श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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“यह महानिर्वाणतन्त्र में लिखा है।”
श्रीरामकृष्ण – हाँ, इसकी धारणा करनी चाहिए।
(३)
श्रीरामकृष्ण का यशोदा-भाव तथा समाधि
श्रीरामकृष्ण अपनी छोटी खाट पर जा बैठे हैं। भाव में तो सदा ही पूर्ण रहते हैं। भावनेत्रों से राखाल को देख रहे हैं। देखते देखते हृदय में वात्सल्यरस उमड़ने लगा, अंग पुलकित होने लगे। क्या यशोदामाता इन्हीं नेत्रों से गोपाल को देखा करती थीं?
देखते ही देखते फिर आप समाधिलीन हो गए। कमरे के भीतर जितने भक्त बैठे हुए थे, वे सभी आश्चर्य से चकित और स्तब्ध होकर श्रीरामकृष्ण के भाव की यह अद्भुत अवस्था देख रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण कुछ प्रकृतिस्थ होकर कहते हैं, – “राखाल को देखकर इतनी उद्दीपना क्यों होती हैं? जितना ही ईश्वर की ओर बढ़ते जाओगे, ऐश्वर्य की मात्रा उतनी ही घटती जाएगी। साधक पहले दशभुजा मूर्ति देखता है। वह ईश्वरी मूर्ति है। इसमें ऐश्वर्य का प्रकाश अधिक रहता है। इसके बाद द्विभुजा मूर्ति देखता है। तब दस हाथ नहीं रहते – इतने अस्त्र-शस्त्र नहीं रहते। इसके बाद गोपाल-मूर्ति के दर्शन होते हैं, कोई ऐश्वर्य नहीं – केवल एक छोटे बच्चे की मूर्ति। इससे भी परे है – केवल ज्योति-दर्शन।
यथार्थ ब्रह्मज्ञान की अवस्था – विचार और आसक्ति का त्याग
“उन्हें प्राप्त कर लेने पर, उनमें समाधिमग्न हो जाने पर, फिर ज्ञान-विचार नहीं रह जाता।
“ज्ञान-विचार तो तभी तक है, जब तक अनेक वस्तुओं की धारणा रहती है – जब तक जीव, जगत्, हम, तुम, यह ज्ञान रहता है। जब एकत्व का यथार्थ ज्ञान हो जाता है, तब चुप हो जाना पड़ता है। जैसे त्रैलंगस्वामी।
“ब्रह्मभोज के समय नहीं देखा? पहले खूब गुलगपाड़ा मचता है। ज्यों-ज्यों पेट भरता जाता है, त्यों-त्यों आवाज घटती जाती है। जब दही आया, तब सुप्-सुप्, बस और कोई शब्द नहीं। इसके बाद ही निद्रा – समाधि! तब आवाज जरा भी नहीं रह जाती!
(मास्टर और प्राणकृष्ण से) – “कितने ही ऐसे हैं जो ब्रह्मज्ञान की डींग मारते हैं परन्तु नीचे स्तर की वस्तुएँ लेकर मग्न रहते हैं। – घर-द्वार, धनमान, इन्द्रियसुख। मोनूमेण्ट (Monument) के नीचे जब तक रहा जाता है, तब तक गाड़ी, घोड़ा, साहब, मेम – यही सब दीख पड़ते हैं। ऊपर चढ़ने पर सिर्फ आकाश, समुद्र लहराता हुआ दीख पड़ता है। तब घर-द्वार, घोड़ा-गाड़ी, आदमी – इन पर मन नहीं रमता, ये सब चींटी जैसे
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नजर आते हैं।
“ब्रह्मज्ञान होने पर संसार की आसक्ति चली जाती है, काम-कांचन के लिए उत्साह नहीं रहता – सब शान्त हो जाता है। काठ जब जलता है तब उसमें चटाचट आवाज होती है और कडुवा धुआँ भी निकलता है। जब सब जलकर खाक हो जाता है, तब फिर शब्द नहीं होता। आसक्ति के जाते ही उत्साह भी चला जाता है। अन्त में केवल शान्ति रह जाती है।
“ईश्वर की ओर कोई जितना ही बढ़ता है, उतनी ही शान्ति मिलती है। शान्तिः शान्तिः शान्तिः प्रशान्तिः। गंगा के निकट जितना ही जाया जाता है, उतना ही शीतलता का अनुभव होता जाता है। नहाने पर और भी शान्ति मिलती है।
“परन्तु जीव, जगत, चौबीस तत्त्व, इनकी सत्ता उन्हीं की सत्ता से भासित हो रही है। उन्हें छोड़ देने पर कुछ भी नहीं रह जाता। एक के बाद शून्य रखने से संख्या बढ़ जाती है। एक को निकाल डालो तो शून्य का कोई अर्थ नहीं रह जाता।”
प्राणकृष्ण पर कृपा करने के लिए श्रीरामकृष्ण अपनी अवस्था के सम्बन्ध में कह रहे हैं।
ब्रह्मज्ञान के उपरान्त ‘भक्ति का मैं’
श्रीरामकृष्ण – ब्रह्मज्ञान के पश्चात् समाधि के पश्चात्, कोई कोई नीचे उतरकर ‘विद्या का मैं’, ‘भक्ति का मैं’ लेकर रहते हैं। हाट का क्रय-विक्रय समाप्त हो जाने पर भी कुछ लोग अपनी इच्छानुसार हाट में ही रह जाते हैं, जैसे नारद आदि। वे ‘भक्ति का मैं’ लेकर लोकशिक्षा के लिए संसार में रहते हैं। शंकराचार्य ने लोकशिक्षा के लिए ‘विद्या का मैं’ रखा था।
“आसक्ति का नाममात्र भी रहते वे नहीं मिल सकते। सूत के रेशे निकले हुए हों तो वह सुई के भीतर नहीं जा सकता।
“जिन्होंने ईश्वर को प्राप्त कर लिया है, उनके काम-क्रोध नाममात्र के हैं, जैसे जली रस्सी, – रस्सी का आकार तो है परन्तु फूकने से ही उड़ जाती है।
“मन से आसक्ति के चले जाने पर उनके दर्शन होते हैं। शुद्ध मन से जो निकलेगी, वह उन्हीं की वाणी है। शुद्ध मन जो है, शुद्ध बुद्धि भी वही है और शुद्ध आत्मा भी वही है; क्योंकि उन्हें छोड़ कोई दूसरा शुद्ध नहीं है।
“परन्तु उन्हें पा लेने पर लोग धर्माधर्म को पार कर जाते हैं।”
इतना कहकर श्रीरामकृष्ण मधुर कण्ठ से भक्त रामप्रसाद का एक गीत गाने लगे। उसका मर्म यह है –
“मन, चल, सैर करने चले। कालीरूपी कल्पलता के नीचे तुझे चारों फल मिल
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जायेंगे। अपनी प्रवृत्ति और निवृति, इन दो पत्नियों में से तू निवृति को साथ लेना और उसी के पुत्र विवेक से तत्त्व की बातें पूछना।।”
(४)
श्रीरामकृष्ण का श्रीराधा-भाव
श्रीरामकृष्ण दक्षिण-पूर्ववाले बरामदे में आकर बैठे हैं। प्राणकृष्ण आदि भक्त भी साथ साथ आये हैं। हाजरा महाशय बरामदे में बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण हँसते हुए प्राणकृष्ण से कह रहे हैं –
“हाजरा कुछ कम नहीं है। अगर यहाँ (स्वयं को लक्ष्य करके) कोई बड़ी दरगाह हो तो हाजरा छोटी दरगाह है!” (सब हँसते हैं।)
नवकुमार आकर बरामदे के दरवाजे में खड़े हुए और भक्तों को देखते ही चले गये। उन्हें देखकर श्रीरामकृष्ण ने कहा – “अहंकार की मूर्ति है!”
दिन के आठ बज चुके हैं। प्राणकृष्ण ने प्रणाम करके चलने की आज्ञा ली; उन्हें कलकत्ते के मकान में लौट जाना है।
एक वैरागी गोपीयन्त्र (एकतारे की सूरत-शकल का) लेकर श्रीरामकृष्ण के कमरे में गा रहे हैं। गीतों का आशय यह है –
(१) “नित्यानन्द का जहाज आया है। तुम्हें पार जाना हो तो इस पर आ जाओ। छः गोरे इसमें सदा पहरा देते हैं। उनकी पीठ ढाल से घिरी हुई है और कमर में तलवार लटक रही है। सदर दरवाजा खोलकर वे धनरत्न लुटा रहे हैं।”
(२) “इस समय घर छा लेना। इस बार वर्षा जोरों की होगी, सावधान हो जाओ, अदरक का पानी पीकर अपने काम पर डट जाओ। जब श्रावण लग जायगा तब कुछ भी न सूझेगा। छप्पर का टाट सड़ जायगा। फिर तुम घर न छा सकोगे। जब झकोरे लगेंगे, तब छप्पर उड़ जायगा। घर वीरान हो जायगा। तुम्हें भी फिर स्थान बदलना ही पड़ेगा।”
(३) “किसके भाव में नदिये में आकर दीन वेश धारण कर तुम स्वयं हरि होते हुए भी हरिनाम गा रहे हो? किसका भाव लेकर तुमने यह भाव और ऐसा स्वभाव धारण किया? कुछ समझ में नहीं आता।”
श्रीरामकृष्ण गाना सुन रहे हैं, इसी समय श्री केदार चटर्जी आये और उन्होंने प्रणाम किया। वे आफिस की पोशाक में – चोगा, अचकन पहने और घड़ी चेन लगाये हुए आये हैं। परन्तु ईश्वरचर्चा होती है तो आपकी आँखों से आँसुओ की झड़ी लग जाती है। आप बड़े प्रेमी हैं। हृदय में गोपीभाव विराजमान है।
केदार को देखकर श्रीरामकृष्ण के मन में वृन्दावन की लीला का उद्दीपन होने लगा। आप प्रेमोन्मत्त हो गये। खड़े होकर केदार को सुनाते हुए इस मर्म का गाना गाने लगे –
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“क्यों सखि, वह वन अभी कितनी दूर है जहाँ मेरे श्यामसुन्दर हैं? अब तो चला नहीं जाता!”
श्रीराधिका के भावावेश में गाते ही गाते श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गये। चित्रवत् खड़े हैं। नेत्रों के दोनों कोरों से आनन्दाश्रु लुढ़क रहे हैं।
भूमिष्ठ होकर श्रीरामकृष्ण के चरणों का स्पर्श करके केदार उनकी स्तुति करने लगे –
“हृदयकमलमध्ये निर्विशेषं निरीहं हरिहरविधिवेद्यं योगिभिर्ध्यानगम्यम्।
जननमरणभीतिभ्रंशि सच्चित्स्वरूपं सकलभुवनबीजं ब्रह्मचैतन्यमीडे।।”
कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण प्रकृतिस्थ हुए। केदार को अपने घर हालीशहर से कलकत्ते में काम पर जाना था। रास्ते में दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर में श्रीरामकृष्ण के दर्शन करके जा रहे हैं। कुछ देर विश्राम करने के पश्चात् केदार ने बिदाई ली।
इसी तरह भक्तों से वार्तालाप करते हुए दोपहर का समय हो गया। श्री रामलाल श्रीरामकृष्ण के लिए थाली में कालीमाता का प्रसाद ले आये। कमरे में आसन पर दक्षिणास्य बैठकर श्रीरामकृष्ण ने प्रसाद पाया। बालकों की तरह भोजन किया – थोड़ा थोड़ा सभी कुछ खाया।
भोजन करके श्रीरामकृष्ण उसी छोटी खाट पर विश्राम करने लगे। कुछ समय पश्चात् मारवाड़ी भक्तों का आगमन हुआ।
(५)
अभ्यासयोग। दो पथ – विचार और भक्ति
दिन के तीन बजे हैं। मारवाड़ी भक्त जमीन पर बैठे हुए श्रीरामकृष्ण से प्रश्न कर रहे हैं। कमरे में मास्टर, राखाल और दूसरे भक्त भी हैं।
मारवाड़ी भक्त – महाराज, उपाय क्या है?
श्रीरामकृष्ण – उपाय दो हैं। विचार-मार्ग और अनुराग अथवा भक्ति का मार्ग।
“सत्-असत् का विचार। एकमात्र सत् या नित्य वस्तु ईश्वर हैं, और सब कुछ असत् या अनित्य है। इन्द्रजाल दिखलानेवाला ही सत्य है, इन्द्रजाल मिथ्या है। यही विचार है।
“विवेक और वैराग्य। इस सत्-असत् विचार का नाम विवेक है। वैराग्य अर्थात् संसार की वस्तुओं से विरक्ति। यह एकाएक नहीं होता – प्रतिदिन अभ्यास करना चाहिए। कामिनी-कांचन का त्याग पहले मन से करना पड़ता है। फिर तो उनकी इच्छा होते ही वह मन से त्याग कर सकता है और बाहर से भी त्याग कर सकता है। पर कलकत्ते के आदमियों से क्या मजाल जो कहा जाय कि ईश्वर के लिए सब कुछ छोड़ो! उनसे यही
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कहना पड़ता है कि मन ही में त्याग करो। अभ्यासयोग से कामिनी-कांचन में आसक्ति का त्याग होता है - यह बात गीता में है। अभ्यास से मन में असाधारण शक्ति आ जाती है। तब इन्द्रियसंयम करने और काम-क्रोध को वश में लाने में कष्ट नहीं उठाना पड़ता। जैसे कछुआ पैर समेट लेने पर फिर बाहर नहीं निकालना चाहता - कुल्हाड़ी से टुकड़े टुकड़े कर डालने पर भी बाहर नहीं निकालता।”
मारवाड़ी भक्त – महाराज, आपने दो रास्ते बतलाये। दूसरा कौनसा है?
श्रीरामकृष्ण – वह अनुराग या भक्ति का मार्ग है। व्याकुल होकर एक बार निर्जन में अकेले में दर्शन की प्रार्थना करते हुए रोओ।
“ऐ मन, जैसे पुकारा जाता है उस तरह तुम पुकारो तो सही, फिर देखो भला तुम्हें छोड़कर माँ श्यामा कैसे रह सकती हैं?”
मारवाड़ी भक्त – महाराज, साकार-पूजा का क्या अर्थ है? और निराकार-निर्गुण का क्या मतलब है?
श्रीरामकृष्ण – जैसे पिता का फोटोग्राफ देखने से पिता की याद आती है, वैसे ही प्रतिमा की पूजा करते करते सत्य के रूप की उद्दीपना होती है।
“साकार रूप कैसा है जानते हो? जैसे जलराशि से बुलबुले निकलते हैं, वैसा ही। महाकाश चिदाकाश से एक एक रूप आविर्भूत होते हुए दीख पड़ते हैं। अवतार भी एक रूप ही है। अवतार-लीला भी आद्याशक्ति ही की क्रीड़ा है।
पाण्डित्य – मैं कौन? मैं ही तुम
“पाण्डित्य में क्या रखा है? व्याकुल होकर पुकारने पर वे मिलते हैं। नाना विषयों का ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं।
“जो आचार्य हैं उन्हीं को कई विषयों का ज्ञान रखना चाहिए। दूसरों को मारने के लिए ढाल-तलवार की जरूरत होती है, परन्तु अपने को मारने के लिए एक सुई या नहरनी ही से काम चल सकता है।
“मैं कौन हूँ, इसकी ढूँढ़-तलाश करने के लिए चलो तो उन्हीं के निकट जाना पड़ता है। क्या मैं मांस हूँ? या हाड़, रक्त या मज्जा हूँ? मन या बुद्धि हूँ? अन्त में विचार करते हुए देखा जाता है कि मैं यह सब कुछ नहीं हूँ। 'नेति' 'नेति'। आत्मा वह चीज नहीं कि पकड़ में आ जाय। वह निर्गुण और निरूपाधि है।
“परन्तु भक्तिमत से वे सगुण हैं। चिन्मय श्याम, चिन्मय धाम – सब चिन्मय!”
मारवाड़ी भक्तगण प्रणाम करके बिदा हुए।
दक्षिनेश्वर में सन्ध्या और आरती
सन्ध्या हो गयी। श्रीरामकृष्ण गंगा-दर्शन कर रहे हैं। कमरे में दीपक जलाया गया।
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१४६ श्रीरामकृष्णवचनामृत १ जनवरी, १८८३
श्रीरामकृष्ण जगन्माता का नामस्मरण कर रहे हैं और अपनी खाट पर बैठे हुए उन्हीं के ध्यान में मग्न हैं!
श्रीमन्दिर में अब आरती होने लगी। जो लोग इस समय भी गंगा के किनारे या पंचवटी में घूम रहे हैं, वे दूर से आरती की मधुर घण्टाध्वनि सुन रहे हैं। ज्वार आ गयी है, भागीरथी कलकल स्वर से उत्तर की ओर बह रही हैं। आरती का मधुर शब्द इस 'कल-कल' ध्वनि से मिलकर और भी मधुर हो गया है। इस माधुर्य के भीतर प्रेमोन्मत्त श्रीरामकृष्ण बैठे हुए हैं। सब कुछ मधुर है! हृदय भी मधुमय हो रहा है!
□ □ □
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परिच्छेद २३
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परिच्छेद २३
बेलघर में गोविन्द मुखोपाध्याय के मकान पर
श्रीरामकृष्ण ने बेलघर के श्री गोविन्द मुखोपाध्याय के मकान पर शुभागमन किया है। रविवार, १८ फरवरी १८८३ ई.। नरेन्द्र, राम आदि भक्तगण आये हैं, पड़ोसीगण भी आये हैं। सबेरे सात-आठ बजे के समय श्रीरामकृष्ण ने नरेन्द्र आदि के साथ संकीर्तन में नृत्य किया था।
कीर्तन के बाद सभी बैठ गये। कई लोग श्रीरामकृष्ण को प्रणाम कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण बीच बीच में कह रहे हैं, “ईश्वर को प्रणाम करो।” फिर कह रहे हैं, “वे ही सब रूपों में हैं। परन्तु किसी किसी स्थान पर उनका विशेष प्रकाश है – जैसे साधुओं में। यदि कहो, दुष्ट लोग भी हैं, बाघ-सिंह भी तो हैं, तो वह ठीक है, परन्तु बाघरूपी नारायण से आलिंगन करने की आवश्यकता नहीं है, उसे दूर से प्रणाम करके चले जाना चाहिए। फिर देखो जल। कोई जल पिया जाता है, किसी जल से पूजा की जाती है, किसी जल से स्नान किया जाता है और फिर किसी जल से केवल हाथमुँह धोया जाता है।”
पड़ोसी – वेदान्त का क्या मत है?
श्रीरामकृष्ण – वेदान्तवादी कहते हैं, 'सोऽहं'। ब्रह्म सत्य, जगत् मिथ्या है। 'मैं' भी मिथ्या है, केवल वह परब्रह्म ही सत्य है।
“परन्तु 'मैं' तो नहीं जाता। इसलिए मैं उनका दास, मैं उनकी सन्तान, मैं उनका भक्त, यह अभिमान बहुत अच्छा है।
“कलियुग में भक्तियोग ही ठीक है। भक्ति द्वारा भी उन्हें प्राप्त किया जाता है। देहबुद्धि के रहने से विषयबुद्धि होती ही है। रूप, रस, गंध, स्पर्श – ये सब विषय हैं। विषयबुद्धि दूर होना बहुत कठिन है। विषयबुद्धि के रहते 'सोऽहं' नहीं होता।*
“संन्यासियों में विषयबुद्धि कम है। संसारीगण सदैव विषयचिन्ता लेकर ही रहते हैं, इसलिए संसारियों के लिए 'दासोऽहं' ”
पड़ोसी – हम पापी हैं, हमारा क्या होगा?
श्रीरामकृष्ण – उनका नाम-गुणगान करने से देह से सब पाप भाग जाते हैं। देहरूपी
* अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते। (गीता, १२।५)
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| १४८ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १८ फरवरी, १८८३ |
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वृक्ष पर पाप-पक्षी बैठे हुए हैं; उनका नाम-कीर्तन करना मानो ताली बजाना है। ताली बजाने से जिस प्रकार वृक्ष के ऊपर के सभी पक्षी भाग जाते हैं, उसी प्रकार उनके नाम-गुणकीर्तन से सभी पाप भाग जाते हैं।
“फिर देखो मैदान के तालाब का जल धूप से स्वयं ही सूख जाता है। इसी प्रकार उनके नाम-गुणकीर्तन से पापरूपी तालाब का जल स्वयं ही सूख जाता है।
“रोज अभ्यास करना पड़ता है। सर्कस में देख आया, घोड़ा दौड़ रहा है, उस पर मेम एक पैर पर खड़ी है। कितने अभ्यास से ऐसा हुआ होगा!
“और उनके दर्शन के लिए कम से कम एक बार रोओ।
“यही दो उपाय हैं, – अभ्यास और अनुराग, अर्थात् उन्हें देखने के लिए व्याकुलता।”
दुमँजले पर बैठकखाने के बरामदे में श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ प्रसाद पा रहे हैं। दिन के एक बजे का समय हुआ। भोजन समाप्त होने के साथ ही साथ नीचे के आँगन में एक भक्त गाने लगे।
(भावार्थ) – “जागो, जागो जननि! हे कुलकुण्डलिनि! मूलाधार में सोते हुए कितने दिन बीत गये!”
श्रीरामकृष्ण गाना सुनकर समाधिमग्न हुए। सारा शरीर स्थिर है, हाथ प्रसाद-पात्र पर जैसा था वैसा ही चित्रलिखित-सा रह गया। और भोजन न हुआ। काफी देर के बाद भाव कुछ कम होने पर कह रहे हैं, “मैं नीचे जाऊँगा, मैं नीचे जाऊँगा।”
एक भक्त उन्हें बड़ी सावधानी के साथ नीचे ले जा रहे हैं।
आँगन में ही प्रातःकाल नामसंकीर्तन तथा प्रेमानन्द में श्रीरामकृष्ण का नृत्य हुआ था। अभी तक दरी और आसन बिछा हुआ है। श्रीरामकृष्ण अभी तक भावमग्न हैं। गानेवाले के पास आकर बैठे। गायक ने इतनी देर में गाना बन्द कर दिया था। श्रीरामकृष्ण दीन भाव से कह रहे हैं, “भाई, और एक बार ‘माँ’ का नाम सुनूँगा।” गायक फिर गाना गा रहे हैं।
(भावार्थ) – “जागो, जागो, जननि! हे कुलकुण्डलिनि! मूलाधार में निद्रितावस्था में कितने दिन बीत गये! अपनी कार्यसिद्धि के लिए मस्तक की ओर चलो, जहाँ सहस्रदल पद्म में परमशिव विराजमान हैं। हे माँ, चैतन्यरूपिणी, षट्चक्र को भेदकर मन के खेद को दूर करो।”
गाना सुनते सुनते श्रीरामकृष्ण फिर भावमग्न हो गये।
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परिच्छेद २४
दक्षिणेश्वर में राखाल, राम आदि के साथ
श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में दोपहर को भोजन करके भक्तों के साथ बैठे हुए हैं। आज २५ फरवरी १८८३ ई. है।
राखाल, हरीश, लाटू, हाजरा आजकल श्रीरामकृष्ण के पास ही रहते हैं। कलकत्ते से राम, केदार, नित्यगोपाल, मास्टर आदि भक्त आये हैं और चौधरी भी आये हैं।
अभी अभी चौधरी की पत्नी का स्वर्गवास हो गया है। मन में शान्ति पाने के उद्देश्य से कुछ एक बार वे श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने के लिए आ चुके हैं। उन्हें उच्च शिक्षा मिली है, सरकारी पद पर नौकरी करते हैं।
श्रीरामकृष्ण (राम आदि भक्तों से) – राखाल, नरेन्द्र, भवनाथ, ये सब नित्यसिद्ध हैं, जन्म ही से इन्हें चैतन्य प्राप्त है। ये लोकशिक्षा के लिए ही शरीर धारण करते हैं।
“एक श्रेणी के लोग और होते हैं। वे कृपासिद्ध कहलाते हैं। एकाएक उनकी कृपा हुई कि दर्शन हुए और ज्ञानलाभ हुआ। जैसे हजार वर्षों के अँधेरे कमरे में चिराग ले जाओ तो क्षण भर में उजाला हो जाता है – धीरे धीरे नहीं होता।
निर्जन में साधना
“जो लोग संसार में हैं, उन्हें साधना करनी चाहिए। निर्जन में व्याकुल होकर ईश्वर को बुलाना चाहिए।
(चौधरी से) – “पाण्डित्य से वे नहीं मिलते।
“और उन्हें विचार करके समझनेवाला है कौन? उनके पादपद्मों में जिस से भक्ति हो, सब को वही करना चाहिए।
“उनका ऐश्वर्य अनन्त हैं – समझ में क्या आये? और उनके कार्यों को भी कोई क्या समझे?
भीष्मदेव का क्रन्दन
“भीष्मदेव जो साक्षात् अष्टवसुओं में एक हैं, शरशय्या पर रोने लगे; कहा, ‘क्या आश्चर्य! पाण्डवों के साथ सदा स्वयं भगवान् रहते हैं, फिर भी उनके दुःख और विपत्तियों का अन्त नहीं! – भगवान् के कार्यों को कोई क्या समझे!’
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१५० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २५ फरवरी, १८८३
“कोई कोई सोचते हैं कि हम भजन-पूजन करते हैं – हम जीत गये। परन्तु हारजीत उनके हाथों में है। यहाँ एक वेश्या मरने के समय ज्ञानपूर्वक गंगा-स्पर्श करके मरी !
चौधरी – किस तरह उनके दर्शन हों?
श्रीरामकृष्ण – इन आँखों से वे नहीं दीख पड़ते। वे दिव्यदृष्टि देते हैं, तब उनके दर्शन होते हैं! अर्जुन को विश्वरूप-दर्शन के समय श्रीभगवान् ने दिव्यदृष्टि दी थी।
“तुम्हारी फिलासफी (Philosophy) में सिर्फ हिसाब-किताब होता है – सिर्फ विचार करते हैं। इससे वे नहीं मिलते।
रागभक्ति – अहैतुकी भक्ति
“यदि रागभक्ति – अनुराग के साथ भक्ति – हो तो वे स्थिर नहीं रह सकते।
“भक्ति उनको उतनी ही प्रिय है जितनी बैल को सानी।
“रागभक्ति – शुद्धा भक्ति – अहैतुकी भक्ति। जैसे प्रह्लाद की।
“तुम किसी बड़े आदमी से कुछ चाहते नहीं हो, परन्तु रोज आते हो, उन्हें देखना ही चाहते हो। पूछने पर कहते हो – ‘जी, कोई काम नहीं है, बस दर्शन के लिए आ गया।’ इसे अहैतुकी भक्ति कहते हैं। तुम ईश्वर से कुछ चाहते नहीं, सिर्फ प्यार करते हो।”
यह कहकर श्रीरामकृष्ण गाने लगे। गीत का मर्म यह है : –
“ ‘मैं मुक्ति देने में कातर नहीं होता, किन्तु शुद्धा भक्ति देने में कातर होता हूँ।’
“मूल बात है ईश्वर में रागानुगा भक्ति और विवेक-वैराग्य चाहिए।”
चौधरी – महाराज, गुरु के न होने से क्या नहीं होता ?
श्रीरामकृष्ण – सच्चिदानन्द ही गुरु हैं।
“शवसाधना करते समय जब इष्टदर्शन का मौका आता है, तब गुरु सामने आकर कहते हैं, ‘यह देख अपना इष्ट।’ फिर गुरु इष्ट में लीन हो जाते हैं। जो गुरु हैं वे ही इष्ट हैं। गुरु मार्ग पर लगा देते हैं।
“अनन्त का तो व्रत, पर पूजा विष्णु की की जाती है। उसी में ईश्वर का अनन्त रूप विराजमान है।
सर्वधर्मसमन्वय
(राम आदि भक्तों से) “यदि कहो किस मूर्ति का चिन्तन करेंगे, तो जो मूर्ति अच्छी लगे, उसी का ध्यान करना। परन्तु समझना कि सभी एक हैं।
“किसी से द्वेष न करना चाहिए। शिव, काली, हरि – सब एक ही के भिन्न भिन्न रूप हैं। वह धन्य है जिसको उनके एक होने का ज्ञान हो गया है।
२५ फरवरी, १८८३ परिच्छेद २४ १५१
२५ फरवरी, १८८३ परिच्छेद २४ १५१
“बाहर शैव, हृदय में काली, मुख में हरिनाम।
“कुछ कुछ काम-क्रोधादि के न रहने से शरीर नहीं रहता। परन्तु तुम लोग घटाने ही की चेष्टा करना।”
श्रीरामकृष्ण केदार को देखकर कह रहे हैं -
“ये अच्छे हैं। नित्य भी मानते हैं, लीला भी मानते हैं। एक ओर ब्रह्म और दूसरी ओर देवलीला से लेकर मनुष्यलीला तक!”
केदार कहते हैं कि श्रीरामकृष्ण के रूप में भगवान् मनुष्यदेह धारण कर अवतीर्ण हुए हैं।
संन्यासी तथा कामिनी
नित्यगोपाल को देखकर श्रीरामकृष्ण बोले -
“इसकी अच्छी अवस्था है। (नित्यगोपाल से) तू वहाँ ज्यादा न जाना। कहीं एक-आध बार चले गए। भक्त है तो क्या हुआ – स्त्री है न? इसीलिए सावधान रहना।
“संन्यासी के नियम बड़े कठिन हैं। उसके लिए स्त्रियों के चित्र देखने की भी मनाही है। यह संसारियों के लिए नहीं है।
“स्त्री यदि भक्त भी हो तो भी उससे ज्यादा न मिलना चाहिए।
“जितेन्द्रिय होने पर भी संन्यासी को लोकशिक्षा के लिए यह सब करना पड़ता है।
“साधुपुरुष का सोलहों आना त्याग देखने पर दूसरे लोग त्याग की शिक्षा लेंगे, नहीं तो वे भी डूब जायेंगे। संन्यासी जगद्गुरु हैं।”
अब श्रीरामकृष्ण और भक्तगण उठकर घूमने लगे। मास्टर प्रह्लाद के चित्र के सामने खड़े होकर देख रहे हैं – श्रीरामकृष्ण ने कहा है कि प्रह्लाद की भक्ति अहैतुकी भक्ति है।
परिच्छेद २५
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परिच्छेद २५
दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर के अपने कमरे में राखाल, मास्टर आदि दो-एक भक्तों के साथ बैठे हैं। शुक्रवार, ९ मार्च १८८३ ई.। माघी अमावस्या, प्रातःकाल आठ-नौ बजे का समय होगा।
अमावस्या का दिन है। श्रीरामकृष्ण को सतत जगन्माता का उद्दीपन हो रहा है। वे कह रहे हैं, “ईश्वर ही वस्तु हैं, बाकी सब अवस्तु। माँ ने अपनी महामाया द्वारा मुग्ध कर रखा है। मनुष्यों में देखो, बद्ध जीव ही अधिक हैं। इतना दुःख-कष्ट पाते हैं, फिर भी उसी ‘कामिनी-कांचन’ में उनकी आसक्ति है। काँटेदार घास खाते समय ऊँट के मुँह से धर-धर खून बहता है, फिर भी वह उसे छोड़ता नहीं, खाते ही जाता है। प्रसववेदना के समय स्त्रियाँ कहती हैं, ‘ओह, अब और पति के पास नहीं जाऊँगी’, परन्तु फिर भूल जाती हैं।
“देखो, उनकी खोज कोई नहीं करता। अनन्नास को छोड़ लोग उसके पत्ते खाते हैं!”
संसार किसलिए? निष्काम कर्म द्वारा चित्तशुद्धि के लिए
भक्त – महाराज, संसार में वे क्यों रख देते हैं?
श्रीरामकृष्ण – संसार कर्मक्षेत्र है। कर्म करते करते ही ज्ञान होता है। गुरु ने कहा, इन कर्मों को करो और इन कर्मों को न करो। फिर वे निष्काम कर्म का उपदेश देते हैं।* कर्म करते करते मन का मैल धुल जाता है। अच्छे डाक्टर की चिकित्सा में रहने पर दवा खाते खाते कैसा ही रोग क्यों न हो, ठीक हो जाता है।
“संसार से वे क्यों नहीं छोड़ते? रोग अच्छा होगा तब छोड़ेंगे। कामिनी-कांचन का भोग करने की इच्छा जब न रहेगी, तब छोड़ेंगे। अस्पताल में नाम लिखाकर भाग आने का उपाय नहीं है। रोग की कसर रहते डाक्टर साहब न छोड़ेंगे।”
श्रीरामकृष्ण आजकल यशोदा की तरह सदा वात्सल्य-रस में मग्न रहते हैं, इसलिए उन्होंने राखाल को साथ रखा है। राखाल के प्रति श्रीरामकृष्ण का गोपाल-भाव है। जिस
* कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। (गीता, २।४७)
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९ मार्च, १८८३ परिच्छेद २५ १०३
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९ मार्च, १८८३ परिच्छेद २५ १०३
प्रकार माँ की गोद में छोटा लड़का जाकर बैठता है, उसी प्रकार राखाल भी श्रीरामकृष्ण की गोद के सहारे बैठते थे। मानो स्तनपान कर रहे हों।
भक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण का बान देखना
श्रीरामकृष्ण इसी भाव में बैठे हैं, इसी समय एक आदमी ने आकर समाचार दिया कि बान* आ रहा है। श्रीरामकृष्ण, राखाल, मास्टर सभी लोग बान देखने के लिए पंचवटी की ओर दौड़ने लगे। पंचवटी के नीचे आकर सभी बान देख रहे हैं। दिन के करीब साढ़े दस बजे का समय होगा। एक नौका की स्थिति को देख श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, "देखो, देखो, उस नाव की न जाने क्या दशा होगी!"
अब श्रीरामकृष्ण पंचवटी के पथ पर मास्टर, राखाल आदि के साथ बैठे हैं।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर के प्रति) – अच्छा, बान कैसे आता है? मास्टर भूमि पर रेखाएँ खींचकर पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य, माध्याकर्षण, ज्वार-भाटा, पूर्णिमा, अमावस्या, ग्रहण आदि समझाने की चेष्टा कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर के प्रति) – यह लो! समझ नहीं सक रहा हूँ। सिर घूम जाता है। चक्कर आ रहा है। अच्छा, इतनी दूर की बातें कैसे जान सके?
"देखो, मैं बचपन में चित्र अच्छी तरह खींच सकता था। परन्तु गणित से सिर चकराता था। हिसाब नहीं सीख सका।"
अब श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में लौट आये हैं। दीवार पर टँगे हुए यशोदा के चित्र को देख कह रहे हैं, "चित्र अच्छा नहीं हुआ। मानो ठीक मालिन मौसी है!"
अधर सेन को उपदेश
मध्याह्न के आहार के बाद श्रीरामकृष्ण ने थोड़ासा विश्राम किया। धीरे धीरे अधर तथा अन्य भक्तगण आ पहुँचे। अधर सेन पहली बार श्रीरामकृष्ण का दर्शन कर रहे हैं। अधर का मकान कलकत्ता, बेनेरोला में है। वे डिप्टी मैजिस्ट्रेट हैं। उम्र उनतीस-तीस वर्ष की होगी।
अधर (श्रीरामकृष्ण के प्रति) – महाराज, मुझे एक बात पूछनी है। क्या देवता के सामने बलि चढ़ाना अच्छा है? इससे तो जीवहिंसा होती है!
श्रीरामकृष्ण – शास्त्र के अनुसार, मन की एक विशेष अवस्था में बलि चढ़ायी जा सकती है। 'विधिवारीय' बलि में दोष नहीं है। जैसे, अष्टमी के दिन एक बलि चढ़ाते हैं।
* बंगाल के उपसागर में ज्वार आने पर उसका बहुतसा जल गंगा में घुस जाता है और वह विशाल जलराशि बड़ी ऊँची लहर के रूप में जोरों से गर्जना करती हुई गंगा के पृष्ठभाग पर से उलटी दिशा में वेग के साथ बढ़ने लगती है। इसे 'बान' कहते हैं। (प्र.)
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१५४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ९ मार्च, १८८३
परन्तु यह विधि सभी अवस्था के लिए नहीं है। मेरी अब ऐसी अवस्था है कि मैं सामने रहकर बलि नहीं देख सकता हूँ।
“फिर ऐसी भी अवस्था होती है कि सर्वभूतों में ईश्वर को देखता हूँ। चीटियों में भी वे ही दिखायी देते हैं। ऐसी स्थिति में एकाएक किसी प्राणी के मरने पर मन में यही सान्त्वना होती है कि उसकी देह मात्र का विनाश हुआ। आत्मा की मृत्यु नहीं है।*
“अधिक विचार करना ठीक नहीं, माँ के चरणकमल में भक्ति रहने से ही हो जाएगा। अधिक विचार करने से तब गोलमाल हो जाता है। इस देश में तालाब का जल ऊपर ऊपर से पिओ, अच्छा साफ जल पाओगे; अधिक नीचे हाथ डालकर हिलाने से जल मैला हो जाता है। इसलिए उनसे भक्ति की प्रार्थना करो। ध्रुव की भक्ति सकाम थी, उसने राज्य पाने के लिए तपस्या की थी; परन्तु प्रह्लाद की निष्काम अहैतुकी भक्ति थी।”
भक्त – ईश्वर कैसे प्राप्त होते हैं?
श्रीरामकृष्ण – उसी भक्ति के द्वारा। परन्तु उनसे जबरदस्ती करनी होती है। दर्शन नहीं देगा तो गले में छुरा भोंक लूँगा, – इसका नाम है भक्ति का तम।
भक्त – क्या ईश्वर को देखा जाता है?
श्रीरामकृष्ण – हाँ, अवश्य देखा जाता है। निराकार-साकार दोनों ही देखे जाते हैं। चिन्मय साकार रूप का दर्शन होता है। फिर साकार मनुष्य रूप में भी वे प्रत्यक्ष हो सकते हैं। अवतार को देखना और ईश्वर को देखना एक ही है। ईश्वर ही युग युग में मनुष्य के रूप में अवतीर्ण होते हैं^\dagger।
☐ ☐ ☐
* न हन्यते हन्यमाने शरीरे। (गीता, २।२०)
† धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे। (गीता, ४।८)
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परिच्छेद २६
परिच्छेद २६
दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण का जन्मोत्सव
(१)
प्रभात में भक्तों के साथ
कालीमन्दिर में आज श्रीरामकृष्ण का जन्मोत्सव है। फाल्गुन की शुक्ला द्वितीया है, दिन रविवार, ११ मार्च १८८३ ई.। आज श्रीरामकृष्ण के अन्तरंग भक्त उन्हें लेकर जन्मोत्सव मनायेंगे।
सबेरे से भक्त एक एक करके एकत्र हो रहे हैं। सामने माता भवतारिणी का मन्दिर है। मंगलारती के बाद ही प्रभाती रागिणी में मधुर तान लगाती हुई नौबत बज रही है। वसन्त का सुहावना मौसम है, लता-वृक्ष नये कोमल पल्लवों से लहराते हुए दीख पड़ते हैं। इधर श्रीरामकृष्ण के जन्मदिन की याद करके भक्तों के हृदय में आनन्द-सिन्धु उमड़ रहा है। चारों ओर आनन्द-समीरण बह रहा है। मास्टर ने देखा, इतने सबेरे ही भवनाथ, राखाल, भवनाथ के मित्र कालीकृष्ण आ गये हैं। श्रीरामकृष्ण पूर्ववाले बरामदे में बैठे हुए इनसे प्रसन्नतापूर्वक वार्तालाप कर रहे हैं। मास्टर ने श्रीरामकृष्ण को भूमिष्ठ हो प्रणाम किया।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – “तुम आये हो! (भक्तों से) लज्जा, घृणा, भय इन तीनों के रहते काम सिद्ध नहीं होता। आज कितना आनन्द होगा! परन्तु जो लोग भगवन्नाम में मत्त होकर नृत्य-गीत न कर सकेंगे, उनका कहीं कुछ न होगा। ईश्वरी चर्चा में कैसी लज्जा और कैसा भय? अच्छा, अब तुम लोग गाओ।”
भवनाथ और कालीकृष्ण गा रहे हैं। गीत इस आशय का है : –
“हे आनन्दमय! आज का दिन धन्य है! हम सब तुम्हारे सत्य-धर्म का भारत में प्रचार करेंगे। हरएक हृदय में तुम्हीं विराजित हो, चारों ओर तुम्हारे ही पवित्र नाम की ध्वनि गूँजती है, भक्त-समाज तुम्हारी स्तुति करते हैं। हे प्रभो, हमें धन, जन और मान न चाहिए, दूसरी कामना भी नहीं है, विकल जन तुम्हारी प्रार्थना कर रहे हैं। हे प्रभो, तुम्हारे चरणों में शरण ली तो फिर न विपत्ति में भय है, न मृत्यु में; मुझे तो अमृत मिल गया। तुम्हारी जय हो!”
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हाथ जोड़कर बैठे हुए मन लगाकर श्रीरामकृष्ण गाना सुन रहे हैं। गाना सुनते सुनते आपका मन सीधे भावराज्य में पहुँच गया है। श्रीरामकृष्ण का मन सूखी दियासलाई है। एक बार घिसने से उद्दीपना होती है। प्राकृत मनुष्यों का मन भीगी दियासलाई है, कितनी ही घिसो पर जलती नहीं, क्योंकि वह विषयासक्त है। श्रीरामकृष्ण बड़ी देर तक ध्यान में लगे हुए हैं। कुछ देर बाद कालीकृष्ण भवनाथ से कुछ कह रहे हैं।
पहले हरिनाम या मजदूरों की शिक्षा
कालीकृष्ण श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके उठे। श्रीरामकृष्ण ने विस्मित होकर पूछा, “कहाँ जाओगे?”
भवनाथ – कुछ काम है, इसीलिए वे जा रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – क्या काम है?
भवनाथ – श्रमजीवियों के शिक्षालय में (Baranagore Workingmen's Institute) जा रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – भाग्य ही में नहीं है। आज हरिनाम-कीर्तन में कितना आनन्द होता है, देखा नहीं। उसके भाग्य ही में नहीं था।
(२)
जन्मोत्सव में भक्तों के संग – संन्यासियों के कठिन नियम
दिन के साढ़े-आठ या नौ बजे होंगे। श्रीरामकृष्ण ने आज गंगा में स्नान नहीं किया, शरीर कुछ अस्वस्थ है। घड़ा भरकर पानी बरामदे में लाया गया। भक्त उनको स्नान करा रहे हैं। नहाते हुए श्रीरामकृष्ण ने कहा, “एक लोटा पानी अलग रख दो।” अन्त में वही पानी सिर पर डाला। आज आप बड़े सावधान हैं, एक लोटे से ज्यादा पानी सिर पर नहीं डाला।
स्नान के बाद मधुर कण्ठ से भगवान् का नाम ले रहे हैं। धोया हुआ कपड़ा पहने, एक-दो भक्तों के साथ आँगन से होते हुए कालीमाता के मन्दिर की ओर जा रहे हैं। मुख से लगातार नाम उच्चारण कर रहे हैं। चितवन बाहर की ओर नहीं है – अण्डे को सेते समय चिड़िया की दृष्टि जिस प्रकार होती है उसी के सदृश हो रही है।
कालीमाता के मन्दिर में जाकर आपने प्रणाम और पूजा की। पूजा का कोई नियम न था – गन्ध-पुष्प कभी माता के चरणों में देते हैं और कभी अपने सिर पर। अन्त में माता का निर्माल्य सिर पर रख भवनाथ से कहा, “यह लो डाब*।” माता का प्रसादी डाब था।
* कच्चा नारियल
११ मार्च, १८८३ | परिच्छेद २६ | १५७
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फिर आँगन से होते हुए अपने कमरे की तरफ आ रहे हैं। साथ में भवनाथ और मास्टर हैं। भवनाथ के हाथ में डाब है। रास्ते की दाहिनी ओर श्रीराधाकान्त का मन्दिर है, जिसे श्रीरामकृष्ण 'विष्णुघर' कहा करते थे। इन युगलमूर्तियों को देखकर आपने भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। बायीं ओर बारह शिवमन्दिर थे। शिवजी को हाथ जोड़कर प्रणाम करने लगे।
अब श्रीरामकृष्ण अपने डेरे पर पहुँचे। देखा कि और भी कई भक्त आए हुए हैं। राम, नित्यगोपाल, केदार चटर्जी आदि अनेक लोग आए हैं। उन्होंने श्रीरामकृष्ण को भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। आपने भी उनसे कुशल-प्रश्न पूछा।
नित्यगोपाल को देखकर श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, "तू कुछ खाएगा?" ये भक्त उस समय बालक के भाव में थे। इन्होंने विवाह नहीं किया था, उम्र तेईस-चौबीस वर्ष की होगी। ये सदा भावराज्य में रहते थे और कभी अकेले, कभी राम के साथ प्रायः श्रीरामकृष्ण के पास आया करते थे। श्रीरामकृष्ण इनकी भावावस्था को देखकर इनसे बड़ा प्यार करते हैं – और कभी कभी कहते हैं कि इनकी परमहंस की अवस्था है। इसलिए आप इनको गोपाल जैसे देख रहे हैं।
भक्त ने कहा, "खाऊँगा।" उनकी बातें ठीक एक बालक की सी थीं।
नित्यगोपाल को उपदेश – त्यागी के लिए स्त्रीलिंग पूर्णतया निर्विघ्न
खिलाने के बाद श्रीरामकृष्ण उनको गंगा की ओर अपने कमरे के गोल बरामदे में ले गए और उनसे बातें करने लगे।
एक परम भक्त महिला, जिनकी उम्र कोई इकतीस-बत्तीस वर्ष की होगी, श्रीरामकृष्ण के पास अक्सर आती हैं और उनकी बड़ी भक्ति करती हैं। वे भी इन भक्त की अद्भुत भावावस्था को देखकर इन्हें अपने लड़के के भाँति प्यार करती हैं और इन्हें प्रायः अपने घर लिवा ले जाती हैं।
श्रीरामकृष्ण (भक्त से) – क्या तू वहाँ जाता है?
नित्यगोपाल (बालक की तरह) – हाँ, जाता हूँ। मुझे लिवा ले जाती है।
श्रीरामकृष्ण – अरे साधु सावधान! एक-आध बार जाना, बस। ज्यादा मत जाना, नहीं तो गिर पड़ेगा! कामिनी और कांचन ही माया है। साधु को स्त्रियों से बहुत दूर रहना चाहिए। वहाँ सब डूब जाते हैं। वहाँ ब्रह्मा और विष्णु तक लोटपोट हो जाते हैं।
भक्त ने सब सुना।
मास्टर (स्वगत) – क्या आश्चर्य की बात है! इन भक्त की परमहंस की अवस्था है – यह तो आप स्वयं ही कहते हैं। इतनी उच्च अवस्था होते हुए भी इनके पतन की आशंका है! साधुओं के लिए आपने क्या ही कठिन नियम बना दिये हैं! स्त्रियों के साथ
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अधिक मिलने-जुलने से साधु का पतन होने की सम्भावना रहती है। यह उच्च आदर्श सामने न रहे तो भला जीवों का उद्धार कैसे हो? वह स्त्री तो भक्त ही है। फिर भी भय है! अब समझा, श्रीचैतन्यदेव ने छोटे हरिदास को इतनी कठोर सजा क्यों दी थी। महाप्रभु के मना करने पर भी हरिदास ने एक भक्त विधवा से वार्तालाप किया था। परन्तु हरिदास संन्यासी थे। इसलिए महाप्रभु ने उन्हें त्याग दिया। कितनी कठोर सजा! संन्यासी के लिए कितना कठिन नियम! फिर इन भक्त पर आपका कितना प्रेम है! आगे चलकर कोई विपत्ति न आ पड़े, इसलिए पहले ही से इन्हें सचेत कर रहे हैं। भक्तगण निःस्तब्ध होकर 'साधु सावधान' यह गम्भीर वाणी सुन रहे हैं।
(३)
साकार-निराकार। श्रीरामकृष्ण की रामनाम में समाधि
अब श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ अपने कमरे के उत्तर-पूर्ववाले बरामदे में आ गए हैं। भक्तों में दक्षिणेश्वर के रहनेवाले एक गृहस्थ भी बैठे हैं; वे घर पर वेदान्त की चर्चा करते हैं। श्रीरामकृष्ण के सामने वे केदार चटर्जी से शब्दब्रह्म पर बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण और अवतार-वाद – श्रीरामकृष्ण और धर्मसमन्वय
दक्षिणेश्वरवाले – यह अनाहत शब्द सदैव अपने भीतर और बाहर हो रहा है।
श्रीरामकृष्ण – केवल शब्द होने से ही तो सब कुछ नहीं हुआ। शब्द का एक प्रतिपाद्य विषय भी तो होना चाहिए। तुम्हारे नाम ही से मुझे थोड़े ही आनन्द होता है। बिना तुमको देखे सोलहों आने आनन्द नहीं होता।
दक्षिणेश्वरवाले – वह शब्द ही ब्रह्म है – अनाहत शब्द।
श्रीरामकृष्ण (केदार से) – अहा, समझे तुम? इनका ऋषियों का-सा मत है। ऋषियों ने श्रीरामचन्द्र से कहा, 'राम, हम जानते हैं कि तुम दशरथ के पुत्र हो। भरद्वाज आदि ऋषि भले ही तुम्हें अवतार जानकर पूजें, पर हम तो अखण्ड सच्चिदानन्द को चाहते हैं।' यह सुनकर राम हँसते हुए चल दिए।
केदार – ऋषियों ने राम को अवतार नहीं जाना। तो वे नासमझ थे।
श्रीरामकृष्ण (गम्भीर भाव से) – तुम ऐसा मत कहना! जिसकी जैसी रुचि! और जिसके पेट में जो चीज पचे!
"ऋषि ज्ञानी थे, इसीलिए वे अखण्ड सच्चिदानन्द को चाहते थे। पर भक्त अवतार को चाहते हैं, भक्ति का स्वाद चखने के लिए। ईश्वर के दर्शन से मन का अन्धकार हट जाता है। पुराणों में लिखा है कि जब श्रीरामचन्द्र सभा में पधारे, तब वहाँ मानो सौ सूर्यों का उदय हो गया! तो प्रश्न उठता है कि सभा में बैठे हुए लोग जल क्यों नहीं गए? इसका
११ मार्च, १८८३ परिच्छेद २६ १५९
११ मार्च, १८८३ परिच्छेद २६ १५९
उत्तर यह है कि उनकी ज्योति जड़ ज्योति नहीं है। सभा में बैठे हुए सब लोगों के हृदयकमल खिल उठे। सूर्य के निकलने से कमल खिल जाते हैं।”
श्रीरामकृष्ण खड़े होकर भक्तों से यह कह ही रहे थे कि एकाएक उनका मन बाहरी जगत् को छोड़ भीतर की ओर मुड़ गया। “हृदयकमल खिल उठे” – ये शब्द कहते ही आप समाधिमग्न हो गये।
श्रीरामकृष्ण उसी अवस्था में खड़े हैं। क्या भगवान् के दर्शन से आपका हृदयकमल खिल उठा? बाहरी जगत् का कुछ भी ज्ञान आपको नहीं है। मूर्ति की तरह आप खड़े हैं। मुँह उज्ज्वल और सहास्य है। भक्तों में से कुछ खड़े और कुछ बैठे हैं, सभी निर्वाक् होकर टकटकी लगाए प्रेमराज्य की इस अनोखी छवि को – इस अपूर्व समाधिदृश्य को – देख रहे हैं।
बड़ी देर बाद समाधि टूटी। श्रीरामकृष्ण लम्बी साँस छोड़कर बारम्बार रामनाम उच्चारण कर रहे हैं। नाम के प्रत्येक वर्ण से मानो अमृत टपक रहा है। श्रीरामकृष्ण बैठे। भक्त भी चारों तरफ बैठकर उनको एकटक देख रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (भक्तों से) – जब अवतार आते हैं, तो साधारण लोग उनको नहीं जान सकते। वे छिपकर आते हैं। दो ही चार अन्तरंग भक्त उनको जान सकते हैं। राम पूर्णब्रह्म थे, पूर्ण अवतार थे, यह बात केवल बारह ऋषियों को मालूम थी। अन्य ऋषियों ने कहा था, 'राम, हम तो तुमको दशरथ का बेटा ही समझते हैं।'
“अखण्ड सच्चिदानन्द को सब कोई थोड़े ही समझ सकते हैं! परन्तु भक्ति उसी की पक्की है, जो नित्य को पहुँचकर विलास के उद्देश्य से लीला लेकर रहता है। विलायत में क्वीन (रानी) को जब देखकर आओ, तब क्वीन की बातें, क्वीन के कार्य, इन सब का वर्णन हो सकता है। क्वीन के विषय में कहना तभी ठीक उतरता है। भरद्वाज आदि ऋषियों ने राम की स्तुति की थी और कहा था, 'हे राम, तुम्हीं वह अखण्ड सच्चिदानन्द हो! हमारे सामने तुम मनुष्य के रूप में अवतीर्ण हुए हो। सच तो यह है कि माया के द्वारा ही तुम मनुष्य जैसे दिखते हो।' भरद्वाज आदि ऋषि राम के परम भक्त थे। उन्हीं की भक्ति पक्की है।”
(४)
कीर्तन का आनन्द तथा समाधि
भक्त निर्वाक् होकर यह अवतार-तत्त्व सुन रहे हैं। कोई कोई सोच रहे हैं, 'क्या आश्चर्य है! वेदोक्त अखण्ड सच्चिदानन्द – जिन्हें वेद ने मन-वचन से परे बताया है – क्या वे ही हमारे सामने साढ़े-तीन हाथ का मनुष्य-शरीर लेकर आते हैं? जब श्रीरामकृष्ण कहते हैं तो वैसा अवश्य ही होगा! यदि ऐसा न होता तो 'राम राम' कहते हुए इन महापुरुष
१६० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ११ मार्च, १८८३
को क्यों समाधि होती? अवश्य इन्होंने हृदयकमल में राम का रूप देखा होगा।'
थोड़ी देर में कोन्नगर से कुछ भक्त मृदंग और झाँझ लिए संकीर्तन करते हुए बगीचे में आए। मनमोहन, नबाई आदि बहुतसे लोग नामसंकीर्तन करते हुए श्रीरामकृष्ण के पास उसी उत्तरपूर्ववाले बरामदे में पहुँचे। श्रीरामकृष्ण प्रेमोन्मत्त होकर उनसे मिलकर संकीर्तन कर रहे हैं।
नाचते नाचते बीच बीच में समाधि हो जाती है। तब संकीर्तन के बीच में निःस्पन्द होकर खड़े रहते हैं। उसी अवस्था में भक्तों ने उनको फूलों की बड़ी बड़ी मालाओं से सजाया। भक्त देख रहे हैं मानो सामने ही श्रीगौरांग खड़े हैं। गहरी भावसमाधि में मग्न हैं। श्रीगौरांग की तरह श्रीरामकृष्ण की भी तीन दशाएँ हैं; कभी अन्तर्दशा – तब जड़ वस्तु की भाँति आप बेहोश और निःस्पन्द हो जाते हैं; कभी अर्धबाह्य दशा – तब प्रेम से भरपूर होकर नाचते हैं; और फिर बाह्य दशा – तब भक्तों के साथ संकीर्तन करते हैं।
श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो खड़े हैं। गले में मालाएँ हैं। कहीं गिर न पड़ें इसलिए एक भक्त आपको पकड़े हुए हैं। चारों ओर भक्त खड़े होकर मृदंग और झाँझ के साथ कीर्तन कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण की दृष्टि स्थिर है। श्रीमुख पर प्रेम की छटा झलक रही है। आप पश्चिम की ओर मुँह किए हैं। बड़ी देर तक सब लोग यह आनन्दमूर्ति देखते रहे।
समाधि छूटी। दिन चढ़ गया है। थोड़ी देर बाद कीर्तन भी बन्द हुआ। भक्तगण श्रीरामकृष्ण को भोजन कराने के लिए व्यग्र हुए।
कुछ देर विश्राम के पश्चात् श्रीरामकृष्ण एक नया पीला वस्त्र पहने अपनी छोटी खाट पर बैठे। आनन्दमय महापुरुष की उस अनुपम ज्योतिर्मय रूपछबि को भक्त देख रहे हैं; पर देखने की प्यास नहीं मिटती। वे सोचते हैं कि इसे देखते ही रहें, इस रूपसागर में डूब जायें।
श्रीरामकृष्ण भोजन करने बैठे। भक्तों ने भी प्रसाद पाया।
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श्रीरामकृष्ण और सर्वधर्मसमन्वय
भोजन के उपरान्त श्रीरामकृष्ण छोटे तख्त पर आराम कर रहे हैं। कमरे में लोगों की भीड़ बढ़ रही है। बाहर के बरामदे भी लोगों से भरे हैं। कमरे के भीतर जमीन पर भक्त बैठे हैं और श्रीरामकृष्ण की ओर एकदृष्टि से ताक रहे हैं। केदार, सुरेश, राम, मनोमोहन, गिरीन्द्र, राखाल, भवनाथ, मास्टर आदि बहुत लोग वहाँ पर मौजूद हैं। राखाल के पिता आए हैं, वे भी वहीं बैठे हैं।
एक वैष्णव गोसाईं भी उसी स्थान पर बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण उनसे बातें कर रहे हैं। गोसाइयों को देखते ही श्रीरामकृष्ण सिर झुकाकर प्रणाम करते थे – कभी कभी तो उनके