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तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)

Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary

आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा

DevanagariHindipublished177 पृष्ठ

अध्याय - ४ इन्द्रसामानिकत्रायस्त्रिंशपारिषदात्मरक्षलोकपालानीक- प्रकीर्णकाभियोग्यकिल्विषिकाश्चैकशः ॥४॥ ऊपर कहे हुए चार प्रकार के देवों में हर एक के दश भेद हैं:- 1. इन्द्र, 2. सामानिक, 3. त्रायस्त्रिंश, 4. पारिषद्, 5. आत्मरक्ष, 6. लोकपाल, 7. अनीक, 8. प्रकीर्णक, 9. आभियोग्य और 10. किल्विषिक। त्रायस्त्रिंशलोकपालवर्ज्या व्यन्तरज्योतिष्काः ॥५॥ ऊपर जो दश भेद कहे हैं उनमें से त्रायस्त्रिंश और लोकपाल

  • ये भेद व्यन्तर और ज्योतिषी देवों में नहीं होते अर्थात् उनमें दो भेदों को छोड़कर बाकी के आठ भेद होते हैं। 52

अध्याय - ४ पूर्वयोर्द्विन्द्राः ॥६॥ भवनवासी और व्यन्तरों में प्रत्येक भेद में दो-दो इन्द्र होते हैं। In the first two orders there are two lords. कायप्रवीचारा आ ऐशानात् ॥७॥ ईशान स्वर्ग तक के देव (अर्थात् भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषी और पहिले तथा दूसरे स्वर्ग के देव) मनुष्यों की भाँति शरीर से काम-सेवन करते हैं। Up to Aiṣāna Kalpa they enjoy copulation. शेषाः स्पर्शरूपशब्दमनःप्रवीचाराः ॥८॥ शेष स्वर्ग के देव, देवियों के स्पर्श से, रूप देखने से, शब्द सुनने से और मन के विचारों से काम-सेवन करते हैं। The others derive pleasure by touch, sight, sound and thought. 53

अध्याय - ४ परेऽप्रवीचाराः ॥९॥ सोलहवें स्वर्ग से आगे के देव काम-सेवन रहित हैं। (उनके कामेच्छा उत्पन्न ही नहीं होती तो फिर उसके प्रतिकार से क्या प्रयोजन?) The rest are without sexual desire. भवनवासिनोऽसुरनागविद्युत्सुपर्णाग्नवातस्तनितोदधि- द्वीपदिक्कुमाराः ॥१०॥ भवनवासी देवों के दश भेद हैं:- 1. असुरकुमार, 2. नागकुमार, 3. विद्युत्कुमार, 4. सुपर्णकुमार, 5. अग्निकुमार, 6. वातकुमार, 7. स्तनितकुमार, 8. उदधिकुमार, 9. द्वीपकुमार और 10. दिक्कुमार। The Residential devas comprise Asura, Nāga, Vidyut, Suparṇa, Agni, Vāta, Stanita, Udadhi, Dvīpa and Dikkumāras. व्यन्तराः किन्नरकिम्पुरुषमहोरगगन्धर्वयक्षराक्षसभूत- पिशाचाः ॥११॥ 54

अध्याय - ४ व्यन्तर देवों के आठ भेद हैं- 1. किन्नर, 2. किम्पुरुष, 3. महोरग, 4. गन्धर्व, 5. यक्ष, 6. राक्षस, 7. भूत और 8. पिशाच। The Peripatetic devas comprise Kinnara, Kimpuruṣa, Mahoraga, Gandharva, Yakṣa, Rākṣasa, Bhūta, and Piśāca classes. ज्योतिष्काः सूर्याचन्द्रमसौ ग्रहनक्षत्रप्रकीर्णकतारकाश्च ॥१२॥ ज्योतिषी देवों के पाँच भेद हैं- 1. सूर्य, 2. चन्द्रमा, 3. ग्रह, 4. नक्षत्र और 5. प्रकीर्णक तारे। The Stellar (luminary) devas comprise the sun, the moon, the planets, the constellations, and the scattered stars. मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो नृलोके ॥१३॥ ऊपर कहे हुए ज्योतिषी देव मेरु पर्वत की प्रदक्षिणा देते हुए मनुष्यलोक में हमेशा गमन करते हैं। In the human region they are characterized by incessant motion around Meru. 55

अध्याय - ४ तत्कृतः कालविभागः ॥१४॥ घड़ी, घंटा, दिवस, रात इत्यादि व्यवहारकाल का जो विभाग है, वह गतिशील ज्योतिषी देवों के द्वारा किया जाता है। The divisions of time are caused by these. बहिरवस्थिताः ॥१५॥ मनुष्यलोक (अढ़ाई द्वीप) के बाहर के ज्योतिषी देव स्थिर हैं। They are stationary outside. वैमानिकाः ॥१६॥ अब वैमानिक देवों का वर्णन प्रारम्भ करते हैं। The Heavenly beings (Vaimānikāh). कल्पोपपन्नाः कल्पातीताश्च ॥१७॥ वैमानिक देवों के दो भेद हैं - 1. कल्पोपपन्न और 2. कल्पातीत। 56

अध्याय - ४ Those born in the kalpas¹ and beyond the kalpas. उपर्युपरि ॥१८॥ सोलह स्वर्ग के आठ युगल, नव ग्रैवेयक, नव अनुदिश और पाँच अनुत्तर, ये सब विमान क्रम से ऊपर-ऊपर हैं। One above the other. सौधर्मेशानसानत्कुमारमाहेन्द्रब्रह्मब्रह्मोत्तर- लान्तवकापिष्ठशुक्रमहाशुक्रशतारसहस्रारेष्वानत- प्राणतयोरारणाच्युतयोर्नवसु ग्रैवेयकेषु विजयवैजयन्तजयन्तापराजितेषु सर्वार्थसिद्धौ च ॥१९॥ सौधर्म-ईशान, सानत्कुमार-माहेन्द्र, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर, लान्तव-कापिष्ठ, शुक्र-महाशुक्र, शतार-सहस्रार इन छह युगलों के बारह स्वर्गों में, आनत-प्राणत इन दो स्वर्गों में, आरण-अच्युत इन दो स्वर्गों में, नव ग्रैवेयक विमानों में, नव अनुदिश विमानों में और विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित तथा सर्वार्थसिद्धि इन पाँच अनुत्तर विमानों में वैमानिक देव रहते हैं। ¹ The kalpas are the habitations of devas from Saudharma prior to Graiveyakas. Refer to sutra 19 and 23. ••••••••••••••••••••••••••••• 57

अध्याय ४: देवलोक व ऊर्ध्वलोक निरूपण

अध्याय - ४ In Saudharma, Aiśāna, Sānatkumāra, Māhendra, Brahma, Brahmottara, Lāntava, Kāpiṣṭha, Śukra, Mahāśukra, Śatāra, Sahasrāra, in Ānata, Prāṇata, Āraṇa, Acyuta, in Navagraiveyakas, in Vijaya, Vaijayanta, Jayanta, Aparājita and in Sarvārthasiddhi also. स्थितिप्रभावसुखद्युतिलेश्याविशुद्धीन्द्रियावधि- विषयतोऽधिकाः ॥२०॥ आयु, प्रभाव, सुख, द्युति, लेश्या की विशुद्धि, इन्द्रियों का विषय और अवधिज्ञान का विषय – ये सब ऊपर-ऊपर के विमानों में (वैमानिक देवों के) अधिक हैं। There is increase with regard to the lifetime, power, happiness, brilliance, purity in thought- colouration, capacity of the senses, and range of clairvoyance. गतिशरीरपरिग्रहाभिमानतो हीनाः ॥२१॥ गति, शरीर, परिग्रह और अभिमान की अपेक्षा से ऊपर-ऊपर के वैमानिक देव हीन-हीन होते हैं। 58

अध्याय - ४ (But) there is decrease with regard to motion, stature, attachment, and pride. पीतपद्मशुक्ललेश्या द्वित्रिशेषेषु ॥२२॥ दो युगलों में पीत, तीन युगलों में पद्म और बाकी के सब विमानों में शुक्ल-लेश्या होती है। In two, three and the rest (they are of) yellow, rose (pink) and white thought-complexions. प्राग्ग्रैवेयकेभ्यः कल्पाः ॥२३॥ ग्रैवेयकों से पहिले के सोलह स्वर्गों को कल्प कहते हैं। उनसे आगे के विमान कल्पातीत हैं। Prior to Graiveyakas are the kalpas. ब्रह्मलोकालया लौकान्तिकाः ॥२४॥ जिनका निवास स्थान पाँचवां स्वर्ग (ब्रह्मलोक) है, उन्हें लौकान्तिक देव कहते हैं। Brahmaloka is the abode of Laukāntikas. 59

अध्याय - ४ सारस्वतादित्यवह्वयरुणगर्दतोयतुषिताव्याबाधारिष्टाश्च ॥२५॥ लौकान्तिक देवों के आठ भेद हैं:- 1. सारस्वत, 2. आदित्य, 3. वह्नि, 4. अरुण, 5. गर्दतोय, 6. तुषित, 7. अव्याबाध और 8. अरिष्ट - ये देव ब्रह्मलोक की ईशान इत्यादि आठ दिशाओं में रहते हैं। विजयादिषु द्विचरमाः ॥२६॥ विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित और अनुदिश विमानों के अहमिन्द्र द्विचरमा होते हैं अर्थात् मनुष्य के दो जन्म (भव) धारण करके अवश्य ही मोक्ष जाते हैं (ये सभी जीव सम्यग्दृष्टि ही होते हैं)। औपपादिकमनुष्येभ्यः शेषास्तिर्यग्योनयः ॥२७॥ उपपाद जन्म वाले (देव तथा नारकी) और मनुष्यों के अतिरिक्त बाकी बचे हुए तिर्यञ्च योनि वाले ही हैं। 60

अध्याय - ४ The beings other than celestial, infernal and human beings are animals. स्थितिरसुरनागसुपर्णद्वीपशेषाणां सागरोपमत्रिपल्योपमार्द्धहीनमिताः ॥२८॥ भवनवासी देवों में असुरकुमार, नागकुमार, सुपर्णकुमार, द्वीपकुमार और बाकी के कुमारों की आयु क्रम से एक सागर, तीन पल्य, अढ़ाई पल्य, दो पल्य और डेढ़ पल्य है। The lifetime of Asura, Nāga, Suparṇa, and Dvīpa kumāras and the rest of the Residential devas is one sāgaropama, three palyas, two and a half palyas, two palyas, and one and a half palyas. सौधर्मेशानयोः सागरोपमे अधिके ॥२९॥ सौधर्म और ईशान स्वर्ग के देवों की आयु दो सागर से कुछ अधिक है। In Saudharma and Aiṣāna Kalpas the maximum lifetime is a little over two sāgaropamas. 61

अध्याय - ४ सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः सप्त ॥३०॥ सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्ग के देवों की आयु सात सागर से कुछ अधिक है। In Sānatkumāra and Māhendra seven. त्रिसप्तनवैकादशत्रयोदशपञ्चदशभिरधिकानि तु ॥३१॥ पूर्व सूत्र में कहे हुए युगलों की आयु (सात सागर) से क्रमपूर्वक, तीन, सात, नव, ग्यारह, तेरह और पन्द्रह सागर अधिक आयु (उसके बाद के स्वर्गों में) है। But more by three, seven, nine, eleven, thirteen and fifteen. आरणाच्युतादूर्ध्वमेकैकैन नवसु ग्रैवेयकेषु विजयादिषु सर्वार्थसिद्धौ च ॥३२॥ आरण और अच्युत स्वर्ग से ऊपर के नव ग्रैवेयकों में, नव अनुदिशों में, विजय इत्यादि विमानों में और सर्वार्थसिद्धि विमानों में देवों की आयु एक एक सागर अधिक है। Above Āraṇa and Acyuta, in Navagraiveyakas, Vijaya, etc. and Sarvārthasiddhi, it is more and more by one sāgara. 62

अध्याय - ४ अपरा पल्योपममधिकम् ॥३३॥ सौधर्म और ईशान स्वर्ग में जघन्य आयु एक पल्य से कुछ अधिक है। The minimum is a little over one palyopama. परतः परतः पूर्वापूर्वाऽनन्तराः ॥३४॥ जो पहिले-पहिले के युगलों की उत्कृष्ट आयु है वह पीछे-पीछे के युगलों की जघन्य आयु होती है। The maximum of the immediately preceding is the minimum of the next one (kalpa). नारकाणां च द्वितीयादिषु ॥३५॥ दूसरे इत्यादि नरक के नारकियों की जघन्य आयु भी देवों की जघन्य आयु के समान है - अर्थात् जो पहिले नरक की उत्कृष्ट आयु है वही दूसरे नरक की जघन्य आयु है। इस प्रकार आगे के नरकों में भी जघन्य आयु जानना चाहिये। The same with regard to infernal beings from the second infernal region onwards. 63

अध्याय - ४ दशवर्षसहस्राणि प्रथमायाम् ॥३६॥ पहिले नरक के नारकियों की जघन्य आयु दस हजार वर्ष की है। (नारकियों की उत्कृष्ट आयु का वर्णन तीसरे अध्याय के छठवें सूत्र में किया है।) Ten thousand years in the first. भवनेषु च ॥३७॥ भवनवासी देवों की जघन्य आयु दस हजार वर्ष की है। In the Residential regions also. व्यन्तराणां च ॥३८॥ व्यन्तर देवों की भी जघन्य आयु दस हजार वर्ष की है। Of the Peripatetic also. परा पल्योपममधिकम् ॥३९॥ व्यन्तर देवों की उत्कृष्ट आयु एक पल्योपम से कुछ अधिक है। The maximum is a little over one palyopama. 64

अध्याय - ४ ज्योतिष्काणां च ॥४०॥ ज्योतिषी देवों की भी उत्कृष्ट आयु एक पल्योपम से कुछ अधिक है। Of the Stellar devas² also. तदष्टभागोऽपरा ॥४१॥ ज्योतिषी देवों की जघन्य आयु एक पल्योपम के आठवें भाग है। The minimum is one-eighth of it. लौकान्तिकानामष्टौ सागरोपमाणि सर्वेषाम् ॥४२॥ समस्त लौकान्तिक देवों की उत्कृष्ट तथा जघन्य आयु आठ सागर की है। Eight sāgaropamas for all Laukāntikas. ॥ इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ✤ ✤ ✤ ² The Stellar celestials include the planets also. Refer to sutra 12. 65

अध्याय - ५ अथ पञ्चमोऽध्यायः The Category of the Non-Living अजीवकाया धर्माधर्माकाशपुद्गलाः ॥१॥ [ धर्माधर्माकाशपुद्गलाः ] धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य, आकाश और पुद्गल ये चार [ अजीवकायाः ] अजीव तथा बहु प्रदेशी हैं। The non-soul substances (bodies) are the medium of motion, the medium of rest, space and matter. द्रव्याणि ॥२॥ ये चार पदार्थ [ द्रव्याणि ] द्रव्य हैं। These (four) are substances (dravyas). जीवाश्च ॥३॥ [ जीवाः ] जीव [ च ] भी द्रव्य है। The souls also (are substances). 66

अध्याय - ५ नित्यावस्थितान्यरूपणि ॥४॥ ऊपर कहे गये द्रव्यों में से चार द्रव्य [ अरूपाणि ] रूप रहित [ नित्यावस्थितानि ] नित्य और अवस्थित हैं। (The substances are) eternal, fixed in number and colourless (non-material). रूपिणः पुद्गलाः ॥५॥ [ पुद्गलाः ] पुद्गल द्रव्य [ रूपिणः ] रूपी अर्थात् मूर्तिक हैं। Things which have form constitute matter (pudgalas). आ आकाशादेकद्रव्याणि ॥६॥ [ आ आकाशात् ] आकाश पर्यन्त [ एकद्रव्याणि ] एक एक द्रव्य हैं अर्थात् धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य और आकाश द्रव्य एक एक हैं। The substances (mentioned in the first sutra) up to space are indivisible wholes (i.e. each is one single continuum). 67

अध्याय - ५ निष्क्रियाणि च ॥७॥ [ च ] और फिर यह धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य और आकाश द्रव्य [ निष्क्रियाणि ] क्रिया रहित हैं अर्थात् ये एक स्थान से दूसरे स्थान को प्राप्त नहीं होते। These three (the medium of motion, the medium of rest, and space) are also without activity (movement). असंख्येयाः प्रदेशाः धर्माधर्मैकजीवानाम् ॥८॥ [ धर्माधर्मैकजीवानाम् ] धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य और एक जीव द्रव्य के [ असंख्येयाः ] असंख्यात [ प्रदेशाः ] प्रदेश हैं। There are innumerable points of space in the medium of motion, the medium of rest, and in each individual soul. आकाशस्यानन्ताः ॥९॥ [ आकाशस्य ] आकाश के [ अनन्ताः ] अनन्त प्रदेश हैं। The units of space are infinite. 68

अध्याय - ५ संख्येयासंख्येयाश्च पुद्गलानाम् ॥१०॥ [ पुद्गलानाम् ] पुद्गलों के [ संख्येयासंख्येयाः च ] संख्यात, असंख्यात और अनन्त प्रदेश हैं। (The space-points) of forms of matter are numerable and innumerable also. नाणोः ॥११॥ [ अणोः ] पुद्गल परमाणु के [ न ] दो इत्यादि प्रदेश नहीं हैं अर्थात् एक प्रदेशी है। (There are) no space-points for the atom (indivisible unit of matter). लोकाकाशेऽवगाहः ॥१२॥ [ अवगाहः ] उपरोक्त समस्त द्रव्यों का अवगाह (स्थान) [ लोकाकाशे ] लोकाकाश में है। (These substances – the media of motion and rest, the souls and the forms of matter) are located in the space of the universe. 69

अध्याय - ५ धर्माधर्मयोः कृत्स्ने ॥१३॥ [ धर्माधर्मयोः ] धर्म और अधर्म द्रव्य का अवगाह [ कृत्स्ने ] तिल में तेल की तरह समस्त लोकाकाश में है। The media of motion and rest pervade the entire universe-space. एकप्रदेशादिषु भाज्यः पुद्गलानाम् ॥१४॥ [ पुद्गलानाम् ] पुद्गल द्रव्य का अवगाह [ एक प्रदेशादिषु ] लोकाकाश के एक प्रदेश से लेकर संख्यात और असंख्यात प्रदेश पर्यन्त [ भाज्यः ] विभाग करने योग्य है - जानने योग्य है। The forms of matter occupy (inhabit) from one unit of space onwards. असंख्येयभागादिषु जीवानाम् ॥१५॥ [ जीवानाम् ] जीवों का अवगाह [ असंख्येयभागादिषु ] लोकाकाश के असंख्यात भाग से लेकर संपूर्ण लोक क्षेत्र में है। The souls inhabit from one of innumerable parts of the universe-space. 70

अध्याय - ५ प्रदेशसंहारविसर्पाभ्यां प्रदीपवत् ॥१६॥ [ प्रदीपवत् ] दीप के प्रकाश की भांति [ प्रदेशसंहारविसर्पाभ्यां ] प्रदेशों के संकोच और विस्तार के द्वारा जीव लोकाकाश के असंख्यातादिक भागों में रहता है। (It is possible) by the contraction and expansion of the space-points (of a soul) as in the case of the light of a lamp. गतिस्थित्युपग्रहौ धर्माधर्मयोरुपकारः ॥१७॥ [ गतिस्थित्युपग्रहौ ] स्वयमेव गमन तथा स्थिति को प्राप्त हुए जीव और पुद्गलों के गमन तथा ठहरने में जो सहायक है सो [ धर्माधर्मयोः उपकारः ] क्रम से धर्म और अधर्म द्रव्य का उपकार है। The functions of the media of motion and rest are to assist motion and rest respectively. आकाशस्यावगाहः ॥१८॥ [ अवगाहः ] समस्त द्रव्यों को अवकाश-स्थान देना यह [ आकाशस्य ] आकाश का उपकार है। (The function) of space (is to) provide accommodation. 71