भारतकोश
संग्रह पर लौटें

स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished77 पृष्ठ

समर्पण

पूज्यनीय राजीव भाई को जिन्होंने देश के लिए अपने सुख व वैभव के साथ अपने प्राणों को भी न्योछावर कर दिया।

परम पूज्यनीज श्री राजीव भाई और उनके पूज्यनीय माता-पिता का स्मरण बार-बार करता हूँ, जिनके पूण्य कर्मों के कारण भारत माता ने अपने ऐसे सपूत को हमारे बीच भेजा।

मैं उन सभी कार्यकर्ताओं को धन्यवाद करना चाहता हूँ, जो राजीव भाई के पद चिन्हों पर चलकर राष्ट्र हित के लिए कार्य कर रहे हैं।

“दुनिया में कोई भी कार्य असम्भव नहीं होता है, महत्वपूर्ण बात यह है कि कार्य करने वाले का संकल्प कितना मजबूत है।”

“केवल स्वदेशी नीतियों से ही देश फिर से सोने की चिड़िया बन सकता है।”

- श्री राजीव दीक्षित जी

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मित्रों राजीव दीक्षित जी के परिचय मे जितनी बातें कही जाएं वो कम है। कुछ चंद शब्दों मे उनके परिचय को बयान कर पाना असंभव है। ये बात वो लोग बहुत अच्छे से समझ सकते हैं जिन्होंने राजीव दीक्षित जी को समझा है। फिर भी हमने कुछ को कुछ शब्दों का रूप देने का शुरु करने से पहले हम आपको ये कि जितना परिचय राजीव भाई का प्रयत्न करेंगे वो उनके जीवन मे किये गये कार्यों का मात्र 1% से भी कम ही होगा। उनको पूर्ण रूप से जानना है तो आपको उनके व्याख्यानों को सुनना पड़ेगा।।

गहराई से सुना और प्रयास कर उनके परिचय प्रयत्न किया है। परिचय बात स्पष्ट करना चाहते हैं हम आपको बताने का

राजीव दीक्षित जी का जन्म 30 नवम्बर 1967 को उत्तर प्रदेश राज्य के अलीगढ़ जनपद की अतरौली तहसील के नाह गाँव में पिता राधेश्याम दीक्षित एवं माता मिथिलेश कुमारी के यहाँ हुआ था। उन्होंने प्रारम्भिक और माध्यमिक शिक्षा फिरोजाबाद जिले के एक स्कूल से प्राप्त की। इसके उपरान्त उन्होंने इलाहाबाद शहर के जे.के इंस्टीट्यूट से बी० टेक० और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (Indian Institute of Technology) से एम० टेक० की उपाधि प्राप्त की। उसके बाद राजीव भाई ने कुछ समय भारत CSIR (Council of Scientific and Industrial Research) में कार्य किया। तत्पश्चात् वे किसी Research Project में भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ० ए पी जे अब्दुल कलाम के साथ भी कार्य किया।।

श्री राजीव जी इलाहाबाद के जे.के इंस्टीट्यूट से बी.टेक. की शिक्षा लेते समय ही “आजादी बचाओ आंदोलन” से जुड़ गए जिसके संस्थापक श्री बनवारी लाल शर्मा जी थे जो कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ही गणित विभाग के मुख्य शिक्षक थे। इसी संस्था में राजीव भाई प्रवक्ता के पद पर थे, संस्था में श्री अभय प्रताप, संत समीर, केशर जी, राम धीरज जी, मनोज त्यागी जी तथा योगेश कुमार मिश्र जी शोधकर्ता अपने अपने विषयों पर शोध कार्य किया करते थे जो कि संस्था द्वारा प्रकाशित “नई आजादी उद्घोष” नामक मासिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ करते थे और राजीव भाई के ओजस्वी वाणी से देश के कोने-कोने में व्याख्यानों की एक विशाल श्रंखलाबद्ध वैचारिक क्रान्ति आने लगी राजीव जी ने अपने प्रवक्ता पद के दायित्वों को एक सच्चे राष्ट्रभक्त के रूप में निभाया जो कि अतुल्य है।

बचपन से ही राजीव भाई देश की समस्याओं को जानने की गहरी रुची थी। प्रति मास 800 रुपये का खर्च उनका मैगजीनों, सभी प्रकार के अखबारों को पढ़ने में हुआ करता था। वे अभी नौवी कक्षा में ही थे कि उन्होंने अपने इतिहास के अध्यापक से एक ऐसा सवाल पूछा जिसका जवाब उस अध्यापक के पास भी नहीं था जैसा कि आप जानते हैं कि हमको इतिहास की किताबों में पढ़ाया जाता है कि अंग्रेजों का भारत के राजा से प्रथम युद्ध 1757 में

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प्लासी के मैदान में रॉबर्ट क्लाइव और बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला से हुआ था। उस युद्ध में रॉबर्ट क्लाइव ने सिराजुद्दौला को हराया था और उसके बाद भारत गुलाम हो गया था। राजीव भाई ने अपने इतिहास के अध्यापक से पूछा कि सर मुझे ये बताइए कि प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों की तरफ से कितने सिपाही थे लड़ने वाले? तो अध्यापक कहते थे कि मुझको नहीं मालूम। तो राजीव भाई ने पूछा क्यों नहीं मालूम? तो कहते थे कि मुझे किसी ने नहीं पढ़ाया तो मैं तुमको कहाँ से पढ़ा दूँ।

तो राजीव भाई ने उनको बराबर एक ही सवाल पूछा कि सर आप जरा ये बताईये कि बिना सिपाही के कोई युद्ध हो सकता है ?? तो अध्यापक ने कहा नहीं। तो फिर राजीव भाई ने पूछा फिर हमको ये क्यों नहीं पढ़ाया जाता है कि युद्ध में कितने सिपाही थे अंग्रेजों के पास? और उसके दूसरी तरफ एक और सवाल राजीव भाई ने पूछा था कि अच्छा ये बताईये कि अंग्रेजों के पास कितने सिपाही थे ये तो हमको नहीं मालूम सिराजुद्दौला जो लड़ रहा था हिंदुस्तान की तरफ से उनके पास कितने सिपाही थे? तो अध्यापक ने कहा कि वो भी नहीं मालूम। तो खैर इस सवाल का जवाब बहुत बड़ा और गंभीर है कि आखिर इतना बड़ा भारत मुठी भर अंग्रेजों का गुलाम कैसे हो गया ?? यहाँ लिखेंगे तो बात बहुत बड़ी हो जाएगी। इसका जवाब आपको राजीव भाई के एक व्याख्यान जिसका नाम आजादी का असली इतिहास में मिल जाएगा।

तो देश की आजादी से जुड़े ऐसे सैकड़ों-सैकड़ों सवाल दिन रात राजीव भाई के दिमाग में घूमते रहते थे। इसी बीच उनकी मुलाकात प्रो० धर्मपाल नाम के एक इतिहासकार से हुई जिनकी किताबें अमेरिका में पढ़ाई जाती है लेकिन भारत में नहीं।

धर्मपाल जी को राजीव भाई अपना गुरु भी के काफी सवालों का जवाब ढूँढ़ने में बहुत भाई को भारत के बारे में वो दस्तावेज की लाइब्रेरी हाउस आफ कामन्स में रखे वर्णन किया था कि कैसे उन्होंने भारत गुलाम बनाया। राजीव भाई ने उन सब दस्तावेजों का बहुत अध्ययन किया और ये जानकर उनके रोंगटे खड़े हो गए कि भारत के लोगों को भारत के बारे में कितना गलत इतिहास पढ़ाया जा रहा है। फिर सच्चाई को लोगों के सामने लाने के लिए राजीव भाई गाँव, गाँव शहर शहर जाकर व्याख्यान देने लगे। और साथ-साथ देश की आजादी और देश के अन्य गंभीर समस्याओं का इतिहास और उसका समाधान तलाशने में लगे रहते।

मानते हैं, उन्होंने राजीव भाई मदद की। उन्होंने राजीव उपलब्ध करवाए जो इंग्लैंड हुए थे जिनमें अंग्रेजों ने पूरा

इलाहबाद में पढ़ते हुए उनके एक खास मित्र हुआ करते थे जिनका नाम है योगेश मिश्रा जी उनके पिता जी इलाहबाद हार्डकोर्ट में वकील थे। तो राजीव भाई और उनके मित्र अक्सर उनसे देश की आजादी से जुड़ी रहस्यमयी बातों पर वार्तालाप किया करते थे। तब राजीव भाई को देश की आजादी के विषय में बहुत ही गंभीर जानकारी प्राप्त हुई। कि 15 अगस्त 1947 को देश में कोई आजादी नहीं आई। बल्कि 14 अगस्त 1947 की रात को अंग्रेज

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माउंट बेटन और नेहरू के बीच के समझौता हुआ था जिसे सत्ता का हस्तांतरण (transfer of power agreement) कहते हैं । इस समझौते के अनुसार अंग्रेज अपनी कुर्सी नेहरू को देकर जाएंगे लेकिन उनके द्वारा भारत को बर्बाद करने के लिए बनाए गये 34735 कानून वैसे ही इस देश में चलेंगे ॥ और क्योंकि आजादी की लड़ाई में पूरे देश का विरोध अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ था तो सिर्फ एक ईस्ट इंडिया कंपनी भारत छोड़ कर जाएगी और उसके साथ जो 126 कंपनियां और भारत को लूटने आए थी वो वैसे की वैसे ही भारत में व्यापार करेगी । लूटती रहेगी । आज उन विदेशी कंपनियों की संख्या बढ़ कर 8992 को पार कर गई है ॥ (इस बारे में और अधिक जानकारी उनके व्याख्यानों में मिलेगी)

एक बात जो राजीव भाई को हमेशा परेशान करती रहती थी कि आजादी के बाद भी अगर भारत में अंग्रेजी कानून वैसे के वैसे ही चलेंगे और आजादी के बाद भी विदेशी कंपनियाँ भारत को वैसे ही लूटेंगी जैसे आजादी से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी लूटा करती थी । आजादी के बाद भी भारत में वैसे ही गौ हत्या होगी जैसे अंग्रेजों के समय होती थी, तो हमारे देश की आजादी का अर्थ क्या है ?? तो ये सब जानने के बाद राजीव भाई ने इन विदेशी कंपनियों और भारत में चल रहे अंग्रेजी कानूनों के खिलाफ एक बार फिर से वैसा ही स्वदेशी आंदोलन शुरू करने का संकल्प लिया जैसा किसी समय में बाल गंगाधर तिलक ने अंग्रेजों के खिलाफ किया था ॥ अपने राष्ट्र में पूर्ण स्वतंत्रता लाने और आर्थिक महाशक्ति के रूप में खड़ा करने के लिए उन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहने की प्रतिज्ञा की और उसे जीवन पर्यन्त निभाया। वो गाँव-गाँव, शहर शहर घूम कर लोगों को लोगों को भारत में चल रहे अंग्रेजी कानून, आधी अधूरी आजादी का सच, विदेशी कंपनियों की भारत में लूट आदि विषयों के बारे में बताने लगे । सन् 1999 में राजीव के स्वदेशी व्याख्यानों की कैसेटों ने सम्बूचे देश में धूम मचा दी थी॥ 1984 में जब भारत में भोपाल गैस कांड हुआ तब राजीव भाई ने इसके पीछे के षड्यंत्र का पता लगाया और ये खुलासा किया कि ये कोई घटना नहीं थी बल्कि अमेरिका द्वारा किया गया एक परीक्षण था (जिसकी अधिक जानकारी आपको उनके व्याख्यानों में मिलेगी ॥) तब राजीव भाई यूनियन कार्बाइड कंपनी के खिलाफ प्रदर्शन किया ।

इसी प्रकार 1995-96 में टिहरी बाँध के बनने के खिलाफ ऐतिहासिक मोर्चे में भाग लिया और पुलिस लाठी चार्ज में काफी चोटें भी खायीं ॥ और इसी प्रकार 1999 में उन्होंने राजस्थान के कुछ गांवसियों साथ मिलकर एक शराब बनाने वाली कंपनी जिसको सरकार ने लाइसेन्स दिया था और वो कंपनी रोज जमीन की नीचे बहुत अधिक मात्रा में पानी निकाल कर शराब बनाने वाली थी उस कंपनी को भगाया ॥ 1991 भारत में चले ग्लोबलाइजेशन, लिब्रलाइजेसशन को राजीव भाई स्वदेशी उद्योगों का सर्वनाश करने वाला बताया और पूरे आंकड़ों के साथ घंटो-घंटो इस पर व्याख्यान दिये और स्वदेशी व्यापारियों को इसके खिलाफ जागरूक किया ॥ फिर 1994 में भारत सरकार द्वारा किए WTO समझौते का विरोध किया क्योंकि ये समझौता भारत को एक बहुत बड़ी आर्थिक गुलामी की और धकेलने वाला था । इस समझौते में सैकड़ों ऐसे शर्त सरकार ने स्वीकार कर ली थी जो आज भारत में

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किसानो की आत्महत्या करने का, रुपए का डालर की तुलना मे नीचे जाने का, देश बढ़ रही भूख और बेरोजगारी का, खत्म होते स्वदेशी उद्योगो का, बैंकिंग, इन्सुरेंस, वकालत सभी सर्विस सेक्टर मे बढ़ रही विदेशी कंपनियों का कारण है । राजीव भाई के अनुसार इस समझोते के बाद सरकार देश को नहीं चलाएगी बल्कि इस समझोते के अनुसार देश चलेगा ।। देश की सारी आर्थिक नीतियाँ इस समझोते को ध्यान मे रख कर बनाई जाए नोंगी । और भारत मे आज तक बनी किसी भी सरकार मे हिम्मत नहीं जो इस WTO समझोते को रद्द करवा सके ।। उन्होंने ने बताया कि कैसे WORLD BANK, IMF, UNO जैसे संस्थाये अमेरिका आदि देशो की पिठू है और विकासशील देशो की सम्पत्ति लूटने के लिए इनको पैदा किया गया है। (WTO समझोते के बारे मे अधिक जानकारी राजीव भाई के व्याख्यानो मे मिलेगी)

इन राष्ट्र विरोधी ताकतों के खिलाफ अपनी लड़ाई को और मजबूत करने लिए राजीव भाई अपने कुछ साथियो के साथ मिलकर पूरे देश मे विदेशी कम्पनियों, अँग्रेजी कानून, WTO, आदि के खिलाफ अभियान चलाने लगे ।। ऐसे ही आर्थर डंकल नाम एक अधिकारी जिसने डंकल ड्राफ्ट बनाया था भारत मे लागू करवाने के लिए वो एक बार भारत आया तो राजीव भाई और बाकी कार्यकर्ता बहुत गुस्से मे थे तब राजीव भाई ने उसे एयरपोर्ट पर ही जूते से मार मार कर भगाया और फिर उनको जेल हुई ।।

1999-2000 सन् मे उन्होंने दो अमेरिकन कम्पनियाँ पेप्सी और कोकाकोला के खिलाफ प्रदर्शन किया और लोगो को बताया कि ये दोनों कम्पनियाँ पेय पदार्थ के नाम पर आप सबको जहर बेच रही हैं और हजारो करोड की लूट इस देश मे कर रही हैं । और आपका स्वास्थ्य बिगाड रही हैं । राजीव भाई ने लोगो से कोक, पेप्सी और इसका विज्ञापन करने वाले क्रिकेट खिलाडियो और, फिल्मी स्टारों का बहिष्कार करने को कहा ।।

सन 2000 मे 9-11 की घटना घटी तो कुछ अखबार वाले राजीव भाई के पास भी उनके विचार जानने को पहुँचे । तब राजीव भाई ने कहा की मुझे नहीं लगता कि ये दोनों टावर आतंकवादियो ने गिराये हैं । तब उन्होंने पूछा आपको क्या लगता है राजीव भाई ने कहा मुझे लगता है ये काम अमेरिका ने खुद ही करवाया है । तो उन्होंने कहा आपके पास क्या सबूत है ? राजीव भाई ने कहा समय दो जल्दी सबूत भी ला दूंगा ।। और 2007 मे राजीव भाई ने गुजरात के एक व्याख्यान मे इस 9-11 की घटना का पूरा सच लाइव प्रोजेक्टर के माध्यम से लोगो के सामने रखा । (जिसका विडियो Youtube पर 9-11 was totally lie के नाम से उपलब्ध है) और 9 सितंबर 2013 को रूस ने भी एक विडियो जारी कर 9-11 की घटना को झूठा बताया । 2003-2004 मे राजीव भाई ने भारत सरकार द्वारा बनाये गये WTO कानून का विरोध किया और पूरे देश के व्यपरियो के समूह मे जाकर घंटो घंटो व्याख्यान दिये और उन्होंने जागरूक किया कि ये WTO का कानून आपकी आर्थिक लूट से ज्यादा आपके धर्म को कमजोर करने और भारत मे ईसाईयत को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है ।। (इस बारे मे अधिक जानकारी राजीव भाई के WTO वाले व्याख्यान मे मिलेगी)

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देश मे हो रही गौ हत्या को रोकने के लिए भी राजीव भाई ने कडा संघर्ष किया । राजीव भाई का कहना था कि जब तक हम गौ माता का आर्थिक मूल्यांकन कर लोगो को नहीं समझाएँगे । तब तक भारत मे गौ रक्षा नहीं हो सकती । क्योंकि कोई भी सरकार आजतक गौ हत्या के खिलाफ संसद मे बिल पास नहीं कर सकी । उनका कहना था कि सरकारी का तो पता नहीं वो कब संसद मे गौ हत्या के खिलाफ बिल पास करें क्योंकि कि आजादी के 64 साल मे तो उनसे बिल पास नहीं हुआ और आगे करेंगे इसका भरोसा नहीं ।। इसलिए तब हमे खुद अपने स्तर पर ही गौ हत्या रोकने का प्रयास करना चाहिए ।।

उन्होंने देश भर मे घूम घूम कर अलग अलग जगह पर व्याख्यान कर लोगो को गौ माता की महत्वता और उसका आर्थिक महत्व बताया । उन्होंने 60 लाख से अधिक किसानो को देसी खेती (ZERO BUDGET NATURAL FARMING) करने के सूत्र बताये कि कैसे किसान रासायनिक खाद, यूरिया आदि खेतो मे डाले बिना गौ माता के गोबर और गौ मूत्र से खेती कर सकते है । जिससे उनके उत्पादन का खर्चा लगभग शून्य होगा ।। और उनकी आय मे बहुत बढ़ोतरी होगी । आज किसान 15-15 हजार रुपए लीटर कीटनाशक खेत मे छिड़क रहा है ।। टनों टन मंहगा यूरिया, रासायनिक खाद खेत मे डाल रहा है जिससे उसके उत्पादन का खर्चा बढ़ता जा रहा है और उत्पादन भी कम होता जा रहा है ।। रासायनिक खाद वाले फल सब्जियाँ खाकर लाखो लाखो लोग दिन प्रतिदिन बीमार हो रहे हैं । राजीव भाई ने गरीब किसानो को गाय ना बेचने की सलाह दी और उसके गोबर और गौ मूत्र से खेती करने के सूत्र बताये ।। किसानो ने राजीव भाई के बताये हुए देसी खेती के सूत्रो द्वारा खेती करना शुरू किया और उनकी आर्थिक समृद्धि बहुत बढ़ी ।।

1998 मे राजीव भाई ने कुछ गौ समितियों के साथ मिलकर गौ हत्या रोकने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट मे मुकदमा दायर कर दिया कि गौ हत्या नहीं होनी चाहिए । सामने बैठे कुरेशी कसाइयो ने कहा क्यों नहीं होनी चाहिए, कोर्ट मे साबित ये करना था की गाय की हत्या कर मांस बेचने से ज्यादा लाभ है या बचाने से ।। कसाइयो की तरफ से लड़ने वाले भारत के सभी बड़े -बड़े वकील जो 50-50 लाख तक फीस लेते हैं सोली सोराब्जी की बीस लाख की फीस है ।, कपिल सिब्बल 22 लाख की फीस है । महेश जेठ मालानी राम जेठ मालानी का लड़का जो फीस लेते है 32 लाख से 35 लाख सारे सभी बड़े वकील कसाइयों के पक्ष में । और इधर राजीव भाई जैसे लोगो के पास कोई बडा वकील नहीं था क्योंकि इतना पैसा नहीं था । तो इन लोगो ने अपना मुकदमा खुद ही लडा ।।(इस मुकदमे की पूरी जानकारी आपको राजीव भाई के व्याख्यान जिसका नाम गौ हत्या और राजनीति) मे मिल जाएगी ।।

हाँ इतना आपको जरूर बता दें 2005 मे मुकदमा राजीव भाई और उनके कार्यकर्ताओं ने जीत लिया ।। राजीव भाई अदालत मे गाय के एक किलो गोबर से 33 किलो खाद तैयार करने का फॉर्मूला बताया और अदालत के सामने करके भी दिखया जिससे रोज की 1800 से 2000 रुपए की रोज की कमाई की जा सकती है ।। ऐसे ही उन्होंने गौ मूत्र से बनने वाली औषधियों का आर्थिक मूल्यांकन करके बताया ।।। और तो और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जज की गाडी

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गोबर गैस से चलाकर दिखा दी ॥ जज ने तीन महीने गाड़ी चलाई और ये सब देख अपने दाँतों तले उंगली दबा ली ॥ अधिक जानकारी आपको राजीव भाई के व्याख्यान में मिलेगी ॥ ( Gau Hatya Rajniti Supreme Court mein ladai at Aurngabad.mp3)

राजीव भाई को जब पता चला कि रासायनिक खाद बनाने वाली कंपनियों के बाद देश की सबसे अधिक हजारों करोड़ रुपए की लूट दवा बनाने वाली सैकड़ों विदेशी कंपनियाँ कर रही है । और इसके इलावा ये बड़ी बड़ी कंपनियाँ वो दवाये भारत में बेच रहे हैं जो अमेरिका और यूरोप के बहुत से देशों में बैन है और जिससे देशवासियों को भयंकर बीमारियाँ हो रही है तब राजीव भाई ने इन कंपनियों के खिलाफ भी आंदोलन शुरू कर दिया ॥ राजीव भाई ने आयुर्वेद का अध्ययन किया और 3500 वर्ष पूर्व महाऋषि चरक के शिष्य वागभट्ट जी को महीनों महीनों तक पढ़ा, और बहुत ज्ञान अर्जित किया । फिर घूम घूम कर लोगों को आयुर्वेदिक चिकित्सा के बारे में बताना शुरू किया की कैसे बिना दवा खाये आयुर्वेद के कुछ नियमों का पालन कर हम सब बिना डॉक्टर के स्वस्थ रह सकते हैं और जीवन जी सकते हैं इसके अलावा हर व्यक्ति अपने शरीर की 85% चिकित्सा स्वयं कर सकता है ॥ राजीव भाई खुद इन नियमों का पालन 15 वर्ष से लगातार कर रहे थे जिस कारण वे पूर्ण स्वस्थ थे 15 वर्ष तक किसी डॉक्टर के पास नहीं गए थे ॥ वो आयुर्वेद के इतने बड़े ज्ञाता हो गए थे कि लोगों की गम्भीर से गम्भीर बीमारियाँ जैसे शुगर, बीपी, दमा, अस्थमा, हार्ट ब्लॉकेज, कोलेस्ट्रॉल आदि का इलाज करने लगे थे और लोगों को सबसे पहले बीमारी होने का असली कारण समझाते थे और फिर उसका समाधान बताते थे ॥ लोग उनके हेल्थ के लेक्चर सुनने के लिए दीवाने हो गए थे इसके इलावा वो होमोपैथी चिकित्सा के भी बड़े ज्ञाता थे होमोपैथी चिकित्सा में तो उन्हें डिग्री भी हासिल थी ॥

एक बार उनको खबर मिली कि उनके गुरु धर्मपाल जी को लकवा का अटैक आ गया है और उनके कुछ शिष्य उनको अस्पताल ले गए थे । राजीव भाई ने जाकर देखा तो उनकी आवाज पूरी जा चुकी थी हाथ पाँव चलने पूरे बंद हो गए थे । अस्पताल में उनको बांध कर रखा हुआ था । राजीव भाई धर्मपाल जी को घर ले आए और उनको एक होमियोपैथी दवा दी मात्र 3 दिन उनकी आवाज वापिस आ गई और एक सप्ताह में वो वैसे चलने फिरने लगे कि कोई देखने वाला मानने को तैयार नहीं था कि इनको कभी लकवा का अटैक आया था ॥ कर्नाटक राज्य एक बार बहुत भयंकर चिकन-गुनिया फैल गया हजारों की संख्या में लोग मरे । राजीव भाई अपनी टीम के साथ वहाँ पहुँच कर हजारों हजारों लोगों इलाज करे मृत्यु से बचाया । ये देख कर कर्नाटक सरकार ने अपनी डॉक्टरों की टीम राजीव भाई के पास भेजी और कहा कि जाकर देखो कि वो किस ढंग से इलाज कर रहे हैं । (अधिक जानकारी के लिए आप राजीव भाई के हेल्थ के लेक्चर सुन सकते हैं घंटो घंटो उन्होने स्वस्थ रहने और रोगों की चिकित्सा के व्याख्यान दिये हैं)

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इसके इलावा राजीव भाई ने यूरोप और भारत की स्मृति संस्कृति और इनकी भिन्नताओं पर गहरा अध्ययन किया और लोगों को बताया कि कैसे भारतवासी यूरोप के लोगों की मजबूरी को अपना फैशन बना रहे हैं और कैसे उनकी नकल कर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं ।। राजीव भाई का कहना था कि देश में आधुनिकीकरण के नाम पर पश्चिमीकरण हो रहा है । और इसका एक मात्र कारण देश में चल रहा अंग्रेज मैकॉले का बनाया हुआ Indian Education System है । क्योंकि आजाद भारत में सारे कानून अंग्रेजों के चल रहे हैं इसी लिए ये मैकॉले द्वारा बनाया गया शिक्षा तंत्र भी चल रहा है ।

राजीव भाई कहते थे कि इस अंग्रेज मैकॉले ने जब भारत का शिक्षा तंत्र का कानून बनाया और शिक्षा का पाठ्यक्रम तैयार किया तब इसने एक बात कही कि मैंने भारत का शिक्षा तंत्र ऐसा बना दिया है की इसमें पढ़ के निकलने वाला व्यक्ति शकल से तो भारतीय होगा पर अकल से पूरा अंग्रेज होगा हो उसकी आत्मा अंग्रेजों जैसी होगी उसको भारत की हर चीज में पिछड़ापन दिखाई देगा ।। और उसको अंग्रेज और अंग्रेजियत ही सबसे बढ़िया लगेगी ।।

इसके इलावा राजीव भाई का कहना था कि इसी अंग्रेज मैकॉले ने भारत की न्याय व्यवस्था को तोड़ कर IPC, CPC जैसे कानून बनाये और उसके बाद ब्यान दिया की मैंने भारत की न्याय पद्धति को ऐसा बना दिया है कि इसमें किसी गरीब को ईसाफ नहीं मिलेगा । सालों साल मुकदमे लटकते रहेंगे ।। मुकदमों के सिर्फ फैसले आएंगे न्याय नहीं मिलेगा ।। इस अंग्रेज शिक्षा पद्धति और अंग्रेजी न्यायव्यवस्था के खिलाफ लोगों को जागरूक करने के लिए राजीव भाई ने मैकॉले शिक्षा और भारत की प्राचीन गुरुकुल शिक्षा पर बहुत व्याख्यान दिये और इसके अतिरिक्त अपने एक मित्र आजादी बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता पवन गुप्ता जी के साथ मिल कर एक गुरुकुल की स्थापना की वहाँ वो फेल हुए बच्चों को ही दाखिल करते थे कुछ वर्ष उन बच्चों को उन्होंने प्राचीन शिक्षा पद्धति से पढ़ाया । और बच्चे बाद में इतने ज्ञानी हो गए की आधुनिक शिक्षा में पढ़े बड़े बड़े वैज्ञानिक उनके आगे दाँतों तले उंगली दबाते थे ।

राजीव जी ने रामराज्य की कल्पना को समझना चाहा । इसके लिए वे भारत अनेकों साधू संतों, रामकथा करने वालों से मिले और उनसे पूछते थे की भगवान श्री राम रामराज्य के बारे क्या कहा है ?? लेकिन कोई भी उत्तर उनको संतुष्ट नहीं कर पाया । फिर उन्होंने भारत में लिखी सभी प्रकार की रामायणों का अध्ययन किया और खुद ये हैरान हुए कि रामकथा में से भारत की सभी समस्याओं का समाधान निकलता है । फिर राजीव भाई घूम घूम कर खुद रामकथा करने लगे और उनकी रामकथा सभी संत और बाबाओं से अलग होती वो सिर्फ उसी बात पर अधिक चर्चा करते जिसे अन्य सत्य तो बताते नहीं या वो खुद ही ना जानते हैं । राजीव भाई लोगों को बताते कि किस प्रकार रामकथा में भारत की सभी समस्याओं का समाधान निकलता है । (इस बारे में अधिक जानकारी के लिए आप राजीव भाई की रामकथा वाला व्याख्यान सुन सकते हैं)

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2009 में राजीव भाई बाबा रामदेव के संपर्क में आए और बाबा रामदेव को देश की गंभीर समस्याओं और उनके समाधानों से परिचित करवाया और विदेशों में जमा कालेधन आदि के विषय में बताया और उनके साथ मिल कर आंदोलन को आगे बढ़ाने का फैसला किया ॥ आजादी बचाओ के कुछ कार्यकर्ता राजीव भाई के इस निर्णय से सहमत नहीं थे ॥ फिर भी राजीव भाई ने 5 जनवरी 2009 को भारत स्वाभिमान आंदोलन की नींव रखी ॥ जिसका मुख्य उद्देश्य लोगों को अपनी विचार धारा से जोड़ना, उनको देश की मुख्य समस्याओं का कारण और समाधान बताना ॥ योग और आयुर्वेद से लोगों को निरोगी बनाना और भारत स्वाभिमान आंदोलन के साथ जोड़ कर 2014 में देश से अच्छे लोगों को आगे लाकर एक नई पार्टी का निर्माण करना था जिसका उद्देश्य भारत में चल रही अंग्रेजी व्यवस्थाओं को पूर्ण रूप से खत्म करना, विदेशों में जमा काला धन, वापिस लाना, गौ हत्या पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाना, और एक वाक्य में कहा जाए ये आंदोलन सम्पूर्ण आजादी को लाने के लिए शुरू किया गया था ॥

राजीव भाई के व्याख्यान सुन कर मात्र ढाई महीने में 6 लाख कार्यकर्ता पूरे देश में प्रत्यक्ष रूप में इस अंदोलन से जुड़ गए थे राजीव भाई पंतजलि में भारत स्वाभिमान के कार्यकर्ताओं के बीच व्याख्यान दिया करते थे जो पंतजलि योगपीठ के आस्था चैनल पर के माध्यम से भारत के लोगों तक पहुंचा करते थे इस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से भारत स्वाभिमान अंदोलन के साथ 3 से 4 करोड़ लोग जुड़ गए थे । फिर राजीव भाई भारत स्वाभिमान आंदोलन के प्रतिनिधि बनकर पूरे भारत की यात्रा पर निकले गाँव-गाँव शहर-शहर जाया करते थे पहले की तरह व्याख्यान देकर लोगों को भारत स्वाभिमान से जुड़ने के लिए प्रेरित करते थे ॥

लगभग आधे भारत की यात्रा करने के बाद राजीव भाई 26 नवंबर 2010 को उड़ीसा से छत्तीसगढ़ राज्य के एक शहर रायगढ़ पहुंचे वहाँ उन्होंने 2 जन सभाओं को आयोजित किया । इसके पश्चात अगले दिन 27 नवंबर 2010 को जंजगीर जिले में दो विशाल जन सभाएं की इसी प्रकार 28 नवंबर बिलासपुर जिले में व्याख्यान देने से पश्चात 29 नवंबर 2010 को छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में पहुंचे । उनके साथ छत्तीसगढ़ के राज्य प्रभारी दया सागर और कुछ अन्य लोग साथ थे । दुर्ग जिले में उनकी दो विशाल जन सभाएं आयोजित थी पहली जनसभा तहसील बेमतरा में सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक थी । राजीव भाई ने विशाल जन सभा को आयोजित किया ॥ इसके बाद का कार्यक्रम सायं 4 बजे दुर्ग में था ॥ जिसके लिए वह दोपहर 2 बजे बेमतरा तहसील से रवाना हुए ।

(इसके बात की घटना विश्वास योग्य नहीं है इसके बाद की सारी घटना उस समय उपस्थित छत्तीसगढ़ के प्रभारी दयासागर और कुछ अन्य साथियों द्वारा बताई गई है) उन लोगों का कहना है गाड़ी में बैठने के बाद उनका शरीर पसीना पसीना हो गया । दयासागर ने राजीव जी से पूछा तो जवाब मिला की मुझे थोड़ी गैस सीने में चढ़ गई है शोचलाय जाऊँ तो ठीक हो जाऊंगा । फिर दयासागर तुरंत उनको दुर्ग के अपने आश्रम में ले गए वहाँ राजीव भाई शोचालय गए और जब कुछ देर बाद बाहर नहीं आए तो दयासागर ने उनको आवाज दी राजीव भाई ने दबी दबी आवाज में कहा गाड़ी स्टार्ट करो मैं निकल रहा हूँ । जब काफी देर

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बाद राजीव भाई बाहर नहीं आए तो दरवाजा खोला गया राजीव भाई पसीने से लथपत होकर नीचे गिरे हुए थे। उनको बिस्तर पर लिटाया गया और पानी छिड़का गया दयासागर ने उनको अस्पताल चलने को कहा। राजीव भाई ने मना कर दिया उन्होंने कहा होमियोपैथी डॉक्टर को दिखाएंगे। थोड़ी देर बाद होमियोपैथी डॉक्टर आकर उनको दवाईयाँ दीं। फिर भी आराम ना आने पर उनको भिलाई से सेक्टर 9 में इस्प्यात स्वयं अस्पताल में भर्ती किया गया। इस अस्पताल में अच्छी सुविधाइए ना होने के कारण उनको। अच्छे हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया। राजीव भाई एलोपैथी चिकित्सा लेने से मना करते रहे। उनका संकल्प इतना मजबूत था कि वो अस्पताल में भर्ती नहीं होना चाहते थे। उनका कहना था कि सारी जिंदगी एलोपैथी चिकित्सा नहीं ली तो अब कैसे ले लू?। ऐसा कहा जाता है कि इसी समय बाबा रामदेव ने उनसे फोन पर बात की और उनको आईसीयु में भर्ती होने को कहा।

फिर राजीव भाई 5 डॉक्टरों की टीम के निरीक्षण में आईसीयु भर्ती करवाएंगे। उनकी अवस्था और भी गंभीर होती गई और रात्रि एक से दो के बीच डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित किया। (बेमेतरा तहसील से रवाना होने के बाद की ये सारी घटना राज्य प्रभारी दयासागर और अन्य अधिकारियों द्वारा बताई गई है अब ये कितनी सच है या झूठ ये तो उनके नार्को टेस्ट करने ही पता चलेगा।) क्योंकि राजीव जी की मृत्यु का कारण दिल का दौरा बता कर सब तरफ प्रचारित किया गया। 30 नवंबर को उनके मृत शरीर को पतंजलि लाया गया जहां हजारों की संख्या में लोग उनके। और 1 दिसंबर राजीव जी का दाह किया गया।

अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे संस्कार कनखल हरिद्वार में

राजीव भाई के चाहने वालों का मे राजीव जी का चेहरा पूरा हल्का नीला, काला पड़ गया था। उनके चाहने वालों ने बार-बार उनका पोस्टमार्टम करवाने का आग्रह किया लेकिन पोस्टमार्टम नहीं करवाया गया। राजीव भाई की मौत लगभग भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की मौत से मिलती जुलती है आप सबको याद होगा ताशकंद से जब शास्त्री जी का मृत शरीर लाया गया था तो उनके भी चेहरे का रंग नीला, काला पड़ गया था। और अन्य लोगों की तरह राजीव भाई भी ये मानते थे कि शास्त्री जी को विष दिया गया था। राजीव भाई और शास्त्री जी की मृत्यु में एक जो समानता है कि दोनों का पोस्टमार्टम नहीं हुआ था। राजीव भाई ने अपने पूरे जीवन में देश भर में घूम घूम कर 5000 से ज्यादा व्याख्यान दिये। सन् 2005 तक वह भारत के पूर्व से पश्चिम उत्तर से दक्षिण चार बार भ्रमण कर चुके थे। उन्होंने विदेशी कंपनियों की नाक में दम कर रखा था।

भारत के किसी भी मीडिया चैनल ने उनको दिखाने का साहस नहीं किया। क्योंकि वह देश से जुड़े ऐसे मुद्दों पर बात करते थे की एक बार लोग सुन लें तो देश में 1857 से बड़ी क्रान्ति हो जाती। वह ऐसे ओजस्वी वक्ता थे जिनकी वाणी पर माँ सरस्वती साक्षात निवास करती थी। जब वे बोलते थे तो सोता घण्टों मन्त्र-मुग्ध होकर उनको सुना करते थे। 30

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नवम्बर 1967 को जन्मे और 30 नवंबर 2010 को ही संसार छोड़ने वाले ज्ञान के महासागर श्री राजीव दीक्षित जी आज केवल आवाज के रूप में हम सबके बीच जिंदा है उनके जाने के बाद भी उनकी आवाज आज देश के लाखों करोड़ों लोगों का मार्गदर्शन कर रही है और भारत को भारत की मान्यताओं के आधार पर खड़ा करने आखिरी उम्मीद बनी हुई है।

राजीव भाई को शत शत नमन ॥

पूरे Internet पर राजीव भाई के केवल 55 से 60 व्याख्यान ही उपलब्ध थे लेकिन उनके कुछ समर्थकों ने उनकी मृत्यु के बाद से दो ढाई साल की मेहनत कर जहां जहां राजीव भाई घूमे थे वहाँ अलग अलग लोगों से संपर्क कुल 150 व्याख्यान जुटा लिए हैं । जो नीचे दी गई website पर उपलब्ध है ॥

www.rajivdixitmp3.com

भारत की आजादी का असली इतिहास

आज से लगभग 400 साल पहले, वास्कोडीगामा आया था हिंदुस्तान, इतिहास की चोपड़ी में, इतिहास की किताब में हमसब ने पढ़ा होगा कि सन् 1498 में मई की 20 तारीख को वास्कोडीगामा हिंदुस्तान आया था।

इतिहास की चोपड़ी में हमको ये बताया गया कि वास्कोडीगामा ने हिंदुस्तान की खोज की, पर ऐसा लगता है कि जैसे वास्कोडीगामा ने जब हिंदुस्तान की खोज की, तो शायद उसके पहले हिंदुस्तान था ही नहीं। हजारों साल का ये देश है, जो वास्कोडीगामा के बाप दादाओं के पहले से मौजूद है इस दुनिया में, तो इतिहास कि चोपड़ी में ऐसा क्यों कहा जाता है कि वास्कोडीगामा ने हिंदुस्तान की खोज की,

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भारत की खोज की, और मैं मानता हूँ कि वो एकदम गलत है, वास्कोडीगामा ने भारत की कोई खोज नहीं की, हिंदुस्तान की भी कोई खोज नहीं की, हिंदुस्तान पहले से था, भारत पहले से था।

वास्कोडीगामा यहाँ आया था भारतवर्ष को लूटने के लिए, एक बात और जो इतिहास में, मेरे अनुसार बहुत गलत बताई जाती है कि वास्कोडीगामा एक बहुत बहादुर नाविक था, बहादुर सेनापति था, बहादुर सैनिक था, और हिंदुस्तान की खोज के अभियान पर निकला था, ऐसा कुछ नहीं था, सच्चाई ये है कि पुर्तगाल का वो उस ज़माने का डॉन था, माफ़िया था। जैसे आज के ज़माने में हिंदुस्तान में बहुत सारे माफ़िया किंग रहे हैं, उनका नाम लेने की जरूरत नहीं है, क्योंकि मंदिर की पवित्रता खत्म हो जाएगी, ऐसे ही बहुत सारे डॉन और माफ़िया किंग 15वीं शताब्दी में होते थे यूरोप में और 15वीं शताब्दी का जो यूरोप था। वहाँ दो देश बहुत ताकतवर थे उस ज़माने में, एक था स्पेन और दूसरा था पुर्तगाल। तो वास्कोडीगामा जो था वो पुर्तगाल का माफ़िया किंग था। सन् 1490 के आस पास से वास्को डी गामा पुर्तगाल में चोरी का काम, लुटेरे का काम, डकैती डालने का काम ये सब किया करता था, और अगर सच्चा इतिहास उसका आप खोजिए तो एक चोर और लुटेरे को हमारे इतिहास में गलत तरीके से हीरो बना कर पेश किया गया और ऐसा जो डॉन और माफ़िया था उस ज़माने का पुर्तगाल का ऐसा ही एक दुसरा लुटेरा और डॉन था, माफ़िया था उसका नाम था कोलंबस, वो स्पेन का था।

तो हुआ क्या था, कोलंबस गया था अमेरिका को लूटने के लिए और वास्कोडीगामा आया था भारतवर्ष को लूटने के लिए, लेकिन इन दोनों के दिमाग में ऐसी बात आई कहीं से, कोलंबस के दिमाग में ये किसने डाला की चलो अमेरिका को लुटा जाए, और वास्कोडीगामा के दिमाग में किसने डाला कि चलो भारतवर्ष को

लुटा जाए, तो इन दोनों को ये कहने वाले लोग कौन थे? अतुल भाई जो बता रहे थे, वही बात मैं आपसे दोहरा रहा हूँ। हुआ क्या था कि 14वीं और 15वीं शताब्दी के बीच का जो समय था, यूरोप में दो ही देश थे जो ताकतवर माने जाते थे, एक देश था स्पेन, दूसरा था पुर्तगाल, तो इन दोनों देशों के बीच में अक्सर लड़ाई झगड़े होते थे, लड़ाई झगड़े किस बात के होते थे कि स्पेन के जो लुटेरे थे, वो कुछ जहाँजो को लूटते थे तो उसकी संपत्ति उनके पास आती थी, ऐसे ही पुर्तगाल के कुछ लुटेरे हुआ करते थे वो जहाँजो को लूटते थे तो उनके पास संपत्ति आती थी, तो संपत्ति का झगड़ा होता था कि कौन-कौन संपत्ति ज्यादा रखेगा। स्पेन के पास ज्यादा संपत्ति जाएगी या पुर्तगाल के पास ज्यादा संपत्ति जाएगी, तो उस संपत्ति का बटवारा करने के लिए कई बार जो झगड़े होते थे वो वहाँ की धर्मसत्ता के पास ले जाए जाते थे, और उस ज़माने की वहाँ की जो धर्मसत्ता थी, वो क्रिस्चियनिटी की सत्ता थी, और क्रिस्चियनिटी की सत्ता 1492 में के आसपास पोप होता था जो सिक्स्थ कहलाता था, छठवा पोप।

तो एक बार ऐसे ही झगड़ा हुआ, पुर्तगाल और स्पेन की सत्ताओं के बीच में, और झगड़ा किस बात को ले कर था? झगड़ा इस बात को ले कर था कि लूट का माल जो मिले वो किसके हिस्से में ज्यादा जाए, तो उस ज़माने के पोप ने एक अध्यादेश जारी किया, आदेश जारी किया, एक नोटिफिकेशन

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जारी किया। सन्. 1492 में, और वो नोटिफिकेशन क्या था? वो नोटिफिकेशन ये था कि 1492 के बाद, सारी दुनिया की संपत्ति को उन्होंने दो हिस्सों में बाँटा, और दो हिस्सों में ऐसा बाँटा कि दुनिया का एक हिस्सा पूर्वी हिस्सा, और दुनिया का दूसरा हिस्सा पश्चिमी हिस्सा, तो पूर्वी हिस्से की संपत्ति को लूटने का काम पुर्तगाल करेगा और पश्चिमी हिस्से की संपत्ति को लूटने का काम स्पेन करेगा, ये आदेश 1492 में पोप ने जारी किया, ये आदेश जारी करते समय, जो मूल सवाल है वो ये है कि क्या किसी पोप को ये अधिकार है कि वो दुनिया को दो हिस्सों में बाँटे, और उन दोनों हिस्सों को लूटने के लिए दो अलग अलग देशों की नियुक्ति कर दे? स्पेन को कहा की दुनिया के पश्चिमी हिस्से को तुम लूटो, पुर्तगाल को कहा की दुनिया के पूर्वी हिस्से को तुम लूटो और 1492 में जारी किया हुआ वो आदेश और बुल आज भी एजिस्ट करता है।

ये क्रिस्चियनिटी की धर्मसत्ता कितनी खतरनाक हो सकती है उसका एक अंदाजा इस बात से लगता है कि उन्होंने मान लिया कि सारी दुनिया तो हमारी है और इस दुनिया को दो हिस्सों में बाँट दो पुर्तगाली पूर्वी हिस्से को लूटेंगे, स्पेनिश लोग पश्चिमी हिस्से को लूटेंगे। पुर्तगालियों को चूँकि दुनिया के पूर्वी हिस्से को लूटने का आदेश मिला पोप की तरफ से तो उसी लूट को करने के लिए वास्को डी गामा हमारे देश आया था, क्योंकि भारतवर्ष दुनिया के पूर्वी हिस्से में पड़ता है, और उसी लूट के सिलसिले को बरकरार रखने के लिए कोलंबस अमरीका गया, इतिहास बताता है कि 1492 में कोलंबस अमरीका पहुंचा, और 1498 में वास्को डी गामा हिंदुस्तान पहुंचा, भारतवर्ष पहुंचा। कोलंबस जब अमरीका पहुंचा तो उसने अमरीका में, जो मूल प्रजाति थी रेड इंडियन्स जिनको माया सभ्यता के लोग कहते थे, उन माया सभ्यता के लोगों से मार कर पिट कर सोना चांदी छिनने का काम शुरू किया। इतिहास में ये बराबर गलत जानकारी हमको दी गई कि कोलंबस कोई महान व्यक्ति था, महान व्यक्ति नहीं था, अगर गुजराती में मैं शब्द इस्तेमाल करू तो नराधम था, और वो किस दर्जे का नराधम था, सोना चांदी लूटने के लिए अगर किसी की हत्या करनी पड़े तो कोलंबस उसमे पीछे नहीं रहता था।

उस आदमी ने 14 – 15 वर्षों तक बराबर अमेरीका के रेड इंडियन लोगों को लुटा, और उस लूट से भर – भर कर जहांजब जब स्पेन गए तो स्पेन के लोगों को लगा कि अमेरिका में तो बहुत सम्पत्ति है, तो स्पेन की फ़ौज और स्पेन की आर्मी फिर अमरीका पहुंची, और स्पेन की फ़ौज और स्पेन की आर्मी ने अमेरीका में पहुँच कर 10 करोड़ रेड इंडियन्स को मौत के घाट उतार दिया, 10 करोड़ और ये दस करोड़ रेड इंडियन्स मूल रूप से अमरीका के बाशिंदे थे, ये जो अमरीका का चेहरा आज आपको दिखाई देता है, ये अमरीका 10 करोड़ रेड इंडियन की लाश पर खड़ा हुआ एक देश है, कितने हैवानियत वाले लोग होंगे, कितने नराधम किस्म के लोग होंगे, जो सबसे पहले गए अमरीका को बसाने के लिए, उसका एक अंदाजा आपको लग सकता है, आज स्थिति क्या है कि जो अमरीका की मूल प्रजा है, जिनको रेड इंडियन कहते हैं, उनकी संख्या मात्र 65000 रह गई है।

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10 करोड़ लोगों को मौत के घाट उतारने वाले लोग आज हमको सिखाते है कि हिंदुस्तान में ह्यूमन राईट की स्थिति बहुत खराब है। जिनका इतिहास ही ह्यूमन राईट के वोइलेसन्. पे टिका हुआ है, जिनकी पूरी की पूरी सभ्यता 10 करोड़ लोगों की लाश पर टिकी हुई है, जिनकी पूरी की पूरी तरक्की और विकास 10 करोड़ रेड इंडियनों लोगों के खून से लिखा गया है, ऐसे अमरीका के लोग आज हमको कहते है कि हिंदुस्तान में साहब, ह्यूमन राईट की बड़ी खराब स्थिति है, कश्मीर में, पंजाब में, वगेरह वगेरह, और जो काम मारने का, पीटने का, लोगों की हत्याएं कर के सोना लूटने का, चांदी लूटने का काम कोलंबस और स्पेन के लोगों ने अमेरीका में किया, ठीक वही काम वास्कोडीगामा ने 1498 में हिंदुस्तान में किया।

ये वास्कोडीगामा जब कालीकट में आया, 20 मई, 1498 को, तो कालीकट का राजा था उस समय झामोरिन, तो झामोरिन के राज्य में जब ये पहुंचा वास्को डी गामा, तो उसने कहा कि मैं तो आपका मेहमान हूँ, और हिंदुस्तान के बारे में उसको कहीं से पता चल गया था कि इस देश में “अतिथि देवो भव” की परंपरा, तो झामोरिन ने बेचारे ने, ये अतिथि है ऐसा मान कर उसका स्वागत किया, वास्को डी गामा ने कहा कि मुझे आपके राज्य में रहने के लिए कुछ जगह चाहिए, आप मुझे रहने की इजाजत दे दो, परमिशन दे दो। झामोरिन बेचारा सीधा सदा आदमी था, उसने कालीकट में वास्को डी गामा को रहने की इजाजत दे दी। जिस वास्को डी गामा को झामोरिन के राजा ने अतिथि बनाया, उसका आथित्य ग्रहण किया, उसके यहाँ रहना शुरू किया, उसी झामोरिन की वास्को डी गामा ने हत्या करायी, और हत्या करा के खुद वास्को डी गामा कालीकट का मालिक बना, और कालीकट का मालिक बनने के बाद उसने क्या किया कि समुद्र के किनारे है कालीकट केरल में, वहां से जो जहांज आते जाते थे, जिसमे हिन्दुस्तानी व्यापारी अपना माल भर-भर के साउथ ईस्ट एशिया और अरब के देशों में व्यापार के लिए भेजते थे, उन जहांजो पर टैक्स वसूलने का काम वास्को डी गामा करता था, और अगर कोई जहांज वास्को डी गामा को टैक्स ना दे, तो उस जहांज को समुद्र में डुबोने का काम वास्कोडीगामा करता था, और वास्कोडीगामा हिंदुस्तान में आया पहली बार 1498 में, और यहाँ से जब लूट के सम्पत्ति ले गया, तो 7 जहांज भर के सोने की अशर्फिया थी। पोर्तुगीज सरकार के जो डॉक्यूमेंट है वो बताते है कि वास्कोडीगामा पहली बार जब हिंदुस्तान से गया, लूट कर सम्पत्ति को ले कर के गया, तो 7 जहांज भर के सोने की अशर्फिया, उसके बाद दुबारा फिर आया वास्कोडीगामा। वास्कोडीगामा हिंदुस्तान में 3 बार आया लगातार लूटने के बाद, चौथी बार भी आता लेकिन मर गया, दूसरी बार आया तो हिंदुस्तान से लूट कर जो ले गया वो करीब 11 से 12 जहांज भर के सोने की अशर्फिया थी, और तीसरी बार आया और हिंदुस्तान से जो लूट कर ले गया वो 21 से 22 जहांज भर के सोने की अशर्फिया थी। इतना सोना चांदी लूट कर जब वास्को डी गामा यहाँ से ले गया तो पुर्तगाल के लोगों को पता चला कि हिंदुस्तान में तो बहुत सम्पत्ति है, और भारतवर्ष की सम्पत्ति के बारे में उन्होंने पुर्तगालियों ने पहले भी कहीं पढ़ा था, उनको कहीं से ये टेक्स्ट मिल गया था कि भारत एक ऐसा देश है, जहाँ पर महमूद गजनवी नाम का एक व्यक्ति आया,

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17 साल बराबर आता रहा, लूटता रहा इस देश को, एक ही मंदिर को, सोमनाथ का मंदिर जो वेंगवेल में है,

उस सोमनाथ के मंदिर को एक व्यक्ति, एक वर्ष आया अरबों चला गया, दूसरे साल आया, फिर गया, तीसरे साल आया, फिर लूट वो बराबर आता रहा, और लूट कर ले जाता रहा। तो वो टेक्स्ट भी उनको मिल गए थे कि एक-एक मंदिर में इतनी सम्पत्ति, इतनी पूंजी है, इतना पैसा है भारत में, तो चलो इस देश को लुटा जाए और उस ज़माने में एक जानकारी और दे दूँ, ये जो यूरोप वाले अमरीका वाले जितना अपने आप को विकसित कहे, सच्चाई ये है कि 14 वीं। और 15 वीं। शताब्दी में दुनिया में सबसे ज्यादा गरीबी यूरोप के देशों में थी, खाने पीने को भी कुछ होता नहीं था। प्रकृति ने उनको हमारी तरह कुछ भी नहीं दिया, न उनके पास नेचुरल रिसोर्सेस है, जितने हमारे पास है। न मौसम बहुत अच्छा है, न खेती बहुत अच्छी होती थी और उद्योगों का तो प्रश्न ही नहीं उठता। 13 वीं। और 14 वीं। शताब्दी में तो यूरोप में कोई उद्योग नहीं होता था, तो उनलोगों का मूलतः जीविका का जो साधन था जो वो लुटेरे बन के काम से जीविका चलाते थे, चोरी करते थे, डकैती करते थे, लूट डालते थे, ये मूल काम वाले यूरोप के लोग थे। तो उनको पता लगा कि हिंदुस्तान और भारतवर्ष में इतनी सम्पत्ति है तो उस देश को लूटा जाए, और वास्को डी गामा ने आ कर हिंदुस्तान में लूट का एक नया इतिहास शुरू किया।

महमूद गजनवी नाम का खरबों की सम्पत्ति ले कर अरबों खरबों की सम्पत्ति ले कर ले गया। और 17 साल

उससे पहले भी लूट चली हमारी, महमूद गजनवी जैसे लोग हमको लूटते रहे। लेकिन वास्को डी गामा ने आकर लूट को जिस तरह से केन्द्रित किया और ओर्गनाइजड किया वो समझने की जरूरत है, उसके पीछे पीछे क्या हुआ, पुर्तगाली लोग आए, उन्होंने 70-80 वर्षों तक इस देश को खूब जम कर लूटा। पुर्तगाली चले गए इस देश को लूटने के बाद, फिर उसके पीछे फ्रांसिसी आए, उन्होंने इस देश को खूब जमकर लुटा 70-80 वर्ष उन्होंने भी पुरे किए। उसके बाद डच आ गये हॉलैंड वाले, उन्होंने इस देश को लुटा, उसके बाद फिर अंग्रेज आ गए हिंदुस्तान में लूटने के लिए ही नहीं बल्कि इस देश पर राज्य भी करने के लिए, पुर्तगाली आए लूटने के लिए, फ्रांसिसी आए लूटने के लिए, डच आए लूटने के लिए, और फिर पीछे से अंग्रेज चले आए लूटने के लिए, अंग्रेजो ने लूट का तरीका बदल दिया। ये अंग्रेजो से पहले जो लूटने के लिए आए वो आर्मी ले कर के आए थे बंदूक ले कर के आये थे, तलवार ले के आए थे, और जबरदस्ती लूटते थे। अंग्रेजो ने क्या किया कि लूट का सिलसिला बदल दिया, और उन्होंने अपनी एक कंपनी बनाई, उसका नाम ईस्ट इंडिया रखा। ईस्ट इंडिया कंपनी को ले के सबसे पहले सुरत में आए इसी गुजरात में, ये बहुत बड़ा दुर्भाग्य है इस देश का कि जब जब इस देश की लूट हुई है इस देश की गुजरात के रास्ते हुई है।

जितने लोग इस देश को लूटने के लिए आए बाहर से वो गुजरात के रास्ते घुसे इस देश में, इसको समझिए क्यों ? क्योंकि गुजरात में सम्पत्ति बहुत थी, और आज भी है, तो अंग्रेजो को लगा कि सबसे

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पहले लूटने के लिए चलो सूरत, पूरे हिंदुस्तान में कहीं नहीं गए, सबसे पहले सूरत में आए और सूरत में आकर ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए कोठी बनानी है, ऐसा वहां के नवाब के आगे उन्होंने फरमान रखा, बेचारा नवाब सीधा सदा था, उसने अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी को कोठी बनाने के लिए जमीन दे दी, कभी आप जाइए सूरत में, वो कोठी आज भी खड़ी हुई है, उसका नाम है, कुपर विला। एक अंग्रेज था उसका नाम था जेम्स कुपर, 6 अधिकारी आए थे सबसे पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के, उनमें से एक अधिकारी था जेम्स कूपर, तो जेम्स कूपर ने अपने नाम पर उस कोठी का नाम रख दिया कुपर विला, तो ईस्ट इंडिया कंपनी की सबसे पहली कोठी बनी सूरत में, सूरत के लोगों को मालूम नहीं था, कि जिन अंग्रेजों को कोठी बनाने के लिए हम जामीन दे रहे हैं, बाद में यही अंग्रेज हमारे खून के प्यासे हो जाएंगे, अगर ये पता होता तो कभी अंग्रेजों को सूरत में ठहरने की भी जमीन नहीं मिलती।

अंग्रेजों ने फिर वही किया जो उनका असली चरित्र था। पहले कोठी बनाई, व्यापार शुरू किया, धीरे धीरे पूरे सूरत शहर में उनका व्यापार फैला, और फिर सन्। 1612 में सूरत के नवाब की हत्या करायी, जिस नवाब से जमीन लिया कोठी बनाने के लिए, उसी नवाब की हत्या करायी अंग्रेजों ने और 1612 में जब नवाब की हत्या करा दी उन्होंने, तो सूरत का पूरा एक पूरा बंदरगाह अंग्रेजों के कब्जे में चला गया। और अंग्रेजों ने जो काम सूरत में किया था सन्। 1612 में, वही काम कलकत्ता में किया, वही काम मद्रास में किया, वही काम दिल्ली में किया, वही काम आगरा में किया, वही काम लखनऊ में किया, माने जहाँ भी अंग्रेज जाते थे अपनी कोठी बनाने के लिए अपनी ईस्ट इंडिया कंपनी को ले के, उस हर शहर पर अंग्रेजों का कब्जा होता था, और ईस्ट इंडिया कंपनी का झंडा फहराया जाता था। 200 वर्षों के अंदर व्यापार के बहाने अंग्रेजों ने सारे देश को अपने कब्जे में ले लिया, 1750 तक आते आते सारा देश अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी का गुलाम हो गया।

किसी को नहीं मालूम था कि जिस ईस्ट इंडिया कम्पनी को हम व्यापार के लिए छुट दे रहे हैं, जिन अंग्रेजों को हम व्यापार के लिए जमीन दे रहे हैं, जिन अंग्रेजों को व्यापार के लिए हिंदुस्तान में हम बुला के ला रहे हैं, वही अंग्रेज इस देश के मालिक हो जाएंगे, ऐसा किसी को

अंदाजा नहीं था, अगर ये अंदाजा होता तो शायद कभी उनको छुट न मिलती, लेकिन 1750 में ये अंदाजा हुआ, और अंदाजा हुआ 1 व्यक्ति को, उसका नाम था सिराजुद्दौला,

बंगाल का नवाब था, गया कि अंग्रेज इस बनाने आए है, इस बहुत है, क्योंकि इस अंग्रेजों के खिलाफ

तो बंगाल का नवाब था सिराजुद्दौला, उसको ये अंदाजा हो देश में व्यापार करने नहीं आए है, इस देश को गुलाम देश को लूटने के लिए आए है। क्योंकि इस देश में सम्पत्ति देश में पैसा बहुत है, तो सिराजुद्दौला ने फैसला किया कि कोई बड़ी लड़ाई लड़नी पड़ेगी, और उस बड़ी को लड़ाई लड़ने के लिए सिराजुद्दौला ने युद्ध किया अंग्रेजों के खिलाफ, इतिहास की चोपड़ी में आपने पढ़ा

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होगा कि प्लासी का युद्ध हुआ, 1757 में, लेकिन इस युद्ध की एक खास बात है जो मैं आपको याद दिलाना चाहता हूँ, आज के समय में भी वो बहुत महत्वपूर्ण है। मैं बचपन में जब विद्यार्थी था कक्षा 9 में पढ़ता था, तो मैं मेरे इतिहास के अध्यापक से ये पूछता था कि सर मुझे ये बताइए कि प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों की तरफ से कितने सिपाही थे लड़ने वाले, तो मेरे अध्यापक कहते थे कि मुझको नहीं मालूम, तो मैं कहता था क्यों नहीं मालूम, तो कहते थे कि मुझे किसी ने नहीं पढ़ाया तो मैं तुमको कहाँ से पढ़ा दूँ, तो मैं उनको बराबर एक ही सवाल पूछता था कि सर आप जरा ये बताइये कि बिना सिपाही के कोई युद्ध हो सकता है कि नहीं तो फिर हमको ये क्यों नहीं पढ़ाया जाता है कि युद्ध में कितने सिपाही अंग्रेजों के पास और उसके दूसरी तरफ एक और सवाल मैं पूछता था कि अच्छा ये बताइये कि अंग्रेजों के पास कितने सिपाही थे ये तो हमको नहीं मालूम सिराजुद्दौला जो लड़ रहा था हिंदुस्तान की तरफ से उनके पास कितने सिपाही थे? तो कहते थे कि वो भी नहीं मालूम। प्लासी के युद्ध के बारे में इस देश में इतिहास की 150 किताबें हैं जो मैंने देखी है, उन 150 में से एक भी किताब में ये जानकारी नहीं दी गई है कि अंग्रेजों की तरफ से कितने सिपाही लड़ने वाले थे और हिंदुस्तान की तरफ से कितने सिपाही लड़ने वाले थे और मैं आपको सच बताऊं मैं मेरे बचपन से इस सवाल से बहुत परेशान रहा और इस सवाल का जवाब अभी 3 साल पहले मुझे मिला, वो भी हिंदुस्तान में नहीं मिला लन्दन में मिला।

लन्दन में एक इंडिया हाउस लाइब्रेरी है बहुत बड़ी लाइब्रेरी है, उस इंडिया हाउस लाइब्रेरी में हिंदुस्तान के गुलामी के 20000 से भी ज्यादा दस्तावेज़ रखे हुए हैं, जो हमारे देश में नहीं हैं वहां रखे हुए हैं, भारतवर्ष को अंग्रेजों ने कैसे तोड़ा कैसे गुलाम बनाया इसकी पूरी विस्तृत जानकारी उन 20000 दस्तावेजों में इंडिया हाउस लाइब्रेरी में मौजूद है। मेरे एक परिचित है प्रोफेसर धर्मपाल, वो 40 वर्ष तक यूरोप में रहे हैं, मैंने एक बार उनको एक चिट्ठी लिखी, मैंने कहा सर, मैं ये जानना चाहता हूँ बेसिक प्रश्न कि प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों के पास कितने सिपाही थे? तो उन्होंने कहा देखो राजीव, अगर तुमको ये जानना है तो बहुत कुछ जानना पड़ेगा, और तुम तैयार हो जानने के लिए, तो मैंने कहा मैं सब जानना चाहता हूँ। मैं इतिहास का विद्यार्थी नहीं लगा लेकिन इतिहास को समझना चाहता हूँ कि ऐसी कौन सी खास बात थी जो हम अंग्रेजों के गुलाम हो गए, ये समझ में तो आना चाहिए अपने को, कि कैसे हम अंग्रेजों के गुलाम हो गए, ये इतना बड़ा देश, 34 करोड़ की आबादी वाला देश 50 हजार अंग्रेजों का गुलाम कैसे हो गया ये समझना चाहिए, तो वो प्लासी के युद्ध पर से वो समझ में आया। उन्होंने कुछ दस्तावेज़ मुझे भेजे, फोटोकॉपी करा के और मेरे पास अभी भी है। उन दस्तावेजों को जब मैं पढ़ता था तो मुझे पता चला कि प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों के पास मात्र 300 सिपाही थे, 300 और सिराजुद्दौला के पास 18000 सिपाही थे। अब किसी भी सामने के विद्यार्थी से, बच्चे से, या सामान्य बुद्धि के आदमी से आप ये पूछें के एक बाजू में 300 सिपाही, और दूसरे बाजू में 18000 सिपाही, कौन जीतेगा? 18000 सिपाही जिनके पास हैं वो जीतेगा।

लेकिन जीता कौन ? जिनके पास मात्र 300 सिपाही थे वो जीत गए, और जिनके पास 18000 सिपाही थे वो हार गए और हिंदुस्तान के, भारतवर्ष के एक एक सिपाही के बारे में अंग्रेजों के पार्लियामेंट में ये कहा जाता था कि भारतवर्ष का 1 सिपाही अंग्रेजों के 5 सिपाही को मारने के लिए

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काफी है, इतना ताकतवर, तो इतने ताकतवर 18000 सिपाही अंग्रेजों के कमजोर 300 सिपाहियों से कैसे हारे ये बिलकुल गम्भीरता से समझने की जरूरत है, और उन दस्तावेजों को देखने के बाद मुझे पता चला कि हम कैसे हारे? अंग्रेजों की तरफ से जो लड़ने आया था उसका नाम था रोबर्ट क्लाइव, वो अंग्रेजी सेना का सेनापति था और भारतवर्ष की तरफ से जो लड़ रहा था सिराजुद्दौला, उसका भी एक सेनापति था, उसका नाम था मीर जाफर, तो हुआ क्या था रोबर्ट क्लाइव ये जनता था कि अगर भारतीय सिपाहियों से सामने से हम लड़ेंगे तो हम 300 लोग है मारे जाएंगे, 2 घंटे भी युद्ध नहीं चलेगा और क्लाइव ने इस बात को कई बार ब्रिटिश पार्लियामेंट को चिट्ठी लिख के कहा था। क्लाइव की 2 चिट्ठियाँ हैं उन दस्तावेजों में, एक चिट्ठी में क्लाइव ने लिखा कि हम सिर्फ 300 सिपाही है, और सिराजुद्दौला के पास 18000 सिपाही है। हम युद्ध जीत नहीं सकते हैं, अगर ब्रिटिश पार्लियामेंट अंग्रेजी पार्लियामेंट ये चाहती है कि हम प्लासी का युद्ध जीते, तो जरूरी है कि हमारे पास और सिपाही भेजे जाए।

उस चिट्ठी के जवाब में क्लाइव को ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक चिट्ठी मिली थी और वो बहुत मजेदार है उसको समझना चाहिए। उस चिट्ठी में ब्रिटिश पार्लियामेंट के लोगों ने ये लिखा कि हमारे पास इससे ज्यादा सिपाही है नहीं, क्यों नहीं है ? क्योंकि 1757 में जब प्लासी का युद्ध शुरू होने वाला था उसी समय अंग्रेजी सिपाही फ्रांस में नेपोलियन बोनापार्ट के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे और नेपोलियन बोनापार्ट क्या था अंग्रेजों को मार मार के फ्रांस से भगा रहा था, तो पूरी की पूरी अंग्रेजी ताकत और सेना नेपोलियन बोनापार्ट के खिलाफ फ्रांस में लड़ती थी इसी लिए वो ज्यादा सिपाही दे नहीं सकते थे, तो उन्होंने कहा अपने पार्लियामेंट में कि हम इससे ज्यादा सिपाही आपको दे नहीं सकते हैं, जो 300 सिपाही है उन्हीं से आपको प्लासी का युद्ध जीतना होगा, तो रोबर्ट क्लाइव ने अपने दो जासूस लगाए, उसने कहा देखो युद्ध लड़ेंगे तो मारे जाएंगे, अब आप एक काम करो, उसने दो अपने साथियों को कहा कि आप जाओ और सिराजुद्दौला की आर्मी में पता लगाओ कि कोई ऐसा आदमी है क्या जिसको रिश्त दे दें, जिसको लालच दे दें और रिश्त के लालच में जो अपने देश से गद्दारी करने को तैयार हो जाए, ऐसा आदमी तलाश करो। उसके दो जासूसों ने बराबर सिराजुद्दौला की आर्मी में पता लगाया कि हां एक आदमी है, उसका नाम है मीर जाफर, अगर आप उसको रिश्त दे दो, तो वो हिंदुस्तान को बेंच डालेगा। इतना लालची आदमी है और अगर आप उसको कुर्सी का लालच दे दो, तब तो वो हिंदुस्तान की 7 पुश्तों को बेंच देगा और मीर जाफर क्या था, मीर जाफर ऐसा आदमी था जो रात दिन एक ही सपना देखता था कि एक न एक दिन मुझे बंगाल का नवाब बनना है और उस ज़माने में बंगाल का नवाब बनना ऐसा ही होता था जैसे आज के ज़माने में बहुत नेता ये सपना देखते हैं कि मुझे हिंदुस्तान का प्रधानमंत्री बनना है, चाहे देश बेंचना पड़े, तो मीर जाफर के मन का ये जो लालच था कि मुझे बंगाल का नवाब बनना है, माने कुर्सी चाहिए, और मुझे पूंजी चाहिए, पैसा चाहिए, सत्ता चाहिए और पैसा चाहिए। ये दोनों लालच उस समय मीर जाफर के मन में सबसे ज्यादा प्रबल थे, तो उस लालच को रोबर्ट क्लाइव ने बराबर भांप लिया।

Mir Jafar

तो रोबर्ट क्लाइव ने मीर जाफर को चिट्ठी लिखी है, वो चिट्ठी दस्तावेजों में मौजूद है और उसकी फोटोकोपी

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मेरे पास है, उसने चिट्ठी में दो ही बातें लिखी है, देखो मीर जाफर अगर तुम अंग्रेजों के साथ दोस्ती करोगे, और ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ समझौता करोगे, तो हम तुमको युद्ध जीतने के बाद बंगाल का नवाब बनाएंगे और दूसरी बात कि जब आप बंगाल के नवाब हो जाओगे तो सारी की सारी सम्पत्ति आपकी हो जाएगी। इस सम्पत्ति में से 5 टका हमको दे देना, बाकि तुम जितना लूटना चाहो लूट लो। मीर जाफर चूँकि रात दिन ये ही सपना देखता था कि किसी तरह कुर्सी मिल जाए, और किसी तरह पैसा मिल जाए, तुरंत उसने वापस रोबर्ट क्लाइव को चिट्ठी लिखी और उसने कहा कि मुझे आपकी दोनों बातें मंजूर है, बताइए करना क्या है ? तो आखरी चिट्ठी लिखी है रोबर्ट क्लाइव ने मीर जाफर को कि आपको सिर्फ इतना करना है कि युद्ध जिस दिन शुरू होगा, उस दिन आप अपने 18000 सिपाहियों को कहिए की वो मेरे सामने सरेंडर कर दें बिना लड़े।

मीर जाफर ने कहा कि आप अपनी बात पे कायम रहोगे ? मुझे नवाब बनाना है आपको, तो रोबर्ट ने कहा कि बराबर हम अपनी बात पे कायम है, आपको हम बंगाल का नवाब बना देंगे, बस आप एक ही काम करो कि अपनी आर्मी से कहो, क्योंकि वो सेनापति था आर्मी का, तो आप अपनी आर्मी को आदेश दो कि युद्ध के मैदान में वो मेरे सामने हथियार डाल दे, बिना लड़े, मीर जाफर ने कहा कि ऐसा ही होगा और युद्ध शुरू हुआ 23 जून 1757 को। इतिहास की जानकारी के अनुसार २३ जून 1757 को युद्ध शुरू होने के 40 मिनट के अंदर भारतवर्ष के 18000 सिपाहियों ने मीर जाफर के कहने पर अंग्रेजों के 300 सिपाहियों के सामने सरेंडर कर दिया।

रोबर्ट क्लाइव ने क्या किया कि अपने 300 सिपाहियों की मदद से हिंदुस्तान के 18000 सिपाहियों को बंदी बनाया, और कलकत्ता में एक जगह है उसका नाम है फोर्ट विलियम, आज भी है, कभी आप जाइए, उसको देखिए उस फोर्ट विलियम में 18000 सिपाहियों को बंदी बना कर ले गया। 10 दिन तक उसने भारतीय सिपाहियों को भूखा रखा और उसके बाद ग्यारहवे दिन सबकी हत्या कराई और उस हत्या कराने में मीर जाफर रोबर्ट क्लाइव के साथ शामिल था, उसके बाद रोबर्ट क्लाइव ने क्या किया, उसने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की हत्या कराई मुर्शिदाबाद में, क्योंकि उस जमाने में बंगाल की राजधानी मुर्शिदाबाद होती थी, कलकत्ता नहीं। सिराजुद्दौला की हत्या कराने में रोबर्ट क्लाइव और मीर जाफर दोनों शामिल थे। और नतीजा क्या हुआ ? बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला मारा गया, ईस्ट इंडिया कंपनी को भागने का सपना देखता था इस देश में वो मारा गया, और जो ईस्ट इंडिया कंपनी से दोस्ती वो बंगाल का नवाब हो गया, मीर

करने की बात करता था जाफर।

इस पूरे इतिहास की दुर्घटना को देखता हूँ। मैं कई बार ऐसा जाफर को मालूम नहीं था कि दोस्ती करेंगे तो इस देश की गुलामी आएगी ? मीर जाफर जानता था कि मैं मेरे कुर्सी के लालच में जो खेल खेल रहा हूँ उस खेल में इस देश को सैकड़ों वर्षों की गुलामी आ सकती है, ये वो जनता था और ये भी जानता था कि अपने स्वार्थ में, अपने लालच में मैं जो गद्दारी करने जा रहा हूँ इस देश के साथ उसके क्या दुष्परिणाम होंगे, वो भी उसको मालूम थे।

मैं एक विशेष नजर से सोचता हूँ कि क्या मीर ईस्ट इंडिया कंपनी से

इस्ट इंडिया कंपनी से

मैं ऐसा सोचता हूँ कि हम गुलामी से आजाद हो जाते, क्योंकि 18000 सिपाही हमारे पास थे और 300 अंग्रेज सिपाहियों को मारना बिलकुल आसन् काम था हमारे लिए, हम 1757 में ही अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हो जाते एक बात और दूसरी बात ये जो 200 वर्षों की गुलामी हमको झेलनी पड़ी 1757 से 1947 तक, और उस 200 वर्ष की गुलामी को भागने के लिए 6 लाख लोगों की जो कुर्बानियां हमको देनी पड़ी, वो बच गया होता। भगत सिंह, चंद्रशेखर, उधम सिंह, तात्या टोपे, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, सुभाष चन्द्र बोस, ऐसे ऐसे नौजवानों की कुर्बानिया दी है ये कोई छोटे मोटे लोग नहीं थे। सुभाष चन्द्र बोस तो आईपीएस टोपर थे, उधम सिंह चाहता तो आध्याशी कर सकता था, बड़े बाप का बेटा था। भगत सिंह और चंद्रशेखर की भी यही हैसियत थी, चाहते तो जिन्दगी की, जवानी की रंगरलियां मानते और अपनी नौजवानी को ऐसे फंदे में नहीं फ़साते, ये सारे वो नौजवान थे जिनका खून इस देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण था। 6 लाख ऐसे नौजवानों की कुर्बानियां जो हमने दी, वो नहीं देनी पड़ती और अंग्रेजों की जो यातनाएँ सही, जो अपमान हमने बर्दास्त किया, वो नहीं करना पड़ता अगर एक आदमी नहीं होता, मीर जाफ़र। लेकिन चूँकि मीर जाफ़र था, मीर जाफ़र का लालच था, कुर्सी का और पैसे का, उस लालच ने इस देश को 200 वर्ष के लिए गुलाम बना दिया।।।

और मैं आपसे यही कहने आया हूँ कि 1757 में तो एक मीर जाफ़र था आज हिंदुस्तान में हज़ारों मीर जाफ़र है। जो देश को वैसे ही गुलाम बनाने में लगे हुए है जैसे मीर जाफ़र ने बनाया था, मीर जाफ़र ने क्या किया था, विदेशों कंपनी को समझौता किया था बुला के, और विदेशी कंपनी से समझौता करने के चक्कर में उसे कुर्सी मिली थी और पैसा मिला था। आज जानते हैं हिंदुस्तान का जो नेता प्रधानमंत्री बनता है, हिंदुस्तान का जो नेता मुख्यमंत्री बनता है वो सबसे पहला काम जानते हैं क्या करता है ? प्रेस कॉन्फ़्रेंस करता है और कहता है विदेशी कंपनी वालो तुम्हारा स्वागत है, आओ यहाँ पर और बराबर इस बात को याद रखिए ये बात 1757 में मीर जाफ़र ने कही थी ईस्ट इंडिया कंपनी से कि अंग्रेजों तुम्हारा स्वागत है, उसके बदले में तुम इतना ही करना कि मुझे कुर्सी दे देना और पैसा दे देना। आज के नेता भी वही कह रहे हैं, विदेशी कंपनी वालों तुम्हारा स्वागत है।

और हमको क्या करना, हमको कुछ नहीं, मुख्यमंत्री बनवा देना, प्रधानमंत्री बनवा देना। 100 – 200 करोड़ रूपये की रिश्त दे देना, बेफ़ोर्स के माध्यम से हो के एनरों के माध्यम से हो। हम उसी में खुश हो जाएँगे, सारा देश हम आपके हवाले कर देंगे। ये इस समय चल रहा है। और इतिहास की वही दुर्घटना दोहराइ जा रही है जो 1757 में हो चुकी है। और मैं आपसे मेरे दिल का दर्द रहा रहा हूँ कि एक ईस्ट इंडिया कंपनी इस देश को 200 – 250 वर्ष इस देश को गुलाम बना सकती है, लूट सकती है तो आज तो इन मीर जफ़रों ने 8992 विदेशी कम्पनियों को बुलाया है। ।।

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