श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
३० जून, १८८४ | परिच्छेद ८५ | ५६१
३० जून, १८८४ | परिच्छेद ८५ | ५६१
पण्डितजी सन्ध्या करने गये। मास्टर और बाबूराम कलकत्ता जायेंगे, श्रीरामकृष्ण को प्रणाम कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण अब भी भावावेश में हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – बात नहीं निकलती, जरा ठहरो अभी।
मास्टर बैठे। श्रीरामकृष्ण की क्या आज्ञा होती है, इसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण ने इशारे से बाबूराम से बैठने के लिए कहा। बाबूराम ने मास्टर से कहा, जरा देर और बैठिये। श्रीरामकृष्ण ने बाबूराम से हवा करने के लिए कहा। बाबूराम पंखा झल रहे हैं, और मास्टर भी।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से, सस्नेह) – तुम अब उतना नहीं आते, क्यों?
मास्टर – जी, कोई खास कारण नहीं है। घर में काम था।
श्रीरामकृष्ण – बाबूराम का घर कहाँ है, यह मैं कल समझा। इसीलिए तो इसे रखने की इतनी कोशिश कर रहा हूँ। चिड़िया समय समझकर अण्डे फोड़ती है। बात यह है कि ये सब शुद्धात्मा लड़के हैं, कभी कामिनी और कांचन में नहीं पड़े। है न?
मास्टर – जी हाँ। अभी तक कोई धक्का नहीं लगा।
श्रीरामकृष्ण – नयी हण्डी है, दूध रखा जाय तो बिगड़ नहीं सकता।
मास्टर – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – बाबूराम के यहाँ रहने की जरूरत भी है। कभी कभी मेरी अवस्था ऐसी हो जाती है कि उस समय ऐसे आदमियों का रहना जरूरी हो जाता है। उसने कहा है, धीरे धीरे रहूँगा, नहीं तो घरवाले शोरगुल मचायेंगे। मैंने कहा है, शनिवार और रविवार को आ जाया कर।
इधर पण्डितजी सन्ध्या करके आ गये। उनके साथ भूधर और बड़े भाई भी थे। पण्डितजी अब जलपान करेंगे।
भूधर के बड़े भाई कह रहे हैं, हम लोगों का क्या होगा, जरा कुछ आज्ञा कर दीजिये।
श्रीरामकृष्ण – तुम लोग मुमुक्षु हो। व्याकुलता के होने से ईश्वर मिलते हैं। श्राद्ध का अन्न न खाया करो। संसार में व्यभिचारिणी स्त्री की तरह होकर रहो। व्यभिचारिणी स्त्री घर का सब काम बड़ी प्रसन्नता से करती है, परन्तु उसका मन दिन-रात उसके यार के साथ रहता है। संसार का काम करो, परन्तु मन ईश्वर पर रखो।
पण्डितजी जलपान कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण कहते हैं, आसन पर बैठकर खाओ।
उन्होंने पण्डितजी से फिर कहा, 'तुमने गीता पढ़ी होगी। जिसे सब लोग मानें उसमें ईश्वर की विशेष शक्ति है।'
पण्डितजी –
" 'यद्यत् विभूतिमत् सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।' "
श्रीरामकृष्ण – तुम्हारे भीतर अवश्य ही उनकी शक्ति है।
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५६२ श्रीरामकृष्णवचनामृत ३० जून, १८८४
पण्डितजी – जो व्रत मैंने लिया है, क्या इसे अध्यवसाय के साथ पूरा करने की कोशिश करूँ?
श्रीरामकृष्ण ने जैसे अनुरोध की रक्षा के लिए कहा, 'हाँ होगा,' परन्तु इस बात को दबाने के लिए दूसरा प्रसंग उठा दिया।
श्रीरामकृष्ण – शक्ति को मानना चाहिए। विद्यासागर ने कहा, क्या उन्होंने किसी को ज्यादा शक्ति भी दी है? मैंने कहा, नहीं तो फिर एक आदमी सौ आदमियों को कैसे मार डालता है? क्वीन विक्टोरिया का इतना मान – इतना नाम क्यों है अगर उनमें शक्ति न होती? मैंने पूछा, तुम यह मानते हो या नहीं? तब उसने कहा, हाँ, मानता हूँ।
पण्डितजी उठे और श्रीरामकृष्ण को भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। साथवाले उनके मित्रों ने भी प्रणाम किया।
श्रीरामकृष्ण कहते हैं – "फिर आना। गंजेड़ी गंजेड़ी को देखता है, तो खुश होता है; कभी तो उसे गले से लगा लेता है। दूसरे आदमी देखकर मुँह छिपाते हैं। गाय अपने साथ की गायों को देखती है तो उनकी देह चाटती है, पर दूसरी गायों को सिर से ठोकर मारती है।" (सब हँसते हैं।)
पण्डितजी के चले जाने पर श्रीरामकृष्ण हँस हँसकर कह रहे हैं – "डाइल्यूट (Dilute = मुग्ध) हो गया है, एक ही दिन में। देखा, कैसा विनय-भाव है, और सब बातें समझकर ग्रहण कर लेता है।"
आषाढ़ की शुक्ला सप्तमी है। पश्चिमवाले बरामदे में चाँदनी छिटक रही है। श्रीरामकृष्ण अब भी वहीं बैठे हैं। मास्टर प्रणाम कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण स्नेहपूर्वक पूछ रहे हैं, क्या जाओगे?
मास्टर – जी हाँ, अब चलता हूँ।
श्रीरामकृष्ण – एक दिन मैंने सोचा कि सब के यहाँ एक-एक बार जाऊँगा – क्यों?
मास्टर – जी हाँ, बड़ी कृपा होगी।
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परिच्छेद ८६
परिच्छेद ८६
साधना की आवश्यकता
(१)
पुनर्यात्रा दिन
श्रीरामकृष्ण बलराम बाबू के बैठकखाने में भक्तों के साथ बैठे हुए हैं। श्रीमुख पर प्रसन्नता झलक रही है, भक्तों से बातचीत कर रहे हैं।
आज रथ की पुनर्यात्रा है, दिन बृहस्पति है, ३ जुलाई १८८४, आषाढ़ की शुक्ला दशमी। श्रीयुत बलराम के यहाँ जगन्नाथजी की सेवा होती है, एक छोटा सा रथ भी है। उन्होंने पुनर्यात्रा के उपलक्ष्य में श्रीरामकृष्ण को निमन्त्रण भेजा था। यहाँ छोटा रथ, घर के बाहरवाले दुमंजले बरामदे में चलाया जाता है।
गत २५ जून बुधवार को रथयात्रा का प्रथम दिन था। श्रीरामकृष्ण ने श्रीयुत ईशान मुखोपाध्याय के यहाँ आकर निमन्त्रण स्वीकार किया था। उसी दिन पिछले पहर कालेज स्ट्रीट में भूधर के यहाँ पण्डित शशधर के साथ उनकी पहली मुलाकात हुई थी। तीन दिन की बात है, दक्षिणेश्वर में शशधर श्रीरामकृष्ण से मिले थे।
श्रीरामकृष्ण की आज्ञा पाकर बलराम ने आज शशधर को न्योता भेजा है। पण्डितजी हिन्दूधर्म की व्याख्या करके लोगों को शिक्षा देते हैं।
श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ बातचीत कर रहे हैं। पास ही राम, मास्टर, बलराम, मनोमोहन, कई बालक भक्त, बलराम के पिता आदि बैठे हैं। बलराम के पिता वैष्णव हैं, बड़े निष्ठावान हैं। वे प्रायः वृन्दावन में अपने ही प्रतिष्ठित कुंज में अकेले रहते हैं और श्रीश्यामसुन्दर विग्रह की सेवा करते हैं। वृन्दावन में वे अपना सारा समय देवसेवा में ही लगाते हैं। कभी कभी चैतन्य-चरितामृत आदि भक्तिग्रन्थों का पाठ करते हैं। कभी किसी भक्तिग्रन्थ की दूसरी लिपि उतारते हैं। कभी बैठे हुए स्वयं ही फूलों की माला तैयार करते हैं। कभी वैष्णवों का निमन्त्रण करके उनकी सेवा करते हैं। श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने के लिए बलराम ने उन्हें पत्र पर पत्र भेजकर कलकत्ता बुलाया है। 'सभी धर्मों में साम्प्रदायिक भाव है, खासकर वैष्णवों में। दूसरे मत वाले एक दूसरे से विरोध करते हैं, वे समन्वय करना नहीं जानते।' – यही बात श्रीरामकृष्ण भक्तों से कह रहे हैं।
५६४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ३ जुलाई, १८८४
श्रीरामकृष्ण – (बलराम के पिता और दूसरे भक्तों से) – वैष्णवों का एक ग्रन्थ है भक्तमाल, बड़ी अच्छी पुस्तक है। भक्तों की सब बातें उसमें हैं। परन्तु एक ही ढर्रे की है। एक जगह भगवती को विष्णुमन्त्र दिलाया है, तब पिण्ड छोड़ा है!
“‘मैंने वैष्णवचरण की बड़ी तारीफ करके सेजो बाबू के पास बुलवाया था। सेजो बाबू ने खूब खातिर की। चाँदी के बर्तन निकालकर उन्हीं में उनको जलपान कराया। फिर जब बातें होने लगीं, तब उसने सेजो बाबू के सामने कह डाला – ‘हमारे केशव-मन्त्र के बिना कुछ होने-जाने का नहीं।’ सेजो बाबू देवी के उपासक थे। इतना सुनते ही उनका मुँह लाल हो गया। मैंने वैष्णव चरण का हाथ दबा दिया।
“सुना है कि श्रीमद्भागवत जैसे ग्रन्थ में भी इस तरह की बातें हैं। ‘केशव का मन्त्र बिना लिये भवसागर के पार जाना कुत्ते की पूँछ पकड़कर महासमुद्र पार करना है।’ भिन्न-भिन्न मतवालों ने अपने ही मत को प्रधान बतलाया है।
“शाक्त भी वैष्णवों को छोटा सिद्ध करने की चेष्टा करते हैं। श्रीकृष्ण भव-नदी के नाविक हैं, पार कर देते हैं, इस पर शाक्त लोग कहते हैं – ‘हाँ, यह बिलकुल ठीक है, क्योंकि हमारी माँ राजराजेश्वरी हैं, भला वे कभी खुद आकर पार कर सकती हैं? – कृष्ण को पार करने के लिए नौकर रख लिया है।’ (सब हँसते हैं।)
“अपने मत पर लोग अहंकार भी कितना करते हैं! उस देश (कामारपुकुर), श्यामबाजार आदि स्थानों में कोरी बहुत हैं। उनमें बहुत से वैष्णव हैं। वे बड़ी लम्बी लम्बी बातें मारते हैं। कहते हैं, ‘अरे ये किस विष्णु को मानते हैं – पाता (पालनकर्ता) विष्णु को? – उसे तो हम लोग छुयेंगे भी नहीं! कौन शिव? – हम लोग तो आत्माराम शिव – आत्मारामेश्वर शिव को मानते हैं।’ कोई दूसरा बोल उठा, ‘तुम लोग समझाओ भी तो, किस हरि को मानते हो?’ इधर कपड़े बुनते हैं और उधर इतनी लम्बी लम्बी बातें!
“रति की माँ, रानी कात्यायनी की सहचरी है; – वैष्णवचरण के दल की है, कट्टर वैष्णवी। यहाँ बहुत आया-जाया करती थी। भक्ति का खूब दिखलावा था, ज्योंही मुझे उसने काली का प्रसाद पाते हुए देखा कि भागी।
“जिसने समन्वय किया है, वही मनुष्य है। अधिकतर आदमी एक खास ढर्रे के होते हैं। परन्तु मैं देखता हूँ, सब एक हैं। शाक्त, वैष्णव, वेदान्त मत, सब उसी एक को लेकर हैं; जो साकार हैं वे ही निराकार हैं, उन्हीं के अनेक रूप हैं। ‘निर्गुण मेरे पिता हैं, सगुण मेरी माँ; मैं किसकी निन्दा करूँ और किसकी वन्दना, दोनों ही पलड़े भारी हैं।’ वेदों में जिनकी बात है उन्हीं की बात तन्त्रों में है और पुराणों में भी उसी एक सच्चिदानन्द की बातें हैं। जो नित्य हैं, लीला भी उन्हीं की है।
“वेदों में है – ॐ सच्चिदानन्द ब्रह्म। तन्त्रों में है – ॐ सच्चिदानन्दः शिवः –
३ जुलाई, १८८४ | परिच्छेद ८६ | ५६५
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शिवः केवलः – केवलः शिवः। पुराणों में हैं – ॐ सच्चिदानन्दः कृष्णः। उसी एक सच्चिदानन्द की बात वेदों, पुराणों और तन्त्रों में है। और वैष्णव-शास्त्र में भी है कि कृष्ण स्वयं काली हुए थे।”
(२)
श्रीरामकृष्ण की परमहंस अवस्था - बालकवत् और उन्मादवत्
श्रीरामकृष्ण जरा बरामदे की ओर जाकर फिर कमरे की ओर चले आये। बाहर जाते समय विश्वम्भर की लड़की ने उन्हें नमस्कार किया था, उसकी उम्र छः-सात साल की होगी। कमरे में उनके चले जाने पर लड़की उनसे बातचीत कर रही है। उसके साथ और भी दो-तीन उसी की उम्र के लड़के-लड़कियाँ हैं।
विश्वम्भर की लड़की – (श्रीरामकृष्ण से) – मैंने तुम्हें नमस्कार किया, तुमने देखा भी नहीं!
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – कहाँ, मैंने नहीं देखा।
कन्या – तो खड़े हो जाओ, फिर नमस्कार करूँ। खड़े हो जाओ, इधर से भी करूँ।
श्रीरामकृष्ण हंसते हुए बैठ गये और जमीन तक सिर झुकाकर कुमारी को प्रतिनमस्कार किया। श्रीरामकृष्ण ने लड़की को गाने के लिए कहा। लड़की ने कहा – भाई-कसम, मैं गाना नहीं जानती।
उससे अनुरोध करने पर उसने कहा, भाई-कसम कहने पर फिर कभी कहा जाता है? श्रीरामकृष्ण उनके साथ आनन्द कर रहे हैं और गाना सुना रहे हैं, बच्चों के गीत।
बच्चे और भक्त गाना सुनकर हँस रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – परमहंस का स्वभाव बिलकुल पाँच साल के बच्चे का-सा होता है। वह सब चेतन देखता है।
“मैं जब उस देश में (कामारपुकुर में) रहता था तब रामलाल का भाई (शिवराम) ४-५ साल का था; तालाब के किनारे पतिंगे पकड़ने जा रहा था। एक पत्ता हिल रहा था। पत्ते की खड़खड़ाहट से शिकार कहीं भाग न जाय, इस विचार से वह पत्ते से कहने लगा – ‘अरे चुप! मैं पतिंगा पकडूूँगा।’ पानी बरस रहा था और आँधी भी चल रही थी। रह रहकर बिजली चमकती थी, फिर भी द्वार खोलकर वह बाहर जाना चाहता था। डाटने पर फिर बाहर न गया, झाँक-झाँककर देखने लगा, बिजली चमक रही थी, तो कहा – चाचा, फिर चकमकी घिस रहा है!
“परमहंस बालक की तरह होते हैं – उनके लिए न कोई अपना है, न कोई पराया। सांसारिक सम्बन्ध की कोई परवाह नहीं है। रामलाल के भाई ने एक दिन कहा, तुम चाचा
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हो या मौसा?
"परमहंसों का चाल-चलन भी बालकों का-सा होता है; कोई हिसाब नहीं रहता कि कहाँ जायें। सब ब्रह्ममय देखते हैं। कहाँ जा रहे हैं, कहाँ चल रहे हैं, कुछ हिसाब नहीं। रामलाल का भाई हृदय के यहाँ दुर्गापूजा देखने गया था। हृदय के यहाँ से आप ही आप किसी तरफ चला गया। किसी को इसका पता भी न चला। चार वर्ष के लड़के को देखकर लोग पूछने लगे, तू कहाँ से आ रहा है? वह कुछ न कह सकता था। उसने सिर्फ कहा – चाला* अर्थात् जिस आठ चाले में पूजा हो रही है। जब लोगों ने पूछा, तू किसके यहाँ से आ रहा है? तब उसने कहा – दादा।
"परमहंसों की पागलों की-सी अवस्था भी होती है। दक्षिणेश्वर की मन्दिर-प्रतिष्ठा के कुछ दिन बाद एक पागल आया था। वह पूर्ण ज्ञानी था – फटे जूते पहने था, एक हाथ में बांस की एक कमची लिये था और दूसरे में गमले में लगा हुआ एक आम का पौधा। गंगा में डुबकी मारकर उठा, न सन्ध्या, न पूजन; कपड़े में कुछ लिये हुए था, वही खाने लगा। फिर कालीमन्दिर में जाकर स्तव करने लगा। मन्दिर काँप उठा था! हलधारी उस समय मन्दिर में था। अतिथिशाला में लोगों ने उसे खाने को नहीं दिया था, परन्तु उसने जरा भी परवाह नहीं की। जूठी पत्तलें खींच खींचकर उनमें जो कुछ लगा था, वही खाने लगा; जहाँ कुत्ते खा रहे थे वहीं कभी-कभी कुत्तों को हटाकर खाता था। कुत्तों ने उसका कुछ नहीं किया। हलधारी उसके पीछे-पीछे गया था। पूछा – 'तुम कौन हो? क्या तुम पूर्ण ज्ञानी हो?' तब उसने कहा था – 'मैं पूर्ण ज्ञानी हूँ! चुप!!'
"मैंने हलदारी से जब ये सब बातें सुनीं, मेरा कलेजा दहलने लगा, मैं हृदय से लिपट गया। माँ से कहा – 'माँ, तो क्या वही अवस्था मेरी भी होगी?' हम लोग उसे देखने गये। हम लोगों से खूब ज्ञान की बातें करता था, दूसरे आदमी आते तो वही पागलपन शुरू कर देता था। जब वह गया, तब हलधारी बहुत दूर तक उसके साथ गया था। फाटक पार करते समय उसने हलधारी से कहा था, 'तुझे मैं क्या कहूँ? जब तलैया और गंगाजी के पानी में भेद-बुद्धि न रह जाय, तब समझना कि पूर्ण ज्ञान हुआ।' इतना कहकर उसने अपना सीधा रास्ता पकड़ा।"
पाण्डित्य की अपेक्षा तपस्या का प्रयोजन। साधना
श्रीरामकृष्ण मास्टर से बातचीत कर रहे हैं। पास ही भक्तगण भी बैठे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – शशधर को तुम क्या समझते हो?
मास्टर – जी, बहुत अच्छा।
* बड़े बड़े छप्परों से छाये हुए बंगले को बंगाल में 'आठ चाला' अर्थात् आठ चालियों या छप्परोंवाला मकान कहते हैं।
३ जुलाई, १८८४ | परिच्छेद ८६ | ५६७
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श्रीरामकृष्ण – बड़ा बुद्धिमान है न?
मास्टर – जी हाँ, उसमें खूब पाण्डित्य है।
श्रीरामकृष्ण – गीता का मत है, जिसे बहुत से लोग मानते, जानते हैं, उसके भीतर ईश्वर की शक्ति है। परन्तु शशधर के कुछ काम बाकी हैं।
“सूखे पाण्डित्य से क्या होगा? कुछ तपस्या चाहिए – कुछ साधना चाहिए।
“गौरी पण्डित ने साधना की थी। जब वह स्तुतियाँ पढ़ता था – ॐ निरालम्बो लम्बोदर – तब अन्य पण्डित केंचुए हो जाते थे।
“नारायण शास्त्री भी केवल पण्डित नहीं, उसने भी साधना की है।
“नारायण शास्त्री पचीस साल तक एक ही बहाव में पड़ा था। सात साल तक सिर्फ न्याय पढ़ा था। फिर भी 'हर हर' कहते ही भावमग्न हो जाता था। जयपुर के महाराजा ने उसे अपना सभापण्डित बनाना चाहा था। उसने वह काम मंजूर नहीं किया। दक्षिणेश्वर में प्रायः आकर रहता था। वशिष्ठाश्रम जाने की उसकी बड़ी इच्छा थी। तपस्या करने के लिए जाने की बात प्रायः मुझसे कहा करता था। मैंने उसे वहाँ जाने के लिए मना किया, तब उसने कहा, किसी दिन दम खतम हो जायेगा, फिर साधना कब करूँगा? जब उसने हठ पकड़ा, तब मैंने कह दिया – अच्छा जाओ।
“सुनता हूँ, कोई कोई कहते हैं, नारायण शास्त्री का देहान्त हो गया है। तपस्या करते समय किसी भैरव ने चपत मारी थी। कोई कोई कहते हैं, वे बचे हुए हैं, अभी उनको रेल पर सवार कराके हम आ रहे हैं।
“केशव सेन को देखने से पहले नारायण शास्त्री से मैंने कहा, तुम एक बार जाकर उन्हें देख आओ और मुझे बताओ कि वे कैसे आदमी हैं। वह देखकर जब आया, तब कहा, वह जप करके सिद्ध हो गया है। नारायण ज्योतिष जानता था। उसने कहा, 'केशव सेन भाग्य का बड़ा जबरदस्त है। मैंने उससे संस्कृत में बातचीत की थी। वह भाषा (बंगाली) बोलता था।
“तब मैं हृदय को साथ लेकर बेलघर के बगीचे में केशव से मिला। उसे देखते ही मैंने कहा था, 'इन्हीं की पूँछ गिर गयी है – ये पानी में भी रह सकते हैं और जमीन पर भी।'”
श्रीरामकृष्ण पूँछ गिरने की लोकोक्ति के द्वारा कह रहे हैं कि यही केशव हैं जो संसार में भी रहते हैं और ईश्वर में भी।
“मेरी परीक्षा लेने के लिए तीन ब्राह्मसमाजियों को केशव ने काली-मन्दिर भेजा। उनमें प्रसन्न भी था। बात यह थी कि वे रात-दिन मुझे देखेंगे और केशव के पास खबर भेजते रहेंगे। मेरे घर में रात को सोये। बस 'दयामय' 'दयामय' करते थे और मुझसे कहते थे, 'तुम केशव बाबू की पैरवी करो तो तुम्हारे लिए अच्छा होगा।' मैंने कहा, 'मैं साकार
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जो मानता हूँ।' उन्होंने 'दयामय, दयामय' कहना न छोड़ा; तब मेरी एक दूसरी अवस्था हो गयी। उस अवस्था में मैंने कहा – 'हटो यहाँ से।' घर के भीतर मैंने उन्हें किसी तरह न रहने दिया। वे सब बरामदे में पड़े रहे।
“कप्तान ने भी जिस दिन मुझे पहले-पहल देखा, उस दिन रात को यहीं रह गया।
“नारायण जब था तब एक दिन माइकेल आया था। मथुर बाबू का बड़ा लड़का द्वारका बाबू उसे अपने साथ ले आया था। मैगजीन के साहबों के साथ मुकदमा होनेवाला था। इस पर सलाह लेने के लिए बाबुओं ने माइकेल को बुलाया था।
“दफ्तर के साथ ही बड़ा कमरा है। वहीं माइकेल से मुलाकात हुई थी। मैंने नारायणशास्त्री को बातचीत करने के लिए कहा। संस्कृत में माइकेल अच्छी तरह बातचीत न कर सका। तब भाषा (बँगला) में बातचीत हुई।
“नारायण शास्त्री ने पूछा, तुमने अपना धर्म क्यों छोड़ा? माइकेल ने पेट दिखाकर कहा, पेट के लिए छोड़ना पड़ा।
“नारायण शास्त्री ने कहा, 'जो पेट के लिए धर्म छोड़ता है, उससे क्या बातचीत करूँ।' तब माइकेल ने मुझसे कहा, आप कुछ कहिये।
“मैंने कहा, न जाने क्यों मेरी कुछ बोलने की इच्छा नहीं होती। किसी ने मेरा मुँह जैसे दबा रखा हो।”
श्रीरामकृष्ण के दर्शनों के लिए चौधरी बाबू के आने की बात थी।
मनोमोहन – चौधरी नहीं आयेंगे; उन्होंने कहा है, फरीदपुर का वह शशधर जायेगा, अतएव मैं न जाऊँगा।
श्रीरामकृष्ण – कैसा नीचप्रकृती है! – विद्या का अहंकार दिखलाता है! उधर दूसरा विवाह किया है – संसार को तिनके बराबर समझने लगा है।
चौधरी ने एम. ए. पास किया है। पहली स्त्री की मृत्यु होने पर बड़ा वैराग्य था। श्रीरामकृष्ण के पास दक्षिणेश्वर प्रायः जाता था। उसने दूसरा विवाह किया है। तीन-चार सौ रुपया महीना पाता है।
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – इस कामिनी-कांचन की आसक्ति ने आदमी को नीच बना डाला है। हरमोहन जब पहले आया था तब उसके लक्षण बड़े अच्छे थे। उसे देखने के लिए मेरा जी व्याकुल हो जाता था। तब उसकी उम्र १७-१८ की रही होगी। मैं अक्सर उसे बुला भेजता था, पर वह न आता था। अब बीबी को लेकर अलग मकान में रहता है! जब अपने मामा के यहाँ रहता था, तब बड़ा अच्छा था। संसार की कोई झंझट न थी। अब अलग मकान लेकर रोज बीबी के लिए बाजार करता है। (सब हँसते हैं।) उस रोज वहाँ गया था। मैंने कहा, जा, यहाँ से चला जा; तुझे छूते मेरी देह किस तरह की हो जाती है।
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कर्ताभजा चन्द्र चैटर्जी आये है। उम्र साठ-पैंसठ की होगी। मुख पर कर्ताभजावालों के श्लोक रहते हैं। श्रीरामकृष्ण के पैर दबाने के लिए जा रहे थे, उन्होंने पैर छूने ही न दिये, हँसकर कहा, इस समय तो खूब हिसाबी बातें कर रहा है। भक्तगण हँसने लगे।
अब श्रीरामकृष्ण बलराम के अन्तःपुर में श्रीजगन्नाथ-दर्शन करने के लिए जा रहे हैं। वहाँ की स्त्रियाँ उनके दर्शनों के लिए व्याकुल हो रही हैं।
श्रीरामकृष्ण फिर बैठकखाने में आये। हँस रहे हैं, कहा, “मैं शौच को गया था, कपड़े बदलकर श्रीजगन्नाथ के दर्शन किये और कुछ फूल-दल चढ़ाये।
“विषयी लोगों की पूजा, जप, तप, सब सामयिक हैं। जो लोग ईश्वर के सिवा और कुछ नहीं जानते, वे साँस के साथ साथ उनका नाम लेते हैं। कोई मन ही मन सदा ‘राम ॐ राम’ जपता रहता है। ज्ञानमार्गी ‘सोऽहम् सोऽहम्’ जपते हैं। किसी-किसी की जीभ सदा हिलती रहती है।
“सदा ही स्मरण-मनन रहना चाहिए।”
(४)
शशधर आदि भक्तगण। समाधि में श्रीरामकृष्ण
पण्डित शशधर दो-एक मित्रों के साथ कमरे में आये और श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके आसन ग्रहण किया।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – हम लोग वधू-सखियों के समान शय्या के पास बैठे हुए जाग रहे हैं कि कब वर आयें।
पण्डित शशधर हँस रहे हैं। अनेक भक्त उपस्थित हैं। बलराम के पिता भी उपस्थित हैं। डाक्टर प्रताप भी आये हुए हैं। श्रीरामकृष्ण फिर बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (शशधर से) – ज्ञान का पहला लक्षण है, स्वभाव शान्त हो; दूसरा, अभिमान न रहे। तुममें दोनों लक्षण हैं।
“ज्ञानी के और भी कुछ लक्षण हैं। साधु के पास वह त्यागी है, कार्य करते समय – जैसे लेक्चर देते हुए – वह सिंह के समान है, स्त्री के पास रसराज है, रसशास्त्र का पण्डित। (पण्डितजी और दूसरे लोग हँसते हैं।)
“विज्ञानी का और स्वभाव है। जैसे चैतन्यदेव की अवस्था। बालकवत्, उन्मत्तवत्, जड़वत्, पिशाचवत्।
“बालक की अवस्था में कई अवस्थाएँ हैं – बाल्य, कैशोर्य, यौवन। किशोरावस्था में दिल्लगी सूझती है। उपदेश देते समय यौवनावस्था होती है।”
पण्डितजी – किस तरह की भक्ति से वे मिलते हैं?
५७० श्रीरामकृष्णवचनामृत ३ जुलाई, १८८४
श्रीरामकृष्ण – प्रकृति के अनुसार भक्ति तीन तरह की है। भक्ति का सत्त्व, भक्ति का रज और भक्ति का तम।
"भक्ति का सत्त्व ईश्वर ही समझ सकते हैं। उस तरह का भक्त भाव छिपाना पसन्द करता है। कभी वह मसहरी के भीतर बैठकर ध्यान करता है। कोई समझ नहीं सकता। सत्त्व का सत्त्व अर्थात् शुद्ध सत्त्व के बन जाने पर फिर ईश्वर-दर्शन में देर नहीं रहती; जैसे पूरब की ओर ललाई छा जाने पर यह समझने में देर नहीं होती कि अब शीघ्र ही सूरज निकलेंगे।
"जिसे भक्ति का रजोभाव होता है, उसकी इच्छा होती है कि लोग देखें, जानें कि मैं भक्त हूँ। वह षोडशोपचार से उनकी पूजा करता है। रेशम की धोती पहनकर श्रीठाकुर-मन्दिर में जाता है, गले में रुद्राक्ष की माला धारण करता है जिसमें मुक्ता और कहीं कहीं सोने के दाने पड़े रहते हैं!
"भक्ति का तमोभाव वह है जिसमें डाके का मतलब दीख पड़े। डाकू बड़े बड़े हथियार लेकर डाका डालते हैं, आठ थानेदारों को भी नहीं डरते – मुख पर 'मारो – लूट लो' लगा रहता है; पागल की तरह 'बम शंकर' कहते जाते हैं; मन में पूरा भरोसा, पक्का बल और जीता-जागता विश्वास!
"शाक्तों का भी विश्वास ऐसा ही है। – क्या, एक बार मैं काली का नाम ले चुका, दुर्गा को पुकारा, राम-नाम जपा, इतने पर भी मुझे पाप छू ले?
"वैष्णवों के भाव में बड़ी दीनता है। वे लोग बस माला फेरते रहते हैं, रोते-कलपते हुए कहते हैं, हे कृष्ण! दया करो, मैं अधम हूँ, मैं पापी हूँ!
"ज्वलन्त विश्वास चाहिए। ऐसा विश्वास कि मैंने उनका नाम लिया है, मुझे फिर कैसा पाप? – पर कुछ लोग रात-दिन ईश्वर का नाम लेते हैं और कहते हैं – मैं पापी हूँ!"
यह कहते ही श्रीरामकृष्ण का प्रेम-पारावार उमड़ चला। वे गाने लगे। गाना सुनकर शशधर की आँखों में आँसू आ गये। गीतों का भाव यह है –
(१) यदि दुर्गा-दुर्गा कहते हुए मेरे प्राण निकलेंगे तो अन्त में इस दीन को तुम कैसे नहीं तारती हो, मैं देखूँगा। ब्राह्मणों का नाश करके, गर्भपात करके, मदिरा पीकर और स्त्री-हत्या करके भी मैं नहीं डरता। मुझे विश्वास है कि इतने पर भी मुझे ब्रह्मपद की प्राप्ति होगी।
(२) शिव के साथ सदा ही रंग करती हुई तू आनन्द में मग्न है। सुधापान करके, तेरे पैर तो लड़खड़ा रहे हैं, पर, माँ, तू गिर नहीं जाती।
अब अधर के गवैये वैष्णवचरण गा रहे हैं – भाव इस प्रकार है।
(१) ऐ मेरी रसने, सदा दुर्गा-नाम का जप कर। बिना दुर्गा के इस दुर्गम मार्ग में और
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३ जुलाई, १८८४ परिच्छेद ८६ ५७१
कौन निस्तार करनेवाला है? तुम स्वर्ग हो, मर्त्य और पाताल हो। हरि, ब्रह्मा और द्वादश गोपाल भी तुम्हीं से हुए हैं; ऐ माँ, तुम दसों महाविद्याएँ हो, दस बार तुमने अवतार लिया है। अबकी बार किसी तरह मुझे पार करना ही होगा। माँ, तुम चल हो, अचल हो, तुम सूक्ष्म हो, तुम स्थूल हो, सृष्टि-स्थिति और प्रलय तुम हो, तुम इस विश्व की मूल हो। तुम तीनों लोक की जननी हो, तीनों लोक की त्राणकारिणी हो। तुम सब की शक्ति हो, तुम स्वयं अपनी शक्ति हो।
इस गाने को सुनकर श्रीरामकृष्ण को भावावेश हो गया। गाना समाप्त होने पर खुद गाने लगे। उनके बाद वैष्णवचरण ने फिर गाया। इस बार उन्होंने कीर्तन गाया। कीर्तन सुनते ही श्रीरामकृष्ण निर्बीज समाधि में लीन हो गये। शशधर की आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी।
श्रीरामकृष्ण समाधि से उतरे। गाना भी समाप्त हो गया। शशधर, प्रताप, रामदयाल, राम, मनमोहन आदि बालक भक्त तथा और भी बहुत से आदमी बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं, तुम लोग कुछ छेड़ते क्यों नहीं? (शशधर से कुछ पूछते क्यों नहीं?)
रामदयाल – (शशधर से) – ब्रह्म की रूप-कल्पना शास्त्रों में है, परन्तु वह कल्पना करते कौन हैं?
शशधर – ब्रह्म स्वयं। वह मनुष्य की कल्पना नहीं।
प्रताप – क्यों, वे रूप की कल्पना क्यों करते हैं?
श्रीरामकृष्ण – उनकी इच्छा, वे इच्छामय जो हैं। वे किसी से सलाह करके कुछ थोड़े ही करते हैं? क्यों वे करते हैं, इस बात से हमें क्या मतलब? बगीचे में आम खाने के लिए आये हो, आम खाओ – कितने पेड़ हैं, कितनी हजार डालियाँ हैं, कितने लाख पत्ते हैं, इस हिसाब से क्या काम? वृथा तर्क और विचार करने से वस्तुलाभ नहीं होता।
प्रताप – तो अब विचार न करें?
श्रीरामकृष्ण – वृथा तर्क और विचार न करो। हाँ, सदसत् का विचार करो कि क्या नित्य है और क्या अनित्य – काम, क्रोध और शोक आदि के समय में।
पण्डितजी – वह और चीज है, उसे विवेकात्मक विचार कहते हैं।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, सदसत् विचार। (सब चुप हैं।)
श्रीरामकृष्ण – (पण्डितजी से) – पहले बड़े बड़े आदमी आते थे।
पण्डितजी – क्या धनी आदमी?
श्रीरामकृष्ण – नहीं, बड़े बड़े पण्डित।
इतने में छोटा रथ बाहर के दुमंजले वाले बरामदे में लाया गया। श्रीजगन्नाथ, बलराम और सुभद्रादेवी पर अनेक प्रकार की फूल-मालाएँ पड़ी हुई उनकी शोभा बढ़ा रही
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५७२ श्रीरामकृष्णवचनामृत ३ जुलाई, १८८४
हैं। सब नये नये अलंकार और नये नये वस्त्र धारण किये हुए हैं। बलराम की सात्त्विक पूजा होती है। उसमें कोई आडम्बर नहीं किया जाता। बाहर के आदमियों को जरा भी खबर नहीं कि भीतर रथ चल रहा है।
श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ रथ के सामने आये। उसी बरामदे में रथ खींचा जायगा। श्रीरामकृष्ण ने रथ की रस्सी पकड़ी और कुछ देर खींचा। फिर गाने लगे।
(भावार्थ) – “श्रीगौरांग के प्रेम की हिलोरों में नदिया डावाडोल हो रहा है।”
श्रीरामकृष्ण नृत्य कर रहे हैं। भक्तगण भी उनके साथ नाचते हुए गा रहे हैं। कीर्तनिया वैष्णवचरण भी सब में मिल गये।
देखते ही देखते सारा बरामदा भर गया। स्त्रियाँ भी पासवाले कमरे से यह सब आनन्द देख रही हैं। मालूम हो रहा था कि श्रीवास के घर में भगवत्प्रेम से विह्वल होकर श्रीगौरांग भक्तों के साथ नृत्य कर रहे हैं। मित्रों के साथ पण्डितजी भी रथ के सामने खड़े हुए इस नृत्य-गीत का दर्शन कर रहे हैं।
अभी शाम नहीं हुई है। श्रीरामकृष्ण बैठकखाने में चले आये। भक्तों के साथ आसन ग्रहण किया।
श्रीरामकृष्ण – (पण्डितजी से) – इसे भजनानन्द कहते हैं। संसारी लोग विषयानन्द में मग्न रहते हैं – वह कामिनी-कांचन का आनन्द है। भजन करते ही करते जब उनकी कृपा होती है, तब वे दर्शन देते हैं – तब उसे ब्रह्मानन्द कहते हैं।
शशधर और भक्तमण्डली चुपचाप सुन रही है।
पण्डितजी – (विनयपूर्वक) – अच्छा जी, किस तरह व्याकुल होने पर मन की यह सरस अवस्था होती है?
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर के दर्शन के लिए जब प्राण डूबते उतराते रहते हैं, तब वह व्याकुलता होती है। गुरु ने शिष्य से कहा, आओ, तुम्हें दिखा दें, किस तरह व्याकुल होने पर वे मिलते हैं। इतना कहकर वे शिष्य को एक तालाब के किनारे ले गये। वहाँ उसे पानी में डुबाकर ऊपर से दबा रखा। थोड़ी देर बाद शिष्य को निकालकर उन्होंने पूछा, कहो, तुम्हारा जी कैसा हो रहा था? उसने कहा, ‘मुझे तो ऐसा मालूम हो रहा था कि मानो मेरे प्राण निकल रहे हों। एक बार सांस लेने के लिए मैं छटपटा रहा था।’
पण्डितजी – हाँ हाँ, ठीक है, अब मैं समझा।
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर को प्यार करना, यही सार वस्तु है। भक्ति एकमात्र सार वस्तु है। नारद ने राम से कहा, ‘ऐसा करो कि तुम्हारे पादपद्मों में मेरी सदा शुद्धा भक्ति रहे। अभी के समान संसार को मुग्ध कर लेनेवाली तुम्हारी माया में न पहूँ।’ श्रीरामचन्द्र ने कहा, कोई दूसरा वर लो। नारद ने कहा, ‘मुझे और कुछ न चाहिए। तुम्हारे पादपद्मों में भक्ति रहे – इतना ही बहुत है।’
३ जुलाई, १८८४ | परिच्छेद ८६ | ५७३
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पण्डितजी जानेवाले हैं। श्रीरामकृष्ण ने कहा, इनके लिए गाड़ी मँगवा दो।
पण्डितजी – जी नहीं, हम लोग ऐसे ही चले जायेंगे।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – कभी ऐसा भी हो सकता है? – 'ब्रह्मा भी तुम्हें ध्यान में नहीं पाते'।
पण्डितजी – अभी जाने की कोई जरूरत न थी, परन्तु सन्ध्या अभी करनी है।
श्रीरामकृष्ण – “माँ की इच्छा से मेरे सन्ध्यादि कर्म छूट गये हैं। सन्ध्यादि के द्वारा देह और मन की शुद्धि की जाती है। वह अवस्था अब नहीं।” यह कहकर श्रीरामकृष्ण ने गाने के एक चरण की आवृत्ति की।
(भावार्थ) “शुचिता और अशुचिता के साथ दिव्यभवन में तू कब सोयेगा? उन दोनों सौतों में जब प्रीति होगी तभी तू श्यामा माँ को पा सकेगा।”
पण्डित शशधर प्रणाम करके बिदा हुए।
राम – कल मैं शशधर के पास गया था, आपने कहा था।
श्रीरामकृष्ण – कहाँ, मैंने तो नहीं कहा; परन्तु तुम गये तो अच्छा किया।
राम – एक संवाद-पत्र (Indian Empire) का संपादक आपकी निन्दा कर रहा था।
श्रीरामकृष्ण – तो इससे क्या हुआ, की होगी।
राम – और भी तो सुनिये। मुझसे आपकी बात सुनकर मुझे छोड़ता ही न था, आपकी बात और सुनना चाहता था।
प्रताप अब भी बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण ने उनसे कहा, वहाँ एक बार जाना, भुवन ने कहा है, भाड़ा दूँगा।
शाम हो गयी है। श्रीरामकृष्ण जगज्जननी का नाम ले रहे हैं। कभी राम नाम करते हैं, कभी कृष्णनाम, कभी हरिनाम। भक्तगण चुपचाप सुन रहे हैं। इतने मधुर कण्ठ से नाम ले रहे हैं, जैसे मधु की वर्षा हो रही हो। आज बलराम का मकान नवद्वीप हो रहा है। बाहर नवद्वीप और भीतर वृन्दावन।
आज रात को ही श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर जायेंगे। बलराम उन्हें अन्तःपुर में लिये जा रहे हैं, जलपान कराने के लिए। इस सुयोग में स्त्रियाँ भी उनके दर्शन कर लेंगी।
इधर बाहर के बैठकखाने में भक्तगण उनकी प्रतीक्षा करते हुए एक साथ कीर्तन करने लगे। श्रीरामकृष्ण भी बाहर आकर उनके साथ मिल गये। खूब कीर्तन होने लगा।
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परिच्छेद ८७
श्रीरामकृष्ण तथा समन्वय
(१)
कुण्डलिनी और षट्चक्र-भेद
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर में दोपहर के भोजन के बाद भक्तों के साथ बैठे हैं। दिन के दो बजे होंगे।
शिवपुर से बाउलों (एक तरह के गानेवालों) का दल और भवानीपुर से भक्तगण आये हुए हैं। श्रीयुत राखाल, लाटू और हरीश आजकल हमेशा यहीं रहते हैं। कमरे में बलराम और मास्टर हैं।
आज श्रावण की शुक्ला द्वादशी है, ३ अगस्त, १८८४। झूलनयात्रा का दूसरा दिन है। कल श्रीरामकृष्ण सुरेन्द्र के घर गये थे। वहाँ शशधर आदि भक्त भी आपके दर्शन करने के लिए आये थे।
श्रीरामकृष्ण शिवपुर के भक्तों से बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – कामिनी और कांचन में मन पड़ा रहा तो योग नहीं होता। साधारण जीवों का मन लिंग, गुदा और नाभि में रहता है। बड़ी साधना करने के बाद कहीं कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होती है। नाड़ियाँ तीन हैं, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना। सुषुम्ना के भीतर छः पद्म हैं। सब से नीचे वाले पद्म को मूलाधार कहते हैं। उसके ऊपर हैं स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा। इन्हें षट्चक्र कहते हैं।
"कुण्डलिनी-शक्ति जब जागती है तब वह मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, इन सब पद्मों को क्रमशः पार करती हुई हृदय के अनाहत पद्म में आकर विश्राम करती है। जब लिंग, गुह्य और नाभि से मन हट जाता है, तब ज्योति के दर्शन होते हैं। साधक आश्चर्यचकित होकर ज्योति देखता है और कहता है, 'यह क्या, यह क्या!'
"छहों चक्रों का भेद हो जाने पर कुण्डलिनी सहस्रार पद्म में पहुँच जाती है; तब समाधि होती है।
"वेदों के मत से ये सब चक्र एक एक भूमि हैं। इस तरह सात भूमियाँ हैं। हृदय चौथी भूमि है। हृदयवाले अनाहत-पद्म के बारह दल हैं।
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३ अगस्त, १८८४ | परिच्छेद ८७ | ५७५
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“विशुद्ध-चक्र पाँचवीं भूमि है। जब मन यहाँ आता है तब केवल ईश्वरी प्रसंग कहने और सुनने के लिए प्राण व्याकुल होते हैं। इस चक्र का स्थान कण्ठ है। वह पद्म सोलह दलों का है। जिसका मन इस चक्र पर आया है, उसके सामने अगर विषय की बातें - कामिनी और कांचन की बातें होती हैं, तो उसे बड़ा कष्ट होता है। उस तरह की बातें सुनकर वह वहाँ से उठ जाता है।
“इसके बाद छठी भूमि है आज्ञाचक्र। यह दो दलों का है। कुण्डलिनी जब यहाँ पहुँचती है, तब ईश्वरी रूप के दर्शन होते हैं। परन्तु फिर भी कुछ ओट रह जाती है, जैसे लालटेन के भीतर की बत्ती, जान तो पड़ता है कि हम बत्ती पकड़ सकते हैं, परन्तु शीशे के भीतर है - एक पर्दा है, इसलिए छुई नहीं जाती।
“इससे आगे चलकर सातवीं भूमि है सहस्रार पद्म। कुण्डलिनी के वहाँ जाने पर समाधि होती है। सहस्रार में सच्चिदानन्द शिव हैं, वे शक्ति के साथ मिलित हो जाते हैं। शिव और शक्ति का मेल।
“सहस्रार में मन के आने पर निर्बीज समाधि होती है। तब बाह्यज्ञान कुछ भी नहीं रह जाता। मुख में दूध डालने से दूध गिर जाता है। इस अवस्था में रहने पर इक्कीस दिन में मृत्यु हो जाती है। काले पानी में जाने पर जहाज फिर नहीं लौटता।
“ईश्वरकोटि और अवतारी पुरुष ही इस अवस्था से उतर सकते हैं। वे भक्ति और भक्त लेकर रहते हैं, इसीलिए उतर सकते हैं। ईश्वर उनके भीतर ‘विद्या का मैं’ - ‘भक्त का मैं’ केवल लोकशिक्षा के लिए रख देते हैं। उनकी अवस्था फिर ऐसी होती है कि छठी और सातवीं भूमि के भीतर ही वे चक्कर लगाया करते हैं।
“समाधि के बाद कोई कोई इच्छापूर्वक ‘विद्या का मैं’ रख छोड़ते हैं। उस ‘मैं’ में कोई मजबूत पकड़ नहीं है, वह ‘मैं’ की एक रेखा मात्र है।
“हनुमान ने साकार और निराकार के दर्शनों के बाद ‘दास मैं’ रखा था। नारद, सनक, सनन्द, सनातन, सनत्कुमार आदि लोगों ने भी ब्रह्म-साक्षात्कार के बाद ‘दास मैं’, ‘भक्त मैं’ रख छोड़ा था। ये सब जहाज की तरह हैं। स्वयं भी पार जाते हैं और साथ बहुत से आदमियों को भी पार ले जाते हैं।
“परमहंस निराकारवादी भी हैं और साकारवादी भी। निराकारवादी जैसे त्रैलंगस्वामी। इनके जैसे परमहंस केवल अपने ही हित के लिए चिन्ता करते हैं। यदि उन्हें स्वयं को इष्ट-प्राप्ति हो जाती है तो वे उसी से सन्तुष्ट हो जाते हैं।
“ब्रह्मज्ञान के बाद भी जो लोग साकारवादी होते हैं, वे लोकशिक्षा के लिए भक्ति लेकर रहते हैं। वे उस घड़े के सदृश हैं जो मुँह तक लबालब भरा है। उसमें से थोड़ा पानी किसी दूसरे बर्तन में भी डाला जा सकता है।
“इन लोगों ने जिन साधनाओं के द्वारा ईश्वर को प्राप्त किया है, उनकी बातें लोक-
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शिक्षा के लिए कही जाती हैं। इस तरह लोगों का कल्याण होता है। पानी पीने के लिए बड़ी मेहनत करके कुआँ खोदा गया, फावड़ा और कुदार लेकर। कुआँ खुद जाने पर कोई कोई कुदार आदि उसी में छोड़ देते हैं, क्योंकि फिर खोदने की कोई जरूरत नहीं रही। परन्तु कोई कोई कन्धे में डाले फिरते हैं, दूसरे के उपकार के लिए।
“कोई आम छिपाकर खाता है, फिर मुँह पोंछकर लोगों से मिलता है, और कोई कोई दूसरे को देकर खाते हैं, लोक-शिक्षा के लिए भी और लोगों को स्वाद चखाने के लिए भी। मैं चीनी खाना अधिक पसन्द करता हूँ, चीनी बन जाना नहीं।
“गोपियों को भी ब्रह्मज्ञान हुआ था, परन्तु वे ब्रह्मज्ञान नहीं चाहती थीं। वे ईश्वर का संभोग करना चाहती थीं, कोई वात्सल्यभाव से, कोई सख्यभाव से, कोई मधुरभाव से और कोई दासीभाव से।”
शिवपुर के भक्त गोपीयन्त्र बजाकर गा रहे हैं। पहले गाने में कह रहे हैं, “हम लोग पापी हैं, हमारा उद्धार करो।”
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – भय दिखाकर या भय खाकर ईश्वर की भक्ति करना प्रवर्तकों का भाव है। उन्हें पा जाने के गीत गाओ। आनन्द के गाने। (राखाल से) नवीन नियोगी के यहाँ उस दिन कैसा गाना हो रहा था? – ‘नाम की मदिरा पीकर मस्त हो जाओ।’
“केवल अशान्ति की बात भी नहीं सुहाती। ईश्वर को लेकर आनन्द करना, उन्हें लेकर मस्त हो रहना।”
शिवपुर के भक्त – क्या आपका एक-आध गाना न होगा?
श्रीरामकृष्ण – मैं क्या गाऊँगा? अच्छा, जब भाव आ जायगा तब मैं गाऊँगा।
कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण गाने लगे। गाते हुए आप ऊर्ध्वदृष्टि हैं। आपने कई गाने गाये। एक का भाव नीचे दिया जाता है।
“श्यामा माँ ने कैसी कल बनायी है। वह साढ़े तीन हाथ की कल के भीतर कितने ही रंग दिखा रही है। वह स्वयं कल के भीतर रहती है और डोर पकड़कर अपनी इच्छा के अनुसार उसे घुमाती रहती है – परन्तु कल कहती है, मैं खुद घूम रही हूँ। वह नहीं जानती कि घुमानेवाली कोई दूसरी ही है। जिसने कल का हाल मालूम कर लिया है, उसे फिर कल नहीं बनना पड़ता। किसी किसी कल की भक्ति की डोर से तो श्यामा माँ स्वयं आकर बँध जाती है।”
(२)
समाधि में श्रीरामकृष्ण। प्रेमतत्त्व
यह गाना गाते हुए श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गये। भक्तगण स्तब्ध भाव से
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निरीक्षण कर रहे हैं। कुछ देर बाद कुछ प्राकृत दशा के आने पर श्रीरामकृष्ण माता के साथ वार्तालाप करने लगे।
“माँ, ऊपर से (सहस्रार से) यहाँ उतर आओ! — क्यों जलाती हो! — चुपचाप बैठो।
“माँ, जिसके जो संस्कार हैं, वे तो होकर ही रहेंगे। — मैं और इससे क्या कहूँ? विवेक-वैराग्य के हुए बिना कुछ होता नहीं।
“वैराग्य कितने ही तरह के हैं। एक ऐसा है जिसे मर्कटवैराग्य कहते हैं, वह वैराग्य संसार की ज्वाला से जलकर होता है, वह अधिक दिन नहीं टिकता। और सच्चा वैराग्य भी है। एक व्यक्ति के पास सब कुछ है, किसी वस्तु का अभाव नहीं, फिर भी उसे सब कुछ मिथ्या जान पड़ता है।
“वैराग्य एकाएक नहीं होता। समय के आये बिना नहीं होता। परन्तु एक बात है, वैराग्य के सम्बन्ध में सुन लेना चाहिए। जब समय आयेगा, तब इसकी याद होगी कि हाँ, कभी सुना था।
“एक बात और है। इन सब बातों को सुनते सुनते विषय की इच्छा थोड़ी थोड़ी करके घटती जाती है। शराब के नशे को घटाने के लिए थोड़ा थोड़ा चावल का पानी पिया जाता है। इस तरह धीरे-धीरे नशा घटता रहता है।
“ज्ञानलाभ करने के अधिकारी बहुत ही कम हैं। गीता में कहा है — हजारों आदमियों में कहीं एक उनके जानने की इच्छा करता है। और ऐसी इच्छा करनेवाले हजारो में से कहीं एक ही उन्हें जान पाता है।”
तान्त्रिक भक्त — 'मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चित् यतति सिद्धये' आदि।
श्रीरामकृष्ण — संसार की आसक्ति जितनी ही घटती जायगी, ज्ञान भी उतना ही बढ़ता जायगा। आसक्ति अर्थात कामिनी और कांचन की आसक्ति।
“प्रेम सभी को नहीं होता। गौरांग को हुआ था। जीवों को भाव हो सकता है। बस ईश्वरकोटि को — जैसे अवतारों को — प्रेम होता है। प्रेम के होने पर संसार तो मिथ्या जान पड़ेगा ही, किन्तु इतने प्यार की वस्तु जो यह शरीर है, यह भी भूल जायगा।
“पारसियों के ग्रन्थ में लिखा है, चमड़े के भीतर मांस है, मांस के भीतर हड्डियाँ, हड्डियों के भीतर मज्जा, इसके बाद और भी न जाने क्या क्या; और सब के भीतर प्रेम!
“प्रेम से मनुष्य कोमल हो जाता है। प्रेम से कृष्ण त्रिभंग हो गये हैं।
“प्रेम के होने पर सच्चिदानन्द को बाँधनेवाली रस्सी मिल जाती है। उसे पकड़कर खींचने ही से हुआ। जब बुलाओगे तभी पाओगे।
“भक्ति के पकने पर भाव होता है। भाव के पकने पर सच्चिदानन्द को सोचकर वह निर्वाक् रह जाता है। जीवों के लिए बस यहीं तक है। और फिर भाव के पकने पर महाभाव या प्रेम होता है। जैसे कच्चा आम और पका हुआ आम।
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“शुद्धा भक्ति ही एकमात्र सार वस्तु है और सब मिथ्या है।
“नारद के स्तुति करने पर श्रीरामचन्द्र ने कहा, तुम वरदान लो। नारद ने शुद्धा भक्ति माँगी और कहा, हे राम, अब ऐसा करो जिससे तुम्हारी भुवनमोहिनी माया से मुग्ध न हो जाऊँ। राम ने कहा, यह तो जैसे हुआ, दूसरा वर माँगो।
“नारद ने कहा, और कुछ न चाहिए, केवल भक्ति की प्रार्थना है।
“यह भक्ति भी कैसे हो? पहले साधुओं का संग करना चाहिए। सत्संग करने पर ईश्वरी बातों पर श्रद्धा होती है। श्रद्धा के बाद निष्ठा है, तब ईश्वर की बातों को छोड़ और कुछ सुनने की इच्छा नहीं होती। उन्हीं के काम करने को जी चाहता है।
“निष्ठा के बाद भक्ति है, इसके बाद भाव, फिर महाभाव और वस्तुलाभ।
“महाभाव और प्रेम अवतारों को होता है। संसारी जीवों का ज्ञान, भक्तों का ज्ञान और अवतार-पुरुषों का ज्ञान बराबर नहीं। संसारी जीवों का ज्ञान जैसे दीपक का उजाला है। उससे घर के भीतर ही प्रकाश होता है और वहीं की चीजें देखी जा सकती हैं। उस ज्ञान से खाना-पीना, घर-गृहस्थी का काम सम्हालना, शरीर की रक्षा, सन्तान-पालन, बस, यही सब होता है।
“भक्त का ज्ञान जैसे चाँदनी; भीतर भी दिखायी पड़ता है और बाहर भी; परन्तु बहुत दूर की चीज या बहुत छोटी चीज नहीं दिखायी देती। अवतार आदि का ज्ञान मानो सूर्य का प्रकाश है। भीतर-बाहर छोटी-बड़ी वस्तु, सभी दिखायी देती हैं।
“यह सच है कि संसारी जीवों का मन गंदले पानी की तरह बना हुआ है। परन्तु फिटकरी छोड़ने पर वह साफ हो सकता है। विवेक और वैराग्य उनके लिए फिटकरी है।”
अब श्रीरामकृष्ण शिवपुर के भक्तों से बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – आप लोगों को कुछ पूछना हो तो पूछिये।
भक्त – जी! सब तो सुन रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – सुन रखना अच्छा है, परन्तु समय के बिना हुए होता नहीं।
“जब ज्वर बहुत रहता है, तब कुनैन देने से क्या होगा? फीवर-मिक्सचर देकर दस्त कराने पर जब बुखार कुछ उतर जाता है, तब कुनैन दी जा सकती है।
“और किसी किसी का बुखार ऐसे भी अच्छा हो जाता है। कुनैन नहीं देनी पड़ती।
“लड़के ने सोते समय अपनी माँ से कहा था, माँ, जब मुझे टट्टी की हाजत हो तब जगा देना। उसकी माँ ने कहा, बेटा, टट्टी की हाजत तुम्हें स्वयं उठा देगी।
“कोई कोई यहाँ आता है, देखता हूँ, वह किसी भक्त के साथ नाव पर चढ़कर आता है, परन्तु ईश्वर की बातें उसे नहीं सुहातीं। वह सदा अपने मित्र को कोंचता रहता है, कि कब उठे। जब उसका मित्र किसी तरह न उठा तब उसने कहा, अच्छा तो तुम यहाँ बैठो, मैं तब तक चलकर नाव पर बैठता हूँ।
३ अगस्त, १८८४ | परिच्छेद ८७ | ५७९
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“जिन्हें पहली ही बार आदमी का चोला मिला है, उन्हें भोग की आवश्यकता है। कुछ काम जब तक किये हुए नहीं होते तब तक चेतना नहीं आती।”
श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले की ओर जायेंगे। गोल बरामदे में मास्टर से कह रहे हैं –
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – अच्छा, यह मेरी कैसी अवस्था है?
मास्टर – (सहास्य) – जी, बाहर से देखने में तो आपकी सहज अवस्था है, परन्तु भीतर बड़ी गम्भीर है – आपकी अवस्था समझना बड़ा कठिन है।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – हाँ, जैसे पक्की फर्श; लोग ऊपर तो देखते हैं, परन्तु भीतर क्या है, यह नहीं जानते।
चाँदनीवाले घाट में बलराम आदि कुछ भक्त कलकत्ता जाने के लिए नाव पर चढ़ रहे हैं। दिन का तीसरा प्रहर है, चार बजे होंगे। गंगा में भाटा है, उस पर दक्षिणवाली हवा बह रही है। गंगा का वक्षस्थल तरंगों से शोभित हो रहा है।
बलराम की नौका बागबाजार की ओर जा रही है। मास्टर बड़ी देर से खड़े हुए देख रहे हैं।
नाव जब दृष्टि से ओझल हो गयी, तब वे श्रीरामकृष्ण के पास लौट आये।
श्रीरामकृष्ण पश्चिमवाले बरामदे से उतर रहे हैं। झाऊतल्ला जायेंगे। उत्तर-पश्चिम के कोने में बड़े ही सुहावने मेघ उमड़े हुए हैं। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं – क्या वर्षा होगी? जरा छाता तो ले आओ। मास्टर छाता ले आये। लाटू भी साथ हैं।
श्रीरामकृष्ण पंचवटी में आये। लाटू से कह रहे हैं – तू दुबला क्यों हुआ जा रहा है?
लाटू – कुछ खाया नहीं जाता।
श्रीरामकृष्ण – क्या बस यही कारण है? मौसम बड़ा खराब है – और शायद तू अधिक ध्यान करता है –
(मास्टर से) “यह भार तुम पर है – बाबूराम से कहना राखाल के चले जाने पर दो-एक दिन के लिए आकर रह जाया करे, नहीं तो मेरे मन में बड़ी अशान्ति रहेगी।”
मास्टर – जी हाँ, मैं कह दूँगा।
सरल होने पर ही ईश्वर मिलते हैं। श्रीरामकृष्ण पूछ रहे हैं, बाबूराम सरल है न?
श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले से दक्षिण ओर आ रहे हैं। मास्टर और लाटू पंचवटी के नीचे उत्तर दिशा की ओर मुँह किये खड़े हैं।
श्रीरामकृष्ण के पीछे नये नये बादलों की छाया गंगा के विशाल वक्ष पर पड़ रही है, अपूर्व शोभा है! गंगाजल काला सा दिख रहा है।
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५८० श्रीरामकृष्णवचनामृत ३ अगस्त, १८८४
(३)
श्रीरामकृष्ण तथा विरोधी शास्त्रों का समन्वय
श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में आकर बैठे। बलराम आम ले आये थे। श्रीरामकृष्ण श्रीयुत राम चैटर्जी से कह रहे हैं, अपने लड़के के लिए कुछ आम लेते जाओ। कमरे में श्रीयुत नवाई चैतन्य बैठे हैं। ये लाल रंग की धोती पहनकर आये हैं।
उत्तरवाले लम्बे बरामदे में श्रीरामकृष्ण हाजरा से वार्तालाप कर रहे हैं। ब्रह्मचारी ने श्रीरामकृष्ण को हरताल भस्म दिया है। वही बात हो रही है।
श्रीरामकृष्ण – ब्रह्मचारी की दवा मुझ पर खूब असर करती है। आदमी सच्चा है।
हाजरा – परन्तु बेचारा संसार में पड़ गया – क्या करे! कोन्नगर से नवाई चैतन्य आये हुए हैं। परन्तु संसारी होकर लाल धोती पहनना!
श्रीरामकृष्ण – क्या कहूँ! मैं देखता हूँ, ये सब मनुष्य-रूप ईश्वर ने स्वयं धारण किये हैं, इसी कारण किसी को कुछ कह नहीं सकता।
श्रीरामकृष्ण फिर कमरे के भीतर आये। हाजरा से नरेन्द्र की बात कह रहे हैं।
हाजरा – नरेन्द्र फिर मुकदमे में पड़ गया है।
श्रीरामकृष्ण – शक्ति नहीं मानता। देह धारण करके शक्ति को मानना चाहिए।
हाजरा – नरेन्द्र कहता है, मैं मानूँगा तो फिर सभी लोग मानने लगेंगे, इसीलिए मैं नहीं मान सकता।
श्रीरामकृष्ण – इतना बढ़ना अच्छा नहीं। अब तो शक्ति के ही इलाके में आया है। जज साहब भी जब गवाही देते हैं, तब उन्हें गवाहियों के कटघरे पर उठकर खड़ा होना पड़ता है।
श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं – “क्या तुमसे नरेन्द्र की भेंट नहीं हुई?”
मास्टर – जी नहीं, इधर नहीं हुई।
श्रीरामकृष्ण – एक बार मिलना और गाड़ी पर बिठाकर ले आना। (हाजरा से) अच्छा यहाँ उसका क्या सम्बन्ध है?
हाजरा – आपसे उसे सहायता मिलेगी।
श्रीरामकृष्ण – और भवनाथ? शुभ संस्कार के हुए बिना यहाँ कभी इतना आ सकता है?
“अच्छा, हरीश और लाटू सदा ही ध्यान किया करते हैं, यह कैसा?”
हाजरा – हाँ, ठीक तो है, सदा ध्यान करना कैसा? यहाँ रहकर आपकी सेवा करे, तो बात दूसरी है।
श्रीरामकृष्ण – शायद तुम ठीक कहते हो। लेकिन कोई बात नहीं। कोई उनकी
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