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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

१२८ -उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी आत्मा या अन्तःकरण में संस्कार का आधान, बुद्धि (ज्ञान) करेगी कहें, तो संस्कारों के आधानकाल में बुद्धि के आधारभूत अन्तःकरण या आत्मा की स्थिति ही कहाँ है ? क्योंकि बौद्ध सिद्धान्त में तो सभी क्षणिक माने गये हैं। तस्मात् बौद्ध मत के अनुसार सदैव स्मृति का अभाव ही रहेगा। प्रत्यभिज्ञा को बौद्धों ने सादृश्यनिबन्धन भ्रम कहा है, किन्तु उनका यह कहना अनुचित है। इनके मत में बुद्धि का कोई आधार (साक्षी) न होने से पूर्ववर्ती और उत्तरवर्ती ज्ञान की तुल्यता का भी कोई हेतु नहीं है, अतः वह तुल्यता, निनिमित्त ही है; क्योंकि पूर्वक्षण और उत्तरक्षणवर्ती दोनों ज्ञानों में सादृश्यनिरूपक कोई नहीं है। सादृश्य के व्यवहार में निमित्त तो गुण या अवयव हुआ करते हैं, विज्ञान में उनका होना संभव नहीं, क्योंकि विज्ञान तो निर्गुण और निरवयव रहता है। तथा पूर्वोत्तर क्षणों में किसी एक द्रष्टा के विद्यमान न रहने से सादृश्य कैसे सिद्ध हो सकेगा ? अतः तुल्यता के सिद्ध न हो पाने से प्रत्यभिज्ञान को तन्निबन्धन अर्थात् सादृश्यनिबन्धन भी नहीं कह सकते। इन सब विपत्तियों से बचने के लिये यदि पूर्वापरक्षणसादृश्य के किसी स्थायी द्रष्टा का स्वीकार करोगे तो तुम्हारे क्षणिकत्व के सिद्धान्त की हानि होगी, जो तुम्हें इष्ट नहीं है ॥ २६ ॥ शान्तेश्चायतनसिद्धत्वात्साधनोक्तिरनर्थिका । एकैकस्मिन्समाप्तत्वाच्छान्तेरन्यानपेक्षता ॥२७॥ शान्तेश्चेति — बाह्य वस्तुओं के स्थायित्वादि भ्रम की निवृत्ति अनायास हो ही सकती है। अतः उसके लिये साधन (उपाय) बताना व्यर्थ ही है। विज्ञान की निवृत्ति एक-एक क्षण में (प्रतिक्षण) हो ही जाती है। अतः उसकी निवृत्ति के लिये किसी अन्य साधन की अपेक्षा नहीं है ॥ २७ ॥ हृदयस्पर्शिनी बौद्धों का जो यह कथन है कि 'सर्वं क्षणिकम् — इस प्रकार क्षणिकत्वादि भावना करते रहने से स्थायित्व- भ्रम की निवृत्ति (शान्ति) होना ही मुक्ति है', वह भी उचित नहीं है। विषयों (पदार्थों) के स्थायित्वादिभ्रम की निवृत्ति के लिये किसी प्रकार के प्रयत्न की तुम्हारे मत के अनुसार आवश्यकता नहीं होगी। क्योंकि तुम्हारे मत में प्रत्येक ज्ञान स्वभावतः ही क्षणिक है, अतः उसके स्थायित्वभ्रम को दूर करने के लिये किसी साधन (उपाय) की कौन-सी आवश्यकता है ? वह तो स्वयमेव दूसरे क्षण में शान्त (निवृत्त) हो जायेगा। सदृश ज्ञान-सन्तान के लिये यदि कहो तो 'सदृश ज्ञान-सन्तान' तो कोई वस्तु ही नहीं है। क्योंकि उस सन्तान का कोई स्थिर साक्षी नहीं है। और एक-एक क्षण में भ्रम का अभाव तो स्वाभाविक ही है, अतः शान्ति (निवृत्ति) रूप मुक्ति के लिये किसी साधन की अपेक्षा तुम्हारे मत में नहीं होनी चाहिये। अतः बौद्ध मत के अनुसार मुक्ति के लिये साधनानुष्ठान करना या साध- नोपदेश देना अनुचित ही सिद्ध हो रहा है ॥ २७ ॥ अपेक्षा यदि भिन्नेऽपि परसंतान इष्यताम् । सर्वार्थे क्षणिके कस्मिंस्तथाप्यन्यानपेक्षता ॥२८॥ अपेक्षेति — इसके अतिरिक्त बौद्ध मत के अनुसार पदार्थों का कार्य-कारण भाव भी नहीं बन सकता। यदि यह कहें कि कार्य और कारण में अत्यन्त भेद होने पर भी उनमें सन्तति-क्रम होने के कारण उन्हे एक-दूसरे की अपेक्षा हो सकती है, तब तो किसी अन्य कार्य-कारण सन्तति में भी अन्य वस्तु की अपेक्षा कहनी होगी। यदि यह कहें कि सब पदार्थ क्षणिक होने पर भी किसी-किसी में ही किसी विशेष पदार्थ की अपेक्षा होती है, तो यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि क्षणिक होने के कारण एक पदार्थ को दूसरे पदार्थ की अपेक्षा ही नहीं होगी ॥ २८ ॥ हृदयस्पर्शिनी किञ्च बौद्ध मत के अनुसार लौकिक साध्य-साधनभाव (कार्य-कारणभाव) भी संगत नहीं हो सकता, क्योंकि सम्पूर्ण पदार्थ क्षणिक ही हैं। लोकव्यवहार में हम देखते हैं कि दूध से दही हुआ करता है, अर्थात् दही का

पार्थिवप्रकरणम् १२९ कारण दूध है। किन्तु बौद्ध मत के अनुसार यदि सभी पदार्थ क्षणिक माने जाते हैं तो कार्य के नियत पूर्ववर्तीरूप से कारण के रहने की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिये। यदि कहो कि पदार्थों को क्षणिक मानने पर भी उनका सन्ततिक्रम तो चलता ही रहता है। अर्थात् कदाचित् बौद्ध यह कहें कि कार्य-कारण में अत्यन्त भिन्नता रहने पर भी, उनमें सन्ततिक्रम (धाराप्रवाह) चलते रहने के कारण एक-दूसरे की अपेक्षा हो सकती है, तो यह बात अनुचित है। जैसे दही से पहले कारणरूप से दूध का होना आवश्यक है, तथापि दुग्धसन्ततिक्रम से दधिसन्ततिक्रम सर्वथा भिन्न है, इसलिये जिस प्रकार दधिसन्ततिक्रम के कारणरूप से दुग्धसन्ततिक्रम की अपेक्षा होती है, वैसे ही वालुकादि अन्य सन्ततिक्रम से भी दधि की उत्पत्ति क्यों नहीं होती ? न हो सकने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिये। यदि दूध और दही का वास्तव में कोई सम्बन्ध नहीं है, तो बालू से भी दही बनाया जाना चाहिये। यदि कहो कि पदार्थों के क्षणिक होने पर भी किसी-किसी कार्य में ही किसी विशेष पदार्थ की आवश्यकता होती है, किन्तु यह कहना भी उचित न होगा, क्योंकि क्षणिक होने के कारण किसी को भी किसी अन्य की अपेक्षा नहीं रहती ॥ २८ ॥ तुल्यकालसमुद्भूतावितेरेतरयोगिनौ । योगाच्च संस्कृतो यस्तु सोऽन्यं होक्षितुमर्हति ॥२९॥ तुल्यकालेति-एक साथ उत्पन्न होने वाले दो पदार्थ जब परस्पर एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं, तब उन दोनों का सम्बन्ध होने पर जो जिससे संस्कार प्राप्त करता है, वही दूसरे की अपेक्षा किया करता है ॥ २९ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे अंकुर और पर्जन्य तुल्यकालसमुद्भूत हैं, अर्थात् एक साथ उत्पन्न होते हैं, और उनका परस्पर सम्बन्ध भी है। उन दोनों में से जो अंकुर पदार्थ है, वही पर्जन्य के सम्बन्ध से अतिशयित होता है। अतिशय को प्राप्त (संस्कृत) हुआ वह अंकुर पदार्थ, अन्य पर्जन्य की अपेक्षा करता है। किन्तु क्षणभङ्गुरवाद में दोनों भिन्नकालिक होने के कारण परस्पर उन दोनों में सम्बन्ध न होने से उपकार्योपकारक-भाव अनुपपन्न है, अतः अंकुर को पर्जन्य की अपेक्षा नहीं होनी चाहिये। किन्तु हमारे मत में पर्जन्य और अंकुर में उपकार्योपकारक-भाव है। पर्जन्य, अंकुर का उपकारक है और अंकुर उसका उपकार्य है। अतः अंकुर को पर्जन्य की अपेक्षा हो सकती है और यह बात स्थायित्व होने पर ही संभव है। जो जिससे उपकृत (संस्कृत) होता है, वह उस संस्कारकर्त्ता की अपेक्षा करता है ॥ २९ ॥ मृषाध्यासस्तु यत्र स्यात्तन्नाशस्तत्र नो मतः । सर्वनाशो भवेद्यस्य मोक्षः कस्य फलं वद ॥३०॥ मृषेति-अभी तक बौद्धों के मत का खण्डन किया गया, अब अपने मत को बता रहे हैं- हमारे वेदान्त-सिद्धान्त में जहाँ (कर्तृत्व-भोक्तृत्वादिहीन्य ब्रह्म में) कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि का मिथ्या अध्यास होता है, वहीं 'मैं ब्रह्म हूँ' इस बोध से उस अध्यास का नाश होता है, अधिष्ठानभूत ब्रह्म का कभी नाश नहीं होता। किन्तु जिसके मत में सर्वनाश (सभी का नाश) हो जाता है, तब मोक्षरूप फल की प्राप्ति किसे होगी ? तुम ही बताओ ॥ ३० ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार क्षणिकमत का निराकरण कर अब शून्यमत का भी निराकरण करेंगे, किन्तु उससे पूर्व अपने मत का सामञ्जस्य बता रहे हैं। वेदान्तमत के अनुसार ब्रह्मरूप आत्मा में किसी प्रकार का कोई अतिशायाधान न होने से क्षणिकमत के समान वेदान्त में भी मोक्ष की अनुपपत्ति माननी पड़ेगी। इस आशंका का उत्तर यह है कि ब्रह्मरूप आत्मा में किसी अतिशय का आधान न होने पर भी उसके (ब्रह्मरूप आत्मा के) स्थायी रहने से मोक्षरूप फल की उपपत्ति हो जाती है। अतः उक्त आशंका उपस्थित करना उचित नहीं है। वेदान्तसिद्धान्त में जहाँ कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि- शून्य अधिष्ठानरूप ब्रह्म में कर्तृत्वादिरूप संसार का मिथ्या अध्यास होता है, अथवा अविद्यानिबन्धन मृषाध्यासरूप भ्रम (कर्तृत्वादिसंसार का प्रतिभास) जहाँ होता है, वहीं पर 'अहं ब्रह्मास्मि' - मैं ब्रह्म हूँ - इस ज्ञान (विद्या) से अध्यस्त का विनाश हुआ करता है। तथाच अज्ञान के वश होने से जो बन्ध का अनुभव कर रहा हो, उसी को ज्ञान होने पर बन्ध १७

१३० उपदेशसाहस्री की निवृत्ति होने से शुद्धस्वरूपानुभवरूप पुरुषार्थ का लाभ होता है। अर्थात् 'अहं ब्रह्मास्मि' इस ज्ञान से अज्ञाननिवृत्ति के माध्यम से यथोक्त अध्यासत्तिवृत्तिरूप मोक्ष ही हमें विवक्षित है, हेयोपादेयरूप नहीं। तस्मात् हमारे पक्ष में वस्तुतः अतिशयाधान न होनेपर भी मोक्ष की अनुपपत्ति नहीं है। अतः वेदान्तियों का मत सामञ्जस्यपूर्ण है। अब शून्य- वादी के मत में दोष बताते हैं—जिस शून्यवादी के मत में अधिष्ठान, आरोप्य आदि सभी का नाश होने से न फल रहा और न फलभोक्ता रहा, तब मोक्षरूप फल का अधिकारी ही कौन रहा ? अतः मोक्षरूप फल के अधिकारी के रूप में किसी स्थिर (स्थायी) तत्त्व को अवश्य ही स्वीकार करना चाहिये । एवंच शून्यवादी के मत में 'मोक्ष' सिद्ध ही नहीं हो पाता है ॥ ३० ॥ अस्ति तावत्स्वयं नाम ज्ञानं वात्माऽन्यदेव वा । भावाभावज्ञतस्तस्य नाभावस्त्वधिगम्यते ॥३१॥ अस्तीति—सभी के सिद्धान्तों के अनुसार 'आत्मा' तो है ही। किन्तु विचारणीय प्रश्न इतना ही है कि वह (आत्मा) ज्ञानस्वरूप है या शून्य है ? हमारे वेदान्त सिद्धान्त के अनुसार तो वह (आत्मा) भाव और अभाव दोनों का साक्षी होने से उसे शून्यरूप नहीं कह सकते ॥ ३१ ॥ हृदयस्पर्शिनी शून्यवादी के अनुसार 'सर्वनाश' को ही मोक्ष कहना होगा। क्योंकि शून्य के परमार्थस्वभाव होने में इनके पास कोई प्रमाण नहीं है । 'स्वयं' तो सभी मानते हैं, उसे स्वयंप्रकाश ज्ञान, आत्मा, कहें या शून्य कहें ? कहने का तात्पर्य यह है कि कोई एक परमार्थवस्तु (परमार्थस्वभाव वस्तु ) अवश्य है। वह क्या है ? यही विचारणीय प्रश्न है। वह परमार्थवस्तु, लौकिक भाव-अभाव की अभिज्ञ (साक्षी) अर्थात् लोकव्यवहारसिद्ध भाव-अभाव पदार्थों को जाननेवाली है। अतः परमार्थवस्तु का अभाव नहीं कह सकते । तस्मात् 'शून्य' को परमार्थ वस्तु समझना उचित नहीं है। भाव-अभाव के अभिज्ञ किसी स्थिर साक्षी के अभाव में अर्थात् न मानने पर समस्त व्यवहार के लोप होने का प्रसंग प्राप्त होगा ॥ ३१ ॥ येनाधिगम्यतेऽभावस्तत्सत्स्यात्तन्न चेद्भवेत् । भावाभावानभिज्ञत्वं लोकस्य स्यान्न चेष्यते ॥३२॥ येनेति—जो अभाव को जानता है, वह जानने वाला कोई सत् ही होना चाहिये । अन्यथा लोगों को भाव और अभाव का ज्ञान ही नहीं होगा, जो किसी को भी अभीष्ट नहीं है ॥ ३२ ॥ हृदयस्पर्शिनी अपने शून्यवाद को सिद्ध करने के लिए यदि बौद्ध कहें कि उस परमार्थवस्तु के अभाव का भी ज्ञान यदि किसी को हो जाय ? तो जिसे वह ज्ञान होगा उसी का सत्त्व (सत्ता) होगा, शून्यत्व की शंका करने का अवसर ही कहाँ रहेगा ? अथवा पूर्वोक्त अर्थ को ही स्पष्ट कर रहे हैं—जो सभी के अभाव को जानता है, उसे सत् ही कहना होगा । अन्यथा लोगों को भाव और अभाव का ज्ञान ही नहीं हो पायगा। उसे इष्ट कहें तो स्वानुभवविरोध होगा, क्योंकि सभी को भाव और अभाव का ज्ञान रहता है। उसका अपलाप नहीं कर सकते । अतः भाव-अभाव का जो अभिज्ञ है, वही सत् आत्मा है । शून्य नहीं है ॥ ३२ ॥ सदसत्सदसच्चेति विकल्पात्प्राग्यदिष्यते । तदद्वैतं समत्वात्तु नित्यं चान्यद्विकल्पितात् ॥३३॥ सदिति—सत्-असत् और सदसत्—इस विकल्प से पूर्व जो वस्तु अभीष्ट है, वह समानरूप होने के कारण अद्वितीय और नित्य है एवं विकल्पित पदार्थों से भिन्न है ॥ ३३ ॥

पार्थिवप्रकरणम् १३१ हृदयस्पर्शिनी इसपर भी बौद्ध पुनः शंका करता है कि भाव-अभाव के विभाग को जाननेवाली यद्यपि कोई वस्तु है, यह स्वीकार कर भी लिया जाय, तथापि वह अभिज्ञातृ वस्तु इसी प्रकार की (अर्थात् सत्) है, इस विशेषता के साथ उसका निर्धारण कर पाने में कोई कारण नहीं है। इस शंका के निराकरणार्थ उसके स्वरूप को बता रहे हैं-भावाभाव को जाननेवाला जो साक्षीस्वरूप है, वह सत्, असत् और सदसत् के विकल्प (विवाद) स्वरूप जगत् के पूर्व से ही सिद्ध है। क्योंकि विकल्प (विवाद) किसी आधार (आलम्बन) पर हुआ करता है, निराधार (निरालम्बन) विकल्प नहीं हुआ करता। अतः विकल्परूप दृश्य जगत् के पूर्व जो है, वह अद्वैत ही है। क्योंकि विकल्प (जगत्) के पूर्व विषमता रहने का कोई कारण ही नहीं है। विकल्प से पूर्व वही अद्वैत वस्तु समानरूप से है। उस अद्वैत वस्तु का स्वरूप द्वैत जड़ से विलक्षण है और वह अविनाशी होने से नित्य है। तथा अनृत (असत्य) से विलक्षण (भिन्न) रहने से वह सत्य है। पूर्वार्ध में 'विकल्पात् प्राग् यदिष्यते' के द्वारा उसका स्वतःसिद्धत्व बताने से उसकी ज्ञानस्वरूपता बताई गई है। 'अद्वैतम्' से उसकी अनन्तता बताई गई है। 'नित्यम्' के द्वारा कूटस्थत्व बताने से दुःखाभाव को सूचित किया गया है और उससे अभिन्न रहनेवाली (अर्थात् दुःखाभाव से सम्बद्ध) आनन्दरूपता को ध्वनित किया गया है। तथाच यह आत्मतत्त्व सत्य-ज्ञान-अनन्त-आनन्दरूप है, यह अनुभव से ही सिद्ध होता है, किसी अन्य कारण के अन्वेषण की आवश्यकता नहीं है ॥ ३३ ॥ विकल्पोद्भवतोऽसत्त्वं स्वप्नदृश्यवदिष्यताम् । द्वैतस्य प्रागसत्त्वाच्च सदसत्त्वादिकल्पनात् ॥३४॥ विकल्पेति-द्वैत (असत्त्व) का आविर्भाव विकल्प से हुआ है और सत्त्व (सत्ता) और असत्त्व (असत्ता) आदि की कल्पना होने से पूर्व उसका (द्वैत का) अभाव है। अतः स्वप्न के दृश्य के समान उसका (द्वैत का) अभाव ही मानना चाहिये ॥ ३४ ॥ हृदयस्पर्शिनी नानाविध द्वैत के प्रतीयमान रहते हुए अद्वैत आत्मतत्त्व का अनुभव हो रहा है, यह कैसे कह सकते हैं ? अथवा द्रष्टा की सत्यता को बताकर दृश्य के विकल्पात्मक रहने से उसकी असत्यता को बता रहे हैं। द्वैत का आविर्भाव विकल्प से हुआ है। वस्तु के न रहने पर भी (अस्तित्व-सत्ता-न रहने पर भी) शब्द मात्र से जिसका बोध होता हो, उसे विकल्प कहते हैं- 'शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः'। यह प्रतिभासमान संसार अविद्या (माया) के कारण अध्यस्त होने से विकल्परूप ही है। वास्तव में वह है नहीं, केवल भ्रम से उसकी प्रतीति हो रही है, उस कारण इसे विकल्प से आविर्भूत हुआ कहते हैं; जैसे स्वप्नदृश्य वस्तुतः नहीं रहता, फिर भी उसकी प्रतीति होती है। अनुमान प्रयोग इस प्रकार होगा- 'द्वैतं न परमार्थसत् दृश्यत्वात् स्वप्नदृश्यवत्'। उसके मिथ्यात्व में एक अन्य हेतु भी है- 'सदसत्त्वादिविकल्पनात् प्राक् असत्त्वात्' - अर्थात् सत्ता और असत्ता आदि की कल्पना करने से पूर्व इसका स्वप्नदृश्य के समान अभाव था। द्वैतरूप प्रपञ्च की अज्ञातसत्ता में कोई प्रमाण नहीं है। अतः द्वैतात्मक प्रपञ्च (संसार) को मिथ्या ही समझना चाहिए ॥ ३४ ॥ वाचारम्भणशास्त्राच्च विकाराणां ह्यभावता । मृत्योः स मृत्युमित्यादेर्मम मायेति च स्मृतेः ॥३५॥ वाचारम्भणेति- 'ये सब घट-पटादि विकार वाणी से आरम्भ होने वाले हैं'- इस शास्त्रवाक्य से, और 'वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है' - इस श्रुति से तथा 'मेरी माया का पार पाना कठिन है'- इस स्मृति से विकारों का अभाव ही सिद्ध होता है ॥ ३५ ॥

१३२ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी न्याय (तर्क) से द्वैत का मिथ्यात्व बताकर अब शास्त्र से भी उसके मिथ्यात्व को बताते हैं— 'घटादि विकार वाणी से आरम्भ हुआ करते हैं'¹ इस श्रुत्यात्मक शास्त्र से विकारों का अभाव स्पष्ट है। 'वाचारम्भण' शब्द अनृतत्व (मिथ्यात्व) का वाचक है, यह प्रतीत हो रहा है, क्योंकि उसके आगे ही कारण की सत्यता का निश्चय किया गया है। 'वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है'² इस श्रुत्यात्मक शास्त्र से द्वैतदर्शन (भेददृष्टि) की निन्दा की गई है। यदि द्वैत सत्य होता तो उसकी निन्दा न की गई होती। अर्थात् उसकी (द्वैत की) अनृतता (असत्यता) प्रतिपादित हो जाती है। मूलस्थित 'आदि' शब्द से साक्षात् द्वैतापवादक (द्वैत का बाधक) शास्त्र 'नेह नानास्ति किञ्चन'³ को भी समझना चाहिए। तथा 'मेरी माया का पार पाना कठिन है'⁴ यहाँ पर 'जो मेरे ही शरण आते हैं, वे इस माया का पार हो पाते हैं'—इस प्रकार परमात्मज्ञान से ही इस गुणमयी कार्यसहित माया की निवृत्ति की जा सकती है, —यह भगवान् स्वयं अपने श्रीमुख से बता रहे हैं। यदि द्वैत सृष्टि सत्य होती तो उनका यह कथन कैसे उपपन्न होगा ? अतः द्वैत मायिक है, यह सिद्ध हो जाता है ॥ ३५ ॥ विशुद्धिश्चात एवास्य विकल्पाच्च विलक्षणः । उपादेयो न हेयोऽत आत्मा नान्यैःप्रकल्पितः ॥३६॥ विशुद्धिरिति—अतएव 'आत्मा' शुद्ध स्वभाववाला और द्वैत से विलक्षण है। वह न ग्राह्य है, और न त्याज्य है और न किसी अन्य तत्त्व के द्वारा कल्पित ही है ॥ ३६ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार श्रुति तथा युक्ति से द्वैत का मिथ्यात्व बताया गया, उस कारण आत्मा का अद्वितीयत्व सुदृढ़ सिद्ध हुआ। अब अशुद्धि का कोई कारण न होने से उसकी विशुद्धि भी बतायी जा रही है— द्वैत के मिथ्या होने से ही आत्मा की धर्माधर्मतत्फलसंसपर्गरूप विशुद्धि भी स्पष्ट है। और विकल्पात्मक द्वैत से विलक्षण (विपरीत) स्वभाव का रहने से वह (आत्मा) न ग्राह्य (उपादेय) है, न त्याज्य (हेय) है। क्योंकि हानोपादान (त्याग और ग्रहण) तो मूर्त पदार्थ का होता है। अमूर्त प्रत्यगात्मा में उनका होना संभव नहीं है। किंच—किसी अन्य तत्त्व के द्वारा उसकी कल्पना करना शक्य न होने से भी वह विशुद्ध है। समस्त कल्पनाओं के अधिष्ठान की किसी के द्वारा कल्पना नहीं की जा सकती। अतः आत्मा नित्य शुद्ध है, यह सिद्ध होता है ॥ ३६ ॥ अप्रकाशो यथाऽऽदित्ये नास्ति ज्योतिःस्वभावतः । नित्यबोधस्वरूपत्वान्नाज्ञानं तद्वदात्मनि ॥३७॥ अप्रकाश इति—प्रकाशस्वरूप (ज्योतिःस्वभाव) होने के कारण जिस प्रकार सूर्य में अप्रकाश (अन्धकार) नहीं है, उसी प्रकार नित्यज्ञानस्वरूप [नित्यबोधस्वरूप] होने से आत्मा में अज्ञान नहीं है ॥ ३७ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा की कल्पना क्यों नहीं की जा सकती ? ऐसी शंका यदि कोई करे तो उसका उत्तर स्पष्ट ही है कि कल्पना का हेतुभूत अज्ञान, वस्तुतः आत्मा में नहीं है। अज्ञान से कल्पित तो अनात्म पदार्थ हैं। अतएव आत्मा में उसका अभाव है। आत्मा तो प्रकाशस्वरूप है। जिस प्रकार सूर्य में अन्धकार नहीं होता, उसी प्रकार आत्मा नित्यज्ञानस्वरूप होने से उसमें अज्ञान नहीं है ॥ ३७ ॥

१. (छां. उ. ६।१।४) २. (बृ. उ. ४।४।१९) ३. (बृ. उ. ४।४।१९) ४. (भ. गी. ७।१४)

पार्थिवप्रकरणम् १३३ तथाऽविक्रियरूपत्वान्नावस्थान्तरमात्मनः । अवस्थान्तरवत्त्वे हि नाशोऽस्य स्यान्न संशयः ॥३८॥ तथेति—उसी प्रकार आत्मा निर्विकार रहने से उसमें [आत्मा में] कभी कोई अवस्थान्तर भी नहीं होता। यदि उसमें अवस्थान्तर हो तो निश्चय ही उसका विनाश होने का प्रसंग प्राप्त होगा ॥ ३८ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे आत्मा, नित्यबोधस्वरूप होने से उसमें वस्तुतः अज्ञान नहीं रहता, उसी तरह वह (आत्मा) सर्व- विक्रियारहितस्वभाव (निर्विकार) रहने से उसमें कूटस्थताप्रच्युतिरूप अवस्थान्तर भी नहीं होता। यदि उसमें अवस्थान्तर हो तो निश्चय ही उसका नाश हो जायगा ॥ ३८ ॥ मोक्षोऽवस्थान्तरं यस्य कृतकः सं चलो ह्यतः । न संयोगो वियोगो वा मोक्षो युक्तः कथंचन ॥३९॥ मोक्ष इति—जिसके मत में मोक्ष को आत्मा का अवस्थान्तर कहा गया है, उसके सिद्धान्त के अनुसार वह कृतक होने से अनित्य है, क्योंकि ब्रह्म के साथ आत्मा के संयोग अथवा वियोग को मोक्ष मानना किसी प्रकार उचित नहीं है ॥ ३९ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे आत्मा में कल्पितत्व नहीं, वैसे ही उसमें अवस्थान्तर भी नहीं—यह पूर्व श्लोक में बताया, किन्तु आत्मा का मोक्षावस्था को प्राप्त होना ही उसका अवस्थान्तर को प्राप्त होना स्पष्ट है। तब उससे अवस्थान्तर का अभाव कैसे माना जाय ? इस पर कहते हैं कि जिस वादी के मत में मोक्ष, आत्मा का अवस्थान्तर है, उसके मत के अनुसार मोक्ष अनित्य (कृतक) होने से उसे चल, विनाशी मानना होगा, तब वह मोक्ष ही नहीं कहलायेगा। उसे अपुरुषार्थ कहना पड़ेगा। मोक्ष को अवस्थान्तर जैसे नहीं माना जाता, उस तरह ब्रह्म के साथ आत्मा के संयोग को अथवा प्रकृति के वियोग को भी मोक्ष नहीं माना जा सकता ॥ ३९ ॥ संयोगस्याप्यनित्यत्वाद्वियोगस्य तथैव च। गमनागमने चैव स्वरूपं तु न हीयते ॥४०॥ संयोगस्येति—ब्रह्म के साथ संयोग और वियोग दोनों ही अनित्य होने के कारण उन्हें मोक्ष नहीं कहा जा सकता। उसी तरह दिव्य लोकों में जीव के गमनागमन को भी मोक्ष नहीं कह सकते, क्योंकि आत्मा अपने स्वरूप से कभी च्युत नहीं होता है, यानी आत्मस्वरूप में कभी च्युति नहीं हुआ करती ॥ ४० ॥ हृदयस्पर्शिनी ब्रह्मात्मसंयोग या प्रकृति से वियोग रूप मोक्ष के अनौचित्य में हेतु दे रहे हैं—'जो कृतक होता है, वह अनित्य होता है'—यह नियम है, तदनुसार संयोग या वियोग को मोक्ष नहीं माना जा सकता। उसी तरह जीव का संसार देश से परमात्मा के देश में गमन अथवा अपने उपासक भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये परमात्मा के उनके प्रति आगमन को ही मोक्ष यदि कहें, तो वह भी उचित न होगा। क्योंकि जीव और परमात्मा दोनों ही निर्विकार (विकाररहित) होने से उनका गमनागमन होना संभव नहीं। इस प्रकार दूसरों के मतों में दोष दिखलाकर अपना निर्दुष्ट मत बताते हैं—'स्वरूपं तु न हीयते'—आत्मस्वरूप में कभी च्युति नहीं हुआ करती। अतः 'आत्मस्वरूप ही मोक्ष है' एवञ्च हमारे पक्ष में मोक्ष नित्य है ॥ ४० ॥ स्वरूपस्यानिमित्तत्वात्तन्निमित्तं हि चापरे । अनुपात्तं स्वरूपं हि स्वेनात्यक्तं तथैव च ॥४१॥

१३४ उपदेशसाहस्री स्वरूपस्येति—स्वरूप का कोई कारण नहीं है, किन्तु अन्य [अवस्थान्तरादि] सकारण हैं। निष्कर्ष यह है कि 'स्वरूप' में अकार्यता है, किन्तु अन्य अवस्थान्तर आदि में कार्यता है, क्योंकि वे सकारण हैं। स्वरूप उसी को कहते है, जिसका ग्रहण [उपार्जन] अथवा त्याग किसी के द्वारा भी अर्थात् न अपने द्वारा और न किसी अन्य के द्वारा ही किया जा सकता है ॥ ४१ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मस्वरूपात्मक मोक्ष के नित्य और अकार्य होने में हेतु बता रहे हैं—स्वरूप अनिमित्त है, अर्थात् स्वरूप का कोई कारण नहीं है, इसलिये वह अकार्य है। अन्य अवस्थान्तर आदि सकारण हैं (सनिमित्त हैं) इसलिए वे अनित्य हैं अर्थात् कार्य हैं। स्वरूप की अनिमित्तता उसके लक्षण से ही सिद्ध होती है। स्वरूप उसे कहते हैं, जो अपने द्वारा या दूसरे के द्वारा उपार्जन नहीं किया जाता और न त्यागा ही जाता है। उपार्जन (उपादान) इसलिए नहीं किया जा सकता कि वह स्वरूपत्वेन नित्य है, और त्यागा इसलिये नहीं जा सकता कि वह स्वरूप होने के कारण ही त्यागने के योग्य नहीं है। तस्मात् अनिमित्त (निमित्तशून्य) होने से स्वरूप को नित्य ही कहना पड़ता है। लोकव्यवहार में भी देखा गया है कि वस्त्रादि का स्वरूप न उपादेय होता है और न हेय ही होता है। अतः वस्तुस्वरूप आगन्तुक नहीं है, अपितु नित्य है ॥ ४१ ॥ स्वरूपत्वान्न सर्वस्य त्यक्तुं शक्यो ह्यनन्यतः । ग्रहीतुं वा ततो नित्योऽविषयत्वापृथक्त्वतः ॥४२॥ स्वरूपत्वादिति—सबका स्वरूप सब से अभिन्न रहता है, अतः आत्मा का ग्रहण या त्याग नहीं हो सकता। तथा किसी का विषय न होने के कारण भी उसका पृथक् रूप से त्याग या ग्रहण करना संभव नहीं है ॥ ४२ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक से उक्त स्वरूपलक्षण को लक्ष्य (आत्मा) में संघटित कर रहे हैं—आकाशादि सबका स्वरूप होने से और आरोपित सर्प आदि के रज्जु की तरह आत्मभूत (अभिन्न) होने के कारण आत्मा का त्याग या ग्रहण करना संभव नहीं। अभिप्राय यह है कि अध्यस्त पदार्थ की सत्ता अपने अधिष्ठान से भिन्न नहीं होती, जिस प्रकार रज्जु में प्रतीयमान सर्प, रज्जु से भिन्न नहीं, उसी तरह सबका अधिष्ठानभूत आत्मा सबसे भिन्न नहीं, किन्तु अभिन्न ही है। तथा किसी का विषय न होने के कारण भी आत्मा पृथक् रूप से ग्राह्य या त्याज्य नहीं है। अविषय का उपादान या स्वरूप का त्याग नहीं किया जाता ॥ ४२ ॥ आत्मार्थत्वाच्च सर्वस्य नित्य आत्मैव केवलः । त्यजेत्तस्मात्क्रियाः सर्वाः साधनैः सह मोक्षवित् ॥४३॥ आत्मेति—सभी पदार्थ 'आत्मा' के ही लिये हैं। इसलिये 'आत्मा' ही नित्य और निरुपाधिक [केवल] है। अतः मुमुक्षु पुरुष साधनों के सहित समस्त कर्मों को त्याग दे ॥ ४३ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा की नित्यता में हेत्वन्तर दे रहे हैं—समस्त आगमापायी (उत्पाद-विनाशशील) पदार्थ (वस्तुएँ) आत्मा के लिए ही होती हैं। अर्थात् आत्मा की भोग्य होती हैं, अतः जो स्वयं अनागमापायी (उत्पत्तिरहित-विनाशरहित) और उनका भोक्ता होगा वही आत्मा है, वही नित्य है। वही केवल अर्थात् निरुपाधिक है। उपाधि से भी उसमें कोई विशेष नहीं हो पाता। जबकि आत्मा नित्य है, उसके अतिरिक्त सभी अनित्य हैं और आत्मार्थ हैं, तथा आत्मस्वरूप में स्थिति ही मोक्ष है, इतना स्पष्ट हो गया है। अतः मुमुक्षु को साधनों सहित समस्त कर्मों का त्याग कर देना चाहिए ॥ ४३ ॥

  • त्वादपृथक् कृतः—पाठान्तरम् ।

पार्थिवप्रकरणम् १३५ आत्मलाभः परो लाभ इति शास्त्रोपपत्तयः । अलाभोऽ*न्यात्मलाभस्तु त्यजेत्तस्मादनात्मताम् ।।४४।। आत्मलाभ इति—आत्मलाभ ही परमलाभ है, ऐसा शास्त्र का सिद्धान्त है तथा तर्कसंगत भी है। अन्य अनात्म पदार्थों का लाभ तो अलाभ ही है, यानी उसे 'लाभ' शब्द से कहना उचित नहीं है। इसलिये अनात्मता का त्याग करना चाहिये ।। ४४ ।। हृदयस्पर्शिनी मुमुक्षु को कर्म (क्रिया) का त्याग इसलिए भी करना चाहिए कि 'आत्मलाभान्न परं विद्यते'१—आत्मलाभ ही परमलाभ है—यह स्मृतिशास्त्र का सिद्धान्त है। इस प्रकार के अनेक शास्त्रवचन और उपपत्तियाँ हैं। 'सर्वस्व- त्यागेनापि आत्मसंरक्षणप्रवृत्तिदर्शनमुपपत्तिः'—सर्वस्व का त्याग करके भी आत्मरक्षण की प्रवृत्ति होती दिखाई देती है—यह उपपत्ति अर्थात् तर्क, युक्ति है। आत्मलाभ तो नित्यसिद्ध है, तब यह कौन-सी नवीन (अपूर्व) बात बताई जा- रही है ? नवीन बात यह कही जा रही है कि अन्यात्मलाभ जो है, वह वास्तव में अलाभ ही है। अर्थात् अपने आत्मा के अज्ञान से निष्पन्न अहंकारादि में अभेदेन जो आत्मस्फुरण होता है, उसे अन्यात्मलाभ कहते हैं। उससे संसारदुःख प्राप्त होता है, इस कारण वह वास्तविक लाभ नहीं है। और वह स्वतःसिद्ध परमानन्दाविर्भाव के होने में प्रतिबन्धक बनता है, उस कारण भी उसे वास्तविक लाभ नहीं कह सकते। वह अन्यात्मलाभ, लाभ न होकर प्रत्युत क्षतिरूप ही है। इसलिए प्रमाणजनित ब्रह्मात्मज्ञान से अज्ञातबाध द्वारा अहंकारादिकों में अविद्या से अध्यारोपित आत्माभिमा- नतारूप अनात्मताबुद्धि का त्याग करना चाहिए ।। ४४ ।। गुणानां साम्यभावस्य भ्रंशो न ह्युपपद्यते । अविद्यादेः प्रसुप्तत्वान्न चान्यो हेतुरुच्यते ॥४५॥ गुणानामिति—सृष्टि के सम्बन्ध में सांख्यदार्शनिकों के विचार का खण्डन कर रहे हैं—गुणों की साम्यावस्था का नाश [भ्रंश] होना संभव नहीं है, और वे सृष्टि के आरंभ से पूर्व अविद्या आदि अपने कारण में लीन रहते हैं, और उनसे भिन्न जो पुरुष है, उसे सृष्टि की उत्पत्ति का कारण नहीं माना गया है। अतः सृष्टि के सम्बन्ध में सांख्य के विचार उचित नहीं हैं ॥ ४५ ॥ हृदयस्पर्शिनी अभी तक यह बताया गया कि आत्मतत्त्व को ब्रह्मरूप समझना ही आत्मलाभ कर लेना है, और वही परमलाभ है, परमपुरुषार्थ है—इस प्रकार का ब्रह्मात्मैक्यज्ञान मोक्ष का साधन है। आत्मा अद्वयानन्दरूप है, उसमें संसार की जो प्रतीति होती है, वह अज्ञान के कारण होती है, वास्तविक प्रतीति नहीं है। इस प्रकार अपना मत बता- कर, उसी में मुमुक्षुओं की बुद्धि को स्थिर करने के लिये अन्यान्य मतों के निराकरण का आरंभ करते हुए भगवान् भाष्यकार सृष्टि के विषय में सांख्यपक्ष का निराकरण अब कर रहे हैं—सांख्य का कहना है कि स्वतन्त्र, अचेतन, त्रिगुणात्मक जो प्रधान (प्रकृति) है, वह पुरुष (आत्मा) के भोगापवर्गार्थ महदादि (महत्तत्त्व आदि) के रूप में परिणत होता है। किन्तु उनका यह कथन संभव नहीं हो सकता। क्योंकि गुणों की साम्यावस्था का नाम प्रकृति है। उस प्रकृति (सत्त्व-रजस्-तमोगुणों) के सृष्टिपूर्वकालीन मेलनरूप समभाव का (साम्यावस्था का) ध्वंस (भ्रंश, प्रच्युति) अर्थात् पूर्वावस्था (साम्यावस्था) का त्याग कर अवस्थान्तरापत्ति (वैषम्यावस्था) रूप परिणाम होना संभव नहीं है। यदि ऐसा माना जाय कि प्रकृति के सर्गोन्मुख होनेपर उसके गुणसाम्य में विषमता हो जाती है। किन्तु यह कहना ठीक न होगा, क्योंकि प्रश्न यह उपस्थित होगा कि गुणसाम्य में होनेवाला विषमतारूप परिणाम निर्हेतुक होगा या सहेतुक होगा ? यदि विषमतारूप परिणाम को निर्हेतुक अर्थात् बिना किसी कारण के ही माना जाय तो सर्वदा ही वह परिणाम होता रहेगा। और यदि अविद्या तथा अदृष्ट को उसका कारण कहें तो प्रकृति १. (आप. ध. १।२२।२)

  • ऽनात्म-पाठान्तरम् ।

१३६ उपदेशसाहस्री के परिणाम से पूर्व वे उसी में लीन रहते हैं, इसलिए वे उस परिणाम के कारण नहीं बन सकते। पुरुष को कारण कहें तो वह उदासीन है। ईश्वर को कारण कहें तो सांख्य सिद्धान्त का ही भंग होगा, क्योंकि वह जगत् के उपादानरूप में ईश्वर को नहीं बताता, जगत् का उपादान तो प्रकृति को बताता है। अतः प्रकृति का महदादिरूप में परिणाम होना संभव ही नहीं हो रहा है। अतः सांख्यमत अनुपपन्न है ॥ ४५ ॥ इतरेतरहेतुत्वे प्रवृत्तिः स्यात्सदा न वा। नियमो न प्रवृत्तीनां गुणेष्वात्मनि वा भवेत् ॥४६॥ इतरेति—परस्पर एक दूसरे की प्रवृत्ति में गुणों को कारण कहा जाय तो सर्वदा ही प्रवृत्ति होती रहेगी अथवा प्रवृत्ति ही नहीं होगी। क्योंकि आत्मा अथवा गुणों में उनकी प्रवृत्ति का नियामक बन पाने का कोई हेतु उपलब्ध नहीं हो रहा है ॥ ४६ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि सत्त्वादि गुणों को परस्पर एक दूसरे की प्रवृत्ति का कारण माना जाय तो किसी अन्य प्रयोजक (कारण) की प्रतीक्षा की अपेक्षा न रहने से सर्वदा ही प्रवृत्तिरूप परिणाम होता रहेगा, क्योंकि प्रवृत्ति का हेतु सर्वदैव विद्यमान है। या किसी विशेष के न होने से प्रवृत्ति ही नहीं होगी। अर्थात् आत्मा में या गुणों में उनकी प्रवृत्ति का नियामक कोई हेतु नहीं है। इसलिये सदा प्रवृत्ति या अप्रवृत्ति होगी—यह अभिप्राय है। सांख्य ने गुण और पुरुष के अतिरिक्त अन्य किसी तत्त्व को स्वीकार नहीं किया है, जो गुणों में या पुरुषों में स्थित रहकर प्रवृत्ति आदि का नियामक बन सके ॥ ४६ ॥ विशेषो मुक्तबद्धानां तादर्थ्यं न च युज्यते । अर्थार्थिनोस्त्वसम्बन्धो नार्थी ज्ञो नेतरोज्ञपि वा ॥४७॥ विशेष इति—यदि 'पुरुष' के भोगापवर्ग के लिये 'प्रधान' की प्रवृत्ति कहें तो बद्ध और मुक्त जीवों में कोई भेद ही नहीं हो सकेगा। इस सांख्यमत में 'अर्थार्थी' [शेष-शेषी] रूप सम्बन्ध ही नहीं बन सकता, क्योंकि 'जीव' भी अर्थी नहीं है, और 'प्रधान' भी अर्थी नहीं है ॥ ४७ ॥ हृदयस्पर्शिनी यथाकथञ्चित् प्रधान की प्रवृत्ति मानी भी जाय, तो भी दोष प्रसक्ति का परिहार नहीं हो सकेगा। प्रधान को पुरुषार्थ के लिये (पुरुष के भोग-मोक्ष के लिए) यदि स्वीकार करें तो बद्ध और मुक्त जीवों का भेद (विशेष) उपपन्न न हो सकेगा। क्योंकि एक ही प्रधान सभी पुरुषों के लिये समान होनेपर उस एक (प्रधान) के व्यापार से किसी का बन्ध और किसी का मोक्ष ऐसा विभिन्न परिणाम (विभिन्न व्यवस्था) उपपन्न नहीं हो सकता। तथाच सभी लोग सर्वदा बद्ध या मुक्त ही रहेंगे। इस मत में अर्थ-अर्थी (शेष-शेषी) का सम्बन्ध ही नहीं बन सकता। क्योंकि जो चाहा जाता है, उसे 'अर्थ' अर्थात् सुख या तत्साधनरूप पदार्थ (वस्तु) कहते हैं, और उसके चाहने वाले को 'अर्थी' कहते हैं। उनका उपकार्योपकारक—भावसम्बन्ध हुआ करता है। वह सम्बन्ध प्रधानवाद में (सांख्य के मत में) घटित (संगत) नहीं हो सकता। क्योंकि न तो 'जीव' ही अर्थी है और न प्रधान ही। क्योंकि जीव (पुरुष) ज्ञानैकस्वभाव (ज्ञ) है, अतः उसे अर्थी मानना उचित न होगा। उसे तो असंग और निर्विशेष माना गया है। उससे भिन्न जो प्रधान है, उसे भी अर्थी नहीं कह सकते, क्योंकि वह तो जड़ है। तस्मात् प्रधान में परार्थत्व की कल्पना करना अनुचित है। उस कारण अर्थ-अर्थी में शेष-शेषिसंबंध नहीं हो पा रहा है ॥ ४७ ॥ प्रधानस्य च पारार्थ्यं पुरुषस्याविकारतः । न युक्तं सांख्यशास्त्रेऽपि विकारेऽपि न युज्यते ॥४८॥

पार्थिवप्रकरणम् १३७ प्रधानस्येति—सांख्यशास्त्र में भी 'पुरुष' को निर्विकार कहा गया है, उस कारण 'प्रधान' का परार्थ्य बताना उचित नहीं है। यदि 'पुरुष' को यथाकथञ्चित् सविकार भी कहा जाय तो भी प्रधान का पारार्थ्य [परार्थ होना] सिद्ध नहीं किया जा सकेगा ॥ ४८ ॥ हृदयस्पर्शिनी सांख्यशास्त्र ने भी प्रधान की जो परार्थता स्वीकार की है, वह भी पुरुष के निर्विकार होने के कारण युक्तियुक्त नहीं है। यदि प्रधान को पुरुष के भोग ओर अपवर्ग (मोक्ष) के लिये स्वीकार किया जाय तो पुरुष को विकारी मानना पड़ेगा, क्योंकि यदि प्रधान के व्यापार से उसमें कोई फल ही न हुआ तो प्रधान की पुरुषार्थता ही क्या हुई ? और पुरुष का स्वामित्व ही क्या रहा ? किन्तु सांख्यमत में पुरुष को निर्विकार माना गया है। इसलिये प्रधान उसका उपकारक नहीं हो सकता। यदि प्रधान के प्रति पुरुष का स्वामित्व सिद्ध करने के लिये पुरुष में यथा- कथञ्चित् विकार को स्वीकार कर लिया जाय, तो भी प्रधान की परार्थता नहीं बन पा रही है। क्योंकि 'जो विकारवान् होता है, वह अनित्य होता है' इस नियम के अनुसार पुरुष को अनित्य मानना होगा, तब अनित्य पुरुष, नित्य प्रधान का उपकार्य नहीं हो सकेगा। अतः प्रधान, पुरुष के लिये है—यह नहीं कहा जा सकता ॥ ४८ ॥ सम्बन्धानुपपत्तेश्च प्रकृतेः पुरुषस्य च । मिथोऽयुक्तं तदर्थत्वं प्रधानस्याचितस्त्वतः ॥४९॥ सम्बन्धेति—प्रकृति और पुरुष दोनों का परस्पर सम्बन्ध न हो सकने से और प्रकृति के जड़ होने से उसका पुरुष के लिये होना [परार्थ होना] कभी सम्भव नहीं है ॥ ४९ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रधान और पुरुष के सम्बन्ध का जो अभाव बताया गया है, उसी को पुनः स्पष्ट कर रहे हैं—पुरुष, असंग और उदासीन है और प्रकृति जड़ है, उस कारण उसकी (प्रकृति की) स्वतः प्रवृत्ति हो नहीं सकती। इसलिये उन दोनों का उपकार्योपकारक-भावसम्बन्ध होना असंभव है। एवं च सांख्य में प्रतिपादित प्रधान की परार्थता युक्ति-युक्त नहीं कही जा सकती। तात्पर्य यह है कि प्रकृति-पुरुष का परस्पर सम्बन्ध न हो सकने के कारण और प्रकृति के जड़ होने के कारण प्रधान (प्रकृति) का पुरुष के लिये होना कदापि संभव नहीं है ॥ ४९ ॥ क्रियोत्पत्तौ विनाशित्वं ज्ञानमात्रे च पूर्ववत् । निर्निमित्ते त्वनिर्मोक्षः प्रधानस्य प्रसज्यते ॥५०॥ क्रियेति—पुरुष में क्रिया की उत्पत्ति यदि मानते हैं, तो पुरुष में विनाशित्व प्राप्त होता है और यदि उसमें केवल ज्ञानमात्र क्रिया का होना स्वीकार करते हैं तो पूर्वोक्त दोष प्राप्त होता है। अर्थात् पुरुष तो कूटस्थ है, उस कारण प्रधान के व्यापार से पुरुष का कोई उपकार नहीं हो सकता। यदि प्रधान की प्रवृत्ति निर्निमित्त ही माने तो पुरुष का कभी मोक्ष ही नहीं हो सकेगा ॥५०॥ हृदयस्पर्शिनी पुरुष में यत्किञ्चित् क्रिया की उत्पत्ति मानने पर उसका विनाशित्व सिद्ध होता है। क्योंकि ऐसी व्याप्ति (नियम) देखी जाती है—'यत् क्रियावत् तदनित्यम् यथा घटादि'। और सांख्य ने तो पुरुष को नित्य माना है। इस पर यदि कोई कहे कि पुरुष में परिस्पन्द या परिमाणरूप क्रिया मानने पर अनित्यत्व प्रसंग हो सकता है, किन्तु हम (सांख्य) परिस्पन्द या परिमाणरूप क्रिया का होना पुरुष में नहीं मानते। हम तो उसमें ज्ञानक्रिया को ही मानते हैं। तथापि पुनः यह प्रश्न होगा कि उस ज्ञान को जन्य मानते हो या अजन्य ? यदि जन्य ज्ञान का उससे सम्बन्ध कहो तो विकारित्व प्राप्त होने से अनित्यत्वापत्ति होगी। यदि अजन्य ज्ञान (नित्य ज्ञान) का उससे सम्बन्ध कहो तो प्रधान के व्यापार से पुरुष पर कोई उपकार नहीं हुआ। अर्थात् प्रधान के प्रति उसकी (पुरुष की) स्वामिता १८

१३८ उपदेशसाहस्री सिद्ध नहीं हो पाई । एवञ्च उक्त दोष तदवस्थ ही रहा । तस्मात् पुरुष के असंग, उदासीन, अतिशयशून्य होने से उसमें प्रवर्त्तकत्व उपपन्न नहीं होता, और प्रधान के विकारों के अतिरिक्त अन्य किसी कारण को स्वीकार न करने से तथा प्रलय-काल में प्रधान के विकारों का स्वरूप न रहने से कोई प्रवर्त्तक दिखलाई नहीं पड़ता । अतः प्रधान की प्रवृत्ति को निर्निमित्त ही कहना होगा । निर्निमित्त मानने पर पूर्वोक्त अव्यवस्था ज्यों-की-त्यों ही बनी रही । प्रधान की निमित्तरहित प्रवृत्ति मानने पर पुरुष का मोक्ष कभी भी नहीं हो सकेगा ॥ ५० ॥ न प्रकाश्यं यथोष्णत्वं ज्ञानेनैवं सुखादयः । एकनीडत्वतोऽग्राह्याः स्युः कणादादिवर्त्मनाम् ॥५१॥ नेति—जिस प्रकार अग्नि का उष्णत्व उसके प्रकाश से प्रकाशित नहीं होता, उसी प्रकार वैशेषिक दार्शनिकों के अनुसार एक ही आश्रय में स्थित रहने के कारण आत्मगत ज्ञान से उसके आनन्दादि गुणों का ग्रहण नहीं किया जा सकता ॥ ५१ ॥ हृदयस्पशिनी यहाँ तक निर्गुण पुरुषवादी सांख्य के मत का निराकरण किया गया । अब सगुण पुरुषवादी वैशेषिकों के मत का निराकरण कर रहे हैं—सगुण पुरुषवादी वैशेषिक लोग आत्मा को सुख, दुःख, ज्ञान आदि गुणों से विशिष्ट मानते हैं । और आत्मगत सुखादि गुणों को आत्मगत (आत्मनिष्ठ) ज्ञान से ग्राह्य (प्रकाशित) मानते हैं । किन्तु यह संगत नहीं हो रहा है । तथापि अग्निनिष्ठ (अग्नि का, अग्निगत) उष्णत्व उसके प्रकाश से (अग्निनिष्ठ, अग्निगत प्रकाश से) प्रकाशित नहीं होता (प्रकाश्य, प्रकाशार्ह नहीं होता), उसी प्रकार वैशेषिक सिद्धान्त के अनुसार एक ही आश्रय में स्थित होने के कारण आत्मगत ज्ञान से उसके (आत्मा के) सुखादि गुण ग्राह्य नहीं हो सकते । विषय- विषयी की समानदेशता रहने पर यह ग्राह्य है, इस प्रकार भेद-नियम नहीं बन सकता ॥ ५१ ॥ युगपत्समवेतत्वं सुखविज्ञानयोरपि । मनोयोगैकहेतुत्वादग्राह्यत्वं सुखस्य च ॥५२॥ युगपदिति—किञ्च आत्मा के साथ सुख और ज्ञान का समवायसम्बन्ध होना शक्य नहीं है । तथा सुख का ग्रहण आत्म-मनःसंयोग से होता है । अतः किसी भी प्रकार से सुख का ग्राह्यत्व नहीं बन पाता है ॥ ५२ ॥ हृदयस्पशिनी केवल एकाश्रय होने से ही ज्ञान-सुखादिकों में भास्य-भासकता की अनुपपत्ति नहीं है, अपितु यौगपद्य के संभव न होने से भी है । सुख और ज्ञान का आत्मा के साथ एक ही समवाय सम्बन्ध का होना भी संभव नहीं है । अर्थात् सुख और विज्ञान में युगपत् समवेतत्व संभव नहीं है । क्योंकि वैशेषिकों के सिद्धान्त के अनुसार ज्ञान और सुखादि का असमवायिकारण आत्म-मनःसंयोग है, और वह आत्म-मनःसंयोग रूप असमवायिकारण आत्मा के केवल एक ही गुण के प्रति कारण होता है । अतः जिस समय सुखनिमित्तक आत्म-मनःसंयोग होगा, उस समय ज्ञाननिमित्तक संयोग न होने के कारण सुख का ज्ञान नहीं हो सकता और सुख के असमवायिकारणरूप उस मनः- संयोग का नाश होने पर सुख का भी नाश हो जायगा । इस प्रकार किसी भी तरह सुख की ग्राह्यता नहीं बताई जा सकती । संयोगान्तररूप असमवायिकारण के ज्ञान से सुख की ग्राह्यता प्रत्यक्षतः उपपन्न नहीं है । ‘अपि’ शब्द से समवाय की कल्पना भी प्रामाणिक नहीं है । ‘च’ शब्द से निरवयव आत्मा और मन का कोई प्रदेश न रहने से दो आत्माओं की तरह संयोग भी अनुपपन्न है । यदि दो विभु आत्माओं का संयोग मान भी लिया जाय तो उनका विभाग अनुपपन्न है । विभाग के न हो पाने पर संयोगान्तर (अन्य संयोग) की अनुपपत्ति होगी, तब ज्ञानादि कार्यों के क्रम की उपपत्ति नहीं हो सकेगी । ‘कोई भी कार्य, अपने असमवायिकारण के देश का अतिक्रमण (उल्लङ्घन) नहीं किया करता’ इस नियम के अनुसार यहाँ भी अणुपरिमाण मनःसंयोग अणुप्रदेशमात्रवर्ती रहने से उस का कार्य भी तन्मात्रवर्ती ही रहेगा, तब सकल शरीरगत आत्मवेदना के अप्रत्यक्ष होने का प्रसङ्ग प्राप्त होगा, इत्यादि अनेक दोषों के होने की संभावना होगी ॥ ५२ ॥

पार्थिवप्रकरणम् १३९ तथाऽन्येषां च भिन्नत्वाद्युगपज्जन्म नेष्यते । गुणानां समवेतत्वं ज्ञानं चेन्न विशेषणात् ॥५३॥ तथेति—उसी प्रकार एक-दूसरे से भिन्न होने के कारण दुःख, इच्छा, प्रयत्न आदि अन्य गुणों की भी उत्पत्ति एक साथ होना शक्य नहीं है। यदि 'उन सभी गुणों का आत्मा के साथ समवायसम्बन्ध होना ही उनका ज्ञान है' [ऐसा कहा जाय]—किन्तु यह कथन भी उचित न होगा, क्योंकि उन गुणों का विशेषण रूप से व्यवहार [ज्ञात सुख, ज्ञात दुःख] किया जाता है ॥ ५३ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे ज्ञान और सुख की युगपत् उत्पत्ति न होने से उनमें ग्राह्य-ग्राहकत्व की अनुपपत्ति बताई उसी प्रकार परस्पर भिन्न होने के कारण दुःख, इच्छा, प्रयत्नादि गुणों का भी एक साथ (युगपत्) उद्भव होना संभव नहीं है। क्योंकि एक आत्म-मनःसंयोग से अनेक कार्यों का होना संभव नहीं है। मूलगत 'च' से एक आश्रयवालों में विषय- विषयिभाव भी नहीं होता। सुखादिकों में ज्ञानभास्यता भले ही न रहे, एक आत्मा में उन सब का समवायसम्बन्ध से होना ही उनका ज्ञान है, किन्तु यह भी ठीक न होगा, क्योंकि 'ज्ञातं सुखम्, ज्ञातं दुःखम्'—इस प्रकार उनका विशिष्ट व्यवहार दृष्टिगत होता है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि सुखादि, आत्मा के गुण न होकर आत्मा के विषय हैं और आत्मा उनका साक्षी है ॥ ५३ ॥ ज्ञानेनैव *विशेषत्वाज्ज्ञानाप्यत्वं स्मृतेस्तथा । सुखं ज्ञातं मयेत्येवं तवाज्ञानात्मकत्वतः ॥५४॥ ज्ञानेनैवेति—सुख-दुःखादि गुणों का विशेषण 'ज्ञान' है, यह ऊपर बता चुके हैं। अतः सुख-दुःखादि गुण, ज्ञान के द्वारा विशेषित रहने से और 'मुझे सुख ज्ञात हुआ' ऐसी स्मृति होने से स्पष्ट होता है कि सुखादि की प्राप्ति में 'ज्ञान' साधन है। किन्तु तुम्हारे [वैशेषिकों के] मत में तो आत्मा को ज्ञानस्वरूप नहीं कहा गया है। अतः सुखादि गुणों की सिद्धि नहीं हो सकती ॥ ५४ ॥ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त कथन को ही और अधिक स्पष्ट करते हैं—ज्ञान के द्वारा सुखादि के विशेषित होने से वे सुखादि ज्ञान के द्वारा प्राप्य हैं। अर्थात् ज्ञान के द्वारा आहित संस्कारों से उत्पन्न स्मृति के विषय होने के कारण भी सुखादिकों में ज्ञानव्याप्यता समझनी चाहिए। 'मुझे सुख ज्ञात हुआ'— इस प्रकार स्मृति होने के कारण सुखादिक, ज्ञान के द्वारा प्राप्त (ग्राह्य) होते हैं। यदि सुखादि ज्ञान को ज्ञानविशिष्ट आत्मसमवेत होना ही मानते हो तो वह ठीक नहीं है, क्योंकि क्षणिक आत्मविशेषगुणों का युगपत् समवाय होना संभव नहीं है। अन्यथा आत्मगत संख्या, परिमाण आदि गुणों का भी ग्रहण होने लगेगा। उसी तरह सुखादि ज्ञान को केवल आत्मसमवेत होना भी नहीं कह सकते क्योंकि तुम्हारे (वैशेषिकों के) मत में आत्मा ज्ञानस्वरूप न होने के कारण सुखादि की सिद्धि नहीं हो सकती। वैशेषिकों के मत में आत्मा ज्ञानस्वरूप नहीं है, किन्तु मन के साथ आत्मा का संयोग होने पर उसमें ज्ञानादि गुणों का अनुभव होता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि आत्मा घटादि के समान केवल द्रव्यमात्र है। अतः जड़रूप होने से उससे समवेत होने मात्र से सुखादि की सिद्धि नहीं हो सकती। क्योंकि सभी तो जड़ हैं। तुम्हारे मत में ज्ञान भी स्वयं- प्रकाश नहीं है। अतः केवल आत्मसमवेत होने मात्र से सुखादि के ज्ञान की सिद्धि नहीं हो सकती ॥ ५४ ॥ सुखादेर्नात्मधर्मत्वमात्मनस्तेऽविकारतः । भेदादन्यस्य कस्मान्न मनसो वाऽविशेषतः ॥५५॥ सुखादेरिति—तुम्हारे [वैशेषिकों के] मत के अनुसार भी 'आत्मा' निर्विकार, विभु और अनेक है। अतः सुखादि उसके धर्म तो हो नहीं सकते तथा भेद में किसी प्रकार की कोई विशेषता न रहने के कारण वे किसी दूसरे आत्मा या मन के धर्म क्यों नहीं होंगे ? ॥ ५५ ॥

  • विशेष्यत्वा०—पाठान्तरम् ।

१४० उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी

ज्ञान, सुख आदि को आत्मा के गुण मानकर भास्य-भासक भाव को असंभव बताया, अब उन्हें आत्म- गुण कहना भी संभव नहीं, यह बता रहे हैं—क्योंकि वैशेषिकों के मतानुसार भी आत्मा विकाररहित होने के कारण सुखादि उसके धर्म हो नहीं सकते। उसी तरह आत्मा विभु होने के कारण उसे तुमने नित्य माना है। उसी तरह उसे अनेक भी माना है। तब कोई भी नित्य पदार्थ अनित्य गुण वाला हो, ऐसा कोई दृष्टान्त भी नहीं है। एवंच आत्मा का गुणवत्त्व ही सिद्ध नहीं हो पा रहा है। ग्राह्य-ग्राहकत्व की कल्पना तो दूर रही। किंच गुण-गुणी में अत्यन्त भेद मानने वाले तुम्हारे मत में इसी आत्मा के ये सुखादिक गुण हैं, यह नियम भी नहीं बन सकता। क्योंकि भेद में कोई विशेषता न होने के कारण वे सुखादिक किसी अन्य आत्मा के या मन के धर्म क्यों नहीं हो सकते? निष्कर्ष यह है— समस्त आत्माओं के विभु होने के कारण जिस शरीरावच्छिन्न आत्मा में सुखादि होंगे, उस समय वहाँ समस्त आत्माएँ विद्यमान होने से उनका भेद वहाँ ज्ञात नहीं हो सकता, इस कारण इसी आत्मा के ये सुखादि धर्म हैं, अन्य आत्मा के नहीं, ऐसा नियम नहीं किया जा सकता। यदि कहो कि जिस शरीरावच्छिन्न आत्मा के साथ मन का संयोग हो, उसी आत्मा के उन सुखादि धर्मों को समझा जायगा, एवंच भिन्न-भिन्न मनःसंयोगों को नियामक कहेंगे, तो वह भी ठीक नहीं रहेगा, क्योंकि शरीरस्थ मन का सभी आत्माओं के साथ समान सम्बन्ध है। भिन्न-भिन्न अदृष्टों को भी नियामक नहीं कह सकते, क्योंकि अदृष्ट भी आत्मा का धर्म है, यह अभी तक सिद्ध नहीं हो पाया है। अदृष्ट के हेतुभूत प्रयत्न आदि भी मनःसंयोग के निमित्त हुआ करते हैं। और वे सभी आत्माओं में समान हैं, उनमें कोई विशेषता (भिन्नता) नहीं होती। अतः अदृष्ट का भी कोई आश्रयविशेष (कोई एक ही आत्मा) सिद्ध नहीं हो पा रहा है। जहाँ कहीं भी होनेवाला सुखादि, जिस किसी का भी क्यों नहीं माना जा सकेगा? तथा मन में क्रिया के होने से और मूर्तता के होने से एवं सुखादिकों के देश (स्थान) का व्यभिचार न होने से सुखादिकों को मन के ही धर्म क्यों न माना जाय ? न मानने में कोई विनिगमना (युक्ति) नहीं है ।। ५५ ।।

स्यान्मालाऽपरिहार्या तु ज्ञानं चेज्ज्ञेयतां व्रजेत् । युगपद्वापि चोत्पत्तिरभ्युपेताऽत इष्यते ।।५६।।

स्यादिति—तुम्हारे मत के अनुसार यदि एक ज्ञान, दूसरे ज्ञान का विषय बन सकता है तो उन ज्ञानों की अनवस्था अनिवार्य हो जायगी और यदि उनकी उत्पत्ति एक साथ मान ली जाय तो रूप-रस आदि सभी ज्ञानों की एकसाथ उत्पत्ति माननी होगी ।। ५६ ।।

हृदयस्पर्शिनी

वैशेषिकों ने एक ज्ञान को दूसरे ज्ञान का विषय (वेद्य) होना स्वीकार किया है, किन्तु वह भी अनवस्था के कारण उचित नहीं है। वैशेषिकों के मतानुसार विषयज्ञान व्यवसायात्मक है और उसका पुनः ज्ञान अनुव्यवसायात्मक है। प्रत्येक व्यवसायात्मक ज्ञान अपने अनुव्यवसायात्मक ज्ञान का विषय होता है। इस प्रकार ज्ञान को ज्ञानान्तर का विषय मानने से अनुव्यवसायात्मक ज्ञान भी दूसरे अनुव्यवसायात्मक ज्ञान का और दूसरा तीसरे का विषय होगा। इस प्रकार अनवस्था होगी। इसके अतिरिक्त प्रत्येक ज्ञान किसी पूर्ववर्ती ज्ञान की अपेक्षा से ही होता है, अतः इस प्रकार से भी अनवस्था का दोष होगा। इसलिये ज्ञान को ज्ञानान्तर का विषय मानना उचित नहीं है। और यदि समस्त ज्ञानों को एक ही आत्म-मनःसंयोग से उत्पन्न हुआ कहें तो शब्द, स्पर्श, रूप, रसादि सभी ज्ञान एक साथ (युगपत्) होने लगेंगे। अभिप्राय यह है कि जिस आत्म-मनःसंयोग से प्रथम ज्ञान उत्पन्न होता है, उससे भिन्न किसी संयोगान्तर से तद्- विषयक अन्य ज्ञान होता है या उसी पूर्व संयोग से ही अन्य ज्ञान होता है ? पूर्वज्ञान यदि ज्ञेयता को प्राप्त होता है तो ज्ञान-परम्परा (अनवस्था-ज्ञानमाला) का परिहार करना कठिन होगा। विषय के अवभास के समय यदि ज्ञान का अवभास नहीं होता है ऐसा कहें तो क्या विषय स्वयं ही भासित होता है ? या ज्ञान के अधीन होकर भासित होता है ? इसका विवेक करना शक्य न होने से उसी समय ज्ञान के भान के लिए ज्ञानान्तर को मानना होगा, उसका भी भान न हो पाने पर पूर्वज्ञान में ज्ञानान्तरभास्यता के सिद्ध न हो पाने से उसके भानार्थ पुनः एक ज्ञानान्तर—इस तरह अनवस्था

पार्थिवप्रकरणम् १४१ दुर्निवार्य हो जायगी। एवंच प्रथम ज्ञानोत्पत्ति के अनन्तर मन में क्रिया, उससे विभाग, उससे पूर्वसंयोग का नाश, उससे संयोगान्तर, तब कहीं ज्ञानान्तर—इस प्रकार से अनेक क्षणों के विलम्ब से उत्पन्न होनेवाला उत्तरज्ञान, पूर्वज्ञान का अवभासन कैसे कर पायगा ? क्योंकि उसका उस काल में अभाव ही रहेगा। इस प्रकार 'ज्ञानं चेद् ज्ञेयतां व्रजेत्' इस प्रथम पक्ष में दोष है। अब 'युगपद् वाप्युत्पत्तिः' इस द्वितीय पक्ष को स्वीकारते हैं, तो अतिप्रसक्ति दोष होगा। अर्थात् अनवस्था दोष को दूर करने के लिए एक ही संयोग से पूर्वोत्तर ज्ञानों की युगपत् उत्पत्ति को कहें तो उस एक ही संयोग से संनिकृष्ट रूप-रस-गन्ध-शब्द-स्पर्शों के ज्ञानों की उसी समय युगपत् उत्पत्ति मान ली जाय, और उसी समय संस्कारोद्बोध संपात् में सहकारी लाभ होने से तदर्थक स्मृतियों का भी युगपत् उत्पन्न होना मान लिया जाय ? अतः ज्ञान को ज्ञानान्तर से वेद्य होने की कल्पना करना युक्तियुक्त नहीं है ॥ ५६ ॥ अनवस्थान्तरत्वाच्च बन्धो नात्मनि *विद्यते । नाशुद्धिश्चाप्यसङ्गतत्वादसङ्गो हीति च श्रुतेः ॥५७॥ अनवस्थेति—आत्मा में कभी कोई अवस्थान्तर नहीं होता है। अतः उसे बन्ध नहीं है तथा 'पुरुष असंग है' इस श्रुतिवचन के अनुसार उसके असंग होने के कारण उसमें अशुद्धि भी नहीं है ॥ ५७ ॥ हृदयस्पर्शिनी किंच—'आत्मनश्चैतन्यम्'—आत्मा का चैतन्य—यह आत्मा का स्वरूपलक्षण है या तटस्थलक्षण है ? यदि इसे स्वरूपलक्षण कहें तो पृथिवी में गन्ध की तरह सर्वदा ही उसके रहने से और उसका स्वरूप से अतिरेक (भिन्नता) न रहने से 'अनित्यज्ञानवान् आत्मा है' यह तुम्हारा उद्घोष मिथ्या हो जायगा। और यदि उसे तटस्थलक्षण कहें तो अनात्म पदार्थों में अतिप्रसक्त न होनेवाला कोई दूसरा ही स्वरूपलक्षण कहना होगा। वह स्वरूपलक्षण, चेतन के अलावा और कुछ हो ही नहीं सकता। अतः देहादि जड़ पदार्थों से विलक्षण आत्मा है—यही कहोगे, तब तुम्हें आत्मा को सदैव निर्विशेष, चिद्रूप, कूटस्थ ही स्वीकार करना पड़ेगा। अन्यथा 'विकारी पदार्थ अनित्य होता है' इस नियम के अनुसार 'बन्ध-मोक्ष से सम्बन्धित (अन्वयी) एक ही आत्मा होता है',—यह कहना तुम्हारे लिये कठिन हो जायगा। इसी अभिप्राय को उक्त पद्य के द्वारा बता रहे हैं—वैशेषिकों की कल्पना कोई उचित नहीं है। वस्तुतः आत्मा में कोई अवस्थान्तर नहीं होता, क्योंकि वह तो कूटस्थ है, इसलिए उसमें वस्तुतः विशेषगुणवत्त्वरूप बन्ध नहीं है। 'च' कार से बन्धनिवृत्तिरूप मोक्ष भी नहीं है। अर्थात् आत्मा का न तो बन्ध है और न ही मोक्ष है। 'असङ्गो ह्ययं पुरुषः'१— पुरुष असंग है, इस श्रुति के अनुसार असंग होने के कारण उसमें अशुद्धि भी नहीं है तस्मात् आत्मा नित्य शुद्ध ही है। वैशेषिकों की कल्पना का निराकरण करने का फल यह है कि स्वगतधर्मकृत बन्धाभाव की तरह अन्यसंसर्गकृत अशुद्धि भी असंग होने के कारण उसमें नहीं है ॥ ५७ ॥ सूक्ष्मैकागोचरेभ्यश्च न लिप्यत इति श्रुतेः । एवं तर्हि न मोक्षोऽस्ति बन्धाभावात्कथंचन ॥५८॥ सूक्ष्मेति—किञ्च सूक्ष्मत्व, अद्वितीयत्व और अविषयत्व रूप हेतुओं से तथा 'आत्मा, लोकदुःखों से लिप्त नहीं होता'—इस श्रुतिवचन के अनुसार भी वह [आत्मा] नित्य शुद्ध है। प्रश्न—यदि ऐसी बात है तो बन्ध का अभाव रहने से किसी प्रकार मोक्ष भी नहीं हो सकेगा ॥ ५८ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा में पारमार्थिक बन्ध आदि के न होने में और भी कारण है—सूक्ष्मत्व (सूक्ष्मता) अर्थात् मन और वाणी से गम्य न होना 'मनोवागगम्यत्वम्', और अद्वितीयत्व अर्थात् एकत्व 'एकत्वमद्वितीयत्वम्', तथा अगोचरत्व (अविषयत्व) अर्थात् 'अगोचरत्वं निर्विशेषत्वम्'—इन हेतुओं से आत्मा की नित्य शुद्धता को ही बताया गया है२। १. (वृ. उ. ४।३।१५) २. 'न लिप्यते लोकदुःखेन'—(कठ. उ. ५।११)

  • युज्यते०—पाठान्तरम्

१४२ उपदेशसाहस्री कठश्रुति ने भी उसकी शुद्धता को प्रमाणित किया है। तथा गीता^१ का स्मृतिवचन भी उक्तार्थ का समर्थन कर रहा है। इतना भाव 'सूक्ष्मैका .... .... ... इति श्रुतेः' इस अर्धश्लोक से बताया गया है। इसपर पूर्वपक्षी पुनः प्रश्न करता है कि क्या आत्मा की नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावता को सिद्ध करने वाले वेदान्ती लोग आत्मोपदेश शास्त्र को निरर्थक समझ रहे हैं ? अर्थात् वेदान्तियों के मतानुसार आत्मा को बन्ध का अभाव होने के कारण उसके मोक्ष की कोई बात ही नहीं है। मोक्ष तो बन्धपूर्वक होता है, बन्ध नहीं तो मोक्ष भी नहीं ॥ ५८ ॥ शास्त्रानर्थक्यमेव स्यान्न बुद्धेर्भ्रान्तिरिष्यते । बन्धो मोक्षश्च तन्नाशः स यथोक्तो न चान्यथा ॥५९॥ शास्त्रानर्थक्यमिति—उत्तर—तथा च मोक्षप्रतिपादक शास्त्र व्यर्थ ही हो जायेगा। किन्तु मोक्षप्रतिपादक शास्त्र को व्यर्थ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि बुद्धि की भ्रान्ति को बन्धन और उस भ्रान्ति के नाश को मोक्ष माना गया है। इस बात को पहिले बता चुके हैं। इसके अतिरिक्त और किसी प्रकार का मोक्ष नहीं है ॥ ५९ ॥ हृदयस्पर्शिनी तथाच मोक्षोपायभूत उपदेशशास्त्र का आनर्थक्य ही रहेगा। उक्त आशंका का समाधान आचार्यचरण कर रहे हैं कि बुद्धि के भ्रम (भ्रान्ति) को बन्ध कहते हैं और उस भ्रम (भ्रान्ति) के नाश को मोक्ष कहते हैं। वस्तुतः आत्मा को न बन्ध है और न ही मोक्ष है। इस प्रकार 'अज्ञानं कल्पनामूलं संसारस्य नियामकम्' यह पहले बता चुके हैं। तथाच अज्ञान से कल्पित बन्धभ्रम के निवृत्त्यर्थ उपदेशशास्त्र की आवश्यकता है, उसे निरर्थक नहीं कहा जा सकता ॥ ५९ ॥ बोधात्मज्योतिषा दीप्ता बोधमात्मनि मन्यते । बुद्धिर्नान्योऽस्ति बोद्धेति सेयं भ्रान्तिर्हि धीगता ॥६०॥ बोधात्मेति—बोधस्वरूप (ज्ञानस्वरूप) आत्मा से प्रकाशित हुई बुद्धि अपने ही में ज्ञान का होना समझती है कि मुझसे भिन्न कोई अन्य बोद्धा नहीं है, किन्तु इस प्रकार समझना बुद्धि की भ्रान्ति ही है ॥ ६० ॥ हृदयस्पर्शिनी पहले बता चुके हैं कि चिदात्मा में बुद्धिधर्म का अध्यासरूप बन्ध, अज्ञानमूलक है, उसी का उपपादन किया जा रहा है—बोध (ज्ञान) रूप आत्मा की जो ज्योति (प्रकाश) है, वही चिदाभास है, उससे प्रकाशित (दीप्त - व्याप्त) हुई बुद्धि, अपने में ही बोध (ज्ञान, चैतन्य) समझती है, और अपने से अतिरिक्त अन्य कोई बोद्धा नहीं है, 'मैं ही बोद्धा' इस प्रकार साभास बुद्धि प्रकाशित होती है। उसके अविवेक से आत्मा में 'मैं ही बद्ध हूँ, कर्ता हूँ' इत्यादि जो संसार प्रतीत होता रहता है, वह सब बुद्धि की ही भ्रान्ति है ॥ ६० ॥ बोधस्यात्मस्वरूपत्वान्नित्यं तत्रोपचर्यते । अविवेकोऽप्यनाद्योऽयं संसारो नान्य इष्यते ॥६१॥ बोधस्येति—बोध (ज्ञान) तो आत्मा का ही स्वरूप है। बुद्धि में तो उसका नित्य उपचार किया जाता है। यह अविवेक के कारण होता है। यह अविवेक भी अनादि है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई संसार नहीं है ॥ ६१ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रतीति के अनुसार बुद्धि को ही वस्तुतः बोधरूप क्यों न माना जाय ? इस आशंका का उत्तर यह है कि बुद्धि के आगन्तुक होने से बोध का व्यभिचार है, अतएव सुषुप्ति में बुद्धि के बिना भी बोध का सद्भाव रहने से (ज्ञान १. 'यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते । सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥'—(भ. गी. १३।३२)

पार्थिवप्रकरणम् १४३ की सत्ता, विद्यमानता रहने से) आत्मा का स्वरूप तो विद्यमान ही है। बोध तो सर्वदा आत्मा का ही स्वरूप है। बुद्धि में तो उसका उपचार होता है। अर्थात् अविवेक के कारण अध्यास करके व्यवहार किया जाता है। यदि अविवेक के कारण यह अध्यास किया जाता है, तो वह अविवेक सादि है या अनादि ? यदि अनादि अज्ञानकृत अविवेक होने से उसे भी अनादि कहा जाता है, तो ब्रह्मात्मज्ञान से उस अविवेक की ही निवृत्ति कही जाय, संसार की निवृत्ति क्यों बताई जा रही है ? इस भ्रम का निवारण यह है कि कर्त्रादिधर्मक बुद्धि का जो अविवेक है, वही तो संसार है, उस अविवेक के अतिरिक्त अन्य कोई संसार नहीं है ।। ६१ ।। मोक्षस्तन्नाश एव *स्यान्नान्यथाऽनुपपत्तितः । येषां वस्त्वन्तरापत्तिर्मोक्षो नाशस्तु तैर्मतः ॥६२॥ मोक्ष इति—उस अविवेक (अज्ञान) का नाश ही मोक्ष है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई मोक्ष उपपन्न नहीं हो सकता। जिनके मत में आत्मा का किसी अन्य वस्तु के आकार को प्राप्त होना 'मोक्ष' माना गया है, उन्हें उसके (आत्मा के) नाश को भी मोक्ष मानना होगा ॥ ६२ ॥ हृदयस्पर्शिनी बन्ध की अज्ञानात्मकता का फल बता रहे हैं—ज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति होनेपर अज्ञानकार्यरूप बन्ध की जो निवृत्ति है, उसे ही मोक्ष (मुक्ति) कहते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य कोई मोक्ष, हेय या उपादेय के रूप में उपपन्न नहीं हो सकता। जो लोग स्व-स्वरूप के अतिरिक्त अन्य वस्तु (वस्त्वन्तर) की प्राप्ति को या अपने स्वरूप का त्याग कर अन्य वस्तु के स्वरूपाकार होने को ही मोक्ष कहते हैं, उन लोगों को, आत्म-नाश को ही मोक्ष का स्वरूप मानना पड़ेगा। कोई वस्तु स्थित रहे या नष्ट हो जाय तो भी वह अन्य नहीं कहलाती। 'स्वरूपादन्यवस्त्वन्तरापत्ति' से यदि प्राप्ति विवक्षित है, तो 'संयोगा विप्रयोगान्ताः'१ इस न्याय से कृतक की 'अनित्यत्व' के साथ व्याप्ति रहती है, अतः मोक्ष को अनित्य कहना होगा ॥ ६२ ॥ अवस्थान्तरमप्येवमविकारान्न युज्यते । विकारेऽवयवित्वं स्यात्ततो नाशो घटादिवत् ॥६३॥ अवस्थान्तरमिति—इसी प्रकार आत्मा का अवस्थान्तर होना भी संभव नहीं है, क्योंकि वह विकाररहित (निर्विकार) है। यदि उसमें विकार होना माना जाय तो उसे सावयव कहना होगा। तब घट-पटादि के समान उसका नाश भी मानना पड़ेगा ॥ ६३ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे 'वस्त्वन्तरापत्तिमोंक्षः' इस पक्ष में अनुपपत्ति और अनित्यत्वापत्ति होती है, उसी तरह 'आत्मनोऽ- वस्थान्तरापत्तिमोंक्षः' पक्ष में भी वही दोष समानरूप से है। क्योंकि आत्मा निर्विकार है, अतः उसमें अवस्थान्तर होने की संभावना ही नहीं। यदि उसमें विकार माना जाय, तो उसे सावयव मानना होगा। तब सावयव रहने से घटादि के समान उसका नाश होना अपरिहार्य रहेगा। अतः 'भ्रान्तिनिवृत्तिरेव मोक्षः'—भ्रान्ति का ध्वंस हो जाना ही मोक्ष है ॥ ६३ ॥ तस्माद्भ्रान्तिरतोन्या हि बन्धमोक्षादिकल्पनाः । साङ्ख्यकाणादबौद्धानां मीमांसाह[हं]तकल्पनाः ॥६४॥ तस्मादिति—अतः इस वेदान्तसिद्धान्त को न मानकर जिन लोगों ने बिना विवेक किये जो बन्ध-मोक्षादि की कल्पना की है, वह तो केवल उनका भ्रम ही है। वस्तुतः सांख्य, काणाद (वैशेषिक) और बौद्धों की वे कल्पनाएँ सर्वथा अविचारपूर्ण ही हैं ॥ ६४ ॥ १. ( महा. भा. स्त्रीपर्व २।३ तथा मोक्षपर्व ३३८।२० )

  • स्यान्नान्योऽस्त्यनु०—पाठान्तरम् ।

१४४ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी अतः वेदान्त के सिद्धान्त से पृथक् विविध वादियों के द्वारा बन्ध-मोक्षादि की जो कल्पनाएँ की गई हैं, वे श्रुति-स्मृति के न्यायों से बाधित होने के कारण मानने योग्य नहीं हैं। परिशेषात् आत्मा के बन्ध-मोक्ष का जो प्रतिभास होता है, वह भ्रम ही है, ऐसा श्रुति आदि ने कहा है। बन्ध-मोक्ष के भ्रम के अतिरिक्त जो उनके स्वरूप की और उनके हेतुओं की कल्पनाएँ अन्य लोगों के द्वारा की गई हैं, वे कभी भी मानने योग्य नहीं हैं। सांख्य, कणाद और बौद्धों की कल्पनाएँ तो सर्वथा विचारशून्य ही हैं ।। ६४ ।। शास्त्रयुक्ति*विहीनत्वान्नादार्तव्याः कदाचन । शक्यन्ते शतशो वक्तुं दोषास्तासां सहस्रशः ।।६५।। शास्त्रेति - उन सांख्यादि दार्शनिकों की बन्ध-मोक्ष विषयक कल्पनाएँ शास्त्र और युक्ति के विरुद्ध हैं। अतः उन कल्पनाओं में आदरबुद्धि नहीं करनी चाहिये । अर्थात् वे कल्पनाएँ उपेक्षणीय हैं। क्योंकि उन कल्पनाओं में सैकड़ों- हजारों दोष बताये जा सकते हैं ।। ६५ ।। हृदयस्पर्शिनी शास्त्र और युक्ति दोनों से विरुद्ध होने के कारण वे कल्पनाएँ किसी भी तरह आदरणीय नहीं है, क्योंकि उनमें सैकड़ों-हजारों दोष बताये जा सकते हैं ।। ६५ ।। अपि निन्दोपपत्तेश्च यान्यतोऽन्यानि चेत्यतः । त्यक्त्वादृतो ह्यन्यशास्त्रोक्तोर्मतिं कुर्याद्दृढां बुधः ।।६६।। अपीति- 'यान्यतोऽन्यानि' आदि वचनों से वेदान्तशास्त्र के अतिरिक्त शास्त्रों की निन्दा की गई है। अतः उन शास्त्रों के कथन की उपेक्षा करके विद्वान् पुरुष को चाहिये कि वह वेदान्तशास्त्र के सिद्धान्तों में सुदृढ निष्ठा रखे ।।६६।। हृदयस्पर्शिनी मनु एवं सूत संहिता आदि में वेदान्तातिरिक्त शास्त्रों की निन्दा की गई है। अतः वेदान्त से भिन्न शास्त्रों की उपेक्षा करके बुद्धिमान् मुमुक्षु वेदान्तशास्त्र में ही अपनी निष्ठा को दृढ़ करे । मनु कहते हैं कि इस पृथ्वीपर वेदान्तशास्त्र से भिन्न जो विविध शास्त्र हैं, उन सब से धर्मशुद्धि चाहने वाला विद्वान् पुरुष सशंक रहे । जितनी भी वेदबाह्य स्मृतियाँ तथा कुतर्क हैं, वे सभी निष्फल हैं और मृत्यु के पश्चात् निरय में ले जाने वाली हैं ऐसा कहा गया है¹ ।। ६६ ।। श्रद्धाभक्ती पुरस्कृत्य हित्वा सर्वमनार्जवम् । वेदान्तस्यैव तत्त्वार्थे व्यासस्याभिमते** तथा ।।६७।। श्रद्धेति - मुमुक्षु विद्वान् को चाहिये कि वह सब प्रकार की कुटिलता को त्याग कर श्रद्धा एवं भक्ति के साथ साक्षात् नारायणावतार भगवान् व्यास के द्वारा अभिमत वेदान्तगम्य तत्त्वार्थ में अपनी बुद्धि को लगावे और उसे उसी में स्थिर रखे ।। ६७ ।। हृदयस्पर्शिनी विद्वान् मुमुक्षु को चाहिये कि वह सर्वविध कुटिलता का त्याग करके श्रुत्युक्त अर्थ में विश्वास ( श्रद्धा ) और उसके प्रति तत्परता (भक्ति) के साथ भगवान् व्यास के अभिमतवेदान्त प्रतिपादित तत्त्व में ही अपनी बुद्धि को दृढ़ करे ।। ६७ ।। १. 'यान्यतोऽन्यानि शास्त्राणि पृथिव्यां विविधानि वै । शङ्कनीयानि विद्वद्भिर्धर्मशुद्धिमभीप्सुभिः' । या वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः । सर्वास्ता निष्फलाः प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः ।।'- ( मनु. १२।९५, सूत. सं. २।१४।१८ )

  • विरोधात्ता ना० - पाठान्तरम् । ** भिमतौ ० - पाठान्तरम् ।

पार्थिवप्रकरणम् १४५ इति प्रणुन्ना द्वयवादकल्पना निरात्मवादाश्च तथा हि युक्तितः । व्यपेतशङ्काः परवादतः स्थिरा मुमुक्षवो ज्ञानपथे स्युरित्यतः* ॥६८॥ इतीति—इस प्रकार द्वैतवाद की कल्पना और निरात्मवाद का युक्तिपूर्वक खण्डन कर दिया गया। अतः मुमुक्षु विद्वान् लोग अन्यान्य वादों में न फँस कर सब प्रकार की शङ्काओं (सन्देह) का परित्याग करके अर्थात् निःशङ्क होकर वेदान्तशास्त्रनिर्दिष्ट ज्ञानमार्ग में स्थिर हो जायें ॥ ६८ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार भेदवाद की कल्पनाओं का युक्तिपुरःसर खण्डन किया गया, उसी तरह निरात्मवादी बौद्धों की कल्पनाओं का भी खण्डन किया गया। अतः मुमुक्षुगण वेदान्तातिरिक्त अन्यान्य शास्त्रीय वादों की ओर से निःशङ्क होकर वेदान्तोक्त ज्ञानमार्ग में सुस्थिर हो जायें ॥ ६८ ॥ स्वसाक्षिकं ज्ञानमतीव निर्मलं विकल्पनाभ्यो विपरीतमद्वयम् । अवाप्य सम्यग्यदि निश्चितो भवेत् निरन्वयो निर्वृतिमेति शाश्वतीम् ॥६९॥ स्वसाक्षिकमिति—इस आत्मसाक्षिक, अत्यन्त निर्मल, सब प्रकार की कल्पनाओं से विपरीत और अद्वय (अद्वैत) ज्ञान को प्राप्त करके मोक्षपथिक विद्वान् यदि सम्यक्तया निश्चय कर ले तो वह सम्पूर्ण अज्ञान और उसके कार्यों के सम्बन्ध से रहित होकर नित्य शान्ति अर्थात् अखण्ड आनन्दानुभव को प्राप्त कर लेता है ॥ ६९ ॥ हृदयस्पर्शिनी वेदान्तविहित ब्रह्मात्मज्ञान ही पुरुषार्थ का साधन है, इसलिये उसके स्वरूप को बताते हुए मुमुक्षुओं को तन्निष्ठ होने की आवश्यकता बता रहे हैं—इस स्वसाक्षिक (आत्मसाक्षिक), अत्यन्त निर्मल, विविध प्रकार की कल्पनाओं के विपरीत, और अखण्डवस्तुमात्राकार (अद्वय) ज्ञान को प्राप्त कर साधक यदि सम्यक् प्रकार से निश्चय कर ले तो वह अज्ञान और उसके कार्य के सम्बन्ध से रहित होकर अखण्ड आनन्दानुभवस्वरूपाविर्भावरूप शाश्वती निर्वृति का अनुभव करता है ॥ ६९ ॥ इदं रहस्यं परमं परायणं व्यपेतदोषैरभिमानवर्जितैः । समीक्ष्य कार्या मतिरार्जवे सदा न तत्त्वदृक्स्वा†न्यमतिर्हि कश्चन ॥७०॥ इदमिति—दोषरहित और अभिमानरहित मुमुक्षु विद्वान् इस परमगति रूप परम रहस्य का सम्यक् चिन्तन करके सर्वदा स्व-स्वरूप ब्रह्म में एकनिष्ठ हो जायें। आत्मा से भिन्न वस्तु में निष्ठा रखने वाला (अपने आराध्य को आत्मा से भिन्न मानने वाला) कोई भी पुरुष तत्त्ववेत्ता नहीं हो सकता ॥ ७० ॥ हृदयस्पर्शिनी यथोक्त ज्ञान के अधिकारी को बताते हुए तत्त्वनिष्ठा के स्वरूप को बता रहे हैं—जिसे पा कर शाश्वती निर्वृति को प्राप्त करता है, वह रहस्य एकमात्र उपदेशगम्य ही है। वह परमात्मतत्त्व का प्रकाशक होने से सर्वोत्तम (परम) है। वह निरवधिक सर्वाश्रय-परमगतिरूप (परायण) है। इस प्रकार आत्मज्ञान को सम्यक् आलोचना के द्वारा दृढ़ करे। इस प्रकार के आत्मज्ञान को प्राप्त करने के लिये इन्द्रियों की बहिर्मुखता को दूर करना होगा, और पाण्डित्य आदि के कारण उत्पन्न हुए चित्तदोषों को दूर कर (अभिमानरहित होकर) शान्त-दान्त बनना होगा। ऐसा अधिकारी ही अपनी बुद्धि को समस्वरूप (आर्जव अर्थात् ऋजुभावापन्न) ब्रह्मात्मतत्त्व में परिनिष्ठित कर सकता है। ब्रह्मात्मतत्त्व ही सर्वदा, सर्वत्र एकरूप होने से 'ऋजु' कहलाता है। उसके स्वरूप को ही आर्जव कहते हैं। क्योंकि उसमें निर्विशेषता रहती है। तथाच ब्रह्माऽभेदेन आत्मज्ञाननिष्ठा को ही तत्त्वनिष्ठा कहते हैं। इसी को व्यतिरेककथन के द्वारा विशद (स्पष्ट) कर रहे हैं—जो कोई प्रत्यगात्मा से भिन्न वस्तु को ही ब्रह्म मानकर, यदि उसी में निष्ठा रखनेवाला है, तो

  • त्यतः—पाठान्तरम् । † शाप्यमति०—पाठान्तरम् । १९

१४६ उपदेशसाहस्री वह वस्तुतः तत्त्ववेत्ता (तत्त्वदृक्, तत्त्वदृष्टिसम्पन्न) नहीं है। क्योंकि श्रुति कह रही है—‘तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदि- दमुपासते’१ तथा ‘योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योसावन्योऽहमस्मि इति न स वेद२ ॥ ७० ॥ अनेकजन्मान्तरसंचितैर्नरो विमुच्यतेऽज्ञाननिमित्तपातकैः । इदं विदित्वा परमं हि पावनं न लिप्यते व्योम* इवेह कर्मभिः ॥७१॥ अनेकेति—इस परम पवित्र आत्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त कर ज्ञानी पुरुष, जन्म-जन्मान्तर के सञ्चित अज्ञानजनित पापों से मुक्त हो जाता है, तदनन्तर पुनः वह इस लोक में आकाश के समान कर्मों से निर्लिप्त रहता है ॥ ७१ ॥ हृदयस्पर्शिनी अत्यन्त प्रयत्न से लब्ध हुए ज्ञान का फल बता रहे हैं—इस परम पवित्र आत्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त कर मनुष्य जन्म-जन्मान्तर के संचित हुए अज्ञान से उत्पन्न होनेवाले पापों से मुक्त हो जाता है। तदनन्तर पुनः इस संसार के कर्मों से वह आकाश के ही समान लिप्त नहीं होता है ॥ ७१ ॥ प्रशान्तचित्ताय जितेन्द्रियाय च प्रहीणदोषाय यथोक्तकारिणे । गुणान्वितायानुगताय सर्वदा प्रदेयमेतत्सततं मुमुक्षवे ॥७२॥ प्रशान्तचित्तायेति—गुरु का भी यह कर्तव्य है कि जो अत्यन्त शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, दोषशून्य, शास्त्रोक्त स्वधर्म का आचरण करने वाला, सद्गुणसम्पन्न और अपने अनुकूल रहने वाला मोक्षकामी शिष्य हो, उसी को सतत इस आत्मज्ञान का उपदेश करे ॥ ७२ ॥ हृदयस्पर्शिनी आचार्य का कर्तव्य बताते हैं—वह आचार्य गुरु अपने शिष्य को जब अच्छी तरह परख ले कि शिष्य अत्यन्त शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, दोषरहित, शास्त्रप्रतिपादित स्वधर्म का अनुसरण करने वाला तथा गुरु की आज्ञा का श्रद्धा-भक्ति से पालन करने वाला, गुणवान्, और अपने अनुकूल रहने वाला है, तब उस मोक्षेच्छु शिष्य को ही३ इस आत्मज्ञान को सर्वदा दे, जिस किसी को शिष्य मानकर इस आत्मतत्त्व ज्ञान को न दे ॥ ७२ ॥ परस्य देहे न †यथाभिमानिता परस्य तद्वत्परमार्थमीक्ष्य च । इदं हि विज्ञानमतीव निर्मलं संप्राप्य मुक्तोऽथ भवेच्च सर्वतः ॥७३॥ परस्येति—जिस प्रकार एक पुरुष के शरीर में दूसरे पुरुष को अभिमान नहीं होता है, उसी प्रकार अपने शरीर में भी अभिमानरहित हो जाय। यह तभी हो सकता है कि जब वह इस शरीर में परमार्थतत्त्व का साक्षात्कार कर ले, तथा इस अत्यन्त निर्मल ज्ञान को प्राप्त कर ले तभी वह सब ओर से सर्वथा मुक्त हो सकता है ॥ ७३ ॥ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त प्रकार का शिष्य महावाक्य के द्वारा ज्ञात कराये जाने वाले आत्मतत्त्व को किस प्रकार से अवगत कर पाता है ? और उससे उसे क्या फलप्राप्ति होती है ? जिस प्रकार अपने से भिन्न दूसरे पुरुष के शरीर में किसी पुरुष को अभिमान नहीं होता अर्थात् मैं-मेरा इस प्रकार अभिमान नहीं होता, उसी प्रकार अपने शरीर में १. (के. उ. ४, ५, ६, ७, ८) २. (बृ. उ. १।४।१०) ३. ‘शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्यति’—(बृ. उ. ४।४।२३ तथा गीता—६।३, २।६६, २।५८, १८।६६, २।१४, २।५३, १२।८, ४।३९, ४।४० तथा मोक्षधर्म प. ३१०।३५-३८ तथा भागवते ३।३२।३९-४२)

  • भवदेव क—पाठान्तरम् । † यथाहममानिता०—पाठान्तरम् ।

पार्थिवप्रकरणम् १४७ भी परमार्थतत्त्व का अर्थात् देहातिरिक्त आत्मतत्त्व का साक्षात्कार कर अभिमानरहित होता हुआ इस अत्यन्त निर्मल ज्ञान को प्राप्त कर पुरुष सर्वथा मुक्त हो जाता है। अर्थात् अज्ञान और उसके कार्यभूत संस्कारों से रहित होकर परमानन्दानुभवरूप ब्रह्मात्मस्वरूप हो जाता है ॥ ७३ ॥ न हीह लाभोऽभ्यधिकोऽस्ति कश्चन स्वरूपलाभात् स इतो हि नान्यतः । न देयमैन्द्रादपि राज्यतोऽधिकं स्वरूपलाभं त्वपरीक्ष्य यत्नतः ॥७४॥ नहीति—इस संसार में स्वरूपलाभ (आत्मलाभ) से बढ़कर अन्य कोई लाभ नहीं है। वह लाभ वेदान्त- वाक्यों से ही हो सकता है, किसी अन्य उपाय (साधन) से नहीं। अतः इस आत्मलाभ को, जो इन्द्रलोक के राज्य से भी बढ़कर है, उसे प्रयत्न पूर्वक परीक्षा किये बिना किसी को नहीं देना चाहिये ॥ ७४ ॥ हृदयस्पर्शिनी गुणविशेषविशिष्ट शिष्य की परीक्षा करने की गुरु को आवश्यकता क्यों होती है ? जिस किसी भी आये हुए शिष्य को यह आत्मविद्या क्यों नहीं दी जाती ? इस संसार (देव-मनुष्यादि जन्मपरंपरा) में आत्मतत्त्वज्ञान (स्वरूपलाभ) से बढ़कर कोई दूसरा लाभ नहीं है१। और वह लाभ वेदान्तवाक्यों से ही हो सकता है, अर्थात् तत्त्व मस्यादि वाक्य का पदार्थविवेक करनेवाले मुमुक्षु को ही निःसंदिग्ध (निर्विचिकित्स) ‘अहं ब्रह्म’ इस प्रकार साक्षात्कार- रूप ज्ञान, जो वेदान्तवाक्य से उत्पन्न हुआ है, वही मोक्ष प्राप्त कराने में हेतु होता है; किसी अन्य शास्त्रान्तरों से नहीं होता है। इस कारण शिष्य की प्रयत्नपूर्वक परीक्षा किये बिना इस स्वरूपलाभ कराने वाले ज्ञान को नहीं देना चाहिये। क्योंकि यह लाभ इन्द्रलोक के राज्य से भी कहीं अधिक बढ़कर है। अतः ऐसे-वैसे किसी भी अनधिकारी शिष्य को यह ज्ञान कभी भी न दे। श्रुति ने भी यही आज्ञा दी है२ ॥ ७४ ॥ ॥ इति षोडशम्पार्थिवप्रकरणं समाप्तम् ॥ १. ‘आत्मलाभान्न परं विद्यते’—(आप. ध. १।२२।२) २. ‘प्राणाय्याय वान्तेवासिने नान्यस्मै कस्मैचन यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूयः’—(छां. उ. ३।११।६)