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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

शब्दकोश विगुण-सारगर्भित ]
विगुण-गुणहीन
विच्युति-भूल, पतन, वियोग
विजितात्मा-जिसने मनको जीत लिया है
विज्ञ-पण्डित, जाननेवाला
विदित-मालूम
विधर्म-धर्मविरुद्ध
विधिवादिगण-नैतिक लोग
विधेय-करने योग्य
विधेयात्मा-जिसकी आत्मा संयत हो
विन्यास-व्यवस्थित करना
विपर्यय-प्रतिकूलता, विपरीतता
विभूति-ऐश्वर्य
विरहकातर-विरहसे कातर
विरोधाभास-विचारमें विरोध प्रतीत होना
विलास-क्रीड़ा
विवक्षित-इच्छित, कथित
विवृत-स्पष्ट, व्यक्त
विशारद-निपुण
विशिष्ट-विशेषतायुक्त
विशिष्टता-विशेषता
विशुद्धचित्त-जिसका चित्त शुद्ध है
विशेषत्व-विशेषता
विषयणी-विषयसे सम्बन्धित
विहित-आदेश किया हुआ
वृष्टि-वर्षा
वेदज्ञ-वेदोंके जाननेवाला
वैषम्य-विषमता
व्यङ्गोक्ति-गूढ़भाषा, वह भाषा जिसमें व्यङ्ग हो
व्यतिक्रम-उल्लङ्घन
व्यतिरेक-असङ्गति, निषेध
व्यवहृत-व्यवहार किया हुआ
व्योम-आकाश
श
शोच्य-शोचनीय
शैव-शिवके उपासक
श्रुत-सुना हुआ
श्रोतव्य-सुनने योग्य
श्लेषोक्ति-छिपे अर्थवाली बात
ष
षडैश्वर्यपूर्ण-छः ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण
स
सङ्कीर्णता-उदार ना होनेका भाव
संवरण-छिपाना
संवेदन-अनुभूति
संस्पर्श-अच्छी तरहसे होनेवाला स्पर्श
संहर्त्ता-संहार करनेवाला
सङ्गति-मेल
सञ्चित-जमा किया हुआ
सदातन-विष्णु
सद्विवेकी-सद् विवेकवाला
समत्वभाव-समताका भाव
सन्निविष्ट-उत्तम रूपसे एकाग्र
समाहर-समुच्चय, समूह
समाहित-संयमित, व्यवस्थित
सम्बन्धविशिष्ट-सम्बन्धवाला
सम्मत-सहमत, एक मत
समन्वित-संयुक्त, स्वाभाविक रूपसे क्रमबद्ध
सम्यक्-भलीभाँति, अच्छी तरह
सर्वतन्त्र-समस्त सिद्धान्त
सर्वतोभावेन-सम्पूर्ण रूपसे
सर्वभूतात्मा-सभी जीवोंके आत्मा अर्थात् परमात्मा
सर्वभुक्-सब कुछ खा जानेवाला
सर्वात्मकत्व-सर्वात्मकता
सहस्र-हजार
साम-सामवेद
सामर्थ्यविशिष्ट-सामर्थ्यवान्
साम्यलक्षण-समानताका लक्षण
सारगर्भित-तत्त्वपूर्ण
| 305

[ सालोक्य-हृदगत श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
सालोक्य मुक्ति—जीवका भगवान्‌के साथ
एक ही लोकमें वास करना
साष्टाङ्ग प्रणाम—आठ अङ्गोंसे प्रणाम (सिर,
हाथ, पैर, आँख, जंघा, हृदय,
वचन और मन)
सुखान्वेषी—सुखकी खोज करनेवाला
सुदुराचारी—अति दुराचारी
सुधा—अमृत
सुरस—रसयुक्त
सुष्ठु—भली भाँति, अच्छी तरह
सुस्पष्ट—विशेषरूपसे स्पष्ट
सौम्य—सुन्दर, कोमल
स्खलित—गिरा हुआ
स्निग्ध—स्नेहयुक्त, प्रियता
स्नेहाधिक्य—स्नेहकी अधिकता
स्फूर्ति—स्फुरण, व्यक्त होना
स्पृहा—इच्छा, आकाङ्क्षा
स्फुरण—व्यक्त होना
स्फुलिङ्ग—चिङ्गारी
स्मार्त्त—स्मृति शास्त्रका अनुयायी
स्थायित्व—स्थिरता
स्रुवा—घीमें आहुति डालनेकी करछी
स्वच्छन्द—स्वतन्त्र
स्वधर्मस्थ—अपने धर्ममें स्थित
स्वयंभू—स्वयं उत्पन्न
स्वानन्दपूर्ण—अपने आनन्दमें पूर्ण
ह
हत—मरा हुआ
हतभागा—भाग्यहीन
हन्त—मारना
हिरण्यगर्भ—ब्रह्मा
हेयता—तुच्छता
हृदगत—हृदय-सम्बन्धी
306 ।

॥ श्रीश्रीगुरुगौराङ्गौ जयतः ॥
गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन चौथी पीढ़ीके महापुरुष श्रीरूपानुग अप्राकृत-कविकुलश्रेष्ठ-
ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद् कृष्णदास-कविराज-गोस्वामी-रचित
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
मध्यलीला [प्रथम भाग (अध्याय 1-14)]
गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन आठवीं पीढ़ीके पुरुषप्रधान श्रीरूपानुगवर-
ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद् सच्चिदानन्द-भक्तिविनोद-ठाकुर-रचित
अमृतप्रवाह-भाष्य,
गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन नौवीं पीढ़ीके श्रेष्ठ परिजन परमहंस-परिव्राजकाचार्य-श्रीरूपानुगश्रेष्ठ-
श्रीब्रह्ममाध्वगौड़ीय-सम्प्रदायके सर्वोत्तम संरक्षक-
ॐ विष्णुपाद परमहंसस्वामी श्रीश्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद-रचित
श्रीस्वरूप-रूप-विरोधी समस्त-कुसिद्धान्तोंको निरस्त करनेवाला
अनुभाष्य
एवं
नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी कृत
‘अमृतानुकणा’, विविध गौड़ीय वैष्णवाचार्योंके लेखों एवं नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद
अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजके प्रवचनोंसे सङ्कलित ‘अमृतानुकणिका’
भाष्य, भूमिका, विविध सूची और विवरण आदि-सहित
गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन दसवीं पीढ़ीके श्रेष्ठ परिजन
श्रीगौड़ीय वेदान्त समितिके प्रतिष्ठाता-आचार्य-भास्कर
नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री
श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराजके अनुकम्पा-पात्र
नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री
श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजके-
आदेश-निर्देशानुसार उनके चरणाश्रितजनोंके द्वारा
अनुवादित और सम्पादित
प्रकाशक : इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स

मूल बङ्गला पयार, संस्कृत श्लोक, अमृतप्रवाह भाष्य, अनुभाष्य,
अमृताणुकणा और अमृताणुकणिका सहित प्रकाशित
प्रथम संस्करण - श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजकी
7वीं विरह तिथि, 12 दिसम्बर, 2017
1000 प्रतियाँ
卐 卐 卐 卐 卐
ग्रन्थ प्राप्ति स्थान
★ श्रीरमणविहारी गौड़ीय मठ B-3, म्यूजिकल फाँउन्टेन पार्कके निकट,
जनकपुरी, नई दिल्ली
✆ 9810192540, 8285211049
★ श्रीकेशवजी गौड़ीय मठ जवाहर हाट, मथुरा (उ.प्र.)
✆ 0565-2502334
★ श्रीरूप-सनातन गौड़ीय मठ दान गली, वृन्दावन (उ.प्र.)
✆ 9456828001
★ श्रीगिरिधारी गौड़ीय मठ दसविसा, राधाकुण्ड रोड, गोवर्धन (उ.प्र.)
✆ 0565-2815668
★ श्रीश्रीकेशवजी गौड़ीय मठ कोलेरडाङ्गा लेन, नवद्वीप (प.ब.)
✆ 9153125442
★ श्रीराधामाधव गौड़ीय मठ 162, सैक्टर-16A, फरीदाबाद (हरियाणा)
✆ 9911283869
★ जयश्री दामोदर गौड़ीय मठ चक्रतीर्थ रोड़, जगन्नाथपुरी (ओडीशा)
✆ 9776238328
★ श्रीराधागोविन्द गौड़ीय मठ D-5, सैक्टर-55, नोएडा, (उ.प्र.)
✆ 9910400878
★ खण्डेलवाल एण्ड सन्स अठखम्बा बाजार, वृन्दावन (उ.प्र.)
✆ 0565-2443101

विषय-सूची
उद्धृत ग्रन्थ । i-iii
अध्याय विवरण । iv-vi
अध्याय 1 | मध्यलीला-सूत्रवर्णन । 3-48
अध्याय 2 | अन्त्यलीलाका सूत्ररूपमें प्रेमोन्माद-प्रलाप-वर्णन । 51-79
अध्याय 3 | संन्यास ग्रहण करनेके बाद श्रीअद्वैत-गृहमें भोजन-विलास-वर्णन । 81-110
अध्याय 4 | श्रीमाधवेन्द्रपुरी-चरितामृतास्वादन । 113-139
अध्याय 5 | साक्षिगोपाल-चरित्र-वर्णन । 141-159
अध्याय 6 | सार्वभौम-उद्धार । 161-209
अध्याय 7 | दक्षिणयात्रामें 'वासुदेव-उद्धार' । 211-230
अध्याय 8 | रामानन्दराय-सङ्गोत्सव । 233-337
अध्याय 9 | दक्षिणदेश-तीर्थ-भ्रमण । 339-402
अध्याय 10 | वैष्णवमिलन । 405-431
अध्याय 11 | 'बेड़ा-कीर्त्तन'-विलास-वर्णन । 433-463

अध्याय 12 गुण्डिचा-मन्दिर-मार्जन । । । । । । । 465-494
अध्याय 13 रथके आगे नृत्य । । । । । । । । 497-527
अध्याय 14 ‘हेरा-पञ्चमी’-यात्रा-दर्शन । । । । । । 529-562
श्लोक सूची । । । । । । । । । । 563-566
पद्य सूची । । । । । । । । । । । 567-582
शब्दकोश । । । । । । । । । । 583-590
साङ्केतिक चिह्नोंकी सूची
अन्त्य — अन्त्यलीला आदि — आदिलीला
उःनीः — उज्ज्वलनीलमणि कठः — कठोपनिषद
छाः — छान्दोग्योपनिषद तैः — तैत्तिरयोपनिषद
नाःपःराः — नारदपञ्चरात्र ब्रःसः — ब्रह्मसंहिता
बृःआः — बृहदारण्यकोपनिषद मध्य — मध्यलीला
मःभाः — महाभारत भःरःसिः — भक्तिरसामृतसिन्धु
भाः — भागवत विःपुः — विष्णुपुराण
श्वेः — श्वेताश्वतरोपनिषद हःभःविः — हरिभक्तिविलास

निवेदन
हमारे परमाराध्य गुरुदेव नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त
नारायण गोस्वामी महाराजजीकी अपार कृपासे गौड़ीय वैष्णवाचार्योंकी विविध टीकाओं
सहित हिन्दी भाषामें श्रीचैतन्यचरितामृतकी दो भागोंमें आदिला प्रकाशित करनेके पश्चात्
अब 'मध्यलीला प्रथम भाग' का प्रकाशन कार्य सम्पन्न हुआ है। यह कार्य उनकी आज्ञा
एवं उनके द्वारा प्रदत्त शक्तिसे ही सम्पादित हुआ है। श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामीने
श्रीचैतन्य महाप्रभुके द्वारा अनुमोदित गूढ़ तत्त्व-सिद्धान्तों और सर्वोच्च रस-तत्त्वका अनूठा,
अद्भुत और चमत्कारी समन्वय इस ग्रन्थमें अति सरल बङ्गला भाषामें करके अपने
अप्राकृत कवित्वका परिचय प्रदान किया है। "मितञ्च सारञ्च वचो हि वाग्मिता", श्रील
कविराज गोस्वामीकी लेखनी इस उक्तिका उज्ज्वल उदाहरण है, उन्होंने अति अल्प शब्दोंमें
समस्त शास्त्रोंके सारको प्रमाण सहित इस ग्रन्थमें प्रस्तुत किया है। इस ग्रन्थकी भाषा
सरल होनेपर भी इसमें अत्यन्त गूढ़ रहस्य समन्वित हैं। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर और
श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुरने अपनी टीकाओं एवं अनेकानेक लेखोंके द्वारा उन
गूढ़ रहस्योंको उद्घाटित किया है। इन टीकाओं और लेखों तथा श्रील गुरुदेवके
प्रवचनोंको इस प्रकाशनमें समन्वय करके ग्रन्थके गूढ़ भावोंको सर्वसाधारणके लिये
बोधगम्य बनानेका हमारा प्रयास है।
उनके मनोवाञ्छित कार्यको सम्पूर्ण करनेके लिये प्रकाशन मण्डलीके सेवक निरन्तर
प्रयासशील हैं और श्रील गुरुदेवकी प्रेरणा एवं निरुपाधिक निरवधि कृपाशक्ति हमें इस
महत् कार्यमें सदा उत्साहशील बनाये रखती है। यह अति हर्षका विषय है कि
श्रीचैतन्यचरितामृतका 'मध्यलीला प्रथम भाग' भी अब प्रकाशित हो गया है और
श्रीगुरुदेवकी प्रसन्नताके लिये उनकी निज वस्तुको उनके ही करकमलोंमें अर्पित करते हुए
परमानन्दका अनुभव कर रहे हैं।
इस ग्रन्थके प्रकाशनके लिये आत्मीय सहायता एवं प्रेरणाके लिये हम श्रीयुता
उमादेवी दासीके आभारी हैं। इस ग्रन्थमें कुछ त्रुटियोंका रह जाना स्वाभाविक है। सुधी
पाठकोंके द्वारा उनका संशोधनपूर्वक पाठ करनेसे हम आनन्दित होंगे।
प्रकाशन मण्डली
इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स (IGVP)

प्रकाशन-मण्डली
अनुवाद और विन्यास (Translation & Layout) :-
श्रीमान् गोकुलचन्द्र दास
शोधकार्य (Research) :-
श्रीमती जानकी दासी / श्रीमान् गोकुलचन्द्र दास
टङ्कण (Typing) :-
श्रीमती ऐश्वर्य दासी / श्रीमती प्रज्ञा दासी
संस्कृत-हिन्दी अनुवाद :-
श्रीमान् डॉ अच्युतलाल भट्ट (पी०एच०डी०)
प्रूफ-संशोधन (Proof Reading) :-
श्रीमती कुन्दलता दासी
मुखपृष्ठ चित्र :-
श्रीमान् अनुज
रेखा चित्र :-
श्रीमान् गुलशन / श्रीमान् राधेश्याम
प्रकाशक :-
श्रीपाद रामचन्द्र दास
इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (प्रथम भाग)
उद्धृत प्रमाण-ग्रन्थ तालिका
आदि पुराण—11/28; उज्ज्वलनीलमणि—8/110, 161,195; 14/163, 174, 187, 192, 197; उत्तररामचरित—7/73;
काव्यप्रकाश—1/58, 13/121; कूर्मपुराण—9/211, 212; कृष्णकर्णामृत—2/58, 61, 65, 74; 10/178; कृष्णचैतन्योक्त
श्लोक—1/211; 2/45; गीतगोविन्द—8/105, 106, 143; गोविन्दलीलामृत—8/182, 206, 211; 14/181, 189, 194;
गोस्वामीपादोक्त श्लोक—2/28; 14/200; गौतमीय-तन्त्र—8/216; चैतन्यचन्द्रोदय नाटक—3/28; 6/142, 254, 255;
10/119; 11/8, 11, 47, 151; जगन्नाथवल्लभ-नाटक—2/18, 36; दानकेलिकौमुदी—14/180; नारदपञ्चरात्र—9/157;
पद्मपुराण—3/28; 6/181, 182, 225, 226; 8/98; 9/29, 32; 11/31; पद्यावली—1/76; 4/197; 8/69, 70; 13/78,
80, 121; बृहन्नारदीयपुराण—6/242; वैष्णवतोषणी—2/42; ब्रह्मसंहिता—8/136, 163; 14/227; ब्रह्माण्डपुराण—9/33;
भक्तिरसामृतसिन्धु—1/190; 8/84, 141, 156, 188, 190; 9/117, 146; 10/178; 14/228; भगवत्सन्दर्भ—8/153;
भगवद्गीता—9/265; भागवत—2/42; 3/36; 6/84, 101-103, 108, 109, 149, 186, 235, 261, 270; 7/143; 8/6,
40, 62, 67, 72, 75, 77, 78, 80, 81, 89, 92, 94, 99, 139, 145, 147, 219, 224, 227, 232, 266, 275,
276; 9/114, 121, 123, 132, 143, 259, 260, 262, 264, 266, 270; 10/12; 11/29, 30, 32, 100, 104, 118,
192; 13/79, 136, 160; 14/13, 158; भागवतामृत—8/98; महाभारत—6/104; 9/30; 10/170; यामुनाचार्यकृत-श्लोक—1/203,
206; 8/73; 11/151; रघुवंश—10/145; रामायण (वाल्मिकी-कृत)—10/146; रूपगोस्वामीकृत श्लोक—1/76;
लघुभागवतामृत—9/157; 11/28, 31; ललितमाधव—1/84; 8/149; 9/150; विदग्धमाधव—2/52; विष्णुपुराण—6/154-157;
8/58, 153, 156; 13/77; श्वेताश्वतर उपनिषद्—10/141; साहित्यदर्पण—13/221; स्तवमाला—13/207; स्तोत्ररत्न—8/73;
हयशीर्षपञ्चरात्र—6/142; हरिभक्तिविलास—9/33 ।
अमृतप्रवाह भाष्यमें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका
ऐतरयोपनिषद्—6/143-148; गोविन्ददासका कड़चा—8/14; 9/93; चैतन्यचन्द्रोदय-नाटक—8/245-257;
9/355-357; चैतन्यभागवत—1/151; 4/4; 5/140; चैतन्य-शतनाम—7/150; जगन्नाथवल्लभ-नाटक—5/20;
नाटक-चन्द्रिका—1/134; पातञ्जल-दर्शन—6/269; प्रपन्नामृत—7/113; प्रेमाम्भोज-मकरन्द-
स्तोत्र—8/168-181; भागवत—8/101-102; 9/133-140; 11/56; 14/8; मुण्डकोपनिषद्—6/158-163;
श्वेताश्वतर उपनिषद्—6/133-141, 150-153; सङ्गीत दामोदर—10/116; सात्वतशास्त्र—9/48; साहित्य-दर्पण—1/134;
हरिभक्तिविलास—8/127 ।
। i

अनुभाष्यमें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका
अध्यात्म रामायण-9/11; अमृतप्रवाह भाष्य-6/97; आदिपुराण-8/246; इतिहाससमुच्चय-8/246;
उज्ज्वलनीलमणि-1/87; 2/66; 6/13; 8/172, 175, 202-205; 14/141-153, 159, 165, 168; उपदेशामृत
(रूपगोस्वामीकृत)-12/195; ऐतरयोपनिषद्-6/143-144; कठोपनिषद्-6/87; 8/307-309; 9/195; 11/37-38;
कर्णूल-म्यानुयेल-1/106; कल्याण-कल्पतरु-12/7-9, 59-61; कात्यान-गृह्यसूत्र-8/127; काशीखण्ड-9/157;
कूर्मपुराण-6/180; कौपीन-पञ्चक (शङ्कराचार्य)-6/121; गज्जाम-म्यानुयेल-7/113; गरुड़-पुराण-8/246;
गोपालतापनी-उपनिषद्-8/137; गोविन्द भाष्य (श्रीमद्भागवत)-11/195; गौतमीय-तन्त्र-13/142; चैतन्यचन्द्रामृत-7/37;
8/246; 10/175-177; चैतन्यचन्द्रोदय-नाटक-10/106; चैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (टिप्पनी)-10/105; चैतन्यभागवत-4/186;
5/140; चैतन्याष्टक-13/207; छान्दोग्योपनिषद्-6/145; 9/270; 12/194; तत्त्व-सन्दर्भ-6/135; तन्त्र-12/212,
215; ताञ्जोर गेजेटियार-9/74, 78-79; तैत्तरीय उपनिषद्-6/143-145, 172; 8/266; तैत्तरीय श्रुतिभाष्य (राघवेन्द्र
यति)-6/143-144; दक्षिण आर्कट म्यानुयेल-9/38, 73; दक्षिण कानाड़ा म्यानुयेल-9/245; दुर्गम-सङ्गमनी-8/202-205;
नरोत्तमदास ठाकुरकी प्रार्थना-8/137; 11/67; 12/135; नारायणव्यूह स्तव-8/246; पदामृत-समुद्र (राधामोहन
ठाकुर)-3/114; पद्मपुराण-8/35-36, 44; 11/32; पूर्णप्रज्ञ-दर्शन-6/135; पत्थरके पटलपर लिखे श्लोक-7/113;
प्रेमविवर्त्त-8/192; प्रेमविलास-विवर्त्त-8/192; बाजसेनकी शाखा-8/121; बाधूल-शाखा-6/143-144;
बृहदारण्यक-श्रुति-12/194; बृहद्वामन-पुराण-8/246; बृहद्विष्णु-पुराण-3/99; बृहद्भागवतामृत-8/248; 14/126;
बृहन्नारदीय-पुराण-8/246; बोम्बाइ गेजेटियार-9/245, 280, 281, 316; ब्रह्मसंहिता-8/137; 10/179-181;
ब्रह्मसूत्र-6/135, 147; 8/266, 308-310; भक्तिरत्नाकर-1/35-44, 189; 9/82; भक्तिरसामृतसिन्धु-2/35, 47, 66,
72; 3/127, 162; 4/202; 6/12; 8/202-205; 12/135; 13/142; 14/157; भविष्यपुराण-6/137; भरद्वाज-संहिता
(पञ्चरात्र)-1/263; भागवत-1/189; 2/29-34; 3/96, 97, 181; 4/179, 186; 5/28; 6/95, 143, 144, 263-265;
8/5, 44, 57, 60, 64, 127, 245-257, 264-266; 9/74, 80, 94-96, 102, 181, 195, 201, 218, 234, 260,
264, 270, 360, 362; 10/10, 11, 175-177; 12/32, 56, 184; 13/139, 142; भागवत-तात्पर्य (मध्व)-9/11;
भावार्थ-दीपिका-6/95, 144; 8/5; भिजागापटम्-गेजेटियार-8/3; मध्व-विजय-9/245; मध्व-भाष्य-6/137, 147;
मनःशिक्षा (दास गोस्वामी)-8/64; मनुसंहिता-10/154; महाभारत-8/127; 9/175, 310; मुकुन्दमालास्तोत्र-9/271;
मुण्डकोपनिषद्-6/172; 8/307-309; 12/59-61; मुरारी-कड़चा-10/185; राधारस-सुधानिधि-13/207; रामायण-9/218,
312; लघुभागवतामृत-6/263-265; 9/138-139; 12/212, 215; लघुभागवतामृत-टीका (बलदेव)-6/263-265;
विद्यापतिको गीतिग्रन्थ-3/114; विवर्त्तविलास (बाउलका ग्रन्थ)-8/192; विलापकुसुमाञ्जली-1/283-284; वेदान्तदर्शन
(गौड़ीय)-8/192; वेदान्त-पारिजात-6/135; वेदार्थसंग्रह (श्रीरामानुज)-8/57; वैष्णव-मञ्जुषा-9/244-245; 10/90;
11/84; शरणागति (ठाकुर भक्तिविनोद)-3/194; 7/69; श्वेताश्वतरोपनिषद्-6/143-144, 150; 8/264; 9/102;
श्रीभाष्य-6/135; श्रुति-8/266; सप्तशती-8/90; सर्वज्ञसूक्त-6/198; सर्वसम्वादिनी-6/135; 8/192; स्कन्दपुराण-6/147;
8/246; स्तवमाला-7/37; स्मृति-10/137; हरिभक्तिविलास-4/59-62; 8/127; 12/126-127 ।
ii ।

अमृतानुकणार्मे उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका
उपदेशामृत—5/142-143; गीता—13/80; चैतन्यभागवत—3/4; छान्दोग्य-भाष्य—9/276; जावालोपनिषद्—3/4;
नारायणसंहिता—9/276; न्यायरक्षामणि—5/142-143; बृहदारण्यक—13/80; ब्रह्मवैवर्त्त-पुराण—3/4; ब्रह्मसूत्र—9/276;
ब्रह्मसूत्र (मध्वभाष्य)—9/276; भागवत—3/4, 9/276, 13/80; मध्वमत-प्रकाशक—9/276; महाभारत—9/276;
महाभारत-तात्पर्य—9/276; माठर श्रुति—9/276; मनुसंहिता—3/4; मुण्डकोपनिषद् (मध्यभाष्य)—9/276; रघुनन्दन—3/4;
शिवार्क-मणिदीपिका—5/142-143; श्रुति—13/80।
अमृतानुकणिकामे उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका
उज्ज्वलनीलमणि—2/5, 2/66-70; गरुड़पुराण—9/192; गीता—8/57, 59; 9/192; दानकेलिकौमुदी—2/61;
नारद-पञ्चरात्र—8/57, 60; भक्तिरसामृतसिन्धु—8/67; 9/94-96; भक्तिसन्दर्भ—8/68; भागवत—8/59, 63, 67-68,
97-99; 9/94-96; महाभारत—8/57; माठरश्रुति—8/67; विदग्धमाधव—8/1; श्रुति—8/59;
। iii

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
मध्यलीला (प्रथम भाग) अध्याय-विवरण
पहला अध्याय— 3-48
मध्य और अन्त्य लीलाकी भूमिका या सूत्रवर्णन।
दूसरा अध्याय— 51-79
अन्तिम 12 वर्ष गम्भीरामें अन्तरदशामें अवस्थित
महाप्रभुका श्रीराधाके आवेशमें दिव्योन्माद और प्रलाप
आदि, एवं श्रीचैतन्यचरितामृत ग्रन्थके मूल आधारका
कथन।
तीसरा अध्याय— 81-110
संन्यास ग्रहण करनेके बाद महाप्रभुका राढ़देशमें
भ्रमण, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी चेष्टासे शान्तिपुरमें श्रीअद्वैताचार्यके
घरमें आकर शचीमाताके द्वारा बनाया गया भोजन ग्रहण
करना और नृत्य-कीर्तनलीला, पुरीमें निवास स्वीकार
और श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि चार भक्तोंके साथ पुरीकी
यात्रा।
चौथा अध्याय— 113-139
रेमुणामें उपस्थित होकर श्रीनित्यानन्द आदिको
श्रीईश्वरपुरीके मुखसे सुनी हुयी श्रीमाधवेन्द्र पुरी गोस्वामीके
द्वारा गोवर्धनधारी गोपालकी प्रतिष्ठा और अन्नकूट
महोत्सव, श्रीमाधवेन्द्रपुरीके रेमुणामें आनेपर श्रीगोपीनाथके
द्वारा उनके लिये क्षीरकी चोरी एवं श्रीमाधवेन्द्रपुरीके
द्वारा चन्दन-कर्पूर संग्रह करके श्रीगोपीनाथके अङ्गमें
लेपन आदिका वृत्तान्त वर्णित है।
पाँचवाँ अध्याय— 141-159
साक्षीगोपालमें आनेपर श्रीनित्यानन्द प्रभुके मुखसे
महाप्रभु आदिका बड़े ब्राह्मण, छोटे ब्राह्मण और साक्षी
गोपालके चरित्रका श्रवण, कमलपुरमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके
द्वारा महाप्रभुका दण्ड भङ्ग, आठारनालामें आनेपर दण्ड
भङ्गकी बात सुनकर महाप्रभुका अकेले पुरीमें आगमन
और श्रीजगन्नाथजीके दर्शनसे मूर्च्छाकी प्राप्ति।
छठा अध्याय— 161-209
श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीमुकुन्द आदिके द्वारा महाप्रभुका
दर्शन, महाप्रभुको बाह्य दशाकी प्राप्ति, सभीके द्वारा
प्रसादका सम्मान। अन्य एक दिन महाप्रभुके परमेश्वरत्वके
सम्बन्धमें श्रीगोपीनाथाचार्यके साथ सशिष्य श्रीभट्टाचार्यका
कुतर्क, मायावादी पण्डित सार्वभौमके मुखसे सात दिन
चुपचाप वेदान्त व्याख्याका श्रवण और वेदान्तके
निर्विशेष ब्रह्मपरतारूप कुतर्कका खण्डन। श्रीसार्वभौमके
द्वारा ‘आत्मारामश्च’ श्लोककी नौ प्रकारकी व्याख्या,
महाप्रभुकी उन नौ प्रकारके अतिरिक्त अठारह प्रकारकी
व्याख्या; श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी पराजय, श्रीसार्वभौमको
चतुर्भुज और द्विभुजरूपका प्रदर्शन और उद्धारका
साधन।
सातवाँ अध्याय— 211-230
कृष्णदास ब्राह्मणके साथ महाप्रभुकी दक्षिणयात्रा,
मार्गमें प्रत्येक ग्राम और नगरवासियोंको वैष्णव बनाना
और कूर्मस्थानमें वासुदेव ब्राह्मणको कुष्ठरोगसे मुक्त
करना।
आठवाँ अध्याय— 233-337
गोदावरी तटपर श्रीरामनान्दके साथ महाप्रभुका
iv ।

मिलन और श्रीरायके मुखसे साध्य-साधन तत्त्वकी
अन्तिम सीमातक श्रवण, श्रीरायको महाप्रभुका
रसराज-महाभाव रूपका प्रदर्शन और श्रीरायको राजकार्य
त्यागकर पुरी आकर मिलनेका आदेश देकर पुनः
दक्षिणयात्रा।

नौवाँ अध्याय— 339-402

दक्षिण देशमें अनेक तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए अन्य
अभिलाषी, ज्ञानी और पाषण्डी लोगों और अन्य
साम्प्रदायिक वैष्णवोंका कृष्ण नाममें प्रवर्त्तन, सिद्ध
होनेपर भी राम-नामकारी ब्राह्मणको कृष्णनाममें प्रवर्त्तन।
मार्गमें तार्किक, मीमांसक, मायावादी, पाषण्डी आदि
समस्त भक्ति विरोधी मतोंका खण्डन करके कृष्णभक्ति
सिद्धान्तका स्थापन, बौद्ध आचार्यकी पराजय, रङ्गक्षेत्रमें
वेङ्कटभट्टके घरमें चातुर्मास्य यापन और श्रीलक्ष्मीनारायण
उपासक श्रीसम्प्रदायी भट्टको सपरिवार श्रीराधाकृष्णकी
उपासनामें प्रवर्त्तन, ऋषभ पर्वतमें श्रीपरमानन्दपुरी गोस्वामीके
साथ भेंट और पुरी गोस्वामीकी नीलाचलकी ओर यात्रा,
दक्षिण मथुरामें रामसीताके भक्त ब्राह्मणको ‘अप्राकृत
वैकुण्ठेश्वरी सीतादेवी प्राकृत असुर रावणके द्वारा
दर्शनसे अतीत हैं’—ऐसा कहकर सान्त्वना प्रदान
करना; बादमें रामेश्वरसे कूर्मपुराण-श्लोक लाकर उनको
दिखाना। मालावार देशमें भट्टथारियोंके हाथोंसे सङ्गी
कृष्णदासका उद्धार, पयस्विनी तटपर ब्रह्मसंहिताके
पञ्चम अध्यायका संग्रह; शृङ्गेरी मठमें जाना; उडुपीमें
मठाधीश मध्वाचार्यकी पराजय, पाण्डरपुरमें श्रीरङ्गपुरीके
मुखसे श्रीशङ्करारण्य अर्थात् बड़े भाई श्रीविश्वरूपकी
स्वधाम प्राप्ति (अप्रकट)का संवाद श्रवण। कृष्णवेन्वा
नदीके तटपर ‘कृष्णकर्णामृत’का संग्रह और विद्यानगरमें
पुनः लौटकर श्रीरामानन्दके साथ भेंट करके अलालनाथसे
होते हुये पुरीमें वापस लौटना।

दसवाँ अध्याय— 405-431
महाप्रभुका श्रीकाशीमिश्रके घरमें अवस्थान, श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्यके द्वारा क्षेत्रवासी वैष्णवोंके परिचयकी प्राप्ति
करना, कृष्णदासको नवद्वीपमें भेजना, गौड़ीय भक्तोंकी
पुरीमें आनेकी तैयारी, श्रीपरमानन्द पुरीका नवद्वीपसे
पुरीमें आगमन, श्रीदामोदर स्वरूपका काशीसे आगमन
और महाप्रभुसे मिलन, श्रीईश्वरपुरीके शिष्य श्रीगोविन्दका
आगमन और महाप्रभुकी सेवामें उनकी नियुक्ति, ब्रह्मानन्द
भारतीसे चर्माम्बरका त्याग करवाना और उनका
महाप्रभुमें श्रीकृष्ण ज्ञान; बलवान काशीश्वरका आगमन।

ग्यारहवाँ अध्याय— 433-463
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके द्वारा प्रतापरुद्रकी महाप्रभुसे
मिलन सम्पादन करनेकी चेष्टा, महाप्रभुकी अनिच्छा,
राजकार्यसे मुक्त होकर श्रीरायका महाप्रभुका दर्शन और
राजा प्रतापरुद्रके गुणोंका कीर्त्तन, राजाके प्रति महाप्रभुके
चित्तभावका परिवर्तन, पुरुषोत्तममें अनवसर-कालमें
महाप्रभुका आलालनाथमें गमन और वहाँसे लौटनेपर
गौड़देशसे समागत श्रीअद्वैताचार्य आदि भक्तोंके साथ
मिलन, श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके साथ श्रीगोपीनाथाचार्यके
द्वारा महलके ऊपर चढ़कर राजा प्रतापरुद्रको गौड़ीय
भक्तोंका परिचय-दान, राजाके द्वारा उनको रहनेके
स्थान और महाप्रसादकी व्यवस्था, महाप्रभुका श्रीहरिदासको
तोटामें अर्थात् एक बगीचेमें स्थान प्रदान करना और
सभीके प्रसाद सेवन करनेके बाद संध्याके समय
मन्दिरमें चार मण्डलियाँ बनाकर कीर्तन।

बारहवाँ अध्याय— 465-494
श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि भक्तोंका महाप्रभुके पास
प्रतापरुद्रकी आर्त्तिका ज्ञापन करना और राजाको
सान्त्वना देने हेतु महाप्रभुके द्वारा व्यवहार किये गये
एक बहिर्वासका खण्ड प्रदान करना, बादमें श्रीरामानन्दके
आग्रहसे निकट आये राजकुमारको ‘कृष्ण’ जानकर
महाप्रभुका उसे आलिङ्गन दान, उस प्रेमाविष्ट पुत्रके
स्पर्शसे राजाको महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति और प्रेम
उदय, गुण्डिचा-मन्दिर मार्जन और धुलाई, एक गौड़ीय

। v

भक्तके द्वारा महाप्रभुके चरणोदकका पान, श्रीअद्वैताचार्यके
पुत्र गोपालकी नृत्य करते हुये मूर्च्छा और महाप्रभुकी
कृपासे पुनः चेतनताकी प्राप्ति, सभीके द्वारा स्नान और
उसके बाद प्रसादका सम्मान, श्रीनित्यानन्द और अद्वैतप्रभुकी
प्रेम-कलहलीला और सभीके द्वारा श्रीजगन्नाथके
नव-यौवनका दर्शन।
तेरहवाँ अध्याय— 497-527
श्रीजगन्नाथकी पाण्डुविजयका दर्शन, राजाके द्वारा
मार्गकी झाडू लगाकर सफाई करना, रथके आगे सात
मण्डलियोंमें महाप्रभुका नृत्य और बलगण्डि उपवनमें
विश्राम।
चौदहवाँ अध्याय— 529-562
विश्रामकालमें प्रतापरुद्रका वैष्णववेशमें एकान्तमें
महाप्रभुके चरण दबाना, उनके मुखसे कालोचित श्लोकका
पाठ सुनकर प्रेममें आविष्ट महाप्रभुका उनको आलिङ्गनका
दान, सभीके द्वारा बलगण्डिमें भोगके प्रसादका सम्मान,
महाप्रभुके द्वारा रथका सञ्चालन, इन्द्रद्युम्न सरोवरमें
भक्तोंके साथ जलक्रीड़ा, हेरा पञ्चमी-यात्राका दर्शन,
स्वरूप दामोदरका महाप्रभु और श्रीवाससे वैकुण्ठ धाम
एवं लक्ष्मीके ऐश्वर्यके साथ ब्रजधाम और श्रीराधाके
ऐश्वर्य, माधुर्य तथा प्रेमके तारतम्यको बतलाना;
कुलीन-ग्रामके भक्तोंको महाप्रभुके द्वारा प्रत्येक वर्ष
श्रीजगन्नाथके लिये मजबूत रेशमी डोरी लानेका आदेश।
vi ।

॥श्री श्रीचैतन्यचरितामृत ॥
मध्यलीला प्रथम भाग
अध्याय 1-14

पहला अध्याय
कथासार—इस अध्यायमें महाप्रभुकी सम्पूर्ण मध्यलीला
और शेषलीलाके प्रथम छह वर्षोंकी लीलाका सूत्ररूपमें
वर्णन हुआ है। “यः कौमारहरः” श्लोकका पाठ करते
हुए महाप्रभुने जिस भावका प्रकाश किया था, उसी
भावको श्रीरूप गोस्वामीने “सोऽयं कृष्णः” श्लोक रचकर
स्पष्ट किया था। श्रीरूप गोस्वामीके इस श्लोकको
पढ़कर महाप्रभुने उनके ऊपर विशेष कृपा की थी। इस
अध्यायमें श्रीरूप, श्रीसनातन और श्रीजीव गोस्वामीके
द्वारा विरचित सभी ग्रन्थोंका उल्लेख किया गया है।
महाप्रभुने रामकेलि ग्राममें श्रीरूप और श्रीसनातन
गोस्वामीपर कृपा की थी, इसका वर्णन भी इस
अध्यायमें हुआ है।
—(अमृतप्रवाह भाष्य)
श्रीगौर-निताइको प्रणाम :-
वन्दे श्रीकृष्णचैतन्य-नित्यानन्दौ सहोदितौ।
गौड़ोदये पुष्पवन्तौ चित्रौ शन्दौ तमोनुदौ॥२॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥२॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मैं श्रीकृष्णचैतन्य और
श्रीनित्यानन्दकी वन्दना करता हूँ, जो सबका मङ्गल
करनेके लिये तथा अज्ञानरूपी अन्धकारको दूर करनेके
लिये गौड़देशरूपी क्षितिजपर एक साथ चन्द्र एवं सूर्यके
समान आश्चर्यजनक रूपसे उदित हुए हैं॥२॥
सम्बन्धाधिदेवताको प्रणाम :-
जयतां सुरतौ पङ्गोर्मम मन्दमतेर्गती।
मत्सर्वस्वपदाम्भोजौ राधामदनमोहनौ॥३॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥३॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मैं पङ्गु और मन्दमति हूँ; जो
मेरी एकमात्र गति हैं और जिनके चरणकमल ही मेरा
समस्त धन हैं, वे परम कृपालु श्रीश्रीराधा-मदनमोहन
जययुक्त हों॥३॥
अभिधेयाधिदेवताको प्रणाम :-
दीव्यद् वृन्दावनकल्पद्रुमाधः
श्रीमद्रत्नागारसिंहासनस्थौ।
श्रीश्रीराधाश्रीलगोविन्ददेवौ
प्रेष्ठालीभिः सेव्यमानौ स्मरामि॥४॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥४॥
अमृतप्रवाह भाष्य—ज्योतिर्मय-शोभायुक्त वृन्दावनके
कल्पवृक्षके नीचे रत्नमन्दिरमें स्थित सिंहासनके ऊपर
विराजमान श्रीश्रीराधागोविन्दकी प्रियसखियाँ उनकी सेवा
कर रही हैं; मैं उनका स्मरण करता हूँ॥४॥
श्रीगौरकृपासे अज्ञानीको भी सर्वज्ञताकी प्राप्ति :-
यस्य प्रसादादज्ञोऽपि सद्यः सर्वज्ञतां व्रजेत्।
स श्रीचैतन्यदेवो मे भगवान् संप्रसीदतु॥१॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥१॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अज्ञानीजन भी जिनकी कृपासे
तत्क्षणात् सर्वज्ञता लाभ करते हैं, वे भगवान् श्रीचैतन्यदेव
मेरे प्रति प्रसन्न हों॥१॥
अनुभाष्य—
यस्य (श्रीचैतन्यदेवस्य) प्रसादात् (अनुकम्पया) अज्ञः
(अनभिज्ञः) अपि सद्यः सर्वज्ञतां व्रजेत् (सर्वेषु विषयेषु
पारङ्गतो विज्ञो भवति), स भगवान् श्रीचैतन्यदेवः मे (मयि)
संप्रसीदतु (सम्यक् प्रसन्नो भवतु)।
श्लोक-भावानुवाद—जिनकी कृपासे अनभिज्ञ व्यक्ति
भी तुरन्त सभी विषयोंमें पारङ्गत हो जाते हैं, वे
भगवान् श्रीचैतन्यदेव मेरे प्रति सम्पूर्ण रूपसे प्रसन्न
हों॥१॥

[ 1/5-14 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
प्रयोजनाधिदेवताको प्रणाम :-
श्रीमान्रासरसारम्भी वंशीवटतटस्थितः ।
कर्षन् वेणुस्वनैर्गोपीर्गोपीनाथः श्रियेऽस्तु नः ॥ ५ ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ५ ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-रासरसके प्रवर्तक वंशीवटके
तटपर स्थित होकर श्रीमद्गोपीनाथ वेणुध्वनिके द्वारा
गोपियोंको आकर्षित कर रहे हैं; वे हमारे मङ्गलका
विधान करें ॥ ५ ॥
जय जय गौरचन्द्र जय कृपासिन्धु।
जय जय शचीसुत जय दीनबन्धु ॥ ६ ॥
अनुवाद-कृपासिन्धु श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, जय
हो। दीन-पतितोंके एकमात्र बन्धु शचीनन्दन सदा
जययुक्त होंवे ॥ ६ ॥
जय जय नित्यानन्द जयाद्वैतचन्द्र।
जय जय श्रीवासादि गौरभक्तवृन्द ॥ ७ ॥
अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैतचन्द्र प्रभु
की जय हो, जय हो, श्रीवासादि गौरभक्तोंकी जय
हो ॥ ७ ॥
पहले आदिलीलामें सूत्रके साथ ही
मूल घटनाएँ वर्णित हुईं :-
पूर्वे कहिलुँ आदिलीलार सूत्रगण।
याहा विस्तारियाछेन दास-वृन्दावन ॥ ८ ॥
अतएव तार आमि सूत्र-मात्र कैलुँ।
ये किछु विशेष, सूत्रमध्येइ कहिलुँ ॥ ९ ॥
अनुवाद-मैंने पहले सूत्ररूपमें आदिलीलामें उन
लीलाओंका वर्णन किया जिनका श्रीवृन्दावनदासने विस्तारसे
वर्णन किया है। इसलिये मैंने उन लीलाओंका सूत्ररूपमें
ही वर्णन किया और उनमें भी जो कुछ विशेष लीलाएँ
थीं, उन्हें भी उन सूत्रोंके बीचमें ही कहा ॥ ८-९ ॥
अब शेषलीलाका मुख्यसूत्र-वर्णनारम्भ :-
एबे कहि शेषलीलार मुख्य सूत्रगण।
प्रभुर अशेष लीला ना याय वर्णन ॥ १० ॥
अनुवाद-यद्यपि महाप्रभुकी असीम लीलाओंका
वर्णन सम्भव नहीं है, तथापि अब उनकी मुख्य
शेषलीलाओंका सूत्र रूपमें वर्णन करूँगा ॥ १० ॥
श्रीचैतन्यभागवतमें विस्तारसे वर्णित घटनाओंको सूत्ररूपमें
और उसमें संक्षेपमें वर्णित मुख्य-मुख्य घटनाओंका
सविस्तार वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा :-
तार मध्ये येइ भाग दास-वृन्दावन।
'चैतन्यमङ्गले' विस्तारि' करिला वर्णन ॥ ११ ॥
सेइ भागेर इहाँ सूत्रमात्र लिखिब।
ताहाँ ये विशेष किछु, इहाँ विस्तारिब ॥ १२ ॥
अनुवाद-जिन लीलाओंका श्रीवृन्दावनदासने
'चैतन्यमङ्गल'में विस्तारसे वर्णन किया है, उनको यहाँ
सूत्र रूपमें ही लिखूँगा और उसमें जो कुछ विशेष
लीलाएँ हैं, उन्हें विस्तारपूर्वक कहूँगा ॥ ११-१२ ॥
अनुभाष्य-ऐसा जाना जाता है कि चैतन्यचरितामृतके
रचनाकाल तक श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके द्वारा रचित
श्रीचैतन्यभागवतका नाम 'चैतन्यमङ्गल' था। जयानन्दके
'चैतन्यमङ्गल' नामसे जो अति आधुनिक
भक्तिसिद्धान्त-विरोधी ग्रन्थका उल्लेख किया जाता है,
वह एक नकली ग्रन्थ है। प्राचीनकालके किसी भी
ग्रन्थमें उसका या उसके रचियता जयानन्दका कोई
उल्लेख नहीं मिलता है। इससे यह सहज ही जाना
जाता है कि 'जयानन्द' एक कृत्रिम नाम है ॥ ११-१२ ॥
वृन्दावनदास ठाकुरकी वन्दना :-
चैतन्यलीलार व्यास-दास वृन्दावन।
ताँर आज्ञाय करौं ताँर उच्छिष्ट चर्वण ॥ १३ ॥
भक्ति करि' शिरे धरि ताँहार चरण।
शेषलीलार सूत्र एबे करिये वर्णन ॥ १४ ॥
4 ।

पहला अध्याय 1/13-23 ]
अनुवाद—श्रीव्यासदेवके अवतार श्रीवृन्दावनदास ही
चैतन्यलीलाके अधिकारी रचियता हैं, मैं तो उनकी
आज्ञासे उनके उच्छिष्टको चबानेकी चेष्टा कर रहा हूँ।
भक्ति-भावसे उनके चरणोंको अपने शीशपर रखकर
अब मैं शेषलीलाका सूत्ररूपमें वर्णन कर रहा हूँ॥ 13-14 ॥
अनुभाष्य—'चैतन्यलीलाके व्यास'—भगवान्के अवतारों
और श्रीकृष्णकी लीलाओंके लेखक श्रीकृष्णद्वैपायन
व्यासदेव हैं। श्रीचैतन्यलीलाके लेखक श्रीवृन्दावनदास
ठाकुर श्रीव्यास-स्वरूप अर्थात् उनके ही अवतार हैं।
श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने जिन श्रीचैतन्य-लीलाओंका वर्णन
नहीं किया है, उन्हीं बची हुई लीलाओंको उनके
आनुगत्यमें ही उनके दास और पाल्य श्रीकृष्णदास
लिख रहे हैं॥ 13॥
शेषलीलाका सूत्र-वर्णन आरम्भ; प्रथम चौबीस
वर्ष गृहस्थ-अभिनयसे आदिलीला :-
चब्बिंश वत्सर प्रभुर गृहे अवस्थान।
ताहाँ ये करिला लीला—'आदि-लीला' नाम ॥ 15 ॥
अनुवाद—प्रथम चौबीस वर्ष महाप्रभु गृहमें रहे और
उन्होंने वहाँ जो-जो लीलाएँ कीं, वे 'आदिलीला'के
नामसे कही जाती हैं॥ 15 ॥
शेष चौबीस वर्षोंकी संन्यासीके अभिनयसे 'शेषलीला' :-
चब्बिंश वत्सर शेष येइ माघमास।
तार शुक्लपक्षे प्रभु करिला संन्यास ॥ 16 ॥
संन्यास करिया चब्बिंश वत्सर अवस्थान।
ताहाँ येइ लीला, तार 'शेषलीला' नाम ॥ 17 ॥
अनुवाद—चौबीसवें वर्षके अन्तमें माघमासके शुक्लपक्षमें
महाप्रभुने संन्यास ग्रहण किया। संन्यास ग्रहण करनेके
पश्चात् महाप्रभुने चौबीस वर्षों तक इस जगत्में रहकर
जो लीलाएँ कीं, उन्हें 'शेषलीला' कहा जाता है॥ 16-17॥
मध्य और अन्त्य-भेदसे शेषलीला :-
शेषलीलार 'मध्य' 'अन्त्य',—दुइ नाम हय।
लीलाभेदे वैष्णव सब नाम-भेद कय ॥ 18 ॥
अनुवाद—शेषलीलाके 'मध्य' और 'अन्त्य'—ये दो
नाम हैं। लीलाके भेदानुसार सब वैष्णव इनका इन दो
नामोंसे उल्लेख करते हैं॥ 18 ॥
शेष चौबीस वर्षोंके प्रथम छह वर्ष समस्त
भारतमें प्रचाररूप मध्यलीला :-
तार मध्ये छय वत्सर—गमनागमन।
नीलाचल-गौड़-सेतुबन्ध-वृन्दावन ॥ 19 ॥
अन्तिम अठारह वर्षोंकी आस्वादनरूप अन्त्यलीला :-
ताहाँ येइ लीला, तार 'मध्यलीला' नाम।
तार पाछे लीला—'अन्त्यलीला' अभिधान ॥ 20 ॥
'आदिलीला', 'मध्यलीला', 'अन्त्यलीला' आर।
एबे 'मध्यलीला' किछु करिये विस्तार ॥ 21 ॥
अनुवाद—(संन्यासके पश्चात्) पहले छह वर्ष
महाप्रभुने यात्रामें बिताये। उन्होंने पुरीसे बङ्गाल और
कन्याकुमारीसे वृन्दावन तक लगभग सम्पूर्ण भारतकी
यात्रा की। इन छह वर्षोंमें उन्होंने जो लीलाएँ कीं,
उनका नाम 'मध्यलीला' है और अन्तिम अठारह
वर्षकी लीलाओंको 'अन्त्यलीला' कहा जाता है।
महाप्रभुकी लीलाएँ समयके भेदसे 'आदि', 'मध्य' और
'अन्त्य' लीला कही जाती हैं। अब मैं मध्यलीलाको
कुछ विस्तारसे कहूँगा॥ 19-21 ॥
बाकी अठारह वर्षोंमें पहले छह वर्ष
भक्तसङ्गमें वास और पुरीमें आचार्यत्व :-
अष्टादशवर्ष केवल नीलाचले स्थिति।
आपनि आचरि' जीवे शिखाइला भक्ति ॥ 22 ॥
तार मध्ये छय वत्सर भक्तगण-सङ्गे।
प्रेमभक्ति प्रवर्त्ताइला नृत्यगीतरङ्गे ॥ 23 ॥
अनुवाद—महाप्रभु अन्तिम अठारह वर्ष केवल
नीलाचल (श्रीजगन्नाथपुरी) में रहे और अपने आचरणसे
उन्होंने जीवोंको भक्तिकी शिक्षा दी। इसमें छह वर्षोंतक
अपने भक्तोंके सङ्ग महाप्रभुने नृत्य और गीतके
माध्यमसे प्रेमाभक्तिकी शिक्षा दी॥ 22-23 ॥
। 5

[ 1/24-32 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
प्रचारकवर्ग—(1) गौड़मण्डलमें निजगणोंके
साथ श्रीनित्यानन्द प्रभुका प्रचार :—
नित्यानन्द-गोसाञिरे पाठाइल गौड़देशे।
तेंहो गौड़देश भासाइल प्रेमरसे ॥ 24 ॥
कृष्णप्रेमकी बाढ़में गौड़देशका डूबना :—
सहजेइ नित्यानन्द—कृष्णप्रेमोद्दाम।
प्रभु-आज्ञाय कैल याहाँ ताहाँ प्रेमदान ॥ 25 ॥
श्रीनित्यानन्द-वन्दना और गुण-वर्णन :—
ताँहार चरणे मोर कोटि नमस्कार।
चैतन्येर प्रिय येहाँ लओयाइल संसार ॥ 26 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको नीलाचलसे
गौड़देश (बङ्गाल) कृपा वितरणके लिये भेजा। श्रीनित्यानन्द
प्रभुने पूरे गौड़देशको श्रीकृष्णप्रेममें डुबो दिया। श्रीनित्यानन्द
प्रभुमें स्वाभाविक रूपसे कृष्णप्रेम विराजमान है और
महाप्रभुकी आज्ञासे उन्होंने उसे जहाँ-तहाँ-सर्वत्र ही
दान किया। उनके श्रीचरणोंमें मेरा करोड़ों बार नमस्कार
है, उन्होंने श्रीचैतन्य महाप्रभुकी भक्तिको लाकर सम्पूर्ण
जगत्में वितरित किया है॥ 24-26 ॥
श्रीगौराङ्गके 'गौरवके भाई' और स्वयं प्रभु
होनेपर भी श्रीनिताइका गौर-दासाभिमान :—
चैतन्य-गोसाञि याँरे बोले 'बड़ भाई'।
तेंहो कहे, मोर प्रभु—चैतन्य-गोसाञि ॥ 27 ॥
यद्यपि आपनि हुये प्रभु बलराम।
तथापि चैतन्येर करे दास-अभिमान ॥ 28 ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभु उन्हें अपना बड़ा भाई
कहते हैं, परन्तु वे चैतन्य महाप्रभुको अपना स्वामी
कहते हैं। यद्यपि श्रीनित्यानन्द प्रभु स्वयं बलराम हैं,
तथापि सदा वे अपनेमें महाप्रभुका दास होनेका
अभिमान रखते हैं॥ 27-28 ॥
अचित्की सेवा और भोग छोड़कर नित्य चिद्-ईश्वरकी
सेवासे ही जीवको नित्य-आनन्दकी प्राप्ति :—
'चैतन्य' सेव, 'चैतन्य' गाओ, लओ 'चैतन्य'-नाम।
'चैतन्य' ये भक्ति करे, सेइ मोर प्राण ॥ 29 ॥
महापापी तक सभीको ही विभु चित्की
सेवामें नियुक्त करना और उनका उद्धार :—
एइ मत लोके चैतन्य-भक्ति लओयाइल।
दीन-हीन, निन्दक, सबारे निस्तारिल ॥ 30 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु सभीसे यही भिक्षा
करते हैं कि 'श्रीचैतन्य-महाप्रभु' की सेवा करो,
'श्रीचैतन्य-महाप्रभु' की लीलाओंका गान करो और
'श्रीचैतन्य-महाप्रभु'के नामका जप करो। जो ऐसी
'श्रीचैतन्य-महाप्रभु'की भक्ति करता है, उसे श्रीनित्यानन्द
प्रभु अपने प्राणोंके समान प्रिय मानते हैं। इस प्रकार
श्रीनित्यानन्द प्रभुने संसारमें श्रीचैतन्य-भक्तिका मुक्त-हस्तसे
वितरण करके सभी दीन-हीन (भक्तिहीन) और निन्दक
व्यक्तियोंका भी उद्धार किया॥ 29-30 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 6/50-51 संख्या देखें॥ 27-30 ॥
(2) माथुरमण्डलमें श्रीरूप-सनातनके द्वारा प्रचार :—
तबे प्रभु व्रजे पाठाइल रूप-सनातन।
प्रभु-आज्ञाय दुइ भाइ आइला वृन्दावन ॥ 31 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीरूप और श्रीसनातन
गोस्वामीको व्रजमें भेजा। महाप्रभुकी आज्ञासे दोनों भाई
उनकी मनोभीष्ट सेवाके लिये वृन्दावनमें आकर वास
करने लगे॥ 31 ॥
(क) शुद्धभक्ति प्रचार, (ख) लुप्ततीर्थ उद्धार,
(ग) मठादि-स्थापनके द्वारा श्रीमूर्त्तिसेवा प्रचार :—
भक्ति प्रचारिये सर्वतीर्थ प्रकाशिल।
मदनगोपाल-गोविन्देर सेवा प्रचारिल ॥ 32 ॥
अनुवाद—उन्होंने व्रजमें श्रीकृष्ण-भक्तिका प्रचार
किया, व्रजमें लुप्त श्रीकृष्ण लीला-स्थलियाँका जगत्में
प्रकाश किया। श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीमदनगोपाल और
श्रीरूप गोस्वामीने श्रीगोविन्ददेवजीके विग्रहोंको प्रकट
करके उनकी सेवा परिपाटीको जगत्में स्थापित किया॥ 32 ॥
अनुभाष्य—अप्राकृत सेवामें रत और संसारसे
विरक्त शुद्ध श्रीकृष्णभक्त ही भक्तिका प्रचार कर सकते
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पहला अध्याय 1/32-36 ]
हैं तथा उनके द्वारा ही तीर्थके स्वरूपका प्रकाश होता
है। कृत्रिम भक्तवेशधारी बाउलिया तो स्वयं ही चरित्रहीन
होते हैं और वे केवल अपनी इन्द्रियोंके भोगोंके लिये
भक्तिके प्रचार कार्य और मन्दिरोंके निर्माणमें प्रवृत्त होते
हैं, इसलिये उनके इन कार्योंसे वैकुण्ठ तीर्थ प्रकाशित
नहीं होते। वह तो केवल मायाकी क्रीड़ामात्र है॥ 32 ॥
(घ) सात्वतशास्त्र-प्रचार, (ङ) अधम-तारण :-
नाना शास्त्र आनि' कैला भक्तिग्रन्थ सार।
मूढ़ अधमजनेरे तैं हो करिला निस्तार ॥ 33 ॥
सर्वशास्त्र-मीमांसा और अप्राकृत व्रज-रागभक्ति-प्रचार :-
प्रभु-आज्ञाय कैल सब शास्त्रेर विचार।
व्रजेर निगूढ़ भक्ति करिल प्रचार ॥ 34 ॥
अनुवाद-वे अनेक शास्त्रोंको व्रजमें लेकर आये
और उनके सारको अपने व्रजकी प्रेमाभक्तिके प्रतिपादक
ग्रन्थोंमें प्रकाश किया। इस प्रकार उन्होंने अज्ञानी और
पतित जीवोंका उद्धार किया। महाप्रभुकी आज्ञासे
उन्होंने समस्त शास्त्रोंका विचार करके सर्वश्रेष्ठ और
परम रहस्यमयी व्रजकी मधुर रसमयी भक्तिका प्रचार
किया ॥ 34-35 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'निगूढ़भक्ति'—पाठान्तरमें निगूढ़
रस ॥ 34 ॥
अनुभाष्य-प्राकृत सहजिया लोग शास्त्रविचारका
त्याग करके कृत्रिम आँसू बहाकर भगवान्‌के लिये
रोनेका नाटक करते हैं, जिस कारण सत्यस्वरूप
(प्रेममयी) भगवत्सेवा उनके अश्रुओंमें बह जाती है।
अर्थात् वे सेवाका त्याग करके केवल कृत्रिम भावोंके
प्रदर्शनके द्वारा भक्त होनेका अभिनय करते हैं। इस
प्रकार वे महाप्रभुकी आज्ञाका उल्लङ्घन करते हैं।
शास्त्रके सिद्धान्तोंको भली-भाँति समझनेवाले भक्तोंके
द्वारा ही निगूढ़ व्रजसेवा प्रचारित होती है, अन्यथा
इन्द्रिय-भोगके विचार आकर भक्तिसिद्धान्तोंको उलट
देते हैं॥ 34 ॥
श्रीसनातन गोस्वामीके चार ग्रन्थ :-
हरिभक्तिविलास, आर भागवतामृत।
दशम-टिप्पनी, आर दशम-चरित ॥ 35 ॥
एइ सब ग्रन्थ कैल गोसाञि सनातन।
रूपगोसाञि कैल यत, के करु गणन ॥ 36 ॥
अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीहरिभक्तिविलास,
बृहद्भागवतामृत, दशम-टिप्पनी और दशम-चरित आदि
ग्रन्थोंकी रचना की। श्रीरूप गोस्वामीने जितने ग्रन्थोंकी
रचना की, कौन उसकी गणना कर सकता है? ॥ 35-36 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - 'भागवतामृत' अर्थात्
बृहद्भागवतामृत। 'दशम-टिप्पनी' अर्थात् दशम स्कन्धकी
'बृहद्-वैष्णवतोषणी' नामक टीका। 'दशम-चरित' अर्थात्
दशम स्कन्धमें वर्णित श्रीकृष्णलीला-चरित
(श्रीलीलास्तव) ॥ 34-36 ॥
अनुभाष्य- 'हरिभक्तिविलास'-श्रील सनातन गोस्वामी
प्रभुके द्वारा रचित तथा श्रील गोपालभट्ट गोस्वामी प्रभुके
द्वारा सङ्कलित वैष्णव-स्मृतिग्रन्थ है, इसमें कुल बीस
विलास हैं। पहले विलासमें-गुरु, शिष्य और मन्त्र;
दूसरे विलासमें-दीक्षा; तीसरे विलासमें-सदाचार, स्मरण
और शुचि (स्नान और सन्ध्या); चौथे विलासमें-संस्कार,
तिलक, मुद्रा, माला और गुरुपूजा; पाँचवें विलासमें-आसन,
प्राणायाम, न्यास, शालग्रामादि श्रीमूर्त्ति; छठे
विलासमें-श्रीमूर्त्तिका आह्वान, स्नान कराना और आनुषङ्गिक
आवश्यक कृत्य; सातवें विलासमें-श्रीविष्णुपूजा योग्य
पुष्पोंका विवरण; आठवें विलासमें-श्रीमूर्तिके सम्मुख
धूप, दीप, नैवेद्य, नृत्य, वाद्य, आरती, स्तुति, नमस्कार
और अपराधोंके लिये क्षमा-प्रार्थना; नवें विलासमें-तुलसी,
वैष्णव-श्राद्ध और नैवेद्य; दसवें विलासमें-भगवद्भक्त
अथवा वैष्णव अथवा साधु; ग्यारहवें विलासमें-श्रीमूर्त्तिका
अर्चन, श्रीहरिनाम, श्रीनामका जप और कीर्तन, नामापराध
और उनका मोचन, भक्तिका माहात्म्य और शरणागति;
बारहवें विलासमें-एकादशी-विधि; तेरहवें विलासमें-उपवास,
महाद्वादशी-व्रत; चौदहवें विलासमें-विभिन्न मासोंमें किये
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