तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
६२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
६२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
( इन्द्रियदमन ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इन्हें सदा करता रहे ] । शम ( मनोनिग्रह ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ ये सर्वदा कर्तव्य हैं ] । अग्नि ( अग्न्याधान ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इनका अनुष्ठान करे ] । अग्निहोत्र तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ ये नित्य कर्तव्य हैं ] । अतिथि ( अतिथिसत्कार ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इनका नियम- से अनुष्ठान करे ] । मानुषकर्म ( विवाहादि लौकिक व्यवहार ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इन्हें करता रहे ] । प्रजा ( प्रजा उत्पन्न करना ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [-ये सदा ही कर्तव्य हैं ] । प्रजन ( ऋतु- कालमें भार्यागमन ) तथा [ इसके साथ ] स्वाध्याय और प्रवचन [ करता रहे ] । प्रजाति ( पौत्रोत्पत्ति ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इनका नियतरूपसे अनुष्ठान करे ] । सत्य ही [ अनुष्ठान करने योग्य है ] ऐसा रथीतरका पुत्र सत्यवचा मानता है । तप ही [ नित्य अनुष्ठान करने योग्य है ] ऐसा नित्य तपोनिष्ठ पौरुशिष्ठिका मत है । स्वाध्याय और प्रवचन ही [ कर्त्तव्य हैं ] ऐसा मुद्गलके पुत्र नाकका मत है । अतः वे ( स्वाध्याय और प्रवचन ) ही तप हैं, वे ही तप हैं ॥ १ ॥
| [मूल भाष्य] | [हिन्दी अनुवाद] |
|---|---|
| ऋतमिति व्याख्यातम् । स्वा-<br>ध्यायोऽध्ययनम् । प्रवचनमध्या-<br>पनं ब्रह्मयज्ञो वा । एतान्यता-<br>दीन्यनुष्ठेयानीति वाक्यशेषः ।<br>सत्यं च सत्यवचनं यथाव्या-<br>ख्यातार्थं वा । तपः कृच्छ्रादि ।<br>दमो बाह्यकरणोपशमः । शमो-<br>ऽन्तःकरणोपशमः । अग्नय आधा- | 'ऋत'—इसकी व्याख्या पहले<br>[ ऋतं वदिष्यामि—इस वाक्यमें ] की<br>जा चुकी है । 'स्वाध्याय' अध्ययनको<br>कहते हैं, तथा 'प्रवचन' अध्यापन<br>या ब्रह्मयज्ञका नाम है । ये ऋत<br>आदि अनुष्ठान किये जाने योग्य<br>हैं—यह वाक्यशेष है । सत्य—सत्य-<br>वचन अथवा जैसा पहले [ सत्यं<br>वदिष्यामि—इस वाक्यमें ] व्याख्या<br>की गयी है, वह; तप—कृच्छ्रादि; दम—<br>बाह्य इन्द्रियोंका निग्रह; शम—चित्त-<br>**की शान्ति; |
अनु० ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३
तव्याः । अग्निहोत्रं च होतव्यम् । | हैं ] । अग्नियोंका आधान करना अतिथयश्च पूज्याः । मानुषमिति | चाहिये। अग्निहोत्र होम करने योग्य लौकिकः संव्यवहारः, तच्च | है । अतिथियोंका पूजन करना चाहिये । मानुष यानी लौकिक यथाप्राप्तमनुष्ठेयम् । प्रजा चोत्पा- | व्यवहार; उसका भी यथाप्राप्त द्या । प्रजननश्च प्रजननमृतौ | अनुष्ठान करना चाहिये । प्रजा उत्पन्न करनी चाहिये । प्रजन- भार्यागमनमित्यर्थः । प्रजातिः | प्रजनन-ऋतुकालमें भार्यागमन और पौत्रोत्पत्तिः पुत्रो निवेशयितव्य | प्रजाति-पौत्रोत्पत्ति अर्थात् पुत्रको इत्येतत् । | स्त्रीपरिग्रह कराना चाहिये । सर्वैरेतैः कर्मभिर्युक्तस्यापि | इन सब कर्मोंसे युक्त पुरुषको [स्वाध्यायप्रवचन-सहयोगकारणम्] स्वाध्यायप्रवचने | भी स्वाध्याय और प्रवचनका यत्न- यत्ततोऽनुष्ठेये इत्येव- | पूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये-इसी- मर्धं सर्वेण सह स्वाध्यायप्रवचन- | लिये इन सबके साथ स्वाध्याय और प्रवचनको ग्रहण किया गया है । ग्रहणम् । स्वाध्यायाधीनं ह्यर्थ- | स्वाध्यायके अधीन ही अर्थज्ञान है ज्ञानम्, अर्थज्ञानायत्तं च परं | और अर्थज्ञानके अधीन ही परमश्रेय श्रेयः; प्रवचनं च तदविस्मरणार्थं | है, तथा प्रवचन उसकी अविस्मृति और धर्मकी वृद्धिके लिये है; इसलिये धर्मप्रवृद्ध्यर्थं च । अतः स्वाध्या- | स्वाध्याय और प्रवचनमें आदर यप्रवचनयोरादरः कार्यः । | ( श्रद्धा ) रखना चाहिये । सत्यमिति सत्यमेवानुष्ठातव्य- | सत्य अर्थात् सत्य ही अनुष्ठान [सत्यादिप्राधान्ये मुनीनां मतभेदाः] मिति सत्यमेव | किये जाने योग्य है-ऐसा सत्यवचा वचो यस्य सोऽयं | -सत्य ही जिसका वचन हो वह अथवा जिसका नाम ही सत्यवचा है सत्यवचा नाम वा तस्य । राथी- | वह राथीतर अर्थात् रथीतरके वंशमें तरो रथीतरस्य गोत्रो राथीतरा- | उत्पन्न हुआ राथीतर आचार्य मानता चार्यो मन्यते । तप इति तप एव | है । तप यानी तप ही कर्त्तव्य है-
६४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
६४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ कर्तव्यमिति तपोन्नित्यस्तपसि । ऐसा तपोन्नित्य-नित्य तपोनिष्ठ नित्यस्तपःपरस्तपोनित्य इति वा अथवा तपोन्नित्य नामवाला पौरुशिष्टि नाम पौरुशिष्टिः पुरुशिष्टस्या- -पुरुशिष्टका पुत्र पौरुशिष्टि आचार्य पत्यं पौरुशिष्टिराचार्यो मन्यते । मानता है । स्वाध्याय और प्रवचन स्वाध्यायप्रवचने एवानुष्ठेये इति ही अनुष्ठान किये जाने योग्य हैं- नाको नामतो मुद्गलस्यापत्यं ऐसा नाक नामवाला मुद्गलका मौद्गल्य आचार्यो मन्यते । तद्धि पुत्र मौद्गल्य आचार्य मानता है । तपस्तद्धि तपः । हि यस्मात्स्वा- वही तप है, वही तप है । ध्यायप्रवचने एव तपस्तस्मात्ते इसका तात्पर्य यह है-क्योंकि एवानुष्ठेये इति । उक्तानामपि स्वाध्याय और प्रवचन ही तप हैं, सत्यतपःस्वाध्यायप्रवचनानां पु- इसलिये वे ही अनुष्ठान किये जाने नर्ग्रहणमादरार्थम् ॥ १ ॥ योग्य हैं । पहले कहे हुए भी सत्य, तप, स्वाध्याय और प्रवचनोंका पुनर्ग्रहण उनके आदरके लिये है ॥१॥
इति शीक्षावल्ल्यां नवमोऽनुवाकः ॥ ९ ॥
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| मन्त्राम्नाय स्वाध्याय ( जप ) के
दशम अनुवाक त्रिशङ्कुका वेदानुवचन अहं वृक्षस्य रेरिवेति स्वाध्या- | ‘अहं वृक्षस्य रेरिवा’ आदि | मन्त्राम्नाय स्वाध्याय ( जप ) के यार्थो मन्त्राम्नायः । स्वाध्यायश्च | लिये है । तथा स्वाध्याय विद्या | ( ज्ञान ) की उत्पत्तिके लिये बतलाया विद्योत्पत्तये । प्रकरणात् । | गया है; यह प्रकरणसे ज्ञात होता | है; क्योंकि यह प्रकरण विद्याके विद्यार्थं हीदं प्रकरणम् । न | लिये ही है, इसके सिवा उसका | कोई और प्रयोजन नहीं जान पड़ता; चान्यार्थत्वमवगम्यते । स्वाध्या- | क्योंकि स्वाध्यायके द्वारा जिसका | चित्त शुद्ध हो गया है उसीको येन च विशुद्धसत्त्वस्य विद्योत्प- | विद्याकी उत्पत्ति होना सम्भव है । त्तिरवकल्प्यते । | अहं वृक्षस्य रेरिवा । कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव । ऊर्ध्व- पवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि । द्रविणꣳसवर्चसम् । सुमेधा अमृतोक्षितः । इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम् ॥ १ ॥ मैं [ अन्तर्यामीरूपसे उच्छेदस्वरूप संसार- ] वृक्षका प्रेरक हूँ । मेरी कीर्ति पर्वतशिखरके समान उच्च है । ऊर्ध्वपवित्र ( परमात्मारूप कारण- वाला ) हूँ । अन्नवान् सूर्यमें जिस प्रकार अमृत है उसी प्रकार मैं भी शुद्ध अमृतमय हूँ । मैं प्रकाशमान [ आत्मतत्त्वरूप ] धन, सुमेधा ( सुन्दर मेधावाला ) और अमरणधर्मा तथा अक्षित ( अव्यय ) हूँ, अथवा अमृतसे सिक्त ( भीगा हुआ ) हूँ—यह त्रिशङ्कु ऋषिका वेदानुवचन है ॥ १ ॥ तै० उ० ९—१०— CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
६६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
६६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━
अहं वृक्षस्योच्छेदात्मकस्य | मैं अन्तर्यामीरूपसे वृक्ष अर्थात् संसारवृक्षस्य रेरिवा प्रेरयिता- | उच्छेदात्मक संसाररूप वृक्षका प्रेरक ऽन्तर्याम्यात्मना । कीर्तिः ख्या- | हूँ । मेरी कीर्ति-प्रसिद्धि पर्वतके तिर्गिरेः पृष्ठमिवोच्छ्रिता मम । | पृष्ठभागके समान ऊँची है । मैं ऊर्ध्व- ऊर्ध्वपवित्र ऊर्ध्वं कारणं पवित्रं | पवित्र हूँ—पवित्र—पावन अर्थात् पावनं ज्ञानप्रकाश्यं पवित्रं परं | ज्ञानसे प्रकाशित होने योग्य पवित्र ब्रह्म यस्य सर्वात्मनो मम सो- | परब्रह्म जिस मुझ सर्वात्माका ऽहमूर्ध्वपवित्रः । वाजिनीव वाज- | ऊर्ध्व यानी कारण है वह वतीव । वाजमन्नं तद्वति सवित- | मैं ऊर्ध्वपवित्र हूँ । 'वाजिनि रीत्यर्थः । यथा सवितर्यमृतमा- | इव'—वाजवान्के समान--वाज अर्थात् त्मतत्त्वं विशुद्धं प्रसिद्धं श्रुति- | अन्न उससे युक्त सूर्यके समान, स्मृतिशतेभ्य एवं स्वमृतं शोभनं | जिस प्रकार सैकड़ों श्रुति-स्मृतियों- विशुद्धमात्मतत्त्वमस्मि भवामि । | के अनुसार सूर्यमें विशुद्ध द्रविणं धनं सवर्चसं दीप्ति- | अमृत यानी आत्मतत्त्व प्रसिद्ध है मत्तदेवात्मतत्त्वमस्मीत्यनुवर्तते । | उसी प्रकार मैं भी सु अमृत अर्थात् ब्रह्मज्ञानं वात्मतत्त्वप्रकाश- | शोभन-विशुद्ध आत्मतत्त्व हूँ । कत्वात्सवर्चसम् । द्रविणमिव | वही मैं आत्मतत्त्व सवर्चस— द्रविणं मोक्षसुखहेतुत्वात् । | दीप्तिशाली द्रविण यानी धन हूँ—इस अस्मिन्पक्षे प्राप्तं मयेत्यध्याहारः | प्रकार यहाँ 'अस्मि (हूँ)' क्रिया- कर्तव्यः । | की अनुवृत्ति की जाती है । अथवा | आत्मतत्त्वका प्रकाशक होनेसे तेजस्वी | ब्रह्मज्ञान, जो मोक्षसुखका हेतु होने- | के कारण धनके समान धन है, | [ मुझे प्राप्त हो गया है ]—इस | पक्षमें [ 'अस्मि' क्रियाकी अनुवृत्ति | न करके ] 'मया प्राप्तम्' ( वह | मुझे प्राप्त हो गया है ) इसका | अध्याहार करना चाहिये ।
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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७
| [शाङ्करभाष्यम्] | [भाष्यार्थ] |
|---|---|
| सुमेधाः शोभना मेधा सर्व-<br>ज्ञलक्षणा यस्य मम सोऽहं<br>सुमेधाः । संसारस्थित्युत्पत्त्युप-<br>संहारकौशल्योगात्सुमेधस्त्वम् ।<br>अत एवामृतोऽमरणधर्माक्षितो-<br>ऽक्षीणोऽव्ययः, अक्षतो वा; अमृतेन<br>वोक्षितः सिक्तः । “अमृतोक्षितो-<br>ऽहम्” इत्यादि ब्राह्मणम् ।<br><br>इत्येवं त्रिशङ्कोऋर्षेर्ब्रह्मभूतस्य<br>ब्रह्मविदो वेदानुवचनम्; वेदो<br>वेदनमात्मैकत्वविज्ञानं तस्य<br>प्राप्तिमनु वचनं वेदानुवचनम् ।<br>आत्मनः कृतकृत्यताख्यापनार्थं<br>वामदेववत्त्रिशङ्कुनार्षेण दर्शनेन<br>दृष्टो मन्त्राम्नाय आत्मविद्या-<br>प्रकाशक इत्यर्थः ।<br><br>अस्य च जपो विद्योत्पत्त्य-<br>र्थोऽवगम्यते । ऋतं चेत्यादि- | सुमेधा—जिस मेरी मेधा शोभन अर्थात् सर्वज्ञत्वलक्षणवाली है वह मैं सुमेधा हूँ । संसारकी स्थिति, उत्पत्ति और संहार—इसका कौशल होनेके कारण मेरा सुमेधस्त्व है । इसीसे मैं अमृत—अमरणधर्मा और अक्षित—अक्षीण यानी अव्यय अथवा अक्षय हूँ । अथवा, [ तृतीयातत्पुरुष समास माननेपर ] अमृतेन उक्षितः अमृतसे सिक्त हूँ । “ मैं अमृतसे उक्षित हूँ” ऐसा ब्राह्मणवाक्य भी है ।<br><br>इस प्रकार यह ब्रह्मभूत ब्रह्मवेत्ता त्रिशङ्कु ऋषिका वेदानुवचन है । वेद वेदन अर्थात् आत्मैकत्वविज्ञानको कहते हैं उसकी प्राप्तिके अनु—पीछेका वचन ‘वेदानुवचन’ कहलाता है । तात्पर्य यह है कि अपनी कृतकृत्यता प्रकट करनेके लिये वामदेवके समान * त्रिशङ्कु ऋषिद्वारा आर्षदृष्टिसे देखा हुआ यह मन्त्राम्नाय आत्मविद्याका प्रकाश करनेवाला है ।<br><br>इसका जप विद्याकी उत्पत्तिके लिये माना जाता है । इस ‘ऋतं |
* देखिये ऐतरेयोपनिषद् २ । १ । ५
६८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
६८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ कर्मोपन्यासादनन्तरं च वेदानु- | च' इत्यादि अनुवाकमें धर्मका वचनपाठादेतदवगम्यत एवं | उपन्यास ( उल्लेख ) करनेके | अनन्तर वेदानुवचनका पाठ करनेसे श्रौतस्मार्तेषु नित्येषु कर्मसु | यह जाना जाता है कि इस प्रकार युक्तस्य निष्कामस्य परं ब्रह्म | श्रौत और स्मार्त नित्यकर्मोंमें लगे विविदिषोराणानि दर्शनानि प्रा- | हुए परब्रह्मके निष्काम जिज्ञासुके प्रति | आत्मा आदिसे सम्बन्धित आर्षदर्शनों- दुर्भवन्त्यात्मादिविषयाणीति॥१॥ | का प्रादुर्भाव हुआ करता है ॥ १ ॥ इति शीक्षावल्ल्यां दशमोऽनुवाकः ॥ १० ॥ एकादश अनुवाक वेदाध्ययनके अनन्तर शिष्यको आचार्यका उपदेश वेदमनूच्येत्येवमादिकर्तव्य- | ब्रह्मात्मैक्यविज्ञानसे पूर्व श्रौत प्राग्ब्रह्मविज्ञानात् कर्मविधिः | तोपदेशारम्भः प्रा- | और स्मार्तकर्मोंका नियमसे अनुष्ठान | ग्ब्रह्मविज्ञानान्निय- | करना चाहिये— इसीलिये ‘वेदम- मेन कर्तव्यानि श्रौतस्मार्त- | नूच्य’ इत्यादि श्रुतिसे उनकी | कर्तव्यताके उपदेशका आरम्भ किया कर्माणीत्येवमर्थः। अनुशासनश्रुतेः | जाता है; क्योंकि [ ‘अनुशास्ति’ पुरुषसंस्कारार्थत्वात् । संस्कृतस्य | ऐसी ] जो अनुशासन-श्रुति है वह | पुरुषके संस्कारके लिये है; क्योंकि जो हि विशुद्धसत्त्वस्यात्मज्ञानमञ्ज- | पुरुष संस्कारयुक्त और विशुद्धचित्त सैवोत्पद्यते । “तपसा कल्मषं | होता है उसे अनायास ही आत्मज्ञान हन्ति विद्ययामृतमश्नुते” ( मनु० | प्राप्त हो जाता है । इस सम्बन्धमें | “तपसे पापका नाश करता है और १२ ! १०४ ) इति स्मृतिः । | ज्ञानसे अमरत्व लाभ करता है” ऐसी वक्ष्यति च-“तपसा ब्रह्म विजि- | स्मृति है । आगे ऐसा कहेंगे भी कि
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अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९
ज्ञासस्व" (तै० उ० ३ । २ । ५) | “तपसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा कर” इति । अतो विद्योत्पत्त्यर्थमनुष्ठे- | अतः ज्ञानकी उत्पत्तिके लिये कर्म यानि कर्माणि । अनुशास्तीत्यनु- | करने चाहिये । ‘अनुशास्ति’ इसमें शासनशब्दादनुशासनातिक्रमे हि | ‘अनुशासन’–ऐसा शब्द होनेके दोषोत्पत्तिः । | कारण उस अनुशासनका अति- | क्रमण करनेपर दोषकी उत्पत्ति | होगी । प्रागुपन्यासाच्च कर्मणाम् । | कर्मोंका उपन्यास पहले किया केवलब्रह्मविद्यारम्भाच्च पूर्वं | जानेके कारण भी [ यह निश्चय कर्माण्युपन्यस्तानि । उदितायां | होता है कि ये कर्म विद्याकी उत्पत्ति- च ब्रह्मविद्यायाम् “अभयं प्रतिष्ठां | के लिये हैं ] । कर्मोंका उपन्यास विन्दते” (तै० उ० २ । ७ । १) | केवल ब्रह्मविद्याका निरूपण “न बिभेति कुतश्चन” (तै० उ० | आरम्भ करनेसे पूर्व ही किया २।९।१) “किमहं साधु नाक- | गया है । ब्रह्मविद्याका उदय रवम्” (तै० उ० २ । ९ । १) | होनेपर तो “अभय प्रतिष्ठाको प्राप्त इत्येवमादिना कर्मनैष्किञ्चन्यं | कर लेता है” “किसीसे भी भय दर्शयिष्यति; इत्यतोऽवगम्यते | नहीं मानता” “मैंने कौन-सा शुभ पूर्वोपचितदुरितक्षयद्वारेण | कर्म नहीं किया” इत्यादि वाक्योंद्वारा विद्योत्पत्त्यर्थानि कर्माणीति । | कर्मोंकी निष्किञ्चनता ही दिखलायेंगे । मन्त्रवर्णाच्च—“अविद्यया मृत्युं | इससे विदित होता है कि कर्म पूर्व- तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते” | सञ्चित पापोंके क्षयके द्वारा ज्ञानकी (ई० उ० ११) इति । ऋता- | प्राप्तिके ही लिये हैं । “अविद्या | ( कर्म ) से मृत्यु ( अधर्म ) को | पार करके विद्या ( उपासना ) से | अमरत्व लाभ करता है” इस मन्त्र- | वर्णसे भी यही बात प्रमाणित होती | है । अतः पहले ( नवम अनुवाकमें )
७० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
७० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ दीनां पूर्वत्रोपदेश आनर्थक्य- | जो ऋतादिका उपदेश किया है वह परिहारार्थः । इह तु ज्ञानोत्पत्त्य- | उनके आनर्थक्यकी निवृत्तिके लिये है । तथा यहाँ ज्ञानकी उत्पत्तिके र्थत्वात्कर्तव्यतानियमार्थः । | हेतु होनेसे उनकी कर्तव्यताका नियम करनेके लिये है । वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति । सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय प्रियं धन- माहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः। सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् ॥१॥ देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् । मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यनवद्यानि कर्माणि । तानि सेवितव्यानि । नो इतराणि । यान्यस्माकँसुचरितानि । तानि त्वयोपास्यानि ॥ २ ॥ नो इतराणि । ये के चास्मच्छ्रेयांसो ब्राह्मणाः । तेषां त्वयासनेन प्रश्वसितव्यम् । श्रद्धया देयम् । अश्रद्धयाऽदेयम् । श्रिया देयम् । ह्रिया देयम् । भिया देयम् । संविदा देयम् । अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात् ॥ ३ ॥ ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तत्र वर्तेरन् । तथा तत्र वर्तेथाः । अथाभ्याख्यातेषु । ये तत्र ब्राह्मणाः CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१
संमर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तेषु वर्तेरन् । तथा तेषु वर्तेथाः । एष आदेशः । एष उपदेशः । एषा वेदोपनिषत् । एतदनुशासनम् । एव- मुपासितव्यम् । एवमु चैतदुपास्यम् ॥ ४ ॥ वेदाध्ययन करानेके अनन्तर आचार्य शिष्यको उपदेश देता है— सत्य बोल । धर्मका आचरण कर । स्वाध्यायसे प्रमाद न कर । आचार्यके लिये अभीष्ट धन लाकर [ उसकी आज्ञासे स्त्रीपरिग्रह कर और ] सन्तान- परम्पराका छेदन न कर । सत्यसे प्रमाद नहीं करना चाहिये । धर्मसे प्रमाद नहीं करना चाहिये । कुशल ( आत्मरक्षामें उपयोगी ) कर्मसे प्रमाद नहीं करना चाहिये । ऐश्वर्य देनेवाले माङ्गलिक कर्मोंसे प्रमाद नहीं करना चाहिये । स्वाध्याय और प्रवचनसे प्रमाद नहीं करना चाहिये ॥ १ ॥ देवकार्य और पितृकार्योंसे प्रमाद नहीं करना चाहिये । तू मातृदेव ( माता ही जिसका देव है ऐसा ) हो, पितृदेव हो, आचार्य- देव हो और अतिथिदेव हो । जो अनिन्द्य कर्म हैं उन्हींका सेवन करना चाहिये—दूसरोंका नहीं । हमारे ( हम गुरुजनोंके ) जो शुभ आचरण हैं तुझे उन्हींकी उपासना करनी चाहिये ॥ २ ॥ दूसरे प्रकारके कर्मोंकी नहीं । जो कोई [ आचार्यादि धर्मोंसे युक्त होनेके कारण ] हमारी अपेक्षा भी श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं उनका आसनादिके द्वारा तुझे आश्वासन ( श्रमापहरण ) करना चाहिये । श्रद्धापूर्वक देना चाहिये । अश्रद्धापूर्वक नहीं देना चाहिये । अपने ऐश्वर्यके अनुसार देना चाहिये । लज्जापूर्वक देना चाहिये । भय मानते हुए देना चाहिये । संवित्—मैत्री आदि कार्यके निमित्तसे देना चाहिये । यदि तुझे कर्म या आचारके विषयमें कोई सन्देह उपस्थित हो ॥ ३ ॥ तो वहाँ जो विचारशील, कर्ममें नियुक्त, आयुक्त ( स्वेच्छासे कर्मपरायण ), अरूक्ष ( सरलमति ) एवं धर्माभिलाषी ब्राह्मण हों, उस प्रसङ्गमें वे जैसा व्यवहार करें वैसा ही तू भी कर । इसी प्रकार जिनपर संशययुक्त दोष आरोपित किये गये हों उनके विषयमें, वहाँ जो विचारशील, कर्ममें
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७२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
७२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ नियुक्त अथवा आयुक्त (दूसरोंसे प्रेरित न होकर स्वतः कर्ममें परायण ), सरलहृदय और धर्माभिलाषी ब्राह्मण हों, वे जैसा व्यवहार करें तू भी वैसा ही कर । यह आदेश—विधि है, यह उपदेश है, यह वेदका रहस्य है और [ ईश्वरकी ] आज्ञा है । इसी प्रकार तुझे उपासना करनी चाहिये—ऐसा ही आचरण करना चाहिये ॥ ४ ॥ वेदमन्नूच्याध्याप्याचार्योऽन्ते- | वेदका अध्ययन करानेके अधीतवेदस्य वासिनं शिष्यमनु- | अनन्तर आचार्य अन्तेवासी—शिष्य- कर्तव्यनिरूपणम् शास्ति ग्रन्थग्रहणा- | को उपदेश करता है; अर्थात् ग्रन्थ- ग्रहणके पश्चात् अनुशासन करता दनु पश्चाच्छास्ति तदर्थं ग्राहयती- | है—उसका अर्थ ग्रहण कराता है । इससे ज्ञात होता है कि वेदाध्ययन त्यर्थः। अतोऽवगम्यतेऽधीतवेदस्य | कर चुकनेपर भी ब्रह्मचारीको बिना धर्मजिज्ञासा किये गुरुकुलसे समा- धर्मजिज्ञासामकृत्वा गुरुकुलान्न | वर्तन ( अपने घरकी ओर प्रत्या- गमन ) नहीं करना चाहिये । समावर्तितव्यमिति । "बुद्ध्वा | “कर्मोंका यथावत् ज्ञान प्राप्त करके उनके अनुष्ठानका आरम्भ करे” इस कर्माणि चारभेत्” इति स्मृतेश्च । | स्मृतिसे भी यही सिद्ध होता है । किस प्रकार उपदेश करता है ? सो कथमनुशास्तीत्याह— | बतलाते हैं— सत्यं वद यथाप्रमाणावगतं | सत्य बोल अर्थात् जो कहने- योग्य बात प्रमाणसे जैसी जानी गयी हो उसे उसी प्रकार कह । वक्तव्यं तद्वद । तद्वद्धर्मं चर । | इसी प्रकार धर्मका आचरण कर । 'धर्म' यह अनुष्ठान करनेयोग्य धर्म इत्यनुष्ठेयानां सामान्यवचनं | कर्मोंका सामान्यरूपसे वाचक है; क्योंकि सत्यादि विशेष धर्मोंका तो सत्यादिविशेषनिर्देशात् । स्वा- | निर्देश कर ही दिया है । स्वाध्याय CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ११] शाङ्करभाष्यार्थ ७३
[वाम स्तम्भः / Left Column - शाङ्करभाष्यम्]
ध्यायादध्ययनान्मा प्रमादः प्रमादं मा कार्षीः । आचार्यायाचार्यर्थं प्रियमिष्टं धनमाहृत्यानीय दत्त्वा विद्यानिष्क्रयार्थम्, आचार्येण चानुज्ञातोऽनुरूपान्दारानृत्य प्रजातन्तुं प्रजासन्तानं मा व्यव- च्छेत्सीः । प्रजासन्ततेर्विच्छित्तिर्न कर्तव्या । अनुत्पद्यमानेऽपि पुत्रे पुत्रकाम्यादिकर्मणा तदुत्पत्तौ यत्नः कर्तव्य इत्यभिप्रायः । प्रजाप्रजनप्रजातित्रयनिर्देश- सामर्थ्यात् । अन्यथा प्रजनश्चे- त्येतदेकमेवावक्ष्यत् । सत्यान्न प्रमदितव्यं प्रमादो न कर्तव्यः । सत्याच्च प्रमदनम- नृतप्रसङ्गः, प्रमादशब्दसामर्थ्यात्। विस्मृत्याप्यनृतं न वक्तव्य- मित्यर्थः । अन्यथासत्यवदन- प्रतिषेध एव स्यात् । धर्मान्न
[दक्षिण स्तम्भः / Right Column - भाष्यार्थः]
अर्थात् अध्ययनसे प्रमाद न कर । आचार्यके लिये प्रिय—उनका अभीष्ट धन लाकर और विद्यादानसे उऋण होनेके लिये उन्हें देकर आचार्यके आज्ञा देनेपर अपने अनुरूप स्त्रीसे विवाह करके प्रजातन्तु—सन्तति- क्रमका छेदन न कर । अर्थात् प्रजासन्ततिका विच्छेद नहीं करना चाहिये । तात्पर्य यह है कि यदि पुत्र उत्पन्न न हो तो भी पुत्र-काम्या (पुत्रेष्टि) आदि कर्मोंद्वारा उसकी उत्पत्तिके लिये यत्न करना ही चाहिये । [नवम अनुवाकमें ] प्रजा, प्रजन और प्रजाति—तीनोंहीका निर्देश किया गया है; उसकी सामर्थ्यसे यही बात सिद्ध होती है; अन्यथा वहाँ केवल 'प्रजन' इस एक ही साधनका निर्देश किया जाता । सत्यसे प्रमाद नहीं करना चाहिये । सत्यसे प्रमादका अभिप्राय है असत्यका प्रसंग, यह प्रमादशब्द- के सामर्थ्यसे बोधित होता है। तात्पर्य यह है कि कभी भूलकर भी असत्य- भाषण नहीं करना चाहिये; यदि ऐसा तात्पर्य न होता तो, यहाँ केवल असत्यभाषणका निषेध ही किया जाता । धर्मसे प्रमाद नहीं
७४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
७४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ प्रमादितव्यम् । धर्मशब्दस्यानुष्ठे- | करना चाहिये । 'धर्म' शब्द अनुष्ठेय यविषयत्वादननुष्ठानं प्रमादः स | कर्मविशेषका वाचक होनेसे उसका न कर्तव्यः । अनुष्ठातव्य एव | अनुष्ठान न करना ही प्रमाद है; धर्म इति यावत् । एवं कुशला- | सो नहीं करना चाहिये । अर्थात् दात्मरक्षार्थात्कर्मणो न प्रमदि- | धर्मका अनुष्ठान करना ही चाहिये । तव्यम् । भूतिर्विभूतिस्तस्यै भूत्यै | इसी प्रकार कुशल—आत्मरक्षामें भूत्यर्थान्मङ्गलयुक्तात्कर्मणो न | उपयोगी कर्मोंसे प्रमाद न करे । 'भूति' प्रमादितव्यम् । स्वाध्यायप्रवच- | वैभवको कहते हैं, उस वैभवके लिये नाभ्यां न प्रमादितव्यम् । स्वाध्या- | होनेवाले मङ्गलयुक्त कर्मोंसे प्रमाद योऽध्ययनं प्रवचनमध्यापनं | न करे । स्वाध्याय और प्रवचनसे ताभ्यां न प्रमादितव्यम् । ते हि | प्रमाद न करे । स्वाध्याय अध्ययन है नियमेन कर्तव्ये इत्यर्थः ॥ १ ॥ | और प्रवचन अध्यापन, उन दोनोंसे तथा देवपितृकार्याभ्यां न | प्रमाद न करे अर्थात् उनका नियम- प्रमादितव्यम् । दैवपित्र्ये कर्मणी | से आचरण करता रहे ॥ १ ॥ इसी कर्तव्ये । | प्रकार देवकार्य और पितृकार्योंसे भी | प्रमाद न करे, अर्थात् देवता और | पितृसम्बन्धी कर्म अवश्य करने | चाहिये । मातृदेवो माता देवो यस्य स | मातृदेव—माता है देव जिसका त्वं मातृदेवो भव स्याः । एवं | वह तू मातृदेव हो । इसी प्रकार पितृदेव आचार्यदेवो भव । | पितृदेव हो, आचार्यदेव हो, [ अतिथि- देवतावदुपास्या एत इत्यर्थः । | देव हो ] [ इनका अर्थ समझना यान्यपि चान्यान्यनवद्यान्यनि- | चाहिये ] । तात्पर्य यह है कि ये न्दितानि शिष्टाचारलक्षणानि | सब देवताके समान उपासना कर्माणि तानि सेवितव्यानि | करनेयोग्य हैं । इसके सिवा और कर्तव्यानि त्वया । नो न कर्त- | भी जो अनवद्य—अनिन्द्य यानी | शिष्टाचाररूप कर्म हैं तेरे लिये वे ही | सेवनीय यानी कर्त्तव्य हैं । अन्य
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अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५ व्यानीतराणि सावद्यानि शिष्ट- | निन्दायुक्त कर्म-भले ही वे शिष्ट कृतान्यपि । यान्यस्माकमाचा- | पुरुषोंके किये हुए हों-तुझे नहीं र्याणां सुचरितानि शोभनचरि- | करने चाहिये । हम आचार्यलोगोंके तान्याम्नायाद्यविरुद्धानि तान्येव | भी जो सुचरित-शुभ चरित अर्थात् त्वयोपास्यान्यहृष्टार्थान्यनुष्ठेया- | शास्त्रसे अविरुद्ध कर्म हैं उन्हींकी नि, नियमेन कर्तव्यानीति या- | तुझे उपासना करनी चाहिये; अदृष्ट वत् ॥ २ ॥ नो इतराणि विपरी- | फलके लिये उन्हींका अनुष्ठान करना तान्याचार्यकृतान्यपि । | चाहिये अर्थात् तेरे लिये वे ही | नियमसे कर्त्तव्य हैं ॥ २ ॥-दूसरे ये के च विशेषिता आचार्य- | नहीं, अर्थात् उनसे विपरीत कर्म त्वादिधर्मैरस्मदस्मत्तः श्रेयांसः | आचार्यके किये हुए भी कर्त्तव्य प्रशस्यतरास्ते च ब्राह्मणा न | नहीं हैं । क्षत्रियादयस्तेषामासनेनासनदा- | जो कोई भी आचार्यत्व आदि धर्मोंके नादिना त्वया प्रश्वसितव्यम् । | कारण विशिष्ट हैं, अर्थात् हमसे श्रेष्ठ- प्रश्वसनं प्रश्वासः श्रमापनयः । | बड़े हैं तथा वे ब्राह्मण भी हैं-क्षत्रिय तेषां श्रमस्त्वयापनेतव्य इत्यर्थः । | आदि नहीं हैं, उनका आसनादिके तेषां चासने गोष्ठीनिमित्ते समु- | द्वारा अर्थात् उन्हें आसनादि देकर दिते तेषु न प्रश्वसितव्यं प्रश्वा- | तुझे प्रश्वास-प्रश्वासका अर्थ है सोऽपि न कर्तव्यः केवलं तदुक्त- | आश्वासन यानी श्रमापहरण करना सारग्राहिणा भवितव्यम् । | चाहिये । तात्पर्य यह है कि तुझे | उनका श्रम निवृत्त करना चाहिये । | तथा किसी गोष्ठी ( सभा ) के लिये | उन्हें उच्चासन प्राप्त होनेपर तुझे | प्रश्वास-दीर्घनिःश्वास भी नहीं | छोड़ना चाहिये; तुझे केवल उनके | कथनका सार ग्रहण करनेवाला | होना चाहिये । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
७६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
७६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
किं च यत्किंचिद्देयं तच्छ्रद्ध- | इसके सिवा, तुझे जो कुछ दान यैव दातव्यम् । अश्रद्धया अदेयं न | करना हो वह श्रद्धासे ही देना | चाहिये, अश्रद्धासे नहीं । श्री दातव्यम् । श्रिया विभूत्या देयं | अर्थात् विभूतिके अनुसार देना | चाहिये, ह्री-लज्जापूर्वक देना दातव्यम् । हिया लज्जया च | चाहिये, भी-भय मानते हुए देयम् । भिया भीत्या च देयम् । | देना चाहिये तथा संविद् यानी संविदा च मैत्र्यादिकार्येण | मैत्री आदि कार्यके निमित्तसे देना | चाहिये । देयम् ।
अथैवं वर्तमानस्य यदि कदा- | फिर इस प्रकार बर्तते हुए तुझे चित्ते तव श्रौते स्मार्ते वा कर्मणि | यदि किसी समय किसी श्रौत या | स्मार्त कर्म अथवा आचरणरूप वृत्ते वाचारलक्षणे विचिकित्सा | वृत्त ( व्यवहार ) में संशय उपस्थित संशयः स्यात् ॥ ३ ॥ ये तत्र तस्मिन् | हो ॥ ३ ॥ तो वहाँ उस देश देशे काले वा ब्राह्मणास्तत्र कर्मा- | या कालमें जो ब्राह्मण नियुक्त | हों—इस प्रकार 'तत्र' इस पदका दौ युक्ता इति व्यवहितेन संबन्धः | 'युक्ता' इस व्यवधानयुक्त पदसे कर्तव्यः । संमर्शिनो विचार- | सम्बन्ध करना चाहिये—[और जो ] | संमर्शी-विचारक्षम, युक्त-कर्म क्षमाः । युक्ता अभियुक्ताः कर्मणि | अथवा आचरणमें पूर्णतया तत्पर, वृत्ते वा । आयुक्ता अपरप्रयुक्ताः । | आयुक्त-किसी दूसरेसे प्रयुक्त न | होनेवाले [ अर्थात् स्वेच्छासे प्रवृत्त ], अल्रूक्षा अरूक्षा अक्रूरमतयः । | अलूक्ष-अरूक्ष अर्थात् अक्रूरमति धर्मकामा अदृष्टार्थिनोऽकामहता | ( सरलचित्त ) और धर्मकामी- | अदृष्टफलकी इच्छावाले अर्थात् इत्येतत्, स्युर्भवेयुः । ते यथा येन | कामनावश विवेकशून्य न हों, वे प्रकारेण ब्राह्मणास्तत्र तस्मिन्क- | ब्राह्मण उस कर्म या आचरणमें जिस
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अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७
[संस्कृत-मूल/भाष्य]
र्मणि वृत्ते वा वर्तेरंस्तथा त्वमपि वर्तेथाः । अथाभ्याख्यातेषु, अभ्याख्याता अभ्युक्ता दोषेण संदिह्यमानेन संयोजिताः केन- चित्तेषु च यथोक्तं सर्वमुपन- येद्ये तत्रेत्यादि । एष आदेशो विधिः । एष उपदेशः पुत्रादिभ्यः पित्रादी- नाम् । एषा वेदोपनिषद्वेदरहस्यं वेदार्थ इत्येतत् । एतदेवानुशा- सनमीश्वरवचनम् । आदेश- वाक्यस्य विधेरुक्तत्वात्सर्वेषां वा प्रमाणभूतानामनुशासनमेतत् । यस्मादेवं तस्मादेवं यथोक्तं सर्व- मुपासितव्यं कर्तव्यम् । एवमु चैतदुपास्यमुपास्यमेव चैतन्नानुपा- स्यमित्यादरार्थं पुनर्वचनम् ॥४॥
[हिन्दी-अनुवाद]
प्रकार बर्ताव करें उसी प्रकार तुझे भी बर्ताव करना चाहिये । इसी प्रकार अभ्याख्यातोंके प्रति- अभ्याख्यात-अभ्युक्त अर्थात् जिन- पर कोई संशययुक्त दोष आरोपित किया गया हो उनके प्रति जैसा पहले 'ये तत्र' इत्यादिसे कहा गया है उसी सब व्यवहारका प्रयोग करना चाहिये । यह आदेश अर्थात् विधि है, यह पुत्रादिको पिता आदिका उपदेश है, यह वेदोपनिषद्-वेदका रहस्य यानी वेदार्थ है । यही अनुशासन यानी ईश्वरका वाक्य है । अथवा आदेशवाक्य विधि है-ऐसा पहले कहा जा चुका है इसलिये यह सभी प्रमाणभूत [ उपदेशकों ] का अनुशासन है । क्योंकि ऐसा है इसलिये पहले जो कुछ कहा गया है वह सब इसी प्रकार उपासनीय-करने योग्य हैं । इस प्रकार ही इसकी उपासना करनी चाहिये-यह उपासनीय ही है, अनुपास्य नहीं है-इस प्रकार यह पुनरुक्ति उपासनाके आदरके लिये है ॥ ४ ॥
७८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
७८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ ꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤ मोक्ष-साधनकी मीमांसा
अत्रैतच्चिन्त्यते विद्याकर्मणो- | अब विद्या और कर्मका विवेक र्विवेक़ार्थं किं कर्म- [मोक्षकारण-मीमांसायां चत्वारो विकल्पाः] | [ अर्थात् इन दोनोंका फल भिन्न- भ्य एव केवलेभ्यः | भिन्न है—इसका निश्चय ] करनेके परं श्रेय उत वि- | लिये यह विचार किया जाता है द्यासव्यपेक्षेभ्य आहोस्विद्विद्या- | कि ( १ ) क्या परम श्रेयकी प्राप्ति कर्मभ्यां संहताभ्यां विद्याया वा | केवल कर्मसे होती है, ( २ ) अथवा कर्मापेक्षाया उत केवलाया एव | विद्याकी अपेक्षायुक्त कर्मसे, ( ३ ) विद्याया इति ? | किंवा परस्पर मिले हुए विद्या और | कर्म दोनोंसे, ( ४ ) अथवा कर्मकी | अपेक्षा रखनेवाली विद्यासे, ( ५ ) | या केवल विद्यासे ही ?
तत्र केवलेभ्य एव कर्मभ्यः | उनमें [ पहला पक्ष यह है कि ] स्यात् । समस्तवे- [कर्मणां मोक्ष-साधनत्वनिरासः] | केवल कर्मोंसे ही परम श्रेयकी प्राप्ति दार्थज्ञानवतः कर्मा- | हो सकती है; क्योंकि “द्विजातिको धिकारात् । “वेदः कृत्स्नोऽधि- | रहस्यके सहित सम्पूर्ण वेदका ज्ञान गन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना” | प्राप्त करना चाहिये” ऐसी स्मृति इति स्मरणात् । अधिगमश्च | होनेसे सम्पूर्ण वेदका ज्ञान रखने- सहोपनिषदर्थेनात्मज्ञानादिना । | वालेको ही कर्मका अधिकार है और “विद्वान्यजते” “विद्वान्याज- | वेदका ज्ञान उपनिषद्के अर्थभूत यति” इति च विदुष एव कर्म- | आत्मज्ञानादिके सहित ही हो ण्यधिकारः प्रदर्श्यते सर्वत्र | सकता है । “विद्वान् यज्ञ करता “ज्ञात्वा चानुष्ठानम्” इति च । | है” “विद्वान् यज्ञ कराता है” | इत्यादि वाक्योंसे सर्वत्र विद्वान्का ही | कर्ममें अधिकार दिखलाया गया | है; तथा “जानकर कर्मानुष्ठान | करे” ऐसा भी कहा है । कोई-कोई
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[अनु० ११] \qquad शाङ्करभाष्यार्थ \qquad ७९
[संस्कृत-मूल]
कृत्स्नश्च वेदः कर्मार्थ इति हि मन्यन्ते केचित् । कर्मभ्यश्चेत्परं श्रेयो नावाप्यते वेदोऽनर्थकः स्यात् ।
न; नित्यत्वान्मोक्षस्य, नित्यो हि मोक्ष इष्यते । कर्मकार्य- स्यानित्यत्वं प्रसिद्धं लोके । कर्मभ्यश्चेच्छ्रेयो नित्यं स्यात्तच्चा- निष्टम् । "तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयते" (छा० उ० ८ । १ । ६) इति न्यायानुगृहीत- श्रुतिविरोधात् ।
काम्यप्रतिषिद्धयोरनारम्भा- दारब्धस्य च कर्मण उपभोगेन क्षयान्नित्यानुष्ठानाच्च तत्प्रत्यवा- यानुत्पत्तेर्ज्ञाननिरपेक्ष एव मोक्ष इति चेत् ?
तच्च न; शेषकर्मसंभवात्तन्नि- मित्तशरीरान्तरोत्पत्तिः प्राप्नो-
[हिन्दी-अनुवाद]
ऐसा भी मानते हैं कि सम्पूर्ण वेद कर्मके ही लिये हैं; और यदि कर्मोंसे ही परम श्रेयकी प्राप्ति न हुई तो वेद भी व्यर्थ ही हो जायगा ।
सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि मोक्षका नित्यत्व है—मोक्ष नित्य ही माना गया है । और जो वस्तु कर्मका कार्य है उसकी अनित्यता लोकमें प्रसिद्ध है । यदि नित्य श्रेय कर्मोंसे होता है ऐसा मानें तो इष्ट नहीं है; क्योंकि इसका "जिस प्रकार यह कर्मोपार्जित लोक क्षीण होता है [उसी प्रकार पुण्यार्जित परलोक भी क्षीण हो जाता है]" इस न्याययुक्ता श्रुतिसे विरोध है ।
पूर्व०—काम्य और प्रतिषिद्ध कर्मोंका आरम्भ न करनेसे, प्रारब्ध कर्मोंका भोगसे ही क्षय हो जानेसे तथा नित्य कर्मोंके अनुष्ठानके कारण प्रत्यवायकी उत्पत्ति न होनेसे मोक्ष ज्ञानकी अपेक्षासे रहित ही है—यदि ऐसा मानें तो ?
सिद्धान्ती—ऐसी बात भी नहीं है; शेष (सञ्चित) कर्मोंके रह जानेसे उनके कारण अन्य शरीरकी उत्पत्ति सिद्ध होती है—इस प्रकार
८० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
[शीर्षक] ८० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
[वाम स्तम्भ] तीति प्रत्युक्तम् । कर्मशेषस्य च नित्यानुष्ठानेनाविरोधात्क्षयानुप- पत्तिरिति च । यदुक्तं समस्तवेदार्थज्ञानवतः कर्माधिकारादित्यादि, तच्च न; श्रुतज्ञानव्यतिरेकादुपासनस्य । श्रुतज्ञानमात्रेण हि कर्मण्यधि- क्रियते नोपासनमपेक्षते । उपा- सनं च श्रुतज्ञानादर्थान्तरं वि- धीयते । मोक्षफलमर्थान्तरप्रसिद्धं च स्यात् । 'श्रोतव्यः' इत्युक्त्वा तद्व्यतिरेकेण 'मन्तव्यो निदि- ध्यासितव्यः' इति यत्नान्तरवि- धानात् । मनननिदिध्यासनयोश्च प्रसिद्धं श्रवणज्ञानादर्थान्तरत्त्वम् । एवं तर्हि विद्यासव्यपेक्षेभ्यः [पार्श्व टिप्पणी: ज्ञानकर्मसमुच्चयस्य मोक्षसाधनत्वनिरासः] कर्मभ्यः स्यान्मोक्षः। विद्यासहितानां च कर्मणां भवेत्कार्या-
[दक्षिण स्तम्भ] हम इसका पहले ही खण्डन कर चुके हैं; तथा नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे सञ्चित कर्मोंका विरोध न होनेके कारण उनका क्षय होना सम्भव नहीं है । और यह जो कहा कि समस्त वेदके अर्थको जाननेवालेको ही कर्मका अधिकार होनेके कारण [ केवल कर्मसे ही निःश्रेयसकी प्राप्ति हो सकती है ] सो भी ठीक नहीं; क्योंकि उपासना श्रुतज्ञान ( गुरु- कुलमें किये हुए वाक्यविचार ) से भिन्न ही है । मनुष्य श्रुतज्ञानमात्रसे ही कर्मका अधिकारी हो जाता है, इसके लिये वह उपासनाकी अपेक्षा नहीं रखता । उपासना तो श्रुतज्ञान- से भिन्न वस्तु ही बतलायी गयी है । वह उपासना मोक्षरूप फलवाली और अर्थान्तररूपसे प्रसिद्ध है; क्योंकि 'श्रोतव्यः' ऐसा कहकर [ मनन और निदिध्यासनके लिये ] 'मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः'--इस प्रकार पृथक् यत्नान्तरका विधान किया है । लोकमें भी श्रवणज्ञानसे मनन और निदिध्यासनका अर्थान्त- रत्व प्रसिद्ध ही है । पूर्व०-इस प्रकार तब तो विद्या- की अपेक्षासे युक्त कर्मोंद्वारा ही मोक्ष हो सकता है । जो कर्म ज्ञान के सहित होते हैं उनमें कार्यान्र्तर-
मपि विषदध्यादीनां मन्त्रशर्क- | ज्वरादि कार्योंके आरम्भमें समर्थ
अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१
न्तरारम्भसामर्थ्यम् । यथा स्वतो | आरम्भका सामर्थ्य हो सकता है, मरणज्वरादिकार्यारम्भसमर्थाना- | जिस प्रकार कि स्वयं मरण और मपि विषदध्यादीनां मन्त्रशर्क- | ज्वरादि कार्योंके आरम्भमें समर्थ रादिसंयुक्तानां कार्यान्तरारम्भ- | होनेपर भी विष एवं दधि आदिमें सामर्थ्यम्, एवं विद्यासहितैः | मन्त्र और शर्करादिसे युक्त होनेपर कर्मभिर्मोक्ष आरभ्यत इति चेत् ? | कार्यान्तरके आरम्भका सामर्थ्य हो | जाता है, इसी प्रकार विद्यासहित | कर्मोंसे मोक्षका आरम्भ हो सकता | है—यदि ऐसा मानें तो ? | न; आरभ्यस्यानित्यत्वादि- | सिद्धान्ती—नहीं, जो वस्तु | आरम्भ होनेवाली होती है वह त्युक्तो दोषः । | अनित्य हुआ करती है—इस प्रकार इस | पक्षका दोष बतलाया जा चुका है । | वचनादारभ्योऽपि नित्य | पूर्व०—किन्तु [ 'न स पुनरा- | वर्तते' इत्यादि ] वचनसे तो आरम्भ एवेति चेत् ? | होनेवाला मोक्ष भी नित्य ही होता है ? | न; ज्ञापकत्वाद्वचनस्य । | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि वचन | तो केवल ज्ञापक है; यथार्थ अर्थको वचनं नाम यथाभूतस्यार्थस्य | बतलानेवालेका ही नाम 'वचन' है । ज्ञापकं नाविद्यमानस्य कर्तृ । न | वह किसी अविद्यमान पदार्थको | उत्पन्न करनेवाला नहीं होता । हि वचनशतेनापि नित्यमारभ्यत | सैकड़ों वचन होनेपर भी नित्य | वस्तुका आरम्भ नहीं किया जा आरब्धं वाविनाशि भवेत् । | सकता और न आरम्भ होनेवाली वस्तु | अविनाशी ही हो सकती है । इससे एतेन विद्याकर्मणोः संहत- | समुच्चित विद्या और कर्मके मोक्षारम्भ- योर्मोक्षारम्भकत्वं प्रत्युक्तम् । | कत्वका प्रतिषेध कर दिया गया । तै० उ० ११–१२—