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त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

द्वाविंशोऽध्यायः । ३५७ विधूय वासनां सत्यामुपैति ब्राह्मणोत्तम । ततो न बाधिता सत्यवासना भवति क्वचित् ॥ ४९ ॥ मध्यमस्य विस्मृतिर्नो न मिथ्या ज्ञानमेव च । अविस्मृतस्येच्छयैव मिथ्याज्ञानं क्वचिद्भवेत् ॥ ५० ॥ सिद्धस्यैषा स्थितिः प्रोक्ता साधकस्योच्यते शृणु । यथा यथा तत्परः स्यात्तथाऽविस्मृतिरुच्छ्रिता ॥ ५१ ॥ पूर्णस्य विस्मृतिर्नास्ति मिथ्याज्ञानं प्रयत्नतः । उत्तमस्य पुनर्ब्रह्मन् समाधिव्यवहारयोः ॥ ५२ ॥ न भेदो लेशतोऽप्यस्ति यतोऽविस्मरणं सदा । यः समाधिपरो मध्यस्तस्य याऽविस्मृतिः स्थिता ॥ ५३ ॥ सैषा म्लाना भवेन्मिथ्याज्ञानभूमिषु भूसुर । यस्तूत्तमोऽपि स्याच्छन्द्यात्प्रारब्धवशतोऽवि वा ॥ ५४ ॥ देता है और सत्य ज्ञानवासनाको प्राप्त कर लेता है। इसके पश्चात् उसकी वह सत्यवासना फिर कभी बाधित नहीं होती ॥ ४८-४९ ॥ मध्यम ज्ञानीको सत्यवासनाकी विस्मृति नहीं होती और न मिथ्या ज्ञान ही होता है। वह सत्यवासनाको बिना भुलाये ही कभी-कभी स्वेच्छासे व्यवहारोपयोगी मिथ्या ज्ञानको स्वीकार कर लेता है ॥ ५० ॥ किन्तु यह स्थिति सिद्ध मध्यम ज्ञानीकी कही गयी है। अब साधककी बतलाता हूँ, सुनो। साधक जैसे-जैसे आत्मानुसन्धानमें तत्पर रहता है वैसे-वैसे उसे स्वरूपकी स्मृति बढ़ती जाती है। पूर्ण होनेपर तो स्वरूपकी विस्मृति होती ही नहीं और मिथ्या द्वैतका स्फुरण भी प्रयत्न करनेपर ही होता है ॥ ५१-५२ पू० ॥ ब्रह्मन् ! उत्तम ज्ञानीकी दृष्टिमें तो समाधि और व्यवहारका लेशमात्र भी भेद नहीं होता, क्योंकि उसे स्वरूपकी स्मृति सदा ही बनी रहती है ॥ ५२ उ०-५३ पू० ॥ जो समाधिनिष्ठ मध्यम ज्ञानी होता है उसे जो स्वरूपकी अविस्मृति रहती है, हे ब्राह्मण ! वह तो मिथ्या अज्ञानकी स्थिति आनेपर कुछ मन्द पड़ जाती है। किन्तु जो उत्तम ज्ञानी है वह

३५८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे समाध्यतत्परो भूयात्तस्याम्लानैव चास्मृतिः । वस्तुतः शृणु भूदेव मध्यमोत्तमज्ञानिनाम् ॥ ५५ ॥ कर्म नैवास्ति यत्किञ्चिद्यतस्ते पूर्णतां गताः । संविदात्मातिरिक्तं यन्न ते पश्यन्ति किञ्चन ॥ ५६ ॥ कर्म शेषं कथं शिष्येद्यतः सर्वं चिदग्निना । भस्मीकृतमतस्तेषां न किञ्चित् परिशिष्यते ॥ ५७ ॥ ऐन्द्रजालिककर्मेव त्वितरैरेव दृश्यते । शृणु ब्रह्मन् रहस्यं ते प्रवक्ष्यामि समासतः ॥ ५८ ॥ शिवस्य यादृशी सैव ज्ञानिनां दृष्टिरुच्यते । नास्ति भेदो लेशतोऽपि सत्यमेतन्न संशयः ॥ ५९ ॥ तस्मान्न किञ्चित् कर्मापि ज्ञानिनामनुवर्त्तते । इति श्रुत्वा स वसुमान् हेमाङ्गदनिरूपितम् ॥ ६० ॥ सर्वसन्देहनिर्मुक्तो विज्ञानविशदाशयः । स्वेच्छासे अथवा प्रारब्धाधीन होनेपर भी यदि समाधिमें तत्पर न रहे तो भी उसकी स्वरूपकी अविस्मृति मन्द नहीं पड़ती ॥ ५३ उ०-५५ पू० ॥ विप्रवर ! सुनो, वास्तवमें तो मध्यम और उत्तम ज्ञानियोंके कुछ भी कर्म हैं ही नहीं, क्योंकि वे तो पूर्णताको प्राप्त हो जाते हैं । एक चिदात्माके सिवा वे और कोई वस्तु नहीं देखते ॥ ५५ उ०-५६ ॥ उनके किसी प्रकारके अवशिष्ट कर्म कैसे रह सकते हैं, क्योंकि वे सब तो चेतनरूप अग्निसे भस्म हो गये हैं । अतः उनके कोई भी कर्म शेष नहीं रहते ॥ ५७ ॥ मायावीके खेलके समान उनके कर्म तो दूसरोंको ही दिखाई देते हैं । ब्रह्मन् ! सुनो, इसमें जो गूढ़ रहस्य है वह मैं संक्षेपमें कहता हूँ ॥ ५८ ॥ जैसी दृष्टि शिवजीकी है वैसी ही ज्ञानियोंकी दृष्टि बतलायी जाती है । उनमें लेशमात्र भी अन्तर नहीं है—यह बात निः- सन्देह सत्य है । इसलिये वास्तवमें ज्ञानियोंका कुछ भी कर्म शेष नहीं रहता ॥ ५६-६० पू० ॥ इस प्रकार हेमाङ्गदका तत्त्वनिरूपण सुनकर वसुमान् सब सन्देहों-

द्वाविंशोऽध्यायः । ३५६ पूजितो राजपुत्राद्यैः संस्थानं प्रत्यपद्यत ॥ ६१ ॥ प्राप्तौ स्वनगरं राजपुत्रावपि ततः परम् । एवं श्रुत्वा पुनारामः पप्रच्छात्रिसुतं मुनिम् ॥ ६२ ॥ श्रुतमेतद्धि विज्ञानं गुरो त्वन्मुखनिर्गतम् । विनष्टो मम सन्देहो विदितं तन्महत् पदम् ॥ ६३ ॥ सर्वानुस्यूतसंवित्तिमात्रात्मा भाति सर्वतः । तथापि भवता प्रोक्तमादितः सर्वमेव तु ॥ ६४ ॥ संक्षेपेण पुनर्ब्रूहि विज्ञानं सारवत्तरम् । यावद्धारयितव्यं मे गुरो सर्वात्मना मया ॥ ६५ ॥ इत्यापृष्टः स रामेण पुनः प्राहात्रिनन्दनः । शृणु राम प्रवक्ष्यामि सर्वसारतमं पुनः ॥ ६६ ॥ या चितिः परमेशानी पूर्णाहन्तामयी परा । सा स्वातन्त्र्याभिधामायाशक्तिमाहात्म्यतः सदा ॥ ६७ ॥ से मुक्त हो गया तथा उसका अन्तःकरण विज्ञानके प्रकाशसे उज्ज्वल हो गया। फिर राजपुत्रादिसे सम्मानित हो वह अपने स्थानको चला गया ॥ ६० उ०-६१ ॥ इसके पश्चात् वे दोनों राजकुमार भी अपनी राजधानीमें चले आये। यह सब सुनकर परशुरामने पुनः मुनिवर दत्तात्रेयसे पूछा—॥ ६२ ॥ “गुरुदेव ! आपके मुखारविन्दसे निःसृत यह ज्ञानोपदेश मैंने सुना। इससे मेरा सन्देह जाता रहा और मुझे उस परमपदका ज्ञान भी हो गया ॥ ६३ ॥ सबमें ओतप्रोत चिन्मात्र आत्मा ही सब ओर भास रहा है। तथापि गुरुदेव ! आपने आरम्भसे अबतक जो कुछ कहा है उसे एक बार संक्षेपसे, जो सबका सारभूत विज्ञान हो और जितना मुझे सभी प्रकार ध्यानमें रखना चाहिये, पुनः सुनाइये” ॥ ६४-६५ ॥ परशुरामके इस प्रकार पूछनेपर अत्रिनन्दन श्रीदत्तात्रेयजी पुनः कहने लगे, “परशुराम ! सुनो, अब जो सबका अत्यन्त सार है वह तुम्हें फिर सुनाता हूँ ॥ ६६ ॥ जो परम समर्था और पूर्णाहन्तामयी परा चिति है वह अपनी स्वतन्त्रतारूपा मायाशक्तिकी महिमासे, जो असम्भवको भी सम्भव

३६० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे जगदाभासयेन्नूनं दुर्घटैकविधायिनः । प्रतिबिम्बवदादर्शे तत्प्रकारं शृणु क्रमात् ॥ ६८ ॥ या सा पराचितिः पूर्णा पूर्णाहंभावबृंहिता । स्वातन्त्र्यवशतः स्वात्मरूपं द्वेधावभासयत् ॥ ६९ ॥ तत्रैकांशेऽप्यहंभावो पूर्ण आभासितो यदा । तदा द्वितीयभागस्तदहंभावविनिर्गतः ॥ ७० ॥ बाह्यमव्यक्तमभवत्तद्दृष्ट्यैव भृगूद्वह । अपूर्णाहंभावयुत एष प्रोक्तः सदाशिवः ॥ ७१ ॥ स तमव्यक्तभागन्तु पश्यन् भिन्नमपि स्वतः । अहमेतदित्यभेदादनुसन्दधिपरः सदा ॥ ७२ ॥ स एव भूयः स्वातन्त्र्यात् सिसृक्षुर्विविधं जगत् । अव्यक्तमात्मनो देहमेतदेवाहमस्थितः ॥ ७३ ॥ कर देनेवाली है, दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान अपने हीमें इस जगत्को आभासित कर देती है। उसके जगत्-प्रकाशनका प्रकार क्रमशः सुनो ॥ ६७-६८ ॥ वह जो परिपूर्ण पराचिति है पूर्ण अहम्भावके कारण अत्यन्त विस्तृत है। अपने स्वातन्त्र्यके प्रभावसे उसने अपने ही स्वरूपको दो रूपोंमें आभासित किया ॥ ६९ ॥ जब उसके एक अंशमें अपूर्ण अहन्ता आभासित हुई तो दूसरा भाग उस अहन्तासे शून्य बाह्य (जड) अव्यक्त हो गया। भृगु- नन्दन ! उस बाह्य अव्यक्तकी दृष्टिसे ही वह अपूर्ण अहन्तायुक्त अंश 'सदाशिव' कहा जाता है ॥ ७०-७१ ॥ वह यद्यपि उस अव्यक्त अंशको अपनेसे भिन्न ही देखता है तथापि उसे सर्वथा अभेदपूर्वक यही जान पड़ता है कि यह मैं ही हूँ ॥ ७२ ॥ उसीको स्वतन्त्रताके कारण फिर अनेक प्रकारका जगत् रचने- की इच्छा हो जाती है और वह अव्यक्तरूप अपनी देहमें 'मैं यही हूँ' ऐसी आस्था करने लगता है ॥ ७३ ॥

द्वाविंशोऽध्यायः । ३६१ इत्येवमनुसन्धानपर ईश्वर आबभौ । अव्यक्तमभिमानेनाविष्ट ईश्वर एव तु ॥ ७४ ॥ त्रिधासमभवद्रुद्रहरिद्रुहिणरूपतः । द्रष्टृदृश्यमहाराशिसमुदायावभासकः ॥ ७५ ॥ विधयो विविधा आसंस्तथा तद्रूपसंस्थिताः । बहवो हरयोऽप्यासंस्तत्संहारपरायणाः ॥ ७६ ॥ अनेकशोऽभवन् रुद्रा एवमेष जगद्विधिः । एवंविधं जगत्तत्त्वं दर्पणप्रतिविम्बवत् ॥ ७७ ॥ भासते केवलं राम न हि जातं तु किञ्चन । पराचितिः प्रपूर्णांहंभावरूपैव सर्वदा ॥ ७८ ॥ स्थिताप्यनेका सम्पूर्णांहंभावपरिवृंहिता । यथा त्वं राम सर्वस्मिन् देहेऽहंभावबृंहितः ॥ ७९ ॥ पृथङ् नेत्राद्यहंभावैरपि तत्तत्क्रियापरः । इस प्रकारका अनुसन्धान करने लगनेपर वह 'ईश्वर' हो गया । जो अभिमान द्वारा अव्यक्तमें आविष्ट है वही 'ईश्वर' है ॥ ७४ ॥ इस दृश्यवर्गके महान् राशिरूप समुदायका अवभासक वह द्रष्टा ही रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा रूपसे तीन प्रकारका हो गया ॥ ७५ ॥ इस ब्रह्माण्डकी स्थिति ( उत्पत्ति ) करनेवाले ब्रह्मा अनेकों थे, विष्णु भी अनेक थे तथा इस जगत्का संहार करनेवाले रुद्र भी अनेकों थे । ऐसा ही इस जगत्का विधान है ॥ ७६-७७ पू० ॥ दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान इस संसारका स्वरूप ऐसा ही है । परशुराम ! यह केवल भासता ही है, वास्तवमें है कुछ नहीं ॥ ७७ उ०-७८ पू० ॥ परिपूर्णरूपा पराचिति सर्वदा अहंभावरूपा ही है। वह स्थिर- स्वरूपा होनेपर भी सम्पूर्ण अहंभावोंसे विस्तृत हुई-सी जान पड़ती है, जिस प्रकार कि परशुराम ! तुम इस देहमें अहंभावसे व्याप्त हो, तथापि नेत्रादि विभिन्न अहंभावोंके द्वारा भी उन अनेक व्यापारोंमें लगे रहते हो ॥ ७८ उ०-८० पू० ॥

३६२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे एवमेव परा संवित् पूर्णाहन्तासमाश्रया ॥ ८० ॥ सदाशिवादिस्तंबान्ताऽपूर्णाहन्ताश्रयापि वै । वस्तुतः सैव परमा चितिरेवं हि भासिनी ॥ ८१ ॥ देहाहंभावरूपस्त्वं स्वतो रूपरसादिकम् । ग्रहीतुमसमर्थोऽपि चाक्षतादात्म्यमेत्य तु ॥ ८२ ॥ सर्वं गृह्णासि सततमेवं देवः सदाशिवः । स्वतः सर्वाभेदमयो ब्रह्मादिस्तम्बराशिषु ॥ ८३ ॥ अतस्तादात्म्यमापन्नो जानाति च करोति च । यथा ते निर्विकल्पं तु रूपं सर्वाश्रयं हि सत् ॥ ८४ ॥ न किञ्चिदपि जानाति करोति च भृगूद्वह । एवमेव परा संवित् सर्वलोकसमाश्रया ॥ ८५ ॥ भेदलेशमपि क्वापि न जानाति करोति च । एतावज्जगतं सर्वं तस्यामेवावभासते ॥ ८६ ॥ इसी प्रकार यह परा चिति भी पूर्ण अहन्ताकी आश्रय है, तथापि यह सदाशिवसे लेकर स्तम्बपर्यन्त अपूर्ण अहंभावोंकी भी आश्रय है। वास्तवमें तो वह पराचिति ही इस प्रकार (इन सब रूपोंमें) भासनेवाली है ॥ ८० उ०-८१ ॥ तुम देहमें अहंभावरूप होकर यद्यपि स्वयं रूप-रस आदि विषयों- को ग्रहण करनेमें असमर्थ हो, तथापि इन्द्रियोंसे तादात्म्य करके तो सर्वदा सब कुछ ग्रहण करते ही हो। इसी प्रकार भगवान् सदाशिव यद्यपि ब्रह्मासे लेकर स्तम्ब पर्यन्त सबके साथ अभिन्नरूप ही हैं, तथापि उन ब्रह्मादिके शरीरोंमें तादात्म्य होनेपर वे ही सब कुछ जानते भी हैं और करते भी हैं ॥ ८२-८४ पू० ॥ जिस प्रकार तुम्हारा निर्विकल्प स्वरूप सबका आश्रय और सत् है, किन्तु भृगुनन्दन ! वह न तो कुछ जानता है और न कुछ करता है; इसी प्रकार वह परा चिति यद्यपि सम्पूर्ण लोकोंकी आश्रय है, तथापि वह लेशमात्र द्वैतको भी न तो जानती है और न कुछ करती ही है ॥ ८४ उ०-८६ पू० ॥ यह सारा जगत्प्रपञ्च उसीमें भास रहा है, किन्तु अपनी स्वतन्त्रता-

द्वाविंशोऽध्यायः । ३६३ तत्स्वातन्त्र्यात् प्रभूतश्च दर्पणप्रतिबिम्बवत् । जगतो भासनं सर्वं तस्या एवावभासनम् ॥ ८७ ॥ यथादर्शाभास एष प्रतिबिम्बावभासनम् । अत्र त्वमहमन्वे च द्रष्टारो दृङ्मयाः खलु ॥ ८८ ॥ दृश्यासंमेलने शुद्धचितिरेव न चेतरत् । घटादिदर्पणो यद्वद् घटादीनामसङ्गमे ॥ ८९ ॥ शुद्धदर्पणमात्रः स्याद्विभेदः प्रतिबिम्बतः । एवं विकल्पसम्भूतदृश्याभासप्रमार्जने ॥ ९० ॥ शेषिता परमा संविदद्वितीयास्वरूपिणी । महानन्दघना चैषा दुःखलेशविवर्जनात् ॥ ९१ ॥ सर्वानन्दघनाकारा यतः सर्वैरभीप्सिता । सुखमात्मस्वरूपं स्यात् सर्वैर्यस्मादभीप्सितम् ॥ ९२ ॥ रूपा शक्तिसे वही दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान अनेकरूप हो गयी है। अतः यह जगत्का सारा अवभास वास्तवमें उसीका आभास है, जिस प्रकार कि प्रतिबिम्बकी प्रतीति केवल दर्पणका ही आभास होती है ॥ ८६ उ०-८८ पू० ॥ यहाँ जो मैं तथा अन्य देखनेवाले हैं वे निश्चय चिन्मात्र ही हैं। यदि उनके साथ दृश्यकी मिलावट न हो तो वे शुद्धचिति ही हैं, और कुछ नहीं ॥ ८८ उ०-८६ पू० ॥ जिस प्रकार घटादिके प्रतिबिम्बोंसे अवच्छिन्न दर्पण घटादिका संग न रहनेपर शुद्ध दर्पणमात्र ही होता है। उसमें जो भेद है वह तो प्रतिबिम्बके कारण ही है ॥ ८६ उ०-६० पू० ॥ इसी प्रकार विकल्पसे उत्पन्न दृश्यरूप आभासका मार्जन (निषेध) करनेपर बची हुई परा चिति तो अद्वयस्वरूपा ही है। वह दुःखके लेशसे शून्य है, इसलिये परमानन्दघनरूपा भी है ॥ ६० उ०-६१ ॥ यह सम्पूर्ण आनन्दोंकी घनीभूत मूर्ति है, क्योंकि उसे सभी चाहते हैं। सुख आत्माका स्वरूप ही है, क्यों सभीको उसकी लालसा है ॥ ६२ ॥

३६४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यदर्थो देहादिभावो यन्न कस्यापि नेप्सितम् । यस्यैव लेशो विषयानन्द इत्यभिधीयते ॥ ९३ ॥ स एव भारहानादौ सुषुप्तौ चावभासते । चिदेव स्पृहणीयत्वादानन्द इति प्रोच्यते । ९४ ॥ मूढा न हि विजानन्ति स्वात्मभूतं महासुखम् । विभिन्नमभिजानन्ति व्यञ्जकानां विभेदतः ॥ ९५ ॥ यथा हि दर्पणे भावा भासमाना निमित्ततः । यावद्दर्पणविज्ञानं भिन्ना एव विभान्ति वै ॥ ९६ ॥ विदिते प्रतिबिम्बत्वे भासमानं च पूर्ववत् । न दर्पणाद् भिन्नमस्ति त्वादर्शः शुद्ध एव हि ॥ ९७ ॥ एवं विदिततत्त्वस्य जगदेतावदीदृशम् । भासमानमपि स्वात्ममात्रमेव न चेतरत् ॥ ९८ ॥ घटादिकं मृदि यथा हेम्नि यद्वद्विभूषणम् । जिसके लिये देहादिमें प्रीति होती है, जो किसीको भी अप्रिय नहीं है और जिसका लेशमात्र अंश ही 'विषयानन्द' कहा जाता है, वह स्वरूपभूत आनन्द ही भार आदिकी निवृत्ति होनेपर तथा सुषुप्ति अवस्थामें भासता है। वास्तवमें तो वाञ्छनीय होनेके कारण चेतन ही 'आनन्द' कहा जाता है ॥ ९३-९४ ॥ अज्ञानी पुरुष अपने आत्मासे ही प्राप्त होनेवाले उस परम सुखको नहीं जानते; वे तो उसको व्यक्त करनेवाले विषयोंकी विभिन्नताके कारण अपनेसे भिन्न ही समझते हैं ॥ ९५ ॥ जिस प्रकार बिम्बरूप निमित्तोंके कारण दर्पणमें भासनेवाले पदार्थ, जबतक दर्पणका ज्ञान नहीं होता उससे भिन्न ही जान पड़ते हैं, किन्तु जब उनकी प्रतिबिम्बताका ज्ञान हो जाता है तो पहले हीकी तरह भासते रहनेपर भी वे दर्पणसे भिन्न नहीं रहते । और दर्पण तो शुद्ध है ही। उसी प्रकार जिसे तत्त्वज्ञान हो गया है उसके लिये यह जगत् इसी रूप भासता रहनेपर भी अपना आत्मा ही है, और कुछ नहीं ॥ ९६-९८ ॥ जैसे मृत्तिकामें घटादि, सुवर्णमें आभूषण और शिलामें प्रति-

द्वाविंशोऽध्यायः । ३६५ प्रतिभाश्च यथा शैले जगदेवं चिदात्मनि ॥ ९९ ॥ जगन्नास्त्येवेति दृष्टिरपूर्णैव भृगूद्वह । नास्तीति विपरीतो हि निश्चयो नैव सिद्ध्यति ॥ १०० ॥ साधकात्मजगद्दृष्टेर्भूयः सम्भवतः स्फुटम् । नास्तीति शापमात्रेण कथं स्याज्जगतो लयः ॥ १०१ ॥ आदर्शनगरं सर्वमस्त्यादर्शस्वभावतः । एवं जगच्चिदात्मैकरूपं सत्यमुदीरितम् ॥ १०२ ॥ पूर्णविज्ञानमेतत् स्यात् सङ्कोचपरिवर्जनात् । दृगेव दृश्यतां प्राप्तं स्वमाहात्म्यप्रकर्षतः ॥ १०३ ॥ यथादर्शो नगरतामेष शास्त्रार्थसंग्रहः । न बन्धोऽस्ति न मोक्षोऽस्ति साधकः साधनं च न ॥ १०४ ॥ माओंकी प्रतीति होती है उसी प्रकार चिदात्मामें यह जगत् भास रहा है ॥ ९९ ॥ परशुराम ! 'जगत् है ही नहीं' यह दृष्टि तो अपूर्ण ही है, क्योंकि 'है ही नहीं' ऐसा विपरीत निश्चय किसी प्रमाणसे सिद्ध नहीं होता ॥ १०० ॥ [ 'सम्पूर्ण द्वैतका निषेध कर देनेपर 'है' और 'नहीं है' इन दोनों ही पक्षोंको ] सिद्ध करनेवाले चिदात्मस्वरूपसे फिर भी जगत्की सत्ता स्पष्टतया रह ही जाती है । ऐसी अवस्थामें 'संसार है ही नहीं' ऐसा शाप देनेसे ही भला जगत्का लय कैसे हो सकता है ? ॥ १०१ ॥ जिस प्रकार दर्पणमें प्रतीत होनेवाला नगर दर्पणरूपसे तो है ही, उसी प्रकार जगत् अद्वितीय चिदात्मस्वरूपसे तो सत्य ही कहा गया है ॥ १०२ ॥ यही पूर्ण विज्ञान है, क्योंकि इसमें किसी प्रकारका सङ्कोच ( कमी ) नहीं है । वास्तवमें अपने स्वातन्त्र्यके प्रभावसे दृक् ( शुद्ध चेतन ) ही दृश्यरूप हो गया है; जैसे कि दर्पण ही अपनेमें प्रति- बिम्बित नगररूप हो जाता है—यही संक्षेपमें शास्त्रोंका तात्पर्य है ॥ १०३-१०४ पू० ॥ न बन्ध है, न मोक्ष है, न साधक है और न साधन है । एक

३६६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अखण्डाद्वयचिच्छक्तिस्त्रिपुरैवावभासिनी । सैवाविद्या च विद्या च बन्धो मोक्षश्च साधनम् ॥ १०५ ॥ एतावदेव विज्ञेयं नान्यद्‌भार्गव विद्यते । एतत्तेऽभिहितं राम विज्ञानक्रममादितः ॥ १०६ ॥ एतत् सुविज्ञाय जनो भूयः क्वापि न शोचति । नारदैष ज्ञानखण्डः सूपपत्त्युपलब्धिकः ॥ १०७ ॥ श्रुतो न नाशयेत् कस्य मोहमज्ञानसम्भवम् । श्रुत्वाप्येतद्यस्य मोहो न शान्तिं प्राप्नुयात् क्वचित् ॥ १०८ ॥ स शैलपुरुषो लोके केन ज्ञानं पुनर्भवेत् । सकृदेव श्रुतं ह्येतद्विज्ञानं जनयेद् दृढम् ॥ १०९ ॥ द्विधा त्रिधा वा मन्दस्य ज्ञानं न जनयेत् कथम् । एतत् पापौघशमनं श्रुतं विज्ञानदं मतम् ॥ ११० ॥ अखण्ड अद्वयस्वरूपा चित्-शक्ति ही प्रकाशित हो रही है। वही अविद्या और विद्या है तथा वही बन्ध, मोक्ष और साधन भी है ॥ १०४ उ०-१०५ ॥ भृगुनन्दन ! बस, इतनी बात ही जानने योग्य है, और कुछ नहीं। परशुराम ! इस प्रकार आरम्भसे ही यह मैंने तुम्हें ज्ञानप्राप्तिका क्रम सुना दिया। इसे अच्छी तरहसे समझ लेनेपर पुरुषको फिर किसी प्रकारका शोक नहीं होता ॥ १०६-१०७ पू० ॥ [श्रीहारितायन मुनि कहते हैं—] नारद ! यह ज्ञानखण्ड सम्यक् प्रकारसे युक्ति और अनुभवसे पूर्ण है। यदि इसका श्रवण किया जाय तो ऐसा कौन है जिसके अज्ञानजनित मोहको यह दूर न करे ॥ १०७ उ०-१०८ पू० ॥ इसे सुनकर भी जिसका मोह शान्त न हो वह तो इस लोकमें पत्थरकी मूर्ति ही है, उसे फिर और किसके द्वारा ज्ञान होगा ? ॥ १०८ उ०-१०९ पू० ॥ यह तो एक बार श्रवण करनेपर ही दृढ ज्ञान उत्पन्न कर देता है। फिर जो मन्दबुद्धि है उसे भी दो-तीन बार सुननेपर कैसे ज्ञान उत्पन्न नहीं करेगा ? ॥ १०९ उ०-११० पू० ॥ यह ग्रन्थ श्रवण करनेपर पापराशिको शान्त करनेवाला और विशुद्ध

द्वाविंशोऽध्यायः । ३६७ लिखितं दृष्टिदोषघ्नं पूजितं चित्तशोधनम् । मूढतानाशनं चैतत् सर्वदा परिशीलितम् ॥ १११ ॥ सर्वात्मभूतं यद्रूपं विचार्यावगतं स्फुटम् । मुक्तिः स्यादन्यथा बन्धः सा भवेत्त्रिपुरैव हीम् ॥ ११२ ॥ इति श्रीमदितिहासोत्तमे त्रिपुरारहस्ये द्वादशसाहस्र्यां संहितायां ज्ञानखण्डे द्वाविंशोऽध्यायः । ज्ञान प्रदान करनेवाला माना गया है। इसे लिखा जाय तो यह दृष्टि- के दोषोंको दूर करता है, पूजा जाय तो चित्त शुद्ध करता और यदि सर्वदा विचारा जाय तो यह मूढता ( अज्ञान ) को नष्ट करनेवाला है ॥ ११० उ०-१११ ॥ जो सबका आत्मभूत स्वरूप है उसे यदि विचार करके स्पष्टतया जान लिया जाय तो मुक्ति हो जाती है, नहीं तो बन्ध है ही। वह स्वरूप देवी त्रिपुरा ही है ॥ ११२ ॥ ह्रीम् । ॐ तत्सत् । द्वाविंश अध्याय समाप्त ।

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शुद्धिपत्रम् पृष्ठ भाषा पंक्ति अशुद्ध शुद्ध ३ संस्कृत ७ हर्षो नायत्रोम- हर्षोऽमायत्रोम- ९ ,, ७ अहोविचार- अहोऽविचार- १४ ,, ११ प्रष्टुं स्प्रष्टुं १७ हिन्दी २ कुवन्नेवेह कुर्वन्नेवेह २१ संस्कृत ६ शीललदेहः शीतलदेहः ,, ,, १३ तदास्ति तदस्ति ४७ ,, ७ मपि मयि ४८ ,, ७ योषितो ऽन्यन्त- योषितोऽत्यन्त- ,, हिन्दी ५ पुनः पुनः पुनः ५३ संस्कृत १३ त्रानखण्डे ज्ञानखण्डे ६७ ,, १२ भुनक्त्यतिरां भुनक्त्यतितरां ७४ टिप्पणी अन्तिम श्रति श्रुति ८१ संस्कृत ,, प्रियाहँ प्रियाहं १०१ हिन्दी ६ अतिवृत्ति अनिवृत्ति १०३ ,, २ कम कर्म ,, ,, ७ बात नहीं हैं बात ऐसी नहीं है १०६ ,, २ स्थल स्थूल १०९ ,, १ साधन सैकड़ों साधन ११० ,, ५ "ऐसा "ऐसा- १११ संस्कृत ७ सुनिमल- सुनिर्मल- ११२ हिन्दी ६ असली असती ११३ संस्कृत ७ -विधौ -विधो ११८ हिन्दी ८ धनोपाजन धनोपार्जन १४१ संस्कृत १० -परायणताः -परायणाः १४६ हिन्दी अन्तिम सद्रप सद्रूप १४७ ,, ११ सान्यावस्था- साम्यावस्था- ,, ,, १२ भाव कारण ,, ,, १४ प्रश्यय प्रलय १४८ ,, अन्तिम परमेश्वरमें परमेश्वरने १४९ संस्कृत २ तथा यथा १५३ हिन्दी १२ अवस्थाथै अवस्थामें १५४ ,, अन्तिम मान भान

३७० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे पृष्ठ भाषा पंक्ति अशुद्ध शुद्ध १५८ हिन्दी ४ पदाथ पदार्थ १६१ संस्कृत ११ वर्तयिष्यामि वर्णयिष्यामि ” हिन्दी १४ तद्रूत तद्रूप १६८ ” अन्तिम मैं मैं समाधिमें १७३ ” ८ इत्यादि इन्द्र इत्यादि १८१ ” १५ महासेन महासेन १८६ ” १२ कसी किसी १८८ ” ४ यदि [ यदि १९२ संस्कृत ८ प्रष्टुं स्प्रष्टुं १९६ टिप्पणी २ उमे उसे २०३ हिन्दी २ चित्त और चित्त की ” ” अन्तिम चत् चित् २०९ ” ३ वचनों प्रवचनों २१३ ” २ तू अकेला तू आज अकेला २१९ ” ९ समझाते समझाये २२१ संस्कृत १ यथा यया २२५ टिप्पणी ३ श्रति श्रुति २२६ संस्कृत ३ पृथक्कृत्यं पृथक्कृत्य २४७ हिन्दी १० 'समाधियोंके समाधियोंके २४८ टिप्पणी १ श्रत श्रुत २५२ हिन्दी ७ ॥ ७४ ॥ ॥ ७५ ॥ २५४ ” ६ बश बस २५५ ” १० मे मेरे २५८ संस्कृत ८ ॰मुक्तो भवेद् ॰मुक्तोऽभवद् २६३ ” ११ ॰रूपस्य सकृत् ॰रूपस्यासकृत् २६५ ” ९ भावोदरगोऽभावो भावोदरगो भावो २६७ ” ११ दृष्टा सत्येन दृष्टासत्येन २६८ ” ५ चिरतो चिततो २७६ हिन्दी ६ तप तम २९९ ” १६ कामवासना कामादि वासनाएँ ३०५ ” १५ अन्यमनस्क अमनस्क ” ” अन्तिम निश्चित निश्चल ३०७ ” ५ पुल्लश्य पुलस्त्य ३०८ संस्कृत ११ विष्णुं नाभि- विष्णुनाभि- ३०९ ” १ विष्णुर्विधि विष्णुविधिः ” ” ४ श्रद्धया युताः श्रद्धयाऽयुताः ३१२ हिन्दी २ तत्परा तत्पर

शुद्धिपत्रम् ३७१ पृष्ठ भाषा पंक्ति अशुद्ध शुद्ध ३१५ हिन्दी ९ मुक्ति युक्ति ३१६ ” १२ होनेपर नहीं होनेपर अन्धकार नहीं ३१८ ” ६ भेद-कल्पना भेद कल्पना ३२७ ” अन्तिम हा गया हो गया ३३४ ” १३ जिस प्रकारकी जिस प्रकार ३४१ संस्कृत १० सूक्ष्मा ग्राह्यत्वतो सूक्ष्मऽग्राह्यत्वतो ३४२ हिन्दी ८ अवृत आवृत्त ३४३ ” १ और और ३४८ ” १ राजाओंमें मनुष्योंमें ३५० ” ७ इसने इसमें ३५३ ” ८ कम कर्म ३५५ संस्कृत ९ नान्तविकृति- नान्तः विकृति- ३६० ” १ दुर्घट कविधायिनः दुर्घटैकविधायिनी ३६१ हिन्दी १४ उन उनके ३६४ ” १४ रूप रूपमें ३६६ ” १ चित्-शक्ति ही चित्-शक्ति त्रिपुरा ही

श्लोकानुक्रमणिका श्लो० पृ० | श्लो० पृ० | श्लो० पृ० | अतस्तस्यो ५७ | अथ धैयं १७२ अकृत्वा १३५ | अतस्तादा ३६२ | अथ निश्चित २५१ अशान्तः ३१२ | अतस्तु १९६ | अथ प्राप्ता १२३ अखण्डा ३६६ | अतस्ते १०३ | अथ प्राह ३४६ अखिलं १८४ | अतस्तैस्तरपदे ३०० | अथ प्रोचु ३१० अखिलाङ्गे ४१ | अतिक्रान्ता १७६ | अथ भूयः १०९ अग्निर्दहति १९३ | अतिनीव्र २९४ | अथ राज १६३ अज्ञाः पश्य २७१ | अतिप्रियं २४१ | अथ शृङ्गे १७३ अज्ञानं २४४ | अतिश्रिति ५३ | अथ स्मृतिं २५३ अज्ञानस्य २४५ | अतीता १८० | अथाजगाम १६४ अज्ञानिनां ३५४ | अतो गृह ११६ | अथान्यथापि २४१ अज्ञानिभि ३५५ | अतो निद्रा २३३ | अथाऽपश्य १२१ अचलानाम् १८५ | अतो बहिः २६५ | अथाऽपश्य १३२ अचेतने २६४ | अतो हि १०६ | अथापि लोके २६७ अतः परं २४६ | अत्यन्तं ७० | अथ मामुप १४ अतः परमकं ९४ | अत्यन्तशोक १७८ | अथालक्ष्य ३३ अतः पौरुष ९३ | अत्यन्ताभाव २७६ | अथासाद्य ३ अतः प्रती ८५ | अत्युत्तमेषु ३५ | अथास्थिरो ६२ अतः प्रमाता ८८ | अत्र ते १६१ | अथाह ३५३ अतः प्रसादन १६४ | अत्र ते २११ | अथैवं १० अतः सर्वसा २९१ | अत्र ते २२९ | अथोत्थाय ११ अतः सुषुप्ति २३९ | अत्र ते ३०७ | अथोत्थितो १७५ अतः स्वात्मनि २७४ | अत्र मुह्यन्ति वह २७३ | अधमाना २५७ अतः शरीरं कर १०४ | अत्र मुह्यन्ति २२९ | अनन्त २५० अतः शरीरं १०५ | अत्र सर्वे २२१ | अनन्तवासना २८८ अतः सद्योशात २३३ | अत्राधुना २४५ | अनपेक्ष्यैव ३१३ अतः सास्म २७६ | अत्रोपपत्ति १४५ | अनयत्तु ६६ अतः एव १०१ | अथ चित्स्वा २०१ | अनन्यशरणं १८ अत एव १५८ | अथ तत्र २९ | अनया विहृता २९० अत एव २३१ | अथ तृतीय ६५ | अनयैव २९१ अतः एव ३५३ | अथ ते कथ २ | अनवस्थस्य ९९ अतत्परत्व २४६ | अथ ते १८० | अनवस्थित ८६ अतत्त्वज्ञे ३५२ | अथ दृष्टो १६९ | अनवस्थित ८७ अतर्कितं २४१ | अथ वेहस्य ११९ | अनवस्थित ४२

श्लोकानुक्रमणिका ३७३ अनवस्थित १२ अन्यथा हि ८६ अप्राप्तावात्मता १९६ अनवस्थित १३ अन्यस्मृत्य २१५ अप्राप्य १८१ अनस्तमित २५६ अन्यान १५३ अप्रेक्षणीया ४६ अनादरेण ९१ अन्यानपेक्ष १३० अबाधितः १८३ अनादिकालतो १९ अन्यानुल्लेख २५१ अबुद्धिपूर्वक ९७ अनादिकाला २७९ अन्यासक्ता ४६ अभाव्यमान १८९ अनादिमिथुनं ३१२ अन्यूना ३२५ अभिमानो १६४ अनादृत्य ३१२ अन्ये दुर्भाग २४९ अभून्मू ७० अनारम्भः १३३ अन्येऽपि ९६ अभ्यासाति ३३६ अनालोच्य १० अन्येभ्यस्तु २२९ अभ्यासान्मणि १५६ अनाश्वासस्य ३२० अन्येभ्यस्तु २३० अभ्यासेना २९९ अनाहतो १४० अन्येपान्तु ३३४ भ्रमित्त्वा १५७ अनिच्छया १९२ अन्यो मोक्षो २६२ अयत्नेनैव ३२६ अनिर्मलान्तः १३२ अन्वय १४६ अयमेवंविव २३४ अनीशा ६२ अन्विच्या १२७ अयमेवंविव २३४ अनुकम्प्यो १६६ अपभ्रंशानु ३०२ अरिक्तारम १५४ अनुध्यानं २५७ अपराध २८९ अर्थक्रिया २६७ अनुरक्तं ४७ अपराध २९० अर्थक्रिया हि २८१ अनुवृत्ति १८६ अपरे तु १०७ अर्बुदानां १७४ अनुवृत्ति ३०४ अपश्य १२५ अहन्तं १०३ अनुष्णा ९५ अपश्यत्त १६४ अलं १३६ अनूतना ११० अपश्यदग्रगं १४७ अलसितं २३६ अनेकचित्र ६१ अपाश्चिम १५४ अलमेतेन २५४ अनेकभेद १५२ अपि किञ्चित् ३४० अल्पविद्यं ९५ अनेकरसतैव १५४ अपूर्णं ३१९ अवच्छेदन २४४ अनेकशो ३६१ अपूर्त्सितार २८८ अवभासय २७२ अन्तःशान्ता २८५ अपूर्व्वमासादितं २५३ अविचारः २१ अन्तरप्यच्छ ३३७ अपृच्छत् १७७ अविचार हता २१ अन्तर्बहिर्वा १९७ अपृष्ट्वा २४८ अविचाराद्ध २३ अन्तर्हितं १३५ अप्यसत्यं ८२ अविचाराद्धि २२ अन्तवत्तु ३१६ अप्यसत्या १७ अविदित्वा २५४ अन्धकार १२६ अप्यस्खलितं ३२५ अविदित्वा १२७ अन्धस्या २६९ अप्यावरण २०८ अविद्यायास्तु ११२ अन्धीभूता १९ अप्रकाशेऽपि १५३ अविवेक १४३ अन्धौ १८ अप्रकाशो २२१ अविवेका ३२२ अन्यथा १११ अप्रमाण १८६ अविवेको १४३ अन्यथा २३३ अप्रष्ट्र्नैव २६९ अव्युत्पत्त्या २५९ अन्यथा चेष्टते १९ अप्राप्तस्य १२६ अभ्यासी २६४ अन्यथाना ९९ अप्राप्तस्यापि २५५ अव्यक्तभित्ति २०५

३७४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अव्यक्त २०२ । अस्थिरस्य ७४ । आत्मविद्या ३२४ अव्यक्तं २३८ । अस्थिराख्यं ६२ । आत्मा १२३ अविशेषात् १८१ । अस्थिराह्नः ६१ । आत्मानं २४२ अवेदं चेत् २२४ । अस्थिरेण ७१ । आत्मान १२३ अदेयं विदितं २१५ । अस्थिरोऽपि ९३ । आत्मा व्यवस्थितः २२३ अशनाद्वास ५७ । अस्मान् राम २९८ । आत्मैव ३१८ अशरीरो १०४ । अस्मिन् ७३ । आदर्श २१७ अशृणोद्धि ६४ । अहं कदा १२० । आदर्शनगर १०६ अशेषोत्पाद ११० । अहन्तया ११९ । आदर्शनगरं ३६५ अश्रद्धया ८७ । अहं पृच्छामि २१५ । आदर्शों १५८ अश्रद्दस्तरुणः ८३ । अहं वाद्यावधि २७ । आद्याऽन्येभ्यः २२९ अश्रद्धेयं ९० । अहं बुद्धि २२७ । आनन्दार्थं ७८ अश्रद्धो ८३ । अहं सख्य ६३ । आनन्दिताहं ७४ अश्रौषं स्वे २५३ । अहो दैवहत। १३४ । आनयन्ति ६४ अश्वमेध १३९ । अहो नृपारमज ३५३ । आन्तरं ११ अश्वस्य १६२ । अहो भगवती २४९ । अन्तरोऽ २३४ असंवेद्यं २२० । अहो महच्चित्र ९ । आपातदर्शना ३३४ असद्रूपेन १५१ । अहो मे २५५ । आप्तेष्व ८३ असङ्ख्यकाल २०५ । अहो यथा ७ । आग्रह २५३ असङ्ख्याता १८० । अहो यथा ११८ । आभातरूप २२८ असञ्चरित्र ५९ । अहो लोका २५४ । आमयाः ५७ असत्ता २७० । अहो विचार ९ । आयान्तं १७९ असत्यत्वेन ३०५ । अहोऽस्य १२२ । आयास्यति १३ असत्यमेव ८१ । अहो स्वयं २६० । आराधयेद् २४ असत्सु ८४ । आ । आलङ्घ्य ४४ असत्सु ८५ । आकाशमेव २७२ । आलम्ब १६ असन्दर्भण ७९ । आकाशादपि २९१ । आविरासां ३०९ असमर्थः १०७ । आकाशाद्धि ३४१ । आवृत २७७ असम्यग् १२४ । आकाशे २७७ । आवृत्त्यभिहितिः २७८ असुखं १६ । आक्षिप्तत्तत्र २१२ । आश्वस्त १०८ अस्ति जानासि २१७ । आगच्छति ३३ । आसक्ते १५ अस्ति तत्रैव २५० । आगतं ३५ । आसने ११८ अस्तिता १४३ । आचार्यं ३४७ । आसादयति १२६ अस्तिबीजं ५८ । आचार्य्यंमत ८९ । आसादित १४० अस्थिरं ७१ । आच्छादितं २७३ । आसीत्सृष्टेः १५० अस्थिर ६९ । आजगाम ३३ । आहुतैरनु ३०३ अस्थिरस्य ७४ । आत्मत्त्व ३२३ । आहोस्वित १२२ अस्थिरस्तु ६७ । आत्मलाभेन १२६ । औ अस्थिरस्तु ७३ । आत्मविज्ञान ३२३ । औषधेन तु १९१

श्लोकानुक्रमणिका ३७५ इतस्ततः ७० | इत्युक्त्वा १७१ | उपासने ९१ इति दत्तात्रेय २८७ | इत्युक्त्वा १७० | उपेपेत ९१ इति निश्चित्य १२३ | इत्युक्त्वा १७४ | उलूकादि १५८ इति निश्चित्य २५४ | इत्युक्त्वा १८८ | उवास ७६ इति पर्य २३२ | इत्युक्त्वा २१३ | इति पूर्वोत्तर २१७ | इत्युक्त्वा ३४० | ऊर्ध्वं १०२ इति पृष्टः २९४ | इत्येतत्ते १७० | ऊषरा १७७ इति पृष्ट ९१ | इत्येवं २६८ | इति प्रियोदितं १३८ | इत्येव २६१ | ऋचो ६४ इति व्यवस्य १० | इदं तदिति २८० | ऋषयो ११६ इयि शुद्धवचः ८८ | इदमेवात्मनो १२५ | इति श्रुत्वा ५७ | इमां वेधा ३१ | एक एव हि १९३ इति श्रुत्वा २०७ | इयं स्याद ३२३ | एकमेव ३१ इहि श्रुत्वा ३१० | इयमेव हि २७५ | एकरूपो २६९ इति सम्प्रार्थितो ४ | | एकस्मिन्नपि १७९ इति सम्प्रार्थितो १७० | ईश्वरानुग्रह २९४ | एकस्यापि २९१ इतोऽपि १७७ | ईश्वरेच्छा १४७ | एकाग्र २४७ इत्यत्रि २०९ | ईश्वरो १०३ | एकान्तग्रहणे ८३ इत्यष्टावक्त्र २१६ | | एकापि ३४१ इत्याकर्ण्य १९० | उत्थाय ३ | एतच्चित्रं १९२ इत्यागम १५० | उत्पत्तिनूं १४५ | एतज्जगत् ९६ इत्यादि ३१४ | उत्तमज्ञा ३५५ | एतज्ज्ञानात् २९० इत्यापृष्ट ३५९ | उत्तमज्ञानि १०३ | एतत् १६६ इत्यापृष्टा २१८ | उत्तमज्ञानिन २०६ | एतत्तं १०४ इत्यापृष्टा ३११ | उत्तमज्ञानिनो ३०४ | एतद्देव २०३ इत्यापृष्टो १६० | उत्तमाः २५२ | एतद्देव २३१ इत्युक्तः ११७ | उत्तमानां २५२ | एतद्द्वयमृते २८० इत्युक्तः १३१ | उत्तमानान्तु १५४ | एतद्वंदन २२४ इत्युक्तः १८३ | उदासीनां १४ | एतत् पदं १३० इत्युक्तः ३४० | उद्यानं ११७ | एतत् परा १९७ इत्युक्ता ८५ | उन्मत्ताश्च २० | एतत्सर्वं २०९ इत्युक्ता १२५ | उन्मील्य १२४ | एतत्सर्वं सु ३२१ इत्युक्ता १३४ | उन्मील्य न १३२ | एतत्सर्वं ३४६ इत्युक्ता ३२७ | उन्मेषयदा २१५ | एतदादीनि ३३६ इत्युक्ती १६७ | उपगच्छा ४२ | एतदेव २१० इत्युक्तो १७९ | उपदेशाद्द्विदुः १४० | एतदेव हि २४३ इत्युक्तो ३४१ | उपपत्त्युप २ | एतदेव हि १३७ इत्युक्त्वा १७ | उपलब्धि २५९ | एतद्यदुक्तं १५

३७६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे एतद्भो ३२७ एवं मम . ६१ एष एव २७६ एतन्मे १८४ एवमुक्ता १११ एष एव २७९ एतन्मे २४३ एवमेव १६ एष मेऽद्य १६६ एतन्मे ३५० एवं रामेण ५४ एषा सुषुप्ति २३९ एताभिस्ति २९१ एवं लोकांश्चि २३ एषा हि १९९ एतावत्सु २१८ एवं वदन्तं १७१ ऐ एतावदेव १०२ एवं वारुणिना २१२ ऐन्द्रजालिक ३५८ एतावदेव ३६६ एवं विक्षेप २५२ ॐ नमः १ एतावद् १०८ एवं विचित्र १९४ एतावानेव २८१ एवं वित्तिरियं २२६ क एते हि १९३ एवं विदित ३६४ कः प्राणप्रिय ३४० एनं पश्य १७६ एवंविधं १९७ कजलेन २३२ एवं च २२० एवंविधं ११४ कटुकानि च ६६ एवं चितिः २३० एवंविध ३१८ कटुतिक्तानि ६६ एवं चिति २७० एवंविधन्तु २६३ कठिना १७७ एवं चिते १५६ एवंविधा ४५ कण्टकैश्चित २० एवं चिरतरे ७७ एवंविधापि ९५ कथं कुत्र ११६ एवं जना २१ एवंविधैक १९९ कथं गण्ड १६८ एवं जीवेश १३६ एवं विनिम्न २९ कथं ज्ञात ३५० एवं तत्र १४१ एवं विलिप्ते २३३ कथं तेषां २९५ एवं तस्या ५ एवं विषं १५८ कथं परीक्षणी ३३४ एवं तस्या वचः ५५ एवं व्यावृत्त २२९ कथं पश्यसि ४१ एवं तेन ५८ एवं शीतं ३९ कथं मुने १७१ एवं दत्तात्रेय १६० एवं सङ्कल्प्यते २६१ कथं वा तदपि २७ एवं देवो १४९ एवं सकृत्स्न २६२ कथं विद्या २२४ एवं निरूपण १५१ एवं सत्तर्का ९७ कथं सर्वैः २४९ एवं परचितेः १७३ एवं सरसङ्ग ५४ कथं स्वान्त २६५ एवं पूर्णानन्द २५६ एवं सर्वे १९३ कथञ्चिद २२५ एवं पृष्ट १३३ एवं सा २०३ कथमेतज्ज १४४ एवं प्रकाश्य २२० एवं स्थिते १८७ कदाचित् १७८ एवं प्रिया ७९ एवं स्वात्म १८३ कदाचिदथ १६८ एवं प्रिया १०८ एवमन्य ५१ कदाचिदपि १२६ एवं प्रोक्तः ११३ एवमन्ये २३ कदाचिदेव ५३ एवं प्रोक्तानि १३४ एवमन्ये ३०७ कमलाकर २१२ एवं प्रोक्तो ३७ एवमेव १६१ कर्णप्रावरणाः ४९ एवं बहुविधा ५० एवमेव १७६ कर्त्तव्य २९६ एवं बहूनि ७० एवमेष ३३६ कर्त्तव्यतैव ८ एवं बुद्धिः १२० एवमेष २७७ कर्त्तव्यमपि २३ एवं भूयो ७७ एवमेष ३५५ कर्त्तव्यविष १९