वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय २१७ ] वराहपुराणकी फल-श्रुति [ ३९९
त्रिलोकीपर विजय प्राप्त करनेके विचारसे उसने अपने नगरसे प्रस्थान कर दिया। तीनों लोकोंको जीतकर उसने इन्द्रपर भी अपना अधिकार जमा लिया। इन्द्रजित् नामका उसका पुत्र उसे सहयोग दे रहा था। उस समय बहुत पहले इन्द्रने जो भगवान् शम्भुके सींगका अग्रभाग लेकर अपने यहाँ स्थापित किया था, उसे अपने पुत्रसहित रावणने उखाड़ लिया। पर जब वह राक्षस उसे लेकर अपनी पुरीको जा रहा था और सिन्धुके तटपर पहुँचा तो उस मूर्तिको जमीनपर रखकर मुहूर्तभर संध्या करने लगा। फिर संध्या समाप्त होनेपर जब उसने उसे बलपूर्वक उठानेकी चेष्टा की तो वह उसे उठा न सका और वह मूर्ति वज्रके समान कठोर बन गयी। तब रावणने उसे वहीं छोड़ दिया और लङ्काकी यात्रा की। (भगवान् वराह पृथ्वीसे कहते हैं—) महामते! तुम्हें इसी मूर्तिको ‘दक्षिणगोकर्णेश्वर’ समझना चाहिये। भूतपति भगवान् शंकर वहाँ स्वयं प्रतिष्ठित हुए हैं।'
**ब्रह्माजी कहते हैं—**मुने! मैंने तुम्हें विस्तारके साथ ये सभी बातें कह सुनायीं। इसी तरह महात्मा गोकर्णकी उत्तर दिशामें भी प्रतिष्ठा हुई है। विप्रर्षे! जैसे दक्षिणमें भगवान् ‘शृङ्गेश्वर’की प्रतिष्ठा हुई है, उसी क्रमसे उत्तरमें भगवान् ‘शैलेश्वर’ विराजते हैं। वत्स! मैं तुमसे इस क्षेत्रके तीर्थोंकी महान् उत्पत्तिका प्रसङ्ग कह चुका। अब तुम मुझसे दूसरा कौन-सा प्रसङ्ग सुनना चाहते हो। [अध्याय २१६]
वराहपुराणकी फल-श्रुति
**सनत्कुमारजी कहते हैं—**भगवन्! आपने यथावत् मेरी सभी शङ्काओंका निराकरणकर सारी बातें स्पष्ट कर दीं। मैं संशयकी बातें पूछता रहा और आप उन्हें भलीभाँति स्पष्ट करते रहे हैं। विश्वस्वरूप ‘स्थाणु’ जगदीश्वर भगवान् शंकर अप्रतिम तेजस्वी हैं। वे जंगलमें आनन्दपूर्वक विचर रहे थे। वह जंगल पुण्यक्षेत्र था। महाभाग! जगत्का कल्याण करनेके लिये उनका विग्रह एवं शृङ्ग जिस प्रकार प्रतिष्ठित हुआ तथा जैसे वे स्थान तीर्थ बन गये, मैं उसे सुनना चाहता हूँ। जगत्प्रभो! आप यथार्थरूपसे उसका वर्णन करनेकी कृपा कीजिये।
**ब्रह्माजीने कहा—**महामुने! इन सभी तीर्थोंके फलका जो निश्चित रूप बतलाया गया है, उसका शेष भाग तुमसे पुलस्त्यजी कहेंगे*। तुम इस समय मुनियोंके अग्रणी बनकर इस वनमें विराजो। तात! तुम मेरे समान ही वेद और वेदाङ्गके तत्त्वको भलीभाँति जाननेवाले पुत्र हो। जो पुरुष इस प्रसङ्गको सुनेगा, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूट जायगा। यही नहीं, वह यशस्वी, कीर्तिमान् होकर इस लोकमें और परलोकमें भी पूज्य होगा। चारों वर्णोंके व्यक्तियोंका कर्तव्य है कि वे मन और इन्द्रियोंको सावधान करके निरन्तर इस प्रसङ्गका श्रवण करें। यह कथानक परम मङ्गलस्वरूप, कल्याणमय, धर्म, अर्थ और कामका साधक, समस्त मनोरथोंका प्रदान करनेवाला, परम पवित्र, आयुवर्धक और विजय देनेमें सक्षम है। यह धन और यश देनेवाला, पापका नाशक, कल्याणकारी और शान्तिकारक है। इस पुराणको सुननेसे मनुष्यकी लोक-परलोकमें
* वह वराहपुराणका अंश खिलरूप है, जिसपर आगेके लेखोंमें पर्याप्त विचार प्राप्त होगा।
| ४०० | संक्षिप्त श्रीवराहपुराण | [ अध्याय २१७ |
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दुर्गति नहीं होती। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इसका श्रवण-कीर्तन करता है, वह स्वर्गमें प्रतिष्ठित होता है।
सूतजी कहते हैं— विप्रवरो! परमेष्ठी प्रजापति ब्रह्माजीने सनत्कुमारजीसे ये सब बातें कहकर विराम लिया। उन सभी बातोंका मैंने भी आप लोगोंसे तत्त्वपूर्वक वर्णन किया। ऋषिवरो! भगवान् वराह और पृथ्वीदेवीके संवादका यह सारभाग है। जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक सदा इसका पठन, श्रवण अथवा मनन करेगा, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर परमगति प्राप्त करेगा। प्रभासक्षेत्र, नैमिषारण्य, हरिद्वार, पुष्कर, प्रयाग, ब्रह्मतीर्थ और अमरकण्टकमें जानेसे जो पुण्यफल प्राप्त होता है, उससे कोटिगुणा अधिक फल इस पुराणके श्रवण एवं पठनसे होता है। श्रेष्ठ ब्राह्मणको कपिला दान करनेपर जो फल मिलता है, उतना फल इस वराहपुराणके एक अध्यायका श्रवण करनेसे हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। पवित्र होकर सावधानीके साथ इस पुराणके दस अध्यायोंका श्रवण करनेपर मनुष्य 'अग्निष्टोम' एवं 'अतिरात्र' यज्ञोंके फलका भागी हो जाता है। जो बुद्धिमान् व्यक्ति उत्तम भक्तिके साथ निरन्तर इसका श्रवण करता रहता है, उसे भगवान् वराहके वचनानुसार यज्ञों, सभी दानों तथा अखिल तीर्थोंके अभिषेकका फल प्राप्त हो जाता है, इसमें कोई संदेहकी बात नहीं। पुत्रहीन व्यक्ति इसके श्रवणसे पुत्रको और पुत्रवान् सुन्दर पौत्रको प्राप्त करता है। जिसके घरमें यह वराहपुराण लिखित रूपमें रहता है और उसकी पूजा होती है, उसपर भगवान् नारायण पूर्ण संतुष्ट हो जाते हैं।
वसुंधरे! इस पुराणका श्रवण करके सनातन भगवान् विष्णुकी भाँति चन्दन, पुष्प और वस्त्रोंसे पूजा करनी चाहिये और ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। यदि राजा हो तो उसे अपनी शक्तिके अनुसार ग्राम आदिका दान करना चाहिये। जो मानव पवित्र होकर संयतचित्तसे इस पुराणका श्रवण करके इसकी पूजा करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर श्रीहरिका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। (अध्याय २१७)
<div align="center">❊ श्रीवराहपुराण समाप्त ❊
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गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित पुराण, उपनिषद् आदि
| 28 श्रीमद्भागवत-सुधासागर | 1111 सं० ब्रह्मपुराण |
| 1490 श्रीमद्भागवत-सुधासागर (विशिष्ट संस्करण) | 1113 नरसिंहपुराणम्—सटीक |
| 25 श्रीशुकसुधासागर—बृहदाकार, बड़े टाइपमें | 1189 सं० गरुडपुराण |
| 1535<br>1536 श्रीमद्भागवत-महापुराण—सटीक, दो खण्डोंमें सेट, (विशिष्ट संस्करण) | 1362 अग्निपुराण (मूल संस्कृतका हिन्दी-अनुवाद) |
| 26<br>27 श्रीमद्भागवत-महापुराण—सटीक, दो खण्डोंमें सेट | 1361 सं० श्रीवराहपुराण |
| 29 श्रीमद्भागवत-महापुराण—मूल, मोटा टाइप | 554 सं० भविष्यपुराण |
| 124 श्रीमद्भागवत-महापुराण—मूल मझला | 1121 सं० लिंगपुराण—सटीक |
| 1092 भागवतस्तुति-संग्रह | 85 सं० ब्रह्मवैवर्तपुराण |
| 571 श्रीकृष्णलीलाचिन्तन | 143 वामन पुराण—सटीक |
| 30 श्रीप्रेम-सुधासागर | 55 कूर्ममहापुराण—सटीक |
| 31 भागवत एकादश स्कन्ध | 161 महापुराण (महाभागवत) शक्तिपीठांक |
| 728 महाभारत—हिन्दी टीका-सहित, सजिल्द, सचित्र [छः खण्डोंमें] सेट (अलग-अलग खण्ड भी उपलब्ध) | 517 गर्गसंहिता |
| 38 महाभारत-खिलभाग हरिवंशपुराण—सटीक | 47 पातंजलयोग-प्रदीप |
| 1589 ,, केवल हिन्दी | 135 पातंजलयोगदर्शन |
| 637 जैमिनीयाश्वमेध पर्व | 582 छान्दोग्योपनिषद्—सानुवाद शांकरभाष्य |
| 39<br>511 संक्षिप्त महाभारत—केवल भाषा, सचित्र, सजिल्द सेट (दो खण्डोंमें) | 577 बृहदारण्यकोपनिषद्—सानुवाद शांकरभाष्य |
| 44 संक्षिप्त पद्मपुराण—सचित्र, सजिल्द | 1421 ईशादि नौ उपनिषद्-सानुवाद शांकरभाष्य |
| 1468 सं० शिवपुराण (विशिष्ट संस्करण) | 66 ईशादि नौ उपनिषद्—अन्वय-हिन्दी व्याख्या |
| 789 सं० शिवपुराण—मोटा टाइप | 67 ईशावास्योपनिषद्-सानुवाद, शांकरभाष्य |
| 1133 सं० देवीभागवत | 68 केनोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य |
| 48 श्रीविष्णुपुराण—सटीक, सचित्र | 578 कठोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य |
| 1364 श्रीविष्णुपुराण (केवल हिन्दी) | 69 माण्डूक्योपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य |
| 1183 सं० नारदपुराण | 513 मुण्डकोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य |
| 279 सं० स्कन्दपुराणांक | 70 प्रश्नोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य |
| 539 सं० मार्कण्डेयपुराण | 71 तैत्तिरीयोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य |
| 72 ऐतरेयोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य | |
| 73 श्वेताश्वतरोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य | |
| 65 वेदान्त-दर्शन—हिन्दी व्याख्या-सहित, सजिल्द | |
| 639 श्रीनारायणीयम्—सानुवाद |
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