वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)
Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary
भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा
म्यमपारिभूप्रसू-Wait! Look at L16:कुट्टलुण्टवृङः षाकन् ॥ १५५ ॥ प्रजोरिनिः ॥ १५६ ॥Then:जिदृक्षिक्विश्रीण्वमाम्यथ...wait, look at the glyphs:जिदृक्षि(जि-दृ-क्षि)क्वन्त्रीorक्विन्रीorक्विश्री? Let's check Panini 3.2.157: "जिदृक्षकॢशिक्रन्दिक्षीव्यथामव्यथामपरिभूप्रसूब्यश्च" or similar? Wait, Panini 3.2.157 is: "चिन्तिक्षिप्रक्रन्द्योः"? No, 3.2.157: "जिदृक्षकॢशिक्रन्दिक्षीव्यथामव्यथाम..." Let's look at the print in L16: जिदृक्षिक्विश्रीण्वमाम्यथाम्यमपारिभूप्रसू-`
Wait, let's read each letter:
जि (जि)
दृ (दृ)
क्षि (क्षि)
क्विन्री or क्विश्री or कॢशि?
Look at: क with something below, then वि or शि, then श्री, then ण्व or न्व, then मा, then म्य, then था, then म्य, then म, then पा, then रि, then भू, then प्र, then
( १६ ) अष्टाध्यायी- क्रियार्थायाम् ॥ १० ॥ भाववचनाश्च ॥ ११ ॥ अण् कर्मणि च ॥ १२ ॥ लुट् शेषे च ॥ ॥ १३ ॥ लुटः सद्वा ॥ १४ ॥ अनद्यतने लुट् ॥ १५ ॥ पदरुजविशस्पृशो घञ् ॥ १६ ॥ ॥ स्थिरे ॥ १७ ॥ भावे ॥ १८ ॥ अकर्तरि च कारके संज्ञायाम् ॥ १९ ॥ परिमाणाख्यायां सर्वेभ्यः ॥ २० ॥ १ ॥ इडश्च ॥ २१ ॥ उपसर्गे रुवः ॥ २२ ॥ समि युद्रुदुवः ॥ २३ ॥ श्रिणीभुवोऽनुपसर्गे ॥ २४ ॥ वौ क्षुश्रुवः ॥ २५ ॥ अवोदोर्नियः ॥ २६ ॥ प्रे द्रुस्तुस्रुवः ॥ २७ ॥ निरभ्योः पूल्वोः ॥ २८ ॥ उन्न्योर्ग्रः ॥ २९ ॥ कॄ धान्ये ॥ ३० ॥ यज्ञे समि स्तुवः ॥ ३१ ॥ प्रे ख्रोऽयज्ञे ॥ ३२ ॥ प्रथने वावशब्दे ॥ ३३ ॥ छन्दो नाम्नि च ॥ ३४ ॥ उदि ग्रहः ॥ ३५ ॥ समि मुष्टौ ॥ ३६ ॥ परिन्योर्नीण
An exact, line-by-line transcription of the page into Devanagari Markdown:
कृत्यल्युटो बहुलम् ॥ ११३ ॥ नपुंसके भावे क्तः ॥ ११४ ॥ ल्युट् च ॥ ११५ ॥ कर्मणि च येन संस्पर्शात्कर्त्तुः शरीरसुखम् ॥ ११६ ॥ करणाधिकरणयोश्च ॥ ११७ ॥ पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण ॥ ११८ ॥ गोचरसंचरवहम्रजव्यजापणनिगमाश्च ॥ ११९ ॥ अवे तृस्त्रोर्घञ् ॥ १२० ॥ ६ ॥ हलश्च ॥ १२१ ॥ अध्यायन्यायोद्यावसंहारौक्ष ॥ १२२ ॥ उदङ्कोऽनुदके ॥ १२३ ॥ जाल- मानायः ॥ १२४ ॥ खनो व च ॥ १२५ ॥ ईषद्दुःसुषु कृच्छ्राकृच्छ्रार्थेषु खल् ॥ १२६ ॥ कर्तृ- कर्मणोश्च भूकृञोः ॥ १२७ ॥ आतो युच् ॥ १२८ ॥ छन्दसि गत्यर्थेभ्यः ॥ १२९ ॥ अन्ये- भ्योऽपि दृश्यते ॥ १३० ॥ वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा ॥ १३१ ॥ आशंकायां भूतवच्च ॥ १३२ ॥ क्षिप्रवचने लृट् ॥ १३३ ॥ आशांसावचने लिङ् ॥
त्त्वैकेन्केन्यत्वनः ॥ १४ ॥ अवचक्षे च ॥ १५ ॥ भावलक्षणे ष्येङ्कृञ्वदिचरिहुतमिनिभ्य- स्तोसुन् ॥ १६ ॥ सृपितृदोः कसुन् ॥ १७ ॥ अलंखल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा ॥ १८ ॥ उदीचां माङो व्यतीहारे ॥ १९ ॥ परावरयोगे च ॥ २० ॥ १ ॥ समानकर्तृकयोः पूर्वकाले ॥ ॥ २१ ॥ आभीक्ष्ण्ये णमुल् च ॥ २२ ॥ न यद्यनाकांक्षे ॥ २३ ॥ विभाषाग्रेप्रथमपूर्वेषु ॥ ॥ २४ ॥ कर्मण्याक्रोशे कृञः खमुञ् ॥ २५ ॥ स्वादुमि णमुल् ॥ २६ ॥ अन्यथैवंकथमिथ्यं- सु सिद्धाप्रयोगश्चेत् ॥ २७ ॥ यथातथयोरसूयाप्रतिवचने ॥ २८ ॥ कर्मणि दृशिविदोः साकल्ये ॥ ॥ २९ ॥ यावति विन्दजीवोः ॥ ३० ॥ चर्मोदरयोः पूरेः ॥ ३१ ॥ वर्षप्रमाण ऊलोपश्चा- स्यादन्यतरस्याम् ॥ ३२ ॥ चेले क्नोपेः ॥ ३३ ॥ निर्मूलसमूलयोः कषः ॥ ३४ ॥ शुष्कचू- र्णरूक्षेषु पिषः ॥ ३५ ॥ समूलाकृतजीवेषु हन्कृञ्ग्रहः ॥ ३६ ॥ करणे हनः ॥ ३७ ॥ स्नेहने पिषः ॥ ३८ ॥ हस्ते वर्तिग्रहोः ॥ ३९ ॥ स्वे पुषः ॥ ४० ॥ २ ॥ अधिकरणे बन्धः ॥ ४१ ॥ संज्ञायाम् ॥ ४२ ॥ कर्त्तॄञ्जीवपुरुषयोर्नशिवहोः ॥ ४३ ॥ ऊर्ध्वे शुषिपूर्योः ॥ ४४ ॥ उपमाने कर्मणि च ॥ ४५ ॥ कषादिषु यथाविध्यनुप्रयोगः ॥ ४६ ॥ उपदंशस्तृ- तीयायाम् ॥ ४७ ॥ हिंसाथीनां च समानकर्मकाणाम् ॥ ४८ ॥ सप्तम्यां चोपपीडरुधकर्षः ॥ ॥ ४९ ॥ समासत्तौ ॥ ५० ॥ प्रमाणे च ॥ ५१ ॥ अपादाने परीप्सायाम् ॥ ५२ ॥ ॥ द्वितीयायां च ॥ ५३ ॥ स्वाङ्गेऽध्रुवे ॥ ५४ ॥ परिक्लिश्यमाने च ॥ ५५ ॥ विशिपतिप- दिस्कन्दां व्याप्यमानासेव्यमानयोः ॥ ५६ ॥ अस्यतितृषोः क्रियान्तरेकालेषु ॥ ५७ ॥ न्नाम्यादिशिग्रहोः ॥ ५८ ॥ अव्ययेऽयथाभिप्रेताख्याने कृञः क्त्वाणमुलौ ॥ ५९ ॥ तिर्यच्य- पवर्गे ॥ ६० ॥ ३ ॥ स्वाङ्गे तस्प्रत्यये कृभ्वोः ॥ ६१ ॥ नाधार्थप्रत्यये च्व्यर्थे ॥ ६२ ॥ तूष्णीमि भुवः ॥ ६३ ॥ अन्वच्यानुलोम्ये ॥ ६४ ॥ शकधृषज्ञाग्लाघटरभलभक्रमसहाहोर्हस्त्यर्थेषु तुमुन् ॥ ६५॥ पर्याप्तिवचनेष्वलमर्थेषु ॥ ६६॥ कर्तरि कृत् ॥६७॥ भव्यगेयप्रवचनीयोपस्थानीयज- न्याप्लाव्यपात्या वा ॥६८॥ लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः ॥६९॥ तयोरेव कृत्यक्तखलर्थाः॥७०॥ आदिकर्मणि क्तः कर्तरि च ॥ ७१ ॥ गत्यर्थाकर्मकश्लिषशीङ्स्थासवसजनरुहजीर्यतिभ्यश्च ॥ ॥ ७२ ॥ दाशगोघ्नौ संप्रदाने ॥ ७३ ॥ भीमादयोऽपादाने ॥ ७४ ॥ ताभ्यामन्यत्रोणादयः ॥ ॥ ७५ ॥ क्तोऽधिकरणे च ध्रौव्यगतिप्रत्यवसानार्थेभ्यः ॥ ७६ ॥ लस्य ॥ ७७ ॥ तिप्तस्झि- सिप्थस्थमिब्वस्मस्तातांझथासाथांध्वमिड्वहिमहिङ् ॥ ७८ ॥ टित आत्मनेपदानां टेरे ॥ ७९ ॥ थासः से ॥ ८० ॥ ४ ॥ लिटस्तझयोरेशिरेच् ॥ ८१ ॥ परस्मैपदानां णलतुसुस्थलथ
सूत्रपाठः । (१९) किदाशिषि ॥ १०४ ॥ झस्य रन् ॥ १०५ ॥ इटोऽत् ॥ १०६ ॥ सुट्तिथोः ॥ १०७ ॥ झेर्जुस् ॥ १०८ ॥ सिजभ्यस्तविदिभ्यश्च ॥ १०९ ॥ आतस् ॥ ११० ॥ लङः शाकटायन- स्यैव ॥ १११ ॥ द्विषश्च ॥ ११२ ॥ तिङ्शित्सार्वधातुकम् ॥ ११३ ॥ आर्धधातुकं शेषः ॥ ॥ ११४ ॥ लिट् च ॥ ११५ ॥ लिङाशिषि ॥ ११६ ॥ छन्दस्युभयथा ॥ ११७ ॥ १७ ॥ ( धातुसम्बन्धेसमानकर्तृकयोरधिकरणेस्वांगे लिटस्तत्स्थस्थमिपां सप्तदश ) ॥ इति तृतीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ ४ ॥ समाप्तश्चाध्यायस्तृतीयः ॥ ३ ॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः । ङ्याप्प्रातिपदिकात् ॥ १ ॥ स्वौजसमौट्छष्टाभ्याम्भिस्ङेभ्याम्भ्यस्ङसिभ्याम्भ्यस्ङसोसाम्ङ्यो- स्सुप् ॥ २॥ स्त्रियाम् ॥ ३॥ अजाद्यतष्टाप् ॥ ४
(२०) अष्टाध्यायी-
याम् ॥ ५८ ॥ दीर्घजिह्वी च च्छन्दसि ॥ ५९ ॥ दिक्पूर्वपदान्डीप् ॥ ६० ॥ ३ ॥ वाहः ॥ ॥ ६१ ॥ सख्यशिश्वीति भाषायाम् ॥ ६२ ॥ जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् ॥ ६३ ॥ पाककर्ण- पर्णपुष्पफलमूलवालोत्तरपदाच्च ॥ ६४ ॥ इतो मनुष्यजातेः ॥ ६५ ॥ ऊङ्कुतः ॥ ६६ ॥ बाह्वन्तात्संज्ञायाम् ॥ ६७ ॥ पङ्गोश्च ॥६८॥ ऊरउत्तरपदादौपम्ये ॥ ६९ ॥ संहितशफलक्षण- वामादेश्च ॥ ७० ॥ कद्रुकमण्डल्वोश्छन्दसि ॥ ७१ ॥ संज्ञायाम् ॥ ७२ ॥ शार्ङ्गरवाद्यञो ङीन् ॥ ७३ ॥ यङश्चाप् ॥ ७४ ॥ आवट्याच्च ॥ ७५ ॥ तद्धिताः ॥ ७६ ॥ यूनस्तिः ॥ ७७ ॥ अणिञोरनार्षयोर्गुरूपोत्तमयोः ष्यङ् गोत्रे ॥ ७८ ॥ गोत्रावयवात् ॥ ७९ ॥ क्रौड्यादिभ्यश्च ॥ ॥ ८० ॥ ४ ॥ दैवयज्ञिशौचिवृक्षिसात्यमुग्रिकान्ठेविद्धिभ्योऽन्यतरस्याम् ॥ ८१ ॥ समर्थानां प्रथमाद्वा ॥ ८२ ॥ प्राग्दीव्यतोऽण् ॥ ८३ ॥ अश्वपत्यादिभ्यश्च ॥ ८४ ॥ दित्यदित्यादित्यप- त्युत्तरपदाण्ण्यः ॥ ८५ ॥ उत्सादिभ्योऽञ् ॥ ८६ ॥ स्त्रीपुंसाभ्यां नञ्स्नञौ भवनात् ॥८७॥ द्विगोर्लुगनपत्ये ॥ ८८ ॥ गोत्रेऽलुगचि ॥ ८९ ॥ यूनि लुक् ॥ ९० ॥ फक्फिञोरन्यतरस्याम् ॥ ९१ ॥ तस्यापत्यम् ॥ ९२ ॥ एको गोत्रे ॥ ९३॥ गोत्राद्यून्यस्त्रियाम् ॥ ९४ ॥ अत इञ् ॥ ॥ ९५ ॥ बाह्वादिभ्यश्च ॥९६॥ सुधातुरकङ् च ॥९७ ॥ गोत्रे कुञ्जादिभ्यश्छफञ् ॥९८ ॥ नडादिभ्यः फक् ॥९९ ॥ हरिताभ्यो ञः ॥१०० ॥ ५ यञिञोश्च ॥ १०१ ॥ शरद्वच्छुनक- दर्भाद् भृगुवत्साप्रायणेषु ॥१०२॥ द्रोणपर्वतजीवन्तादन्यतरस्याम् ॥१०३॥ अनृष्यानन्तर्ये बिदादिभ्योऽञ् ॥ १०४ ॥ गर्गादिभ्यो यञ् ॥ १०५ ॥ मधुबभ्र्वोर्ब्राह्मणकौशिकयोः ॥ ॥ १०६ ॥ कपिबोधादाङ्गिरसे ॥ १०७ ॥ वतण्डाच्च ॥ १०८ ॥ लुक् स्त्रियाम् ॥ १०९ ॥ अश्वादिभ्यः फञ् ॥ ११० ॥ भर्गात् त्रैगर्तै ॥ १११ ॥ शिवादिभ्योऽण् ॥ ११२ ॥ अङ्गाद्भ्यो नदीमानुषीभ्यस्तन्नामिकाभ्यः ॥ ११३ ॥ ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च ॥ ११४ ॥ मातुरुत्संख्यासंभद्रपूर्वायाः ॥ ११५ ॥ कन्यायाः कनीन च ॥ ११६ ॥ विकर्णशुङ्खच्छगला- द्वत्सभरद्वाजात्रिषु ॥ ११७ ॥ पीलाया वा ॥ ११८ ॥ ढक् च मण्डूकात् ॥ ११९ ॥ स्त्रीभ्यो ढक् ॥ १२० ॥ ६ ॥ द्व्यचः ॥ १२१ ॥ इतश्चानिञः ॥ १२२ ॥ शुभ्रादिभ्यश्च ॥१२३॥ विकर्णकुषीटकात् काश्यपे ॥ १२४ ॥ भ्रुवो वुक् च ॥ १२५ ॥ कल्याण्यादीनामिन्नङ् च ॥ ॥ १२६ ॥ कुलटाया वा ॥ १२७ ॥ चटकाया ऐरक् ॥ १२८ ॥ गोधाया ढ्रक् ॥ १२९ ॥ आरगुदीचाम् ॥ १३० ॥ क्षुद्राभ्यो वा ॥ १३१ ॥ पितृष्वसुश्छण् ॥ १३२ ॥ ढकि लोपः ॥ ॥ १३३ ॥ मातृष्वसुश्च ॥ १३४ ॥ चतुष्पाद्भ्यो ढञ् ॥ १३५ ॥ गृष्ट्यादिभ्यश्च ॥ १३६ ॥ राजश्वशुराद्यत् ॥ १३७ ॥ क्षत्राद्धः ॥ १३८ ॥ कुलात्खः ॥ १३९ ॥ अपूर्वपदादन्यतरस्यां यड्ढकञौ ॥ १४० ॥ ७ ॥ महाकुलादञ्खञौ ॥ १४१ ॥ दुष्कुलाड्ढक् ॥ १४२ ॥ स्व- सुश्छः ॥ १४३ ॥ भ्रातृर्व्यच्च ॥ १४४ ॥ व्यन् सपत्ने ॥ १४५ ॥ रेवत्यादिभ्यश्छक् ॥१४६॥ गोत्रस्त्रियाः कुत्सने ण च ॥ १४७ ॥ वृद्धाड्ढक् सौवीरेषु बहुलम् ॥ १४८ ॥ फेञ्छ च ॥ ॥ १४९ ॥ फाण्टाहृतितिमताभ्यां णफिञौ ॥ १५० ॥ कुर्वादिभ्यो ण्यः ॥ १५१ ॥ सेना- न्तलक्षणकारिभ्यश्च ॥ १५२ ॥ उदीचामिञ् ॥ १५३ ॥ तिकादिभ्यः फिञ् ॥ १५४ ॥ कौस-
सूत्रपाठः । (२१) ल्यकार्मार्थाभ्यां च ॥ १५५ ॥ अणो द्व्यचः ॥ १५६ ॥ उदीचां वृद्धाद्गोत्रात् ॥ १५७ ॥ वार्किनादीनां कुक् च ॥ १५८ ॥ पुत्रान्तादन्यतरस्याम् ॥ १५९ ॥ प्राचामवृद्धात् फिन् बहु- लम् ॥ १६० ॥ ८ ॥ मनोजातावञ्यतौ षुक् च ॥ १६१ ॥ अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम् ॥ १६२ ॥ जीवति तु वंश्ये युवा ॥ १६३ ॥ भ्रातरि च ज्यायसि ॥ १६४ ॥ वान्यस्मिन् सपिण्डे स्थविरतरे जीवति ॥ १६५ ॥ वृद्धस्य च पूजायाम् ॥ १६६ ॥ यूनश्च कुत्सायाम् ॥ १६७ ॥ जनपदशब्दात् क्षत्रियादञ् ॥ १६८ ॥ साल्वेयगान्धारिभ्यां च ॥ १६९ ॥ द्व्यञ्मगधकलिङ्ग- सूरमसादण् ॥ १७० ॥ वृद्धेत्कोसलाजादाञ्ञ्यङ् ॥ १७१ ॥ कुरुनादिभ्यो ण्यः ॥ १७२ ॥ साल्वावयवप्रत्यग्रथकालकूटाश्मकादिञ् ॥ १७३ ॥ ते तद्रा
( २२ ) अष्टाध्यायी- योद्धृभ्यः ॥ ५६ ॥ तदस्यां प्रहरणमिति क्रीडायां णः ॥ ५७ ॥ घञः सास्यां क्रियेति ञः ॥ ॥ ५८ ॥ तदधीते तद्वेद ॥ ५९ ॥ ऋतुकथादिसूत्रान्ताड्ढक् ॥ ६० ॥ ३ ॥ क्रमादिभ्यो वुन् ॥ ॥ ६१ ॥ अनुब्राह्मणादिनिः ॥ ६२ ॥ वसन्तादिभ्यष्ठक् ॥ ६३ ॥ प्रोक्ताल्लुक् ॥ ६४ ॥ सूत्राच्च कोपधात् ॥ ६५ ॥ छन्दोब्राह्मणानि च तद्विषयाणि ॥ ६६ ॥ तदस्मिन्नस्तीति देशे तन्नाम्नि ॥ ६७ ॥ तेन निर्वृत्तम् ॥ ६८ ॥ तस्य निवासः ॥ ६९ ॥ अदूरभवश्च ॥ ७० ॥ ओरञ् ॥ ७१ ॥ मतोश्च बह्वजङ्गात् ॥ ७२ ॥ बह्वचः कूपेषु ॥ ७३ ॥ उदक्च विपाशः ॥ ॥७४॥ संकलादिभ्यश्च ॥ ७५ ॥ स्त्रीषु सौवीरसालप्रक्षु ॥ ७६ ॥ सुवास्त्वादिभ्योऽण् ॥७७॥ रोणी ॥ ७८ ॥ कोपधा
दृतिकुक्षिकूलशवस्त्यस्त्यहेर्ढञ् : look at L19: द ृ त ि - क ु क ् ष ि - क ू ल - श - व - स ् त ् य - स ् त ् य - ह ेर ् - ढ ञ् Wait, is there "अस्त्य"? Look between शवस्त्य and हेर्ढञ्: It's: स् + त् + य + स ् + त ् य = no, look at the glyphs: श - व - स ् त ् य - स ् त ् य - ह ेर ् - ढ ञ् Wait, 4.3.56 is: "दृतिकुक्षिकलशबस्त्यस्त्याहेर्ढञ्" Here: दृ त ि क ु क ् ष ि क ू ल (is it कल or कूल? It has ू : कूल! Wait, wait, is it कल? No, it has an oo-kar: क Tool! Wait, ूल! No, क ु क ् ष ि क ू ल or क ल ? Ah, there is क ु क ् ष ि then क followed by something. Wait! Look at L19: द ृ त ि (दृति) क ु क ् ष ि (कुक्षि) क ल (कल) - wait, is it क followed by ल? Wait, let's look at the character after क्षि: It is: क
महाराजाह्ठञ् ॥ ९७॥ वासुदेवार्जुनाभ्यां वुन् ॥ ९८ ॥ गोत्रक्षत्रियाख्येभ्यो बहुलं वुञ् ॥ ९९ ॥ जनपदिनां जनपदवत् सर्वं जनपदेन समानशब्दानां बहुवचने ॥ १०० ॥ ५ ॥ तेन प्रोक्तम् ॥ १०१ ॥ तित्ति रिवरतन्तुखण्डिकोखाच्छण् ॥ १०२ ॥ काश्यपकौशिकाभ्यामृषिभ्यां णिनिः ॥ १०३ ॥ कलापिवैशम्पायनान्तेवासिभ्यश्च ॥ १०४ ॥ पुराणप्रोक्तेषु ब्राह्मणकल्पेषु ॥ ॥ १०५ ॥ शौनकादिभ्यश्छन्दसि ॥ १०६ ॥ कठचरकाल्लुक् ॥ १०७ ॥ कलापिनोऽण् ॥ ॥ १०८ ॥ छगलिनो ढिनुक् ॥ १०९ ॥ पाराशर्यशिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयोः ॥११०॥ कर्मन्दकृ- शाश्वादिनीः ॥ १११ ॥ तेनैकदिक् ॥ ११२ ॥ तसिश्च ॥ ११३ ॥ उरसो यच्च ॥ ११४ ॥ उपज्ञाते ॥ ११५ ॥ कृते ग्रन्थे ॥ ११६ ॥ संज्ञायाम् ॥ ११७ ॥ कुलालादिभ्यो वुञ् ॥ ११८ ॥ क्षुद्राभ्रमरवटरपादपादञ् ॥ ११९ ॥ तस्येदम् ॥ १२० ॥ ६ ॥ रथाद्यत् ॥ १२१ ॥ पत्रपू- र्वादञ् ॥ १२२ ॥ पत्राध्वर्युपरिषदश्च ॥ १२३ ॥ हलसीराट्ठक् ॥ १२४ ॥ द्वन्द्वाद्वुन् वैरमैथुनि- कयोः ॥ १२५ ॥ गोत्रचरणाद्वुञ् ॥ १२६ ॥ सङ्घाङ्कलक्षणेष्वञ्यञिञामण् ॥ १२७ ॥ शाकलाद्वा ॥ १२८ ॥ छन्दोगौक्थिकयाज्ञिकबह्वृचनटाञ्ण्यः ॥ १२९ ॥ न दण्डमाणवा- न्तेवासिषु ॥ १३० ॥ रैवतिकादिभ्यश्छः ॥ १३१ ॥ कौपिञ्जलहास्तिपदादण् ॥ १३२ ॥ आथर्वणिकस्येकलोपश्च ॥ १३३ ॥ तस्य विकारः ॥ १३४ ॥ अवयवे च प्राण्योषद्विवृक्षेभ्यः ॥ १३५ ॥ बिल्वादिभ्योऽण् ॥ १३६ ॥ कोपधाच्च ॥ १३७ ॥ त्रपुजतुनोः षुक् ॥ १३८॥ ओरञ् ॥ १३९ ॥ अनुदात्तादेश्च ॥ १४० ॥ ७ ॥ पलाशदिभ्यो वा ॥ १४१ ॥ शम्याः प्लञ् ॥ १४२ ॥ मयड्वैतयोर्भाषायामभक्षाच्छादनयोः ॥ १४३ ॥ नित्यं वृद्धशरादिभ्यः १४४॥ गोश्चपुरीषे ॥ १४५ ॥ पिष्टाच्च ॥ १४६ ॥ संज्ञायां कन् ॥ १४७ ॥ व्रीहेः पुरोडाशे ॥ १४८ ॥ असंज्ञायां तिलयवाभ्याम् ॥ १४९ ॥ द्व्यचश्छन्दसि ॥ १५० ॥ नोत्वदूर्ध्ववि- ह्वात् ॥ १५१ ॥ तालादिभ्योऽण् ॥ १५२ ॥ जातरूपेभ्यः परिमाणे ॥ १५३ ॥ प्राणिरज- तादिभ्योऽञ् ॥ १५४ ॥ ञितश्च तत्प्रत्ययात् ॥ १५५ ॥ क्रीतवत् परिमाणात् ॥ १५६ ॥ उष्ट्राद्वुञ् ॥ १५७ ॥ उमौर्णयोर्वा ॥ १५८ ॥ एण्या ढञ् ॥ १५९ ॥ गोपयसोर्यत् ॥ १६०॥ ॥ ८ ॥ द्रोश्च ॥ १६१॥ माने वयः ॥ १६२॥ फले लुक् ॥ १६३॥ प्लक्षादिभ्योऽण्॥१६४॥ जम्ब्वा वा ॥ १६५ ॥ लुक् च ॥ १६६ ॥ हरीतक्यादिभ्यश्च ॥ १६७ ॥ कंसीयपरश- व्ययोर्यञ्ञौ लुक् च ॥ १६८ ॥ ८ ॥ ( युष्मद्गोमन्तात्सम्भूते ग्रामाद्वेतुतेन रथात्पलाशादि- भ्यो द्रोश्चाष्टौ ) ॥ ॥ इति चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ३ ॥ प्राग्वहतेष्ठक् ॥ १ ॥ तेन दीव्यति खनति जयति जितम् ॥ २ ॥ संस्कृतम् ॥ ३ ॥ कुलत्थकोपधादण् ॥ ४ ॥ तरति ॥ ५ ॥ गोपुच्छाट्ठञ् ॥ ६ ॥ नौद्व्यचष्ठन् ॥ ७ ॥ चरति ॥ ८ ॥ आकर्षात् ष्ठल् ॥ ९ ॥ पर्णादिभ्यः ष्ठन् ॥ १० ॥ श्वगणाट्ठञ् च ॥ ११ ॥ वेतना- दिभ्यो जीवति ॥ १२ ॥ वस्त्रक्रयविक्रयाट्ठन् ॥ १३ ॥ आयुधाच्छ च ॥ १४ ॥ हरत्युत्सङ्गादिभ्यः
४. समास प्रकरण (अव्ययीभाव, तत्पुरुष, बहुव्रीहि, द्वन्द्व) एवं पूर्वार्ध उपसंहार
न्orट्कन्? It looks very much like ट्कन्. Let's preserve what is printed: हलसीराट्कन्`.
Line 22:
॥ ८३ ॥ धनगणं लब्धा ॥ ८४ ॥ अन्नाण्णः ॥ ८५ ॥ वशं गतः ॥ ८६ ॥ पदमस्मिन्द्व-
Wait, sutra 83 text was in line 21: विध्यत्यधनुषा ॥
Then line 22 starts with ॥ ८३ ॥!
Wait, is line 21 ending with ॥ or does it not?
Line 21 ends with: विध्यत्यधनुषा ॥
And line 22 starts with: ॥ ८३ ॥!
Wait, line 21 has: विध्यत्यधनुषा ॥ and then line 22 has: ॥ ८३ ॥ धनगणं लब्धा ॥ ८४ ॥ अन्नाण्णः ॥ ८५ ॥ वशं गतः ॥ ८६ ॥ पदमस्मिन्द्व-
Wait, is अन्नाण्णः or अन्नान्नः?
Look at 4.4.85: अन्नाण्णः!
Letters: अ न्ना ण्णः -> अन्नाण्णः. Yes, ण्णः!
Line 23: `द्वयम् ॥ ८७ ॥ मूलमस्या
च ॥ ११७ ॥ समुद्रादभ्राद्घः॥ ११८ ॥ बर्हिषि दत्तम् ॥ ११९ ॥ दूतस्य भागकर्मणि ॥ ॥ १२० ॥ ६ ॥ रक्षोयातूनां हननी ॥ १२१ ॥ रेवतीजगतीहविष्याभ्यः प्रश- स्ये ॥ १२२ ॥ असुरस्य स्वम् ॥ १२३ ॥ मायायामण् ॥ १२४॥ तद्वाना- सामुपधानो मन्त्र इतीष्टकासु लुक् च मतोः ॥ १२५ ॥ अश्विनोदण् ॥ १२६ ॥ वयस्यासु मूर्ध्नो मतुप् ॥ १२७ ॥ मत्वर्थे मासतन्वोः ॥ १२८ ॥ मधोर्ज च ॥१२९॥ ओज- सोऽहनि यत्खौ ॥१३०॥ वेशोयशआदेर्भगान्ण्वुल् ॥१३१॥ ख च ॥१२२॥ पूर्वैः कृतमिनयौ च ॥१३३॥ अद्भिः संस्कृतम् ॥१३४॥ सहस्रेण संमितौ घः ॥१३५॥ मतौ च ॥ १३६ ॥ सोममर्हति यः ॥ १३७॥ मये च ॥ १३८॥ मधोः ॥१३९॥ वसोः समूहे च ॥१४०॥७॥ नक्षत्राद्घः
स्याम्॥ ५३ ॥ द्विगोष्ठंश्च ॥ ५४ ॥ कुलिजालुक्खौ च ॥ ५५ ॥ सोऽस्यांशवस्नभृतयः॥ ॥ ५६॥ तदस्य परिमाणम् ॥ ५७॥ संख्यायाः संज्ञासङ्घसूत्राध्ययनेषु ॥५८॥ पंक्तिविंशति- त्रिंशच्चत्वारिंशत्पञ्चाशत्षष्टिसप्तत्यशीतिनवतिशतम् ॥ ५९ ॥ पञ्चद्दशतौ वर्गे वा ॥६०॥३॥ सत्तनोऽञ्छन्दसि ॥ ६१ ॥ त्रिंशच्चत्वारिंशतोर्ब्राह्मणे संज्ञायां डण् ॥ ६२ ॥ तदर्हति ॥६३॥ छेदादिभ्यो नित्यम् ॥६४॥ शीर्षच्छेदाद्यच्च ॥६५॥ दण्डादिभ्यो यः ॥६६॥ छन्दसि च ॥६७॥ पात्राद्द्वंश्च ॥ ६८ ॥ कडंकरदक्षिणाच्च च ॥ ६९ ॥ स्थालीबिलात् ॥ ७० ॥ यज्ञर्त्विग्भ्यां घखञौ ॥ ७१ ॥ पारायणतुरायणचान्द्रायणं वर्तयति ॥ ७२ ॥ संशयमापन्नः ॥ ७३ ॥ योजनं गच्छति ॥ ७४ ॥ पथः ष्कन् ॥ ७५ ॥ पंथो ण नित्यम् ॥ ७६ ॥ उत्तरपथेनाहृतं च ॥ ॥७७ ॥ कालात् ॥ ७८ ॥ तेन निर्वृत्तम् ॥ ७९॥ तमधीष्टो भृतो भूतो भावी ॥ ८० ॥ ४ ॥ मासाद्वयसि यत्खञौ ॥ ८१ ॥ द्विगोर्यप् ॥ ८२ ॥ षण्मासाण्ण्यच्च ॥ ८३ ॥ अवयसि ठंश्च ८४॥ समायाः खः ॥८५॥ द्विगोर्वा ॥८६॥ रात्र्यहः संवत्सराच्च ॥८७॥ वर्षालुक् च॥८८॥ चित्तवति नित्यम् ॥८९॥ षष्टिकाः षष्टिरात्रेण पच्यन्ते ॥९०॥ वत्सरान्ताच्छश्छन्दसि ॥ ९१ ॥ संपरिपूूर्वात्ख च ॥ ९२ ॥ तेन परिजय्यलभ्यकार्यसुकरम् ॥९३ ॥ तदस्य ब्रह्मचर्यम् ॥ ९४ ॥ तस्य दक्षिणा यज्ञाख्येभ्यः ॥ ९५ ॥ तत्र च दीयते कार्यं भववत् ॥ ९६ ॥ व्युष्टादिभ्योऽण् ॥ ॥ ९७ ॥ तेन यथाकथाचहस्ताभ्यां णयतौ ॥ ९८ ॥ संपादिनि ॥ ९९ ॥ कर्मवेषाद्यत् ॥ ॥ १०० ॥ ५ ॥ तस्मै प्रभवति संतापादिभ्यः ॥ १०१ ॥ योगाद्यच्च ॥ १०२ ॥ कर्मण उकञ् ॥ १०३ ॥ समयस्तदस्य प्राप्तम् ॥ १०४ ॥ ऋतोरण् ॥ १०५ ॥ छन्दसि घस् ॥ ॥ १०६ ॥ कालाद्यत् ॥ १०७ ॥ प्रकृष्टे ठञ् ॥ १०८ ॥ प्रयोजनम् ॥ १०९ ॥ विशाखा- षाढादण्मन्थदण्डयोः ॥११०॥ अनुप्रवचनादिभ्यश्छः ॥१११॥ समापनात्पूर्वपदात् ॥११२॥ ऐकागारिकट्चौरे ॥ ११३ ॥ आकालिकडाचन्तवचने ॥ ११४ ॥ तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः ॥ ॥ ११५ ॥ तत्र तस्येव ॥ ११६ ॥ तदर्हम् ॥ ११७ ॥ उपसर्गाच्छन्दसि धात्वर्थे ॥ ११८ ॥ तस्य भावस्त्वतलौ ॥ ११९ ॥ आ च त्वात् ॥ १२० ॥ ६ ॥ न नञ्पूर्वात्तत्पुरुषादचतुरसंगत- लवणवट्युधकतरसलसेभ्यः ॥ १२१ ॥ पृथादिभ्यः इमनिज्वा ॥ १२२ ॥ वर्णदृढादिभ्यः ष्यञ् च ॥ १२३ ॥ गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च ॥ १२४ ॥ स्तेनाद्यन्नलोपश्च ॥ १२५ ॥ सख्युर्यः ॥ १२६ ॥ कपिज्ञात्योर्ढक् ॥ १२७ ॥ पत्यन्तपुरोहितादिभ्यो यक्॥१२८॥ प्राण- भृज्जातिवयोवचनोद्गात्रादिभ्योऽञ् ॥ १२९ ॥ हायनान्तयुवादिभ्योऽण् ॥ १३० ॥ इगन्ताच्च लघूपूर्वात् ॥ १३१ ॥ योपधाद्गुरूपोत्तमाद्वुञ् ॥ १३२ ॥ द्वन्द्वमनोज्ञादिभ्यश्च ॥ १३३ ॥ गोत्रचरणाच्छ्लाघात्याकारतदवेतेषु ॥ १३४ ॥ होत्राभ्यश्छः ॥ १३५ ॥ ब्रह्मणस्त्वः ॥१३६॥ ॥ १६ ॥ ( प्राक्क्रीताच्छताच्च सर्वभूमिसत्तनोऽञ्मासात्तस्मै प्रभवति ननञ्पूर्वात् षोडश ) ॥ इति पञ्चमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ १ ॥
( २८ ) अष्टाध्यायी-
धान्यानां भवने क्षेत्रे खञ् ॥ १ ॥ व्रीहिशाल्योर्ढक् ॥ २ ॥ यवयवकषष्टिकाद्यत् ॥ ३ ॥ विभाषा तिलमाषोमाभङ्गाणुभ्यः ॥ ४ ॥ सर्वचर्मणः कृतः खखञौ ॥ ५ ॥ यथामुखसंमुखस्य दर्शनः खः ॥ ६ ॥ तत्सर्वादेः पथ्यङ्गकर्मपत्रपात्रं व्याप्नोति ॥ ७ ॥ आप्रपदं प्राप्नोति ॥ ८ ॥ अनुपदसर्वान्नायानयं बद्धामक्षयतिनेयेषु ॥ ९ ॥ परोवरपरंपरपुत्रपौत्रमनुभवति ॥१०॥ अवारपारात्यन्तानुकामंगामी ॥११ ॥ समांसमां विजायते ॥ १२ ॥ अद्यश्वीनावष्टब्धे ॥ १३ ॥ आगवीनः ॥१४॥ अनुग्वलंगामी ॥१५ ॥ अध्वनो यत्खौ ॥ १६॥ अभ्यमित्राच्छ च ॥१७॥ गोष्ठात्खञ् भूतपूर्वे ॥१८॥ अश्वस्यैकाहगमः ॥१९ ॥ शालीनकौपीने ऽधृष्टाकार्ययोः ॥२०॥१॥ व्रातेन जीवति ॥ २१ ॥ साप्तपदीनं सख्यम्
परुत्परायैषमः (wait, is there a space? सद्यः परुत्परायैषमः -> yes, space after सद्यः)
परेद्यव्यद्यपूर्वेद्युरन्येद्युरन्यतरेद्युरितरेद्युरपरेद्युरधरेद्युरुभयेद्युरुत्तरेद्युः - all joined, matches!
Let's check line 31:
`दिक़्शब्देभ्यः` or `दिक्शब्देभ्यः`?
It is `दिक्शब्देभ्यः`.
5. Format the response clearly with line markers , , etc. as requested.र्वाच्च ॥ ८७ ॥ इष्टादिभ्यश्च ॥ ८८ ॥ छन्दसि परिपन्थिपरिपरीणौ पर्यवस्थातरि ॥ ८९ ॥
अनुपद्यन्वेष्टा ॥ ९० ॥ साक्षाद्रष्टरि संज्ञायाम् ॥ ९१ ॥ क्षेत्रियच्परक्षेत्रे चिकित्स्यः ॥ ९२ ॥
इन्द्रियमिन्द्रलिङ्गमिन्द्रदृष्टमिन्द्रसृष्टमिन्द्रजुष्टमिन्द्रदत्तमिति वा ॥ ९३ ॥ तदस्यास्त्यस्मिन्निति
मतुप् ॥ ९४ ॥ रसादिभ्यश्च ॥ ९५ ॥ प्राणिस्थादातो ल्जन्य
(३०) अष्टाध्यायी- ॥ ३१ ॥ पश्चात् ॥ ३२ ॥ पश्च पश्चा च च्छन्दसि ॥ ३३ ॥ उत्तराधरदक्षिणादातिः ॥ ॥ ३४ ॥ एनबन्तरस्यामदूरेऽपञ्चम्याः ॥ ३५ ॥ दक्षिणादाच् ॥ ३६ ॥ आहि च दूरे ॥ ॥ ३७ ॥ उत्तराच्च ॥ ३८ ॥ पूर्वाधरावराणामसि पुरववश्चैषाम् ॥ ३९ ॥ अस्ताति च ॥ ॥ ४० ॥ २ ॥ विभाषावरस्य ॥ ४१ ॥ संख्याया विधार्ये धा ॥ ४२ ॥ अधिकरणविचाले च ॥ ४३ ॥ एकाद्धो ध्यमुञन्यतरस्याम् ॥ ४४ ॥ द्वित्र्योश्च धमुञ् ॥ ४५ ॥ एधाच्च ॥ ४६ ॥ याप्ये पाशप् ॥ ४७ ॥ पूरणाद्भागे तीयादन्न् ॥ ४८ ॥ प्रागेकादशभ्योऽच्छन्दसि ॥ ४९ ॥ षष्ठाष्टमाभ्यां ञ च ॥ ५० ॥ मानपश्वङ्गेभ्यः कन्लुकौ च ॥५१ ॥ एकादाकिनिच्चासहाये ॥५२॥ भूतपूर्वे चरट् ॥ ५३ ॥ षष्ठ्या रूप्य च ॥ ५४ ॥ अतिशायने तमबिष्ठनौ ॥
(wait, is that ५१ and ५२?) Line 20:रजसां लोपश्च ॥ ५१ ॥ विभाषा साति कात्स्न्ये ॥ ५२ ॥Then:अभिचित्रौ? Wait, look at the number after it: ॥ ५३ ॥The text between ॥ ५२ ॥ and ॥ ५३ ॥ is:[something] संपदा च`!
Now, what is that word before संपदा च?
Let's look at it character by character, pixel by pixel:
अभwithि? Orमwithि? Wait, look at the top loop of this letter. It has a circle/loop at the top left, like 'भ'. Wait, is it 'भ'? Yes, it looks like 'भि'.- Next is another vertical stroke with an arch to the left, and an i-matra? Wait! Look at the matra: it's an 'ि' (hrasva i). And the letter under it is: 'चि' or 'वि' or 'पि'? Wait! Look at 'वि' in 'विभाषा' right next to it: In 'विभाषा' (line 20), 'वि' has the round belly to the left of the danda, and 'ि' on top. Here, it looks like 'चि' or 'वि' or 'पि' or 'नि
विंशतिः ) ॥
Wait, look at line 29:
खार्या नञ्दुःसुभ्यो धयसि विंशतिः ) ॥
Wait, 'धयसि' or 'वयसि'?
Look at L29: खार्या नञ्दुःसुभ्यो धयसि विंशतिः ) ॥
The letter is 'ध' or 'व'?
Look at 'ध' in 'धनुषश्च' (L18), 'धर्मादनिच्' (L16). The letter in L29 has a top loop like 'ध'! It's printed धयसि instead of वयसि!
Yes, exactly! It's धयसि!
And in L28: (पादशतस्य तत्प्रकृतवृकज्येष्ठाभ्यां सप्रभान्ववततात्
Wait, सप्रभान्ववततात् or सप्रभान्ववत्ततात्?
It is सप्रभान्ववततात् or सप्रभान्ववत्ततात् - looks like सप्रभान्ववततात्.
इति पञ्चमाध्यायस्य तुरीयः पादः ॥ ४ ॥ इति पञ्चमोऽध्यायस्समाप्तः ॥
Let's double-check all lines carefully.
Line 1: `( ३२
पररूपम् ॥ ९४ ॥ ओमाङोश्च ॥ ९५ ॥ उस्यपदान्तात् ॥ ९६ ॥ अतो गुणे
Line 30: ॥ ९७ ॥ अव्यक्तानुकरणस्यात इतौ ॥ ९८ ॥ नाम्रेडितस्यान्त्यस्य तु वा ॥ ९९ ॥ At the very bottom: ३
Let's double check line numbers and all sutras to be completely faithful.
Let's re-read line 20:
"शस्यूषन्दोषन्द्" then gap with handwritten "यकञ्छकन्नुदञ्" ... "कञ्छकन्नुदञ्छस्प्रभृतिषु ॥ ६३ ॥ वात्वादेः षः सः ॥ ६४ ॥ णो नः ॥"
Let's transcribe what is visible:
शस्यूषन्दोषन्द् यकञ्छकन्नुदञ्छस्प्रभृतिषु ॥ ६३ ॥ वात्वादेः षः सः ॥ ६४ ॥ णो नः ॥
Line 18:
स्मयतेः ॥ ५७ ॥ वाणौचिनि दृशोर्ह्वल्यमकिति ॥ ५८ ॥ अनुदात्तस्य चर्दुपधस्यान्यतरस्याम् ॥ ५९ ॥
Line 19: `शोर्वीरंछन्दसि छ्व्योः ॥ ६ ॥ ॥ ये च तद्धिते ॥ ६१ ॥ अचि शीर्षः ॥ ६२ ॥ पद्
कयोः 154: कास्तीराजस्तुन्दे नगरे 155: कारस्करो वृक्षः 156: पारस्करप्रभृतीनि च संज्ञायाम् 157: अनुदात्तं पदमेकवर्जम् 158: कर्षात्वतो घञोऽन्त उदात्तः 159: उञ्छादीनां च 160: अनुदात्तस्य च यत्रोदात्तलोपः
WAIT! Look at the numbering in standard Ashtadhyayi: 152 is प्रस्कण्वहरिश्चन्द्रावृषी! 153 is मस्करमस्करिणौ वेणुपरिव्राजकयोः! 154 is कास्तीराजस्तुन्दे नगरे! 155 is कारस्करो वृक्षः! 156 is पारस्करप्रभृतीनि च संज्ञायाम्! 157 is अनुदात्तं पदमेकवर्जम्! 158 is कर्षात्वतो घञोऽन्त उदात्तः! 159 is उञ्छादीनां च! 160 is अनुदात्तस्य च यत्रोदात्तलोपः!
NOW LOOK AT THE IMAGE! Line 21 has: "॥ १५२ ॥ प्रस्कण्वहरिश्चन्द्रावृषी ॥ १५३ ॥ मस्करमस्करिणौ वेणु..." Then what was printed? The printer MISPRINTED something! What did the printer print?