सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
मर्मशारीरम् ।
The diagram illustrates the locations of vital points (Marmas) on the human back and legs. The labels are as follows:
- Right side labels (from top to bottom):
- विधुरम् (Vidhura)
- कृकारिका (Krukarika)
- अंसः (Asa)
- अंसफलकः (Asaphalaka)
- बृहती (Bhuti)
- कूपरम् (Kupa)
- पार्श्वसन्धि (Parshvasandhi)
- नितम्बः (Nitamba)
- कुकुन्दरे (Kukundra)
- क्रीकतस्त्रणम् (Krikatrasna)
- गुदम् (Gudam)
- कूर्व (Kurva)
- आणिः (Agni)
- जानु (Janu)
- इन्द्रवस्ति (Indravasti)
- गुल्फः (Gulfa)
- Left side labels (from top to bottom):
- कृकारिका (Krukarika)
- अंसः (Asa)
- अंसफलकः (Asaphalaka)
- बृहती (Bhuti)
- कूपरम् (Kupa)
- पार्श्वसन्धि (Parshvasandhi)
- नितम्बः (Nitamba)
- मणिबन्धः (Manibandha)
- क्रीकतस्त्रणम् (Krikatrasna)
- उर्वी (Urva)
- आणिः (Agni)
- जानु (Janu)
- इन्द्रवस्ति (Indravasti)
- गुल्फः (Gulfa)
This image shows a blank page with a light beige or off-white background. There are several small, dark specks scattered across the surface, which appear to be scanning artifacts or dust. A faint vertical line is visible along the right edge of the page. The overall texture is slightly grainy, typical of a scanned document.
This image shows a blank, aged page from a book or document. The paper has a light beige or off-white color with a slightly textured appearance. There are subtle signs of aging, including faint yellowing and some minor discoloration, particularly along the left edge where it might have been bound. The overall surface is smooth but shows the natural grain of the paper. No text, illustrations, or other markings are present on the page.
मर्मशारीरम् ।
The diagram illustrates the 'Marmashariram' (Vital Points and Organs) of the human body. The labels are as follows:
- Head and Neck:
- अश्वघातः (Ashvaghata) - Forehead
- स्वपनी (Svapani) - Temple
- अपाङ्गः (Apanga) - Side of head
- मन्या (Manya) - Side of head
- सिरासातृका (Sirasatruka) - Side of head
- नीला (Nila) - Side of head
- आवर्तो (Aavarto) - Back of head
- उदक्षेत्रो (Udaksheetro) - Back of head
- शङ्खः (Shanka) - Side of head
- मन्या (Manya) - Side of head
- सिरासातृका (Sirasatruka) - Side of head
- नीला (Nila) - Side of head
- Upper Body:
- अपस्तम्भः (Apastambha) - Neck
- स्तनरोहितम् (Stanarohitam) - Right breast
- उर्वी (Urvī) - Right breast
- स्तनमूलम् (Stanamoolam) - Right breast
- कक्षाधरः (Kshadhar) - Right shoulder
- हृदयम् (Hridayam) - Right heart
- उर्वी (Urvī) - Right heart
- अगणिः (Agaṇi) - Right arm
- नाभिः (Nabhi) - Navel
- बस्तिः (Basti) - Right arm
- इन्द्रबस्तिः (Indrabasti) - Right arm
- माणबन्धः (Maṇabandha) - Right arm
- कूर्चशिरः (Kurchasira) - Right arm
- कूर्चः (Kurcha) - Right arm
- तलहृदयम् (Talahridayam) - Right arm
- रक्षिमम् (Rakshimam) - Right arm
- उर्वी (Urvī) - Right arm
- आगणिः (Agaṇi) - Right arm
- जानु (Janu) - Right leg
- Lower Body:
- लोहिताक्षम् (Lohitaaksham) - Left breast
- विटपम् (Vitapam) - Left breast
- मणिबन्धः (Maṇibandha) - Left arm
- कूर्परम् (Koorparam) - Left arm
- स्तनमूलम् (Stanamoolam) - Left breast
- उर्वी (Urvī) - Left breast
- स्तनरोहितम् (Stanarohitam) - Left breast
- अपस्तम्भः (Apastambha) - Left neck
- नीला (Nila) - Left side of head
- सिरासातृका (Sirasatruka) - Left side of head
- मन्या (Manya) - Left side of head
- अपाङ्गः (Apanga) - Left side of head
- स्वपनी (Svapani) - Left temple
- अश्वघातः (Ashvaghata) - Left forehead
- गुल्फः (Gulfa) - Left foot
- जानु (Janu) - Left leg
- आगणिः (Agaṇi) - Left leg
- तलहृदयम् (Talahridayam) - Left leg
- कूर्चः (Kurcha) - Left leg
- माणबन्धः (Maṇabandha) - Left leg
- इन्द्रबस्तिः (Indrabasti) - Left leg
- बस्तिः (Basti) - Left leg
- नाभिः (Nabhi) - Navel
- अगणिः (Agaṇi) - Left leg
- गुल्फः (Gulfa) - Left foot
४७
गारीरस्थानम्
३६६
अस्थिसन्धयः २१०
(दशोत्तरे द्वे शते)
सन्धिसंख्यास्थिराः
चेष्टावन्तः
| १ शाखासु | = ६८ |
|---|---|
| २ कोष्ठे | = ५६ |
| ३ मूर्धनि | ८३ |
| २१० = |
| ० | ६८ | |
|---|---|---|
| ५६ | ३ | |
| ७३ | + | १० |
| १२६ | ८१ |
(१) शाखासु—(६८)
अस्थिसन्धिविस्तारवर्णनम्
एकस्मिन् सन्धिन् एकैकस्यां पादाङ्गुल्यां ३ × ४ = १२
सन्धिसंख्या
(२) अन्तराधी—(५६)
| अंगुष्ठे | = | २ |
|---|---|---|
| गुल्फ, जानुनि वक्षणे, | = | ३ |
| १ १ १ | = | १७ |
| एवं तिसृषु शाखासु | = | १७ × ४ = |
| कटिकपालेषु | = | ३ |
| पृष्ठवशे | = | २४ |
| पार्श्वयोः | = | २४ |
| उरसि | = | ८ |
| ५६ = |
६८
(३) मूर्धनि—(८३)
| श्रीवायाम् | = | ८ |
|---|---|---|
| कंठनाञ्चाम् | = | ३ |
| हृदययकृतकलोमनाडीषु | ||
| कंठनाडीनिबद्धाः | = | १८ |
५६
| दन्तमूलेषु | = | ३२ |
|---|---|---|
| काकलनासामूर्ध्नि | = | ३ |
| १ १ १ |
गंड-कर्ण-शंख-वर्त्त-नेत्र-हनुसंघिषु = १२ २, २, २, २, २, २,
| भ्रुवास्परिघात् | = | २ |
|---|---|---|
| शिखरःकपालेषु | = | ५ |
| ८३ = |
८३
२१०
२१०
३७०
सुश्रुतसंहिता
स्नायूनां नवशतानि [६००]
| १ ग्राखासु | ६०० | एकस्मिन् सविधन | स्नायुसंख्या | |
|---|---|---|---|---|
| एकैकस्यां पादांगुल्याम् | ६ × ५ — ३० | |||
| तलकूर्चगुरुफेषु | १० × ३ — ३० | |||
| जंघायाम् | — ३० | |||
| जानुनि | — १० | |||
| ऊरौ | — १० | |||
| वंशणे | — ३० | |||
| १५० × ४ — ६०० | ||||
| २ कोष्ठे | २३० | कव्याम् | — ६० | ६०० |
| पृष्ठे | — ८० | |||
| पाश्चवयोः | — ६० | |||
| उरसि | — ३० | |||
| २३० | ||||
| ३ ग्रीवां प्रत्युर्ध्वम | ७० | ग्रीवायाम् | — ३६ | २३० |
| मूर्ध्नि | — ३४ | |||
| ७० | ||||
| ६०० | ७० | |||
| ६०० |
द्विविधाः स्नायवः
१ बाह्याः
२ आभ्यन्तराः
चतुर्विधाः स्नायवः
१ प्रतानवत्यः
शाखासु—
२ वृत्ताः
सर्वसंक्षिपु—
३ पृथव्यः
पाश्चोरसि, पृष्ठे शिरसि | आमपक्काशयान्तेषु, वस्तौ
२ सुषिराः
स्नायुकर्मे
एवमेव शरीरेऽस्मिन् यावन्तः सन्धयः स्मृताः । स्नायुमिवदुमिर्बद्धास्तेन भारसहा नराः ॥
शारीरस्थानम्
३७१
पेशीनां पंचशतानि [ ५०० ]
( मांसावयवसंघातः परस्परं विभक्तः 'पेशी' इत्युच्यते )
| (१) शाखासु — ४०० | पेशी संख्या | (३) ग्रीवां प्रत्युर्ध्वम् = ३४ | पेशी संख्या |
|---|---|---|---|
| एकरिमन् सकिध्न — | ग्रीवायाम् — ४ | ||
| एकैकस्यां पादांगुल्यां ३ × ५ = १५ | हन्वोः — ८ | ||
| प्रपदे — १० | काकलकगलयोः — २ | ||
| पादोपरि कूर्चसन्निविष्टाः — १० | १ | ||
| गुल्फ-तलयोः — १० | तालुनि — २ | ||
| ५ ५ | जिह्वायाम् — १ | ||
| गुल्फजान्वन्तरे — २० | ओष्ठयोः — २ | ||
| जातुनि — ५ | नासायाम् — २ | ||
| ऊरौ — २० | नेत्रयोः — २ | ||
| वक्षणे — १० | गण्डयोः — ४ | ||
| १०० × ४ | कर्णयोः — २ | ||
| ४०० | ललाटे — ४ | ३४ | |
| शिरसि — १ | |||
| (२) क्रोष्टे ६६ | ५०० | ||
| पायी — १ | क्षीणां तु विशतिरधिकः | ||
| मेदुं — १ | स्तनयोः ५ × २ = १० | ||
| सेवन्याम् — ३ | अपत्यपथे — ४ | ||
| वृषणयोः — २ | गर्भच्छिद्रसंश्रिताः — ३ | ||
| स्फिनोः ५ × ५ = १० | शुक्रार्तवप्रवेशिन्यः — ३ | ||
| नस्तिशिरसि — २ | ३० | ||
| उदरे — ५ | |||
| नाभ्याम् — १ | |||
| पृष्ठोर्ध्वसन्निविष्टादीर्घाः ५ + ५ = १० | |||
| पाशर्वयोः — ६ | |||
| वक्षसि — १० | |||
| अक्षकांसौ प्रतिसमन्तात् — ७ | |||
| हृदयामाशययोः — २ | |||
| यकृतप्लीहोण्डुकेषु — ६ | |||
| ६६ | |||
| ६६ |
पेशीनां स्थानवशात् नानास्वरूपत्वम् ( प्रकाराः )
१. बहलाः | ७. हृस्वाः | सन्ध्यस्यसिराः स्नायुप्रच्छादकाः पेशीभिः संवृतान्यत्र | पेशीकर्म । सन्वयश्च शरीरिणाम् । बलवन्ति भवन्त्यतः ॥ ---|---|---|--- २. पेलवाः | ८. दीर्घाः ३. स्थूलाः | ९. स्थिराः ४. अणवः | १०. मृदवः ५. प्रथवः | ११. रल्लुणाः ६. वृत्ताः | १२. कर्कशाः
३७२
सुश्रुतसंहिता
सिरासंख्याविवरणम् ( सुश्रुतात् )
( सिरासंख्या-७०० )
मूला सिरा-४०
वातवाहिन्यः १० (अरुणाः)
वातस्थानगताः
१७५
पित्तवाहिन्यः १० (उष्णाः नीलाः)
पित्तस्थानगताः
१७५
कफवाहिन्यः १० (शोताः गौर्घः स्थिराः)
कफस्थानगताः
१७५
रक्तवाहिन्यः १० (नास्त्युष्णशोतलाः रोहिण्यः)
रक्त-(यकृत् प्लीहा) स्थानगताः
१७५
वातवाहिन्यः सिराः १७५
एकस्मिन् सविध्न
२५ × ४ = १००
१००
कोष्ठे—
शोण्याम् गुदमेदाश्रितः
८
पार्श्वयोः द्वे द्वे
४
पुष्टे षट्
६
३४
उदरे षट्
६
वक्षसि दश
१०
जत्रुणः ऊर्ध्वम्
श्रीवायाम्
१४
कर्णयोः
४
जिह्वायाम्
६
नासिकायाम्
६
४१
नेत्रयोः
८
१७५
एवम् पित्तकफरक्तवाहिसिरासु बोद्धव्यम् = ७००
विशेषः पित्तवाहिषु-कर्णयोः २ नेत्रयोः १०
सिराः सप्तशतानि ( ७०० )
व्यधनीयाः सिराः
अव्यधनीयाः सिराः
सिरासंख्याः
| (१) शाखागताः | ३७४ | १६ | ४०० |
|---|---|---|---|
| (२) अन्तराधिगताः | १०४ | ३२ | १३६ |
| (३) मूर्धगताः | ११४ | ५० | १६४ |
| ६०२ | ६८ | ७०० |
शारीरस्थानम्
१७३
व्यधनीयाव्यधनीयसिराणां विस्तारवर्णनम्
सिरासंख्या (७००) (१) शाखागता:— एकस्मिन् सकृन् शतं सिरा: १०० X ४ = ४०० | अव्यधनीयसिरासंख्या (६८) जालन्धरा १ ऊर्वासिजे २ लोहिताक्षसंज्ञा १ ४ X ४ = १६ | ---|---|--- (२) अन्तराधिगता:— श्रोण्याम् ३२ (गुदमेद्वाश्रया: ) | वक्षगुणयो: ( विटपयो: ) ४ कटीकतक्षणयो: ४ ८ | पार्श्वगता: १६ | पार्श्वयो: तयोरुध्वंगाम् एककाम् १ पार्श्वसंधिसंज्ञाम् ( मर्मणि ) १ २ | पृष्ठगता: २४ | पृष्ठवंशमुभयत: द्वे द्वे २ ऊध्वंगामिन्यो २ ४ | ३२ उदरगता: २४ | मेदस्थोपरि रोमराजीमुभयतो २ द्वे द्वे २ ४ | वक्षोगता: ४० १३६ | हृदये द्वे = २ स्तनमूल्यो: = ४ स्तनरोहितयो: = ४ अपस्तम्भयो: = २ अपालापयो: = २ १४ |
१७४
सुश्रुतसंहिता
(३) मूषंगता:— श्रीवागता: | २४ | नीले २ मन्त्र्ये २ = ४ मातुका = ८ कृकाटिकयो: = २ विधुरयो: = २
१६ ---|---|--- हतुगता: | १६ | सन्धिषसंबन्धिन्यौ = २ जिह्वागता: | १६ | रसवेदिन्यौ = २ वाक्प्रवर्तिन्यौ = २
४ नासागता: | २४ | गन्धवेदिन्यौ = २ ताखुनि = १
३ नेत्रगता: ललाटे नासानेत्रगता: | ५६ | उन्मेष निमेषक्रिये अपांगा = ६ २ २ २ केशान्तानुगता आवर्त स्थपनि = ७ ४ २ १
१३ कर्णगता: | १६ | शब्दवाहिन्यौ शंखसंधिगते = ४ २ २ शिरोगता: | १२
१६४
७०० | उत्क्षेपयो: सीमन्तेषु अधिपति = ८ २ ५ १
५०
६८
शारीरस्थानम् मर्मविवरणं कोष्ठकम्
३७५
| क्र. सं. क्र. सं. | मर्मनाम | मर्म सं. क्र. | मर्मणां प्रकाराः | स्थानम् | विशेषः |
|---|---|---|---|---|---|
| मांसम | सिराम | स्तनम् | शिराम | सिराम | |
| (१) सद्यः प्राण-हराणि-१९ | |||||
| १ | गुदम् | १ | ✿ | ||
| २ | वस्तिः (मूत्राशयः) | १ | ✿ | ||
| ३ | नाभिः | १ | ✿ | ||
| ४ | हृदयम् | १ | ✿ | ||
| ५ | मातृकाः | ८ | ✿ | ||
| ६ | शंखौ | २ | |||
| ७ | शुक्राटकानि | ४ | ✿ | ✿ | |
| ८ | अधिपतिः (रोमावर्तः) | १ | |||
| (२) कालान्तर प्राणहराणि ३० | |||||
| ९ | तलहृदयानि | ४ | ✿ | ||
| १० | क्षिप्राणि | ४ | ✿ | ||
| ११ | इन्द्रवस्तयः | ४ | ✿ | ||
| १२ | स्तनमूले | २ | ✿ | ||
| १३ | स्तनरोहिते | २ | ✿ | ||
| १४ | अपस्तम्भौ | २ |
३७६
सुश्रुतसंहिता
| क्रमिक | सर्मनाम | सर्मनाम | सर्मणां प्रकाराः | स्थानम् | विशेषः |
|---|---|---|---|---|---|
| मांससम् | स्निग्धसम् | सूक्ष्मसम् | अस्निग्धसम् | सूक्ष्मसम् | |
| १५ | अपालापौ | २ | ✧ | ||
| १६ | कटिकतरुणे | २ | |||
| १७ | नितम्बो | २ | |||
| १८ | पाशर्वसन्धौ | २ | ✧ | ||
| १९ | बृहत्योः | २ | |||
| २० | सीमन्ताः | ५ | |||
| २१ | (३) विशल्य- | ||||
| घ्नानि ३ | |||||
| उत्क्षेपौ | २ | ||||
| २२ | स्थपनी | १ | ✧ | ||
| २३ | (४) विकलत्व- | ||||
| कराणि ४४ | |||||
| कृचाः | ४ | ✧ | |||
| २४ | जानुनी | २ | |||
| २५ | कूर्परो | २ | |||
| २६ | आण्यः | ४ | ✧ | ||
| २७ | ऊर्ध्वः | ४ | ✧ | ||
| २८ | लोहिताश्वाणि | ४ | ✧ | ||
| २९ | विरुपौ | २ | ✧ | ||
| ३० | कक्षाघरी | २ | ✧ | ||
| ३१ | कुकुन्दरो | २ |
४८
आरोग्यस्थानम्
३७७
| क्रमिक | सर्गनाम | सर्गसं. | सर्गणां प्रकाराः | स्थानम् | विशेषः |
|---|---|---|---|---|---|
| मसिषम | सिन्धम | सैन्धम | असैन्धम | सिन्धिम | |
| ३२ | अंखौ | २ | ✿ | ||
| स्कंधवन्धनौ | स्तब्धवाहुता | ||||
| ३३ | अंसफलकौ | २ | |||
| संबद्धे | बहुस्वापशोषौ | ||||
| ३४ | नीले | २ | ✿ | ||
| ग्राहिता वा | |||||
| ३५ | मन्ये | २ | ✿ | ||
| ३६ | कुकटिके | २ | ✿ | ||
| ३७ | विधुरे | २ | ✿ | ||
| ३८ | फणौ | २ | ✿ | ||
| प्रतिबद्धौ अभ्यन्तरतः | गन्वाज्ञानम् | ||||
| ३९ | अपांगौ | २ | ✿ | ||
| बाह्यतः | आन्ध्यम् दृष्ट्युपघातो वा | ||||
| ४० | आवतो | २ | ✿ | ||
| ४१ | (४) रूजाकराणि | ||||
| कुचविरांसि | ४ | ||||
| ४२ | गुल्फौ | २ | ✿ | ||
| वा | |||||
| ४३ | मणिबन्धौ | २ |
३७४
सुश्रुतसंहिता
धमन्यः चतुर्विंशतिः (सु० शा० ६-४-६)
(नाभिप्रभवः)
ऊर्ध्वगाः १०
अधोगामिन्यः १०
तिर्यग्गाः ४
हृदयमभिप्रपन्नाः त्रिधा जायन्ते ताः त्रिशत्
पित्ताशयमभिप्रपन्नाः आमपकाशयान्तरे च त्रिधा जायन्ते ताः त्रिशत्
एकैका शतधा सहस्रधा चोत्तरोत्तरं विम- ज्यन्ते तास्त्वसंख्येयाः तासां मुखानि रोमकूपप्रतिबद्धानि यैः स्वेदं अभिवहन्ति रसं चाभितर्पयन्त्यन्त- र्बहिश्च तैरेव चाभ्यङ्गपरिवेकावगाहालेपन- वीर्याण्यन्तः शरीरमभिप्रतिपद्यन्ते त्वच्चि विपक्वान्नि, तैरेव च स्पर्शं मुखममुखं वा यद्वाति, तास्त्वैताश्चतस्रो धमन्यः सर्वोगगताः ।
वातवहे २
वातवहे २
पित्तवहे २
पित्तवहे २
कफवहे २
कफवहे २
शोणितवहे २
शोणितवहे २
रसवहे २
रसवहे २
शब्दवहे २
अन्नवाहिन्यौ २
रूपवहे २
रसवहे २
(अत्राश्रिते)
गन्धवहे २
तोयवहे २
द्वाम्यां भाषते २
मूत्रवहे २
द्वाम्यां घोषं करोति २
(मूत्रवस्तिनाभिप्रपन्ने)
द्वाम्यां स्वपिति २
शुक्रवहे
द्वाम्यां प्रतिबुध्यते २
(शुक्रप्रादुर्भावय)
द्वे अश्रुवाहिन्यौ २
शुक्रवहे
द्वे स्तन्यं स्त्रियां वहतः २
(विसर्गय)
ते एव शुक्रं नरस्य स्तनाभ्यां
वर्चोनिरसन्यौ
अभिबहतः
(स्थूलान्प्रतिबद्धे)
द्वे तिर्यग्गाणां धमनीनां ८
स्वेदं अपश्यन्ति
३०
३०
ते एव रक्तमभिबहती (विसृजतश्च)
नारीणामार्तर्वसंज्ञम्
अथ चिकित्सास्थानम्
प्रथमोऽध्यायः
अथातो द्विब्रणीयं चिकित्सतं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अब इसके बाद द्विब्रणीय चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे— जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ।
वि० मन्तव्य—दो प्रकार के ब्रणों को ध्यान में रखकर लिखी चिकित्सा अर्थात् व्याधि प्रतिकार ॥ १, २ ॥
द्वौ ब्रणौ भवतः—शारीरः आगन्तुश्च । तयोः शारीरः पवनपित्तकफशोणितसन्निपातनिमित्तः, आगन्तुरपि पुरुष-पशुपक्षिग्यालसरोस्त्रपप्रतनपीडनप्रहाराग्निक्षारविषघती-क्षोणषशकलकपालशृङ्गचक्रेषु परशुशक्तिकुन्ताद्यायुधाभि-जातनिमित्तः । तेन तुल्ये ब्रणसामान्ये द्विकारणोत्थानप्रयोजनसामर्थ्याद् 'द्विब्रणीयं' इत्युच्यते ॥ ३ ॥
दो प्रकार के ब्रण होते हैं—शारीर और आगन्तुक । इनमें शारीरिक ब्रण—वायु, पित्त, कफ, रक्त, सन्निपातजन्य हैं, आगन्तुक ब्रण भी—पुरुष, पक्षि, हिंसकपशु, सर्प आदि के गिरने से, पीडन-प्रहार अग्नि-क्षार विष-तीक्ष्णोषध-काष्ठ आदि के टुकड़ों, कपाल, सौग, चक्र, बाण, परशु, शक्ति, कुन्त, आदि शस्त्रों के अभिघात से उत्पन्न होते हैं । इन दोनों में ब्रणत्व सामान्य होने से, दो कारणों के कारण उत्पन्न होने के उद्देश्य से इस अध्याय को द्विब्रणीय कहते हैं । जैसा कि चरक में भी इस अध्याय का नाम "द्विब्रणीय" रक्खा है । यथा—'यो ब्रणो पूर्वमुद्दिष्टो निजश्रान्तुरेव च । श्रूयतां विधिवत्सौम्यं तयोर्लिङ्गं सपेक्षम्' चरक ॥ ३ ॥
सर्वसिन्धेवागन्तुब्रणे तत्कालमेव क्षतोऽमणः प्रसूतस्योपशमार्थं पित्तवच्छीतक्रियावचारणविधिविशेषसन्धानार्थं च मधुघृतप्रयोग इत्येतद्द्विकारणोत्थानप्रयोजनम्, उत्तरकालं तु दोषोपलब्धविशेषाच्छारीरवत् प्रतीकारः ॥ ४ ॥
सभी प्रकार के आगन्तुक ब्रणों में उसी समय क्षत की उणिमा को आगे न फैलने देने के लिये, पित्त की भाँति शीतल किया को करने तथा ब्रण को मिलाने के लिये मधु और घृत का उपयोग करना, ये दो कारणों के उत्पन्न होने के उद्देश्य हैं । पीछे से दोषों के कोप होने पर शरीरजन्य ब्रणों की भाँति चिकित्सा है ।
वक्तव्य—दो उद्देश्य होने से इसे द्विब्रणीय कहा है । आगन्तुक ब्रण पीछे दोषों से मिल जाता है, यथा—आगन्तुर-वैति निजं विकारं, निजस्तथागन्तुमपि प्रबुद्धः । तत्रानुबन्धं
प्रकृतिं च सम्यक्, ज्ञात्वा ततः कर्म समादिशेत् ॥ इल्लुण ने उत्तरकाल से सात दिन पीछे का समय माना है । सात दिन के पीछे आगन्तुक ब्रणों में दोष की अधिकता से शारीरिक ब्रणों की भाँति चिकित्सा करे ।
वि० मन्तव्य—आगन्तुक ब्रण में तत्काल उक्त उपचार करने से पाक आदि का प्रारम्भ नहीं होता, परन्तु यदि हो ही जाय तो शारीर ब्रण के समान शोचन रोपण आदि उपचार करे । जब तक—पाकादि का प्रारम्भ नहीं होता तब तक ब्रण को आगन्तु समझा जाता है और उक्त उपचार किया जाता है, सन्धान के लिए—मधु १ तोला, गो घृत २ तोला मिला फेंटकर लेप करे और आवश्यकता हो तो सोवन कर्म करे । तदर्थ देखिये सू० अ० २५ के श्लोक १६ से २६ । यही विशिष्ट कर्म का उपदेश करने के लिए ब्रण को दो प्रकार का कहा—लिखा गया है । क्योंकि उसके पश्चात् दोषों का प्रवेश हो जाने पर—पाक आदि का प्रारम्भ हो जाने पर तो आगन्तु तथा शारीर दोनों ब्रण समान ही होते हैं अर्थात् उनके लक्षण एवं चिकित्सा दोनों समान होते हैं ॥ ४ ॥
दोषोपलब्धविशेषः पुनः समासतः पञ्चदशप्रकारः प्रसरणसामर्थ्यात्, यथोक्तो ब्रणप्रभाधिकारे, शुद्धत्वात्षोडशप्रकार इत्येके ॥ ५ ॥
दोषों का उपलब्ध भेद संक्षेप में पन्द्रह प्रकार का है, यह भेद इन दोषों के फैलने के अनुसार है, इसको ब्रण प्रश्नाधिकार में कह चुके हैं । एक भेद शुद्ध ब्रण होने से ब्रण साल्ह प्रकार का है ऐसा कई मानते हैं ।
वक्तव्य—दोष से बात, पित्त, कफ और रक्त चारों ही का यहाँ ग्रहण है, इसी से कहा है, "नत्तं देहः कफादस्ति, न पित्तान्नं च मास्तात् । शोणितादपि वा नित्यं देह एतेस्तु धार्यते ॥" ॥ ५ ॥
तस्य लक्षणं द्विविधं—सामान्यं वैशेषिकं च । तत्र सामान्यं रक्त । 'ब्रणं' गात्रविचूर्णने, ब्रणयतीति ब्रणः । विशेषलक्षणं पुनर्वार्तादिलिङ्गविशेषः ॥ ६ ॥
ब्रण के लक्षण दो प्रकार के हैं, सामान्य और वैशेषिक (विशिष्टता के सूचक) । इनमें सामान्य लक्षण दर्द होना है । ब्रण-गात्रविचूर्णने इस धातु से ब्रण शब्द बनता है, जिसका अर्थ शरीर में विचूर्णता करना है । विशेष-लक्षण—वातादि दोषों से लक्षणों की भिन्नता है ।
३८०
सुश्रुतसंहिता
[ अ० १ ]
वक्तव्य—वृणोति यस्माद् रुठेऽपि व्रणवस्तु न नश्यति । आदेहधारणात्सत्मात् व्रण इत्युच्यते बुधेः ॥ सु० सू० अ० २१ । शरीर जव तक रहता है, तब तक विवर्णता रहती है ।
वि० मन्तव्य—व्रण में रुजा—वेदना होना सामान्य लक्षण है अर्थात् रुजा सब व्रणों में होती है । व्रण गात्रविचूर्णन धातु है—व्रणयति गात्रं विचूर्णयति इति व्रणः—अर्थात् जो गात्र को चूर्न २ कर देता है वह व्रण कहलाता है । जितने स्थान में व्रण होता है उतना स्थान चूर्न २ हो जाता है । देखिये सू० स्था० अ० २१-२२ तथा भगन्दर आदि के प्रकरण । व्रण का नाम है घाव । वह आगन्तु व्रण छः प्रकार का होता है—“छिन्नं मिन्नं तथा विद्वं क्षतं पिचितमेव च । घुष्टं आहुः तथा षष्ठं” और शारीर व्रण—वह है जो प्रथम शीथ उत्पन्न होता है और फिर उसके पककर फटने पर घाव बनता है । इन सब में गात्र का विचूर्णन होता है, अतः “व्रण” कहलाता है ॥ ६ ॥
तत्र श्यावारुणाभस्तमुः शीतः पिच्छिलोऽल्पस्त्रावी रुक्षरुचटचटायनशीलः स्फुरणायामतोदभेदवेदनावहुलो निमांसश्चेति वातात् , क्षिप्रजः पीतनीलाभः किमुकोदकाभोणस्त्रावी दाहपाकरागविकारकारी पीतपिडकाजुष्टश्चेति पिप्सात् , प्रततचण्डकण्डुबहुलः स्थूलौष्टः सत्व्यसिरास्तायुजालावततः कठिनः पाण्डुवृषभासो मन्दवेदनः शुक्लशीत-सान्द्रपिच्छिलास्त्रावी गुरुश्चेति कफात् , प्रवालदलनिचयप्रकाशः कृष्णस्फोटपिडकाजालोपचितस्तुरङ्गस्थानगन्धिः सवेदो धूमायनशीलो रक्तस्त्रावी पिचलिलङ्गश्चेति रक्तात् , तोददाहधूमायनप्रायः पीतारुणाभस्तद्वर्णस्त्रावी चेति वातपिप्ताभ्यां, कण्डुयनशीलः सनिस्तोदो रुक्षो गुरुदर्शणो सुदुर्मुदः शीतपिच्छिलालपस्त्रावी चेति वातरुलेष्मभ्यां, गुरुः सदाह उष्णः शीतपाण्डुस्त्रावी चेति पिचरुलेष्मभ्यां, रुक्षस्तनुस्तोदबहुलः सुप्त इव च रक्तारुणाभस्तद्वर्णस्त्रावी चेति वातशोणिताभ्यां, घृतमप्लाभो मीनधावनतोयगन्धिमुदु-विसर्प्युष्णकृष्णस्त्रावी चेति पिचशोणिताभ्यां, रक्तो गुरुः स्निग्धः पिच्छिलः कण्डुप्रायः स्थिरो सरक्तपाण्डुस्त्रावी चेति रुलेष्मशोणिताभ्यां, स्फुरणतोददाहधूमायनप्रायः पीततनुरक्तस्त्रावी चेति वातपित्तशोणितेभ्यः, कण्डुस्फुरण-चुमचुमायमानप्रायः पाण्डुधनुरक्तस्त्रावी चेति वातरुलेष्मशोणितेभ्यः, दाहपाकरागकण्डुप्रायः पाण्डुधनस्त्रावी चेति वातरुलेष्मशोणितेभ्यः, त्रिविधवर्णवेदनास्त्रावविशेषोपेतः पवनपित्तकफेभ्यः, निर्दहननिर्मथनस्फुरणतोददाहपाकरागकण्डुस्वापबहुलो नानावर्णवेदनास्त्रावविशेषोपेतः पवनपित्तकफशोणितेभ्यः, जिह्वातलाभो भुदुः स्निग्धः रक्तर्णो विगतवेदनः सुव्यवस्थितो निरास्त्रावश्चेति शुद्धो व्रण इति ॥ ७ ॥
वातजन्य व्रण—श्याव या अरुण वर्ण, पतला, या शीतल, पिच्छिल, थोड़े खाववाला, रुक्ष, चटचट करनेवाला ( फटने-चिरने के स्वभाव का ), स्फुरण ( फड़कन ), खिचाव, तोद, भेद की अधिक वेदनावाला और मांस रहित ( कम मांस का ) होता है । पित्तजन्य व्रण-जल्दी उत्पन्न होता है, पीली झाँकेवाला, ढाक के फूल के पानी के समान, उष्ण खाव युक्त दाह पाक सुखी एवं विकारकारी, पीली पिडकाओं से भरा होता है । कफजन्य व्रण—निरन्तर भयानक, कण्डु बहुल, मोटे किनारों का, सिंरा स्तायु के जालों से भरा, कठिन, पाण्डु ( श्वेत ) वर्ण की झाँके का, मन्द वेदना युक्त, श्वेत, शीतल, सान्द्र, पिच्छिल खाव युक्त और गुरु होता है । रक्तजन्य व्रण—मूंगे की शाखा के समान कान्तिवाला, काले छाले, एवं पिडिकाओं के जाल से भरा, घुड़साल के समान तीक्ष्ण गन्धवाला, वेदना युक्त अतिशय धूमोद्गार करने जैसा, रक्त का खाव करनेवाला और पिच वर्ण के लक्षणोंवाला होता है । वात-पित्तजन्य व्रण-तोद, दाह, धूमोद्गार की प्रधानतावाला, पीली या लाल झाँके का, वात-पित्त के व्रण के समान वर्ण एवं खाव युक्त होता है । वात-कफजन्य व्रण—कण्डु युक्त, चुमने की दर्द, रुक्ष, भारी, कठोर, बार-बार शीतल-पिच्छिल और थोड़ा खाव करनेवाला होता है । पित्त रक्त के कारण व्रण गुरु, दाहयुक्त, उष्ण, पीला और पाण्डुव्रण का खाववाला होता है । वातरक्तजन्य वर्ण-रुक्ष, पतला, तोद ( चुमने की दर्द ) की अधिकता का, सोया हुआ सा, लाल—धरुण झाँके का, वात-रक्त के समान वर्ण एवं खाव युक्त होता है । पिच रक्त के कारण—धी के मण्ड ( उपरिभाग ) के समान कान्ति का, मछली के घोंये हुए पानी के समान गन्ध का, कोमल, फैलनेवाला, उष्ण एवं काला खाव करनेवाला होता है । कफ रक्तजन्य व्रण—लाल, गुरु, स्निग्ध, पिच्छिल, कण्डु बहुल, स्थिर, रक्त ( लाल ) एवं पाण्डु वर्ण का खाव करता है । वात-पित्त-रक्तजन्य व्रण—स्फुरण, तोद, दाह, धूमोद्गमन बहुल, पीला-पतला रक्त खाव करनेवाला होता है । वात कफ-रक्तजन्य-कण्डु, स्फुरण, चुमचुमायमान, तथा-पाण्डुषट्ट रक्त खाववाला होता है । पित्तकफ रक्त-जन्य व्रण-दाह-सुखी-पाक-कण्डुबहुल, पाण्डु षट्ट रक्त खाववाला होता है । वात पित्त-कफ के कारण व्रण तीनों दोषों के वर्ण, खाव, वेदना के लक्षणों से युक्त होता है । वायु-पित्त, कफ और रक्त के कारण व्रण—जलाने की भांति, मथने की भांति, स्फुरण, तोद, दाह, पाक, सुखी, कण्डु, सुन्नता बहुल, नाना प्रकार की वेदना, वर्ण, खाव से युक्त होता है । शुद्ध व्रण—जिह्वा तल के समान ( दोनों से भरा-लाल ) कोमल, स्निग्ध, चिकना, वेदना रहित, भली प्रकार स्थित, बिना खाव का होता है ।
अ० १ ]
चिकित्सास्थानम्
३८१
वक्तव्य—चुमचुमायमान-सरसों का लेप करने पर या धूप में गरमी में बैठने पर जैसे किडियाँ सी लड़ती हैं। चरक में—स्तन्धः कठिनसंस्पर्शो मन्दस्वावोऽतितीव्रः। उद्यते स्फुरति श्यावो व्रणो मांसुत्संभवः॥ तुष्णा-मोहज्वरस्वेददाहदुष्टव्यदारणैः। व्रणं पित्तकृतं विद्यात् गन्ध-लावैश्च पूतिकैः॥ बहुपिचो गुरुः स्निग्धः स्तिमितो मन्दवेदनः। पाण्डुवर्णोऽल्पसंकलेदः चिरकारी कफव्रणः॥ चरक० चि० अ० ॥१५-११॥
वि० मन्तव्य—दोष भेद से व्रणों के ये १५ प्रकार हैं और शुद्ध व्रण भी व्रण तो है ही, मले ही उसमें किसी दोष के व्यक्त लक्षण नहीं रहते, परन्तु रोपण कर्म करना ही होता है और साथ २ रक्षाविधान आदि भी। अतः उसको साथ में गिनने से व्रणों की संख्या १६ हो जाती है ॥७॥
तस्य वृणस्य पट्टिरुपक्रममा भवन्ति। तद्यथा—अपत-र्पणमालेपः परिपेकोऽभ्यङ्गः स्वेदो विम्लापनमुपनाहः पाचनं विस्वावणं स्नेहो वमनं विरेचनं छेदनं दारणं लेखनमेषण-माहरणं व्यधनं सीवनं सन्धानं पीडनं शोणितार्थापनं निर्वा-पणसुकारिका कषायो वर्तिः कल्कः सर्पितैलं रसक्रियाऽ-वर्चुर्णं व्रणधूपनमुत्सादनमप्रसादनं मृदुकर्म दारुणकर्म क्षारकर्मोत्तर्कर्म कृष्णकर्म पाण्डुकर्म प्रतिसारणं रोमस-ञ्जनं लोमापहरणं वस्तिकर्मात्तरवस्तिकर्म वन्धः पत्रदानं क्रमिन्नं बृंहणं विषघ्नं शिरोविरेचनं नस्यं कवलधारणं धूमो मधुसर्पिर्नन्त्रमाहारो रक्षाविधानमिति ॥८॥
व्रण के उपक्रम साठ हैं, यथा—अपतर्पण, आलेप, परिपेक, अभ्यंग, स्वेद, विम्लापन, उपनाह, पाचन, विस्वावण, स्नेह, वमन, विरेचन, छेदन, भेदन, दारण, लेखन, एषण, आहरण, व्यधन, विस्वावण, सीवन, सन्धान, पीडन, शोणितार्थापन, निर्वापण, उत्कारिका, कषाय, वर्त्ति, कल्क, सर्पि, तैल, रसक्रिया, अवर्चुर्ण, वृण धूपन, उत्सादन, अवसादन, मृदुकर्म, दारुण-कर्म, क्षारकर्म, अग्निनिकर्म, कृष्णकर्म, पाण्डुकर्म, प्रतिसा-रण, रोमसञ्जन, लोमापहरण, वस्तिकर्म, उत्तरवस्तिकर्म, वन्ध, पत्रदान, क्रमिन्न, बृंहण, विषघ्न, शिरोविरेचन, नस्य, कवल-धारण, धूम, मधुसर्पि, यंत्र, आहार, और रक्षाविधान। (मधु-सर्पि एक गिनना चाहिये)।
वक्तव्य—डल्हन ने लिखा है कि इसमें प्रतिधारण को नहीं गिने, तब साठ उपक्रम पूरे होते हैं। परन्तु इस पाठ में 'वर्त्ति' दो बार आता है। इसे एक स्थान पर गिनकर प्रति-धारण को गिनने से साठ हो जायेंगे।
चरक में छत्तीस उपक्रम कहे हैं, यथा— शोफन् पड्विर्ध चैव, शस्त्रकर्मविपीडनम्। निर्वापिणं ससन्धानं स्वेदः शमनमेषणा ॥
शोधनौ रोपणीयो च कषायौ सप्रलेपनौ। ह्यौ स्नेहौ तदुगुणौ पत्रच्छेदने द्वे च वन्धने ॥ भोज्यमुत्सादनं दाहौ द्विविधः सावसादनः। काठिन्यमादवकरे धूपने लेपने शुभे ॥ वर्णाविचूर्णनं व्रण्यं रोपणं लोमरोहणम्। इति षट् त्रिशदुद्दिष्टाव्रणानां समुपक्रमाः ॥ (पाटनं व्यधनं चैव छेदनं लेपनं तथा। प्रोञ्छनं सीवनं चैव पड्विर्ध शस्त्रकर्म तत्) वि० मन्व्यव—व्रण के ये ६० उपक्रम-उपचार हैं। इनका समय २ पर अथच आवश्यकता अनुसार प्रयोग किया जाता है। तेषु कषायो वर्त्तिः कल्कः सर्पितैलं रसक्रियाऽवर्चुर्ण-मिति शोधनरोपणानि, तेष्वष्टौ शस्त्रकृत्याः, शोणितार्था-पनं क्षारोऽग्निर्नन्त्रमाहारो रक्षाविधानं वन्धविधानं चो-क्तानि, स्नेहस्वेदनवमनविरेचनवस्त्युत्तरवस्तिशिरोविरेच-नस्य धूमकवलधारणान्यन्यत्र वक्ष्यामः। यदन्यदवशिष्ट-मुपक्रमजातं तद्विह वक्ष्यते ॥९॥
इनमें कषाय, वर्त्ति, कल्क, सर्पि, तैल, रसक्रिया, अवर्चुर्ण ये कम शोधन और रोपण दोनों को करते हैं। इनमें आठ शस्त्र कर्म हैं। शोणितार्थापन, क्षार, अग्नि, यंत्र, आहार, रक्षाविधान, वन्धविधान पहले कह चुके हैं। स्नेह, स्वेदन, वमन, विरेचन, वस्ति, उत्तरवस्ति शिरोविरेचन, नस्य, धूम, कवलधारण, इनको अन्यत्र कहेंगे। इनसे जो उपक्रम शेष रह गये हैं, उनको यहाँ पर कहेंगे।
वि० मन्तव्य—इनमें ८ उपक्रम-शस्त्रद्वारा किये जाते हैं, यथा—१-छेदन, २-भेदन या दारण, ३-लेखन, ४-एषण, ५-आहरण, ६-व्यधन, ७-विस्वावण तथा ८-सीवन। शोणितार्थापन—रक्तप्रवाह को रोकने का उपाय सू० स्था० अ० १५ में, क्षार कर्म सू० अ० ११ में, अग्निनिकर्म सू० अ० १२ में, यन्त्रण सू० अ० ७ में, आहार सू० स्था० १६ तथा २० में, रक्षाविधान सू० स्था० १६ तथा अ० ५ में, वन्धविधान—सू० स्था० अ० १६ तथा १८ में देखिये। स्नेहन—चि० स्था० अ० ३१, स्वेदन—चि० स्था० अ० ३२, वमन अ० ३३, विरेचन अ० ३३, वस्तिकर्म अ० ३५, उत्तरवस्ति अ० ३६, शिरोविरेचन—धूम, नस्य, कवलग्रह अ० ४० में देखिये ॥९॥
षड्विधः प्रागुपदिष्टः शोफः, तस्यैकादशोपक्रमामभव-न्यपतर्पणादयो विरेचनान्ताः, ते च विषेशेण शोधप्रती-कारे वर्तन्ते, वृणभावमापन्नस्य च न विरुध्यन्ते, शेषान्तु प्रायेण व्रणप्रतीकारहेतव एव ॥१०॥
पहले कहा है कि शोफ छे प्रकार का है, इस शोफ के अपतर्पण से लेकर विरेचन तक ग्यारह उपक्रम होते हैं। ये उपक्रम मुख्यतः शोध की चिकित्सा में बरते जाते हैं। शोध के
३८२
सुश्रुतसंहिता
[ अ० १ ]
व्रण में बदल जाने पर भी इनका उपयोग हो सकता है। शेष उपक्रम प्रधानतः व्रण की चिकित्सा में काम आते हैं।
वि० मन्तव्य—छ प्रकार का शोथ या शोफ सू० अ० १७ में देखिये। इनमें कुछ उपक्रम शोथ (कोड़ा) को दबाने—बैठाने के लिये किये जाते हैं और कुछ पकाने के लिये। यथा अपतर्पण-उपवास से शोथ को बढ़ने के लिये बल नहीं मिलता, वमन विरेचन से शारीरिक दोषों का मूलेच्छेद ही हो जाता है, अतः भी वह नहीं बढ़ता आलेप से विष्ठापन पर्यन्त उपक्रमों से शोथ में सन्नित दोषों का विलयन हो जाता है और विस्वावण से स्थानीय रक्त दोषों को साथ लेकर निकल जाता है। यदि इन्.सब उपक्रमों से शोथ नहीं बैठता तो उपनाह एवं पाचन लेगों से वह सरलता से और शीघ्र पक जाता है, यद्यपि स्वयं भी व्रणशोथ पक जाते हैं, परन्तु उनका पकना हानिकारक होता है। पकने पर जब वह फूट जाता है अथवा छेदन एवं दारण आदि अद्यविध सख्कर्म द्वारा चौर दिया या फोड़ दिया जाता है, तब वह 'व्रण' कहलाता है। इस दशा में भी आवश्यकतानुसार अपतर्पण से विरेचन पर्यन्त कर्मों का प्रयोग किया जाता है। और अवशिष्ट सब उपक्रम आवश्यकतानुसार समय समय पर किये जाते हैं। उन सब उपक्रमों के उपयोग के हेतु तथा फल आगे विस्तार के साथ कहे गये हैं। उनका परिश्रम पूर्वक अध्ययन कीजिये ॥१०॥
अपतर्पणमाद्य उपक्रमः, एष सर्वशोफानां सामान्यः प्रधानतमश्च ॥११॥
अपतर्पण ही सबसे पहला उपक्रम है। यह अपतर्पण सब प्रकार के शोथों में सामान्य-तुल्य है और सबसे मुख्य है ॥११॥
भवन्ति चान्न—
दोषोच्छ्रायोपशान्त्यर्थं दोषान्द्रक्ष्य देहितः।
अवेक्ष्य दोषं प्राणं च कार्यं स्यादपतर्पणम् ॥१२॥
इस विषय में श्लोक भी हैं—मनुष्य में दोष की प्रधानता देखकर-कुपित दोष की शान्ति के लिये दोष का तथा प्राण (यक्ति बल) का विचार करके, अपतर्पण—लंघन कराना चाहिये ॥१२॥
ऊर्ध्वमास्तुरष्णात्तुमुखशोषश्रमान्वितः।
न कार्यं गर्भिणीवृद्धवालदुर्वलभीरुभिः ॥१३॥
ऊर्ध्ववात, प्यास, मूत्र, मुखशोष, श्रम से पीड़ित तथा गर्भवती, बालक, बूढ़, दुर्बल और डरपोक को उपवास लंघन न कराये। ऊर्ध्ववात का लक्षण—मुक्तऽमुक्ते तथा सुस्ते यशोद्वगारं भूयं भवेत्। ऊर्ध्ववातं तं विद्यात्, उदानव्यानसंभवम् ॥१३॥
शोफेष्वेत्यतमात्रेषु वृणोषूरुस्तेषु च।
यथास्वैरौषधैर्लपं प्रत्येकस्येन कारयेत् ॥१४॥
शोफ के तुरन्त उत्पन्न होते ही, तीव्र वेदनावाले व्रणों में
दोषों के अनुसार प्रत्येक दोष की दृष्टि से—औषधियों का लेप करे।
वि० मन्तव्य—व्रणशोथ पर-उसे बैठाने एवं पकाने के लिये और व्रणभाव को प्राप्त हो जाने पर शोधन रोपण के लिये लेप लगाये जाते हैं। बैठाने एवं पकाने के लेप तो लेप ही कहलाते हैं और शोधन रोपण के लेप 'मलहूर' या 'मलहम' कहलाते हैं ॥
यथा प्रववलिते वेश्मन्यम्भस्मा परिपेचनम्।
क्षिप्रं प्रशमयत्यग्नितमेवमालेपनं रुजः ॥१५॥
प्रह्लादने शोधने च शोफस्य हरणे तथा।
उत्सादने रोपणे च लेपः स्यात्तु तदर्थकृन् ॥१६॥
जिस प्रकार जलते हुए घर पर शीतल पानों को डालते हैं, इसी प्रकार लेप जलन और वेदना को तुरन्त शान्त कर देता है। व्रण की वेदना को हटाने के कारण सुख देने में, शोधन में, (शोफ को नाश करने में) और रोपण में लेप इन कार्यों को करता है। (अवसादन-नीचे करना भी कार्य लेप से होता है उत्सादन से ही इसे गिनना) ॥१५, १६॥
वातशोफे तु वेदनोपशमार्थं सर्पिस्तैलधान्यान्ममांस-रसवातहरोषधनिष्कवाथैरशोतैः परिपेकान् कुर्वीत, पिस्-रक्तभिधातविषनिमित्तेषु क्षीरघृतसमधुशर्करोदकेरुसमधु-रौषधक्षीरवृक्षनिष्कवाथैरनुष्णः परिपेकान् कुर्वीत, रूक्षम-शोफे तु तैलमूत्रक्षारोदकसुराशुक्तफकफनीषधनिष्कवाथैर-शोतैः परिपेकान् कुर्वीत ॥१७॥
यथाऽम्बुभिः सिन्धुमानः शान्तिमग्नितिनियच्छति।
दोषाग्निरैवं सहसा परिपेकेण शम्यति ॥१८॥
वातजन्य शोफ में वेदना की शान्ति के लिये घी, तैल कांजी, मांखरस, भद्रदाह आदि वातहर औषधियों के क्वाथ को कोसा करके परिपेक करे। पिस्-रक्तविष और चोट जन्म व्रणों में—दूध, घी, मधु, शर्करा का शर्बत, इन्तुरस, मधुरौषध (काको-ल्पादि), वरगद आदि क्षीर वृक्षों के शीतल क्वाथों से परिपेक करे। कफजन्य शोफ में—तैल, मूत्र, क्षारोदक, सुरा, शुक्त और कफन् औषधियों के उष्ण क्वाथों से परिपेक करे। जिस प्रकार पानी के छिड़काव से अग्नि शान्त हो जाती है, इसी प्रकार दोषों की अग्नि परिपेक से तुरन्त शान्त होती है।
वि० मन्तव्य—परितः सिन्धुते अनेन इति परिपेचनं-परिपेकः अर्थात् जिस द्रव से व्रणशोथ अथवा व्रण का सेवन किया जाता है उसका नाम परिपेचन या परिपेक है। इसे 'टर्कोर' कहते हैं, इससे धुल भी जाता है और वेदना एवं शोथ की शान्ति भी होती है ॥१७, १८॥
अभ्यङ्गस्तु दोषमालोक्योपयुक्तो दोषोपशमं मृदुतां च करोति ॥१९॥
॥ १ ]
चिकित्सास्थानम्
३८३
स्वेदविन्म्लापनादीनां क्रियाणां प्राक् स उच्यते ।
पश्चात् कर्मसु चादिष्टः स च विस्वावणादिषु ॥२०॥
दोष को देखकर प्रयुक्त किया अभ्यंग दोष की शान्ति और मुहुता करता है । यह अभ्यंग स्वेदन विम्लापन आदि क्रियाओं से पहले बरता जाता है । विस्वावण आदि कार्यों में अभ्यंग पीछे से बरता जाता है । (विस्वावण से लेकर परिपेचन तक कार्यों में पीछे बरतते हैं) ।
वि० मन्तव्य—अभितः अज्यते अनेन इति अभ्यंगः—अभ्यञ्जनम् अर्थात् जिससे सब और आक्त किया—स्निग्ध किया जाता है । अभ्यञ्जन स्नेहों द्वारा किया जाता है—स्नेह के लेपन का नाम है अभ्यञ्ज । अर्थात् स्नेह को उस स्थान पर जुगुड़ देना—लगा भर देना ॥१६,२०॥
रुजावतां दारुणानां कठिनानां तथैव च ।
शोफानां स्वेदनं कार्यं ये चाप्येवविधा वृणाः ॥२१॥
वेदनावाले, कठोर, वायु से सख्त ( रूख ) शोफों में तथा इस प्रकार के वृणों में स्वेदन करना चाहिये ।
वि० मन्तव्य—स्वियते अनेन इति स्वेदनम्—जिसके द्वारा वृणशोथ तथा वृण का स्थान स्विन्न हो जाता है । स्वेदन के लिये देखिये वि० अ० ३२ ॥२१॥
स्थिराणां रुजतां मन्दं कार्यं विम्लापनं भवेत् ।
अभ्यञ्ज्य स्वेदयित्वा तु वेणुनाड्या ततः शनैः ॥२२॥
विमर्दयेद्विषक प्राज्ञस्तलेनाङ्गुष्ठकेन वा ।
स्थिर, वेदनावाले ( थोड़ी वेदनावाले—कफाधिक ) शोफों में विम्लापन करना चाहिये । इसके लिये अभ्यंग करके, स्वेदन देकर, वॉस की पौरी से, या हाथ की हथेली से अथवा अंगूठे से वैद्य धीरे धीरे मर्दन करे ।
वि० मन्तव्य—विम्लापन—अंगुली आदि से मर्दन करके शोथ का विलयन करना । जब वृणशोथ उत्पन्न होने लगता है तबही यह उपक्रम किया जाय ॥२२॥
शोफयोर्रुपनाहं तु कुर्यादामविदग्धयोः ॥२३॥
अविदग्धः शमं याति विदग्धः पाकमेति च ।
आम और विदग्ध दोनों ही अवस्थाओं में शोफ पर उपनाह ( पुलटिस ) बॉयनो चाहिये । इस उपनाह से न पका शोफ बैठ जाता है, और आधा पका शोथ पूरा पक जाता है ।
वि० मन्तव्य—उपनाह—उपनह्यते अनेन इति उपनाहः—अर्थात् वृणशोथ को बैठाने अथवा पकाने के लिये जो लेप किया जाता है । उपनाहोपयोगी द्रव्य—सू० अ० ३७ के श्लो० १ से ८ देखिये ॥२३॥
निवर्तते न यः शोफो विरेकान्तेरुपक्रमैः ॥२४॥
तस्य संपाचनं कुर्यात् समाहृत्यौषधानि तु ।
दधितक्रसुराशुक्रधान्याम्लैर्योजितानि तु ॥२५॥
स्निग्धानि लवणीकृत्य पचेदुत्कारिकां शुभाम् ।
ऐरण्डपत्रया शोफं नाहयेदुष्णया तथा ॥२६॥
हितं सम्भोजनं चापि पाकायामिमुक्षो यदि ।
विरेचन तक कहे हुए उपचारों के बरतने पर भी जो शोफ शान्त नहीं होता, उसके लिये औषधियाँ लाकर उसका पाचन करे । इसके लिये—मिश्रकोक्त अध्याय में कहीं शणमूल बीजक आदि औषधियों को दही, तक्र, सुरा, शुक्त, कांजी में मिलाकर, तैल आदि से स्निग्ध करके, इसमें अच्छी मात्रा में नमक मिलाकर उत्कारिका (लपसी सी) बनाये । इसको गरम करके एरण्ड पत्र के साथ शोफ पर बांध देवे । यदि शोफ पक रहा हो तो उसे भोजन भी यथेष्ट (पकानेवाला) देवे । (पथ्या-पथ्यमिहैकत्र सुक्तं संभोजनं मतम् । ऐसा भोजन दे अर्थात् पथ्य-अपथ्य मिलाकर भोजन देवे, ऐसा भी कई मानते हैं) ॥
वेदुनोपशमार्थाय तथा पाकशमाय च ॥२७॥
अचिरोत्पत्ति ते शोफे कुर्याच्छ्लोणितमोक्षणम् ।
सशोफे कठिने ध्यामे सरक्ते वेदनावति ॥२८॥
संरुद्धे विषमे चापि वृणे विस्वावणं हितम् ।
सविषे च विशेषेण जलौकभिः पदैस्तथा ॥२९॥
वेदनायाः प्रशान्त्यर्थं पाकस्याप्राप्ते तथा ।
तत्काल उत्पन्न शोफ में वेदना की शान्ति के लिये और पकने से बचाने के लिये जोँक से रक्तमोक्षण करे । शोफ-युक्त कठिन, फूले, सुखीवाले, वेदना युक्त, विशाल मलवाले, और विषम वृण में ( नीचे ऊँचे वृण में ), विस्वावण हितकारी है । विषवाले वृणों में तो मुख्यतः जोँकों से, अथवा पाछकर, रक्त मोक्षण करे । जिससे वेदना शान्त हो जाये और पकने से बच जाये ।
वि० मन्तव्य—रक्तमोक्षण—वृणस्थान पर जोँक लगाकर अथवा पन्थ लगाकर रक्त निकालना ॥२६॥
सोपद्रवणां रुक्षाणां कृशानां व्रणओषिणाम् ॥३०॥
यथास्वमौषधैः सिद्धं स्नेहपानं विधीयते ।
उपद्रववाले, रूख, कृश, वृणजन्य शोथ से पीड़ित व्यक्तियों में उनके अपने दोषों के अनुसार औषधियों से सिद्ध स्नेह का पान कराना चाहिये ॥३०॥
उत्सन्नमांसशोफे तु कफजुष्टे विशेषतः ॥३१॥
संक्तिष्टश्या (ध्या) मरुधिरं व्रणे प्रच्छदं हितम् ।
शोफ में मांस उभरा होने पर, विशेषकर कफयुक्त वृणों में, रक्त के दूषित एवं श्याम—काला होने पर वमन हितकारी है ।
चरक में कहा भी है—
वृणानामादितः कार्यं यथासन्नं विशोधनम् ।
ऊर्ध्वभागोरधोभागेः शस्त्रैर्वस्तिभिरेव च ॥
सद्यः शुद्धशरीरणां प्रशमं यान्ति हि वृणाः ॥३१॥
वातपित्तप्रदुष्टेषु दीर्घकालानुविधेषु ॥३२॥
विरेचनं प्रशंसन्ति व्रणेषु व्रणकोविदाः ।
३८४
मुश्रुतसंहिता
[ अ० १ ]
वायु-पित्त से दूषित और पुराने-देर से चालू वृणों में वृण को जाननेवाले विरेचन को उत्तम बताते हैं ॥३२॥
अपाकेषु तु रोगेषु कठिनेषु स्थितेषु च ॥३३॥
स्नायुकोश्यादिषु तथा च्छेदनं प्राममुच्यते ।
मेद-कफ-ग्रन्थि-मांस आदि न पकनेवाले या थोड़ा पकनेवाले, दृढ़ एवं स्थिर रोगों में तथा स्नायु कोश आदि में (खिरा आदि के सड़ने में) छेदन करना उत्तम है । (जैसे कि गंभीरता में छेदन करना श्रेयस्कर है) ।
वि० मन्तव्य—छेदन—वृणभूमि—गली सड़ी या गलने सड़नेवाली वृणभूमि को मूलतः शस्त्रद्वारा निकाल देना अथवा शोधन द्वारा साफ कर देना, अथवा जन्तुमारक क्रमि उत्पन्न करके दूषित भाग को खिला देना ॥३३॥
अन्तःपूरेष्ववकत्रेषु तथैवोत्सङ्गवत्स्वपि ॥३४॥
गतिमस्तु च रोगेषु भेदनं प्राममुच्यते ।
अन्दर पूयवाले परन्तु बिना मुख के, अन्दर खोखली वृण वास्तु (कैविटी-गुहा) वाले तथा गतिवाले वृणों में भेदन उत्तम है ॥३४॥
बालवृद्धासहस्रौणीभीरूणां योषितामपि ॥३५॥
समोपरि च जतेषु रोगेषुक्त्रेषु दारणम् ।
सुपक्वे पिण्डिते शोफे पीडनैरुपपीडिते ॥३६॥
पाकोद्वृत्तेषु दोषेषु तत्तु कार्यं विज्ञानता ।
सुपिष्टेदोरणद्रव्यैर्युक्तैः क्षारेण वा पुनः ॥३७॥
बालक, बृद्ध, न सहन करनेवाले (शस्त्र को जो न सह सके), क्षीण, डरपोक, स्त्रियों के तथा मर्म स्थानों के ऊपर उत्पन्न रोगों में, एवं भली प्रकार पके, पीण्डित (एक स्थान पर स्थित) शोफ में मिश्रकोक चिरनिलवादि पीडन द्रव्यों से पीडन करके फाड़ना उत्तम है । दोषों के त्वचा में आने पर (उत्पन्न होने पर), दारण द्रव्यों को भली प्रकार पीसकर इनसे लेप करके फाड़े अथवा क्षार से दारण करे ।
वि० मन्तव्य—भेदन—जब वृणशोधन में पूरा उत्पन्न हो जाता है तब किया जाता है, यदि ऊपर से न पककर भीतरी-गम्भीरपाक होता है तब शस्त्र द्वारा चीरा लगाया जाता है अथवा क्षार मिश्रित लेप लगाकर दारण किया जाता है ॥३५-३७॥
कठिनान् स्थूलवृत्तोष्ठान् दीर्घमाणान् पुनः पुनः ।
कठिनोत्सन्नमांससिद्धं लेखनेनाचरेद्विषक् ॥३८॥
समं लिखेत् सुलिखितं लिखेन्निरवशेषतः ।
वर्त्तमानं तु प्रमाणेन समं शस्त्रेण निलिखेत् ॥३९॥
कठिन, मोटे या गोल किनारों के बार-बार फट जानेवाले तथा कठिन एवं ऊपर को उठे मांसवाले वृणों में वैद्य लेखन करे । वृण में भली प्रकार-समान रूप में लेखन करे । सम्पूर्ण
रूप में लेखन करे । वृण के किनारों के प्रमाण में बारबार शस्त्र से लेखन करे ॥३६॥
क्षौमं प्लोतं पिचुं फेनं यावशूकं ससैनध्वम् ।
कर्कशानि च पत्राणि लेखनार्थं प्रदापयेत् ॥४०॥
अलसी—वस्त्र, कपड़े का टुकड़ा, लूई का फोया, जो की क्षार, समुद्र फेन, सैनध्व और शोफालिका आदि खुरदरे पत्ते, लेखन के लिये बरते ।
वि० मन्तव्य—लेखन—छील देना—जो भाग छील देने योग्य हो उसे छील देना । रगड़कर दूर कर देना ॥४०॥
नाडीव्रणात् शल्यगर्भातुन्माग्युत्सङ्गिनः शनैः ।
करीरबालाङ्गुलिभिरेषणया वैषयेद्विषक् ॥४१॥
नेत्रवर्त्तमंगुदाभ्यासनाङ्कोऽवकत्राः सगोणिताः ।
चुच्चूपोदकजैः शलदणैः करीरैरपेयत्तु ताः ॥४२॥
नाड़ी वृणों को, शल्यवाले, उन्मागर्ग अंदर से खोखले वृणों में वैद्यकरीर बाल, अंगुलि या ऐषणी से धीमे रूप में ऐषण कार्य करे । नेत्र वर्त्तम (पलक), गुदा के समीप, छोटे मुख के नाड़ी वृण, रक्तवाले वृणों में—चुच्चु, पोई—इनके चिकने कोमल नालों से इनको खोजे ।
वि० मन्तव्य—ऐषण—वृण के मार्ग को खोजना कि वह कहाँ तक है और खोजकर—वहाँ तक बत्ती—औषधलिप्त बत्ती चढ़ाना—पहुँचाना अथवा शस्त्र द्वारा या दारण लेपों द्वारा वहाँ तक भेदन करके या दारण करके शोधन रोपण उपचार के योग्य बना लेना ॥४२॥
संवृत्तासंवृत्तास्येषु वृणेषु मतिमान् भिषक् ।
यथोक्तमाहरेच्छल्यं प्राप्तोद्धारणलक्षणम् ॥४३॥
जिन वृणों के मुख खुले रहते हैं और बन्द रहते हैं (कभी खुल जाते हैं और कभी भर जाते हैं) ऐसे ऐसे वृणों में बुद्धिमान् वैद्य सद्यः प्राणहर, विशल्यन्त आदि मर्मी को बचाकर शस्त्र कर्म करे ॥४३॥
रोगो व्यधनसाध्ये तु यथोद्देशं प्रमाणतः ।
शस्त्रं निदध्याहोषं च स्नावयेत् कीर्तिनं यथा ॥४४॥
व्यधन साध्य रोगों में उद्देश्य एवं प्रमाण के विचार से शस्त्र कर्म करे, और दोष का स्नाव कहे अनुसार करे । (यथा-महत्स्वपि च पाकेषु द्रव्यगुल्मान्तरं व्यंगुल्मान्तरे वा शस्त्रनिपातनम्) । यहाँ पर दो उपक्रम व्यधन और विस्वावण कह दिये हैं ।
वि० मन्तव्य—व्यधन—बीधना—जैसे फफोले को सूर्य से बीथकर और मूत्रवृद्धि तथा जलोदर रोगों में कोष तथा उदर को बीथकर तद्रव्य जल-द्रव-निकाला जाता है । कीर्तिनं तथा-जैसा उन २ रोगों की चिकित्सा में कहा गया है ॥४४॥
अपाकोपद्रुता ये च मांसस्था विकृताश्च ये ।
यथोक्तं सीवनं तेषु कार्यं सन्धानमेव च ॥४५॥
जिन वृणों में पाकजन्य उपद्रव नहीं है, जिनका