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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

॥ गुरुदेव कौ अंग ॥ | १३ सुन्दर कहत कछु महिमा कही न जाइ, ऐसे गुरुदेव दादू मेरे मन मान्यो है ॥२६॥ जीते हैं जु काम क्रोध लोभ मोह दूरि किए, और सब गुननि को मद जिन भान्यो है । उपजै न ताप कोऊ सीतल सुभाव जाको, सबही में समता संतोप उर आन्यो है ॥ काहू सों न राग दोप देत सबही कौ पोष, जीवत ही पायौ मोक्ष एक ब्रह्म जान्यो है । सुन्दर कहत कछु महिमा कही न जाइ, ऐसो गुरुदेव दादू मेरे मन मान्यो है ॥२७॥ ॥ इति श्री गुरुदेव कौ अंग सम्पूर्ण ॥

(२६) तत-तत्त्व । रिषीसुर-ऋषीश्वर । मुनीसुर- मुनीश्वर । कवीसूर-कवीश्वर । (२७) भान्यो है-दूर कर दिया । दोप-द्वेष । मोक्ष । पोष-पोषण ।

१४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ उपदेश चितावनी को अग ॥२॥ हमाल छंद तो सही चतुर तू जान परवीन अति, परै जनि पिंजरै मोह कूंवा । पाइ उत्तम जनम लाइ लै चपल मत, गाड गोविंद गुन जीति जूवा ॥ आपु ही आपु अज्ञान नलनी बध्यौ, विना प्रभु विमुख कै वार मूवा । दास सुन्दर कहै परम पद तौ लहै, राम हरि राम हरि बोल सूवा ॥१॥ नप्स शतान कौ आपुनौ कैद करि, क्या दुनी मै पर्या खाइ गोता । है गुनहगार भी गुनह ही करत है, खाइगा मार तब फिरै रोता ॥ जिन तुझै खाक सौ अजब पैदा किया, तू उस्से क्यों फरामोस होता । दास सुन्दर कहै सरम तब ही रहै, हक्क तू हक्क तू बोल तोता ॥२॥ (१) परवीन-प्रवीण । अज्ञान नलनी-अज्ञानकी नाली, जैसा कि तोता नाली के द्वारा पकड़ा जाता है । (२) नप्स मन । उस्से-उसमे । फरामोस-विमुख ।

॥ उपदेश चितावनी को अङ्ग ॥ [ ६५ आब की बूंद औजूद पैदा किया, नैन तन मानिषा रंगि सजूती । ख्याल मैला भये उरी लीये फिरै, जानि कै दोप बग करै सूती ॥ भूलि उस खसम को काम नै क्या किया, बेगिले यादि करि मति निपूती । दास सुन्दर कहै गर्व गुल नौ रहे भी तुही ना तुही बोल नूती ॥३॥ श्रवन उस्ताद के कद्म की खाक हौ, दिग्म दुयजार सब छाडि फैना । यार दिलदार दिल माहिं तू याद कर, है तुझी पास तू देखि नैना ॥ जान का जान है, जिद का जिद है, सपुन का सपुन कछु समझि सैना । दास सुन्दर कहै मकान घट मै रहै, एक तू एक तू बोलि मैना ॥४॥ मनहर छन्द कान के गए तै कहा कान ऐसो होत मूढ, नैन के गये तै कहा नैन ऐसे पाइ है । (३) आब-पानी । औजूद-अद्भूत शरीर । करि सजूती- लगाकर । ख्याल-विचार । खसम-स्वामी परमेश्वर ।

१६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ नासिका गये तै कहा नासिका सुगन्ध लेत, मुख के गये तै कहा मुख ऐसै गाइ है ॥ हाथ के गये तै कहा हाथ ऐसौ काम होत, पाव के गये तै ऐसै पाव कत धाइ है । याहि तै बिचारि देखि सुन्दर कहत तोहि, देह के गये तै ऐसी देह नही आई है ॥५॥ बार बार कह्यौ तोहि सावधान क्यौ न होहि, ममता की पोट सिर काहे कौं धरतु है । मेरो धन मेरो धाम मेरे सुत मेरी बाम, मेरो पशु मेरो ग्राम भूलौ यौ फिरतु है ॥ तौ भयौ बावरौ बिकाई गई बुद्धि तेरी, ऐसौ अन्धकूप गृह तामै तू परतु है । सुन्दर कहत तोहि नैक हू न आवै लाज, काज कौ बिगारि कै अकाज क्यौ करतु है ॥६॥ (४) अबल उस्ताद-आदि जगद्गुरु । कदम की खाक- पैरो की धूल । हिरस बुगुजार-कामना छोड । फैना-छल कपट । जान का जान-प्रणो का प्राण । जिंद का जिंद- जीवन का जीवन । सखुन का सखुन-सब सारो सार । (६) बाम-वामागना, स्त्री । नेक-थोडी सी भी । काज- कार्य । अकाज-अकार्य ।

१. अंग १-५: गुरु-देव अंग, विरह अंग, ज्ञान-योग अंग व अद्वैत विचार

॥ उपदेश चितावनी को अंग ॥ | ९७ ने रैं तौ कुपेच पर्यो गाठि अति पूरि गई, ब्रह्मा आइ छोरै पगो तौ छूटन न जबहू । तेल सौं भिजोड करि नोलग लपेटि राखै, कूकुर की पूंछ सूधी होइ नहीं तबहू ॥ मानू देत सीप बहु कीरी की भिनत जाउ, कहत कहत दिन बीत गयो सबहू । सुन्दर अज्ञान ऐसो छाड्यो नही अभिमान, निकसन प्रान लग देत्यो नहि कवहू ॥७॥ वालू माहि तेल नहि निकसत काहू विधि, पाथर न भीजै बहु वरषन घन है । पानी के मथे तं कहु घीव नहि पाइयत, कूकस कें कूटै नहि निकसत कन है ॥ शून्य कूं मूठी भरे तै हाथ न परत कछु, ऊसर के वाहै कहा उपजत अन्न है । उपदेश औषध कवन विधि लाग ताहि, सुन्दर असाध्य रोग भयौ जाकै मन है ॥८॥ (७) कुपेच-दुर्बुद्धि । छोरे-छुटावे सुलझावे । कीरीकी- कीडी के समान । (८) घन-ब दल । कूकस-भूसा । कन-कण, अन्न के दाने । शून्य-सूना आकाश । ऊसर-खारडे की जमीन ।

१८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ बैरी घर मांहि तेरे जानत सनेही मेरे, दारा सुत वित्त तेरौ पोसि पोसि खाहिंगे । और ऊ कुटुम्ब लोग लूटैं चहू ओर ही तैं, मीठी मीठी बात कहि तोसौ लपटाहिंगे ॥ सकट परैगो जब कोऊ नहि तेरौ तब, अति ही कठिन वाकी बेर उठि जाहिंगे । सुन्दर कहत तानै झूठौ ही प्रपंच यह, सुपन की नाईं सब देखत विलाहिंगे ॥९॥ वारू कै मदिर माहि बैठि रह्यौ थिर होइ, राखत है जीवने की आसा कैऊ दिन की । पल पल छीजत घटत जात घरी घरी, बिनसत वार कहा षवरि न छिनकी ॥ करत उपाइ झूठै लेन देन षान पान, मूसा इत उत फिरै ताकि रही मिनकी । सुन्दर कहत मेरी मेरो करि भूलौ शठ, चंचल चपल माया भई किन किन की ॥१०॥ अन अन्त । (९) सनेही-प्रेमी । वित्त-धन । बाकी बेर-उनके मौक़ पर । उठि जाहिंगे-मुंह फेर लेंगे । (१०) बारू-बालू मिट्टी । छिन की-क्षणभर की । मूसा-चूहा। मिनकी-बिल्ली । शठ-दुष्ट, मूर्ख ।

॥ उपदेश चितावनी को अग ॥ [ १६ श्रवनू लै जाइ करि नाद कौ लै डारै पासि, नैनवा लै जाइ करि रूप वसि कर्यौ है । नथुवा लै जाइ करि बहुत सुंघावै फूल, रसनू लै जाइ करि स्वाद मन हर्यौ है ॥ चरनू लै जाइ करि नारी सों सपर्श करै, सुन्दर कोऊक साध ठगन तें डर्यौ है । काम ठग क्रोध ठग लोभ ठग मोह ठग, ठगन की नगरी मैं जीव आइ पर्यौ है ॥११॥ पायौ है मनुष देह औसर बन्यौ है आइ, ऐसी देह बार बार कहौ कहां पाइये । भूलत है बावरे ! तूं अबकै सयानौ होइ, रतन अमोल यह काहे कौ ठगाइये ॥ समुझि विचारि करि ठगन कौ संग त्यागि, ठगा बाजी देखि कहुं मन न डुलाइये । सुन्दर कहत तोहि अब सावधान होइ, हरि कौ भजन करि हरि मैं समाइये ॥१२॥ (११) पासि-पाश, फांसी बंधन । रसनू-जीभ । सपर्श-स्पर्श । वाद-सुन्दर शब्द । (१२) औसर-अवसर । सयानौ-बुद्धिमान ।

२० ] ।। सुन्दर विलास ।। घरी घरी घटत छीजत जात छिन छिन, भीजत ही गरि जात माटी कौ सौ ढेल है । मुक्ति हू कै द्वारे आइ सावधान क्यों न होई, वार वार चढत न “त्रिया कौ सौ तेल है” ॥ करि लै सुकृत हरि भजन अखड उर, याही मैं अन्तर परै यामैं ब्रह्म मेल है । मनुष जन्म पाउ जीति भावै हारि अब, सुन्दर कहत यामैं जूवा कौ सौ खेल है ॥१३॥ जोवन कौ गयौ राज और सब भयौ साज, आपुनि दुहाई फेरि दामामौ वजायौ है । लकुटी हथियार लिये नैनन की ढाल दीये, सेत वार भये ताकौ तंबू सौ तनायौ है ॥ दशन गये सु मानौ, दरवान दूरि कीये, झींगरी परी सु औरै बिछौना बिछायौ है । सीस कर कंपत सु सुन्दर निकार्यौ रिपु, देषत ही देषत बुढापौ दौरि आयौ है ॥१४॥ (१३) सुकृत-सत्कर्म । और-भेद, दूरी । भावै-चाहे । (१४) सेतवार-सफेद बाल । दशन, दात । झींगरी परी-चमड़ी सिकुड़ गई ।

॥ उपदेश चितावनी को अग ॥ [ २१ ईंदव छंद घीच तुचा कटि है लटकी, कचऊ पलटे अजहू रत वामी । दत भया मुख के उखरे, नषरे न गये सुखरौ खर कामी ॥ कपति देह सनेह सु दपति, सपति झपति है निस जामी । सुन्दर अन्त हु भौन तज्यौ, “न भज्यो भगवत सु लौन हरामी ।१५। देह घटी पग भूमि मडै नहि, औ लटिया पुनि हाथ लईजू । आंखिहु नाक परै मुख तै जल, सीस हलै कटि घीच नईजू ॥ ईश्वर कौ कबहू न सभारत, दुख परै तब त्राहि दई जू । सुन्दर तौहु बिषै सुख बछत, “घोरे गये पै बगै न गई जू” ॥१६॥ (१५) घीच-गदन । तुचा त्वचा, चमडी । कच शिर के बाल । वामी-स्त्री । रत-आसक्त । भया-भैया । सूखरे-पूरे । खर-गधा । झपति है-जपता है । निसजामी-रात दिन । भौन-भवन, शरीरका घर । लौनहरामी-नमकहरामी । (१६) बगै-पशुओ के स्थान पर उडने वाली मक्खी ।

२२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ पाइ अमोलक देह इहै नर, क्यौं न बिचार करै दिल अन्दर । कामहु क्रोधहु लोभहु मोह हु, लूटत है दस हू दिसि दुर्दर ॥ तूं अब बाछत है सुरलोक हि, कालहु पाड परै सु पुरदर । छाडि कुबुद्धि सुबुद्धि हृदै धरि, "आतमराम भजै किन सुन्दर" ॥१७॥ इन्द्रिय के सुख मानत हैं शठ, याहित तै बहुते दुख पावै । ज्यौं जल मैं झष मास हि लीलत, स्वाद बध्यो जल बाहरि आवै ॥ ज्यौं कपि मूठि न छाडत है, रसना बस वदि पर्यो बिललावै । सुन्दर बर्षा पहिलै न सभारत, "जो गुर पाट सु कान विंधावै" ॥ १८ ॥ कौन कुबुद्धि भई घट अंतर, तू अपने प्रभु सों मन चोरै । (१७) दुर्दर-द्वन्द्व । पुरंदर-इन्द्र । किन-क्यों नहीं । (१८) झष-मछली। लीलत-खाने के लिए । गुर-गुरु ।

॥ उपदेश चितावनी को अग ॥ [ २३ भूलि गयौ विषया सुख मैं गठ, लालच लागि रह्यौ अति थोरै ॥ ज्यौ कोऊ कचन छार मिलावत, लेकरि पाथर सौ नग फोरै । सुन्दर या नर देह अमोलिक, तीर लगी नवका कत वोरै ॥१६॥ देषित के नर सोभित हैं जैसे, आहि अनूपम केरि कौ खंभा । भीतर तौ कुछ सार नही पुनि, ऊपर छीलक अवर दभा ॥ बोलत है पर नाही कछू सुधि, ज्यौ बबयारि तैं बाजत कुम्भा । रूसि रहै कपि ज्यौं छिन माहिमु, याहि तै सुन्दर होत अचभा ॥२०॥ देषत के नर दीसत हैं पर, लक्षन तौ पसु के सबही है । बोलत चालत पीवत खात सु, वै घर वै बन जात सही है ॥ (१६) छार-राख । नग-हीरा मोती । कत-क्यो । वोरै-डुबाता है । (२०) केरि-केला । अवर-दभा-आडवर । बवियारि- फूंक । कुम्भा-घडा ।

२४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ प्रात गये रजनी फिर आवत, सुन्दर यौ नित भार वही है ! और तो लक्षण आइ मिलै सब, एक कमी सिर शृङ्ग नही है ॥२१॥ प्रेत भयौ कि पिशाच भयौ कि, निशाचर सौ जितही तित डोलै । तूं अपनी सुधि भूलि गयौ, मुख तै कछु और को और ई बोलै ॥ भोई उपाड करै जु मरै पचि, बधन तौ कवहू नही खोलै । सुन्दर जा तन मैं हरि पावत, सो तन नाश कियौ मति भोलै ॥२२॥ पेट ते बाहिर होत हि बालक, आड कें मात पयोधर पीनीं । मोह बढ़यौ दिन ही दिन औग, तरुन्न भयौ त्रिय के रस भीनीं ॥ पुत्र पडन बढ्यौ परिवार मु, ऐसो ही भाति गये पन तीनों । सुन्दर राम कौ नाम विसारिन्, आपुहि आपकौ वधन कीनीं ॥२३॥ (२३) पयोधर-स्तन । तरुन्न-तरुण, जवान । त्रिय- स्त्री । पडन पौत्र, पोता । पन तीनों-तीनों अवस्था ।

॥ उपदेश चितावनी को अंग ॥ [ २५ मात पिता सुत भाइ बध्यौ, जुवती के कहे कहा कान करे है । चोरी करै बटमारी करै किरषी बनजी कर पेट भरै है ॥ शीत सहै सिर घाम सहै, कहि सुन्दर सो रन माहि मरै है । वाध रह्यौ ममता सब सौ नर, ताहि तैं बाध्यौ ई बाँध्यो फिरै है ॥२४॥ तू ठगि कै धन और कौ ल्यावत, तेरेऊ तौ घर औरई फोरै । आगि लगै सबही जरि जाइ सु, तू दमरी दमरी कर जोरै ॥ हाकिम कौ डर नाहि न सूझत, सुन्दर एक हि वार निचोरै । तू षरचै नहिं आपु न षाइ सु, “तेरी ही चातुरी तोहि ले बोरै” ॥२५॥ (२४) जुवती-युवती । किरषी-खेती । बनजी-व्यापार । (२५) चातुरी-चतुराई ।

२६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ मनहर छंद । करत प्रपंच इनि पंचनि कैं वसि पर्यौ, परदारा रत भै न आनत बुराई कौ । पर धन हर पर जीव की करत घात, मद्य मास षाइ लव लेस न भलाई कौ ॥ होइगो हिसाब तब मुषतैं न आवै ज्वाब, सुन्दर कहत लेषा लेत राई राई कौ । इहा तैं किये बिलास जम की न तोहि त्रास, उहातौ न व्है है कछु राज पोपाबाई कौ ॥२६॥ दुनिया कौ दौडता है औरति कौ लोडता है, औजूद कौ मोडता है बटोही सराइ का । मुरगी कौ मोसता है बकरी कौ रोसता है, गरीबू कौ शोसता है बेमिहर गाइ का ॥ जुलम कौ करता है धनी सौ न डरता है, दोजग कौ भरता है खजाना बलाइ का । (२६) प्रपच-जंजाल । परदारा-पराई स्त्री । भै-भय । घात-हत्या । बिलास-भोग विलास । त्रास-डर । पोपाबाई को राज-पोल का राज्य ।

॥ उपदेश चितावनी को अंग ॥ [ २७ होइगा हिसाव तब आवैगा न ज्वाव कछु, सुन्दर कहत गुन्हैगार है खुदाइ का ॥२७॥ कर कर आयौ जब घर घर काट्यौ नार, भर भर बाज्यौ ढोल घर घर जान्यौ है । दर दर दौर्यौ जाइ नर नर आगै दीन, बर बर बकत न नेक अलसान्यौ है ॥ सर सर सोधै धन तर तर तोरै पात, जर जर काटत अधिक मोद मान्यौ है । फर फर फूल्यौ फिरै डर डरपै न मूढ, हर हर हसत न सुन्दर सकान्यौ है ।२८।।। जनम सिरानौ जाइ भजन बिमुख शठ, काहे कौ भवन कूप बिन मीच मरि है । ग्रहित अविद्या जानि शुक नलिनी ज्यौ मूढ, करम विकरम करत नहि डरि है । (२७) लोड ता है-भोगता है । औजूद-शरीर । बेमिहर- निर्दय । दोजग-दोजख, नर्क । बलाई का-पापो का । गुन्हैगार-अपराधी । धनी-स्वामी, परमेश्वर । (२८) कर कर आयो-पाप पुण्य करके जन्म लिया । नार-नाभिनात । भर-भर भड भड । दर दर-घर घर के दरवाजे । बर वर-बड वड । सर-सर सोधै-सूत-सूत कर इकट्ठा करे । तर तर-तरड तरड । जर जर-जरड-जरड । मोद-आनद ।

२८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ आपु ही तै जात अध नरकनि बार बार, अजहु न शक मन माहि अव करि है । दुख कौ समूह अवलोकिकै न त्रास होइ, सुन्दर कहत नर नागपासि परि है ॥२६॥ जग मग पग तजि सजि भजि राम नाम, काम कौ न तन मन घेर घेर मारिये । झूठ मूठ हठ त्यागि जागि भागि सुनि पुनि, गुनि ग्यान आन आन वारि वारि डारिये ॥ गहि ताहि जाहि शेष ईश शीस सुर नर, और बात हेत तात फेरि फेरि जारिये । सुन्दर दरद धोइ धोइ धोइ बार बार, सार सग रग अग हेरि हेरि धारिये ॥३०॥ झूठौ जग ऐन सुन नित्य गुरु बैन देखे, आपने हु नैन तोऊ अध रहै ज्वानी मे । केते राव राजा रक भये रहे चलि गये, मिलि गये धूर माहि आये ते कहानी मं । (२६) जनम-जीवन । सिरानो जाय-बीत रहा है । मीच-मौत । गहित-अविद्या-अज्ञान ग्रस्त । विकरम-विकर्म, पापकर्म । नागपास-संसार का फदा । (३०) जगमग पग-संसारी मार्ग पर चलना । ज्ञान आन ज्ञान ले । आन-और बातें । हेत-प्रेम । दरद-दुख । सार सग-सत्संग । हेरि हेरि-तलाश कर कर ।

।। उपदेश चितावनी को अग ।। [ २६ सुन्दर कहत अब ताहि न सुरत आवे, चेते क्यो न मूढ चित लाय हिरदानी मे । भूले जन दाव जात लोह को सो ताव जात, आप जात ऐसे जैसे नाव जात पानी मे ।।३१।। डुमिला छंद हठ योग धरौ तन जात भिया, हरि नाम विना मुख धूर परै । शठ सोक हरौ छन गात किया, चरि चाम दिना भुष पूरि जरै ॥ भठ भोग परौ गन पात धिया, अरि काम किना सुख भूरि मरै । मठ रोग करौ घन घात हिया, परि राम तिना दुख दूरि करै ।।३२।। (३१) ऐन-ठीक से । ज्वानी-जवानी । रक-निर्धन । सुरत-ध्यान । हिरदानी-हृदय । (३२) भिया-अरे भाई। तन जात-जीव।-जा रहा है । शोक-चिंता । छन गात क्रिया-शरीर क्षणभंगुर है । चाम-चमडी या शरीर । चरि-परिवर्तनशील है । दिना भुष- आयु के दिन भोगकर । करि जरै-भस्म होगा । भठ भोग परो-भोगो की भट्टी मे पडा है । गन-गण, विषय समुदाय। खात-धिया-वृद्धि को खा रहे है । अरि काम किना-शत्रु का मो काम कर रहे है । मठ-घर बार परिवार को । रोग

३० ] ।। सुन्दर विलास ।। गुरु ग्यान गहै अति होइ सुखी, मन मोह तजै सब काज सरै । धुर ध्यान रहै पति खोइ मुखी, रन लोह बजै तब लाज परै ॥ सुरतान उहै हति दोइ 'रुखी, तन.छोह सजै अब आज मरै । पुरथान लहै मति धोइ दुखी, जन वोह रजै जब राज करै ॥३३॥ इति उपदेश चितावनी को अग सम्पूर्ण करो-व्याधि समझो । घन-घात हिया-हृदय पर गहरी चोट करो । (३३) धुर-दृढ । पति-सासारिक प्रतिष्ठा । खोइ- याग कर । मुखी-गुरुमुखी है । रन लोह बजै-विघ्न बाधाओ ने युद्ध करे । तन छोह तजे-देह का मोह छोड दे । अब नाज मरे-मरने जीनेदी चिन्ता न करे । पुरथान लहै-परम पद प्राप्त करे । मति धोइ-बुद्धि को शुद्ध करे ।

॥ काल चितावनी को अंग ॥ [ ३१ अथ काल चितावनी को अंग ॥२॥ इन्दव छन्द मन्दिर माल विलाइत है, गज ऊट दमामे दिना इक दो है । तातहु मात त्रिया सुत बधव, देषि धौ पामर होत बिछोहै ॥ झूठ प्रपंच सौ गचि रह्यौ शठ, काठ की पूतरि ज्यौ कपि मो है । मेरि ही मेरि करै नित सुन्दर, आँखि लगै कहि कौनको को है ॥१॥ ये मेरे देश बिलाइत है गज, ये मेरे मन्दिर या मेरी थाती । ये मेरे मात पिता पुनि बधव, ये मेरे पूत सु ये मेरे नाती ॥ ये मेरी काँमनि केलि करै नित, ये मेरे सेवक है दिन राती । सुन्दर वैसे हि छाडि गयौ सब, तेल जर्र्यौ रु बुझी जब बाती ॥२॥ तैं दिन च्यारि बिराम लियौ शठ, तेरै कहै कछू व्है गई तेरी । जैसे हि बाप दादा गये छाडि सु, तैसेही तू तजि है पल फेरी ॥

३२ ] ।। सुन्दर विलास ।। मारि है काल चपेटि अचानक, होइ घरी माहि राख की ढेरी । सुन्दर ले न चलै कछु सग सु, भूलि कहै नर मेरी ही मेरी ॥३॥ कै यह देह जराइ कै छार, किया कि किया कि किया कि किया है । कै यह देह जमी महि षोदि, दिया कि दिया कि दिया कि दिया है ॥ कै यह देह रहै दिन चारि, जिया कि जिया कि जिया कि जिया है । दर काल अचानक आइ, लिया कि लिया कि लिया कि लिया है ॥४॥ त सदा उपदेश बतावत, केश सबै सिर शेत भये हैं । ममता अजहू नही छाडत, मौत हू आइ सदेश दिये हैं ॥ ज कि काल्हि चलै उठि मुरिख, तेरे ही देखत केते गये हैं । दर क्यों नहिं राम सभारत, या जग मैं कहि कौन रहे हैं ॥५॥ मनेह न छाडत है नर, ानत है शठ है थिर येहा ।