श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
( ५७१ ) है'' इत्यादि श्रुतियों में ज्योति ब्रह्म की प्रसिद्धि है। ज्योतिरुपक्रमा का अर्थ है ब्रह्मकारणिका, अर्थात् ज्योति ब्रह्म ही जिसका कारण है। तैत्तिरीयोपनिषद् की एक शाखा में इसे ब्रह्मकारणिका बतलाया गया है— “इस जीवात्मा की अन्तर्गुहा में, अणु से अणु और महान् से महान रूप वाला वह परमात्मा विराजमान है'' इस वाक्य में, हृदय की गुहा में उपास्य रूप से सन्निहित ब्रह्म का वर्णन करके “सात प्राण उससे उत्पन्न होते हैं'' इत्यादि में सभी लोकों और ब्रह्मा आदि की उत्पत्ति उसी से बतलाकर, सबकी कारणीभूत अजा है उसी से सब उत्पन्न हुए हैं, ऐसा “अजामेकाम्'' इत्यादि में बतलाया गया है। ब्रह्म के अतिरिक्त, उत्पन्न होने वाले सारे पदार्थ ब्रह्मात्मक हैं, ऐसे उपदेश के प्रसंग में, अनेक प्रजाओं की सृष्टि करने वाली, कर्माधीन जीवात्मा से भोग्या, अन्य ज्ञानी जीव से परित्यक्ता, ब्रह्मोत्पन्ना, इस अजा को भी, प्राण समुद्र पर्वत आदि की तरह, ब्रह्मात्मक मानना होगा। यही उक्त प्रकरण का तात्पर्य है। जैसे कि वाक्यांश से चमस शब्द की विशेष अर्थ प्रतीति होती है, वैसे ही उक्त शाखान्तरीय वाक्य से भी अजा शब्द की विशेष अर्थ प्रतीति होती है, इसलिए यह अजा ब्रह्मात्मिका है, ऐसा निश्चित होता है। इहापि प्रकरणोपक्रमे “किं कारणं ब्रह्म” इत्यारभ्य “ते ध्यान- योगानुगता अपश्यन्देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढां” इति परब्रह्म शक्ति- रूपाया अजाया अवगते, उपरिष्टाच्च “अस्मान्मायी सृजते विश्वमेत- तस्मिंश्चान्यो मायया सन्निरुद्धः” “मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्” “यो योनिंयोनिमधितिष्ठत्येकः” इति च तस्या एव प्रतीतेर्नास्मिन्मंत्रे तंत्रसिद्ध स्वतंत्र प्रकृति प्रतिपत्ति गंधः। इस प्रकरण के उपक्रम में “इस जगत का मुख्य कारण ब्रह्म कौन है ?” इत्यादि से प्रारंभ करके “उन्होंने ध्यान योग में स्थित होकर, अपने गुणों से आवृत आत्म शक्ति का साक्षात् किया” इस वाक्य तक जो वर्णन किया गया है उससे अजा परब्रह्म की शक्ति रूपा है, ऐसा परिज्ञान होता है। इसके बाद के वाक्य से भी यही निश्चित होता है, जैसे— ankurnagpal108@gmail.com
( ५७२ ) “प्रकृति को माया तथा महेश्वर को मायाधीश जानो, उसी के अंगभूत कारण समुदाय से यह संपूर्ण जगत् ब्याप्त है ।” इन सब से ब्रह्मात्मिका अजा की ही प्रतीति हो रही है । सांख्य तंत्रोक्त, स्वतंत्र स्वभावा अजा की तो इस मंत्र में लेशमात्र भी चर्चा नहीं है । कथं तर्हि ज्योतिरुपक्रमाया लोहित शुक्ल कृष्ण रूपाया अस्याः प्रकृतेरजात्वम्, अजाया वा कथं ज्योतिरुपक्रमात्वमित्य- त्राह-- ज्योतिरुपक्रमा, रक्त श्वेत कृष्ण वर्णा इस प्रकृति का अजा होना कैसे संभव है ? यदि अजा है तो वह ज्योतिरुपक्रमा कैसे है ? इस शंका की निवृत्ति करते हैं-- कल्पनोपदेशाच्च मध्वादिषदविरोधः ॥१।४।१०॥ प्रसक्ताशंकानिवृत्यर्थश्च शब्दः । अस्याः प्रकृतेरजात्वं ज्योति- रुपक्रमात्वं च न विरुध्यते, कुतः ? कल्पनोपदेशात् । कल्पनं क्लृप्तिः सृष्टिः जगद् सृष्ट्युपदेशादित्यर्थः । यथा-“सूर्याश्चंद्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्” इति कल्पनं सृष्टिः । अत्रापि “अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्” इति जगत् सृष्टिरुपदिश्यते । स्वेनाविभक्ताद- स्मात् सूक्ष्मावस्थात् कारणान्मायी सर्वेश्वरः सर्वं जगत् सृजती- त्यर्थः । अनेन कल्पनोपदेशेनास्याः प्रकृतेः कार्यकारणरूपेणावस्था- द्वयान्वयोऽवगम्यते । सा हि प्रलयवेलायां ब्रह्मतापन्ना अविभक्त नामरूपा सूक्ष्मरूपेणावतिष्ठते । सृष्टि वेलायां तद्भूत सत्वादिगुणाः विभक्त नामरूपाऽव्यक्तादि शब्दवाच्या तेजोऽबन्नादिरूपेण च परिणता लोहित शुक्ल कृष्णाकारा चावतिष्ठते । अतः कारणावस्था अजा कार्यावस्थाज्योतिरूपक्रमेति न विरोधः । सूत्रस्थ च शब्द की गई शंका की निवृत्ति के लिए प्रयोग किया गया है । इस प्रकृति के अजात्व और ज्योतिरुपक्रमात्व में कोई विरोध नहीं है, क्योंकि-कल्पना का उपदेश दिया गया है । क्लृप्ति का अर्थ
( ५७३ ) होता है सृष्टि, इसलिए कल्पना के उपदेश का तात्पर्य है सृष्टि का उपदेश । जैसे कि--"विधाता ने वैसे ही सूर्य और चंद्र की कल्पना की" इस वाक्य में कल्पना शब्द सृष्टि वाची है । इसमें भी "यह मायावी भूत समुदाय से जगत की सृष्टि करता है" ऐसा जगत सृष्टि का उपदेश दिया गया है । उक्त वाक्य का तात्पर्य है कि-मायाधीश सर्वेश्वर, अपने से अभिन्न, सूक्ष्म कारण रूप में स्थित इस प्रकृति से ही जगत को रचते हैं। इस कल्पनोपदेश से इस प्रकृति की कार्यकारण रूप दोनों अवस्थाओं की प्रतीति होती है। यह प्रकृति प्रलयावस्था में, अविभक्त नाम रूप वाली होकर सूक्ष्म रूप से ब्रह्म में लीन होकर स्थित रहती है । सृष्टि काल में यही, सत्त्व आदि गुणों के रूप में प्रकट विभक्त नाम रूपवाली, अव्यक्त आदि नामों वाली, तेज जल पृथिवी आदि रूपों में परिणत, रक्त शुक्ल कृष्ण आकार वाली हो जाती है । इस प्रकार कारण अवस्था वाली अजा और ज्योतिरुपक्रमा अजा में कोई विरोध प्रतीत नहीं होता । मध्वादिवत्-यथेश्वरेणादित्यस्य कारणावस्थायामेकस्यैवाव- स्थितस्य कार्यावस्थायामृग्यजुःसामाथर्व प्रतिपाद्य कर्मनिष्पाद्यरसा- श्रयतया वस्वादि देवताभोग्यत्वाय मधृत्वकल्पनं उदयास्तमय कल्प- नं च न विरुध्यते, तदुक्तं मधुविद्यायाम्-"असौ वा आदित्यो देवमधु" इत्यारभ्य "अथ तत ऊर्ध्वं उदेत्य नैवोदेतानास्तमेतैकल एव मध्ये स्थाता" इत्यंतेन । एकलः एकस्वभावः । अतोऽनेन मंत्रेण ब्रह्मा- त्मिकाऽजैवाभिधीयते, न कपिलतंत्र सिद्धेति सिद्धम् । जैसे कि--कारणावस्था में स्थित एक ही आदित्य की कार्यावस्था अर्थात् उदीयमान अवस्था की ऋग् यजु साम और अथर्व वेद में, कर्म- फलावाप्ति के लिए, वसु आदि देवताओं की भोग्यता संपादन के लिए मधुरूप से की गई कल्पना में कोई विरुद्धता नहीं है, वैसे ही अजा के भी कार्यकारण रूप में कोई विरुद्धता नहीं है, मधुविद्या के-"यह आदित्य ही देवताओं का मधु है" इत्यादि से प्रारंभ कर "जैसा अब उदय हुआ है, वैसा अब उदय न होगा" इस अंतिम वाक्य तक के वर्णन से यही ankurnagpal108@gmail.com
( ५७४ ) बात स्पष्ट होती है। मंत्र में प्रयुक्त एकल शब्द एक स्वभाव का वाची है। इस मंत्र से ब्रह्मात्मिका अजा की ही प्रतीति होती है, कापिल तंत्र- सिद्ध प्रकृति की नहीं यह निश्चित मत है। अन्ये त्वस्मिन् मन्त्रे तेजोबन्नलक्षणाऽजैकाभिधीयत इति ब्रुवते । ते प्रष्टव्याः, किं तेजोवन्नान्येव तेजोबन्नात्मिकाऽजेका, उत तेजोबन्न रूपं ब्रह्मैव, किं वा तेजोबन्नकारणभूता काचित्—इति । प्रथमे कल्पे तेजोबन्नानां अनेकत्वात् “अजामेकाम्” इति विरुध्यते । न च वाच्यं तेजोबन्नानामनेकत्वेऽपि त्रिवृत्करणे नैकतापत्तिरिति त्रिवृत्करणेऽपि बहुत्वानपगमात्--“इमास्तिस्रो देवताः” तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणि' इति प्रत्येकं त्रिवित्करणोपदेशात् । द्वितीयः कल्पो विकल्प्यः, किं तेजोबन्नरूपेण विकृतं ब्रह्मैवाजैका, किं वा स्वरूपेणावस्थितमविकृतमिति । प्रथमः कल्पो बहुत्वानपायादेव निरस्तः । द्वितीयोऽपि “लोहितशुक्लकृष्णां” इति विरुध्यते । स्वरूपेणावस्थितं ब्रह्म तेजोबन्नलक्षणमिति वक्तुमपि शक्येत । तृतीये कल्पेऽप्यजाशब्देन तेजोबन्नानि निर्दिश्य तैस्तत्कारणावस्थोपस्थापनी- येत्यास्थेयम् । ततो वरमजाशब्देन तेजोबन्नकारणावस्थायाः श्रुति- सिद्धाया एवाभिधानम् । अन्य संप्रदाय वाले कहते हैं कि—इस मंत्र में तेज जल पृथिवी रूपा एक अजा का वर्णन है। ऐसा कहने वालों से प्रश्न है कि–तेज जल पृथिवी रूप ही तेज जल पृथिव्यात्मिका एक अजा है ? अथवा तेज जल पृथिवी रूप ब्रह्म ही अजा है ? अथवा तेज जल पृथिवी की कारण भूता कोई शक्ति विशेष है ? प्रथम प्रकार तो संभव नहीं है क्योंकि तेज जल पृथिवी आदि तो अनेक हैं और अजा एक है, यह विरुद्धता कैसे संभव होगी । आप यह नहीं कह सकते कि--तेज जल पृथिवी अनेक होते हुए भी त्रिवृत् प्रक्रिया से एक ही माने जाते हैं। उनके व्यात्मक होते हुए भी उनकी अनेकता भंग नहीं होती, जैसा कि--“इन तीन देवताओं को एक-एक के तीन-तीन करूँगा” इत्यादि से ज्ञात होता है। ankurnagpal108@gmail.com
( ५७५ ) द्वितीय प्रकार भी वैकल्पिक है, अर्थात् यह अजा, तेज जल पृथवी रूप से विकृत ब्रह्म है, अथवा स्वरूपावस्थ अविकृत ब्रह्म है ? उसका विकृत रूप तो हो नहीं सकता, क्योंकि विकृत रूप अनेक होता है, और अजा एक है । अविकृत रूप भी "लोहित शुक्ल कृष्णा" इस विकृत वर्णन से विरुद्ध है । इसलिए तेज जल पृथ्वी आदि रूप वाली स्वरूपावस्थिति है ऐसा तो कह नहीं सकते । तृतीय प्रकार में भी, अजा शब्द से तेज जल पृथिवी आदि निर्दिष्ट उसकी कारणावस्था ही माननी पड़ेगी । यदि ऐसा ही मानना है तो, श्रुतिसिद्ध कारणावस्था के निर्देश को मानना ही श्रेष्ठ है । यत्पुनरस्याः प्रकृतेरजाशब्देन छागत्वपरिकल्पनमुपदिश्यत इति, तदप्यसंगतम्, निष्प्रयोजनत्वात् । यथा-“आत्मानं रथिनं विद्धि” इत्यादिषु ब्रह्मप्राप्त्युपायताख्यापनाय शरीरादिषु रथादिरूपणं क्रियते तद्वदस्यां प्रकृतौ छागत्वपरिकल्पनं क्वोपयुज्यते ? न केवल- मुपयोगाभाव एव, विरोधश्च, कृत्स्न जगत् कारणभूतायाः स्वस्मि- न्नादिकाल संबद्धानां सर्वेषामेव चेतनानां निखिल सुखदुःखोपभोगा- पवर्ग साधनभूतायाः अचेतनायाः अत्यल्प प्रजासर्गकरागंतुक संगम- चेतन विशेषैकरूपा अत्यल्प प्रयोजन साधन स्वपरित्यागाहेतुभूत स्वसंबंधिपरित्याग समर्थ चेतन विशेषरूपच्छागस्वभावख्यापनाय तद्रूपत्वकल्पनं विरुद्धमेव । “अजामेकां” अजो ह्येकः “अजोऽन्यः” इत्यत्राजाशब्दस्य विरूपार्थकल्पनं च न शोभनम् । सर्वत्र छागत्वं परिकल्प्यत इतिचेत् “जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः” इति विदुष आत्यंतिक प्रकृति परित्यागं कुर्वंतो अनेन वान्येन वा पुनरपि संबंध- योग्छागत्वपरिकल्पनमत्यंत विरुद्धम् । यदि यह कहें कि--अजा शब्द का अर्थ बकरी है, ऐसा कहना भी असंगत है, ऐसे अर्थ में अजा शब्द के प्रयोग का कोई प्रयोजन समझ में नहीं आता । जैसे कि-“आत्मा को सारथी जानो” इत्यादि वाक्य में, ankurnagpal108@gmail.com
ब्रह्म प्राप्ति की उपायता दिखलाने के लिए, शरीरादि की रथादि रूपों में कल्पना की गई, वैसे ही इस अजा का बकरी अर्थ करने में क्या उपयोग है ? अजा शब्द का बकरी अर्थ करने में केवल प्रयोजन का ही अभाव नहीं है अपितु विरोध भी पड़ता है । संपूर्ण जगत की कारण रूपा प्रकृति, अचेतन होती हुई भी, अनादिकाल से अपने में संबद्ध विशिष्ट चेतनों के समस्त सुख दुःखों के भोग की तथा अपवर्ग की राधिका भी है । उसको अत्यल्प संतान समुत्पादनार्थ, चेतन विशेष के साथ अभिनव संगम संबंध से केवल दुग्ध प्रदान रूप प्रयोजन के लिए बकरी रूप से कल्पित करना, उसके स्वरूप के विरुद्ध ही होगा । “अजामेकाम्, अजो ह्ये कः, अजोऽन्यः” इन पदों में प्रयुक्त अजा शब्द जो कि क्रमशः प्रकृति, बद्धजीव और मुक्त जीव के लिए कहा गया है, यहाँ बकरी अर्थ करना अशोभनीय भी है । यदि कहो कि हम तीनों ही अर्थों में बकरी अर्थ करेंगे तो “दूसरा अज इस भुक्तभोगी अजा का त्याग करता है” इस वाक्य में संपूर्ण रूप से प्रकृति को त्याग करने वाले जिस ज्ञानी पुरुष अज का वर्णन किया गया है, उसकी बकरी रूप से कल्पना करना तो उस मुक्त पुरुष को पुनः माया संबंधी बकरी रूप से बांधना है, जो कि अत्यंत विरुद्ध है । ३ संख्योपसंग्रहाधिकरण :— न संख्योपसंग्रहादपि नानाभावादतिरेकाच्च ।१।४।११॥ वाजसनेयिनः समामनंति-“यस्मिन् पंच पंचजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः, तमेवम्मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम्” इति । किमयं मंत्रः कपिलतंत्रसिद्ध तत्वप्रतिपादनपरः उत नेति संदि- ह्यते । किं युक्तम् ? तंत्रसिद्धतत्व प्रतिपादनपर इति, कुतः ? पंच- शब्द विशेषात् पंचजनशब्दात् पंचविंशति तत्त्व प्रतीतेः । एतदुक्तं भवति-“पंचजनाः” इति समासः समाहार विषयः । पंचानां जनानां समूहः पंचजनाः “पंचपूल्य” इतिवत् । पंचजना इति लिंगव्यत्य- यश्छांदसः, ते च समूहाः कतीत्यपेक्षायां पंचजनशब्द विशेषेण ankurnagpal108@gmail.com
( ५७७ ) प्रथमेन पंचशब्देन समूहाः पंचेति प्रतीयंते, यथा पंच पंचपूल्य इति । अतः “पंच पंचजनाः” इति पंचविंशतिपदार्थावगतौ ते कतम इत्य- पेक्षायां मोक्षाधिकारान्मुमुक्षुभिः ज्ञातव्यतया स्मृति प्रसिद्धाः प्रकृत्या- दय एव ज्ञायंते । “मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त, षोडशकश्च विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः” इति हि कापिलानां प्रसिद्धिः, अतस्तंत्रसिद्ध तत्त्व प्रतिपादन परः । वाजसनेयी बृहदारण्यकोपनिषद् में कहा गया कि--“पाँच, पांच- जन और आकाश जिसपर प्रतिष्ठित हैं, उसी को आत्मा मानकर अमृत- स्वरूप ब्रह्मवेत्ता पुरुष अमर होते हैं ।” इस पर संदेह होता है कि-- यह कापिल तंत्रोक्त तत्त्व का प्रतिपादक है या नहीं ? कह सकते हैं कि - सांख्य तत्त्व का ही प्रतिपादक है, क्योंकि- इसमें पांच-पांच जनों का वर्णन विशेष रूप से किया गया है, जो कि सांख्योक्त पच्चीस तत्त्वों की ही प्रतीति कराता है । “पंचजनाः” पद समाहार समास विषयक है, पांच जनों के समूह को “पंचजन” कहते हैं, यह “पंचपुल्यः” की तरह समस्त पद है। इस पद में वैदिक व्याकरण के अनुसार लिंग विपर्यय है ( पुल्लिंग प्रयोग किया गया है अन्यथा स्त्रीलिंग “पंचजनी” प्रयोग होना चाहिए था) । ये पांच समूह कौन हैं ? ऐसी आकांक्षा होने पर—पंचजन शब्द के विशेषणीभूत, दूसरे “पंच” शब्द से ऐसा ज्ञात होता है कि केवल पांच ही हैं; जैसा कि “पंच पंचपूल्यः” में है । “पंच पंचजनाः” इस वाक्य में कहे गए पांच पांच के वे पांच समूहित पदार्थ कौन हैं ? ऐसी आकांक्षा होने पर--सांख्यतत्त्वप्रसिद्ध मुमुक्षुओं के लिए ज्ञातव्य प्रकृति आदि तत्त्व ही ज्ञात होते हैं, यह शास्त्र एकमात्र मोक्षाधिकार का ही उपदेश देता है । “मूल प्रकृति अविकृत है, महत् आदि सात ( रूप-रस-गंध-स्पर्श- शब्द-महत्-अहंकार ) प्रकृति विकृति दोनों हैं । सोलह ( जिह्वा-चक्षु- कर्ण-त्वग्-घ्राण, हस्त-पाद-पायु-उपस्थ-वाक्-मन-पृथ्वी-जल-वायु-तेज- आकाश ) विकार हैं, पुरुष न प्रकृति है न विकृति ।” ये कापिल तंत्रसिद्ध पच्चीस तत्त्व हैं । इससे यही ज्ञात होता है कि—उक्त श्रुति वाक्य इन तत्त्वों का ही प्रतिपादक है ।
( ५७८ ) सिद्धान्तः—इति प्राप्ते प्रचक्ष्महे—"न संख्योपसंग्रहादपि" इति । 'पंच पंचजनाः' इति पंचविंशति संख्योपसंग्रहादपि न तंत्रसिद्ध- तत्त्वप्रतीतिः, कुतः ? नानाभावात्—एषां पंच संख्या विशेषितानां पंचजनानां तंत्रसिद्धेभ्यस्तत्त्वेभ्यः पृथग्भावात्, "यस्मिन् पंच पंच जना आकाशश्च प्रतिष्ठितः" इत्येतेषां यच्छब्द निर्दिष्ट ब्रह्मााश्रयतया ब्रह्मात्मकत्वं हि प्रतीयते । "तमेवम्मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽ- मृतम्" इत्यत्र तमिति परामर्शेन यच्छब्दनिर्दिष्टं ब्रह्मेत्यवगम्यते । अतस्तेभ्यः पृथग्भूताः पंचजना इति न तंत्रसिद्धा एते । अतिरेकाच्च तंत्रसिद्धेभ्यस्तत्त्वेभ्योऽत्र तत्त्वातिरेकोऽपि भवति । यच्छब्दनिर्दिष्ट आत्मा आकाशश्चात्रातिरिच्येते । अतः "तं षड्विंशकमित्याहुस्सप्त- विंशमथापरे" इति श्रुति प्रसिद्धसर्वतत्त्वाश्रयभूतः सर्वेश्वरः परम- पुरुषोऽत्राभिधीयते, "न संख्योपसंग्रहादपि" इत्यपि शब्दस्य "पंच पंचजनाः इत्यत्र पंचविंशति तत्त्वप्रतिपत्तिरेव न संभवतीत्यभिप्रायः । कथम् ? पंचभिरारब्धसमूह पंचकासंभवात्, न हि तंत्रसिद्धतत्त्वेषु पंचसु पंचस्वनुगतं यत्संख्यानिवेशनिमित्तं जात्याद्यस्ति, न च वाच्यं, पंच कर्मेन्द्रियाणि, पंच ज्ञानेन्द्रियाणि, पंच महाभूतानि, पंच तन्मात्राणि, अविशिष्टानि पंच—इत्यवांतरसंख्यानिवेशाय निमित्त- मस्त्येव इति । आकाशस्य पृथङ्निर्देशेन, पंचभिरारब्धमहाभूत- समूहासिद्धेः । अतः "पंचजनाः" इत्ययं समासो न समाहार विषयः, अयंतु "दिक्संख्ये संज्ञायाम्" इति संज्ञाविषयः, अन्यथा पंचजनाः इति लिंगव्यत्ययश्च । पंचजना नाम केचित्संति, ते च पंच संख्या विशेष्यन्ते, "पंच पंचजनाः" इति, "सप्त सप्तर्षय" इति वत् । उक्त संशय पर सूत्रकार सिद्धान्त रूप से "न संख्योप" इत्यादि सूत्र प्रस्तुत करते हैं । अर्थात् उक्त वाक्य का पचीस संख्या अर्थ मान लेने पर भी सांख्योक्त तत्त्वों की प्रतीति नहीं होती, सांख्योक्त तत्त्वों से ankurnagpal108@gmail.com
( ५७६ ) पृथक्ता है। इन पंच संख्याविशेषित पांच जनों की सांख्योक्त तत्त्वों से पृथक्ता दिखलाई गई है। यत् शब्द निर्दिष्ट ब्रह्म के आश्रित होने से, इन तत्त्वों की ब्रह्मात्मकता प्रतीत होती है। “उसको ही आत्मा मानकर जो अमृत स्वरूप ब्रह्म को जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं” इस वाक्य में प्रयुक्त तत् शब्द से यत् शब्द निर्दिष्ट ब्रह्म का ही निर्देश किया गया है। इससे स्पष्ट है कि-पंचजन सांख्योक्त तत्त्व से पृथक् हैं। इसमें जो तत्त्व बतलाये गए हैं वे सांख्य तत्त्वों से संख्या में अधिक भी हैं। यत् शब्द निर्दिष्ट आत्मा और आकाश ये दो सांख्य तत्त्व से अधिक हैं। “उन्हें कुछ लोग छब्बीस तथा कुछ सत्ताइस तत्त्वों वाला कहते हैं” ऐसे श्रुति प्रसिद्ध, समस्त तत्त्वों के आश्रय सर्वेश्वर परब्रह्म पुरुषोत्तम ही उक्त श्रुति के प्रतिपाद्य हैं। सूत्रस्थ अपि शब्द यह निर्देश कर रहा है कि—“पंच-पंचजनाः” पद से पच्चीस तत्त्वों की प्रतीति कदापि संभव नहीं है। क्योंकि पांच-पांच समूहों का व्यवस्थित रूप से आरंभ करना संभव नहीं है। सांख्योक्त तत्त्वों की पांच-पांच संख्यावाली कोई सुनियोजित पद्धति नहीं है। ऐसा नहीं कह सकते कि-पंच कर्मेन्द्रिय, पंच महाभूत, पंच तन्मात्रा और पंच अवशिष्ट (महत्, अहंकार, प्रकृति, मन, पुरुष) ऐसी क्रमबद्ध शृंखला है, क्योंकि-वाक्य में जो आकाश का पृथक् निर्देश किया गया है, उससे पंचमहाभूत समूह असिद्ध हो जाता है। यह “पंचजनाः” पद समाहार समस्त पद नहीं है अपितु “दिक् संख्ये संज्ञायाम्” सूत्र के अनुसार संख्यावाची है। यदि ऐसा न होता तो इस पद में लिंगविपर्यय अवश्य हो जाता (अर्थात् पंचजनी होता), “पंच पंचजनाः” वाक्य “सप्त सप्तर्षयः” की तरह संख्यावाची ही है। के पुनस्ते पंचजनाः ? इत्यत आह— तो फिर वे पांच कौन हैं ? इसका उत्तर देते हैं— प्राणादयो वाक्यशेषात् । १।४।१२॥ “प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुः श्रोत्रस्य श्रोत्रं अन्नस्यान्नं मनसो ये मनो विदुः” इति वाक्यशेषात् ब्रह्माश्रयाः प्राणादय एव पंचपंचजनाः इति विज्ञायन्ते । ankurnagpal108@gmail.com
( ५८० ) “वे प्राणों के प्राण, नेत्रों के नेत्र, श्रोत्रों के श्रोत्र, अन्नों के अन्न और मनों के मन कहे जाते हैं” इस वाक्यांश में कहे गए, ब्रह्माश्चित प्राण आदि ही उक्त वाक्य में पांच संख्यावाले तत्त्व ज्ञात होते हैं । अथ स्यात् काण्वानां माध्यन्दिनानां च “यस्मिन् पंच पंच- जनाः” इत्ययं मंत्रः समानः । “प्राणस्य प्राणः” इत्यादि वाक्यशेषे काण्वानामन्नस्य पाठो न विद्यते । तेषां पंच पंचजनाः प्राणादय इति न शक्यते वक्तुम्–इति, तत्रोत्तरम् । आपकी बात ही ठीक हो सकती है, पर काण्व और माध्यन्दिन दोनों शाखाओं में “पंच पंचजनाः” इत्यादि मंत्र समान रूप से मिलता है, किंतु “प्राणस्य प्राणः” इत्यादि काण्व शाखीय वाक्यशेष में अन्न पाठ नहीं है, इसलिए उसमें तो प्राणादि को पांच तत्त्व कह नहीं सकते । इसका उत्तर देते हैं— ज्योतिषैकेषामसत्यन्ने ॥१।४।१३॥ एकेषां काण्वानां पाठे असत्यन्ने ज्योतिषः पंचजनाः इंद्रिया- णीति ज्ञायंते, तेषां वाक्यशेषः प्रदर्शनार्थः । एतदुक्तं भवति- “यस्मिन् पंच पंचजनाः” इत्यस्मात्पूर्वस्मिन् मंत्रे “तं देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम्” इति ज्योतिषां ज्योतिष्ट्वे ब्रह्मएयभि- धीयमाने ब्रह्माधीनस्वकार्याणि कानिचित् ज्योतींषि प्रतिपन्नानि, तानि च विषयाणां प्रकाशकानीन्द्रियाणीति । “यस्मिन् पंच पंचजना” इत्यनिर्धारितविशेषनिर्देशेनावगम्यंते इति । “प्राणस्य” इति प्राण शब्देन स्पर्शनेन्द्रियं गृह्यते, वायुसंबंधित्वात् स्पर्शनेन्द्रियस्य मुख्य प्राणस्य ज्योतिः शब्देन प्रदर्शनायोगात् । चक्षुष इति चक्षुरिन्द्रियम्, श्रोत्रस्येति श्रोत्रे न्द्रियम्, अन्नस्येति घ्राणरसनयोस्तंत्रे णोपादानम्, अन्न शब्दोदित पृथिवी संबंधित्वात् घ्राणेंद्रियमनेन गृह्यते । अद्यते अनेनेत्यन्नम् इति रसनेन्द्रियमपि गृह्यते । मनस इति मनः । ankurnagpal108@gmail.com
( ५८१ ) घ्राणरसनयोस्तन्त्रेणोपादानमिति पंचत्वमप्यविरुद्धम् । प्रकाशकानि मनः पर्यन्तानीन्द्रियाणि पंचजनशब्दनिर्दिष्टानि तदविरोघाय घ्राणरसनयोस्तन्त्रेणोपादानम् । तदेवम्–“यस्मिन् पंच पंचजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः” इति पंचजन शब्दनिर्दिष्टानि इन्द्रियाणि आकाश शब्द प्रदर्शितानि महाभूतानि च ब्रह्मणि प्रतिष्ठितानीति सर्वतत्त्वानां ब्रह्माश्चयत्व प्रतिपादनात् न तंत्रसिद्ध पंचविंशति तत्त्व प्रसंगः । अतः सर्वत्र वेदांते संख्योपसंग्रहे तदभावे वा न कापिल- तंत्रसिद्ध तत्त्वप्रतीतिः, इति स्थितम् । काण्व शाखीय पाठ में अन्न शब्द के न होते हुए भी, ज्योति शब्द के निर्देश से इन्द्रियों की ही “पंचजन” शब्द से प्रतीति होती है । उक्त अर्थ के प्रकाशन के लिए ही वाक्य के शेष में “पंचजन” शब्द का प्रयोग किया गया है । कथन यह है कि—“पंच पंचजनाः” वाक्य के पूर्ववर्त्ती “तं देवा ज्योतिषां ज्योतिः” इत्यादि वाक्य में, ज्योतियों के प्रकाशक के रूप में ब्रह्म का निरूपण किया गया है । उन ज्योतियों का अपना अपना प्रकाशन कार्य ब्रह्म के ही अधीन है । ‘यस्मिन् पंच’ इत्यादि में जो विशेष निर्देश किया गया है उससे, विषयों की प्रकाशक पांच इन्द्रियों का ही बोध होता है । “प्राणस्य” पद में कहे गए प्राण शब्द से स्पर्शनेंद्रिय का ग्रहण होता है, इस इन्द्रिय का वायु के साथ संबंध है । ज्योति शब्द का मुख्य प्राण से तो ग्रहण किया जा नहीं सकता । “चक्षुषः” से चक्षु- रिन्द्रिय, “श्रोत्रस्य’ से श्रोत्रेन्द्रिय का निर्देश किया गया है । “अन्नस्य” से घ्राण और रसन दोनों इन्द्रियों का निर्देश किया गया है । अन्न का अर्थ है पृथ्वी, घ्राणेंद्रिय का पृथ्वी से संबंध है, क्योंकि यह इन्द्रिय गंध- गुणवाली पृथ्वी से ही प्रकट हुई है । “अद्यते अनेन इति अन्नम्” इस व्याख्या के अनुसार, रसनेन्द्रिय भी अन्न शब्दवाची हो सकती है । “मनसः” शब्द से मन का निर्देश है । घ्राण और रसन के एक साथ निर्देश होने पर भी, पांच संख्या में कोई अन्तर नहीं आता । प्रकाश स्वभाव वाली मनपर्यन्त इन्द्रियाँ ही “पंचजन” शब्द से निर्दिष्ट हैं, संख्या विषयक विरोध के परिहार के लिए ही घ्राण और रसन दोनों ankurnagpal108@gmail.com
( ५८२ ) का एक साथ निर्देश किया गया है । "पंच पंचजनाः" इत्यादि का तात्पर्य है कि--पंचशब्द निर्दिष्ट पांच इन्द्रियाँ और आकाश शब्द निर्दिष्ट आकाशादि पंच महाभूत, ब्रह्म में अधिष्ठित है। इस प्रकार समस्त तत्त्वो के ब्रह्माश्रयत्व प्रतिपादन से ही यह निश्चित हो जाता है कि सांख्य तंत्र सिद्ध तत्त्वो की उक्त मंत्र में चर्चा नहीं है। संख्या का ग्रहण हो न हो, वेदांत वाक्यों में कहीं भी, कपिल तंत्र सिद्ध तत्त्वों की प्रतीति ही नही होती, यह निश्चित है। ४ कारणत्वाधिकरण :— कारणत्वेन चाकाशादिषु यथाव्यपदिष्टोक्तेः १।४।१४॥ पुनः प्रधान कारणवादी प्रत्यवतिष्ठते–न वेदांतेषु एकस्मात् सृष्टिराम्नायत इति, जगतो ब्रह्मैककारणत्वं न युज्यते इति । कथम् ? तथाहि–“सदेव सोम्येदमग्र आसीत्” इति सत्पूर्विका सृष्टिराम्नायते, “असद् वा इदमग्र आसीत्” इत्यसत् पूर्विका च, अन्यत्र “असदेवेदमग्र आसीत्तत्सदासीत्तत्समभवत्” इति च । अतो वेदांतेषु स्रष्टुरव्यवस्थितेर्जगतो ब्रह्मैककारणत्वं न निश्चेतुं शक्यम्, प्रत्युत प्रधानकारणत्वमेव निश्चेतुं शक्यते । प्रधान-कारणवादी पुनः सामने आते हैं, वे कहते हैं कि वेदांत वाक्यों में केवल एक से ही सृष्टि नहीं बतलाई गई है, इसलिए जगत का कारण एक मात्र ब्रह्म ही है, ऐसा कहना उपयुक्त नहीं है। देखें—"पहिले यह जगत् सत् स्वरूप ही था" इसमे सत्पूर्विका सृष्टि तथा—"पहिले यह जगत असद् रूप ही था" इसमें असत्पूर्विका सृष्टि का वर्णन मिलता है तथा "यह जगत् पहिले असत् ही था, वही सत् था, वही संभूत हुआ" ऐसा उभयात्मक भी वर्णन मिलता है। इस प्रकार वेदांत वाक्यों में सृष्टिकर्त्ता के विषय में जो अव्यवस्थित वर्णन मिलता है, उससे एकमात्र ब्रह्म को ही जगत् की सृष्टि का निश्चित कारण नहीं कह सकते, अपितु प्रधान को ही निश्चित रूप से जगत का कारण कह सकते हैं।
( ५८३ ) “तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्” इत्यव्याकृते प्रधाने जगतः प्रलय- मभिधाय “तन्नामरूपाभ्यां व्याक्रियत” इत्यव्याकृतादेव जगतः सृष्टि- श्चाभिधीयते । अव्याकृतं अव्यक्तम् , नामरूपाभ्यां न व्याक्रिय ते न व्यज्यत इत्यर्थः । अव्यक्तं प्रधानमेव । अस्य च स्वरूप नित्यत्वेन परिणामाश्रत्वेन च जगत्कारणवादिवाक्यगतौ सदसच्छब्दौ ब्रह्म- णीवास्मिन्न विरोत्स्येते । एवं अव्याकृत कारणत्वे निश्चिते सतीक्ष- णादयः कारणगताः सृष्ट्यौन्मुख्याभिप्रायेण योजयितव्याः । ब्रह्मा- त्मशब्दावपि बृहत्त्वप्यपित्वाभ्यां प्रधान एव वर्त्तेते अतः स्मृतिन्याय- प्रसिद्धं प्रधानमेव जगत्कारणं वेदांतवाक्यैः प्रतिपाद्यते । “यह जगत् उस समय अव्याकृत था” इस वाक्य में अव्याकृत शब्द वाच्य प्रकृति में प्रलय बतलाकर “वह अव्याकृत ही नाम रूप से व्याकृत हो गया”इस वाक्य में उस अव्याकृत प्रकृति से ही जगत् की सृष्टि भी बतलाई गई है । अव्याकृत का अर्थ है अव्यक्त, अर्थात् जो नामरूप से व्यक्त न हो । अव्यक्त तो प्रधान है ही। यह प्रधान स्वरूपतः नित्य और संपूर्ण परिणामों का आधार होने से, जगत् कारण के प्रतिपादक सत् और असत् दोनों पदों से व्यवहृत हो सकता है, जैसे कि—ब्रह्म का दोनों शब्दों से प्रयोग होता है । इस प्रकार जगत् के कारण रूप से, अव्याकृत के निश्चित हो जाने पर, कारण के संबंध में कहे गए ईक्षण आदि गुणों को भी, सृष्ट्योन्मुखी भाव के अभिप्राय से, अव्यक्त के साथ ही जोड़ना होगा । ब्रह्म और आत्मा शब्दों को भी, जो कि वृहत्व और व्यापकत्व के द्योतकं हैं, प्रधान के लिए ही मानना होगा । इसलिए निश्चित ही सांख्यस्मृति- प्रसिद्ध प्रधान ही वेदांत वाक्यों में जगत कारण के रूप से प्रतिपादित है । सिद्धान्तः—एवं प्राप्ते प्रचक्ष्महे—“कारणत्वेन चा काशाषि” इत्यादि, च शब्दस्तुशब्दार्थे, सर्वज्ञात् सर्वेश्वरात् सत्यसंकल्पान्निरस्त निखिलदोषगन्धात् परस्माद् ब्रह्मण एव जगदुत्पद्यत इति निश्चेतुं
( ५८४ ) शक्यते, कुतः ? आकाशादिषु कारणत्वेन यथाव्यपदिष्टस्योक्तेः, सर्वज्ञत्वादि विशिष्टत्वेन “जन्माद्यस्य यतः” इ त्येवमादिषु प्रतिपादितं ब्रह्म यथा व्यपदिष्टमित्युच्यते, तस्यैकस्यैवाकाशादिषु कारणत्वेनोक्तेः । “तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः” “तत्तेजोऽसृजत्” “इत्यादिषुसर्वज्ञं ब्रह्मैव कारणत्वेनोच्यते । तथाहि “सत्यंज्ञानमनंतं ब्रह्म” “सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता” इति प्रकृतं विपश्चिदेव ब्रह्म तस्माद् वा एतस्मादिति परामृश्यते। तथा-“तदैक्षत् बहुस्याम्” इतिनिर्दिष्टं सर्वज्ञं ब्रह्मैव “तत्तेजोऽसृजत्” इति परामृश्यते । एवं सर्वत्र सृष्टि वाक्येषु द्रष्टव्यम् अतोब्रह्मैक कारणं जगदिति निश्चीयते । उन सांख्यवादियों के कथन पर सूत्रकार सिद्धान्त रूप से “कारण- त्वेन चाकाशादिषु” इत्यादि सूत्र प्रस्तुत करते हैं। सूत्र में च शब्द तु शब्द वाची है। सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, सत्य संकल्प, निर्दोष परब्रह्म से ही जगत् की सृष्टि हुई है ऐसा निश्चित कह सकते हैं। क्योंकि-आकाशादि में कारण रूप से ब्रह्म का ही उल्लेख किया गया है। “जन्माद्यस्य यतः” सूत्र में सर्वज्ञ आदि गुणविशिष्ट रूप से प्रतिपादित ब्रह्म ही, यथाव्यपदिष्ट रूप से कहा गया है, आकाशादि में एकमात्र उसी को कारण बतलाया गया है। “उसी से आकाश हुआ, उसने तेज की सृष्टि की” इत्यादि में ब्रह्म को ही कारण बतलाया गया है। उसी प्रकार--“ब्रह्म सत्य ज्ञान अनंत स्वरूप है” “वह सर्वदर्शी, ब्रह्म के साथ समस्त कामनाओं को भोगता है” इत्यादि में जिस सर्वज्ञ ब्रह्म का वर्णन किया गया है, “तस्माद् वा एतस्माद्” में उसी का उल्लेख है। “उसने सोचा बहुत हो जाऊँ” इत्यादि में निर्दिष्ट सर्वज्ञ ब्रह्म का ही “उसने तेज की सृष्टि की” इत्यादि में उल्लेख है। इसी प्रकार सभी जगह सृष्टि परक वाक्यों में देखना चाहिए। इससे निश्चित होता है कि--जगत् का एकमात्र कारण ब्रह्म ही है। ननु “असद् वा इदमग्र आसीत्” इत्यसदेव कारणत्वेन
( ५८५ ) व्यपदिश्यते । तत्कथमिव सर्वज्ञस्य सत्यसंकल्पस्य ब्रह्मण एव कारणत्वं निश्चीयत इत्यत आह-- "सृष्टि के पूर्व यह जगत् असत् था" इस वाक्य में तो असत् को ही कारण रूप से दिखलाया गया है, तब सर्वज्ञ सत्य संकल्प ब्रह्म की जगतकारणता कैसे निश्चित होगी ? इसका समाधान करते हैं-- समाकर्षात् । १।४।१५॥ "असद् वा इदमग्र आसीत्" इत्यत्रापि विपश्चिदानंदमयं सत्यसंकल्पं ब्रह्मैव समाकृष्यते । कथम् ? "तस्माद् वा एतस्माद् विज्ञानमयाद् अन्योऽन्तर आत्माऽनन्दमयः,-सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेयेति-इदं सर्वमसृजत, यदिदं किंच तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् तदनुप्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत्" इत्यादिना ब्राह्मणेनानंदमयं ब्रह्म सत्यसंकल्पं सर्वस्य स्रष्टृ सर्वानुप्रवेशेन सर्वात्मभूतमभिधाय "तदप्येष श्लोको भवति" इत्युक्तस्यार्थस्य सर्वस्य साक्षित्वेनोदाहृतो- ऽयं श्लोकः "असद् वा इदमग्र आसीत्" इति । तथोत्तरत्र "भीषा- ऽस्माद् वातः पवते" इत्यादिना तदेव ब्रह्म समाकृष्य सर्वस्य प्रशा- शितृत्वनिरतिशयानंदत्वादयोऽभिधीयंते । अतोऽयं मंत्रस्तद्विषय एव । तदानीं नामरूपविभागाभावेन तत्संबंधितयाऽस्तित्वाभावात् ब्रह्मैवासच्छब्देनोच्यते । "असदेवेदमग्र आसीत्" इत्यत्राप्ययमेव निर्वाहः । "सृष्टि के पूर्व यह जगत् असत् था" इस वाक्य में भी सर्वदर्शी आनंदमय, सत्य संकल्प, ब्रह्म का ही संबंध है । सो कैसे ? ( उत्तर ) "निश्चय ही पहिले कहे हुए, विज्ञानमय जीवात्मा से भिन्न, उसके भीतर रहने वाले आत्मा आनंदमय परमात्मा हैं, -उस परमेश्वर ने विचार किया कि प्रकट होकर बहुत हो जाऊँ,-जो कुछ भी देखने और समझने में आता है उस सबकी रचना की,-उस जगत की रचना करके वह स्वयं
उसी में साथ-साथ प्रविष्ट हो गए,-उसमें प्रविष्ट होकर मूर्त्त और अमूर्त्त हो गए" इत्यादि ब्राह्मण मंत्रों से आनंदमय, सत्य संकल्प, सर्व- स्रष्टा ब्रह्म को, सब मे प्रविष्ट सर्वात्मभूत बतलाकर "उस विषय में भी यह श्लोक है" उपरोक्त अर्थ का प्रतिपादक साक्षी स्वरूप "प्रकट होने से प्रथम यह जडचेतनात्मक जगत अव्यक्त ही था" यह श्लोक कहा गया । तथा इसी प्रकरण के बाद—"इसी के भय से पवन चलता है" इत्यादि वाक्य में, उसी ब्रह्म से संबद्ध सर्व प्रशासकता निरतिशय आनंदमयता का वर्णन किया गया है। इससे सिद्ध होता है कि उक्त मंत्र ब्रह्मविषयक ही है। सृष्टि के पूर्व नाम रूप का विभाग न होने से, नाम रूप से संबद्ध उसका अस्तित्व भी नहीं था, इसलिए उस अवस्था वाले ब्रह्म का असत् शब्द से उल्लेख किया गया है। "असदेवेदमग्र आसीत्" वाक्य की भी इसी प्रकार अर्थ संगति करनी होगी ।
यदुक्तं "तद्धेदं तर्हि अव्याकृतमासीत्" इति प्रधानमेव जग- त्कारणत्वेनाभिधीयत इति, नेत्युच्यते । तत्राप्यव्याकृतशब्देनाव्याकृत- शरीरं ब्रह्मैवाभिधीयते, "स एष हि प्रविष्ट आनखाग्रेभ्यः पश्यं- श्चक्षुः शृण्वन् श्रोत्रं मन्वानो मन आत्मेत्येवोपासीत्" इत्यत्र "स एषः" इति तच्छब्देनाव्याकृतशब्दान्निर्दिष्यान्तः प्रविश्य प्रशासितृत्वेना- नुकर्षात् "तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्-अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि" इति स्रष्टुः सर्वज्ञस्य परस्य ब्रह्मणः कार्यानु- प्रवेशनामरूपव्याकरण प्रसिद्धेश्च । "अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानाम्" इति नियमनार्थत्त्वादनुप्रवेशस्य प्रधानस्याचेतनस्यैवंरूपोऽनुप्रवेशो न संभवति ।
जो यह कहा कि—"उस समय यह जगत् अव्याकृत था", इत्यादि वाक्य में अव्याकृत प्रधान को ही कारण कहा गया है। यह कथन भी असंगत है, इसमें भी अव्याकृत शरीर ब्रह्म का ही वर्णन है। "वह आत्मा इस शरीर में नख से शिख पर्यन्त प्रविष्ट है उसके देखने से चक्षु, सुनने से श्रोत्र तथा मनन करने से मन आदि शब्दों का प्रयोग होता है, उसे
( १५७ ) आत्मा मानकर उपासना करो" इस वाक्य में "स एषः" वाक्यगत तत् शब्द से अव्याकृत शब्दनिर्दिष्ट पदार्थ को ही, अन्तर्यामी प्रशासक रूप से स्थिर किया गया है । "उसने सृष्टि करके उसी में प्रवेश किया" तथा इस जीव में प्रवेश करके नाम रूप को प्रकाशित करूँगा" इत्यादि में जगत् स्रष्टा, सर्वज्ञ परब्रह्म के कार्यानुप्रवेश और नामरूपाभिव्यक्तीकरण का प्रसिद्ध वर्णन है । "वह अन्तर्यामी सबका शासक है" इत्यादि वाक्य में, उसका अनुप्रवेश और जगत शासकता ही एकमात्र उद्देश्य है, प्रधान में जडता के कारण ऐसी अनुप्रवेश शक्ति संभव नहीं है । अतः अव्याकृतम्-अव्याकृतशरीरं ब्रह्म "तन्नामरूपाभ्यां व्या- क्रियत" इति तदेवाविभक्तनामरूपं ब्रह्म सर्वज्ञं सत्यसंकल्पं स्वेनैव विभक्त नामरूपं स्वयमेव व्याक्रियेत्युच्यते । एवं च सति ईक्षणा- दयो मुख्या एन भवंति ब्रह्मात्मशब्दावपि निरतिशयबृहत्त्वनियमना- र्थव्यापित्वाभावेन प्रधाने न कथंचिदुपपद्येते । अतो ब्रह्मैककारणं जगदिति स्थितम् । अव्याकृत शरीर ब्रह्म को ही अव्याकृत बतलाया गया है, जैसी कि--"वह नामरूपाकार में अभिव्यक्त हुआ" इत्यादि में अव्याकृत सर्वज्ञ सत्यसंकल्प ब्रह्म की नामरूपाकार में अभिव्यक्ति बतलाई गई है । इस प्रकार ब्रह्म की अभिव्यक्ति और अनभिव्यक्ति सिद्ध हो जाने पर ईक्षण आदि गुण भी उन्हीं के सिद्ध होते हैं । ब्रह्म और आत्मा शब्द भी, निरतिशय वृहत्व और सर्वनियमनोपयोगी व्यापकता के अभाव से, प्रधान में कभी भी संभव नहीं हैं । इससे सिद्ध होता है कि जगत का एकमात्र कारण ब्रह्म ही है । ५ जगद्वाचित्वाधिकरण :- जगद्वाचित्वात् ।१।४।१६॥ पुनरपि सांख्यं प्रत्यवतिष्ठते--यद्यपि वेदांत वाक्यानि चेतनं जगत्कारणत्वेन प्रतिपादयंति, तथापि तंत्रसिद्धप्रधानपुरुषातिरिक्तं
( ५८८ )
वस्तु जगत्कारणं वेद्यतया न तेभ्यः प्रतीयते । तथाहि-भोक्तारमेव पुरुषं कारणं वेद्यतयाऽधीयते कौषीतकिनो बालाक्यजातशत्रु- संवादे--"ब्रह्म ते ब्रवाणि" इत्युपक्रम्य "यो वै बालाक एतेषां पुरुषाणां कर्ता यस्य वैतत्कर्म स वै वेदितव्यः" इति उपक्रमे वक्तव्यतया बालाकिनोपक्षिप्तं ब्रह्माजानते तस्मा एव अजात- शत्रुणा "स वै वेदितव्यः" इति ब्रह्मोपदिश्यते । "यस्य वैतत्कर्म" इति कर्मसंबंधात् प्रकृत्यध्यक्षो भोक्ता पुरुषो वेदितव्योपदिश्टं ब्रह्मेति निश्चीयते । नाथनिरम् , तस्य कर्मसंबंधानभ्युपगमात् । कर्म च पुण्यापुण्यलक्षणं क्षेत्रज्ञस्यैव संभवति । सांख्यवादी पुनः प्रतिपक्षी होकर उठते है--यद्यपि वेदान्त वाक्यो मे चेतन को ही जगत् कारण रूप से प्रतिपादित किया गया है, तथापि उनमे सांख्य तंत्र सिद्ध प्रधान पुरुष के अतिरिक्त, कोई अन्य वस्तु जगत् कारणरूप से नही प्रतीत होती । कौषीतकि शाखा के बालाकि और अजातशत्रु के कथोपकथन मे, भोक्ता को ही, कारण रूप से, ज्ञातव्य बतलाया गया है । "तुझे ब्रह्मोपदेश करता हूँ" इत्यादि से प्रारंभ करके "हे बालाकि ! जो इस पुरुष समुदाय का कर्त्ता है, एवं जगत् जिसका कार्य है, वही ज्ञातव्य तत्त्व है" । बालाकि ने उपक्रम मे जिस ब्रह्म को जानने की अभिलाषा प्रकट की, बालाकि उस ब्रह्म को नही जानता ऐसा समझकर अजातशत्रु ने स्वतः ही उसे ब्रह्म सबंधी उपदेश उक्त वाक्य में दिया । "यही जिसका कर्म है" इत्यादि वाक्य मे, कर्म के साथ संबंधित होने से यह निश्चित होता है कि-ज्ञातव्यरूप से उपदिष्ट ब्रह्म तत्त्व, सांख्य सम्मत प्रकृति प्रेरक, भोक्ता पुरुष से भिन्न, कोई दूसरा नही है ऐसा प्रतीत होता है । उक्त प्रसग मे जिस ब्रह्म का उल्लेख किया गया है, वह परब्रह्म नही हो सकता, क्योकि--परब्रह्म का कही भी, कर्म के साथ संबंध नही बतलाया गया है । पुण्य पाप लक्षण वाले कर्म का संबंध तो क्षेत्रज्ञ ( जीव ) से ही हो सकता है । न च वाच्यम्-क्रियत इति कर्मेति व्युत्पत्त्या प्रत्यक्षादि प्रमाणो- पस्थापितं जगदेतत्कर्मेति निर्दिश्यते, यस्यैतत्कृत्स्नं जगत् कर्म, स
( ५८६ ) वेदिव्य इति क्षेत्रज्ञादर्थान्तरमेव प्रतीयतेति । “यो वै बालाके एतेषां पुरुषाणां कर्त्ता यस्य वैतत्कर्म” इति पृथङ्निर्देश वैयर्थ्यात् , कर्मशब्दस्य च लोकवेदयोः पुण्य पाप रूप एव कर्मणि प्रसिद्धेः । तत्तद्भोक्तृकर्मनिमित्तत्वात् जगदुत्पत्तेरेतेषां पुरुषाणां कर्त्तेति च भोक्तुरेवोपपद्यते । तदयमर्थः –एतेषां आदित्यमंडलाद्यधिकरणानां क्षेत्रज्ञभोग्य भोगोपकरणभूतानां पुरुषाणां यः कारणभूतः, एतत्- कारणभावहेतुभूतं पुण्यापुण्यलक्षणं च कर्म यस्य स वेदितव्यः, तत्स्व- रूपं प्रकृतेर्विविक्तं वेदितव्यम्–इति । ऐसा नहीं कह सकते कि--जो किया जाय उसे कर्म कहते हैं, इस व्याख्या के अनुसार, प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से सिद्ध जगत् ही, इस ब्रह्म के कर्म के रूप में बतलाया गया है । “जिसका यह सारा जगत् कर्म है, वही ज्ञातव्य है” इत्यादि में क्षेत्रज्ञ से विलक्षण, परब्रह्म ही प्रतीत होता है । ऐसा मानने पर तो “हे बालाकि ! जो इन पुरुषों का कर्त्ता है, एवं यह जगत् जिसका कर्म है” इत्यादि में किया गया कर्त्ता और कर्म का पृथक् निर्देश ही व्यर्थ हो जायेगा । कर्म शब्द की, लोक और वेद में पाप और पुण्य रूप कर्म से ही प्रसिद्धि है । विभिन्न भोक्ताओं के कर्मा- नुसार ही जगत् की उत्पत्ति होती है, इस नियम के अनुसार “इन सब पुरुषों का कर्त्ता” इत्यादि वक्तव्य से, भोक्ता संबंधी कर्म ही, सिद्ध होता है । उक्त प्रसंग से यह तात्पर्य निकलता है कि, जो आदित्य मंडल आदि में स्थित हैं, एवं जीव के भोग्य और भोगोपकरण रूप इन पुरुषों के कारण हैं तथा कारण भाव के हेतुभूत, पाप और पुण्य कर्म वाले हैं, उन्हें ही जानना चाहिए, अर्थात् उनके स्वरूप को, प्रकृति से भिन्न रूप से जानना चाहिए । तथोत्तरत्र– “तौ ह सुप्तं पुरुषमाजग्मतुः तं यष्टिना चिक्षेप” इति सुप्तपुरुषागमनयष्टिघातोत्थापनादीनि च भोक्तृप्रतिपादन एव लिंगानि । तथोपरिष्टादपि भोक्तैव प्रतिपाद्यते“ तद्यथा श्रेष्ठी स्वैर्भुंको यथा वा स्वाः श्रेष्ठिनं भुंजंत्येवमेवैष प्रज्ञात्मैतैरात्मभिर्भुंके ankurnagpal108@gmail.com
( ५६० )
एवमेवैत आत्मान एनं भुञ्जन्ति" इति । तथा "क्वौषा एतद् बालाके पुरुषोऽशयिष्ट क्व वा एतदभूत् कुत एतदायात्" इति पृष्टमर्थमजा- नते तस्मै स्वयमेवाजातशत्रुरुवाच - "हिता नाम नाड्यस्तासु तदा भवति यदा सुप्तः स्वप्नं न कथंचन पश्यत्यथास्मिन् प्राण एवैकधा भवति तदैनं वाक् सर्वैर्नामभिः सहाप्येति मनः सर्वैः ध्यानैः सहाप्येति स यदा प्रतिबुध्यते यथाग्नेर्ज्वलतः सर्वा दिशो विस्फुलिंगा विप्रतिष्ठे- रन्नेवमेवैतस्मादात्मनः प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः" इति सुषुप्त्याधारतया स्वप्नसुषुप्तिजागरितावस्थासु वर्त्तमानं वागादिकरणाप्ययोद्गमस्थानमेव जीवात्मानम् "अथास्मिन् प्राण एवैकधा भवति" इत्युक्तवान् । प्रकरण के उत्तर भाग में कहा गया है कि- "वे दोनों सोए हुए पुरुष के निकट आए, और छड़ी से प्रहार किया" इत्यादि में सुप्त के पास आना और छड़ी के प्रहार से उठाना आदि, भोक्तृप्रतिपादन के ही चिन्ह हैं [ प्रकृत आत्मा देह इन्द्रिय आदि से भिन्न तत्त्व है, यह समझाने के लिए, अजातशत्रु बालाकि के साथ एक सोते पुरुष के पास जाकर छड़ी से मारने लगे, उसकी निद्रा भंग हो गई। इससे स्पष्ट हो गया कि- यह आत्मा यदि भोक्ता न होता तो, छड़ी के स्पर्श से उसमें संज्ञा का संचार न होता, छड़ी का स्पर्श भी एक प्रकार का भोग ही है, तभी तो उसे संज्ञा प्राप्त हुई ] । इसी प्रकार प्रकरण के पूर्व भाग में भी भोक्ता का प्रतिपादन किया गया है, जैसे- "सेठ जिस प्रकार धन का भोग करता है, ठीक उसी प्रकार यह प्रज्ञात्मा भी, इन देह इन्द्रिय आदि से भोग करता है, ये देहेन्द्रिय आदि भी उसका भोग करते हैं" तथा- "हे बालाकि ! यह जो पुरुष है, जब सोया था, तब कहाँ था, अब यह कहाँ से आया ?" इस प्रश्न द्वारा बालाकि को अज्ञानी जानकर अजातशत्रु ने स्वयं ही उससे कहा- "हिता नाम की जो, हृदय से संवद्ध शरीर में व्याप्त नाडियाँ हैं, उनके द्वारा, बुद्धि सहित हृदय में जाकर शयन करता है, सुषुप्ति में वह स्वप्न नही देखता, उस समय सारे प्राण एकत्र होकर स्थित रहते हैं, वागेन्द्रिय समस्त शब्दों के साथ उसके निकट पहुँच जाती