त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
अष्टादशोऽध्यायः। २७७ स एव तेषामात्मा स्याच्चिदानन्दघनात्मकः । एवं स्वकल्पिताकाशग्रस्तं यच्चिद्वपुः स्थितम् ॥ १०८ ॥ तदेव मन इत्युक्तमात्मैव न हि चेतरत् । तत्रावरणमुख्यत्वात् प्रमाणं मन उच्यते ॥ १०९ ॥ आवृतप्राधान्यतस्तु प्रमाता जीव उच्यते । एवमाकाशावृतोऽपि चिदात्मा भूय एव तु ॥ ११० ॥ आकाशे कोमलेऽत्यन्तशिथिले निर्घनेऽमले । कठिनश्लिष्टघनतामालिन्यानां प्रकल्पजैः ॥ १११ ॥ भूतान्याभास्य देहात्मा देहेनापि समावृतः । कुम्भोदरगतो दीप उदरं व्याप्य भासते ॥ ११२ ॥ एवमेष शरीरान्तरवभासनमात्रकः । आस्ते गूढप्रदीपात्मा तदन्तर्मात्रभासनः ॥ ११३ ॥ जिस प्रकार दूसरोंके शरीरोंमें जो आकाश प्रतीत होता है वही उनका चिदानन्दघनस्वरूप आत्मा है और वही सर्वदा तुम्हारा भी आत्मा है ॥ १०७ उ०-१०८ पू० ॥ इस प्रकार जो चैतन्यस्वरूप हमारे कल्पित आकाशसे व्याप्त है वही 'मन' कहा गया है और वही आत्मा भी है, कोई अन्य नहीं ॥ १०८ उ०-१०९ पू० ॥ आवरण करनेवाली जडशक्तिकी प्रधानतासे उसे प्रमाणरूप मन कहते हैं और आवृत होनेवाली चित्शक्तिके प्राधान्यसे वही प्रमाता जीव कहा जाता है ॥ १०९ उ०-११० पू० ॥ इस प्रकार आकाशसे आवृत हुआ भी चिदात्मा फिर पञ्चभूतोंसे आवृत हो जाता है । आकाश अत्यन्त कोमल, शिथिल, विरल और निर्मल है; किन्तु उसमें कठिनता, संश्लेष, सघनता और मलिनता- की कल्पनासे पञ्चभूत प्रकट हो जाते हैं । इस प्रकार देहसे आवृत होकर यह देहात्मा घड़ेके भीतर रखे हुए दीपककी तरह शरीरके भीतर व्याप्त होकर प्रकाशित होने लगता है ॥ ११० उ०-११२ ॥ इस प्रकार यह आत्मा शरीरके भीतरी भागको ही प्रकाशित करता है, जैसे घड़ेके भीतर रखा हुआ दीपक उसके भीतरी भागको प्रकाशित किया करता है ॥ ११३ ॥
२७८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे दीपप्रभा घटच्छिद्राद्यथा निर्याति वै बहिः । एवमक्षद्वारमुखाद् भूयो निर्याति वै चितिः ॥ ११४ ॥ निर्याणं तु चितेर्नास्ति पूर्णत्वादक्रियत्वतः । स्वात्मावरणमाकाशं स्फूत्तिंशक्तिश्चिदात्मनः ॥ ११५ ॥ यावन्निवारयेत्तावन्निर्याणं प्रतिभासते । मनोव्यापार एष स्यात् स्फूर्त्त्यापहतिरावृतेः ॥ ११६ ॥ तस्माद्राम मनो नान्यदात्मैव मन उच्यते । चला चितिर्मनोनाम्नी निश्चलात्मस्वरूपिणी ॥ ११७ ॥ आवृत्त्यमिहतिः स्फूर्त्या चलनं राम वै चितेः । एतदेव विकल्पः स्याद्विकल्पपरिवर्जने ॥ ११८ ॥ निर्विकल्पं पूर्णरूपं विज्ञानं मुक्तिनामकम् । राम त्यजात्र सन्देहं विकल्पस्य विवर्जने ॥ ११९ ॥ अप्यावरणदोषः स्यादिति नास्त्येव चावृतिः । आवृतिर्न हि सत्यास्ति यतः स्वेनैव कल्पिता ॥ १२० ॥ जिस प्रकार घड़ेके छिद्रोंमें होकर दीपकका प्रकाश बाहर निकलता रहता है, उसी प्रकार फिर यह चिदात्मा इन्द्रियद्वारोंसे होकर बाहर निकलने लगता है ॥ ११४ ॥ चेतन पूर्ण और अक्रिय है, इसलिये उसका कहीं आना-जाना नहीं हो सकता । किन्तु जब चिदात्माकी चेतनशक्ति अपने आवरण आकाश- को अलग करती है तो उसका निकलना भासने लगता है । चेतनके द्वारा यह आवरणकी निवृत्ति ही मनका व्यापार है ॥ ११५-११६ ॥ इसलिये परशुराम ! मन कोई अन्य पदार्थ नहीं है, आत्मा ही मन कहा जाता है । चलायमान चेतनका नाम मन है और निश्चल चेतन आत्मस्वरूप है ॥ ११७ ॥ चितिशक्तिके स्फुरणद्वारा आवरणका हटना ही चेतनका चलन है । यही विकल्प है । विकल्पका त्याग होनेपर जो निर्विकल्प पूर्ण विज्ञान रहता है उसीका नाम मुक्ति है ॥ ११८-११९ पू० ॥ परशुराम ! तुम यह सन्देह त्याग दो कि विकल्पका त्याग होनेपर भी आवरणदोष फिर हो सकता है; क्योंकि आवरण तो है ही नहीं
अष्टादशोऽध्यायः। २७६
यथा मनोरथे बद्धः केन चिच्छत्रुणा स्वयम् । ताड्यमानस्तर्ज्यमानो यावत् सङ्कल्पवर्जनम् ॥ १२१ ॥ कुर्यात्तावत्ताडनं वा तर्जनं वापि लीयते । किं तत्र शिष्यते बन्धस्तथात्रापि विभावय ॥ १२२ ॥ अनादिकालाद्रामात्र बन्धो नास्त्येव कस्यचित् । जडात्मभ्रान्तिमुत्सृज्य कोऽयं बन्धो विचारय ॥ १२३ ॥ एष एव महाबन्धो बन्धसत्यत्वनिश्चयः । मृषा भीतस्य बालस्य यक्षग्रह इव स्थितः ॥ १२४ ॥ यावद्वन्धभ्रान्तिमेनां नोत्सृजेद् बुद्धिमानपि । न तावत् संसृतेर्मुक्तो भवेत् क्वापि महोद्यमैः ॥ १२५ ॥ कोऽयं बन्धः कथं वा स्यान्निर्मलस्य चिदात्मनः । प्रतिबिम्बात्मकैः स्वात्मादर्शान्तःप्रविभावितैः ॥ १२६ ॥ बन्धो यदि तदादर्शप्रतिबिम्बाग्निरादहेत् । आवरण वास्तविक नहीं है, क्योंकि वह तो अपना ही कल्पना किया हुआ है ॥ ११६ उ०-१२० ॥ जिस प्रकार कोई मनोराज्य करे कि उसे किसी शत्रुने बाँध लिया है, वह मारता है और धमका रहा है। किन्तु जैसे ही वह उस संकल्पको त्यागता है उसके वे ताडन और तर्जन भी लीन हो जाते हैं। क्या वहाँ कोई बन्धन बच रहता है ? वैसी ही बात यहाँ समझो ॥ १२१-१२२ ॥ परशुराम ! इस संसारमें अनादिकालसे किसीका कोई बन्धन नहीं है। इस जडस्वरूपा भ्रान्तिको त्यागकर विचार करो कि वास्तवमें बन्धन है क्या ? ॥ १२३ ॥ बन्धनकी सत्यता समझना—यही सबसे बड़ा बन्धन है। वह झूठमूठ हौआसे डरे हुए बालकके भयके समान बना हुआ है ॥ १२४ ॥ बुद्धिमान् पुरुष भी जबतक इस भ्रान्तिको नहीं त्यागेगा, तब तक महान् प्रयत्न करनेपर भी वह संसारसे कभी मुक्त नहीं होगा ॥ १२५ ॥ यह बन्धन है क्या ! निर्मल चिदात्माको यह हो भी कैसे सकता है ? यदि अपने आत्मारूप दर्पणमें भासनेवाले प्रतिबिम्बात्मक पदार्थोंसे इसे बन्धन हो सकता है तब तो दर्पणके प्रतिबिम्बमें प्रतीत होनेवाले
२८० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे बन्धस्य सत्यताबुद्धिर्मनसोऽस्तित्वनिश्चयः ॥ १२७ ॥ एतद्द्वयमृते नास्ति बन्धः कस्यापि कुत्रचित् । यावदेतद्द्वयमलं सद्विचारमहाजलैः ॥ १२८ ॥ नोन्मार्जितं तावदिह तस्य संसारनाशनम् । अहं वा ब्रह्मदेवो वा विष्णुर्वापि च शङ्करः ॥ १२९ ॥ विद्यात्मिका वा त्रिपुरा नैव शक्ताः कथञ्चन । तस्माद्राम द्वयञ्चैतत् परित्यज्य सुखी भव ॥ १३० ॥ तस्माद्राम निर्विकल्परूपे मनसि संस्थिते । आत्ममात्रत्वतस्तस्य द्वैतं न परिशिष्यते ॥ १३१ ॥ इदं तदितिरूपेण भासनान्यन्मनो नहि । इदमादिपरित्यागे मनसात्मैव शिष्यते ॥ १३२ ॥ रज्जुसर्पपरिभ्रान्तिः सत्याभिमतवस्तुनि । रज्जुरूपे हि सर्पस्य भासिनीति विनिश्चयः ॥ १३३ ॥ अग्निसे भी पदार्थोंका दाह हो जाना चाहिये ॥ १२६-१२७ पू० ॥ ‘बन्धनको सत्य समझना’ और ‘मनकी सत्ता स्वीकार करना’ इन दो को छोड़कर कहीं किसीके लिये और कोई बन्धन नहीं है ॥ १२७ उ०-१२८ पू० ॥ जबतक सद्विचाररूप महान् जलसे इन दो मलोंका मार्जन नहीं होगा तबतक मैं, ब्रह्मा, विष्णु, शंकर अथवा विद्यास्वरूपिणी स्वयं देवी त्रिपुरा भी किसी प्रकार उसके संसार की निवृत्ति नहीं कर सकते। इसलिये परशुराम ! तुम इन दोनोंको त्यागकर सुखी हो जाओ ॥ १२८ उ०-१३० ॥ अतः परशुराम ! यद्यपि समाधिमें निर्विकल्परूपमें मन रहता है, तथापि उस समय वह आत्ममात्र ही तो है, इसलिये द्वैत नहीं रहता॥१३१॥ ‘यह’ ‘वह’ इत्यादि रूपसे भासनेके सिवा मन और कुछ नहीं है। जब मनसे ‘यह’ ‘वह’ इत्यादिका त्याग हो गया तब तो आत्मा ही रह जाता है ॥ १३२ ॥ रज्जुमें भासित होनेवाली सर्पकी भ्रान्ति व्यवहारमें सत्य मानी हुई वस्तुमें होती है। अतः उसके विषयमें यह निश्चय होता है कि यह रज्जुके रूपमें सर्पकी प्रतीति कराने वाली है ॥ १३३ ॥
अष्टादशोऽध्यायः। २८१ तत्र सर्पस्य बाधोऽपि रज्ज्वालम्बनहेतुतः। चिद्रूपादात्मनोऽन्यत्तु रज्जुज्ञानं स्थितं भवेत् ॥ १३४ ॥ सापि रज्जुस्थिति यदा स्वप्नदृष्टान्तकल्पिता। रज्जुबाधे हि तज्ज्ञानं कथं शिष्येत् किमाश्रयम् ॥ १३५ ॥ तस्माद् दृश्यस्य बाधे तु तज्ज्ञानं केवला हि दृक्। चिदात्मानतिरिक्तत्वाद् द्वैतं तेन कथं भवेत् ॥ १३६ ॥ अर्थक्रिया हि संदृष्टा स्वप्नवस्तुषु सुस्थिरा। स्वाप्नवस्तु स्थिरमिति स्वप्ने सर्वैर्विभावितम् ॥ १३७ ॥ एतावानेव भेदः स्यात् स्वप्नजाग्रद्विभासयोः। जाग्रति स्वप्नमिथ्यात्वनिश्चयो भवति ध्रुवम् ॥ १३८ ॥ स्वप्ने न जायते जाग्रन्मिथ्यात्वस्य विनिर्णयः। नैतावतैव सत्यत्वं जाग्रद्व्यवहृतेर्भवेत् ॥ १३९ ॥ उसमें सर्पका तो बाध हो जाता है, क्योंकि उसका आलम्बन तो रज्जु ही होती है। किन्तु उस समय भी चिद्रूप आत्मासे रज्जुका ज्ञान भिन्न ही रहता है, [ उसका बाध नहीं होता ] ॥ १३४ ॥ पर जब स्वप्नके दृष्टान्तसे वह रज्जु भी चेतनमें कल्पित मानी जाय, तब रज्जुका बाध होनेपर उसका ज्ञान किस प्रकार और किसके आश्रयसे शेष रहेगा ? ॥ १३५ ॥ अतः दृश्य जगत्का बाध होनेपर उसका ज्ञान केवल चिन्मात्र ही रहता है। वह चिदात्मासे भिन्न है ही नहीं, फिर द्वैत कैसे रह सकता है ? ॥ १३६ ॥ [ यदि कार्यका निर्वाह करनेवाली और स्थिर जान पड़नेके कारण व्यावहारिक वस्तुओंको सत्य मानो, तब तो ] स्वप्नकी वस्तुओंमें भी स्थिर कार्यनिर्वाहकता देखी जाती है। स्वप्नमें स्वप्नके पदार्थ भी सबको स्थिर ही जान पड़ते हैं ॥ १३७ ॥ स्वप्न और जाग्रत्की प्रतीतियोंमें केवल इतना ही भेद है कि जाग्रत्कालमें स्वप्नका मिथ्यात्व-निश्चय तो अवश्य हो जाता है, किन्तु स्वप्नमें जाग्रत्का मिथ्यात्व निश्चय नहीं होता। इतनेसे ही जाग्रत्कालके व्यवहारकी सत्यता तो सिद्ध हो नहीं सकती ॥१३८-१३९॥
२८२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यथा जाग्रति वस्तूनां स्थिरतार्थक्रियापि च । दृश्यते किं तथा स्वप्ने दृश्यते न हि वा वद ॥ १४० ॥ न स्वप्ने जागरा भावाः स्वाप्ना वा नैव जागरे । अर्थक्रियाकरा वापि स्थिरा वा भान्ति तत्समम् ॥ १४१ ॥ विभावय सूक्ष्मदृशा को भेदोऽतीतस्वप्नयोः । पश्यैन्द्रजालिककृते स्थैर्यमर्थक्रियामपि ॥ १४२ ॥ किं तावतैव तत् सत्यमैन्द्रजालिकनिर्मितम् । सत्यासत्यविभागो वै प्राकृतैर्विदितो न हि ॥ १४३ ॥ अतएव मोहितास्ते प्रोचुः सत्यं हि जागतम् । कदाप्यभावसंस्पृष्टं सत्यं राम प्रचक्षते ॥ १४४ ॥ अभावः स्यादभानाद्वै त्वभानं न चितेः क्वचित् । अभानमचितामस्ति ह्यनेकत्वावभासतः ॥ १४५ ॥ जाग्रत्कालमें जिस प्रकार वस्तुओंकी स्थिरता और कार्यनिर्वाहकता देखी जाती है, बताओ, क्या स्वप्नमें स्वप्नके पदार्थोंकी वैसी नहीं देखी जाती ? ॥ १४० ॥ हाँ, स्वप्नमें जाग्रत्के पदार्थ और जाग्रत्में स्वप्नके पदार्थ न तो कार्यनिर्वाहक जान पड़ते हैं और न स्थिर ही। सो, यह बात दोनों अवस्थाओंमें समान ही है ॥ १४१ ॥ तुम सूक्ष्मदृष्टिसे विचार करो कि जाग्रत्की बीती हुई घटनाओंमें और स्वप्नमें क्या भेद है ? देखो, जाग्रदवस्थामें ऐन्द्रजालिककी बनायी हुई वस्तुओंमें स्थिरता भी रहती है और कार्यनिर्वाहकता भी । तो क्या इतनेसं ही उसकी बनायी हुई वे वस्तुएँ सत्य हो जाती हैं ? ॥ १४२-१४३ पू० ॥ यह सत्य और असत्यका भेद साधारण पुरुषोंको मालूम नहीं है । इसीसे वे मोहवश कहते हैं कि जगत्के पदार्थ सत्य हैं ॥ १४३ उ०-१४४ पू० ॥ परशुराम ! सत्य तो वह है जिसे कभी अभावका स्पर्श नहीं होता । और अभाव तब होता है जब भान न हो । तो चितिका अभाव कभी नहीं होता । और अभाव तो अचेतन दृश्य पदार्थोंका ही होता है, क्योंकि उनमें अनेकता भासती है ॥ १४४ उ०--१४५ ॥
अष्टादशोऽध्यायः। २८३ परस्पराभावभासा अचिद्भावा हि सर्वथा। चिद्भानं कदा कुत्र स्याद्राम प्रविचारय ॥ १४६ ॥ यदा चितिर्न भायाद्वै तदा भायात् कथं वद। न भायाद्वा कथं भायादभाने यदि तद्द्वयोः ॥ १४७ ॥ राम भायादेव चितिस्तस्मात् सत्यैव सा चितिः। राम सत्यासत्यभेदं शृणु संक्षेपतो ब्रुवे ॥ १४८ ॥ अन्यानपेक्षभासं स्यात् सत्यमन्यदसत्यकम् । अन्यथा रज्जुसर्पाद्यमपि सत्यं भवेन्ननु ॥ १४९ ॥ बाधो ह्यभावविज्ञानं तद्भावेऽपि हि सम्भवेत् । दृश्य पदार्थ सर्वथा अन्योन्याभावपूर्वक¹ ही भासते हैं। किन्तु परशुराम ! विचार तो करो—भला, चेतनका अभाव कब और कहाँ हो सकता है ? ॥ १४६ ॥ जब चेतनका भान न होगा तब उस 'तब' ( काल ) का भी भान कैसे होगा ? यदि कहो कि नहीं होगा, तो उन काल और चेतन दोनोंका अभान होनेपर उस अभानका भी भान कैसे होगा ? [ क्योंकि काल और चेतनके अभानका भान भी तो चेतनके ही प्रकाशमें हो सकता है । ] ॥ १४७ ॥ अतः परशुराम ! चेतन तो भासता ही रहता है, इसलिये वही सत्य है । राम ! सत्य और असत्यका भेद संक्षेपसे सुनो, मैं बताता हूँ ॥ १४८ ॥ जो दूसरेकी अपेक्षाके बिना भासे वह सत्य, अन्य सब असत्य । नहीं तो रज्जुमें कल्पित सर्पादि भी सत्य मानने होंगे² ॥ १४९ ॥ [ यदि बाध और अबाधको ही सत्यासत्यका निर्णय करनेमें हेतु मानें तो— ] 'बाध' कहते हैं अभावानुभूति को । यह भावमें भी हो १. जैसे घट और पट दो भिन्न पदार्थ हैं, इनका भान परस्पर एक-दूसरेके अभावपूर्वक ही होगा । अर्थात् घटाभावके बिना पटका और पटाभावके बिना घटका भान नहीं हो सकता । २. यदि सत्य और असत्यका ऐसा लक्षण न करके यह मानें कि जिसका बाध या अभाव हो जाय वह असत्य और जिसका बाध या अभाव न हो वह सत्य— तो प्रतीतिकालमें तो रज्जुमें कल्पित सर्पका भी न अभाव होता है और न बाध, इसलिये उसे भी सत्य ही मानना होगा । अतः सबसे निर्दोष लक्षण वही है जो यहाँ किया गया है ।
२८४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अभावे भावविज्ञानमपि सम्भवति स्फुटम् ॥ १५० ॥ ततो न बाधितं सत्यमसत्यं बाधितं भवेत् । इति पक्षो न युक्तः स्यात् सर्वथा व्यभिचारतः ॥ १५१ ॥ चितोऽभाने न किञ्चित् स्यान्न स्यात्तदपि सर्वथा । तस्माद्यश्चिन्न भातीति वदेत् तार्किकसत्खरः ॥ १५२ ॥ स ब्रूयान्नाहमस्मीति तत्र केन किमुच्यते । यस्यात्मनि स्यात् सन्देहो भानाभावेन सर्वदा ॥ १५३ ॥ सोऽन्येषां नाशयेन्मोहं निपुणैस्तर्कगुम्फनैः । तदा गण्डशिलाप्येषाऽप्यन्यमोहं विनाशयेत् ॥ १५४ ॥ तस्मार्दथक्रियाभासमात्रेण न हि सत्यता । सर्वमेव हि विज्ञानं भ्रान्तिरेव न संशयः ॥ १५५ ॥ सकती है। और अभावमें भी स्पष्टतया भावरूपताकी अनुभूति हो जाती है १ ॥ १५० ॥ इसलिये अबाधित सत्य होता है और बाधित असत्य—यह पक्ष बिल्कुल ठीक नहीं है, क्योंकि इसका व्यभिचार भी देखा जाता है ॥ १५१ ॥ यदि चेतनका भान न हो तब तो कुछ भी नहीं रहेगा। यहाँ तक कि 'कुछ नहीं है' का भी भान नहीं होगा। इसलिये जो मूर्ख- तार्किक कहता है कि चेतन नहीं भासता वह तो मानो कहता है कि 'मैं नहीं हूँ'। ऐसी अवस्थामें किसके द्वारा क्या कहा जा रहा है ॥ १५२-१५३ पू० ॥ अतः जिसे भान न होनेके कारण सर्वदा अपने अस्तित्वमें ही सन्देह हो, वह तो कुशल तर्कके गुम्फन द्वारा [ अर्थात् शास्त्ररचना करके ] अवश्य दूसरोंके अज्ञानको नष्ट कर देगा ! [ अर्थात् उसके कथन द्वारा दूसरोंका अज्ञान कभी निवृत्त नहीं हो सकता।] ऐसी अवस्थामें तो शायद यह पत्थरकी शिला भी दूसरोंका अज्ञान नष्ट कर दे ॥ १५३ उ०-१५४ ॥ इसलिये जिसमें कार्यनिर्वाहकता प्रतीत हो उसकी इतने ही से १. कई बार ऐसी भ्रान्ति हो जाती है कि जो वस्तु मौजूद है उसके न होनेका ज्ञान होता है और जो नहीं है उसके होनेका अतः यह पक्ष निर्विवाद नहीं है।
अष्टादशोऽध्यायः। २८५ अपरेयं महाभ्रान्तिस्तेष्वभ्रान्तत्वनिश्चयः । यथा हि बाघविज्ञानात् पूर्वं भ्रान्तिर्भवेत्तथा ॥ १५६ ॥ सर्वजाग्रतविज्ञानमभ्रान्तिरिव हि स्थितम् । यथा च रजतज्ञानं शुक्तिज्ञानाद् भ्रमात्मकम् ॥ १५७ ॥ एवं चिदात्मविज्ञानात् सर्वं ज्ञानं भ्रमात्मकम् । नभोनीलभ्रमः सर्वसमानो भासते तथा ॥ १५८ ॥ जागतो भ्रम एष स्यात् सर्वेषां दोषहेतुतः । अभ्रान्तिशुद्धविज्ञानं यच्चिदात्मतया स्थितम् ॥ १५९ ॥ एवमेतच्चया पृष्टं प्रोक्तं युक्त्यनुसङ्गतम् । सन्देहमत्र सन्त्यज्य राम प्रोक्तं विनिश्चिनु ॥ १६० ॥ कथं मुक्ते व्यवहृतिरिति पृष्टं पुरा तु यत् । तत्ते प्रवक्ष्यामि राम शृणु सम्यक् समाहितः ॥ १६१ ॥ सत्यता सिद्ध नहीं हो जाती । इसमें सन्देह नहीं कि इस प्रकारके सब ज्ञान भ्रममात्र ही हैं । तथा उन्हें भ्रम न मानना—यह दूसरी बहुत बड़ी भ्रान्ति है ॥ १५५-१५६ पू० ॥ जिस प्रकार कोई भी भ्रान्ति उसका बाध अनुभव होनेसे पहले सत्य ही जान पड़ती है उसी प्रकार जाग्रत्कालका सारा ज्ञान अभ्रान्ति- सा ही जान पड़ता है ॥ १५६ उ०-१५७ पू० ॥ किन्तु जिस प्रकार शुक्तिका परिचय हो जानेपर उसमें अध्यस्त चाँदीकी प्रतीति भ्रमरूप जान पड़ती है, उसी प्रकार चेतन आत्माका ज्ञान होनेपर अन्य सभी ज्ञान भ्रमरूप निश्चय होते हैं ॥ १५७ उ०-१५८ पू० ॥ जिस प्रकार आकाशकी नीलताका भ्रम सबको समानरूपसे भासता है उसी प्रकार अविद्यारूप दोषके कारण जाग्रत्कालका भ्रम सभीको समानरूपसे हो रहा है । अभ्रान्ति तो शुद्ध विज्ञान ही है जो चेतन आत्मारूपसे स्थित है ॥ १५८ उ०-१५६ ॥ परशुराम ! इस प्रकार तुम्हारे प्रश्नके विषयमें मैंने युक्तिपूर्वक उत्तर दे दिया । तुम इस विषयमें सन्देह त्यागकर जैसा कहा गया है वैसा ही निश्चय करो ॥ १६० ॥ तुमने पहले ( पन्द्रहवें अध्यायके आरम्भमें ) पूछा था कि मुक्ति हो जानेपर भी व्यवहार कैसे होता है ! उसका उत्तर देता हूँ ! परशुराम ! खूब सावधान होकर सुनो ॥ १६१ ॥
२८६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मुक्ता हि ज्ञानिनो लोके ह्युत्तमाधममध्यमाः । प्रारब्धोपनतैर्भोगैः खिद्यमानाः क्षणे क्षणे ॥ १६२ ॥ स्वरूपज्ञास्तु ये राम ते मन्दज्ञानिनः स्मृताः । ये तु प्रारब्धसंप्राप्तान् भुञ्जाना अपि नो विदुः ॥ १६३ ॥ मधुक्षीवा रसमिव मध्यास्ते ज्ञानिनः स्मृताः । ये तु प्रारब्धकोटीनां फलैरपि विचित्रितैः ॥ १६४ ॥ न स्वस्थितेः प्रच्यवन्ते नोद्विजन्त्यापदां गणैः । न विस्मयन्ति चाश्चर्यैर्न हृष्यन्ति महासुखैः ॥ १६५ ॥ अन्तःशान्ता वहिर्लोकसमास्ते ज्ञानिषूत्तमाः । एवं बुद्धिविभेदेन ज्ञानपाकविभेदतः ॥ १६६ ॥ प्रारब्धशेषमाहात्म्याद्व्यवहारा विचित्रिताः । मधुमत्तादिवच्चैषां व्यवहारोऽपि सम्भवेत् ॥ १६७ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अष्टादशोऽध्यायः ।
लोकमें मुक्त हुए ज्ञानी पुरुष तीन प्रकारके हैं—उत्तम, अधम और मध्यम। जो लोग प्रारब्धवश प्राप्त हुए भोगोंसे क्षण-क्षणमें खिन्न होते रहते हैं, किन्तु जिन्हें स्वरूपका ज्ञान होता है, वे मन्द ज्ञानी माने जाते हैं ॥ १६२-१६३ पू० ॥ जिन्हें प्रारब्धसे प्राप्त हुए भोगोंको भोगते हुए भी, मदिरोन्मत्तके समान निरन्तर समाहित रहनेके कारण, उन भोगोंका कुछ पता नहीं चलता, वे मध्यम ज्ञानी माने गये हैं ॥ १६३ उ०-१६४ पू० ॥ किन्तु जो करोड़ों प्रारब्धोंके तरह-तरहके फल-भोग प्राप्त होनेपर भी अपनी स्वरूपस्थितिसे च्युत नहीं होते, अनेकों आपत्तियाँ आने- पर भी खिन्न नहीं होते, बड़े-बड़े आश्चर्योंसे भी जिन्हें विस्मय नहीं होता और महान् सुखोंकी प्राप्ति होनेपर भी हर्ष नहीं होता, इस प्रकार जो भीतरसे शान्त और ऊपरसे अन्य लोगोंके समान रहते हैं, वे ज्ञानियोंमें उत्तम माने गये हैं ॥ १६४ उ०-१६६ पू० ॥ इस प्रकार बुद्धिके भेदसे, ज्ञानकी परिपक्वताके भेदसे और शेष प्रारब्धके प्रभावसे ज्ञानियोंके व्यवहार भिन्न-भिन्न प्रकारके होते हैं। तथापि मदोन्मत्तादिके समान उनके द्वारा व्यवहार भी अवश्य हो सकता है ॥ १६६ उ०-१६७ ॥ अष्टादश अध्याय समाप्त।
एकोनविंशोऽध्यायः इति दत्तात्रेयमुखाच्छ्रुत्वा भार्गवनन्दनः । भूयः पप्रच्छ मुक्तानां व्यवहारक्रमं क्रमात् ॥ १ ॥ भगवन् भूय एतन्मे विस्तरेण निरूपय । यथा बुद्धिविभेदेन ज्ञानपाकविचित्रता ॥ २ ॥ ज्ञानन्त्वेकविधं स्वात्ममात्रभानात्मकं ननु । उपेयञ्च तदेव स्याद्यन्मोक्षस्तत्प्रथात्मकः ॥ ३ ॥ तत् कथं बुद्धिभेदेन पाकभेदसमाश्रयम् । साधनान्यपि भिद्यन्तेऽथवा नेति तदीरय ॥ ४ ॥ इति पृष्टः पुनस्तेन दत्तात्रेयो दयानिधिः । विस्तरेण तमेवार्थं प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ ५ ॥ एकोनविंश अध्याय ॥ १९ ॥ ज्ञानियोंकी स्थितियोंके भेद श्रीदत्तात्रेयजीके मुखसे यह सब सुनकर भृगुनन्दन परशुरामने उनसे क्रमशः मुक्तपुरुषोंकी व्यवहारपद्धतिके विषयमें पुनः प्रश्न किया ॥ १ ॥ भगवन् ! आप कृपा करके यह बात मुझे विस्तारपूर्वक फिर समझाइये कि बुद्धिभेदके कारण ज्ञानियोंके ज्ञानकी परिपक्वतामें कैसे अन्तर रह जाता है ॥ २ ॥ यह तो निश्चय है कि केवल अपने आत्माका भानरूप ज्ञान तो सबको एक-सा ही होता है। तथा उस ज्ञानकी स्थितिरूप जो मोक्ष है वही सबका लक्ष्य भी है ॥ ३ ॥ फिर बुद्धिभेदके कारण उसकी परिपक्वतामें रहनेवाला अन्तर क्यों ? क्या उनके साधनोंमें भी कोई भेद रहता है या नहीं—यह सब बताइये ॥ ४ ॥ उनके इस प्रकार पूछनेपर दयानिधि भगवान् दत्तात्रेयने उसी बातको पुनः विस्तारपूर्वक कहना आरम्भ किया ॥ ५ ॥
२८८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे शृणु राम प्रवक्ष्यामि रहस्यं ह्येतदुत्तमम् । साधने न विभेदोऽस्ति ज्ञानं न चित्रसाधनम् ॥ ६ ॥ तारतम्यात् साधनानां फलप्राप्तिर्विभेदिता । पूर्णे तु साधने ज्ञानमनायासेन सिद्ध्यति ॥ ७ ॥ अपूर्चितारतम्येन त्वयासापेक्षणाद्भवेत् । वस्तुतः साधनं किञ्चिज्ज्ञानेनैवोपयुज्यते ॥ ८ ॥ ज्ञानं क्वचिन्नैव साध्यं सिद्धत्वात्तु स्वभावतः । चैतन्यमेव विज्ञानं तत् सदा स्वप्रकाशकम् ॥ ९ ॥ तत्र का साधनापेक्षा नित्याभानस्वरूपके । चैतन्यं निहितं चित्तकरण्डेऽतिसुनिर्मले ॥ १० ॥ अनन्तवासनापङ्कमग्नं नैवोपलक्ष्यते । निरोधसलिलैः सम्यग् वासनापङ्कमार्जने ॥ ११ ॥ परशुराम ! सुनो, मैं यह उत्तम रहस्य तुम्हें सुनाता हूँ । ज्ञानके साधनोंमें कोई भेद नहीं रहता । ज्ञान विभिन्न साधनोंवाला नहीं है ॥ ६ ॥ किन्तु साधनोंकी न्यूनाधिकता रहनेके कारण उनकी फलप्राप्तिमें अन्तर रहता है । साधन की पूर्णता होनेपर तो सहजहीमें ज्ञान प्राप्त हो जाता है । और अपूर्णता रहनेपर उसकी न्यूनाधिकताके अनुसार प्रयास करनेकी आवश्यकता पड़ती है ॥ ७-८ पू० ॥ वास्तवमें तो ज्ञानप्राप्तिके लिये साधनकी कोई आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि ज्ञान स्वभावसे ही सिद्ध होनेके कारण किसी साधनसे प्राप्त होनेवाला नहीं है ॥ ८ उ०-९ पू० ॥ चैतन्य ही तो ज्ञान है और वह सदा ही स्वयंप्रकाश है । अतः उस नित्यप्रकाशस्वरूपकी उपलब्धिके लिये साधनकी क्या आवश्यकता है ? ॥ ९ उ०-१० पू० ॥ यह चैतन्य चित्तरूप स्फटिकमणिकी अत्यन्त स्वच्छ पिटारीमें रखा हुआ है । किन्तु अनन्तवासनाओंकी कीचड़में फँसा होनेके कारण दिखायी नहीं देवा ॥ १० उ०-११ पू० ॥ अतः चित्तनिरोधरूप जलसे उस वासनाओंके कीचड़को धोना
एकोनविंशोऽध्यायः । २८६ विचारशितयन्त्रेण यत्नाच्चित्तकरण्डके । चिरात् संघटिते राम सुयुक्त्योद्घाटिते ततः ॥ १२ ॥ भासमानं तु मणिवच्चैतन्यमुपलभ्यते । राम तस्माद् वासनानां निरासे साधनं स्मृतम् ॥ १३ ॥ वासनाल्प्याधिक्यभावाद् बुद्धिस्तु विविधा भवेत् । यस्य यावद् वासनौघो बुद्धिमाच्छाद्य संस्थितः ॥ १४ ॥ साधनापेक्षं तस्य तावदेव भृगूद्वह । वासना विविधाः प्रोक्तास्तत्र मुख्या वदामि ते ॥ १५ ॥ अपराधकर्मकामभेदेन त्रिविधा हि सा । अश्रद्धैवापराधः स्यान्मुख्यः स्वात्मविनाशनः ॥ १६ ॥ विपरीतग्रहश्चापि ह्यपराधस्तु पौरुषः । प्रायः कलासु कुशला अपराधवशन्ननु ॥ १७ ॥ सत्सङ्गशास्त्रयोगैश्च परं तत्त्वं हि नो विदुः । पड़ता है । यह चित्तपेटिका बहुत दिनोंसे बन्द पड़ी हुई है । इसे विचाररूप तीक्ष्ण यन्त्रके द्वारा बड़ी युक्तिसे खोलना पड़ता है । तब वह चैतन्य मणिके समान दमकता हुआ दिखायी देने लगता है । इस प्रकार परशुरामजी ! साधनका उपयोग तो वासनाओंकी निवृत्तिमें ही माना गया है ॥ ११ उ०-१३ ॥ वासनाओंकी न्यूनता और अधिकताके कारण बुद्धि अनेक प्रकारकी होती है । जिसकी बुद्धिको जितने वासनाजालने ढक रखा है, परशुराम ! उसको उतने ही साधनकी अपेक्षा होती है ॥ १४-१५ पू० ॥ वासनाएँ अनेक प्रकारकी कही गयी हैं । उनमेंसे मुख्य तुम्हें बताता हूँ । वे अपराधवासना, कर्मवासना और कामवासना भेदसे तीन प्रकारकी हैं ॥ १५ उ०-१६ पू० ॥ वेद-शास्त्रादिमें श्रद्धा न होना ही अपना नाश करनेवाला मुख्य अपराध है ; तथा पुरुष (आत्मा) सम्बन्धी विपरीत धारणा होनी दूसरा अपराध है ॥ १६ उ०-१७ पू० ॥ प्रायः जो लोग अनेक कलाओंमें कुशल हैं वे भी इन अपराधोंके कारण संतसमागम और शास्त्रावलोकनके अवसर प्राप्त होनेपर भी उस परमतत्त्वको नहीं जान पाते ॥ १७ उ०-१८ पू० ॥
२६० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे निर्विशेषं परं तत्त्वं नास्ति नैव च सम्भवेत् ॥ १८ ॥ अस्ति तच्चैव विज्ञातुं शक्यते केनचित् क्वचित् । ज्ञात्वापि परमं तत्त्वं नैव तत्त्वं परं भवेत् ॥ १९ ॥ एतज्ज्ञानात् कथं मोक्ष इत्यादि बहुधा स्थितः । विपरीतग्रहो वापि चैतत्संशय एव वा ॥ २० ॥ अपराधः पौरुषस्तु वासनाद्या प्रकीर्त्तिता । शास्त्रविद्यासु कुशलाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २१ ॥ अनया विहता राम संसृतिं समुपागताः । पुरा दुष्कृतसंस्कारवशाद् बुद्धौ तु यत् स्थितम् ॥ २२ ॥ मालिन्यमुपदेशस्य ग्रहणप्रतिबन्धकम् । येनाचार्यैः सम्यगुक्तमपि नो गृह्यते खलु ॥ २३ ॥ सा कर्मवासना प्रोक्ता दुर्जेयापि निरोधतः । कामः कर्त्तव्यशेषः स्यादनन्तो बहुशाखकः ॥ २४ ॥ [ उनकी ऐसी धारणा रहती है—] 'कोई निर्विशेष परमतत्त्व है ही नहीं और न उसका होना सम्भव ही है। यदि वह हो भी तो किसीको उसका कभी ज्ञान नहीं हो सकता। यदि कोई जान भी ले तो सन्देह होने लगता है कि यह परमतत्त्व होना सम्भव नहीं है; इसके ज्ञानसे मोक्ष कैसे हो सकता है ?' इस प्रकार विपरीत ग्रह अनेक प्रकारसे रहता है। अथवा इसीको संशय भी कह सकते हैं ॥ १८ उ०-२० ॥ यह पुरुषसम्बन्धी अपराध पहली वासना कही गयी है। परशुराम ! इसके मारे हुए सैकड़ों-हजारों शास्त्रविद्यामें कुशल पुरुष भी संसार- चक्रमें पड़े रहते हैं ॥ २१-२२ पू० ॥ पूर्व दुष्कर्मोंके संस्कारोंके कारण बुद्धिमें जो मलिनता आ जाती है वह उपदेशको ग्रहण करने में रुकावट डालनेवाली होती है, जिसके कारण गुरुदेवके द्वारा बहुत समझानेपर भी बात समझमें नहीं आती। उसको 'कर्मवासना' कहा है। इसे चित्तनिरोधके द्वारा भी जीतना कठिन है ॥ २२ उ०-२४ पू० ॥ 'मेरा यह कर्त्तव्य है' इत्यादि प्रकारसे कर्त्तव्यशेष रहनेका संकल्प 'कामवासना' है। यह अनन्त और अनेकों शाखाओंवाली है।
एकोनविंशोऽध्यायः । २६१ रामाम्भोधौ तरङ्गाणां संख्यां कुर्याद्धि कश्चन । पार्थिवानाम्णूनां वा तथा तारागणस्य वा ॥ २५ ॥ एकस्यापि हि कामानां संख्यातुं नैव शक्यते । इयं राम तृतीया ते संप्रोक्ता कामवासना ॥ २६ ॥ आकाशादपि विस्तीर्णा ह्यचला भूधरादपि । आशापिशाची प्रोक्तेयं राम या कामवासना ॥ २७ ॥ अनयैव हि सर्वोऽयं लोक उन्मत्तवत् स्थितः । येन दन्दह्यमानोऽयं लोक आक्रन्दते तदा ॥ २८ ॥ केऽपि लोके धन्यतमा महामन्त्रसमाश्रयात् । विनिर्मुक्तास्तया भान्ति नराः सर्वाङ्गशीतलाः ॥ २९ ॥ एताभिस्तिसृभी राम वासनाभिर्यतो मनः । समाक्रान्तमतो नूनं तत्तत्त्वं नावभासते ॥ ३० ॥ अतः सर्वसाधनस्य वासनानाशनं फलम् । परशुराम ! कोई पुरुष समुद्रकी तरंगोंकी गणना तो कर सकता है, पृथ्वीके कणोंको भी गिन सकता है और तारागणकी गिनती भी कर सकता है; किन्तु किसी एक पुरुषकी भी कामनाओंको गिनना सम्भव नहीं है । परशुराम ! यह तुमसे तीसरी कामवासनाका वर्णन किया ॥ २४ उ०--२६ ॥ परशुराम ! यह कामवासना ही आशापिशाची भी कही जाती है । यह आकाशसे भी विस्तीर्ण और पर्वतसे भी अधिक अविचल है ॥२७॥ इसीके कारण यह सारा लोक उन्मत्त-सा हो रहा है और इसीसे दग्ध होकर यह सर्वदा चीत्कार करता रहता है ॥ २८ ॥ इस संसारमें कोई अत्यन्त बड़भागी पुरुष ही परवैराग्यरूप महामन्त्रका आश्रय लेकर इससे मुक्त होते हैं और फिर सर्वाङ्ग शीतल होकर सुशोभित होते हैं ॥ २९ ॥ परशुराम ! क्योंकि मन इन तीन वासनाओंसे आक्रान्त है, इसीसे इसे वह परमतत्त्व प्रकाशित नहीं होता ॥ ३० ॥ अतः सब साधनोंका फल वासनाओंका नाश ही है। इनमें
२६२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तत्राद्या ह्यपराधत्वनिश्चयाद्विनिवर्त्तते ॥ ३१ ॥ द्वितीया जन्मनैकेन निवर्त्तेतापि जन्मभिः । ऐश्वरेण प्रसादेन नान्यथा कोटियुक्तिभिः ॥ ३२ ॥ तृतीया विनिवर्त्तेत वैराग्यादिसुसाधनैः । दोषदृष्ट्यैव वैराग्यं भवेन्नैवाऽन्यथा क्वचित् ॥ ३३ ॥ प्रोक्तानां वासनानां वै स्वल्पानल्पविभेदतः । तस्याश्चाल्पानल्पभावापेक्षा भवति भार्गव ॥ ३४ ॥ तत्राद्यं सर्वमूलं स्यान्मुमुक्षुत्वं न चेतरत् । मुमुक्षामन्तरा यत्तु श्रवणं मननादिकम् ॥ ३५ ॥ न मुख्यफलसंयुक्तं केवलं शिल्पवद्भवेत् । न शिल्पज्ञानमात्रेण प्राप्यते परमं पदम् ॥ ३६ ॥ मुमुक्षामन्तरा यैस्तु श्रुतं सम्यग् विचारितम् । शवालङ्कारवत् सर्वं तेषां व्यर्थं भवेत् खलु ॥ ३७ ॥ पहली अपराधवासना तो अश्रद्धा आदिमें अपराधत्वका निश्चय होनेसे निवृत्त होती है ॥ ३१ ॥ दूसरी कर्मवासना एक या अनेक जन्मोंमें केवल ईश्वरकी कृपासे ही छूट सकती है, और तो करोड़ों युक्तियोंसे भी नहीं छूट सकती ॥३२॥ तीसरी कामवासना वैराग्यादि साधनोंसे दूर हो सकती है। वैराग्य विषयोंमें दोषदृष्टि होनेपर ही होता है, और किसी प्रकार नहीं ॥ ३३ ॥ परशुराम ! उपर्युक्त वासनाओंकी अल्पता अथवा अधिकताके भेदके अनुसार उनकी निवृत्तिके लिये भी अल्प या अधिक भावकी अपेक्षा होती है ॥ ३४ ॥ इनमें भी सबका मूल और आदि कारण मुमुक्षुता है, कोई और नहीं। मुमुक्षुताके बिना जो श्रवण-मनन इत्यादि होते हैं उनसे मुख्य फल तत्त्वज्ञान नहीं मिलता, वे केवल कलामात्र रह जाते हैं और केवल कलामात्रका ज्ञान होनेसे परमपदकी प्राप्ति हो नहीं सकती ॥ ३५-३६ ॥ मुमुक्षुताके बिना जिन्होंने जो कुछ भी श्रवण या मनन किया होता है वह तो केवल मुर्देके श्रृंगारके समान उनके लिये व्यर्थ ही होता है ॥ ३७ ॥
एकोनविंशोऽध्यायः। २६३ व्यर्था सापि भवेन्मन्दा मुमुक्षा राम सर्वथा । यथा फलश्रुतेरिच्छा सामान्या न फलावहा ॥ ३८ ॥ फलश्रुत्युत्तरोद्भूता नेच्छा कर्मफलावहा । फलश्रुत्या कस्य नाम न स्यात् सा जीवधर्मिणः ॥ ३९ ॥ तस्मादापातरूपाया मुमुक्षाया न वै फलम् । यथा मुमुक्षा तीव्रा स्यात्तथा तस्याचिरं फलम् ॥ ४० ॥ मुमुक्षा या मुख्यतमा सा साधनगणेष्वलम् । प्रवृत्तिमुत्पादयेद्वै सा हि तत्परतोच्यते ॥ ४१ ॥ यथा सुदग्धसर्वाङ्गो न शीतान्यदपेक्षते । तथा यदा विमुक्त्यन्यन्नापेक्षेत हि सर्वथा ॥ ४२ ॥ सा मुमुक्षा भवेत्तीव्रा समर्था फलसाधने । एषा विमुक्तेरन्यत्र दोषदृष्ट्यैव जायते ॥ ४३ ॥ परशुराम ! वह मुमुक्षुता भी यदि मन्द हो तो सर्वथा व्यर्थ ही होती है, जिस प्रकार केवल फल सुनकर होनेवाली इच्छा सामान्य ही होती है, उससे फलकी प्राप्ति नहीं होती ॥ ३८ ॥ फल सुननेके पश्चात् उत्पन्न हुई इच्छा कर्मका फल देनेवाली नहीं होती। ऐसा कौन जीवधर्मी है जिसे फल सुनकर इच्छा उत्पन्न न हो ॥ ३६ ॥ इसलिये जो अकस्मात् (किसी कारणविशेषसे) उत्पन्न हो जाती है उस मुमुक्षुता का फल नहीं होता। मुमुक्षा जितनी तीव्र होगी उतना ही शीघ्र उसका फल प्राप्त होगा ॥ ४० ॥ जो तीव्रतम मुमुक्षा है वह तो अकेली ही सम्पूर्ण साधनोंमें प्रवृत्ति उत्पन्न कर देती है। उसीको तत्परता भी कहते हैं ॥ ४१ ॥ जिसके सब अंगोंमें अत्यन्त दाह हो रहा हो वह पुरुष जैसे शीतके सिवा किसी अन्य वस्तुकी इच्छा नहीं करता, उसी प्रकार जब मुक्तिके सिवा और किसी प्रकारकी इच्छा न रहे तब वह तीव्र मुमुक्षा होती है वही मुक्तिरूप फल प्राप्त करानेमें समर्थ है। ऐसी मुमुक्षा मुक्तिके सिवा और सभीमें दोषदृष्टि होनेपर ही उत्पन्न होती है ॥ ४२-४३ ॥
२६४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तीव्रवैराग्यमुखतः क्रमेण तीव्रतामियात् । दोषदृष्ट्या हि वैराग्यं विषयप्रीतिनाशनम् ॥ ४४ ॥ वैराग्येण मुमुक्षुत्वं तीव्रं तत्परतोदयम् । तत्परत्वं साधनेषु प्रवृत्तिरतितीव्रता ॥ ४५ ॥ अतितीव्रप्रवृत्त्यैव द्रुतं फलमवाप्नुयात् । इति दत्तात्रेयवचो निशम्य भार्गवः पुनः ॥ ४६ ॥ पप्रच्छ सन्दिग्धमनाः संशयं सुमहत्तरम् । भगवन् भवता प्रोक्तं सत्सङ्गो मूलकारणम् ॥ ४७ ॥ ईश्वरानुग्रहश्चापि दोषदृष्टिरपीति च । किमादिकारणं मुख्यं तत्प्राप्तिर्वा कथं भवेत् ॥ ४८ ॥ न हि निष्कारणं किञ्चिद्भवेदिति हि निश्चयः । तत् कथं स्याद्विना हेतोरेतन्मे वद विस्तरात् ॥ ४९ ॥ इति पृष्टः प्राह रामं दत्तात्रेयो दयानिधिः । तीव्र वैराग्यादिके क्रमसे मुमुक्षुतामें तीव्रता आती है । विषयों- में दोषदृष्टि होनेसे ही उनकी आसक्तिको नष्ट करनेवाला वैराग्य उत्पन्न होता है ॥ ४४ ॥ वैराग्यसे तत्परताकी प्राप्ति करानेवाली तीव्र मुमुक्षुता होती है । और साधनोंमें प्रवृत्त होनेकी अत्यन्त तीव्रता ही तत्परता है तथा अत्यन्त तीव्र प्रवृत्ति होनेपर ही फलकी शीघ्र प्राप्ति होती ॥४५-४६ पू०॥ श्रीदत्तात्रेयजीके ये वचन सुनकर परशुरामजीके मनमें सन्देह हो गया । अतः उन्होंने पुनः यह महान् संशय प्रकट करते हुए पूछा—॥ ४६ उ०-४७ पू० ॥ "भगवन् ! पहले आपने सत्संगको ही मूलकारण बतलाया था । फिर ईश्वरकी कृपा और विषयोंमें दोषदृष्टिका भी वर्णन किया । इनमें मुख्य और आदि कारण कौन-सा है और उसकी प्राप्ति भी कैसे होती है, क्योंकि यह तो निश्चय है कि कोई भी बात अकारण ही नहीं होती; फिर वह (मुक्तिका मूलकारण) ही बिना किसी निमित्तके कैसे हो जायगा ? अतः आप उसका विस्तारसे वर्णन कीजिये" ॥ ४७ उ०-४९ ॥ ऐसा प्रश्न होनेपर दयानिधि दत्तात्रेयजी परशुरामसे कहने
एकोनविंशोऽध्यायः । २६५ भार्गव शृणु ते वक्ष्ये श्रेयसः परमोद्भवम् ॥ ५० ॥ परा सा या चितिर्देवी स्वस्वातन्त्र्यस्य वैभवात् । स्वात्मन्येव जगच्चित्रं दर्पणप्रतिबिम्बवत् ॥ ५१ ॥ सैव हैरण्यगर्भाख्यां तनुमास्थाय वै परा । अनाद्यज्ञानसञ्छन्नजीवानां हितकाम्यया ॥ ५२ ॥ उन्मेषयदागमाब्धिं सर्वकामप्रपूरणम् । तत्र जीवाः स्वभावेन विचित्रकामवासनाः ॥ ५३ ॥ कथं तेषां शुभं भूयादेवं चिन्तापरायणः । असृजत् काम्यकर्माणि फलचित्राणि सर्वशः ॥ ५४ ॥ सदसद्वापि हि जनः करोत्येव स्वभावतः । तथा च केनापि कर्मपरिपाकवशेन तु ॥ ५५ ॥ भ्रमन् योनिविभेदेषु मानुष्यमुपसङ्गतः । कामनावशतः काम्ये कर्मण्यभिमुखो भवेत् ॥ ५६ ॥ लगे—"भृगुनन्दन ! सुनो, मैं तुम्हें निःश्रेयसका प्रधान साधन बतलाता हूँ ॥ ५० ॥ जो पराचितिदेवी अपने स्वातन्त्र्यके प्रभावसे दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान अपनेमें ही इस जगत्रूप चित्रको भासित कर देती है उसीने हिरण्यगर्भसंज्ञक शरीर धारण कर अनादि अज्ञानसे आवृत जीवोंके हितकी कामनासे सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले आगम- शास्त्ररूप समुद्रको प्रकट किया ॥ ५१-५३ पू० ॥ संसारमें जीव तो स्वभावसे ही अनेकों प्रकारकी कामना एवं वासनाओंवाले हैं। अतः उनका किस प्रकार शुभ हो—ऐसा चिन्तन करते हुए उसने अनेक फल देनेवाले सम्पूर्ण काम्य कर्मों की रचना की ॥ ५३ उ०-५४ ॥ मनुष्य स्वभावसे ही शुभ या अशुभ कर्म तो करता ही रहता है। तथा अनेकों योनियोंमें भटकता हुआ किसी कार्यविशेषके फलोन्मुख होनेपर मनुष्य-शरीर प्राप्त करता है। तब कामनाओंके अधीन होकर वह काम्य कर्मोंकी ओर प्रवृत्त होता है ॥ ५५-५६ ॥
२६६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे कामनाया विशेषेण यदीश्वरपरो भवेत् । तदैश्वराणि शास्त्राणि प्रसङ्गादवलोकयेत् ॥ ५७ ॥ काम्यकर्मफलश्रुत्या प्रवृत्तः काम्यकर्मणि । विहतस्तत्फलाप्राप्त्या वैगुण्यात् सूक्ष्मकर्मणः ॥ ५८ ॥ कर्त्तव्यजिज्ञासयैव कश्चित् स पुरुषं व्रजेत् । तत्प्रसङ्गवशात् क्वापि माहात्म्यं शृणुयात् क्वचित् ॥ ५९ ॥ महेश्वरस्य च ततः प्राक्पुण्यपरिपाकतः । तस्य प्रसादने भूयात् प्रवृत्तिरपि भार्गव ॥ ६० ॥ तस्मात् प्राक्पुण्यपाकेन सत्सङ्गमभिगम्य तु । प्राप्नोति श्रेयःसोपानपंक्तिमत्यन्तदुर्लभाम् ॥ ६१ ॥ प्रायः सत्सङ्गमूलैव श्रेयःप्राप्तिरुदीरिता । क्वचिदुत्कृष्टपुण्येन चोत्कृष्टतपसापि वा ॥ ६२ ॥ [ मेरी कामनापूर्तिमें विघ्न न हो—ऐसी ] विशेष कामनासे ही जब वह ईश्वरपरायण होता है, तब प्रसंगवश उसे ईश्वरसम्बन्धी शास्त्र देखने पड़ते हैं ॥ ५७ ॥ काम्य कर्मोंके फल सुनकर वह काम्य कर्मोंमें प्रवृत्त होता है। किन्तु किसी कर्मांगमें त्रुटि आजानेके कारण जब उसकी फलप्राप्तिमें विघ्न पड़ता है तो अपना कर्त्तव्य जाननेकी इच्छासे वह किसी सत्पुरुषके पास जाता है ॥ ५८-५६ पू० ॥ उसी प्रसंगसे कभी अपना पूर्व पुण्य उदय होनेपर वह उन महा- पुरुषके मुखसे भगवान् महेश्वरका माहात्म्य श्रवण करता है। और परशुरामजी ! उन महेश्वरकी कृपासे ही माहात्म्य-वर्णनमें उन महा- पुरुषकी प्रवृत्ति भी होती है ॥ ५६ उ०--६० ॥ अतः पूर्व पुण्योंका उदय होनेपर ही वह सत्संगमें जाकर निःश्रेयस ( मुक्तिपद ) की अत्यन्त दुर्लभ सोपानपरम्परा ( सीढ़ी अर्थात् साधन- पद्धति ) प्राप्त करता है ॥ ६१ ॥ इस प्रकार निःश्रेयसप्राप्तिका मूलकारण प्रायः सत्संग ही कहा गया है। कभी महान् पुण्य अथवा उत्तम तपके द्वारा आकाशसे