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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

शब्दकोश नैमित्तिक-प्राकृत ] नैमित्तिक-निमित्तसे उत्पन्न नैरन्तर्य-निरन्तर होनेका भाव नैर्घृण्य-निर्ममता, क्रूरता प पक्षान्तर-दूसरी ओर पन्था-पथ परिज्ञात-अच्छे प्रकारसे ज्ञात परनिष्ठित-दूसरेमें निष्ठावाला परदार-दूसरेकी स्त्री परवर्ती-बादमें पराक्रान्त-शक्तिशाली परिग्रह-ग्रहण पराभक्ति-श्रेष्ठा, शुद्धा भक्ति पराभूत-पराजित परिचर्या-सेवा परिचालक-चलानेवाला परिदृष्ट-दृष्ट परिनिष्ठित-पूर्णतया निपुण परिमित-सीमित परिलक्षित-अच्छी तरह देखाभाला हुआ परिव्राजक-संन्यासी परिवेष्टित-घिरा हुआ पर्यन्त-तक पर्यवसित-समाप्त पाण्डित्य-विद्वता पारत्रिक-परलोक-सम्बन्धी पारलौकिक-परलोक-सम्बन्धी पार्षद-परिकर पाषण्डी-पाखण्डी पूर्वपक्ष-संशयके सम्बन्धमें उठाया गया प्रश्न पूर्वराग-मिलनसे पहलेका राग प्रकरण-निर्माण, प्रसङ्ग प्रकृत-यथार्थ प्रकृष्ट-उत्तम प्रक्षिप्त-बादमें जोड़ा या घुसाया हुआ प्रच्छन्न-ढका हुआ प्रजल्प-इधर-उधरकी बात प्रज्ञा-बुद्धि प्रणयन-रचना, निर्माण प्रणत-शरणागत प्रणतपाल-शरणागतकी रक्षा करनेवाले प्रणति-प्रणाम, शरणागति प्रताड़ित-सताया गया प्रतिपादित-प्रमाणित प्रतिपाद्य-जिसे प्रमाणित किया जाय प्रतिभात-प्रभायुक्त, ज्ञात प्रतीयमान-जान पड़ता हुआ, जिसकी प्रतीति हो रही हो प्रत्यगात्मा-जीवात्मा प्रत्यवाय-दोष प्रत्याहार-निरोध, रोकना प्रत्युपकार-भलाईके बदलेमें की हुई भलाई प्रदत्त-दिया हुआ प्रधान-मायाकी एक वृत्ति प्रधानतः-मुख्यरूपसे प्रपत्ति-शरणागति प्रभूत-अत्यधिक प्रभृति-जैसा प्रयोजनीयता-आवश्यकता प्रयोजक-प्रयुक्त करनेवाला प्रयोजकत्व-प्रयोजक होनेका भाव प्रवर-श्रेष्ठ प्रवर्त्तक-किसी काममें लगानेवाला, आरम्भ करनेवाला प्रवृत्ति-मनका किसी विषयकी ओर झुकाव, प्रभाव प्रशस्त-प्रशंसाके योग्य प्रशान्तात्मा-शुद्ध या शान्त आत्मा प्रशामक-शान्त करनेवाला प्राकृत-प्रकृति-सम्बन्धी । 587

[ प्राक्तन–विक्षिप्त श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

प्राक्तन–प्राचीन प्रादुर्भूत–आविर्भूत, अवतरित प्रादेशिक वाक्य–प्रसङ्गत, स्थानीय वाक्य प्रापक–प्राप्त करने या करानेवाला प्रापञ्चिक–जगत् या प्रपञ्च–सम्बन्धी प्राप्य–प्राप्त होने योग्य प्रार्थित–प्रार्थना किया हुआ प्रेमास्पद–प्रेमका स्थल प्रेमोत्कर्ष–प्रेमका उत्कर्ष

ब बाहुल्य–अधिकता बाह्य अङ्ग–बाहरी अङ्ग बिद्ध–छेदा हुआ, आहत बृहत्–बड़ा बोधगम्य–समझमें आने योग्य ब्रह्मलय–ब्रह्ममें लय होना ब्रह्मवेत्ता–ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्मानन्द–ब्रह्मका आनन्द ब्रह्मानुभूति–ब्रह्मकी अनुभूति

भ भक्तानन्दायिनी–भक्तोंको आनन्द देनेवाली भोक्तृत्वभाव–भोक्ता होनेका भाव

म मत्सम्बन्धी–मेरे सम्बन्धी मत्सरता–डाह, जलन, द्वेष मथन–मथनेका भाव मधुरिमा–माधुर्य मन्वन्तर–ब्रह्माजीके दिनका चौदहवाँ भाग मन्तव्य–विचार, मत ममार्थ–सार महत्–बड़ा मायाच्छन्न–मायाके द्वारा आच्छन्न मुकुलित–आधा विकसित मुमुक्षु–मुक्तिकी इच्छा करनेवाला


मेधायुक्त–मेधावी मोहान्ध–मोहसे अन्धा म्लेच्छ–चारो वर्णोंसे भी नीच

य यतिगण–संन्यासी लोग याग–यज्ञ यादृच्छिक–स्वतन्त्र, ऐच्छिक युक्तियुक्त–उचित, युक्तिपूर्ण युगपत्–एक ही समयमें, साथ-साथ युगावतार–प्रत्येक युगमें लेनेवाले अवतार योगमाया–भगवान्की परा शक्ति योगस्थैर्य–योगकी स्थिरता

र रक्तिम–लालिमायुक्त रञ्जित–रंगा हुआ रूक्ष–रूखा, नीरस

ल लिङ्गशरीर–सूक्ष्म शरीर लिप्सा–किसी वस्तुको पानेकी इच्छा लुब्ध–ललचाया हुआ, लोभित लोकपाल–लोकका पालन करनेवाला लोकप्रवर्त्तन–लोगोंके कल्याणके लिये

व वञ्चक–वञ्चना करनेवाला वयस–उम्र वर्चस्व–अधिकार वर्णविशिष्ट–वर्णवाला वर्णसङ्कर–भिन्न जातियोंके स्त्री-पुरुषसे उत्पन्न वाक्–वाणी, बोलनेकी इन्द्रिय वाचाल–अधिक बोलनेवाला वागिन्द्रिय–जिह्वा विक्षिप्त–पागल, उद्विग्न

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शब्दकोश विगुण-सारगर्भित ] विगुण—गुणहीन विच्युति—भूल, पतन, वियोग विजितात्मा—जिसने मनको जीत लिया है विज्ञ—पण्डित, जाननेवाला विदित—मालूम विधर्म—धर्मविरुद्ध विधिवादिगण—नैतिक लोग विधेय—करने योग्य विधेयात्मा—जिसकी आत्मा संयत हो विन्यास—व्यवस्थित करना विपर्यय—प्रतिकूलता, विपरीतता विभूति—ऐश्वर्य विरहकातर—विरहसे कातर विरोधाभास—विचारमें विरोध प्रतीत होना विलास—क्रीड़ा विवक्षित—इच्छित, कथित विवृत—स्पष्ट, व्यक्त विशारद—निपुण विशिष्ट—विशेषतायुक्त विशिष्टता—विशेषता विशुद्धचित्त—जिसका चित्त शुद्ध है विशेषत्त्व—विशेषता विषयणी—विषयसे सम्बन्धित विहित—आदेश किया हुआ वृष्टि—वर्षा वेदज्ञ—वेदोंके जाननेवाला वैषम्य—विषमता व्यङ्गोक्ति—गूढ़भाषा, वह भाषा जिसमें व्यङ्ग हो व्यतिक्रम—उल्लङ्घन व्यतिरेक—असङ्गति, निषेध व्यवहृत—व्यवहार किया हुआ व्योम—आकाश श शोच्य—शोचनीय शैव—शिवके उपासक श्रुत—सुना हुआ श्रोतव्य—सुनने योग्य श्लेषोक्ति—छिपे अर्थवाली बात ष षडैश्वर्यपूर्ण—छः ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण स सङ्कीर्णता—उदार ना होनेका भाव संवरण—छिपाना संवेदन—अनुभूति संस्पर्श—अच्छी तरहसे होनेवाला स्पर्श संहर्त्ता—संहार करनेवाला सङ्गति—मेल सञ्चित—जमा किया हुआ सदातन—विष्णु सद्विवेकी—सद् विवेकवाला समत्वभाव—समताका भाव सन्निविष्ट—उत्तम रूपसे एकाग्र समाहर—समुच्चय, समूह समाहित—संयमित, व्यवस्थित सम्बन्धविशिष्ट—सम्बन्धवाला सम्मत—सहमत, एक मत समन्वित—संयुक्त, स्वाभाविक रूपसे क्रमबद्ध सम्यक्—भलीभाँति, अच्छी तरह सर्वतन्त्र—समस्त सिद्धान्त सर्वतोभावेन—सम्पूर्ण रूपसे सर्वभूतात्मा—सभी जीवोंके आत्मा अर्थात् परमात्मा सर्वभुक्—सब कुछ खा जानेवाला सर्वात्मकत्व—सर्वात्मकता सहस्र—हजार साम—सामवेद सामर्थ्यविशिष्ट—सामर्थ्यवान् साम्यलक्षण—समानताका लक्षण सारगर्भित—तत्त्वपूर्ण । 589

[ सालोक्य-हृदगत श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत सालोक्य मुक्ति—जीवका भगवान्के साथ एक ही लोकमें वास करना साष्टाङ्ग प्रणाम—आठ अङ्गोंसे प्रणाम (सिर, हाथ, पैर, आँख, जंघा, हृदय, वचन और मन) सुखान्वेषी—सुखकी खोज करनेवाला सुदुराचारी—अति दुराचारी सुधा—अमृत सुरस—रसयुक्त सुष्ठु—भली भाँति, अच्छी तरह सुस्पष्ट—विशेषरूपसे स्पष्ट सौम्य—सुन्दर, कोमल स्खलित—गिरा हुआ स्निग्ध—स्नेहयुक्त, प्रियता स्नेहाधिक्य—स्नेहकी अधिकता स्फूर्ति—स्फुरण, व्यक्त होना स्पृहा—इच्छा, आकाङ्क्षा स्फुरण—व्यक्त होना स्फुलिङ्ग—चिङ्गारी स्मार्त्त—स्मृति शास्त्रका अनुयायी स्थायित्व—स्थिरता स्रुवा—घीमें आहुति डालनेकी करछी स्वच्छन्द—स्वतन्त्र स्वधर्मस्थ—अपने धर्ममें स्थित स्वयंभू—स्वयं उत्पन्न स्वानन्दपूर्ण—अपने आनन्दमें पूर्ण ह हत—मरा हुआ हतभागा—भाग्यहीन हन्त—मारना हिरण्यगर्भ—ब्रह्मा हेयता—तुच्छता हृदगत—हृदय-सम्बन्धी 590 ।

॥ श्रीश्रीगुरुगौराङ्गौ जयतः ॥ गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन चौथी पीढ़ीके महापुरुष श्रीरूपानुग अप्राकृत-कविकुलश्रेष्ठ- ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद् कृष्णदास-कविराज-गोस्वामी-रचित श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला [द्वितीय भाग (अध्याय 15-25)] गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन आठवीं पीढ़ीके पुरुषप्रधान श्रीरूपानुगवर- ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद् सच्चिदानन्द-भक्तिविनोद-ठाकुर-रचित अमृतप्रवाह-भाष्य, गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन नौवीं पीढ़ीके श्रेष्ठ परिजन परमहंस-परिव्राजकाचार्य-श्रीरूपानुगश्रेष्ठ- श्रीब्रह्मामाध्वगौड़ीय-सम्प्रदायके सर्वोत्तम संरक्षक- ॐ विष्णुपाद परमहंसस्वामी श्रीश्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद-रचित श्रीस्वरूप-रूप-विरोधी समस्त-कुसिद्धान्तोंको निरस्त करनेवाला अनुभाष्य एवं नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी कृत 'अमृतानुकणा', विविध गौड़ीय वैष्णवाचार्योंके लेखों एवं नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजके प्रवचनोंसे सङ्कलित 'अमृतानुकणिका' भाष्य, भूमिका, विविध सूची और विवरण आदि-सहित गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन दसवीं पीढ़ीके श्रेष्ठ परिजन श्रीगौड़ीय वेदान्त समितिके प्रतिष्ठाता-आचार्य-भास्कर नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराजके अनुकम्पा-पात्र नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजके- आदेश-निर्देशानुसार उनके चरणाश्रितजनोंके द्वारा अनुवादित और सम्पादित प्रकाशक : इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स

मूल बङ्गला पयार, संस्कृत श्लोक, अमृतप्रवाह भाष्य, अनुभाष्य, अमृताणुकणा और अमृताणुकणिका सहित प्रकाशित प्रथम संस्करण– श्रीगौर–पूर्णिमा , 9 मार्च, 2020 1000 प्रतियाँ ग्रन्थ प्राप्ति स्थान ★ श्रीरमणविहारी गौड़ीय मठ B-3, म्यूजिकल फॉऊन्टेन पार्कके निकट, जनकपुरी, नई दिल्ली ✆ 9810192540, 8285211049 ★ श्रीकेशवजी गौड़ीय मठ जवाहर हाट, मथुरा (उ.प्र.) ✆ 0565-2502334 ★ श्रीरूप–सनातन गौड़ीय मठ दान गली, वृन्दावन (उ.प्र.) ✆ 9456828001 ★ श्रीगिरिधारी गौड़ीय मठ दसविसा, राधाकुण्ड रोड, गोवर्धन (उ.प्र.) ✆ 0565-2815668 ★ श्रीश्रीकेशवजी गौड़ीय मठ कोलेरडाङ्गा लेन, नवद्वीप (प.ब.) ✆ 9153125442 ★ श्रीराधामाधव गौड़ीय मठ 162, सैक्टर–16 A, फरीदाबाद (हरियाणा) ✆ 9911283869 ★ जयश्री दामोदर गौड़ीय मठ चक्रतीर्थ रोड़, जगन्नाथपुरी (ओडीशा) ✆ 9776238328 ★ श्रीविनोदबिहारी गौड़ीय मठ Q-29, सैक्टर–12, नोएडा, (उ.प्र.) ✆ 9650824442 ★ श्रीराधागोविन्द गौड़ीय मठ D-5, सैक्टर–55, नोएडा, (उ.प्र.) ✆ 9910400878 ★ खण्डेलवाल एण्ड सन्स अठखम्बा बाजार, वृन्दावन (उ.प्र.) ✆ 0565-2443101

विषय-सूची उद्धृत ग्रन्थ ................................................................... i-iii अध्याय विवरण .............................................................. iv-v 15 सार्वभौमके घरमें भोजन-विलास .................................... 1-47 16 पुनःगौड़गमन-विलास .............................................. 49-90 17 श्रीवृन्दावन-गमन .................................................... 93-127 18 श्रीवृन्दावन-दर्शन-विलास ........................................... 129-169 19 प्रयागमें श्रीरूपपर अनुग्रह ........................................... 171-219 20 स्वरूपतत्तत्वरूप-श्रीभगवत्स्वरूप-भेदविचार .................... 221-289 21 सम्बन्धतत्त्व-विचारसे श्रीकृष्ण-ऐश्वर्य-माधुर्य-वर्णन ... 291-324 22 अभिधेयभक्तितत्त्व-विचार ............................................ 327-375 23 प्रेमप्रयोजन-विचार ................................................. 377-407 24 'आत्मारामश्च'-श्लोक-व्याख्यासे श्रीसनातनपर अनुग्रह 409-474 25 काशीवासियोंका वैष्णवकरण और पुनः नीलाचल-गमन 477-519 श्लोक सूची ................................................................. 521-528 पद्य सूची ................................................................. 529-545 शब्दकोष ................................................................. 547-554

साङ्केतिक चिह्नोंकी सूची अन्त्य — अन्त्यलीला आदि — आदिलीला उःनीः — उज्ज्वलनीलमणि कठः — कठोपनिषद छाः — छान्दोग्योपनिषद तैः — तैत्तिरयोपनिषद नाःपःराः — नारदपञ्चरात्र ब्रःसंः — ब्रह्मसंहिता बृःआः — बृहदारण्यकोपनिषद मध्य — मध्यलीला मःभाः — महाभारत भःरःसिः — भक्तिरसामृतसिन्धु भाः — भागवत विःपुः — विष्णुपुराण श्वेः — श्वेताश्वतरोपनिषद हःभःविः — हरिभक्तिविलास

निवेदन हमारे परमाराध्य गुरुदेव नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजजीकी अपार कृपासे गौड़ीय वैष्णवाचार्योंकी विविध टीकाओं सहित हिन्दी भाषामें श्रीश्रीचैतन्यचरितामृतकी दो भागोंमें आदिलीला एवं मध्यलीला प्रथम भाग प्रकाशित करनेके पश्चात् अब 'मध्यलीला द्वितीय भाग' का प्रकाशन कार्य सम्पन्न हुआ है। यह कार्य उनकी आज्ञा एवं उनके द्वारा प्रदत्त शक्तिसे ही सम्पादित हुआ है। श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामीने श्रीचैतन्य महाप्रभुके द्वारा अनुमोदित गूढ़ तत्त्व-सिद्धान्तों और सर्वोच्च रस-तत्त्वका अनूठा, अद्भुत और चमत्कारी समन्वय इस ग्रन्थमें अति सरल बङ्गला भाषामें करके अपने अप्राकृत कवित्वका परिचय प्रदान किया है। "मितञ्च सारञ्च वचो हि वाग्मिता", श्रील कविराज गोस्वामीकी लेखनी इस उक्तिका उज्ज्वल उदाहरण है, उन्होंने अति अल्प शब्दोंमें समस्त शास्त्रोंके सारको प्रमाण सहित इस ग्रन्थमें प्रस्तुत किया है। इस ग्रन्थकी भाषा सरल होनेपर भी इसमें अत्यन्त गूढ़ रहस्य समन्वित हैं। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर और श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुरने अपनी टीकाओं एवं अनेकानेक लेखोंके द्वारा उन गूढ़ रहस्योंको उद्घाटित किया है। इन टीकाओं और लेखों तथा श्रील गुरुदेवके प्रवचनोंको इस प्रकाशनमें समन्वय करके ग्रन्थके गूढ़ भावोंको सर्वसाधारणके लिये बोधगम्य बनानेका हमारा प्रयास है। उनके मनोवाञ्छित कार्यको सम्पूर्ण करनेके लिये प्रकाशन मण्डलीके सेवक निरन्तर प्रयासशील हैं और श्रील गुरुदेवकी प्रेरणा एवं निरुपाधिक निरवधि कृपाशक्ति हमें इस महत् कार्यमें सदा उत्साहशील बनाये रखती है। यह अति हर्षका विषय है कि श्रीश्रीचैतन्यचरितामृतका 'मध्यलीला द्वितीय भाग' भी अब प्रकाशित हो गया है और श्रीगुरुदेवकी प्रसन्नताके लिये उनकी निज वस्तुको उनके ही करकमलोंमें अर्पित करते हुए परमानन्दका अनुभव कर रहे हैं। इस ग्रन्थके प्रकाशनके लिये आत्मीय सहायता एवं प्रेरणाके लिये हम श्रीयुता उमादेवी दासीके आभारी हैं। इस ग्रन्थमें कुछ त्रुटियोंका रह जाना स्वाभाविक है। सुधी पाठकोंके द्वारा उनका संशोधनपूर्वक पाठ करनेसे हम आनन्दित होंगे। प्रकाशन मण्डली इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स (IGVP)

प्रकाशन-मण्डली अनुवाद, विन्यास एवं सम्पादन (Translation, Layout & Editing) :- श्रीमान् गोकुलचन्द्र दास शोधकार्य (Research) :- श्रीमती जानकी दासी / श्रीमान् गोकुलचन्द्र दास टङ्कण (Typing) :- श्रीमती ऐश्वर्य दासी / श्रीमती प्रज्ञा दासी संस्कृत-हिन्दी अनुवाद :- श्रीमान् डॉ अच्युतलाल भट्ट (पी०एच०डी०) प्रूफ-संशोधन (Proof Reading) :- श्रीमती राधा नूपुर दासी / सुश्री मञ्जुलता दासी मुखपृष्ठ चित्र :- श्रीमान् अनुज प्रकाशक :- श्रीपाद रामचन्द्र दास इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (द्वितीय भाग)

उद्धृत प्रमाण-ग्रन्थ तालिका

अमरकोश—24/305; इतिहास-समुच्चय—19/50; 20/58; उज्ज्वलनीलमणि—23/82-86; एकादशी-तत्त्व—17/186; 25/56; कात्यान-संहिता—22/88; कृष्णकर्णामृत—21/136; 23/29, 32; गरुड़पुराण—25/137, 138, 139; गोविन्दलीलामृत—17/210, 212, 214, 216; 18/12; 19/54; गोस्वामीपादोक्त श्लोक—21/45; 22/89; 24/179; चैतन्यचन्द्रोदय नाटक—19/119, 120, 121; 24/344, 345, 346; नारदपञ्चरात्र—19/170; 23/8; पद्मपुराण—17/133, 136; 18/8; 19/219; 20/145; 21/50, 51, 88; 22/109; 23/26; 25/78; पद्यावली—15/110; 19/96, 98, 106; 22/131; पाणिनि—24/26, 293, 295; प्राचीनकृत श्लोक—24/315; बृहत्-गौतमीय-तन्त्र—23/64; ब्रह्मसंहिता—15/170; 20/154, 160, 258, 281, 304, 310, 316; 21/35, 41, 49; भक्तिरसामृतसिन्धु—18/38; 19/134, 167, 170, 176, 186, 211; 20/106, 378, 397, 398, 399; 22/16, 102, 109, 126, 127, 128, 131, 142, 145, 149, 150, 153, 155, 158; 23/5, 7, 14, 15, 18, 19, 23, 26, 30, 33, 36, 63, 64, 66-80, 89-92, 94; 24/37, 116, 121, 124, 129, 165, 167, 176, 190, 269, 274; भगवत्सन्दर्भ—18/114; 24/108, 139, 304; 25/149; भगवद्गीता—17/18, 19/199; 20/116, 121, 163, 373, 374; 22/23, 57, 58, 91; 23/100-107; 24/90, 128, 134, 154, 155, 168, 187; 25/38, 39, 148; भागवत—15/180, 237, 270; 16/145, 186; 17/36, 39, 138, 140, 142; 18/34, 35, 125; 19/72, 142, 143, 150, 171-174, 197, 201, 203-209, 212, 215; 20/57, 59, 119, 137, 138, 147, 148, 151, 156, 158, 170, 173, 249, 262, 266, 267, 270, 274, 275, 299, 306, 312, 313, 318, 331, 335, 336, 340, 342, 343, 345, 353, 357; 21/9, 11, 13, 15, 27, 33, 37, 83, 100, 112, 123, 124; 22/19, 20, 27, 28, 30, 32, 36, 40, 44, 46, 48, 50, 52, 53, 55, 61, 63, 69, 70, 71, 73, 78, 79, 81, 82, 83, 85, 86, 87, 93, 95, 100, 107, 108, 132-134, 136, 139, 141, 157; 23/16, 21, 24, 37, 61, 108; 24/5, 21, 45, 46, 48, 49, 51, 52, 55, 58, 71, 73, 78, 83, 84, 86, 94, 96, 99, 111, 113, 119, 127, 131, 133, 136, 137, 138, 151, 152, 161, 164, 171, 172-174, 178, 185, 192, 194, 195, 202-205, 209, 211, 213, 316, 317; 25/31, 32, 36, 37, 74, 75, 81-83, 99, 103, 107, 111, 117, 121, 124, 126-128, 130, 132, 134, 135, 141, 142, 144, 145, 150-152; भावार्थदीपिका—17/80; 18/114; 24/69, 75; 25/138; महाभारत—15/269; 17/186; 25/56; मुनिवाक्य—22/6; रामायण (वाल्मिकी-कृत)—22/34; रूपगोस्वामीकृत श्लोक—19/53; 23/27, 74-80, 82-86; लघुभागवतामृत—20/242, 251, 371; 21/50, 51, 88; ललितमाधव—19/165; 20/181, 182; विश्वप्रकाश—24/12, 18, 64, 65, 146; विष्णुधर्मोत्तर—17/133; विष्णुपुराण—20/110, 112-115, 344; 24/68, 304; विष्णुस्वामिवाक्य—18/114; वैष्णवतन्त्र—18/116; 22/97, 98; सर्वज्ञसूक्तवाक्य—18/114; सात्वत-तन्त्र—20/251; स्कन्दपुराण—22/142; 24/274; स्मृतिवचन—15/265; हरिभक्तिविलास—18/116; 19/50, 229; 22/34, 88, 97, 98; 23/8; 25/137; हरिभक्तिसुधोदय—19/75; 20/61; 22/42; 23/23; 24/215। i

अमृतप्रवाह भाष्यमें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका ईशोपनिषद्—25/99; उद्भटचन्द्रिका—20/3; चैतन्यचन्द्रोदय-नाटक—16/205-210; चैतन्यचरितकाव्य—16/205-210; चैतन्यभागवत—16/55-56, 81, 205, 210, 212; चैतन्यमङ्गल—16/205-210; पद्यावली—19/92; प्रेमदासका भाष्य—16/205-210; भक्तिरसामृतसिन्धु—22/111-125; भागवत—15/265, 19/142, 24/28; भागवतामृत—20/165; सात्वत तन्त्र और शैवतन्त्र—20/173; हरिभक्तिसुधोदय—22/21 । अनुभाष्यमें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका आग्नेय पुराण—15/9; उपदेशामृत (रूपगोस्वामीकृत)—15/106, 111, 16/74, 19/102, 157; ऋग्वेद—23/110, 24/21; कर्णामृत—22/21; काशीखण्ड—17/82; कृष्णगणोद्देशदीपिका—15/241; कृष्ण-सन्दर्भ—23/111, 112; गरुड़-पुराण—15/274; गोपालतापनी-उपनिषद्—8/137; गीता—24/326; चैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (टिप्पनी)—16/207; चैतन्यभागवत—16/207, 208; 5/140; चैतन्यमङ्गल (श्रीलोचनदास)—16/207; तत्त्व-सागर—24/326; दुर्गम-सङ्गमनी—17/95; नीलकण्ठ टीका—23/110; न्यासादेश विवरण—18/47; पद्मपुराण—15/167-169; 18/116; 20/242; 24/326; पद्यावली—17/145; प्रेमदास—16/207; ब्रह्मसंहिता—20/272-273; ब्रह्मसूत्र-भाष्य—18/47; 8/266, 308-310; भक्तिरत्नाकर—18/26, 38, 47, 49-52, 57-64, 66-68, 70-72; भक्तिरसामृतसिन्धु—15/108; 16/74, 238; 17/95; 19/177-178, 180, 183-185, 187-188; 22/65-67; 23/42-44, 46, 48, 52; भक्तिसन्दर्भ—15/107, 108, 261; 16/74; 18/115; 22/98; भागवत—15/106, 107, 261-262, 264, 274-277; 16/74, 280-281; 17/14-15, 55-56, 95, 186; 18/115; 19/17, 151, 189; 20/63, 127, 245, 248, 278, 332-333; 21/11, 19; 22/31-32, 37-39, 69, 98; 23/111-112; 24/166, 172, 326; 25/131-132; भावार्थ-दीपिका—24/326; मथुराखण्ड—18/38; मथुरा-माहात्म्य—18/58-62; मनुसंहिता—16/150, 20/59; 23/111-112; महाभारत—16/150; 20/59; 23/111-112; महाभारत-टीका (नीलकण्ठ)—23/1110; 24/326; मुक्ताफलटीका—20/59; मुण्डकोपनिषद्—19/17, 139; रागवर्त्म-चन्द्रिका—20/393-395; लघुभागवतामृत—20/165, 184; 21/33, 59-89; 23/111-112; लघुभागवतामृत-टीका (बलदेव)—23/111-112; वराह-पुराण—18/55; विद्वन्मण्डल—18/47; विष्णुपुराण—23/111-112; वैष्णव-मञ्जूषा—18/49; शिक्षाष्टक—16/74; शृङ्गाररसमण्डल—18/47; श्वेताश्वतरोपनिषद्—22/126; श्रुति—22/126; 24/314; सर्वसम्वादिनी—23/111-112; सांख्यकारिका—20/278; सिद्धान्त-शिरोमणि—20/218; 21/84; सिद्धार्थ-संहिता—20/224-236; सुबोधिनी-टिप्पणी—18/47; सूर्यसिद्धान्त—21/84; स्कन्दपुराण—15/261; स्तवावली—18/26, 38, 66; स्मृति—22/126; 24/364; हयशीर्ष-पञ्चरात्र—20/238, 239; हरिवंश—23/110; हरिभक्तिविलास—15/108, 261; 20/202; 24/324, 330-332, 337 । ii ।

अमृतानुकणामें उद्धत ग्रन्थादि-तालिका कृष्ण-सन्दर्भ—23/112-113; गीता—15/48; 22/90, 152-153, 23/112-113; छान्दोग्योपनिषद्—20/127-128; दशमूल—22/80; पद्मपुराण—21/125; बृहन्नारदीयपुराण—22/80; ब्रह्मपुराण—23/112-113; ब्रह्माण्डपुराण—21/33; भक्तिरसामृतसिन्धु—22/80, 22/148-149, 152-153; भागवत—21/33, 22/84, 152-153, 23/112-113; मन्त्रार्थ-दीपिका—21/125; रागवर्त्म-चन्द्रिका—22/148-149; वर्णागम-भास्वत्—21/125; विष्णुपुराण—23/112-113; श्रीचैतन्यशिक्षामृत—22/103-104, 152-153; श्रीलघुभागवतामृत—21/33; 23/112-113; स्कन्दपुराण—23/112-113।

अमृतानुकणिकामें उद्धत ग्रन्थादि-तालिका कूर्मपुराण—15/136; गीता—20/118; बृहद्भागवतामृत—18/34; भागवत—18/34; 19/157; 22/107; विष्णुपुराण—25/191-193; शिक्षाष्टक—19/157; श्रीगान्धर्वासंप्रार्थनाष्टकम्—21/112; श्रीहरिभक्तिविलास—15/236।

iii

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (द्वितीय भाग) अध्याय-विवरण पन्द्रहवाँ अध्याय— 1-47 महाप्रभुकी गोप और हनुमानके वेशमें लीला, श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ एकान्तमें परामर्श, श्रीवासके द्वारा नवद्वीपमें माताको सांत्वना-वाक्य भेजना, राघव पण्डित, खण्डवासी मुकुन्द और रघुनन्दन, मुरारी गुप्त, वाचस्पति आदि भक्तोंके गुणोंकी व्याख्या करके प्रत्येकको सेवा निर्देश करके विदायी देना। कुलीनग्रामवासियोंके प्रश्नोंके उत्तरमें सभी साधकोंके नित्य कर्त्तव्योंका उपदेश देना, वासुदेवके अपूर्व जीवोंपर दया-सूचक वाक्यकी आलोचना, सार्वभौमके घरमें भिक्षा और भट्टके दामाद अमोघका उद्धार। सोलहवाँ अध्याय— 49-90 अगले वर्ष गौड़देशसे वैष्णव-गृहिणियोंका भक्तोंके साथ महाप्रभुके लिये नैवेद्य एकत्रित करके पुरीमें आगमन और चातुर्मासके अन्तमें गौड़देशमें लौट जाना। कुलीनग्रामवासियोंके प्रश्नके उत्तरमें वैष्णवोंके अधिकार-तारतम्यका निर्देश, विद्यानिधिका श्रीक्षेत्रमें ‘ओड़नषष्ठी’-दर्शन, विजयदशमीके दिन महाप्रभुकी वृन्दावन-यात्रा, महाप्रभुके साथमें गदाधरकी जानेकी इच्छा और उनका महाप्रभुके प्रति अनुपम प्रेम, गदाधरको विदायी देकर जलपथसे पानिहाटी, कुमारहट्ट और विद्यानगरसे होते हुए कुलियामें आगमन और अनेक अपराधियोंके अपराधोंका मोचन, रामकेलिमें रूप-सनातनके साथ साक्षात्कार, सनातनके इङ्गितानुसार कनाई-नाटशालासे पुरीकी ओर वापस लौटना, उसके द्वारा नृसिंहानन्द ब्रह्मचारीके ध्यानके आवेशमें उच्चारित भविष्यवाणीकी सफलताका विधान, पथमें शान्तिपुरमें आकर रघुनाथको उपदेश देना और अन्तमें पुरीमें वापस लौटना। सत्रहवाँ अध्याय— 93-127 बलभद्र ब्राह्मणके साथ वृन्दावन-यात्रा, झारिखण्ड मार्गसे काशीमें आगमन, तपनमिश्रके घरमें अवस्थान, कृष्णनामापराधी मायावादियोंकी निन्दा, मथुरा जाकर माधवेन्द्रपुरीके शिष्य सनोड़िया ब्राह्मणको वैष्णव जानकर जातिबुद्धि न करके उसके घरमें भोजन, वृन्दावनमें स्थित द्वादश-वनोंमें भ्रमण और कृष्णप्रेमविकार। अठारहवाँ अध्याय— 129-169 वृन्दावनमें सभी कृष्णलीला-स्थानोंका दर्शन, बलभद्रके कालिय हृदमें मछुआरे कृष्णवर्ण नाविकको ‘कृष्ण’-भ्रमरूप विवर्त्त दूर करना, उस देशके वासियोंको जीव और कृष्णके स्वरूपका वर्णन, मथुरासे वापस लौटते हुये मार्गमें बिजली-खाँ और उसके सङ्गियोंका उद्धार करना, मुसलमानशास्त्रसे कृष्णभक्ति-संस्थापन, त्रिवेणीमें आगमन। उन्नीसवाँ अध्याय— 171-219 श्रीरूपका अपने देशमें अपने घरमें आगमन, राजकार्यको त्याग करनेके कारण सनातनको कारावास, अनुजके साथमें श्रीरूपका गृहत्याग और प्रयागमें महाप्रभुके साथ मिलन, वल्लभाचार्यको महाप्रभुके द्वारा दोनों भाइयोंका परिचय देना, महाप्रभु और रघुपति उपाध्यायका वार्तालाप, दशाश्वमेध-घाटपर श्रीरूपको कृष्णभक्तिरसतत्त्वकी शिक्षा प्रदान करना और वृन्दावनमें iv ।

भेजना तथा बादमें पुरीमें आकर पुनः मिलनेका आदेश देकर महाप्रभुका काशीमें आगमन।

बीसवाँ अध्याय— 221-289 सनातनका कारागारसे छूटकर निकल जाना, काशीमें गमन और चन्द्रशेखरके घरमें महाप्रभुसे मिलन, श्रीसनातन शिक्षा—(1) 'सम्बन्ध ज्ञान'—(क) जीवके और भगवान्के स्वरूपका वर्णन।

इक्कीसवाँ अध्याय— 291-324 (ख) कृष्णैश्वर्य-माधुर्य-वर्णन।

बाइसवाँ अध्याय— 327-375 (2) वैध और रागानुग-भेदसे 'अभिधेय'-साधन- भक्तिका वर्णन।

तेइसवाँ अध्याय— 377-407 (3) 'प्रयोजन'-प्रेम-तत्त्व-वर्णन।

चौबीसवाँ अध्याय— 409-474 “आत्मारामश्च”-श्लोककी 61 प्रकारकी व्याख्या, श्रीमद्भागवतके माहात्म्यका कीर्तन, वैष्णव-स्मृति हरिभक्तिविलासका मूल सूत्र-वर्णन।।

पचीसवाँ अध्याय— 477-519 प्रमुख-प्रकाशानन्द और काशीवासियोंके द्वारा महाप्रभुकी निन्दा, भक्तोंकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये उनका उद्धार (आदिलीला सातवाँ अध्याय देखें), एकत्रित हुए समस्त कुतार्किकोंके कुतर्कोंका खण्डन, सभीके द्वारा महाप्रभुको साक्षात् नारायण मानना, प्रकाशानन्दके एक शिष्यके द्वारा महाप्रभुके प्रचारित मतकी अर्थात् श्रुतियोंकी अवरोहपन्यासे और सविशेष- ब्रह्मतत्पर्य एवं शक्तिपरिणामवादकी प्रशंसा तथा निर्विशेष-ब्रह्मपरता विवर्त्तवाद या आरोहवादपन्थाकी निन्दा, प्रकाशानन्दके द्वारा उस वाक्यका समर्थन, अन्य दार्शनिक मतवादोंका खण्डन, महाप्रभुका दर्शन, महाप्रभुके द्वारा पाषण्ड-संज्ञाका निर्देश, प्रकाशानन्दको उनकी प्रार्थनापर महाप्रभुके द्वारा चतुःश्लोकीकी व्याख्या, उसके बाद “आत्मारामश्च” श्लोककी 61 प्रकारकी व्याख्या, काशीवासियोंका उद्धार-साधन, सनातनको वृन्दावनमें भेजना, सुबुद्धिरायको निरन्तर कृष्णनाम- ग्रहण-व्यवस्था प्रदान, पुरीमें पुनः लौटकर आना और भक्तोंके साथ मिलन।

| v

vi ।

पन्द्रहवाँ अध्याय कथासार—रथयात्राके पूर्ण होनेपर श्रीअद्वैतप्रभुने महाप्रभुकी पुष्प-तुलसी देकर पूजा की, महाप्रभुने भी पूजापात्रमें बचे हुए पुष्प-तुलसी देकर श्रीअद्वैताचार्यकी योऽसि सोऽसिं-मन्त्रसे पूजा की। उसके बाद श्रीअद्वैताचार्यने महाप्रभुको निमन्त्रण करके भोजन करवाया। नन्दोत्सवके दिन महाप्रभुने अपने भक्तोंके सहित गोपवेश धारण करके आनन्दोत्सव मनाया। विजयादशमीके दिन लङ्का-विजयोत्सवमें महाप्रभुने अपने भक्तोंको वानर सेनाके वेशमें सजाकर स्वयं हनुमानके आवेशमें बहुत आनन्द प्रकाशित किया। उसके बाद अन्यान्य उत्सवोंको देखनेके बाद महाप्रभुने समागत भक्तोंको गौड़देश जानेकी आज्ञा दी। महाप्रभुने श्रीरामदास, श्रीगदाधरदास आदि कुछ वैष्णवोंके साथ श्रीनित्यानन्द प्रभुको भी गौड़देशमें भेजा। बादमें बहुतसे दैन्यपूर्ण वचनोंके साथ (श्रीवासके हाथसे) अपनी माताके लिये प्रसाद-वस्त्र आदि भिजवाये। महाप्रभुने श्रीराघवपण्डित, श्रीवासुदेव दत्त, कुलीन-ग्रामवासी भक्तों आदि सभी वैष्णवोंके अनेक गुणोंकी व्याख्या करके उन्हें विदायी दी। श्रीरामरामानन्द और श्रीसत्यराजके प्रश्नोंके उत्तरमें महाप्रभुने गृहस्थ-वैष्णवोंके लिये शुद्धनामपरायण वैष्णवोंकी सेवाका निर्देश दिया। तब महाप्रभुने खण्डवासी-वैष्णवोंके माहात्म्य (और सेवा-निर्देश), श्रीसार्वभौम और श्रीविद्या-वाचस्पतिको (दारु और जलब्रह्मकी सेवाका आदेश) और श्रीमुरारि-गुप्तकी श्रीरामके चरणकमलोंमें निष्ठाकी व्याख्या की। तत्पश्चात् श्रीवासुदेव दत्तकी सम्पूर्ण-वैष्णवोचित प्रार्थनाके अनुसार श्रीकृष्णके (अनायास) जगत्के उद्धारके सामर्थ्यका विचार किया। उसके बाद श्रीसार्वभौमके घरपर (महाप्रभुके द्वारा) भिक्षा ग्रहणके समय अमोघकी कुछ दुर्बुद्धि होनेपर अगले दिन प्रातःकालमें उसे हैजाका रोग हो गया। महाप्रभुने कृपा करके उसे रोगसे मुक्त कराके श्रीकृष्ण-नाममें रुचि प्रदान की। —(अमृतप्रवाह भाष्य) अपने निन्दक अमोघको आत्मसात्कारी श्रीगौरसुन्दर :— सार्वभौमगृहे भुञ्जन् स्वनिन्दकममोघकम्। अङ्गीकुर्वन् स्फुटां चक्रे गौरः स्वां भक्तवश्यताम्॥१॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसार्वभौमके घरमें भोजन करते समय अपने निन्दक अमोघ-भट्टाचार्यको अङ्गीकार करके श्रीगौरचन्द्रने स्पष्टरूपसे अपनी भक्तवश्यताको प्रकाश किया था॥१॥ अनुभाष्य— गौरः सार्वभौमगृहे (भट्टाचार्यभवने) भुञ्जन् (भिक्षां स्वीकुर्वन्) स्वनिन्दकं (निज-निन्दाकारिणम्) अमोघकं (तन्नामकं सार्वभौमदुहितृ-'षष्ठी'-पतिम्) अङ्गीकुर्वन् (निजदासगणमध्ये गणयन्) स्वां (निजां) भक्तवश्यतां (अनुगत-जनबाध्यतां) स्फुटां (व्यक्तीभूतां) चक्रे (कृतवान्)॥१॥ श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। 'अमोघ'— श्रीसार्वभौमकी पुत्री 'षष्ठी'का पति॥१॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥२॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो॥२॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके श्रोताओंकी जय :— जय श्रीचैतन्यचरितामृत-श्रोतागण। चैतन्यचरितामृत—याँर प्राणधन॥३॥ । 1

[ 15/3-11 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-श्रीचैतन्य-चरितरूपी अमृत ही जिनका प्राणधन है, उन श्रीचैतन्यचरितामृतके श्रोताओंकी जय हो॥3॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुकी पुरुषोत्तम-लीला :- एइमत महाप्रभु भक्तगण-सङ्गे। नीलाचले राहि' करे नृत्यगीत-रङ्गे ॥4॥ अनुवाद-इस प्रकार नीलाचलमें रहकर महाप्रभु भक्तोंके साथ नृत्य-गान करके आनन्दका आदान-प्रदान करते थे॥4॥ प्रथम-वत्सरे जगन्नाथ-दरशन। नृत्यगीत करे दण्ड, प्रणाम, स्तवन ॥5॥ अनुवाद-(ग्रन्थकार महाप्रभुके संन्यास ग्रहण करनेके बाद प्रथम वर्षकी कुछ लीलाओंका वर्णन करते हुए कह रहे हैं-) महाप्रभु श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करते और उनके आगे नृत्य-गीत, दण्डवत्-प्रणाम और उनकी स्तुति करते ॥5॥ मध्याह्न भोगके बाद श्रीहरिदासके साथ साक्षात्कार :- 'उपलभोग' लागिले करे बाहिरे विजय। हरिदास मिलि' आइसे आपन-निलय ॥6॥ अनुवाद-'उपलभोग' लगनेके समय महाप्रभु मन्दिरसे बाहर चले आते। तब वे श्रीहरिदास ठाकुरसे मिलकर अपने आवास-स्थानपर आ जाते ॥6॥ अनुभाष्य-मध्याह्नकालमें भोगवर्धन-खण्डमें भोग अर्थात् उपल-भोग लगनेपर महाप्रभु श्रीमन्दिरसे बाहर चले आते। उससे पहले गरुड़-स्तम्भके पीछे खड़े होकर दण्डवत्-प्रणाम और स्तवादि करते थे। लौटते समय 'सिद्धबकुल'में श्रीहरिदास ठाकुरके साथ मिलकर अपने वासस्थान श्रीकाशीमिश्र-भवनमें आ जाते॥6॥ अपने वासस्थानमें बैठकर नामकीर्तन, श्रीअद्वैतके द्वारा महाप्रभुकी पूजा :- घरे बसि' करे प्रभु नाम-सङ्कीर्त्तन। अद्वैत आसिया करे प्रभुर पूजन ॥7॥ अनुवाद-महाप्रभु अपने वास-स्थानमें बैठकर नाम-जप करते। एक दिन श्रीअद्वैताचार्यने वहाँ आकर महाप्रभुकी पूजा की॥7॥ सुगन्धि-सलिले देन पाद्य, आचमन। सर्वाङ्गे लेपये प्रभुर सुगन्धि चन्दन ॥8॥ गले माला देन, माथाय दिल तुलसी-मञ्जरी। जोड़-हाते स्तुति करे पदे नमस्करि' ॥9॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यने महाप्रभुके चरण और मुख धोने (पाद्य और आचमन) के लिये सुगन्धित जल प्रदान करके महाप्रभुके समस्त अङ्गोंपर सुगन्धित चन्दनका लेपन किया। उन्होंने महाप्रभुके गलेमें माला पहनायी और उनके मस्तकपर तुलसी-मञ्जरी प्रदान की। तब उन्होंने हाथोंको जोड़कर महाप्रभुके चरणोंमें प्रणाम करते हुए उनकी स्तुति की॥8-9॥ अमृतानुकणिका-महाप्रभु यद्यपि स्वयं भगवान् हैं और उनके चरणोंमें तुलसी देनेसे कोई अपराध नहीं होता। परन्तु महाप्रभु उस समय भक्तरूपमें लीला कर रहे थे, इसलिये श्रीअद्वैताचार्यने उनके मस्तकपर तुलसी-मञ्जरी प्रदान की ॥8-9॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीअद्वैतका प्रतिपूजन :- पूजा-पात्रे पुष्प-तुलसी शेष ये आछिल। सेइ सब लञा प्रभु आचार्ये पूजिल ॥10॥ 'योऽसि सोऽसि नमोऽस्तु ते' एइ मन्त्र पड़े। मुखवाद्य करि' प्रभु हासाय आचार्ये ॥11॥ अनुवाद-पूजा-पात्रमें जो भी पुष्प और तुलसी-पत्र बच गये, महाप्रभुने उनके द्वारा श्रीअद्वैताचार्यकी पूजा की। पूजा करते समय उन्होंने यह मन्त्र पढ़ा,-'आप जो हो, सो हो, मैं आपको नमस्कार करता हूँ।' तथा अपने मुखसे वाद्ययन्त्रकी भाँति कुछ ध्वनि की जिसे सुनकर श्रीअद्वैताचार्य हँसने लगे ॥10-11॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'आप जो हो, सो हो, मैं 2 ।

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/11-19 ] आपको ही नमस्कार करता हूँ,—यह मन्त्र पढ़कर आचार्यकी पूजा की॥ 11 ॥ अनुभाष्य—कोई यह पाठ बोलते हैं— “राधे कृष्ण रमे विष्णो सीते राम शिवे शिव। योऽसि सोऽसि नमो नित्यं योऽसि सोऽसि नमोऽस्तु ते।” अर्थात् “आप चाहे राधा-कृष्ण या रमा-विष्णु या सीता-राम या शिवानी-शिव, जो हों, सो हों, मैं आपको नमस्कार करता हूँ, नित्य नमस्कार करता हूँ॥” 11 ॥ अमृतानुकणिका—उपरोक्त मन्त्र शिवमन्त्रका एक विशेष अंश है। श्रीअद्वैताचार्य सदाशिव हैं, इसलिये महाप्रभुने उनकी इस मन्त्रके द्वारा पूजा की ॥ 10-11 ॥ एइमत अन्योन्ये करेन नमस्कार। प्रभुरे निमन्त्रण करे आचार्य बार बार ॥ 12 ॥ आचार्यके वासस्थानपर महाप्रभुकी भिक्षा— श्रीचैतन्यभागवतमें वर्णित :— आचार्येर निमन्त्रण—आश्चर्य-कथन। विस्तारि' वर्णियाछेन दास-वृन्दावन ॥ 13 ॥ एक-एक भक्तके घरमें सगण महाप्रभुको निमन्त्रण :— पुनरुक्ति हय ताहा, ना कैलुँ वर्णन। आर भक्तगण करे प्रभुरे निमन्त्रण ॥ 14 ॥ एक एक दिन एक एक भक्तगृहे महोत्सव। प्रभु-सङ्गे ताँहा भोजन करे भक्त सब ॥ 15 ॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु और श्रीअद्वैताचार्यने परस्पर एक-दूसरेको नमस्कार किया। उसके बाद श्रीअद्वैताचार्य बार-बार महाप्रभुको अपने वासस्थानपर भोजनके लिये निमन्त्रण करते। एक दिन श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण करनेकी घटना बहुत आश्चर्यजनक है। श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने श्रीचैतन्यभागवतमें इसका विस्तारसे वर्णन किया है। पुनरुक्ति दोष हो जायेगा, इसलिये मैं (ग्रन्थकार) उसका वर्णन नहीं कर रहा हूँ। इसी प्रकार अन्यान्य भक्त भी महाप्रभुको निमन्त्रण देते थे। एक-एक दिन एक-एक भक्तके स्थानपर महोत्सव होता और महाप्रभुके साथ समस्त भक्त भी वहाँपर भोजन करते थे ॥ 12-15 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीचैतन्यभागवतमें अन्त्यखण्ड, नौवाँ अध्याय देखें ॥ 13 ॥ गौड़ीयगणोंका महाप्रभुके साथ चारमास रहना :— चारिमास रहिला सबे महाप्रभु-सङ्गे। जगन्नाथेर नाना यात्रा देखे महारेङ्गे ॥ 16 ॥ अनुवाद—समस्त भक्त चार मास तक नीलाचलमें महाप्रभुके साथ रहे और उन्होंने बड़े आनन्दसे श्रीजगन्नाथदेवके सभी महोत्सवोंका दर्शन किया ॥ 16 ॥ नन्दोत्सवके दिन गोपवेशमें भक्तोंके साथ ब्रजलीलाका अभिनय :— कृष्णजन्मयात्रा-दिने नन्द-महोत्सव। गोपवेश हैला प्रभु लञा भक्त सब ॥ 17 ॥ दधिदुग्ध-भार प्रभु निज-स्कन्धे करि'। महोत्सव-स्थाने आइला बलि 'हरि' 'हरि' ॥ 18 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण-जन्माष्टमीके अगले दिन नन्द-महोत्सवमें महाप्रभु और सभी भक्तोंने गोपवेश धारण किया। महाप्रभु दूध और दहीसे भरे पात्रोंको अपने कन्धोंपर उठाकर 'हरि' 'हरि' बोलते हुए महोत्सव-स्थलपर आये ॥ 17-18 ॥ अनुभाष्य—'कृष्णजन्मयात्रा-दिन'—जन्माष्टमीसे अगले दिन अर्थात् नन्दोत्सवके दिन ॥ 17 ॥ श्रीकानाइ-खुटियाका 'नन्द' और श्रीजगन्नाथ-माहातिका 'यशोदा'-वेश :— कानाइ-खुटिया आछेन 'नन्द' वेश धरि'। जगन्नाथ-माहाति हञाछेन 'व्रजेश्वरी' ॥ 19 ॥ अनुवाद—श्रीकानाइ खुटियाने श्रीनन्द महाराजका वेश धारण किया। और श्रीजगन्नाथ-माहातिने व्रजेश्वरी श्रीयशोदाका वेश धारण किया ॥ 19 ॥ । 3

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[ 15/19-27 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—'खुटिया'—उड़ीसावासी ब्राह्मणोंकी विशेष उपाधि; 'माहाति'—उड़ीसावासी कायस्थोंकी विशेष उपाधि॥ 19॥ राजा, मिश्र, भट्टाचार्य और तुलसी-पड़िछाके साथ महाप्रभुका लीलाविनोद :— आपने प्रतापरुद्र, आर मिश्र-काशी। सार्वभौम, आर पड़िछा-पात्र तुलसी॥ 20॥ इँहा सबा लञा प्रभु करे नृत्य-रङ्ग। दधि-दुग्ध हरिद्रा-जले भरे सबार अङ्ग॥ 21॥ अनुवाद—उस समय राजा प्रतापरुद्र भी श्रीकाशीमिश्र, श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य और तुलसी पड़िछा-पात्रके साथ वहाँ उपस्थित थे। इन सबको अपने साथ लेकर महाप्रभु आनन्दपूर्वक नृत्य कर रहे थे और दही-दूध और हल्दीवाले जलसे सभी सराबोर हो रहे थे॥ 20-21॥ अनुभाष्य—'पात्र'—उड़ीसावासी सम्मानित व्यक्तियोंकी उपाधि॥ 20॥ लाठी खेलकर अपने गोपस्वरूपको दिखलानेका अनुरोध :— अद्वैत कहे, —"सत्य कहि, ना करिह कोप। लगुड़ फिराइते पार, तबे जानि गोप॥" 22॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने कहा,—"मैं सत्य कह रहा हूँ, आप क्रोध मत कीजियेगा। यदि आप लाठी घुमाकर दिखा पायेंगे, तभी मैं मानूँगा कि आप गोप हैं॥" 22॥ अनुभाष्य—'लगुड़'—लाठी; लाठी-खेलमें गोप अथवा गौड़गण ही सबसे आगे होते हैं॥ 22॥ महाप्रभुके द्वारा लाठीको घुमाकर गोप-लीला-प्रदर्शन :— तबे लगुड़ लञा प्रभु फिराइते लागिला। बार बार आकाशे फेलि' लुफिया धरिला॥ 23॥ शिरेर उपरे, सम्मुखे, पृष्ठे, दुइ-पाशे। पादसन्धये फिराय लगुड़, —देखि' लोक हासे॥ 24॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यकी बात सुनकर महाप्रभु लाठीको घुमाने लगे। वे बार-बार लाठीको आकाशकी ओर फेंकते और उसके नीचे आनेपर उसे पकड़ लेते। महाप्रभु कभी अपने सिरके ऊपर, कभी अपने सामने, कभी अपने पीछे, कभी अपनी दाहिनी ओर तथा कभी अपनी बायीं ओर एवं कभी दोनों पैरोंके बीच हाथोंसे लाठीको घुमाते जा रहे थे। इसे देखकर सभी लोग हँस रहे थे॥ 23-24॥ अनुभाष्य—'पादसन्धये'—दोनों पैरोंके बीचके स्थानमें॥ 24॥ उसे देखकर सभीको विस्मय :— अलात-चक्रेर प्राय लगुड़ फिराय। देखि' सर्वलोक-चित्ते चमत्कार पाय॥ 25॥ अनुवाद—महाप्रभु लाठीको अलात-चक्रकी भाँति घुमा रहे थे जिसे देखकर सभी लोगोंके हृदयमें बड़ा आश्चर्य हो रहा था॥ 25॥ अनुभाष्य—'अलातचक्र'—जलते हुए अङ्गारेको तेजीसे घुमानेपर जैसे वह एक आगके चक्रकी भाँति प्रतीत होता है, महाप्रभुने भी उसी प्रकार बड़ी तेजीसे लाठीको घुमाकर ऐसा प्रदर्शन किया कि देखनेवालोंको चक्रमें सब जगह लाठी दिख रही थी॥ 25॥ श्रीनिताइके द्वारा भी इस प्रकार लाठी घुमाकर अपने गोपस्वरूपका प्रदर्शन :— एइमत नित्यानन्द फिराय लगुड़। के बुझिबे ताँहा दुँहार गोपभाव गूढ़॥ 26॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने भी उसी प्रकार लाठीको घुमाकर दिखलाया। वहाँ उन दोनोंके गूढ़ गोपभावको कौन समझ सकता था ?॥ 26॥ महाप्रभुके मस्तकपर तुलसी-पड़िछाके द्वारा लाये गये प्रसादी-वस्त्रको बाँधना :— प्रतापरुद्रेर आज्ञाय पड़िछा-तुलसी। जगन्नाथेर प्रसाद-वस्त्र एक लञा आसि'॥ 27॥ 4 ।