वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| अध्याय ४३ ] | स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और सांनिहित्य सरोवरके सम्बन्धमें प्रश्न और लोमहर्षणका उत्तर | १८७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न च क्रोधेन निर्मुक्ताः केवलं मूढबुद्धयः।<br>एतच्छ्रुत्वाऽब्रवीद् देवी मा मैवं शंसितव्रतान् ॥ ५०<br><br>देव दर्शयात्मानं परं कौतूहलं हि मे।<br>स इत्युक्त उवाचेदं देवीं देवः स्मिताननः ॥ ५१<br><br>तिष्ठ त्वमत्र यास्यामि यत्रैते मुनिपुंगवाः।<br>साधयन्ति तपो घोरं दर्शयिष्यामि चेष्टितम् ॥ ५२ | और न कामशून्य। ये क्रोधसे मुक्त भी नहीं हैं और विचार-रहित हैं। यह सुनकर उमादेवीने कहा—नहीं, व्रत धारण करनेवाले इन लोगोंको ऐसा मत कहिये; (प्रत्युत) देव! आप अपनेको प्रकट करें। निश्चय ही मुझे बड़ा कौतूहल है। उमाके ऐसा कहनेपर शंकरने मुस्कुराकर देवीसे इस प्रकार कहा—अच्छा, तुम यहाँ रुको। ये मुनिश्रेष्ठ जहाँ घोर तपस्याकी साधना कर रहे हैं, वहाँ जाकर मैं इनकी चेष्टा कैसी है, उसे दिखलाता हूँ॥ ४९—५२॥ |
| इत्युक्ता तु ततो देवी शंकरेण महात्मना।<br>गच्छस्वेत्याह मुदिता भर्तारं भुवनेश्वरम् ॥ ५३<br><br>यत्र ते मुनयः सर्वे काष्ठलोष्ठसमाः स्थिताः।<br>अधीयाना महाभागाः कृताग्निसदनक्रियाः ॥ ५४<br><br>तान् विलोक्य ततो देवो नग्नः सर्वाङ्गसुन्दरः।<br>वनमालाकृतापीडो युवा भिक्षाकपालभृत् ॥ ५५<br><br>आश्रमे पर्यटन् भिक्षां मुनीनां दर्शनं प्रति।<br>देहि भिक्षां ततश्चोक्त्वा ह्याश्रमादाश्रमं ययौ ॥ ५६ | जब महात्मा शंकरने देवी उमासे इस प्रकार कहा तब उमादेवी प्रसन्न हो गयीं और भुवनोंके पालन करनेवाले भुवनेश्वर शिवसे बोलीं—अच्छा, जिस स्थानपर लकड़ी और मिट्टीके ढेलेके समान निश्चेष्ट, अग्निहोत्री एवं अध्ययनमें लगे हुए मुनिगण रहते हैं, उस स्थानपर आप जायँ। (फिर उमाद्वारा इस प्रकार प्रेरित किये जानेपर शंकरजी मुनिमण्डलीकी ओर जानेके लिये प्रस्तुत हो गये) फिर शंकरने उस मुनिमण्डलीको देखकर वनमाला धारण कर लिया। तब वे सर्वाङ्गसुन्दर (पर) नग्न-सुडौल देह धारण कर युवाके रूपमें हो गये और भिक्षा-पात्र हाथमें लेकर मुनियोंके सामने भिक्षाके लिये भ्रमण करते हुए 'भिक्षा दो' यह कहते हुए एक आश्रमसे दूसरे आश्रममें जाने लगे ॥ ५३—५६ ॥ |
| तं विलोक्याश्रमगतं योषितो ब्रह्मवादिनाम्।<br>सकौतुकस्वभावेन तस्य रूपेण मोहिताः ॥ ५७<br><br>प्रोचुः परस्परं नार्य एहि पश्याम भिक्षुकम्।<br>परस्परमिति चोक्त्वा गृह्य मूलफलं बहु ॥ ५८<br><br>गृहाण भिक्षामूचुस्तास्तं देवं मुनियोषितः।<br>स तु भिक्षाकपालं तं प्रसार्य बहु सादरम् ॥ ५९<br><br>देहि देहि शिवं वोऽस्तु भवतीभ्यस्तपोवने।<br>हसमानस्तु देवेशस्तत्र देव्या निरीक्षितः।<br>तस्मै दत्त्वैव तां भिक्षां पप्रच्छुस्तं स्मरातुराः ॥ ६० | एक आश्रमसे दूसरे आश्रममें घूम रहे उन नग्न युवाको देखकर ब्रह्मवादियोंकी स्त्रियाँ उत्सुकताके साथ स्वभाववश उनके रूपसे मोहित हो गयीं और परस्परमें कहने लगीं—आओ, भिक्षुकको देखा जाय। आपसमें इस प्रकार कहकर बहुत-सा मूल-फल लेकर मुनि-पत्नियोंने उन देवसे कहा—आप भिक्षा ग्रहण करें। उन्होंने भी अत्यन्त आदरसे उस भिक्षापात्रको फैलाकर (सामने दिखाकर) कहा-तपोवनवासिनियो! (भिक्षा) दो, दो! आप सबका कल्याण हो। पार्वतीजी वहाँ हँसते हुए शंकरको देख रही थीं। कामातुर मुनिपत्नियोंने उस नग्न युवाको भिक्षा देकर उनसे पूछा— ॥ ५७–६०॥ |
| नार्य ऊचुः<br><br>कोऽसौ नाम व्रतविधिस्त्वया तापस सेव्यते।<br>यत्र नग्नेन लिङ्गेन वनमालाविभूषितः।<br>भवान् वै तापसो हृद्यो हृद्याः स्मो यदि मन्यसे ॥ ६१ | **मुनिपत्नियोंने पूछा—**तापस! आप किस व्रतके विधानका पालन कर रहे हैं, जिसमें वनमालासे विभूषित हृदयहारी तपस्वीका सुन्दर स्वरूप धारण कर नग्न-मूर्ति बनना पड़ा है? आप हमारे हृदयके आनन्दप्रद तापस हैं, यदि आप मानें तो हम भी आपकी |
१८८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ४३ इत्युक्तस्तापसीभिस्तु प्रोवाच हसिताननः । इदमीदृग् व्रतं किंचिन्न रहस्यं प्रकाश्यते ॥ ६२ शृण्वन्ति बहवो यत्र तत्र व्याख्या न विद्यते । अस्य व्रतस्य सुभगा इति मत्वा गमिष्यथ ॥ ६३ एवमुक्तास्तदा तेन ताः प्रत्यूचुस्तदा मुनिम् । रहस्ये हि गमिष्यामो मुने नः कौतुकं महत् ॥ ६४ इत्युक्त्वा तास्तदा तं वै जगृहुः पाणिपल्लवैः । काचित् कण्ठे सकन्दर्पा बाहुभ्यामपरास्तथा ॥ ६५ जानुभ्यामपरा नार्यः केशेषु ललितापराः । अपरास्तु कटीरन्धे अपराः पादयोरपि ॥ ६६ क्षोभं विलोक्य मुनय आश्रमेषु स्वयोषिताम् । हन्यतामिति संभाष्य काष्ठपाषाणपाणयः ॥ ६७ पातयन्ति स्म देवस्य लिङ्गमुद्धृत्य भीषणम् । पतिते तु ततो लिङ्गे गतोऽन्तर्धानमीश्वरः ॥ ६८ देव्या स भगवान् रुद्रः कैलासं नगमाश्रितः । पतिते देवदेवस्य लिङ्गे नष्टे चराचरे ॥ ६९ क्षोभो बभूव सुमहानृषीणां भावितात्मनाम् । एवं देवे तदा तत्र वर्तति व्याकुलीकृते ॥ ७० उवाचैको मुनिवरस्तत्र बुद्धिमतां वरः । न वयं विद्मः सद्भावं तापसस्य महात्मनः ॥ ७१ विरिञ्चिं शरणं यामः स हि ज्ञास्यति चेष्टितम् । एवमुक्ताः सर्व एव ऋषयो लज्जिता भृशम् ॥ ७२ ब्रह्मणः सदनं जग्मुर्देवैः सह निषेवितम् । प्रणिपत्याथ देवेशं लज्जयाऽधोमुखाः स्थिताः ॥ ७३ अथ तान् दुःखितान् दृष्ट्वा ब्रह्मा वचनमब्रवीत् । अहो मुग्धा यदा यूयं क्रोधेन कलुषीकृताः ॥ ७४ न धर्मस्य क्रिया काचिज्ज्ञायते मूढबुद्धयः । श्रूयतां धर्मसर्वस्वं तापसाः क्रूरचेष्टिताः ॥ ७५ मनोऽनुकूल प्रिया हो सकती हैं। उन्होंने तपस्विनियोंके इस प्रकार कहनेपर हँसते हुए कहा - यह व्रत ऐसा है कि इसका कुछ भी रहस्य प्रकट नहीं किया जा सकता। सौभाग्यशालिनियो ! जहाँ बहुत-से सुननेवाले हों वहाँ इस व्रतकी व्याख्या नहीं की जा सकती। इसलिये यह जानकर आप सभी चली जायँ। उनके ऐसा कहनेपर उन्होंने मुनिसे कहा - मुने ! हम सब (यह जाननेके लिये) एकान्तमें चलेंगी; (क्योंकि) हमें महान् कौतूहल हो रहा है ॥ ६१-६४ ॥ यह कहकर उन सभीने उनको अपने कोमल हाथोंसे पकड़ लिया। कुछ कामसे आतुर होकर कण्ठसे लिपट गयीं और कुछने उन्हें भुजाओंमें बाँध लिया; कुछ स्त्रियोंने उन्हें घुटनोंसे पकड़ लिया; कुछ सुन्दरी स्त्रियाँ उनके केश छूने लगीं; और कुछ उनकी कमरसे लिपट गयीं एवं कुछने उनके पैरोंको पकड़ लिया। मुनियोंने आश्रममें अपनी स्त्रियोंकी अधीरता देख 'मारो-मारो' - इस प्रकार कहते हुए हाथोंमें डंडा और पत्थर लेकर शिवके लिङ्गको ही उखाड़कर फेंक दिया। लिङ्गके गिरा दिये जानेपर भगवान् शंकर अन्तर्हित हो गये ॥ ६५-६८ ॥ वे भगवान् रुद्र उमादेवीके साथ कैलास पर्वतपर चले गये। देवदेव शंकरके लिङ्गके गिरनेपर प्रायः समस्त चर-अचर जगत् नष्ट हो गया। इससे आत्मनिष्ठ महर्षियोंको व्याकुलता हुई। इसी प्रकार देवके (भी) व्याकुल हो जानेपर एक अत्यन्त बुद्धिमान् श्रेष्ठ मुनिने कहा - हम उन महात्मा तापसके सद्भाव (सदाशय) - को नहीं जानते। हम ब्रह्माकी शरणमें चलें। वे ही उनकी चेष्टा (रहस्य) समझ सकेंगे। ऐसा कहनेपर सभी ऋषि अत्यन्त लज्जित हो गये ॥ ६९-७२ ॥ फिर, वे लोग देवताओंसे उपासित ब्रह्माके लोकमें गये। वहाँ देवेश (ब्रह्मा) - को प्रणाम कर लज्जासे मुख नीचा कर खड़े हो गये। उसके बाद ब्रह्माने उन्हें दुःखी देखकर यह वचन कहा - अहो, क्रोध करनेसे तुम सबका मन कलुषित हो गया है, इसलिये मूढ़ हो गये हो। मूढ बुद्धिवालो ! तुम सब धर्मकी कोई वास्तविक क्रिया नहीं जानते। अप्रिय कर्म करनेवाले तापसो ! धर्मके सारभूत रहस्यको सुनो, जिसे
अध्याय ४३ ] स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और सांनिहत्य सरोवरके सम्बन्धमें प्रश्न और लोमहर्षणका उत्तर १८९ विदित्वा यद् बुधः क्षिप्रं धर्मस्य फलमाप्नुयात्। योऽसावात्मनि देहेऽस्मिन् विभुर्नित्यो व्यवस्थितः ॥ ७६ सोऽनादिः स महास्थाणुः पृथक्त्वे परिसूचितः। मणिर्यथोपधानेन धत्ते वर्णोज्ज्वलोऽपि वै ॥ ७७ तन्मयो भवते तद्वदात्माऽपि मनसा कृतः। मनसो भेदमाश्रित्य कर्मभिश्चोपचीयते ॥ ७८ ततः कर्मवशाद् भुङ्क्ते संभोगान् स्वर्गनारकान्। तन्मनः शोधयेद् धीमाञ्ज्ञानयोगाद्युपक्रमैः ॥ ७९ तस्मिञ्छुद्धे ह्यन्तरात्मा स्वयमेव निराकुलः। न शरीरस्य संक्लेशैरपि निर्दहनात्मकैः ॥ ८० शुद्धिमाप्नोति पुरुषः संशुद्धं यस्य नो मनः। क्रिया हि नियमार्थाय पातकेभ्यः प्रकीर्तिताः ॥ ८१ यस्मादत्याविलं देहं न शीघ्रं शुद्ध्यते किल। तेन लोकेषु मार्गोऽयं सत्पथस्य प्रवर्तितः ॥ ८२ वर्णाश्रमविभागोऽयं लोकाध्यक्षेण केनचित्। निर्मितो मोहमाहात्म्यं चिह्नं चोत्तमभागिनाम् ॥ ८३ भवन्तः क्रोधकामाभ्यामभिभूताश्रमे स्थिताः। ज्ञानिनामाश्रमो वेश्म अनाश्रममयोगिनाम् ॥ ८४ क्व च न्यस्तसमस्तेच्छा क्व च नारीमयो भ्रमः। क्व क्रोधमीदृशं घोरं येनात्मानं न जानथ ॥ ८५ यत्क्रोधनो यजति यच्च ददाति नित्यं यद् वा तपस्तपति यच्च जुहोति तस्य। प्राप्नोति नैव किमपीह फलं हि लोके मोघं फलं भवति तस्य हि क्रोधनस्य ॥ ८६ जानकर बुद्धिमान् मनुष्य शीघ्र ही कर्मका फल प्राप्त करता है। हम सबके इस शरीरमें रहनेवाला जो नित्य विभु (परमेश्वर) है, वह आदि-अन्त-रहित एवं महा स्थाणु है। (विचार करनेपर) वह (देही) इस शरीरसे अलग प्रतीत होता है। जिस प्रकार उज्ज्वल वर्णकी मणि भी आश्रयके प्रभावसे उसी रूपकी भासती है, उसी प्रकार आत्मा भी मनसे संयुक्त होकर मनके भेदका आश्रय कर कर्मोंसे ढक जाता है। उसके बाद कर्मवश वह स्वर्गीय तथा नारकीय भोगोंको भोगता रहता है। बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि ज्ञान तथा योग आदि उपायोंद्वारा मनका शोधन करे ॥ ७३-७९ ॥ मनके शुद्ध होनेपर अन्तरात्मा अपने-आप निर्मल हो जाता है। जिसका मन शुद्ध नहीं है, ऐसा पुरुष शरीरको सुखानेवाले क्लेशोंके द्वारा शुद्ध नहीं होता। पापोंसे बचनेके लिये ही (धर्म्य) क्रियाओंका विधान हुआ है, अतः अत्यन्त पापपूर्ण शरीर (स्वतः) शीघ्र शुद्ध नहीं होता। इसीलिये लोकमें सत्पथ-शास्त्रविहित क्रियाओंका यह मार्ग प्रवर्तित हुआ है। किसी दिव्यद्रष्टा लोक-स्वामीने उत्तम भाग्यवालोंके निमित्त मोह-माहात्म्यके प्रतीकस्वरूप इस वर्णाश्रम-विभागका निर्माण किया है ॥ ८०-८३ ॥ आपलोग आश्रममें रहते हुए भी क्रोध तथा कामके वशीभूत हैं। ज्ञानियोंके लिये घर ही आश्रम है और अयोगियों (अज्ञानियों)-के लिये आश्रम भी अनाश्रम है। कहाँ समस्त कामनाओंका त्याग और कहाँ नारीमय यह भ्रम-जाल। (कहाँ तप और) कहाँ तो इस प्रकारका क्रोध, जिससे तुमलोग अपने आत्मा (शिव)-को नहीं पहचान पाते। क्रोधी पुरुष लोकमें जो सदा यज्ञ करता है, जो दान देता है अथवा जो तप या हवन करता है, उसका कोई फल उसे नहीं मिलता। उस क्रोधीके सभी फल व्यर्थ होते हैं ॥ ८४-८६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४३ ॥
४७- स्थाणुतीर्थके सन्दर्भमें राजा वेनका चरित्र, पृथु-जन्म और उनका अभिषेक, वेनके उद्धारके लिये पृथुका प्रयत्न और वेनकी शिव-स्तुति
| १९० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४४ |
|---|
चौवालीसवाँ अध्याय
ऋषियोंसहित ब्रह्माजीका शंकरजीकी शरणमें जाना और स्तवन; स्थाण्वीश्वरप्रसङ्ग और हस्तिरूप शंकरकी स्तुति एवं लिङ्गमें संनिधान
| सनत्कुमार उवाच | सनत्कुमारने कहा— उन सभी ऋषियोंने ब्रह्माकी इस वाणीको सुनकर संसारके कल्याणार्थ पुनः उपाय पूछा॥ १॥ |
|---|---|
| ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा ऋषयः सर्व एव ते।<br>पुनरेव च पप्रच्छुर्जगतः श्रेयकारणम्॥ १ | |
| ब्रह्मोवाच | ब्रह्माने कहा— (उत्तर दिया) (आओ), हम सभी लोग हाथमें शूल धारण करनेवाले, त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरकी शरणमें चलें। तुम सब लोग उन्हीं देवदेवके प्रसादसे पहले-जैसे हो जाओगे। ब्रह्माके ऐसा कहनेपर वे लोग उनके साथ श्रेष्ठ पर्वत कैलासपर चले गये और वहाँ उन लोगोंने उमा (पार्वती)-के साथ बैठे हुए शंकरका दर्शन किया। उसके बाद संसारके पितामह ब्रह्माने देवोंके इष्टदेव, तीनों लोकोंके स्वामी वरदानी भगवान् शंकरकी स्तुति करनी आरम्भ की—॥ २—४॥ |
| गच्छामः शरणं देवं शूलपाणिं त्रिलोचनम्।<br>प्रसादाद् देवदेवस्य भविष्यथ यथा पुरा॥ २ | |
| इत्युक्ता ब्रह्मणा सार्धं कैलासं गिरिमुत्तमम्।<br>ददृशुस्ते समासीनमुमया सहितं हरम्॥ ३ | |
| ततः स्तोतुं समारब्धो ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>देवाधिदेवं वरदं त्रैलोक्यस्य प्रभुं शिवम्॥ ४ | |
| ब्रह्मोवाच | पिनाक धारण करनेवाले वरदानी अनन्त महादेव! स्थाणुस्वरूप परमात्मदेव! आपको मेरा नमस्कार है। भुवनोंके स्वामी भुवनेश्वर तारक भगवान्! आपको सदा नमस्कार है। पुरुषोत्तम! आप ज्ञान देनेवाले अद्वितीय देव हैं। आप कमलगर्भ एवं पद्मेश हैं। आपको बारम्बार नमस्कार है। (प्रचण्ड) घोर-स्वरूप एवं शान्तिमूर्ति! आपको नमस्कार है। विश्वके शासकदेव! आपको नमस्कार है। सुरनायक! आपको नमस्कार है। शूलपाणि शंकर! आपको नमस्कार है। (संसारके रचनेवाले) विश्वभावन! आपको मेरा नमस्कार है॥ ५—८॥ |
| अनन्ताय नमस्तुभ्यं वरदाय पिनाकिने।<br>महादेवाय देवाय स्थाणवे परमात्मने॥ ५ | |
| नमोऽस्तु भुवनेशाय तुभ्यं तारक सर्वदा।<br>ज्ञानानां दायको देवस्त्वमेकः पुरुषोत्तमः॥ ६ | |
| नमस्ते पद्मगर्भाय पद्मेशाय नमो नमः।<br>घोरशान्तिस्वरूपाय चण्डक्रोध नमोऽस्तु ते॥ ७ | |
| नमस्ते देव विश्वेश नमस्ते सुरनायक।<br>शूलपाणे नमस्तेऽस्तु नमस्ते विश्वभावन॥ ८ | |
| एवं स्तुतो महादेवो ब्रह्मणा ऋषिभिस्तदा।<br>उवाच मा भैर्व्रजत लिङ्गं वो भविता पुनः॥ ९ | ऋषियों और ब्रह्माने जब इस प्रकार शंकरकी स्तुति की तब महादेव शङ्करने कहा—भय मत करो; जाओ (तुमलोगोंके कल्याणार्थ) लिङ्ग फिर भी (उत्पन्न) हो जायगा। मेरे वचनका शीघ्र पालन करो। लिङ्गकी प्रतिष्ठा कर देनेपर निस्सन्देह मुझे अत्यन्त प्रसन्नता होगी। जो व्यक्ति भक्तिके साथ मेरे लिङ्गकी पूजा करेंगे उनके लिये कोई भी पदार्थ कभी दुर्लभ न होगा। |
| क्रियतां मद्वचः शीघ्रं येन मे प्रीतिरुत्तमा।<br>भविष्यति प्रतिष्ठायां लिङ्गस्यात्र न संशयः॥ १० | |
| ये लिङ्गं पूजयिष्यन्ति मामकं भक्तिमाश्रिताः।<br>न तेषां दुर्लभं किंचिद् भविष्यति कदाचन॥ ११ |
| अध्याय ४४ ] | ऋषियोंसहित ब्रह्माजीका शंकरजीकी शरणमें जाना और स्तवन | १९१ |
|---|
| सर्वेषामेव पापानां कृतानामपि जानता।<br>शुद्ध्यते लिङ्गपूजायां नात्र कार्या विचारणा॥ १२ | जानकर किये गये समस्त पापोंकी भी शुद्धि लिङ्गकी पूजा करनेसे हो जाती है; इसमें किसी प्रकारका अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये॥ ९—१२॥ | | युष्माभिः पतितं लिङ्गं सारयित्वा महत्सरः।<br>सांनिहत्यं तु विख्यातं तस्मिञ्शीघ्रं प्रतिष्ठितम्॥ १३<br><br>यथाभिलषितं कामं ततः प्राप्स्यथ ब्राह्मणाः।<br>स्थाणुर्नाम्ना हि लोकेषु पूजनीयो दिवौकसाम्॥ १४<br><br>स्थाण्वीश्वरे स्थितो यस्मात्स्थाण्वीश्वरस्ततः स्मृतः।<br>ये स्मरन्ति सदा स्थाणुं ते मुक्ताः सर्वकिल्बिषैः॥ १५<br><br>भविष्यन्ति शुद्धदेहा दर्शनान्मोक्षगामिनः।<br>इत्येवमुक्ता देवेन ऋषयो ब्रह्मणा सह॥ १६<br><br>तस्माद् दारुवनाल्लिङ्गं नेतुं समुपचक्रमुः।<br>न तं चालयितुं शक्तास्ते देवा ऋषिभिः सह॥ १७ | तुमलोगोंने लिङ्गको गिरा दिया है, इसलिये शीघ्र ही उसे उठाकर प्रसिद्ध महान् सांनिहित्य-सरोवरमें स्थापित करो। ब्राह्मणो! ऐसा करनेसे तुमलोग अपने इच्छानुकूल मनोरथोंको प्राप्त करोगे। सारे संसारमें उस लिङ्गकी प्रसिद्धि स्थाणु नामसे होगी। देवताओंद्वारा (भी) वह पूज्य होगा। वह लिङ्ग स्थाण्वीश्वरमें स्थित रहनेके कारण स्थाण्वीश्वर नामसे स्मरण किया जायगा। जो स्थाण्वीश्वरको सदा स्मरण करेंगे, उनके सारे पाप कट जायँगे और वे पवित्र-देह होकर मोक्षकी प्राप्ति करेंगे। जब शंकरने ऐसा कहा तब ब्रह्माके सहित ऋषिलोग लिङ्गको उस दारुवनसे ले जानेका उद्योग करने लगे। किंतु ऋषियोंसहित वे सभी देवगण उसे हिलाने-डुलानेमें समर्थ न हो सके॥ १३—१७॥ | | श्रमेण महता युक्ता ब्रह्माणं शरणं ययुः।<br>तेषां श्रमाभितप्तानामिदं ब्रह्माऽब्रवीद् वचः॥ १८<br><br>किं वा श्रमेण महता न यूयं वहनक्षमाः।<br>स्वेच्छया पतितं लिङ्गं देवदेवेन शूलिना॥ १९<br><br>तस्मात् तमेव शरणं यास्यामः सहिताः सुराः।<br>प्रसन्नश्च महादेवः स्वयमेव नयिष्यति॥ २०<br><br>इत्येवमुक्ता ऋषयो देवाश्च ब्रह्मणा सह।<br>कैलासं गिरिमासेदू रुद्रदर्शनकाङ्क्षिणः॥ २१ | (फिर) वे बहुत परिश्रम करके ब्रह्माकी शरणमें गये। ब्रह्माने परिश्रमसे श्रान्त-क्लान्त (संतप्त) हुए उन लोगोंसे यह वचन कहा—देवताओ! अत्यन्त कठोर परिश्रम करनेसे क्या लाभ? तुमलोग इसे उठानेमें समर्थ नहीं हो। देवाधिदेव भगवान् शंकरने अपनी इच्छासे इस लिङ्गको गिराया है। अतः हे देवो! हम सभी एक साथ उन्हीं भगवान् शंकरकी शरणमें चलें। महादेव सन्तुष्ट होकर अपने-आप ही (लिङ्गको) ले जायँगे। इस प्रकार ब्रह्माके कहनेपर सभी ऋषि और देवता ब्रह्माके साथ शंकरजीके दर्शनकी अभिलाषासे कैलासपर्वतपर पहुँचे॥ १८—२१॥ | | न च पश्यन्ति तं देवं ततश्चिन्तासमन्विताः।<br>ब्रह्माणमूचुर्मुनयः क्व स देवो महेश्वरः॥ २२<br><br>ततो ब्रह्मा चिरं ध्यात्वा ज्ञात्वा देवं महेश्वरम्।<br>हस्तिरूपेण तिष्ठन्तं मुनिभिर्मानसैः स्तुतम्॥ २३<br><br>अथ ते ऋषयः सर्वे देवाश्च ब्रह्मणा सह।<br>गता महत्सरः पुण्यं यत्र देवः स्वयं स्थितः॥ २४<br><br>न च पश्यन्ति तं देवमन्विष्यन्तस्ततस्ततः।<br>ततश्चिन्तान्विता देवा ब्रह्मणा सहिताः स्थिताः॥ २५ | वहाँ उन लोगोंने शंकरजीको नहीं देखा। तब वे चिन्तित हो गये। फिर उन्होंने ब्रह्माजीसे पूछा (कि ब्रह्मन्) वे महेश्वरदेव कहाँ हैं? उसके बाद ब्रह्माने चिरकालतक ध्यान लगाया और देखा कि मुनियोंके अन्तः-करणसे स्तुत महेश्वर देव हाथीके आकारमें स्थित हैं। उसके पश्चात् वे ऋषि और ब्रह्माके सहित सभी देवता उस पावन महान् सरोवरपर गये जहाँ भगवान् शंकर स्वयं उपस्थित थे। वे लोग वहाँ इधर-उधर चारों ओर उन्हें ढूँढ़ने लगे, फिर भी शंकरजीका दर्शन न पा सके। ब्रह्माके साथ दर्शन न पानेके कारण सभी देवता चिन्तित |
४८- वेन-कृत शिव-स्तुति एवं स्थाणुतीर्थका माहात्म्य, वेन आदिकी सुगतिका वर्णन
| १९२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४४ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पश्यन्ति देवीं सुप्रीतां कमण्डलुविभूषिताम्।<br>प्रीयमाणा तदा देवी इदं वचनमब्रवीत्॥ २६ | हो गये। उसके बाद उन्होंने कमण्डलुसे सुशोभित देवीको अत्यन्त प्रसन्न देखा। उस समय प्रसन्न होती हुई देवी उनसे यह वचन बोलीं—॥ २२-२६॥ |
| श्रमेण महता युक्ता अन्विष्यन्तो महेश्वरम्।<br>पीयताममृतं देवास्ततो ज्ञास्यथ शङ्करम्।<br>एतच्छ्रुत्वा तु वचनं भवान्या समुदाहृतम्॥ २७<br>सुखोपविष्टास्ते देवाः पपुस्तदमृतं शुचि।<br>अनन्तरं सुखासीनाः पप्रच्छुः परमेश्वरीम्॥ २८<br><br>क्व स देव इहायातो हस्तिरूपधरः स्थितः।<br>दर्शितश्च तदा देव्या सरोमध्ये व्यवस्थितः॥ २९<br><br>दृष्ट्वा देवं हर्षयुक्ताः सर्वे देवाः सहर्षिभिः।<br>ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा इदं वचनमब्रुवन्॥ ३० | महेश्वरको ढूँढ़ते हुए तुमलोग अत्यन्त श्रान्त हो गये हो। देवो! तुम सब अमृतका पान करो। तब तुम सब शङ्करको जान सकोगे। भवानीद्वारा कही हुई इस वाणीको सुनकर वे देवता सुखपूर्वक बैठ गये और उन्होंने उस पवित्र अमृतको पी लिया। उसके बाद सुखपूर्वक बैठे हुए उन देवताओंने परमेश्वरीसे पूछा— देवि! हाथीके रूपको धारण किये हुए भगवान् शंकर देव यहाँ किस स्थानपर आये हुए हैं? देवताओंके इस प्रकार पूछनेपर देवीने सरोवरके बीचमें स्थित शंकरको उन्हें दिखला दिया। ऋषियोंके साथ सभी देवता उनका दर्शन पाकर हर्षित हो गये और ब्रह्माको आगे कर शंकरजीसे ये वचन बोले—॥ २७-३०॥ |
| त्वया त्यक्तं महादेव लिङ्गं त्रैलोक्यवन्दितम्।<br>तस्य चानयने नान्यः समर्थः स्यान्महेश्वर॥ ३१<br><br>इत्येवमुक्तो भगवान् देवो ब्रह्मादिभिर्हरः।<br>जगाम ऋषिभिः सार्द्धं देवदारुवनाश्रमम्॥ ३२<br><br>तत्र गत्वा महादेवो हस्तिरूपधरो हरः।<br>करेण जग्राह ततो लीलया परमेश्वरः॥ ३३<br><br>तमादाय महादेवः स्तूयमानो महर्षिभिः।<br>निवेशयामास तदा सरःपार्श्वे तु पश्चिमे॥ ३४<br><br>ततो देवाः सर्व एव ऋषयश्च तपोधनाः।<br>आत्मानं सफलं दृष्ट्वा स्तवं चक्रुर्महेश्वरे॥ ३५ | महेश्वर! आपने तीनों लोकोंमें वन्दित जिस लिङ्गको छोड़ दिया है, उसे ले आनेमें दूसरे किसीकी शक्ति नहीं है, उसे कोई दूसरा उठा नहीं सकता। इस प्रकार ब्रह्मा आदि देवताओंने जब भगवान् शंकरसे कहा, तब देवदेव शिवजी ऋषियोंके साथ देवदारुवनके आश्रममें चले गये। वहाँ जाकर हाथीका रूप धारण करनेवाले महादेव शिवने खेल-खेलमें (लिङ्गको) अपने सूँड़से पकड़कर उठा लिया। शंकरजी महर्षियोंके द्वारा स्तुति किये जाते हुए उस लिङ्गको लाकर सरोवरके पास पश्चिम दिशामें स्थापित कर दिया। उसके बाद सभी देवता एवं तपस्वी ऋषियोंने अपनेको सफल समझा और वे भगवान् शंकरकी स्तुति करने लगे॥ ३१-३५॥ |
| नमस्ते परमात्मन् अनन्तयोने लोकसाक्षिन्<br>परमेष्ठिन् भगवन् सर्वज्ञ क्षेत्रज्ञ परावरज्ञ ज्ञानज्ञेय<br>सर्वेश्वर महाविरिञ्च महाविभूते महाक्षेत्रज्ञ<br>महापुरुष सर्वभूतावास मनोनिवास आदिदेव<br>महादेव सदाशिव ईशान दुर्विज्ञेय दुराराध्य महाभूतेश्वर<br>परमेश्वर महायोगेश्वर त्र्यम्बक महायोगिन् परब्रह्मन्<br>परमज्योति ब्रह्मविदुत्तम ॐकार वषट्कार<br>स्वाहाकार स्वधाकार परमकारण सर्वगत सर्वदर्शिन् | परमात्मन्! अनन्तयोने! लोकसाक्षिन्! परमेष्ठिन्!<br>भगवन्! सर्वज्ञ! क्षेत्रज्ञ! हे पर और अवरके ज्ञाता!<br>ज्ञानज्ञेय! सर्वेश्वर! महाविरिञ्च! महाविभूते! महाक्षेत्रज्ञ!<br>महापुरुष! हे सब भूतोंके निवास! मनोनिवास! आदिदेव!<br>महादेव! सदाशिव! ईशान! दुर्विज्ञेय! दुराराध्य! महाभूतेश्वर!<br>परमेश्वर! महायोगेश्वर! त्र्यम्बक! महायोगिन्! परब्रह्मन्!<br>परमज्योति! ब्रह्मविद्! उत्तम! ॐकार! वषट्कार!<br>स्वाहाकार! स्वधाकार! परमकारण! सर्वगत! सर्वदर्शिन्! |
| अध्याय ४५ ] | सांनिहितसर—स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और स्थाणुलिङ्गका माहात्म्य-वर्णन | १९३ |
|---|
| सर्वशक्ते सर्वदेव अज सहस्रार्चि पृषार्चि सुधामन् हरधाम अनन्तधाम संवर्त संकर्षण वडवानल अग्नीषोमात्मक पवित्र महापवित्र महामेघ महामायाधर महाकाम कामहन् हंस परमहंस महाराजिक महेश्वर महाकामुक महाहंस भवक्षयकर सुरसिद्धाच्चित हिरण्यवाह हिरण्यरेता हिरण्यनाभ हिरण्याग्रकेश मुञ्जकेशिन् सर्वलोकवरप्रद सर्वानुग्रहकर कमलेशय कुशेशय हृदयेशाय ज्ञानोदधे शम्भो विभो महायज्ञ महायाज्ञिक सर्वयज्ञमय सर्वयज्ञहृदय सर्वयज्ञसंस्तुत निराश्रय समुद्रेशय अत्रिसम्भव भक्तानुकम्पिन् अभ्रग्रयोग योगधर वासुकिमहामणि विद्योतितविग्रह हरितनयन त्रिलोचन जटाधर नीलकण्ठ चन्द्रार्धधर उमाशरीरार्धहर गजचर्मधर दुस्तरसंसारमहासंहारकर प्रसीद भक्तजनवत्सल। | सर्वशक्ति! सर्वदेव! अज! सहस्रार्चि! पृषार्चि! सुधामन्! हरधाम! अनन्तधाम! संवर्त! संकर्षण! वडवानल, अग्नि और सोमस्वरूप! पवित्र! महापवित्र! महामेघ! महामायाधर! महाकाम! कामहन्! हंस! परमहंस! महाराजिक! महेश्वर! महाकामुक! महाहंस! भवक्षयकर! हे देवों और सिद्धोंसे पूजित! हिरण्यवाह! हिरण्यरेता! हिरण्यनाभ! हिरण्याग्रकेश! मुञ्जकेशिन्! सर्वलोकवरप्रद! सर्वानुग्रहकर! कमलेशय! कुशेशय! हृदयेशय! ज्ञानोदधे! शम्भो! विभो! महायज्ञ! महायाज्ञिक! सर्वयज्ञमय! सर्वयज्ञहृदय! सर्वयज्ञसंस्तुत! निराश्रय! समुद्रेशय! अत्रिसम्भव! भक्तानुकम्पिन्! अभ्रग्रयोग! योगधर! हे वासुकि और महामणिसे द्युतिमान् शिव! हरितनयन! त्रिलोचन! जटाधर! नीलकण्ठ! चन्द्रार्धधर! उमाशरीरार्धहर! गजचर्मधर! दुस्तरसंसारका महासंहार करनेवाले महाप्रलयंकर शिव! हमारा आपको नमस्कार है। भक्तजनवत्सल शङ्कर! आप हम सबपर प्रसन्न हों। |
| एवं स्तुतो देवगणैः सुभक्त्या<br> सब्रह्ममुख्यैश्च पितामहेन।<br>त्यक्त्वा तदा हस्तिरूपं महात्मा<br> लिङ्गे तदा संनिधानं चकार॥ ३६॥ | इस प्रकार पितामह ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवगणोंके साथ भक्तिपूर्वक स्तुति करनेपर उन महात्माने हस्तिरूपका त्यागकर लिङ्गमें सन्निधान (निवास) कर लिया॥ ३६॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौवालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४४॥
पैंतालीसवाँ अध्याय
सांनिहितसर—स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और स्थाणुलिङ्गका माहात्म्य-वर्णन
| सनत्कुमार उवाच | |
|---|---|
| अथोवाच महादेवो देवान् ब्रह्मपुरोगमान्।<br>ऋषीणां चैव प्रत्यक्षं तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम्॥ १<br>एतत् सांनिहितं प्रोक्तं सरः पुण्यतमं महत्।<br>मयोपसेवितं यस्मात् तस्मान्मुक्तिप्रदायकम्॥ २<br>इह ये पुरुषाः केचिद् ब्राह्मणाः क्षत्रिया विशः।<br>लिङ्गस्य दर्शनादेव पश्यन्ति परमं पदम्॥ ३<br>अहन्यहनि तीर्थानि आसमुद्रसरांसि च।<br>स्थाणुतीर्थं समेष्यन्ति मध्यं प्राप्ते दिवाकरे॥ ४ | **सनत्कुमारने कहा—**इसके बाद महादेवने ऋषियोंके सामने (ही) ब्रह्मा आदि देवोंसे परमश्रेष्ठ तीर्थके माहात्म्यको कहा। ऋषियो! यह सांनिहित नामक सरोवर अत्यन्त पवित्र एवं महान् कहा गया है। यतः मेरे द्वारा यह सेवित किया गया है, अतः यह मुक्ति प्रदान करनेवाला है। यहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य—सभी वर्णोंके पुरुष लिङ्गका दर्शन कर ही परम पदका दर्शन करते हैं। समुद्रसे लेकर सरोवरतकके तीर्थ प्रतिदिन भगवान् सूर्यके आकाशके मध्यमें आ जानेपर (दोपहरमें) स्थाणुतीर्थमें आ जाते हैं॥ १–४॥ |
४९- चार मुखोंकी उत्पत्ति-कथा, ब्रह्म-कृत शिवकी स्तुति और स्थाणुतीर्थका माहात्म्य
| १९४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४५ |
|---|
| स्तोत्रेणानेन च नरो यो मां स्तोष्यति भक्तितः।<br>तस्याहं सुलभो नित्यं भविष्यामि न संशयः॥ ५<br><br>इत्युक्त्वा भगवान् रुद्रो ह्यन्तर्धानं गतः प्रभुः।<br>देवाश्च ऋषयः सर्वे स्वानि स्थानानि भेजिरे॥ ६<br><br>ततो निरन्तरं स्वर्गं मानुषैर्मिश्रितं कृतम्।<br>स्थाणुलिङ्गस्य माहात्म्यं दर्शनात् स्वर्गमाप्नुयात्॥ ७<br><br>ततो देवाः सर्व एव ब्रह्माणं शरणं ययुः।<br>तानुवाच तदा ब्रह्मा किमर्थमिह चागताः॥ ८ | जो मनुष्य इस स्तोत्रसे भक्तिपूर्वक मेरा स्तवन करेगा, उसके लिये मैं सदा सुलभ होऊँगा—इसमें कोई संदेह नहीं है। यह कहकर भगवान् शंकर अदृश्य हो गये। सभी देवता तथा ऋषिगण अपने-अपने स्थानको चले गये। उसके बाद पूरा—सारा-का-सारा स्वर्ग मनुष्योंसे भर गया; क्योंकि स्थाणुलिङ्गका यह माहात्म्य है कि उसका दर्शन करनेसे ही स्वर्ग प्राप्त हो जाता है। फिर सभी देवता ब्रह्माकी शरणमें गये, तब ब्रह्माने उनसे पूछा—देवताओ! आपलोग यहाँ किस कार्यसे आये हैं?॥ ५-८॥ | | ततो देवाः सर्व एव इदं वचनमब्रुवन्।<br>मानुषेभ्यो भयं तीव्रं रक्षास्माकं पितामह॥ ९<br><br>तानुवाच तदा ब्रह्मा सुरांस्त्रिदशनायकः।<br>पांशुना पूर्यतां शीघ्रं सरः शक्रे हितं कुरु॥ १०<br><br>ततो ववर्ष भगवान् पांशुना पाकशासनः।<br>सप्ताहं पूरयामास सरो देवैस्तदा वृतः॥ ११<br><br>तं दृष्ट्वा पांशुवर्षं च देवदेवो महेश्वरः।<br>करेण धारयामास लिङ्गं तीर्थवटं तदा॥ १२ | तब सभी देवताओंने यह वचन कहा—पितामह! हमलोगोंको मनुष्योंसे बहुत भारी भय हो रहा है। आप हम सबकी रक्षा करें। उसके बाद देवताओंके नेता ब्रह्माने उन देवोंसे कहा—इन्द्र! सरोवरको शीघ्र धूलिसे पाट दो और इस प्रकार इन्द्रका कल्याण करो। ब्रह्माके इस प्रकार समझानेपर पाक नामके राक्षसको मारनेवाले (पाकशासन) भगवान् इन्द्रने देवताओंके साथ सात दिनतक धूलिकी वर्षा की और सरोवरको धूलिसे पाट दिया। देवदेव महेश्वरने देवताओंद्वारा बरसायी गयी इस धूलिकी वर्षाको देखकर लिङ्ग और तीर्थवटको अपने हाथमें ले लिया॥ ९-१२॥ | | तस्मात् पुण्यतमं तीर्थमाद्यं यत्रोदकं स्थितम्।<br>तस्मिन् स्नातः सर्वतीर्थैः स्नातो भवति मानवः॥ १३<br><br>यस्तत्र कुरुते श्राद्धं वटलिङ्गस्य चान्तरे।<br>तस्य प्रीताश्च पितरो दास्यन्ति भुवि दुर्लभम्॥ १४<br><br>पूरितं च ततो दृष्ट्वा ऋषयः सर्व एव ते।<br>पांशुना सर्वगात्राणि स्पृशन्ति श्रद्धया युताः॥ १५<br><br>तेऽपि निर्धूतपापास्ते पांशुना मुनयो गताः।<br>पूज्यमानाः सुरगणैः प्रयाता ब्रह्मणः पदम्॥ १६ | इसलिये पहले जिस स्थानपर जल था, वह तीर्थ अत्यन्त पवित्र है। उसमें स्नान करनेवाला मनुष्य सभी तीर्थोंमें स्नान करनेका फल प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य वट और लिङ्गके बीचमें श्राद्ध करता है उसके पितर उसपर संतुष्ट होकर उसे पृथ्वी (भर)-में दुर्लभ वस्तु सुलभ कर देते हैं—ऐसा सुनकर वे सभी ऋषि धूलिसे भरे हुए सरोवरको देखकर श्रद्धासे अपने सभी अङ्गोंमें धूलि मलने लगे। वे मुनि भी धूलि मलनेके कारण निष्पाप हो गये और देवताओंसे पूजित होकर ब्रह्मलोक चले गये॥ १३-१६॥ | | ये तु सिद्धा महात्मानस्ते लिङ्गं पूजयन्ति च।<br>व्रजन्ति परमां सिद्धिं पुनरावृत्तिदुर्लभाम्॥ १७<br><br>एवं ज्ञात्वा तदा ब्रह्मा लिङ्गं शैलमयं तदा।<br>आद्यलिङ्गं तदा स्थाप्य तस्योपरि दधार तत्॥ १८ | जो सिद्ध महात्मा पुरुष लिङ्गकी पूजा करते वे आवागमनसे रहित होकर परमसिद्धिको प्राप्त करने लगे। ऐसा जानकर तब ब्रह्माने उस आद्यलिङ्गको नीचे रख उसके ऊपर पाषाणमय लिङ्गको स्थापित कर दिया। |
अध्याय ४५ ] सांनिहितसर-स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और स्थाणुलिङ्गका माहात्म्य-वर्णन १९५ ततः कालेन महता तेजसा तस्य रञ्जितम्। कुछ समय बीत जानेपर उसके (आद्य लिङ्गके) तस्यापि स्पर्शनात् सिद्धः परं पदमवाप्नुयात् ॥ १९ तेजसे (वह पाषाण-मूर्ति-लिङ्ग भी) रञ्जित हो गया। सिद्ध-समुदाय उसका भी स्पर्श करनेसे परमपदको ततो देवैः पुनर्ब्रह्मा विज्ञप्तो द्विजसत्तम । प्राप्त करने लगा। द्विजश्रेष्ठ ! तत्पश्चात् देवताओंने पुनः एते यान्ति परां सिद्धिं लिङ्गस्य दर्शनान्नराः ॥ २० ब्रह्माको बतलाया ब्रह्मन् ! ये मनुष्य लिङ्गका दर्शन करके परम सिद्धिको प्राप्त करनेका लाभ उठा रहे हैं। देवताओंसे यह सुनकर भगवान् ब्रह्माने देवताओंके तच्छ्रुत्वा भगवान् ब्रह्मा देवानां हितकाम्यया। मंगलकी इच्छासे एकके ऊपर एक, इस प्रकार सात उपर्युपरि लिङ्गानि सप्त तत्र चकार ह ॥ २१ लिङ्गोंको स्थापित कर दिया ॥ १७-२१ ॥ ततो ये मुक्तिकामाश्च सिद्धाः शमपरायणाः। उसके बाद मुक्तिके अभिलाषी शम (दमादि)- सेव्यं पांशुं प्रयत्नेन प्रयाताः परमं पदम् ॥ २२ में लगे रहनेवाले सिद्धगण यत्नपूर्वक धूलिका सेवनकर पांशवोऽपि कुरुक्षेत्रे वायुना समुदीरिताः। परमपदको प्राप्त करने लगे। (वस्तुतः) कुरुक्षेत्रमें वायुके चलनेसे उड़ी हुई धूल भी बड़े-बड़े पापियोंको महादुष्कृतकर्माणं प्रयान्ति परमं पदम् ॥ २३ मुक्ति दे देती है। किसी स्त्री या पुरुषने चाहे जानेमें या अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि स्त्रियो वा पुरुषस्य वा। अनजानेसे पाप किया हो तो उसके सारे पाप स्थाणु- नश्यते दुष्कृतं सर्वं स्थाणुतीर्थप्रभावतः ॥ २४ तीर्थके प्रभावसे नष्ट हो जाते हैं। लिङ्गका दर्शन करनेसे और वटका स्पर्श करनेसे मुक्ति प्राप्त होती है और लिङ्गस्य दर्शनान्मुक्तिः स्पर्शनाच्च वटस्य च। उसके निकट जलमें स्नान करनेसे मनुष्य मनचाहे तत्संनिधौ जले स्नात्वा प्राप्नोत्यभिमतं फलम् ॥ २५ फलको प्राप्त करता है। उस जलमें पितरोंका तर्पण पितॄणां तर्पणं यस्तु जले तस्मिन् करिष्यति। करनेवाला व्यक्ति जलके प्रत्येक बिन्दुमें अनन्त फलको बिन्दौ बिन्दौ तु तोयस्य अनन्तफलभाग्भवेत् ॥ २६ प्राप्त करता है ॥ २२-२६ ॥ यस्तु कृष्णतिलैः सार्द्धं लिङ्गस्य पश्चिमे स्थितः। लिङ्गसे पश्चिम दिशामें काले तिलोंसे श्रद्धापूर्वक तर्पयेच्छ्रद्धया युक्तः स प्रीणाति युगत्रयम् ॥ २७ तर्पण करनेवाला व्यक्ति तीन युगोंतक (पितरोंको) तृप्त करता है। जबतक मन्वन्तर है और जबतक यावन्मन्वन्तरं प्रोक्तं यावल्लिङ्गस्य संस्थितिः। लिङ्गकी संस्थिति है, तबतक पितृगण संतुष्ट होकर तावत्प्रीताश्च पितरः पिबन्ति जलमुत्तमम् ॥ २८ उत्तम जलका पान करते हैं। सत्ययुगमें 'सान्निहत्य' कृते युगे सान्निहत्यं त्रेतायां वायुसंज्ञितम्। सर, त्रेतामें 'वायु' नामका हृद, कलि एवं द्वापरमें कलिद्वापरयोर्मध्ये कूपं रुद्रह्रदं स्मृतम् ॥ २९ 'रुद्रहृद' नामके कूप सेवनीय माने गये हैं। चैत्रके कृष्णपक्षकी चतुर्दशीके दिन 'रुद्रह्रद' नामक तीर्थमें चैत्रस्य कृष्णपक्षे च चतुर्दश्यां नरोत्तमः। स्नान करनेवाला उत्तम पुरुष परमपद-मुक्तिको प्राप्त स्नात्वा रुद्रह्रदे तीर्थे परं पदमवाप्नुयात् ॥ ३० करता है। रात्रिके समय वटके नीचे रहकर परमेश्वरका यस्तु वटे स्थितो रात्रिं ध्यायते परमेश्वरम्। ध्यान करनेवालेको स्थाणुवटके अनुग्रह (दया)-से स्थाणोर्वटप्रसादेन मनसा चिन्तितं फलम् ॥ ३१ मनोवाञ्छित फल प्राप्त होता है ॥ २७-३१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४५ ॥
| १९६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४६ |
|---|
छियालीसवाँ अध्याय
स्थाणुलिङ्गके समीप असंख्य लिङ्गोंकी स्थापना और उनके दर्शन-अर्चनका माहात्म्य
| सनत्कुमार उवाच<br>स्थाणोर्वटस्योत्तरतः शुक्रतीर्थं प्रकीर्तितम्।<br>स्थाणोर्वटस्य पूर्वेण सोमतीर्थं द्विजोत्तम॥ १<br>स्थाणोर्वटं दक्षिणतो दक्षतीर्थमुदाहृतम्।<br>स्थाणोर्वटात् पश्चिमत्ः स्कन्दतीर्थं प्रतिष्ठितम्॥ २<br>एतानि पुण्यतीर्थानि मध्ये स्थाणुरिति स्मृतः।<br>तस्य दर्शनमात्रेण प्राप्नोति परमं पदम्॥ ३<br>अष्टम्यां च चतुर्दश्यां यस्त्वेतानि परिक्रमेत्।<br>पदे पदे यज्ञफलं स प्राप्नोति न संशयः॥ ४<br>एतानि मुनिभिः साध्यैरादित्यैर्वसुभिस्तदा।<br>मरुद्भिर्वह्निभिश्चैव सेवितानि प्रयत्नतः॥ ५<br><br>अन्ये ये प्राणिनः केचित् प्रविष्टाः स्थाणुमुत्तमम्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्ताः प्रयान्ति परमां गतिम्॥ ६<br><br>अस्ति तत्संनिधौ लिङ्गं देवदेवस्य शूलिनः।<br>उमा च लिङ्गरूपेण हरपार्श्वं न मुञ्चति॥ ७<br><br>तस्य दर्शनमात्रेण सिद्धिं प्राप्नोति मानवः।<br>वटस्य उत्तरे पार्श्वे तक्षकेण महात्मना॥ ८<br><br>प्रतिष्ठितं महालिङ्गं सर्वकामप्रदायकम्।<br>वटस्य पूर्वदिग्भागे विश्वकर्मकृतं महत्॥ ९<br><br>लिङ्गं प्रत्यङ्मुखं दृष्ट्वा सिद्धिमाप्नोति मानवः।<br>तत्रैव लिङ्गरूपेण स्थिता देवी सरस्वती॥ १०<br>प्रणम्य तां प्रयत्नेन बुद्धिं मेधां च विन्दति।<br>वटपार्श्वे स्थितं लिङ्गं ब्रह्मणा तत् प्रतिष्ठितम्॥ ११<br><br>दृष्ट्वा वटेश्वरं देवं प्रयाति परमं पदम्।<br>ततः स्थाणुवटं दृष्ट्वा कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्॥ १२<br><br>प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तद्वीपा वसुन्धरा।<br>स्थाणोः पश्चिमदिग्भागे नकुलीशो गणः स्मृतः॥ १३ | **सनत्कुमारने कहा—**द्विजोत्तम! स्थाणुवटकी उत्तर दिशामें ‘शुक्रतीर्थ’ और स्थाणुवटकी पूर्व दिशामें ‘सोमतीर्थ’ कहा गया है। स्थाणुवटके दक्षिण ‘दक्षतीर्थ’ एवं स्थाणुवटके पश्चिममें ‘स्कन्दतीर्थ’ स्थित है। इन परम पावन तीर्थोंके बीचमें ‘स्थाणु’ नामका तीर्थ है। उसका दर्शन करनेमात्रसे परमपद (मोक्ष)-की प्राप्ति होती है। जो मनुष्य अष्टमी और चतुर्दशीको इनकी प्रदक्षिणा करता है, वह एक-एक पगपर यज्ञ करनेका फल प्राप्त करता है—इसमें कोई सन्देह नहीं है॥ १-४॥<br><br>मुनियों, साध्यों, आदित्यों, वसुओं, मरुतों एवं अग्नियोंने इन तीर्थोंका यत्नपूर्वक सेवन किया है। जो भी अन्य कोई प्राणी उस उत्तम स्थाणुतीर्थमें प्रवेश करते हैं वे भी सभी पापोंसे मुक्त होकर परम गतिको प्राप्त करते हैं। उसीके निकट त्रिशूल धारण करनेवाले देवदेव भगवान् शंकरका लिङ्ग है। उमादेवी वहाँपर लिङ्गरूपमें रहनेवाले शंकरजीके पासमें ही रहती हैं; वे उनकी बगलसे अलग नहीं होतीं। उस लिङ्गके दर्शन करनेमात्रसे मनुष्य सिद्धिको प्राप्त करता है। वटके उत्तरी भागमें महात्मा तक्षकने सभी कामनाओंको सिद्ध करनेवाले महालिङ्गको प्रतिष्ठित किया है। वटकी पूर्व दिशाकी ओर विश्वकर्माके द्वारा निर्मित किया गया महान् लिङ्ग है। पश्चिमकी ओर रहनेवाले लिङ्गका दर्शन कर मानवको सिद्धि प्राप्त होती है। वहींपर देवी सरस्वती लिङ्गरूपसे स्थित हैं॥ ५-१०॥<br><br>मनुष्य उन्हें प्रयत्न (श्रद्धा-विधि)-पूर्वक प्रणाम कर बुद्धि एवं तीव्र मेधा प्राप्त करता है। वटकी बगलमें ब्रह्माके द्वारा प्रतिष्ठापित वटेश्वर-लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य परम पदको प्राप्त करता है। तत्पश्चात् जिसने स्थाणुवटका दर्शन और प्रदक्षिणा कर ली उसकी वह मानो सातों द्वीपवाली पृथ्वीकी की हुई प्रदक्षिणा हो जाती है। स्थाणुकी पश्चिम दिशाकी ओर ‘नकुलीश’ |
अध्याय ४६] स्थाणुलिङ्गके समीप असंख्य लिङ्गोंकी स्थापना और उनके दर्शन-अर्चनका माहात्म्य १९७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तमभ्यर्च्य प्रयत्नेन सर्वपापैः प्रमुच्यते।<br>तस्य दक्षिणदिग्भागे तीर्थं रुद्रकरं स्मृतम्॥ १४ | नामके गण स्थित हैं। विधिपूर्वक उनकी पूजा करनेवाला मनुष्य सभी प्रकारके पापोंसे छूट जाता है। उनकी दक्षिण दिशामें 'रुद्रकरतीर्थ' है॥ ११—१४॥ |
| तस्मिन् स्नातः सर्वतीर्थे स्नातो भवति मानवः।<br>तस्य चोत्तरदिग्भागे रावणेन महात्मना॥ १५<br><br>प्रतिष्ठितं महालिङ्गं गोकर्णं नाम नामतः।<br>आषाढमासे या कृष्णा भविष्यति चतुर्दशी।<br>तस्यां योऽर्चति गोकर्णं तस्य पुण्यफलं शृणु॥ १६<br><br>कामतोऽकामतो वापि यत् पापं तेन संचितम्।<br>तस्माद् विमुच्यते पापात् पूजयित्वा हरं शुचिः॥ १७<br><br>कौमारब्रह्मचर्येण यत्पुण्यं प्राप्यते नरैः।<br>तत्पुण्यं सकलं तस्य अष्टम्यां योऽर्चयेच्छिवम्॥ १८ | जिसने उस (रुद्रकरतीर्थ)-में स्नान कर लिया मानो उसने सभी तीर्थोंमें स्नान कर लिया। उसकी उत्तर दिशाकी ओर महात्मा रावणने गोकर्ण नामका प्रसिद्ध महालिङ्ग स्थापित किया है। आषाढ़मासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिमें जो गोकर्णकी अर्चना करता है उसके पुण्यफलको सुनो। यदि किसीने अपनी इच्छा या अनिच्छासे भी पापसंचय कर लिया है तो वह भगवान् शंकरकी पूजा करके पवित्र हो जाता है और वह संचित पापसे छूट जाता है। जो अष्टमी तिथिमें शिवका पूजन करता है उसे कौमार-अवस्था (जन्मसे १६ वर्षकी अवस्था)-में ब्रह्मचर्य-पालनसे जो फल प्राप्त होता है वह सम्पूर्ण पुण्य-फल उसे प्राप्त होता है॥ १५—१८॥ |
| यदीच्छेत् परमं रूपं सौभाग्यं धनसंपदः।<br>कुमारेश्वरमाहात्म्यात् सिद्ध्यते नात्र संशयः॥ १९<br><br>तस्य चोत्तरदिग्भागे लिङ्गं पूज्य विभीषणः।<br>अजरामरश्चैव कल्पयित्वा बभूव ह॥ २०<br><br>आषाढस्य तु मासस्य शुक्ला या चाष्टमी भवेत्।<br>तस्यां पूज्य सोपवासो ह्यमृतत्वमवाप्नुयात्॥ २१<br><br>खरेण पूजितं लिङ्गं तस्मिन् स्थाने द्विजोत्तम।<br>तं पूजयित्वा यत्नेन सर्वकामानवाप्नुयात्॥ २२ | यदि मनुष्य उत्तम सौन्दर्य, सौभाग्य या धन-सम्पत्ति चाहता है तो (उसे कुमारेश्वरकी आराधना करनी चाहिये; क्योंकि) कुमारेश्वरके माहात्म्यसे उसे निस्सन्देह उन सबकी सिद्धि प्राप्त होती है। उन (कुमारेश्वर)-के उत्तर भागमें विभीषणने शिव-लिङ्गको स्थापित कर उसकी पूजा की, जिससे वे अजर और अमर हो गये। आषाढ़ महीनेके शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथिको उपवास रहकर उसकी पूजा करनेवाला मनुष्य देवत्व प्राप्त कर लेता है। द्विजोत्तम! खरने वहाँपर लिङ्गकी पूजा की थी। उस लिङ्गकी विधिपूर्वक पूजा करनेवालेकी सभी कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं॥ १९—२२॥ |
| दूषणस्त्रिशिराश्चैव तत्र पूज्य महेश्वरम्।<br>यथाभिलषितान् कामानापतुस्तौ मुदान्वितौ॥ २३<br><br>चैत्रमासे सिते पक्षे यो नरस्तत्र पूजयेत्।<br>तस्य तौ वरदौ देवौ प्रयच्छेतेऽभिवाञ्छितम्॥ २४<br><br>स्थाणोर्वटस्य पूर्वेण हस्तिपादेश्वरः शिवः।<br>तं दृष्ट्वा मुच्यते पापैरन्यजन्मनि संभवैः॥ २५<br><br>तस्य दक्षिणतो लिङ्गं हारीतस्य ऋषेः स्थितम्।<br>यत् प्रणम्य प्रयत्नेन सिद्धिं प्राप्नोति मानवः॥ २६ | दूषण एवं त्रिशिराने भी वहाँ महेश्वरकी पूजा की और वे प्रसन्न हो गये। उन दोनोंने अभिवाञ्छित मनोरथ प्राप्त कर लिये। चैत्र महीनेके शुक्लपक्षमें जो मनुष्य वहाँ पूजन करता है, उसकी समस्त इच्छाएँ वे दोनों देव पूरी कर देते हैं। 'हस्तिपादेश्वर' शिव स्थाणुवटकी पूर्व दिशामें हैं। उनका दर्शन करके मनुष्य अन्य जन्मोंमें बने पापोंसे छूट जाता है। उसके दक्षिणमें हारीत नामके ऋषिद्वारा स्थापित किया हुआ लिङ्ग है, जिसको विधिपूर्वक प्रणाम करनेसे (ही) मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर लेता है॥ २३—२६॥ |
५०- कुरुक्षेत्रके पृथूदकतीर्थके सन्दर्भमें अक्षय-तृतीयाके महत्त्वकी कथा
| १९८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४६ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्य दक्षिणपार्श्वे तु वापीतस्य महात्मनः।<br>लिङ्गं त्रैलोक्यविख्यातं सर्वपापहरं शिवम्॥ २७<br>कङ्कालरूपिणा चापि रुद्रेण सुमहात्मना।<br>प्रतिष्ठितं महालिङ्गं सर्वपापप्रणाशनम्॥ २८<br>भुक्तिदं मुक्तिदं प्रोक्तं सर्वकिल्बिषनाशनम्।<br>लिङ्गस्य दर्शनाच्चैव अग्निष्टोमफलं लभेत्॥ २९<br>तस्य पश्चिमदिग्भागे लिङ्गं सिद्धप्रतिष्ठितम्।<br>सिद्धेश्वरं तु विख्यातं सर्वसिद्धिप्रदायकम्॥ ३० | उसके निकट दक्षिण भागमें महात्मा वापीतके द्वारा संस्थापित सभी पापोंका हरण करनेवाला कल्याणकर्ता लिङ्ग है जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। कंकालके रूपमें रहनेवाले महात्मा भगवान् रुद्रने भी समस्त पापोंका नाश करनेवाला महालिङ्ग प्रतिष्ठित किया है। महात्मा रुद्रद्वारा प्रतिष्ठापित वह लिङ्ग भुक्ति एवं मुक्तिका देनेवाला तथा सभी पापोंको नष्ट करनेवाला है। उस लिङ्गका दर्शन करनेसे ही अग्निष्टोम-यज्ञके फलकी प्राप्ति हो जाती है। उसकी पश्चिम दिशामें सिद्धोंद्वारा प्रतिष्ठित सिद्धेश्वर नामसे विख्यात लिङ्ग है। वह सर्वसिद्धिप्रदाता है॥ २७-३०॥ |
| तस्य दक्षिणदिग्भागे मृकण्डेन महात्मना।<br>तत्र प्रतिष्ठितं लिङ्गं दर्शनात् सिद्धिदायकम्॥ ३१<br>तस्य पूर्वे च दिग्भागे आदित्येन महात्मना।<br>प्रतिष्ठितं लिङ्गवरं सर्वकिल्बिषनाशनम्॥ ३२<br>चित्राङ्गदस्तु गन्धर्वो रम्भा चाप्सरसां वरा।<br>परस्परं सानुरागौ स्थाणुदर्शनकाङ्क्षिणौ॥ ३३<br>दृष्ट्वा स्थाणुं पूजयित्वा सानुरागौ परस्परम्।<br>आराध्य वरदं देवं प्रतिष्ठाप्य महेश्वरम्॥ ३४ | उसकी दक्षिण दिशामें महात्मा मृकण्डने (शिव) लिङ्गकी स्थापना की है। उस लिङ्गके दर्शन करनेसे सिद्धि प्राप्त होती है। उसके पूर्व भागमें महात्मा आदित्यने सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाले श्रेष्ठ लिङ्गको प्रतिष्ठापित किया है। अप्सराओंमें श्रेष्ठ रम्भा और चित्राङ्गद नामके गन्धर्व—इन दोनोंने परस्परमें प्रेमपूर्वक स्थाणु भगवान्के दर्शन किये; फिर उनका पूजन किया और तब वरदानी देवकी स्थापनाकर आराधना की। (उनसे स्थापित लिङ्गोंका नाम हुआ चित्राङ्गद और रम्भेश्वर)॥ ३१-३४॥ |
| चित्राङ्गदेश्वरं दृष्ट्वा तथा रम्भेश्वरं द्विज।<br>सुभगो दर्शनीयश्च कुले जन्म समाप्नुयात्॥ ३५<br>तस्य दक्षिणतो लिङ्गं वज्रिणा स्थापितं पुरा।<br>तस्य प्रसादात् प्राप्नोति मनसा चिन्तितं फलम्॥ ३६<br>पराशरेण मुनिना तथैवाराध्य शंकरम्।<br>प्राप्तं कवित्वं परमं दर्शनाच्छंकरस्य च॥ ३७<br>वेदव्यासेन मुनिना आराध्य परमेश्वरम्।<br>सर्वज्ञत्वं ब्रह्मज्ञानं प्राप्तं देवप्रसादतः॥ ३८ | द्विज! चित्राङ्गदेश्वर एवं रम्भेश्वरका दर्शन करके मनुष्य सुन्दर और दर्शनीय (रूपवाला) हो जाता है एवं सत्कुलमें जन्म ग्रहण करता है। उसके दक्षिण भागमें इन्द्रने प्राचीन कालमें लिङ्गकी स्थापना की थी। इन्द्रद्वारा प्रतिष्ठापित लिङ्गके प्रसादसे मनुष्य मनोवाञ्छित फल प्राप्त कर लेता है। उसी प्रकार पराशर मुनिने शंकरकी आराधना की और भगवान् शंकरके दर्शनसे उत्कृष्ट कवित्वको प्राप्त किया। वेदव्यास मुनिने परमेश्वर (शंकर)-की आराधना की और उनकी कृपासे सर्वज्ञता तथा ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया॥ ३५-३८॥ |
| स्थाणोः पश्चिमदिग्भागे वायुना जगदायुना।<br>प्रतिष्ठितं महालिङ्गं दर्शनात् पापनाशनम्॥ ३९<br>तस्यापि दक्षिणे भागे लिङ्गं हिमवतेश्वरम्।<br>प्रतिष्ठितं पुण्यकृतां दर्शनात् सिद्धिकारकम्॥ ४० | स्थाणुके पश्चिम भागमें जगत्के प्राण-स्वरूप (जगत्प्राण) वायुने महालिङ्गको प्रतिष्ठित किया है, जो दर्शनमात्रसे ही पापका विनाश कर देता है। उसके भी दक्षिण भागमें हिमवतेश्वर लिङ्ग प्रतिष्ठित है। पुण्यात्माओंने उसे प्रतिष्ठित किया है। उसका दर्शन सिद्धि देनेवाला है। |
| अध्याय ४६ ] | स्थाणुलिङ्गके समीप असंख्य लिङ्गोंकी स्थापना और उनके दर्शन-अर्चनका माहात्म्य | १९९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्यापि पश्चिमे भागे कार्तवीर्येण स्थापितम्।<br>लिङ्गं पापहरं सद्यो दर्शनात् पुण्यमाप्नुयात्॥ ४१<br><br>तस्याप्युत्तरदिग्भागे सुपार्श्वे स्थापितं पुनः।<br>आराध्य हनुमांश्चाप सिद्धिं देवप्रसादतः॥ ४२ | उसके पश्चिम भागमें कार्तवीर्यने (एक) लिङ्गकी स्थापना की है। (यह लिङ्ग) पापका तत्काल हरण करनेवाला है। (इसके) दर्शन करनेसे पुण्यकी प्राप्ति होती है। उसके भी उत्तरकी ओर बिलकुल निकट स्थानमें (एक) लिङ्गकी स्थापना हुई है; हनुमान्ने उस लिङ्गकी आराधना कर शंकरकी कृपासे सिद्धि प्राप्त की॥ ३९-४२॥ |
| तस्यैव पूर्वदिग्भागे विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>आराध्य वरदं देवं चक्रं लब्धं सुदर्शनम्॥ ४३<br><br>तस्यापि पूर्वदिग्भागे मित्रेण वरुणेन च।<br>प्रतिष्ठितौ लिङ्गवरौ सर्वकामप्रदायकौ॥ ४४<br><br>एतानि मुनिभिः साध्यैरादित्यैर्वसुभिस्तथा।<br>सेवितानि प्रयत्नेन सर्वपापहराणि वै॥ ४५<br><br>स्वर्णलिङ्गस्य पश्चात्तु ऋषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः।<br>प्रतिष्ठितानि लिङ्गानि येषां संख्या न विद्यते॥ ४६<br><br>तथा ह्युत्तरतस्तस्य यावदोधवती नदी।<br>सहस्रमेकं लिङ्गानां देवपश्चिम्रतः स्थितम्॥ ४७ | उसके भी पूर्वी भागमें प्रभावशाली विष्णुने वरदाता महादेवकी आराधना कर सुदर्शनचक्र प्राप्त किया था। उसके भी पूर्वी भागमें मित्र एवं वरुणने सभी अभिलाषाओंकी पूर्ति करनेवाले दो लिङ्गोंकी स्थापना की है। ये दोनों लिङ्ग सभी प्रकारके पापोंका विनाश करनेवाले हैं। मुनियों, साध्यों, आदित्यों एवं वसुओंद्धारा इन लिङ्गोंकी उत्साहपूर्वक सेवा की गयी है। तत्त्वदर्शी ऋषियोंने स्वर्णलिङ्गके पीछेकी ओर जिन लिङ्गोंको प्रतिष्ठित किया है, उनकी संख्या नहीं गिनी जा सकती। उसी प्रकार स्वर्णलिङ्गके उत्तर ओघवती नदीतक पश्चिमकी ओर महादेवके एक हजार लिङ्ग स्थित हैं॥ ४३-४७॥ |
| तस्यापि पूर्वदिग्भागे बालखिल्यैर्महात्मभिः।<br>प्रतिष्ठिता रुद्रकोट्यार्वित्संनिहितं सरः॥ ४८<br><br>दक्षिणेन तु देवस्य गन्धर्वैर्यक्षकिन्नरैः।<br>प्रतिष्ठितानि लिङ्गानि येषां संख्या न विद्यते॥ ४९<br><br>तिस्रः कोट्योऽर्धकोटी च लिङ्गानां वायुरब्रवीत्।<br>असंख्याताः सहस्राणि ये रुद्राः स्थाणुमाश्रिताः॥ ५०<br><br>एतज्ज्ञात्वा श्रद्दधानः स्थाणुलिङ्गं समाश्रयेत्।<br>यस्य प्रसादात् प्राप्नोति मनसा चिन्तितं फलम्॥ ५१ | उस (नदी)-के पूर्वी भागमें महात्मा बालखिल्योंने संनिहित सरोवरतक करोड़ों रुद्रोंकी स्थापना की है। गन्धर्वों, यक्षों एवं किन्नरोंने दक्षिण दिशाकी ओर भगवान् शंकरके असंख्य लिङ्गोंकी स्थापना की है। वायुका कहना है कि साढ़े तीन करोड़ लिङ्गोंकी स्थापना हुई है। स्थाणुतीर्थमें अनन्त सहस्र रुद्र-लिङ्ग विद्यमान हैं। मनुष्यको चाहिये कि श्रद्धाके साथ स्थाणु-लिङ्गका आश्रय ले। इससे स्थाणु-लिङ्गकी दयासे मनोवाञ्छित फल मिलता है॥ ४८-५१॥ |
| अकामो वा सकामो वा प्रविष्टः स्थाणुमन्दिरम्।<br>विमुक्तः पातकैर्घोरैः प्राप्नोति परमं पदम्॥ ५२<br><br>चैत्रमासे त्रयोदश्यां दिव्यनक्षत्रयोगतः।<br>शुक्रार्कचन्द्रसंयोगे दिने पुण्यतमे शुभे॥ ५३ | जो मनुष्य निष्काम या सकामभावसे स्थाणु-मन्दिरमें प्रवेश करता है, वह घोर पापोंसे छुटकारा पाकर परम पदको प्राप्त करता है। जब चैत्र महीनेकी त्रयोदशी तिथिमें दिव्य नक्षत्रोंका योग हुआ और उसमें शुक्र, सूर्य, चन्द्रका (शुभ) संयोग हुआ तब |
अध्याय ४७ ] स्थाणुतीर्थके सन्दर्भमें राजा वेनका चरित्र, पृथु-जन्म और उनका अभिषेक २०१ तत्र कृत्वा तपो घोरं धर्मेणावृत्य रोदसी। प्राप्तवान् ब्रह्मसदनं पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥ ८ वेनो राजा समभवत् समस्ते क्षितिमण्डले। स मातामहदोषेण तेन कालात्मजात्मजः॥ ९ घोषयामास नगरे दुरात्मा वेदनिन्दकः। न दातव्यं न यष्टव्यं न होतव्यं कदाचन ॥ १० अहमेकोऽत्र वै वन्द्यः पूज्योऽहं भवतां सदा। मया हि पालिता यूयं निवसंध्वं यथासुखम् ॥ ११ तन्मत्तोऽन्यो न देवोऽस्ति युष्माकं यः परायणम्। एतच्छ्रुत्वा तु वचनमृषयः सर्व एव ते॥ १२ परस्परं समागम्य राजानं वाक्यमब्रुवन् । श्रुतिः प्रमाणं धर्मस्य ततो यज्ञः प्रतिष्ठितः ॥ १३ यज्ञैर्विना नो प्रीयन्ते देवाः स्वर्गनिवासिनः। अप्रीता न प्रयच्छन्ति वृष्टिं सस्यस्य वृद्धये ॥ १४ तस्माद् यज्ञैश्च देवैश्च धार्यते सचराचरम्। एतच्छ्रुत्वा क्रोधदृष्टिर्वेनः प्राह पुनः पुनः ॥ १५ न यष्टव्यं न दातव्यमित्याह क्रोधमूर्च्छितः। ततः क्रोधसमाविष्टा ऋषयः सर्व एव ते ॥ १६ निजघ्नुर्मन्त्रपूतैस्ते कुशैर्वज्रसमन्वितैः। ततस्त्वराजके लोके तमसा संवृते तदा ॥ १७ दस्युभिः पीड्यमानास्तान् ऋषींस्ते शरणं ययुः । ततस्ते ऋषयः सर्वे ममन्थुस्तस्य वै करम् ॥ १८ सव्यं तस्मात् समुत्तस्थौ पुरुषो ह्रस्वदर्शनः। तमूचुर्ऋषयः सर्वे निषीदतु भवानिति ॥ १९ उसने वहाँ घोर तपस्या की तथा पृथ्वी एवं आकाशके बीचके स्थानको धर्मसे व्याप्तकर नहीं लौटनेवाले स्थान उस ब्रह्मलोकको प्राप्त कर लिया। (और इधर) वेन सम्पूर्ण भूमण्डलका राजा हो गया। अपने नानाके उस दोषके कारण कालकन्या भयाके उस दुष्टात्मा वेद-निन्दक पुत्रने नगरमें यह घोषणा करा दी कि कभी भी (कोई) दान न दे, यज्ञ न करे एवं हवन न करे - (दान, यज्ञ, हवन करना अपराध माना जायेगा) ॥ ७-१०॥ इस संसारमें एकमात्र मैं ही आपलोगोंका वन्दनीय और पूजनीय हूँ। आपलोग मुझसे रक्षित रहकर आनन्दपूर्वक निवास करें। मुझसे भिन्न कोई दूसरा देवता नहीं है, जो आपलोगोंका उत्तम आश्रय हो सके। वेनके इस वचनको सुननेके पश्चात् सभी ऋषियोंने आपसमें मिलकर (निश्चय किया और) राजासे यह वचन कहा - राजन् ! धर्मके विषयमें वेद (-शास्त्र) ही प्रमाण हैं। उन्हींसे यज्ञ विहित हैं, प्रतिष्ठित हैं- विष्णुरूपमें मान्य हैं। (उन) यज्ञोंके किये बिना स्वर्गमें रहनेवाले देवता सन्तुष्ट नहीं होते और बिना सन्तुष्ट हुए वे अन्नकी वृद्धिके लिये जलकी वृष्टि नहीं करते। अतः विष्णुमय यज्ञों और देवताओंसे ही चर-अचर समस्त संसारका धारण और पोषण होता है। यह सुनकर वेन क्रोधसे आँखें लालकर बार-बार कहने लगा - ॥ ११-१५॥ क्रोधसे झल्लाकर (तिलमिलाकर) उसने 'न यज्ञ करना होगा और न दान देना होगा' - ऐसा कहा। उसके बाद ऋषियोंने भी क्रुद्ध होकर मन्त्रद्वारा वज्रमय कुशोंसे उसे मार डाला। उसके (मर जानेके) बाद (राजासे रहित) संसारमें अराजकता छा गयी, जिससे सर्वत्र अशान्ति फैल गयी। चोरों-डाकुओंने लोकजनोंको पीड़ित कर डाला। दस्युदलोंसे त्रस्त जनवर्ग उन ऋषियोंकी शरणमें गया, जिस ऋषिवर्गने उस वेनको मार डाला था। उसके बाद उन सभी ऋषियोंने उसके बायें हाथको मथित किया। उससे एक पुरुष निकला जो छोटा बौना दीख रहा था। सभी ऋषियोंने उससे कहा- 'निषीदतु भवान्' अर्थात् आप बैठें ॥ १६-१९॥
| २०४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४७ |
|---|
| प्रायश्चित्तं करिष्येऽहं यद् वदिष्यन्ति देवताः।<br>ततस्ता देवताः सर्वा इदं वचनमब्रुवन्॥ ४५<br><br>स्नात्वा स्नात्वा च तीर्थेषु अभिषिञ्चस्व वारिणा।<br>ओजसा चुलुकं यावत् प्रतिकूले सरस्वतीम्॥ ४६<br><br>स्नात्वा मुक्तिमवाप्नोति पुरुषः श्रद्धयान्वितः।<br>एष स्वपोषणपरो देवदूषणतत्परः॥ ४७<br><br>ब्राह्मणैश्च परित्यक्तो नैष शुद्ध्यति कर्हिचित्।<br>तस्मादेनं समुद्दिश्य स्नात्वा तीर्थेषु भक्तितः॥ ४८<br><br>अभिषिञ्चस्व तोयेन ततः पूतो भविष्यति।<br>इत्येतद्वचनं श्रुत्वा कृत्वा तस्याश्रमं ततः॥ ४९<br><br>तीर्थयात्रां ययौ राजा उद्दिश्य जनकं स्वकम्।<br>स तेषु प्लावनं कुर्वंस्तीर्थेषु च दिने दिने॥ ५०<br><br>अभ्यषिञ्चत् स्वपितरं तीर्थतोयेन नित्यशः।<br>एतस्मिन्नेव काले तु सारमेयो जगाम ह॥ ५१<br><br>स्थाणोर्मठे कौलपतिर्देवद्रव्यस्य रक्षिता।<br>परिग्रहस्य द्रव्यस्य परिपालयिता सदा॥ ५२<br><br>प्रियश्च सर्वलोकेषु देवकार्यपरायणः।<br>तस्यैवं वर्त्तमानस्य धर्ममार्गे स्थितस्य च॥ ५३<br><br>कालेन चलिता बुद्धिर्देवद्रव्यस्य नाशने।<br>तेनाधर्मेण युक्तस्य परलोकगतस्य च॥ ५४<br><br>दृष्ट्वा यमोऽब्रवीद् वाक्यं श्वयोनिं व्रज मा चिरम्।<br>तद्वाक्यानन्तरं जातः श्वा वै सौगन्धिके वने॥ ५५<br><br>ततः कालेन महता श्वयूथपरिवारितः।<br>परिभूतः सरमया दुःखेन महता वृतः॥ ५६<br><br>त्यक्त्वा द्वैतवनं पुण्यं सन्निहत्यं ययौ सरः।<br>तस्मिन् प्रविष्टमात्रस्तु स्थाणोरेव प्रसादतः॥ ५७<br><br>अतीव तृषया युक्तः सरस्वत्यां ममज्ज ह।<br>तत्र संप्लुतदेहस्तु विमुक्तः सर्वकिल्बिषैः॥ ५८ | (परन्तु) देवगण! आपलोग इसके लिये जो प्रायश्चित्त कहेंगे, उसे मैं करूँगा। उसके ऐसा कहनेपर उन सभी देवताओंने यह बात कही—तीर्थमें बार-बार (स्नान करके) तीर्थ-जलद्वारा इसे बार-बार सींचो। सरस्वतीके तटपर 'ओजसतीर्थ'से 'चुलुक'पर्यन्त हर-एक तीर्थमें स्नान करनेवाला श्रद्धालु पुरुष मुक्तिको प्राप्त करता है। यह अपना ही पालन-पोषण करनेमें लगा रहता था एवं देवताओंकी निन्दा करनेमें तत्पर रहता था। ब्राह्मणोंने इसको पाप करनेके कारण त्याग दिया था। यह कभी भी शुद्ध नहीं हो सकता। इसलिये (इसकी यदि शुद्धि चाहते हो तो) इसके उद्देश्यसे तीर्थोंमें जाकर भक्तिपूर्वक स्नान करके तीर्थ-जलसे इसे अभिषिक्त करो। इससे यह पवित्र हो जायगा। उसके बाद राजा देवताओंके इन वचनोंके सुननेके बाद वहाँ अपने पिताके लिये एक आश्रमका निर्माण कराकर उसके उद्देश्यसे तीर्थयात्रा करने चला गया। वह प्रतिदिन उन तीर्थोंमें स्नान करते हुए तीर्थजलसे अपने पिताको अभिषिक्त करने लगा। इसी समय वहाँ एक कुत्ता आ गया। (कुत्तेका इतिहास इस प्रकार है—) पूर्वकालमें वह कुत्ता स्थाणुतीर्थमें स्थित मठमें देव-द्रव्योंकी रक्षा करनेवाला—दानमें प्राप्त द्रव्यका सदा पालन करनेवाला—सर्वजनप्रिय एवं देवकृत्यमें रत कौलपति नामका महन्त था। इस प्रकार वह अपना जीवनयापन कर रहा था। एक बार धर्ममार्गमें स्थित रहते हुए भी उस कौलपतिकी बुद्धि कुछ समयके बाद धर्ममार्गसे हट गयी। वह देवद्रव्यका नाश (दुरुपयोग) करने लगा। वह अधर्मी (बना) कौलपति जब मरकर परलोकमें गया, तब यमराजने उसे (उसके कर्मविपाकको) देखकर कहा—तुम कुत्तेकी योनिमें जाओ, देर मत करो। उनके कहनेके पश्चात् वह महन्त सौगन्धिक वनमें कुत्तेकी योनिमें उत्पन्न हुआ॥ ४५—५५॥<br><br>उसके बाद बहुत समय व्यतीत होनेतक वह कुत्ता कुत्तोंके झुंडसे घिरा रहता था; फिर भी कुतियासे अपमानित होनेके कारण अत्यन्त दुःखित रहता था। इसलिये वह द्वैतवनको छोड़कर पवित्र सन्निहत्य-सरोवरमें चला गया। उसमें प्रवेश करते ही स्थाणु भगवान्की ही कृपासे अत्यन्त प्यासा होकर उसने सरस्वती नदीमें डुबकी लगायी। उसमें स्नान करनेसे ही वह समस्त पापोंसे विमुक्त हो गया। |
अध्याय ४७ ] स्थाणुतीर्थके सन्दर्भमें राजा वेनका चरित्र, पृथु-जन्म और उनका अभिषेक २०५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आहारलोभेन तदा प्रविवेश कुटीरकम्।<br>प्रविशन्तं तदा दृष्ट्वा श्वानं भयसमन्वितः॥ ५९<br>स तं पस्पर्श शनकैः स्थाणुतीर्थे ममज्ज ह।<br>पततः पूर्वतीर्थेषु विप्रुषैः परिषिञ्चतः॥ ६०<br>शुनोऽस्य गात्रसम्भूतैरब्बिन्दुभिः स सिञ्चितः।<br>विरक्तदृष्टिश्च शुनः क्षेपेण च ततः परम्॥ ६१<br>स्थाणुतीर्थस्य माहात्म्यात् स पुत्रेण च तारितः।<br>नियतस्तत्क्षणाज्जातो दिव्यदेहसमन्वितः।<br>प्रणिपत्य तदा स्थाणुं स्तुतिं कर्तुं प्रचक्रमे॥ ६२ | उसके बाद आहारके लोभसे उसने कुटीमें प्रवेश किया। उस कुत्तेको प्रवेश करते देखकर भयभीत होकर उस (वेन)-ने उसका धीरेसे स्पर्श किया। स्पर्श करनेके बाद स्थाणुतीर्थमें उसने स्नान किया। पूर्वतीर्थोंमें स्नान करनेके बाद तीर्थके जलबिन्दुओंसे सिञ्चित करनेवाले पुत्रसे एवं उस कुत्तेके शरीरसे निकले जलबिन्दुओंसे सिञ्चित होने तथा कुत्तेके भयसे स्थाणुतीर्थमें गिर जानेके कारण स्नान हो जानेके माहात्म्यसे उसकी दृष्टि विरक्त हो गयी। पुत्रने स्थाणुतीर्थके माहात्म्यसे अपने पिताका उद्धार कर दिया और संयतेन्द्रिय होकर उसने तत्काल दिव्य देह धारण कर भगवान् स्थाणुको प्रणाम किया और स्तुति करना प्रारम्भ किया॥ ५६—६२॥ |
| वेन उवाच<br>प्रपद्ये देवमीशानं त्वामजं चन्द्रभूषणम्।<br>महादेवं महात्मानं विश्वस्य जगतः पतिम्॥ ६३<br>नमस्ते देवदेवेश सर्वशत्रुनिषूदन।<br>देवेश बलिविष्टम्भ देवदैत्यैश्च पूजित॥ ६४<br>विरूपाक्ष सहस्राक्ष त्र्यक्ष यक्षेश्वरप्रिय।<br>सर्वतः पाणिपादान्त सर्वतोऽक्षिशिरोमुख॥ ६५<br>सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठसि।<br>शङ्कुकर्ण महाकर्ण कुम्भकर्णार्णवालय॥ ६६ | वेन स्तुति करने लगा— मैं अजन्मा चन्द्रमाके शिरोभूषणवाले, ईशानदेव, महात्मा, सारे संसारका पालन करनेवाले आप महादेवकी शरण ग्रहण करता हूँ। देवदेवेश! समस्त शत्रुओंके निषूदन! देवेश! बलिको निरुद्ध करनेवाले! देवों एवं दैत्योंसे पूजित! आपको नमस्कार है। हे (विरूप आँखवाले) विरूपाक्ष! हे (हजारों आँखोंवाले) सहस्राक्ष! हे तीन नेत्रोंवाले! हे यक्षेश्वरप्रिय! हे चारों ओरसे (हाथ-पैरवाले) पाणिपादयुक्त! हे चारों ओर आँख एवं मुखवाले! आपको नमस्कार है। आप सर्वत्र सुन सकनेवाले और सभी स्थानोंपर व्याप्त हैं। संसारमें आपने सभीको आवृत कर (ढक) रखा है। हे शङ्कुकर्ण! हे महाकर्ण! हे कुम्भकर्ण! हे समुद्र-निवासी! आपको नमस्कार है॥ ६३—६६॥ |
| गजेन्द्रकर्ण गोकर्ण पाणिकर्ण नमोऽस्तु ते।<br>शतजिह्व शतावर्त शतोदर शतानन॥ ६७<br>गायन्ति त्वां गायत्रिणो ह्यर्चयन्त्यर्क्रमर्चिणः।<br>ब्रह्माणं त्वा शतक्रतो उद्वंशमिव मेनिरे॥ ६८<br>मूर्त्तौ हि ते महामूर्ते समुद्राम्बुधरास्तथा।<br>देवताः सर्व एवात्र गोष्ठे गाव इवासते॥ ६९<br>शरीरे तव पश्यामि सोममग्निं जलेश्वरम्।<br>नारायणं तथा सूर्य ब्रह्माणं च बृहस्पतिम्॥ ७० | हे गजेन्द्रकर्ण! हे गोकर्ण! हे पाणिकर्ण! हे शतजिह्व! हे शतावर्त! हे शतोदर! हे शतानन! आपको नमस्कार है। गायत्रीका जप करनेवाले विद्वान् आपकी ही महिमा गाते हैं। सूर्यकी पूजा करनेवाले सूर्यरूपसे आपकी ही पूजा करते हैं। आपको ही सभी लोग इन्द्रसे श्रेष्ठ वंशवाला ब्रह्मा मानते हैं। महामूर्ते! आपकी मूर्तिमें समुद्र, मेघ और समस्त देवता ऐसे स्थित हैं जैसे गोशालामें गौएँ रहती हैं। मैं आपके शरीरमें सोम, अग्नि, वरुण, नारायण, सूर्य, ब्रह्मा और बृहस्पतिको देख रहा हूँ॥ ६७—७०॥ |
| भगवान् कारणं कार्यं क्रियाकरणमेव तत्।<br>प्रभवः प्रलयश्चैव सदसच्चापि दैवतम्॥ ७१<br>नमो भवाय शर्वाय वरदायोगरूपिणे।<br>अन्धकासुरहन्त्रे च पशूनां पतये नमः॥ ७२ | आप भगवान्, कारण, कार्य, क्रियाके करण, प्रभव, प्रलय, सत्, असत् एवं दैवत हैं। भव, शर्व, वरद, उग्र-रूप धारण करनेवाले, अन्धकासुरको मारनेवाले और पशुओंके पति पशुपतिको नमस्कार है। |
| २०६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्रिजटाय त्रिशीर्षाय त्रिशूलासक्तपाणये ।<br>त्र्यम्बकाय त्रिनेत्राय त्रिपुरघ्न नमोऽस्तु ते ॥ ७३<br>नमो मुण्डाय चण्डाय अण्डायोत्पत्तिहेतवे ।<br>डिण्डिमासक्तहस्ताय डिण्डिमुण्डाय ते नमः ॥ ७४ | हे त्रिपुरनाशक! तीन जटावाले, तीन सिरवाले, हाथमें त्रिशूल लिये रहनेवाले त्र्यम्बक एवं त्रिनेत्र (कहलानेवाले) आपको नमस्कार है। हे मुण्ड, चण्ड और अण्डकी उत्पत्तिके हेतु, डिण्डिमपाणि एवं डिण्डिमुण्ड! आपको नमस्कार है॥ ७३-७४॥ |
| नमोर्ध्वकेशदंष्ट्राय शुष्काय विकृताय च ।<br>धूम्रलोहितकृष्णाय नीलग्रीवाय ते नमः ॥ ७५<br>नमोऽस्त्वप्रतिरूपाय विरूपाय शिवाय च ।<br>सूर्यमालाय सूर्याय स्वरूपध्वजमालिने ॥ ७६<br>नमो मानातिमानाय नमः पटुतराय ते ।<br>नमो गणेन्द्रनाथाय वृषकन्धाय धन्विने ॥ ७७<br>संक्रन्दनाय चण्डाय पर्णधारपुटाय च ।<br>नमो हिरण्यवर्णाय नमः कनकवर्चसे ॥ ७८ | हे ऊर्ध्वकेश, ऊर्ध्वदंष्ट्र, शुष्क, विकृत, धूम्र, लोहित, कृष्ण एवं नीलग्रीव! आपको नमस्कार है। अप्रतिरूप, विरूप, शिव, सूर्यमाल, सूर्य एवं स्वरूपध्वजमालीको नमस्कार है। मानातिमानको नमस्कार है। आप पटुतरको नमस्कार है। गणेन्द्रनाथ, वृषकन्ध एवं धन्वीको नमस्कार है। संक्रन्दन, चण्ड, पर्णधारपुट एवं हिरण्यवर्णको नमस्कार है। कनकवर्चसको नमस्कार है॥ ७५-७८॥ |
| नमः स्तुताय स्तुत्याय स्तुतिस्थाय नमोऽस्तु ते ।<br>सर्व्वाय सर्वभक्षाय सर्वभूतशरीरिणे ॥ ७९<br>नमो होत्रे च हन्त्रे च सितोद्रग्रपताकिने ।<br>नमो नम्याय नम्राय नमः कटकटाय च ॥ ८०<br>नमोऽस्तु कृशनाशाय शयितायोत्थिताय च ।<br>स्थिताय धावमानाय मुण्डाय कुटिलाय च ॥ ८१<br>नमो नर्त्तनशीलाय लयवादित्रशालिने ।<br>नाट्योपहारलुब्धाय मुखवादित्रशालिने ॥ ८२ | स्तुत किये गये तथा स्तुतिके योग्य (आप)-को नमस्कार है। स्तुतिमें स्थित, सर्व, सर्वभक्ष एवं सर्वभूतशरीरी आपको नमस्कार है। होता, हन्ता तथा सफेद और ऊँची पताकावालेको नमस्कार है। नमन करनेयोग्य एवं नम्रको नमस्कार है। आप कटकटको नमस्कार है। कृशनाश, शयित, उत्थित, स्थित, धावमान, मुण्ड एवं कुटिलको नमस्कार है। नर्तनशील, लय वाद्यशाली, नाट्यके उपहारके लोभी एवं मुखोंमें बम-बम-जैसे मुँहसे बोले जानेवाले वाद्य-प्रेमीको नमस्कार है॥ ७९-८२॥ |
| नमो ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय बलातिबलघातिने ।<br>कालनाशाय कालाय संसारक्षयरूपिणे ॥ ८३<br>हिमवद्दुहितुः कान्त भैरवाय नमोऽस्तु ते ।<br>उग्राय च नमो नित्यं नमोऽस्तु दशबाहवे ॥ ८४<br>चितिभस्मप्रियायैव कपालाक्तपाणये ।<br>विभीषणाय भीष्माय भीमव्रतधराय च ॥ ८५<br>नमो विकृतवक्त्राय नमः पूतोग्रदृष्टये ।<br>पक्वाममांसलुब्धाय तुम्बिवीणायप्रियाय च ॥ ८६ | ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, बलवान्से भी बलवान्को नष्ट करनेवाले, कालनाश, कालस्वरूप एवं संसारक्षयस्वरूप आपको नमस्कार है। हे हिमालयकी पुत्रीके पति-पार्वतीपति! आप भैरवको नमस्कार है और उग्ररूप आपको नित्य नमस्कार है। दस बाहुओंवाले (शिव)-को नमस्कार है। चिताके भस्मको प्रिय माननेवाले, कपालपाणि, अत्यधिक भयंकर भयरूप (भीष्म) एवं व्रतधर (आप)-को (नमस्कार) है। विकृत मुँहवाले (आप)-को नमस्कार है। पवित्र तेजस्विनी दृष्टिवाले, कच्चे-पक्के फलके गूदेको प्रिय माननेवाले, तुम्बी एवं वीणाको प्रिय माननेवालेको नमस्कार है॥ ८३-८६॥ |
| नमो वृषाङ्कवृक्षाय गोवृषाभिरुते नमः ।<br>कटङ्कटाय भीमाय नमः परपराय च ॥ ८७<br>नमः सर्ववरिष्ठाय वराय वरदायिने ।<br>नमो विरक्तरक्ताय भावनायाक्षमालिने ॥ ८८<br>विभेदभेदभिन्नाय छायायै तपनाय च ।<br>अघोरघोररूपाय घोरघोरतराय च ॥ ८९ | वृषाङ्कवृक्षको नमस्कार है। गोवृषाभिरुतको नमस्कार है। कटङ्कट, भीम एवं परसे भी परको नमस्कार है। सर्ववरिष्ठ, वर एवं वरदायीको नमस्कार है। विरक्त एवं रक्तरूप, भावन एवं अक्षमालीको नमस्कार है। विभेद एवं भेदसे भिन्न, छाया, तपन, अघोर तथा घोररूप एवं घोरघोरतर रूपको नमस्कार है। |