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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

३३६ सूरसागर सार सटीक

मिलकर तुमको पकड़ती हैं, तुम छुड़ाकर भागते हो। सूरदास (उद्धव के शब्दो) में कहते हैं कि (ब्रज मे) नित्य प्रति (तुम्हारी) सब लीला देख-देख करके मन रम जाता है ।।१८४।। श्रीकृष्ण वचन सुनि ऊधौ मोहिं नैकु न बिसरत, वै ब्रजबासी लोग । तुम उनकौँ कछु भली न कीन्ही, निसि दिन दियौ वियोग । जउ बसुदेव-देवकी मथुरा, सकल राज-सुख भोग । तद्यपि मनहिँ बसत वंसी बट, वन जमुना संजोग । वै उत रहत प्रेम अवलंबन, इत तें पठयौ जोग । सूर उसाँस छांड़ि भरि लोचन, बढ़यौ विरह ज्वर सोग ।।१८५।। अर्थ—उद्धव, सुनो मुझे वे ब्रजवासी जन तनिक भी नही भूलते । तुमने उनका कुछ भला नही किया ,रात-दिन वियोग (की शिक्षा) दिया। यद्यपि वसुदेव तथा देवकी के मथुरा मे समस्त राजभोग है फिर भी मन से वंशी वट वन और मथुरा से संयुक्त रहता हूँ। वे वहाँ प्रेम के आधार पर जीते हैं किन्तु (मैंने यहाँ) से योग भेजा। सूरदास कहते है कृष्ण ने उच्छ्वास छोड़कर आंखों को आंसू से भर लिया तथा (उनका) विरह ज्वर और बढ गया ।।१८५।। ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहींँ । वृन्दावन गोकुल बन उपवन, सघन कुंज की छांहीँ । प्रात समय माता जसुमति अरु, नद देखि सुख पावत । माखन रोटी दह्यौ सजायौ, अति हित साथ खवावत । गोपी ग्वाल बाल सँग खेलत, सब दिन हँसत सिरात । सूरदास धनि-धनि ब्रजवासी, जिनसौँ हित जदुनाथ ।।१८६।। अर्थ--उद्धव, मुझे ब्रज भूलता नही। वृन्दावन, गोकुल वन, उपवन तथा सघन कुजो की छाया (नही भूलती) प्रातः काल माता यशोदा तथा नंद को देखकर सुख पाता था। वे माखन रोटी तथा सजाव (थक्केदार) दही को अत्यधिक स्नेह से खिलाते थे। गोपी तथा ग्वाल-बाल के साथ खेलता था तथा सारा दिन हँसते हुए बीत जाता था। सूरदास कहते हैं कि ब्रज के निवासी धन्य-धन्य हैं जिनसे कृष्ण का प्रेम है ।।१८६।। ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहींँ । हंस सुता को सुदर कगरी, अरु कुंजनि की छाहीँ । वै सुरभी, वै बच्छ दोहनी, खरिक दुहावन जाहीं । ग्वाल-बाल मिलि करत कुलाहल, नाचत गहि गहि बाहींँ। यह मधुरा कंचन की नगरी, मनि मुक्ताहल जाहींँ। जबहिँ सुरति आवति वा सुख की, जिय उमगत तन नाहींँ । अनगन भाँति करी बहु लीला, जसुदा नंद निवाहीँ । सूरदास प्रभु रहै मौन ह्वै, यह कहि कहि पछिताहीँ ।।१८७।।

उद्धव संदेश ३३७ अर्थ—ऊधो मुझे ब्रज भूलता नही। यमुना की सुन्दर कगार और कुंजो की छाया तथा वे गाये तथा वे बछडे, जिन्हे बाड़े मे दुहाने जाते थे हमें नही भूलते । ग्वाल बाल सब के साथ मिलकर कोलाहल करते थे तथा गला पकड़कर नाचते थे। यह मथुरा सोने की नगरी है जहां मणि तथा मुक्ताफल है किन्तु जब उस सुख की याद आती है तो मन उमगता है तथा शरीर (की चेत) नही रहती। ब्रज मे अनेक लीला की नद तथा यशोदा ने सब कुछ निबाहा । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण चुप हो गये और यह कहकर पछताते है ॥१८७॥ जो जन ऊधौ मोहिं न बिसारत, तिहिँ न बिसारौं एक घरी। मेटौँ जनम जनम के संकट, राखौँ सुख आनंद भरी। जो मोहिं भजै भजौँ मैं ताकौं, यह परिमिति मेरे पाइँ परी। सदा सहाइ करौँ वा जन की, गुप्त हुती सो प्रगट करी। ज्यौँ भारत भरुही के अंडा, राखे गज के घंट तरी। सूरजदास ताहि डर काकौ, निसि बासर जो जपत हरी ॥१८८॥ अर्थ - उद्धव, जो लोग मुझे नही भुलाते उन्हे एक घडी भी नही भुलाता। (उनके) जन्म-जन्म के संकट को मिटा दूंगा तथा सुख और आनन्द से भरा रखूंगा। जो मुझे भजता है मैं उसे भजता हूँ यह मर्यादा मेरे पैर पड़ गयी है। उस आदमी की सदा सहायता करता हूँ जो बात गुप्त थी उसे प्रत्यक्ष कर देता हूँ। जैसे महाभारत में टिटहरी के अन्डे को हाथी के घण्टे के नीचे बांधा (वैसी ही) सूरदास कहते हैं कि उसे किसका डर है जो दिन-रात कृष्ण को जपता है ॥१८८॥

२२

द्वारिका चरित द्वारिका प्रयाण बार सत्तरह जरासंध, मथुरा चढ़ि आयौ । गयौ सो सब दिन हारि, जात घर बहुत लजायौ । तब खिस्याइ कै कालजवन, अपनैं सँग ल्यायो । हरि जु कियौ बिचार, सिंधु तट नगर बसायौ । उग्रसेन सब लै कुटुंब, ता ठौर सिधायौ । अमर पुरी तैं अधिक, तहाँ सुख लोगनि पायौ । कालजवन मुचुकुंदहिं सौं, हरि भसम करायौ । बहुरि आइ भरमाइ, अचल रिपु ताहि जरायौ । जरासिंधु हू ह्वाँ तैं पुनि, निज देस सिधायौ । गए द्वारिका स्याम राम, जस सूरुज गायौ ॥१॥ अर्थ—जरासंध सत्रह बार मथुरा पर चढ आया । लेकिन सब दिन (हर बार) हार गया और घर जाते हुए बहुत लजाया । तब खीझकर वह कालयवन को अपने साथ लाया । हरि ने विचार किया ( और ) उन्होंने समुद्र के किनारे (एक) नगर बसाया । उग्रसेन सारा परिवार लेकर उस स्थान को चले गये । वहाँ (पर) लोगो ने अमरपुरी से अधिक सुख पाया । मुचुकुंद के द्वारा हरि ने कालयवन को भस्म करा दिया । फिर आकर (और) भ्रमित करके उस अचल शत्रु को जलाया । जरासिंधु यहाँ से फिर अपने देश चला गया । श्याम और बलराम द्वारिका गये । सूरदास ने (उनके) यश का गान किया है ॥१॥ रुक्मिणी परिणय हरि हरि हरि सुमिरन करौ । हरि चरनाबिंद उर धरौ । हरि सुमिरन जब रुकमिनि कर्यौ । हरि करि कृपा ताहि तब बर्यौ । कहौं सो कथा सुनौ चित लाइ । कहै सुनै सो रहै सुख पाइ । कुंडिनपुर को भीषम राइ । बिस्नु भक्ति कौ तिहिँ चित चाइ । रुक्म आदि ताके सुत पाँच । रुकमिनि पुत्री हरि रंग राँच । नृपति रुक्म सौं कह्यौ बनाइ । कुँवरि जोग बर श्री जदुराइ ।

द्वारिका चरित ३३६ रुक्म रिसाइ पिता सौं कह्यौ। जदुपति -ब्रज जो चोरत मह्यौ। रुक्मनि कौं सिसुपालहिं दीजै। करि विवाह जग मैं जस लीजै। यह सुनि नृप नारी सौं कह्यौ। सुनि ताकौँ अंतरगत दह्यौ। रुक्म चँदेरी बिप्र पठायौ। ब्याह काज सिसुपाल बुलायौ। सो बारात जोरि तहँ आयौ। श्री रुकमिनि के मन नहिँ भायौ। कह्यौ मेरे पति श्री भगवान। उनहिँ बरौँ कै तजौँ परान। यह निहचै करि पत्री लिखी। बोल्यौ विप्र सहज इक सखी। पाती दै कह्यौ बचन सुनाइ। हरि को दै कहियौ या भाइ। भीषम सुता रुकमिनो बाम। सूर जपति निसि दिन तुव नाम ॥२॥ अर्थ—हरि का स्मरण करो (तथा) हरि के चरणरूपी कमल को हृदय मे धारण करो। जब रुक्मिणी ने हरि का स्मरण किया (तब) हरि ने कृपा करके उसका वरण किया। उसी कथा को कहता हूँ, मन लगाकर सुनो; जो (इस कथा को) कहता- सुनता है वह सुख पाता है। कुंडिनपुर के भीष्म राजा के मन मे विष्णु-भक्ति का चाव था। रुक्म आदि उसके पाँच पुत्र थे। हरि के रंग में रंगी रुक्मिणी (उसकी) एक पुत्री थी। नृपति ने रुक्म से भली-भांति कहा (कि) कुमारी (रुक्मिणी) के योग्य वर यदुराय (कृष्ण) हैं। रुक्म ने क्रोधित होकर पिता से कहा कि व्रज मे दही चुराता था (यह) यदुपति ! रुक्मिणी को शिशुपाल को दीजिए (तथा) विवाह करके जग मे यश लीजिए। यह सुनकर राजा ने स्त्री (पत्नी) से कहा, सुनकर उसका हृदय जल गया। रुक्म ने विप्र को चंदेरी भेजा (तथा) विवाह के लिए शिशुपाल को बुलाया। वह बारात जोड़कर वहाँ आया, (लेकिन) श्री रुक्मिणी के मन को (यह) अच्छा नही लगा। उसने कहा कि मेरे पति श्री भगवान् (है); उनको बरूँगी या प्राण छोड़ दूँगी। यह निश्चय करके (उसने) पत्र लिखा (तथा) सहज ही एक सखी से ब्राह्मण को बुलाया। पत्रिका देकर (यह) वचन सुनाकर कहा (कि) (पत्रिका) हरि को देकर इस प्रकार कहना (कि) भीष्म की पुत्री रुक्मिणी रात-दिन तुम्हारा नाम भजती है ॥२॥ द्विज पाती दै कहियौ स्यामहिँ। कुंडिनपुर की कुँवरि रुकमनी, जपति तिहारे नामहिँ। पा लागौँ तुम जाहु द्वारिका, नंद-नँदन के धामहिँ। कंचन, चीर-पटंबर दैहौँ, कर कंचन जु इनामहिँ। यह सिसुपाल असुचि अज्ञानी, हरत पराई बामहिँ। सूर स्याम प्रभु तुम्हरौ भरोसौ, लाज करौ किन नामहिँ ॥३॥ अर्थ—हे द्विज ! पत्रिका देकर स्याम से कहना कि कुंडिनपुर की कुमारी रुक्मिणी तुम्हारे नाम को जपती है। (मैं) पांव लगती हूँ तुम कृष्ण के धाम द्वारिका जाओ। मैं तुम्हे सोना, चीर-पटंबर (रेशमी वस्त्र) दूँगी (तथा) हाथ का कंगन इनाम

३४० सूरसागर सार सटीक में दूँगी। यह शिशुपाल अपवित्र तथा अज्ञानी है, पराई स्त्रियों को हरता है। सूर के प्रभु हे स्याम ! आप (अपने) नाम की लाज क्यों नही करते ॥३॥ द्विज कहियौ जदुपति सौं बात । बेद बिरुद्ध होत कुंडिनपुर, हंस के अंस काग नियरात । जनि हमरे अपराध बिचारहु, कन्या लिख्यौ मेटि गुरु तात । तन आतमा समर्प्यौ तुमकौं, उपजि परी तातैं यह बात । कृपा करहु उठि बेगि चढ़हु रथ, लगन समै आवहु परभात । कृष्न सिंह बलि धरी तुम्हारी, लैबे कौं जंबुक अकुलात । तातैं मैं द्विज बेगि पठायौ, नेम धरम मरजादा जात । सूरदास सिसुपाल पानि गहै, पावक रचौं करौं अपघात ॥४॥ अर्थ — हे ब्राह्मण ! कृष्ण से (यह) बात कहना कि कुंडिनपुर में वेद के विरुद्ध (आचरण) हो रहा है; हंस के भाग को (लेने के लिए) कौआ नजदीक आ रहा है। हमारे अपराध पर ध्यान न दो (कि) कन्या ने गुरु तथा पिता की (आज्ञा की) अव- हेलना करके पत्र लिखा है। (मैंने) तन तथा आत्मा तुम्हे सौंप दी है, इसलिए यह बात (स्थिति) उत्पन्न हो गयी है। कृपा करो (और) उठकर शीघ्र रथ पर चढ़ो, (तथा) लग्न के समय प्रातः आओ। हे कृष्ण ! सिंह की बलि तुम्हारे लिए रखी (सुरक्षित) है; (उसे) लेने के लिए शृगाल अकुला रहा है। इसी से मैंने ब्राह्मण को शीघ्र ही भेजा, क्योंकि (मेरी) नियम, धर्म तथा मर्यादा जा रही है। सूरदास कहते हैं (रुक्मिणी कहती है) (कि) (यदि) शिशुपाल मेरा हाथ ग्रहण करता है (पाणिग्रहण करता है) (तो) अग्नि रचूँगी (तथा) आत्म हत्या कर लूंगी ॥४॥ सुनत हरि रुकमिनी कौ संदेश । चढ़ि रथ चले बिप्र कौं सँग लै, कियौ न गेह प्रवेस । बारंबार बिप्र कौं पूछत, कुँवरि बचन सो सुनावत । दीनबंधु करुना निधान सुनि, नैन नीर भरि आवत । कह्यौ हलधर सौं आवहु दल लै, मैं पहुँचत हौं धाइ । सूरज प्रभु, कुंडिनपुर आए, बिप्र सो जाइ सुनाइ ॥५॥ अर्थ — रुक्मिणी का संदेश सुनते ही हरि रथ पर चढ़कर (तथा) ब्राह्मण को साथ लेकर चले, (सुनने के बाद) (अपने) घर में प्रवेश नही किया। बार-बार ब्राह्मण से पूछते हैं, (वह) कुंवरि रुक्मिणी की बात सुनाता है। सुनकर दीनबन्धु करुणा- निधान (कृष्ण की) आंखो मे आंसू भर आते हैं ! (उन्होने) बलराम से कहा (कि) सेना लेकर आओ मैं दौडकर पहुँचता हूँ। सूरज के प्रभु कुंडिनपुर आ गये, ब्राह्मण ने जाकर यह (समाचार) सुनाया ॥५॥ रुकमिनी देवी-मंदिर आई। धूप दीप पूजा-सामग्री, अली संग सब ल्याई।

द्वारिका चरित ३४१ रखवारी कौं बहुत महाभट, दीन्हे रुक्म पठाई। ते सब सावधान भए चहुँ दिसि, पंछी तहाँ न जाई। कुंवरि पूजि गौरी बिनती करी, वर देउ जादवराई। मैं पूजा कीन्ही इहिं कारन, गौरी सुनि मुसकाई। पाइ प्रसाद अंबिका-मंदिर, रुकमिनी बाहर आई। सुभट देखि सुन्दरता मोहे, धरनि गिरे मुरझाई। इहिं अंतर जादोपति आए, रुकमिनी रथ बैठाई। सूरज प्रभु पहुँचे दल अपनैं, तब सुभटनि सुधि पाई॥६॥ अर्थ—रुक्मिणी देवी मन्दिर में आईं। धूप, दीप तथा पूजा की समस्त सामग्री सखियाँ साथ ले आईं। रुक्म ने रखवाली के लिए बहुत से बड़े वीरो को भेज दिया। वे सभी वहाँ सावधान हो गये, वहाँ पक्षी भी नही जा पाता था। कुँवरि ने पूजा करके पार्वती से (यह) विनती की कि (मुझे) कृष्ण को वर के रूप में दे। मैंने इसीलिए पूजा की (है)। (यह) सुनकर गौरी मुस्करायी ! अंबिका के मन्दिर में प्रसाद (वरदान) पाकर रुक्मिणी बाहर आईं। (वहाँ के) सुभट (उसकी) सुन्दरता देखकर मोहित हो गए (और) पृथ्वी पर मूर्छित होकर गिर पड़े। इसी बीच कृष्ण (वहाँ) गए तथा (उन्होंने) रुक्मिणी को रथ पर बिठा लिया। सूरज के प्रभु (कृष्ण) अपनी सेना मे (जब) पहुँच गये तब (रुक्म द्वारा तैनात) सुभटों ने खबर पायी (कि रुक्मिणी हरण हो गया) ॥६॥ आवहु री मिलि मंगल गावहु। हरि रुकमिनी लिए आवत हैं, यह आनंद जदुकुलहिं सुनावहु। बाँधहु बन्दनवार मनोहर, कनक कलस भरि नीर धरावहु। दधि अच्छत फल फूल परम रुचि, आँगन चंदन चौक पुरावहु। कदली जूथ अनूप किसल दल, सुरँग सुमन लै मंडल छावहु। हरद दूब केसर मग छिरकहु, भेरी मृदँग निसान बजावहु। जरासंध सिसुपाल नृपति तैं, जीते हैं उठि अरघ चढ़ावहु। बल समेत तन कुसल सूर प्रभु, आए हैं आरती बनावहु ॥७॥ अर्थ—(हे सखियो !) आओ, (सब) मिलकर मंगल (गीत) गाओ। हरि रुक्मिणी को लेकर आ रहे हैं। यह आनंद यदुकुल को सुनाओ। मनोहर वंदनवार बांधो (तथा) सोने के कलश (घड़े) मे जल भर कर रखवाओ। दही, अक्षत, परम रुचिकर फल, फूलों के द्वारा आंगन मे चौक पुरवाओ। केले के समूहो, अनुपम किशलय दलो (तथा) सुन्दर रंग के फूलो मे मंडप छावाओ। रास्ते मे हल्दी दूब (तथा) केसर छिड़को; नगाड़ो (भेरी), मृदंग तथा ढोल (निशान) बजाओ। जरासंध शिशुपाल नृप से (कृष्ण) जीत गये हैं। उठकर अर्घ्य (पूजन सामग्री) चढ़ाओ। बलराम सहित सूर के प्रभु (कृष्ण) शरीर से कुशलता-पूर्वक आये है। (उनकी) आरती सजाओ ॥७॥

३४२ सूरसागर सार सटीक बलभद्र ब्रज यात्रा स्याम राम के गुन नित गाऊँ । स्याम राम ही सौं चित लाऊँ । एक बार हरि निज पुर छाए । हलधर जी बृन्दावन गए । रथ देखत लोगनि सुख पाए । जान्यौ स्याम राम दोउ आए । नन्द जसोमति जब सुधि पाई । देह गेह की सुरति भुलाई । आगैं ह्वै लैबे कौं धाए । हलधर दौरि चरन लपटाए । बल कौं हित करि गरैं लगाए । दै असीस बोले या भाए । तुम तौ भली करी बलराम । कहाँ रहे मन मोहन स्याम । देखो कान्हर की निठुराई । कबहुँ पाती हू न पठाई । आपु जाइ ह्वाँ राजा भए । हमकौं बिछुरि बहुत दुख दए । कहौ कबहुँ हमरी सुधि करत । हम तौ उन बिनु बहु दुख भरत । कहा करैं ह्वाँ कोउ न जात । उन बिनु पल पल जुग सम जात । इहिँ अन्तर आए सब ग्वार । भेंटे सबनि जथा ब्यौहार । नमस्कार काहूँ कौ कियौ । काहू कौं अंकम भरि लियौ । पुनि गोपी जुरि मिलि सब आईँ । तिन हित साथ असीस सुनाईँ । हरि सुधि करि सुधि बुधि बिसराई । तिनकौ प्रेम कह्यौ नहिं जाई । कोउ कहै हरि ब्याही बहु नार । तिनकौ बढ़्यौ बहुत परिवार । उनकौं यह हम देतिँ असीस । सुख सौं जीवैं कोटि बरीस । कोउ कहै हरि नाहीँ हम चीन्हौ । बिनु चीन्हैं उनकौं मन दीन्हौ । निसि दिन रोवत हमैँ बिहाइ । कहौ करैं अब कहा उपाइ । कोउ कहै इहाँ चरावत गाइ । राजा भए द्वारिका जाइ । काहे कौं वै आवैं इहाँ । भोग बिलास करत नित उहाँ । कोउ कहै हरि रिपु छै किए । अरु मित्रनि कौ बहु सुख दिए । बिरह हमारौ कहँ रहि गयौ । जिन हमकौं अति हीँ दुख दयौ । कोउ कहै जे हरि की रानी । कौन भाँति हरि कौं पतियानी । कोऊ चतुर नारि जो होइ । करै नहीं पतिआरी सोइ । कोउ कहै हम तुम कत पतियाईँ । उनकैं हित कुल लाज गवाईँ । हरि कछु ऐसौ टोना जानत । सबकौं मन अपनैं बस आनत । कोउ कहै हरि हम सब बिसराईं । कहा कहैं कछु कह्यौ न जाई । हरिकौं सुमिरि नयन जल धारैं । नैंकु नहीँ मन धीरज धारैं । यह सुनि हलधर धीरज धारि । कह्यौ आइहैं हरि निरधारि । जब बल यह संदेस सुनायौ । तब कछु इक मन धीरज आयौ । बल तहं बहुरि रहे द्वै मास । ब्रज बासिनि सौं करत विलास । सब सौं मिलि पुनि निजपुर आए । सूरदास हरि के गुन गाए ॥८॥

द्वारिका चरित ३४३ अर्थ—श्याम (और) बलराम के गुणों को नित्य गाता हूँ (तथा) श्याम और बलराम में ही चित्त लगाता हूँ । एक बार (जब) हरि अपने पुर (मथुरा) में छाये थे (विद्यमान थे) हलधर जी वृन्दावन गये (आए) रथ देखते ही (वृन्दावन) के लोगों ने सुख पाया, समझा (कि) श्याम और बलराम दोनों आये हैं । नद (तथा) यशोदा ने जब खबर पायी तो उन्होने (प्रसन्नता से) (अपने) शरीर तथा घर की स्मृति भुला दी । दोनो आगे होकर लेने को दोडे । हलधर दौड़कर (उनके) चरणों से लिपट गये (नंद यशोदा ने) वलराम को स्नेह-पूर्वक गले से लगाया, (और) आशीर्वाद देकर इस प्रकार बोले । वलराम ! तुमने तो अच्छा किया (आ गए), लेकिन मनमोहन श्याम कहाँ रह गये ! कृष्ण की निष्ठुरता (तो) देखो, कभी पत्र भी नही भेजा । स्वयं तो वहाँ जाकर राजा हो गए, (लेकिन) बिछुड़कर हमको बहुत दुख दिया । कहो, (श्याम) कभी हमारा स्मरण करते हैं । हम तो उनके बिना बहुत दुख भोगते हैं । क्या करे, (यहाँ से) वहाँ कोई जाता नहीं, उनके बिना पल-पल युग के समान बीतता है । इसी बीच सभी ग्वाल आये (तथा) सबों ने यथाविधि भेट की (बलराम ने) किसी को नमस्कार किया, किसी को गले लगाया। फिर सब गोपियां मिलकर आईं, उन्होने प्रेमपूर्वक मंगल कामनाएं की । हरि का स्मरण करके (गोपियो की) सुध-बुध भूल गयी । उनके प्रेम को कहा नही जाता । कोई कहती है (कि) हरि ने बहुत-सी स्त्रियों से विवाह कर लिया है, (तथा) उनका परिवार बहुत बढ़ गया है ! उनको हम यह आशीर्वाद देती है (कि) (वे) सुखपूर्वक करोड़ो वर्ष जिये। कोई कहती हैं (कि) हरि ने हमें पहचाना नही; बिना पहचाने (हमने) (उन्हे) मन दे दिया । हमारा (समय) रात-दिन रोते ही व्यतीत होता है। कहो अब क्या उपाय करे । कोई कहती है (कि) गाय चराते थे द्वारिका जाकर राजा हो गये ! वे यहाँ क्यो आये, वहाँ नित्य भोग विलास करते हैं । कोई कहती है कि हरि ने शत्रुओ का नाश किया (तथा) मित्रो को बहुत सुख दिया । हमारा विरह कहाँ रह गया, जिन्होने हमे बहुत दुख दिया । कोई कहती है (कि) जो हरि की रानी हैं (उन्होंने) हरि पर कैसे विश्वास किया ? यदि कोई चतुर स्त्री होती तो उन पर विश्वास न करती । कोई (आपस मे) कहती है (कि) हमने-तुमने (उन पर) कैसे विश्वास किया; उनके लिए (अपने) कुल की लाज गंवा दी । हरि कुछ ऐसा टोना जानते हैं (जिससे) सबके मन को अपने वश मे कर लेते हैं । कोई कहती हैं (कि) हरि ने हम सब को भुला दिया, क्या कहे, कुछ कहा नही जाता ! हरि का स्मरण करके नयनो मे जल ढालती है। मन, तनिक भी, धीरज नही मानता। यह सुनकर हलधर ने धीरज धरकर कहा कि हरि निश्चित आयेगे । जब बलराम ने यह संदेश सुनाया तब मन मे थोड़ा-सा धीरज आया ! बलराम वहाँ दो महीने रहे (तथा) ब्रजवासियो से विलास करते रहे । सब से मिलकर फिर अपने पुर (मथुरा) आये, सूरदास ने (इस प्रकार) हरि का गुणगान किया ॥८॥

३४४ सूरसागर सार सटीक सुदामा चरित कंत सिधारौ मधुसूदन पै, सुनियत हैं वे मीत तुम्हारे। बाल-सखा अरु बिपति विभंजन, संकट हरन मुकुंद मुरारे। और जु अतिसय प्रीति देखियै, निज तन मन की प्रीति बिसारे। सरबस रीझि देत भक्तनि कौं, रंक नृपति काहूँ न विचारे। जद्यपि तुम संतोष भजत हौ, दरसन सुख तैं होत जु न्यारे। सूरदास प्रभु मिले सुदामा, सब सुख दै पुनि अटल न टारे ॥६॥ अर्थ-(सुदामा की स्त्री कहती है) हे पति ! मधुसूदन (कृष्ण) के पास जाओ, सुनती हूँ वे तुम्हारे मित्र हैं ! (वे तुम्हारे) बाल मित्र हैं; मुकुंद मुरारी विपत्तियों के भंजक (तथा) संकट हरने वाले है। और जो (जहां) अतिशय प्रेम देखते हैं तो (वहां) अपने तन-मन की प्रीति (भी) भुला देते है। रीझ कर भक्तों को सर्वस्व देते हैं, (वे) दरिद्र (और) नृपति किसी का विचार नही करते। यद्यपि तुम संतोष धारण करते हो, (और) (वहां न जाकर) दर्शन सुख से वंचित होते हो (फिर भी) सूरदास (कहते है) (कि) प्रभु (कृष्ण) से सुदामा मिलने पर सब सुख देकर (उससे) मिले, फिर वह सुख अटल (होगा), नही टाला (सदैव प्राप्त हुआ) ॥६॥ सुदामा सोचत पंथ चले। कैसैं करि मिलिहैं मोहिँ श्रीपति, भए तब सगुन भले। पहुँचौ जाइ राजद्वारे पर, काहूँ नहिँ अटकायौ। इत उत चितै धँस्यौ मंदिर मैं, हरि कौ दरसन पायौ। मन मैं अति आनंद कियौ हरि, बाल-मीत पहिचान। धाए मिलन नगन पग आतुर, सूरज प्रभु भगवान ॥१०॥ अर्थ-सुदामा रास्ते मे सोचते हुए चले (कि) श्रीपति (कृष्ण) हमसे कैसे मिलेगे, तब (उस समय) अच्छे सगुन हुये। (सुदामा) राजद्वार पर जा पहुँचा, कही भी रोक नही हुई। इधर-उधर देखकर मन्दिर (महल) मे प्रविष्ट हुआ। (और) हरि (कृष्ण) का दर्शन पाया। बचपन के साथी को पहचान कर हरि ने मन मे अत्यधिक आनंद माना (प्रसन्न हुए)। आतुर होकर नगे पांव (ही) मिलने के लिए सूरज के प्रभु भगवान् दौड़े ॥१०॥ दूरहिँ तैं देख्यौ वलवीर। अपने बालसखा जु सुदामा, मलिन बसन अरु छीन सरीर। पौढ़े हे परजंक परम रुचि, रुकमिनी चाँर डुलावति तीर। उठि अकुलाइ अगमने लीन्हें, मिलत नैन भरि आए नीर। निज आसन बैठारि स्याम-घन, पूछी कुसल कह्यौ मति धीर। ल्याए हौ सु देहु किन हमकौं, कहा दुरावन लागे चोर।

दरस परस हम भए सभागे, रह्यो न मन मैं एकहु पोर । सूर सुमति तंदुल चाबत हौं, कर पकर्यो कमला भई धीर ॥११॥ अर्थ—बल राम के भाई (कृष्ण) ने दूर से ही मलिन वस्त्र तथा क्षीण शरीर वाले अपने बाल मित्र सुदामा को देखा। परम रुचिकर पलंग पर लेटे थे, पास में (बैठी) रुक्मिणी चमर डुला रही थीं ! (कृष्ण ने) आकुल होकर (तथा) उठकर (सुदामा की) अगवानी की, मिलते ही (उनके) नेत्र जल से भर आये । (उसे) अपने आसन पर बिठा कर कृष्ण ने कुशल पूछी; धीर मति (सुदामा ने) बताया । (कृष्ण ने कहा) (कि) जो कुछ लाये हो उसे हमको क्यों नही देते, वस्त्र में क्या छिपाने लगे ? हम दर्शन (तथा) स्पर्श से सौभाग्यशाली हो गये, मन में एक भी पीड़ा नही रही । सूरदास (कहते हैं) (कि) सुमति (कृष्ण) को चावल चबाते देख कमला ने धीर (अधीर) होकर हाथ पकड़ लिया ॥११॥

ऐसी प्रीति की बलि जाऊँ । सिंहासन तजि चले मिलन कौं, सुनत सुदामा नाउँ । कर जोरे हरि विप्र जानि कै, हित करि चरन पखारे । अंकमाल दै मिले सुदामा, अर्धासन बैठारे । अर्धांगी पूछति मोहन सौं, कैसे हितू तुम्हारे । तन अति छीन मलीन देखियत, पाउँ कहाँ तैं धारे । संदीपन कैं हमऽरु सुदामा, पढ़े एक चटसार । सूर स्याम की कौन चलावै, भक्तनि कृपा अपार ॥१२॥

अर्थ—ऐसी प्रीति की (मैं) बलि जाता हूँ। सुदामा का नाम सुनकर (कृष्ण) सिंहासन छोड़कर मिलने चले । हरि ने (सुदामा को) ब्राह्मण जानकर हाथ जोड़े (उसे प्रणाम किया), (तथा) स्नेहपूर्वक चरण धोये । गले लगाकर सुदामा से मिले तथा अर्धासन (आधे आसन) पर (उसे) बिठाया । अर्द्धांगिनी ने कृष्ण से पूछा (कि) ये कैसे तुम्हारे मित्र हुए ? (इनका) शरीर अत्यन्त क्षीण है, मलिन दिखाई देते हैं, ये कहाँ से पधारे हैं ? (कृष्ण ने उत्तर दिया) हम और सुदामा संदीपन (ऋषि) के शिष्य हैं। एक ही पाठशाला में पढ़ते थे । सूरदास (कहते है) (कि) कृष्ण की (बात) कौन चलाये भक्तो पर (इनकी) अपार कृपा (रहती है) ॥१२॥

गुरु-गृह हम जब बन कौं जात । जोरत हमरे बदलैं लकरी, सहि सब दुख निज गात । एक दिवस बरषा भई बन मैं, रहि गए ताही ठौर । इनकी कृपा भयौ नहिं मोहिं श्रम, गुरु आए भए भोर । सो दिन मोहिं विसरत न सुदामा, जौ कीन्हौ उपकार । प्रति उपकार कहा करौं सूरजु, भाषत आप मुरार ॥१३॥

३४६ सूरसागर सार सटीक अर्थ—गुरु के घर (से) जब हम वन जाते थे, (तब) हमारे बदले (ये) सब दुख सहकर लकड़ी जोड़ते (एकत्र करते) थे । एक दिन वन में वर्षा हुई, (हम लोग) उसी स्थान पर रह गये । इनकी कृपा से मुझे श्रम नही हुआ, प्रातः होने पर गुरु (के घर) आये । उस दिन सुदामा ने जो उपकार किया वह मुझे भूलता नही ! मुरारि (कृष्ण) स्वयं कहते हैं कि प्रत्युपकार (बदले) (के रूप) मे क्या करूँ ? ।।१३।। सुदामा गृह कौँ गमन कियौ । प्रगट बिप्र कौँ कछु न जनायौ, मन मैं बहुत दियौ । वेई चीर कुचील वहै विधि, मोकौँ कहा भयौ । धरिहौँ कहा जाय तिय आगैँ, भरि भरि लेत हियौ । सो संतोष मानि मन हीँ मन, आदर बहुत लियौ । सूरदास कीन्हे करनी बिनु, को पतियाइ बियौ ।।१४।। अर्थ—सुदामा ने घर के लिए प्रस्थान किया । प्रकट रुप मे विप्र को कुछ नही बताया, (लेकिन) मन मे बहुत दिया । (सुदामा सोचते है) वही मैले वस्त्र, वही विधि मुझे हुआ ही क्या (क्या मिला) ? पत्नी के आगे जाकर क्या रखूंगा; (सुदामा का) हृदय (दुख) से भर-भर आता था । (सुदामा ने) मन-ही-मन इस (बात पर) संतोष किया (कि) (कृष्ण ने) बहुत आदर से (मुझे) लिया (मेरा बहुत आदरपूर्वक स्वागत किया) । सूरदास (कहते है) (कि) करणी किये बिना दूसरा कौन विश्वास करेगा । (सुदामा सोचते है कि कृष्ण के अतिरिक्त दूसरा ऐसा कौन है जो मुझे जैसे अकर्मण्य का विश्वास कर इतना आदर देगा) ।।१४।। सुदामा मंदिर देखि डरचौ । इहाँ हुती मेरी तनक मड़ैया, को नृप आनि छरचौ । सीस धुनै दोऊ कर मीँड़े, अंतर सोच परचौ । ठाढ़ी तिया जु मारग जोवै, ऊँचै चरन धरयौ । तोहिँ आदरचौ त्रिभुवन कौ नायक, अब क्यौँ जात फिरचौ । सूरदास प्रभु की यह लीला, दारिद दुःख हरचौ ।।१५।। अर्थ—(घर लोटने पर) सुदामा मंदिर (अपना घर) देखकर डर गया ! यहां मेरी छोटी सी मड़इया थी, किस नृप ने आकर छल किया (छीन लिया) । (वे) सिर घुमाते हैं, दोनो हाथ मलते है, मन के भीतर सोचने लगे । चरणो को ऊँचा करके (ऊंचे स्थान पर खड़ी होकर) स्त्री खडी हुई मार्ग जोह रही है । (उसने कहा) त्रिभुवन के नायक ने आदर दिया अब (घर से) क्यो वापस जाते हो ! सूरदास (कहते हैं) (कि) यह प्रभु (कृष्ण) की लीला है कि (उन्होंने) (समस्त) दुख-दरिद्रता को हर लिया ।।१५।। हौँ फिरि बहुरि द्वारिका आयौ । समुझि न परी मोहिँ मारग की, कोउ बूझौ न बतायौ ।

द्वारिका चरित ३४७ कहिहैं स्याम सत्त इन छाँड्यौ, उतौ राँक ललचायौ । तृन की छहैं मिटी निधि मांगत, कौन दुखनि सौं छायौ । सागर नहीं समीप कुमति कैं, विधि कह अंत भ्रमायौ । चितवत चित्त विचारत मेरौ, मन सपनैं डर छायौ । सुरतरु, दासी, दास, अस्व, गज, बिभौ विनोद बनायौ । सूरज़ प्रभु नंद-सुवन मित्र व्है, भक्तनि लाड़ लड़ायौ ॥१६॥ अर्थ-(अपनी मड़ैया के स्थान पर सोने का आवास बना देखकर भौचक्का सुदामा सोचता है।) क्या मैं लौटकर फिर द्वारिका आ गया ! (लगता है) मार्ग की (स्थिति) मुझे समझ नही पड़ी । न किसी से (मैंने) पूछा, न किसी ने (स्वयमेव) बताया । (मुझे पुनः आया देख) कृष्ण कहेंगे (कि) इन्होंने सत्य छोड़ दिया, वहाँ (यह) दरिद्री था, (तभी तो) ललचा गया, (लौट आया) । ऐश्वर्य मांगने पर तृण की छाया भी मिट गयी (कृष्ण के पास समृद्धि के लालच से गया, लौटा तो फूस का छप्पर भी गायब) उसे कितनी कठिनाई से मैंने छाया था । (मुझ) कुमति के लिये समीप मे सागर (भी) नही (कि जाकर डूब मरूँ), अन्त मे विधाता ने मुझे क्यो भरमाया ? (कहाँ पहुँचा दिया) । (सोने का आवास) देखते हुए चित्त मे सोचता है; मन में स्वप्न का (सा) डर छा गया ( मैं डरा, कही सपना तो नही देख रहा हूँ ! ) (यहाँ तो) वैभव का कौतुक बना है- (जहां मड़ैया थी वहाँ अब) कल्पवृक्ष, दासी, घोडे, हाथी (हैं) सूरज़ (कहते हैं) (कि) नन्द के प्रभु (कृष्ण) मित्र होकर (अनुकूल होने पर), (इसी प्रकार) भक्तों का लाड़ लड़ाया करते है (उन पर प्रेम का प्रदर्शन किया करते है) ॥१६॥ कहा भयौ मेरौ गृह माटी कौ । हौं तौ गयौ गुपालहिं भेंटन, और खरच तंदुल गाँठी कौ । विनु ग्रीवा कल सुभग न आन्यौ, हुतौ कमंडल दृढ़ काठी कौ । घुनौ बाँस जुत बुनौ खटोला, काहु कौ पलँग कनक पाटी कौ । नूतन छीरोदक जुवती पै, भूषन हुतौ न लोह माटी कौ । सूरदास प्रभु कहा निहोरौ, मानत रंक त्रास टाटी कौ ॥१७॥ अर्थ-मेरे मिट्टी के घर का क्या हुआ ? (वह कहाँ चला गया !) मैं तो गोपाल से भेट करने गया था और (मैंने) गांठ के (अपने पास के) (चावल) भी खर्च किए (गवाँ दिए) । विना गले का टूटा घडा (कलसु भगन ?) (मैं) लाया (था) कड़ी लकड़ी (काठी) का कमंडल (मेरे पास ) था (तथा) घुने हुए बाँस का विना हुआ खटोला (जहां) था (उसी घर मे अब) सोने की पारी वाला किसी का पलंग (पड़ा) है । (जिस) युवती (पत्नी) के पास लोहे (अथवा) मिट्टी के आभूषण न थे (उसी के पास अब) नयी रेशमी वस्त्र है । सूरदास के प्रभु से क्या प्रार्थना करूँ ? (जिस) दरिद्री

३४८ सूरसागर सार सटीक को झोपडी (टाटी) का कष्ट है (जिसके पास झोपड़ी भी नही है) उसे भी (प्रभु) अंगीकार करते हैं (उसकी चिन्ता भी उन्हे रहती है) ॥१७॥ भूलौ द्विज देखत अपनौ घर । औरहिं भाँति रची रचना रुचि, देखतही उपज्यौ हिरदै डर । कै वह ठोर छुड़ाइ लियौ किहुँ, कोऊ आइ बस्यौ समरथ नर । कै हौं भूलि अनतहीँ आयौ, यह कैलास जहाँ सुनियत हर । बुध-जन कहत दुबल घातक बिधि, सो हम आज लही या पटतर । ज्यों नलिनी बन छाँड़ि वसै जल, दाहै हेम जहाँ पानी-सर । पाछै तैं तिय उतरि कह्यौ पति, चलिए द्वार गह्यौ कर सौं कर । सूरदास यह सब हित हरि कौ, द्वारैं आइ भयौ जु कलपतर ॥१८॥ अर्थ—ब्राह्मण (सुदामा) अपना घर देखकर भ्रमित हो गया (वहां तो) और ही तरह की रुचिकर रचना रची थी, जिसे देखते ही (सुदामा के) हृदय मे डर उत्पन्न हुआ । या तो किसी ने वह स्थान (उसका पुराना घर) छीन लिया (और) (वहाँ पर) आकर कोई समर्थ व्यक्ति बस गया (किसी बलवान् ने कब्जा कर लिया) या तो मैं भूल कर अन्यत्र (ही) आ गया (हूँ), यह (कही) कैलाश तो नही है जहाँ शिव (का निवास) सुना जाता है । बुद्धिमान लोग कहते हैं कि विधाता दुर्बलो का घातक है उसका नमूना आज पा लिया (देखा) । जैसे कमलिनी वन छोड़कर जल मे बसती है, (लेकिन) जहाँ (वहाँ) पानी के तालाब मे (भी) उसे हिम दग्ध करता है ! पीछे से (सुदामा की) पत्नी उतरकर आयी (और) हाथ-से-हाथ पकडकर पति से बोली (कि) दरवाजे (घर) के (भीतर) चलिए । सूरदास (कहते है) (कि) यह सब हरि का स्नेह है (जिसके फलस्व- रूप द्वार पर आकर कल्पवृक्ष लग गया है !) ॥१८॥ कैसैँ मिले पिय स्याम सँघाती । कहियै कत कौन बिधि परसे, बसन कुचील छीन अति गाती । उठिकै दौरि अंक भरि लीन्हौ, मिलि पूछी इत-उत कुसलाती । पटतैँ छोरि लिए कर तंदुल, हरि समीप रुकमिनी जहाँ ती । देखि सकल तिय स्याम-सुँदर गुन, पट दै ओट सबै मुसक्यातीँ । सूरदास प्रभु नवनिधि दीन्ही, देते और जो तिय न रिसातीँ ॥१९॥ अर्थ—हे प्रिय ! मित्र साथी श्याम कैसे मिले । हे पति ! कहिये, (कृष्ण ने) मैले वस्त्रो वाले तुम्हारे अत्यन्त क्षीण शरीर को कैसे स्पर्श किया ? सुदामा ने कहा (कृष्ण ने) उठकर-दौडकर (मुझे) गले लगाया, (तथा) मिलकर यहाँ-वहाँ की (सबकी) कुशलता पूछी । वस्त्र से खोलकर हाथ मे चावल ले लिया, जहां (वहाँ) हरि के पास (ही) रुक्मनि भी थी । (उस समय) सभी स्त्रियां श्याम सुन्दर (कृष्ण) के गुणो को देखकर वस्त्र की ओट मे मुसकराती थी । सूरदास (कहते है) (कि) प्रभु (कृष्ण) ने

द्वारिका चरित ३४६ नव-निधियां दी, (वे) और भी देते यदि (उनकी) पत्नी (रुक्मिणी) नाराज न होती ॥१६॥ हरि बिनु कौन दरिद्र हरै । कहत सुदामा सुनि सुन्दरि, हरि मिलन न मन बिसरै । और मित्र ऐसी गति देखत, को पहिचान करै । विपत्ति परैं कुसलात न बूझै, बात नहीं बिचरै । उठि भेटे हरि तंदुल लीन्हे, मोहिं न वचन फुरै । सूरदास लछि दई कृपा करि, टारी निधि न टरै ॥२०॥ अर्थ—हरि के बिना दरिद्रता कौन दूर करे ? सुदामा कहते हैं (कि) हे सुन्दरी, सुनो ! हरि का मिलना मन से भूलता नही । (मेरी) जैसी गति देखकर दूसरे मित्र क्या मुझे पहचानते ? विपत्ति पड़ने पर (कोई) कुशलता (भी) नही पूँछते (तथा) बातचीत (भी) नही करते । हरि (कृष्ण) ने उठकर भेट (और) चावल ले लिया मुझसे (तो) वचन तक स्फुरित नही हुआ (मैं तो बोल भी न पाया) । सूरदास (कहते हैं) (कि) (कृष्ण ने) कृपा करके (इतनी) लक्ष्मी (सम्पत्ति) दी, कि (वह) निधि टाले नही टलती (खर्च करने पर भी समाप्त नही होती) ॥२०॥ व्रजनारी पथिक संवाद तब तैं बहुरि न कोऊ आयौ । वहै जु एक बेर ऊधौ सौं, कछु संदेसौ पायौ । छिन-छिन सुरति करत जदुपति की, परत न मन समुझायौ । गोकुलनाथ हमारैं हित लगि, लिखि हूँ क्यौं न पठायौ । यहै विचार करौं धौं सजनी, इती गहरु क्यौं लायौ । सूर स्याम अब वेगि न मिलहू, मेघनि अम्बर छायौ ॥२१॥ अर्थ—(जब से कृष्ण गए) तब से (वहां से) लौटकर कोई नही आया । वहीं एक बार ऊधो से (हमने) कुछ संदेश पाया था । हर क्षण यदुपति (कृष्ण) की स्मृति करती हूँ; मन समझाते नही बनता । गोकुलपति (कृष्ण) ने हमारे हित के लिए लिखकर भी (पत्र) नही भेजा । हे सखी ! यही विचार करती (रहती) हूँ (कि) इतना विलंब क्यों किया । सूर के स्याम (कृष्ण) अब शीघ्र (ही) (क्यों) नही मिलते, (अब तो) आकाश मे बादल छा गये हैं ॥२१॥ बहुरौ हो ब्रज बात न चाली । वहै सु एक बेर ऊधौ कर, कमल नयन पाती दै घाली । पथिक तिहारे पा लागति हौं, मथुरा जाहु जहाँ बनमाली । कहियौ प्रगट पुकारि द्वार ह्वै, कालिंदी फिरि आयौ काली । तब वह कृपा हुती नंदनंदन, रुचि रुचि रसिक प्रीति प्रतिपाली । माँगत कुसुम देखि ऊँचे द्रुम, लेत उछंग गोद करि आली ।

३५० सूरसागर सार सटीक जब वह सुरति होति उर अंतर, लागत काम वान की भाली। सूरदास प्रभु प्रीति पुरातन, सुमिरत दुसह सूर उर साली ॥२२॥ अर्थ-हे (पथिक) ! फिर (कृष्ण) ब्रज की बात नही चलायी। वही एक वार कमल नेत्र (कृष्ण) ने उद्धव के हाथ पत्रिका देकर भेजी थी। हे पथिक ! तुम्हारे पैर लगती हूँ; मथुरा जाओ जहां वनमाली (कृष्ण) हैं। द्वार पर से प्रत्यक्ष पुकार कर कहना (कि) यमुना में (कालीदह मे) पुनः काली (नाग) आ गया ! उस समय (कृष्ण की) वैसी (गहरी) कृपा थी, (उन) रसिक (कृष्ण ने) रुचि लेकर प्रेम का निर्वाह किया था। (हे सखी !) ऊँचे वृक्ष मे लगे पुष्प को मांगने पर गोद मे उठाकर अपने उत्संग (ऊपरी भाग, कंधो पर) बिठा लेते हैं (ताकि हम स्वयं अपने हाथ से तोड़ ले) ! जब हृदय मे वह स्मृति होती है (वह घटना याद आती है) तो काम के बाण की नोक (भाली) चुभती हैं। सूरदास (कहते हैं) (कि) प्रभु (कृष्ण) की प्रीति पुरानी (है) स्मरण करते ही असह्य पीड़ा (शूल) हृदय मे सालती (चुभती) है ॥२२॥ तुम्हरे देस कागद मसि खूटी। भूख प्यास अरु नीँद गई सब, विरह लरी तन लूटी। दादुर मोर पपीहा बोले, अवधि भई सब झूठी। पाछैं आइ तुम कहा करोगे, जब तन जैहै छूटी। राधा कहति संदेश स्याम सौं, भई प्रीति की टूटी। सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन बिनु, सखी करति है कूटी ॥२३॥ अर्थ- (जान पड़ता है) तुम्हारे देश में कागज (और) स्याही समाप्त हो गयी। (हमारी) भूख, प्यास, नींद, सब चली गई, विरह ने शरीर को लूट लिया। दादुर, मोर (तथा) पपीहा बोलने लगे; आने की अवधि सब झूठी हो गयी। बाद में आकर तुम क्या करोगे, जब शरीर छूट जायेगा। राधा श्याम से संदेश कहती है (कि) प्रेम खंडित हो रहा है। सूरदास के प्रभु ! तुम्हारे मिलन के विना सखियां (तुम्हारे विषय मे) कूट करती हैं (उपहास करती हैं) ॥२३॥ पथिक कह्यौ ब्रज जाइ, सुने हरि जात सिंधु तट। सुनि सब अँग भए सिथिल, गयौ नहिँ बज्र हियौ फट। नर नारी घर-घरनि सबै, यह करति बिचारा। मिलिहैं कैसी भाँति हमैं, अब नन्द कुमारा। निकट वसत हुती आस, कियौ अब दूरि पयाना। विना कृपा भगवान, उपाइ न सूरज आना ॥२४॥ अर्थ-(किसी) पथिक ने ब्रज जाकर कहा (कि), (उसने) सुना है (कि) हरि सिंधु के तट (द्वारिका) जा रहे है। (यह) सुनकर (गोपियो के) सब अंग शिथिल हो गये, (किन्तु) (उनका) वज्र (सा) (कठोर) हृदय फट नही गया। सभी घरों मे नर (तथा) नारियां यहो विचार करती है (कि) अब नन्द-कुमार (कृष्ण) किस तरह

द्वारिका चरितं ३५३ मिलेंगे। (जब वे) निकट बसते थे तो मिलने की (कुछ) आशा थी, (किन्तु) अब तो (उन्होंने) दूर प्रस्थान कर दिया। कृष्ण की कृपा के बिना सूर अब कोई दूसरा उपाय नही ॥२४॥ नैना भए अनाथ हमारे । मदनगुपाल उहाँ तैं सजनी, सुनियत दूरि सिधारे । वै समुद्र हम मीन बापुरी, कैसेँ जीवैँ न्यारे । हम चातक वै जलद-स्याम-घन, पियतिँ सुधा-रस प्यारे । मधुरा बसत आस दरसन की, जोइ नैन मग हारे । सूरदास हमकौँ उलटी बिधि, मृतकहूँ, तैँ पुनि मारे ॥२५॥ अर्थ-गोपियां सोचती हैं कि हमारे नेत्र अनाथ हो गये। सुनती हूँ (कि) मदन गोपाल वहाँ से (भी) (कही) दूर चले गये। वे (कृष्ण) समुद्र हैं, हम वेचारी मछलियां हैं, (उनसे) अलग (होकर) कैसे जीवित रहे। हम चातक हैं, वे श्याम बादल हैं, (हम) प्रिय का अमृत-रस पीती रहती हैं। मथुरां में बसते हुए दर्शन की आशा थी, (किन्तु) रास्ता देखते नेत्र (अब) हार गये। सूरदास (कहते हैं) (कि) विधाता ने हमारे लिए उल्टी (स्थिति) (पैदा कर दी), मरे हुए को पुनः मारा (कृष्ण बिरह) में हम मरी सी थी ही, विधाता को इससे संतोष न हुआ, उसने हमें मार ही डाला ॥२५॥ उती दूर तैँ को आवै री । जासौँ कहि संदेस पठाऊँ, सो कहि कहन कहा पावै री । सिंधु कूल इक देस बसत है, देख्यौ सुन्यौ न मन धावै री । तहँ नव-नगर जु रच्यौ नंद-सुत, द्वारावति पुरी कहावै री । कंचन के बहु भवन मनोहर, रंक तहाँ नहिँ त्रन छावै री । ह्वाँ के बासी लोगनि कौँ क्यौं, ब्रज कौ बसिबौ मन भावै री । बहु बिधि करतिँ विलाप विरहिनी, बहुत उपायनि चित लावैँ री । कहा करौँ कहँ जाऊँ सूर प्रभु, को हरि पिय पै पहुँचावै री ॥२६॥ अर्थ - हे सखी ! उतनी दूर से (द्वारिका से) (भला) कौन आता है; जिससे कह कर (हम) (कृष्ण के पास) संदेश भेजे, वह (विधि) कहो, (हम) (अपना संदेश) कैसे कह पाये । समुद्र के किनारे एक देश बसता है । (उसे) न तो देखा है न सुना है (और) न मन (वहाँ तक) दौड़ पाता है (मन द्वारिका की कल्पना ही नही कर पाता) वहाँ नन्द के पुत्र (कृष्ण ने) नवीन नगर बसाया है जो द्वारिका पुरी कहलाता है। वहाँ सोने के बहुत से मनोहर भवन हैं, (वहाँ) (कोई व्यक्ति) दरिद्र (ही) नही है (जो) तृण से घर छाये । वहाँ के निवासी लोगो को ब्रज मे बसना क्यों अच्छा लगे । विरहिणियां बहुत प्रकार से विलाप करती हैं तथा बहुत (से) उपायों को (सोचने मे) चित्त लगाती हैं। सूर के प्रभु (को पाने के लिए) क्या करें, कहाँ जाये; हरि प्रिय (कृष्ण) के पास कौन पहुँचाए ॥२६॥

३५२ सूरसागर सार सटीक हों कैसौँ के दरसन पाऊँ । सुनहु पथिक उहिँ देस द्वारिका, जौ तुम्हरैं सँग जाऊँ । बाहर भीर बहुत भूपनि की, बूझत वदन दुराऊँ । भीतर भीर भोग भामिनि की, तिहिँ ठाँ काहि पठाऊँ । बुधि बल जुक्ति जतन करि उहिं पुर, हरि पिय पै पहुँचाऊँ । अब वन वसि निसि कुंज रसिक बिनु, कौनैं दसा सुनाऊँ । श्रम कै सूर जाउँ प्रभु पासहिं, मन मैं भलैं मनाऊँ । नव-किसोर मुख मुरलि बिना, इन नैननि कहा दिखाऊँ ॥२७॥ अर्थ—मैं कैसे कृष्ण का दर्शन पाऊँ । हे पथिक ! सुनो, यदि तुम्हारे साथ उस द्वारिका देश को चलूं (तो) (वहाँ) बाहर (कृष्ण के प्रासाद के बाहर) बहुत से राजाओ की भीड (होगी); (उनके) पूछने पर (लज्जा से) मुख छिपा लूंगी (महल के) भीतर स्त्री (पत्नी-रुक्मिणी) के सुख-विलास ("भोग") की प्रचुरता (है), उस स्थान पर किसे भेजूँ । बुद्धि-बल (तथा) युक्तिपूर्ण यत्न करके उस नगर मे हरि प्रिय (कृष्ण) के पास अपना (संदेश) (कैसे) भेजूँ । (राधिका !) अब रसिक (कृष्ण) के बिना वन मे रहते हुए कुंज मे रात (के समय) अपनी दशा किसे सुनाऊँ । मुरली संयुक्त नव किशोर (कृष्ण) के मुख के बिना इन नेत्रो को क्या दिखाऊँ ? ॥२७॥ तातैं अति मरियत अपसोसनि । मधुराहू तैं गए सखी री, अब हरि कारे कोसनि । यह अचरज सु वड़ौ मेरैं जिय, यह छाँड़नि, वह पोषनि । निपट निकाम जानि हम छाँड़ी, ज्यौं कमान बिन गोसनि । इक हरि के दरसन बिनु मरियत, अरु कुविजा के ठोसनि । सूर सु जरनि कहा उपजी जो, दूरि होति करि ओसनि ॥२८॥ अर्थ—हे सखी ! अब मथुरा से भी काले कोसो (बहुत दूर) चले गये हैं, इसीलिए अफसोस (दुःख) से बहुत मर (बहुत कष्ट सह) रही हूँ। मेरे जी मे यह बड़ा आश्चर्य है कि (कहाँ तो) (कृष्ण का) वह पालन-पोषण (करना), (और कहाँ) अब इस प्रकार छोड़ देना ! बिना धनुपकोटि (दोनो नोको) के बिना जैसे धनुष कमान की भाँति उन्होंने हमे बिल्कुल निकम्मी समझकर छोड दिया है, एक तो हरि के दर्शन विना (मैं) मरती हूँ दूसरे कुब्जा के डाह (कुढन से) । सूरदास कहते हैं कि गोपियां कह रही हैं कि जो जलन उत्पन्न हो गई क्या वह ओस से दूर हो सकती ? ॥२८॥ माई री कैसे बनै हरि कौ ब्रज आवन । कहियत है मधुबन तैं सजनी, कियौ स्याम कहुँ अनत गवन । अगम जु पंथ दूरि दच्छिन दिसि, तहँ सुनियत सखि सिंधु लवन । अब हरि ह्वाँ परिवार सहित गए, मग मै मार्यौ कालजवन ।

निकट बसत मतिहीन भईं हम, मिलिहुँ न आईँ सुत्यागि भवन । सूरदास तरसत मन निसि दिन, जदुपति लौं लै जाइ कवन ॥२९॥ अर्थ—हे सखी ! हरि का ब्रज लौटना कैसे संभव हो ? सखी, (लोग) कहते हैं (कि) मधुबन से स्याम ने कही अन्यत्र गमन किया है। जो (जहाँ का) रास्ता अगम (है), (जो) दूर दक्षिण दिशा मे (स्थित है), सखी ! सुनते हैं वहां लवण का समुद्र है। अब हरि वहां परिवार सहित चले गये, (और) (वहां जाते समय) मार्ग मे (उन्होने) काल यवन (राक्षस) को मारा। पास बसते समय (जब कृष्ण मथुरा मे ही थे), (उस समय) हमारी अकल मारी गई (थी), (नही तो) भवन त्याग कर (उनसे) मिल न आती । सूरदास (कहते हैं) (कि) रात-दिन मन तरसता है, यदुपति (कृष्ण) के पास तक (अब) कौन ले जाय ॥२९॥ सुनियत कहुँ द्वारिका बसाई । दच्छिन दिशा तीर सागर कैं, कंचन कोट गोमती खाई । पंथ न चलै संदेस न आवै, इती दूर नर कोऊ न जाई । सत जोजन मथुरा तैं कहियत, यह सुधि एक पथिक पै पाई । सब ब्रज दुखी नंद जसुदा हू, इक टक स्याम राम लव लाई । सूरदास प्रभु के दरसन बिनु, भई विदित ब्रज काम दुहाई ॥३०॥ अर्थ—सुनती हूँ (कृष्ण ने) कही द्वारिका बसायी है। दक्षिण दिशा में सागर के किनारे (वहाँ) सोने के किले (तथा), (किलों की सुरक्षा के लिए) गोमती की नहर (बनी है), वह रास्ता नही चलता (उस तरफ पथिक नही जाते), (वहाँ से) संदेश (भी) नही आता (तथा) इतनी दूर कोई मनुष्य नही जाता। मथुरा से (वह नगरी) एक सौ योजन कही जाती है, यह खबर एक पथिक से (हमे) मिली। सब ब्रज (वासी) (तथा) नंद-यशोदा (भी) दुखी हैं; (वे) एकटक श्याम और बलराम मे ध्यान लगाये है। सूरदास कहते हैं (कि) प्रभु (कृष्ण) के दर्शन के बिना ब्रज मे कामदेव की दुहाई विदित हुई (कामदेव के प्रताप का डंका बज गया) ॥३०॥ बीर बटाऊ पाती लीजौ । जब तुम जाहु द्वारिका नगरी, हमरे रसाल गुपालहिं दीजौ । रंगभूमि रमनीक मधुपुरी, रजधानी ब्रज को सुधि कीजौ । छार समुद्र छाँड़ि किन आवत, निर्मल जल जमुना कौ पीजौ । या गोकुल की सकल ग्वालिनी, देतिं असीस बहुत जुग जीजौ । सूरदास प्रभु हमरे कौतैं, नंद नंदन के पाईं परीजौ ॥३१॥ अर्थ—भाई पथिक ! (यह) पत्रिका लीजिए। जब तुम द्वारिका नगरी जाना तो (इसे) हमारे रसिक गोपाल को देना। (कहना कि) ब्रज की राजधानी रमणीक रंगभूमि मथुरा, की खबर (तो) लो। खारे समुद्र को छोड़कर क्यो नही आते; (यहाँ आकर) यमुना के स्वच्छ जल को पिएं ! इस गोकुल की सभी ग्वालिनियां (तुम्हे) २५

३५४ सूरसागर सार सटीक आशीर्वाद देती हैं (कि) बहुत जुगो तक जियो । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) (कि) (हे पथिक!) हमारी तरफ से नद के पुत्र (कृष्ण) के पैर पड़ना (प्रणाम करना) ॥३१॥ रुक्मिणी कृष्ण संवाद रुकमिनी बूझति हैं गोपालहिं । कहौ बात अपने गोकुल की, कितिक प्रीति ब्रजबालहिं । तब तुम गाइ चरावन जाते, उर धरते बनमालहिं । कहा देखि रीझे राधा सौं, सुंदर नैन विसालहिं । इतनी सुनत नैन भरि आए, प्रेम विवस नँदलालहिं । सूरदास प्रभु रहे मौन ह्वै, घोष बात जनि चालहिं ॥३२॥ अर्थ—रुक्मिणी कृष्ण से पूछती हैं (कि) (जरा) अपने गोकुल की बात (तो) कहो (और बताओ) ब्रज-बालाओं से (तुम्हारा) कितना प्रेम था । तब तुम गाय चराने जाते थे, हृदय पर वनमाल धारण करते थे । क्या देखकर (तुम) सुन्दर विशाल नेत्रो वाली राधा पर रीझे थे (उसकी विशेषताएं तो बताओ) । इतना सुनकर प्रेम से विवश कृष्ण के नेत्र भर आये । सूरदास (कहते है कि) प्रभु (कृष्ण) मौन हो रहे। (सिर्फ यही कहा) अहीरो की वस्ती (ब्रज) की बात (चर्चा) मत चलाओ ! ॥३२॥ रुकमिनी मोहिं निमेष न बिसरत, वे ब्रजवासी लोग । हम उनसौं कछु भली न कीन्हीं, निसि-दिन मरत वियोग । जदपि कनक मनि रची द्वारिका, विषय सकल संभोग । तद्यपि मन जु हरत बंसी-वट, ललिता कै संजोग । मैं ऊधौ पठयौ गोपिनि पै, दैन संदेसौ जोग । सूरदास देखत उनकी गति, किहिं उपदेसै सोग ॥३३॥ अर्थ—(कृष्ण कहते हैं) हे रुक्मिणी ! मुझे क्षण भर भी ब्रजवासी-जन नही भूलते । हमने उनके साथ (अर्थात् उनकी) कुछ (भी) भलाई नही की; (वे) रात-दिन (मेरे) वियोग मे मरते हैं (दुख सहते हैं) । यद्यपि कनक तथा मणियों से द्वारिकां बनी है, सुख के सभी विषय (उपकरण) (वहाँ उपलब्ध हैं), तब भी वंशी-वट (के नीचे) ललिता का संयोग (सुख) मन को हर लेता है । मैंने ऊधो को गोपियो के पास योग का संदेश देने को भेजा था । सूरदास (कहते हैं कि) उन (गोपियों के प्रेम) की गति देखते हुए कौन शोक (युक्त) (योग का) उपदेश दे ? ॥३३॥ रुकमिनी मोहिं ब्रज बिसरत नाहीँ । वह क्रीड़ा वह केलि जमुन तट, सघन कदम की छाहीं । गोप बधुनि की भुजा कंध धरि, विहरत कुंजनि माहीं । और विनोद कहाँ लगि वरनौं, वरनत वरनि न जाहीं ।

द्वारका चरित ३५५ जद्यपि सुख निधान द्वारावति, गोकुल कें सम नाहीं । सूरदास घनस्याम मनोहर, सुमिरि-सुमिरि पछिताहीं ॥३४॥ अर्थ-हे रुक्मिणी ! मुझे ब्रज भूलता नही। वह क्रीडा, यमुना तट की वह केलि, (तथा) सघन कदंब (के नीचे) की (वह) छाया (हम कैसे भूल जायें)। गोप- बन्धुओं की भुजाएँ कंधो पर रखकर कुंजों (के बीच) विहार करना-और विनोद कहां तक वर्णित करूँ, वर्णन करने पर (भो) वर्णित नही हो पाते। यद्यपि द्वारिका सुख का निधान (है), (फिर भी) गोकुल के समान नही (है)। सूरदास (कहते हैं कि) मनोहर घनश्याम (उन्हें) स्मरण कर करके पछताते हैं ॥३४॥ रुकमिनि चलौ जन्म भूमि जाहिँ । जद्यपि तुम्ह्रौ विभव द्वारिका, मथुरा कैँ सम नाहिँ । जमुना कैँ तट गाइ चरावत, अमृत जल अँचवाहिँ । कुंज केलि अरु भुजा कंध धरि, सीतल द्रुम की छाँहिँ । सरस सुगंध मंद मलयानल, बिहरत कुंजन माहिँ । जो क्रीड़ा श्री बृन्दावन मैँ, तिहूँ लोक मैँ नाहिँ । सुरभी ग्वाल नंद अरु जसुमति, मम चित तैँ न टराहिँ । सूरदास प्रभु चतुर सिरोमनि, तिनकी सेव कराहिँ ॥३५॥ अर्थ-हे रुक्मिणी ! चलो, (हम) जन्म-भूमि चलें। यद्यपि द्वारिका में तुम्हारा वैभव (है), (फिर भी) (वह) मथुरा की समता का नहीं (है)। (मथुरा में तो हम) यमुना के तट पर गाय चराते थे (तथा) (यमुना के) अमृत (जैसे) जल का आचमन (पान) करते थे। (वहाँ हम) कुंजो मे केलि (करते थे), (अपनी) भुजाओ को (गोपियो के) कंधो पर रखकर वृक्षों की शीतल छाया मे (बिहार करते थे)। उत्तम सुगन्ध-युक्त मंद मलयानल मे कुजो मे घूमते थे। जो क्रीड़ाएं वृन्दावन मे (की), (वे) तीनो लोक मे (प्राप्त) नही (है)। गाये, ग्वाल, नद और यशोदा मेरे चित्त से नही टलते; सूरदास के प्रभु चतुर शिरोमणि (हैं) उन (सब) की सेवा किया करते हैं ॥३५॥ कुरुक्षेत्र में कृष्ण-ब्रजवासी भेंट ब्रज बासिनि कौ हेतु, हृदय मैँ राखि मुरारी । सब जादव सौँ कह्यौ, बैठि कै सभा मझारी । बड़ी परब रवि-ग्रहन, कहा कहौँ तासु बड़ाई । चलौ सकल कुरुखेत, तहाँ मिलि न्हैयें जाई । तात, मात, निज नारि लिए, हरि जू सब संगा । चले नगर के लोग, साजि रथ तरल तुरंगा । कुरुच्छेत्र मैँ आइ, दियौ इक दूत पठाई । नद जसोमति गोप ग्वाल, सब सूर बुलाई ॥३६॥