श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
३ अगस्त, १८८४ | परिच्छेद ८७ | ५७९
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“जिन्हें पहली ही बार आदमी का चोला मिला है, उन्हें भोग की आवश्यकता है। कुछ काम जब तक किये हुए नहीं होते तब तक चेतना नहीं आती।”
श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले की ओर जायेंगे। गोल बरामदे में मास्टर से कह रहे हैं –
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – अच्छा, यह मेरी कैसी अवस्था है?
मास्टर – (सहास्य) – जी, बाहर से देखने में तो आपकी सहज अवस्था है, परन्तु भीतर बड़ी गम्भीर है – आपकी अवस्था समझना बड़ा कठिन है।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – हाँ, जैसे पक्की फर्श; लोग ऊपर तो देखते हैं, परन्तु भीतर क्या है, यह नहीं जानते।
चाँदनीवाले घाट में बलराम आदि कुछ भक्त कलकत्ता जाने के लिए नाव पर चढ़ रहे हैं। दिन का तीसरा प्रहर है, चार बजे होंगे। गंगा में भाटा है, उस पर दक्षिणवाली हवा बह रही है। गंगा का वक्षस्थल तरंगों से शोभित हो रहा है।
बलराम की नौका बागबाजार की ओर जा रही है। मास्टर बड़ी देर से खड़े हुए देख रहे हैं।
नाव जब दृष्टि से ओझल हो गयी, तब वे श्रीरामकृष्ण के पास लौट आये।
श्रीरामकृष्ण पश्चिमवाले बरामदे से उतर रहे हैं। झाऊतल्ला जायेंगे। उत्तर-पश्चिम के कोने में बड़े ही सुहावने मेघ उमड़े हुए हैं। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं – क्या वर्षा होगी? जरा छाता तो ले आओ। मास्टर छाता ले आये। लाटू भी साथ हैं।
श्रीरामकृष्ण पंचवटी में आये। लाटू से कह रहे हैं – तू दुबला क्यों हुआ जा रहा है?
लाटू – कुछ खाया नहीं जाता।
श्रीरामकृष्ण – क्या बस यही कारण है? मौसम बड़ा खराब है – और शायद तू अधिक ध्यान करता है –
(मास्टर से) “यह भार तुम पर है – बाबूराम से कहना राखाल के चले जाने पर दो-एक दिन के लिए आकर रह जाया करे, नहीं तो मेरे मन में बड़ी अशान्ति रहेगी।”
मास्टर – जी हाँ, मैं कह दूँगा।
सरल होने पर ही ईश्वर मिलते हैं। श्रीरामकृष्ण पूछ रहे हैं, बाबूराम सरल है न?
श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले से दक्षिण ओर आ रहे हैं। मास्टर और लाटू पंचवटी के नीचे उत्तर दिशा की ओर मुँह किये खड़े हैं।
श्रीरामकृष्ण के पीछे नये नये बादलों की छाया गंगा के विशाल वक्ष पर पड़ रही है, अपूर्व शोभा है! गंगाजल काला सा दिख रहा है।
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५८० श्रीरामकृष्णवचनामृत ३ अगस्त, १८८४
(३)
श्रीरामकृष्ण तथा विरोधी शास्त्रों का समन्वय
श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में आकर बैठे। बलराम आम ले आये थे। श्रीरामकृष्ण श्रीयुत राम चैटर्जी से कह रहे हैं, अपने लड़के के लिए कुछ आम लेते जाओ। कमरे में श्रीयुत नवाई चैतन्य बैठे हैं। ये लाल रंग की धोती पहनकर आये हैं।
उत्तरवाले लम्बे बरामदे में श्रीरामकृष्ण हाजरा से वार्तालाप कर रहे हैं। ब्रह्मचारी ने श्रीरामकृष्ण को हरताल भस्म दिया है। वही बात हो रही है।
श्रीरामकृष्ण – ब्रह्मचारी की दवा मुझ पर खूब असर करती है। आदमी सच्चा है।
हाजरा – परन्तु बेचारा संसार में पड़ गया – क्या करे! कोन्नगर से नवाई चैतन्य आये हुए हैं। परन्तु संसारी होकर लाल धोती पहनना!
श्रीरामकृष्ण – क्या कहूँ! मैं देखता हूँ, ये सब मनुष्य-रूप ईश्वर ने स्वयं धारण किये हैं, इसी कारण किसी को कुछ कह नहीं सकता।
श्रीरामकृष्ण फिर कमरे के भीतर आये। हाजरा से नरेन्द्र की बात कह रहे हैं।
हाजरा – नरेन्द्र फिर मुकदमे में पड़ गया है।
श्रीरामकृष्ण – शक्ति नहीं मानता। देह धारण करके शक्ति को मानना चाहिए।
हाजरा – नरेन्द्र कहता है, मैं मानूँगा तो फिर सभी लोग मानने लगेंगे, इसीलिए मैं नहीं मान सकता।
श्रीरामकृष्ण – इतना बढ़ना अच्छा नहीं। अब तो शक्ति के ही इलाके में आया है। जज साहब भी जब गवाही देते हैं, तब उन्हें गवाहियों के कटघरे पर उठकर खड़ा होना पड़ता है।
श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं – “क्या तुमसे नरेन्द्र की भेंट नहीं हुई?”
मास्टर – जी नहीं, इधर नहीं हुई।
श्रीरामकृष्ण – एक बार मिलना और गाड़ी पर बिठाकर ले आना। (हाजरा से) अच्छा यहाँ उसका क्या सम्बन्ध है?
हाजरा – आपसे उसे सहायता मिलेगी।
श्रीरामकृष्ण – और भवनाथ? शुभ संस्कार के हुए बिना यहाँ कभी इतना आ सकता है?
“अच्छा, हरीश और लाटू सदा ही ध्यान किया करते हैं, यह कैसा?”
हाजरा – हाँ, ठीक तो है, सदा ध्यान करना कैसा? यहाँ रहकर आपकी सेवा करे, तो बात दूसरी है।
श्रीरामकृष्ण – शायद तुम ठीक कहते हो। लेकिन कोई बात नहीं। कोई उनकी
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३ अगस्त, १८८४ | परिच्छेद ८७ | ५८१
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जगह दूसरा आ जायगा।
हाजरा कमरे से चले गये। अभी सन्ध्या होने में देर है। श्रीरामकृष्ण कमरे में बैठे हुए माता के साथ एकान्त में बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मणि से) – अच्छा, भाव की अवस्था में मैं जो कुछ कहता हूँ, क्या इससे लोग आकर्षित होते हैं?
मणि – जी हाँ, खूब होते हैं।
श्रीरामकृष्ण – आदमी क्या सोचते हैं? भाववाली अवस्था देखने पर क्या कुछ समझ में आता है?
मणि – जान पड़ता है, एक ही आधार में ज्ञान, प्रेम, वैराग्य और सहज अवस्था विराजमान हैं। भीतर कितनी उथलपुथल मच गयी है, फिर भी बाहर से सहज भाव दीख पड़ता है। यह अवस्था बहुतेरे नहीं समझ सकते। परन्तु कुछ लोग उसी पर आकृष्ट होते हैं।
श्रीरामकृष्ण – घोषपाड़ा के मत में ईश्वर को सहज कहते हैं। और कहते हैं, सहज हुए बिना सहज को कोई पहचान नहीं सकता।
(मणि से) “अच्छा मुझमें अभिमान है?”
मणि – जी हाँ, कुछ है शरीर की रक्षा और भक्ति तथा भक्तों के लिए – ज्ञानोपदेश के लिए। यह भी तो आपने प्रार्थना करके रखा है।
श्रीरामकृष्ण – मैंने नहीं रखा, उन्हीने रख छोड़ा है। अच्छा भावावेश के समय क्या होता है?
मणि – आपने उस समय कहा, मन के छठी भूमि पर जाने से ईश्वरी रूप के दर्शन होते हैं। फिर जब आप बातचीत करते हैं, तब मन पाँचवी भूमि पर उतर आता है।
श्रीरामकृष्ण – वे ही सब कर रहे हैं। मैं कुछ नहीं जानता।
मणि – जी हाँ, इसीलिए तो इतना आकर्षण है।
“देखिये, शास्त्रों में दो तरह से कहा है। एक पुराण के मत में श्रीकृष्ण चिदात्मा हैं और श्रीराधा चित्शक्ति। एक दूसरे पुराण में श्रीकृष्ण को ही काली और आद्याशक्ति कहा है।”
श्रीरामकृष्ण – देवी पुराण के मत से काली ने ही कृष्ण का स्वरूप धारण किया है।
“तो इससे क्या हुआ? वे अनन्त हैं और उनके मार्ग भी अनन्त हैं।”
मणि – अब मैं समझा, आप जैसा कहते हैं, छत पर चढ़ना ही इष्ट है, चाहे जिस तरह चढ़ सको – जीने से या बाँस लगाकर अथवा रस्सी पकड़कर।
श्रीरामकृष्ण – यह जिसने समझा है, उस पर ईश्वर की दया है। ईश्वर की कृपा हुए
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५८२ श्रीरामकृष्णवचनामृत ३ अगस्त, १८८४
बिना कभी संशय दूर नहीं होता।
“बात यह है कि किसी तरह उन पर भक्ति होनी चाहिए, प्यार होना चाहिए। अनेक खबरों से काम क्या है? एक रास्ते से चलते चलते अगर उन पर प्यार हो जाय तो काम बन गया। प्यार के होने से ही उन्हें आदमी पाता है। इसके बाद अगर जरूरत होगी तो वे समझा देंगे – सब रास्तों की खबर बतला देंगे। ईश्वर पर प्यार होने ही से काम हुआ – तरह तरह के विचारों की क्या आवश्यकता है? आम खाने के लिए आये हो आम खाओ, कितनी डालियाँ हैं, कितने पत्ते हैं, इन सब के हिसाब से क्या मतलब? हनुमान का भाव चाहिए – ‘मैं वार, तिथि, नक्षत्र, यह सब कुछ नहीं जानता, मैं तो बस श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण किया करता हूँ।’ ”
मणि – इस समय ऐसी इच्छा होती है कि कर्म बिलकुल घट जायँ और ईश्वर की तरफ मन लगाऊँ।
श्रीरामकृष्ण – अहा! यह होगा क्यों नहीं?
“परन्तु ज्ञानी निर्लिप्त होकर संसार में रह सकता है।”
मणि – जी हाँ, परन्तु निर्लिप्त होकर रहने के लिए विशेष शक्ति चाहिए।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, यह ठीक है। परन्तु तुमने संसार चाहा होगा।
“श्रीकृष्ण राधिका के हृदय में ही थे, परन्तु राधा की इच्छा उनके साथ मनुष्य-रूप में लीला करने की हुई। इसीलिए वृन्दावन में इतनी लीलाएँ हुई। अब प्रार्थना करो जिससे तुम्हारे सांसारिक कर्म सब घट जायँ।
“और मन से त्याग होने से तुम्हें अन्तिम ध्येय की प्राप्ति हो जायगी।”
मणि – यह तो उनके लिए है जो बाहर का त्याग नहीं कर सकते। ऊँचे दर्जेवालों के लिए तो एक साथ ही सब त्याग होना चाहिए – बाहर का भी और भीतर का भी।
श्रीरामकृष्ण चुप हैं। फिर बातचीत करने लगे।
श्रीरामकृष्ण – तुमने वैराग्य की बातें उस समय कैसी सुनीं?
मणि – जी हाँ, खूब।
श्रीरामकृष्ण – वैराग्य का अर्थ क्या है, जरा कहो तो – सुनूँ।
मणि – वैराग्य का अर्थ सिर्फ संसार से विराग नहीं, ईश्वर पर अनुराग और संसार से विराग है।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, ठीक कहा।
“संसार में धन की जरूरत है अवश्य, परन्तु उसके लिए अधिक चिन्ता न करना। यदृच्छालाभ – यही अच्छा है। संचय के लिए इतना न सोचा करो। जो लोग उन्हें मन और अपने प्राण सौंप देते हैं, जो उनके भक्त हैं – शरणागत हैं, वे लोग यह सब इतना नहीं सोचते। जहाँ आय है वहाँ व्यय भी है। एक ओर से रुपया आता है, दूसरी ओर से
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३ अगस्त, १८८४ | परिच्छेद ८७ | ५८३
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खर्च हो जाता है। इसका नाम है यदृच्छालाभ।”
श्रीरामकृष्ण हरिपद की बातें कहने लगे – “उस दिन हरिपद आया था।”
मणि – (सहास्य) – हरिपद कथक है। प्रह्लाद-चरित्र, श्रीकृष्ण की जन्मकथा, यह सब सस्वर बहुत अच्छा कहता है।
श्रीरामकृष्ण – अच्छा, उस दिन मैंने उसकी आँखें देखीं, जान पड़ता था, गुस्से में है। मैंने पूछा, क्या तू ध्यान ज्यादा करता है? वह सिर झुकाये बैठा रहा। तब मैंने कहा, अरे! इतना अच्छा नहीं।
शाम हो गयी है। श्रीरामकृष्ण माता का नाम ले रहे हैं – उनका स्मरण कर रहे हैं।
कुछ देर बाद श्रीठाकुर-मन्दिर में आरती होने लगी। आज सावन की शुक्ला द्वादशी है। झूलनोत्सव का दूसरा दिन है। आकाश में चन्द्रोदय हो गया। मन्दिर, मन्दिर का आँगन, बगीचा, सारे स्थान हँस रहे हैं। धीरे धीरे रात के आठ बजे। कमरे में श्रीरामकृष्ण बैठे हैं। राखाल और मास्टर भी हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – बाबूराम कहता है – ‘संसार! अरे बापरे!’
मास्टर – यह सुनी बात है। बाबूराम अभी संसार का हाल क्या जाने!
श्रीरामकृष्ण – हाँ यह ठीक है। निरंजन को देखा है तुमने? – बड़ा सरल है।
मास्टर – जी हाँ। उसके चेहरे में ही आकर्षण है – खींच लेता है। आँखों का भाव कैसा है!
श्रीरामकृष्ण – आँखों का ही भाव नहीं, सब कुछ। उसके विवाह की बात घरवालों ने की थी, उसने कहा, क्यों मुझे डुबाते हो? (हँसते हुए) क्यों जी, लोग कहते हैं, दिन भर मेहनत करके शाम को बीबी के पास जाकर बैठने से बड़ा आनन्द आता है – यह कैसा है?
मास्टर – जी हाँ, जो लोग उसी भाव में हैं, उन्हें आनन्द आता क्यों नहीं? (राखाल से) परीक्षा हो रही है – Leading Question.
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – माँ कहती है, मैं अपने बच्चे का विवाह कर दूँ, तो जी ठिकाने हो। धूप में झुलसकर छाँह में थोड़ी देर बैठेगा, तो कुछ ठण्डा तो हो ही लेगा!
मास्टर – जी हाँ। माँ-बाप भी तरह-तरह के होते हैं। ज्ञानी पिता कभी अपने बच्चों को विवाह के बन्धन में नहीं डालता और अगर वह ऐसा करता है तब तो क्या कहना चाहिए उसके ज्ञान को! (श्रीरामकृष्ण हँसते हैं।)
श्रीयुत अधर सेन कलकत्ते से आये हैं। श्रीरामकृष्ण को भूमिष्ठ होकर प्रणाम किया, जरा देर बैठकर काली के दर्शन करने चले गये।
मास्टर ने भी काली के दर्शन किये। फिर चाँदनी-घाट पर आकर गंगा के तट पर बैठे। गंगा का पानी ज्योत्स्ना में चमक रहा है। ज्वार का आना अभी शुरू हुआ है। मास्टर
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५८४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ३ अगस्त, १८८४
एकान्त में बैठे हुए श्रीरामकृष्ण के अद्भुत चरित्र की चिन्ता कर रहे हैं। उनकी अद्भुत समाधि, क्षण क्षण में भाव, प्रेम और आनन्द, विश्रामविहीन ईश्वरी कथाप्रसंग, भक्तों पर अकृत्रिम स्नेह, बालक का-सा स्वभाव, यही सब सोच रहे हैं।
अधर और मास्टर श्रीरामकृष्ण के कमरे में गये। अधर चिटगाँव में दफ्तर के काम से गये थे। वे चन्द्रनाथ तीर्थ और सीताकुण्ड की बातें कह रहे हैं।
अधर – सीताकुण्ड के पानी में अग्नि की शिखाएँ उठती रहती हैं, जीभ के आकार की।
श्रीरामकृष्ण – यह किस तरह होता है?
अधर – पानी में फास्फोरस (Phosphorus) है।
श्रीयुत राम चैटर्जी भी कमरे में आये। श्रीरामकृष्ण अधर से उनकी तारीफ कर रहे हैं। और कह रहे हैं – “राम है, इसीलिए हम लोगों को अधिक चिन्ता नहीं करनी पड़ती। हरीश, लाटू इन्हें वह बुला बुलाकर खिलाया करता है। वे सब कहीं एकान्त में ध्यान करते रहते हैं और राम उन्हें बुला लाता है।”
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परिच्छेद ८८
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परिच्छेद ८८
कीर्तनानन्द में श्रीरामकृष्ण
(१)
अधर के घर में नरेन्द्रादि भक्तों के संग में
श्रीरामकृष्ण अधर के घर के बैठकखाने में भक्तों के साथ बैठे हुए हैं। बैठकखाना दुमंजले पर है। श्रीयुत नरेन्द्र, दोनों भाई मुखर्जी, भवनाथ, मास्टर, चुनीलाल, हाजरा आदि भक्त श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हैं। दिन के तीन बजे होंगे। आज शनिवार है, ६ सितम्बर १८८४।
भक्तगण प्रणाम कर रहे हैं। मास्टर के प्रणाम करने के बाद श्रीरामकृष्ण अधर से पूछते हैं, क्या निताई डाक्टर न आयेगा?
श्रीयुत नरेन्द्र गायेंगे, इसके लिए बन्दोबस्त हो रहा है। तानपूरा बाँधते समय तार टूट गया। श्रीरामकृष्ण ने कहा, अरे यह क्या किया! तब नरेन्द्र अपना तबला ठीक करने लगे। श्रीरामकृष्ण कहते हैं - अरे तुम तबला ठोंक रहे हो पर मुझे तो ऐसा मालूम होता है मानो कोई मेरे गाल पर चपत मार रहा हो।
कीर्तन के गीत के सम्बन्ध में बातचीत हो रही है। नरेन्द्र कह रहे हैं - कीर्तन में ताल-सम आदि कुछ नहीं हैं, इसीलिए इतना Popular (जनप्रिय) है और लोग उसे पसन्द करते हैं।
श्रीरामकृष्ण – यह तू क्या कह रहा है? गाना करुणापूर्ण होता है, इसीलिए लोग इतना चाहते हैं।
नरेन्द्र गा रहे हैं -
(१) हे दीनशरण! तुम्हारा नाम बड़ा ही मधुर है।
(२) क्या मेरे दिन व्यर्थ ही चले जायेंगे? हे नाथ! सदा ही आशा-पथ पर मेरी दृष्टि लगी हुई है।
श्रीरामकृष्ण – (हाजरा से, सहास्य) – इसने पहली भेंट के समय यही गाना गाया था।
नरेन्द्र ने और भी दो-एक गाने गाये। फिर वैष्णवचरण ने एक गाना गाया।
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| ५८६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ६ सितम्बर, १८८४ |
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श्रीरामकृष्ण – 'ऐ वीणा! तू ईश्वर का नाम ले,' यह गाना एक बार गाओ।
वैष्णवचरण गा रहे हैं –
“ऐ वीणा, तू ईश्वर का नाम ले। उनके श्रीचरणों को छोड़ तुझे परम-तत्त्व की प्राप्ति न होगी। उनके नाम से पाप और ताप दूर हो जाते हैं। तू 'हरे कृष्ण' 'हरे कृष्ण' कहती जा। उनकी कृपा होगी तो मैं भवसागर में फिर न रह जाऊँगा, न उसके लिए मुझे कोई चिन्ता होगी। वीणा, एक ही बार उनका नाम ले; नाम के सिवा और दूसरा अवलम्ब नहीं है। गोविन्ददास कहते हैं, दिन चले जा रहे हैं, सावधान रहना जिससे कि मैं अपार समुद्र में कहीं बह न जाऊँ।”
गाना सुनते ही श्रीरामकृष्ण को भावावेश हो गया है। वे उसी आवेश में कहते हैं – 'अहा! हरे कृष्ण कहो – हरे कृष्ण कहो।'
यह कहते हुए श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गये। भक्तगण चारों ओर बैठे हुए श्रीरामकृष्ण को देख रहे हैं। कमरा आदमियों से भर गया है।
कीर्तनिया उस गाने को समाप्त कर एक दूसरा गाना गाने लगा – 'श्रीगौरांग सुन्दर नव नटवर तप्तकांचनकाय' वह गा रहा था, श्रीरामकृष्ण उठकर खड़े हो गये और नृत्य करने लगे। फिर बैठकर बाँहें फैलाकर स्वयं उसके पद गा रहे हैं।
गाते ही गाते श्रीरामकृष्ण को फिर भावावेश हो गया। सिर झुकाये हुए समाधिलीन हो गये। सामने तकिया पड़ा हुआ है, उस पर सिर झुककर ढुलक गया है। कीर्तनिया फिर गा रहे हैं –
“हरिनाम के सिवा संसार में और कौनसा धन है? मधाई, मधुर स्वर से तू उनके नाम का कीर्तन कर। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।”
कीर्तनिया ने एक गाना और गाया। श्रीरामकृष्ण प्रेमोन्मत्त हो गये, नृत्य कर रहे हैं। वह अपूर्व नृत्य देखकर नरेन्द्र आदि भक्तगण स्थिर न रह सके। सब श्रीरामकृष्ण के साथ नृत्य करने लगे।
नृत्य करते हुए श्रीरामकृष्ण को समाधि हो रही है। उस समय उनकी अन्तर्दशा हो गयी। जबान बन्द हो गयी। सर्वांग स्थिर हो गया। भक्तगण उन्हें घेरकर नाच रहे हैं। प्रेमोन्मत्त की तरह।
कुछ प्राकृत दशा में आते ही श्रीरामकृष्ण ने गाना शुरू किया।
आज अंधर का बैठकखाना श्रीवास का आँगन हो रहा है। हरिनाम की ध्वनि सुनकर आम सड़क पर कितने ही आदमी एकत्र हो गये हैं।
भक्तों के साथ बड़ी देर तक नृत्य करके श्रीरामकृष्ण ने आसन ग्रहण किया। भावावेश अब भी है। उसी अवस्था में नरेन्द्र से कह रहे हैं, “वही गाना गा, 'माँ, मुझे
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६ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ८८ ५८७
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पागल कर दे।’”
श्रीरामकृष्ण की आज्ञा पाकर नरेन्द्र ने गाया – ‘माँ मुझे पागल कर दे।’ श्रीरामकृष्ण ने एक दूसरा गाना – ‘चिदानन्द सिन्धुनीरे’ – गाने के लिए कहा। नरेन्द्र गा रहे हैं –
“चिदानन्द सिन्धु में प्रेमानन्द की तरंगें उठ रही हैं। वह महाभाव है, उस रसलीला की माधुरी का मैं क्या वर्णन करूँ! महायोग में सब कुछ एकाकार हो गया। देश-काल की सीमा, भेदाभेद, सब दूर हो गये। अब आनन्द में मस्त होकर बाहुओं को उठा, मन! उनके नाम का कीर्तन कर।”
श्रीरामकृष्ण – (नरेन्द्र से) – और ‘चिदाकाश’ वाला? – नहीं, रहे, वह बड़ा लम्बा है, न? अच्छा धीरे-धीरे सही।
नरेन्द्र ने वह गाना भी गाया। श्रीरामकृष्ण ने एक और गाना गाने के लिए कहा, उसे भी गाया।
श्रीरामकृष्ण और भक्तगण जरा विश्राम कर रहे हैं। नरेन्द्र ने धीरे-धीरे श्रीरामकृष्ण के कानों में कहा – ‘आप वह गाना जरा गाइयेगा?’ श्रीरामकृष्ण ने कहा, मेरा गला बैठ गया है। कुछ देर बाद उन्होंने पूछा, कौनसा गाना? नरेन्द्र – ‘भुवन-रंजन-रूप’। श्रीरामकृष्ण ने धीरे-धीरे गाकर नरेन्द्र को सुना दिया।
(२)
श्रीरामकृष्ण तथा भक्त का जाति-विचार
गाना समाप्त हो गया। नरेन्द्र, भवनाथ आदि भक्तगण श्रीरामकृष्ण से वार्तालाप कर रहे हैं। हँसते हुए कह रहे हैं, हाजरा नाचा था।
नरेन्द्र – (सहास्य) – जी हाँ, धीरे-धीरे!
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – धीरे-धीरे?
नरेन्द्र – (सहास्य) – उसकी तोंद भी नाचती थी! (सब हँसते हैं।)
शशधर जिस मकान में हैं, उस मकान में श्रीरामकृष्ण के निमन्त्रण की बात हो रही है।
नरेन्द्र – मकानवाला खिलायेगा?
श्रीरामकृष्ण – सुना है, उसका स्वभाव अच्छा नहीं है, लुच्चा है।
नरेन्द्र – इसीलिए जिस दिन शशधर से आपकी प्रथम भेंट हुई थी, उस दिन उसके छुये हुए गिलास से आपने पानी नहीं पिया। आपने कैसे पहचाना कि उसका स्वभाव अच्छा नहीं है?
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – हाजरा एक घटना और जानता है। उस देश में –
५८८ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ६ सितम्बर, १८८४
सिहोड़ में - हृदय के घर में वह हुई थी।
हाजरा - वह एक वैष्णव है - मेरे साथ आपके दर्शन करने आया था। ज्योंही आकर बैठा कि आप उसकी ओर पीठ फेरकर बैठ गये।
श्रीरामकृष्ण - सुना, अपनी मौसी से फँसा था - पीछे से पता चला। (नरेन्द्र से) पहले तू कहता था, ये सब मेरे मन के विकार हैं।
नरेन्द्र - मैं तब जानता थोड़े ही था। अब तो कई बार देखा - सब मिलते हैं।
नरेन्द्र के कहने का तात्पर्य यह है कि श्रीरामकृष्ण भावावस्था में लोगों का अन्तर भी देख लेते हैं। इसी की उन्होंने कितनी ही बार परीक्षा ली है।
श्रीरामकृष्ण और भक्तों की सेवा के लिए अधर ने बड़ा इन्तजाम किया है। उन्होंने भोजन के लिए सब को बुलाया।
महेन्द्र और प्रियनाथ, दोनों मुखर्जी भाइयों से श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, क्यों जी, तुम भोजन करने न चलोगे?
उन्होंने विनयपूर्वक कहा - जी, हमें अब रहने दीजिये।
श्रीरामकृष्ण - (सहास्य) - ये लोग सब कुछ करते हैं। बस इतने ही से इन्हें संकोच है।
“एक औरत के जेठों के नाम हरि और कृष्ण थे। उसे हरिनाम तो कहना ही होगा। इधर 'हरे कृष्ण' कहने से जेठों के नाम आते थे। इसलिए वह जपत्ती थी -
'फरे फृष्ट, फरे फृष्ट, फृष्ट फृष्ट फरे फरे
फरे राम, फरे राम, राम राम फरे फरे।' ”
अधर जाति के स्वर्णवणिक थे। इसीलिए कोई-कोई ब्राह्मण भक्त उनके यहाँ भोजन करते हुए संकोच करते थे। कुछ दिन बाद जब उन्होंने देखा, श्रीरामकृष्ण स्वयं भोजन कर रहे हैं, तब उनका वह भाव दूर हो गया।
रात के नौ बजे नरेन्द्र, भवनाथ आदि भक्तों के साथ आनन्दपूर्वक श्रीरामकृष्ण ने भोजन किया।
अब बैठकखाने में आकर विश्राम कर रहे हैं। फिर दक्षिणेश्वर लौटने का उद्योग होने लगा।
कल रविवार है। दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण के आनन्द के लिए मुखर्जी भ्राताओं ने कीर्तन का बन्दोबस्त किया है। श्यामदास कीर्तनाये का गाना होगा। श्यामदास को अपने यहाँ बुलाकर राम ने कीर्तन सीखा था।
श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र से कल दक्षिणेश्वर जाने के लिए कह रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण - (नरेन्द्र से) - कल जाना, अच्छा?
नरेन्द्र - अच्छा जी, जाने की कोशिश करूँगा।
६ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ८८ | ५८९
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| ६ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ८८ | ५८९ |
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श्रीरामकृष्ण – स्नान-भोजन वहीं करना।
“ये (मास्टर) भी जायेंगे अगर कोई अड़चन न हो। (मास्टर से) तुम्हारी बीमारी तो अब अच्छी हो गयी है न? – अब पथ्यवाली व्यवस्था तो नहीं है?”
मास्टर – जी नहीं – मैं भी जाऊँगा।
नित्यगोपाल वृन्दावन में हैं। कई दिन हुए, चुनीलाल वृन्दावन से लौटे हैं। श्रीरामकृष्ण उनसे नित्यगोपाल का हाल पूछ रहे हैं। अब दक्षिणेश्वर चलने की तैयारी होने लगी। मास्टर ने भूमिष्ठ हो उनके पादपद्मों में माथा टेककर प्रणाम किया।
श्रीरामकृष्ण ने स्नेहपूर्वक उनसे कहा, तो अब जाओ।
(नरेन्द्रादि भक्तों से सस्नेह) –
“नरेन्द्र, भवनाथ, तुम लोग जाना।”
नरेन्द्र, भवनाथ आदि भक्तों ने भूमिष्ठ हो उन्हें प्रणाम किया। उनके अपूर्व कीर्तनानन्द और भक्तों के साथ सुन्दर नृत्य की याद करते हुए भक्तगण घर लौटे।
आज भादों की कृष्णा प्रतिपदा, चांदनी रात है। श्रीरामकृष्ण भवनाथ, हाजरा आदि भक्तों के साथ गाड़ी पर बैठकर दक्षिणेश्वर की ओर जा रहे हैं।
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परिच्छेद ८९
प्रवृत्ति या निवृत्ति?
(१)
दक्षिणेश्वर में राम, बाबूराम आदि भक्तों के संग में
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर में, अपने उसी कमरे में छोटी खाट पर भक्तों के साथ बैठे हैं। दिन के ग्यारह बजे होंगे, अभी उन्होंने भोजन नहीं किया।
कल शनिवार को श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ श्रीयुत अधर सेन के यहाँ गये थे। नाम-संकीर्तन के महोत्सव द्वारा भक्तों का जीवन सफल कर आये थे। आज यहाँ श्यामदास का कीर्तन होगा। श्रीरामकृष्ण को कीर्तनानन्द में देखने के लिए बहुत से भक्तों का समागम हो रहा है।
पहले बाबूराम, मास्टर, श्रीरामपुर के ब्राह्मण, मनोमोहन, भवनाथ, किशोरीलाल आये; फिर चुनीलाल, हरिपद, दोनों मुखर्जी भ्राता, राम, सुरेन्द्र, तारक, अधर और निरंजन आये। लाटू, हरीश और हाजरा आजकल दक्षिणेश्वर में ही रहते हैं। श्रीयुत रामलाल काली की पूजा करते हैं और श्रीरामकृष्ण की भी देखरेख रखते हैं। श्रीयुत राम चक्रवर्ती पर विष्णुमन्दिर की पूजा का भार है। लाटू और हरीश, दोनों श्रीरामकृष्ण की सेवा करते हैं। आज रविवार है, ७ सितम्बर, १८८४।
मास्टर के आकर प्रणाम करने पर श्रीरामकृष्ण ने पूछा, नरेन्द्र नहीं आया ?
उस दिन नरेन्द्र नहीं आ सके। श्रीरामपुर के ब्राह्मण, रामप्रसाद के गाने की किताब लेते आये हैं और उसी पुस्तक से गाने पढ़-पढ़कर श्रीरामकृष्ण को सुना रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – हाँ पढ़ो।
ब्राह्मण एक गीत पढ़कर सुनाने लगे। उसमें लिखा था – माँ वस्त्र धारण करो।
श्रीरामकृष्ण – यह सब रहने दो, विकट गीत। ऐसा कोई गीत पढ़ो जिसमें भक्ति हो।
ब्राह्मण – कौन कहे कि काली कैसी है, षड्दर्शनों को भी जिसके दर्शन नहीं होते।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – कल अधर सेन के यहाँ भावावस्था में एक ही तरह बैठे रहने के कारण पैरों में दर्द होने लगा था। इसीलिए बाबूराम को ले जाया करता हूँ।
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सहृदय है।
यह कहकर श्रीरामकृष्ण गाने लगे –
“ऐ सखि री, मैं अपना हृदय किसके पास खोलूँ – मुझे बोलना मना जो है। बिना किसी ऐसे को पाये जो मेरी व्यथा समझ सके, मैं तो मरी जा रही हूँ। केवल उसकी आँखों में आँखें डालकर मुझे अपने हृदय के प्रेमी का मिलन प्राप्त हो जायगा – परन्तु ऐसा तो कोई विरला ही होता है जो आनन्दसागर में निरन्तर बहता रहे।
“ये सब बाउलों (एक सम्प्रदाय) के गीत हैं।
“शाक्त मत में सिद्ध को कौल कहते हैं, वेदान्त के मत से परमहंस कहते हैं। बाउल-वैष्णवों के मत में साईं कहते हैं – साईं अन्तिम सीमा है।
“बाउल जब सिद्ध हो जाता है तब साईं होता है। तब सब अभेद हो जाता है। आधी माला गौ के हाड़ों की और आधी तुलसी की पहनता है। 'हिन्दुओं का नीर और मुसलमानों का पीर' बन जाता है।
“साईं जो होते हैं, वे अलख जगाया करते हैं। इसे वैदिक मत से ब्रह्म कहते हैं; वे लोग कहते हैं अलख। जीवों के सम्बन्ध में कहते हैं, अलख से आते हैं और अलख में जाते हैं। अर्थात् जीवात्मा अव्यक्त से आता है और अव्यक्त में ही लीन हो जाता है।
“वे लोग पूछते हैं, हवा की खबर जानते हो?
“अर्थात् कुण्डलिनी के जागने पर, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना के भीतर से जो महावायु चढ़ती है उसकी खबर है?
“पूछते हैं, किस पैठ में हो? – छः पैठ – छहों चक्र हैं।
“अगर कोई कहे कि पांचवें में है, तो समझना चाहिए कि विशुद्ध चक्र तक मन की पहुँच है।
(मास्टर से) “तब निराकार के दर्शन होते हैं, जैसा गीत में है।”
यह कहकर श्रीरामकृष्ण कुछ स्वर करके कह रहे हैं – “उसके ऊर्ध्व भाग में कमल आकाश है, उस आकाश के अवरुद्ध हो जाने पर सब कुछ आकाश हो जाता है।
“एक बाउल आया था। मैंने उससे पूछा, 'क्या तुम्हारा रस का काम हो गया? – कड़ाही उतर गयी?' रस को जितना ही जलाओगे, उतना ही Refine (साफ) होगा। पहले रहता है ईख का रस – फिर होती है राब – फिर उसे जलाओ – तो होती है चीनी – और फिर मिश्री। धीरे धीरे और भी साफ हो रहा है।
“कड़ाही कब उतरेगी, अर्थात् साधना की समाप्ति कब होगी? – जब इन्द्रियाँ जीत ली जायेंगी। जैसे जोंक पर नमक छोड़ने से वे आप ही छूटकर गिर जाती हैं वैसे ही इन्द्रियाँ भी शिथिल हो जायेंगी। स्त्री के साथ रहता है, पर वह रमण नहीं करता।
“उनमें बहुत से लोग राधातन्त्र के मत से चलते हैं। पाँचों तत्त्व लेकर साधना करते
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हैं – पृथ्वीतत्त्व, जलतत्त्व, अग्नितत्त्व, वायुतत्त्व, आकाशतत्त्व, – मल, मूत्र, रज, वीर्य, ये सब तत्त्व ही हैं। ये साधनाएँ बड़ी घृणित हैं; जैसे पाखाने के भीतर से घर में प्रवेश करना।
“एक दिन मैं दालान में भोजन कर रहा था। घोषपाड़ा के मत का एक आदमी आया। आकर कहने लगा – ‘तुम स्वयं खाते हो या किसी को खिलाते हो?’ इसका यह अर्थ है जो सिद्ध होता है, वह अन्तर में ईश्वर देखता है।
“जो लोग इस मत से सिद्ध होते हैं, वे दूसरे मत के लोगों को ‘जीव’ कहते हैं। विजातीय मनुष्यों के सामने बातचीत नहीं करते। कहते हैं, यहाँ ‘जीव’ हैं!
“उस देश में मैंने इस मत को माननेवाली एक स्त्री देखी है। उसका नाम सरी (सरस्वती) पाथर है। इस मत के लोग आपस में एक दूसरे के यहाँ तो भोजन करते हैं, परन्तु दूसरे मत वालों के यहाँ नहीं खाते। मल्लिक घरानेवालों ने सरी पाथर के यहाँ तो भोजन किया, परन्तु हृदय के यहाँ नहीं खाया। कहते हैं, ये सब ‘जीव’ हैं! (सब हँसते हैं।)
“मैं एक दिन उसके यहाँ हृदय के साथ घूमने गया था। तुलसी के पेड़ खूब लगाये हैं। उसने चना-चिउड़ा दिया, मैंने थोड़ा सा खाया, हृदय तो बहुत सा खा गया – फिर बीमार भी पड़ा।
“वे लोग सिद्धावस्था को सहज अवस्था कहते हैं। एक दर्जे के आदमी हैं। वे ‘सहज सहज’ चिल्लाते फिरते हैं। वे सहज अवस्था के दो लक्षण बतलाते हैं। एक यह कि देह में कृष्ण की गन्ध भी न रहेगी और दूसरा यह कि पद्म पर भौंरा बैठेगा, परन्तु मधुपान न करेगा। कृष्ण की गन्ध भी न रह जायगी, इसका अर्थ यह है कि ईश्वर के भाव सब अन्तर में ही रहेंगे, बाहर कोई लक्षण प्रकट न होगा – नाम का जप भी न करेगा। दूसरे का अर्थ है, कामिनी और कांचन की आसक्ति का त्याग – जितेन्द्रियता।
“वे लोग ठाकुर-पूजन, मूर्तिपूजन, यह सब पसन्द नहीं करते – जीता-जागता आदमी चाहते हैं। इसीलिए उनके दर्जे के आदमियों को कर्ताभजा कहते हैं। कर्ताभजा अर्थात् जो लोग कर्ता को – गुरु को ईश्वर समझते और इसी भाव से उनकी पूजा करते हैं।”
(२)
श्रीरामकृष्ण और सर्वधर्मसमन्वय
श्रीरामकृष्ण – देखा, कितने तरह के मत हैं। जितने मत उतने पथ। अनन्त मत हैं और अनन्त पथ हैं।
भवनाथ – अब उपाय क्या है?
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श्रीरामकृष्ण – एक को बलपूर्वक पकड़ना पड़ता है। छत पर जाने की चाह है, तो जीने से भी चढ़ सकते हो; बाँस की सीढ़ी लगाकर भी चढ़ सकते हो; रस्सी की सीढ़ी 'लगाकर, सिर्फ रस्सी पकड़कर या केवल एक बाँस के सहारे, किसी भी तरह से छत पर पहुँच सकते हो, परन्तु एक पैर इसमें और दूसरा उसमें रखने से नहीं होता। एक को दृढ़ भाव से पकड़े रहना चाहिए। ईश्वरलाभ करने की इच्छा हो तो एक ही रास्ते पर चलना चाहिए।
“और दूसरे मतों को भी एक एक मार्ग समझना। यह भाव न हो कि मेरा ही मार्ग ठीक है, और सब झूठ हैं; द्वेष न हो।
“अच्छा, मैं किस मार्ग का हूँ? केशव सेन कहता था, आप हमारे मत के हैं – निराकार में आ रहे हैं। शशधर कहता है, ये हमारे हैं; विजय भी कहता है, ये हमारे मत के हैं।”
श्रीरामकृष्ण सभी मार्गों से साधना करके ईश्वर के निकट पहुँचे थे; इसलिए सब लोग उन्हें अपने ही मत का आदर्श मानते थे।
श्रीरामकृष्ण मास्टर आदि दो-एक भक्तों के साथ पंचवटी की ओर जा रहे हैं – हाथ मुँह धोयेंगे। दिन के बारह बजे का समय है। अब ज्वार आनेवाली है। देखने के लिए श्रीरामकृष्ण पंचवटी के रास्ते पर प्रतीक्षा कर रहे हैं।
भक्तों से कह रहे हैं – “ज्वार और भाटा कितने आश्चर्य के विषय हैं!
“परन्तु एक बात देखो, समुद्र के पास ही नदियों में ज्वार-भाटा होते हैं। परन्तु समुद्र से बहुत दूर होने पर उसी नदी में ज्वार-भाटा नहीं होता, बल्कि एक ही ओर बहाव रहता है। इसका क्या अर्थ? – इस भाव का अपने आध्यात्मिक जीवन पर आरोप करो। जो लोग ईश्वर के बहुत पास पहुँच जाते हैं, उन्हीं में भक्ति और भाव होता है। और, किसी किसी को – ईश्वरकोटि को – महाभाव, प्रेम, यह सब होता है।
(मास्टर से) “अच्छा, ज्वार-भाटा क्यों होते हैं?”
मास्टर – अंग्रेजी ज्योतिष-शास्त्र में लिखा है, सूर्य और चन्द्र के आकर्षण से ऐसा होता है।
यह कहकर मास्टर मिट्टी में रेखाएँ खींचकर सूर्य और चन्द्र की गति बतलाने लगे। थोड़ी देर तक देखकर श्रीरामकृष्ण ने कहा – बस रहने दो, मेरा माथा घूमने लगा।
बात हो ही रही थी कि ज्वार आने की आवाज होने लगी। देखते ही देखते जलोच्छ्वास का घोर शब्द होने लगा। ठाकुरमन्दिर की तटभूमि में टकराता हुआ बड़े वेग से पानी उत्तर की ओर चला गया। श्रीरामकृष्ण एक नजर से देख रहे हैं। दूर की नाव देखकर बालक की तरह कहने लगे, देखो देखो – अब उस नाव की क्या हालत होती है!
श्रीरामकृष्ण मास्टर से बातचीत करते हुए पंचवटी के बिलकुल नीचे पहुँच गये।
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५९४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ७ सितम्बर, १८८४.
उनके हाथ में एक छाता था, उसे पंचवटी के चबूतरे पर रख दिया। नारायण को वे साक्षात् नारायण देखते हैं इसीलिए बहुत प्यार करते हैं। नारायण स्कूल में पढ़ता है। इस समय श्रीरामकृष्ण उसी की बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – नारायण को देखा है तुमने? कैसा स्वभाव है! क्या लड़के, बच्चे, बूढ़े सब से मिलता है। विशेष शक्ति के बिना यह बात नहीं होती। और सब लोग उसे प्यार करते हैं। अच्छा, क्या वह यथार्थ ही सरल है।
मास्टर – जी हाँ, जान तो ऐसा ही पड़ता है।
श्रीरामकृष्ण – सुना, तुम्हारे यहाँ जाता है।
मास्टर – जी हाँ, दो-एक बार आया था।
श्रीरामकृष्ण – क्या एक रुपया तुम उसे दोगे या काली से कहूँ?
मास्टर – अच्छा तो है, मैं ही दे दूँगा।
श्रीरामकृष्ण – बड़ा अच्छा है। जो ईश्वर के अनुरागी हैं उन्हें देना अच्छा है। इससे धन का सदुपयोग होता है। सब रुपये संसार को सौंपने से क्या होगा?
किशोरीलाल के लड़के-बच्चे हो गये हैं। वेतन कम पाता है इससे पूरा नहीं पड़ता। श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं – “नारायण कहता था, किशोरीलाल के लिए एक नौकरी ठीक कर दूँगा। नारायण को यह बात याद दिलाना।”
मास्टर पंचवटी में खड़े हुए हैं। श्रीरामकृष्ण कुछ देर बाद झाऊतल्ले से लौटे। मास्टर से कह रहे हैं – जरा बाहर एक चटाई बिछाने के लिए कहो, मैं थोड़ी देर बाद जाता हूँ, लेटूँगा।
श्रीरामकृष्ण कमरे में पहुँचकर कह रहे हैं – तुममें से किसी को छाता ले आने की बात याद नहीं रहीं। (सब हँसते हैं।) जल्दबाज आदमी पास की चीज भी नहीं देखते। एक आदमी एक दूसरे के यहाँ कोयले में आग सुलगाने के लिए गया था, और इधर उसके हाथ में लालटेन जल रही थी।
“एक आदमी अंगौछा खोज रहा था, अन्त में वह उसी के कन्धे पर पड़ा हुआ मिला!”
श्रीरामकृष्ण के लिए काली का अन्न-भोग लाया गया। श्रीरामकृष्ण प्रसाद पायेंगे। दिन के एक बजे का समय होगा। वे भोजन करके जरा विश्राम करेंगे। भक्तगण कमरे में बैठे ही रहे। समझाने पर वे बाहर जाकर बैठे। हरीश, निरंजन और हरिपद पाकशाला में प्रसाद पायेंगे। श्रीरामकृष्ण हरीश से कह रहे हैं, अपने लिए थोड़ा सा अमरस लेते जाना।
श्रीरामकृष्ण विश्राम करने लगे। बाबूराम से कहा, “बाबूराम, जरा मेरे पास आ।” बाबूराम पान लगा रहे थे, कहा, “मैं पान लगा रहा हूँ।”
श्रीरामकृष्ण – रख उधर, फिर पान लगाना।
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श्रीरामकृष्ण विश्राम कर रहे हैं। इधर पंचवटी में और बकुल के पेड़ के नीचे कुछ भक्त बैठे हुए हैं - दोनों मुखर्जी भाई, चुनीलाल, हरिपद, भवनाथ और तारक। तारक वृन्दावन से अभी अभी लौटे हैं। भक्तगण उनसे वृन्दावन की बातें सुन रहे हैं। तारक नित्यगोपाल के साथ अब तक वृन्दावन में थे।
(३)
कीर्तनानन्द में
श्रीरामकृष्ण जरा विश्राम कर रहे हैं। श्यामदास माथुर अपने आदमियों को लेकर कीर्तन गा रहे हैं - 'सुखमय सायर (सागर) मरुभूमि भइल, जलद निहारइ चातकि मरि गइला।' श्रीराधा का यह विरह-वर्णन हो रहा है। सुनकर श्रीरामकृष्ण को भावावेश हो रहा है। वे छोटी खाट पर बैठे हुए हैं। बाबूराम, निरंजन, राम, मनोमोहन, मास्टर, सुरेन्द्र, भवनाथ आदि भक्त जमीन पर बैठे हैं। गाना जम नहीं रहा है।
कोन्नगर के नवाई चैतन्य से श्रीरामकृष्ण कीर्तन करने के लिए कह रहे हैं। नवाई मनोमोहन के चाचा हैं। पेन्शन लेकर कोन्नगर में श्रीगंगाजी के तट पर भजन-साधन करते हैं। श्रीरामकृष्ण का प्रायः दर्शन करने आते हैं।
नवाई उच्च कण्ठ से संकीर्तन कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण आसन छोड़कर नृत्य करने लगे। साथ ही नवाई और भक्तगण उन्हें घेरकर नृत्य करने लगे। कीर्तन खूब जम गया। महिमाचरण भी श्रीरामकृष्ण के साथ नृत्य कर रहे हैं।
कीर्तन हो जाने पर श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठे। हरिनाम के बाद अब आनन्दमयी का नाम ले रहे हैं। श्रीरामकृष्ण भावपूर्ण हैं। नाम लेते हुए ऊर्ध्वदृष्टि हो रहे हैं।
गाना - "माँ, आनन्दमयी होकर मुझे निरानन्द न करना।"
गाना - "उसका चिन्तन करने पर भाव का उदय होता है। जैसा भाव होता है, फल भी वैसा ही मिलता है। इसकी जड़ विश्वास है। जो काली का भक्त है, उसे तो जीवन्मुक्त कहना चाहिए। वह सदा ही आनन्द में रहता है। अगर उनके चरणरूपी सुधा-सरोवर में चित्त लगा रहा तो समझना चाहिए, उसके लिए पूजा, जप, होम, बलि, ये सब कुछ भी नहीं हैं।"
श्रीरामकृष्ण ने तीन-चार गाने और गाये। अन्त में जो पद उन्होंने गाया, उसका भाव यह है - "मन! आदरणीया श्यामा माँ को यत्नपूर्वक हृदय में रखना। तू देख और मैं देखूँ, कोई दूसरा उन्हें न देखने पाये।"
यह गाना गाते हुए श्रीरामकृष्ण जैसे खड़े हो गये। माता के प्रेम में पागल हो गये। 'आदरणीया श्यामा माँ को हृदय में रखना' यह इतना अंश बार बार भक्तों को गाकर सुना रहे हैं। शराब पीकर मतवाले हुए की तरह सब को गाकर सुना रहे हैं। श्रीरामकृष्ण गाते
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हुए बहुत झूम रहे हैं। यह देख निरंजन उन्हें पकड़ने के लिए बढ़े। श्रीरामकृष्ण ने मधुर स्वरों में कहा – 'मत छू।' श्रीरामकृष्ण को नाचते हुए देखकर भक्तगण उठकर खड़े हो गये। श्रीरामकृष्ण मास्टर का हाथ पकड़कर कहते हैं – 'नाच।'
श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठे हुए हैं। भाव की पूर्ण मात्रा है – बिलकुल मतवाले हैं।
भाव का कुछ उपशम होने पर कह रहे हैं – ॐ ॐ ॐ काली! भक्तों में से कितने ही खड़े हैं। महिमाचरण खड़े हुए श्रीरामकृष्ण को पंखा झुल रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (महिमाचरण से) – आप लोग बैठिये।
“आप वेद से जरा कुछ सुनाइये।”
महिमाचरण सुना रहे हैं – जय यज्वमान आदि; फिर वे महानिर्वाण-तन्त्र की स्तुति का पाठ करने लगे –
“ॐ नमस्ते सते ते जगत्कारणाय नमस्ते चिते सर्वलोकाश्रयाय। नमोऽद्वैततत्त्वाय मुक्तिप्रदाय, नमो ब्रह्मणे व्यापिने शाश्वताय॥ त्वमेकं शरण्यं त्वमेकं वरेण्यम् त्वमेकं जगत्पालकं स्वप्रकाशम्। त्वमेकं जगत्कर्तृपातृप्रहर्तृ त्वमेकं परं निश्चलं निर्विकल्पम्॥ भयानां भयं भीषणं भीषणानाम् गतिः प्राणिनां पावनं पावनानाम्। महोच्चैः पदानां नियन्तृ त्वमेकम् परेषां परं रक्षणं रक्षणानाम्॥ वयं त्वां स्मरामो वयं त्वां भजामो वयं त्वां जगत्साक्षिरूपं नमामः॥ सदेकं निधानं निरालम्बमीशम् भवाम्भोधिपोतं शरण्यं व्रजामः॥”
श्रीरामकृष्ण ने हाथ जोड़कर स्तुति सुनी। पाठ हो जाने पर हाथ जोड़कर उन्होंने प्रणाम किया। भक्तों ने भी प्रणाम किया।
कलकत्ते से अधर आये। श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – आज खूब आनन्द रहा। महिम चक्रवर्ती भी इधर झुक रहा है। कीर्तन में खूब आनन्द रहा – क्यों?
मास्टर – जी हाँ।
महिमाचरण ज्ञानचर्चा करते हैं। आज उन्होंने कीर्तन किया है, और नाचे भी हैं। श्रीरामकृष्ण इस बात पर आनन्द प्रकट कर रहे हैं।
शाम हो रही है। भक्तों में से बहुतेरे श्रीरामकृष्ण को प्रणाम कर बिदा हुए।
(४)
प्रवृत्ति या निवृत्ति? अधर का कर्म
शाम हो गयी है। दक्षिणवाले लम्बे बरामदे में और पश्चिम के गोल बरामदे में बत्ती
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जला दी गयी। कुछ देर बाद चन्द्रोदय हुआ। मन्दिर का आँगन, बगीचे के रास्ते, गंगातट, पंचवटी, पेड़ों का ऊपरी हिस्सा, सब कुछ चाँदनी में हँस रहे थे।
श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठे हुए भावावेश में माता का स्मरण कर रहे हैं।
अधर आकर बैठे। कमरे में मास्टर और निरंजन भी हैं। श्रीरामकृष्ण अधर के साथ बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – अजी, तुम अब आये! कितना कीर्तन और नृत्य हो गया। श्यामदास का कीर्तन था – राम के उस्ताद का। परन्तु मुझे बहुत अच्छा न लगा। उठने की इच्छा भी नहीं हुई। उस आदमी की बात फिर पीछे से मालूम हुई। गोपीदास के साथवाले ने कहा, मेरे सिर पर जितने बाल हैं, उतनी उसकी रखेलियाँ हैं! (सब हँसते हैं।) क्या तुम्हारा काम हुआ?
अधर डिप्टी हैं। तीन सौ तनख्वाह पाते हैं। उन्होंने कलकत्ता म्यूनिसिपल्टी के वाइस चेअरमैन के लिए अर्जी दी थी। वहाँ हजार रुपये महीने की तनख्वाह है। इसके लिए अधर कलकत्ते के बहुत बड़े-बड़े आदमियों से मिले थे।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर और निरंजन से) – हाजरा ने कहा था, अधर का काम हो जायगा, तुम जरा माँ से कहो। अधर ने भी कहा था। मैंने माँ से कहा था, 'माँ, यह तुम्हारे यहाँ आयाजाया करता है, अगर उसे जगह मिलनी हो तो दे दो –' परन्तु इसके साथ ही माँ से मैंने यह भी कहा था कि माँ, इसकी बुद्धि कितनी हीन है? ज्ञान और भक्ति की प्रार्थना न करके तुम्हारे पास यह सब चाहता है!
(अधर से) “क्यों नीच प्रकृति के आदमियों के यहाँ इतना चक्कर मारते फिरे? इतना देखा और समझा, सातों काण्ड रामायण पढ़कर सीता किसकी भार्या थी, इतना भी नहीं समझे?”
अधर – संसार में रहने पर इन सब के बिना किये काम भी नहीं चलता। आपने तो मना भी नहीं किया था।
श्रीरामकृष्ण – निवृत्ति ही अच्छी है, प्रवृत्ति अच्छी नहीं। इस अवस्था के बाद मुझे तनख्वाह के बिल पर दस्तखत करने के लिए कहा था! मैंने कहा, 'यह मुझसे न होगा। मैं तो कुछ चाहता नहीं। तुम्हारी इच्छा हो तो किसी दूसरे को दे दो।'
“एकमात्र ईश्वर का दास हूँ – और किसका दास बनूँ?
“मुझे खाने की देर होती थी, इसलिए मल्लिक ने भोजन पकाने के लिए एक ब्राह्मण नौकर रख दिया था। एक महीने में एक रुपया दिया था। तब मुझे लज्जा हुई, उसके बुलाने से ही दौड़ना पड़ता था! – खुद जाऊँ वह बात दूसरी है।
“सांसारिक जीवन व्यतीत करने में मनुष्य को न जाने कितने नीच आदमियों को खुश करना पड़ता है, और उसके अतिरिक्त और भी न जाने क्या क्या करना पड़ता है।
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५९८ श्रीरामकृष्णवचनामृत ७ सितम्बर, १८८४
“ऊँची अवस्था प्राप्त होने के पश्चात् तरह तरह के दृश्य मुझे दीख पड़ने लगे। तब माँ से कहा, 'माँ यहीं से मन को मोड़ दो जिससे मुझे धनी लोगों की खुशामद न करनी पड़े।
“जिसका काम कर रहे हो, उसी का करो। लोग सौ-पचास रुपये के लिए जी देते हैं, तुम तो तीन सौ महीना पाते हो। उस देश में मैंने डिप्टी देखा था, ईश्वर घोषाल को। सिर पर टोपी – गुस्सा नाक पर; मैंने लड़कपन में उसे देखा था; डिप्टी कुछ कम थोड़े ही होता है!
“जिसका काम कर रहे हो, उसी का करते रहो। एक ही आदमी की नौकरी से जी ऊब जाता है, फिर पाँच आदमियों की नौकरी?
“एक स्त्री किसी मुसलमान को देखकर मुग्ध हो गयी थी, उसने उसे मिलने के लिए बुलाया। मुसलमान आदमी अच्छा था, प्रकृति का साधु था। उसने कहा – 'मैं पेशाब करूँगा, अपनी हण्डी ले आऊँ।' उस स्त्री ने कहा – 'हण्डी तुम्हें यहीं मिल जायगी, मैं दूँगी तुम्हें हण्डी।' उसने कहा – 'ना, सो बात नहीं होगी! जिस हण्डी के पास मैंने एक दफे शर्म खोई, इस्तेमाल तो मैं उसी का करूँगा – नयी हण्डी के पास दोबारा बेईमान न हो सकूँगा।' यह कहकर वह चला गया। औरत की भी अक्ल दुरुस्त हो गयी; हण्डी का मतलब वह समझ गयी।”
पिता का वियोग हो जाने पर नरेन्द्र को बड़ी तकलीफ हो रही है। माता और भाइयों के भोजन-वस्त्र के लिए वे नौकरी की तलाश कर रहे हैं। विद्यासागर के बहूबाजार वाले स्कूल में कुछ दिनों तक उन्होंने प्रधान शिक्षक का काम किया था।
अधर – अच्छा, नरेन्द्र कोई काम करेगा या नहीं?
श्रीरामकृष्ण – हाँ, वह करेगा। माँ और भाई जो हैं।
अधर – अच्छा, नरेन्द्र की जरूरत पचास रुपये से भी पूरी हो सकती है और सौ रुपये से भी उसका काम चल सकता है। अब अगर उसे सौ रुपये मिलें तो वह काम करेगा या नहीं?
श्रीरामकृष्ण – विषयी लोग धन का आदर करते हैं। वे सोचते हैं, ऐसी चीज और दूसरी न होगी। शम्भू ने कहा – 'यह सारी सम्पत्ति ईश्वर के श्रीचरणों में सौंप जाऊँ, मेरी बड़ी इच्छा है।' वे विषय थोड़े ही चाहते हैं? वे तो ज्ञान, भक्ति, विवेक, वैराग्य यह सब चाहते हैं।
“जब श्रीठाकुर-मन्दिर से गहने चोरी चले गये, तब सेजो बाबू ने कहा – 'क्यों महाराज! तुम अपने गहने न बचा सके! हंसेश्वरी देवी को देखो, किस तरह अपने गहने बचा लिये थे!'
“सेजो बाबू ने मेरे नाम एक ताल्लुका लिख देने के लिए कहा था। मैंने काली-