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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पद्य सूची झारि-तुमि ]
झ ताँर भक्त्ये हय जीवेर 18/193 तार मध्ये प्रवेशये 22/96
'झारिखण्डे' स्थावर-जङ्गम 17/46 ताँर मुखे आन सुने 17/48 तार मध्ये मनुष्य-जाति 19/145
ताँर लागि' गोपीनाथ 16/33 तार मध्ये म्लेच्छ, पुलिन्द 19/145
ड ताँर शास्त्रयुक्त्ये ताँरे 18/187 तारे मध्ये 'स्थावर' 19/144
डुबिया रहिला प्रभु जलेर 18/137 ताँर सङ्गे अन्योन्ये, ताँर 18/220 तारा तैछे तोमा मारिबे 24/245
ताँर सूत्रेर अर्थ कोन 25/90 तारुण्यामृत-पारापार 21/113
त ताँर सेवा छाड़ि' आमि 15/48 तारे तिरस्करिवारे करिला 25/113
'तटस्थ'-लक्षणे उपजय 22/103 ताँर सेवा बिना जीवेर 18/194 तारे वध कैले, हय 15/261
तत्तत्कामादि छाड़ि' हय 24/91 ताँरे 'निर्विशेष' स्थापि 25/33 ताहा खण्डि 'सविशेष' 18/189
तथापि पुरी देखि' ताँर 17/180 ताँरे राधा-सम प्रेम कृष्ण 18/10 ताहा निस्तारिया कैला 25/165
तथापि वृक्ष नाहि जाने 15/173 ताँहा एकवाक्य ताँर 15/99 ताहा विघ्न करि वनपथे 17/74
तदेकात्मरूपे 'विलास' 20/184 ताहा छाड़ि' करियाछि 15/49 तँहो दण्डवत् कैल, प्रभु 19/62
'तदीय'-तुलसी, वैष्णव 22/122 ताँहा बिना एइ प्रेमार 17/173 तँहो दुइ बहिर्वास-कौपीन 20/78
'तपस्वी' प्रभृति यत 24/210 ताँहा बिना एइ राज्य 16/6 तिँहो ये कहये वस्तु 25/57
तबु वृन्दावन याह' लोक 16/281 ताँहा विस्तारित हञा 19/155 तँहो रहु-सर्वज्ञ-शिरोमणि 21/14
तबे ताँरे कहे प्रभु चापड़ 18/100 ताँहा यमुना, गङ्गा 16/280 तिन आवास-स्थान कृष्णेर 21/42
तबे तुमि आमा-पाश 16/240 ताँहार चरणे प्रीति 18/194 तिनकाले सत्य तिँहो 24/71
तबे महत्तत्त्व हैते त्रिविध 20/276 ताँहार महिमा-प्रताप ना 17/106 तिनबारे 'कृष्णनाम' ना 17/127
तबे मिश्र पुरातन एक 20/78 ताँहारे जानिह तुमि 16/74 तिन मुद्रार भोट गाय 20/92
तबे मुक्ति पाइले अवश्य 24/134 ताँहा स्तम्भ रोपण कर 16/115 तिन साधने भगवान् तिन 24/76
तबे मूलशाखा बाड़ि' याय 19/161 ताँहा सेइ कल्पवृक्षर 19/163 तिने आज्ञाकारी कृष्णेर 21/36
तबे याय तदुपरि 'गोलोक 19/154 ताते कृष्ण भजे, करे 22/25 तिने 'भेद' नाहि,-तिन 17/131
तबे रामानन्द, आर सत्यराज 15/102 ताते छय दर्शन हैते 25/55 तिनेर अधीश्वर कृष्ण-स्वयं 21/92
तबे सूत्रेर मूल अर्थ 25/91 ताते बड़, ताँर सम 21/34 तिनेर तिनशक्ति मेलि' 20/254
तबे सेइ जीव 'साधुसङ्ग' 23/9 ताते भासे माया, लज्जा 15/176 तीर्थ 'लुप्त' जानि', प्रभु 18/5
ताँर इच्छाय गेल मोर 20/93 ताते माली यत्न करि' 19/157 'तुमि आमाय आनि' 18/153
ताँर उपदेश-मन्त्रे पिशाची 22/15 ताते लीला 'नित्य' कहे 20/393 तुमि-ईश्वर, नाहि तोमार 17/182
ताँर कृपाय प्रश्न करिते 20/94 तावत् रहिब आमि 15/289 तुमि एक जिन्दापीर 20/5
ताँर ज्ञाने आनुषङ्गे याय 20/144 तार एकदेशे वैकुण्ठज 21/29 तुमि केने एत दुःखी 20/128
ताँर नाभिद्म हैते उठिल 20/287 तार एक फल पड़ि' 15/173 तुमि जान, कृष्ण निज 16/144
ताँर प्रेम-वश आमि 15/49 तार एक राइ-नाशे 15/177 तुमि त' ईश्वर, तोमार 25/88
ताँर प्रेमे आनि' आमाय 15/65 तार तले पिँड़ि-बान्धा 18/76 तुमि देखा पाबे, आर 15/46
ताँर वाक्य, क्रिया, मुद्रा 23/35 तार मध्ये आवेशे प्रभु 17/26 तुमि वक्ता भागवतेर 24/310
। 535

[ तुम्हि-नाम श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
तुमि याँर हित वाञ्छ' 15/169 द देह-देहीर, नाम-नामीर 17/132
तुमि याँहा-याँहा रह 16/280 दक्षिणाधो हस्त हैते 20/222 देहारामी—कर्मनिष्ठ 24/208
तुम्हि करिह भक्तिशास्त्रेर 23/98 दण्ड्यजने राजा येन 20/118 देहारामी देहे भजे 24/206
तँ 'तुल-तले बसि' 18/78 दधि येन खण्ड-मरिच 23/45 देहारामी, सर्वकाम—सब 24/212
तँ 'तुलि-तलाते आसि' 18/75 दरवेश हञा आमि 20/13 देहे आत्म-ज्ञाने आच्छादित 24/195
तँ 'हो कहे, –'के वैष्णव 16/71 'दर्शन'-'स्नाने' करे जीवेर 15/134 द्वादश-मासेर देवता—एइ 20/198
तेरछे नेत्रान्ते बाण, तार 21/105 दर्शनेर कार्य आछुक, ये 18/123 द्वारका-मथुरा-पुरे नित्य 20/190
तैछे एक ब्रह्माण्ड यदि 15/174 दारिद्रय-नाश, भवक्षय 20/142 द्वारे एक 'वैष्णव' हय 20/47
तैछे भक्ति-फले कृष्णे 20/141 'दारु'-'जल'-रूपे कृष्ण 15/134 “द्वारेते वैष्णव नाहि” 20/48
तैछे राधाकुण्ड-प्रिय 18/7 'दारुब्रह्म'-रूपे-साक्षात् 15/135 द्विविध 'विभाव',–आलम्बन 23/46
तोमा देखि' जिह्वा मोर 18/203 दास्य-भक्तेर रति हय 24/32 द्विभुज-स्वरूप कभु 20/175
तोमा देखि, तोमा स्पर्शि 20/60 दास्यभाव-भक्त—सर्वत्र 19/189 ध
तोमा देखि' सर्वलोक 18/110 दास्य-रति 'राग' पर्यन्त 23/50 धन नाहि पाबे, खुदिते 20/134
तोमा बिना अन्य जानिते 24/310 दास्येर 'सम्भ्रम-गौरव' 19/221 धन पाइले यैछे सुख 20/140
तोमा-सङ्गे ना याइब 16/134 दिव्य देह दिया कराय 24/105 धनेर झारि पड़िबेक तोमार 20/135
तोमार इच्छा-मात्रे हबे 15/171 दीक्षा-पुरश्चर्या-विधि 15/108 धर्म নহে, करि आमि 15/48
तोमार कार्य-धर्म-धन 15/130 दुइ कर, शीघ्र पाबे 16/70 धर्म प्रवर्त्तन करे व्रजेन्द्र 20/339
तोमार कि कथा, तोमार 15/101 दुइ गण्ड सुचिक्वण 21/127 धर्म-स्थापन-हेतु साधुर 17/185
तोमार घरे कीर्त्तने आमि 15/46 दुइदिके माता-पिता पुष्ट 18/60 धर्महानि हय, लोके करे 20/92
तोमार दुइ भाइ तथा 25/175 दुइ धान्यक्षेत्रे अल्पजले 18/5 धर्माचारि-मध्ये बहुत 19/147
तोमार 'दोष' करिते करे 17/126 दुइभाइ विषय-त्यागेर 19/4 ध्वनि—बड़ उद्भट 21/142
तोमार नाम शुनि' हय 18/124 दुइ योग्य নহে, दुइ 15/262 न
तोमार निश्वासे सर्ववेद 24/309 दुँहार मुखे कृष्णनाम 19/71 नदीर प्रवाहे येन काष्ठ 22/43
तोमार पण्डित-सबार 18/197 'दुःसङ्ग' कहिये—'कैतव' 24/94 'नन्दनन्दन कृष्ण—मोर 15/100
तोमार शास्त्रे कहे शेषे 18/190 दुग्ध येन अम्लयोगे 20/309 नवविधा भक्ति पूर्ण नाम 15/107
'तोमार सुखे आमार सुख' 17/9 दुग्धान्तर वस्तु নহে, दुग्ध 20/309 नव-योगीश्वर जन्म हैते 24/113
तोमारे ना कहिल, अन्यत्र 20/128 दुर्वार उद्भट प्रेम, নহে 19/82 नाचे, कान्दे व्याघ्रगण 17/41
तोमाय चाखाइते तार कहि 19/137 दूर हैते ताहा देखि' 18/105 ना दिलेक लक्ष कोटि 21/133
तोमा-सबार इच्छाय बिना 25/163 देखि' भट्टाचार्येर मने हय 17/33 नाना कामे भजे, तबु 24/190
तोमा-सबार सङ्ग-बले 24/9 देखिले ना माने ऐश्वर्य 19/194 ना पड़' कुतर्क-गर्त्ते 25/272
तोमा-सबार 'सुखे', पथे 17/7 देव-ऋषि-पितृदिगेर 22/136 नाम-गाने सदा रुचि 23/28
'त्रिपाद विभूति'र केबा 21/87 'देवीधाम' नाम तार, जीव 21/53 नाम-प्रेम दिया कैल 17/54
'त्रि'-शब्दे कृष्णेर तिन 21/90 देहकान्ति पीताम्बर कैल 18/118
त्रेतार धर्म 'यज्ञ' कराय 20/333
536 ।

पद्य सूची नाम-प्रति ]
'नाम', 'विग्रह', 'स्वरूप' 17/131 | निष्ठा हैते श्रवणाद्ये 23/11 | 'पाठान-वैष्णव' बलि हैल 18/211
नाम-सङ्कीर्त्तन-प्रेमे सेह 19/130 | नीच जाति, नीच सङ्गी 20/99 | 'पातअल' कहे, - 'ईश्वर 25/51
ना मागिलेह कृष्ण तारे 22/37 | नीवि खसाय पति-आगे 21/143 | पादपीठ-मुकुटाग्र-संघट्टे 21/72
नायक-नायिका, - दुइ 23/87 | नीलाचले आछि मुञि 15/52 | पारापार-शून्य गभीर भक्तिरस 19/137
नायिकार शिरोमणि-राधा 23/62 | नौकाते कालीय-ज्ञान 18/106 | पालनार्थ स्वांश विष्णुरूपे 20/314
नारायणे माने, तारे 25/77 | 'न्याय' कहे, - 'परमाणु 25/50 | पालनार्थे विष्णु-कृष्णेर 20/317
'न्याय' कहे, - 'परमाणु 25/50 | प | पाले-पाले व्याघ्र, हस्ती 17/26
निकटे यमुना बहे 18/77 | पक्षी, मृग, वृक्ष, लता 24/54 | पिछल्दा पर्यन्त सब 16/159
निज-कृत सूत्रेर निज 25/136 | पङ्गु नाचाइते यदि हय 23/117 | पितृ-मातृ-स्नेह आदि 24/33
निज-चिच्छक्त्ये कृष्ण 21/96 | पञ्चविध-भक्ते गौण सप्तरस 19/187 | 'पीत'-वर्ण धरि' तबे 20/338
निज-भ्रमे मूर्ख लोक 18/101 | पञ्चम-पुरुषार्थ-एइ 23/96 | पुण्य, अर्थ,-दुइ लाभ 20/8
निज-सम सखा-सङ्गे 21/108 | पञ्चरस 'स्थायी', व्यापी' 19/188 | पुनः कृष्णरति हय दुइत 19/192
निज-ज्ञाने सत्य छाड़ि' 18/98 | पञ्चरात्रे, भागवते एइ 19/169 | पुनः सेइ निन्दकेर मुख 15/263
निजाभीष्ट कृष्णप्रेष्ठ पाछे 22/155 | पञ्चलक्ष चारिसहस्र 20/322 | पुनरपि देशे बहि लञोया 25/162
निजांश-कलाय कृष्ण 20/307 | पण्डित कहे,-"याँहा तुमि 16/131 | पुरी-गोसाञि तोमार घरे 17/177
नित्य दुइ फूल हय 15/129 | पण्डितेर गौराङ्गप्रेम बुझने 16/137 | पुरी-गोसाञिर ये आचरण 17/185
'नित्यबद्ध' - कृष्ण हैते 22/12 | 'पतित' हइले भर्त्ता 15/264 | पुरीद्वये, परव्योमे-'पूर्णतर' 20/396
'नित्यमुक्त'-नित्य कृष्णचरणे 22/11 | 'परंब्रह्म'-'परमात्मा'-ज्ञान 19/217 | पुरीद्वये, वैकुण्ठाद्ये-ऐश्वर्य 19/193
नित्य याइ' देखि मुञि 15/53 | पर्वते ना चड़े दुइ 18/45 | पुरी मधुपरी वरा-कहे 19/102
'नित्यसंसार', भुञ्जे नरकादि 22/12 | परव्योम-मध्ये वैसे 20/192 | पुरीर आवरणरूपे पुरीर 20/241
नित्यसिद्ध कृष्णप्रेम 'साध्य' 22/104 | परव्योमे वासुदेवादि-निज 20/226 | पुरुषार्थ-शिरोमणि-प्रेम 20/125
नित्यानन्द कहे,-"आमि 16/66 | परम ईश्वर कृष्ण स्वयं 21/34 | पुरुषोत्तम, अच्युत 20/204
नित्यानन्दे आज्ञा दिल 15/42 | परम उदार इँहो, ये 15/94 | पूतना-वधादि यत लीला 20/379
निमाइर प्रिय मोर-एसब 15/56 | परम कारण ईश्वरे केह 25/54 | पूर्णानन्द-प्राप्ति ताँर 18/195
निरन्तर कर कृष्णनाम 15/104, 25/191 | परम पवित्र स्थान अपवित्र 15/275 | 'पूर्णैश्वर्यप्रभु-ज्ञान' अधिक 19/218
निरन्तर गाय मुखे, ना 21/12 | परम मधुर, गुप्त ! व्रजेन्द्र 15/138 | पूर्व आज्ञा,-वेद-धर्म 22/59
निरन्तर सेवा करे 22/155 | परमात्मा यँहो, तँहो 20/161 | पूर्वदिके ताते माटी अल्प 20/135
'निर्गुण'-व्यतिरेके, तिँहो 25/53 | परमार्थ-विचार गेल, करि 25/42 | पूर्वापर-विधि-मध्ये 'पर' 18/197
'निर्ग्रन्थ'-शब्दे कहे 24/16 | परम्पराय 'वैष्णव' हइल 17/49 | पूर्वे आमि इँहारे लोभाइल 15/138
निर्वेद-हर्षादि-तेत्रिश 23/48 | परशुरामे 'दुष्टनाश 20/370 | प्रकृति क्षोभित करि' 20/272
निषिद्ध पापाचारे तार 22/138 | परित्याग कैलुँ तार नाम 15/263 | प्रणवेर येइ अर्थ, गायत्रीते 25/92
'निषिद्धाचार', 'कुटीनाटी' 19/159 | 'पश्चिमे' खुदिबे, ताहा 20/133 | “प्रतापरुद्र-संन्नाता” नाम 16/108
'निष्ठा' हैते उपजय प्रेमेर 22/130 | पाँच सहस्र मुद्रा दिब 20/8 | 'प्रतिज्ञा', 'श्रीकृष्णसेवा' 16/137
| 537

[ प्रति-ब्रह्मा श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
'प्रतिज्ञा' 'सेवा' छाड़िबे 16/139 | प्रभुर चरणे किछु कैल 15/102 | ब
प्रत्यब्द आसिबे यात्राय 15/98 | प्रभुर चरणे पड़े प्रेमाविष्ट 16/224 | बन्धु देखि' बन्धु येन 17/201
प्रथमेइ उपशाखार करये 19/161 | प्रभुर दरशने शुद्ध हञाछे 17/123 | बहुग्रन्थ-कलाभ्यास 22/115
प्रद्युम्न, अनिरुद्ध,–मुख्य 20/186 | प्रभुर प्रेमावेश, आर प्रभाव 19/76 | बहुत संन्यासी यदि 15/197
प्रद्युम्नेर विलास–नृसिंह 20/206 | प्रभुर सहित करे कीर्त्तन 16/47 | बहुधन दिया दुइ ब्राह्मणे 19/4
प्रद्युम्नेर मूर्ति–त्रिविक्रम 20/197 | प्रभुर स्वभाव,–येबा देखे 25/8 | 'बापेर धन आछे'–जाने 20/131
प्रपञ्च ये देख सब 25/109 | प्रभुरे मिलिया गेला आपन 19/3 | बालक-दोष ना लय पिता 15/291
प्रभु-आगे दुःखी हञा 17/123 | प्रभु-सङ्गे रहे गृह-स्त्री 18/90 | बालगोपाल किंवा खाइल 15/59
प्रभु कहे,–“अन्यावतार 20/350 | प्रलये अवशिष्ट आमि 25/110 | बाल्यकाल हैते ताँहो 16/222
प्रभु कहे,–“अमोघ शिशु 15/287 | 'प्र'-शब्दे–मोक्षवाञ्छा 24/96 | बाल्य, पौगण्ड, कैशोरे 19/103
प्रभु कहे,–“उठ, कृष्णनाम 18/205 | प्रश्नोत्तरे भागवते करियाछे 24/313 | बाह्य, अन्तर,–इहार दुइ 22/152
प्रभु कहे,–“उपाध्याय, श्रेष्ठ 19/101 | प्राकृत-क्षोभे ताँर क्षोभ 23/20 | बाह्य वैराग्य, वातुलता 16/243
प्रभु कहे,–कह 'कृष्ण' 17/29 | प्राकृत प्रपञ्च पाय 25/110 | बाह्ये राजवैद्य इँहो 15/120
प्रभु कहे,–“काँहा पाइला 18/109 | प्राकृतेन्द्रिय-ग्राह्य नहे, हय 17/134 | 'बाह्ये' साधकदेहे करे 22/152
प्रभु कहे,–“कृष्ण-कृपा 20/104 | प्राणीमात्रे मनोवाक्ये उद्वेग 22/117 | बुद्धिमान्-अर्थे–यदि 24/86
प्रभु कहे,–“के तुमि 18/85 | प्रातःकाले भव्य-लोक 18/103 | बुद्धि, स्वभाव,–एइ 24/11
प्रभु कहे,–“क्षौर कराह 20/68 | प्राते कुमारहट्टे आइला 16/205 | ब्रह्म-अङ्गकान्ति ताँर 20/159
प्रभु कहे,–“तुमि 'गुरु' 17/170 | प्राते वृन्दावने कैला 18/75 | ब्रह्म, आत्मा, भगवान् 20/157
प्रभु कहे,–“तोमा स्पर्शि 20/56 | प्राभवविलास-वासुदेव 20/186 | 'ब्रह्म' 'आत्मा' 'चैतन्य' 17/129
प्रभु कहे,–“तोमार शास्त्र 18/189 | प्राभव-वैभव-भेदे 20/185 | ब्रह्मज्ञानी आकर्षिया करे 17/137
प्रभु कहे,–“धर्म নহে 15/188 | 'प्राभव'-'वैभव'रूपे 20/167 | 'ब्रह्म'-शब्दे कहे 25/33
प्रभु कहे,–“पूज्य एइ 15/234 | प्रीत्यङ्कुरे 'रति', 'भाव' 22/161 | 'ब्रह्म'-शब्देर अर्थ–तत्त्व 24/66
प्रभु कहे,–“वैष्णव-सेवा 16/70 | 'प्रेमफल' पाकि' पड़े 19/162 | ब्रह्मा आइला,–द्वारपाल 21/59
प्रभु कहे,–“मायावादी कृष्णे 17/129 | प्रेम वृद्धिक्रमे नाम 19/178 | ब्रह्माण्ड जीवेर तुमि 15/167
प्रभु कहे,–“याँर मुखे 15/106 | 'प्रेमवैचित्त्य' श्रीदशमे 23/60 | ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोन 19/151
प्रभु कहे,–“ये करिते 24/323 | प्रेमसुख-भोग-मुख्य 20/142 | ब्रह्माण्डानुरूप ब्रह्मार 21/86
प्रभु कहे,–“सेवा छाड़िबे 16/133 | प्रेमा क्रमे बाड़ि' हय 23/38 | ब्रह्मादि कीटपर्यन्त–ताँर 24/302
प्रभु कहेन,–“कृष्णसेवा' 15/104 | प्रेमादिक स्थायिभाव 23/43 | ब्रह्मादि रह–सहस्रवदने 21/12
प्रभु जले कृत्य करे 17/31 | प्रेमे कृष्णास्वाद हैले 20/141 | ब्रह्मानन्द हैते पूर्णानन्द 17/139
प्रभु ताँरे विदाय दिया 16/227 | प्रेमे प्रभु करे राधाकुण्डेर 18/6 | ब्रह्मा, विष्णु, शिव 20/291, 20/301
प्रभु देखि' वृन्दावनेर 17/202 | 'प्रेमेर विवर्त्त' इहा शुने 16/149 | ब्रह्मा, विष्णु, हर 21/36
प्रभुर उपदेशामृत शुने 23/121 | फ | ब्रह्माय 'सृष्टि'-शक्ति 20/369
प्रभुर गम्भीर-स्वरे येन 17/206 | फूल-फल भरि' डाल 17/201 | ब्रह्मार एकदिने हय 20/320
538 ।

पद्य सूची ब्रह्मा-महिषी ]
ब्रह्मार वत्सरे पञ्चसहस्र 20/321 | भट्टाचार्य पण्डित बिश 19/17 | मथुरावास, श्रीमूर्त्तिर श्रद्धाय 22/125
ब्रह्मा, शिव-आज्ञाकारी 20/317 | भट्टेर सङ्कोचे प्रभु सम्वरण 19/63 | मद्यप यवनेर चित्त ऐछे 16/174
भ | भद्र कराजा ताँरे गङ्गास्नान 20/70 | मधुर ऐश्वर्य-माधुर्य-कृपादि 21/44
भक्त आमा बान्धियाछे 25/125 | भद्र हओ, छाड़' एइ 20/42 | मधुर-रसे-कृष्णनिष्ठा, सेवा 19/230
भक्त-इच्छा बिना प्रभु 16/11 | 'भागवत' करिब सूत्रेर 25/95 | मधुर-रसे भक्तमुख्य-व्रजे 19/191
भक्त कृपा-वशे भीष्मेर 16/144 | भागवत-विचार करेन 19/17 | मधुर हैते सुमधुर, ताहा 21/138
भक्तगणे स्फुरि आमि 25/123 | भागवतेरे सम्बन्ध, अभिधेय 25/100 | 'मध्यम-अधिकारी' सेइ 22/66
भक्तदेह पाइले हय गुणेर 24/106 | भागवते सेइ ऋक् श्लोके 25/97 | 'मध्यम-आवास' कृष्णेर 21/47
भक्तवत्सल ना देखि 25/261 | भागीरथी हन साक्षात् 15/135 | मध्याह्न करि' आसिं करे 18/78
भक्तवत्सल, कृतज्ञ, समर्थ 22/92 | भाग्यवान् तुमि, तोमार 15/228 | मध्ये मध्ये आमि तोमार 15/44
भक्तवात्सल्य, आत्मा पर्यन्त 24/42 | भावकालि बेचिते आमि 17/144 | मध्ये मध्ये आसिमु, ताँर 15/52
भक्तभेदे रति-भेद पञ्च 19/183 | भावावेशाकृति-भेदे 20/183 | मध्ये एक शिशु' हय 18/60
भक्त-सम्बन्धे याहा क्षमिल 15/300 | भाविते भाविते कृष्ण 19/235 | 'मनुष्य नहे, इँहो-कृष्ण' 19/100
भक्ति-प्रभाव, -सेइ काम 24/192 | भारी बोझा लञा आइलाङ 17/145 | 'मने' निज-सिद्धदेह करिया 22/153
भक्तिफल 'प्रेम' हय 22/49 | भिक्षा करि' महाप्रभु करिला 17/90 | मन्वन्तरावतार एबे, शुन 20/319
भक्ति-बले पार तुमि 20/56 | 'भीमरुल-वरुली' उठिबे 20/132 | 'ममता' अधिक, कृष्णे 19/224
भक्तिबले 'प्राप्तस्वरूप' 24/129 | भुक्ति-मुक्ति आदि-वाञ्छा 9/175 | ममताधिक्ये ताड़न-भर्त्सन 19/226
भक्ति बिना केवल ज्ञाने 24/104 | भुक्ति-मुक्ति-वाञ्छा, यत 19/158 | मयूरेर कण्ठ देखि' प्रभुर 17/218
भक्ति बिना कोन साधन 24/87 | भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-सुख 24/39 | मर्कट-वैराग्य ना कर 16/238
भक्ति बिना मुक्ति 24/134, 25/30 | भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-कामी 19/149 | मरित' अमोघ, तारे केने 15/290
भक्तिमुख-निरीक्षक कर्म 22/17 | भुक्ति, सिद्धि, इन्द्रियार्थ ताँरे 23/22 | महत्-कृपा बिना कोन 22/51
भक्तिर स्वभाव, - ब्रह्म हैते 24/105 | भूषणेर भूषण अङ्ग, ताँहे 21/105 | 'महाजन' येइ कहे, सेइ 25/55
भक्त लागि' विस्तारिला 25/260 | भृत्य-वाञ्छा-पूरण बिना 15/166 | महापातकेर हय एइ 25/193
'भक्ति'-शब्देर अर्थ हय 24/30 | भोटकम्बल-पाने प्रभु 20/82 | महाप्रभु देखि' 'सत्य' कृष्ण 18/98
भक्ति साधन करे येइ 24/104 | भ्रमिते भ्रमिते आइला 17/166 | महाप्रभुर यत बड़ बड़ 19/123
भक्तेर महिमा कहिते हय 15/118 | भ्रमिते भ्रमिते यदि साधु 22/14 | महाप्रेमावेशे नाचे प्रभु 17/56
'भक्त्ये' कृष्ण वश हय 20/136 | भ्रमिते भ्रमिते यदि साधुसङ्ग 24/305 | महाविष्णु, पद्मनाभ 21/39
'भक्त्ये जीवन्मुक्त', 'ज्ञाने 24/124 | म | 'महाभागवत'-लक्षण शुनि 17/110
'भक्त्ये जीवन्मुक्त' गुणाकृष्ट 24/125 | 'मकरे' पहुँचाते प्रयागे 18/146 | महारौरव हैते तोमाय 20/63
'भक्त्ये' ओ भगवानेर 20/164 | मणि-पीठे ठेकाठेकि 21/95 | महिषीगण, लक्ष्मीगण, असंख्य 19/191
'भगवत्ता' मानिते 'अद्वैत' 25/47 | मथुराते केशवेर नित्य 20/215 | महिषीगणेर 'रूढ़', 'अधिरूढ़' 23/53
भट्ट मिलिबारे याय, दुँहे 19/67 | मथुराय लुप्ततीर्थेर करिह 23/98 | महिषी-विवाहे हैल 20/168
भट्टाचार्य-द्वारा मृत्तिका 18/14 | 'मथुरा'-पद्मेर पश्चिमदले 18/18 | महिषी-हरण आदि 23/113
। 539

[ माघ-यैछे श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
माघ-मास लागिल, एबे 18/145 | 'मुनि'-शब्दे मननशील 24/15 | याँहा नदी देखे, ताँहा 17/56
'मात्सर्य'-चण्डाल केने 15/275 | मुनि सब जानि' करे 20/352 | याँहा विप्र नाहि, ताँहा 17/60
माधवदास-गृहे तथा 16/208 | मुमुक्षा छाड़िया गुणे भजे 24/122 | याँहार दर्शने मुखे आइसे 16/74
माधवेन्द्र-पुरीर 'सम्बन्ध' 17/172 | 'मुमुक्षु' अनेक जगते 24/117 | याँहा लञा याह तुमि, ताँहाइ 18/154
माधुर्य भगवत्ता-सार, व्रजे 21/110 | 'मूर्ख'-लोक करिबेक 17/183 | याँर सङ्गे हय एड 16/266
माधुर्यशक्त्ये गोलोक, ऐश्वर्ये 24/22 | मूर्खेर वाक्ये 'मूर्ख' हैला 18/100 | याँहा हैते कृष्णभक्ति सेइ 15/117
माया-कार्य, माया हैते 25/114 | मृगमद वस्त्रे बान्धे, तबु 18/119 | यार एकबिन्दु-पाने 25/271
मायाजाल छुटे, पाय 22/25 | मृगी व्याधिते आमि 18/184 | याहार कोमल श्रद्धा 22/67
मायातीत परव्योमे सबार 20/264 | मोक्षाकाङ्क्षी ज्ञानी हय 24/116 | युक्तवैराग्य स्थिति सब 23/100
मायातीत हैले हय आमार 25/116 | मोक्षादि आनन्द यार नहे 18/195 | येइ कुण्डे नित्य कृष्ण 18/9
माया-द्वारे सृजे तेंहो 20/259 | मोर इच्छा हय,-हड 18/86 | येइ ग्रन्थकर्त्ता चाहे 25/48
'माया' निमित्तहेतु, 'प्रधान' 20/271 | मोर ध्याने अश्रुजले भरिल 15/57 | येइ ग्रामे दिया यान 17/47
मायाबन्ध हैते कृष्ण तारे 22/33 | मोर वाङ्‌मानसेर गम्य 21/26 | येइ तर्क करे इँहा 18/227
मायावादिगण याते महा 17/143 | मोर मन धुँइते नारे 23/116 | येइ ताँरे देखे, सेइ 17/118
मायावादी कृष्णे अपराधी 17/129 | मोर यदि बोल धरे 21/134 | येइ मूढ़ कहे,-जीव 18/115
'मायावादी'—निर्विशेष-ब्रह्मे 25/50 | मोर सुख चाह यदि 16/141 | येइ येइ कहिल, प्रभु 18/188
मायामुग्ध जीवेर नाहि 20/122 | मोरे खाओयाइते करे 15/64 | येइ सूत्रकर्त्ता, से यदि 25/91
मायार 'आश्रय' हय, तबु 20/293 | मोरे तुमि भिक्षा देह 17/177 | येइ सूत्रे येइ ऋक् 25/97
मायार ये दुइ वृत्ति 20/271 | 'मोरे ना छुँइह'—कहे 20/52 | ये कहे,—'कृष्णेर वैभव 21/25
मायासङ्ग-विकारे रुद्र 20/308 | मोरे प्रसाद देह' भिन्न 15/231 | ये-काले द्विभुज, नाम 20/176
मायिक विभूति—एकपाद 21/55 | मोरे शिष्य करि' मोर 17/167 | ये-काले संन्यास कैलुँ 15/51
मार्गशीर्षे—केशव, पौषे 20/198 | मौषल-लीला, आर कृष्ण 23/112 | ये खण्डिल कुविषय-भोग 20/93
माली हञा करे सेइ 19/152 | म्लेच्छेर हृदये येन लागे 18/178 | ये-दिवस प्रभु संन्यासीरे 25/18
मिलने 'रसाला' हय अमृत 19/182 | य | ये देखिबे कृष्णानन, तार 21/134
'मीमांसक' कहे,—ईश्वर 25/49 | यत्नाग्रह बिना भक्ति ना 24/165 | ये 'विग्रह' नाहि माने 25/113
मुकुन्द कहे,—"रघुनन्दन 15/115 | यथायोग्य विषय भुञ्ज' 16/238 | ये येइ दोष करे, देह' 19/26
मुक्ताहार—वकपाँति 21/109 | यदि वैष्णव-अपराध उठे 19/156 | ये रूपेर एक कण, डुबाय 21/102
मुक्ति-भुक्ति-सिद्धिकामी 22/35 | यद्यपि असृज्य नित्य 20/257 | ये लीला-अमृत बिने 25/271
'मुक्ति' लागि' भक्त्ये करे 24/117 | यद्यपि भट्टेर आगे प्रभुर 19/82 | यैछे आमार गुण, कर्म 25/105
मुखे मुख दिया करे 17/42 | यद्यपि 'सनोड़िया' हय सेइत' 17/179 | यैछे आमार 'स्वरूप' 25/105
मुखे 'हय' 'हय' करे 25/27 | याँर आगे तृण-तुल्य 19/164 | यैछे इक्षुरस-बीज—गुड़ 23/39
मुख्य-गौण-वृत्ति, किंवा 20/146 | याँर यत शक्ति तत 17/233 | यैछे तैछे येहि कोहि 24/56
मुञि ये शिखाइ तोरे 23/118 | याँहा कृष्ण, ताँहा नाहि 22/31 | यैछे दधि, सिता, घृत 19/182
540 |

पद्य सूची                                यैछे–वृक्ष ]


स्तम्भ १

यैछे बीज, इक्षु-रस — 19/179
यैछे सूर्येर स्थाने भासये — 25/115
'योऽसि सोऽसि नमोऽस्तु — 15/11
योगमाया चिच्छक्ति — 21/103
योगमाया-दासी, याँहा — 21/44
योगमार्गे-अन्तर्यामि — 24/79
'योगारुरुक्षु', 'योगारूढ़' — 24/152

र

रघुनाथेर पाय मुञि — 15/149
रति गाढ़ हैले तार — 19/177
रति-प्रेम-तारतम्ये भक्त — 22/68
रतिभेदे कृष्णभक्ति-रसे — 19/184
रसगण-मध्ये तुमि श्रेष्ठ — 19/104
राग, अनुराग, भाव — 19/178, 23/38
रागभक्ति, विधिभक्ति हय — 24/80
रागभक्त्ये व्रजे स्वयं — 24/81
रागमयी भक्तिर हय — 22/148
रागहीन जन भजे शास्त्रेर — 22/106
रागात्मिका-भक्ति—'मुख्या' — 22/145
राजमन्त्री सनातन-बुद्धये — 20/348
राजा मोरे प्रीति करे — 19/13
रात्रि-दिने करे व्रजे — 22/153
राधाकृष्णे लागाञाछ — 15/228
'राधा-दामोदर' अन्य व्रजेन्द्र — 20/201
राधिकाद्ये 'पूर्वरोग' प्रसिद्ध — 23/60
'रामदास' बलि' प्रभु ताँर — 18/207
रुचि हैते भक्ति हय — 23/12
'रूढ़', 'अधिरूढ़' भाव — 23/53
'रूढ़ि-वृत्त्ये' निर्विशेष — 24/78
रूप-गुण-श्रवणे रुक्मिण्यादिर — 24/47
रूप-गोसाञिर छोटभाइ — 19/36
रूप-गोसाञिरे शिक्षा करा'न — 19/114
रूप देखि' आपनार, कृष्णेर — 21/104


स्तम्भ २

रूप-सनातन-सबार कृपा — 19/123
रोग खण्डि' सवैद्य ना — 20/91

ल

लता अवलम्बि' माली — 19/162
लवमात्र साधुसङ्गे सर्वसिद्धि — 22/54
ललाटे अष्टमी-इन्दु — 21/127
'लाभ', 'पूजा', 'प्रतिष्ठादि' — 19/159
लोक कहे, — “रात्र्ये — 18/104
लोक कहे, —“संन्यासी — 18/109
लोक-भिड़-भये प्रभु — 19/114
लोके कहे, — “कृष्ण — 18/94
लोभे व्रजवासीर भावे — 22/149

व

वंशी-गीते हरे कृष्ण — 24/50
वंशीध्वनि-चक्रवात, नारीर — 21/113
वंशीस्वरादि-उद्दीपन — 23/46
वन देखि' भ्रम हय — 17/55
वनपथे आनि' आमाय बड़ — 17/69
'वयः कैशोरकं ध्येयं'-कहे — 19/103
वर्णमात्र-भेद, सब-कृष्णेर — 20/174
वर दिला-'एइ सब स्फुरुक — 23/119
वर देह' मोर माथे धरिया — 23/117
वसुदेव-देवकीर कृष्ण चरण — 19/196
वस्तुतः बुद्धि 'शुद्ध' नहे — 22/29
वाचस्पति ! कर जलब्रह्मोरे — 15/136
वात्सल्य-भक्त-माता — 19/190
वात्सल्यरति, मधुररति, -ए — 19/184
वात्सल्ये शान्तेर गुण, दास्येर — 19/225
वातुल बालकेर माता — 15/50
'वातुल' ना हइओ, घरे — 18/102
वादियार वाजि पाति' — 16/272
वाराणसी हैल द्वितीय — 25/160


स्तम्भ ३

वासुदेव-दत्तेर तुमि — 15/93
वासुदेवेर क्षत्रिय-वेश — 20/177
वासुदेवेर विलास दुइ — 20/205
वासुदेवेर मूर्त्ति-केशव — 20/195
विचार करिया यबे भजे — 24/185
विजया-दशमी-दिने करिल — 16/94
विजया-दशमी-लङ्गा — 15/32
विज्ञ-जनेर हय यदि — 22/94
विधि-धर्म छाड़ि' भजे — 22/138
विधिभक्त्ये पार्षददेहे — 24/81
विधि मोरे हिन्दुकुले केने — 16/181
बिना पाप-भोगे हबे — 15/167
विप्र कहे, — “श्रीपाद माधवेन्द्र — 17/166
विप्रगृहे गोपालेर निभृते — 18/30
विप्रगृहे स्थूलभिक्षा, काँहा — 19/128
'विप्रलम्भ' चतुर्विध-पूर्वरोग — 23/59
'विवर्त्तवाद' स्थापे, 'व्यास भ्रान्त' — 25/40
विभाव, अनुभाव, सात्त्विक — 23/44
विभुरूपे व्यापे, शक्त्ये — 24/22
'विरजा', 'ब्रह्मलोक' भेदि' — 19/153
विरहे कृष्णस्फूर्त्ति, आपनाके — 23/57
विराट् व्यष्टि-जीवेर — 20/295
विलास, स्वांशेर भेदे — 20/184
विलासेर विलास-भेद — 20/185
विशुद्ध-निर्मल-प्रेम — 15/139
विश्रम्भ-प्रधान सख्य — 19/223
विश्वसृष्ट्यादि कैल, वेद — 20/359
'विश्वास' आसिया प्रभु — 16/170
विश्वे अवतारि' धरे — 20/264
विषयकूप हैते तोमा — 19/49
विषय-रोग खण्डाइल — 20/90
विष्णुवैष्णव-निन्दा — 22/117
वृक्षलता-प्रफुल्लित, सेइ — 17/45


। 541

[ वृद्ध-श्रीरूप श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
वृद्धकाले रूप-गोसाञि ना 18/46 | व्रजवासी लोक 'गोलोक' 18/136 | शास्त्रे लिखियाछे, केह 18/199
वृन्दावन देखिं यबे आसिब 16/240 | व्रजे कृष्ण—सर्वैश्वर्यप्रकाशे 20/396 | 'शिव'—मायाशक्तिसङ्गी 20/311
वृन्दावन याइते पथे हैल 17/226 | व्रजे गोपभाव रामेर, पुरे 20/187 | शिवानन्द-सेनेर पुत्र 19/118
वृन्दावन याइवार एइ नहे 16/266 | व्रजेन्द्रनन्दन कृष्ण—नायक 23/62 | 'शिष्य' करि' ताँर भिक्षा 17/180
वृन्दावन याब काँहा 16/274 | व्रजेन्द्रनन्दने इहा अधिक 20/178 | शीघ्र याइ' मुञि सब 15/58
वृन्दावन-शोभा देखे यमुनार 18/77 | व्रजेन्द्र-व्रजेश्वरीर कैल चरण 18/62 | शुकदेवेर मन हरिल 24/44
वृन्दावन-स्थानेर देख आश्चर्य 21/28 | व्रजे वास,—एइ पञ्चसाधन 24/187 | शुक्ल-रक्त-कृष्ण-पीत 20/330
वृन्दावने 'कृष्ण' आइला 18/107 | श | 'शुद्धभक्ति' हैते हय 'प्रेमा' 19/166
वृन्दावने कृष्णसेवा 23/99 | शक्ति कम्पयुक्त परिपाट्ये 24/20 | शुनि' 'कृष्ण' 'कृष्ण' 15/278
वृन्दावने हइला तुमि कृष्ण 18/110 | शक्त्यावेश दुइरूप—'मुख्य' 20/366 | शुनियांछि गौड़देशेर 17/116
वेदनिषिद्ध पाप करे, धर्म 19/146 | शची-माता मिलि' ताँर 16/210 | शुनिलेओ भाग्यहीनेरे ना 18/225
वेदनिष्ठ-मध्ये अर्द्धेक वेद 19/146 | शतेक वत्सर हय 'जीवन' 20/322 | 'शुष्कज्ञाने जीवन्मुक्त' 24/125
वेदमते कहे ताँरे—'स्वयं 25/51 | शर्करा, सिता-मिछरि 19/179 | शुष्कवैराग्य-ज्ञान सब 23/100
वेदशास्त्र कहे—'सम्बन्ध' 20/124 | शरण लञा करे कृष्णे 22/99 | शुष्क रुटी-चाना चिबाय 19/128
वेदशास्त्रे उपदेशे, कृष्ण 22/3 | शरणागतेर, अकिञ्चनेर 22/96 | शेषे 'स्व-सेवन'-शक्ति 20/370
वेदशास्त्रे कहे सम्बन्ध 20/143 | शान्त, दास्य, सख्य 19/185 | शैल देखि' मने हय 17/55
वेदादि सकल शास्त्रे कृष्ण 20/144 | शान्त-दास्य-रसे ऐश्वर्य 19/195 | 'श्याममेव परं रूपं'—कहे 19/101
'वेदान्त'-मते,—ब्रह्म 'साकार' 25/53 | शान्तभक्त—नवयोगेन्द्र 19/189 | 'श्याम'-रूपेर वासस्थान 19/102
वेदेर प्रतिज्ञा केवल कहये 20/146 | शान्त-भक्तेर रति बाड़े 24/32 | श्रद्धावान् जन हय भक्ति 22/64
वैकुण्ठ, ब्रह्माण्डगण 20/150 | शान्तरति, दास्यरति, सख्यरति 19/183 | 'श्रद्धा'-शब्दे विश्वास कहे 22/62
वैकुण्ठे 'शेष'—धरा 20/368 | शान्तरसे शान्ति-रति 23/50 | श्रवण-कीर्त्तन-जले करये 19/152
वैदिक, याज्ञिक तुमि 19/69 | शान्तरसे—'स्वरूपबुद्धये 19/210 | श्रवण, कीर्त्तन, स्मरण 22/118
'वैधी-भक्ति' बलि' तारे 22/106 | शान्तादि रसेर 'योग' 23/52 | श्रवणादि-क्रिया—तार 22/103
वैभवप्रकाश कृष्णेर 20/174 | 'शान्तिपुराचार्य'-गृहे ऐछे 16/210 | श्रवणादि-शुद्धचित्ते करये 22/104
वैभवप्रकाश यैछे देवकी 20/175 | शान्तेर गुण दास्ये आछे 19/220 | श्रवणाद्येर फल 'प्रेमा' 24/58
वैभवप्रकाशे आर प्राभव 20/188 | शान्तेर गुण, दास्येर सेवन 19/221 | श्रीअङ्ग-रूपे हरे 24/47
वैष्णवेर पाप कृष्ण दूर 15/169 | 'शास्त्र'-'गुरु'-'आत्म'-रूपे 20/123 | श्रीकृष्णचैतन्य-वाक्य दृढ़ 25/28
व्यर्थ मोर एइ देह 16/182 | शास्त्र छाड़ि' कुकल्पना 25/41 | श्रीकृष्णचैतन्य-वाणी 25/57
व्याख्या शिखाइल यैछे 23/113 | शास्त्र-युक्ति नाहि जाने 22/66 | श्रीकृष्णचैतन्य हय 'साक्षात् 25/24
व्याघ्र-मृगी मिलि' चले 17/37 | शास्त्रयुक्ति नाहि माने 22/149 | श्रीचैतन्यसम आर कृपालु 25/261
व्याध हञा हय पूज्य 24/222 | शास्त्रयुक्त्ये सुनिपुण, दृढ़ 22/65 | श्रीमुखे करेन आज्ञा, निवेदि 15/103
व्यासकृपाय शुकदेवेर 24/111 | शास्त्रेर सहज अर्थ नहे 25/48 | श्रीरघुनाथ-चरण छाड़ान 15/150
'व्याससूत्रेर्' अर्थ करेन 25/24 | | श्रीरूप-सनातन रहे 19/3
542 ।

पद सूची श्रीरूप-सहाय ]
श्रीरूप-हृदये प्रभु शक्ति १९/११७ | 'सनकादि', 'नारद', 'पृथु' २०/३६७ | 'सरखेल' हञा तुमि करिह १५/९६
श्रीरूपे शिक्षा दिल शक्ति १९/१३५ | सनकादिर मन हरिल २४/४४ | 'सरस्वती' एइ वाक्ये 'सत्य' १८/९७
श्री, लज्जा, दया, कीर्त्ति २१/१२१ | सनकाद्ये 'ज्ञान'-शक्ति, नारदे २०/३६९ | सर्व अमङ्गल हरे, प्रेम २४/५५
षड्दर्शन-व्याख्या बिना १७/९६ | सनातन-मुखे कृष्ण आमा १७/७४ | सर्व-आदि, सर्व-अंशी २०/१५३
षडैश्वर्य्यपूर्ण कृष्ण हय १८/११२ | सनातने कहिला,-"तुमि २५/१७५ | सर्वकर्म त्याग करि' से २२/६०
'षाठी राण्डी हउक'-इहा १५/२५२ | सनातनरे वैराग्ये प्रभुर २०/८२ | सर्व-जन-देश-काल २५/११८
षोलक्रोश वृन्दावन,-शास्त्रेर २१/२९ | सनोड़िया-घरे संन्यासी १७/१७९ | सर्वजीवेर पाप प्रभु देह' १५/१६२
स | संन्यासी-चित्कण जीव १८/११२ | 'सर्वज्ञ' आसि' दुःख देखि' २०/१२७
| 'संन्यासी'-नाम-मात्र, १७/१२० | सर्वज्ञ कहे तारे प्राप्तिर २०/१३१
संसार भ्रमिते कोन भाग्ये २२/४३ | संन्यासीर सङ्ग-भये ना १७/१०३ | सर्वज्ञ मुनिर वाक्य २०/३५१
संहारार्थे माया-सङ्गे रुद्र २०/३०७ | सप्तग्रामे बारलक्ष मुद्रार १६/२१७ | सर्वज्ञेर वाक्ये करे २०/१२९
सकल जीवेर, प्रभु, घुचाह १५/१६३ | सप्त गौण 'आगन्तुक' १९/१८८ | सर्वज्ञेर वाक्ये मूलधन २०/१३०
सकलसाधन-श्रेष्ठ एइ २२/१२६ | सवंशे सेइ जल मस्तके १९/८६ | सर्वतत्त्व-निरूपिया 'प्रवीण' १९/११७
सकाम-भक्ते 'अज्ञ' जानि' २४/९७ | सब कहा ना याय २२/७४ | सर्वतीर्थे हैल ताँर परम १८/२१२
सकारण लिखि आदौ २४/३२४ | सब खण्डि' स्थापे 'ईश्वर' १८/१९६ | सर्वत्र गाहिया बुले १८/२११
सङ्कर्षणेर विलास-उपेन्द्र २०/२०५ | सब गोपी हैते राधा कृष्णेर १८/७ | सर्वत्र प्रमाण दिबे पुराण २४/३३८
सङ्कर्षणेर मूर्त्ति-गोविन्द २०/१९६ | सब छाड़ि' कृष्णभक्ति २४/१८२ | सर्व-देश-काल-दशाय २५/१२०
सखागणेर रति हय 'अनुराग' २४/३३ | सब तत्त्व जान, तोमार २०/१०४ | सर्व महागुणगण वैष्णव २२/७२
सख्य-वात्सल्य-रति पाय २३/५१ | सब त्यजि' तबे तिँहो २४/३०५ | सर्व मुक्त करिते कृष्णेर १५/१७१
सख्य-भक्त-श्रीदामादि १९/१९० | सब फल देय भक्ति २४/८७ | सर्वशास्त्र खण्डि' प्रभु २५/२०
सख्यभावे धार्ष्ट्य क्षमापय १९/१९८ | सब ब्रह्माण्ड सह यदि १५/१७८ | सर्वशास्त्र-सिद्धान्तेर इँहा २५/२६३
सख्ये, वात्सल्ये, मधुर-रसे १९/१९५ | सब शिखाइल प्रभु भागवत १९/११५ | सर्वशास्त्रे उपदेशे, 'श्रीकृष्ण' २०/१३०
सख्येरे असङ्कोच, लालन १९/२३० | सब साधि' अवशेषे एइ २२/५९ | सर्वश्रेष्ठ, सर्वाराध्य, कारणेर १८/१९३
सख्येर गुण-'असङ्कोच' १९/२२६ | सबारे उपदेश करे १८/८१ | सर्वाकर्षक, सर्वान्हादक २४/३८
सगर्भ, निगर्भ,-एइ हय २४/१४९ | सबे 'एक'-मत नहे, भिन्न १७/१८४ | 'सर्वात्मा', 'सर्वज्ञ', नित्य १८/१९१
सङ्गे केने आनियाछ एइ २०/२५ | सबे 'कृष्ण' कहे, सबार १८/२०६ | सर्वेन्द्रिय-फल,-एइ २०/६०
सच्चिदानन्द-देह, पूर्णब्रह्म १८/१९१ | सबे हैला चतुर्भुज वैकुण्ठेर २१/२२ | 'सर्वैश्वर्य्यपूर्ण' तँहो-श्याम १८/१९०
सञ्चय ना कैले कुटुम्ब १५/९५ | समस्त ब्रह्माण्डगणेर इँहो २०/२८२ | सर्वैश्वर्य्यपूर्ण याँर गोलोक २०/१५५
सत्सङ्ग, कृष्णसेवा, भागवत २४/१८७ | समुत्कण्ठा हय सदा २३/२८ | 'सर्वोत्तम' आपनाके 'हीन' २३/२५
सत्सङ्गे 'कर्म' त्यजि' २४/२०८ | 'सम्भोग'-'विप्रलम्भ'-भेदे २३/५८ | सर्वोपरि कृष्णलोके 'कर्णिकार' २१/७
"सत्यं परँ"-सम्बन्ध २५/१४० | सम्भोगे 'मादन', विरहे २३/५४ | सहजे आमार किछु अर्थ २४/९
'सत्य' शब्दे कहे ताँर २०/३५८ | सम्मान करिते नारि १५/१९७ | सहजे निर्मल एइ ब्राह्मण १५/२७४
सत्ययुगे ध्यान-कर्म कराय २०/३३२ | सयुक्तिक वाक्ये मन २५/२० | सहाय हइल दैव, कैल १५/२६७
। 543

[ सहिते-स्व श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
सहिते ना पारि आमि 18/148 | सूत्र-उपनिषदेर मुख्यार्थ 25/26 | सेइ माया अवलोकिते 20/265
सहिते ना पारिमु सेइ 17/183 | सूत्रेर परिणामवाद, ताहा 25/40 | सेह मोर प्रिय, अन्य 15/284
‘सांख्य’ कहे,—‘जगतेर 25/49 | सूर्य बिना स्वतः तार 25/115 | सेइ ‘रति’ गाढ़ हैले 23/13
साक्षात्शक्त्ये ‘अवतार’ 20/366 | सूर्य येन चर्मचक्षे 20/159 | सेइ सब गुण हय 22/74
सात दिन रहि’ तथा लोक 16/209 | सूर्यांशु-किरण, येन 20/109 | सेइ सब सूत्र लञा 25/52
साधक, ब्रह्ममय, आर 24/103 | सृष्टि करि’ तार मध्ये 25/109 | सेइ सबेर साधुसङ्गे गुण 24/119
साधन करिले प्रेम उत्पन्न 19/175 | ‘सृष्टिर पूर्वे षडैश्वर्यपूर्ण 25/108 | सेइ सेइ सेवनेर इँहा 19/225
साधनभक्ति हैते हय 19/177 | सृष्टि, स्थिति, प्रलय ताँहा 18/192 | सेइ स्वाराज्यलक्ष्मी करे 21/97
साधनभक्त्ये हय 23/10 | सृष्टि-हेतु येइ मूर्ति 20/263 | सेकजल पाञा उपशाखा 19/160
साधनेर फल—‘प्रेम’ मूल 25/102 | से अक्षर ‘चन्द्र’ हय 21/125 | से केने राखिबे तोमार 20/91
साधु-गुरु-प्रसादे, ताहा 25/270 | सेइ अद्वयतत्त्व कृष्ण 24/71 | से चैतन्यलीला हय 25/264
साधु-शास्त्र-कृपाय यदि 20/120 | सेइ अमोघ हैल प्रभुर 15/296 | से-छल सेकाले कृष्ण 16/241
साधुसङ्ग-कृपा किंवा 24/92 | सेइ अर्थ चतुःश्लोकीते 25/92 | से जानुक,—कायमने मुञि 21/25
साधुसङ्ग, कृष्णकृपा, भक्तिर 24/99 | सेइ कुण्डे येइ एकबार 18/10 | ‘सेवा’ करि’ कृष्णे सुख 19/219
साधुसङ्ग, नामकीर्त्तन 22/125 | सेइ ‘कृष्ण’ ‘कृष्ण’ करे 17/32 | सेवा-नामापराधादि दूरे 22/114
‘साधुसङ्ग’ ‘साधुसङ्ग’ 22/54 | सेइ कृष्ण भज तुमि 15/142 | से विघ्न करिबे,—धने हात 20/133
साधुसङ्ग हैते हय 23/10 | सेइ गोवर्द्धनेर पुत्र—रघुनाथ 16/222 | से माधुरी आस्वादिते 20/179
साधुसङ्गे कृष्णभक्त्ये 22/49 | सेइ जलबिन्दु-कणा लागे 17/32 | से सिद्ध हइल—छाड़ि’ 16/139
साधुसङ्गे तप छाड़ि’ 24/210 | सेइ जीव निस्तारे, माया 20/120 | सौन्दर्य, ऐश्वर्य, माधुर्य 20/178
साधुसङ्गे तरे, कृष्णे रति 22/45 | सेइत ‘पाषण्डी’ हय, दण्डे 18/115 | सौभाग्यादि-प्राय सेइ 20/169
साधु, साधु, गुप्त! तोमार 15/153 | सेइ त’ वैष्णव, करिह 15/111 | स्तब्ध हञा मूलशाखा 19/160
‘साध्य’, ‘साधन’-तत्त्व 20/103 | सेइ त’ माधुर्य-सार 21/117 | स्त्री-बाल-वृद्ध, आर 18/121
‘साध्य-साधन-वस्तु’ 18/202 | सेइ दिने व्यय करे 15/94 | ‘स्त्री-सङ्गी’—एक असाधु 22/84
सार्वभौम! कर ‘दारुब्रह्म’ 15/136 | सेइ प्रेमा—‘प्रयोजन’ सर्वानन्द 23/13 | स्थाणु-पुरुषे यैछे विपरीत 18/108
सार्वभौम-गृहे दास-दासी 15/284 | सेइ प्रेमे पाय जीव 25/102 | स्थावर-जङ्गम मिलि’ 17/206
सार्वभौम-सङ्गे तोमार 15/276 | सेइ वपु भिन्नाभासे किछु 20/183 | स्थायिभाव ‘रस’ हय एइ 23/44
सार्वभौम-सम्बन्धे तुमि 15/283 | सेइ वपु, सेइ आकृति 20/171 | स्थायिभावे मिले यदि विभाव 19/180
सिद्धान्त शिखाइला,—येइ 23/115 | सेइ बिजली-खाँन हैल 18/212 | स्थिर हञा घरे याओ 16/237
सिद्धि-अष्टादश, मुक्ति 24/28 | सेइ विभिन्नांश जीव-दुइ 22/10 | स्थूल-सूक्ष्म-जगतेर तेंहो 18/192
सुखभोग हैते दुःख आपनि 20/140 | सेइ बुद्धि देन ताँरे 24/185 | स्नान-भिक्षादि-निर्वाह करेन 17/229
सुखे प्रेमफल-रस करे 19/163 | सेइ वैष्णव-श्रेष्ठ, भज 16/72 | स्फूर्त्ति-ज्ञाने तेंहो ताहा 15/53
सुबलाद्येर ‘भाव’ पर्यन्त 23/51 | सेइ ‘ब्रह्म’-शब्दे कहे 24/69 | स्वकर्म करिते से रौरवे 22/26
सुबुद्धि जनेर हय 24/188 | सेइ भिते हात दिया 15/83 | स्व-चरण दिया करे 24/97
544 ।

पद्य सूची स्व-हेला ]
स्वचरणामृत दिया 'विषय' 22/39 स्वरूपशक्ति शक्ति-कार्येर 20/150 हस्ती-व्याघ्र पथ छाड़े 17/25
'स्वतन्त्र ईश्वर' तुमि-स्वयं 17/79 स्वर्ग, मोक्ष कृष्णभक्त 19/214 हास्य, अद्भुत, वीर, करुण 19/187
'स्वयं-भगवत्ता', 'प्रकाश' 24/80 'स्वसौभाग्य' याँर नाम 21/104 'हिन्दु' हैले पाइताम 16/182
'स्वयं भगवान्', आर 20/240 स्व-स्व-मत स्थापे 25/54 हिरण्यगर्भ-अन्तर्यामी 20/292
स्वयं भगवान् कृष्ण 20/155 स्वाङ्ग-विशेषाभासरूपे 20/273 'हिरण्य', 'गोवर्धन',-दुइ 16/217
स्वयंरूप, तदेकात्मरूप 20/165 स्वाभाविक कृष्णेर तिन 20/109 'हेतु'-शब्दे कहे-भुक्ति 24/27
'स्वयंरूप' 'स्वयंप्रकाश' 20/166 हेनकाले 'अमोघ' 15/245
स्वयंरूपेर गोपवेश, गोप 20/177 ह हेनकाले व्याघ्र तथा आइल 17/37
'स्वरूप' अनुभवि' ताँरे 25/8 हेन कृष्ण छाड़ि' पण्डित 22/92
स्वरूप-ऐश्वर्यपूर्ण, कृष्ण 20/315 हरिभक्त्ये हिंसा-शून्य 24/266 हेन-तोमार एइ जीव 16/184
'स्वरूप'-लक्षण, आर 20/354 'हरि:'-शब्दे नानार्थ, दुइ 24/55 हेलाय 'मुक्ति' पाबे, पाबे 25/147
'स्वरूप'-लक्षणे तुमि 18/126 हस्तिगण-मध्ये येन 21/69

| 545

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
546 ।

शब्दकोश

अ
अक्षजज्ञान—इन्द्रियोंके द्वारा प्राप्त ज्ञान
अघटन-घटन-पटीयसी—असम्भवको भी
सम्भव तथा इसके विपरीत करनेवाली
अचिद्वस्तु—जो वस्तु चित् नहीं हो
अच्छेद्य—अविभाज्य, जिसका छेदन ना हो सके
अच्युत—जो च्युत नहीं हो
अज—अजन्मा
अजागलस्तन—बकरीके गलेमें लटकनेवाली
स्तनके जैसी चीज
अज्ञ—ज्ञानरहित
अणिमा—योगकी आठ सिद्धियोंमेंसे एक,
जिसमें योगी अणुके समान सूक्ष्म
हो जाता है
अतिक्रम—मर्यादा, कर्त्तव्य, अधिकार आदिका
उल्लङ्घन
अतिक्रान्त—अतीत, क्रमका उल्लङ्घन किया
हुआ
अतिशय—अत्यधिक
अतिशयोक्ति—किसी बातका बढ़ा-चढ़ाकर
कहना
अत्याज्य—नहीं त्यागने योग्य
अत्युत्तम—अति उत्तम
अदृष्ट—न देखा हुआ, अज्ञात
अधिदैव—आराध्य देवता
अधिरूढ़—बढ़ा हुआ
अधिष्ठान—आधार, आश्रय
अनभिज्ञ—न जाननेवाला
अनवरत—निरन्तर
अनायास—बिना कष्टके
अनिर्वचनीय—वचनसे ना वर्णन करने योग्य
अनुक्षण—निरन्तर
अनुगत—अनुगामी, अधीन
अनुवर्त्तन—अनुसरण, अनुगमन
अनुष्ठान—आरम्भ करना, कोई धार्मिक कृत्य
अनुसन्धान—खोज, प्रयत्न
अन्तर्भुक्त—किसीके अन्तर्गत होना
अन्तर्भूत—अन्तर्गत
अन्त्य—अन्तका, आखिरी
अन्यतम—बहुतोंमें से एक, सर्वश्रेष्ठ
अन्वय—वाक्यमें शब्दोंका परस्पर सम्बन्ध,
मेल
अन्वेषण—खोज, ढूँढना
अपकार—अहित
अपटुता—अकुशलता
अपरा—जो श्रेष्ठ ना हो
अपरिमित—अगणित, अनगिनत
अपवर्ग—मोक्ष, निर्वाण
अपूर्व—जो पहले ना हुआ हो, अनूठा
अप्राकट्य—अप्रकट होना
अप्राकृत—अलौकिक
अप्रारब्ध—वैसा फल जो वर्तमान शरीरमें न
भोगा जा रहा हो
अप्रासङ्गिक—प्रस्तुत विषयसे असम्बद्ध,
प्रसङ्गके विरुद्ध
अबाध—बाधारहित
अभयत्व—अभयता
अभिज्ञ—जाननेवाला
अभिधा—नाम, वाच्यार्थ प्रकट करनेवाली
शब्द शक्ति
अभिधान—शब्दकोष
अभिधेय—अर्थ या उपाय, कथनीय, विषय

। 547

[ अभिप्राय-ईशिता श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अभिप्राय-मूल अर्थ, तात्पर्य
अभिप्रेत-उद्दिष्ट, अभिलाषित, स्वीकृत
अभिवृद्धि-अभ्युदय, बढ़ना
अभिव्यक्ति-प्रकट करना
अभिसन्धि-जोड़, समझौता
अभिसार-आगे बढ़ना, प्रियसे मिलने जाना
अभिहित-कहा हुआ
अभीष्ट-प्रिय, रुचिकर
अभ्यस्त-बार बार अभ्यास किया गया
अभ्युदय-उदय
अमित-अत्यधिक
अरण्य-वन
अवगत-जाना हुआ
अर्वाचीन-नया, बादमें उत्पन्न हुआ
अवतारणा-नीचे लाना, इन्द्रियगोचर करना
अवतीर्ण-अवतारके रूपमें प्रकट
अवधारण-शब्दके अर्थकी सीमा बाँधना,
निश्चय करना
अवयव-अङ्ग, अंश
अवरुद्ध-रुका हुआ
अवलम्बन-आश्रय लेना, सहारा लेना
अवलोकन-देखना
अवशिष्ट-बचा हुआ, शेष
अवस्थान-रहना, अवस्थिति
अविचिन्त्य-अचिन्त्य
अविच्छिन्न-अविभक्त, लगातार अविच्छिन्न
तैलधारावत्-तेलकी धाराके समान अटूट
अव्यय-अविकारी
अव्याकृत-अव्यक्त
अशेष-सम्पूर्ण
अष्टसिद्धि-आठ प्रकारकी सिद्धियाँ
असङ्ग-आसक्तिहीन
असङ्गत-प्रसङ्गविरुद्ध, अनुचित
असङ्गति-मेलका ना होना
असंस्कृत-संस्कारहीन
असमोध्र्द्ध-जिससे बड़ा और जिसके बराबर
कोई नहीं हो
असार-सारहीन
असूया-ईर्ष्या, दूसरेके गुणमें दोष निकालना
आ
आख्यायिका-कहानी
आच्छन्न-ढका हुआ
आत्मविषयणी-आत्म-सम्बन्धी
आत्मसात्-अपने अधिकारमें
आत्यन्तिक-असीम
आदित्य-सूर्य
आधान-स्थापन, कोई वस्तु रखनेका स्थान
रखना
आधिदैविक-देवताओंके द्वारा कृत
आधिभौतिक-अन्य प्राणियों द्वारा प्रदत्त
आध्यात्मिक-मानसिक, आत्म-सम्बन्धी
आपाततः-अचानक, अन्तमें
आप्त-पूर्ण, कुशल
आम्नाय-वेद, श्रुत, परम्पराप्राप्त उपदेश
आयुध-अस्त्र
आरूढ़-आसीन
आरोहण-चढ़ना, ऊपरकी ओर जाना
आर्त्ति-क्लेश, पीड़ा
आर्ष-ऋषियोंका
आलोचना-गुण-दोष निरूपण
आलोच्य-आलोचना योग्य
आह्लादित-आनन्दित
इ
इति-इस प्रकार, समाप्ति
इहलोक-यह लोक
ई
ईक्षण-दृष्टिपात
ईशिता-ईश्वरत्व
548 ।

शब्दकोश उच्छिष्ट-छन्दविद्या ]
उ
उच्छिष्ट-खाकर छोड़ा हुआ, परित्यक्त
उत्कृष्ट-उन्नत, श्रेष्ठ
उद्बुद्ध-जगा या जगाया हुआ, विकसित
उद्भासित-व्यक्त, चमकता हुआ
उद्यत-तैयार
उद्रेक-प्रचुरता, बढ़ती
उद्वेग-क्षोभ, चित्तकी अस्थिरता
उपक्रम-योजना, आरम्भ, प्रयास
उपशम-विराग, विरक्ति
उपलक्षित-इशारेसे बताया हुआ
उपाङ्ग-छोटा या सहायक अंग
उपार्जित-कमाया हुआ
उपादान-साधन-सामग्री
उपादेय-ग्रहण करने योग्य, उपयोगी
उपेयत्व-उपाय-योग्य होनेका भाव
उरु-विस्तृत, महान
उरुक्रम-विष्णु
उरुगाय-उत्तम व्यक्तियोंके द्वारा जिसका
स्तुतिगान किया गया हो
ए
एकरस-जो सदा एक रूपमें रहे,
एकीभूत-जो मिलकर एक हो गया हो
ऐ
ऐहिक-सांसारिक
औ
औत्सुक्य-उत्सुकता
औद्धत्य-उद्धतता, अखड़पन
औपाधिक-उपाधियुक्त
क
कर्त्तृत्व-कर्ताका धर्म, कार्य
कलुषित-गंदा, कलुषयुक्त
कल्प-वेदका एक अङ्ग, ब्रह्माका एक दिन
कल्पवृक्ष-इच्छा पूरी करनेवाला वृक्ष
काम्यकर्म-फलकी कामनासे किया
जानेवाला कर्म
कैतव-छल, धोखा
केवला भक्ति-शुद्धा भक्ति
कैङ्कर्य-दासत्व
कैवल्य मुक्ति-निर्वाण मुक्ति
कौतूहलवश-उत्सुकतावश
क्रोड़ीभूत-अन्तर्भूत
क्लान्त-थका हुआ, क्षीण
क्ष
क्षिति-पृथ्वी
क्षेत्र-शरीर
क्षेत्रज्ञ-शरीरका ज्ञाता, आत्मा तथा
परमात्मा
क्षोभ-असन्तोष, व्याकुलता
ग
ग्रथित-गूँथा हुआ
ग्रन्थि-गाँठ
ग्रास-आहार
ग्रीवा-गर्दन
घ
घ्राण-गन्ध, सूँघनेकी शक्ति
च
चित्तगुहा-हृदयरूपी कन्दरा
चित्-शक्ति-भगवानकी एक प्रकारकी शक्ति
चिदालोचना-चित्-वस्तुकी आलोचना
चिन्तामल-चिन्तारूपी मल
चिन्मयत्व-चिन्मयता
चैतन्यत्व-चेतनता
चैतन्यनिष्ठ-चित्-वस्तुमें जिसकी निष्ठा है
चैतन्यहीन-चेतनारहित
छ
छन्दविद्या-अठारह विद्याओंमें एक
। 549

[ जर्जरित-नैतिक श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
ज
जर्जरित—जो जर्जर हो गया हो
त
तत्त्वज्ञान—तत्त्ववस्तुका ज्ञान
तत्त्वतः—यथार्थतः
तत्त्वविद्—तत्त्वको जाननेवाला
तदीय—भगवत्-सम्बन्धी
तनय—पुत्र
तन्मय—तल्लीन
तादात्म्य—दो वस्तुओंके परस्पर अभिन्न होनेका स्वभाव
तारतम्य—दो वस्तुओंके घट-बढ़कर होनेका भाव
तिर्यग्—पशु-पक्षी
तैलधारावत्—तैलकी भाँति धारावाला
त्रिगुणातीत—तीनों गुणोंसे अतीत
त्रिवर्ग—धर्म, अर्थ और काम
द
दिक्पाल—दश दिशाओंके रक्षक देवता
दुर्ज्ञेय, दुर्बोध—कठिनाईसे जानने योग्य
दुर्निगृहीत—कठिनाईसे वशमें लाया हुआ
दुर्निवारित—कठिनाईसे निवारण किया हुआ
दुरूह—कठिन
दुस्त्याज्य—नहीं त्यागने योग्य
देदीप्यमान—चकमता-दमकता हुआ
देहाध्यास—देहमें मिथ्या अभिमान
द्रव्यमययज्ञ—द्रव्य द्वारा किया गया यज्ञ
द्विजवर—ब्राह्मणश्रेष्ठ
द्वैतभाव—दो होनेका भाव
ध
धूसरित—धूलसे भरा हुआ
ध्वनित होना—पता चलना
न
नराकृति—मनुष्यके समान आकृति
नामाभास—नामका आभास
निःशक्तिक—शक्तिरहित
निःश्वास—प्राणवायु या साँसका बाहर निकलना
निःसृत—निकला हुआ
निकृष्ट—तुच्छ
निकेतन—घर
निक्षेप करना—फेंकना
निगृहीत—निग्रह किया हुआ
निग्रह—संयम
निन्तान्त—अत्यन्त, एकदम
निमज्जित—डूबा हुआ, स्नात
नियमाग्रह—नियम-पालनमें आलस्य
निरञ्जन—निर्दोष, अज्ञानसे रहित
निरपेक्ष—किसी औरकी अपेक्षा नहीं
निर्गत—बाहर निकला हुआ
निर्गुण—सत्त्व, रज और तमोगुणसे अतीत
निर्दिष्ट—निर्देशित
निर्वाण—मोक्ष
निर्विकल्प—विकल्पसे रहित
निर्विवाद—बिना विवादका
निरुद्ध—विशेषरूपसे रोका हुआ
निरूपक—निरूपण करनेवाला
निरूपण—किसी विषयको ठीक-ठीक समझा देना
निशा—रात्रि
निष्काम कर्म—कामनासे रहित कर्म
निष्पन्न—जिसकी उत्पत्ति हुई है
निसर्गवाद—प्रकृतिवाद (प्रकृति ही जगत्की सृष्टि करनेवाली है, ऐसा मतवाद)
निस्तारक—निस्तार करनेवाला
निस्त्रैगुण्य—तीनों गुणोंसे अतीत
निहत—मारा हुआ
नीलमणि—नीलम
नैतिक—नीति-सम्बन्धी
550 |

शब्दकोश नैमित्तिक-प्राकृत ]
नैमित्तिक-निमित्तसे उत्पन्न
नैरन्तर्य-निरन्तर होनेका भाव
नैर्घृण्य-निर्ममता, क्रूरता
प
पक्षान्तर-दूसरी ओर
पन्था-पथ
परिज्ञात-अच्छे प्रकारसे ज्ञात
परिनिष्ठित-दूसरेमें निष्ठावाला
परदार-दूसरेकी स्त्री
परवर्ती-बादमें
पराक्रान्त-शक्तिशाली
परिग्रह-ग्रहण
पराभक्ति-श्रेष्ठा, शुद्धा भक्ति
पराभूत-पराजित
परिचर्या-सेवा
परिचालक-चलानेवाला
परिदृष्ट-दृष्ट
परिनिष्ठित-पूर्णतया निपुण
परिमित-सीमित
परिलक्षित-अच्छी तरह देखाभाला हुआ
परिव्राजक-संन्यासी
परिवेष्टित-घिरा हुआ
पर्यन्त-तक
पर्यवसित-समाप्त
पाण्डित्य-विद्वता
पारत्रिक-परलोक-सम्बन्धी
पारलौकिक-परलोक-सम्बन्धी
पार्षद-परिकर
पाषण्डी-पाखण्डी
पूर्वपक्ष-संशयके सम्बन्धमें उठाया गया प्रश्न
पूर्वराग-मिलनसे पहलेका राग
प्रकरण-निर्माण, प्रसङ्ग
प्रकृत-यथार्थ
प्रकृष्ट-उत्तम
प्रक्षिप्त-बादमें जोड़ा या घुसाया हुआ
प्रच्छन्न-ढका हुआ
प्रजल्प-इधर-उधरकी बात
प्रज्ञा-बुद्धि
प्रणयन-रचना, निर्माण
प्रणत-शरणागत
प्रणतपाल-शरणागतकी रक्षा करनेवाले
प्रणति-प्रणाम, शरणागति
प्रताड़ित-सताया गया
प्रतिपादित-प्रमाणित
प्रतिपाद्य-जिसे प्रमाणित किया जाय
प्रतिभात-प्रभायुक्त, ज्ञात
प्रतीयमान-जान पड़ता हुआ, जिसकी प्रतीति हो रही हो
प्रत्यगात्मा-जीवात्मा
प्रत्यवाय-दोष
प्रत्याहार-निरोध, रोकना
प्रत्युपकार-भलाईके बदलेमें की हुई भलाई
प्रदत्त-दिया हुआ
प्रधान-मायाकी एक वृत्ति
प्रधानतः-मुख्यरूपसे
प्रपत्ति-शरणागति
प्रभूत-अत्यधिक
प्रभृति-जैसा
प्रयोजनीयता-आवश्यकता
प्रयोजक-प्रयुक्त करनेवाला
प्रयोजकत्व-प्रयोजक होनेका भाव
प्रवर-श्रेष्ठ
प्रवर्त्तक-किसी काममें लगानेवाला, आरम्भ करनेवाला
प्रवृत्ति-मनका किसी विषयकी ओर झुकाव, प्रभाव
प्रशस्त-प्रशंसाके योग्य
प्रशान्तात्मा-शुद्ध या शान्त आत्मा
प्रशामक-शान्त करनेवाला
प्राकृत-प्रकृति-सम्बन्धी
। 551

[ प्राक्तन-विक्षिप्त श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
प्राक्तन-प्राचीन
प्रादुर्भूत-आविर्भूत, अवतरित
प्रादेशिक वाक्य-प्रसङ्गत, स्थानीय वाक्य
प्रापक-प्राप्त करने या करानेवाला
प्रापञ्चिक-जगत् या प्रपञ्च-सम्बन्धी
प्राप्य-प्राप्त होने योग्य
प्रार्थित-प्रार्थना किया हुआ
प्रेमास्पद-प्रेमका स्थल
प्रेमोत्कर्ष-प्रेमका उत्कर्ष
ब
बाहुल्य-अधिकता
बाह्य अङ्ग-बाहरी अङ्ग
बिद्ध-छेदा हुआ, आहत
बृहत्-बड़ा
बोधगम्य-समझमें आने योग्य
ब्रह्मलय-ब्रह्ममें लय होना
ब्रह्मवेत्ता-ब्रह्मको जाननेवाला
ब्रह्मानन्द-ब्रह्मका आनन्द
ब्रह्मानुभूति-ब्रह्मकी अनुभूति
भ
भक्तानन्दायिनी-भक्तोंको आनन्द देनेवाली
भोक्तृत्वभाव-भोक्ता होनेका भाव
म
मत्सम्बन्धी-मेरे सम्बन्धी
मत्सरता-डाह, जलन, द्वेष
मथन-मथनेका भाव
मधुरिमा-माधुर्य
मन्वन्तर-ब्रह्माजीके दिनका चौदहवाँ भाग
मन्तव्य-विचार, मत
मर्मार्थ-सार
महत्-बड़ा
मायाच्छन्न-मायाके द्वारा आच्छन्न
मुकुलित-आधा विकसित
मुमुक्षु-मुक्तिकी इच्छा करनेवाला
मेधायुक्त-मेधावी
मोहान्ध-मोहसे अन्धा
म्लेच्छ-चारो वर्णोंसे भी नीच
य
यतिगण-संन्यासी लोग
याग-यज्ञ
यादृच्छिक-स्वतन्त्र, ऐच्छिक
युक्तियुक्त-उचित, युक्तिपूर्ण
युगपत्-एक ही समयमें, साथ-साथ
युगावतार-प्रत्येक युगमें लेनेवाले अवतार
योगमाया-भगवान्‌की परा शक्ति
योगस्थैर्य-योगकी स्थिरता
र
रक्तिम-लालिमायुक्त
रञ्जित-रंगा हुआ
रुक्ष-रूखा, नीरस
ल
लिङ्गशरीर-सूक्ष्म शरीर
लिप्सा-किसी वस्तुको पानेकी इच्छा
लुब्ध-ललचाया हुआ, लोभित
लोकपाल-लोकका पालन करनेवाला
लोकप्रवर्त्तन-लोगोंके कल्याणके लिये
व
वञ्चक-वञ्चना करनेवाला
वयस-उम्र
वर्चस्व-अधिकार
वर्णविशिष्ट-वर्णवाला
वर्णसङ्कर-भिन्न जातियोंके स्त्री-पुरुषसे उत्पन्न
वाक्-वाणी, बोलनेकी इन्द्रिय
वाचाल-अधिक बोलनेवाला
वागिन्द्रिय-जिह्वा
विक्षिप्त-पागल, उद्विग्न
552 ।

शब्दकोश विगुण-सारगर्भित ]
विगुण—गुणहीन
विच्युति—भूल, पतन, वियोग
विजितात्मा—जिसने मनको जीत लिया है
विज्ञ—पण्डित, जाननेवाला
विदित—मालूम
विधर्म—धर्मविरूद्ध
विधिवादिगण—नैतिक लोग
विधेय—करने योग्य
विधेयात्मा—जिसकी आत्मा संयत हो
विन्यास—व्यवस्थित करना
विपर्यय—प्रतिकूलता, विपरीतता
विभूति—ऐश्वर्य
विरहकातर—विरहसे कातर
विरोधाभास—विचारमें विरोध प्रतीत होना
विलास—क्रीड़ा
विवक्षित—इच्छित, कथित
विवृत—स्पष्ट, व्यक्त
विशारद—निपुण
विशिष्ट—विशेषतायुक्त
विशिष्टता—विशेषता
विशुद्धचित्त—जिसका चित्त शुद्ध है
विशेषत्त्व—विशेषता
विषयणी—विषयसे सम्बन्धित
विहित—आदेश किया हुआ
वृष्टि—वर्षा
वेदज्ञ—वेदोंके जाननेवाला
वैषम्य—विषमता
व्यङ्गोक्ति—गूढ़भाषा, वह भाषा जिसमें व्यङ्ग
हो
व्यतिक्रम—उल्लङ्घन
व्यतिरेक—असङ्गति, निषेध
व्यवहृत—व्यवहार किया हुआ
व्योम—आकाश
श
शोच्य—शोचनीय
शैव—शिवके उपासक
श्रुत—सुना हुआ
श्रोतव्य—सुनने योग्य
श्लेषोक्ति—छिपे अर्थवाली बात
ष
षडैश्वर्यपूर्ण—छः ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण
स
सङ्कीर्णता—उदार ना होनेका भाव
संवरण—छिपाना
संवेदन—अनुभूति
संस्पर्श—अच्छी तरहसे होनेवाला स्पर्श
संहर्त्ता—संहार करनेवाला
सङ्गति—मेल
सञ्चित—जमा किया हुआ
सदातन—विष्णु
सद्विवेकी—सद् विवेकवाला
समत्वभाव—समताका भाव
सन्निविष्ट—उत्तम रूपसे एकाग्र
समाहर—समुच्चय, समूह
समाहित—संयमित, व्यवस्थित
सम्बन्धविशिष्ट—सम्बन्धवाला
सम्मत—सहमत, एक मत
समन्वित—संयुक्त, स्वाभाविक रूपसे क्रमबद्ध
सम्यक्—भलीभाँति, अच्छी तरह
सर्वतन्त्र—समस्त सिद्धान्त
सर्वतोभावेन—सम्पूर्ण रूपसे
सर्वभूतात्मा—सभी जीवोंके आत्मा अर्थात्
परमात्मा
सर्वभुक्—सब कुछ खा जानेवाला
सर्वात्मकत्व—सर्वात्मकता
सहस्र—हजार
साम—सामवेद
सामर्थ्यविशिष्ट—सामर्थ्यवान्
साम्यलक्षण—समानताका लक्षण
सारगर्भित—तत्त्वपूर्ण
। 553

[ सालोक्य-हृदगत श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
सालोक्य मुक्ति—जीवका भगवान्‌के साथ
एक ही लोकमें वास करना
साष्टाङ्ग प्रणाम—आठ अङ्गोंसे प्रणाम (सिर,
हाथ, पैर, आँख, जंघा, हृदय,
वचन और मन)
सुखान्वेषी—सुखकी खोज करनेवाला
सुदुराचारी—अति दुराचारी
सुधा—अमृत
सुरस—रसयुक्त
सुष्ठु—भली भाँति, अच्छी तरह
सुस्पष्ट—विशेषरूपसे स्पष्ट
सौम्य—सुन्दर, कोमल
स्खलित—गिरा हुआ
स्निग्ध—स्नेहयुक्त, प्रियता
स्नेहाधिक्य—स्नेहकी अधिकता
स्फूर्ति—स्फुरण, व्यक्त होना
स्पृहा—इच्छा, आकाङ्क्षा
स्फुरण—व्यक्त होना
स्फुलिङ्ग—चिङ्गारी
स्मार्त्त—स्मृति शास्त्रका अनुयायी
स्थायित्व—स्थिरता
स्रुवा—घीमें आहुति डालनेकी करछी
स्वच्छन्द—स्वतन्त्र
स्वधर्मस्थ—अपने धर्ममें स्थित
स्वयंभू—स्वयं उत्पन्न
स्वानन्दपूर्ण—अपने आनन्दमें पूर्ण
ह
हत—मरा हुआ
हतभागा—भाग्यहीन
हन्त—मारना
हिरण्यगर्भ—ब्रह्मा
हेयता—तुच्छता
हृदगत—हृदय-सम्बन्धी
554 ।