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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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की एकरूपता का विश्लेषण। आश्रमोचित कर्म के साथ विद्या के अविरोध का प्रतिपादन। —पृ०१०६७-६६ ६. विधुराधिकरण (सूत्र ३६-३६) अनाश्रमी व्यक्तियों के लिए भी ब्रह्मविद्या में अधिकार प्रदर्शन प्रकारान्तर से उक्त मत का प्रतिपादन। अनाश्रमी की अपेक्षा आश्रमी की श्रेष्ठता प्रतिपादन। —पृ०१०६६-११०२ १०. तद्भूताधिकरण (सूत्र ४०-४३) ब्रह्मचर्य आदि नैष्ठिकों के लिए निज आश्रम परित्या- ज्यता का निषेध, नैष्ठिकों के स्वधर्माच्युत होने पर प्रायश्चित्ताभाव का निरूपण। स्वधर्माच्युत नैष्ठिकों का विद्या में अनधिकार प्रदर्शन। —पृ०११०२-५ ११. स्वाम्यधिकरण (सूत्र ४४-४५) १. आत्रेय के मतानुसार कर्मांग उपासना में यजमान कर्त्तृता का निरूपण। २. औडुलोमि के मत से ऋत्वित्वक् कर्त्तृत्व निरूपण —पृ०११०

४५ (चतुर्थ अध्याय) (प्रथम पाद) १. आवृत्त्यधिकरण (सूत्र १-२) १. ब्रह्म प्राप्ति की उपाय उपासना के एक बार अनुष्ठान मात्र से फलप्राप्ति संभावना प्रदर्शन। २. जीवन पर्यन्त उपासना की कर्त्तव्यता निरूपण, अनुकूल प्रमाणों के आधार पर उक्तसिद्धान्त का निरूपण। —पृ०१११७-२० २. आत्मत्वोपासनाधिकरण (सूत्र ३) १. पूर्वपक्ष—आत्मरूप से ब्रह्म की उपासना का निषेध। २. (सिद्धान्त)—आत्मभाव से उपासना की कर्त्तव्यता का निरूपण। —पृ०११२०-२३ ३. प्रतीकाधिकरण (सूत्र ४-५) १. पूर्वपक्ष--मन आदि प्रतीक की आत्मारूप से उपासना का समर्थन। २. (सिद्धान्त) मन आदि प्रतीक की आत्मारूप से उपासना का खंडन मन आदि प्रतीक में ब्रह्मदृष्टि की कर्त्तव्यता का प्रतिपादन। —पृ०११२३-२४ ४. आदित्यादिमत्याधिकरण (सूत्र ६) १. पूर्वपक्ष—कर्मांग उद्गीथ आदि की उपासना में आदित्य आदि में उद्गीथादि दृष्टि कर्त्तव्यता का निरूपण। २. (सिद्धान्त)—कर्मांग उद्गीथ आदि में आदित्य दृष्टि का समर्थन। —पृ०११२४-२५ ५. आसीनाधिकरण (सूत्र ७-११) आसनविशेष में ही उपासना करने का उपपादन। ध्यानात्मक उपासना में आसन की अनिवार्यता ज्ञापन। उपासना की स्थिरतासापेक्षता का प्रतिपादन। उपासना में एकाग्रता के अनुकूल देश, काल की प्रयोजनीयता का समर्थन। —पृ०११२५-२७ ankurnagpal108@gmail.com

४६ ६. आप्रायणाधिकरण (सूत्र १२) मृत्युकाल पर्यन्त उपासना की प्रयोजनीयता का प्रतिपादन । —पृ० ११२८- ७. तदधिगमाधिकरण (सूत्र १३) १. पूर्वपक्ष—ब्रह्म विद्या अभ्यास से पूर्वोत्तरपापों के विनाश का अस्वीकरण । २. (सिद्धान्त)—ब्रह्मविद्या अभ्यास से पूर्वोत्तर पापों का विनाश तथा उत्तरीय पापपुण्यों के असंस्पर्श का प्रतिपादन । —पृ० ११२८–३२ ८. इतराधिकरण (सूत्र १४) ब्रह्मविद्या के उदय से पूर्वोत्तर पुण्य के विनाश और असंस्पर्श का प्रतिपादन । —पृ० ११३२–३३ ९. अनारब्धकार्याधिकरण (सूत्र १५) १. पूर्वपक्ष—ब्रह्मविद्या प्राप्ति से प्रारब्धकर्म के विनाश का प्रतिपादन । २. (सिद्धान्त)—प्रारब्धकर्म रहित अन्य कर्मों के क्षय का प्रतिपादन । —पृ० २१३३–३४ १०. अग्निहोत्राद्यधिकरण (सूत्र १६-१८) १. पूर्वपक्ष—अग्निहोत्र आदि नित्यकर्मों की अनुष्ठेयता का प्रदर्शन । २. सिद्धान्त—अग्निहोत्र आदि की अवश्य कर्त्तव्यता का प्रतिपादन विद्या सहकारी कृत कर्मों की श्रेष्ठता का प्रतिपादन । —पृ० ११३४–३६ ११. इतरक्षपणाधिकरण (सूत्र १९) भोगद्वारा ही प्रारब्ध कर्मों के क्षय का प्रतिपादन । पृ० ११३६–३७ (द्वितीय पाद) १. वागाद्यधिकरण (सूत्र १-२) १. पूर्वपक्ष—वाक् आदि इन्द्रियों की वृत्तिलय का प्रदर्शन । ankurnagpal108@gmail.com

४७ २. सिद्धान्त- उत्क्रमण काल में इन्द्रियों का मन से मिलने का प्रतिपादन तथा इन्द्रियों की अणुता का उपपादन। —पृ०११३६-४१ २. मनोधिकरण (सूत्र ३) मरण काल में इन्द्रियों सहित मन का प्राण से मिलने का वर्णन। —पृ०११४१-४२ ३. अध्यक्षाधिकरण (सूत्र ४) देहाध्यक्ष जीव की प्राण संबद्धता का निरूपण। —पृ०११४२-४३ ४. भूताधिकरण (सूत्र ५-६) जीव समन्वित प्राण की भूतसंबद्धता का निरूपण। भूतों से प्राण संयोग का समर्थन। —पृ०११४३-४५ ५. आसृत्युपक्रमाधिकरण (सूत्र ७-१३) १. पूर्वपक्ष—विद्वान और अविद्वान के भेद से उपक्रमण के पार्थक्य की संभावना का संशय। २ सिद्धान्त—उपक्रमण में विद्वान अविद्वान की समानता का प्रतिपादन। ब्रह्म प्राप्ति न होने तक संसारगति का समर्थन। देह त्याग के उपरान्त भी जीव का सूक्ष्म शरीर से संबन्ध निरूपण। सूक्ष्म शरीर के सद्भाव से ही दैहिक उष्णता की उपलब्धि ज्ञापन। पृ०११४५-५३ ६. पर संपत्त्यधिकरण (सूत्र १४) जीव समन्वित भूतों की परमात्म लीनता का वर्णन। —पृ०११५३-५४ ७. अविभागाधिकरण (सूत्र १५) जीव समन्वित भूतों की परमात्मा से अविभक्त स्थिति का निरूपण —पृ०११५४-५५ ८. तदोकोधिकरण (सूत्र १६) मृत्युकाल में उपासक के हृदयाग्रभाग में ज्वलन का वर्णन। —पृ०११५५-५७ ankurnagpal108@gmail.com

४६ ९. रश्म्यनुसाराधिकरण (सूत्र १७) सूर्य रश्मियों के सहारे उपासक के ऊर्ध्वगमन का विश्लेषण। —पृ० ११५७-५८ १०. निशाधिकरण (सूत्र १८) दक्षिणायन में भी मृत उपासक की ब्रह्म प्राप्ति का निरूपण। दक्षिणायन और दोनों मार्गों की नित्यस्मरणीयता का प्रतिपादन। —पृ० ११५८-६३ (तृतीय पाद) १. अर्चिराद्यधिकरण (सूत्र १) मृत्यु के बाद उपासक की अर्चिरादि गति का निरूपण। —पृ० ११६४-६५ २. वाय्वधिकरण (सूत्र २) संवत्सरगति के बाद आदित्य पूर्वं वायु प्राप्ति का वर्णन। —पृ० ११६७-७० ३. वरुणाधिकरण (सूत्र ३) विद्युत्प्राप्ति के पूर्व वारुणी गति का समर्थन। —पृ० ११७०-७२ ४. आतिवाहिकाधिकरण (सूत्र ४-५) अर्चिरादि शब्दों का आतिवाहिक अर्थ निरूपण, —पृ० ११७२-७४ ५. कार्याधिकरण (सूत्र ६-१६) विद्युत लोक के वैद्युत पुरुषों द्वारा उपासक की ब्रह्म प्राप्ति का निरूपण। १ बादरि आचार्य के मत से उपासकों की हिरण्यगर्भ लोक प्राप्ति का निरूपण। हिरण्यगर्भ में ब्रह्म शब्द की गौणार्थता का निरूपण। कर्त्तव्य के अवसान में हिरण्यगर्भ सहित ब्रह्मलोक वासियों की मुक्ति का समर्थन। ankurnagpal108@gmail.com

४६ २. जैमिनि के मत से ब्रह्म शब्द की मुख्यार्थता समर्थन ३. का बादरायण के मत से प्रतीकोपासना रहित उपासकों का निरूपण । —पृ० ११७४-८३ (चतुर्थ पाद) १. संपद्याविर्भावाधिकरण (सूत्र १-३) परज्योति परब्रह्म की प्राप्ति के अनन्तर जीव के स्वरूपाविर्भाव का निरूपण प्रकरणानुसार आत्मा की स्वाविक निष्पापता का समर्थन । —पृ० ११८४-८७ २. अविभागेन दृष्टत्वाधिकरण (सूत्र ४) मुक्त पुरुष की अभिन्नरूप से ब्रह्मानुभूति का समर्थन । —पृ० ११८७-९२ ३. ब्राह्माधिकरण (सूत्र ५-७) १. जैमिनि के मत से अपहतपाप्मता आदि गुणविशिष्ट ब्रह्म रूप से मुक्तात्मा के आविर्भाव का निरूपण । २. औडुलोमि के मत से चैतन्यात्मक ब्रह्मरूप में स्वरूपाविर्भाव का निरूपण । ३. बादरायण के मत से दोनों स्वरूपाविर्भाव का प्रतिपादन । —पृ० ११९२-९५ ४. संकल्पाधिकरण (सूत्र ८-९) मुक्त पुरुष के स्वेच्छानुसार ज्ञाति प्रिय समागम का निरूपण । मुक्त पुरुष की पराधीनता का निराकरण । —पृ० ११९६-९७ ५. अभावाधिकरण (सूत्र १०-१६) १. बादरि के मत से मुक्त पुरुष के शरीरादि अभाव का प्रतिपादन । २. जैमिनि के मत से मुक्त पुरुष के शरीरादि सद्भाव का समर्थन । ankurnagpal108@gmail.com

५० ३. मुक्ति के समय देहाभाव में भी स्वेच्छा से भगवान के लीलारस आस्वादन का प्रतिपादन। मुक्त पुरुष की देहादि के सद्भाव में जाग्रतानुभूति का निरूपण। मुक्तावस्थ अणु स्वरूप आत्मा की अन्यत्र भोग संभावना का समर्थन। नित्य जीवात्मा की सर्वज्ञता का समर्थन। —पृ०११६७-१२०२ ६. जगद्व्यापारवर्जाधिकरण (सूत्र १७-२२) १. मुक्त पुरुष का जगत् सृष्टि आदि ईश्वरीय कार्यों से भिन्न कार्यों में अधिकार निरूपण। २. मुक्त पुरुष के निर्विकार ब्रह्मभोग का वर्णन। ३. मुक्त पुरुष की संसार पुनरावृत्ति का निराकरण पृ०१२०२-११

॥ श्रीमते रामानुजाय नम ॥ शारीरक मीमांसा श्रीभाष्य अखिलभुवनजन्मस्थेमभङ्गादिलीले, विनतविविधभूतव्रातरक्षैकदीक्षे। श्रुतिशिरसि विदीप्ते ब्रह्मणि श्रीनिवासे, भवतु मम परस्मिन् शेमुषी भक्तिरूपा॥ समस्त विश्व की सृष्टि, स्थिति और लय रूप लीला करने वाले, 'शरणागत भक्त की रक्षा के लिए प्रतिश्रुत, उपनिषद् शास्त्र प्रतिपादित परब्रह्म श्रीनिवास वासुदेव में मेरी सतत भक्तिमयी मति हो। पाराशर्यवचःसुधामुपनिषद्दुग्धाब्धिमध्योद्धृतां संसाराग्निविदीपनव्यपगतप्राणात्मसंजीवनीम्। पूर्वाचार्यसुरक्षितां बहुमतिव्याघातदूरस्थिता-, मानीतान्तु निजाक्षरैःसुमनसो भौमाः पिबन्त्वन्वहम्॥ उपनिषद् शास्त्र रूप समुज्ज्वल क्षीरसागर से प्रकट, संसार रूप अग्निताप से तप्त, परमात्मज्ञान हीन संतप्त जनो की संजीवनी, पूर्वा- चार्य ( श्री द्रविडाचार्य ) से सुरक्षित, मतमतान्तरों के व्याघात से दुर्बोध, वेदान्ताचार्यों के व्याख्यानों से प्राप्त, पराशरपुत्र बादरायण की अमृतमय वाणी का भूलोक वासी विद्वज्जन निरन्तर पान करे। भगवद्बोधायनकृतां विस्तीर्णां ब्रह्मसूत्रवृत्तिं पूर्वाचार्याः संचिक्षिपुः तन्मतानुसारेण सूत्राक्षराणि व्याख्यास्यन्ते। भगवान् बोधायन कृत विस्तृत ब्रह्मसूत्र वृत्ति को पूर्वाचार्य ( श्री द्रविड ) ने संक्षिप्त किया, मैं उन्हीं के मतानुसार सूत्राक्षरों की व्याख्या कर रहा हूँ। ankurnagpal108@gmail.com

( २ ) प्रथम अध्याय, प्रथम पाद १ अधिकरण अथाऽतो ब्रह्मजिज्ञासा । १।१।१।। अत्रायमथशब्द आनन्तर्ये भवति, अतश्शब्दो वृत्तस्य हेतुभावे । अधीतसाङ्गसशिरस्कवेदस्याधिगताल्पास्थिरफल-केवलकर्मज्ञानतया संजातमोक्षाभिलाषस्यानन्तास्थिरफल-ब्रह्मजिज्ञासा ह्यनन्तरभा- विनी । इस सूत्र में "अथ" शब्द आनन्तर्य अर्थ का बोधक तथा "अतः" शब्द पूर्वावगत विषय का सूचक है, अर्थात् पूर्ववर्त्ती कर्मकाण्ड से अवगत कर्म-फल की अस्थिरता, अनित्यता आदि का अवबोध ही ब्रह्मजिज्ञासा की उपस्थिति का मुख्य हेतु है । जिस व्यक्ति ने वेद वेदांग, उपनिषद् शास्त्र के अध्ययन से यह बात समझ ली है कि केवल कर्म का फल अल्प, अस्थिर और नाशवान् है तथा ब्रह्मज्ञान का फल अनन्त और अक्षर है, तो निश्चित ही उसके मन में मोक्षलाभ की अभिलाषा जाग्रत होती है, और फिर उसके अनन्तर उसके मन में ब्रह्म सम्बन्धिनी जिज्ञासा होती है । ब्रह्मणो जिज्ञासा ब्रह्मजिज्ञासा इति कर्मणि षष्ठी "कर्तृकर्मणोः कृति" इति विशेषविधानात् । यद्यपि संबन्धसामान्यपरिग्रहेऽपि जिज्ञासायाः कर्मापेक्षत्वेन कर्मार्थत्वसिद्धिः, तथाप्याक्षेपतः प्राप्तादाभिधानिकस्यैव ग्राह्यत्वात् कर्मणि षष्ठी गृह्यते । न च “प्रतिपदविधाना षष्ठी न समस्यते" इति कर्मणि षष्ठ्याः समास- निषेधः शङ्कनीयः । “कृद्योगा च षष्ठी समस्यते" इति प्रतिप्रसव- सद्भावात् । ब्रह्म जिज्ञासा का तात्पर्य है ब्रह्म के जानने की इच्छा । "कर्तृ कर्मणोः कृतिः" इस व्याकरणीय नियमानुसार "ब्रह्मणः" पद कर्मवाच्य षष्ठी विभक्ति का है । यद्यपि सामान्य संबंध रूप अर्थ स्वीकारने से भी जिज्ञासा कर्म की अपेक्षित कर्मार्थता सिद्ध है, तथापि आक्षेप लब्ध ( प्रकारान्तर से प्राप्त ) अर्थ की अपेक्षा आभिधानिक ankurnagpal108@gmail.com

( ३ )

( शब्द लब्ध ) अर्थ ग्राह्य होता है इसलिए यहाँ कर्म में षष्ठी विभक्ति मानते हैं। "प्रतिपद ( कर्म विहित ) षष्ठी विभक्ति में समास नहीं होता" इस नियमानुसार यहाँ समास निषेध की शंका भी नहीं की जा सकती, क्योंकि "कृद्योगे षष्ठी समस्यते" इस नियम से कृत् प्रत्यय के योग में विहित षष्ठी के साथ समास का पुनः विधान किया गया है। ब्रह्मशब्देन च स्वभावतो निरस्तनिखिलदोषोऽनवधिकातिशया- संख्येयकल्याणगुणगणः पुरुषोत्तमोऽभिधीयते, सर्वत्र बृहत्त्वगुणयोगेन हि ब्रह्मशब्दः, बृहत्त्वं च स्वरूपेण गुणैश्च यत्रानवधिकातिशयं सोऽस्य मुख्योऽर्थः । स च सर्वेश्वर एव, अतो ब्रह्मशब्दस्तत्रैव मुख्यवृत्तः । तस्मादन्यत्र तद्गुणलेशयोगादौपचारिकः, अनेकार्थकल्पनायोगाद् भगवच्छब्दवत् । तापत्रयातुरैरमृतत्वाय स एव जिज्ञास्यः । अतस्सर्वेश्वर एव जिज्ञासाकर्मभूतं ब्रह्म । ब्रह्म शब्द से स्वभावतः समस्त दोषों से रहित, निरवधि, असंख्येय, कल्याणमय गुणों से युक्त पुरुषोत्तम कहे गये हैं। ब्रह्म शब्द सभी जगह "बृहत्त्व" गुणवाला कहा गया है। स्वरूपतः और गुणानुसार असीमता और अतिशयिता ही बृहत्त्व का सही अर्थ है। उक्त विशेषताओं से युक्त सर्वेश्वर ही हैं, इसलिए ब्रह्म शब्द से वे ही अभिहित हैं । उक्त गुणों से आंशिक संबंध होने से अन्यों के लिए प्रयुक्त ब्रह्म शब्द भगवत् शब्द की तरह औपचारिक मात्र है। त्रितापों से तप्त और आतुर संसारी जीवों को अमरता और शांति प्राप्त करने के लिए वह सर्वेश्वर ही जिज्ञास्य हैं। जिस ब्रह्म की जिज्ञासा की जाती है वह सर्वेश्वर ही हैं। ज्ञातुमिच्छा जिज्ञासा । इच्छाया इष्यमाणप्रधानत्वादिष्य- माणं ज्ञानमिह विधीयते । मीमांसापूर्वभागज्ञातस्य कर्मणोऽल्पा- स्थिरफलत्वादुपरितनभागावसेयस्य ब्रह्मज्ञानस्यानन्ताक्षय फलत्वं च पूर्ववृत्तात् कर्मज्ञानादनन्तरं तत एव हेतोर्ब्रह्म ज्ञातव्यमित्युक्तं भवति । तदाह वृत्तिकारः—"वृत्तात्कर्माधिगमादनन्तरं ब्रह्म- विविदिषा" इति ।

( ४ ) जानने की इच्छा को जिज्ञासा कहते हैं, इच्छा क्रिया में इष्यमाण वस्तु प्रधान होती है, जिज्ञासा पद में इष्यमाण वस्तु ज्ञान है; इसलिए ब्रह्म जिज्ञासा का तात्पर्य है, ब्रह्म ज्ञान । मीमांसा के पूर्व भाग से ज्ञात कर्म की अल्प और अस्थिर फलता तथा उत्तर भाग से ज्ञात ब्रह्म ज्ञान की अनन्त और अक्षय फलता से मन में निर्वेद होता है, जिसके फलस्वरूप कर्म तत्त्व को भली भाँति जानकर ब्रह्म तत्त्व को भी जानना चाहिए ऐसा भाव होता है। ऐसा ही वृत्तिकार ने कहा भी है—"कर्मतत्त्व को भली भाँति जानने के बाद ब्रह्म ज्ञान की इच्छा होती है।" वक्ष्यति च कर्मब्रह्ममीमांसयोरेकशास्त्र्यम्—"संहितमेतच्छा- रीरकं जैमिनीयेन षोडशलक्षणेनेति शास्त्रैकत्वसिद्धिः” इति । अतः प्रतिपिपादयिषितार्थभेदेन षट्कभेदवदध्यायभेदवच्च पूर्वोत्तर- मीमांसयोर्भेदः । मीमांसाशास्त्रम्—"अथातो धर्मजिज्ञासा” इत्या- रभ्य "अनावृत्तिश्शब्दादनावृत्तिश्शब्दात्” इत्येवमन्तं संगति- विशेषेणाविशिष्टक्रमम् । वृत्तिकार कर्ममीमांसा और ब्रह्ममीमांसा दोनों को एक ही शास्त्र बतलाते हैं—"यह शारीरक मीमांसा, जैमिनि कृत धर्म मीमांसा के सोलह अध्यायों से मिलकर ही संपूर्ण एक शास्त्र के रूप में पूरी होती है।" प्रतिपाद्य विषय को जैसे पाद और अध्यायों में बाँटकर अलग- अलग वर्णन किया गया है, वैसे ही मीमांसा के पूर्व और उत्तर दो भेद हैं। मीमांसा शास्त्र पूर्व मीमांसा के आदिम सूत्र "अथातो धर्म जिज्ञासा” से लेकर उत्तर मीमांसा के अंतिम सूत्र "अनावृत्तिश्शब्दात्" में जाकर संगति विशेष के विशिष्ट क्रम से पूरा हुआ है । तथाहि प्रथमं तावत् "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः" इति अध्ययनेनैव स्वाध्यायशब्दवाच्यवेदाख्याक्षरराशेर्ग्रहणं विधीयते । सर्व प्रथम विद्यार्थी को आदेश होता है "स्वाध्ययोऽध्येतव्यः", तथा अध्ययन से स्वाध्याय शब्द वाच्य वेद नामक अक्षर राशि को ग्रहण करने का विधान बतलाया जाता है । ankurnagpal108@gmail.com

( ५ ) तच्चाध्ययनं किंरूपम् ? कथं च कर्तव्यम् ? इत्यपेक्षायाम्— श्रावण्यां प्रौष्ठपद्यां वा उपाकृत्य यथाविधि “अष्टवर्षं ब्राह्मण- मुपनयीत तमध्यापयेत्” इत्यनेन “युक्तश्छन्दांस्यधीयीत मासान्विप्रोऽर्धपञ्चमान् ।” इत्यादिब्रतनियमविशेषोपदेशैश्चापेक्षितानि विधीयन्ते । एवं सत्संतानप्रसूतसदाचारनिष्ठात्मगुणोपेत- वेदविदाचार्योपनीतस्य व्रतनियमविशेषयुक्तस्याचार्योच्चारणानुच्चा- रणरूपमक्षरराशिग्रहणफलमध्ययनमित्यवगम्यते । उस अध्ययन का क्या रूप है ? वह कैसे किया जाता है ? ऐसी आकांक्षा होने पर “आठ वर्ष में ब्राह्मण का उपनयन करके उसे पढ़ाओ”, “श्रावण या भाद्रपद की पूर्णिमा को यथा विधि उपाकर्म करके साढ़े चार महीने तक स्थिर चित्त से वेद पढ़ना चाहिए ।” इत्यादि व्रत और नियम विशेष के उपदेश द्वारा अपेक्षित अध्ययन की विधि का निरूपण किया गया है। इस प्रकार कुलीन, सदाचार निष्ठ, आत्म गुण संपन्न वेदज्ञ आचार्य द्वारा उपनीत, विशेष व्रत नियम संपन्न (बटु) शिक्षा के उद्देश्य से जब अक्षर राशि को गुरुमुख से श्रवण कर स्वयं मुखरित करता है, उसे ही अध्ययन मानते हैं । अध्ययनं च स्वाध्यायसंस्कारः “स्वाध्यायोऽध्येतव्यः” इति स्वाध्यायस्य कर्मत्वावगमात् । संस्कारो हि नाम कार्यान्तरयोग्यता- करणम् । संस्कार्यत्वं च स्वाध्यायस्य युक्तम्, धर्मार्थकाममोक्षरूप- पुरुषार्थचतुष्टयतत्साधनावबोधितत्वात्, जपादिना स्वरूपेणापि तत्साधनत्वाच्च । एवमध्ययनविधिर्मन्त्रवन्नियमवदक्षरराशि- ग्रहणमात्रे पर्यवस्यति । “स्वाध्यायोऽध्येतव्यः” इस वाक्य से अध्ययन स्वाध्याय क्रिया का कर्म निश्चित होता है; अध्ययन से स्वाध्यायरूप संस्कार दृढ होता है । कार्यान्तर योग्यता संपादन करने वाले को संस्कार कहते हैं । अधीत अक्षर- राशि प्रतिपाद्य ज्ञानार्जन से धर्मार्थ काम मोक्ष रूप पुरुषार्थ चतुष्टय

काँ संपादन होता है तथा अक्षर राशि के जाप आदि रूप से भी पुरुषार्थ चतुष्टय की सिद्धि होती है, इसलिए स्वाध्याय की सस्कार्यता युक्ति युक्त है। वेद की अध्ययन विधि मंत्र की तरह अक्षर राशि के ग्रहण मात्र मे पर्यवसित है। अध्ययनगृहीतस्य स्वाध्यायस्य स्वभावत एव प्रयोजनवदर्था- वबोधित्वदर्शनात् । गृहीतात् स्वाध्यायादवगम्यमानात् प्रयोजनवतोऽर्थानापाततो दृष्ट्वा तत्स्वरूपप्रकारविशेषनिर्णयफल- वेदवाक्यविचाररूपमीमांसाश्रवणे अधीतवेदः पुरुषः स्वयमेव प्रवर्तते । अध्ययन-गृहीत अक्षर राशि रूप स्वाध्याय के प्रयोजनीय (यज्ञ, उपा- सना आदि) अर्थावबोध की प्रवृत्ति स्वतः ही होती है तथा वेद के विधि- वत् कण्ठस्थ हो जाने पर प्रयोजनीय विषयो को वेदो मे आदि से अन्त तक देखकर उनके स्वरूप, प्रकार विशेष आदि के निर्द्धारण के लिए वेद- वाक्य विचारात्मक मीमांसा शास्त्र के श्रवण मे वेद पढ़ा हुआ व्यक्ति स्व- यमेव उन्मुख होता है। तत्र कर्मविधिस্বরূপे निरूपिते कर्मणामल्पास्थिरफलत्वं दृष्ट्वा अध्ययनगृहीतस्वाध्यायोपनिषद्वाक्येषु च अमृतस्वरूपा- नन्तस्थिरफलापातप्रतीतेः तन्निर्णयफलवेदान्तविचाररूपशारीरक- मीमांसायामधिकरोति । कर्म मीमांसा के कर्म विधि के स्वरूप निरूपण प्रकरण में कर्मों की अल्प अस्थिर फलता को देखकर तथा अध्ययन के सिलसिले में अधीत उप- निषद् वाक्यो मे ब्रह्मज्ञान की अनन्त स्थिर फलता की प्रतीति होने पर ब्रह्मतत्त्व निर्णायक वेदांत विचार रूप शारीरक मीमांसा में स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। विचारक स्वतः ही शारीरक मीमांसा का अध्ययन करता है। तथाच वेदान्तवाक्यानि केवलकर्मफलस्य क्षयित्वं ब्रह्मज्ञानस्यै वाक्षयफलत्वं दर्शयन्ति—"तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयते, एव- ankurnagpal108@gmail.com

मेवात्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते”, “अन्तवदेवाऽस्य तद् भवति”, “नह्यध्रुवैः प्राप्यते”, “प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपाः”, “परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायात् नास्त्यकृतः कृतेन। तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्॥ तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय। येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम्।” इति। “ब्रह्मविदाप्नोति परम्”, “न पुनर्मृत्यवे तदेकं पश्यति”, “न पश्योमृत्यं पश्यति”, “स स्वराड्भवति”, “तमेव विद्वानमृत इह भवति”, “नान्यः पन्था अयनाय विद्यते”, “पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति” इत्यादीनि। वेदान्त वाक्य ज्ञानरहित कर्मफल की क्षीणता तथा ब्रह्मज्ञान की अक्षय फलता का ऐसा विवेचन करते है—“इस लोक की वस्तुएं जैसे नाशवान् है वैसे ही पारलौकिक वस्तुएं भी नाशवान् हैं”—“सकाम कर्मों का फल नाशवान् ही होता है”—“क्षण भंगुर कर्मों से नित्य फल कभी नहीं मिलता”—“यज्ञादि कर्म संसार से पार करने वाली दृढ नौकाएं नहीं हैं” —“लौकिक कर्मों का भली भांति पर्यवेक्षण करके, कर्मों की अक्षमता समझ कर ब्राह्मण को सांसारिक कर्मों की ओर से निर्वेद होता है, वह ब्रह्म तत्व की जिज्ञासा से हाथ में कुश आदि पूजन सामग्रियों को लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के निकट उपस्थित होता है, गुरु अपने निकट उपस्थित प्रशान्तचित्त संयतेन्द्रिय शिष्य को ब्रह्मविद्या का उपदेश दें जिससे कि वह अक्षर तथा सत्य से अवगत हो जाय”—“ब्रह्मवेत्ता पर- ब्रह्म को प्राप्त करता है”—“पुनः मृत्यु को प्राप्त नहीं करता”—“वह एक ही वस्तु को देखता है, जागतिक कामनाओं को न देखने वाला मृत्यु को नहीं देखता”—“वह स्वतंत्र हो जाता है” “उसको जानने वाला अमृत हो जाता है”—“उसे जानकर मृत्यु का अतिक्रमण करता है,—इसके अतिरिक्त मोक्ष का दूसरा उपाय नहीं है”—“प्रेरक आत्मा को भिन्न मानकर उसका कृपा पात्र होता है और उसी से, अमृतत्वं प्राप्त करता है।” इत्यादि।

( ८ ) ननु च साङ्गवेदाध्ययनादेव कर्मणां स्वर्गादिफलत्वं स्वर्गादीनां च क्षयित्वं ब्रह्मोपासनस्यामृतफलत्वं च ज्ञायत एव । अनन्तरं मुमुक्षुर्ब्रह्मजिज्ञासायामेव प्रवर्तताम्, किमर्था धर्मविचारापेक्षा ? एवं तर्हि शारीरकमीमांसायामपि न प्रवर्तताम् साङ्गाध्ययनादेव कृत्स्नस्य, ज्ञातत्वात् । सत्यम्, आपातप्रतीतिर्विद्यत एव, तथापि न्यायानुगृहीतस्य वाक्यस्यार्थनिश्चायकत्वादापातप्रतीतोऽप्यर्थः संशयविपर्ययौ नाति- वर्तते; अतस्तन्निर्णयाय वेदान्तवाक्यविचारः कर्तव्य इति चेत्; तथैव धर्मविचारोऽपि कर्त्तव्यः, इति पश्यतु भवान् । ( शंका ) वेद वेदांग के अध्ययन से ही कर्मों की स्वर्गादि फलता, स्वर्गादि की क्षीणता एव ब्रह्मोपासना की अमृतफलता ज्ञात हो जाती है तो मोक्ष की इच्छा वालो की ब्रह्म जिज्ञासा में ही प्रवृत्ति होगी, उन्हे धर्म विचार की अपेक्षा ही क्या है ? (उत्तर) यदि ऐसी ही बात है कि वेदाध्ययन से ही सब कुछ ज्ञात हो जाता है तो शारीरक मीमांसा में ही क्यो प्रवृत्ति होगी । (पूर्वपक्ष) उक्त विषयो की सामान्य प्रतीति अध्ययन से हो जाती है ऐसा सत्य है; फिर भी न्यायानुमोदित वाक्य के अर्थनिर्ण- यक होने से अविचारित रूप से प्रतीत होने वाला सामान्य अर्थ संशय और विपर्यय (भ्रम) की निवृत्ति नही कर पाता, इसलिए अर्थ निर्णायक वेदान्त वाक्यों का विचार आवश्यक है । (उत्तर पक्ष) आपके उक्त मत के अनुसार ही धर्म विचार भी आवश्यक हो जाता है । (लघु पूर्वपक्ष) ननु च ब्रह्मजिज्ञासा यदेव नियमेनापेक्षते, तदेव पूर्ववृत्तं वक्तव्यम् । न धर्मविचारापेक्षा ब्रह्मजिज्ञासायाः, अधीत- वेदान्तस्यानधिगतकर्मणोऽपि वेदान्तवाक्यस्यार्थविचारोपपत्तेः । कर्माङ्गाश्रयाणि उद्गीथ-आदि उपासनानि अत्रैव चिन्त्यन्ते, तदनधि- गतकर्मणो न शक्यं कर्त्तुमिति चेत्, अनभिज्ञो भवान् शारीरक- शास्त्रविज्ञानस्य । अस्मिन् शास्त्रे अनाद्यविद्याकृतविविधभेद-

( ६ ) दर्शननिमित्तजन्मजरामरणादिसांसारिकदुःखसागरनिमग्नस्य निखिल- दुःखमूलमिथ्याज्ञाननिबर्हणायात्मैकत्वविज्ञानं प्रतिपिपादयिषितम्। अस्यहि भेदावलम्बिकर्मज्ञानं क्वोपयुज्यते ? प्रत्युत विरुद्धमेव । उद्गीथादिविचारस्तु कर्मशेषभूत एव ज्ञानरूपत्वाविशेषादिहैव क्रियते । स तु न साक्षात् संगतः, अतो यत् प्रधानं शास्त्रं तदपेक्षित- मेव पूर्ववृत्तं किमपि वक्तव्यम् । (वाद) ब्रह्म जिज्ञासा में जिस नियम की अपेक्षा होती है, उस पूर्व- वर्त्ती कारण के विषय में कुछ कहना है । ब्रह्म जिज्ञासा, मैं धर्म विचार अपेक्षित नहीं है । वेदांत का ज्ञाता कर्म के विधि निषेधात्मक नियमों को न जानकर भी वेदांतवाक्यों के तत्त्वों पर विचार कर सकता है । यदि आप कहें कि वेदांत में तो कर्माङ्गाश्रित उद्गीथ आदि विद्याओं का भी निरूपण है, कर्मकांड के विचार बिना उन पर विचार नहीं हो सकता । तो मेरी समझ में आप शारीरक मीमांसा शास्त्र प्रणाली से अनभिज्ञ हैं। इस शास्त्र में अनादि अविद्याजन्य भेद दृष्टि के फलस्वरूप होने वाले जन्म जरा मरण आदि सांसारिक दुःख सागर में निमग्न व्यक्ति की दुःखराशि की मूलकारण मिथ्याभ्रान्ति के निवारणार्थ, आत्मैकत्व ज्ञान का प्रति- पादन किया गया है । इस विवेक में भेद पर अवलंबित कर्म ज्ञान की क्या उपयोगिता हो सकती है ? यह तो इसमें विरुद्ध कार्य ही करेगा । उद्गीथ आदि उपासना कर्माङ्ग होते हुए भी ज्ञान स्वरूप हैं इसीलिए उनका उत्तरमीमांसा में विवेचन किया गया है, कर्म का उन उपासनाओं से साक्षात् संबन्ध नहीं है । शास्त्र के प्रधान प्रतिपाद्य विषय से संबद्ध विषय को ही उस शास्त्र का पूर्ववर्त्ती कारण कह सकते हैं, अन्य किसी को नहीं (अतः कर्म ज्ञान ब्रह्मजिज्ञासा में अपेक्षित नहीं है) । बाढम् ; तदपेक्षितं च कर्मविज्ञानमेव, कर्मसमुच्चिताद् ज्ञानादपवर्गश्रुतेः । वक्ष्यति च “सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्” इति । अपेक्षिते च कर्मण्यज्ञाते केन समुच्चयः केन नेति विभागो न शक्यते ज्ञातुम्, अतस्तदेव पूर्ववृत्तम् । ankurnagpal108@gmail.com

( १० ) (प्रतिबाद ) ब्रह्मज्ञान में कर्म ज्ञान ही अपेक्षित पूर्व कारण हो सकता है। कर्मसमुच्चित ज्ञान से ही मुक्ति होती है, ऐसा मोक्ष प्रतिपादक श्रुति वाक्य से ज्ञात होता है। ऐसा सूत्रकार भी “यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्” मे प्रति- पादन करते हैं। ज्ञानापेक्षित कर्मकाण्ड का विशेष ज्ञान न होने से कौन सा कर्म ज्ञानसमुच्चित हो सकता है, कौन सा नहीं ? ऐसा निर्णय करना कठिन है। इसलिए समस्त कर्ममीमांसा को ब्रह्ममीमांसा का पूर्ववर्त्ती मानना होगा। नैतद् युक्तम्; सकलविशेषप्रत्यनीकचिन्मात्रब्रह्मविज्ञानादेवा- विद्यानिवृत्तेः, अविद्यानिवृत्तेरेव हि मोक्षः । वर्णाश्रमविशेषसाध्य- साधनेतिकर्तव्यताद्यनन्तविकल्पास्पदं कर्म सकलभेददर्शननिवृत्ति- रूपाज्ञाननिवृत्तेः कथमिव साधनं भवेत् ? श्रुतयश्च कर्मणामनित्य- फलत्वेन मोक्षविरोधित्वं, ज्ञानस्यैव मोक्षसाधनत्वं च दर्शयन्ति— “अन्तवदेवास्य तद् भवति”, “तद् यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयते, एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते”, “ब्रह्मविदाप्नोति परम्, ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति”, “तमेव विदित्वातिमृत्युमेति” इत्याद्याः । (वाद) उक्त कथन संगत नही है, सर्वविध भेदों से रहित शुद्ध चिन्मय ब्रह्मज्ञान से ही अविद्या की निवृत्ति होती है, अविद्या की निवृत्ति ही मोक्ष है। वर्ण और आश्रमगत भेद, साध्य, साधन और इतिकर्तव्यता आदि अनन्त भेद सापेक्ष कर्म समस्त भेद दर्शन निवृत्तिरूप अज्ञान निवृत्ति के साधन कैसे हो सकते हैं ? ‘ अज्ञानी का कर्म निश्चित ही नाशवान् होता है”, “इस लोक में कर्मलब्ध वस्तुएं जैसे अशाश्वत होती हैं; वैसे पुण्यचित् स्वर्गादि भी नश्वर है”, “ब्रह्मवेत्ता ही पर ब्रह्म को प्राप्त कर सकता है”, “ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही होता है।” इत्यादि श्रुतियाँ भी अनित्य फल वाले कर्मों को मोक्ष विरोधी तथा ज्ञान को ही मोक्ष साधक बतलाती हैं। यदपि चेदमुक्तम्—यज्ञादिकमपिक्षाविद्येति, तद् वस्तुविरोधात् श्रुत्यक्षरपर्यालोचनया चान्तःकरणनैर्मल्यद्वारेण विविदिषोत्पत्ता- वुपयुज्यते, न फलोत्पत्तौ, “विविदिषन्तीति” श्रवणात्, विविदिषा-

( ११ ) यां जातायां ज्ञानोत्पत्तौ शमादीनामेव अन्तरङ्गोपायतां श्रुतिरेवाह “शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्येत्” इति । तदेवं जन्मान्तरशतानुष्ठितानभिसंहितफलविशेषकर्म- मृदितकषायस्य विविदिषोत्पत्तौ सत्याम् “सदेव सोम्येदमग्र आसीद् एकमेवाद्वितीयम्”, “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”, “निष्कलं निष्क्रियं शान्तम्”, “अयमात्मा ब्रह्म”, “तत्त्वमसि” इत्यादिवाक्यजन्यज्ञानाद- विद्या निवर्त्तते । यद्यपि “विद्या यज्ञादि कर्म सापेक्ष है” ऐसा कहा गया है । श्रुति के अक्षरों की पर्यालोचना से स्पष्ट होता है कि अन्तःकरण की निर्मलता द्वारा ब्रह्म जिज्ञासा की उत्पत्ति में ही यज्ञादि कर्म की उपयोगिता है, फलोत्पत्ति में नहीं । यदि इसे फलोत्पत्ति में उपयोगी मानेंगे तो वह ज्ञान वस्तु का विरोधी सिद्ध होगा । “विविदिषन्ति” इस श्रुतिवाक्य से [L14

( १२ ) वाक्यार्थज्ञानमविद्यां निवर्त्तयतीत्येवंरूपस्य श्रवणस्यापेक्षितमेव पूर्ववृत्तं वक्तव्यम् । तच्च नित्यानित्यवस्तुविवेकः, शमदमादि- साधनसम्पत्, इहामुत्र फलभोगविरागः, मुमुक्षुत्वं चेत्येतत्साधन- चतुष्टयम् । अनेन विना जिज्ञासानुपपत्तेः, अर्थस्वभावादेवेदमेव पूर्ववृत्तमिति ज्ञायते । श्रवण, मनन और निदिध्यासन वाक्यार्थज्ञान के उपयोगी साधन हैं। तत्त्वदर्शी आचार्य से "समस्त वेदान्त वाक्य अभेद विद्या के प्रतिपादक हैं" ऐसे युक्तियुक्त वाक्यार्थ ग्रहण को श्रवण कहते हैं। ऐसे आचार्योपदिष्ट तथ्य को युक्ति संगत मानकर आत्मसात् करने के अभ्यास को मनन कहते हैं। एकत्व ज्ञान की विरोधी अनादि भेद बुद्धि और उसके संस्कारों को दूर करने के लिए आचार्योपदिष्ट तत्व की अनवरत भावना को निदिध्यासन कहते हैं। इस प्रकार श्रवण मनन आदि द्वारा जिसकी समस्त भेदवासना निरस्त हो चुकी है, (तत्वमसि आदि) वाक्य जनित ज्ञान उसी की अविद्या की निवृत्ति कर सकता है। इस प्रकार का श्रवण रूप कर्म ही वाक्यार्थ ज्ञान का पूर्ववर्ती अपेक्षित कर्म है, ऐसा कहना चाहिए। नित्य अनित्य वस्तु का विवेक, शम दम आदि साधन, ऐहिक और पारलौकिक फल भोग से वैराग्य तथा मुमुक्षता ये चार साधन हैं, इनके बिना ब्रह्म जिज्ञासा हो नही सकती। श्रुतियों के वास्तविक अर्थ से ये चारो ही अपेक्षित पूर्ववृत्त ज्ञात होते हैं। एतदुक्तं भवति—ब्रह्मस्वरूपाच्छादिकाऽविद्यामूलमपारमार्थिकं भेददर्शनमेव बन्धमूलम् । बन्धश्चापारमार्थिकः स च समूलोऽपा- रमार्थिकत्वादेव ज्ञानेनैव निवर्त्यते । निवर्त्तकं च ज्ञानं तत्त्व- मस्यादिवाक्यजन्यम् । तस्यैतस्य वाक्यजन्यस्य ज्ञानस्य स्वरूपो- त्पत्तौ कार्ये वा कर्मणो नोपयोगः, विविदिषायामेव तु कर्मणामुपयोगः स च पापमूलरजस्तमोनिबर्हणद्वारेण सत्त्वविवृद्ध्या भवती- त्युपयोगमभिप्रेत्य "ब्राह्मणा विविदिषन्ति" इत्युक्तमिति । अतः कर्मज्ञानस्यानुपयोगादुक्तमेव साधनचतुष्टयं पूर्ववृत्तमिति वक्तव्यम् । ankurnagpal108@gmail.com

( १३ ) कथन यह है कि ब्रह्म के स्वरूप को ढकने वाली अविद्या से प्रसूत असत्य भेद दर्शन ही (जीवों के) बन्धन का कारण है, वह बन्धन भी अवास्तविक है, और वह समूल अवास्तविक होने से ज्ञान से ही उसकी निवृत्ति हो जाती है। तत्त्वमसि आदि वाक्य जन्य ज्ञान ही उक्त बन्धन का निवारक है। इस प्रकार के वाक्य जन्य ज्ञान में कार्य या कर्म की कोई उपयोगिता नहीं है, विविदिषा में ही एक मात्र कर्मों की उपयोगिता है। वह विविदिषा, पाप के हेतु रज और तम गुणों की निवृत्ति तथा सत्त्व गुण की अत्यधिक वृद्धि में ही होती है। इसकी इस उपयोगिता के आशय से ही “ब्राह्मणाः विविदिषन्ति” ऐसा निर्देश किया गया है। इससे सिद्ध होता है कि ब्रह्मज्ञान में कर्मज्ञान की कोई उपोगिता नहीं है, पूर्वोक्त साधन चतुष्टय ही पूर्ववर्ती उपयोगी साधन हैं। (लघु सिद्धान्त)—अत्रोच्यते—यदुकमविद्यानिवृत्तिरेव मोक्षः सा च ब्रह्मविज्ञानादेव भवति, इति । तदभ्युपगम्यते, अविद्यानिवृत्तये वेदान्तवाक्यैर्विधित्सितं ज्ञानं किंरूपमिति विवेचनीयम्, किं वाक्याद् वाक्यार्थज्ञानमात्रम्, उत तन्मूलमुपासनात्मकं ज्ञानम् ? इति । (प्रतिवाद) आपने जो यह कहा कि “अविद्या निवृत्ति ही मोक्ष है और वह ब्रह्मज्ञान से ही होती है”, तो मैं पूछता हूँ कि अविद्या निवृत्ति के लिए वेदान्त वाक्यों के विधित्सित ज्ञान का रूप क्या है, यह विवेचन का विषय है। वह ज्ञान वाक्य जन्य वाक्यार्थ ज्ञान मात्र है अथवा वाक्यार्थ ज्ञान मूलक उपासना का बोधक है ? न तावद् वाक्यजन्यं ज्ञानं तस्य विधानमन्तरेणापि वाक्या- देव सिद्धेः, तावन्मात्रेणाविद्यानिवृत्त्यनुपलब्धेश्च । न च वाच्यम् भेदवासनायामन्निरस्तायां वाक्यमविद्यानिवर्त्तकं ज्ञानं न जनयति, जातेऽपि सर्वस्य सहसैव भेदज्ञानानिवृत्तिः न दोषाय, चन्द्रैकत्वे ज्ञातेऽपि द्विचन्द्रज्ञानानिवृत्तिवत् । अनिवृत्तमपि छिन्नमूलत्वेन न बन्धाय भवति, इति । वाक्य जन्य ज्ञान तो अविद्या निवृत्ति का कारण हो नहीं सकता,