श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२१ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९२ | ६३७
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राम – केशव सेन कहते थे, उनके पास आदमी इतना क्यों जाते हैं? एक दिन चुपचाप चुभो देंगे तब भागना होगा।
श्रीरामकृष्ण – चुभों क्यों दूँगा? मैं तो आदमियों से कहता हूँ, यह भी करो और वह भी करो। संसार भी करो और ईश्वर को भी पुकारो। सब कुछ छोड़ने के लिए तो मैं कहता नहीं। (हँसकर) केशव सेन ने एक दिन लेक्चर दिया। कहा 'हे ईश्वर ऐसा करो कि हम लोग भक्ति-नदी में गोते लगा सकें और गोते लगाकर सच्चिदानन्द-सागर में पहुँच जायँ।' स्त्रियाँ सब 'चिक' की ओट में बैठी थीं। मैंने केशव से कहा, 'एक ही साथ सब आदमियों के गोते लगाने से कैसे होगा? तो इन लोगों (स्त्रियों) की दशा क्या होगी? कभी कभी किनारे पर लग जाया करना। फिर गोते लगाना, फिर ऊपर आना।' केशव और दूसरे लोग हँसने लगे। हाजरा कहता है, 'तुम रजोगुणी आदमियों को बड़ा प्यार करते हो, जिनके रुपया-पैसा, मान-मर्यादा खूब है।' अगर ऐसी बात है तो हरीश, लाटू, इन्हें क्यों प्यार करता हूँ? नरेन्द्र को क्यों प्यार करता हूँ? उसके तो भूना भाँटा खाने को नमक भी नहीं है।
श्रीरामकृष्ण कमरे से बाहर आये; मास्टर से बातचीत करते हुए झाऊतल्ले की ओर जा रहे है। एक भक्त गड़ुआ और अँगोछा लेकर साथ साथ जा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण कलकत्ते में आज 'चैतन्यलीला' नाटक देखने जायेंगे, उसी की बाते हो रही हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – राम सब रजोगुण की बातें कह रहा है। इतने अधिक दाम खर्च करके बैठने की क्या जरूरत है?
बाक्स का टिकट न लिया जाय, श्रीरामकृष्ण का यह उद्देश्य है।
(४)
हाथीबागान में भक्त के घर। श्री महेन्द्र मुखर्जी की सेवा
श्रीरामकृष्ण श्रीयुत महेन्द्र मुखर्जी की गाड़ी पर चढ़कर दक्षिणेश्वर से कलकत्ता आ रहे हैं। आज रविवार है, २१ सितम्बर, १८८४। दिन के पाँच का समय है। गाड़ी में महेन्द्र मुखर्जी, मास्टर और दो-एक व्यक्ति और हैं। गाड़ी के कुछ बढ़ते ही ईश्वरचिन्तन करते हुए श्रीरामकृष्ण भाव-समाधि में मग्न हो गये।
बड़ी देर के बाद समाधि छूटी। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, हाजरा भी मुझे शिक्षा देता है! कुछ देर बाद फिर कह रहे हैं – मैं पानी पीऊँगा। बाह्य संसार में मन को उतारने के लिए समाधि के भंग होने पर प्रायः श्रीरामकृष्ण यह बात कहते थे।
महेन्द्र मुखर्जी – (मास्टर से) – तो कुछ जलपान के लिए मँगा लिया जाय।
मास्टर – नहीं, इस समय ये न खायेंगे।
श्रीरामकृष्ण – (भावस्थ) – मैं खाऊँगा और शौच भी जाऊँगा।
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| ६३८ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २१ सितम्बर, १८८४ |
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हाथीबागान में महेन्द्र मुखर्जी की आटे की चक्की है। उसी कारखाने में श्रीरामकृष्ण को लिए जा रहे हैं। वहाँ जरा देर विश्राम करके स्टार थियेटर में चैतन्यलीला नाटक देखने जायेंगे। महेन्द्र का मकान बाग-बाजार में है, श्रीमदनमोहनजी के कुछ उत्तर तरफ। श्रीरामकृष्ण को उनके पिता नहीं जानते; इसीलिए महेन्द्र उन्हें घर नहीं ले गये। उनके भाई प्रियनाथ भी श्रीरामकृष्ण के भक्त हैं।
महेन्द्र के कारखाने में तख्त पर दरी बिछी हुई है। उसी पर श्रीरामकृष्ण बैठे हुए ईश्वर-प्रसंग कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण — (मास्टर और महेन्द्र से) — चैतन्यचरितामृत सुनते हुए हाजरा कहता है, 'यह सब शक्ति की लीला है — इसके भीतर विभु नहीं हैं।' विभु को छोड़कर शक्ति कभी रह सकती है? यहाँ के मत को उलट देने की चेष्टा!
"मैं जानता हूँ, ब्रह्म और शक्ति अभेद हैं। जैसे जल और उसकी हिमशक्ति, अग्नि और उनकी दाहिका शक्ति। वे विभु के रूप से सर्व भूतों में विराजमान हैं, परन्तु कहीं उनकी शक्ति का अधिक और कहीं कम प्रकाश है। हाजरा यह भी कहता है, 'ईश्वर को पा जाने पर उन्हीं की तरह मनुष्य षडैश्वर्यशाली हो जाता है। षडैश्वर्य रहेंगे जरूर, फिर वह उन्हें अपने काम में लाये या न लाये।' "
मास्टर — षडैश्वर्य मुट्ठी में रहने चाहिए। (सब हँसते हैं।)
श्रीरामकृष्ण — (सहास्य) — हाँ, मुट्ठी में रहने चाहिए। कैसी हीन बुद्धि हैं! जिसने ऐश्वर्य का कभी भोग नहीं किया, वह 'ऐश्वर्य ऐश्वर्य' चिल्लाकर अधीर होता है। जो शुद्ध भक्त है, वह कभी ऐश्वर्य के लिए प्रार्थना नहीं करता।
श्रीरामकृष्ण शौच को जायेंगे। महेन्द्र ने गडुए में पानी मँगवाया और गडुए को खुद हाथ में ले लिया। श्रीरामकृष्ण को साथ लेकर मैदान की ओर जायेंगे।
श्रीरामकृष्ण ने सामने मणि को देखकर महेन्द्र से कहा, तुम्हें न लेना होगा, इन्हें दे दो।
मणि गड़ुआ लेकर श्रीरामकृष्ण के साथ कारखाने के भीतरवाले मैदान की ओर गये। हाथ-मुख धो चुकने के बाद श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं, "क्या सन्ध्या हो गयी? सन्ध्या होने पर सब काम छोड़कर ईश्वरचिन्तन करना चाहिए।"
यह कहकर श्रीरामकृष्ण हाथ के रोएँ देख रहे हैं — गिने जा सकते हैं या नहीं। रोएँ अगर न गिने जा सकें तो समझना चाहिए कि सन्ध्या हो गयी।
(५)
थियेटर में चैतन्यलीला। समाधि में श्रीरामकृष्ण
श्रीरामकृष्ण बीडन स्ट्रीट में स्टार थियेटर के सामने आ गये। रात के साढ़े आठ बजे
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का समय होगा। साथ में मास्टर, बाबूराम, महेन्द्र, मुखर्जी तथा दो-एक भक्त और हैं। टिकट खरीदने का बन्दोबस्त हो रहा है। नाट्यागार के मैनेजर श्रीयुत गिरीश घोष कुछ कर्मचारियों के साथ श्रीरामकृष्ण की गाड़ी के पास आये। स्वागत करके आदरपूर्वक उन्हें ऊपर ले गये। गिरीश बाबू ने श्रीरामकृष्णदेव का नाम सुना था। वे चैतन्यलीला-अभिनय देखने के लिए आये हैं, यह सुनकर उन्हें बड़ा आनन्द हुआ है। श्रीरामकृष्ण को लोगों ने दक्षिण-पश्चिमवाले बाक्स में बैठाया। पीछे बाबूराम तथा और भी दो-एक भक्त बैठे।
रंगमंच में बत्ती जल गयी। नीचे बहुत से आदमी बैठे हुए थे। श्रीरामकृष्ण की बाईं ओर ड्रापसीन दीख पड़ रहा है। कितने ही बाक्सों में भी आदमी आ गये हैं। बाक्स के पीछे से हवा करने के लिए एक एक पंखा झलनेवाला नौकर है। श्रीरामकृष्ण को भी हवा करने के लिए गिरीश आदमी ठीक कर गये।
रंगमंच देखकर श्रीरामकृष्ण को बालकों की तरह प्रसन्नता हुई है।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से हँसते हुए) – वाह! यहाँ तो बड़ा अच्छा है। आकर बड़ा अच्छा हुआ। बहुत से आदमियों के एक साथ होने से उद्दीपना होती है। तब मैं यथार्थ ही देखता हूँ कि वे ही सब हुए हैं।
मास्टर – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – यहाँ कितना लेगा?
मास्टर – जी, कुछ न लेंगे। आप आये हैं, इसलिए उन्हें बड़ा हर्ष है।
श्रीरामकृष्ण – सब माँ का माहात्म्य है।
ड्रापसीन उठ गया। एक साथ ही दर्शकों की दृष्टि रंगमंच पर पड़ी। पहले पाप और छः रिपुओं की सभा थी। फिर अरण्य-मार्ग में विवेक, वैराग्य और भक्ति की बातचीत थी।
भक्ति कह रही है – नदिया में गौरांग ने जन्म ग्रहण किया है, इसलिए विद्याधरियाँ और ऋषि-मुनि छद्मवेश धारण कर उनके दर्शन करने जा रहे हैं।
विद्याधरियाँ और ऋषि-मुनि गौरांग को अवतार मानकर उनकी स्तुति कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण उन्हें देखकर भाव में विभोर हो रहे हैं। मास्टर से कह रहे हैं, अहा! देखो, कैसा है!
विद्याधरियाँ और ऋषि-मुनि गाकर श्रीगौरांग की स्तुति कर रहे हैं –
पुरुषगण – केशव कुरु करुणा दीने कुंज-कानन-चारी।
स्त्रियाँ – माधव मनमोहन मोहन-मुरलीधारी॥
सब मिलकर – हरि बोल, हरि बोल, हरि बोल, मन आमार।
पुरुष – ब्रजकिशोर कालीय-हर कातर-भय-भंजन।
स्त्रियाँ – नयन बाँका, बाँका शिखिपाखा, राधिका-हृदिरंजन।
पुरुष – गोवर्धन धारण, वनकुसुम – भूषण, दामोदर कंसदर्पहारी।
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स्त्रियाँ – श्याम रासरसबिहारी॥
सब – हरि बोल, हरि बोल, हरि बोल, मन आमार।
विद्याधरियों ने जब गाया – 'नयन बाँका, बाँका शिखिपाखा राधिका-हृदिरंजन', तब श्रीरामकृष्ण गम्भीर समाधि में मग्न हो गये। कन्सर्ट (concert) में कई वाद्य एक साथ बज रहे हैं। श्रीरामकृष्ण को कोई होश नहीं।
(६)
चैतन्यलीला-दर्शन। गौर-प्रेम में उन्मत्त श्रीरामकृष्ण
जगन्नाथ मिश्र (श्रीगौरांग के पिता) के घर एक अतिथि आये हैं। बालक निमाई अपने साथियों के साथ आनन्दपूर्वक गा रहे हैं।
अतिथि आँखें मूँदकर भगवान को भोग लगा रहे हैं। निमाई दौड़कर अतिथि के पास पहुँचे और अतिथि के नैवेद्य को खाने लगे। अतिथि समझ गये कि ये ईश्वर के अवतार हैं। वे दस अवतारों की स्तुति को बालक के सामने पढ़कर उसे प्रसन्न करने लगे। मिश्र और शची के पास से विदा होते समय उन्होंने फिर गाकर स्तुतिपाठ किया –
“जय नित्यानन्द गौरचन्द्र जय जय भवतारण!
अनाथत्राण जीवप्राण भीतभयवारण!
युगे युगे रंग, नव लीला नव रंग,
नव तरंग, नव प्रसंग, धराभार-धारण!
तापहारी प्रेमवारि वितर रासरस-बिहारी,
दीनआश, कलुषनाश, दुष्टत्रासकारण!”
स्तुति सुनते ही सुनते श्रीरामकृष्ण को फिर भावावेश हो रहा है।
अब नवद्वीप के गंगातट का दृश्य आया। गंगा नहाकर ब्राह्मणों की स्त्रियाँ और पुरुष घाट पर बैठे हुए पूजा कर रहे हैं। निमाई नैवेद्य छीन-छीनकर खा रहे हैं। एक ब्राह्मण बहुत गुस्सा हो गये। उन्होंने कहा, क्यों रे दुष्ट, विष्णुपूजा का नैवेद्य छीनता है? – तेरा सर्वनाश होगा। निमाई ने फिर भी नैवेद्य छीनकर खाया और फिर वहाँ से चल दिया। बहुत सी औरतें थीं, जो उसे बड़ा प्यार करती थीं। निमाई को जाते देखकर उन्हें जो हार्दिक कष्ट हुआ, उसे वे सह न सकीं। वे उच्च स्वर से पुकारने लगीं, 'निमाई, लौट आ, निमाई लौट आ', पर निमाई ने उनकी एक न सुनी। स्त्रियों में एक निमाई को लौटाने का महामन्त्र जानती थीं। उसने 'हरि बोल, हरि बोल' कहना आरम्भ कर दिया। बस निमाई 'हरि बोल, हरि बोल' कहते हुए लौट पड़े।
मणि श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हुए हैं। कहा – अहा!
श्रीरामकृष्ण स्थिर न रह सके। 'अहा' कहते हुए मणि की ओर देखकर प्रेमाश्रु वर्षण
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कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (बाबूराम और मास्टर से) – देखो, अगर मुझे भावसमाधि हो, तो तुम लोग शोरगुल न मचाना; संसारी आदमी समझेंगे – ढकोसला है।
निमाई का उपनयन हो रहा है। निमाई संन्यासी के वेश में हैं। शची और पड़ोसिनें चारों ओर खड़ी हैं। निमाई गाकर भिक्षा माँग रहे हैं।
सब चले गये। निमाई अकेले हैं। देव और देवियाँ ब्राह्मण और ब्राह्मणियों के वेश में उनकी स्तुति कर रहे हैं –
पुरुषगण – चन्द्रकिरण अंगे, नमो वामनरूपधारी।
स्त्रियाँ – गोपीगणमनमोहन, मंजुकुंजचारी।
निमाई – जय राधे, श्रीराधे!
पुरुष – व्रज-बालक-संग, मदन-मान-भंग।
स्त्रियाँ – उन्मादिनी व्रजकामिनी उन्माद-तरंग॥
पुरुष – दैत्य-छलन नारायणसुरगण-भय-हारी॥
स्त्रियाँ – व्रज-बिहारी, गोपनारी-मान-भिखारी॥
निमाई – जय राधे, श्रीराधे
श्रीरामकृष्ण यह गाना सुनते सुनते समाधिमग्न हो गये।
अब दूसरा अंक शुरू हुआ। अद्वैत के घर के सामने श्रीवास आदि बातें कर रहे हैं। मुकुन्द मधुर कण्ठ से गा रहे हैं।
निमाई घर में हैं। श्रीवास इनसे भेंट करने के लिए आये हैं। पहले शची से भेंट हुई। शची रोने लगीं, 'मेरा पुत्र संसार-धर्म में मन नहीं देता। जब से विश्वरूप चला गया है, तब से सदा ही मेरे प्राण काँपते रहते हैं कि कहीं निमाई भी संन्यासी न हो जाय।'
इसी समय निमाई आते हुए दीख पड़े। शची श्रीवास से कह रही हैं, 'देखो – जान पड़ता है पागल है – आँसुओं से हृदय प्लावित हुआ जा रहा है, कहो, कहो – किस तरह इसका यह भाव दूर हो?'
निमाई श्रीवास को देखकर रो रहे हैं – 'कहाँ, प्रभु! कहाँ मुझे कृष्णभक्ति हुई? अधम जन्म तो व्यर्थ ही कटा जा रहा हैं!'
श्रीरामकृष्ण मास्टर की ओर देखकर कुछ बोलना चाहते हैं पर बात नहीं निकलती। गला भर गया है। कपोलों पर आँसुओं की धारा बहती जा रही है। अनिमेष लोचनों से देख रहे हैं – निमाई श्रीवास के पैरों पर पड़े हुए कह रहे हैं – 'कहाँ, प्रभु! कृष्ण की भक्ति तो मुझे नहीं हुई!'
इधर निमाई पाठशाला के छात्रों को अब पढ़ा भी नहीं सकते। निमाई ने गंगादास से पढ़ा था। वे निमाई को समझाने आये हैं। उन्होंने श्रीवास से कहा – 'श्रीवासजी, हम
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लोग भी तो ब्राह्मण हैं, विष्णुपूजा भी किया करते हैं, परन्तु अब देखा जाता है, आप लोग उसके संसार को नष्ट-भ्रष्ट कर डालेंगे।'
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – यह संसारी की शिक्षा है, यह भी करो और वह भी करो। संसारी मनुष्य जब शिक्षा देता है, तब दोनों ओर सम्हालने के लिए कहता हैं।
मास्टर – जी हाँ।
गंगादास निमाई को फिर समझा रहे है – “क्यों जी, निमाई तुम्हें तो अब शास्त्रज्ञान भी हो गया है। तुम हमारे साथ तर्क करो। संसार-धर्म से बड़ा और कौन धर्म है? हमें समझाओ – तुम गृही हो, गृही की तरह आचरण न करके विपरीत आचरण क्यों करते हो?”
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – देखा? दोनों ओर सम्हालने के लिए कह रहा है।
मास्टर – जी हाँ।
निमाई ने कहा, “मैं अपनी इच्छा से संसार-धर्म की उपेक्षा नहीं कर रहा हूँ। मेरी तो यही इच्छा है कि लोक परलोक दोनों बनें। परन्तु प्रभु, न जाने क्यों प्राण उधर को खींचते हैं। समझाने पर भी नहीं समझते। अगाध समुद्र में कुदाना चाहते हैं।”
श्रीरामकृष्ण – अहा!
(७)
थियेटर में नित्यानन्द के वंशज; तथा श्रीरामकृष्ण का उद्दीपन
नवद्वीप में नित्यानन्द आये हुए हैं। वे निमाई को खोज रहे हैं, उसी समय निमाई से भेंट हो गयी। निमाई भी उनको खोज रहे थे। मुलाकात होने पर निमाई कह रहे हैं – “मेरा जीवन सार्थक है। मेरा स्वप्न सत्य हुआ। तुम मुझे स्वप्न में दर्शन देकर छिप गये थे।”
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से गद्गद स्वरों में) – निमाई कहते हैं कि स्वप्न में मैंने देखा है।
श्रीवास ने षड्भुजा मूर्ति देखी है और स्तव कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण भावावेश में षड्भुजा-मूर्ति के दर्शन कर रहे हैं।
गौरांग को ईश्वरावेश हुआ हैं। वे अद्वैत, श्रीवास, हरिदास आदि के साथ भावावेश में बातचीत कर रहे हैं।
गौरांग का भाव समझकर नित्यानन्द गा रहे हैं – “क्यों री सखी, कुंज में श्रीकृष्ण कब आये?”
श्रीरामकृष्ण गाना सुनते ही समाधिमग्न हो गये। बड़ी देर तक उसी अवस्था में रहे। वाद्य बज रहे हैं। श्रीरामकृष्ण की समाधि छूटी। अब खड़दह के एक बाबू आये, वे
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नित्यानन्द के वंशज थे। वे श्रीरामकृष्ण की कुर्सी के पीछे खड़े हुए। उम्र तीस पैंतीस की होगी। श्रीरामकृष्ण को उन्हें देखकर अपार आनन्द हुआ। उनका हाथ पकड़कर उनसे कितनी ही बातें कह रहे हैं। कभी कभी उनसे कहते हैं - 'यहाँ बैठो, बैठो न, तुम्हारे यहाँ रहने पर बड़ी उद्दीपना होगी।' स्नेहपूर्वक उनका हाथ पकड़ मानो खेल कर रहे हैं। उनके मुँह पर हाथ फेरकर कितना ही स्नेह कर रहे हैं।
गोस्वामी के चले जाने पर मास्टर से कह रहे हैं - "वह बड़ा पण्डित है। उसका बाप बड़ा भक्त है। जब मैं खड़दह के श्यामसुन्दर का दर्शन करने गया था, तब सौ रुपये देने पर भी जो भोग नहीं मिलता, वही भोग लाकर मुझे उसने खिलाया था।
"इसके लक्षण बड़े अच्छे हैं। जरा हिला-डुला देने से चेतना हो जायगी। उसे देखते ही उद्दीपना होती है और खूब होती है। और जरा देर रहता तो मैं खड़ा हो जाता।"
पर्दा उठ गया। राजपथ पर नित्यानन्द सिर पर हाथ लगाये हुए खून का बहना रोक रहे हैं। मधाई ने कलसी का टुकड़ा फेंककर मारा है। परन्तु नित्यानन्द का ध्यान मधाई की ओर नहीं है। गौरांग के प्रेम से वे पूरे मतवाले हो रहे हैं। श्रीरामकृष्ण को भावावेश हुआ है। देख रहे हैं, मारकर पश्चाताप करनेवाले मधाई को और उसके साथी जगाई को नित्यानन्द गले से लगा रहे हैं।
अब निमाई शची देवी से संन्यास की बात कह रहे हैं।
सुनकर शची देवी मूर्च्छित हो गयीं। उनको मूर्च्छित देखकर कितने ही दर्शक हाहाकार कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण तिल भर भी विचलित न होकर एकदृष्टि से देख रहे हैं। केवल आँखों के कोरों में एक एक बूँद आँसू झलक रहा हैं।
(८)
श्रीरामकृष्ण का भक्त-प्रेम
अभिनय समाप्त हो गया। श्रीरामकृष्ण गाड़ी पर चढ़ रहे हैं। एक भक्त ने पूछा, आपने कैसा देखा? श्रीरामकृष्ण ने हँसते हुए कहा, असल और नकल एक देखा।
गाड़ी महेन्द्र मुखर्जी के कारखाने में जा रही है। एकाएक श्रीरामकृष्ण को भावावेश हो गया। कुछ देर बाद प्रेमपूर्वक आप ही आप कह रहे हैं - "हा कृष्ण! हे कृष्ण! ज्ञान कृष्ण! प्राण कृष्ण! मन कृष्ण! आत्मा कृष्ण! देह कृष्ण!" फिर कह रहे हैं - "प्राण हे गोविन्द मेरे जीवन!"
गाड़ी मुखर्जी के कारखाने में पहुँची। बड़े आदर-सत्कार के साथ महेन्द्र ने श्रीरामकृष्ण को भोजन कराया। मणि पास बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण स्नेहपूर्वक उनसे कह रहे हैं, तुम भी कुछ खाओ। हाथ से उठाकर मिष्टान्न प्रसाद दिया।
अब श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर जा रहे हैं। गाड़ी में महेन्द्र मुखर्जी तथा और
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६४४ श्रीरामकृष्णवचनामृत २१ सितम्बर, १८८४
भी दो-तीन भक्त हैं। महेन्द्र कुछ आगे बढ़कर छोड़ आयेंगे। श्रीरामकृष्ण आनन्दपूर्वक श्रीगौरांग पर रचा गया एक गाना गा रहे हैं। साथ साथ मणि भी गा रहे हैं।
महेन्द्र तीर्थ जायेंगे। श्रीरामकृष्ण से उसी सम्बन्ध की बातें कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (महेन्द्र से सहास्य) – प्रेम के अंकुर के बिना उगते ही जाओगे, सब सूख न जायेगा?
"परन्तु जल्दी आना। अहा, बहुत दिनों से तुम्हारे यहाँ आने की इच्छा हो रही थी। एक बार देख लिया, अच्छा हुआ।"
महेन्द्र – जी, हम लोगों का जन्म और जीवन सार्थक हो गया।
श्रीरामकृष्ण – सार्थक तो तुम हो ही। तुम्हारे पिता भी अच्छे हैं। उस दिन देखा, अध्यात्म रामायण पर विश्वास है।
महेन्द्र – जी, कृपा रखियेगा, जिससे भक्ति हो।
श्रीरामकृष्ण – तुम बड़े उदार और सरल हो। उदार हुए बिना कोई ईश्वर को पा नहीं सकता। वे कपट से बहुत दूर हैं।
महेन्द्र श्यामबाजार के पास बिदा हुए। गाड़ी जा रही है।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – यदु मल्लिक ने क्या किया?
मास्टर – (मन ही मन) – श्रीरामकृष्ण सब की कल्याण-कामना कर रहे हैं।
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परिच्छेद ९३
परिच्छेद ९३
प्रार्थना-रहस्य
(१)
साधारण ब्राह्म-समाज मन्दिर में श्रीरामकृष्ण। 'समन्वय'
आज श्रीरामकृष्ण कलकत्ता आये हुए हैं। आज नवरात्रि की सप्तमी-पूजा है। शुक्रवार, २६ सितम्बर, १८८४। श्रीरामकृष्ण को बहुत से काम हैं। शारदीय महोत्सव है - हिन्दुओं के यहाँ आज प्रायः घर-घर में यह महोत्सव मनाया जा रहा है, फिर राजधानी कलकत्ते की बात ही क्या है। श्रीरामकृष्ण अधर के यहाँ जाकर प्रतिमा-पूजन देखेंगे और आनन्दमयी के आनन्दोत्सव में भाग लेंगे। उनकी एक इच्छा और है। वे श्रीयुत शिवनाथ शास्त्री के दर्शन करेंगे।
दिन के दोपहर से साधारण ब्राह्मसमाज के फुटपाथ पर हाथ में छाता लिये प्रतीक्षा में मास्टर टहल रहे हैं। एक बजा, दो बजे, श्रीरामकृष्ण न आये। श्रीयुत महलानवीस के कारखाने की सीढ़ी पर बैठकर कभी पूजा के उत्सव में आबाल-वृद्ध नरनारियों को आनन्द करते हुए देखते हैं।
तीन बज गये। कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण की गाड़ी आकर पहुँच गयी। साथ में हाजरा तथा दो-एक भक्त और हैं। मास्टर को श्रीरामकृष्ण के दर्शनों से अपार आनन्द हुआ है। उन्होंने श्रीरामकृष्ण की चरणवन्दना की। श्रीरामकृष्ण ने कहा, मैं शिवनाथ के घर जाऊँगा। श्रीरामकृष्ण के आने की बात सुनकर कई ब्राह्मभक्त वहाँ आ पहुँचे। श्रीरामकृष्ण को अपने साथ वे ब्राह्ममुहल्ले के भीतर शिवनाथ के यहाँ ले आये। शिवनाथ घर में न थे। अब क्या किया जाय? देखते ही देखते श्रीयुत विजय, श्रीयुत महलानवीस आदि ब्राह्मसमाज के संचालक आ गये। वे श्रीरामकृष्ण का स्वागत करके उन्हें समाज-मन्दिर के अन्दर ले गये। श्रीरामकृष्ण जरा देर के लिए बैठ गये, यह आशा थी कि तब तक शिवनाथ भी आयेंगे।
श्रीरामकृष्ण सदा ही आनन्दमय बने रहते हैं। हँसकर उन्होंने आसन ग्रहण किया। वेदी के नीचे जिस जगह संकीर्तन होता है, वहीं बैठने का आसन कर दिया गया। विजय आदि बहुतेरे ब्राह्मभक्त सामने बैठे।
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६४६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २६ सितम्बर, १८८४
श्रीरामकृष्ण – (विजय से, हँसते हुए) – मैंने सुना है कि यहाँ कोई साइनबोर्ड है। दूसरे मतों के आदमी यहाँ नहीं आने पाते। नरेन्द्र ने कहा, समाज में जाने की जरूरत नहीं, आप शिवनाथ के यहाँ जाइयेगा।
“मैं कहता हूँ, उनको सभी पुकार रहे हैं। द्वेष की क्या जरूरत है? कोई साकार कहता है और कोई निराकार। मैं कहता हूँ, जिसका विश्वास साकार पर है, वह साकार की ही चिन्ता करे और जिसका विश्वास निराकार पर है, वह निराकार की चिन्ता करे। तात्पर्य यह कि इस कट्टरता की कोई आवश्यकता नहीं कि मेरा ही धर्म ठीक है, तथा अन्य सब वाहियात हैं। 'मेरा धर्म ठीक है, पर दूसरों के धर्म में सच्चाई है या वह गलत है, यह मेरी समझ में नहीं आता', ऐसा भाव अच्छा है, क्योंकि बिना ईश्वर का साक्षात्कार किये उनका स्वरूप समझ में नहीं आता। कबीर कहते थे, साकार मेरी माँ है और निराकार मेरा बाप।
'काको निन्दौं काको बन्दौं दोनों पल्ला भारी।'
“हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, शाक्त, वैष्णव, शैव, ऋषियों के समय के ब्रह्मज्ञानी और आजकल के ब्राह्मसमाजवाले तुम लोग, सब एक ही वस्तु की चाह रखते हो। अन्तर इतना ही है कि जिससे जिसका हाजमा नहीं बिगड़ता, उसी की व्यवस्था उसके लिए माँ ने की है।
“बात यह है कि देश, काल और पात्र के भेद से ईश्वर ने अनेक धर्मों की सृष्टि की है। परन्तु सब मत ही उनके रास्ते हैं, पर मत कभी ईश्वर नहीं है। बात यह है कि आन्तरिक भक्ति के द्वारा एक मत का आश्रय लेने पर उनके पास तक पहुँचा जाता है। अगर किसी मत का आश्रय लेने पर कोई भूल उसमें रहती है, तो आन्तरिकता के होने पर वे भूल सुधार देते हैं। अगर कोई आन्तरिक भक्ति के साथ जगन्नाथजी के दर्शनों के लिए निकलता है और भूलकर दक्षिण की ओर न जाकर उत्तर की ओर चला जाता है, तो रास्ते में उसे कोई अवश्य ही कह देता है, 'क्यों भाई, उस तरफ कहाँ जाते हो, दक्षिण की ओर जाओ।' वह आदमी कभी न कभी जगन्नाथजी के दर्शन अवश्य ही करेगा।
“परन्तु इस बात की आलोचना हमारे लिए निष्प्रयोजन है कि दूसरों का मत गलत है। जिनका यह संसार है, वे सोच रहे हैं। हमारा तो यह कर्तव्य है कि किसी तरह जगन्नाथजी के दर्शन करें। और तुम्हारा मत अच्छा तो है। उन्हें निराकार कह रहे हो, यह अच्छा तो है। मिश्री की रोटी सीधी तरह से खाओ या टेढ़ी करके खाओ, मीठी जरूर लगेगी।
“केवल कट्टरता अच्छी नहीं होती। तुम लोगों ने बहुरूपिये की कहानी सुनी होगी। आदमी ने जंगल में जाकर पेड़ पर एक गिरगिट देखा। मित्रों के पास लौटकर उसने कहा, मैंने एक लाल गिरगिट देखा। उसको विश्वास था कि वह बिलकुल लाल है। एक आदमी और उस पेड़ के नीचे से लौटकर आया और उसने आकर कहा, मैं एक हरा
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२६ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९३ | ६४७
| २६ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९३ | ६४७ |
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गिरगिट देख आया हूँ। उसका विश्वास था कि वह बिलकुल हरा है। परन्तु जो मनुष्य उस पेड़ के ही नीचे रहता था, उसने आकर कहा, तुम लोग जो कुछ कहते हो, सब ठीक है, क्योंकि वह कभी लाल होता है, कभी पीला और कभी उसके कोई रंग नहीं रह जाता।
“वेदों में ईश्वर को निर्गुण, सगुण दोनों कहा है। तुम लोग केवल निराकार कह रहे हो, यह एक खास ढर्रे का है, परन्तु इससे कोई हर्ज नहीं। एक का यथार्थ ज्ञान हो जाय तो दूसरे का भी हो जाता है। वे ही समझा देते हैं। तुम्हारे यहाँ जो आता है, वह इन्हें भी पहचानता है और उन्हें भी।” (यह कहकर उन्होंने दो-एक ब्राह्मभक्तों की ओर उँगली उठाकर बताया।)
(२)
विजय गोस्वामी के प्रति उपदेश
विजय तब भी साधारण ब्राह्मसमाज में थे। उसी ब्राह्मसमाज में वे तनख्वाह लेकर आचार्य का काम करते थे। आजकल वें ब्राह्मसमाज के सब नियमों को मानकर चलने में असमर्थ हो रहे हैं। वे साकारवादियों के साथ भी मिल रहे हैं। इन सब बातों को लेकर साधारण ब्राह्मसमाज के संचालकों के साथ उनका मतान्तर हो रहा है। समाज के ब्राह्मभक्तों में कितने ही उनसे असन्तुष्ट हो रहे हैं। श्रीरामकृष्ण एकाएक विजय को लक्ष्य करके कह रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (विजय से, हँसकर) – तुम साकारवादियों से मिलते हो, इसलिए मैंने सुना, तुम्हारी बड़ी निन्दा हो रही है। जो ईश्वर का भक्त है, उसकी बुद्धि कूटस्थ होती है, जैसे लोहार के यहाँ की निहाई। हथौड़े की अनगिनती चोटें लगातार पड़ रही हैं, फिर भी निर्विकार है। बुरे आदमी तुम्हें बहुत कुछ कहेंगे, तुम्हारी निन्दा करेंगे। अगर तुम हृदय से परमात्मा को चाहते हो, तो तुम्हें सब सहना होगा। दुष्टों के बीच में रहकर क्या ईश्वर की चिन्ता नहीं हो सकती? देखो न, ऋषि लोग वन में ईश्वर की चिन्ता करते थे। चारों ओर बाघ, रीछ, अनेक प्रकार के हिंसक पशु रहते थे। बुरे आदमियों का स्वभाव बाघों और रीछों जैसा ही है। वे धावा कर अनर्थ करते हैं।
“इन कई जीवों के पास सावधान रहना पड़ता है। प्रथम हैं बड़े आदमी। धन और जन, दोनों ही उनके पास यथेष्ट हैं, वे चाहें तो तुम्हारा अनर्थ कर सकते हैं। बहुत संभलकर उनसे बातचीत करनी चाहिए। वे जो कहें, उसमें हाँ मिलाते जाना पड़ता है। इसके बाद है कुत्ता। जब कुत्ता खदेड़ लेता है या भौंकता है, तब खड़े होकर मुँह से पुचकारकर उसे ठण्डा करना पड़ता है। फिर है साँड़। मारने आये तो उसे भी पुचकारकर ठण्डा करना पड़ता है। इसके पश्चात् है शराबी। अगर चिढ़ा दो तो कहेगा, तेरी चौदह पीढ़ी की ऐसी-तैसी, तुझे फिर क्या कहूँ – इस तरह कितनी ही गालियाँ देता है। उससे
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६४८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २६ सितम्बर, १८८४
कहना पड़ता है, क्यों चाचा कैसे हो? तो वह खूब प्रसन्न हो जायगा कहो तो तुम्हारे पास ही बैठकर तम्बाकू पीने लगे।
“बुरे आदमी को देखते ही मैं सावधान हो जाता हूँ। अगर कोई आकर पूछता है, क्या हुक्का-सुक्का है? तो मैं कहता हूँ, हाँ है।
“किसी का स्वभाव साँप के समान होता है। तुम्हारे बिना जाने ही कहो वह तुम्हें काट खाय। उसकी चोट से बचने के लिए बहुत विचार करना पड़ता है। नहीं तो तुम्हें ही ऐसा क्रोध आ जायगा कि उल्टे उसी के नाश करने की चिन्ता में पड़ जाओगे। इतने पर भी कभी कभी सत्संग की बड़ी आवश्यकता है। सत्संग करने पर ही सत् असत् का विचार आता है।”
विजय – अवकाश नहीं है, यहाँ काम में फँसा रहता हूँ।
श्रीरामकृष्ण – तुम लोग आचार्य हो, दूसरों को छुट्टी भी मिलती है, परन्तु आचार्य को छुट्टी नहीं मिलती, नायब जब एक हल्के का अच्छा इन्तजाम कर लेता है, तब जमींदार उसे दूसरे महाल के इन्तजाम के लिए भेजता है। इसीलिए तुम्हें छुट्टी नहीं मिलती। (सब हँसते हैं।)
विजय – (हाथ जोड़कर) – आप जरा आशीर्वाद दीजिये।
श्रीरामकृष्ण – ये सब अज्ञान की बातें हैं। आशीर्वाद ईश्वर देंगे।
गृही ब्राह्मभक्त को उपदेश
विजय – जी, आप कुछ उपदेश दीजिये।
श्रीरामकृष्ण – (समाज-गृह के चारों ओर नजर डालकर सहास्य) – यह (ब्राह्मसमाज) एक तरह से अच्छा है। इसमें राब भी है और शीरा भी। (सब हँसते हैं।) नक्श खेल जानते हो? सत्रह से अधिक होने पर बाजी बरबाद हो जाती है। यह एक प्रकार का ताशों का खेल है। जो लोग सत्रह नुक्ताओं से कम में रह जाते हैं – जो लोग पाँच में रहते हैं, सात या दस में, वे होशियार हैं। मैं अधिक चढ़कर जल गया हूँ।
“केशव सेन ने घर में लेक्चर दिया था। मैंने सुना था। बहुत से आदमी बैठे थे। चिक के भीतर औरतें भी थीं। केशव ने कहा, ‘हे ईश्वर, तुम आशीर्वाद दो कि हम लोग भक्ति की नदी में बिलकुल डूब जाय।’ मैंने हँसकर केशव से कहा, ‘भक्ति की नदी में अगर बिलकुल ही डूब जाओगे, तो चिक के भीतर जो बैठी हुई हैं, उनकी दशा क्या होगी? इसलिए एक काम याद रखना, जब डूबना है, तब कभी-कभी तट पर लग जाया करना। बिलकुल ही तलस्पर्श न कर लेना।’ यह बात सुनकर केशव तथा दूसरे लोग हँसने लगे।
“खैर, आन्तरिकता के रहने पर संसार में भी ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है। ‘मैं’ और
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'मेरा' यही अज्ञान है। हे 'ईश्वर, तुम और तुम्हारा' यह ज्ञान है।
"संसार में इस तरह रहो जैसे बड़े आदमियों के घर की दासी। सब काम करती है, बाबू के बच्चे की सेवा करके उसे बड़ा कर देती है, उसका नाम लेकर कहती है, यह मेरा हरि है। परन्तु मन ही मन खूब जानती है कि न यह घर मेरा है और न यह लड़का। वह सब काम तो करती है, परन्तु उसका मन उसके देश में लगा रहता है। उसी तरह संसार का सब काम करो, परन्तु मन ईश्वर पर रखो और समझो कि घर, परिवार, पुत्र सब ईश्वर के हैं। मेरा यहाँ कुछ भी नहीं है। मैं केवल उनका दास हूँ।
"मैं मन से त्याग करने के लिए कहता हूँ। संसार छोड़ने के लिए मैं नहीं कहता। अनासक्त होकर, संसार में रहकर, अन्तर से उनकी प्राप्ति की इच्छा रखने पर, उन्हें मनुष्य पा सकता है।
(विजय से) "मैं भी आँखें मूँदकर ध्यान करता था। उसके बाद सोचा, क्या इस तरह करने पर (आँखें मूँदने पर) ईश्वर रहते हैं और इस तरह करने पर (आँखें खोलने पर) ईश्वर नहीं रहते ? आँखें खोलकर भी मैंने देखा, सब भूतों में ईश्वर विराजमान हैं। मनुष्य, जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, सूर्य-चन्द्र, जल-स्थल और अन्य सब भूतों में वे हैं।
"मैं क्यों शिवनाथ को चाहता हूँ? जो बहुत दिनों तक ईश्वर की चिन्ता करता है, उसके भीतर सार पदार्थ रहता है। उसके भीतर ईश्वर की शक्ति रहती है। जो अच्छा गाता और बजाता है, कोई एक विद्या बहुत अच्छी तरह जानता है, उसके भीतर भी सार पदार्थ है, ईश्वर की शक्ति है। यह गीता का मत है। चण्डी में है, जो बहुत सुन्दर है, उसके भीतर भी सार पदार्थ है, ईश्वर की शक्ति है। (विजय से) अहा! केदार का कैसा स्वभाव हो गया है; आते ही रोने लगता है। दोनों आँखें सदा ही फूली हुई-सी दीख पड़ती हैं।"
विजय – वहाँ केवल आप ही की बातें होती हैं और वे आपके पास आने के लिए व्याकुल हो रहे हैं।
कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण उठे। ब्राह्मभक्तों ने नमस्कार किया। उन्होंने भी नमस्कार किया। श्रीरामकृष्ण गाड़ी पर बैठे। अधर के यहाँ श्री दुर्गा के दर्शन करने के लिए जा रहे हैं।
(३)
महाष्टमी के दिन राम के घर पर श्रीरामकृष्ण
आज रविवार, महाष्टमी है, २८ सितम्बर, १८८४। श्रीरामकृष्ण देवी-प्रतिमा के दर्शन के लिए कलकत्ता आये हुए हैं। अधर के यहाँ शारदीय दुर्गोत्सव हो रहा है। श्रीरामकृष्ण का तीनों दिन न्योता है। अधर के यहाँ प्रतिमादर्शन करने के पहले आप राम के घर जा रहे हैं। विजय, केदार, राम, सुरेन्द्र, चुनीलाल, नरेन्द्र, निरंजन, नारायण,
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हरीश, बाबूराम, मास्टर आदि बहुत भक्त साथ में हैं; बलराम और राखाल अभी वृन्दावन में हैं।
श्रीरामकृष्ण – (विजय और केदार को देखकर, सहास्य) – आज अच्छा मेल है। दोनों एक ही भाव के भावुक हैं! (विजय से) क्यों जी शिवनाथ की क्या खबर है? क्या तुमने –
विजय – जी हाँ, उन्होंने सुना है। मेरे साथ तो मुलाकात नहीं हुई परन्तु मैंने खबर भेजी थी और उन्होंने सुना भी है।
श्रीरामकृष्ण शिवनाथ के यहाँ गये थे, उनसे मुलाकात करने के लिए, परन्तु मुलाकात नहीं हुई। बाद में विजय ने खबर भेजी थी; परन्तु शिवनाथ को काम से फुरसत नहीं मिली, इसलिए आज भी नहीं मिल सके।
श्रीरामकृष्ण – (विजय आदि से) – मन में चार वासनाएँ उठी हैं।
“बैंगन की रसदार तरकारी खाऊँगा। शिवनाथ से मिलूँगा। हरिनाम की माला लाकर भक्तगण जप करें, मैं देखूँगा और आठ आने का कारण (शराब) अष्टमी के दिन तान्त्रिक साधक पीयेगा, मैं देखकर प्रणाम करूँगा।”
नरेन्द्र सामने बैठे हुए थे। उनकी उम्र २२-२३ की होगी। ये बातें कहते कहते श्रीरामकृष्ण की नरेन्द्र पर दृष्टि पड़ी। श्रीरामकृष्ण खड़े होकर समाधिमग्न हो गये। नरेन्द्र के घुटने पर एक पैर बढ़ाकर उसी भाव से खड़े हैं। बाहर का कुछ भी ज्ञान नहीं है, आँखों की पलक नहीं गिर रही है।
बड़ी देर बाद समाधि भंग हुई अब भी आनन्द का नशा नहीं उतरा है। श्रीरामकृष्ण आप ही आप बातचीत कर रहे हैं। भावस्थ होकर नाम जप रहे हैं। कहते हैं –
“सच्चिदानन्द! सच्चिदानन्द! कहूँ? नहीं, आज तू कारणानन्ददायिनी है – कारणानन्दमयी। सा रे ग म प ध नि। नि में रहना अच्छा नहीं। बड़ी देर तक रहा नहीं जाता। एक स्वर नीचे रहूँगा।
“स्थूल, सूक्ष्म, कारण और महाकारण। महाकारण में जाने पर चुप है। वहाँ बातचीत नहीं हो सकती।
“ईश्वरकोटि महाकारण में पहुँचकर लौट सकते हैं। वे ऊपर चढ़ते हैं, फिर नीचे भी आ सकते हैं। अवतार आदि ईश्वरकोटि हैं। वे ऊपर भी चढ़ते हैं और नीचे भी आ सकते हैं। छत के ऊपर चढ़कर, फिर सीढ़ी से उतरकर नीचे चल-फिर सकते हैं। अनुलोम और विलोम। सात मंजला मकान है, किसी की पहुँच बाहर के फाटक तक ही होती है, और जो राजा का लड़का है, उसका तो वह अपना ही मकान है, वह सातों मंजिल पर घूम-फिर सकता है। एक एक तरह के अनार है। एक खास प्रकार हैं, जिसमें थोडी देर तो एक तरह की फुलझड़ियाँ होती हैं, फिर कुछ देर बन्द रहकर दूसरे तरह के फूल
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निकलने लगते है, फिर और किसी तरह के फूल, मानो फुलझड़ियों का छूटना बन्द ही नहीं होता।
“एक तरह के अनार और हैं। आग लगाने से थोड़ी ही देर के बाद वह भुस्स से फूट जाते हैं। उसी तरह बहुत प्रयत्न करके साधारण आदमी अगर ऊपर चला भी जाता है तो फिर वह लौटकर खबर नहीं देता। जीवकोटि के जो हैं, बहुत प्रयत्न करने पर उन्हें समाधि हो सकती है, परन्तु समाधि के बाद न वे नीचे उतर सकते हैं और न उतरकर खबर ही दे सकते हैं।
“एक हैं नित्यसिद्ध की तरह। वे जन्म से ही ईश्वर की चाह रखते हैं, संसार की कोई चीज उन्हें अच्छी नहीं लगती। वेदों में होमापक्षी की कथा है। यह चिड़िया आकाश में बहुत ऊँचे पर रहती हैं। वहीं वह अण्डे भी देती है। इतनी ऊँचाई पर रहती है कि अण्डा बहुत दिनों तक लगातार गिरता रहता है। गिरते गिरते अण्डा फूट जाता है। तब बच्चा गिरता रहता है। बहुत दिनों तक लगातार गिरता रहता है। गिरते ही गिरते उसकी आँखें भी खुल जाती हैं। जब मिट्टी के समीप पहुँच जाता हैं, तब उसे ज्ञान होता हैं। तब वह समझ लेता है कि देह में मिट्टी के छू जाने से ही जान जायगी। तब वह चीख मारकर अपनी माँ की ओर उड़ने लगता है। मिट्टी से मृत्यु होगी, इसीलिए मिट्टी देखकर भय हुआ है। अब अपनी माँ को चाहता है। माँ उस ऊँचे आकाश में है। उसी ओर बेतहाशा उड़ने लगता है, फिर दूसरी ओर दृष्टि नहीं जाती।
“अवतारों के साथ जो आते हैं, वे नित्यसिद्ध होते हैं, कोई अन्तिम जन्मवाले होते हैं।
(विजय से) “तुम लोगों को दोनों ही है, योग भी है और भोग भी। जनक राजा को योग भी था और भोग भी था। इसीलिए उन्हें लोग राजर्षि कहते हैं। राजा और ऋषि दोनों ही। नारद देवर्षि हैं, और शुकदेव ब्रह्मर्षि।
“शुकदेव ब्रह्मर्षि हैं, शुकदेव ज्ञानी नहीं, पुञ्जीकृत ज्ञान की मूर्ति हैं। ज्ञानी किसे कहते हैं? जिसे प्रयत्न करके ज्ञान हुआ हैं। शुकदेव ज्ञान की मूर्ति हैं, अर्थात् ज्ञान की जमायी हुई राशि है। यह ऐसे ही हुआ है, साधना करके नहीं।”
बातें कहते हुए श्रीरामकृष्ण की साधारण दशा हो गयी है। अब भक्तों से बातचीत कर सकेंगे।
केदार से उन्होंने संगीत गाने के लिए कहा। केदार गा रहे हैं। उन्होंने कई गाने गाये। एक का भाव नीचे दिया जाता है -
“देह में गौरांग के प्रेम की तरंगें लग रही हैं। उनकी हिलोरों में दुष्टों की दुष्टता बह जाती है। यह ब्रह्माण्ड तलातल को पहुँच जाता है। जी में आता है, डुबकर नीचे बैठा रहूँ परन्तु वहाँ भी गौरांग-प्रेम-रूपी घड़ियाल से जी नहीं बचता, वह निगल जाता है। ऐसा
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सहानुभूतिपूर्ण और कौन है, जो हाथ पकड़कर खींच ले जाय?”
गाना हो जाने पर श्रीरामकृष्ण फिर भक्तों से बातचीत कर रहे हैं। श्रीयुत केशव सेन के भतीजे नन्दलाल वहाँ मौजूद थे। वे अपने दो-एक ब्राह्मभक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण के पास ही बैठे हुए हैं।
श्रीरामकृष्ण – (विजय आदि भक्तों से) – कारण (शराब) की बोतल एक आदमी ले आया था, मैं छूने गया, पर मुझसे छुई न गयी।
विजय – अहा!
श्रीरामकृष्ण – सहजानन्द के होने पर यों ही नशा हो जाता है। शराब पीनी नहीं पड़ती। माँ का चरणामृत देखकर मुझे नशा हो जाता है, ठीक उतना जितना पाँच बोतल शराब पीने से होता है।
ज्ञानी तथा भक्त की अवस्था
“इस अवस्था में सब समय सब तरह का भोजन नहीं खाया जाता।”
नरेन्द्र – खाने-पीने के लिए जो कुछ मिला, वही बिना विचार के खाना अच्छा है।
श्रीरामकृष्ण – यह बात एक विशेष अवस्था के लिए है। ज्ञानी के लिए किसी में दोष नहीं। गीता के मत से ज्ञानी खुद नहीं खाता, वह कुण्डलिनी को आहुति देता है।
“यह बात भक्त के लिए नहीं है। मेरी इस समय की अवस्था यह है कि ब्राह्मण का लगाया भोग न हो तो मैं नहीं खा सकता। पहले ऐसी अवस्था थी कि दक्षिणेश्वर के उस-पार से मुर्दों के जलने की जो बू आती थी, उसे मैं नाक से खींच लेता था – वह बड़ी मीठी लगती थी। पर अब सब के हाथ का नहीं खा सकता।
“और सचमुच नहीं खा सकता, यद्यपि कभी कभी खा भी लेता हूँ। केशव सेन के यहाँ मुझे नववृन्दावन नाटक दिखाने ले गये थे। पूड़ियाँ और पकौड़ियाँ ले आये। न मालूम धोबी ले आया था या नाई। (सब हँसते हैं।) मैंने खूब खाया। राखाल ने कहा, जरा और खाओ।
(नरेन्द्र से) “तुम्हारे लिए इस समय यह चल सकता है। तुम इधर भी और उधर भी हो। इस समय तुम सब खा सकते हो।
(भक्तों से) “शूकर-मांस खाकर भी अगर किसी का ईश्वर की ओर झुकाव हो, तो वह धन्य है और निरामिष-भोजन करने पर भी अगर किसी का मन कामिनी और कांचन पर लगा रहे, तो उसे धिक्कार है।
“मेरी इच्छा थी कि लोहारों के यहां की दाल खाऊँ बचपन की बात है। लोहार कहते थे, ब्राह्मण क्या खाना पकाना जाने? खैर, मैंने खाया, परन्तु उसमें लोहारी बू मिल रही थी। (सब हँसते हैं।)
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“गोविन्द राय के पास मैंने अल्ला मन्त्र लिया। कोठी में प्याज डालकर भात पकाया गया। मणि मल्लिक के बगीचे में मैंने तरकारी खायी, परन्तु उससे एक तरह की घृणा हो गयी।
“मैं देश (कामारपुकुर) गया, तब रामलाल का बाप* डरा। उसने सोचा कि यह तो इधर-उधर किसी के यहाँ भी खा लेता है। कहीं ऐसा न हो कि जाति से च्युत कर दिया जाऊँ; इसीलिए मैं अधिक दिन वहाँ न रह सका, वहाँ से चला आया।
“वेदों और पुराणों में शुद्धाचार की बात लिखी है। वेदों और पुराणों में जिसके लिए कहा है कि यह न करो, इनसे अनाचार होता है, तन्त्रों में उसी को अच्छा कहा है।
“मेरी कैसी कैसी अवस्थाएँ बीत गयी हैं। मुख आकाश और पाताल तक फैलाता था और तब मैं माँ कहता था, मानो माँ को पकड़े लिये आ रहा हूँ जैसे जाल डालकर जबरदस्ती मछली पकड़कर खींचना। एक गाने में है –
“अबकी बार, ऐ काली, तुम्हे ही मैं खा जाऊँगा। तारा, गण्डयोग में मेरा जन्म हुआ है। इस योग में पैदा होने पर बच्चा अपनी माँ को खा जाता है। अबकी बार, माँ, या तो तुम्हीं मुझे खा जाओगी या मैं ही तुम्हें खाऊँगा, दो में एक तो होगा ही। मैं हाथों में, पैरों में, सर्वांग में कालिख † पोत लूँगा। जब यमराज आकर मुझे बाँधने लगेंगे तब वही कालिख उसके मुँह में लगाऊँगा। मैं यह तो कहता हूँ कि तुझे खा जाऊँगा परन्तु माँ, यह समझ ले कि खाकर भी मैं तुझे उदरस्थ न करूँगा, हृदय-पद्म में तुझे बैठा लूँगा और तब अपनी मौज से तेरी पूजा करूँगा। अगर यह कहो कि काली को खा जाओगे तो फिर काल के हाथ से कैसे बचोगे, तो कहना यह है कि मैं काली कहकर काल से पिण्ड छुड़ाऊँगा।
... ‘मैं उसे अच्छी तरह जना दूँगा कि रामप्रसाद काली का बेटा है। उससे या तो मन्त्र की सिद्धि ही होगी या मेरा यह शरीर ही न रह जायगा।’
“पागल की अवस्था हो गयी थी – यह व्याकुलता है!”
नरेन्द्र गा रहे हैं – “माँ, मुझे पागल कर दे, ज्ञान के विचार से मुझे काम नहीं।”
गाना सुनते ही श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हो गये।
समाधि के छूटने पर पार्वती की माता का भाव अपने पर आरोपित करके श्रीरामकृष्ण ‘आगमनी’ (देवी के आगमन के समय का संगीत जो बंगाल में गाया जाता है) गा रहे हैं।
गाने के बाद श्रीरामकृष्ण भक्तों से कह रहे हैं, आज महाष्टमी है न, माँ आयी हुई
* श्रीरामकृष्ण के बडे भाई रामेश्वर।
† बंगला शब्द ‘काली’ से दो अर्थ निकलते हैं – स्याही और कालिका देवी। यहाँ उसी श्लेष से मतलब हैं।
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हैं। इसीलिए इतनी उद्दिपना हो रही है।
श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं –
“सखी री! जिसके लिए मैं पागल हो गयी उसे अभी कहाँ पाया?”
श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं, एकाएक ‘हरि बोल’ ‘हरि बोल’ कहकर विजय खड़े हो गये। श्रीरामकृष्ण भी भावोन्मत्त होकर विजय आदि भक्तों के साथ नृत्य करने लगे।
(४)
किस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए
कीर्तन हो जाने पर श्रीरामकृष्ण, विजय, नरेन्द्र तथा दूसरे भक्तों ने आसन ग्रहण किया। सब की दृष्टि श्रीरामकृष्ण पर लगी हुई है। सन्ध्या होने में अभी कुछ देर है। श्रीरामकृष्ण भक्तों से बातचीत कर रहे हैं। उनसे कुशल-प्रश्न पूछ रहे हैं। केदार बड़े ही विनीत भाव से हाथ जोड़कर बहुत ही मृदु तथा मधुर शब्दों में श्रीरामकृष्ण से निवेदन कर रहे हैं। पास हैं नरेन्द्र, चुनी, सुरेन्द्र, राम, मास्टर और हरीश।
केदार – (श्रीरामकृष्ण से, विनयपूर्वक) – सिर का चक्कर खाना किस तरह अच्छा होगा?
श्रीरामकृष्ण – (सस्नेह) – ऐसा होता है; मुझे भी हुआ था। थोड़ा थोड़ा बादाम का तेल सिर में लगाकर मालिश कर लिया कीजिये। सुना है, इस तरह यह बीमारी अच्छी हो जाती है।
केदार – जो आज्ञा।
श्रीरामकृष्ण – (चुनी से) – क्यों जी, तुम सब कैसे हो?
चुनी – जी, इस समय तो सब कुशल है। वृन्दावन में बलराम बाबू और राखाल अच्छी तरह हैं।
श्रीरामकृष्ण – तुमने इतनी मिठाई क्यों भेज दी?
चुनी – जी, वृन्दावन से आ रहा हूँ।
चुनीलाल बलराम के साथ वृन्दावन गये हुए थे और कई महीने तक वहीं ठहरे थे। छुट्टी पूरी हो रही है, इसलिए अब कलकत्ता लौट आये हैं।
श्रीरामकृष्ण – (हरीश से) – तू दो-एक दिन बाद जाना। अभी बीमारी की हालत है, जाने पर वहाँ फिर बीमार पड़ जायगा।
(नारायण से, सस्नेह) “बैठ, आ मेरे पास आकर बैठ। कल जाना और वहीं खाना भी। (मास्टर की ओर इशारा करके) इनके साथ जाना। (मास्टर से) क्यों जी?”
मास्टर की इच्छा थी, वे उसी दिन श्रीरामकृष्ण के साथ दक्षिणेश्वर जायें, अतएव वे सोचने लगे। सुरेन्द्र बड़ी देर तक थे। बीच में एक बार घर गये थे। घर से लौटकर
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श्रीरामकृष्ण के पास खड़े हुए।
सुरेन्द्र कारण (शराब) पीते हैं। पहले नम्बर बहुत बढ़ा-चढ़ा था। सुरेन्द्र की हालत देखकर श्रीरामकृष्ण को चिन्ता हो गयी थी। बिलकुल ही पीना छोड़ देने के लिए नहीं कहा, उन्होंने कहा, “सुरेन्द्र, देखो, जो पीना, श्रीदेवी को निवेदित करके पीना और उतना ही जिससे न पैर लड़खड़ायें और न सिर घूमे। उनकी चिन्ता करते करते फिर तुम्हें पीना बिलकुल ही अच्छा न लगेगा। वे स्वयं कारणानन्ददायिनी हैं। उन्हें पा लेने पर सहजानन्द होता है।”
सुरेन्द्र पास खड़े हैं। श्रीरामकृष्ण ने उनकी ओर दृष्टि करके कहा, तुमने कारण पान किया है। यह कहकर ही भाव में तन्मय हो गये।
शाम हो गयी। कुछ बहिर्मुख होकर श्रीरामकृष्ण माता का नाम लेकर आनन्दपूर्वक गाने लगे। बीच बीच में तालियाँ बजा रहे हैं। स्वर करके कह रहे हैं – “हरि बोल, हरि बोल, हरिमय हरि बोल, हरि हरि हरि बोल।”
फिर कहने लगे – “राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम।”
श्रीरामकृष्ण अब प्रार्थना कर रहे हैं – “ऐ राम! हे राम! मैं भजन हीन हूँ, साधन हीन हूँ, ज्ञान हीन हूँ, भक्ति हीन हूँ, क्रिया हीन हूँ, राम! शरणागत हूँ। मैं देह-सुख नहीं चाहता। अष्ट-सिद्धि तो क्या, शत सिद्धियाँ भी नहीं चाहता। मैं शरणागत हूँ, शरणागत। बस वही करो, जिससे तुम्हारे पादपद्मों में शुद्धा भक्ति हो, और तुम्हारी भुवनमोहिनी माया से मैं मुग्ध न होऊँ। राम! मैं शरणागत हूँ।”
श्रीरामकृष्ण प्रार्थना कर रहे हैं और सब लोग टकटकी लगाये देख रहे हैं। उनका करुणामय स्वर सुनकर भक्त आँसू रोक नहीं सकते। श्रीयुत राम पास आकर खड़े हुए हैं।
श्रीरामकृष्ण – (राम के प्रति) – राम, तुम कहाँ थे?
राम – जी ऊपर था।
श्रीरामकृष्ण तथा भक्तों की सेवा के लिए राम ऊपर प्रबन्ध करने के लिए गये थे।
श्रीरामकृष्ण – (राम से, सहास्य) – ऊपर रहने की अपेक्षा क्या नीचे रहना अच्छा नहीं? नीची जमीन में ही पानी ठहरता है। ऊँची जमीन से पानी बह जाता है।
राम – (हँसते हुए) – जी हाँ।
छत पर पत्तलें पड़ चुकी हैं। श्रीरामकृष्ण और भक्तों को लेकर राम ऊपर गये और उन्हें आनन्द से भोजन कराया। उत्सव हो जाने पर, श्रीरामकृष्ण निरंजन, मास्टर आदि भक्तों को साथ लेकर अधर के यहाँ गये। वहाँ माँ आयी हुई हैं। आज महाष्टमी है। अधर की विशेष प्रार्थना है, श्रीरामकृष्ण उपस्थित रहें, जिससे उनकी पूजा सार्थक हो जाये।
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मातृभाव से साधना
(१)
ईश्वर-कोटि का विश्वास स्वयंसिद्ध
आज नवमी पूजा है, २९ सितम्बर, १८८४। अभी सबेरा हुआ ही है। काली की मंगलारती हो गयी है। नौबतखाने से रोशनचौकी में प्रभाती मधुर रागिनी बज रही है। ब्राह्मण देव हाथ में फूलदानी लेकर पूजार्थ फूल तोड़ने आ रहे हैं। उधर माली भी देवमन्दिरों में फूल चढ़ाने के उद्देश्य से पुष्पचयन करने निकले हैं। माता की पूजा होगी। श्रीरामकृष्ण उषा की ललाई छा जाने से पहले ही उठे हैं। भवनाथ, निरंजन और मास्टर गत रात्रि से ही यहाँ पर हैं। वे श्रीरामकृष्ण के कमरेवाले बरामदे में रात भर सोये थे। आँख खोलकर देखा, श्रीरामकृष्ण मतवाले होकर नृत्य कर रहे हैं और 'जय दुर्गा, जय दुर्गा' कह रहे हैं।
जैसे एक बालक, जिसके कमर में धोती भी नहीं रहती, माता का नाम लेते हुए कमरे भर में नाच रहे हैं।
कुछ देर बाद फिर कह रहे हैं - 'संहजानन्द - सहजानन्द।' इसके अनन्तर बार बार गोविन्द का नाम लेने लगे। कह रहे हैं - 'प्राण हे गोविन्द! मेरे जीवन हो।'
भक्तगण उठकर बैठ गये। एकदृष्टि से श्रीरामकृष्ण का भाव देख रहे हैं। हाजरा भी कालीमन्दिर में हैं। श्रीरामकृष्ण के कमरे के दक्षिण पूर्ववाले बरामदे में उनका आसन है। लाटू भी हैं और श्रीरामकृष्ण की सेवा किया करते हैं। राखाल इस समय वृन्दावन में हैं। नरेन्द्र कभी कभी दर्शन करने के लिए आते हैं। आज आयेंगे।
श्रीरामकृष्ण के कमरे के उत्तर-पूर्ववाले छोटे बरामदे में भक्तगण सोये हुए हैं। जाड़े का समय है, इसलिए टट्टी बँधी है। सब के हाथमुँह धो चुकने के बाद, इस उत्तरवाले बरामदे में श्रीरामकृष्ण एक चटाई पर आकर बैठे। दूसरे भक्त भी यहाँ कभी कभी आकर बैठते हैं।
श्रीरामकृष्ण - (भवनाथ से) - बात यह है कि जो जीवकोटि के हैं उन्हें सहज ही विश्वास नहीं होता। ईश्वर-कोटि के जो हैं उनका विश्वास स्वतः सिद्ध है। प्रह्लाद 'क' लिखते
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