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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

तव कथामृतं तप्तजीवनं
कविभिरीडितं कल्मषापहम्।
श्रवणमंगलं श्रीमदाततं
भुवि गृणन्ति ये भूरिदा जनाः॥

– प्रभो, तुम्हारी लीलाकथा अमृतस्वरूप है। तापतप्त जीवों के लिए तो वह जीवनस्वरूप है। ज्ञानी महात्माओं ने उसका गुणगान किया है। वह पापपुंज को हरनेवाली है। उसके श्रवणमात्र से परम कल्याण होता है। वह परम मधुर तथा सुविस्तृत है। जो तुम्हारी इस प्रकार की लीलाकथा का गान करते हैं, वास्तव में इस भूतल में वे ही सर्वश्रेष्ठ दाता हैं।

(श्रीमद्भागवत, १०।३१।९)

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भगवान् श्रीरामकृष्णदेव की

संक्षिप्त जीवनी

हम यह देखते हैं कि श्रीरामचन्द्र तथा भगवान् बुद्ध को छोड़कर बहुधा अन्य सभी अवतारी महापुरुषों का जन्म संकटग्रस्त परिस्थितियों में ही हुआ है, और यह कहा जा सकता है कि भगवान् श्रीरामकृष्ण भी किसी विशेष प्रकार के सुखद वातावरण में इस संसार में अवतरित नहीं हुए।

श्रीरामकृष्ण का जन्म हुगली प्रान्त के कामारपुकुर गाँव में एक श्रेष्ठ ब्राह्मण परिवार में शकाब्द १७५७ फाल्गुन मास की शुक्लपक्ष द्वितीया तदनुसार बुधवार ता. १७ फरवरी १८३६ ई. को हुआ। कामारपुकुर गाँव बर्दवान से लगभग चौबीस-पचीस मील दक्षिण तथा जहानाबाद (आरामबाग) से लगभग आठ मील पश्चिम में है।

श्रीरामकृष्ण के पिता श्री क्षुदिराम चट्टोपाध्याय परम सन्तोषी, सत्यनिष्ठ एवं त्यागी पुरुष थे, और उनकी माता श्री चन्द्रमणि देवी सरलता तथा दयालुता की मूर्ति थीं। यह आदर्श दम्पति पहले देरे नामक गाँव में रहते थे, परन्तु वहाँ के अन्यायी जमींदार की कुछ जबरदस्तियों के कारण इन्हें वह गाँव छोड़कर करीब तीन मील की दूरी पर इसी कामारपुकुर गाँव में आ बसना पड़ा।

बचपन में श्रीरामकृष्ण का नाम गदाधर था। अन्य बालकों की भाँति वे भी पाठशाला भेजे गये, परन्तु एक ईश्वरी अवतार एवं संसार के पथ-प्रदर्शक को उस 'अ, आ, इ, ई' की पाठशाला में चैन कहाँ? बस, जी उचटने लगा, और मन लगा घर में स्थापित आनन्दकन्द सच्चिदानन्द भगवान् श्रीरामजी की मूर्ति में – स्वयं वे फूल तोड़ लाते और इच्छानुसार मनमानी उनकी पूजा करते।

कहते हैं कि अवतारी पुरुषों में कितने ही ऐसे गुण छिपे रहते हैं कि उनका अनुमान करना कठिन होता है। श्री गदाधर की स्मरणशक्ति विशेष तीव्र थी। साथ ही उन्हें गाने की भी रुचि थी और विशेषतः भक्तिपूर्ण गानों के प्रति।

साधु-संन्यासियो के जत्थों के दर्शन तो मानो इनकी जीवनी में संजीवनी का कार्य करते थे। अपने घर के पास लाहा की अतिथिशाला में जहाँ बहुधा संन्यासी उतरा करते थे, इनका काफी समय जाता था। मुहल्ले के बालक, वृद्ध, सभी ने न जाने इनमें कौनसा दैवी गुण परखा था कि वे सब इनसे बड़े प्रसन्न रहते थे। रामायण, महाभारत, गीता आदि के श्लोक ये केवल बड़ी भक्ति से सुनते ही नहीं थे, वरन् उनमें से बहुतसे उन्हें सहजरूप

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कण्ठस्थ भी हो जाया करते थे।

यह दैवी बालक अपनी करतूतें शुरू से ही दिखाते रहा और कह नहीं सकते कि उसके बचपन से ही कितनों ने उसे ताड़ा होगा।

छिपे हुए दैवी गुणों का विकास पहले-पहल उस बार हुआ जब यह बालक अपने गाँव के समीपवर्ती आनुड़ गाँव को जा रहा था। एकाएक इस बालक को एक विचित्र प्रकार की ज्योति का दर्शन हुआ और वह बाह्यज्ञानशून्य हो गया। कहना न होगा कि मायाग्रस्त सांसारिकों ने जाना कि गर्मी के कारण वह मूर्च्छा थी, परन्तु वास्तव में वह थी भावसमाधि।

अपने पिता की मृत्यु के बाद श्रीरामकृष्ण अपने ज्येष्ठ भ्राता के साथ, जो एक बड़े विद्वान् पुरुष थे, कलकत्ता आये। उस समय वे लगभग १७-१८ वर्ष के थे। कलकत्ते में उन्होंने एक दो स्थानों पर पूजन का कार्य किया। इसी अवसर पर रानी रासमणि ने कलकत्ते से लगभग पाँच मील पर दक्षिणेश्वर में एक मन्दिर बनवाया और श्रीकालीदेवी की स्थापना की। ता. ३१ मई १८५५ को इसी मन्दिर में श्रीरामकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता श्री रामकुमारजी कालीमन्दिर के पुजारीपद पर नियुक्त हुए, परन्तु यह कार्यभार शीघ्र ही श्रीरामकृष्ण पर आ पड़ा। श्रीरामकृष्ण उक्त मन्दिर में पूजा करते थे, परन्तु अन्य साधारण पुजारियों की भाँति वे कोरी पूजा नहीं करते थे, परन्तु पूजा करते समय ऐसे मग्न हो जाते थे कि उस प्रकार की अलौकिक मग्नता ‘देखा सुना कबहुँ नहीं कोई’ – और यह अक्षरशः सत्य भी क्यों न हो? ईश्वर ही ईश्वर की पूजा कर रहे थे! उस भाव का वर्णन कौन कर सकता है जिससे श्रीरामकृष्ण प्रेरित हो, ध्यानावस्थित हो श्रीकालीदेवी पर फूल चढ़ाते थे! आँखॊ में अश्रुधारा बह रही है, तन-मन की सुध नहीं, हाथ काँप रहे हैं , हृदय उल्लास से भरा है, मुख से शब्द नहीं निकलते हैं, पैर भूमि पर स्थिर नहीं रहते है और घण्टी, आरती आदि तो सब किनारे ही पड़ी रही – श्रीकालीजी पर पुष्प चढ़ा रहे हैं और थोड़ी ही देर में उन्हें ही उन्हें देखते हैं – स्वयं में भी उन्हीं को देख रहे हैं और कम्पित कर से अपने ही ऊपर फूल चढ़ाने लगते हैं, कहते हैं – माँ-माँ-तुम-मैं-मैं-तुम और ध्यानमग्न हो समाधिस्थ हो जाते हैं। देखनेवाले समझते हैं कुछ का कुछ, परन्तु ईश्वर मुसकराते हैं, बड़े ध्यान से सब देखते हैं और विचारते होंगे कि यह रामकृष्ण हूँ तो मैं ही!

उनके हृदय की व्याकुलता की पराकाष्ठा उस दिन हो गयी जब व्यथित होकर माँ के दर्शन के लिए एक दिन मन्दिर में लटकती हुई तलवार उन्होंने उठा ली और ज्यो ही उससे वे अपना शरीरान्त करना चाहते थे कि उन्हें जगन्माता का अपूर्व अद्भुत दर्शन हुआ और देहभाव भूलकर वे बेसुध हो जमीन पर गिर पड़े। तदुपरान्त बाहर क्या हुआ और वह दिन तथा उसके बाद का दिन कैसे व्यतीत हुआ, यह उन्हें कुछ भी नहीं मालूम पड़ा। अन्तःकरण में केवल एक प्रकार के अननुभूत आनन्द का प्रवाह बहने लगा।

बेचारा मायाग्रस्त पुरुष यह सब कैसे समझ सकता है? उसके लिए तो दिव्य चक्षु की आवश्यकता होती है। बस श्रीरामकृष्ण के घर के लोग समझ गये कि इनके मस्तिष्क

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में कुछ फेरफार हो गया है और विचार करने लगे उसके उपचार का। किसी ने सलाह दी कि इनका विवाह कर दिया जाय तो शायद मानसिक विकार (?) दूर हो जाय। विवाह का प्रबन्ध होने लगा और कामारपुकुर से दो कोस पर जयरामवाटी ग्राम में रहनेवाले श्री रामचन्द्र मुखोपाध्याय की कन्या श्रीसारदामणि से इनका विवाह करा दिया गया।

परन्तु इस बालिका के दक्षिणेश्वर में आने पर भी श्रीरामकृष्ण के जीवन में कोई अन्तर नहीं हुआ और श्रीरामकृष्ण ने उस बालिका में प्रत्यक्ष देखा उन्हीं श्रीकालीदेवी को। एक सांसारिक बन्धन सम्मुख आया और वह था पति का कर्तव्य। बालिका को बुलाकर शान्ति से पूछा, “क्या तुम मुझे सांसारिक जीवन की ओर खींचना चाहती हो?” परन्तु उस बालिका ने तुरन्त उत्तर दिया, “मेरी यह बिलकुल इच्छा नहीं कि आप सांसारिक जीवन व्यतीत करें, पर हाँ, आपसे मेरी यह प्रार्थना अवश्य है कि आप मुझे अपने ही पास रहने दें, अपनी सेवा करने दें तथा योग्य मार्ग बतलावें।”

कहा जा सकता है कि उस बालिका ने एक आदर्श अर्द्धांगिनी का धर्म पूर्ण रूप से निबाहा। अपने सर्वस्व पति को ईश्वर मानकर उनके सुख में अपना सुख देखा और उनके आदर्श जीवन की साथिन बनकर उनकी सहायता करने लगी। श्रीरामकृष्ण को तो श्रीसारदादेवी और श्रीकालीदेवी एक ही प्रतीत होने लगीं और इस भाव की चरम सीमा उस दिन हुई जब उन्होंने श्रीसारदादेवी का साक्षात् श्रीजगदम्बाज्ञान से षोड़शोपचार पूजन किया। पूजाविधि पूर्ण होते ही श्रीसारदादेवी को समाधि लग गयी। अर्ध-बाह्यदशा में मन्त्रोच्चार करते-करते श्रीरामकृष्ण भी समाधिमग्न हो गये। देवी और उसके पुजारी दोनों ही एकरूप हो गये। कैसा उच्च भाव है – अनेकता में एकता झलकने लगी!

हीरे का परखनेवाला जौहरी निकल ही आता है। रानी रासमणि के जामाता श्री मथुरबाबू ने यह भाव कुछ ताड़ लिया और श्रीरामकृष्ण को परखकर शीघ्र ही उन्होंने उनकी सेवाशुश्रूषा का उचित प्रबन्ध कर दिया। इतना ही नहीं, बल्कि पुजारीपद पर एक दूसरे ब्राह्मण को नियुक्त कर उन्हें अपने भाव में मग्न रहने का पूरा-पूरा अवकाश दे दिया। साथ ही श्रीरामकृष्ण के भानजे श्री हृदयराम को उनकी सेवा आदि का कार्य सौंप दिया।

फिर श्रीरामकृष्ण ने विशेष पूजा नहीं की। दिनरात ‘माँ काली’ ‘माँ काली’ ही पुकारा करते थे; कभी जड़वत् हो मूर्ति की ओर देखते, कभी हँसते, कभी बालकों की तरह फूट-फूटकर रोते और कभी कभी तो इतने व्याकुल हो जाते कि भूमि पर लोटते-पोटते अपना मुँह तक रगड़ डालते थे।

इसके बाद श्रीरामकृष्ण ने भिन्न भिन्न साधनाएँ कीं और कई प्रकार के दर्शन प्राप्त कर लिये। कालीमन्दिर में एक बड़े वेदान्ती श्री तोतापुरीजी पधारे थे। वे वहाँ लगभग ग्यारह महीने रहे और उन्होंने श्रीरामकृष्ण से वेदान्त-साधना करायी। श्री तोतापुरीजी को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जिस निर्विकल्प समाधि को प्राप्त करने के लिए उन्हें चालीस वर्ष तक सतत प्रयत्न करना पड़ा था, उसे श्रीरामकृष्ण ने तीन ही दिन में सिद्ध कर डाला। इसके

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कुछ समय पूर्व ही वहाँ एक भैरवी ब्राह्मणी पधारी थीं। उन्होंने भी श्रीरामकृष्ण से अनेक प्रकार की तन्त्रोक्त साधनाएँ करायी थीं।

श्री वैष्णवचरण जो एक वैष्णव पण्डित थे, श्रीरामकृष्ण के पास बहुधा आया करते थे। वैष्णवचरण ने मथुरबाबू से कहा था यह उन्माद साधारण नहीं वरन् दैवी है। एक बार श्रीरामकृष्ण कलूटोला की हरिसभा में गये थे। वहाँ वे समाधिस्थ हो गये और चैतन्यदेव के आसन पर जा विराजे। श्रीचैतन्य की भाँति श्रीरामकृष्ण की कभी 'अन्तर्दशा', कभी 'अर्धबाह्य' और कभी 'बाह्य दशा' हो जाया करती थी। वे कहते थे कि अखण्ड सच्चिदानन्द परब्रह्म और माँ सब एक ही हैं।

उन्होंने कामिनी-कांचन का पूर्ण रूप से त्याग किया था। अपने भक्तगणों को, जो सैकड़ों की संख्या में उनके पास आते थे, वे कहा करते थे कि ये दोनों चीजें ईश्वरप्राप्ति के मार्ग में विशेष रूप से बाधक हैं। बुरे आचरणवाली नारी में भी वे जगन्माता का साक्षात् स्वरूप देखते थे और उसी भाव से आदर करते थे। उनका कांचनत्याग इतना पूर्ण था कि यदि वे पैसे या रुपये को छू लेते तो उनकी उँगलिया ही टेढ़ीमेढ़ी होने लगती थीं। कभी कभी वे गिन्नियों और मिट्टी को एक साथ अंजुली में लेकर गंगाजी के किनारे बैठ जाते थे और 'मिट्टी पैसा, पैसा मिट्टी' कहते हुए दोनों चीजों को मलते मलते श्रीगंगाजी की धार में बहा देते थे।

माता चन्द्रमणि को श्रीरामकृष्ण जगज्जननी का स्वरूप मानते थे। अपने ज्येष्ठ भ्राता श्री रामकुमार के स्वर्गलाभ के बाद श्रीरामकृष्ण उन्हें अपने ही पास रखते थे और उनकी पूजा करते थे।

मथुरबाबू तथा उनकी पत्नी जगदम्बा दासी के साथ वे एक बार वाराणसी, प्रयाग तथा वृन्दावन भी गये थे। उस समय हृदयराम भी साथ में थे। वाराणसी में उन्होंने मणिकर्णिका में समाधिस्थ होकर भगवान् शंकर के दर्शन किये और मौनव्रतधारी त्रैलंग स्वामी से भेंट की। मथुरा में तो उन्होंने साक्षात् भगवान् आनन्दकन्द, सच्चिदानन्द, अन्तर्यामी श्रीकृष्ण के दर्शन किये। कैसी उच्च भावदशा रही होगी!

'सेस, महेस, गनेस, दिनेस, सुरेशहुँ जाहि निरन्तर गावें, जाहि अनादि, अनन्त, अखण्ड, अछेद, अभेद सुवेद बतावें।'

(— श्रीरसखानि)

उन्हीं भगवान् श्रीकृष्ण को उन्होंने यमुना पार करते हुए गौओ को गोधूलि समय वापस लाते देखा और ध्रुवघाट पर से वसुदेव की गोद में भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन किये।

श्रीरामकृष्ण तो कभी कभी समाधिस्थ हो कहते थे, 'जो राम थे और जो कृष्ण थे वही अब रामकृष्ण होकर आये हैं।'

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सन् १८७९-८० में श्रीरामकृष्ण के अन्तरंग भक्त उनके पास आने लगे थे। उस समय उनकी उन्माद-अवस्था प्रायः चली-सी गयी थी और अब शान्त, सदानन्द और समाधि की अवस्था थी। बहुधा वे समाधिस्थ रहते थे और समाधि भंग होने पर भावराज्य में विचरण किया करते थे।

शिष्यों में उनके मुख्य शिष्य नरेन्द्र (बाद में स्वामी विवेकानन्द) थे। जब से श्री नरेन्द्र उनके पास आने लगे थे तभी से उन्हें नरेन्द्र के प्रति एक विशेष प्रेम हो गया था और वे कहते थे कि नरेन्द्र साधारण जीव नहीं है। कभी कभी तो नरेन्द्र के न आने से उन्हें व्याकुलता होती थी; क्योंकि वे यह अवश्य जानते रहे होंगे कि उनका कार्य भविष्य में मुख्यतः नरेन्द्र द्वारा ही संचालित होगा। अन्य भक्तगण राखाल, भवनाथ, बलराम, मास्टर महाशय आदि थे। ये भक्तगण १८८२ के लगभग आये और इसके उपरान्त दो-तीन वर्ष तक अनेक अन्य भक्त भी आये। इन सब भक्तों ने श्रीरामकृष्ण तथा उनके कार्य के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया।

ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, डॉ. महेन्द्रलाल सरकार, बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय, अमेरिका के कुक साहब, पं. पद्मलोचन तथा आर्यसमाज के प्रवर्तक श्री स्वामी दयानन्द सरस्वतीजी ने भी उनके दर्शन किये थे।

ब्राह्मसमाज के अनेक लोग उनके पास आया जाया करते थे। श्रीरामकृष्ण केशवचन्द्र सेन के ब्राह्ममन्दिर में भी गये थे।

श्रीरामकृष्ण ने अन्य धर्मों की भी साधनाएँ कीं। उन्होंने कुछ दिनों तक इस्लाम धर्म का पालन किया और 'अल्लाह' मन्त्र का जप करते करते उन्होंने उस धर्म का अन्तिम ध्येय प्राप्त कर लिया। इसी प्रकार उसके उपरान्त उन्होंने ईसाई धर्म की साधना की और ईसामसीह के दर्शन किये। जिन दिनों वे जिस धर्म की साधना में लगे रहते थे, उन दिनों उसी धर्म के अनुसार रहते, खाते, पीते, बैठते-उठते तथा बातचीत करते थे। इन सब साधनाओ से उन्होंने यह दिखा दिया कि सब धर्म अन्त में एक ही ध्येय में पहुँचते हैं। और उनमें आपस में विरोध-भाव रखना मूर्खता है। ऐसा महान् कार्य करनेवाले ईश्वरी अवतार श्रीरामकृष्ण ही थे।

इस प्रकार ईश्वरप्राप्ति के लिए कामिनी-कांचन का सर्वथा त्याग तथा भिन्न भिन्न धर्मों में एकता की दृष्टि रखना इन्होंने अपने सभी भक्तों को सिखाया और उनसे उनका अभ्यास कराया। इनके कतिपय शिष्य आगे चलकर भारतवर्ष के अतिरिक्त अमेरिका आदि अन्य देशों में भी गये और वहाँ उन्होंने श्रीरामकृष्ण के उपदेशों का प्रचार किया।

१५ अगस्त सन् १८८६ की रात को गले के रोग से पीड़ित हो श्रीरामकृष्ण ने महासमाधि ले ली; परन्तु महासमाधि में गया केवल उनका पांचभौतिक शरीर। उनके उपदेश आज संसार भर में श्रीरामकृष्ण मिशन के द्वारा कोने कोने में गूँज रहे हैं और उनसे असंख्य जनों का कल्याण हो रहा है।

विद्याभास्कर शुक्ल

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अनुक्रमणिका

प्रस्तावना ... (३)
वक्तव्य ... (४)
श्रीमाताजी का आशीर्वाद ... (६)
भगवान् श्रीरामकृष्णदेव की संक्षिप्त जीवनी ... (७)
१. प्रथम दर्शन ... १
२. द्वितीय दर्शन ... ४
३. तृतीय दर्शन ... ११
४. चतुर्थ दर्शन ... १९
५. बलराम के मकान पर श्रीरामकृष्ण तथा प्रेमानन्द में नृत्य २३
६. श्यामपुकुर में प्राणकृष्ण के मकान पर श्रीरामकृष्ण ... २६
७. श्रीरामकृष्ण तथा ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ... ३६
८. दक्षिणेश्वर में केदार द्वारा आयोजित उत्सव ... ५२
९. दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ ... ५४
१०. दक्षिणेश्वर में अन्तरंग भक्तों के साथ ... ६१
११. दक्षिणेश्वर में भक्तों से वार्तालाप ... ७२
१२. दक्षिणेश्वर मन्दिर में बलराम आदि के साथ - ... ७७
१३. केशवचन्द्र सेन के साथ श्रीरामकृष्ण का नौका विहार, आनन्द और वार्तालाप ... ७९
१४. सींती का ब्राह्मसमाज - शिवनाथ आदि ब्राह्मभक्तों के साथ वार्तालाप और आनन्द ... ९६
१५. सर्कस में श्रीरामकृष्ण - ... १०९
१६. षड्भुजदर्शन! राजमोहन के मकान पर शुभागमन - नरेन्द्र ... ११२
१७. मनोमोहन तथा सुरेन्द्र के मकान पर श्रीरामकृष्ण ... ११३
१८. मणि मल्लिक के ब्राह्मोत्सव में श्रीरामकृष्ण ... ११५
१९. विजयकृष्ण गोस्वामी आदि के प्रति उपदेश ... ११७
२०. भक्तों के प्रति उपदेश ... १३२
२१. मारवाड़ी भक्तों के साथ ... १३५
२२. राखाल, प्राणकृष्ण, केदार आदि भक्तों के साथ ... १३७
२३. बेलघर में गोविन्द मुखोपाध्याय के मकान पर ... १४७
२४. दक्षिणेश्वर में राखाल, राम आदि के साथ ... १४९
२५. दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ ... १५२

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२६. दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण का जन्मोत्सव ... १५५ २७. ब्राह्मभक्तों के प्रति उपदेश ... १६७ २८. नरेन्द्र आदि भक्तों के साथ बलराम के मकान पर ... १७१ २९. दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ ... १७४ ३०. सुरेन्द्र के मकान पर अन्नपूर्णा पूजा के उत्सव में ... १८६ ३१. सींती के ब्राह्मसमाज में ब्राह्मभक्तों के साथ ... १९१ ३२. नन्दनबागान के ब्राह्मसमाज में भक्तों के साथ ... १९७ ३३. भक्तों के साथ कीर्तनानन्द में ... २०१ ३४. दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ ... २०३ ३५. भक्तों के मकान पर ... २०६ ३६. दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ ... २१३ ३७. श्रीरामकृष्ण का प्रथम प्रेमोन्माद ... २२१ ३८. दक्षिणेश्वर मन्दिर में ... २२६ ३९. मणिरामपुर तथा बेलघर के भक्तों के साथ ... २२८ ४०. दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ ... २३७ ४१. दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ ... २४३ ४२. पानीहाटी महोत्सव में ... २४७ ४३. बलराम के मकान पर ... २५२ ४४. दक्षिणेश्वर में ... २५४ ४५. अधर के मकान पर ... २५७ ४६. भक्तों के साथ ... २५८ ४७. ब्रह्मतत्त्व तथा आद्याशक्ति ... २६८ ४८. बलराम के मकान पर ... २७७ ४९. दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ ... २७९ ५०. दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ ... २८७ ५१. गुरुशिष्य-संवाद - गुह्य कथा ... २९१ ५२. दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ ... २९४ ५३. अधर के मकान पर ईशान आदि भक्तों के संग में ... ३०२ ५४. दक्षिणेश्वर में राम आदि भक्तों के साथ ... ३१० ५५. मास्टर के प्रति उपदेश ... ३१४ ५६. अधर के मकान पर दुर्गापूजा-महोत्सव में ... ३२२ ५७. दक्षिणेश्वर में कार्तिकी पूर्णिमा ... ३२८ ५८. सिंदुरियापाटी में ब्राह्मभक्तों के प्रति उपदेश ... ३३५ ५९. केशव सेन के मकान पर ... ३४३ ६०. दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ ... ३६० ६१. दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ ... ३६७ ६२. दक्षिणेश्वर में अंतरंग भक्तों के साथ ... ३७५

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६३. ईश्वरदर्शन के उपाय ... ३७७ ६४. जीवनोद्देश्य – ईश्वरदर्शन ... ३८३ ६५. भक्तों के साथ ... ३८६ ६६. बिल्ववृक्ष और पंचवटी के नीचे ... ३८९ ६७. दक्षिणेश्वर में बलराम के पिता आदि के साथ ... ३९४ ६८. दक्षिणेश्वर में गुरुरूपी श्रीरामकृष्ण ... ३९८ ६९. जगद्गुरु श्रीरामकृष्ण ... ४०१ ७०. रामचन्द्र दत्त के बगीचे में ... ४०९ ७१. ईशान मुखोपाध्याय के मकान पर ... ४११ ७२. दक्षिणेश्वर में राखाल, राम, केदार प्रभृति के साथ ... ४१९ ७३. ईश्वर-दर्शन के उपाय ... ४२३ ७४. मणि के प्रति उपदेश ... ४२९ ७५. ईश्वर-दर्शन के लिए व्याकुलता ... ४३५ ७६. ईश्वर ही एक मात्र सत्य है। ... ४४५ ७७. गृहस्थ तथा संन्यासियों के नियम ... ४५० ७८. ईश्वरलाभ ही जीवन का उद्देश्य है ... ४६५ ७९. अवतारवाद ... ४७६ ८०. आत्मदर्शन के उपाय ... ४९१ ८१. संसार में किस प्रकार रहना चाहिए ... ५०४ ८२. सुरेन्द्र के घर में महोत्सव ... ५१२ ८३. निष्काम भक्ति ... ५२६ ८४. कलि में भक्तियोग ... ५३१ ८५. पण्डित शशधर को उपदेश ... ५४५ ८६. साधना की आवश्यकता ... ५६३ ८७. श्रीरामकृष्ण तथा समन्वय ... ५७४ ८८. कीर्तनानन्द में श्रीरामकृष्ण ... ५८५ ८९. प्रवृत्ति या निवृत्ति? ... ५९० ९०. साधना तथा साधुसंग ... ६०३ ९१. अभ्यासयोग ... ६१४ ९२. चैतन्यलीला-दर्शन ... ६३२ ९३. प्रार्थना-रहस्य ... ६४५ ९४. मातृभाव से साधना ... ६५६ ९५. भक्तों के साथ कीर्तनानन्द ... ६६६.


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भगवान श्रीरामकृष्ण

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परिच्छेद १

श्रीरामकृष्णवचनामृत

(प्रथम भाग)

परिच्छेद १

प्रथम दर्शन

तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम्।
श्रवणमंगलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ये भूरिदा जनाः।।
(श्रीमद्भागवत, १०।३१।९)

श्रीगंगाजी के पूर्वतट पर कलकत्ते से कोई छः मील दूर दक्षिणेश्वर में श्रीकालीजी का मन्दिर है। यहीं भगवान् श्रीरामकृष्णदेव रहते हैं। वसन्त ऋतु है। १८८२ ईसवीं का फरवरी माह। श्रीरामकृष्ण के जन्मोत्सव के बाद कुछ दिन बीत चुके हैं। श्री केशवचन्द्र सेन और ज़ोसेफ कुक के साथ २३ फरवरी, बृहस्पतिवार के दिन श्रीरामकृष्ण जहाज में बैठकर घूमने गए थे। इसके कुछ ही दिन बाद (२६ फरवरी) की घटना है।

सन्ध्या का समय था। मास्टर ने श्रीरामकृष्ण के कमरे में प्रवेश किया। इसी समय उन्होंने श्रीरामकृष्णदेव के प्रथम बार दर्शन किए। उन्होंने देखा, कमरा लोगों से भरा हुआ है; सब लोग चुपचाप बैठे उनके वचनामृत का पान कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण तखत पर पूर्व की ओर मुँह किये बैठे हुए प्रसन्नवदन हो ईश्वरीय चर्चा कर रहे हैं। भक्तगण फर्श पर बैठे हुए हैं।

कर्मत्याग कब होता है?

मास्टर खड़े खड़े आश्चर्यमुग्ध होकर देखने लगे। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ, मानो साक्षात् शुकदेव भगवत्-प्रसंग कर रहे हैं तथा उस स्थान पर सभी तीर्थों का समागम हुआ है अथवा मानो श्रीचैतन्यदेव पुरीधाम में रामानन्द, स्वरूप आदि भक्तों के साथ बैठकर भगवान् का नामगुणगान कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण कह रहे थे – "जब एक बार हरिनाम या रामनाम लेते ही रोमांच होता है, आँसुओ की धारा बहने लगती है, तब निश्चित समझो

२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २६ फरवरी, १८८२

कि सन्ध्यादि कर्मों की आवश्यकता नहीं रह जाती। तब कर्मत्याग का अधिकार पैदा हो जाता है – कर्म आप ही आप छूट जाते हैं। उस अवस्था में केवल रामनाम, हरिनाम, या केवल ओंकार का जप करना ही पर्याप्त है।” आपने फिर कहा – “सन्ध्यावन्दन का लय गायत्री में होता है और गायत्री का ओंकार में।”

मास्टर सिधू* के साथ वराहनगर से निकलकर एक बाग से दूसरे बाग में घूमते हुए यहाँ आ पहुँचे थे। रविवार का दिन था – छुट्टी थी, इसलिए घूमने निकले थे। थोड़ी देर पहले श्री प्रसन्न बनर्जी के बाग में घूम रहे थे। उस समय सिधू ने कहा, “गंगाजी के किनारे एक सुन्दर बगीचा है, देखने चलिएगा? वहाँ एक परमहंस रहा करते हैं।”

बगीचे के सामनेवाले फाटक से प्रवेश कर मास्टर और सिधू सीधे श्रीरामकृष्णदेव के कमरे में आए। मास्टर विस्मित होकर देखते हुए सोचने लगे – 'वाह, कैसा सुन्दर स्थान है! कितने अच्छे महात्मा हैं! कैसी सुन्दर वाणी है! यहाँ से हिलने तक की इच्छा नहीं होती।' थोड़ी देर बाद उन्होंने मन में विचार किया, 'एक बार देख आऊँ, कहाँ आया हूँ। फिर यहाँ आकर बैठूँगा।'

मास्टर सिधू के साथ कमरे के बाहर निकले। ठीक उसी समय आरती की मधुर ध्वनि आरम्भ हुई। एक साथ घण्टे, घड़ियाल, झाँझ, मृदंग आदि बज उठे। उद्यान की दक्षिण सीमा से नौबत की मधुर ध्वनि गूँज उठी। वह ध्वनि मानो भागीरथी के वक्ष पर से संचार करती हुई कहीं दूर जाकर विलीन होने लगी। वसन्तसमीर पुष्पों की सुगन्ध लिए मन्द मन्द बह रहा था। चारों ओर ज्योत्स्ना छा गयी। प्रकृति में सर्वत्र मानो देवताओं की आरती का आयोजन हो रहा था। बारह शिवमन्दिर, श्रीराधाकान्त-मन्दिर और श्रीभवतारिणी के मन्दिर में आरती देखकर मास्टर को अत्यन्त प्रसन्नता हुई। सिधू ने बताया, “यह रासमणि का देवस्थान है। यहाँ देवताओं की नित्य सेवापूजा होती है। रोज कई लोग आते हैं, कई साधु-सन्त, ब्राह्मण, भिखारी यहाँ प्रसाद पाते हैं।”

भवतारिणी के मन्दिर से निकलकर दोनों बातचीत करते करते पक्के विस्तीर्ण आँगन पर से चलते हुए पुनः श्रीरामकृष्ण के कमरे के सामने आ पहुँचे। उन्होंने देखा, कमरे का दरवाजा अब भिड़ा लिया गया है।

कमरे के भीतर अभी धूप दिखाया गया है। मास्टर अंग्रेजी पढ़े-लिखे आदमी हैं। सहसा घर में घुस न सकते थे। द्वार पर वृन्दा (कहारिन) खड़ी थी। मास्टर ने पूछा, “साधु महाराज क्या इस समय कमरे के भीतर हैं?” उसने कहा, “हाँ, वे भीतर हैं।”

मास्टर – ये यहाँ कब से हैं?

वृन्दा – ये? बहुत दिनों से हैं।


* श्री सिद्धेश्वर मजुमदार – ये उत्तर वराहनगर में रहते थे।

२६ फरवरी, १८८२ | परिच्छेद १ | ३

२६ फरवरी, १८८२परिच्छेद १

मास्टर – अच्छा, तो पुस्तकें खूब पढ़ते होंगे?

वृन्दा – पुस्तकें? उनके मुँह में सब कुछ है।

मास्टर हाल ही में पढ़ाई-लिखाई पूरी कर आए थे। श्रीरामकृष्ण पुस्तकें नहीं पढ़ते, यह सुनकर उन्हें और भी आश्चर्य हुआ।

मास्टर – अब तो ये शायद सन्ध्या करेंगे? क्या हम भीतर जा सकते हैं? एक बार खबर दे दो न।

वृन्दा – तुम लोग जाते क्यों नहीं? – जाओ, भीतर बैठो।

तब दोनों ने कमरे में प्रवेश किया। देखा, कमरे में और कोई नहीं है। श्रीरामकृष्ण अकेले तख्त पर बैठे हैं। कमरे में धूप की सुगन्ध भर रही है। सभी दरवाजे बन्द हैं। मास्टर ने अन्दर आते ही हाथ जोड़कर प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण द्वारा बैठने की आज्ञा पाकर वे और सिधू फर्श पर बैठ गए। श्रीरामकृष्ण ने पूछा, कहाँ रहते हो, क्या करते हो, वराहनगर क्यों आए इत्यादि। मास्टर ने कुल परिचय दिया। वे देखने लगे कि श्रीरामकृष्ण का मन बीच बीच में मानो दूसरी ओर खिंच रहा है। उन्हें बाद में मालूम हुआ कि इसी को ‘भाव’ कहते हैं। मानो कोई बंसी डालकर मछली पकड़ने बैठा है जब मछली आकर काँटे में लगे चारे को खाने लगती है और बंसी का शोला हिलने लगता है, उस समय वह आदमी किस प्रकार व्यस्त होकर बंसी को पकड़े हुए एकाग्र चित्त से शोले की ओर टक लगाकर देखने लगता है, – किसी से बातचीत नहीं करता यह भी ठीक उसी प्रकार का भाव था। बाद में मास्टर ने सुना और देखा कि सन्ध्या के बाद श्रीरामकृष्ण को इस प्रकार का भावान्तर प्रायः प्रतिदिन हुआ करता है, कभी कभी तो वे पूरी तरह बाह्यज्ञान-शून्य हो जाते हैं।

मास्टर – आप तो अब सन्ध्या करेंगे, हम अब चलें।

श्रीरामकृष्ण (भावस्थ) – नहीं, – सन्ध्या – ऐसा कुछ नहीं।

और कुछ देर बातचीत होने के बाद मास्टर ने प्रणाम किया और चलना चाहा। श्रीरामकृष्ण ने कहा, “फिर आना।”

मास्टर लौटते समय सोचने लगे – “ये सौम्यदर्शन पुरुष कौन हैं? – इनके पास फिर लौट जाने की इच्छा हो रही है! क्या बिना पुस्तकों के पढ़े भी मनुष्य महान् बन सकता है? कितना आश्चर्य है, मुझे यहाँ फिर आने की इच्छा हो रही है इन्होंने भी कहा, 'फिर आना' कल या परसों सबेरे फिर आऊँगा।”


परिच्छेद २

परिच्छेद २

द्वितीय दर्शन

(१)

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।।

द्वितीय दर्शन का प्रसंग। सुबह का समय था, – आठ बजे होंगे। श्रीरामकृष्ण उस समय दाढ़ी बनवाने की तैयारी में थे। तब भी थोड़ी ठण्डी थी। इसलिए वे शरीर पर गरम किनारीदार शाल ओढ़े हुए थे। मास्टर को देखकर उन्होंने कहा, “तुम आए हो? अच्छा, यहाँ बैठो।”

यह वार्तालाप श्रीरामकृष्ण के कमरे के दक्षिण-पूर्व बरामदे में हो रहा था। नाई आया हुआ था। श्रीरामकृष्ण उसी बरामदे में बैठकर दाढ़ी बनवाने लगे। बीच बीच में वे मास्टर के साथ बातचीत कर रहे थे। शरीर पर शाल थी, पैर में जूतियाँ। सहास्यवदन थे। बात करते समय कुछ तुतलाते थे।

श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – क्यों जी, तुम्हारा घर कहाँ है?
मास्टर – जी कलकत्ते में।
श्रीरामकृष्ण – यहाँ कहाँ आए हो?
मास्टर – यहाँ वराहनगर में बड़ी दीदी के घर आया हूँ, – ईशान कविराज के यहाँ।
श्रीरामकृष्ण – ओहो, ईशान के यहाँ।

श्री केशवचन्द्र सेन के लिए श्रीरामकृष्ण का जगन्माता के पास रोना।

श्रीरामकृष्ण – क्यों जी, केशव अब कैसा है – बहुत बीमार था।
मास्टर – जी हाँ, मैंने भी सुना था कि बीमार हैं, पर अब शायद अच्छे हैं।
श्रीरामकृष्ण – मैंने तो केशव के लिए माँ के निकट नारियल और चीनी की पूजा मानी थी। रात को जब नींद उचट जाती थी, तब माँ के पास रोता और कहता था, – 'माँ, केशव की बीमारी अच्छी कर दे। केशव अगर न रहा तो मैं कलकत्ते जाकर बातचीत किससे करूँगा?' इसी से तो नारियल-चीनी मानी थी।

मार्च, १८८२ | परिच्छेद १ | ५

मार्च, १८८२परिच्छेद १

“क्यों जी, क्या कोई कुक साहब आया है? सुना वह लेक्चर (व्याख्यान) देता है। मुझे केशव जहाज पर चढ़ाकर ले गया था। कुक साहब भी साथ था।”

मास्टर – जी हाँ, ऐसा ही कुछ मैंने भी सुना था। परन्तु मैंने उनका लेक्चर नहीं सुना। उनके विषय में ज्यादा कुछ मैं नहीं जानता।

गृहस्थ तथा पिता का कर्तव्य

श्रीरामकृष्ण – प्रताप का भाई आया था। कुछ दिन यहाँ रहा। काम-काज कुछ है नहीं। कहता है, मैं यहाँ रहूँगा। सुनते हैं, जोरूजाता सब को ससुराल भेज दिया है। कच्चे-बच्चे कई हैं। मैंने खूब डाँटा। भला देखो तो, लड़के-बच्चे हुए हैं, उनकी देख-रेख, उनका पालपोष तुम न करोगे तो क्या कोई गाँववाला करेगा? शर्म नहीं आती, बीवी-बच्चों को ससुर के यहाँ रख दिया है, उन्हें कोई और पाल रहा है। बहुत डाँटा और काम-काज खोज लेने को कहा, तब यहाँ से गया।

(२)

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।।

मास्टर का तिरस्कार तथा उनका अहंकार चूर्ण करना

श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – क्या तुम्हारा विवाह हो गया है?
मास्टर – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण (चौंककर) – अरे रामलाल, अरे अपना विवाह तो इसने कर डाला। रामलाल श्रीरामकृष्ण के भतीजे और कालीजी के पुजारी हैं। मास्टर घोर अपराधी जैसे सिर नीचा किए चुपचाप बैठे रहे। सोचने लगे, विवाह करना क्या इतना बड़ा अपराध है?
श्रीरामकृष्ण ने फिर पूछा – “क्या तुम्हारे लड़के-बच्चे भी हैं?”
मास्टर का कलेजा काँप उठा। डरते हुए बोले – “जी हाँ, लड़के-बच्चे हुए हैं।”
श्रीरामकृष्ण ने फिर दुःख के साथ कहा – “अरे लड़के भी हो गए!”
इस तरह तिरस्कृत होकर मास्टर चुपचाप बैठे रहे। उनका अहंकार चूर्ण होने लगा। कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण सस्नेह कहने लगे, “देखो, तुम्हारे लक्षण अच्छे हैं, यह सब मैं किसी के कपाल, आँखें आदि को देखते ही जान लेता हूँ। अच्छा, तुम्हारी स्त्री कैसी है? विद्या-शक्ति है या अविद्या-शक्ति?

ज्ञान क्या है?

मास्टर – जी अच्छी है, पर अज्ञान है।
श्रीरामकृष्ण (अप्रसन्न होकर) – और तुम ज्ञानी हो?

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६ श्रीरामकृष्णवचनामृत मार्च, १८८२

मास्टर नहीं जानते, ज्ञान किसे कहते हैं और अज्ञान किसे। अभी तो उनकी धारणा यही है कि कोई लिख-पढ़ ले तो मानो ज्ञानी हो गया। उनका यह भ्रम दूर तब हुआ जब उन्होंने सुना कि ईश्वर को जान लेना ज्ञान है और न जानना अज्ञान। श्रीरामकृष्ण की इस बात से कि ‘तुम ज्ञानी हो’ मास्टर के अहंकार पर फिर धक्का लगा।

मूर्तिपूजा

श्रीरामकृष्ण – अच्छा, तुम्हारा विश्वास ‘साकार’ पर है या ‘निराकार’ पर?

मास्टर मन ही मन सोचने लगे, ‘यदि साकार पर विश्वास हो तो क्या निराकार पर भी विश्वास हो सकता है? ईश्वर निराकार है – यदि ऐसा विश्वास हो तो ईश्वर साकार है ऐसा भी विश्वास कभी हो सकता है? ये दोनों विरोधी भाव किस प्रकार सत्य हो सकते हैं? सफेद दूध क्या कभी काला हो सकता है?’

मास्टर – निराकार मुझे अधिक पसन्द है।

श्रीरामकृष्ण – अच्छी बात है। किसी एक पर विश्वास रखने से काम हो जायगा। निराकार पर विश्वास करते हो, अच्छा है। पर यह न कहना कि यही सत्य है, और सब झूठ। यह समझना कि निरकार भी सत्य है और साकार भी सत्य है। जिस पर तुम्हारा विश्वास हो उसी को पकड़े रहो।

दोनों सत्य हैं, यह सुनकर मास्टर चकित हो गए। यह बात उनके किताबी ज्ञान में तो थी ही नहीं! तीसरी बार धक्का खाकर उनका अहंकार चूर्ण हुआ, पर अभी कुछ रह गया था; इसलिए फिर वे तर्क करने को आगे बढ़े।

मास्टर – अच्छा, वे साकार हैं, यह विश्वास मानो हुआ। पर मिट्टी की या पत्थर की मूर्ति तो वे हैं नहीं।

श्रीरामकृष्ण – मिट्टी की मूर्ति वे क्यों होने लगे? पत्थर या मिट्टी नहीं, चिन्मयी मूर्ति।

चिन्मयी मूर्ति, यह बात मास्टर न समझ सके। उन्होंने कहा – “अच्छा, जो मिट्टी की मूर्ति पूजते हैं, उन्हें समझाना भी तो चाहिए कि मिट्टी की मूर्ति ईश्वर नहीं है और मूर्ति के सामने ईश्वर की ही पूजा करना ठीक है, किन्तु मूर्ति की नहीं!”

लेक्चर तथा श्रीरामकृष्ण

श्रीरामकृष्ण (अप्रसन्न होकर) – तुम्हारे कलकत्ते के आदमियों में यही एक धुन सवार है, – सिर्फ लेक्चर देना और दूसरों को समझाना! अपने को कौन समझाए, इसका ठिकाना नहीं। अजी समझानेवाले तुम हो कौन? जिनका संसार है वे समझाएँगे। जिन्होंने सृष्टि रची है, सूर्य-चन्द्र, मनुष्य, जीव-जन्तु बनाए हैं, जीव-जन्तुओं के भोजन के उपाय सोचे हैं, उनका पालन करने के लिए माता-पिता बनाए हैं, माता-पिता में स्नेह का संचार

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मार्च, १८८२ | परिच्छेद २ | ७

मार्च, १८८२परिच्छेद २

किया है - वे समझाएँगे। इतने उपाय तो उन्होंने किए और यह उपाय वे न करेंगे? अगर समझाने की जरूरत होगी तो वे समझाएँगे, क्योंकि वे अन्तर्यामी हैं। यदि मिट्टी की मूर्ति पूजने में कोई भूल होगी तो क्या वे नहीं जानते कि पूजा उन्हीं की हो रही है? वे उसी पूजा से सन्तुष्ट होते हैं। इसके लिए तुम्हारा सिर क्यों धमक रहा है? तुम यह चेष्टा करो जिससे तुम्हें ज्ञान हो - भक्ति हो।

अब शायद मास्टर का अहंकार बिलकुल चूर्ण हो गया।

वे सोचने लगे, 'ये जो कह रहे हैं वह ठीक ही तो है। मुझे दूसरों को समझाने की क्या जरूरत? क्या मैंने ईश्वर को जान लिया है, या मुझमें उनके प्रति विशुद्ध भक्ति उत्पन्न हुई है? स्वयं के सोने के लिए जगह नहीं है, और लोगों को न्यौता दे रहे हैं! स्वयं को कुछ ज्ञान नहीं, अनुभव नहीं, और दूसरों को समझाने चले हैं! वास्तव में कितनी लज्जा की बात है, कितनी हीन बुद्धि का काम है। क्या यह गणित, इतिहास या साहित्य है कि दूसरों को समझा दे? यह ईश्वरीय ज्ञान है। ये जो बातें कह रहे हैं, वे कैसे हृदय को स्पर्श कर रही हैं!

श्रीरामकृष्ण के साथ मास्टर का यही प्रथम और यही अन्तिम तर्कवाद था।

श्रीरामकृष्ण – तुम मिट्टी की मूर्ति की पूजा की बात कहते थे। यदि मिट्टी ही की हो तो भी उस पूजा की जरूरत है। देखो, सब प्रकार की पूजाओ की योजना ईश्वर ने ही की है। जिनका यह संसार है, उन्होंने ही यह सब किया है। जो जैसा अधिकारी है उसके लिए वैसा ही अनुष्ठान ईश्वरने किया है। लड़के को जो भोजन रुचता है और जो उसे सह्य है, वही भोजन उसके लिए माँ पकाती है, समझे?

मास्टर – जी हाँ।

(३)

संसारार्णवघोरे यः कर्णधारस्वरूपकः।
नमोऽस्तु रामकृष्णाय तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

भक्ति का उपाय

मास्टर (विनीत भाव से) – ईश्वर में मन किस तरह लगे?

श्रीरामकृष्ण – सर्वदा ईश्वर का नाम-गुणगान करना चाहिए, सत्संग करना चाहिए – बीच बीच में भक्तों और साधुओं से मिलना चाहिए। संसार में दिनरात विषय के भीतर पड़े रहने से मन ईश्वर में नहीं लगता। कभी कभी निर्जन स्थान में जाकर ईश्वर की चिन्ता करना बहुत जरूरी है। प्रथम अवस्था में बीच बीच में एकान्तवास किए बिना ईश्वर में मन लगाना बड़ा कठिन है।

“पौधे को चारों ओर से रूँधना पड़ता है, नहीं तो बकरी चर लेगी।”

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८ श्रीरामकृष्णवचनामृत मार्च, १८८२

“ध्यान करना चाहिए मन में, कोने में और वन में। और सर्वदा सत्-असत् विचार करना चाहिए। ईश्वर ही सत् अथवा नित्य वस्तु है, और सब असत्, अनित्य। बारम्बार इस प्रकार विचार करते हुए मन से अनित्य वस्तुओं का त्याग करना चाहिए।

मास्टर (विनीत भाव से) – संसार में किस तरह रहना चाहिए?

गृहस्थ तथा संन्यास। उपाय – निर्जन में साधना

श्रीरामकृष्ण – सब काम करना चाहिए परन्तु मन ईश्वर में रखना चाहिए। माता-पिता, स्त्री-पुत्र आदि सब के साथ रहते हुए सब की सेवा करनी चाहिए परन्तु मन में इस ज्ञान को दृढ़ रखना चाहिए की ये हमारे कोई नहीं हैं।

“किसी धनी के घर की दासी उसके घर का कुल काम करती है, किन्तु उसका मन अपने गाँव के घर पर लगा रहता है। मालिक के लड़कों का वह अपने लड़कों की तरह लालन-पालन करती है, उन्हें ‘मेरा मुन्ना’, ‘मेरा राजा’ कहती है, पर मन ही मन खूब जानती है कि ये मेरे कोई नहीं हैं।”

“कछुआ रहता तो पानी में है, पर उसका मन रहता है किनारे पर जहाँ उसके अण्डे रखे हैं। संसार का काम करो, पर मन रखो ईश्वर में।

“बिना भगवद्-भक्ति पाए यदि संसार में रहोगे तो दिनोंदिन उलझनोंमें फँसते जाओगे और यहाँ तक फँस जाओगे कि फिर पिण्ड छुड़ाना कठिन होगा। रोग, शोक, तापादि से अधीर हो जाओगे। विषय-चिन्तन जितना ही करोगे, आसक्ति भी उतनी ही अधिक बढ़ेगी।

“हाथों में तेल लगाकर कटहल काटना चाहिए। नहीं तो, हाथों में उसका दूध चिपक जाता है। भगवद्-भक्तिरूपी तेल हाथों में लगाकर संसाररूपी कटहल के लिए हाथ बढ़ाओ।

“परन्तु यदि भक्ति पाने की इच्छा हो तो निर्जन में रहना होगा। मक्खन खाने की इच्छा हो, तो दही निर्जन में ही जमाया जाता है। हिलाने-डुलाने से दही नहीं जमता। इसके बाद निर्जन में ही सब काम छोड़कर दही मथा जाता है, तभी मक्खन निकलता है।

“देखो, निर्जन में ही ईश्वर का चिन्तन करने से यह मन भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का अधिकारी होता है। इस मन को यदि संसार में डाल रखोगे तो यह नीच हो जायगा। संसार में कामिनी-कांचन के चिन्तन के सिवा और है ही क्या?

“संसार जल है और मन मानो दूध। यदि पानी में डाल दोगे तो दूध पानी में मिल जाएगा, पर उसी दूध का निर्जन में मक्खन बनाकर यदि पानी में छोड़ोगे तो मक्खन पानी में उतराता रहेगा। इस प्रकार निर्जन में साधना द्वारा ज्ञान-भक्ति प्राप्त करके यदि संसार में रहोगे भी तो संसार से निर्लिप्त रहोगे।

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मार्च, १८८२ | परिच्छेद २ | ९

मार्च, १८८२परिच्छेद २

“साथ ही साथ विचार भी खूब करना चाहिए। कामिनी और कांचन अनित्य हैं, एकमात्र ईश्वर ही नित्य हैं। रुपये से क्या मिलता है? रोटी, दाल, कपड़े, रहने की जगह – बस यहीं तक। रुपये से ईश्वर नहीं मिलते। तो रुपया जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकता। इसी को विचार कहते हैं – समझे?”

मास्टर – जी हाँ, अभी अभी मैंने ‘प्रबोधचन्द्रोदय’ नाटक पढ़ा है। उसमें ‘वस्तु-विचार’ है।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, वस्तु-विचार! देखो, रुपये में ही क्या है और सुन्दरी की देह में भी क्या है। विचार करो, सुन्दरी की देह में केवल हाड़, मांस, चरबी, मल, मूत्र – यही सब है। ईश्वर को छोड़ इन्हीं वस्तुओं में मनुष्य मन क्यों लगाता है? क्यों वह ईश्वर को भूल जाता है?

ईश्वर-दर्शन के उपाय

मास्टर – क्या ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं?

श्रीरामकृष्ण – हाँ, हो सकते हैं। बीच बीच में एकान्तवास, उनका नाम-गुणगान और वस्तु-विचार करने से ईश्वर के दर्शन होते हैं।

मास्टर – कैसी अवस्था हो तो ईश्वर के दर्शन हों?

श्रीरामकृष्ण – खूब व्याकुल होकर रोने से उनके दर्शन होते हैं। स्त्री या लड़के के लिए लोग अँसुओ की धारा बहाते हैं, रुपये के लिए रोते हुए आँखें लाल कर लेते हैं, पर ईश्वर के लिए कोई कब रोता है? ईश्वर को व्याकुल होकर पुकारना चाहिए।

यह कहकर श्रीरामकृष्ण गाने लगे –

(भावार्थ) – “मन, तू सच्ची व्याकुलता के साथ पुकारकर तो देख। भला देखें, वह श्यामा बिना सुने कैसे रह सकती हैं! तुझे यदि माँ काली के दर्शन की अत्यन्त तीव्र इच्छा हो तो जवापुष्प और बिल्वपत्र लेकर उन्हें भक्तिचन्दन से लिप्त कर माँ के चरणों में पुष्पांजलि दे।”

“व्याकुलता हुई कि मानो आसमान पर सुबह की ललाई छा गयी। शीघ्र ही सूर्य भगवान् निकलते हैं, व्याकुलता के बाद ही भगवद्दर्शन होते हैं।

“विषय पर विषयी की, पुत्र पर माता की और पति पर सती की – यह तीन प्रकार की चाह एकत्रित होकर जब ईश्वर की ओर मुड़ती है तभी ईश्वर मिलते हैं।

“बात यह है कि ईश्वर को प्यार करना चाहिए। विषय पर विषयी की, पुत्र पर माता की और पति पर सती को जो प्रीति है, उसे एकत्रित करने से जितनी प्रीति होती है, उतनी ही प्रीति से ईश्वर को बुलाने से उस प्रेम का महा आकर्षण ईश्वर को खींच लाता है।

“व्याकुल होकर उन्हें पुकारना चाहिए। बिल्ली का बच्चा ‘मिऊँ-मिऊँ’ करके माँ