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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

२८६ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी तज्जातमिति—इस प्रकार उपोद्घात के रूप में शरीरोत्पत्ति को बताकर उसके आगे बताते हैं—वह उत्पन्न हुआ शरीर जातकर्मादि संस्कारों से नाम और रूप प्राप्त कर पुनः मंत्रों से संस्कृत होने पर उपनयन संस्कार के द्वारा 'ब्रह्मचारी' संज्ञा को प्राप्त करता है। पश्चात् वही शरीर पत्नी-ग्रहणरूप संस्कार के द्वार 'गृहस्थ' संज्ञा को प्राप्त करता है। पुनः वही वानप्रस्थ संस्कार के द्वारा 'वानप्रस्थ' संज्ञा को प्राप्त करता है। पश्चात् वही सर्वकर्मपरित्याग- निमित्तरूप संस्कार के द्वारा 'संन्यासी' संज्ञा को प्राप्त करता है। इस प्रकार विभिन्न जाति, कुल और संस्कारवाला यह शरीर तुझसे पृथक् है ॥ २१ ॥ मनश्चेन्द्रियाणि च *नामरूपात्मकान्येव, “अन्नमयं हि सोम्य मनः” इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥२२॥ हृदयस्पर्शिनी मन इति—इसके अतिरिक्त “हे सोम्य ! मन अन्नमय ही है”१ इत्यादि श्रुतियों के अनुसार मन और इन्द्रियाँ भी नाम-रूपात्मिका ही हैं ॥ २२ ॥ कथं चाहं भिन्नजात्यन्वयसंस्कारवर्जित इत्येतच्छृणु—योऽसौ नामरूपयोर्व्याकर्ता नामरूप†- विलक्षणः, स एव नामरूपे व्याकुर्वन्-सृष्ट्वेदं शरीरं स्वयं ‡संसारधर्मवर्जितो नामरूप इह प्रविष्टोऽन्यैरदृष्टः स्वयं पश्यन्, तथाऽश्रुतः शृण्वन्, अमतो मन्वानः, अविज्ञातो विजानन्, “सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाऽभिवदन्यदास्ते” इत्यस्मिन्नर्थे श्रुतयः सहस्रशः—“तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्”, “अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानाम्”, “स एष इह प्रविष्टः”, “एष त आत्मा”, “स एतमेव सीमानं विदार्येतया द्वारा प्रापद्यत”, “एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा”, “सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवताः” “अशरीरं शरीरेषु” इत्याद्याः ॥२३॥ हृदयस्पर्शिनी कथमिति—तुमने जो पूछा था कि मैं अनात्मभूत जाति, कुल एवं संस्कारों से रहित किस प्रकार हूँ ? उसे भी इस प्रकार सुनो—यह जो नाम-रूप के धर्मों से विलक्षण नाम-रूप को व्याकृत (व्यक्त) करने वाला है, वही नाम-रूप को व्यक्त करते हुए इस शरीर को रचकर स्वयं संस्कार और धर्मों से रहित हुआ ही दूसरों से अदृष्ट किन्तु स्वयं देखता हुआ, दूसरों से अश्रुत किन्तु स्वयं सुनता हुआ, तथा मन का अविषय होकर भी मनन करता हुआ और अविज्ञात होकर भी सबको जानता हुआ इन नाम और रूपों में प्रविष्ट हो गया है, जैसे “बुद्धिमान् पुरुष सम्पूर्ण रूपों की रचना कर उनके देव-मनुष्य आदि नाम रखकर उनके द्वारा बोलता (व्यवहार करता) हुआ स्थित रहता है”२ इस श्रुति के दृष्टान्त से उपर्युक्त कथन स्पष्ट हो जाता है। इसी अर्थ में “उसे रचकर उसी में अनुप्रविष्ट हो गया”३, “आत्मा सबके भीतर प्रविष्ट होकर सब जीवों का शासन करने वाला है”४, “वह आत्मा इस शरीर में प्रविष्ट है”५, “यह तेरा आत्मा है”६, “वह इस मूर्द्धसीमा को विदीर्णकर इसके द्वारा प्रविष्ट हो गया”७, “वह आत्मा समस्त प्राणियों में छिपा हुआ है”८, “उस (सत्स्वरूप) देवता ने ईक्षण किया कि अहा ! मैं इन तीन (अप्, तेज और अन्न) देवताओं को प्रकाशित करूँ”९ इत्यादि सहस्रों श्रुतियाँ उपलब्ध हैं। जैसे पक्षी अपने नीड (घोसले) में प्रविष्ट होता है तो वह सबको उपलब्ध भी होता है, वैसे ही परमात्मा यदि यहाँ सर्वत्र प्रविष्ट है तो वह सबको उपलब्ध क्यों नहीं होता ? इस शंका का समाधान “अन्यैरदृष्टः” से हो जाता है। “अदृष्टो द्रष्टा”—(बृ. आ. ३।७।२३) श्रुति को मूल में अर्थतः दिया गया है ॥ २३ ॥ १. “अन्नमयं हि सोम्य मनः” (छां. उ. ६।५।४) ६. (बृ. उ. ३।७।३) २. (तै. आ. ३।१२।७) ७. (ऐ. उ. ३।१२) ३. (तै. उ. २।६) ८. (कठ उ. १।३।१२) ४. (तै. आ. ३।११) ९. (छां. उ. ६।३।२) ५. (बृ. उ. १।४।७) * रूपकाण्येव—पाठान्तरम् । † रूपधर्म वि० —पाठान्तरम् । ‡ संस्कार धर्म—पाठान्तरम् ।

शिष्यानुशासनप्रकरणम् २८७ स्मृतयोऽपि—"आत्मैव देवताः सर्वाः"१, "नवद्वारे पुरे देही"२, "क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि"३, "समं सर्वेषु भूतेषु"४, "उपद्रष्टानुमन्ता च"५, "उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः"६, "अशरीरं शरीरेषु" इत्याद्याः । तस्माज्जात्यन्वयसंस्कारवर्जितस्त्वमिति सिद्धम् ॥२४॥ हृदयस्पर्शिनी स्मृतयोऽपीति—परमात्मा ही क्षेत्रज्ञ है—इस श्रुतियुक्त अर्थ को बताने के लिये स्मृतिवचनों को भी उद्धृत कर रहे हैं । "सब देवता आत्मा ही हैं"१, "नौ द्वार के पुर में देही रहता है"२, "क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जान३", "सब भूतों में समानरूप से स्थित"४, "उपद्रष्टा और अनुमन्ता"५, "उत्तम पुरुष तो अन्य ही है६", "जो शरीरों में अशरीरी है७" इत्यादि स्मृतियाँ भी हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि तू जाति, कुल और संस्कारों से रहित है। 'इत्यादि' के 'आदि' शब्द से "स पर्य्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्"८ को भी संगृहीत किया समझना चाहिये ॥ २४ ॥ स यदि ब्रूयात्—अन्य एवाहमज्ञः सुखी दुःखी बद्धः संसारी, अन्योऽसौ मद्विलक्षणोऽसंसारी देवः, तमहं बल्युपहारनमस्कारादिभिर्वर्णाश्रमकर्मभिश्चाराध्य संसारसागरादुत्तितीर्षुरस्मि—कथमहं स एव ? इति ॥२५॥ हृदयस्पर्शिनी स यदीति—'परमात्मा और तू एक ही हैं—इस अभेदोपदेश से जीव को जाति, कुल, संस्कारराहित्य का निश्चय कराया गया किन्तु स्वानुभवविरोध की आशंका की जा रही है। शिष्य यदि यह आशंका करे कि मैं अज्ञानी, सुखी, दुःखी, बद्ध संसारी जीव तो अन्य हूँ, किन्तु यह असंसारी देव मुझसे भिन्न ही है। अतः मैं पूजा (बलि) उपहार और प्रणामादि के द्वारा तथा अपने वर्णाश्रमविहित कर्मानुष्ठान से उसकी आराधना करके इस संसारसागर से पार होना चाहता हूँ। मैं साक्षात् वही कैसे हो सकता हूँ? क्योंकि मैं तो अज्ञ हूँ, यह अज्ञता मेरी अनुभवसिद्ध है। और उससे विलक्षण ईश्वरतत्त्व है—यह श्रुति-स्मृतियों के द्वारा बताया गया है। अतः आत्मा और परमात्मा को अभिन्न कैसे समझा जाय ? उत्कृष्ट ईश्वर को निकृष्ट संसारी के रूप में देखने पर प्रत्यवाय भी होगा। अतः उसका अनुग्रह प्राप्त करने के लिये मुझे उसकी आराधना ही करना उचित होगा। उसके अनुग्रह से ही मैं संसार से मुक्त हो सकूँगा ॥ २५ ॥ आचार्यो ब्रूयात्—नैवं सोम्य, प्रतिपत्तुमर्हसि—प्रतिषिद्धत्वाद्वैतप्रतिपत्तेः। कथं प्रतिषिद्धा भेदप्रतिपत्तिरित्यत आह—"अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद", "ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद", "मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति" इत्येवमाद्याः ॥२६॥ हृदयस्पर्शिनी आचार्य इति—शिष्य की भ्रमपूर्ण आशंका को सुनकर आचार्य को कहना चाहिये कि 'हे सोम्य ! तुझे ऐसा नहीं समझना चाहिये। क्योंकि भेदज्ञान की निन्दा की गई है।' यदि कोई ऐसा आक्षेप करे कि भेद तो प्रत्यक्ष- १. ( मनुस्मृति १२।११९ ) २. ( भग. गी. ५।१३ ) ३. ( भग. गी. १३।२ ) ४. ( भग. गी. १३।२७ ) ५. ( भग. गी. १३।२२ ) ६. ( भग. गी. १५।१७ ) ७. ( सूत सं. २।११।६७ ) ८. ( ईश. उ. ८ )

२८८ उपदेशसाहस्री सिद्ध है, अतः प्रत्यक्षविरुद्ध प्रमाणान्तर से उस (भेद) का प्रतिषेध कैसे होगा ? भेदज्ञान की निन्दा इस प्रकार की गई है कि “यह परमात्मा अन्य है और मैं अन्य हूँ—ऐसा जो जानता है, उसने कुछ नहीं जाना है। अर्थात् वह कुछ नहीं जानता है¹।” “जो ब्रह्म को आत्मा से भिन्न देखता है, ब्रह्म उसे त्याग देता है²।” “जो यहाँ (इस लोक में) नानावत् देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है³।” इत्यादि श्रुतियाँ इसमें प्रमाण हैं। तात्पर्य यह है कि असंसारी ईश्वर का प्रत्यक्ष न होने से, उसके भेद का प्रत्यक्ष भी आत्मा में हो पाना संभव नहीं है। सुखी-दुःखी आदि का आत्मा में अनुभव करना केवल भ्रम है। भ्रम होने से भेद का अध्यवसाय कर नहीं सकते। अतः अनन्यथासिद्धार्थ श्रुति के द्वारा प्रतिषिद्ध हुए भेद को प्रमाण समझना उचित नहीं है ॥ २६ ॥ एता एव श्रुतयो भेदप्रतिपत्तेः संसारगमनं दर्शयन्ति ॥२७॥ हृदयस्पर्शिनी एता इति—ये भेदप्रतिषेधक श्रुतियाँ ही भेदज्ञान से संसार की प्राप्ति को भी प्रदर्शित करती हैं। अर्थात् ऊपर उल्लिखित श्रुतियाँ केवल भेदनिषेध ही नहीं कर रही हैं, किन्तु भेददर्शी व्यक्ति के लिये अनर्थप्राप्तिरूप प्रत्यवाय की सूचना भी देती हैं। यह परमेश्वर मुझसे विलक्षण कोई अन्य ही है, और मैं भी उससे विलक्षण संसारी जीव हूँ, ऐसा समझकर जो व्यक्ति अन्य देवता की उपासना करता है, अर्थात् श्रुति का तात्पर्य भेद में होना ही समझना है, उसने सचमुच तत्त्व को नहीं जाना, यही समझना चाहिये। क्योंकि भेदज्ञान, अविद्या से हुआ करता है। भेददर्शी के लिये श्रुति ने बताया है कि “उसे देवपशुत्व की प्राप्ति होती है⁴।” पराधीनता से बढ़कर कोई दूसरा दैन्य अथवा कष्ट नहीं है। ब्रह्म, भेददर्शी के विषय में सोचता है कि यह भेददर्शी मुझ आत्मरूप को अनात्मरूप से देखता है, अतः वह उस भेददर्शी का हित नहीं करता, अर्थात् वह उससे मानो द्वेष ही करने लगता है। अर्थात् उसे तत्त्व विमुख कर देता है। 'नानेव' यहाँ पर 'इव' शब्द नानात्वदर्शन में आभासत्व सूचित करने के लिये है। वह मृत्यु से मृत्यु को अर्थात् एक संसार से दूसरे संसार को और दूसरे से तीसरे संसार को इस प्रकार अनन्तकाल तक अनर्थपरम्परा को ही प्राप्त करता रहता है ॥ २७ ॥ अभेदप्रतिपत्तेश्च मोक्षं दर्शयन्ति सहस्रशः । “स आत्मा तत्त्वमसि” इति परमात्मभावं विधाय “आचार्यवान् पुरुषो वेद” इत्युक्त्वा “तस्य तावदेव चिरम्” इति मोक्षं दर्शयन्ति अभेद- विज्ञानादेव । सत्याभिसन्धस्यातस्करस्येव दाहाद्यभावदृष्टान्तेन संसाराभावं दर्शयन्ति । भेददर्शनादसत्याभि- सन्धस्य संसारगमनं दर्शयन्ति तस्करस्येव दाहादिदृष्टान्तेन ॥२८॥ हृदयस्पर्शिनी अभेदप्रतिपत्तेश्चेति—इस प्रकार भेददृष्टि की निन्दा बताकर और अभेददृष्टि की फलवत्ता होने से उनकी प्रशंसा करते हुए वही उपादेय है। अभेदज्ञान के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति को हजारों श्रुतियों ने बताया है। अन्वय- व्यतिरेक व्याप्ति दोनों में है, इसी बात को श्रुत्यर्थ के द्वारा बताते हुए उक्त अर्थ को पुष्ट कर रहे हैं। “पुरुषं सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्ति⁵” इस खण्ड में इस अर्थ को बताया गया है। “राजपुरुष किसी पुरुष को हाथ पकड़कर लाते हैं और कहते हैं कि इसने धन चुराया है, इसके लिये परशु तपाओ। यदि उसने चोरी की है तो वह अपने को झूठा सिद्ध १. ( बृ. उ. १।४।१० ) २. ( बृ. उ. २।४।६, ४।५।७ ) ३. ( बृ. उ. ४।४।१९, कठ उ. ४।१० ) ४. “यथा पशुरेवं स देवानाम्” ।—( बृ. उ. १।४।१०, ४।४।१९ ) ५. “पुरुष सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्त्यपहार्षीत्स्तेयमकार्षीत्परशुमस्मै तपतेति । स यदि तस्य कर्ता भवति तत एवानृतमात्मानं कुरुते सोऽनृताभिसन्धोऽनृतेनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स दह्यतेऽथ हन्यते ॥ १ ॥ अथ यदि तस्याकर्ता भवति तत एव सत्यमात्मानं कुरुते स सत्याभिसन्धः सत्येनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स न दह्यतेऽथ मुच्यते ॥ २ ॥ ( छां. उ. ६।१६।२ )

शिष्यानुशासनप्रकरणम् २८९ करता है और तप्त परशु को छूने से जल जाता है तथा मार दिया जाता है। किन्तु यदि उसने चोरी नहीं की है तो वह अपने को सत्यवादी सिद्ध करता है। वह उस तप्त परशु से नहीं जलता, और उसे छोड़ दिया जाता है। उसी प्रकार भेददर्शी असत्यनिष्ठ होने के कारण संसारबन्धन में बँधता है और अभेददर्शी सत्यनिष्ठ होने के कारण उससे छूट जाता है।” अभेदज्ञान के द्वारा मोक्षप्राप्ति को बताने वाली श्रुतियाँ इस प्रकार हैं— “वह आत्मा है और वही तू है¹।” इस प्रकार जीव के परमात्मभाव का विधान कर “आचार्यवान् पुरुष को ही ज्ञान होता है²।” ऐसा कहकर “उसके लिये तभी तक विलम्ब है³।” इस प्रकार अभेदज्ञान से ही श्रुतियाँ मोक्ष का प्रदर्शन कर रही हैं। तथा अचौर पुरुष के दाहादि के अभाव के समान दृष्टान्त द्वारा सत्यनिष्ठ पुरुष को संसारप्राप्ति का अभाव और चौर के दाहादि दृष्टान्त से भेददर्शी असत्यनिष्ठ पुरुष को संसार की प्राप्ति दिखलायी है ॥ २८ ॥ “त इह व्याघ्रो वा” इत्यादिना च अभेददर्शनात् “स स्वराड्भवति” इत्युक्त्वा, तद्विपरीतेन भेददर्शनेन संसारगमनं दर्शयन्ति— “अथ येऽन्यथाऽतो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति” इति प्रतिशाखम्। तस्मान्मृषैवैवमवादी: “ब्राह्मणपुत्रोऽदोऽन्वयः संसारी परमात्मविलक्षणः” इति ॥२९॥ हृदयस्पर्शिनी अभेददर्शनादिति— सुषुप्ति में परमात्मा के साथ अभेदसम्पत्ति होने पर भी वैसा अभेदज्ञान न रहने के अपराध से ही पुनः व्याघ्रादि भाव से उठे हुए (जगे हुए) लोगों के लिये संसार का अविच्छेद बताती हुई श्रुति परमात्मा के साथ अभेद के रूप में होने वाला आत्म ज्ञान ही मोक्ष प्राप्ति में हेतु है--यह सूचित कर रही है। “वह यहाँ व्याघ्र अथवा⁴ (सिंह, भेड़िया, भालू, कीट, पतंग, या मच्छर) जो कुछ होता है, सुषुप्ति से जागने पर वही हो जाता है” इस श्रुति से भी अभेद ही दिखलाया गया है। तथा “वह स्वराट् (स्वतन्त्र सम्राट) हो जाता है”⁵ ऐसा कहकर उसके विपरीत “जो इससे भिन्न प्रकार से जानते हैं, उनके अधिपति दूसरे होते हैं, तथा वे क्षयशील लोकों को प्राप्त होते हैं”⁶ इत्यादि श्रुतियों द्वारा प्रत्येक शाखा में भेददर्शन के द्वारा संसार की प्राप्ति दिखलाई है। अतः तुमने यह मिथ्या ही बताया है कि ‘मैं परमात्मा से भिन्न अमुक गोत्र में उत्पन्न हुआ संसारी ब्राह्मणपुत्र हूँ’। तात्पर्य यह है कि भेददर्शन की निन्दा एवं अभेददर्शन की प्रशंसा के द्वारा जीव और ब्रह्म का अभेद निश्चित किया गया है। अतः आत्मा में ब्राह्मणत्वादि का अभिमान करना मिथ्या है, यह सिद्ध किया गया है ॥ २९ ॥ तस्मात्— प्रतिषिद्धत्वाद्द्भेददर्शनस्य, भेदविषयत्वाच्च कर्मोपादानस्य, कर्मसाधनत्वाच्च यज्ञोपवीतादेः कर्मसाधनोपादानस्य परमात्माभेदप्रतिपत्त्या प्रतिषेधः कृतो वेदितव्यः। कर्मणां तत्साधनानां च यज्ञोपवीतादीनां परमात्मऽभेदप्रतिपत्तिविरुद्धत्वात्, संसारिणो हि कर्माणि विधीयन्ते, तत्साधनानि च यज्ञोपवीतादीनि, न परमात्मनोऽभेददर्शिनः। भेददर्शनमात्रेण च ततोऽन्यत्वम् ॥३०॥ हृदयस्पर्शिनी तस्मादिति— अतः शिष्य ने पूर्वगत २५ वे वाक्य से जो यह कहा था कि ‘मैं पूजा, प्रणामादि वर्णाश्रम- विहित कर्मानुष्ठान के द्वारा परमेश्वर की आराधना करूँगा’ यह दृष्टि भी सम्यक् दृष्टि नहीं है, वह भेददृष्टि ही है, जिसका अभेदश्रुति ने बाध कर दिया है। भेददृष्टि का प्रतिषेध किया होने से और कर्मानुष्ठान भेदविषयक होने से तथा यज्ञोपवीतादि, कर्मानुष्ठान का साधन होने से परमात्मा के साथ अभेदज्ञान हो जाने पर कर्म के साधन और १. (“स आत्मा तत्त्वमसि” ।—छां. उ. ६।८।१६ ) २. “आचार्यवान् पुरुषो वेद” ।—(छां. उ. ६।१४।२ ) ३. “तस्य तावदेव चिरम्” ।— (छां. उ. ६।१४।२ ) ४. “त इह व्याघ्रो वा” ।— (छां. उ. ६।९।२ ) ५. “स स्वराट् भवति” ।—(छां. उ. ७।२५।२ ) ६. “अथ येऽन्यथाऽतो विदुरन्ये राजा नस्ते क्षय्यलोका भवन्ति” ।— (छां. उ. ७।२५।२ ) ३७

२९० उपदेशसाहस्री

कर्मानुष्ठान का भी प्रतिषेध हुआ समझना चाहिये, क्योंकि कर्म और उनके यज्ञोपवीतादि साधन परमात्मा से अभेद- ज्ञान के विरोधी हैं। कर्म और उनके साधन यज्ञोपवीतादि का संसारी पुरुषों के लिये ही विधान किया गया है। पर- मात्मा के साथ अपना अभेद देखने वाले के लिये नहीं किया गया है। संसारी जीव का तो परमात्मा से भेद है और वह भेददृष्टि के कारण ही है, वास्तविक नहीं है। क्रिया, कारक, फल आदि भेद का आश्रय किये बिना कर्म का स्वरूप ही सिद्ध नहीं हो सकता। कर्म का स्वरूप तो भेदज्ञान पर ही निर्भर है। श्रुति ने ही यज्ञोपवीत धारण आदि में कर्म की साधनता बताई है। किन्तु साध्य कर्म के अभाव में उसके साधनों का परिग्रह करना निरर्थक ही है। 'मैं ब्रह्म हूँ', और 'मैं कर्ता हूँ' इन दो विरुद्ध प्रतिपत्तियों का समुच्चय एक पुरुष में होना संभव नहीं है। इससे यह नहीं समझना चाहिये कि अधिकारी के अभाव में वेदोक्त कर्मकाण्ड निराधार है, अप्रमाण है। वह जाति, कुल आदि का अभिमान रखनेवाले संसारी जीव के लिए बताया गया है। अभेददर्शी के लिए वह नहीं है ॥ ३० ॥

यदि कर्माणि कर्तव्यानि, न विनिवर्तयिषितानि, कर्मसाधनासम्बन्धिनः कर्मनिमित्तजात्या- श्रमाद्यसम्बन्धिनश्च, परमात्मन* आत्मनैवाभेदप्रतिपत्तिं नावक्ष्यत्—“स आत्मा तत्त्वमसि” इत्येवमादि- भिर्निश्चितरूपैर्वाक्यैः । भेदप्रतिपत्तिनिन्दां च नाभ्यधास्यत् ॥ ३१॥

हृदयस्पशिनी यदीति—श्रुति ने ब्रह्मात्मैक्यप्रतिपत्ति के द्वारा कर्म और उनके साधनों का जो प्रतिषेध किया, उसी को अब व्यतिरेक से बता रहे हैं। कर्तव्य कर्मों की निवृत्ति यदि श्रुति को अभीष्ट नहीं होती तो वह कर्मसाधनों से असंबन्धित तथा कर्मनिमित्तक जाति एवं आश्रमादि से असंबंधित परमात्मा का “वह आत्मा है और वह तू है¹” ऐसे निश्चित रूप वाक्यों के द्वारा आत्मा के साथ अभेद का प्रतिपादन न करती और न “यह ब्राह्मण की नित्य महिमा है²” “वह पुण्य से असंश्लिष्ट है और पाप से भी असंश्लिष्ट है³” “यहाँ चौर, अचौर हो जाता है⁴” आदि वाक्यों द्वारा भेदज्ञान की निन्दा नहीं की होती ॥ ३१ ॥

“एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य”, “अनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन”, “अत्र स्तेनोऽस्तेनः”—इत्यादिना कर्मासम्बन्धित्वरूपत्वं कर्मनिमित्तवर्णाद्यसम्बन्धरूपतां च नाभ्यधास्यत्, कर्माणि च कर्मसाधनानि च यज्ञोपवीतादीनि यद्यपरितित्याजयिषितानि; तस्मात्ससाधनं कर्म परित्यक्तव्यं मुमुक्षुणा—परमात्माभेददर्शनविरोधात्—आत्मा च पर एव प्रतिपत्तव्यो यथाश्रुत्युक्तलक्षणः ॥ ३२॥

हृदयस्पर्शिनी एष इति—दूसरा कारण यह भी है कि यदि श्रुति को यज्ञादि कर्म और यज्ञोपवीतादि कर्मसाधनों का त्याग अभीष्ट न होता तो वह आत्मा की कर्मासम्बन्धिरूपता तथा कर्मनिमित्तक वर्णादिसंसर्गशून्यता का वर्णन न करती । अतः मुमुक्षु पुरुष साधनसहित कर्मों का परित्याग करे, क्योंकि उनका परमात्मा के अभेदज्ञान के साथ विरोध है। अतः श्रुति के द्वारा बताये हुए लक्षणों से युक्त आत्मा को परब्रह्म ही समझना चाहिए ॥ ३२ ॥

स यदि ब्रूयात्—भगवन्, दह्यमाने छिद्यमाने वा देहे प्रत्यक्षा वेदना; अशनायादिनिमित्तं च प्रत्यक्षं दुःखं मम । परश्चायमात्मा, “अयमात्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः” †सर्वसंसारधर्मविवर्जितः श्रूयते सर्वश्रुतिषु स्मृतिषु च । कथं तद्विलक्षणोऽनेकसंसारधर्मसंयुक्तः परमात्मा-


१. (छां. उ. ६।८।७ ) २. (बृ. उ. ४।४।२३ ) ३. ( बृ. उ. ४।३।२२ ) ४. ( बृ. उ. ४।३।२२ )

  • आत्म०—पाठान्तरम् । † सर्वगन्ध-रसवर्जितः०—पाठान्तरम् ।

शिष्यानुशासनप्रकरणम् २९१ नमात्मत्वेन मां च संसारिणं परमात्मत्वेनाग्निमिव शीतत्वेन *प्रतिपद्येय ? संसारी च सन्, सर्वाभ्युदयनिः- श्रेयससाधनेऽधिकृतः, अभ्युदयनिःश्रेयससाधनानि कर्माणि तत्साधनानि यज्ञोपवीतादीनि कथं परित्यजेयम् ? इति ॥३३॥ हृदयस्पशिनी स इति—आगम के आधार पर निरूपित किये गये ब्रह्मात्मैक्य को अब युक्ति से भी सुदृढ़ बनाने के लिए शिष्य के मुख से पुनः आक्षेप कराया जा रहा है। शिष्य गुरु से कहता है कि हे भगवन् ! देह (शरीर) के दहन या छेदन किये जाने पर जो वेदना (पीड़ा) होती है, वह तो प्रत्यक्ष है, उसी तरह क्षुधा (भूख) से होनेवाली पीड़ा (दुःख) का भी मुझे प्रत्यक्ष अनुभव होता है। तथा “यह आत्मा पापशून्य, रजोरहित, मृत्युरहित, शोकहीन, क्षुधाहीन, पिपासाहीन और सब प्रकार के गन्ध और रस से रहित है”१ इस प्रकार सभी श्रुतियों और स्मृतियों में यह आत्मा ही परमात्मा रूप से सुना जाता है। ऐसी स्थिति में इन लक्षणों से रहित तथा अनेक सांसारिक धर्मों से युक्त हुआ मैं अग्नि को शीतत्व- विशिष्ट समझने के समान परमात्मा को आत्मस्वरूप से और संसारी अपने-आपको परमात्मारूप से कैसे समझूँ ? तथा संसारी होने के कारण सर्वविध अभ्युदय और निःश्रेयस के साधनों में अधिकार रखता हुआ भी उन अभ्युदय और निःश्रेयस के साधनभूत कर्म एवं उनके साधनभूत यज्ञोपवीतादि को भी कैसे त्याग दूँ ? अतः ‘जीव-परमात्मानौ वस्तुतो भिन्नौ विरुद्धधर्मसंसर्गित्वात्, शीतोष्णवत्' यह आक्षेप करनेवाले शिष्य का अनुमान है। एवंच भेद तो तात्त्विक है, तब कर्म और तत्साधनभूत यज्ञोपवीतादि परित्यागात्मक संन्यास के लिए अवसर (प्रसंग) ही कहाँ है ? अर्थात् नहीं है ॥ ३३ ॥ तं प्रति ब्रूयात्—यदवोचो दह्यमाने छिद्यमाने वा देहे प्रत्यक्षा वेदनोपलभ्यते ममेति; तदसत् । कस्मात् ? दह्यमाने छिद्यमान इव वृक्ष उपलब्धुरुपलभ्यमाने कर्मणि शरीरे दाहच्छेदवेदनाया उपलभ्यमानत्वाद्दाहादिसमानाश्नयैव वेदना । यत्र हि दाहच्छेदो वा क्रियते तत्रैव व्यपदिशति दाहादिवेदनां लोकः, न वेदनां दाहाद्युपलब्धरीति । कथं क्व ते वेदनेति पृष्टः शिरसि मे वेदना, उरस्युदर इति वा, यत्र दाहादिस्तत्रैव व्यपदिशति, न तूपलब्धरीति । यद्युपलब्धरि वेदना स्यात् वेदनानिमित्तं वा दाहच्छेदादि, वेदनाश्रयत्वेनोपदिशेद्दाहाद्याश्रयवत् ॥३४॥ हृदयस्पर्शिनी त मिति—उस शिष्य से गुरु यह कहे—तुमने जो कहा कि ‘शरीर के दग्ध और छेदन किये जाने पर मुझे वेदना की उपलब्धि का प्रत्यक्ष अनुभव होता है’ किन्तु तुम्हारा यह कथन ठीक नहीं है। क्यों ठीक नहीं है ? क्योंकि दग्ध और छेदन किये जाते हुए वृक्ष के समान उपलब्धा को उपलब्ध होनेवाले उसकी उपलब्धि के कर्मभूत शरीर में ही दाह और छेदन की वेदना, उपलब्ध होने के कारण वह वेदना उन दाहादि के समान आश्रयवाली ही है। क्योंकि जहाँ दाह या छेदन किया जाता है, वहीं पर लोग उस दाहादि की वेदना का व्यपदेश (उल्लेख) किया करते हैं। दाहादि की उपलब्धि करनेवाले में नहीं। किस प्रकार ? (सो सुनो)—जब किसी से यह पूछा जाता है कि तुम्हारे कहाँ पर वेदना है ? तो ‘मेरे शिर में वेदना है अथवा हृदय में या पेट में वेदना है', इसी प्रकार जहाँ दाहादि होता है, वहीं उसकी वेदना भी वह बताता है, उस वेदना के उपलब्ध करनेवाले को नहीं बतलाता । यदि वह वेदना अथवा उसका निमित्त दाहच्छेदनादि, उपलब्धा में होता तो दाहादि के आश्रय के समान उसकी वेदना के आश्रयरूप से उसी का व्यपदेश करता। तात्पर्य यह है कि आक्षेप करनेवाले शिष्य के द्वारा उपस्थित किए गए अनुमान प्रयोग में गुरु, हेत्वसिद्धि दिखा रहे हैं। अनुमान में ‘जीवपरमात्मानौ' के द्वारा क्या उपाधिभेदविशिष्ट वस्तु का यथाप्रतिपत्ति निर्देश कर रहे हो, अथवा चैतन्यमात्राकार का निर्देश कर रहे हो ? प्रथम पक्ष में आकाशभेद के समान औपाधिक भेद वास्तविक ही १. (छां. उ. ८।१।५ )

  • प्रतिपद्येयम् ०—पाठान्तरम् ।

होने से बाध और व्यभिचार हैं। और भेदमात्र का साधन यदि कर रहे हो तो सिद्धसाधन है, इस अभिप्राय से द्वितीय पक्ष में असिद्धि है ॥ ३४ ॥

स्वयं च नोपलभ्येत चक्षुर्गतरूपवत् । तस्माद्दाहच्छेदादिसमाना श्रयत्वेनोपलभ्यमानत्वाद्दाहादि- वत्कर्मभूतैव वेदना । भावरूपत्वाच्च साश्रया तण्डुलपाकवत् । वेदनासमाना श्रय एव तत्संस्कारः स्मृति- समानकाल एवोपलभ्यमानत्वात्, वेदनाविषयः तन्निमित्तविषयश्च द्वेषोऽपि संस्कारसमाना श्रय एव । तथा चोक्तम्—

"रूपसंस्कारतुल्याधी रागद्वेषौ भयं च यत्। गृह्यते धीश्रयं तस्माज्ज्ञाता शुद्धोऽभयः सदा" ॥३५॥

हृदयस्पर्शिनी

स्वयं मिति—अन्य युक्ति भी बताते हैं—जैसे चक्षुगतरूप चक्षु के द्वारा ग्रहण नहीं किया जाता, वैसे ही आत्मगत वेदना का ग्रहण भी आत्मा के द्वारा नहीं होगा, अन्यथा कर्म-कर्तृ विरोध होगा। दाह, छेदन और वेदना ये तीनों समानाश्रय हैं, ऐसा अनुभव होने से दाहादि के तुल्य उनकी वेदना भी, वेत्ता या अनुभविता की कर्मभूत ही माननी होगी। तथा वह वेदना, कार्यरूप होने से तण्डुलपाक के समान साश्रय (आश्रययुक्त) भी है। और उसके संस्कार भी वेदना के समानाश्रय ही हैं। क्योंकि उसकी उपलब्धि वेदना के समान काल (जाग्रत्-स्वप्न) में ही होती है। सुषुप्ति में नहीं होती, क्योंकि उस समय वेदना का भी अभाव रहता है। अतः संस्कार, वेदना से साथ ही रहनेवाले हैं। उस वेदना के निमित्तभूत दाहादि के प्रति जो द्वेष है, वह भी संस्कारों के समानाश्रय ही है। ऐसा कहा भी है—"नील-पीतादि रूप और उनके संस्कार और तदनुकूल जो बुद्धि, राग, द्वेष और भय हैं, वे बुद्धि के ही आश्रित दिखाई देते हैं। अतः उनका ज्ञाता (आत्मा) तो सर्वदा शुद्ध और अभयरूप है१"। अभिप्राय यह है कि आत्मा वेदनाश्रय नहीं हो सकता। यहाँ पर शंका यह की जा सकती है कि वेदना का अर्थ तो 'दुःख' है, दुःख का जड़ देह में होना तो संभव नहीं है, क्योंकि सुख- दुःखादि धर्मों में चेतनाश्रयता रहती है, यह नियम है। यदि पुनः चेतन होता हुआ भी आत्मा, वेदनाश्रय न कहा जाय तो शरीर भी अचेतन है, वह भी वेदनाश्रय नहीं होगा। बौद्धों की तरह वेदना को निराश्रय (अनाश्रय) ही माना जाय, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि वह कार्यरूप है। अतः कह सकते हैं कि 'वेदना साश्रया कार्यत्वात् तण्डुल- पाकवत्'। 'कार्यत्वात्' हेतु को अप्रयोजक भी नहीं कह सकते। क्योंकि यदि वेदना को निराश्रय कहें तो उसके नष्ट होने पर संस्कार का भी अभाव होने से कालान्तर में उसका स्मरण न हो सकेगा। अथवा 'वेदना समानाश्रय एव तत्संस्कारः' कहकर हेतुसिद्धि की आशंका का भी परिहार किया जा सकता है। अर्थात् वेदना कार्यरूप न हो तो उसका संस्कार और स्मृति दोनों का होना असंभव होगा, तब कालान्तर में 'मेरे पैर में वेदना हुई थी' इत्यादि व्यवहार नहीं हो पाएगा। अथवा वेदना के साश्रय पक्ष में यदि कोई यह शंका करे कि वेदना यदि साश्रय है, तो वह आत्माश्रय ही होगी, क्योंकि उसके संस्कार-स्मृति आदि की उपलब्धि, आत्मा में ही होगी। तो इस आशंका का उत्तर देने के लिए 'वेदना समानाश्रय एव तत्संस्कारः' कहा गया है। अर्थात् यत्स्था वेदना होती है, तत्स्थ ही उसके संस्कार आदि होते हैं, अर्थात् जिसमें वेदना स्थित हो, उसी में उससे उत्पन्न हुए संस्कारादि होते हैं। वेदना, तत्संस्कार, स्मृति ये सब एकाश्रय हुआ करते हैं, ऐसा नियम है। वेदना तो उपलब्धि के कर्म में स्थित है, अतः उपलब्धा जो आत्मा है, उसमें वेदना के संस्कार को नहीं माना जा सकता। इसलिए वेदनाजन्य संस्कार को वेदनासमाना श्रय ही मानना चाहिए। क्योंकि जाग्रत्, स्वप्नावस्थारूप स्मृतिकाल में ही उसकी उपलब्धि होती है, सुषुप्ति काल में नहीं। अनुमान प्रयोग इस प्रकार होगा—'वेदनादिः अनात्माश्रयः अनात्मप्रत्ययकाल एवोपलब्धिगोचरत्वात्, देहकार्यादिवत्' । वेदना आदि के अनात्माश्रय होने में एक और भी कारण है। उस वेदना का जो निमित्त दाहच्छेद आदि है, तद्विषयक द्वेष भी संस्कारतुल्याश्रय अर्थात् अनात्माश्रय ही होगा। निष्कर्ष यह है—देह के कट जाने पर अथवा जल जाने पर 'मैं कट

१. ( उप. स. पद्य प्र. १५।१३ )

शिष्यानुशासनप्रकरणम् २९३ गया, मैं जल गया' इस प्रकार अपने आत्मा को देह से अभिन्न माननेवाला व्यक्ति सन्तप्त (दुःखी) होता है। छेदन या दाह से होने वाली वेदना, उसके संस्कार, स्मृति, द्वेष आदि ये सब, देह से अभिन्न आत्मा में ही उपलब्ध होते हैं। देहाभिमानरहित अवस्था में ये सब नहीं हुआ करते । देह, उपलभ्यमान होने से उपलब्धि का कर्म है। वह उपलब्धि का आश्रय नहीं है। इस कारण संघातात्मक शरीर के ही ये वेदनादि हैं, असंहत साक्षी आत्मा के नहीं । आत्मा तो नित्य शुद्ध ही है। वृद्ध लोग भी इस तरह कहते हैं—रूपादि संस्कार और तज्जन्य रागादि सब कुछ बुद्ध्याश्रित ही उपलब्ध होते हैं, अपने साक्षी के आश्रित नहीं होते । अतः ज्ञाता (आत्मा) सर्वदा शुद्ध (राग-द्वेष से रहित), अभय (संसार रहित) है ।। ३५ ।। किमाश्रयाः पुनारूपसंस्कारादय इति ? उच्यते—यत्र कामादयः । क्व पुनस्ते कामादयः ? “कामः संकल्पो विचिकित्सा” इत्यादिश्रुतेर्बुद्धावेव । तत्रैव रूपादिंसंस्कारादयोऽपि, “कस्मिन्नु रूपाणि प्रतिष्ठितानीति हृदये” इति श्रुतेः । “कामा येऽस्य हृदि श्रिताः”, “तीर्णो हि तदा सर्वान्शोकान् हृदयस्य”, “असङ्गो ह्ययम्”, “तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दाः” इत्यादिश्रुतिशतेभ्यः; “अविकार्योऽयमुच्यते”, “अनादित्वान्निर्गुणत्वात्” इत्यादिभ्यः—इच्छाद्वेषादि च क्षेत्रस्यैव विषयस्य धर्मः, नात्मन इति— स्मृतिभ्यश्च कर्मस्थैवाशुद्धिः नात्मस्थेति ।।३६।। हृदयस्पशिनी किमाश्रया इति—यद्यपि वेदनादिकों का अनात्मधर्मत्व, युक्ति से तथा वृद्धसम्मति से उपपादन कर चुके हैं तथापि पुनः प्रश्नपूर्वक श्रुति के द्वारा प्रतिपादन करते हुए उसके आश्रयविशेष का निर्धारण करते हैं। रूप आदि के संस्कार ( सूक्ष्मावस्था ) आदि का आश्रय कौन है ? इस प्रकार प्रश्न करने पर उत्तर देते हैं कि 'जहाँ कामादि रहते हैं, वहीं उनके संस्कारादि भी रहते हैं। और वे कामादि कहाँ रहते हैं ? तो बताया कि "काम, संकल्प, विचिकित्सा' ( संशय )" आदि श्रुति के अनुसार बुद्धि में ही रहते हैं, और वहीं पर रूपादि संस्कार भी रहते हैं। रूप किसमें प्रतिष्ठित है ? तो बताया 'हृदय'² में । इस श्रुति के अनुसार रूपादि के संस्कार भी वहीं रहते हैं। “इसके हृदय में जो कामनाएँ आश्रित हैं",३ "जबकि यह हृदय के समस्त शोकों से पार हो जाता है",४ यह ( आत्मा ) असंग है,' " इसका यह आत्मा कामादि दोषों से रहित है"६ इत्यादि सैकड़ों श्रुतियों तथा "वह अविकार्य कहा जाता है", "अनादि और निर्गुण होने के कारण"८ इत्यादि स्मृतियों से भी यही सिद्ध होता है। और इच्छा और द्वेषादि तो विषयरूप क्षेत्र के ही धर्म है, आत्मा के नहीं। अतः स्मृतियों के अनुसार यह अशुद्धि, कर्म ( विषयभूत अनात्मा ) में ही है, आत्मा में नहीं है ।। ३६ ।। अतो रूपादिंसंस्काराद्यशुद्धिसम्बन्धाभावान्न परस्मादात्मनो विलक्षणस्त्वमिति प्रत्यक्षादि- विरोधाभावाद्युक्तं पर एवात्माऽहमिति प्रतिपत्तुम्, “तदात्मानमेवावेत् अहं ब्रह्मास्मीति”, एकधैवानु- द्रष्टव्यम्”, “अहमेवाधस्तात्”, “आत्मैवाधस्तात्”, “सर्वमात्मानं पश्येत्”, “यत्र त्वस्य सर्वमात्मैव”, १. ( बृ. उ. १।५।३, मै. उ. ६।३० ) २. ( बृ. उ. ३।९।२० ) ३. ( बृ. उ. ४।४।७, कठ उ. ६।१४ ) ४. ( बृ. उ. ४।३।२२ ) ५. ( बृ. उ. ४।३।१५ ) ६. ( बृ. उ. ४।३।२१ ) ७. ( भ. गी. २।२५ ) ८. ( भ. गी. १३।३१ ) ९. “इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः । एतत् क्षेत्रं समासेन सविकार मुदाहृतम् ॥”—( भ. गी. १३।६ )

२९४ उपदेशसाहस्री “इदं सर्वं यदयमात्मा”, “स एषोऽकलः”, अनन्तरोऽबाह्यः “अनन्तरमबाह्यम्”, “स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः”, ब्रह्मैवेदम् “एतया द्वारा प्रापद्यत”, “प्रज्ञानस्य नामधेयानि”, “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”, “तस्माद्वा एतस्मात्”, “तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्”, “एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी”, “अशरीरं शरीरेषु”, “न जायते म्रियते वा विपश्चित्”, “स्वप्नान्तं जागरितान्तम्”, “स म आत्मेति विद्यात्”, “यस्तु सर्वाणि भूतानि”, “तदेजति तन्नैजति”, “वेनस्तत्पश्यन्”, “तदेवाग्निः”, “अहं मनुरभवं सूर्य्यश्च”, “अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानाम्”, “सदेव सोम्य”, “तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि”, इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥३७॥ हृदयस्पर्शिनी अत इति—अतः रूपादि संस्कारादि अशुद्धि का संबंध न होने से प्रत्यक्षादि प्रमाण से कोई विरोध भी नहीं है। अतः 'तू परमात्मा से भिन्न नहीं है' इस प्रकार तुझे समझना चाहिये। 'मैं परमात्मा ही हूँ' यही समझना उचित है। 'उसने आत्मा को ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ'१, “एक रूप से ही देखना चाहिये”२, “मैं ही नीचे हूँ ३ आत्मा ही नीचे है”४, “सबको आत्मस्वरूप देखे”५, “जिस अवस्था में इसे सब कुछ आत्मा ही हो जाता है”६, “यह जो कुछ है, आत्मा ही है”७, “वह यह आत्मा निष्कल है”८, “यह न अन्तर है न बाह्य है”९, “वह बाहर भीतर विद्यमान एवं अजन्मा है”१०, “यह ब्रह्म ही है”११, “इसी के द्वारा प्रविष्ट हुआ”१२, “प्रज्ञान के ही नाम है”१३, “ब्रह्म सत्य ज्ञान और अनन्तरूप है”१४ “उस इस आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ”१५, “उसे रचकर उसी में अनुप्रविष्ट हो गया”१६, “समस्त भूतों में एक सर्वव्यापी देव छिपा हुआ है”१७, “वह शरीरों में अशरीरी है”१८, “वह न उत्पन्न होता है, न मरता है”१९, “जो स्वप्न और जाग्रत् दोनों अवस्थाओं के पदार्थ को देखता है”२०, “वह मेरा आत्मा है, ऐसा जाने”२१, “जो समस्त भूतों को अपने में देखता है”२२, “वह गमन करता है और नहीं भी करता है”२३, “ज्ञानियों ने उसे देखा है”२४, “वही अग्नि है”२५, “मैं मनु हुआ और मैं सूर्य भी हुआ”२६, “वह जीवों के भीतर प्रविष्ट हुआ, जीवों का शासन करनेवाला है”२७, “हे सोम्य ! पहले सत् ही था”२८, “वह सत्य है, वह आत्मा है, और वही तू है”२९—इत्यादि श्रुतियों से भी यही सिद्ध होता है। इस अनुच्छेद के द्वारा यह बताया गया है कि रूपादि संस्कारादि अशुद्धि का संबंध न होने के कारण ही प्रत्यक्षादि विरोध भी नहीं है। अतः तू परमात्मा से भिन्न नहीं है। इसलिये तू परमात्मा ही है। ब्रह्म को आत्मा से अभिन्न ही समझो ॥ ३७ ॥ १. ( बृ. उ. १।४।१० ) २. ( बृ. उ. ४।४।२० ) ३. ( छा. उ. ७।२५।१ ) ४. ( छा. उ. ७।२५।२ ) ५. ( बृ. उ. ४।४।२३ ) ६. ( बृ. उ. ४।५।१५ ) ७. ( बृ. उ. २।४।६, ४।५।७ ) ८. ( प्र. उ. ६।५ ) ९. ( बृ. उ. २।५।१९, ३।८।८ ) १०. ( मुं. उ. २।१।२ ) ११. ( मुं. उ. २।२।११ ) १२. ( ऐ. उ. ३।१२ ) १३. ( ऐ. उ. ५।२ ) १४. ( तै. उ. २।१ ) १५. ( तै. उ. २।१ ) १६. ( तै. उ. २।६ ) १७. ( श्वे. उ. ६।११ ) १८. ( कठ उ. २।२२ ) १९. ( कठ उ. २।१८ ) २०. ( कठ. उ. ४।४ ) २१. ( कौ. उ. ३।८ ) २२. ( ई. उ. ५, ६ ) २३. ( महाना. उ. २।३ ) २४. ( महाना. उ. १।७ ) २५. ( बृ. उ. १।४।१० ) २६. ( बृ. उ. १।४।१० ) २७. ( तै. आ. ३।११ ) २८. ( छां. उ. ६।२।१ ) २९. ( छां. उ. ६।८।७ )

शिष्यानुशासनप्रकरणम् २९५ स्मृतिभ्यश्च 'पूर प्राणिनः सर्व एव गुहाशयस्य'१, 'आत्मैव देवताः'२, 'नवद्वारे पुरे'३, 'समं सर्वेषु भूतेषु'४, 'विद्याविनयसंपन्ने'५, 'अविभक्तं विभक्तेषु'६, 'वासुदेवः सर्वम्'७ इत्यादिभ्य एक एवात्मा परं ब्रह्म सर्वसंसारधर्मविनिर्मुक्तस्त्वमिति सिद्धम् ॥३८॥ हृदयस्पर्शिनो स्मृतिभ्यश्चेति — उपर्युक्त श्रुत्युक्त अर्थ का समर्थन स्मृतियों ने भी किया है। “समस्त प्राणिवर्ग एक बुद्धि स्थित आत्मा के ही शरीर हैं”१, “समस्त देवता आत्मा ही है”२, “नवद्वार के पुर में देही रहता है”३, “सम्पूर्ण भूतों में समानरूप से विद्यमान”४, “विद्या-विनय सम्पन्न ब्राह्मण में”५, “भिन्न-भिन्न प्राणियों में अभिन्नरूप से स्थित”६, “सभी वासुदेव हैं”७—इत्यादि स्मृतिवाक्यों से भी तू समस्त सांसारिक धर्मों से रहित परब्रह्मस्वरूप एक आत्मा ही है, यह स्पष्ट होता है। तात्पर्य यह है कि जितने भी प्राणी हैं, वे सब एक ही आत्मा (गुहाशय) के शरीर हैं। अतः प्रत्येक शरीर का आत्मा भिन्न नहीं हैं ॥ ३८ ॥ स यदि ब्रूयात्—यदि “भगवन् अनन्तरोऽबाह्यः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः”८ कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव, सैन्धवघनवदात्मा सर्वमूर्तिभेदवर्जित आकाशवदेकरसः, किमिदं दृश्यते, श्रूयते वा, साध्यं साधनं वा साधकश्चेति श्रुतिस्मृतिलोकप्रसिद्धं वादिशतविप्रतिपत्तिविषयमिति ॥३९॥ हृदयस्पर्शिनी स यदीति—यदि वह शिष्य पुनरपि यह कहे कि हे भगवन् ! यदि अन्तर-बाह्य से रहित, बाहर-भीतर विद्यमान एवं अजन्मा तथा पूर्णतया प्रज्ञानघन ही सैन्धवघन के समान सम्पूर्ण मूर्त भेदों से रहित आकाश के समान एकरस आत्मा है, तो श्रुति-स्मृति और लोक में प्रसिद्ध तथा शतशः वादियों के विवाद का विषयभूत यह साध्य, साधन और साधकरूप भेद कैसा देखा-सुना जाता है ? अर्थात् ब्रह्मात्मैकत्व यद्यपि श्रुति-स्मृति और न्याय से सिद्ध किया गया है, तथापि लौकिक-वैदिक व्यवहार का उससे विरोध दिखाई देता है। लोकव्यवहार में गृह, क्षेत्र, कोश आदि 'साध्य', उसके प्राप्ति का साधन प्रतिग्रह- सेवा, विजय, युद्ध आदि, और उसके साधक —अधिवर्ग ब्राह्मणादि दिखाई देते हैं। उसी तरह वैदिक व्यवहार में स्वर्ग आदि—साध्य, उसका साधन—याग आदि, और उसके साधक—इच्छुक जन होते हैं। इस प्रकार ऐहलौकिक और पारलौकिक निर्दिष्ट त्रिक सुनाई पड़ते हैं ३९ ॥ आचार्यो ब्रूयात्—अविद्याकृतमेतद्यदिदं दृश्यते, श्रूयते वा, साध्यं साधनं साधकश्चेति । परमार्थतस्त्वेक एवात्मा अविद्यादृष्टेरेनेकवदवभासते*—तिमिरदृष्ट्याऽनेकचन्द्रवत् । “यत्र वा अन्यदिव स्यात्”९, “यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति”१०, “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति”१०, “अथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पम्...अथ यदल्पं तन्मर्त्यम्”११ इति, “वाचारम्भणं विकारो १. (आपस्तंबीयत अध्यात्म पटल-४) २. (मनु. १२।११९) ३. (भ. गी. ५।१३) ४. (भ. गी. १३।२७) ५. (भ. गी. ५।१८) ६. (भ. गी. १८।२०) ७. (भ. गी. ७।१९) ८. (बृ. उ. ४।३।३१) ९. (बृ. उ. २।४।१४, ४।५।१५) १०. (बृ. उ. ४।४।१९, कठ. उ. ४।१०) ११. (छां. उ. ७।२४।१)

  • दाभासते०—पाठान्तरम् ।

२९६ उपदेशसाहस्री नामधेयम् १”, “अनृतम् २”, “अन्योऽसावन्योऽहम् ३” इति भेददर्शननिन्दोपपत्तेरविद्याकृतं द्वैतम्—“एकमेवा- द्वितीयम् ४”, “यत्रत्वस्य ५”, “को मोहः कः शोकः ६” इत्याद्येकत्वविधिश्रुतिभ्यश्चेति ॥४०॥ हृदयस्पर्शिनी आचार्य इति—तब आचार्य को यह कहना चाहिए—'यह जो कुछ देखा या सुना जाता है, वह वस्तुतः अविद्याकृत है, वास्तव में एक ही आत्मा है। वह एक ही आत्मा, अविद्यामयी दृष्टिवाले लोगों को अनेक-सा प्रतीत होता है। जैसे—तिमिर रोग से पीड़ित मनुष्य को अनेक चन्द्र प्रतीत होते हैं। “जहाँ अन्य-सा होता है”, “वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है”, “और जहाँ कुछ अन्य देखता है, अन्य सुनता है अथवा अन्य जानता है, वह अल्प है, और जो अल्प है वह मरणधर्मा है”, “वाणी से आरंभ होनेवाला विकार नाममात्र है, मृत्तिका ही सत्य है”, वह अन्य है और मैं अन्य हूँ (जो ऐसा जानता है वह नहीं जानता)” इत्यादि भेद-दृष्टि की निन्दा उपपन्न होने के कारण भी 'द्वैत' अविद्याकृत ही है। तथा “एक ही अद्वितीय”, “जहाँ इसे (सब कुछ आत्मा ही हो गया)”, “वहाँ क्या मोह और क्या शोक” इत्यादि एकत्व का विधान करनेवाली श्रुतियों से भी यही सिद्ध होता है। तात्पर्य यह है कि व्यवहार तो अविद्या का विषय अर्थात् अविद्याजन्य है, इसलिए पारमार्थिक ब्रह्मात्मैक्य के मानने में कोई विरोध नहीं ॥ ४० ॥ यद्येवं, भगवन्, किमर्थं श्रुत्या साध्यसाधनादिभेद उच्यते, उत्पत्तिः प्रलयश्चेति ? ॥४१॥ हृदयस्पर्शिनी यद्येवमिति—शिष्य पूछता है कि हे भगवन् ! यदि ऐसा ही बात है तो साध्य-साधन आदि भेद का तथा उत्पत्ति और प्रलय का वर्णन श्रुति क्यों करती है ? उक्त प्रश्न का अभिप्राय यह है कि यदि साध्य-साधनभेद, अविद्या का विषय है, तो समस्त कर्मकाण्ड मिथ्यार्थगोचर होने के कारण उसे अप्रमाण कहना होगा। द्वैत को मिथ्या मानने पर केवल कर्मकाण्ड ही अप्रमाण नहीं कहलायेगा, अपितु ज्ञानकाण्ड में भी सृष्टि-प्रलयादि के वाक्य निर्विषय हो जायेंगे, उस कारण ज्ञानकाण्ड को भी अप्रमाण कहना पड़ेगा ॥ ४१ ॥ अत्रोच्यते—अविद्यावत उपात्तशरीरादिभेदस्येष्टानिष्टयोगिनमात्मानं मन्यमानस्य साधनै- रेवेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारोपायविवेकमजानत इष्टप्राप्तिं चानिष्टपरिहारं चेच्छतः शनैस्तद्विषयमज्ञानं *निवर्तयत् शास्त्रम्, न साध्यसाधनादिभेदं विधत्ते अनिष्टरूपः संसारो हि स इति। तद्भेददृष्टिमेवाविद्यां संसारमूल- मुन्मूलयति उत्पत्तिप्रलयादि एकत्वोपपत्तिप्रदर्शनेन ॥४२॥ हृदयस्पर्शिनी अत्रेति—वेदान्तवाक्य से उत्पन्न ब्रह्मात्म विज्ञान होने के पूर्व कर्मकाण्ड के अप्रामाण्य की शंका कर रहे हो, या ब्रह्मात्मैकत्वज्ञान के पश्चात् कर्मकाण्ड के अप्रामाण्य की शंका कर रहे हो ? प्रथम पक्ष में—आचार्य कहते हैं कि 'अप्राप्ते शास्त्रम् अर्थवत्' इस न्याय से, कर्तृ-साधन-फलभेदस्वरूप का ज्ञान तो शास्त्रज्ञान से रहित लोगों को भी रहता है, किन्तु उसमें वेद (श्रुति) का तात्पर्य नहीं होता, इसलिये यथाप्रसिद्ध भेद को लेकर ही पुरुष के लिये अविज्ञात पुरुषार्थसाधन का बोध करानेवाले शास्त्र के प्रति अप्रामाण्य की आशंका नहीं की जा सकती—इसी १. (छां. उ. ६।१।४-६, ६।४।१-४) २. (छां. उ. ७।२।१, ७।७।१, तै. उ. २।६ ) ३. (बृ. उ. १।४।१०) ४. (छां. उ. ६।२।१-२) ५. (बृ. उ. ४।५।१५) ६. (ई. उ. ७)

  • निवर्तयितुम—पाठान्तरम् ।

शिष्यानुशासनप्रकरणम् २१७ अभिप्राय को आचार्य बता रहे हैं। साधनों (उपायों) से ही इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट के परिहार की इच्छा रखने- वाले किन्तु उनके उपाय को न जानने वाले पुरुष का जो अज्ञान है, उसे शनैः शनैः दूर करने के लिये ही 'शास्त्र' है। वह साध्य-साधनादि भेद का विधान नहीं करता, क्योंकि वह तो अनिष्टरूप संसार ही है। अतः संसार के उत्पत्ति- प्रलयादि के द्वारा एकत्व की उपपत्ति प्रदर्शित कर वह उस भेददृष्टिरूप अविद्या (संसार) का ही उच्छेद करता है ॥ ४२ ॥

अविद्यायामुन्मूलितायां श्रुतिस्मृतियुक्तिभ्यः अनन्तरोऽबाह्यः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः सैन्धव- घनवत्प्रज्ञानघन एवैकरस आत्मा आकाशवत्परिपूर्ण *इत्येवैका प्रज्ञा प्रतिष्ठिता परमार्थदर्शिनो भवति, न साध्यसाधनोत्पत्तिप्रलयादिभेदेनाशुद्धिगन्धोऽप्युपपद्यते ॥४३॥

हृदयस्पर्शिनी अविद्यायामिति—इस रीति से श्रुति, स्मृति और युक्ति से अविद्या का समूल उन्मूलन (उच्छेद) हो जाने पर उस परमार्थदर्शी मुमुक्षु की एकनिष्ठ बुद्धि 'अन्तर-बाह्य शून्य है', 'बाहर-भीतर विद्यमान और अजन्मा है', 'सैन्धवघन के तुल्य है', 'आत्मा एक और प्रज्ञानघन ही है', 'आत्मा आकाश के समान परिपूर्ण है' इस, लक्ष्यपर ही स्थिर हो जाती है। फिर उसमें साध्य-साधन और उत्पत्ति-प्रलयादि भेद से अशुद्धि का गन्धमात्र भी होना असंभव है ॥ ४३ ॥

तच्चैतत्परमार्थदर्शनं प्रतिपत्तुमिच्छता वर्णाश्रमाद्यभिमानकृतपाङ्क्तरूपपुत्रवित्तलोकैषणादिभ्यो व्युत्थानं कर्तव्यं, सम्यक्प्रत्ययविरोधात्तदभिमानस्य । भेददर्शनप्रतिषेधार्थोपपत्तिश्चोपपद्यते । न ह्येकस्मिन्नात्मन्यसंसारित्वबुद्धौ शास्त्रन्यायोत्पादितायां तद्विपरीता बुद्धिर्भवति । न ह्यग्नौ शीतत्वबुद्धिः, शरीरे वाऽजरामरणबुद्धिः । तस्मादविद्याकार्यत्वात् सर्वकर्मणां तत्साधनानां च यज्ञोपवीतादीनां परमार्थ- दर्शननिष्ठेन त्यागः कर्तव्यः ॥४४॥

हृदयस्पर्शिनी तच्चैतदिति—इस परमार्थ दर्शन की प्राप्ति के अभिलाषी व्यक्ति को वर्णाश्रमादि के अभिमान से होने वाली पाङ्क्त रूप (पाँच प्रकार की) पुत्र, वित्त और लोकव्यवहार संबंधी एषणाओं से ऊपर उठना ही चाहिये। क्योंकि इनका अभिमान, सम्यक् ज्ञान का विरोधी है। इसलिये भेददर्शन का प्रतिषेधरूप जो अर्थ है, उसकी भी उपपत्ति उचित ही है। एक ही आत्मा में शास्त्र और युक्ति के द्वारा असंसारित्वबुद्धि उत्पन्न कर दिये जाने पर, पुनः उसमें उससे विपरीत बुद्धि नहीं हो सकती। जैसे अग्नि में शीतत्वबुद्धि अथवा शरीर में अजरामरबुद्धि कभी नहीं हो सकती। अतः सम्पूर्ण कर्म और उनके यज्ञोपवीतादि साधन अविद्या के कार्य होने से उनका त्याग ही करना उचित है। बृहदारण्यकोपनिषद् में पाङ्क्तोपासना का उल्लेख इस प्रकार किया गया है कि पहले एकमात्र आत्मा ही था। उसने इच्छा की कि मेरे पत्नी हो, फिर उसने पुत्र की कामना की, पश्चात् धन की इच्छा की और फिर कर्मा- नुष्ठान की कामना की। पुरुष जब तक इन विषयों को प्राप्त नहीं करता, तब तक वह यही समझता है कि अभी मुझे कुछ प्राप्त करना है, अभी मैं पूर्ण नहीं हूँ। 'पाङ्क्त' शब्द का अर्थ पाँच का समूह है। अतः यजमान, पत्नी, पुत्र, मानुष वित्त, और दैववित्त इन पाँच से निष्पन्न होनेवाले यज्ञादि को 'पाङ्क्त' कहते हैं। इहलोक पुत्र द्वारा प्राप्त होता है, पितृलोक मानुष वित्त से प्राप्त होता है और देवलोक दैववित्त से जीता जाता है। पाङ्क्त रूप से उपासना करने के लिये श्रुति ने मन को आत्मा

  • इत्यत्रैवैका०—पाठान्तरम् । ३८

२९८ उपदेशसाहस्री (जिसने कि आरंभ में इच्छा की थी) वाणी को स्त्री, प्राण को पुत्र, चक्षु को मानुषवित्त (गौ आदि) और श्रोत्र को दैव वित्त (विज्ञान) बतलाया है । 'एषणा' तीन प्रकार की होती है। (१) पुत्रैषणा, (२) वित्तैषणा, (३) लोकैषणा । इनमें मानुष और दैव भेद से वित्त दो प्रकार का है और उनसे प्राप्त होनेवाले लोक-इहलोक, पितृलोक, और देवलोक भेद से तीन प्रकार के हैं। मुमुक्षु को इन सभी का त्याग करना चाहिये । ये सब यजमानादि के द्वारा साध्य यज्ञादि कर्म से प्राप्त होते हैं। इसलिये इन्हें 'पाङ्क्त' कहा है ।। ४४ ।। ॥ इति प्रथमं शिष्यानुशासनप्रकरणं समाप्तम् ॥

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कूटस्थाऽद्वयात्मबोधप्रकरणम् सुखमासीनं ब्राह्मणं ब्रह्मनिष्ठं कश्चिद्ब्रह्मचारी *जन्मरमरणलक्षणात् संसारात्निर्विण्णो मुमुक्षुः विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ—भगवन्, कथमहं संसारान्मोक्षिष्ये† शरीरेन्द्रियविषयवेदनावाञ् जागरिते दुःख- मनुभवामि, तथा स्वप्नेऽनुभवामि, पुनः पुनः सुषुप्तिप्रतिपत्त्या विश्रम्य विश्रम्य जाग्रत्स्वप्नयोर्दुःखमनु- भवामि—किमयमेश मम स्वभावः ? किंवाऽन्यस्वभावस्य सतो नैमित्तिकः ? इति । यदि अयमेव स्वभावः, न मे मोक्षाशा; स्वभावस्यावर्जनीयत्वात् । अथ नैमित्तिकः, निमित्तपरिहारे स्यान्मो- क्षोपपत्तिः ॥४५॥ हृदयस्पर्शिनी सुखमासीनमिति—पूर्व प्रकरण में गुरु ने शिष्य को बताया कि तू इन स्थूल और सूक्ष्म दोनों देहों के अभिमान का त्याग करके अपने को ब्रह्मरूप समझ । ब्रह्मस्वरूप के विपरीत जो कुछ भी है, वह सब अविद्याकृत है । अब अब्रह्मस्वरूप की अविद्यात्मकता और आत्मा कूटस्थ होने के कारण उसकी स्वतःसिद्ध ब्रह्मरूपता का उपपादन करने के लिये प्रकरणान्तर का आरंभ करनेवाले ग्रन्थकार संन्यास ग्रहण किये हुए मुमुक्षु के लिये विधि के द्वारा वेदान्तवाक्यश्रवण की सूचना देते हुए शिष्य के प्रश्न को उपस्थित कर रहे हैं । एक समय सुखपूर्वक बैठे हुए एक ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण के समीप जन्म-मरणरूप संसार से विरक्त हुआ कोई मोक्षेच्छु ब्रह्मचारी (ब्रह्मविचारतत्पर) यथा- विधि प्राप्त होकर पूछने लगा, कि हे भगवन् ! शरीर, इन्द्रिय और विषय से उत्पन्न होनेवाली वेदना से ग्रस्त (पीड़ित) हुआ मैं, इस संसार से किस प्रकार मुक्त हो सकूँगा ? ग्रन्थकार ने 'ब्राह्मण' शब्द का प्रयोग किया है, उससे यह स्पष्ट है कि आपातकाल को छोड़कर अन्य समय में ब्राह्मणेतर वर्ण (अब्राह्मण) से उपदेश ग्रहण न करे । गुरु के साथ 'ब्रह्मनिष्ठ' विशेषण को जोड़कर यह सूचित किया है कि उसी गुरु में शिष्य प्रतिबोधन का सामर्थ्य होता है, अन्य किसी में वह सामर्थ्य नहीं होता । 'कश्चित्' शब्द से पूर्वोक्त गुणगणों से युक्त, सुपरीक्षित शिष्य बताया गया है । 'कश्चित्' कहकर उपदेश ग्रहण के समय उसकी एकाकिता को सूचित किया है । 'ब्रह्मचारी' उसे कहते हैं, जो प्रत्यक्- तत्त्वरूप ब्रह्म में विचरण करता रहता है—'ब्रह्माणि प्रत्यक्तत्त्वे चरितुं विचरितुं शीलमस्यास्तीति ब्रह्मचारी ।' 'ब्रह्मचारी' कहकर 'नित्याऽनित्यवस्तुविवेक' को प्रदर्शित किया है । मैं सुषुप्ति के प्राप्त होते रहने से बीच-बीच में विश्राम लेता हुआ जाग्रत् में और स्वप्नावस्था में पुनः-पुनः दुःख का अनुभव करता रहता हूँ । क्या यही मेरा स्वभाव है ? अथवा मेरा कोई अन्य स्वभाव होता हुआ भी मुझे वह निमित्तवश प्राप्त हुआ है ? यदि वह मेरा स्वभाव ही है, तब तो उससे मेरे छुटकारे की कोई आशा नहीं है । क्योंकि स्वभाव की निवृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि स्वभाव की निवृत्ति से तो वस्तु की ही निवृत्ति हो जाती है । जैसे उष्णता (अग्नि का स्वभाव) की निवृत्ति होने से अग्नि की भी निवृत्ति हो जाती है । कहते भी हैं कि 'स्वभावो मूर्ध्नि वर्तते' । यदि केवल निमित्तवश (नैमित्तिक) वह प्राप्त हुआ है, तो उस निमित्त की निवृत्ति होने पर उस दुःख से छुटकारा मिलना संभव हो सकता है । 'भगवन्' से लेकर 'नैमित्तिक' तक शिष्य ने प्रश्न किया है । उसमें 'संसारमोक्षविषयक' एक प्रश्न है, और दूसरा प्रश्न—दुःखा- नुभव के आत्मस्वभावत्व विषयक है । प्रथम प्रश्न के करने में निमित्त है—'शरीर-इन्द्रिय विषयनिमित्त वेदनानुभव को ही संसार कहते हैं, तद्वान् होता हुआ मैं इस संसार से कैसे मोक्ष पा सकूँगा ?' और द्वितीय प्रश्न के करने में निमित्त है—'जागरित में दुःख का अनुभव करता हूँ । पुनः पुनः सुषुप्ति की प्राप्ति से बीच-बीच में विश्राम पाकर जाग्रत्-स्वप्न में दुःख का अनुभव होने से और सुषुप्ति में तत्तद् दुःखों का आत्मा में अनुभव न होने से शिष्य के मन में संशय उत्पन्न हुआ है । गुरु के समीप मुमुक्षु शिष्य की उपसत्ति यथाविधि बताई गई है । क्योंकि मुण्डक श्रुति कह रही है—'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्सम्त्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्' ॥ ४५ ॥ १. (मुं. उ. १।२।१२)

  • जन्म-जरा-मरण—पाठान्तरम् । † रान्मोक्ष्ये—पाठान्तरम् ।

३०० उपदेशसाहस्री तं गुरुहवाच—शृणु वत्स; न तवायं स्वभावः किंतु नैमित्तिकः ।।४६।। हृदयस्पर्शिनी तमिति—दुःखानुभव करना आत्मा का स्वभाव नहीं है—इस अस्वभाव पक्ष का अवलम्बन करके गुरु उत्तर देते हैं कि हे शिष्य ! तू भय मत कर। सुनो, यह तुम्हारा स्वभाव नहीं है, किन्तु वह तो तुम्हें निमित्तवश प्राप्त हुआ है ।। ४६ ।। इत्युक्तः शिष्य उवाच—किं निमित्तम् ? किं वा तस्य निवर्तकम् ? को वा मम स्वभावः ? यस्मिन्निमित्ते निर्वर्तिते नैमित्तिकाभावः रोगनिमित्तनिवृत्ताविव रोगी स्वभावं *प्रतिपद्येयेति ।।४७।। हृदयस्पर्शिनी इत्युक्त इति—गुरु के द्वारा आश्वासन प्राप्त किया हुआ शिष्य बोला कि निमित्त की निवृत्ति हुए बिना नैमित्तिक की आत्यन्तिक निवृत्ति होना संभव नहीं है, क्योंकि जब तक उसके स्वरूप का ज्ञान न हो, तब तक उसका परिहार नहीं हो सकता। इस कारण शिष्य पूछ रहा है कि वह निमित्त क्या है ? और उसका निवर्तक कौन है ? और मेरा स्वभाव क्या है ? तथा जिस निमित्त के निवृत्त होने पर इस नैमित्तिक दुःख का अभाव (निवृत्ति) हो जायगा। जैसे रोगी, रोग के निमित्त की निवृत्ति होने पर स्वास्थ्यलाभ करता है, वैसे ही दुःख के निमित्त की निवृत्ति होने पर जिस स्वभाव को मैं प्राप्त होऊँगा, वह मेरा स्वभाव क्या है ? ।। ४७ ।। गुरुरुवाच—अविद्या निमित्तं; विद्या †तस्या निवर्तिका । अविद्यायां निवृत्तायां तन्निमित्ता- भावान्मोक्ष्यसे जन्ममरणलक्षणात्संसारात्, स्वप्नजाग्रद्दुःखं च नानुभविष्यसीति ।।४८।। हृदयस्पर्शिनी गुरुहरिति—शिष्य के द्वारा पूछे गये प्रश्न के अनुसार उसके स्वरूप को बताने के लिये उत्तर दे रहे हैं। गुरु बोले—दुःखप्राप्ति के होने में निमित्त अविद्या है। उसकी निवृत्ति करानेवाली विद्या है। अविद्या के निवृत्त होने पर तन्निमित्तक (उसके कारण होनेवाले) संसार का अभाव हो जाने से तू जन्म-मरणरूप संसार से मुक्त हो जायेगा। तब स्वप्न और जाग्रत् अवस्था में उत्पन्न होनेवाले दुःखों का अनुभव नहीं कर पायेगा। अर्थात् स्वप्न-जागरित दुःख का आत्मधर्मत्वेन तुझे अनुभव नहीं होगा ।। ४८ ।। शिष्य उवाच—का ‡सा अविद्या ? किंविषया वा ? विद्या च काऽविद्यानिवर्तिका यया स्वभावं प्रतिपद्येय ? इति ।।४९।। हृदयस्पर्शिनी शिष्य इति—स्वरूपतः अवगत हुए पदार्थों के सम्बन्ध में अधिक विशेषज्ञान प्राप्त करने की इच्छा से शिष्य पूछ रहा है। शिष्य बोला—वह अविद्या क्या है ? और उसका विषय क्या है ? अर्थात् वह किसको विषय करती है। तथा वह विद्या क्या है ? जिसके द्वारा मैं अपने स्वभाव को प्राप्त कर सकूँगा। अर्थात् जाग्रदादि अवस्थाओं में भी दुःखानुभवहीन ऐसे आत्मतत्त्व को प्राप्त कर पाऊँगा ।। ४९ ।। गुरुहवाच—त्वं परमात्मानं सन्तमसंसारिणं संसार्यहमस्मीति विपरीतं प्रतिपद्यसे, अकर्तारं सन्तं कर्तेति, अभोक्तारं सन्तं भोक्तेति, विद्यमानं चाविद्यमानमिति— इयमविद्या ।।५०।। हृदयस्पर्शिनी गुरुहरिति—तुम्हारे स्वरूप की आवरणविपर्ययाध्यासलक्षण जो अविद्या है, वह तुम्हारी स्वरूपाश्रयविषया है। अर्थात् कार्यद्वारा अविद्या को दिखाते हुए आत्मा ही उस अविद्या का विषय है। विद्या ही आत्मस्वभाव को बताती हुई उसकी निवर्तिका होती है। गुरु बोले—तुम असंसारी परमात्मा होते हुए अपने को 'मैं संसारी हूँ' ऐसा

  • प्रतिपद्यत, प्रतिपद्येयम् इति—पाठौ । † तस्य—पाठान्तरम् । ‡ साऽवविद्या—पाठान्तरम् ।

यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति दिया गया है:

कूटस्थाऽद्वयात्मबोधप्रकरणं ३०१ विपरीत समझ रहे हो। तथा अकर्ता होते हुए कर्ता, अभोक्ता होते हुए भोक्ता और विद्यमान होते हुए अविद्यमान मानते हो—यही अविद्या है॥५०॥ शिष्य उवाच—यद्यप्यहं विद्यमानः, तथाऽपि न परमात्मा, कर्तृत्वभोक्तृत्वलक्षणः संसारो मम स्वभावः, प्रत्यक्षादिभिः प्रमाणैरनुभूयमानत्वात्—नाविद्यानिमित्तः, अविद्यायाः स्वात्मविषयत्वा- नुपपत्तेः। अविद्या नामान्यस्मिन्नन्यधर्माध्यारोपणा—यथा प्रसिद्धं रजतं प्रसिद्धायां शुक्तिकायाम्, यथा प्रसिद्धं पुरुषं स्थाणावध्यारोपयति, प्रसिद्धं वा स्थाणुं पुरुषे, नाप्रसिद्धं प्रसिद्धे, प्रसिद्धं वा अप्रसिद्धे। न चात्मन्यनात्मानमध्यारोपयति, आत्मनोऽप्रसिद्धत्वात्; तथाऽऽत्मानमनात्मनि आत्मनोऽप्रसिद्धत्वादेव ॥५१॥ हृदयस्पर्शिनी शिष्य इति—शिष्य ने आत्मा की नित्यता तो स्वीकार कर ली, किन्तु उसके असंसारित्व पर पुनः आक्षेप किया है। अर्थात् अविद्या, मिथ्याज्ञान की कारणभूत है, यह कह चुके हैं। किन्तु शिष्य को यह शंका हो रही है कि मिथ्याज्ञान के अतिरिक्त अविद्या नाम की कोई वस्तु नहीं है। किन्तु संसार के उपादानकारण के रूप में मिथ्या- ज्ञानातिरिक्त अविद्या की सिद्धि हो जाती है। शिष्य बोला—यद्यपि मैं विद्यमान हूँ, तथापि परमात्मा तो नहीं हूँ। कर्तृत्व-भोक्तृत्वरूप संसार मेरा स्वभाव है, क्योंकि प्रत्यक्षादि प्रमाणों से ऐसा ही अनुभव होता है। अर्थात् 'मैं कर्ता हूँ' यह प्रतीति तो प्रत्यक्ष ही है। उसके अतिरिक्त धर्म होने के कारण 'कर्तृत्वादि' तो साश्रय ही होने चाहिये, जैसे रूपादि। उनका आश्रय पाषाणादि अचेतन पदार्थ नहीं हो सकते, क्योंकि उनमें सुख-दुःखादि योग देखने में नहीं आता। अतः वे चेतन के ही आश्रित होने चाहिये। तथाहि—'कर्तृत्व-भोक्तृत्वादिः साश्रयः धर्मत्वात्, रूपादिवत्, इति साश्रयत्वे सिद्धे न अचेतने सुखदुःखम्, पाषाणादौ तददर्शनात्। परिशेषात् चेतनाश्रयत्वसिद्धिः' यह अनुमान से भी सिद्ध हो रहा है। उसी तरह “गुणान्वयो यः फलकर्मकर्ता कृतस्य तस्यैव स चोपभोक्ता”१, “य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः२” इन श्वेताश्वतर और कठ इत्यादि आगमप्रमाणों से भी यही सिद्ध होता है। उपर्युक्त अनुभव, अविद्या के कारण नहीं हो सकता, क्योंकि अविद्या अपने आत्मा को ही विषय नहीं कर सकती। अन्य वस्तु में अन्य वस्तु के धर्मों का आरोप करना ही अविद्या है। जिस प्रकार प्रसिद्ध प्रत्यक्ष प्रमाणसिद्ध रजत का, प्रसिद्ध शुक्ति में, तथा प्रसिद्ध पुरुष का प्रसिद्ध स्थाणु में आरोप किया जाता है। प्रसिद्ध वस्तु में अप्रसिद्ध का तथा अप्रसिद्ध में प्रसिद्ध का आरोप नहीं होता। 'आत्मा' तो लोकप्रसिद्ध नहीं है। इसलिये उसमें कोई अनात्मा का आरोप नहीं कर सकता और न अनात्मा में ही आत्मा का आरोप हो सकता है, क्योंकि आत्मा अप्रसिद्ध है। यदि आत्मा प्रसिद्ध हो तो प्रकाशस्वरूप होने के कारण उसमें अनात्मधर्मों की प्रतीति नहीं हो सकती, और यदि अप्रसिद्ध हो तो उसका स्फुरण ही न होने के कारण उसमें अन्य धर्मों का आरोप कैसे किया जा सकता है? इस प्रकार आत्मा में किसी तरह भी अध्यास का होना संभव नहीं है, अतः कर्तृत्व-भोक्तृत्व तो आत्मा का स्वभाव ही है॥५१॥ तं गुरुरुवाच—न, व्यभिचारात् । न हि, वत्स, प्रसिद्धं प्रसिद्ध एवाध्यारोपयतीति नियन्तुं शक्यम् । आत्मन्यध्यारोपणदर्शनात् । गौरोऽहं, कृष्णोऽहमिति देहधर्मस्याहंप्रत्ययविषये आत्मनि, अहंप्रत्ययविषयस्य च आत्मनः देहेऽयमह मस्मीति ॥५२॥ हृदयस्पर्शिनी तमिति—अधिष्ठान और अध्यस्यमान दोनों पदार्थों की पृथक् प्रसिद्धि के बिना अध्यास का होना अनुपपन्न है, या केवल प्रसिद्धि के बिना? ऐसा विकल्प करने पर अन्तिम पक्ष तो उचित नहीं है, क्योंकि सिद्धिमात्र को तो स्वीकार किया गया है। इस अभिप्राय को ध्यान में रखकर आद्यपक्ष का निराकरण कर रहे हैं। शिष्य के किये हुए प्रश्न का उत्तर गुरु दे रहे हैं। उस शिष्य से गुरु ने कहा—तुमने जो ऊपर नियम का प्रदर्शन किया वह उचित १. (श्वे. उ. ५।७ ) २. (कठ उ. ५।८ )

  • याश्चात्म—पाठान्तरम् ।

३०२ उपदेशसाहस्री नहीं है, वैसा नियम नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसमें व्यभिचार दिखाई देता है। हे वत्स ! प्रसिद्ध वस्तु का प्रसिद्ध वस्तु में ही अध्यारोप करने का कोई नियम नहीं है। क्योंकि आत्मा में भी अध्यारोप होता देखा जाता है। 'मैं गौर हूँ, मैं कृष्ण (काला) हूँ' इस प्रकार देह (शरीर) के धर्मों का 'अहम्' प्रत्यय के विषयभूत 'आत्मा' में और 'यह मैं हूँ' इस प्रकार 'अहम्' प्रत्यय के विषयभूत आत्मा का देह में अध्यास होता देखा जाता है। देह और आत्मा की पृथक्- पृथक् प्रसिद्धि नहीं है। अतः वहाँ पर उक्त नियम का व्यभिचार है ॥ ५२ ॥ शिष्य आह—प्रसिद्ध एव तर्ह्यात्माऽहंप्रत्ययविषयतया, देहश्चायमिति । तत्रैवं सति, प्रसिद्ध- योरैव देहात्मनोरितरेतराध्यारोपणा* स्थाणुपुरुषयोः शुक्तिकारजतयोरिव । तत्र कं विशेषमाश्रित्य भगवतोक्तं प्रसिद्धयोरितरेतराध्यारोपणेति नियन्तुं न शक्यत इति ? ॥५३॥ हृदयस्पर्शिनी शिष्य इति—प्रसिद्ध स्थाणु और पुरुष का जैसे परस्पर अध्यास होता है, वैसे ही इन्द्रियविषयत्वेन और अहं-प्रत्ययविषयत्वेन प्रसिद्ध देह और आत्मा का भी परस्पराध्यास होता है। अतएव मनुष्य गौर-श्यामादि देह- धर्मों को आत्मा में और आत्मा के चेतनत्वादि धर्म को देह में समझता है। ऐसी स्थिति में भगवान् गुरुदेव ने किस विशेषता को लेकर यह कहा था कि 'प्रसिद्ध पदार्थों का ही एक-दूसरे में अध्यास होता है'—इस प्रकार का नियम नहीं किया जा सकता ॥ ५३ ॥ गुरुराह—शृणु, सत्यं प्रसिद्धौ देहात्मानौ । न तु स्थाणुपुरुषाविव विविक्तप्रत्ययविषयतया सर्वलोकप्रसिद्धौ । कथं तर्हि ? नित्यमेव निरन्तराविविक्तप्रत्ययविषयतया प्रसिद्धौ । न हि—अयं देहः, अयमात्मा—इति विविक्ताभ्यां प्रत्ययाभ्यां देहात्मानौ गृह्णाति यतः कश्चित् । अत एव हि मोमुह्यते लोक आत्माऽनात्मविषये—एवमात्मा, नैवमात्मेति इमं विशेषमाश्रित्य अवोचं नैवं नियन्तुं शक्यमिति ॥५४॥ हृदयस्पर्शिनी गुरुरिति—इसपर गुरु कहते हैं—देह और आत्मा दोनों प्रसिद्ध हैं, यह तुम्हारा कहना सत्य है। किन्तु वे सर्वलोकप्रसिद्ध रहने पर भी पुरुष के तुल्य अलग-अलग ज्ञान के विषयरूप से प्रसिद्ध नहीं हैं। तो उनकी प्रसिद्धि किस प्रकार से है ? देह और आत्मा तो हमेशा ही व्यवधानशून्य अपृथक् प्रतीति के विषयरूप से जाने जाते हैं, क्योंकि कोई भी व्यक्ति 'यह देह है' और 'यह आत्मा है' इस प्रकार अलग-अलग प्रतीतियों के द्वारा देह और आत्मा का ग्रहण नहीं करता। अतएव आत्मा और अनात्मा के विषय में 'आत्मा इस प्रकार का है, इस प्रकार का नहीं है' यह मोह होता है। इसी विशेषता को दृष्टि में रखकर मैंने कहा था कि ऐसा नियम नहीं किया जा सकता है। अतः मैंने तुम्हारे अभीप्सित नियम का जो व्यभिचार बताया, वह उचित ही है ॥ ५४ ॥ नन्वविद्याध्यारोपितं यत्र यत्, तदसत् तत्र दृष्टम्—यथा रजतं शुक्तिकायाम्, स्थाणौ पुरुषः, रज्जवां सर्पः, आकाशे तलमलिनत्वमित्यादि, तथा देहात्मनोरपि नित्यमेव निरन्तराऽविविक्तप्रत्य†येनेतरेत- राध्यारोपणा कृता स्यात्—तदितरेतरयोर्नित्यमेवासत्त्वं स्यात्—यथा शुक्तिकादिष्वविद्याध्यारोपितानां रजतादीनां नित्यमेवात्यन्तासत्त्वम्, तद्विपरीतानां च विपरीतेषु, तद्वद्देहात्मनोरविद्ययैवेतरेतराध्यारोपणा कृता स्यात्; तत्रैवं सति देहात्मनोरसत्त्वं प्रसज्येत—तच्चानिष्टम् बैनाशिकपक्षत्वात् । अथ तद्विपर्ययेण देह आत्मन्यविद्ययाध्यारोपितः, देहस्यात्मनि सति असत्त्वं प्रसज्येत, तच्चानिष्टम्, प्रत्यक्षादिविरोधात् । तस्माद्देहात्मानौ नाविद्ययेतरेतरस्मिन्नध्यारोपितौ । कथं तर्हि ? वंशस्तंभवन्नित्यसंयुक्तौ ॥५५॥

  • णात्—पाठान्तरम् । † त्ययतयेतरे—पाठान्तरम् ।

कूटस्थाऽद्वयात्मबोधप्रकरण ३०३ हृदयस्पर्शिनी नन्विति-इस पर शिष्य अपनी भ्रान्त धारणा के वशीभूत होने से मीमांसकादि के मत से पुनः शंका करता है कि जैसे वंश-स्तंभों (बाँस और खंभों) के परस्पर आधाराधेयभावात्मक संयोगविशेष से घर बनता है। और वह, लोगों के 'गृहम्' = यह घर है, इस प्रकार एकशब्दप्रत्यय का विषय होता है, उसी तरह देह और आत्मा के संयोग- विशेष से 'अहं मनुष्यः' = मैं मनुष्य हूँ, इस प्रकार सामानाधिकरण्य व्यवहार होता है, अतः वही आत्मा है। यदि आत्मा और अनात्मा दोनों ही अध्यास के विषय होते हों तो आत्मा की सत्ता ही उपपन्न नहीं हो सकेगी, क्योंकि अध्यस्त पदार्थ तो मिथ्या होता है। जो वस्तु जहाँ अविद्या से अध्यारोपित रहती है, उसे वहाँ असत् देखा गया है। जैसे शुक्ति (सीपी) आदि में रजत (चाँदी), स्थाणु में पुरुष, रज्जु (रस्सी) में साँप, आकाश में तलमालिन्य (नीलिमा, गंधर्वनगरादि) इस प्रकार व्याप्ति बताकर यदि देह और आत्मा का भी सर्वदा ही निरन्तर (व्यवधानशून्य) अभिन्न- प्रतीतिविषयत्वरूप एक दूसरे में अध्यारोप किया गया हो तो वह हमेशा ही उन दोनों की पारस्परिक असत्ता का ही हेतु होगा, इस प्रकार पक्षधर्मता को बता रहा है। अर्थात् व्याप्ति और पक्षधर्मता के सिद्ध होनेपर अनात्मा में आत्मा, और आत्मा में अनात्मा नित्य ही असत् कहा जायगा, क्योंकि वे नित्य ही इतरेतरत्र अध्यस्त हैं। जिस प्रकार शुक्ति आदि में अविद्या से अध्यारोपित रजतादि की सर्वदा ही आत्यन्तिक असत्ता है, तथा इसके विपरीत शुक्तिकादि की तद्विपरीत रजतादि में असत्ता है। इस रीति से प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण-इन तीन अवयवों को बताकर उपनय और निगमन को बता रहे हैं-उसी प्रकार यदि देह और आत्मा का भी अविद्या से ही एक-दूसरे में अध्यास हुआ है तो, उनकी ( देह और आत्मा की ) असत्ता का ही प्रसंग उपस्थित होता है। इस पर बौद्धमत के अनुसार यदि कोई सिद्ध- साध्यत्व की आशंका करे तो उसके निवारणार्थ ग्रन्थकार कह रहे हैं कि “तच्च अनिष्टम्, वैनाशिकपक्षत्वात्” अर्थात् यह आत्मा की असत्ता का पक्ष, वैनाशिक का (बौद्ध का) होने के कारण हमें इष्ट नहीं है। अतः सिद्धसाध्यत्व की आशंका करना उचित नहीं है। और यदि अन्यतराध्यास अर्थात् देह को ही आत्मा में अविद्या से आरोपित कहें तो आत्मा की सत्ता रहते हुए भी देह की असत्ता का प्रसंग उपस्थित होगा, किन्तु वह भी प्रत्यक्षादि प्रमाणों के विरुद्ध होने के कारण अभीष्ट नहीं है। अतः यह मानना होगा कि देह और आत्मा अविद्यावश एक-दूसरे में आरोपित नहीं हैं। तो वे कैसे हैं? ऐसी जिज्ञासा होने पर उन्हें बाँस और खंभे के समान नित्य संयुक्त समझना चाहिये ॥ ५५ ॥ न, अनित्यत्वपरार्थत्वप्रसङ्गात् । संहतत्वात् परार्थत्वमनित्यत्वं च वंशस्तम्भादिवदेव । किंच--यस्तु परैर्देहेन संहतः कल्पित आत्मा, स संहतत्वात्परार्थः । तेनाऽसंहतः परोऽन्यो नित्यः सिद्धस्तावत् ॥५६॥ हृदयस्पर्शिनी नेति-परिशेषात् इतरेतराध्यास को सिद्ध करने के लिये सिद्धान्ती उक्त सम्बन्ध का खण्डन कर रहा है। पूर्वपक्षी (शिष्य) का कथन उचित नहीं है, क्योंकि वैसा स्वीकार करने पर उनके अनित्य और परार्थत्व का प्रसंग उपस्थित होगा। परस्पर संहत (संयुक्त) होने के कारण वंश और स्तंभ के समान ही उनका परार्थत्व और अनित्यत्व मानना होगा। इस प्रकार अनित्यत्व मानने पर संघातवाद की प्राप्ति होगी, अर्थात् अनेक तत्त्वों से मिल कर आत्मा बना है, यह मानना होगा। और परार्थ मानने पर आत्मा को अचेतन स्वीकार करना पड़ेगा, क्योंकि जो वस्तु परार्थ होती है, वह परप्रकाश्य भी होती है। किञ्च अन्यमतावलंबी जिस आत्मा को देह से संहत कहते हैं, वह संहत होने के कारण परार्थ हो जाता है। अतः परार्थ (अनित्य) संघात रूप देह से भिन्न जो आत्मा है, वह दूसरा ही है और वह नित्य ही है, यह सिद्ध होता है। उसके अतिरिक्त सब अनित्य है। अनुमान का आकार यह होगा-‘विमतो देहः स्वविलक्षणशेषः संहतत्वात् गृहवत्' ।। ५६ ।। तस्यासंहतस्य देहे देहमात्रतयाऽध्यारोपितत्वेनासत्त्वाऽनित्यत्वादिदोषप्रङ्गो न भवति। ननु तत्र निरात्मको देह इति वैनाशिकपक्षप्राप्तिदोषः स्यात् ॥५७॥

३०४ उपदेशसाहस्री हृदयस्पशिंनी तस्येति—शिष्य कहता है कि संघातात्मक अचेतन से अन्य आत्मा है, यह जो आपने कहा वह ठीक है, किन्तु उसका यदि शरीरादि संहत पदार्थ के साथ कोई संबन्ध न हो तो 'मैं मनुष्य हूँ' यह व्यवहार नहीं बन सकेगा, अतः आत्मा में अध्यस्त देहादि के साथ उस आत्मा का तादात्म्य संबन्ध माना जाय । अर्थात् उस असंहत संघातसाक्षी आत्मा का अपने में अध्यस्त देह में देहरूप से अध्यास होता है। ऐसा मानने पर भी उसके (आत्मा के) असत्त्व, अनित्यत्वादि के दोष की आपत्ति होगी । तब 'अध्यस्त पदार्थ मिथ्या होता है'—इस नियम के अनुसार 'देह, आत्म- शून्य है' इस प्रकार वैनाशिक के 'शून्यवाद' पक्ष की प्राप्ति होगी ॥ ५७ ॥ न। स्वत एवात्मन आकाशस्येवासंहतत्वाभ्युपगमात्। सर्वेणासंहतः स चात्मेति न निरात्मको देहादिः सर्वः स्यात्। यथा चाकाशं सर्वेणासंहतमिति सर्वं न निराकाशं भवति, एवम्। तस्मान्न वैनाशिकपक्षप्राप्तिदोषः स्यात् ॥५८॥ हृदयस्पशिंनी नेति—गुरुदेव कहते हैं कि तुम्हारा कथन उचित नहीं है, क्योंकि आत्मा का असंहतत्व, आकाश के समान स्वाभाविक माना गया है। यह आत्मा सभी से असंहत है, ऐसा कहने पर देहादि समस्त पदार्थ निरात्मक भी सिद्ध नहीं होते । जैसे आकाश सबसे असंहत है, इसलिये सब वस्तु, आकाशहीन सिद्ध नहीं होती। इसलिये यहाँ वैनाशिक पक्ष की प्राप्ति का दोष उपस्थित नहीं होता। अभिप्राय यह है कि देहादि पदार्थ रूपादिमान् या सावयव होने के कारण यद्यपि घट-पटादि के समान जड़ हैं, तथापि अपने से विलक्षण चेतनरूप प्रतीत होते हैं। अतः तप्त लोहपिण्ड के समान उसका चेतन आत्मा से संश्लेष (संबंध) कहना चाहिये। तथा उस संघातसाक्षी, चिन्मात्रस्वभाव निरवयव आत्मा में आकाश के समान स्वतःपरिच्छेद एवं अशुद्धि आदि दोषों का संभव न होने के कारण देह के संश्लेष से ही देह में उसका प्रतिभास होता है। इस प्रकार एक दूसरे के धर्मों का संसर्ग होने से अनुभव के अनुसार ही उनका एक-दूसरे में अध्यास सिद्ध होता है। उसी कारण देह में चेतनत्व और आत्मा में गौरत्व, श्यामत्व आदि धर्मों की प्रतीति होती है। यहाँ यह भूलना न होगा कि निरधिष्ठान आरोप होता हुआ कभी किसी के नहीं देखा है। आरोप- ज्ञान के होने पर स्फुरण होने वाले दो पदार्थों में प्रतीयमान् वस्तु की प्रतीति अन्य वस्तु के उपराग के बिना स्वतंत्रता से कभी नहीं होती, अर्थात् वह तो स्वरूप से ही आरोपित हुआ करती है। जिस प्रकार आकाश से उपरक्त नीलिमा अथवा मरुभूमि से उपरक्त मृगजल की प्रतीति, आकाश और मरुभूमि के बिना कभी नहीं होती, अतः ये स्वरूप से ही अध्यस्त माने जाते हैं। किन्तु इनके विपरीत जिसका केवल संसर्गवश ही अन्य में आरोप होता है, उसे स्वरूप से आरोपित नहीं समझा जाता। जैसे शुक्ति में 'यह रजत है' ऐसा अध्यास होने पर रजत में शुक्ति के इदमंश का जो स्फुरण होता है, वह स्वरूपतः अध्यस्त नहीं है। उसी प्रकार आत्मा का भी सुषुप्ति आदि में देहादि के बिना ही स्वतः स्फुरण होता है। उस कारण वह स्वरूपतः देह में अध्यस्त नहीं है, क्योंकि देहादि का आत्मसत्ता के बिना स्वतः स्फुरण नहीं होता, इसलिये वे स्वरूपतः अध्यस्त हैं। अतः देहादि का निरात्मकत्व (आत्मशून्यत्व) भी सिद्ध नहीं होता, क्योंकि कोई भी अध्यस्त वस्तु बिना अधिष्ठान नहीं हुआ करती। इस कारण बौद्धाभिमत शून्यवाद को युक्तियुक्त नहीं कहा जा सकता। देह, चैतन्याभास से व्याप्त होने के कारण, उसमें चिद्धर्म के अध्यारोप के अधिष्ठान का उपचार किया जाता है। अतः परस्पराध्यास पक्ष में कोई दोष नहीं है। स्वतः असंहत के सर्वत्र सर्वदा विद्यमान रहने से संघात (शरीर) को निरात्मक भी नहीं कहा जा सकेगा। और न आत्मा को अनित्य ही कहना पड़ेगा। अतः कोई दोष नहीं है ॥ ५८ ॥ यत्पुनरुक्तम्--देहस्यात्मन्यसत्त्वे प्रत्यक्षादिविरोधः स्यादिति, तन्न प्रत्यक्षादिभिरात्मनि देहस्य सत्त्वानुपलब्धेः । न ह्यात्मनि--कुण्डे बदरम्, क्षीरे सर्पिः, तिले तैलम्, भित्तौ चित्रमिव च- प्रत्यक्षादिभिर्देह उपलभ्यते । तस्मान्न प्रत्यक्षादिविरोधः ॥५९॥

कूटस्थाऽद्वयात्मबोधप्रकरणम् ३०५ हृदयस्पर्शिनी यत्पुनरुक्तमिति—तुमने कहा है कि देहादि को आत्मा में अध्यस्त मानने पर उसकी असत्ता (अत्यन्ताभाव) होगी तो प्रत्यक्षादि प्रमाणों से विरोध होगा। किन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है। क्योंकि प्रत्यक्षादि प्रमाणों से आत्मा में देह की सत्ता नहीं देखी गई है। अर्थात् चक्षु से अथवा स्पर्श से देह का ग्रहण होने पर भी उनसे आत्मा का ग्रहण किसी को नहीं होता है। उस आत्मा का उनके द्वारा ग्रहण न हो सकने से 'तत्र इदम्' उसमें यह है, इस प्रकार ग्रहण अनुपपन्न है। "पराञ्चि खानि¹"—इस श्रुति के अनुसार आत्मा, इन्द्रिय का विषय नहीं है, अतः उसमें देह के सम्बन्ध का प्रत्यक्ष नहीं है। वह सम्बन्ध, प्रत्यक्ष का ही जब विषय नहीं बन पाता, तब वह अनुमानादि प्रमाणों का भी विषय नहीं बन पाता, यह अर्थात् सिद्ध हो जाता है, क्योंकि अनुमानादि प्रमाणों की प्रवृत्ति प्रत्यक्षमूलक ही हुआ करती है। गमले में ही बेर का पौधा, दूध में ही घी, तिल में ही तैल, और भित्ति में ही चित्र इत्यादि व्यतिरेक दृष्टान्तों को देकर उसकी (देह की) आत्मा में अनुपलब्धि को बताया गया है। पहला उदाहरण प्रत्यक्ष प्रमाण का है, दूसरा उदाहरण अनुमान का है, तीसरा उदाहरण अर्थापत्ति का है। गमले में बेरी के तुल्य देह और आत्मा एक देश (एक जगह) में संलग्न हुए नहीं उपलब्ध होते हैं। तथापि भित्ति और चित्र की भेदेन उपलब्धि न होने पर भी जैसे उनमें आधाराधेयभाव रहता है, वैसा ही आत्मा और देह में क्यों न मान लिया जाय, यह शंका हो सकती है। तथापि चित्रांकित भित्ति की उपलब्धि के समान देहाकारांकित आत्मा की उपलब्धि नहीं हुआ करती। यदि वैसी उपलब्धि हो तो 'मयि मनुष्यो देहोऽयमस्ति' मुझमें मनुष्यरूप यह देह है—ऐसा व्यवहार होता, 'मनुष्योऽहम्, स्थूलोऽहम्'-मैं मनुष्य हूँ, मैं स्थूल हूँ—यह व्यवहार न होता, किन्तु व्यवहार तो ऐसा ही होता है। अतः प्रत्यक्षादि प्रमाणों से आत्मा में देह नहीं देखा गया है। इस कारण प्रत्यक्षादि प्रमाणों से भी कोई विरोध नहीं है। अतः प्रत्यक्षादि प्रमाणों से आत्मा में देह की सत्ता नहीं है ॥ ५९ ॥ कथं तर्हि प्रत्यक्षाद्यप्रसिद्धात्मनि देहाध्यारोपणा*, देहे चात्मारोपणा* ? ॥६०॥ हृदयस्पर्शिनी कथमिति—इसपर पुनः शिष्य अपनी शंका प्रकट कर रहा है कि किसी भी विषय का सामान्यतः ग्रहण होने पर और विशेषतः ग्रहण न होने पर ही विषयान्तर का अध्यास होता देखा गया है। परन्तु आत्मा तो प्रत्यक्षादि प्रमाणों का अविषय है, ऐसी स्थिति में इसपर अनात्मा का अध्यारोप कैसे किया जा रहा है? तथा अनात्मापर आत्मा का आरोप कैसे किया जा रहा है ? ॥ ६० ॥ नायं दोषः, स्वभावप्रसिद्धत्वादात्मनः। नहि कादाचित्कसिद्धावेवाध्यारोपणा, न नित्यसिद्धौ- इति नियन्तुं शक्यम् आकाशे तलमलाद्यध्यारोपणदर्शनात् ॥६१॥ हृदयस्पर्शिनी नायमिति—शिष्य की आशंका को स्पष्ट करने के लिये तीन विकल्प किये जा सकते हैं। (१) क्या आत्मा का स्फुरण न होने से उसमें अध्यास का संभव नहीं हो सकता ? अथवा (२) विषयत्वेन स्फुरण न होने से अध्यास नहीं हो सकता ? किंवा (३) सामान्यांश का ग्रहण होने से किन्तु विशेष अंश का ग्रहण न हो पाने से अध्यास का संभव नहीं है ? इन तीन विकल्पों में से प्रथम विकल्प तो बन नहीं सकता, क्योंकि आत्मा तो स्वभाव से ही प्रसिद्ध है, अर्थात् स्वप्रकाश आत्मा का अपनी महिमा से ही सदा स्फुरण होता रहता है। दूसरा विकल्प भी ठीक नहीं है, क्योंकि यह कोई नियम नहीं है कि केवल कदाचित् अर्थात् कभी-कभी सिद्ध होनेवाली वस्तु में ही आरोप हुआ करता है, नित्यसिद्ध वस्तु में आरोप नहीं होता। क्योंकि अनैन्द्रियक आकाश में (आकाश के अप्रत्यक्ष होने पर) भी ऐन्द्रियक होने का भ्रम होता ही है, अर्थात् आकाश के प्रत्यक्ष होने का भ्रम होता ही है अर्थात् स्वतः स्फुरित होने वाला आत्मा स्वयं अविषय रहने पर भी उसमें विषयाध्यास का होना असंभव नहीं है। आकाश में तलमलिनता (नीलत्व) का अध्यारोप १. ( कठ उ. ४।१)

  • पर्णं—पणम्—पाठान्तरम् । ३९