भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

सौंदर्य लहरी २३५

हो जाय, तो वह संबंध भी शिथिल हो जाता है । यह संबंध वास्तव में एक-पक्षी ही है, उभय-पक्षी नहीं। क्योंकि गुरु की शिष्य के प्रति श्रद्धा की भावना का होना संभव नहीं, श्रद्धा सदा अपने से बड़ों के प्रति ही हुआ करती है। परन्तु श्रद्धा की प्रतिक्रिया भी प्रेम के रूप में प्रकट हुआ करती है, जिससे शिष्य को गुरु की विद्या फलीभूत होती है। शिष्य गुरु की शरण में श्रद्धा की प्रेरणा से प्रेरित होकर जाता है, कि उसको वहां से उसकी जिज्ञास्य विद्या की उपलब्धि होगी। और आध्यात्म पथ का पथिक गुरु से भौतिक स्तर पर उस प्रकाश की जिज्ञासा रखता है जो उसे तीनों तापों से मुक्त करदे । इसलिये वह ज्ञानी गुरु की खोज करता है परोक्षज्ञानी की नहीं, वरन् अनुभवी तत्व ज्ञानी की। श्री भगवान ने भी ऐसे ही ज्ञानी गुरु की शरण में जाने का आदेश किया है:— यथा,

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः ॥ गीता ॥

ज्ञानी गुरु योगी तो होना ही चाहिये, क्योंकि बिना योग संसिद्धि के ज्ञान नहीं होता, श्री भगवान् स्वयं कहते हैं कि:—

'तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति । गीता ।

परन्तु योग से भोग और भोगों से रोग भी होते हैं, यह देखने में आता है । इसलिये यदि गुरु में योग के साथ-साथ भोग भी हों तो हर्ष की बात है, क्योंकि योगी के पास भोगों की समृद्धि उसकी सिद्धियों का परिचय देती है। परन्तु भोगों के साथ रोग भी गुरु की

२२६ | सौंदर्य लहरी

सेवा में आ उपस्थित हों और रोगों के निवारणार्थ गुरु घबरा कर साधारण डाक्टरों वैद्यों का आश्रय ढूंढता फिरे, तो उसके योग को बट्टा लग जाने की आशंका है । और उससे शिष्य की श्रद्धा में भी ठेस लगने की संभावना है ।

भोग और रोग दोनों पूर्वार्जित् प्रारब्ध कर्मों का भी फल हो सकते हैं, जिनका योग की सिद्धि से कोई संबंध नहीं होता, परन्तु एक योगी और ज्ञानी महापुरुष से यह भी आशा की जाती है कि वह वीतराग होने के कारण भोगों में फंसेगा नहीं, और योगज और प्रारब्धज दोनों प्रकार के भोगों को पास नहीं फटकने देगा, यदि उनसे रोग उत्पन्न होते दिखते हैं, और यदि प्रारब्धवश रोगों का आक्रमण भी हो, तो अपने योग बल से उनको परास्त करता हुआ उन्हें वह सहन करेगा, न कि साधारण मनुष्य के सदृश भोगासक्ति का कुपथ्य करके उनका पोषण करेगा ।

यदि किसी गुरु को भोगासक्त और रोगाक्रांत देखा जाय, तो स्वभावतः शिष्य की श्रद्धा भंग हो जाने में आश्चर्य नहीं । परन्तु उसका दुष्परिणाम शिष्य के लिये उसके सर्व-नाश का कारण बन जाता है ।

तैत्तिरीयोपनिषत् की ब्रह्मानन्दवल्ली के चतुर्थ अनुवाक् में श्रद्धा को विज्ञानात्मा का शिर बताया गया है, और योग को उसकी आत्मा । विज्ञानात्मा के ऋत् और सत्य दोनों पक्ष हैं और महत् उसकी प्रतिष्ठा पुच्छ है । शिर के कट जाने पर आत्मा शरीर को छोड देती है, और शिर के विकार से दोनों हाथ निकम्मे अर्थात्

सौंदर्य लहरी २२७

पक्षाघात के रोगी हो जाते हैं, और प्रतिष्ठा भी नहीं रहती। अर्थात् श्रद्धा की कमी होते ही उससे योग, सत्य और ऋत तीनों विदा होने लगते हैं और महत् का सहारा छूट जाता है। महत् से आनंदमय सगुण ब्रह्म का ही यहां अभिप्राय है, क्योंकि साधक की प्रतिष्ठा उसी के आधार पर होती है, न कि लोक प्रतिष्ठा पर। विज्ञानमय कोष का आधार आनन्दमय आत्मा ही है, उसे स्वयं परमात्मा का प्रतीक समझना चाहिये।

जब विज्ञानात्मा ही न रहा, तो मनोमय, प्राणमय और अन्नमय आत्मा की क्या दशा होगी यह पाठकगण स्वयं समझ सकते हैं।

मणिपूर चक्र

(४०)

तडित्वन्तं शक्त्या तिमिरपरिपन्थिस्फुरणया
स्फुरन्नानारत्नाभरणपरिणद्धेन्द्रधनुषम् ।
तव श्यामं मेघं कमपि मणिपूरैकशरणं
निषेवे वर्षन्तं हरमिहिरतप्तं त्रिभुवनम् ॥

शब्दः कमपि=जलको भी, हर=अग्नि ।

**अर्थः—**तेरे मणिपूर की शरण में गये हुए श्याम मेघों के रूप धारण करने वाले कं जल की भी सेवा करता हूं, जिन में अंधकार की परिपंथिनी अर्थात् प्रतिद्वंद्विनी बिजली की चमक आभरणों में जटित नाना रत्नों की चमक सदृश इन्द्रधनुष का

२३८ | सौँदर्य लहरी

रूप धारण किये हुए हैं, और जो अग्नि और सूर्य के ताप से संतप्त त्रिभुवन पर वर्षा कर रहे हैं।

मणिपूर चक्र में मेघेश्वर और सौदामिनी के रूप में शिव शक्ति का ध्यान बताया गया है। सूर्य का स्थान ऊपर सूर्य मण्डल में और अग्नि का स्थान नीचे स्वाधिष्ठान चक्रस्थ अग्नि मण्डल मे होने के कारण, दोनों के ताप से सारा देहरूपी तीन खण्डों का त्रिभुवन तप्त होने पर जल बाष्प रूप से मणिपूर चक्र मे मेघों का रूप धारण कर लेता है और मेघों मे अग्नि विद्युताकार चमकने लगती है। जिन को मेघेश्वर और सौदामिनी कहते हैं, और दोनों के योग से वर्षावत् सारे शरीर मे रस का सिंचाव होने लगता हैं।

मूलाधार

(४१)

तवाधारे मूले सह समयया लास्यपरया
शिवा ( नवा ) त्मान मन्ये नवरस महाताण्डवनटम् ।
उभाभ्यामेताभ्यामुद(भ)य विधिमुद्दिश्य दयया
सनाथाभ्यां जज्ञे जनक जननीमज्जगदिदम् ॥

अर्थः— तेरे मूलाधार में लास्यपरा अर्थात् नृत्य करती हुई समया देवी के साथ, नवधा रसपूर्ण ताण्डव नृत्य करने वाले नटेश्वर नवात्मा-शिवजी का मैं चिन्तन करता हूं। यह जगत् इन दोनों की जनक जननीवत् दया से प्रभवाभिमुख होने के कारण अपने को सनाथ मानता है।

सौन्दर्य लहरी

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समया देवी मे समयाचार की उपास्य देवी निर्दिष्ट है, लास्य भगवती के नृत्य का नाम है और ताण्डव शंकर के नृत्य का नाम है । नवरस युक्त ताण्डव नृत्य को महा ताण्डव कहते हैं । नौ रस ये हैं— १. श्रृंगार, २. विभत्स, ३. रौद्र, ४. अद्भुत, ५. भयानक ६. वीर, ७. हास्य, ८. करुणा, ९. शान्त । ये नौरस साहित्य, कविता, नृत्य और गान विद्या के अंग हैं । नवात्मा शिवजी को कहते हैं, जिसकी व्याख्या ऊपर श्लोक ३४ के नीचे दी जा चुकी है ।

आधार चक्र में प्राण के निरोध होने पर योगी नृत्य करने लगता है, कहा है

आधार वात रोधेन शरीरं कम्पते यदा,
आधारवात रोधेन योगी नृत्यति सर्वदा ॥ यो. शि. ६ २८)
आधारवात रोधेन विश्वं तत्रैव दृश्यते ।
सृष्टिराधारमाधारमाधारे सर्व देवताः
आधारे सर्ववेदाश्चतस्मादाधारमाश्रयेत् ॥ (६, २९.)

अर्थ:— आधार चक्र में जब प्राण शक्ति का निरोध होता है, तब शरीर कांपने लगता है योगी नृत्य करने लगता है, और वहाँ ही विश्व दिखने लगता है । आधार चक्र में जो सृष्टि का आधार है, सब देवता, सब वेद रहते हैं । इसलिये आधार चक्र का आश्रय लेना चाहिये ।

समया देवी का नाम मूलाधार और स्वाधिष्ठान चक्रों के ध्यान में मिलता है, अन्य चक्रों के ध्यान में नहीं, इससे यह प्रतीत

२३० सौंदर्य लहरी


होता है कि शंकर भगवत्पाद ने इन दोनों चक्रों में विशेष रूप से समयाचार की ओर लक्ष्य कराया है, क्योंकि उनका ध्यान कौल मत वालों को ही अभिष्ट है। समयाचार वालों को ऊपर के चक्रों पर विशेष ध्यान देना चाहिये, मूलाधार और स्वाधिष्ठान चक्रों पर नहीं। इसका कारण हम अन्यत्र भी कह आये हैं। देखें श्लोक ९। स्वाधिष्ठान चक्र के वेध से वीर्यपात इत्यादि की क्रियायें होने की सम्भावना है, और ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रम के साधकों का उन क्रियाओं से पतन होने की आशंका है, इसलिये वेध क्रम को भी इसी प्रकार बताया गया है कि स्वाधिष्ठान चक्र को नहीं छोड़ा जाता। यह स्मरण रहे कि ऊपर के अनाहत् अथवा आज्ञा चक्र का पूर्ण वेध होने पर नीचे के चक्रों का भी वेध स्वयं हो जाता है। इसलिये काम वासना की दीप्ति से रक्षा करने के लिये अनाहत् चक्र और आज्ञा चक्रों का अथवा नादानु-सन्धान का आश्रय लेना श्रेयस्कर है। हृदय चक्र में दहर विद्या, आज्ञा चक्र में शांभवी विद्या और नाद श्रवण तीनों के साधन शुद्ध और ऊंचे हैं। एक शांभवी मुद्रा के साधन से ऊर्ध्वरेतत् की सिद्धि के साथ २ खेचरत्व की सिद्धि हो जाती है। फिर बज्रौली क्रिया की झंझट वृथा मोल लेकर पथभ्रष्ट होने की संभावना का क्यों आवा-हन किया जाय।

पृथिवी तत्व की ६४ किरणें आधी २ ताण्डवनटेश्वर और लास्य परा समया देवी से उद्भूत समझनी चाहियें।

सौंदर्य लहरी २३१


शिव ताण्डव

हिरण्मयेनपात्रेण सत्यस्यापिहितंमुखम् ।
तत्त्वंपूषन्नपा वृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ (यजुर्वेद)

वेद कहते हैं कि सत्य का मुख सुवर्ण के पात्र से ढका हुआ है, मानो सत्य की देवी ने सुनहरी घूंघट से अपना सुंदर वदन छुपा लिया है, अथवा उसकी सुनहरी अलकें ही मुख पर आ पडी हैं जो घूंघट का काम कर रही हैं। यदि कहें कि सूर्य अपनी ही किरणों में स्वयं छुप गया है तो अधिक ठीक है। यह उपमा आत्मदेव के लिए दी गई है। अध्यात्म-सूर्य जो सत्य है, अपनी माया के सुनहरी पडदे में स्वयं अंतर्हित हो रहा है। कोई-कोई दार्शनिक विद्वान माया की अन्धकार से तुलना करते हैं, परन्तु माया का अर्थ सुवर्णमय विस्तार भी तो किया जाता है। क्या यह दूसरा अर्थ सुंदर नहीं है ? सुवर्ण किसको प्रिय नहीं लगता ? सुवर्ण में तो एक कांति चमकती है, अंधकार में कांति कहां ? इसलिये हम तो यह ही समझते हैं कि माया का पडदा अथवा घूंघट हिरण्यमय ही ठीक बखाना गया है, जिसके आकर्षण में पडकर जीव अनादिकाल से मर-मर कर भी उसका पीछा नहीं छोड़ रहा। आधुनिक युग का भौतिक विज्ञान तो इस सुनहरी घूंघट के सौंदर्य से संतुष्ट नहीं होता, उसने उस पर हजारों रहस्यमय तारे लगा दिये हैं, मानों प्रकृति के विद्युत्कण(electrons) अनंत संख्या में चमक रहे हैं। यद्यपि भौतिक विज्ञानियों की दृष्टि पडदे के पीछे छुपे हुये सत्य के मौलिक सौंदर्य तक नहीं जाती, तो भी वह अपने मनोरंजन में व्यस्त हैं। इसमें

२३२ सौंदर्य लहरी


किसी का क्या दोष है ? हिरण्मय घूंघट की ही शोभा इतना आकर्षण रखती है, कि उसे स्वयं आत्मदेव ने ही ओढ लिया है । अपना मुख छुपाने की दृष्टि से नहीं, परन्तु इसमें उसका अपने सौंदर्य का विकास करने का ही मुख्य उद्देश्य जान पडता है । शायद शून्यवादी इस रहस्य से परिचित नहीं है, उसका तो विश्वास यह जान पडता है कि घूंघट के पीछे कोई तत्त्व नहीं, केवल शून्य पर ही पददा पडा हुआ है, वास्तव में जांच तो उसकी किसी हद तक ठीक ही सी जान पडती है, परन्तु क्या शून्य का ही नाम सत्य है ? वेद मिथ्या क्यों बहकाने लगे । इसी धारणा से शायद बुड्ढे भारत के कतिपय पागल जिज्ञासु उस शून्य में ही मौलिक सत्य की खोज के लिये कटिबद्ध रहते हैं । जिसका घूंघट, जो उसी की किरणों की प्रभा की जाली से बना हुआ है, इतना सुंदर है, तो उस सत्य के मुख की शोभा कितनी ऊंची होना चाहिये । पाठकगण ! वह अनुमान का विषय नहीं है, परन्तु कोई-कोई सत्य के अन्वेषक साक्षि देते हैं कि वह अवश्य दर्शनीय है । इसलिये इन भौतिकवादियों की बातों में नहीं आना, उसे शून्य मत समझो, वह शून्य नहीं है, वरन् पूर्ण है, सुंदर है, स्वयं ज्योति स्वरूप है, सत्य है, अनंत ज्ञान निधि है, और आनंद का खजाना है । वह पददे में है दिखता नहीं तो यह नहीं समझना चाहिये कि उसका अस्तित्व ही नहीं । ठीक बात तो यह ही है कि सूर्य अपनी किरणों में छुपा होने के कारण नहीं दिखाई दे रहा, बस यह बात बीसों बिसवे सत्य समझो ! उक्त हिरण्यमय पददे को ही गायत्री मंत्र 'भर्गो देवस्य' कहकर ध्यान करने का उपदेश करता है । तेज के ध्यान द्वारा तेजस्वी का ध्यान होता है, और शक्ति का ध्यान करने से शक्ति मान का ध्यान होता

सौंदर्य लहरी २३३

है। यहां पर तो सत्य ब्रह्म का भर्गस् (तेज) और उसकी शक्ति एक ही जान पडती है। सारा जगत्-पिण्ड और ब्रह्मांड उसी की परिणति मात्र है। शक्तिमान अपनी शक्ति के रूप में व्यक्त होता है, और शक्ति की द्युति उस ही की ज्योति का प्रकाश है। अर्थात् शक्ति में वह स्वयं चमकता है अथवा यों कहें कि शक्ति स्वयं शक्तिमान का तेजोमय प्रसार है, जिसकी अभिव्यक्ति किसी स्तर पर चेतनवत् दिखती है, और किसी स्तर पर जडवत्। जडचेतन की विभाग रेखा शक्ति और तेज दोनों की भिन्नता का मिथ्या ज्ञान है। और यदि दोनों को भिन्न मानें तो दोनों का इतरेत्तर अध्यास रूपी एक का दूसरे के धर्मों का अपने ऊपर अध्यारोपण कर लेना भी मिथ्या ज्ञान है। क्योंकि शक्ति में परिणामी धर्म स्पष्ट है परन्तु तेज का चेतन स्वरूप धर्म अपरिणामी है। परन्तु जड शरीर में चेतन के धर्मों का अध्यारोपण होने से चेतना भी परिणामिनीसी दीख पडती है, यद्यपि वह मौलिक रूप से अपरिणामी है, केवल उसकी जड शरीर पर पडने वाली छाया परिणामीवत् प्रतीत होती है। अर्थात् 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' के मुख को ढकने वाला हिरण्यमय पात्र तेजोमय आजमान है, उस तेज में शक्ति है और शक्ति में तेज है। तेज से शक्ति में कांति है और उसकी तेजोमई प्रभा आदिमूल शक्ति की प्रत्येक स्तर की परिणति में चमक रही है। विद्युत-अणु में वह विद्युत् है और प्रत्येक विद्युत्-कण उसके तेज से परिपूर्ण है। अग्नि सूर्य सब में शक्ति है और शक्ति कहीं भी तेज से रहित नहीं। शक्ति रजोगुण और तमोगुण की विरोधी सापेक्षिक सक्रिय और क्रिया रहित परिणामों युक्त अनेक रूपों का स्वांग भरकर सर्वत्र

२३४ | सौंदर्य लहरी


नृत्य कर रही है और तेज भी युग पद् अपरिणामी होते हुए भो, उसके नृत्य के साथ ताण्डव करता रहता है । यह ही शिवशक्ति का अनादि जोडा है ।

यह समस्त जड-चेतनमय विश्व शंकर भगवान के अविराम ताण्डव नृत्य का अभिनय है और उनके ताण्डव के अंगहार अथवा अंग विक्षेप ही मानों सत् शक्ति के परिणामक्रम के विभिन्न स्तरों पर उसकी स्वांग भरी नृत्य कलाएं हैं, जिस शृंगार के नवधा-रस-परिपूर्ण हाव-भावों में शंकर के चिदानंद स्वरूप का प्रत्याभास हो रहा है । इस नृत्य को आनंद ब्रह्म के उन्मेश से प्रेरणा मिलती है और प्रलयकालीन विराम भी नृत्य के परिश्रम के अनंतर विश्रामरूपी आनंद का आभोगरूपी निमेश है । शिवजी के इस आनंदोन्मेशरूपी ताण्डव को वेदों ने संवर्तन कहा है और शंकर भगवत्पाद उसको विवर्तन कहते हैं । हमको तो दोनों शब्द एक ही अर्थ में प्रयुक्त हुये से दीखते हैं ।

शिवजी के ताण्डव नृत्य को तालबद्ध करने के लिये उन दिगम्बर एवं चिदम्बर के पास डमरू के वाद्य के सिवाय दूसरा यंत्र नहीं ! डमरू में दो विपरीत दिशाओं से शिव-शक्त्यात्मक दोनों ही प्रकार के शब्द ताल दिया करते हैं । जिनसे सरस्वती देवी अ-क--च-ट-त-प-यशों के वर्ण-वर्गों की वर्ण-माला की शिक्षा ग्रहण करके समस्त वैखरी वाणी की सृष्टि करती है । मानों शिवजी के डमरू की सहायता से ही वह वाक्शक्ति बोलना सीखती है और उसका अभ्यास अपनी वीणातंत्री पर किया करती हैं । अर्थात ताण्डव की तालों से निकलने वाली शिव-शक्त्यात्मक ध्वनि ही शंकर का

सौंदर्य लहरी २३५

डमरू वाद्य है, जिसको उनके चिदाकाशरूपी देह की स्पन्द-ध्वनि का वाचिक-व्यंजक अभिनय कह सकते हैं।

शिव तांडव का साक्षात् प्रत्यक्षी-करण तारों की टिमटिमाहट-रूपी डिमडिम में, ग्रहों के नृत्य में, सूर्य के नेत्रोल्हास में, पृथ्वी के षड्ऋतुओं के श्रृंगारयुक्त नाट्य में, चन्द्रमा की कलाओं में, विद्युत् की क्रीडा में, वसंत की मंद सुगंधित वायु के झकोरों में, पुष्पों के हास्य में, समुद्र की तरंगों में, हिमपात के हिमकणों के नर्तन में, आंधी तूफानों की द्रुत गति में, नदियों के कल-कल निनाद में, पर्वतों के श्रृंगार में, शस्य-श्यामा भूतल के आंचल के हिलोरों में, पशुपक्षियों की अटरखेलियों में और मनुष्य की मस्तीभरी चालों में, कहां नहीं ? सर्वत्र किया जा सकता है !

यह सब विराट्‌विश्व सृष्टि-प्रसार का निम्नतम स्तर रूपी मूलाधार है, जिसमें भगवती के इस लास्य नृत्य और शंकर के तांडव को युगपद् देखने वाले उपासक जीवन मुक्ति का आनंद लेते हैं। जो मूढ अपने तुच्छ स्वार्थों के अंधकार वश इसका साक्षात्कार नहीं कर पाते और मिथ्या अज्ञान वश शोक-मोह के कूपों में पड़े रोते हैं वे वास्तव में दया के पात्र हैं।

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सौंदर्य लहरी २३७


सौन्दर्य लहरी (उत्तरार्द्ध)

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणतास्म ताम् ॥

सौन्दर्य लहरी को दो भागों में विभक्त किया जाता है। प्रथम भाग जिसमें ४१ श्लोक हैं, आनन्द लहरी के नाम से विख्यात है। यह नाम श्लोक ८ में स्पष्ट रूप से मिलता है और २१ वें श्लोक में भी परमाह्लाद लहरी पद का प्रयोग तदर्थ वाचक है। इस भाग में शंकर भगवत्पाद ने पिंडस्थ शक्ति और तत्संबंधी श्री चक्र, श्री विद्या, षट् चक्र वेध और उनका मातृकाओं के द्वारा परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणि से, और सब के पारस्परिक संबंधों पर प्रकाश डाला है, जिसका उद्देश्य कुण्डलिनी शक्ति के जागरण द्वारा अद्वैत सिद्धान्त के जीव ब्रह्मैक्य ज्ञान की अपरोक्षानुभूति कराना मात्र है। यह पूर्व भाग पूरे ग्रंथ की आत्मा कही जा सकती है, क्योंकि सृष्टि के जड चेतन अनन्त प्रसार में मनुष्य देह ही पूर्ण समझा जाता है। यद्यपि चेतन सत्ता जड प्रकृति का कार्य प्रतीत होती है, और इस भ्रान्ति में पडकर अनेक भौतिकवादी अनात्म वाद का समर्थन करने लगते हैं, परन्तु चेतना को प्रकृति

२३८ सौंदर्य लहरी


का अन्तिम विकासस्तर कहकर चेतनकारण वाद को स्वयं सिद्ध करने में, बिना समझे सहायक बनते हैं । ब्रह्माण्ड में जो चेतन सत्ता अपरोक्ष में निहित है, वह पिंड में प्रत्यक्ष प्रकाशमान है । सूर्य चन्द्र, तारागण के अनन्त विश्व में भौतिक वादियों को जड प्रकृति का ही विस्तार दिखाई देता है, जिसके सामने आकीट पतंग, पशु, पक्षि, एवं मनुष्य में चमकने वाली चेतना के ये सब विकास स्थान अतिक्षुद्र और अणु समान हैं, तो भी समस्त चेतन जगत् का शिरोमणि मनुष्य, प्रकृति को स्वायत करने में कृत कार्य होकर चेतन सत्ताकी महिमा को सिद्ध करता है । जो चेतन सत्ता प्राणि-मात्र में अर्ध विकसित दिख पडती है, मनुष्य देह में उसका विकास इतना अधिक है कि उसे पूर्ण विकास कहने में संकोच नहीं होता, परन्तु भारत के ऋषि महर्षियों ने यह दावा किया है कि मनुष्य देह में जो चेतन प्रकाश है वह प्रसुप्तवत् अंशविकास ही है, उसकी चरम और परम सीमा ब्रह्म भाव के जागृत होने पर मिलती है । सृष्टि की आदि कारण भूताशक्ति चिति की ही वह सत्ता है, जो एक अंश में समस्त चेतन जगत में विद्यमान है ।

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ॥ गीता ॥

और प्रत्येक मनुष्य-देह प्रकृति देवी के विकास का वह पुष्प है, जिसके द्वारा पूर्णतया विकसित होने पर, वह आदि शक्ति अपनी संपूर्ण अनन्त महिमा की अभिव्यक्ति स्वरूप किरणों को सुगन्धवत् फैलाने लगती है, तथापि उसके परोक्ष अस्तित्व का परिचय ब्रम्हाण्ड का अणु २ दे रहा है । पिंड और ब्रह्मांड दोनों में उसी की व्यक्तता

सौंदर्य लहरी २३९

है, परन्तु एक में चेतन रूप में और दूसरे में जड के रूप में । पूर्व भाग में चिति शक्ति का कीर्ति गान कर के साधक-गणों के ध्यानार्थ ब्रह्मांड रूपी विराट् देह में निवास करने वाली उस अधि-देवी के सौन्दर्य का निरूपण सौन्दर्य लहरी संज्ञक उत्तर विभाग के ६२ श्लोकों में किया गया है, ४४ वें श्लोक में जैसा भगवत्पाद स्वयं कहते हैं:—

तनोतु क्षेमं नस्तव वदनसौन्दर्य लहरी ।

सौन्दर्य लहरी के उत्तरार्ध में विश्व को भगवती का विराट् देह मानकर, प्रकृति देवी के दिव्य देह का चित्र खींचा गया है जो छन्द-शास्त्रोक्त आभूषणों से अलंकृत, सर्व भाव पूर्ण, नवरसों में पगी अनादि अनन्त महामाया महादेवी आदि शक्ति की झांकी दिखाने वाली, वास्तव में सौन्दर्य लहरी ही है, जिसको पढकर अनात्मवादी भी पुराण कवि भगवान शंकर के अवतार भगवत्पाद की इस वैखरी झरी के रसों का आस्वादन कर के, अपनी अनात्म देह में स्थित अधिष्ठातृ चेतना देवी की अनन्त महिमा की किंचित झांकी पाकर आत्म विश्वासी बन सकता है। हम उसको उसके अनात्म विश्वासी होने पर दोषी नहीं ठहराते, क्योंकि जिस प्रकार हम जड प्रकृति को भी जिस ब्राह्मी चिति शक्ति की एक अभि-व्यक्ति कहते हैं, उसी प्रकार वह अनात्मवादी भी तो उसी का जड-चेतन-मय एक अर्ध विकसित स्तर है, जो समय पाकर अपनी अध्यात्म विकास यात्रा के किसी स्टेशन पर आत्मवादी हो जायगा।

श्री मच्छंकर भगवत्पाद ने भगवती उमा के सौन्दर्य का आनख शिख चित्र, एक भक्त के दृष्टिकोण से, उपासकों के ध्यान लाभार्थ

२४० | सौंदर्य लहरी

खेंचा है। १ श्लोक में किरीट, ३ श्लोकों में केश, एक में ललाट एक में भ्रू, ९ श्लोकों में नेत्र, २ में दृष्टि, १ में कपोल, १ में कर्ण एक में नासिका, १ में दान्त, १ में मुस्कराहट, १ में मुख का तांबूल, १ में बाणि, १ में चिबुक, २ में ग्रीवा और कंठ, १ में चार हाथ, १ में नखों की द्युति, ४ श्लोकों में स्तन पान द्वारा वात्सल्य स्नेह, ३ श्लोकों में नाभि, २ में कटि, १ में नितम्ब, १ में जानु, १ में पैर, ८ श्लोकों में चरण, १ में शरीर की आभा, शेष श्लोकों में प्रार्थना युक्त सामान्य रूप से सर्वांग सौन्दर्य का चित्र खेंचा गया है। अनुमान होता है, कि कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की प्रातःकालीन उषा के रूप में विराट देवी का ध्यान कराया गया है।

पंडित स. सुब्रह्मण्य शास्त्री, और टी. आर. श्रीनिवास अयंगार के अंग्रेजी में लिखित सौन्दर्य लहरी के प्रत्येक श्लोक के साथ एक-एक यंत्र दिया गया है। जिसके पूजन और उससे संबंधित श्लोक के जप सहित अनुष्ठान करने से अनेक कामनाओं की सिद्धी होती है,

हमने सकाम अनुष्ठानों की ओर ध्यान न देकर केवल एक निष्काम उपासक अथवा एक योगी की दृष्टि से यह ग्रन्थ लिखा है, क्योंकि जिस भगवती के स्तोत्र के एक २ श्लोक के अनुष्ठान द्वारा जन्म मरण की शृंखलाबद्ध कारणभूत कामनाओं की पूर्ति होती है उस स्तोत्र के सामूहिक अनुष्ठान का फल अनन्त आप्तकाम पद का देने वाला क्यों न होगा ?

सौंदर्य लहरी २४१


मुकुट का ध्यान

[ ४२ ]

गतैर्माणिक्यत्वं गगनमणिभिः सान्द्रघटितं
किरीटं ते हैमं हिमगिरिसुते कीर्तयति यः ।
स नीडेयच्छायाच्छुरणशबलं चन्द्रशकलं
धनुः शौनासीरं किमिति न निबध्नाति धिषणाम् ॥

कठिन शब्दों के अर्थ:— सान्द्रं घटितं=घनी भूत पास २ जडे हुए. नीडे=घोंसले में. छायाच्छुरण=मणियौं की द्युति की चमक. शकल=टुकडा. शौनासीरं=इन्द्रं का. धिषणा=समझ, धारणा.

अर्थ:— हे हिमाचल की पुत्रि ! जो मनुष्य तेरे सुवर्ण के बने हुए किरीट का वर्णन करे तो उसकी धारणा ऐसी क्यों न होगी, कि मानो इन्द्र धनुष निकला हुआ है । क्योंकि वह किरीट गगन मणियों अर्थात तारागण रूपी मणियों से घनीभूत जडा हुआ है और चन्द्रमा के टुकडे का पक्षि के घोंसले सदृश जान पडता है और जो उषः कालीन प्रकाश में रंगबरंगा चमक रहा है ।

अर्थात् उषः कालीन आकाश प्रकृति देवी का किरीट है । यहां कृष्णा चतुर्दशी और अमावस्या की संधि में पडने वाले उषः काल का चित्र खेचा गया है । कृष्णा चतुर्दशी भगवती की उपासना के लिये उपयुक्त तिथि समझी जाती है अर्थात वह भगवती का ही

२४२ | सौंदय लहरी

रूप है और विशेषतया कार्तिक की कृष्णा चतुर्दशी ली जाय तो और भी अच्छा है, जिसको रूप चतुर्दशी भी कहते हैं, और उसके तुरन्त पश्चात् महालक्ष्मी पूजन का दीपावली पर्व होता है ।

केशों का ध्यान:

[ ४३ ]

धुनोतुध्वान्तं नस्तुलित दलितेन्दीवर वनं
घनस्निग्धंश्लक्ष्णं चिकुरनिकुरुम्बं तवशिवे ।
यदीयं सौरभ्यं सहजमुपलब्धुं सुमनसो
वसन्त्यस्मिन्मन्ये बलमथनवाटीविटपिनाम् ॥

ध्वान्त=अंधकार. इन्दीवर=नीलकमल. श्लक्षण=मुलायम. निकुरुम्ब=समुह. चिकुर=केश. सौरभ्यं=सुगंध. बलमथन=बलासुर का मारने वाला इन्द्र.

अर्थः— हे शिवे ! तेरे गहरे चिकने मुलायम केशों का समूह जो खिले हुए इन्दीवर के बन की तुलना करता है हमारे अज्ञानान्धकार को हटावे, जिसमें गुंथे हुए इन्द्र की वाटिका के वृक्षों के पुष्प. मेरी समझ में, उसकी सुगंधि से स्वयं सहज ही सुगंधित होने के लिये वहां आबसे हैं ।

प्रातःकालीन विकसित इन्दीवर वनों की शोभा और उषःकाल का प्रकाश दोनों मिलकर जैसे रात्रि के अन्धकार को भगाते हुए

सौंदर्य लहरी २४३

से प्रतीत होते हैं। वैसे ही भगवती के केशों का ध्यान अज्ञान को दूर करने वाला है। भगवतीके केश स्वयं सुगंधित हैं, इन्द्र की बाटिका के पुष्पों को भी मानो वे ही सुगन्ध प्रदान कर रहे हैं अर्थात् पुष्पों में जो सुगन्ध होती है वह प्रकृति देवी की ही देन है। प्रायः केशभूषार्थ स्त्रियां अपने केशों में पुष्प गूंथा करती हैं, यह रिवाज मद्रास प्रान्त में अधिक प्रचलित है। भाव यह है कि स्त्रियों के केश. धारण किये हुए पुष्पों से सुगन्धित होते हैं, परन्तु भगवती के केशों की सुगन्ध से पुष्प स्वयं सुवासित होतेहैं।

[ ४४ ]

वहन्ती सिन्दूरं प्रबलकबरीभारतिमिर द्विषां वृन्दैर्बन्दीकृतमिव नवीनार्ककिरणम् । तनोतुक्षेमं नस्तव वदनसौन्दर्यलहरी परीवाहः स्रोतः सरणिरिव सीमान्तसरणिः ॥

कठिन शब्दों के अर्थ:—कबरी=केश, सरणि=मार्ग, सड़क रेखा, लाइन। वदन=मुख, सीमान्त सरणि=जिस रेखा पर सीमा का अन्त होता है, सिर पर केशों की मांग।

अर्थ:— तेरे मुख की सौन्दर्य लहरी के प्रवाहस्रोत के मार्ग के सदृश सिन्दूर से भरी तेरे केशों की मांग हमारे क्षेम (कल्याण) का प्रसार करे, जो मांग केशों के भारमय अन्धकार रूपी प्रबल दुश्मनों के वृन्दों से बन्दी की हुई उदय होने वाले नवीन सूर्य की अरुण किरण के सदृश है।

२४४ | सौंदर्य लहरी


जैसे स्त्रियां मांग में सिंदुर भरती हैं उसी प्रकार मानो देवी के मुख कमल की अरुणिमा केशों की मांग में सिंदूर सी चमकती हुई मूर्धा पर बह रही है । मानों उदय कालीन सूर्य की लाल किरणें रात्रि के अन्धकार को चीरना चाहती हैं । परन्तु अन्धकार रूपी दुश्मनों ने उसको कैद कर लिया है ।

स्रोत का प्रवाह ऊपर से निम्न तल पर हुआ करता है, परन्तु भगवती की शोभा की कान्ति उर्ध्व गामिनी है । उसे योगियों में ज्ञान के सूर्य के उदय होने से पूर्व प्रकट होने वाले प्रातिभ ज्ञान के सदृश समझना चाहिये ।

अलकों का ध्यान:—

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अरालैः स्वाभाव्यादलिकलभश्रीभिरलकैः
परीतं ते वक्त्रं परिहसति पंकेरुह रुचिम् ।
दरस्मेरे यस्मिन्दशन रुचि किंजल्करुचिरे
सुगन्धौ माद्यन्ति स्मरदहन चक्षुर्मधुलिहः ॥

कठिन शब्दों का अर्थ:— अराल=घुंघराले; कलभ=बच्चा; स्मेर=मुस्कराहट; दर=किंचित, थोडी; किंजल्क=स्फटिक; मधुलिह=भौँरा; अलक=जुल्फ ।

**अर्थ:—**स्वाभाविक घुंघराली जवान भौंरा की कांतियुक्त अलकावलि से घिरा हुआ तेरा मुख, कमलों की शोभा का