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वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

अध्याय २१५ ] गोकर्णेश्वर तथा जलेश्वरके माहात्म्यका वर्णन [ ३९७

है। ब्रह्मर्षिगण वहाँ निवास करते हैं। वहाँ जाकर केवल स्नान करनेसे प्राणीको अग्निहोत्र-यज्ञका फल मिल जाता है।

एक बार एक नकुलके मनमें सद्बुद्धि उत्पन्न हुई। अतः उसने सावधान होकर वहाँ स्नान किया। इससे उसका मन परम पवित्र बन गया और उसे पूर्वजन्मकी बात याद आ गयी। उसके उत्तर भागमें सिद्धपुरुषोंसे सेवित एक श्रेष्ठ तीर्थ है। उस गुह्यतीर्थका नाम 'प्रान्तकपानीय' है, जिसकी गुह्यकगण निरन्तर रक्षा करते हैं। जो मनुष्य वहाँ पूरे वर्षभर सदा स्नान करता है, उसे उत्तम बुद्धि प्राप्त होती है और वह गुह्यकका शरीर प्राप्तकर भगवान् रुद्रका अनुचर बन जाता है। इस शिखरपर निवास करनेवाली भगवती उमाके पूर्व, उत्तर और दक्षिण-भागोंमें वागमतीकी धारा प्रवाहित होती है। यह पुण्य नदी हिमालयकी कन्दरासे निकली है। वहाँ ब्रह्मोद्भेद नामका एक दूसरा पवित्र तीर्थ भी है। वहाँ जाकर मानवको जलसे आचमन एवं स्नान करना चाहिये। इसके फलस्वरूप उसे मृत्युलोकका दर्शन नहीं होता। उसे किसी प्रकारकी बाधा कष्ट नहीं पहुँचा सकती। वहीं सुन्दरीकातीर्थ है। बहुत पहले ब्रह्माजीने उसका निर्माण किया है। उसके जलमें स्नान करनेसे पुरुष सुन्दर रूपवाला और तेजस्वी हो जाता है। मनुष्यको चाहिये कि तीनों संध्याओंके समयमें वहाँ जाकर संध्योपासन करे। इससे वह पापसे मुक्त हो जाता है। वागमती और मणिवती—ये दोनों पवित्र नदियाँ हिमालयका भेदन करके निकली हैं। इन दोनोंमें पापनाश करनेकी पूरी शक्ति है। जो वेदका पूर्ण विद्वान् द्विज पवित्र होकर दिन-रात वहाँ निवास करता और रुद्रका जप करता है, वह अग्निष्टोम-यज्ञका फल प्राप्त करता है। राजा उसका सम्मान करते हैं। उसके इस कर्मके प्रभावसे उसका सारा कुल तर जाता है। किसी प्रकारका व्यक्ति वहाँ स्नान करके तिल और जलसे तर्पण करता है तो उसके पितर तर जाते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। जहाँ-जहाँ वागमती नदी प्रवाहित हुई है, वहाँ-वहाँ श्रेष्ठ पुरुषको स्नान करना चाहिये। इसके फलस्वरूप वह मानव तिर्यग्योनिमें जन्म पानेसे मुक्त हो जाता है। किसी समृद्ध कुलमें उसका जन्म होता है। वागमती और मणिवती इन दोनों नदियोंमें थोड़ा भेद है। ऋषिलोग यहाँ निवास करते हैं। बुद्धिमान् पुरुषका कर्तव्य है कि वह काम और क्रोधसे रहित होकर विधानपूर्वक गङ्गाद्वारमें स्नान करे। वहाँ स्नान करनेका जो महान् पुण्यफल बताया गया है, उससे कहीं दसगुना अधिक फल उक्त नदियोंमें स्नान करनेसे प्राप्त होता है, इसमें कोई संदेह नहीं। इस क्षेत्रमें विद्याधर, सिद्ध, गन्धर्व, मुनि, देवता और यक्ष—इनका समुदाय आकर स्नान करता और उपासनामें सदा संलग्न रहता है। यहाँपर यदि ब्राह्मणोंको थोड़ा भी धन दानमें दिया जाय तो उस दानका पुण्य-फल अक्षय हो जाता है। अतएव देवताओ! सब प्रकारसे प्रयत्न करके यहाँ धर्म-कार्यका सम्पादन करना चाहिये। यह 'श्लेष्मातक'वन परम पुण्य क्षेत्र है। इसमें देवता निवास करते हैं। इससे बढ़कर दूसरा कोई उत्तम क्षेत्र है ही नहीं। प्रिय देववृन्द! मैंने मृगका रूप धारण करके जहाँ-जहाँ विचरण किया अथवा बैठा और सोया करता था, वहाँ-वहाँकी समूची, सब ओरकी भूमि सम्यक् प्रकारसे पुण्यक्षेत्र बन गयी है। सुरगणो! मेरे शृङ्गके ही ये तीन रूप बन गये थे, इसे भली प्रकार हृदयमें धारण कर

३९८संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय २१६

लो। यह मेरा क्षेत्र पृथ्वीमें 'गोकर्णेश्वर'के नामसे प्रसिद्ध होगा।

इस प्रकार सनातन भगवान् रुद्रने देवताओंको आदेश देकर अपना रूप संवरण कर लिया। अब देवता उन्हें देखनेमें असमर्थ हो गये और वे उत्तर दिशाकी ओर चल पड़े। [अध्याय २१५]


'गोकर्णेश्वर' और 'शृङ्गेश्वर' आदिका माहात्म्य

भगवान् वराह कहते हैं—मुने! मृगका रूप धारण करनेवाले भगवान् शंकर जब वहाँसे अन्यत्र चले गये तो मुझ सहित उपस्थित सभी प्रधान देवताओंने पुनः परस्पर विचार करना प्रारम्भ किया। उस समयतक भगवान् शंकरका शृङ्ग तीन भागोंमें बँट चुका था। देवसमुदायने यत्नकर वैदिक कर्मके अनुसार भलीभाँति पृथक्-पृथक् उनकी स्थापनाका प्रबन्ध किया। (भगवान् वराहका धरणीके प्रति कथन है—) देवि! वज्रपाणि इन्द्रके हाथमें सींगका अग्रभाग था। शक्तिशाली शंकरके शृङ्गका बिचला भाग (ब्रह्माजी कहते हैं—) मैंने ले रखा था। फिर देवराजने तथा मैंने उन भागोंको वहीं विधिपूर्वक स्थापित कर दिया। तब देवताओं, सिद्धों, देवर्षियों और ब्रह्मर्षियोंके प्रयाससे वह इस परम विशिष्ट मूर्तिकी 'गोकर्ण' नामसे प्रतिष्ठा हो गयी। श्रीहरिके हाथमें शृङ्गका मूलभाग पड़ा था। उन्होंने देवतीर्थसे उसकी स्थापना कर दी। वह विशाल विग्रह 'शृङ्गेश्वर'के नामसे वहाँ सुशोभित हुआ। शृङ्गमें तीन रूप धारण करके भगवान् शिव विराजते थे। वे ही उन सभी स्थानोंमें प्रतिष्ठित हो गये। वस्तुतः वे एक ही अनेक रूपोंमें अभिव्यक्त हैं। उन्होंने उस मृगके शरीरमें अपने सौ भागोंको स्थान दिया था। फिर उस शृंगमें तीन प्रकारसे विभक्त भागोंको स्थापितकर सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न भगवान् शंकर उस मृगरूपी शरीरसे पृथक् होकर हिमालय पर्वतके शिखरपर पधार गये। पर्वतोंके राजा हिमालयपर सर्वसमर्थ शिवकी सैकड़ों मूर्तियाँ सुप्रतिष्ठित हैं। ये तीन प्रकारके विग्रह प्रभुके एक सींगमें ही सर्वप्रथम सुशोभित थे।

भगवान् शंकर समस्त संसारके शासक हैं। देवता और दानव सभी उन्हें अपना गुरु मानते हैं। उस समय उन सभीने अत्यन्त कठिन तपस्याके द्वारा भगवान् शिवकी आराधना की और अनेक प्रकारके वर प्राप्त किये। 'श्लेष्मातक' वनका समस्त भूभाग चारों ओरसे देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, यक्षों और महोरगोंके द्वारा भरा रहता था। तीर्थयात्राके विचारसे वे वहाँ आते और प्रदक्षिणा करनेमें संलग्न हो जाते थे। तीर्थोंके दर्शनसे फल प्राप्त होता है—यह भावना उनके मनमें भरी रहती थी तथा इस क्षेत्रका महान् फल भी उन्हें विदित था। प्रायः सभी सुरगण जहाँ-जहाँ तीर्थ हैं, वहाँ जाते और उस स्थानसे पुनः इस 'श्लेष्मातक' तीर्थमें पधारते थे। एक दिन पुलस्त्य ऋषिका पौत्र रावण भी वहाँ आया। उसके साथ उसके दोनों भाई भी वहाँ आये थे। उसने अत्यन्त उग्र तपस्या करके भगवान् शंकरकी आराधना की। वहाँ सनातन श्रीशिवजी 'गोकर्णेश्वर' नामसे प्रतिष्ठित थे। जब रावणने उनकी असीम शुश्रूषा की, तब वे वर देनेमें कुशल प्रभु स्वयं उसपर संतुष्ट हो गये। ऐसी स्थितिमें रावणने तीनों लोकोंपर विजय पानेके लिये उनसे वर माँग लिया। अन्तमें भगवान् शंकरकी कृपासे उसकी सारी मनःकामनाएँ पूरी हो गयीं। उन परम प्रभुने रावणकी बार-बार सहायता की। फिर उसी क्षण

अध्याय २१७ ] वराहपुराणकी फल-श्रुति [ ३९९

त्रिलोकीपर विजय प्राप्त करनेके विचारसे उसने अपने नगरसे प्रस्थान कर दिया। तीनों लोकोंको जीतकर उसने इन्द्रपर भी अपना अधिकार जमा लिया। इन्द्रजित् नामका उसका पुत्र उसे सहयोग दे रहा था। उस समय बहुत पहले इन्द्रने जो भगवान् शम्भुके सींगका अग्रभाग लेकर अपने यहाँ स्थापित किया था, उसे अपने पुत्रसहित रावणने उखाड़ लिया। पर जब वह राक्षस उसे लेकर अपनी पुरीको जा रहा था और सिन्धुके तटपर पहुँचा तो उस मूर्तिको जमीनपर रखकर मुहूर्तभर संध्या करने लगा। फिर संध्या समाप्त होनेपर जब उसने उसे बलपूर्वक उठानेकी चेष्टा की तो वह उसे उठा न सका और वह मूर्ति वज्रके समान कठोर बन गयी। तब रावणने उसे वहीं छोड़ दिया और लङ्काकी यात्रा की। (भगवान् वराह पृथ्वीसे कहते हैं—) महामते! तुम्हें इसी मूर्तिको ‘दक्षिणगोकर्णेश्वर’ समझना चाहिये। भूतपति भगवान् शंकर वहाँ स्वयं प्रतिष्ठित हुए हैं।'

**ब्रह्माजी कहते हैं—**मुने! मैंने तुम्हें विस्तारके साथ ये सभी बातें कह सुनायीं। इसी तरह महात्मा गोकर्णकी उत्तर दिशामें भी प्रतिष्ठा हुई है। विप्रर्षे! जैसे दक्षिणमें भगवान् ‘शृङ्गेश्वर’की प्रतिष्ठा हुई है, उसी क्रमसे उत्तरमें भगवान् ‘शैलेश्वर’ विराजते हैं। वत्स! मैं तुमसे इस क्षेत्रके तीर्थोंकी महान् उत्पत्तिका प्रसङ्ग कह चुका। अब तुम मुझसे दूसरा कौन-सा प्रसङ्ग सुनना चाहते हो। [अध्याय २१६]


वराहपुराणकी फल-श्रुति

**सनत्कुमारजी कहते हैं—**भगवन्! आपने यथावत् मेरी सभी शङ्काओंका निराकरणकर सारी बातें स्पष्ट कर दीं। मैं संशयकी बातें पूछता रहा और आप उन्हें भलीभाँति स्पष्ट करते रहे हैं। विश्वस्वरूप ‘स्थाणु’ जगदीश्वर भगवान् शंकर अप्रतिम तेजस्वी हैं। वे जंगलमें आनन्दपूर्वक विचर रहे थे। वह जंगल पुण्यक्षेत्र था। महाभाग! जगत्का कल्याण करनेके लिये उनका विग्रह एवं शृङ्ग जिस प्रकार प्रतिष्ठित हुआ तथा जैसे वे स्थान तीर्थ बन गये, मैं उसे सुनना चाहता हूँ। जगत्प्रभो! आप यथार्थरूपसे उसका वर्णन करनेकी कृपा कीजिये।

**ब्रह्माजीने कहा—**महामुने! इन सभी तीर्थोंके फलका जो निश्चित रूप बतलाया गया है, उसका शेष भाग तुमसे पुलस्त्यजी कहेंगे*। तुम इस समय मुनियोंके अग्रणी बनकर इस वनमें विराजो। तात! तुम मेरे समान ही वेद और वेदाङ्गके तत्त्वको भलीभाँति जाननेवाले पुत्र हो। जो पुरुष इस प्रसङ्गको सुनेगा, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूट जायगा। यही नहीं, वह यशस्वी, कीर्तिमान् होकर इस लोकमें और परलोकमें भी पूज्य होगा। चारों वर्णोंके व्यक्तियोंका कर्तव्य है कि वे मन और इन्द्रियोंको सावधान करके निरन्तर इस प्रसङ्गका श्रवण करें। यह कथानक परम मङ्गलस्वरूप, कल्याणमय, धर्म, अर्थ और कामका साधक, समस्त मनोरथोंका प्रदान करनेवाला, परम पवित्र, आयुवर्धक और विजय देनेमें सक्षम है। यह धन और यश देनेवाला, पापका नाशक, कल्याणकारी और शान्तिकारक है। इस पुराणको सुननेसे मनुष्यकी लोक-परलोकमें


* वह वराहपुराणका अंश खिलरूप है, जिसपर आगेके लेखोंमें पर्याप्त विचार प्राप्त होगा।

४००संक्षिप्त श्रीवराहपुराण[ अध्याय २१७

दुर्गति नहीं होती। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इसका श्रवण-कीर्तन करता है, वह स्वर्गमें प्रतिष्ठित होता है।

सूतजी कहते हैं— विप्रवरो! परमेष्ठी प्रजापति ब्रह्माजीने सनत्कुमारजीसे ये सब बातें कहकर विराम लिया। उन सभी बातोंका मैंने भी आप लोगोंसे तत्त्वपूर्वक वर्णन किया। ऋषिवरो! भगवान् वराह और पृथ्वीदेवीके संवादका यह सारभाग है। जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक सदा इसका पठन, श्रवण अथवा मनन करेगा, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर परमगति प्राप्त करेगा। प्रभासक्षेत्र, नैमिषारण्य, हरिद्वार, पुष्कर, प्रयाग, ब्रह्मतीर्थ और अमरकण्टकमें जानेसे जो पुण्यफल प्राप्त होता है, उससे कोटिगुणा अधिक फल इस पुराणके श्रवण एवं पठनसे होता है। श्रेष्ठ ब्राह्मणको कपिला दान करनेपर जो फल मिलता है, उतना फल इस वराहपुराणके एक अध्यायका श्रवण करनेसे हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। पवित्र होकर सावधानीके साथ इस पुराणके दस अध्यायोंका श्रवण करनेपर मनुष्य 'अग्निष्टोम' एवं 'अतिरात्र' यज्ञोंके फलका भागी हो जाता है। जो बुद्धिमान् व्यक्ति उत्तम भक्तिके साथ निरन्तर इसका श्रवण करता रहता है, उसे भगवान् वराहके वचनानुसार यज्ञों, सभी दानों तथा अखिल तीर्थोंके अभिषेकका फल प्राप्त हो जाता है, इसमें कोई संदेहकी बात नहीं। पुत्रहीन व्यक्ति इसके श्रवणसे पुत्रको और पुत्रवान् सुन्दर पौत्रको प्राप्त करता है। जिसके घरमें यह वराहपुराण लिखित रूपमें रहता है और उसकी पूजा होती है, उसपर भगवान् नारायण पूर्ण संतुष्ट हो जाते हैं।

वसुंधरे! इस पुराणका श्रवण करके सनातन भगवान् विष्णुकी भाँति चन्दन, पुष्प और वस्त्रोंसे पूजा करनी चाहिये और ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। यदि राजा हो तो उसे अपनी शक्तिके अनुसार ग्राम आदिका दान करना चाहिये। जो मानव पवित्र होकर संयतचित्तसे इस पुराणका श्रवण करके इसकी पूजा करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर श्रीहरिका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। (अध्याय २१७)

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श्रीवराहपुराण समाप्त

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गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित पुराण, उपनिषद् आदि

28 श्रीमद्भागवत-सुधासागर1111 सं० ब्रह्मपुराण
1490 श्रीमद्भागवत-सुधासागर (विशिष्ट संस्करण)1113 नरसिंहपुराणम्—सटीक
25 श्रीशुकसुधासागर—बृहदाकार, बड़े टाइपमें1189 सं० गरुडपुराण
1535<br>1536 श्रीमद्भागवत-महापुराण—सटीक, दो खण्डोंमें सेट, (विशिष्ट संस्करण)1362 अग्निपुराण (मूल संस्कृतका हिन्दी-अनुवाद)
26<br>27 श्रीमद्भागवत-महापुराण—सटीक, दो खण्डोंमें सेट1361 सं० श्रीवराहपुराण
29 श्रीमद्भागवत-महापुराण—मूल, मोटा टाइप554 सं० भविष्यपुराण
124 श्रीमद्भागवत-महापुराण—मूल मझला1121 सं० लिंगपुराण—सटीक
1092 भागवतस्तुति-संग्रह85 सं० ब्रह्मवैवर्तपुराण
571 श्रीकृष्णलीलाचिन्तन143 वामन पुराण—सटीक
30 श्रीप्रेम-सुधासागर55 कूर्ममहापुराण—सटीक
31 भागवत एकादश स्कन्ध161 महापुराण (महाभागवत) शक्तिपीठांक
728 महाभारत—हिन्दी टीका-सहित, सजिल्द, सचित्र [छः खण्डोंमें] सेट (अलग-अलग खण्ड भी उपलब्ध)517 गर्गसंहिता
38 महाभारत-खिलभाग हरिवंशपुराण—सटीक47 पातंजलयोग-प्रदीप
1589 ,, केवल हिन्दी135 पातंजलयोगदर्शन
637 जैमिनीयाश्वमेध पर्व582 छान्दोग्योपनिषद्—सानुवाद शांकरभाष्य
39<br>511 संक्षिप्त महाभारत—केवल भाषा, सचित्र, सजिल्द सेट (दो खण्डोंमें)577 बृहदारण्यकोपनिषद्—सानुवाद शांकरभाष्य
44 संक्षिप्त पद्मपुराण—सचित्र, सजिल्द1421 ईशादि नौ उपनिषद्-सानुवाद शांकरभाष्य
1468 सं० शिवपुराण (विशिष्ट संस्करण)66 ईशादि नौ उपनिषद्—अन्वय-हिन्दी व्याख्या
789 सं० शिवपुराण—मोटा टाइप67 ईशावास्योपनिषद्-सानुवाद, शांकरभाष्य
1133 सं० देवीभागवत68 केनोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
48 श्रीविष्णुपुराण—सटीक, सचित्र578 कठोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
1364 श्रीविष्णुपुराण (केवल हिन्दी)69 माण्डूक्योपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
1183 सं० नारदपुराण513 मुण्डकोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
279 सं० स्कन्दपुराणांक70 प्रश्नोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
539 सं० मार्कण्डेयपुराण71 तैत्तिरीयोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
72 ऐतरेयोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
73 श्वेताश्वतरोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
65 वेदान्त-दर्शन—हिन्दी व्याख्या-सहित, सजिल्द
639 श्रीनारायणीयम्—सानुवाद

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