भारतकोश
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वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary

भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा

DevanagariHindipublished835 पृष्ठ

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कृत्यल्युटो बहुलम् ॥ ११३ ॥ नपुंसके भावे क्तः ॥ ११४ ॥ ल्युट् च ॥ ११५ ॥ कर्मणि च येन संस्पर्शात्कर्त्तुः शरीरसुखम् ॥ ११६ ॥ करणाधिकरणयोश्च ॥ ११७ ॥ पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण ॥ ११८ ॥ गोचरसंचरवहम्रजव्यजापणनिगमाश्च ॥ ११९ ॥ अवे तृस्त्रोर्घञ् ॥ १२० ॥ ६ ॥ हलश्च ॥ १२१ ॥ अध्यायन्यायोद्यावसंहारौक्ष ॥ १२२ ॥ उदङ्कोऽनुदके ॥ १२३ ॥ जाल- मानायः ॥ १२४ ॥ खनो व च ॥ १२५ ॥ ईषद्दुःसुषु कृच्छ्राकृच्छ्रार्थेषु खल् ॥ १२६ ॥ कर्तृ- कर्मणोश्च भूकृञोः ॥ १२७ ॥ आतो युच् ॥ १२८ ॥ छन्दसि गत्यर्थेभ्यः ॥ १२९ ॥ अन्ये- भ्योऽपि दृश्यते ॥ १३० ॥ वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा ॥ १३१ ॥ आशंकायां भूतवच्च ॥ १३२ ॥ क्षिप्रवचने लृट् ॥ १३३ ॥ आशांसावचने लिङ् ॥

त्त्वैकेन्केन्यत्वनः ॥ १४ ॥ अवचक्षे च ॥ १५ ॥ भावलक्षणे ष्येङ्कृञ्वदिचरिहुतमिनिभ्य- स्तोसुन् ॥ १६ ॥ सृपितृदोः कसुन् ॥ १७ ॥ अलंखल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा ॥ १८ ॥ उदीचां माङो व्यतीहारे ॥ १९ ॥ परावरयोगे च ॥ २० ॥ १ ॥ समानकर्तृकयोः पूर्वकाले ॥ ॥ २१ ॥ आभीक्ष्ण्ये णमुल् च ॥ २२ ॥ न यद्यनाकांक्षे ॥ २३ ॥ विभाषाग्रेप्रथमपूर्वेषु ॥ ॥ २४ ॥ कर्मण्याक्रोशे कृञः खमुञ् ॥ २५ ॥ स्वादुमि णमुल् ॥ २६ ॥ अन्यथैवंकथमिथ्यं- सु सिद्धाप्रयोगश्चेत् ॥ २७ ॥ यथातथयोरसूयाप्रतिवचने ॥ २८ ॥ कर्मणि दृशिविदोः साकल्ये ॥ ॥ २९ ॥ यावति विन्दजीवोः ॥ ३० ॥ चर्मोदरयोः पूरेः ॥ ३१ ॥ वर्षप्रमाण ऊलोपश्चा- स्यादन्यतरस्याम् ॥ ३२ ॥ चेले क्नोपेः ॥ ३३ ॥ निर्मूलसमूलयोः कषः ॥ ३४ ॥ शुष्कचू- र्णरूक्षेषु पिषः ॥ ३५ ॥ समूलाकृतजीवेषु हन्कृञ्ग्रहः ॥ ३६ ॥ करणे हनः ॥ ३७ ॥ स्नेहने पिषः ॥ ३८ ॥ हस्ते वर्तिग्रहोः ॥ ३९ ॥ स्वे पुषः ॥ ४० ॥ २ ॥ अधिकरणे बन्धः ॥ ४१ ॥ संज्ञायाम् ॥ ४२ ॥ कर्त्तॄञ्जीवपुरुषयोर्नशिवहोः ॥ ४३ ॥ ऊर्ध्वे शुषिपूर्योः ॥ ४४ ॥ उपमाने कर्मणि च ॥ ४५ ॥ कषादिषु यथाविध्यनुप्रयोगः ॥ ४६ ॥ उपदंशस्तृ- तीयायाम् ॥ ४७ ॥ हिंसाथीनां च समानकर्मकाणाम् ॥ ४८ ॥ सप्तम्यां चोपपीडरुधकर्षः ॥ ॥ ४९ ॥ समासत्तौ ॥ ५० ॥ प्रमाणे च ॥ ५१ ॥ अपादाने परीप्सायाम् ॥ ५२ ॥ ॥ द्वितीयायां च ॥ ५३ ॥ स्वाङ्गेऽध्रुवे ॥ ५४ ॥ परिक्लिश्यमाने च ॥ ५५ ॥ विशिपतिप- दिस्कन्दां व्याप्यमानासेव्यमानयोः ॥ ५६ ॥ अस्यतितृषोः क्रियान्तरेकालेषु ॥ ५७ ॥ न्नाम्यादिशिग्रहोः ॥ ५८ ॥ अव्ययेऽयथाभिप्रेताख्याने कृञः क्त्वाणमुलौ ॥ ५९ ॥ तिर्यच्य- पवर्गे ॥ ६० ॥ ३ ॥ स्वाङ्गे तस्प्रत्यये कृभ्वोः ॥ ६१ ॥ नाधार्थप्रत्यये च्व्यर्थे ॥ ६२ ॥ तूष्णीमि भुवः ॥ ६३ ॥ अन्वच्यानुलोम्ये ॥ ६४ ॥ शकधृषज्ञाग्लाघटरभलभक्रमसहाहोर्हस्त्यर्थेषु तुमुन् ॥ ६५॥ पर्याप्तिवचनेष्वलमर्थेषु ॥ ६६॥ कर्तरि कृत् ॥६७॥ भव्यगेयप्रवचनीयोपस्थानीयज- न्याप्लाव्यपात्या वा ॥६८॥ लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः ॥६९॥ तयोरेव कृत्यक्तखलर्थाः॥७०॥ आदिकर्मणि क्तः कर्तरि च ॥ ७१ ॥ गत्यर्थाकर्मकश्लिषशीङ्स्थासवसजनरुहजीर्यतिभ्यश्च ॥ ॥ ७२ ॥ दाशगोघ्नौ संप्रदाने ॥ ७३ ॥ भीमादयोऽपादाने ॥ ७४ ॥ ताभ्यामन्यत्रोणादयः ॥ ॥ ७५ ॥ क्तोऽधिकरणे च ध्रौव्यगतिप्रत्यवसानार्थेभ्यः ॥ ७६ ॥ लस्य ॥ ७७ ॥ तिप्तस्झि- सिप्थस्थमिब्वस्मस्तातांझथासाथांध्वमिड्वहिमहिङ् ॥ ७८ ॥ टित आत्मनेपदानां टेरे ॥ ७९ ॥ थासः से ॥ ८० ॥ ४ ॥ लिटस्तझयोरेशिरेच् ॥ ८१ ॥ परस्मैपदानां णलतुसुस्थलथ

सूत्रपाठः । (१९) किदाशिषि ॥ १०४ ॥ झस्य रन् ॥ १०५ ॥ इटोऽत् ॥ १०६ ॥ सुट्तिथोः ॥ १०७ ॥ झेर्जुस् ॥ १०८ ॥ सिजभ्यस्तविदिभ्यश्च ॥ १०९ ॥ आतस् ॥ ११० ॥ लङः शाकटायन- स्यैव ॥ १११ ॥ द्विषश्च ॥ ११२ ॥ तिङ्शित्सार्वधातुकम् ॥ ११३ ॥ आर्धधातुकं शेषः ॥ ॥ ११४ ॥ लिट् च ॥ ११५ ॥ लिङाशिषि ॥ ११६ ॥ छन्दस्युभयथा ॥ ११७ ॥ १७ ॥ ( धातुसम्बन्धेसमानकर्तृकयोरधिकरणेस्वांगे लिटस्तत्स्थस्थमिपां सप्तदश ) ॥ इति तृतीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ ४ ॥ समाप्तश्चाध्यायस्तृतीयः ॥ ३ ॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः । ङ्याप्प्रातिपदिकात् ॥ १ ॥ स्वौजसमौट्छष्टाभ्याम्भिस्ङेभ्याम्भ्यस्ङसिभ्याम्भ्यस्ङसोसाम्ङ्यो- स्सुप् ॥ २॥ स्त्रियाम् ॥ ३॥ अजाद्यतष्टाप् ॥ ४

(२०) अष्टाध्यायी-

याम् ॥ ५८ ॥ दीर्घजिह्वी च च्छन्दसि ॥ ५९ ॥ दिक्पूर्वपदान्डीप् ॥ ६० ॥ ३ ॥ वाहः ॥ ॥ ६१ ॥ सख्यशिश्वीति भाषायाम् ॥ ६२ ॥ जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् ॥ ६३ ॥ पाककर्ण- पर्णपुष्पफलमूलवालोत्तरपदाच्च ॥ ६४ ॥ इतो मनुष्यजातेः ॥ ६५ ॥ ऊङ्कुतः ॥ ६६ ॥ बाह्वन्तात्संज्ञायाम् ॥ ६७ ॥ पङ्गोश्च ॥६८॥ ऊरउत्तरपदादौपम्ये ॥ ६९ ॥ संहितशफलक्षण- वामादेश्च ॥ ७० ॥ कद्रुकमण्डल्वोश्छन्दसि ॥ ७१ ॥ संज्ञायाम् ॥ ७२ ॥ शार्ङ्गरवाद्यञो ङीन् ॥ ७३ ॥ यङश्चाप् ॥ ७४ ॥ आवट्याच्च ॥ ७५ ॥ तद्धिताः ॥ ७६ ॥ यूनस्तिः ॥ ७७ ॥ अणिञोरनार्षयोर्गुरूपोत्तमयोः ष्यङ् गोत्रे ॥ ७८ ॥ गोत्रावयवात् ॥ ७९ ॥ क्रौड्यादिभ्यश्च ॥ ॥ ८० ॥ ४ ॥ दैवयज्ञिशौचिवृक्षिसात्यमुग्रिकान्ठेविद्धिभ्योऽन्यतरस्याम् ॥ ८१ ॥ समर्थानां प्रथमाद्वा ॥ ८२ ॥ प्राग्दीव्यतोऽण् ॥ ८३ ॥ अश्वपत्यादिभ्यश्च ॥ ८४ ॥ दित्यदित्यादित्यप- त्युत्तरपदाण्ण्यः ॥ ८५ ॥ उत्सादिभ्योऽञ् ॥ ८६ ॥ स्त्रीपुंसाभ्यां नञ्स्नञौ भवनात् ॥८७॥ द्विगोर्लुगनपत्ये ॥ ८८ ॥ गोत्रेऽलुगचि ॥ ८९ ॥ यूनि लुक् ॥ ९० ॥ फक्फिञोरन्यतरस्याम् ॥ ९१ ॥ तस्यापत्यम् ॥ ९२ ॥ एको गोत्रे ॥ ९३॥ गोत्राद्यून्यस्त्रियाम् ॥ ९४ ॥ अत इञ् ॥ ॥ ९५ ॥ बाह्वादिभ्यश्च ॥९६॥ सुधातुरकङ् च ॥९७ ॥ गोत्रे कुञ्जादिभ्यश्छफञ् ॥९८ ॥ नडादिभ्यः फक् ॥९९ ॥ हरिताभ्यो ञः ॥१०० ॥ ५ यञिञोश्च ॥ १०१ ॥ शरद्वच्छुनक- दर्भाद् भृगुवत्साप्रायणेषु ॥१०२॥ द्रोणपर्वतजीवन्तादन्यतरस्याम् ॥१०३॥ अनृष्यानन्तर्ये बिदादिभ्योऽञ् ॥ १०४ ॥ गर्गादिभ्यो यञ् ॥ १०५ ॥ मधुबभ्र्वोर्ब्राह्मणकौशिकयोः ॥ ॥ १०६ ॥ कपिबोधादाङ्गिरसे ॥ १०७ ॥ वतण्डाच्च ॥ १०८ ॥ लुक् स्त्रियाम् ॥ १०९ ॥ अश्वादिभ्यः फञ् ॥ ११० ॥ भर्गात् त्रैगर्तै ॥ १११ ॥ शिवादिभ्योऽण् ॥ ११२ ॥ अङ्गाद्भ्यो नदीमानुषीभ्यस्तन्नामिकाभ्यः ॥ ११३ ॥ ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च ॥ ११४ ॥ मातुरुत्संख्यासंभद्रपूर्वायाः ॥ ११५ ॥ कन्यायाः कनीन च ॥ ११६ ॥ विकर्णशुङ्खच्छगला- द्वत्सभरद्वाजात्रिषु ॥ ११७ ॥ पीलाया वा ॥ ११८ ॥ ढक् च मण्डूकात् ॥ ११९ ॥ स्त्रीभ्यो ढक् ॥ १२० ॥ ६ ॥ द्व्यचः ॥ १२१ ॥ इतश्चानिञः ॥ १२२ ॥ शुभ्रादिभ्यश्च ॥१२३॥ विकर्णकुषीटकात् काश्यपे ॥ १२४ ॥ भ्रुवो वुक् च ॥ १२५ ॥ कल्याण्यादीनामिन्नङ् च ॥ ॥ १२६ ॥ कुलटाया वा ॥ १२७ ॥ चटकाया ऐरक् ॥ १२८ ॥ गोधाया ढ्रक् ॥ १२९ ॥ आरगुदीचाम् ॥ १३० ॥ क्षुद्राभ्यो वा ॥ १३१ ॥ पितृष्वसुश्छण् ॥ १३२ ॥ ढकि लोपः ॥ ॥ १३३ ॥ मातृष्वसुश्च ॥ १३४ ॥ चतुष्पाद्भ्यो ढञ् ॥ १३५ ॥ गृष्ट्यादिभ्यश्च ॥ १३६ ॥ राजश्वशुराद्यत् ॥ १३७ ॥ क्षत्राद्धः ॥ १३८ ॥ कुलात्खः ॥ १३९ ॥ अपूर्वपदादन्यतरस्यां यड्ढकञौ ॥ १४० ॥ ७ ॥ महाकुलादञ्खञौ ॥ १४१ ॥ दुष्कुलाड्ढक् ॥ १४२ ॥ स्व- सुश्छः ॥ १४३ ॥ भ्रातृर्व्यच्च ॥ १४४ ॥ व्यन् सपत्ने ॥ १४५ ॥ रेवत्यादिभ्यश्छक् ॥१४६॥ गोत्रस्त्रियाः कुत्सने ण च ॥ १४७ ॥ वृद्धाड्ढक् सौवीरेषु बहुलम् ॥ १४८ ॥ फेञ्छ च ॥ ॥ १४९ ॥ फाण्टाहृतितिमताभ्यां णफिञौ ॥ १५० ॥ कुर्वादिभ्यो ण्यः ॥ १५१ ॥ सेना- न्तलक्षणकारिभ्यश्च ॥ १५२ ॥ उदीचामिञ् ॥ १५३ ॥ तिकादिभ्यः फिञ् ॥ १५४ ॥ कौस-

सूत्रपाठः । (२१) ल्यकार्मार्थाभ्यां च ॥ १५५ ॥ अणो द्व्यचः ॥ १५६ ॥ उदीचां वृद्धाद्गोत्रात् ॥ १५७ ॥ वार्किनादीनां कुक् च ॥ १५८ ॥ पुत्रान्तादन्यतरस्याम् ॥ १५९ ॥ प्राचामवृद्धात् फिन् बहु- लम् ॥ १६० ॥ ८ ॥ मनोजातावञ्यतौ षुक् च ॥ १६१ ॥ अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम् ॥ १६२ ॥ जीवति तु वंश्ये युवा ॥ १६३ ॥ भ्रातरि च ज्यायसि ॥ १६४ ॥ वान्यस्मिन् सपिण्डे स्थविरतरे जीवति ॥ १६५ ॥ वृद्धस्य च पूजायाम् ॥ १६६ ॥ यूनश्च कुत्सायाम् ॥ १६७ ॥ जनपदशब्दात् क्षत्रियादञ् ॥ १६८ ॥ साल्वेयगान्धारिभ्यां च ॥ १६९ ॥ द्व्यञ्मगधकलिङ्ग- सूरमसादण् ॥ १७० ॥ वृद्धेत्कोसलाजादाञ्ञ्यङ् ॥ १७१ ॥ कुरुनादिभ्यो ण्यः ॥ १७२ ॥ साल्वावयवप्रत्यग्रथकालकूटाश्मकादिञ् ॥ १७३ ॥ ते तद्रा

( २२ ) अष्टाध्यायी- योद्धृभ्यः ॥ ५६ ॥ तदस्यां प्रहरणमिति क्रीडायां णः ॥ ५७ ॥ घञः सास्यां क्रियेति ञः ॥ ॥ ५८ ॥ तदधीते तद्वेद ॥ ५९ ॥ ऋतुकथादिसूत्रान्ताड्ढक् ॥ ६० ॥ ३ ॥ क्रमादिभ्यो वुन् ॥ ॥ ६१ ॥ अनुब्राह्मणादिनिः ॥ ६२ ॥ वसन्तादिभ्यष्ठक् ॥ ६३ ॥ प्रोक्ताल्लुक् ॥ ६४ ॥ सूत्राच्च कोपधात् ॥ ६५ ॥ छन्दोब्राह्मणानि च तद्विषयाणि ॥ ६६ ॥ तदस्मिन्नस्तीति देशे तन्नाम्नि ॥ ६७ ॥ तेन निर्वृत्तम् ॥ ६८ ॥ तस्य निवासः ॥ ६९ ॥ अदूरभवश्च ॥ ७० ॥ ओरञ् ॥ ७१ ॥ मतोश्च बह्वजङ्गात् ॥ ७२ ॥ बह्वचः कूपेषु ॥ ७३ ॥ उदक्च विपाशः ॥ ॥७४॥ संकलादिभ्यश्च ॥ ७५ ॥ स्त्रीषु सौवीरसालप्रक्षु ॥ ७६ ॥ सुवास्त्वादिभ्योऽण् ॥७७॥ रोणी ॥ ७८ ॥ कोपधा

दृतिकुक्षिकूलशवस्त्यस्त्यहेर्ढञ् : look at L19: द ृ त ि - क ु क ् ष ि - क ू ल - श - व - स ् त ् य - स ् त ् य - ह ेर ् - ढ ञ् Wait, is there "अस्त्य"? Look between शवस्त्य and हेर्ढञ्: It's: स् + त् + य + स ् + त ् य = no, look at the glyphs: श - व - स ् त ् य - स ् त ् य - ह ेर ् - ढ ञ् Wait, 4.3.56 is: "दृतिकुक्षिकलशबस्त्यस्त्याहेर्ढञ्" Here: दृ त ि क ु क ् ष ि क ू ल (is it कल or कूल? It has ू : कूल! Wait, wait, is it कल? No, it has an oo-kar: क Tool! Wait, ूल! No, क ु क ् ष ि क ू ल or क ल ? Ah, there is क ु क ् ष ि then क followed by something. Wait! Look at L19: द ृ त ि (दृति) क ु क ् ष ि (कुक्षि) क ल (कल) - wait, is it क followed by ल? Wait, let's look at the character after क्षि: It is: क

महाराजाह्ठञ् ॥ ९७॥ वासुदेवार्जुनाभ्यां वुन् ॥ ९८ ॥ गोत्रक्षत्रियाख्येभ्यो बहुलं वुञ् ॥ ९९ ॥ जनपदिनां जनपदवत् सर्वं जनपदेन समानशब्दानां बहुवचने ॥ १०० ॥ ५ ॥ तेन प्रोक्तम् ॥ १०१ ॥ तित्ति रिवरतन्तुखण्डिकोखाच्छण् ॥ १०२ ॥ काश्यपकौशिकाभ्यामृषिभ्यां णिनिः ॥ १०३ ॥ कलापिवैशम्पायनान्तेवासिभ्यश्च ॥ १०४ ॥ पुराणप्रोक्तेषु ब्राह्मणकल्पेषु ॥ ॥ १०५ ॥ शौनकादिभ्यश्छन्दसि ॥ १०६ ॥ कठचरकाल्लुक् ॥ १०७ ॥ कलापिनोऽण् ॥ ॥ १०८ ॥ छगलिनो ढिनुक् ॥ १०९ ॥ पाराशर्यशिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयोः ॥११०॥ कर्मन्दकृ- शाश्वादिनीः ॥ १११ ॥ तेनैकदिक् ॥ ११२ ॥ तसिश्च ॥ ११३ ॥ उरसो यच्च ॥ ११४ ॥ उपज्ञाते ॥ ११५ ॥ कृते ग्रन्थे ॥ ११६ ॥ संज्ञायाम् ॥ ११७ ॥ कुलालादिभ्यो वुञ् ॥ ११८ ॥ क्षुद्राभ्रमरवटरपादपादञ् ॥ ११९ ॥ तस्येदम् ॥ १२० ॥ ६ ॥ रथाद्यत् ॥ १२१ ॥ पत्रपू- र्वादञ् ॥ १२२ ॥ पत्राध्वर्युपरिषदश्च ॥ १२३ ॥ हलसीराट्ठक् ॥ १२४ ॥ द्वन्द्वाद्वुन् वैरमैथुनि- कयोः ॥ १२५ ॥ गोत्रचरणाद्वुञ् ॥ १२६ ॥ सङ्घाङ्कलक्षणेष्वञ्यञिञामण् ॥ १२७ ॥ शाकलाद्वा ॥ १२८ ॥ छन्दोगौक्थिकयाज्ञिकबह्वृचनटाञ्ण्यः ॥ १२९ ॥ न दण्डमाणवा- न्तेवासिषु ॥ १३० ॥ रैवतिकादिभ्यश्छः ॥ १३१ ॥ कौपिञ्जलहास्तिपदादण् ॥ १३२ ॥ आथर्वणिकस्येकलोपश्च ॥ १३३ ॥ तस्य विकारः ॥ १३४ ॥ अवयवे च प्राण्योषद्विवृक्षेभ्यः ॥ १३५ ॥ बिल्वादिभ्योऽण् ॥ १३६ ॥ कोपधाच्च ॥ १३७ ॥ त्रपुजतुनोः षुक् ॥ १३८॥ ओरञ् ॥ १३९ ॥ अनुदात्तादेश्च ॥ १४० ॥ ७ ॥ पलाशदिभ्यो वा ॥ १४१ ॥ शम्याः प्लञ् ॥ १४२ ॥ मयड्वैतयोर्भाषायामभक्षाच्छादनयोः ॥ १४३ ॥ नित्यं वृद्धशरादिभ्यः १४४॥ गोश्चपुरीषे ॥ १४५ ॥ पिष्टाच्च ॥ १४६ ॥ संज्ञायां कन् ॥ १४७ ॥ व्रीहेः पुरोडाशे ॥ १४८ ॥ असंज्ञायां तिलयवाभ्याम् ॥ १४९ ॥ द्व्यचश्छन्दसि ॥ १५० ॥ नोत्वदूर्ध्ववि- ह्वात् ॥ १५१ ॥ तालादिभ्योऽण् ॥ १५२ ॥ जातरूपेभ्यः परिमाणे ॥ १५३ ॥ प्राणिरज- तादिभ्योऽञ् ॥ १५४ ॥ ञितश्च तत्प्रत्ययात् ॥ १५५ ॥ क्रीतवत् परिमाणात् ॥ १५६ ॥ उष्ट्राद्वुञ् ॥ १५७ ॥ उमौर्णयोर्वा ॥ १५८ ॥ एण्या ढञ् ॥ १५९ ॥ गोपयसोर्यत् ॥ १६०॥ ॥ ८ ॥ द्रोश्च ॥ १६१॥ माने वयः ॥ १६२॥ फले लुक् ॥ १६३॥ प्लक्षादिभ्योऽण्॥१६४॥ जम्ब्वा वा ॥ १६५ ॥ लुक् च ॥ १६६ ॥ हरीतक्यादिभ्यश्च ॥ १६७ ॥ कंसीयपरश- व्ययोर्यञ्ञौ लुक् च ॥ १६८ ॥ ८ ॥ ( युष्मद्गोमन्तात्सम्भूते ग्रामाद्वेतुतेन रथात्पलाशादि- भ्यो द्रोश्चाष्टौ ) ॥ ॥ इति चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ३ ॥ प्राग्वहतेष्ठक् ॥ १ ॥ तेन दीव्यति खनति जयति जितम् ॥ २ ॥ संस्कृतम् ॥ ३ ॥ कुलत्थकोपधादण् ॥ ४ ॥ तरति ॥ ५ ॥ गोपुच्छाट्ठञ् ॥ ६ ॥ नौद्व्यचष्ठन् ॥ ७ ॥ चरति ॥ ८ ॥ आकर्षात् ष्ठल् ॥ ९ ॥ पर्णादिभ्यः ष्ठन् ॥ १० ॥ श्वगणाट्ठञ् च ॥ ११ ॥ वेतना- दिभ्यो जीवति ॥ १२ ॥ वस्त्रक्रयविक्रयाट्ठन् ॥ १३ ॥ आयुधाच्छ च ॥ १४ ॥ हरत्युत्सङ्गादिभ्यः

४. समास प्रकरण (अव्ययीभाव, तत्पुरुष, बहुव्रीहि, द्वन्द्व) एवं पूर्वार्ध उपसंहार

न्orट्कन्? It looks very much like ट्कन्. Let's preserve what is printed: हलसीराट्कन्`.

Line 22: ॥ ८३ ॥ धनगणं लब्धा ॥ ८४ ॥ अन्नाण्णः ॥ ८५ ॥ वशं गतः ॥ ८६ ॥ पदमस्मिन्द्व- Wait, sutra 83 text was in line 21: विध्यत्यधनुषा ॥ Then line 22 starts with ॥ ८३ ॥! Wait, is line 21 ending with or does it not? Line 21 ends with: विध्यत्यधनुषा ॥ And line 22 starts with: ॥ ८३ ॥! Wait, line 21 has: विध्यत्यधनुषा ॥ and then line 22 has: ॥ ८३ ॥ धनगणं लब्धा ॥ ८४ ॥ अन्नाण्णः ॥ ८५ ॥ वशं गतः ॥ ८६ ॥ पदमस्मिन्द्व- Wait, is अन्नाण्णः or अन्नान्नः? Look at 4.4.85: अन्नाण्णः! Letters: न्ना ण्णः -> अन्नाण्णः. Yes, ण्णः!

Line 23: `द्वयम् ॥ ८७ ॥ मूलमस्या

च ॥ ११७ ॥ समुद्रादभ्राद्घः॥ ११८ ॥ बर्हिषि दत्तम् ॥ ११९ ॥ दूतस्य भागकर्मणि ॥ ॥ १२० ॥ ६ ॥ रक्षोयातूनां हननी ॥ १२१ ॥ रेवतीजगतीहविष्याभ्यः प्रश- स्ये ॥ १२२ ॥ असुरस्य स्वम् ॥ १२३ ॥ मायायामण् ॥ १२४॥ तद्वाना- सामुपधानो मन्त्र इतीष्टकासु लुक् च मतोः ॥ १२५ ॥ अश्विनोदण् ॥ १२६ ॥ वयस्यासु मूर्ध्नो मतुप् ॥ १२७ ॥ मत्वर्थे मासतन्वोः ॥ १२८ ॥ मधोर्ज च ॥१२९॥ ओज- सोऽहनि यत्खौ ॥१३०॥ वेशोयशआदेर्भगान्ण्वुल् ॥१३१॥ ख च ॥१२२॥ पूर्वैः कृतमिनयौ च ॥१३३॥ अद्भिः संस्कृतम् ॥१३४॥ सहस्रेण संमितौ घः ॥१३५॥ मतौ च ॥ १३६ ॥ सोममर्हति यः ॥ १३७॥ मये च ॥ १३८॥ मधोः ॥१३९॥ वसोः समूहे च ॥१४०॥७॥ नक्षत्राद्घः

स्याम्॥ ५३ ॥ द्विगोष्ठंश्च ॥ ५४ ॥ कुलिजालुक्खौ च ॥ ५५ ॥ सोऽस्यांशवस्नभृतयः॥ ॥ ५६॥ तदस्य परिमाणम् ॥ ५७॥ संख्यायाः संज्ञासङ्घसूत्राध्ययनेषु ॥५८॥ पंक्तिविंशति- त्रिंशच्चत्वारिंशत्पञ्चाशत्षष्टिसप्तत्यशीतिनवतिशतम् ॥ ५९ ॥ पञ्चद्दशतौ वर्गे वा ॥६०॥३॥ सत्तनोऽञ्छन्दसि ॥ ६१ ॥ त्रिंशच्चत्वारिंशतोर्ब्राह्मणे संज्ञायां डण् ॥ ६२ ॥ तदर्हति ॥६३॥ छेदादिभ्यो नित्यम् ॥६४॥ शीर्षच्छेदाद्यच्च ॥६५॥ दण्डादिभ्यो यः ॥६६॥ छन्दसि च ॥६७॥ पात्राद्द्वंश्च ॥ ६८ ॥ कडंकरदक्षिणाच्च च ॥ ६९ ॥ स्थालीबिलात् ॥ ७० ॥ यज्ञर्त्विग्भ्यां घखञौ ॥ ७१ ॥ पारायणतुरायणचान्द्रायणं वर्तयति ॥ ७२ ॥ संशयमापन्नः ॥ ७३ ॥ योजनं गच्छति ॥ ७४ ॥ पथः ष्कन् ॥ ७५ ॥ पंथो ण नित्यम् ॥ ७६ ॥ उत्तरपथेनाहृतं च ॥ ॥७७ ॥ कालात् ॥ ७८ ॥ तेन निर्वृत्तम् ॥ ७९॥ तमधीष्टो भृतो भूतो भावी ॥ ८० ॥ ४ ॥ मासाद्वयसि यत्खञौ ॥ ८१ ॥ द्विगोर्यप् ॥ ८२ ॥ षण्मासाण्ण्यच्च ॥ ८३ ॥ अवयसि ठंश्च ८४॥ समायाः खः ॥८५॥ द्विगोर्वा ॥८६॥ रात्र्यहः संवत्सराच्च ॥८७॥ वर्षालुक् च॥८८॥ चित्तवति नित्यम् ॥८९॥ षष्टिकाः षष्टिरात्रेण पच्यन्ते ॥९०॥ वत्सरान्ताच्छश्छन्दसि ॥ ९१ ॥ संपरिपूूर्वात्ख च ॥ ९२ ॥ तेन परिजय्यलभ्यकार्यसुकरम् ॥९३ ॥ तदस्य ब्रह्मचर्यम् ॥ ९४ ॥ तस्य दक्षिणा यज्ञाख्येभ्यः ॥ ९५ ॥ तत्र च दीयते कार्यं भववत् ॥ ९६ ॥ व्युष्टादिभ्योऽण् ॥ ॥ ९७ ॥ तेन यथाकथाचहस्ताभ्यां णयतौ ॥ ९८ ॥ संपादिनि ॥ ९९ ॥ कर्मवेषाद्यत् ॥ ॥ १०० ॥ ५ ॥ तस्मै प्रभवति संतापादिभ्यः ॥ १०१ ॥ योगाद्यच्च ॥ १०२ ॥ कर्मण उकञ् ॥ १०३ ॥ समयस्तदस्य प्राप्तम् ॥ १०४ ॥ ऋतोरण् ॥ १०५ ॥ छन्दसि घस् ॥ ॥ १०६ ॥ कालाद्यत् ॥ १०७ ॥ प्रकृष्टे ठञ् ॥ १०८ ॥ प्रयोजनम् ॥ १०९ ॥ विशाखा- षाढादण्मन्थदण्डयोः ॥११०॥ अनुप्रवचनादिभ्यश्छः ॥१११॥ समापनात्पूर्वपदात् ॥११२॥ ऐकागारिकट्चौरे ॥ ११३ ॥ आकालिकडाचन्तवचने ॥ ११४ ॥ तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः ॥ ॥ ११५ ॥ तत्र तस्येव ॥ ११६ ॥ तदर्हम् ॥ ११७ ॥ उपसर्गाच्छन्दसि धात्वर्थे ॥ ११८ ॥ तस्य भावस्त्वतलौ ॥ ११९ ॥ आ च त्वात् ॥ १२० ॥ ६ ॥ न नञ्पूर्वात्तत्पुरुषादचतुरसंगत- लवणवट्युधकतरसलसेभ्यः ॥ १२१ ॥ पृथादिभ्यः इमनिज्वा ॥ १२२ ॥ वर्णदृढादिभ्यः ष्यञ् च ॥ १२३ ॥ गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च ॥ १२४ ॥ स्तेनाद्यन्नलोपश्च ॥ १२५ ॥ सख्युर्यः ॥ १२६ ॥ कपिज्ञात्योर्ढक् ॥ १२७ ॥ पत्यन्तपुरोहितादिभ्यो यक्॥१२८॥ प्राण- भृज्जातिवयोवचनोद्गात्रादिभ्योऽञ् ॥ १२९ ॥ हायनान्तयुवादिभ्योऽण् ॥ १३० ॥ इगन्ताच्च लघूपूर्वात् ॥ १३१ ॥ योपधाद्गुरूपोत्तमाद्वुञ् ॥ १३२ ॥ द्वन्द्वमनोज्ञादिभ्यश्च ॥ १३३ ॥ गोत्रचरणाच्छ्लाघात्याकारतदवेतेषु ॥ १३४ ॥ होत्राभ्यश्छः ॥ १३५ ॥ ब्रह्मणस्त्वः ॥१३६॥ ॥ १६ ॥ ( प्राक्क्रीताच्छताच्च सर्वभूमिसत्तनोऽञ्मासात्तस्मै प्रभवति ननञ्पूर्वात् षोडश ) ॥ इति पञ्चमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ १ ॥

( २८ ) अष्टाध्यायी-

धान्यानां भवने क्षेत्रे खञ् ॥ १ ॥ व्रीहिशाल्योर्ढक् ॥ २ ॥ यवयवकषष्टिकाद्यत् ॥ ३ ॥ विभाषा तिलमाषोमाभङ्गाणुभ्यः ॥ ४ ॥ सर्वचर्मणः कृतः खखञौ ॥ ५ ॥ यथामुखसंमुखस्य दर्शनः खः ॥ ६ ॥ तत्सर्वादेः पथ्यङ्गकर्मपत्रपात्रं व्याप्नोति ॥ ७ ॥ आप्रपदं प्राप्नोति ॥ ८ ॥ अनुपदसर्वान्नायानयं बद्धामक्षयतिनेयेषु ॥ ९ ॥ परोवरपरंपरपुत्रपौत्रमनुभवति ॥१०॥ अवारपारात्यन्तानुकामंगामी ॥११ ॥ समांसमां विजायते ॥ १२ ॥ अद्यश्वीनावष्टब्धे ॥ १३ ॥ आगवीनः ॥१४॥ अनुग्वलंगामी ॥१५ ॥ अध्वनो यत्खौ ॥ १६॥ अभ्यमित्राच्छ च ॥१७॥ गोष्ठात्खञ् भूतपूर्वे ॥१८॥ अश्वस्यैकाहगमः ॥१९ ॥ शालीनकौपीने ऽधृष्टाकार्ययोः ॥२०॥१॥ व्रातेन जीवति ॥ २१ ॥ साप्तपदीनं सख्यम्

परुत्परायैषमः (wait, is there a space? सद्यः परुत्परायैषमः -> yes, space after सद्यः) परेद्यव्यद्यपूर्वेद्युरन्येद्युरन्यतरेद्युरितरेद्युरपरेद्युरधरेद्युरुभयेद्युरुत्तरेद्युः - all joined, matches!

Let's check line 31:
`दिक़्शब्देभ्यः` or `दिक्शब्देभ्यः`?
It is `दिक्शब्देभ्यः`.

5. Format the response clearly with line markers , , etc. as requested.र्वाच्च ॥ ८७ ॥ इष्टादिभ्यश्च ॥ ८८ ॥ छन्दसि परिपन्थिपरिपरीणौ पर्यवस्थातरि ॥ ८९ ॥ अनुपद्यन्वेष्टा ॥ ९० ॥ साक्षाद्रष्टरि संज्ञायाम् ॥ ९१ ॥ क्षेत्रियच्परक्षेत्रे चिकित्स्यः ॥ ९२ ॥ इन्द्रियमिन्द्रलिङ्गमिन्द्रदृष्टमिन्द्रसृष्टमिन्द्रजुष्टमिन्द्रदत्तमिति वा ॥ ९३ ॥ तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् ॥ ९४ ॥ रसादिभ्यश्च ॥ ९५ ॥ प्राणिस्थादातो ल्जन्य

(३०) अष्टाध्यायी- ॥ ३१ ॥ पश्चात् ॥ ३२ ॥ पश्च पश्चा च च्छन्दसि ॥ ३३ ॥ उत्तराधरदक्षिणादातिः ॥ ॥ ३४ ॥ एनबन्तरस्यामदूरेऽपञ्चम्याः ॥ ३५ ॥ दक्षिणादाच् ॥ ३६ ॥ आहि च दूरे ॥ ॥ ३७ ॥ उत्तराच्च ॥ ३८ ॥ पूर्वाधरावराणामसि पुरववश्चैषाम् ॥ ३९ ॥ अस्ताति च ॥ ॥ ४० ॥ २ ॥ विभाषावरस्य ॥ ४१ ॥ संख्याया विधार्ये धा ॥ ४२ ॥ अधिकरणविचाले च ॥ ४३ ॥ एकाद्धो ध्यमुञन्यतरस्याम् ॥ ४४ ॥ द्वित्र्योश्च धमुञ् ॥ ४५ ॥ एधाच्च ॥ ४६ ॥ याप्ये पाशप् ॥ ४७ ॥ पूरणाद्भागे तीयादन्न् ॥ ४८ ॥ प्रागेकादशभ्योऽच्छन्दसि ॥ ४९ ॥ षष्ठाष्टमाभ्यां ञ च ॥ ५० ॥ मानपश्वङ्गेभ्यः कन्लुकौ च ॥५१ ॥ एकादाकिनिच्चासहाये ॥५२॥ भूतपूर्वे चरट् ॥ ५३ ॥ षष्ठ्या रूप्य च ॥ ५४ ॥ अतिशायने तमबिष्ठनौ ॥

(wait, is that ५१ and ५२?) Line 20:रजसां लोपश्च ॥ ५१ ॥ विभाषा साति कात्स्न्ये ॥ ५२ ॥Then:अभिचित्रौ? Wait, look at the number after it: ॥ ५३ ॥The text between ॥ ५२ ॥ and ॥ ५३ ॥ is:[something] संपदा च`! Now, what is that word before संपदा च? Let's look at it character by character, pixel by pixel:

  1. with ि? Or with ि? Wait, look at the top loop of this letter. It has a circle/loop at the top left, like 'भ'. Wait, is it 'भ'? Yes, it looks like 'भि'.
  2. Next is another vertical stroke with an arch to the left, and an i-matra? Wait! Look at the matra: it's an 'ि' (hrasva i). And the letter under it is: 'चि' or 'वि' or 'पि'? Wait! Look at 'वि' in 'विभाषा' right next to it: In 'विभाषा' (line 20), 'वि' has the round belly to the left of the danda, and 'ि' on top. Here, it looks like 'चि' or 'वि' or 'पि' or 'नि

विंशतिः ) ॥ Wait, look at line 29: खार्या नञ्दुःसुभ्यो धयसि विंशतिः ) ॥ Wait, 'धयसि' or 'वयसि'? Look at L29: खार्या नञ्दुःसुभ्यो धयसि विंशतिः ) ॥ The letter is 'ध' or 'व'? Look at 'ध' in 'धनुषश्च' (L18), 'धर्मादनिच्' (L16). The letter in L29 has a top loop like 'ध'! It's printed धयसि instead of वयसि! Yes, exactly! It's धयसि! And in L28: (पादशतस्य तत्प्रकृतवृकज्येष्ठाभ्यां सप्रभान्ववततात् Wait, सप्रभान्ववततात् or सप्रभान्ववत्ततात्? It is सप्रभान्ववततात् or सप्रभान्ववत्ततात् - looks like सप्रभान्ववततात्.

इति पञ्चमाध्यायस्य तुरीयः पादः ॥ ४ ॥ इति पञ्चमोऽध्यायस्समाप्तः ॥

Let's double-check all lines carefully.

Line 1: `( ३२

पररूपम् ॥ ९४ ॥ ओमाङोश्च ॥ ९५ ॥ उस्यपदान्तात् ॥ ९६ ॥ अतो गुणे

Line 30: ॥ ९७ ॥ अव्यक्तानुकरणस्यात इतौ ॥ ९८ ॥ नाम्रेडितस्यान्त्यस्य तु वा ॥ ९९ ॥ At the very bottom: ३

Let's double check line numbers and all sutras to be completely faithful.

Let's re-read line 20: "शस्यूषन्दोषन्द्" then gap with handwritten "यकञ्छकन्नुदञ्" ... "कञ्छकन्नुदञ्छस्प्रभृतिषु ॥ ६३ ॥ वात्वादेः षः सः ॥ ६४ ॥ णो नः ॥" Let's transcribe what is visible: शस्यूषन्दोषन्द् यकञ्छकन्नुदञ्छस्प्रभृतिषु ॥ ६३ ॥ वात्वादेः षः सः ॥ ६४ ॥ णो नः ॥

Line 18: स्मयतेः ॥ ५७ ॥ वाणौचिनि दृशोर्ह्वल्यमकिति ॥ ५८ ॥ अनुदात्तस्य चर्दुपधस्यान्यतरस्याम् ॥ ५९ ॥

Line 19: `शोर्वीरंछन्दसि छ्व्योः ॥ ६ ॥ ॥ ये च तद्धिते ॥ ६१ ॥ अचि शीर्षः ॥ ६२ ॥ पद्

कयोः 154: कास्तीराजस्तुन्दे नगरे 155: कारस्करो वृक्षः 156: पारस्करप्रभृतीनि च संज्ञायाम् 157: अनुदात्तं पदमेकवर्जम् 158: कर्षात्वतो घञोऽन्त उदात्तः 159: उञ्छादीनां च 160: अनुदात्तस्य च यत्रोदात्तलोपः

WAIT! Look at the numbering in standard Ashtadhyayi: 152 is प्रस्कण्वहरिश्चन्द्रावृषी! 153 is मस्करमस्करिणौ वेणुपरिव्राजकयोः! 154 is कास्तीराजस्तुन्दे नगरे! 155 is कारस्करो वृक्षः! 156 is पारस्करप्रभृतीनि च संज्ञायाम्! 157 is अनुदात्तं पदमेकवर्जम्! 158 is कर्षात्वतो घञोऽन्त उदात्तः! 159 is उञ्छादीनां च! 160 is अनुदात्तस्य च यत्रोदात्तलोपः!

NOW LOOK AT THE IMAGE! Line 21 has: "॥ १५२ ॥ प्रस्कण्वहरिश्चन्द्रावृषी ॥ १५३ ॥ मस्करमस्करिणौ वेणु..." Then what was printed? The printer MISPRINTED something! What did the printer print?

- wait, the text isवर्णो वर्णेनान्येते`.

Let's look at line 26: प्रत्येनसि ॥ २७ ॥ पूगेष्वन्यतरस्याम् ॥ २८ ॥ इगन्तकालकपालभगलशरावेषु द्विगौ ॥२९ ॥ Wait, 6.2.29: इगन्तकालकपालभगलशरावेषु द्विगौ - wait, is it भगल or शभाल? In Ashtadhyayi: इगन्तकालकपालशभालशरावेषु द्विगौ or भगल? In the image: इगन्तकालकपालभगलशरावेषु - look at भगल: भ, ग, ल. Yes, clearly भगल!

Line 27: बहन्यतरस्याम् ॥ ३० ॥ दिष्टिवितस्त्योश्च ॥ ३१ ॥ सप्तमी सिद्धशुष्कपक्वबन्धैश्चकालात् ॥ ३२॥ Wait, look at सिद्धशुष्कपक्वबन्धैश्चकालात्: Wait, 6.2.32: सप्तमी सिद्धशुष्कपक्वबन्धैश्च (or सिद्धशुष्कपक्वध्वाङ्क्षैरक्षेपैः? No, 2.1.something is that). Here: सिद्धशुष्कपक्व then what? Look closely at line 27: `सप्तमी

( ३६ ) अष्टाध्यायी- तदर्थे ॥ ४३ ॥ अर्थे ॥ ४४ ॥ क्ते च ॥ ४५ ॥ कर्मधारयेऽनिष्ठा ॥ ४६ ॥ अहीने द्वितीया ॥ ४७ ॥ तृतीया कर्मणि ॥ ४८ ॥ गतिरनन्तरः ॥ ४९ ॥ तादौ च निति कृत्यतौ ॥ ५० ॥ तवै चान्तश्च युगपत् ॥ ५१ ॥ अनिगन्तोऽञ्चतावप्रत्यये ॥ ५२ ॥ न्यधी च ॥ ५३ ॥ ईष- दन्यतरस्याम् ॥ ५४ ॥ हिरण्यपरिमाणं धने ॥ ५५ ॥ प्रथमोऽचिरोपसंपत्तौ ॥ ५६ ॥ कतरकतभौ कर्मधारये ॥ ५७ ॥ आर्यो ब्राह्मणकुमारयोः ॥ ५८ ॥ राजा च ॥ ५९ ॥ षष्ठी प्रव्येनेसि ॥ ६० ॥ ३ ॥ क्ते नित्यार्थे ॥ ६१ ॥ ग्रामः शिल्पिनि ॥ ६२ ॥ राजा च प्रशंसायाम् ॥ ६३ ॥ आदिरुदात्तः ॥ ६४ ॥ सप्तमीहारिणौ धर्म्येऽहरणे ॥ ६५ ॥ युक्ते च ॥ ६६ ॥ विभाषाध्यक्षे ॥ ६७ ॥ पापं च शिल्पिनि ॥ ६८ ॥ गोत्रान्तेवासिमाणवब्राह्मणेषु क्षेपे ॥ ६९ ॥ अङ्गानि मैरेये ॥ ७० ॥ भक्तरूपास्तदर्थेषु ॥ ७१ ॥ गोबिडालसिंहसैन्यवेषूप- माने ॥ ७२ ॥ अके जीविकार्थे ॥ ७३ ॥ प्राचां क्रीडायाम् ॥ ७४ ॥ अणि नियुक्ते ॥ ७५ ॥ शिल्पिनि चाक्रुञः ॥ ७६ ॥ संज्ञायां च ॥ ७७ ॥ गोतन्तिथवं पाले ॥ ७८ ॥ णिनि ॥ ॥ ७९ ॥ उपमानं शब्दार्थप्रकृतावेव ॥ ८० ॥ ४ ॥ युक्तारोहादयश्च ॥ ८१ ॥ दीर्घकाश- तुषभ्राष्ट्रवटं जे ॥ ८२ ॥ अन्यात्पूर्वं बहुचः ॥ ८३ ॥ प्रामेडनिश्वसन्तः ॥ ८४ ॥ घोषादिषु च ॥ ८५ ॥ छात्रादयः शालायाम् ॥ ८६ ॥ प्रस्थेऽवृद्धमकर्क्यादीनाम् ॥ ८७ ॥ मालादीनां च ॥ ८८ ॥ अमहन्नवन्नगरेऽनुदीचाम् ॥ ८९ ॥ अर्मे चावर्णं द्व्यच्त्र्यच् ॥ ९० ॥ भूताधि- कसंजीवमद्रामकञ्जलम् ॥ ९१ ॥ अन्तः ॥ ९२ ॥ सर्वं गुणकात्स्न्र्ये ॥ ९३ ॥ संज्ञायां गिरिनिकाययोः ॥ ९४ ॥ कुमार्यां वयसि ॥ ९५ ॥ उदकेऽकेवले ॥ ९६ ॥ द्विगौ क्रतौ ॥ ॥ ९७ ॥ सभायां नपुंसके ॥ ९८ ॥ पुरे प्राचाम् ॥ ९९ ॥ अरिष्टगौडपूर्वे च ॥ १०० ॥ ५॥ न हस्तिनफलकमर्देयाः ॥ १०१ ॥ कुसूलकूपकुम्भशालं बिले ॥ १०२ ॥ दिक्शब्दा ग्राम- जनपदद्यानचानराटेपु ॥ १०३ ॥ आचार्योपसर्जनश्चान्तेवासिनि ॥ १०४ ॥ उत्तरपद- वृद्धौ सर्वं च ॥ १०५ ॥ बहुव्रीहौ विश्वं संज्ञायाम् ॥ १०६ ॥ उदराश्वेषुषु ॥ १०७ ॥ क्षेपे ॥ १०८ ॥ नदी बन्धुनि ॥ १०९ ॥ निष्ट्रोपसर्गपूर्वमन्यतरस्याम् ॥ ११० ॥ उत्तर- पदादिः ॥ १११ ॥ कर्णो वर्णलक्षणात् ॥ ११२ ॥ संज्ञौपम्ययोश्च ॥ ११३ ॥ कण्ठपृष्ठ- ग्रीवाजत्रुं च ॥ ११४ ॥ शृङ्खमवस्थायां च ॥ ११५ ॥ नञो जरमरमित्रमृताः ॥ ११६ ॥ सोर्मनसी अलोमोपसी ॥ ११७ ॥ ऋत्वादयश्च ॥ ११८ ॥ आयुदात्तं द्व्यच्छन्दसि ॥ ११९॥ वीरवीर्यौ च ॥ १२० ॥ ६ ॥ कलतीरतूलमूलशालाक्षसममव्ययीभावे ॥ १२१ ॥ कंसरमन्थ- शूर्पपाद्यकाण्डं द्विगौ ॥ १२२ ॥ तत्पुरुषे शालायां नपुंसके ॥ १२३ कन्या च ॥ १२४ ॥ आदिश्चिह्णादीनाम् ॥ १२५ ॥ चेलखेटकटुककाण्डं गर्हायाम् ॥ १२६ ॥ चीरमुपमानम् ॥ ॥ १२७ ॥ पललसूपशाकं मिश्रे ॥ १२८ ॥ कूलसूदस्थलकर्षाः संज्ञायाम् ॥ १२९ ॥ अकर्मधारये राज्यम् ॥ १३० ॥ वर्गादयश्च ॥ १३१ ॥ पुत्रः पुम्भगः ॥ १३२ ॥ नाचार्यराजनिक्संयुक्तज्ञात्याख्येभ्यः ॥ १३३ ॥ चूर्णादीन्यप्राणिषष्ठ्याः ॥ १३४ ॥ प्रष्टू च काण्डादीनि ॥ १३५ ॥ कुण्डं वनम् ॥ १३६ ॥ प्रकृत्या भगलम् ॥ १ 'अञ्चतौ वप्रत्यये' इति पाठान्तरम् ।