्यसे प्राप्त हुआ है, अतः मैं इस खजानेको बाँटकर लेना नहीं चाहता हूँ। अपने पुण्यसे प्राप्त हुए खजानेका ये स्वयं ही उपभोग करें। वे ही भगवान्
जय विश्वैकवेद्येश जय नागेन्द्रभूषण। जय गौरीपते शम्भो जय चन्द्रार्धशेखर॥
जय कोट्यर्कसंकाश जयानन्तगुणाश्रय। जय रुद्र विरूपाक्ष जयाचिन्त्य निरञ्जन॥
जय नाथ कृपासिन्धो जय भक्तार्तिभञ्जन। जय दुस्तरसंसारसागरोत्तारण प्रभो॥
प्रसीद मे महादेव संसारार्तस्य खिद्यतः। सर्वपापभयं हत्वा रक्ष मां परमेश्वर॥
महादारिद्र्यमग्नस्य महापापहतस्य च। महाशोकविनष्टस्य महारोगातुरस्य च॥
ऋणभारपरीतस्य दह्यमानस्य कर्मभिः। ग्रहैः प्रपीड्यमानस्य प्रसीद मम शंकर॥
(स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० ७।५९-६६)
६८६
- संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
शंकर मुझपर भी कृपा करेंगे।' इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक भगवान् शंकरकी पूजा करते हुए उन दोनों कुमारोंका उसी घरमें एक वर्ष व्यतीत हो गया। एक दिन राजकुमार उस ब्राह्मणकुमारके साथ वसन्त-ऋतुमें वनमें भ्रमण करनेके लिये गया। कुछ दूर जानेपर उन्होंने सैकड़ों गन्धर्वकन्याओंको परस्पर क्रीडा करते हुए देखा। उन्हें देखकर ब्राह्मणकुमारने दूरसे ही राजकुमारसे कहा- 'यहाँसे आगे जाना उचित नहीं है; क्योंकि उधर स्त्रियाँ विहार कर रही हैं। स्वच्छ अन्तःकरणवाले विद्वान् पुरुष स्त्रियोंका सामीप्य त्याग देते हैं। ये रमणियाँ छल करनेवाली तथा वाणीद्वारा अनुनय-विनय करनेमें कुशल हैं। ये पुरुषोंको अपनी दृष्टिमात्रसे मोहित कर लेती हैं। इसलिये अपने धर्ममें तत्पर ब्रह्मचारी कभी स्त्रियोंके समीप जाकर उनके साथ वार्तालाप न करे।' ऐसा कहकर ब्राह्मणकुमार लौट पड़ा और दूर जाकर खड़ा हो गया। किंतु राजकुमार अकेला ही निर्भय होकर स्त्रियोंकी उस क्रीडास्थलीकी ओर चला गया। उन गन्धर्वकन्याओंमेंसे एकने राजकुमारको आते देख मन-ही-मन कुछ विचार किया और सखियोंसे कहा- 'सहेलियो ! यहाँसे थोड़ी ही दूरपर एक उत्तम वन है, जहाँ विचित्र चम्पा, अशोक, पुन्नाग और वकुल आदि वृक्ष खिले हुए हैं। वहाँ जाकर तुम सब लोग फूल तोड़ो। तबतक मैं यहीं बैठी हूँ। तुम फूलोंका संग्रह करके पुनः यहाँ आ जाना।' उसके इस प्रकार आदेश देनेपर सखियाँ वनके भीतर चली गयीं और वह गन्धर्वकन्या राजकुमारपर दृष्टि लगाये वहीं खड़ी रही। उसे देखकर राजकुमार कामदेवके बाणोंसे पीड़ित हो गया। गन्धर्वकन्याने अपने पास आये हुए राजकुमारको बैठनेके लिये कोमल पल्लवोंका आसन दिया और पूछा- 'कमलनयन ! तुम कौन हो? किस देशसे यहाँ आये हो और किसके पुत्र हो?' इस प्रकार पूछनेपर राजकुमारने अपना पूरा परिचय बतलाया- 'मैं विदर्भराजका पुत्र हूँ। मेरे पिता-माता बचपनमें ही मर गये हैं। शत्रुओंने मेरे राज्यपर अधिकार जमा लिया है और मैं दूसरेके राज्यमें गुजारा करता हूँ।'
ये सारी बातें बताकर राजकुमारने उस गन्धर्वकन्यासे पूछा- सुन्दरी ! तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारा क्या कार्य है और तुम किसकी पुत्री हो? उनके इस प्रकार पूछनेपर कन्याने कहा- 'महाराजकुमार ! एक द्रविक नामक गन्धर्व हैं, जो समस्त गन्धर्वकुलके अगुआ माने जाते हैं। मैं उन्हींकी पुत्री हूँ और मेरा नाम अंशुमती है। सब सखियोंको छोड़कर मैं यहाँ अकेली हूँ। मैं तुम्हारी अभिलाषा जानती हूँ। तुम्हारा मन मुझमें आसक्त हो गया है। इसी प्रकार दैवने मेरे मनमें भी तुम्हारे लिये उत्कण्ठा भर दी है। अब हम दोनोंका स्नेह कभी भंग नहीं होना चाहिये।' ऐसा कहकर गन्धर्वकुमारीने शीघ्र ही अपने गलेसे मोतीका हार निकालकर प्रेमपूर्वक राजकुमारको भेंट किया। उस अद्भुत हारको देखकर राजकुमारने पूछा- 'भीरु ! मैं एक बात कहता हूँ। मैं राज्यहीन और निर्धन हूँ। तुम मेरी प्रिया कैसे होना चाहती हो? मूर्ख स्त्रीकी भाँति पिताकी आज्ञाका उल्लंघन करके अपनी इच्छाके अनुसार आचरण क्यों करती हो?' यह सुनकर गन्धर्वकन्याने कहा- 'प्रियतम ! आपका कहना ठीक है। मैं पिताकी आज्ञाके विरुद्ध नहीं करूँगी। आप इस समय घरको पधारें और परसों प्रातःकाल पुनः यहीं दर्शन दें। आपसे कुछ हमारा कार्य है।' इतना कहकर वह गन्धर्वकन्या अपनी सखियोंके आ जानेसे उनके साथ चली गयी और राजकुमार भी हर्षपूर्वक ब्राह्मणकुमारके समीप लौट आया। उसने द्विजपुत्रसे सब बातें बतायीं और उसके साथ घरको प्रस्थान किया। वहाँ पतिव्रता ब्राह्मणीको भी यह शुभ समाचार सुनाकर राजकुमारने प्रसन्न किया तथा पूर्वनिश्चित समय आनेपर वह पुनः द्विजपुत्रके साथ वनमें गया।
नियत स्थानपर पहुँचकर राजकुमारने देखा-
* ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६८७
गन्धर्वराज और उनकी कन्या दोनों उपस्थित हैं। गन्धर्वराजने वहाँ आये हुए दोनों कुमारोंका अभिनन्दन किया और सुन्दर आसनपर बिठाकर राजपुत्रसे कहा—‘विदर्भराजकुमार ! मैं कल कैलास पर्वतपर गया था। वहाँ मैंने पार्वतीजीके साथ महादेवजीके दर्शन किये। देवेश्वर भगवान् शिव करुणारूपी अमृतके सागर हैं। उन्होंने मुझे बुलाकर सब देवताओंके समीप इस प्रकार कहा—'पृथ्वीतलपर धर्मगुप्त नामसे प्रसिद्ध एक राजकुमार है, जो इस समय अकिंचन है। उसका राज्य छिन गया है, शत्रुओंने उसके देशको अपने अधिकारमें कर लिया है। अब वह बालक अपने गुरुकी आज्ञासे सदा मेरी आराधनामें संलग्न रहता है। उसीके प्रभावसे आज उसके समस्त पितर मेरे स्वरूपको प्राप्त हो गये हैं। गन्धर्वश्रेष्ठ ! तुम भी उस राजकुमारकी सहायता करो। अब वह शत्रुओंको मारकर अपने राज्यसिंहासनपर आसीन हो जायगा।' महादेवजीके इस प्रकार आज्ञा देनेपर मैं अपने घरको आया। यहाँ इस मेरी कन्याने भी तुम्हारे लिये बहुत प्रार्थना की। यह सब परमदयालु भगवान् शिवकी प्रेरणासे ही हो रहा है, ऐसा समझकर मैं इस कन्याको साथ लेकर आया हूँ। अतः अपनी पुत्री अंशुमतीको मैं तुम्हें पत्नीरूपमें देता हूँ और भगवान् शिवजीकी आज्ञासे शत्रुओंको मारकर तुम्हें तुम्हारे राज्यपर बिठाऊँगा। अपने उस नगरमें तुम अपनी इस धर्मपत्नीके साथ दस हजार वर्षोंतक मनोवांछित सुख भोगकर अन्तमें भगवान् शिवके लोकमें जाओगे और वहाँ भी मेरी यह कन्या तुम्हारी ही सेवामें प्रस्तुत रहेगी।'
इस प्रकार कहकर गन्धर्वराजने उसी वनमें राजकुमारके साथ अपनी पुत्रीका विवाह कर दिया और दहेजमें परम उज्ज्वल रत्नभार भेंट किये। चन्द्रमाके समान चमकीली चूड़ामणि तथा दमकते हुए मोतियोंके मनोहर हार दिये। दिव्य आभूषण, वस्त्र, सुवर्णके बने हुए बहुत-से सामान, दस हजार हाथी, एक लाख नीले घोड़े और हजारों सोनेके बड़े-बड़े रथ प्रदान किये। अन्तमें एक दिव्य रथ, इन्द्रके धनुषके समान विशाल धनुष, सहस्रों अस्त्र-शस्त्र, अक्षय बाणोंसे भरे हुए दो तरकस, अभेद्य सुवर्णमय कवच तथा शत्रुओंका संहार करनेवाली शक्ति समर्पित की। अपनी पुत्रीकी सेवाके लिये गन्धर्वराजने प्रसन्नचित्त होकर पाँच हजार दासियाँ दीं। इतना ही नहीं, राजकुमारकी सहायताके लिये उन्होंने अत्यन्त उग्र गन्धर्वोंकी चतुरंगिणी सेना भी भेंट की। इस प्रकार परम उत्तम सम्पत्तिको पाकर राजकुमार अपनी मनोवांछित पत्नीके साथ बहुत प्रसन्न हुए। पुत्रीका विवाह कराकर गन्धर्वराज स्वर्गलोकमें चले गये। धर्मगुप्त विवाहके अनन्तर गन्धर्वोंकी सेनाके साथ अपने नगरको गये और वहाँ उन्होंने शत्रुसेनाका संहार करके राजधानीमें प्रवेश किया। तत्पश्चात् श्रेष्ठ ब्राह्मणों और मन्त्रियोंने मिलकर राजकुमारका अभिषेक किया और वे रत्नमय सिंहासनपर आरूढ़ होकर अकण्टक राज्यका उपभोग करने लगे। जिस ब्राह्मण-पत्नीने उनका अपने पुत्रकी भाँति पालन किया था, वही उनकी माता हुई। वह द्विजकुमार ही भाई हुआ तथा गन्धर्वराजपुत्री अंशुमती महारानीके पदपर प्रतिष्ठित हुई। भगवान् शंकरकी आराधना करके धर्मगुप्त विदर्भ देशके राजा हो गये। इसी प्रकार दूसरे लोग भी प्रदोषव्रतके दिन गिरिजापतिकी आराधना करके मनोवांछित कामनाओंको प्राप्त कर लेते हैं और देहावसान होनेपर परम गतिको प्राप्त होते हैं।
सूतजी कहते हैं—जो प्रदोषव्रतके परम अद्भुत पुण्यमय माहात्म्यको उस व्रतके दिन शिवपूजनके पश्चात् एकाग्रचित्त होकर सुनता अथवा पढ़ता है, उसे सौ जन्मोंतक कभी दरिद्रता नहीं होती और अन्तमें वह ज्ञानके ऐश्वर्यसे युक्त हो भगवान् शंकरके परमधामको प्राप्त होता है।
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सोमवार-व्रतके प्रभावसे सीमन्तिनीको पुनः परम सौभाग्यकी प्राप्ति
सूतजी कहते हैं— जो नित्य, आनन्दमय, शान्त, निर्विकल्प, निरामय, अनादि, अनन्त शिव-तत्त्वको जानते हैं, वे परम पदको प्राप्त होते हैं। जो धीर पुरुष कामभोगोंसे विरक्त हो भगवान् शंकरमें हेतुरहित पराभक्ति करते हैं, उनका मोक्ष हो जाता है, वे संसारबन्धनमें नहीं पड़ते। जो मायामय संसारमें चिरकालतक सुखपूर्वक विहार करके देहावसान होनेपर मोक्ष चाहते हैं, उनके लिये यह धर्म बताया गया है कि संसारमें भगवान् शिवकी पूजा सदा ही स्वर्ग और मोक्षका हेतु है। यदि प्रदोष आदिके गुणोंसे युक्त सोमवारके दिन यह पूजा की जाय तो उसका विशेष माहात्म्य है। जो केवल सोमवारको भी भगवान् शंकरकी पूजा करते हैं, उनके लिये इहलोक और परलोकमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है। सोमवारको उपवास करके पवित्र हो इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए वैदिक अथवा लौकिक मन्त्रोंसे विधिपूर्वक भगवान् शिवकी पूजा करनी चाहिये। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, कन्या, सुहागिन स्त्री अथवा विधवा कोई भी क्यों न हो, भगवान् शिवकी पूजा करके मनोवांछित वर पाता है। इस विषयमें मैं एक कथा कहूँगा, जिसको सुनकर मनुष्य मोक्ष पाते हैं और उनके मनमें भगवान् शिवकी भक्ति होती है।
आर्यावर्तमें चित्रवर्मा नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे। वे दुष्टोंको दण्ड देनेके लिये यमराजके समान समझे जाते थे। वे धर्ममर्यादाओंके रक्षक, कुमार्गगामी पुरुषोंको दण्ड देकर राहपर लानेवाले, समस्त यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले और शरणार्थियोंकी रक्षा करनेमें समर्थ थे। भगवान् शिव और विष्णुमें उनकी बड़ी भक्ति थी। राजा चित्रवर्माने अनेक परम पराक्रमी पुत्रोंको पाकर अन्तमें एक सुन्दर मुखवाली कन्या प्राप्त की। एक दिन राजाने जातकके लक्षण जाननेवाले श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको बुलाकर कन्याकी जन्मकुण्डलीके अनुसार भावी फल पूछे। तब उन ब्राह्मणोंमेंसे एक बहुज्ञ विद्वान्ने कहा—'महाराज! यह आपकी कन्या सीमन्तिनी नामसे प्रसिद्ध होगी। यह भगवती उमाकी भाँति मांग्लयमयी, दमयन्तीकी भाँति परम सुन्दरी, सरस्वतीके समान सब कलाओंको जाननेवाली तथा लक्ष्मीकी भाँति अत्यन्त सद्गुणोंसे सुशोभित होगी। यह दस हजार वर्षोंतक अपने स्वामीके साथ आनन्द भोगेगी और आठ पुत्रोंको जन्म देकर उत्तम सुखका उपभोग करेगी।' तत्पश्चात् एक दूसरे ब्राह्मणने कहा—'यह कन्या चौदहवें वर्षमें विधवा हो जायगी।' यह वज्राघातके समान दारुण वचन सुनकर राजा दो घड़ीतक चिन्तामें डूबे रहे। तदनन्तर सब ब्राह्मणोंको विदा करके राजाने 'सब कुछ भाग्यके अनुसार ही होता है' ऐसा समझकर चिन्ता छोड़ दी। सीमन्तिनी धीरे-धीरे सयानी हुई। अपनी सखीके मुखसे भावी वैधव्यकी बात सुनकर उसे बड़ा खेद हुआ। उसने चिन्तामग्न होकर याज्ञवल्क्य मुनिकी पत्नी
- ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६८९
मैत्रेयीसे पूछा—‘माताजी! मैं आपके चरणोंकी शरणमें आयी हूँ। मुझे सौभाग्य बढ़ानेवाले सत्कर्मका उपदेश दीजिये।’ इस प्रकार शरणमें आयी हुई राजकन्यासे पतिव्रता मैत्रेयीने कहा—‘सुन्दरी! तू शिवसहित पार्वतीजीकी शरणमें जा और सोमवारको एकाग्रचित्त हो स्नान और उपवासपूर्वक स्वच्छ वस्त्र धारण करके शिव और पार्वतीका पूजन कर। सोमवारके दिन शिव और पार्वतीकी आराधना करती रह। इससे बड़ी भारी आपत्ति पड़नेपर भी तू उससे मुक्त हो जायगी। घोर-से-घोर एवं भयंकर महाक्लेशमें पड़कर भी शिव-पूजा न छोड़ना। उसके प्रभावसे महान् भयसे पार हो जाओगी।’ इस प्रकार सीमन्तिनीको आश्वासन देकर पतिव्रता मैत्रेयी आश्रमको चली गयीं। राजकुमारीने उनके कथनानुसार भगवान् शिवका पूजन प्रारम्भ किया।
निषध देशमें नलकी पत्नी दमयन्तीके गर्भसे इन्द्रसेन नामक पुत्र हुआ था। राजा इन्द्रसेनके पुत्र चन्द्रांगद हुए। नृपश्रेष्ठ चित्रवर्माने राजकुमार चन्द्रांगदको बुलाकर गुरुजनोंकी आज्ञासे उन्हींके साथ अपनी पुत्री सीमन्तिनीका विवाह कर दिया। उस विवाहमें बड़ा उत्सव हुआ था। विवाहके पश्चात् चन्द्रांगद कुछ कालतक ससुरालमें ही रहे। एक दिन राजकुमार यमुनाके पार जानेके लिये कुछ मित्रोंके साथ नावपर सवार हुए। भाग्यवश नाव यमुनाके भँवरमें मल्लाहोंसहित डूब गयी। यमुनाके दोनों तटोंपर बड़ा भारी हाहाकार मच गया। इस दुर्घटनाको देखनेवाले समस्त सैनिकोंके विलापसे सारा आकाशमण्डल गूँज उठा। डूबनेवालोंमेंसे कुछ तो मर गये और कुछ ग्राहोंके पेटमें चले गये तथा राजकुमार आदि कुछ लोग उस महाजलमें अदृश्य हो गये। यह समाचार सुनकर राजा चित्रवर्मा बड़े व्याकुल हुए और यमुनाके किनारे आकर मूर्छित होकर गिर पड़े। सीमन्तिनीने भी जब यह समाचार सुना तब वह अचेत होकर धरतीपर गिर पड़ी। राजा इन्द्रसेन भी अपने पुत्रके डूबनेका समाचार पाकर रानियोंसहित बहुत दुःखी हुए और सुध-बुध खोकर गिर पड़े। तदनन्तर बड़े-बूढ़ोंके समझानेपर राजा चित्रवर्मा धीरे-धीरे नगरमें आये और उन्होंने अपनी पुत्रीको धीरज बँधाया।
राजा चित्रवर्माने जलमें डूबे हुए अपने दामादका और्ध्वदैहिक कृत्य वहाँ आये हुए उनके बन्धु-बान्धवोंसे करवाया। पतिव्रता सीमन्तिनीने चितामें बैठकर पतिलोकमें जानेका विचार किया। किंतु उसके पिताने स्नेहवश रोक दिया। तब वह विधवा-जीवन व्यतीत करने लगी। मुनिपत्नी मैत्रेयीने जिस शुभ सोमवार व्रतका उपदेश दिया था, उसे सदाचारपरायणा सीमन्तिनीने विधवा होनेपर भी नहीं छोड़ा। इस प्रकार चौदहवें वर्षकी आयुमें अत्यन्त दारुण दुःख पाकर वह भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन करने लगी। शिवकी आराधना करते-करते उसके तीन वर्ष व्यतीत हो गये। उधर पुत्रशोकसे उन्मत्त हुए राजा इन्द्रसेनको बलपूर्वक दबाकर उनके भाइयोंने सारा राज्य छीन लिया और उन्हें पत्नीसहित पकड़कर कारागृहमें डाल दिया।
इन्द्रसेनके पुत्र चन्द्रांगद यमुनाके जलमें डूबनेपर नीचे-नीचे गहराईमें उतरने लगे। बहुत नीचे जानेपर उन्होंने नागवधुओंको जलक्रीडामें निमग्न देखा। राजकुमारको देखकर वे भी विस्मित हुईं और उन्हें पाताललोकमें ले गयीं। वहाँ चन्द्रांगदने तक्षक नागके परम अद्भुत रमणीय नगरमें प्रवेश किया और इन्द्रभवनके समान मनोहर एक सुन्दर महल देखा, जो बड़े-बड़े रत्नोंकी प्रकाशमान किरणोंसे उद्दीप्त हो रहा था। भगवान् सूर्यके समान तेजस्वी तक्षक नागको सभाभवनमें विराजमान देख परम बुद्धिमान् राजकुमारने प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तक्षकके तेजसे उनके नेत्र