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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

८४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

८४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ विरोधाच्च विद्याकर्मणोः समु- | इसके सिवा विद्या और कर्मका च्चयानुपपत्तिः । प्रविलीनकर्त्रा- | विरोध होनेके कारण भी उनका दिकारकविशेषतत्त्वविषया हि | समुच्चय नहीं हो सकता । जिसमें विद्या तद्विपरीतकारकसाध्येन | कर्ता-करण आदि कारकविशेषोंका कर्मणा विरुध्यते । न ह्येकं वस्तु | पूर्णतया लय होता है उस तत्त्वको परमार्थतः कर्त्रादिविशेषवत्तच्छू- | ( ब्रह्मको ) विषय करनेवाली विद्या न्यं चेत्युभयथा द्रष्टुं शक्यते । | अपनेसे विपरीत साधनसाध्य कर्मसे अवश्यं ह्यन्यतरन्मिथ्या स्यात् । | विरुद्ध है । एक ही वस्तु परमार्थतः अन्यतरस्य च मिथ्यात्वप्रसङ्गे | कर्ता आदि विशेषसे युक्त और उस- युक्तं यत्स्वाभाविकाज्ञानविषयस्य | से रहित—दोनों ही प्रकारसे नहीं द्वैतस्य मिथ्यात्वम् । “यत्र हि | देखी जा सकती । उनमेंसे एक द्वैतमिव भवति” ( बृ० उ० २ । | पक्ष अवश्य मिथ्या होना चाहिये । ४ । १४ ) “मृत्योः स मृत्यु- | इस प्रकार किसी एकके मिथ्यात्वका माप्नोति” ( क० उ० २ । १ । | प्रसङ्ग उपस्थित होनेपर जो स्वभाव- १०, बृ० उ० ४ । ४ । १९ ) | से ही अज्ञानका विषय है उस “अथ यत्रान्यत्पश्यति......... | द्वैतका ही मिथ्या होना उचित है, तदल्पम्” (छा० उ० ७।२४।१) | जैसा कि “जहाँ द्वैतके समान होता “अन्योऽसावन्योऽहमस्मि” ( बृ० | है” “वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता उ० १ । ४ । १० ) “उदरमन्तरं | है” “जहाँ अन्य देखता है वह अल्प कुरुते अथ तस्य भयं भवति” | है” “यह अन्य है मैं अन्य हूँ” “जो (तै० उ० २ । ७ । १) इत्यादि- | थोड़ा-सा भी अन्तर करता है उसे श्रुतिशतेभ्यः । | भय प्राप्त होता है” इत्यादि सैकड़ों | श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है ।

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अनु० ११] शाङ्करभाष्यार्थ ८५

सत्यत्वं चैकत्वस्य “एकधै- | तथा “एक रूपसे ही देखना वानुद्रष्टव्यम्” (बृ० उ० ४ । | चाहिये” “एक ही अद्वितीय” “यह ४ । २०) “एकमेवाद्वितीयम्” | सब ब्रह्म ही है”, “यह सब आत्मा (छा० उ० ६ । २ । १) “ब्रह्मै- | ही है” इत्यादि श्रुतियोंसे एकत्वकी वेद सर्वम्” (मु० उ० २ । २ । | सत्यता सिद्ध होती है। सम्प्रदान ११) “आत्मैवेद सर्वम्” | आदि कारकभेदके दिखायी न देने- (छा० उ० ७ । २५ । २) | पर कर्म होना सम्भव भी नहीं है। इत्यादिश्रुतिभ्यः । न च संप्रदा- | ज्ञानके प्रसंगमें भेददृष्टिके अपवाद नादिकारकभेदादर्शने कर्मोप- | तो सहस्रों सुननेमें आते हैं। अतः पद्यते । अन्यत्वदर्शनापवादश्च | विद्या और कर्मका विरोध है; इस- विद्याविषये सहस्रशः श्रूयते । | लिये भी उनका समुच्चय होना अतो विरोधो विद्याकर्मणोः । | असम्भव है। ऐसी दशामें पूर्वमें अतश्च समुच्चयानुपपत्तिः । तत्र | तुमने जो कहा था कि ‘परस्पर यदुक्तं संहताभ्यां विद्याकर्मभ्यां | मिले हुए विद्या और कर्म दोनोंसे मोक्ष इति, अनुपपन्नं तत् । | मोक्ष होता है’ वह सिद्ध नहीं होता। विहितत्वात्कर्मणां श्रुतिवि- | पूर्व०-कर्म भी श्रुतिविहित हैं, | अतः ऐसा माननेपर श्रुतिसे विरोध रोध इति चेत् । यद्युपमृद्य कर्त्रा- | उपस्थित होता है। यदि सर्पादि- | भ्रान्तिजनित ज्ञानका बाध करनेवाले दिकारकविशेषमात्मैकत्वविज्ञानं | रज्जु आदि विषयक ज्ञानके समान | कर्ता आदि कारकविशेषका बाध विधीयते सर्पादिभ्रान्तिविज्ञानो- | करके ही आत्मैकत्वके ज्ञानका | विधान किया जाता है तो कोई पमर्दकरज्ज्वादिविषयविज्ञानव- | विषय न रहनेके कारण कर्मका त्प्राप्तः कर्मविधिश्रुतीनां निर्विष- | विधान करनेवाली श्रुतियोंका उन

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८६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

८६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ यत्त्वाद्विरोधः । विहितानि च | (विद्याका विधान करनेवाली | श्रुतियों) से विरोध उपस्थित होता कर्माणि । स च विरोधो न | है; और कर्मोंका विधान भी | किया ही गया है तथा सभी श्रुतियाँ युक्तः । प्रमाणत्वाच्छ्रुतीनामिति | प्रमाणभूत हैं इसलिये पूर्वोक्त | विरोधका होना उचित नहीं है-यदि चेत् ? | ऐसा कहें तो ? न; पुरुषार्थोपदेशपरत्वाच्छ्रुती- | सिद्धान्ती-यह कथन ठीक नहीं; | क्योंकि श्रुतियाँ परम पुरुषार्थका नाम् । विद्योपदेशपरा तावच्छ्रुतिः | उपदेश करनेमें प्रवृत्त हैं । श्रुति | ज्ञानका उपदेश करनेमें तत्पर है । संसारात्पुरुषो मोक्षयितव्य इति | उसे संसारसे पुरुषका मोक्ष कराना | है, इसके लिये संसारकी हेतुभूत संसारहेतोरविद्याया विद्यया | अविद्याकी विद्याके द्वारा निवृत्ति | करना आवश्यक है; अतः वह निवृत्तिः कर्त्तव्येति विद्याप्रकाश- | विद्याका प्रकाश करनेवाली होकर | प्रवृत्त हुई है । इसलिये ऐसा कत्वेन प्रवृत्तेति न विरोधः । | माननेसे कोई विरोध नहीं आता । एवमपि कर्त्रादिकारकसद्भाव- | पूर्व०-किन्तु ऐसा माननेपर भी | तो कर्तादि कारककी सत्ताका प्रति- प्रतिपादनपरं शास्त्रं विरुध्यत | पादन करनेवाले शास्त्रका तो उससे | विरोध होता ही है ? एवेति चेत् ? | न; यथाप्राप्तमेव कारकास्ति- | सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है; | स्वभावतः प्राप्त कारकोंके अस्तित्वको त्वमुपादायोपात्तदुरितक्षयार्थं | स्वीकार कर सञ्चित पापोंके क्षयके | लिये कर्मोंका विधान करनेवाला कर्माणि विदधच्छास्त्रं मुमुक्षूणां | शास्त्र मुमुक्षुओं और फलकी

अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७ फलार्थिनां च फलसाधनं न | इच्छावालोंको [ उनके इष्ट ] फलकी प्राप्ति करानेका साधन है; वह कारकास्तित्वे व्याप्रीयते । उप- | कारकोंका अस्तित्व सिद्ध करनेमें चितदुरितप्रतिबन्धस्य हि विद्यो- | प्रवृत्त नहीं है । जिस पुरुषका सञ्चित पापरूप प्रतिबन्ध विद्यमान त्पत्तिर्नावकल्पते । तत्क्षये च | रहता है उसे ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं हो सकती; उसका क्षय हो जानेपर विद्योत्पत्तिः स्यात्ततश्चाविद्यानि- | ही ज्ञान होता है और तभी अविद्याकी निवृत्ति होती है तथा वृत्तिस्तत आत्यन्तिकः संसारो- | उसके अनन्तर ही संसारकी आत्यन्तिक उपरति होती है । परमः । अपि चानात्मदर्शिनो ह्यना- | इसके सिवा जो पुरुष अनात्म- दर्शी है उसे ही अनात्मवस्तु- [हाशिए पर: ज्ञानादेव तु कैवल्यम्] त्मविषयः कामः । | सम्बन्धिनी कामना हो सकती है; कामयमानश्च करो- | कामनावाला ही कर्म करता ति कर्माणि । ततस्तत्फलोप- | है और उसीसे उनका फल भोगनेके लिये उसे शरीरादिग्रहणरूप संसार- भोगाय शरीराद्युपादानलक्षणः | की प्राप्ति होती है । इसके विपरीत जो आत्मैकत्वदर्शी है उसकी दृष्टिमें संसारः । तद्व्यतिरेकेणात्मैक- | विषयोंका अभाव होनेके कारण उसे उनकी कामना भी नहीं हो सकती । त्वदर्शिनो विषयाभावात्कामानु- | आत्मा तो अपनेसे अभिन्न है, इस- त्पत्तिरात्मनि चानन्यत्वात्का- | लिये उसकी कामना भी असम्भव होनेके कारण उसे स्वात्मस्वरूपमें मानुत्पत्तौ स्वात्मन्यवस्थानं मोक्ष | स्थित होनारूप मोक्ष सिद्ध ही है । इत्यतोऽपि विद्याकर्मणोर्विरोधः । | इसलिये भी ज्ञान और कर्मका विरोध


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८८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

[Header] ८८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १


विरोधादेव च विद्या मोक्षं प्रति | है और विरोध होनेके कारण ही ज्ञान न कर्माण्यपेक्षते । | मोक्षके प्रति कर्मकी अपेक्षा नहीं | रखता । स्वात्मलाभे तु पूर्वोपचित- | हाँ, आत्मलाभमें पूर्वसञ्चित प्रतिबन्धापनयद्वारेण विद्याहेतुत्वं | पापरूप प्रतिबन्धकी निवृत्तिद्वारा प्रतिपद्यन्ते कर्माणि नित्यानीति । | नित्यकर्म ज्ञानप्राप्तिके हेतु अवश्य | होते हैं । इसीलिये इस प्रकरणमें अत एवास्मिन्प्रकरण उपन्य- | कर्मोंका उल्लेख किया गया है—यह स्तानि कर्माणीत्यवोचाम । एवं | हम पहले ही कह चुके हैं । इस | प्रकार भी कर्मका विधान करनेवाली चाविरोधः कर्मविधिश्रुतीनाम् | श्रुतियोंका [ विद्याविधायिनी श्रुतियों- अतः केवलाया एव विद्यायाः | से ] विरोध नहीं है । अतः यह | सिद्ध हुआ कि केवल विद्यासे ही परं श्रेय इति सिद्धम् । | परमश्रेयकी प्राप्ति होती है । एवं तर्ह्याश्रमान्तरानुपपत्तिः । | पूर्व०—यदि ऐसी बात है तब | तो [ गृहस्थाश्रमके सिवा ] अन्य कर्मनिमित्तत्वाद्द्योत्पत्तेः । गा- | आश्रमोंका होना भी उपपन्न नहीं | है; क्योंकि विद्याकी उत्पत्ति तो र्हस्थ्ये च विहितानि कर्माणी- | कर्मके निमित्तसे होती है और कर्मों- | का विधान केवल गृहस्थके ही लिये त्यैकाश्रम्यमेव । अतश्च यावज्जी- | किया गया है; अतः इससे एकाश्रमत्व- | की ही सिद्धि होती है । और इसलिये वादिश्रुतयोऽनुकूलतराः । | 'यावज्जीवन अग्निहोत्र करे' इत्यादि | श्रुतियाँ और भी अनुकूल ठहरती हैं । न; कर्मानैकत्वात् । न ह्य- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; | क्योंकि कर्म तो अनेक हैं । केवल [ज्ञानसाधकानि] ग्निहोत्रादीन्येव क- | अग्निहोत्र आदि ही कर्म नहीं हैं । [कर्माणि] र्माणि । ब्रह्मचर्यं | ब्रह्मचर्य, तप, सत्यभाषण, शम, तपः सत्यवदनं शमो दमोऽहिंसे- | दम और अहिंसा आदि अन्य कर्म


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अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९ त्येवमादीन्यपि कर्माणीतराश्रम- | भी इतर आश्रमोंके लिये प्रसिद्ध ही प्रसिद्धानि विद्योत्पत्तौ साधक- | हैं। वे तथा ध्यान-धारणादिरूप | कर्म [हिंसा आदि दोषोंसे] तमान्यसंकीर्णत्वाद्विद्यन्ते ध्यान- | असंकीर्ण होनेके कारण ज्ञानकी धारणादिलक्षणानि च। वक्ष्यति | उत्पत्तिमें सर्वोत्तम साधन हैं। आगे | (भृगु० २।५ में) यह कहेंगे च—"तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व" | भी कि "तपके द्वारा ब्रह्मको जानने- (तै० उ० ३। २—५) इति। | की इच्छा कर"। जन्मान्तरकृतकर्मभ्यश्च प्राग- | जन्मान्तरमें किये हुए कर्मोंसे तो ज्ञानप्राप्तौ पि गार्हस्थ्याद्विद्यो- | गृहस्थाश्रम स्वीकार करनेसे पूर्व भी गार्हस्थ्यस्य त्पत्तिसंभवात्कर्मा- | ज्ञानकी उत्पत्ति होना सम्भव है। आनर्थक्यम् र्थत्वाच्च गार्हस्थ्य- | तथा गृहस्थाश्रमकी स्वीकृति केवल प्रतिपत्तेः कर्मसाध्यायां च | कर्मोंके ही लिये की जाती है। | अतः कर्मसाध्य ज्ञानकी प्राप्ति हो विद्यायां सत्यां गार्हस्थ्यप्रति- | जानेपर तो गृहस्थाश्रमकी स्वीकृति पत्तिरनर्थिकैव । | भी व्यर्थ ही है। लोकार्थत्वाच्च पुत्रादीनाम्; | इसके सिवा पुत्रादि साधन तो | लोकोंकी प्राप्तिके लिये हैं। पुत्रादि पुत्रादिसाध्येभ्यश्चायं लोकः पितृ- | साधनोंसे सिद्ध होनेवाले उन इह- लोको देवलोक इत्येतेभ्यो व्या- | लोक, पितृलोक एवं देवलोक आदि- | से जिसकी कामना निवृत्त हो गयी वृत्तकामस्य नित्यसिद्धात्मलोक- | है, नित्यसिद्ध आत्माका साक्षात्कार दर्शिनः कर्मणि प्रयोजनमपश्यतः | करनेवाले एवं कर्मोंमें कोई प्रयोजन | न देखनेवाले उस ब्रह्मवेत्ताकी कथं प्रवृत्तिरुपपद्यते। प्रतिपन्न- | कर्मोंमें कैसे प्रवृत्ति हो सकती | है? जिसने गृहस्थाश्रम स्वीकार गार्हस्थ्यस्यापि विद्योत्पत्तौ विद्या- | कर लिया है उसे भी, जब ज्ञानकी CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

९० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

९० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ परिपाकाद्विरक्तस्य कर्मसु प्रयो- | प्राप्ति होती है और ज्ञानके परिपाक- जनमपश्यतः कर्मभ्यो निवृत्ति- | से विषयोंमें वैराग्य होता है तो, रेव स्यात् । "प्रव्रजिष्यन्वा अरे- | कर्मोंमें अपना कोई प्रयोजन न देखकर ऽहमस्मात्स्थानादस्मि" ( बृ० उ० | उनसे निवृत्ति ही होगी । इस विषयमें ४ । ५ । २ ) इत्येवमादिश्रुति- | "अरी मैत्रेयि ! अब मैं इस स्थानसे लिङ्गदर्शनात् । | संन्यास करना चाहता हूँ" इत्यादि | श्रुतिरूप लिंग भी देखा जाता है । कर्म प्रति श्रुतेर्यत्नाधिक्यद- | पूर्व०—किन्तु कर्मके प्रति श्रुतिका र्शनाद्युक्तमिति चेदग्निहोत्रादि- | अधिक प्रयत्न देखनेसे तो यह बात कर्म प्रति श्रुतेरधिको यत्नो | ठीक नहीं जान पड़ती ?—अग्निहोत्रादि महांश्च कर्मण्यायासोऽनेकसाध- | कर्मके प्रति श्रुतिका विशेष प्रयत्न है; नसाध्यत्वादग्निहोत्रादीनाम् । | कर्मानुष्ठानमें आयास भी अधिक है; तपोब्रह्मचर्यादीनां चेतराश्रम- | क्योंकि अग्निहोत्रादि कर्म अनेक कर्मणां गार्हस्थ्येऽपि समानत्वाद- | साधनोंसे सिद्ध होनेवाले हैं । अन्य ल्पसाधनापेक्षत्वाच्चेतरेषां न | आश्रमोंके कर्म तप और ब्रह्मचर्यादि युक्तस्तुल्यवद्विकल्प आश्रमिभि- | तो गृहस्थाश्रममें भी उन्हींके समान स्तस्येति चेत् । | कर्त्तव्य तथा अल्पसाधनकी अपेक्षा- | वाले हैं; अतः अन्य आश्रमियोंके | साथ गृहस्थाश्रमको समान-सा | मानना तो उचित नहीं है ? न; जन्मान्तरकृतानुग्रहात् । | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि उनपर | जन्मान्तरका अनुग्रह होता है । यदुक्तं कर्माणि श्रुतेरधिको | तुमने जो कहा कि 'कर्मपर | श्रुतिका विशेष प्रयत्न है' इत्यादि, यत्न इत्यादि नासौ दोषः । | सो यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि


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अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१ यतो जन्मान्तरकृतमप्यग्निहोत्रा- | जन्मान्तरमें किया हुआ भी अग्नि- दिलक्षणं कर्म ब्रह्मचर्यादिलक्षणं | होत्रादि तथा ब्रह्मचर्यादिरूप कर्म चानुग्राहकं भवति विद्योत्पत्तिं | ज्ञानकी उत्पत्तिमें उपयोगी होता है, प्रति । येन जन्मनैव विरक्ता | जिससे कि कोई लोग तो जन्मसे ही दृश्यन्ते केचित् । केचित्तु कर्मसु | विरक्त देखे जाते हैं और कोई कर्ममें प्रवृत्ता अविरक्ता विद्याविद्वे- | तत्पर, वैराग्यशून्य एवं ज्ञानके षिणः । तस्माज्जन्मान्तरकृत- | विरोधी दीख पड़ते हैं। अतः संस्कारेभ्यो विरक्तानामाश्रमा- | जन्मान्तरके संस्कारोंके कारण जो न्तरप्रतिपत्तिरेवेष्यते । | विरक्त हैं उन्हें तो [ गृहस्थाश्रमसे भिन्न ] अन्य आश्रमोंको स्वीकार करना ही इष्ट होता है । कर्मफलबाहुल्याच्च; पुत्रस्व- | कर्मफलोंकी अधिकता होनेके [कर्मविधौ श्रुतेः प्रयासप्रयोजनम्] र्गब्रह्मवर्चसादिलक्ष- | कारण भी [ श्रुतिमें उनका णस्य कर्मफलस्या- | विशेष विस्तार है ] । पुत्र, स्वर्ग एवं संख्येयत्वात्, तत्प्रति च पुरु- | ब्रह्मतेज आदि कर्मफल असंख्येय षाणां कामबाहुल्यात्तदर्थः श्रुते- | होनेके कारण और उनके लिये रधिको यत्नः कर्मसूपपद्यते । | पुरुषोंकी कामनाओंकी अधिकता आशिषां बाहुल्यदर्शनादिदं मे | होनेसे भी कर्मोंके प्रति श्रुतिका स्यादिदं मे स्यादिति । | अधिक यत्न होना उचित ही है; क्योंकि 'मुझे यह मिले, मुझे यह मिले' इस प्रकार कामनाओंकी बहुलता भी देखी ही जाती है । उपायत्वाच्च; उपायभूतानि | उपायरूप होनेके कारण भी हि कर्माणि विद्यां प्रतीत्यवो- | [ श्रुतिका उनमें विशेष प्रयत्न है ] । चाम । उपायेऽधिको यत्नः | कर्म ज्ञानोत्पत्तिमें उपायरूप हैं-ऐसा कर्तव्यो नोपेये । | हम पहले कह चुके हैं; तथा प्रयत्न उपायमें ही अधिक करना चाहिये, उपेयमें नहीं ।

९२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

९२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १


[मूल संस्कृत]

कर्मनिमित्तत्वाद्विद्याया यत्ना- न्तरानर्थक्यमिति चेत्कर्मभ्य एव पूर्वोपचितदुरितप्रतिबन्धक्षयादेव विद्योत्पद्यते चेत्कर्मभ्यः पृथगुप- निषच्छ्रवणादियत्नोऽनर्थक इति चेत् । न; नियमाभावात् । न हि प्रतिबन्धक्षयादेव विद्योत्पद्यते न त्वीश्वरप्रसादतपोध्यानाद्यनुष्ठा- नादिति नियमोऽस्ति । अहिंसा- ब्रह्मचर्यादीनां च विद्यां प्रत्युप- कारकत्वात्साक्षादेव च कारणत्वा- च्छ्रवणमनननिदिध्यासनानाम् । अतः सिद्धान्याश्रमन्तराणि सर्वेषां चाधिकारो विद्यायां परं च श्रेयः केवलाया विद्याया एवेति सिद्धम् ।


[हिन्दी अनुवाद]

पूर्व ०–ज्ञान कर्मके निमित्तसे होने- वाला है, इसलिये भी अन्य प्रयत्नकी निरर्थकता सिद्ध होती है। यदि कर्मों- के द्वारा ही पूर्वसञ्चित पापरूप प्रति- बन्धका क्षय होनेपर ज्ञानकी उत्पत्ति होती है तो कर्मोंसे भिन्न उपनिषच्छ्रव- णादिविषयक प्रयत्न व्यर्थ ही है। ऐसा मानें तो ? सिद्धान्ती – नहीं, क्योंकि ऐसा कोई नियम नहीं है—'ज्ञानकी उत्पत्ति प्रतिबन्धके क्षयसे ही होती है, ईश्वरकृपा, तप एवं ध्यानादिके अनुष्ठानसे नहीं हो सकती' ऐसा कोई नियम नहीं है; क्योंकि अहिंसा एवं ब्रह्मचर्यादि भी ज्ञानोत्पत्तिमें उपयोगी हैं तथा श्रवण, मनन और निदिध्यासनादि तो उसके साक्षात् कारण ही हैं। अतः अन्य आश्रमों- का होना सिद्ध ही है तथा ज्ञानमें सभी आश्रमियोंका अधिकार है। इससे यह सिद्ध हुआ कि परमश्रेयकी प्राप्ति केवल ज्ञानसे ही हो सकती है।


इति शीक्षावल्ल्यामेकादशोऽनुवाकः ॥ ११ ॥


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द्वादश अनुवाक अतीतविद्याप्राप्त्युपसर्गशम- | पूर्वकथित विद्याकी प्राप्तिके प्रतिबन्धोंकी शान्तिके लिये शान्ति- नार्थं शान्तिं पठति— | पाठ किया जाता है— शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादिषम् । ऋतमवादिषम् । सत्यमवादिषम् । तन्मामावीत् । तद्वक्तारमावीत् । आवीन्माम् । आवीद्वक्तारम्॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! ॥ १ ॥ मित्र ( सूर्यदेव ) हमारे लिये सुखकर हो । वरुण हमारे लिये सुखावह् हो । अर्यमा हमारे लिये सुखप्रद हो । इन्द्र तथा बृहस्पति हमारे लिये शान्तिदायक हों । तथा जिसका पादविक्षेप बहुत विस्तृत है वह विष्णु हमारे लिये सुखदायक हो । ब्रह्म [ रूप वायु ] को नमस्कार है । हे वायो ! तुम्हें नमस्कार है । तुम ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हो । तुम्हींको हमने प्रत्यक्ष ब्रह्म कहा है । तुम्हींको ऋत कहा है । तुम्हींको सत्य कहा है । अतः तुमने मेरी रक्षा की है तथा ब्रह्मका निरूपण करनेवाले आचार्यकी भी रक्षा की है । मेरी रक्षा की है और वक्ताकी भी रक्षा की है । त्रिविध तापकी शान्ति हो ॥ १ ॥ व्याख्यातमेतत्पूर्वम् ॥ १ ॥ | इसकी व्याख्या पहले की जा चुकी है ॥ १ ॥ इति शीक्षावल्ल्यां द्वादशोऽनुवाकः ॥ १२ ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य- श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ तैत्तिरीयोपनिषद्भाष्ये शीक्षावल्ली समाप्ता ॥ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

ब्रह्मानन्दवल्ली

ब्रह्मानन्दवल्ली प्रथम अनुवाक ब्रह्मानन्दवल्लीका शान्तिपाठ अतीतविद्याप्राप्त्युपसर्गप्रश- | पूर्वकथित विद्याकी प्राप्तिके मनार्था शान्तिः पठिता । इदानीं | प्रतिबन्धोंकी शान्तिके लिये शान्ति-पाठ कर दिया गया । अब आगे तु वक्ष्यमाणब्रह्मविद्याप्राप्त्युप- | कही जानेवाली विद्याकी प्राप्तिके प्रतिबन्धोंकी शान्तिके लिये शान्ति- सर्गोपशमनार्था शान्तिः पठ्यते- | पाठ किया जाता है— ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सहवीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! [ वह परमात्मा ] हम [ आचार्य और शिष्य ] दोनोंकी साथ-साथ रक्षा करे, हम दोनोंका साथ-साथ पालन करे, हम साथ-साथ वीर्यलाभ करें, हमारा अध्ययन किया हुआ तेजस्वी हो और हम परस्पर द्वेष न करें । तीनों प्रकारके प्रतिबन्धोंकी शान्ति हो ।

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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५

सह नाववतु-नौ शिष्याचार्यौ | 'सह नाववतु'-[ वह ब्रह्म ] हम सहैवावतु रक्षतु । सह नौ भुनक्तु | आचार्य और शिष्य दोनोंकी साथ- भोजयतु । सह वीर्यं विद्यादि- | साथ ही रक्षा करें और हमारा साथ- निमित्तं सामर्थ्यं करवावहै निर्वर्त- | साथ भरण अर्थात् पालन करे । हम यावहै । तेजस्वि नावावयोरुत्तेज- | साथ-साथ वीर्य यानी विद्याजनित स्विनोरधीतं स्वधीतमस्तु, अर्थ- | सामर्थ्य सम्पादन करें; हम दोनों ज्ञानयोग्यमस्त्वित्यर्थः । मा | तेजस्वियोंका अध्ययन किया हुआ विद्विषावहै; विद्याग्रहणनिमित्तं | तेजस्वी-सम्यक् प्रकारसे अध्ययन शिष्यस्याचार्यस्य वा प्रमादकृता- | किया हुआ अर्थात् अर्थ-ज्ञानके योग्य दन्यायाद्द्विद्वेषः प्राप्तस्तच्छमनाय | हो तथा हम विद्वेष न करें । विद्या- इयमाशीर्मा विद्विषावहा इति । | ग्रहणके कारण शिष्य अथवा मैवेतरेतरं विद्वेषमापद्यावहै । | आचार्यका प्रमादकृत अन्यायसे | द्वेष हो सकता है; उसकी शान्तिके | लिये 'मा विद्विषावहै' ऐसी कामना | की गयी है । तात्पर्य यह है कि | हम एक-दूसरेके विद्वेषको प्राप्त न हों । शान्तिः शान्तिः शान्तिरिति | 'शान्तिः शान्तिः शान्तिः' इस त्रिर्वचनमुक्तार्थम् । वक्ष्यमाण- | प्रकार तीन बार 'शान्ति' शब्द विद्याविघ्नप्रशमनार्था चेयं | उच्चारण करनेका प्रयोजन पहले कहा शान्तिः । अविघ्नेनात्मविद्या- | जा चुका है । यह शान्तिपाठ आगे प्राप्तिराशास्यते तन्मूलं हि परं | कही जानेवाली विद्याके विघ्नोंकी श्रेय इति । | शान्तिके लिये है । इसके द्वारा | निर्विघ्नतापूर्वक आत्मविद्याकी प्राप्ति- | की कामना की गयी है; क्योंकि वही | परम श्रेयका भी मूल कारण है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

९६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

९६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ ब्रह्मज्ञानके फल, सृष्टिक्रम और अन्नमय कोशरूप पक्षीका वर्णन संहितादिविषयाणि कर्मभि- | कर्मसे अविरुद्ध संहितादिविषयक उपक्रमः रविरुद्धान्युपासना- | उपासनाओंका पहले वर्णन किया न्युक्तानि । अनन्तरं | गया । उसके पश्चात् व्याहृतियोंके चान्तःसोपाधिकात्मदर्शनमुक्तं | द्वारा स्वाराज्यरूप फल देनेवाला व्याहृतिद्वारेण स्वाराज्यफलम् । | हृदयस्थित सोपाधिक आत्मदर्शन न चैतावताशेषतः संसारबीज- | कहा गया । किन्तु इतनेहीसे संसार- स्योपमर्दनमस्तीत्यतोऽशेषोपद्रव- | के बीजका पूर्णतया नाश नहीं हो बीजस्याज्ञानस्य निवृत्त्यर्थं विधूत- | जाता । अतः सम्पूर्ण उपद्रवोंके सर्वोपाधिविशेषात्मदर्शनार्थमिद- | बीजभूत अज्ञानकी निवृत्तिके निमित्त मारभ्यते ब्रह्मविदाप्नोति पर- | इस सर्वोपाधिरूप विशेषसे रहित मित्यादि । | आत्माका साक्षात्कार करानेके लिये | अब 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' इत्यादि | मन्त्र आरम्भ किया जाता है । प्रयोजनं चास्या ब्रह्मविद्याया | इस ब्रह्मविद्याका प्रयोजन अविद्या- अविद्यानिवृत्तिस्तत आत्यन्तिकः | की निवृत्ति है; उससे संसारका संसाराभावः । वक्ष्यति च- | आत्यन्तिक अभाव होता है । यही “विद्वान्न बिभेति कुतश्चन” | बात “ब्रह्मवेत्ता किसीसे नहीं डरता” (तै० उ० २ । ९ । १) इति । | इत्यादि वाक्यसे श्रुति आगे कहेगी संसारनिमित्ते च सत्यभयं | भी । संसारके निमित्त [ अज्ञान ] प्रतिष्ठां च विन्दत इत्यनुपपन्नम्, | के रहते हुए ‘पुरुष अभय स्थितिको कृताकृते पुण्यपापे न तपत इति | प्राप्त कर लेता है; तथा उसे कृत च । अतोऽवगम्यतेऽस्माद्विज्ञाना- | और अकृत अर्थात् पुण्य और पाप त्सर्वात्मब्रह्मविषयादात्यन्तिकः | ताप नहीं पहुँचाते’ ऐसा मानना संसाराभाव इति । | सर्वथा अयुक्त है । इससे जाना | जाता है कि इस सर्वात्मक ब्रह्म- | विषयक विज्ञानसे ही संसारका | आत्यन्तिक अभाव होता है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९७

स्वयमेव च प्रयोजनमाह | इस प्रकरणके सम्बन्ध और ब्रह्मविदाप्नोति परमित्यादावेव | प्रयोजनका ज्ञान करानेके लिये श्रुतिने स्वयं ही 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' संबन्धप्रयोजनज्ञापनार्थम् । नि- | इत्यादि वाक्यसे आरम्भमें ही इसका प्रयोजन बतला दिया है; क्योंकि र्ज्ञातयोर्हि सम्बन्धप्रयोजनयो- | सम्बन्ध और प्रयोजनोंका ज्ञान हो जानेपर ही पुरुष विद्याके श्रवण, र्विद्याश्रवणग्रहणधारणाभ्यासार्थं | ग्रहण, धारण और अभ्यासके लिये प्रवृत्त हुआ करता है । “श्रोतव्यो प्रवर्तते । श्रवणादिपूर्वकं हि | मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः” इत्यादि दूसरी श्रुतियोंसे यह भी निश्चय विद्याफलम् “श्रोतव्यो मन्तव्यो | होता ही है कि विद्याका फल श्रवणादिपूर्वक होता है । निदिध्यासितव्यः” (बृ० उ० | २।४।५) इत्यादिश्रुत्यन्त- | रेभ्यः । |

ब्रह्मविदाप्नोति परम् । तदेषाऽभ्युक्ता । सत्यं ज्ञान- मनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति । तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः । आकाशाद्वायुः । वायोरग्निः । अग्नेरापः । अद्भ्यः पृथिवी । पृथिव्या ओषधयः । ओषधीभ्योऽन्नम् । अन्नात्पुरुषः । स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः । तस्येदमेव शिरः । अयं दक्षिणः पक्षः । अयमुत्तरः पक्षः । अयमात्मा । इदं पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥ ब्रह्मवेत्ता परमात्माको प्राप्त कर लेता है । उसके विषयमें यह [ श्रुति ] कही गयी है—'ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है ।' जो पुरुष उसे बुद्धिरूप परम आकाशमें निहित जानता है, वह सर्वज्ञ ब्रह्मरूपसे एक साथ ही सम्पूर्ण भोगोंको प्राप्त कर लेता है । उस इस आत्मासे ही आकाश उत्पन्न हुआ । आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल, तै० उ० १३—१४— CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

९८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

Here is the line-by-line Devanagari text transcription from the image:

९८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ जलसे पृथिवी, पृथिवीसे ओषधियाँ, ओषधियोंसे अन्न और अन्नसे पुरुष उत्पन्न हुआ। वह यह पुरुष अन्न एवं रसमय ही है। उसका यह [शिर] ही शिर है, यह [दक्षिण बाहु] ही दक्षिण पक्ष है, यह [वाम बाहु] वाम पक्ष है, यह [शरीरका मध्यभाग] आत्मा है और यह [नीचेका भाग] पुच्छ प्रतिष्ठा है। उसके विषयमें ही यह श्लोक है॥ १ ॥

ब्रह्मविद्ब्रह्मेति वक्ष्यमाणलक्षणं 'ब्रह्मवित्'- ब्रह्म, जिसका लक्षण आगे कहा जायगा और जो ब्रह्मविदो बृहत्तमत्वाद्व्रह्म त- सबसे बड़ा होनेके कारण 'ब्रह्म' ब्रह्मप्राप्तिनिरूपणम् द्वेत्ति विजानातीति कहलाता है, उसे जो जानता है ब्रह्मविदाप्नोति परं निरतिशयं उसका नाम 'ब्रह्मवित्' है; वह ब्रह्मवित् उस परम-निरतिशय ब्रह्म- तदेव ब्रह्म परम् । न ह्यन्यस्य को ही 'आप्नोति'-प्राप्त कर लेता विज्ञानादन्यस्य प्राप्तिः । स्पष्टं है; क्योंकि अन्यके विज्ञानसे किसी अन्यकी प्राप्ति नहीं हुआ करती। च श्रुत्यन्तरं ब्रह्मप्राप्तिमेव ब्रह्म- "वह, जो कि निश्चय ही उस परब्रह्म- विदो दर्शयति "स यो ह वै को जानता है, ब्रह्म ही हो जाता है" यह एक दूसरी श्रुति ब्रह्मवेत्ता- तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति" को स्पष्टतया ब्रह्मकी ही प्राप्ति होना (मु० उ० ३ । २ । ९) इत्यादि । प्रदर्शित करती है।

ननु सर्वगतं सर्वस्यात्मभूतं शङ्का-ब्रह्म सर्वगत और सबका आत्मा है-ऐसा आगे कहेंगे; इसलिये ब्रह्म वक्ष्यति । अतो नाप्यम् । वह प्राप्तव्य नहीं हो सकता। प्राप्ति प्राप्तिश्चान्यस्यान्येन परिच्छिन्नस्य तो अन्य परिच्छिन्न पदार्थकी किसी अन्य परिच्छिन्न पदार्थद्वारा ही होती च परिच्छिन्नेन दृष्टा । अपरि- देखी गयी है। किन्तु ब्रह्म तो च्छिन्नं सर्वात्मकं च ब्रह्मेत्यतः अपरिच्छिन्न और सर्वात्मक है; इसलिये परिच्छिन्न और अनात्म- परिच्छिन्नवदनात्मवच्च तस्याप्ति- पदार्थके समान उसकी प्राप्ति होनी रनुपपन्ना। असम्भव है।

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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९


[संस्कृत-मूल]

नायं दोषः; कथम् ? दर्श- नादर्शनापेक्षत्वाद्ब्रह्मण आप्त्य- नाप्त्योः । परमार्थतो ब्रह्मरूप- स्यापि सतोऽस्य जीवस्य भूत- मात्राकृतबाह्यपरिच्छिन्नान्नमया- द्यात्मदर्शिनस्तदासक्तचेतसः प्र- कृतसंख्यापूरणस्यात्मनोऽव्यव- हितस्यापि बाह्यसंख्येयविषया- सक्तचित्ततया स्वरूपाभावदर्शन- वत्परमार्थब्रह्मस्वरूपाभावदर्शन- लक्षणयाविद्ययान्नमयादीन्बाह्या- ननात्मन आत्मत्वेन प्रतिपन्न- त्वादन्नमयाद्यनात्मभ्यो नान्यो- ऽहमस्मीत्यभिमन्यते । एवमविद्य- यात्मभूतमपि ब्रह्मानाप्तं स्यात् ।


[हिन्दी-अनुवाद]

समाधान—यह कोई दोषकी बात नहीं है; किस प्रकार नहीं है ? क्योंकि ब्रह्मकी प्राप्ति और अप्राप्ति तो उसके साक्षात्कार और असाक्षात्कारकी अपेक्षासे हैं । जिस प्रकार [ दशम पुरुषके लिये ] प्रकृत ( दशम ) संख्याकी पूर्ति करनेवाला अपना-आप* सर्वथा अव्यवहित होनेपर भी संख्या करने योग्य बाह्य विषयोंमें आसक्तचित्त रहनेके कारण वह अपने स्वरूपका अभाव देखता है उसी प्रकार पञ्च- भूत तन्मात्राओंसे उत्पन्न हुए बाह्य परिच्छिन्न अन्नमय कोशादिमें आत्म- भाव देखनेवाला यह जीव परमार्थतः ब्रह्मस्वरूप होनेपर भी उनमें आसक्त हो जाता है और अपने परमार्थ ब्रह्मस्वरूपका अभाव देखनास्वरूप अविद्यासे अन्नमय कोश आदि बाह्य अनात्माओंको आत्मस्वरूपसे देखने- के कारण 'मैं अन्नमय आदि अनात्माओंसे भिन्न नहीं हूँ' ऐसा अभिमान करने लगता है । इसी प्रकार अपना आत्मा होनेपर भी अविद्यावश ब्रह्म अप्राप्त ही है ।


[पाद-टिप्पणी]

* इस विषयमें यह दृष्टान्त प्रसिद्ध है कि एक बार दश मनुष्य यात्रा कर रहे थे । रास्तेमें एक नदी पड़ी । जब उसे पार कर वे उसके दूसरे तटपर पहुँचे तो यह जाननेके लिये कि हममेंसे कोई बह तो नहीं गया अपनेको गिनने लगे । उनमेंसे जो भी गिनना आरम्भ करता वह अपनेको छोड़कर शेष नौको ही गिनता । इस प्रकार एककी कमी रहनेके कारण वे यह समझकर कि हममेंसे एक आदमी नदीमें बह गया है खिन्न हो रहे थे । इतनेहीमें एक बुद्धिमान्

१०० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१०० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ तस्यैवमविद्ययानाप्तब्रह्मस्व- | जिस प्रकार प्रकृत ( दशम ) रूपस्य प्रकृतसंख्यापूरणस्यात्म- | संख्याको पूर्ण करनेवाला अपना-आप नोऽविद्ययानाप्तस्य सतः केन- | अविद्यावश अप्राप्त रहता है और फिर चित्स्मारितस्य पुनस्तस्यैव वि- | किसीके द्वारा स्मरण करा दिये जाने- द्ययाप्तिर्यथा तथा श्रुत्युपदिष्टस्य | पर विद्याद्वारा उसकी प्राप्ति हो जाती सर्वात्मब्रह्मण आत्मत्वदर्शनेन | है उसी प्रकार अविद्यावश जिसके विद्यया तदाप्तिरुपपद्यत एव । | ब्रह्मस्वरूपकी उपलब्धि नहीं होती उस सबके आत्मभूत श्रुत्युपदिष्ट ब्रह्मकी आत्मदर्शनरूप विद्याके द्वारा प्राप्ति होनी उचित ही है । ब्रह्मविदाप्नोति परमिति वाक्यं | 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' यह वाक्य [उत्तरग्रन्थावतरणिका] सूत्रभूतम् । सर्वस्य | सूत्रभूत है । जो सम्पूर्ण वल्लीके वल्ल्यर्थस्य ब्रह्म- | अर्थका विषय है, जिसका 'ब्रह्मविदा- विदाप्नोति परमित्यनेन वाक्येन | प्नोति परम्' इस वाक्यद्वारा ज्ञातव्य- वेद्यतया सूत्रितस्य ब्रह्मणोऽनि- | रूपसे सूत्रतः उल्लेख किया गया र्धारितस्वरूपविशेषस्य सर्वतो | है, उस ब्रह्मके ऐसे लक्षणका— व्यावृत्तस्वरूपविशेषसमर्पणसम- | जिसके विशेष रूपका निश्चय नहीं र्थस्य लक्षणस्याविशेषेण चोक्तवेद- | किया गया है और जो सम्पूर्ण नस्य ब्रह्मणो वक्ष्यमाणलक्षणस्य | वस्तुओंसे व्यावृत्त स्वरूपविशेषका ज्ञान करानेमें समर्थ है—वर्णन करते हुए स्वरूपका निश्चय करानेके लिये तथा जिसके ज्ञानका सामान्यरूपसे वर्णन कर दिया गया है उस आगे कहे जानेवाले लक्षणोंसे युक्त ब्रह्मको पुरुष उधर आ निकला। उसने सब वृत्तान्त जानकर उन्हें एक लाइनमें खड़ा किया और हाथमें डंडा लेकर एक, दो, तीन—इस प्रकार गिनते हुए हर एकके एक-एक डंडा लगाकर उन्हें दश होनेका निश्चय करा दिया और यह भी दिखला दिया कि वह दशवाँ पुरुष स्वयं गिननेवाला ही था जो दूसरोंमें आसक्तचित्त रहनेके कारण अपनेको भूले हुए था । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१

विशेषेण प्रत्यगात्मतयानन्य- | विशेषतः 'अपना अन्तरात्मा होनेसे रूपेण विज्ञेयत्वाय, ब्रह्मविद्याफलं | अनन्यरूपसे जाननेयोग्य है' ऐसा च ब्रह्मविदो यत्परब्रह्मप्राप्ति- | प्रतिपादन करनेके लिये और यह दिखलानेके लिये कि—ब्रह्मवेत्ताको जो लक्षणमुक्तं स सर्वात्मभावः सर्व- | परमात्माकी प्राप्तिरूप ब्रह्मविद्याका फल बतलाया गया है वह सर्वात्मभाव संसारधर्मातीतब्रह्मस्वरूपत्वमेव | सम्पूर्ण सांसारिक धर्मोंसे अतीत नान्यदित्येतत्प्रदर्शनायैषर्गुदाहि- | ब्रह्मस्वरूपता ही है—और कुछ नहीं है—'तदेषाभ्युक्ता' यह ऋचा कही यते—तदेषाम्युक्तेति । | जाती है । तत्तस्मिन्नेव ब्राह्मणवाक्यो- | तत्—उस ब्राह्मणवाक्यद्वारा क्तेऽर्थे एषर्ग्भ्युक्ताम्नाता । सत्यं | बतलाये हुए अर्थमें ही [ सत्यं ज्ञान- ज्ञानमनन्तं ब्रह्मेति ब्रह्मणो लक्ष- | मनन्तं ब्रह्म ] यह ऋचा कही गयी है । 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' यह णार्थं वाक्यम् । सत्यादीनि हि | वाक्य ब्रह्मका लक्षण करनेके लिये त्रीणि विशेषणार्थानि पदानि | है । 'सत्य' आदि तीन पद विशेष्य विशेष्यस्य ब्रह्मणः । विशेष्यं | ब्रह्मके विशेषण बतलानेके लिये हैं । ब्रह्म विवक्षितत्वाज्ज्ञेयतया । | वेद्यरूपसे विवक्षित ( बतलाये जाने- वेद्यत्वेन यतो ब्रह्म प्राधान्येन | को इष्ट ) होनेके कारण ब्रह्म विशेष्य है । क्योंकि ब्रह्म प्रधानतया विवक्षितं तस्माद्विशेष्यं विज्ञेयम् । | वेद्यरूपसे ( ज्ञानके विषयरूपसे ) अतः अस्माद् विशेषणविशेष्य- | विवक्षित है; इसलिये उसे विशेष्य समझना चाहिये । अतः इस त्वादेव सत्यादीनि एक- | विशेषण-विशेष्यभावके कारण एक विभक्त्यन्तानि पदानि समाना- | ही विभक्तिवाले 'सत्य' आदि तीनों धिकरणानि । सत्यादि- | पद समानाधिकरण हैं । सत्य आदि CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

१०२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यन्तरण (Transcription) दिया गया है:

१०२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ भिस्त्रिभिर्विशेषणैर्विशेष्यमाणं ब्रह्म | तीन विशेषणोंसे विशेषित होनेवाला विशेष्यान्तरेभ्यो निर्धार्यते । एवं | ब्रह्म अन्य विशेष्योंसे पृथक्रूपसे निश्चय हि तज्ज्ञानं भवति यदन्येभ्यो | किया जाता है । जिसका अन्य पदार्थों- निर्धारितम् । यथा लोके नीलं | से पृथग्रूपसे निश्चय किया गया है महत्सुगन्ध्युत्पलमिति । | उसका इसी प्रकार ज्ञान हुआ करता | है; जैसे लोकमें 'नील' विशाल और ननु विशेष्यं विशेषणान्तरं | सुगन्धित कमल [—ऐसा कहकर ऐसे (पार्श्व-टिप्पणी: निर्विशेषस्य) व्यभिचरद्विशेष्यते । | कमलका अन्य कमलोंसे पृथक्रूपसे (पार्श्व-टिप्पणी: विशेषणवत्त्वे) यथा नीलं रक्तं | निश्चय किया जाता है ] । (पार्श्व-टिप्पणी: आक्षेपः) चोत्पलमिति । यदा ह्यनेकानि | शङ्का—अन्य विशेषणोंका व्यावर्तन द्रव्याण्येकजातीयान्यनेकविशेषण- | करनेपर ही कोई विशेष विशेषित योगीनि च तदा विशेषणस्यार्थ- | हुआ करता है; जैसे—नीला अथवा वत्त्वम् । न ह्येकस्मिन्नेव वस्तुनि | लाल कमल । जिस समय अनेक द्रव्य विशेषणान्तरायोगात् । यथासा- | एक ही जातिके और अनेक विशेषणों- वेक आदित्य इति, तथैकमेव च | की योग्यतावाले होते हैं तभी ब्रह्म न ब्रह्मान्तराणि येभ्यो | विशेषणोंकी सार्थकता होती है। एक विशेष्येत नीलोत्पलवत् । | ही वस्तुमें, किसी अन्य विशेषणका न; लक्षणार्थत्वाद्विशेषणा- | सम्बन्ध न हो सकनेके कारण, | विशेषणकी सार्थकता नहीं होती । | जिस प्रकार यह सूर्य एक है उसी प्रकार (पार्श्व-टिप्पणी: ब्रह्मविशेषणानां) नाम् । नायं दोषः; | ब्रह्म भी एक ही है; उसके सिवा अन्य (पार्श्व-टिप्पणी: तल्लक्षणार्थत्वम्) कस्मात् ? यस्माल्ल- | ब्रह्म हैं ही नहीं, जिनसे कि नील | कमलके समान उसकी विशेषता क्षणार्थप्रधानानि विशेषणानि न | बतलायी जाय । | समाधान—ऐसा कहना ठीक | नहीं है; क्योंकि ये विशेषण लक्षणके | लिये हैं । [ अब इस सूत्ररूप वाक्य- | की ही व्याख्या करते हैं—] यह | दोष नहीं हो सकता; क्यों नहीं हो | सकता ? क्योंकि ये विशेषण लक्षणार्थ- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३

विशेषणप्रधानान्येव । कः पुनर्ल- | प्रधान हैं, केवल विशेषणप्रधान ही क्षणलक्ष्ययोर्विशेषणविशेष्ययोर्वा | नहीं हैं । किन्तु लक्षण-लक्ष्य तथा | विशेषण-विशेष्यमें विशेषता (अन्तर) विशेष इति ? उच्यते; समान- | क्या है ? सो बतलाते हैं—विशेषण | तो अपने विशेष्यका उसके सजातीय जातीयेभ्य एव निवर्तकानि | पदार्थोंसे ही व्यावर्तन करनेवाले | होते हैं, किन्तु लक्षण उसे सभीसे विशेषणानि विशेष्यस्य । लक्षणं | व्यावृत्त कर देता है; जिस प्रकार तु सर्वत एव यथावकाशप्रदात्रा- | अवकाश देनेवाला 'आकाश' होता | है—इस वाक्यमें है। *यह हम पहले काशमिति । लक्षणार्थं च वाक्य- | ही कह चुके हैं कि यह वाक्य मित्यवोचाम । | [आत्माका] लक्षण करनेके लिये है । सत्यादिशब्दा न परस्परं | सत्यादि शब्द परार्थ (दूसरेके [सत्यमित्यस्य व्याख्यानम्] संबध्यन्ते परार्थ- | लिये) होनेके कारण परस्पर त्वात् । विशेष्यार्था | सम्बन्धित नहीं हैं । वे तो विशेष्य- हि ते । अत एकैको विशेषण- | के ही लिये हैं । अतः उनमेंसे शब्दः परस्परं निरपेक्षो ब्रह्म- | प्रत्येक विशेषणशब्द परस्पर एक- | दूसरेकी अपेक्षा न रखकर ही 'सत्यं शब्देन संबध्यते सत्यं ब्रह्म | ब्रह्म, ज्ञानं ब्रह्म, अनन्तं ब्रह्म' इस ज्ञानं ब्रह्मानन्तं ब्रह्मेति । | प्रकार 'ब्रह्म' शब्दसे सम्बन्धित है । सत्यमिति यद्रूपेण यन्निश्चितं | सत्यम्—जो पदार्थ जिस रूपसे | निश्चय किया गया है उससे व्यभि- तद्रूपं न व्यभिचरति तत्सत्यम् । | चरित न होनेके कारण वह सत्य | कहलाता है । जो पदार्थ जिस रूपसे यद्रूपेण निश्चितं यत्तद्रूपं व्यभि- | निश्चित किया गया है उस रूपसे

  • इस वाक्यमें 'अवकाश देनेवाला' यह पद उसके सजातीय अन्य महाभूतोंसे तथा विजातीय आत्मा आदिसे भी व्यावृत्त कर देता है ।