वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
अनुबन्ध चतुष्टय १३७ अनुवाद-शम आदि तो (वस्तुतः) शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान, श्रद्धा नाम वाले हैं। शम-श्रवण आदि से अतिरिक्त (सांसारिक) विषयों से मन को रोकना ही शम है। बाह्य इन्द्रियों का उन (श्रवणादि) से अतिरिक्त विषयों से रोकना दम है। (बाह्यविषयों से) रोकी गयी इन (इन्द्रियों) को उस (ब्रह्मादि) से अतिरिक्त विषयों से पूर्णतया अवरुद्ध करना ही उपरति है अथवा शास्त्रोक्त (नित्यादि) कर्मों का (सन्यासाश्रम में) विधिपूर्वक परित्याग (ही उपरति है)। सर्दी-गर्मी (सुख-दुःख) आदि द्वन्द्वों को सहन करना ही तितिक्षा है। पूर्णतया नियन्त्रितमन को श्रवण आदि तथा उनके अनुकूल विषयों में भलीप्रकार लगाना ही समाधि है। गुरु द्वारा उपदिष्ट वेदान्त के वाक्यों में विश्वास श्रद्धा है। मोक्ष की इच्छा ही मुमुक्षुत्व है। इसप्रकार की विशेषताओं से युक्त हुआ प्रमाता अधिकारी है। 'जितेन्द्रिय ही शान्तचित्त रहता है' इत्यादि श्रुतिवचन भी है। 'चन्द्रिका' - ग्रन्थकार ने साधनचतुष्टय का उल्लेख करते समय शमादि षट्सम्पत्ति कहकर तृतीय साधन का संकेतमात्र किया था। प्रस्तुत अंश में उन सभी का नामोल्लेख करते हुए उन्हें परिभाषित करते हैं। शमादि से यहाँ क्रमशः शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान, श्रद्धा इन छः से अभिप्राय ग्रहण करना चाहिए। इन छः को ग्रन्थकार ने सम्पत्ति इसलिए कहा क्योंकि ये ब्रह्मज्ञान के मार्ग को प्रशस्त करते हैं। अतः तत्त्वज्ञान अथवा मोक्षप्राप्तिरूप कार्य में ये छहों सम्पत्तिस्वरूप हैं। तत्पश्चात् क्रमशः इनकी व्याख्या करते हैं- (१) शम-जिसप्रकार भूखा व्यक्ति अपनी भूख शान्त करने हेतु उसके साधनस्वरूप अन्न को प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहता है। उसीप्रकार तत्त्वज्ञान के साधन जो श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि हैं, उन्हें छोड़कर दूसरे सांसारिकविषयों में बार-बार दौड़कर जाते हुए मन को एक विशेष प्रकार की अन्तःकरण की वृत्ति नियन्त्रित करती है। इसी रोकने वाली वृत्ति को दर्शन की भाषा में शम कहते हैं। संक्षेप में-अन्तरिन्द्रिय मन को बाह्य सांसारिकविषयों से हटाकर तत्त्वज्ञान के साधनस्वरूप वेदों के श्रवण, मनन आदि में लगाना ही शम है। इसप्रकार शम हमारे अन्दर स्थित मन नामक इन्द्रिय का वह व्यापार है जो उसे सांसारिक भौतिकसुखों की ओर जाने से रोकता है।
१३८ वेदान्तसार (२) दम-चक्षुः, श्रोत्र, रसना, घ्राण एवं त्वक् नामक पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों को ग्रहण करने के लिए लालायित रहती हैं। जैसे-नेत्रेन्द्रिय सुन्दरवस्तु को देखने के लिए व्याकुल रहती है तो श्रोत्रेन्द्रिय मधुरध्वनि सुनने के लिए; इसीप्रकार रसनेन्द्रिय स्वादिष्ट व्यञ्जन खाने के लिए बेचैन रहती है। इन सभी को इन सांसारिक भोगसामग्रियों से बलपूर्वक रोककर ब्रह्मसाक्षात्कार के साधनभूत 'श्रवण-मनन' आदि में लगाना 'दम' कहलाता है। इसप्रकार 'शम' और 'दम' में केवल इतना ही अन्तर है कि वहाँ अन्तरिन्द्रिय मन को बाह्य सांसारिकविषयों से हटाकर श्रवण, मनन आदि ब्रह्मज्ञान के साधन में लगाया जाता है, जबकि 'दम' में पञ्चज्ञानेन्द्रियों को उन-उनके विषयों से रोकते हुए ब्रह्मसाक्षात्कार के साधन श्रवण-मननादि में लगाया जाता है। यद्यपि ज्ञानेन्द्रियों पर भी 'मन' का नियन्त्रण होने के कारण प्रबलता 'शम' की ही माननी होगी। (३) उपरति-ब्रह्मसाक्षात्कार के साधनस्वरूप श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि के अतिरिक्त सांसारिकविषयों से हटायी हुई इन्द्रियाँ पुनः उन विषयों में न जा सकें, यह जिस वृत्ति द्वारा किया जाता है, उसे 'उपरति' कहते हैं। इसप्रकार 'उपरति' मन का वह कार्यव्यापार है, जो नियन्त्रित की गयी इन्द्रियों को उनके विषयों की ओर पुनः जाने से रोकता है। इसप्रकार उपरति, शम एवं दम में अत्यन्तसूक्ष्म अन्तर रहता है। इसी प्रसङ्ग में ग्रन्थकार 'उपरति' की दूसरी परिभाषा भी प्रस्तुत करते हैं-संध्यावन्दन, अग्निहोत्र आदि जो नित्यनैमित्तिककार्य शास्त्रों में गृहस्थादिकों के करने के लिए बताए गए हैं, संन्यास आश्रम को स्वीकार करके शास्त्रोक्तरीति से उनका परित्याग करना भी 'उपरति' कहलाता है। दर्शनशास्त्र, शमादि के समान ही संन्यास को भी आत्मज्ञान का महत्त्वपूर्ण साधन स्वीकार करता है, क्योंकि यज्ञादिकार्यों में लगे रहने के कारण तथा ब्राह्मणत्व, क्षत्रियत्व विषयक विरोधी भावनाओं के बने रहने से साधक वेदान्त के तत्त्वों पर भलीभाँति विचार करने में समर्थ ही नहीं हो पाता है। इसलिए मुमुक्षु के लिए 'संन्यास' की अनिवार्यता प्रतिपादित की गयी है तथा विधिपूर्वक त्याग से अभिप्राय है-सर्ववेदस् यज्ञादि करने के बाद साधक संन्यास की दीक्षा ग्रहण करता है तथा इसीसमय शास्त्रोक्त रीति से वह नित्यनैमित्तिककर्मों के परित्याग का भी संकल्प लेता है, नित्यादि
अनुबन्ध चतुष्टय १३१ कर्मों का यह परित्याग वह आलस्य, अविश्वास अथवा प्रमाद के कारण नहीं करता, अपितु इसके परित्याग में शास्त्रोक्तर्रीति का अनुकरण करता है। आचार्य मनु का भी इस विषय में कथन है- प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेदस दक्षिणाम्। आत्मन्यग्नीन् समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात्।। (मनु. 6.38) (४) तितिक्षा-सर्दी-गर्मी, मान-अपमान तथा इनसे अनुभव किए जाने वाले सुख-दुःख आदि को प्रायः सभी प्राणी अनुभव करते हैं, किन्तु जो व्यक्ति यह मानते हुए कि सर्दी-गर्मी, सुखःदुःख आदि तो केवल शरीर के धर्म हैं। आत्मा के ऊपर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इसप्रकार से विवेकपूर्वक इन्हें सहन करना ही 'तितिक्षा' माना गया है। महाभारत में गीताकार ने भी इसी अभिप्राय को व्यक्त किया है- “मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदा। आगमापायिनोऽनित्यास्तान् तितिक्षस्व भारत।। (गीता 2/14) (५) समाधान-वश में किए हुए मन को श्रवण-मनन-निदिध्यासन आदि द्वारा एकाग्र करना, निरन्तर इन्हीं का चिन्तन करना ही समाधि है तथा इसीको 'समाधान' भी कहा गया है। इसी प्रसङ्ग में ग्रन्थकार ने 'तदनुगुणविषय' शब्द का प्रयोग किया है, जिसका अभिप्राय है, मन को बाह्यविषयों से रोककर गुरु के प्रति भक्ति, सेवा-शुश्रूषा तथा उसके प्रति विनयपूर्वक आचरण करते हुए वेदान्तग्रन्थों का अध्ययन एवं चिन्तन करे। ऐसी स्थिति में जहाँ एक ओर साधक का मन इधर-उधर भटकना बन्द कर देता है, वहीं दूसरी ओर वह विनम्रता की मानो साक्षात्मूर्ति ही बन जाता है। अभिमान उसको स्पर्श तक नहीं कर पाता है। कुछ विद्वानों ने समाधान का अभिप्राय अपरिग्रह किया है-'दण्डं आच्छादनं कौपीनं परिगृहेत् शेषं विसृजेत्।" (६) श्रद्धा-गुरु को न केवल भारतीयसंस्कृति अपितु सम्पूर्णदर्शन साहित्य में अत्युच्च स्थान प्राप्त हुआ है। इसीकारण 'गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुःदेवो महेश्वरः गुरुः साक्षात्, परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः' कहकर उसे परमब्रह्म की कोटि में रखा गया है। इसी गुरु द्वारा कहे गए वेदान्त-वचनों 'तत्त्वमसि', 'ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या' 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्यादि के प्रति आस्था, अगाधविश्वास धारण करना ही 'श्रद्धा' कहा गया है। गीताकार ने भी तत्त्वज्ञान के लिए श्रद्धा की अनिवार्यता प्रतिपादित की है-
१४० वेदान्तसार “श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः” यहाँ तक षट्सम्पत्तिरूप तृतीय साधन की व्याख्या करने के बाद ग्रन्थकार ने मुमुक्षुत्व नाम चतुर्थ एवं अन्तिम साधन का उल्लेख किया है। ‘मुमुक्षु’ का अभिप्राय है-‘मोक्ष की इच्छा वाला’। इसलिए मुमुक्षुत्व का अर्थ होगा ‘मोक्ष की इच्छा का भाव’। पूर्व में बताए गए तीन साधनों से सम्पन्न साधक जब मोक्ष की प्रबल इच्छा वाला होता है, तभी वह अपने गुरु से आध्यात्मिकज्ञान को प्राप्त करने का अधिकारी बन पाता है। इस प्रसङ्ग में यह उल्लेखनीय है कि दर्शनशास्त्र इच्छा अथवा कामना को बन्धन का कारण मानते आये हैं, फिर यह मोक्षेच्छा प्रशस्य क्यों? वस्तुतः यह प्रशंसनीय इसलिए है, क्योंकि आत्मा से भिन्न वस्तु की कामना करना ही ‘काम’ है। आत्मा के सम्बन्ध में होने के कारण मोक्ष के प्रति इच्छा तो ‘अकाम’ ही माना जाएगा, अर्थात् उसकी गणना काम की श्रेणी में नहीं होगी। वस्तुतः आत्मा की कामना करने वाले को पूर्णकाम होने पर भी सभीप्रकार की कामनाओं से मुक्त ही मानना होगा। ऊपर बताए गए शमदमादि गुणों से सम्पन्न, नित्यानित्यवस्तुविवेक आदि साधनचतुष्टय से समृद्ध व्यक्ति ही वस्तुतः प्रस्तुत प्रकरणग्रन्थ वेदान्तसार के अध्ययन करने का अधिकारी है। अपनी बात की पुष्टि के लिए ग्रन्थकार ‘शान्तो दान्तः’ इत्यादि श्रुति को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हैं। यह श्रुतिवचन काण्वशाखा की बृहदारण्यकोपनिषद् में इसप्रकार उद्धृत किया गया है। यहाँ भी प्रायः उपर्युक्त षट्सम्पत्ति की ओर ही संकेत किया गया है— “शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्यति” विशेष— (1) प्रस्तुत श्रुति ग्रन्थकार द्वारा पूर्व प्रतिपादित षट्सम्पत्ति को शास्त्रसम्मत प्रतिपादित करने के लिए ही उद्धृत की गयी है। (2) उपर्युक्त अंश में ग्रन्थकार ने उपरति को दो प्रकार से परिभाषित किया है। द्वितीय परिभाषा संन्यास अथवा कर्मसंन्यास को प्रमुखता प्रदान करने के लिए की गयी है। (3) इस दृष्टि से संन्यासी ही मोक्ष का, वेदान्त का अधिकारी हो सकता है, यह अभिप्राय भी ग्रहण किया जा सकता है। (4) आत्मा को देखने की इच्छा अथवा आत्मज्ञान को वेदान्ती ‘काम’ की श्रेणी में नहीं मानते हैं।
अनुबंध चतुष्टय १४१ (5) गीताकार ने भी ब्रह्मज्ञान के लिए ‘शम’ की आवश्यकता प्रतिपादित की है– ‘योगारूढस्य शमः कारणमुच्यते’ (6/3) (6) यहाँ प्रयुक्त श्रवणादि से अभिप्राय वेदशास्त्रों के अध्ययन, मनन, चिन्तन, श्रवण तथा आचरण से ग्रहण करना चाहिए। (7) ‘दम’ को भगवान् श्रीकृष्ण ने कछुए के उदाहरण द्वारा अत्यन्त सुन्दर ढंग से इसप्रकार समझाया है– यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।। (गीता-2/58) (8) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है–
चित्र-२४ 3 साधन 4 ┌──────────────────────────┴──────────────────────────┐ शमादि षट्क सम्पत्ति मोक्षेच्छा ┌──────┬───────┬───────┬───────┬───────┐ │ शम दम उपरति तितिक्षा समाधान श्रद्धा मोक्ष प्राप्ति │ │ │ │ │ │ के प्रति अन्तरिन्द्रिय श्रोत्रत्वगादि नित्य नैमित्तिक │ सर्वथा नियन्त्रित │ │ मन बाह्येन्द्रिय को कर्मों का │ मन को श्रवणादि │ प्रबल इच्छा │ शास्त्रोक्त रीति │ विषयों में लगाना │ │ से परित्याग │ │ ┌──────────┴──────────┐ │ ┌──────────┴──────────┐ बाह्य विषयों से निरोध │ │ गुरुवचनों पर आस्था │ │ │ │ एवं दृढ़ विश्वास │ श्रवणादि में नियोजन ┌──────────┴──────────┐ └──────────────────────┘ │ सुखदुःखादि द्वन्द्व को शरीर │ │ धर्म मानकर सहन करना │ └──────────────────────┘
अवतरणिका–‘अनुबन्धचतुष्टय’ में से इसप्रकार प्रथम अनुबन्ध ‘अधिकारी’ की व्याख्या करने के पश्चात् ग्रन्थकार अपनी बात की पुष्टि में आचार्य शङ्कर द्वारा विरचित ‘उपदेशसाहस्री’ में प्रयुक्त कारिका को उद्धृत करते हैं– उक्तं च– “प्रशान्तचित्ताय जितेन्द्रियाय च प्रहीणदोषाय यथोक्तकारिणे। गुणान्वितायानुगताय सर्वदा प्रदेयमेतत्सततं मुमुक्षवे” इति॥
१४२ वेदान्तसार अन्वय-प्रशान्तचित्ताय, जितेन्द्रियाय, प्रहीणदोषाय, यथोक्त-कारिणे, गुणान्विताय, च अनुगताय मुमुक्षवे सर्वदा एतत् सकलम् (ज्ञानम्) प्रदेयम्।। इति।। अनुवाद- अत्यन्त शान्तचित्त, इन्द्रियों को वश में करने वाले, निर्मल अन्तःकरण वाले, पूर्वोक्त बातों का पालन करने वाले, (विवेकादि) गुणों से सम्पन्न, गुरु की आज्ञा का पालन करने वाले (उसके वाक्यों में श्रद्धा रखने वाले) मोक्ष के इच्छुक व्यक्ति को ही हमेशा यह सम्पूर्ण वेदान्त का ज्ञान प्रदान करना चाहिए। 'चन्द्रिका'- जिस व्यक्ति का मन सांसारिक भोगविलासविषयक सामग्री की ओर से विरक्त होकर एकमात्र आत्मतत्त्व के चिन्तन अथवा ब्रह्मज्ञान के साधनभूतश्रवण मननादि में स्थिर होकर शान्तभाव को प्राप्त हो गया हो। जिसने अपनी बाह्य इन्द्रियों श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राण आदि को पूर्णतया अपने वश में कर लिया हो तथा जिसकी ये सभी इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों की ओर न जाकर श्रवणमननादि ब्रह्मसाक्षात्कार के साधनों के प्रति ही आकृष्ट होती हों। जिसने काम्य एवं निषिद्धकर्मों का पूर्णतया परित्याग करके नित्य-नैमित्तिक-प्रायश्चित्त एवं उपासन आदि कर्मों द्वारा अपने अन्तःकरण को पूर्णतया निर्मल बना लिया हो। साथ ही जिसमें नित्य-अनित्यवस्तुओं के सम्बन्ध में विवेक ने स्थान बना लिया हो तथा जिसे इस लोक एवं परलोकविषयक फलभोगसामग्री के प्रति वैराग्य हो गया हो। इसके अतिरिक्त जो अभिमानरहित अत्यन्त विनम्र- भाव से गुरु की सेवा एवं उनकी आज्ञापालन में आनन्द का अनुभव करता हो। जो गुरु की प्रत्येक आज्ञा को माला के समान अपने मस्तक पर धारण करते हुए, उनके प्रत्येक वचन के प्रति अगाधश्रद्धा एवं आस्था धारण करे। मोक्ष के प्रति प्रबल इच्छा रखने वाले इसप्रकार के अधिकारी व्यक्ति को ही आत्मविषयक ज्ञान प्रदान करना चाहिए। विशेष-(1) प्रस्तुत कारिका वस्तुतः यहाँ तक विवेचन किए गए अधिकारी के गुणों का अत्यन्त संक्षिप्तरूप कहा जा सकता है। (2) ग्रन्थकार ने इसे अपनी बात की पुष्टि में प्रमाणरूप में प्रस्तुत किया है। (3) कारिका में प्रयुक्त 'गुणान्विताय' को विद्वानों ने सद्-असद् विवेक, त्याग तथा क्षमारूप गुणों से युक्त अर्थ में भी प्रयुक्त माना है।
अनुबन्ध चतुष्टय १४३ अवतरणिका-अनुबन्धचतुष्टय के प्रथम अनुबन्ध अधिकारी की विस्तृत व्याख्या करने के बाद ग्रन्थकार उसके शेष तीन अनुबन्धों-विषय, सम्बन्ध एवं प्रयोजन का उल्लेख करते हुए कहते हैं- विषयो जीवब्रह्मैक्यं शुद्धचैतन्यं प्रमेयं तत्रैव वेदान्तानां तात्पर्यात्। सम्बन्धस्तु तदैक्यप्रमेयस्य तत्प्रतिपादकोपनिषत्प्रमाणस्य च बोध्यबोधकभावः। प्रयोजनं तु तदैक्यप्रमेयगताज्ञाननिवृत्तिः स्वस्वरूपानन्दावाप्तिश्च "तरति शोकमात्मवित्" इत्यादिश्रुतेः "ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति" इत्यादि श्रुतेश्च॥४॥ पदच्छेद- विषयः-जीव-ब्रह्म-ऐक्यम् शुद्धचैतन्यम् प्रमेयम् तत्रैव वेदान्तानाम् तात्पर्यात्। सम्बन्धः-तु तद् ऐक्य प्रमेयस्य तत् प्रतिपादक-उपनिषत् प्रमाणस्य च बोध्यबोधकभावः। प्रयोजनम्-तु तद् ऐक्य प्रमेयगत-अज्ञाननिवृत्तिः स्व-स्वरूप-आनन्द-अवाप्तिः च। "तरति शोकम् आत्मवित्" इत्यादि श्रुतेः। "ब्रह्मवित् ब्रह्म एव भवति" इत्यादि श्रुतेः च॥4।। अनुवाद- (वेदान्त का प्रतिपाद्य) विषय-जीव और ब्रह्म की एकता है। शुद्धचैतन्य (ही यहाँ) प्रमा (ज्ञान) का विषय है, क्योंकि समस्त वेदान्त वाक्यों का अभिप्राय उसी (शुद्धचैतन्य) के प्रतिपादन में निहित है। ज्ञान के विषय उन जीव और ब्रह्म का ऐक्य एवं उनका प्रतिपादन करने वाले उपनिषद्रूप प्रमाणवाक्यों का (परस्पर) बोध्यबोधकभाव सम्बन्ध है। जबकि उस जीव एवं ब्रह्म के ऐक्यविषयक ज्ञान के साथ अज्ञान की निवृत्तिपूर्वक अपने स्वरूप का परिचय होने से चरम आनन्द की प्राप्ति ही (इस शास्त्र का) मुख्य प्रयोजन है। "आत्मज्ञानी शोक से तर जाता है" इत्यादि तथा "ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म ही हो जाता है" इत्यादि श्रुति का (कथन यहाँ प्रमाण है)। 'चन्द्रिका'-ग्रन्थ के आरम्भ में ग्रन्थकार ने प्रस्तुत प्रकरणग्रन्थ वेदान्तसार के अधिकारी, विषय, सम्बन्ध एवं प्रयोजन इस 'अनुबन्धचतुष्टय' का उल्लेख करने के पश्चात् अधिकारी पद की विस्तृत व्याख्या की। पुनः प्रस्तुत गद्यखण्ड में शेष तीन अनुबन्धों-'विषय, सम्बन्ध एवं प्रयोजन' की व्याख्या प्रस्तुत करते हैं- (१) विषय-प्रस्तुत वेदान्तसार में जीव और ब्रह्म दोनों की एकता प्रतिपादित की गयी है और यही इस ग्रन्थ का मुख्य प्रतिपाद्यविषय भी है। यहाँ जीव से अभिप्राय सामान्यप्राणी से है, जिसको हम प्रतिदिन अपनी
१४४ वेदान्तसार आंखों से देखते हैं। वेदान्त के अनुसार यह जीव वस्तुतः शुद्धचैतन्यरूप ब्रह्म का ही मलिनसत्त्वप्रधान अज्ञान से आच्छादित रूप है। सम्पूर्ण वेदान्त-दर्शन में इन्हीं दोनों तत्त्वों जीव एवं ब्रह्म के ऐक्य को सिद्ध करने का ही प्रयास किया गया है। समर्थ गुरु, अधिकारी साधक को ‘अध्यारोप-अपवाद’ न्याय का सहारा लेकर अज्ञान/अविद्या अथवा माया एवं उस नित्यशुद्धचैतन्यस्वरूप ब्रह्म के अन्तर को समझाते हुए ज्ञान का विषय एकमात्र शुद्धचैतन्य को ही बताता है। जिसके परिणामस्वरूप साधक को मोक्ष-प्राप्ति होती है। वस्तुतः इस ग्रन्थ में भी सर्वत्र विभिन्नशैलियों से उसी शुद्धचैतन्य का ही प्रतिपादन किया गया है, क्योंकि वही शुद्धचैतन्य मुख्यरूप से ज्ञान का विषय है। अतः यही इसका मुख्य वर्ण्यविषय भी है। प्रत्यक्षतः दिखायी देने पर हमें जीव में अल्पज्ञता आदि गुण देखने को मिलते हैं, जबकि ब्रह्म सर्वज्ञत्व आदि गुणों से युक्त है। फिर भला ये दोनों एक कैसे हो सकते हैं? ऐसी शङ्का करना उचित नहीं है, क्योंकि अज्ञान से आच्छादित होना ही जीव के अल्पज्ञत्व का कारण है, किन्तु गुरुकृपा द्वारा अज्ञान के दूर होने से सर्वज्ञत्व आदि गुणों से युक्त शुद्धचैतन्य ही शेष रहता है। वस्तुतः जीव का अल्पज्ञत्व माया/अज्ञान द्वारा आरोपित है, वास्तविक नहीं है। इसीलिए ब्रह्म एवं जीव में अभेद प्रतिपादित किया गया है। (२) सम्बन्ध - तत्पश्चात् जीव और ब्रह्म का ऐक्य जो वस्तुतः इस दर्शन का मुख्य प्रतिपाद्य है, इस ग्रन्थ में भी प्रतिपादन किया गया है, क्योंकि वेदान्त के अनुबन्ध प्रस्तुत ग्रन्थ पर भी अक्षरशः लागू होते हैं। साथ ही जीव एवं ब्रह्म के एकतारूपी विषय ही वस्तुतः प्रमा अर्थात् ज्ञान के विषय हैं तथा इस ग्रन्थ में उद्धृत किए गए उपनिषद्वाक्यरूप प्रमाण इन दोनों का बोध्यबोधकभाव सम्बन्ध है, क्योंकि जीव एवं ब्रह्म का ऐक्य यह बोध्य अर्थात् जानने योग्य विषय है तथा ‘तत्त्वमसि’ इत्यादि श्रुतिवाक्य उसका बोध अर्थात् ज्ञान कराने से ‘बोधकवाक्य’ हैं। इस प्रसङ्ग में यह उल्लेखनीय है कि शुद्धचैतन्य के अस्तित्व को प्रत्यक्षरूप से प्रमाणित न कर सकने से अनुमानप्रमाण एवं शब्दप्रमाण का सहारा लेकर उस शुद्धचैतन्य को प्रमाणित करके यहाँ उसकी व्याख्या की गयी है। इसलिए जीव-ब्रह्म की एकता नामक विषय एवं प्रस्तुत ग्रन्थ के प्रतिपादक वाक्यों में परस्पर बोध्यबोधकभाव सम्बन्ध ही सिद्ध होता है।
अनुबन्ध चतुष्टय १४५
(३) प्रयोजन-जैसा कि पूर्व में बताया गया कि जीव और ब्रह्म के ऐक्यविषयक ज्ञान के साथ अज्ञान की निवृत्ति होने से दिखायी देने वाला यह अज्ञानजन्य सकलप्रपञ्च भी ज्ञानी की दृष्टि में ठीक उसीप्रकार समाप्त हो जाता है। जैसे-सीपी में चाँदी देखने वाले अज्ञानी की ज्ञान होने पर चाँदीविषयक धारणा समाप्त हो जाती है। साथ ही अपने स्वरूप (आत्मस्वरूप) से परिचय हो जाने के कारण उसे अद्भुत आनन्द की ठीक उसीप्रकार अनुभूति होती है, जैसे-कोई व्यक्ति अपनी खोई हुई अमूल्य वस्तु के अकस्मात् मिलने से चरम आनन्द का अनुभव करता है। इसप्रकार आत्मस्वरूप का दर्शन अथवा परिचय होने से अखण्ड आनन्द की प्राप्ति ही वेदान्तशास्त्र का मुख्यप्रयोजन है। अपने इस कथ्य की पुष्टि में ग्रन्थकार दो श्रुतिवाक्यों को उद्धृत करते हैं- 'आत्मज्ञानी संसारबन्धनरूप शोक से तर जाता है' अर्थात् जीव-ब्रह्म के ऐक्य का ज्ञान होने से ज्ञानीव्यक्ति संसार के जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर ब्रह्मसायुज्य (मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है। ऐसा श्रुतिवचन इस सम्बन्ध में प्रमाण है। ठीक इसीप्रकार अन्य श्रुतिवाक्य 'ब्रह्म को जानने वाला व्यक्ति वस्तुतः स्वयं ब्रह्मस्वरूप ही हो जाता है' क्योंकि तात्त्विकदृष्टि से ब्रह्म और ब्रह्मज्ञानी में कोई भेद नहीं रहता है। भेदकतत्त्व वस्तुतः पञ्चतत्त्वों से निर्मित यह शरीर होता है, जिसके 'पात' होने पर ब्रह्मज्ञानी का आत्मा 'ब्रह्म' नामक चैतन्यांश में मिलकर एकाकार हो जाता है। विशेष- (1) प्रस्तुत अंश के प्रारम्भ में प्रयुक्त 'जीवब्रह्मैक्यम्' के पश्चात् 'शुद्धचैतन्यम्' कहने का अभिप्राय है कि वेदान्त का प्रतिपाद्य विषय जीव और ब्रह्म की एकता है, किन्तु यह ऐक्य शुद्धचैतन्य का ही है। (2) क्योंकि जीव का अल्पज्ञत्व तथा ब्रह्म का सर्वज्ञत्व दोनों विरुद्ध धर्म हैं, किन्तु उन दोनों का परित्याग कर देने पर शुद्धचैतन्य दोनों में विद्यमान रहता है। जो सम्पूर्ण वेदान्तवाक्यों का प्रतिपाद्य है। (3) इस प्रसङ्ग में यह उल्लेखनीय है कि जीव और ब्रह्म की एकता दूध एवं जल के समान अलग-अलग तथा एक-दूसरे से मिल जाने पर होने वाली तद्रूप एकता के समान न होकर भिन्न होती है। (4) प्रस्तुत अंश में ग्रन्थकार ने विषय, सम्बन्ध और प्रयोजन इन तीन अनुबन्धों को सूत्रात्मकशैली में स्पष्ट किया है।
१४६ वेदान्तसार (५) उक्त गद्यखण्ड के अभिप्राय को हम इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं- चित्र-२५ अनुबन्ध-चतुष्टय ┌───────┬────────────────┬───────────────────────────┬───────────────────┐ │ 1 │ 2 │ 3 │ 4 │ │अधिकारी│ विषय │ सम्बन्ध │ प्रयोजन │ │ │ │ ┌────────────┐ │ ┌────────────┬──────────┐ │ ┌───────────────┐ │ │(पूर्व │ │जीव और ब्रह्म │ │ │जीव और ब्रह्म│ उपनिषद् │ │ │अज्ञान की │ │ │में │ │का ऐक्य │ │ │का ऐक्य │ वाक्य │ │ │निवृत्ति होने से│ │ │व्याख्या│ │प्रतिपादन │ │ └──────┬─────┴─────┬────┘ │ │आत्मदर्शन द्वारा│ │ │किया जा│ └────────────┘ │ │ │ │ │चरम आनन्द │ │ │चुका है)│ │ ▼ ▼ │ │की प्राप्ति │ │ │ │ │ ┌─────────────────────┐ │ └───────────────┘ │ │ │ │ │ बोध्य ───> बोधकभाव │ │ │ │ │ │ └─────────────────────┘ │ │ └───────┴────────────────┴───────────────────────────┴───────────────────┘ अवतरणिका-अनुबन्धचतुष्टय का उल्लेख करने के बाद ग्रन्थकार 'अधिकारी' के आचरण एवं तत्पश्चात् गुरु के व्यवहार का कथन करते हुए कहते हैं- अयमधिकारी जननमरणादिसंसारानलसन्तप्तो प्रदीप्तशिरोजलराशि- मिवोपहारपाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठं गुरुमुपसृत्य तमनुसरति "समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठं" इत्यादिश्रुतेः। स परमकृपयाध्यारोपापवाद- न्यायेनैनमुपदिशति "तस्मै स विद्वानुपसन्नाय प्राह" इत्यादिश्रुतेः॥५॥ पदच्छेद-अयम् अधिकारी जनन-मरण-आदि संसार-अनल-संतप्तः दीप्तशिरः जलराशिम् इव उपहारपाणिः श्रोत्रियम् ब्रह्मनिष्ठम् गुरुम् उपसृत्य तम् अनुसरति। 'समित् पाणिः श्रोत्रियम् ब्रह्मनिष्ठम्' इत्यादि श्रुते। सः (गुरुः) परमकृपया 'अध्यारोप-अपवाद, न्यायेन एनम् उपदिशति। 'तस्मै सः विद्वान् उपसन्नाय प्राह' इत्यादि श्रुतेः॥5॥ अनुवाद-जिसप्रकार भयानकगर्मी से अत्यधिक तप्त हुआ व्यक्ति अपनी तपनरूपी व्याकुलता को दूर करने के लिए जलराशि के पास जाता है। उसीप्रकार यह (वेदान्त का) अधिकारी जन्म, मरण आदि संसाररूप कष्टाग्नि से संतप्त होकर हाथ में उपहार ग्रहण करके, वेदों का अध्ययन करने वाले, ब्रह्म में अगाधनिष्ठा रखने वाले आचार्य के पास जाकर उसका अनुसरण करता है। 'समिधा हाथ में लिए हुए (शिष्य) वेदों का अध्ययन
अनुबन्ध चतुष्टय १४७ करने वाले ब्रह्मनिष्ठ (गुरु के पास जाता है) इत्यादि श्रुतिवाक्य (इसमें प्रमाण हैं) वह (गुरु) अत्यन्त कृपापूर्वक 'अध्यारोप-अपवाद-न्याय द्वारा इसे (परम रहस्य) का उपदेश प्रदान करता है। 'समीप आए हुए उस जिज्ञासु के लिए वह (ब्रह्मनिष्ठ) विद्वान् उपदेश देता है' इत्यादि श्रुतिवचन भी हैं। 'चन्द्रिका' - सूर्य की प्रचण्ड गर्मीरूपी अग्नि में जिसका अंग-अंग जला जा रहा है, ऐसा व्यक्ति जिसप्रकार अपनी तपनरूप व्याकुलता को, बैचेनी को दूर करने के लिए अपने आसपास स्थित तालाब, सरोवर आदि जलराशि को देखकर जिस तड़पन के साथ उसकी ओर दौड़ता है तथा उसमें स्नान कर अथवा आकण्ठ डूबकर जिस शान्ति एवं सुख को प्राप्त करता है। सभी वेद-वेदाङ्गों का अध्ययन करने वाला काम्य एवं निषिद्धकर्मों का परित्याग करने वाला, नित्यनैमित्तिक, प्रायश्चित्त, उपासनकर्मों का अनुष्ठान करके निर्मलबुद्धि, नित्य-अनित्यवस्तु-विवेकादि साधन-चतुष्टय- सम्पन्न प्रमाता अर्थात् अधिकारी जन्म, मरण, वृद्धावस्था एवं रोगादि संसार के विभिन्न संतापों से ठीक वैसी ही अत्यधिक व्याकुलता का अनुभव करता है। जिसे दूर करने के लिए वह अपनी सामर्थ्य के अनुसार पत्रपुष्पादि उपहार अपने हाथों में लेकर वेदों का गहन अध्ययन, चिन्तन और मननकर उनके अगाधज्ञान को हृदयंगम करने वाले, एकमात्र ब्रह्मतत्त्व में श्रद्धा रखने वाले, ब्रह्मज्ञानी गुरु के समीप जाता है तथा विनम्रभाव से उपहारस्वरूप भेंट, उनके चरणों में रखकर उनसे ब्रह्मज्ञान के उपदेश का निवेदन करता है। उसकी विनम्रता आदि के कारण आचार्य द्वारा उसे स्वीकार करने पर, वह उनके उपदेशों को श्रद्धापूर्वक सुनता है एवं पूर्णतया विनम्रभाव से उपदेश के अनुसार आचरण करता हुआ मन-वचन और कर्म से गुरु की सेवा करता है। यहाँ आकर उसे ठीक उसीप्रकार असीमशान्ति का अनुभव होता है, जैसे-गर्मी से संतप्त व्यक्ति जल के निकट आकर शान्ति का अनुभव करता है। 'समित्पाणि' इत्यादि श्रुति उक्त कथन में प्रमाण है। सांसारिकदुःखों से छुटकारा पाने तथा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को वेदों के ज्ञान से सम्पन्न, ब्रह्मज्ञानी गुरु की शरण में अपनी सामर्थ्य के अनुसार समिधादि लेकर ही जाना चाहिए। यहाँ प्रयुक्त 'समित्' शब्द को उपलक्षण मानना चाहिए। इसका अभिप्राय है कि यदि व्यक्ति इतना निर्धन हो कि वह गुरु को देने के लिए कोई वस्तु ले जाने में सक्षम न हो तो वह पत्र-पुष्प अथवा यज्ञहेतु समिधाएँ ही अपने हाथों में लेकर
१४८ वेदान्तसार गुरु के पास जाए, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि देवता, गुरु और राजा इनके पास कभी भी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए- “रिक्तपाणिर्न सेवेत राजानं देवतां गुरुम्” इसप्रकार श्रुतिसम्मत अधिकारी शिष्य के आचरण का उल्लेख करने के पश्चात् ग्रन्थकार करुणहृदय गुरु के व्यवहार के विषय में प्रमाणस्वरूप श्रुतिवाक्य प्रस्तुत करते हुए कहते हैं- उसकी दयनीयस्थिति एवं ब्रह्मज्ञान के लिए विकलता को देखकर श्रोत्रिय एवं ब्रह्मनिष्ठ वह आचार्य अत्यन्त कृपापूर्वक ‘अध्यारोप’ ‘अपवाद’ न्याय से उसे ब्रह्मरूप रहस्य का उपदेश प्रदान करता है। इस क्रम में भी ग्रन्थकार ने ‘तस्मै स’ इत्यादि श्रुतिवाक्य को प्रमाणरूप में उद्धृत करते हुए अपने कथन की पुष्टि की है। यहाँ प्रयुक्त ‘अध्यारोप-अपवादन्याय’ विशेष व्याख्या की अपेक्षा रखता है। अध्यारोप-अपवादन्याय-अज्ञानवश वस्तु में अवस्तु का भ्रम होना ही अध्यारोप है। जैसे-सीप में चाँदी तथा रस्सी में सर्प की प्रतीति। इसीप्रकार अज्ञान के कारण भ्रमवश परब्रह्म में संसार की प्रतीति होना ही अध्यारोप कहलाता है। इसीप्रकार प्रकाश आदि के कारण भ्रम के दूर होने पर वस्तु के वास्तविकस्वरूप का ज्ञान होना ही अपवाद है। जैसे-वहीं सीपी में प्रतीत होने वाली चांदी के स्थान पर उसके सीपीस्वरूप का वास्तविकज्ञान होना तथा रस्सी में प्रतीत होने वाले सर्प के स्थान पर रस्सी का स्वरूप भासित होना ही अपवाद है। विद्वान् आचार्य भी अधिकारी शिष्य को ‘ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या’ इत्यादि वाक्यों द्वारा ब्रह्म के वास्तविकस्वरूप का ज्ञान कराता है। इसी सम्पूर्णप्रक्रिया को यहाँ ग्रन्थकार ने ‘अध्यारोप-अपवाद-न्याय’ कहा है। विशेष-(1) प्रस्तुत खण्ड के आरम्भ में प्रयुक्त ‘जनन-मरणादि’ के ‘आदि’ शब्द से अभिप्राय वृद्धावस्था एवं रोगादि शारीरिकदुःखों से ग्रहण करना चाहिए। (2) ‘संसारानल’-संसाररूपी अग्नि अर्थ करने पर रूपक अलंकार। यहाँ संसार को अग्नि बताकर उनमें अभेद का आरोप किया गया है- “तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः” (3) श्रोत्रिय से अभिप्राय वेद-वेदाङ्ग में पूर्णतया निष्णात व्यक्ति से लेना चाहिए। (4) बृहदारण्यकोपनिषद् में श्रोत्रिय को निष्काम एवं पापरहित अर्थ में प्रयुक्त माना है- ‘यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतः”
अज्ञान-निरूपण
अज्ञान निरूपण १४९ (5) ब्रह्मनिष्ठं—'ब्रह्मणि निष्ठा यस्य तम्'। आचार्य शङ्कर ने इसको जपनिष्ठ एवं तपोनिष्ठ अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त माना है। (6) 'अनुसरण' का अभिप्राय केवल पीछे-पीछे चलने से नहीं लेना चाहिए, अपितु इसका 'मनसा, वाचा और कर्मणा श्रद्धापूर्वक गुरु की सेवा' अर्थ करना उचित है। (7) आचार्य की कृपा प्राप्त करके ही अधिकारी ब्रह्मज्ञान को गुरु से प्राप्त करने में सक्षम है। इसी भाव की अभिव्यक्ति 'परमकृपया' द्वारा हो रही है। (8) प्रथम गद्यखण्ड में अधिकारी की तुलना गर्मी से संतप्त व्यक्ति से करने के कारण उपमालंकार का प्रयोग द्रष्टव्य है—'प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमेत्यभिधीयते'। (9) प्रस्तुत खण्ड के अर्थ को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है— चित्र-२६ ┌────────────────────┐ │जन्ममरणादि संसारानल│ ── आदि ──┬─ वृद्धावस्था ──┬─> शारीरिक धर्म │प्रदीप्त शिर: │ └─ रोगादि ┘ └─────────┬──────────┘ ↓ (अधिकारी) ──────> जलराशिमिव ──┬─ श्रोत्रियम् ─┬─> ┌───────┐ │ └─ ब्रह्मनिष्ठम्┘ │ गुरुम्│ ┌─────┴────────┐ └─┬─────┘ │समित्पाणि भूत्वा│ ↓ └──────────────┘ ┌───────┐ │उपसृत्य │ (सगुरु:) └─┬─────┘ │ ↓ ┌────────────────┼────────────────┐ अनुसरति ┌───┴───┐ ┌───┴───┐ │अध्यारोप│ │ अपवाद │ └───┬───┘ └───┬───┘ └──────────┐ ┌──────────┘ ↓ ↓ ┌─────┐ │न्यायेन│ ───────> (परमकृपया उपदिशति) └─────┘ अवतरणिका—अधिकारी एवं आचार्य के आचरण, व्यवहार का कथन करने के पश्चात् अध्यारोप एवं अज्ञान के स्वरूप का कथन करते हैं- असर्पभूतायां रज्जौ सर्पारोपवद्वस्तुन्यवस्त्वारोपोऽध्यारोपः। वस्तु सच्चिदानन्दानन्ताद्वयं ब्रह्म। अज्ञानादिसकलजडसमूहोऽवस्तु। अज्ञानं तु सदसद्भ्यामनिर्वचनीयं त्रिगुणात्मकं ज्ञानविरोधि भावरूपं यत्किञ्चिदिति वदन्त्यहमज्ञ इत्याद्यनुभवात् "देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्" इत्यादिश्रुतेश्च॥६॥ पदच्छेद— असर्पभूतायाम् रज्जौ सर्प-आरोपवद् वस्तुनि अवस्तु-आरोपः अध्यारोपः। वस्तु-सत्-चित्-आनन्द-अनन्त-अद्वयम् ब्रह्म। अज्ञान-आदि सकल जड़समूहः अवस्तु।
१५० वेदान्तसार अज्ञानम्-तु सद्-असदभ्याम् अनिर्वचनीयम् त्रिगुणात्मकम् ज्ञानविरोधि भावरूपम् यत्किञ्चिद् इति वदन्ति। 'अहम् अज्ञः' इत्यादि अनुभवात्। “देवात्मशक्तिम् स्वगुणैः निगूढाम्” इत्यादि श्रुतेः च॥6।। अनुवाद- सर्प की सत्ता से रहित रस्सी में सर्प के आरोप के समान, वस्तु में अवस्तु का आरोप ही अध्यारोप है। सच्चिदानन्द, अनन्त और अद्वैत ब्रह्म वस्तु है तथा अज्ञान आदि से लेकर सम्पूर्ण जड़प्रपञ्च अवस्तु है। अज्ञान को तो सत् और असत् दोनों से विलक्षण होने से अनिर्वचनीय, त्रिगुणात्मक, ज्ञान का विरोधी तथा भावरूप होने से 'यत्किञ्चित्' ऐसा कहते हैं। मैं अज्ञानी हूँ, इत्यादि अनुभव से तथा 'परमात्मा की शक्ति अपने गुणों से आच्छन्न है' इत्यादि श्रुतिवचन से (इसके अस्तित्व की पुष्टि होती है।) ‘चन्द्रिका’– प्रस्तुत गद्यखण्ड में ग्रन्थकार ने सर्वप्रथम 'अध्यारोप' को सोदाहरण परिभाषित करते हुए कहा कि-- “किसी वस्तु में अज्ञान आदि के कारण उसी के समान अन्य वस्तु के आरोप को अध्यारोप कहते हैं। जैसे-मार्ग में पड़ी हुई रस्सी को यदि कोई व्यक्ति अंधकार आदि के कारण सर्प मान बैठता है। उस स्थिति में देखने वाले का रस्सी-विषयक अज्ञान सर्प के आकार में परिणत हो जाता है। परिणामस्वरूप वह भयभीत होकर वहाँ से दूर भागता है इत्यादि। किन्तु बाद में जब वह टॉर्च आदि से प्रकाश करके उसको पास जाकर भलीभांति देखता है तो उसका रस्सी-विषयक अज्ञान दूर हो जाता है और वह निश्चय कर लेता है कि यह वस्तुतः सांप नहीं है, अपितु रस्सी है। इसी बात को सीपी और चांदी के उदाहरण द्वारा इसप्रकार समझा सकते हैं- एक व्यक्ति कुछ दूर पर पड़ी हुई चमचमाती हुई वस्तु को चाँदी मानकर उसके पास जाकर उसे उठाने का प्रयास करता है। आरम्भ से लेकर अन्त तक की यह प्रक्रिया 'अध्यारोप' कहलाएगी, क्योंकि चमकती हुई वह वस्तु वास्तव में चांदी न होकर सीप थी, जो चांदी के समान चमक रही थी। इसप्रकार यहाँ भी वस्तु सीप में अवस्तु चांदी का आरोप होने से यह भी वेदान्तदर्शन की परिभाषा के अनुसार 'अध्यारोप' ही कहलाएगा।
अज्ञान निरूपण १५१ ठीक इसीप्रकार सच्चिदानन्दस्वरूप, अनन्त तथा अद्वैत आदि विशेषताओं से सम्पन्न एकमात्र ब्रह्म ही वस्तु है, जो काल एवं स्थान की सीमाओं से परे नित्य है। जबकि स्वयंप्रकाश, अनन्त ब्रह्मरूप इस वस्तु में अज्ञान अथवा माया के कारण दृश्यमान सम्पूर्ण चराचरजगत् रूप अवस्तु भासित होती रहती है। इसप्रकार ब्रह्मरूप वास्तविकवस्तु में अज्ञान के कारण चराचरजगत् की प्रतीति होना, वेदान्त की भाषा में अध्यारोप माना जाएगा। इसप्रकार यह सम्पूर्ण चराचरजगत् रूप प्रपञ्च वस्तुतः अज्ञान का ही परिणाम है। इसलिए यहाँ अज्ञान को ही अवस्तु कहा गया है। ब्रह्म के सभी विशेषणों की व्याख्या विस्तारपूर्वक हम भूमिका में कर चुके हैं। (पृ० 43) अतः पुनरावृत्ति-भय से उनका यहाँ फिर से उल्लेख नहीं किया जा रहा है। विशेष – (1) प्रस्तुत अंश में ग्रन्थकार ने 'अध्यारोप' को परिभाषित किया है। (2) 'अध्यारोप' वेदान्तदर्शन का महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है, जिसपर वेदान्तदर्शनरूपी भवन टिका हुआ है। (3) वेदान्तदर्शन के अनुसार 'ब्रह्म' ही एकमात्र वस्तु है तथा शेष सम्पूर्ण चराचरप्रपञ्च अवस्तु बताया गया है। (4) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं- चित्र-२७ वस्तु में अवस्तु ब्रह्म सम्पूर्ण चराचर संसाररूप प्रपञ्च सत् चित् आनन्द अनन्त अद्वैत की भ्रान्ति अध्यारोप अज्ञान/माया सर्प है (अवस्तु) के कारण अन्धकार या अज्ञान आदि वस्तु (रस्सी) में के कारण अवस्तु सर्प का आरोप अज्ञान का स्वरूप-उपर्युक्त गद्यखण्ड के द्वितीय अंश में ग्रन्थकार ने अज्ञान के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए इसके, सत्, असत् से भिन्न अर्थात् अनिर्वचनीय, सत्व, रजस्, तमस् गुणों से युक्त होने के कारण त्रिगुणात्मक, ज्ञान का विरोधी होने से ज्ञानविरोधी, भावरूप एवं यत्किञ्चित्
१५२ वेदान्तसार
आदि पाँच विशेषणों का उल्लेख किया है। जिनकी हम यहाँ विस्तारपूर्वक व्याख्या कर रहे हैं- (१) सदसद्भ्यामनिर्वचनीयम्-इसी प्रसङ्ग में अज्ञानरूप अवस्तु की व्याख्या करते हुए ग्रन्थकार ने इसे सत् एवं असत् से भिन्न होने के कारण अनिर्वचनीय कहा है, क्योंकि अज्ञान यदि सद्रूप में होता तो ब्रह्म के समान कभी भी इसका बाध नहीं होता। जबकि ब्रह्मविषयकज्ञान के पश्चात् इसकी निवृत्ति हो जाती है। इस दृष्टि से यह सत् नहीं कहा जा सकता है। इसके अतिरिक्त यदि इसे हमं असत् मानें तो बांझ-स्त्री के समान कभी भी हमें इसकी प्रतीति नहीं होनी चाहिए। जबकि किसी वस्तु को न जानने की स्थिति में 'मैं इस विषय में अज्ञानी हूँ' ऐसा अनुभव प्रत्येक व्यक्ति को होता है। इसलिए अज्ञान को असत् रूप वाला भी नहीं कह सकते हैं। परिणामस्वरूप सत् एवं असत् से विलक्षण होने के कारण इसके लिए 'अनिर्वचनीय' रूप एक विशेषण प्रदान करना ही उचित एवं न्यायसंगत प्रतीत होता है। जिसका ग्रन्थकार ने यहाँ उल्लेख किया है। (२) त्रिगुणात्मक-इस प्रसंग में यह शङ्का होना स्वाभाविक है कि अज्ञान के अनिर्वचनीय होने से कहीं उसके अस्तित्व के विषय में तो आपको संदेह नहीं है। इस शङ्का का निवारण करते हुए ग्रन्थकार ने इसका 'त्रिगुणात्मक' विशेषण प्रस्तुत किया। अज्ञान की त्रिगुणात्मकता श्रुति, स्मृति एवं अनुभव के आधार पर सिद्ध की जा सकती है। दैनिकजीवन में हम तेज में लोहित, जल में शुक्ल तथा पृथिवी में कृष्णवर्णों का अवलोकन करते हैं तथा सत्कार्यवाद के सिद्धान्त के अनुसार कारण के गुण कार्य में भी विद्यमान रहते हैं। इसलिए यह दृश्यमानजगत् अज्ञान का कार्य होने से त्रिगुणात्मक दिखायी देता है। अतः इसकारण अज्ञान का त्रिगुणात्मक (सत्त्व-रजस्-तमस्) गुणवाला होना सिद्ध होता है। “अजामेकां लोहितशुक्ल कृष्णां” इत्यादि अनेक श्रुतिवचन भी इस कथ्य की पुष्टि में प्रमाण हैं। (३) ज्ञानविरोधी- वेदान्तदर्शन एकमात्र ब्रह्म की सत्ता को ही स्वीकार करता है। उसके अनुसार यह सम्पूर्ण दृश्यमानजगत् रस्सी में सर्प की भ्रान्ति के समान मिथ्या है। 'आवरण' एवं 'विक्षेप' इन दो शक्तियों से युक्त यह अज्ञान ही शुद्धचैतन्यब्रह्म को आवृत्त कर उसमें सृष्टि का असदाभास कराता है। यह अज्ञान ही ब्रह्म के साक्षात्कार में बाधक है। इसके कारण ही हम ब्रह्म के वास्तविकस्वरूप को पहचानने में असमर्थ रहते हैं। इसलिए यह
अज्ञान निरूपण १५३ अज्ञान वस्तुतः ज्ञानविरोधी है, क्योंकि ज्ञान होने पर वह स्वतः विनष्ट हो जाता है। (४) भावरूप-अज्ञान को यहाँ भावरूप भी कहा गया है तथा इसकी यह विशेषता इसी बात से सिद्ध होती है कि ज्ञान के होने पर वह स्वतः विलीन हो जाता है। इसके अलावा प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से भी इसकी भावरूपता का प्रतिपादन किया जा सकता है, क्योंकि व्यक्ति को 'मैं अज्ञ हूँ' इत्यादि की प्रत्यक्ष अनुभूति अनेकशः होती रहती है। अनुमान एवं अर्थापत्तिप्रमाण द्वारा भी इसकी भावरूपता को विद्वानों ने सिद्ध करने का प्रयास किया है। (५) यत्किञ्चित्-अज्ञान के लिए एक अन्य विशेषण 'यत्किञ्चित्' भी यहाँ ग्रन्थकार द्वारा प्रस्तुत किया गया है। इसका अभिप्राय यही है कि यद्यपि अज्ञान सत्त्व, रजस् और तमस् इन तीन गुणों से युक्त एवं भावरूप है तथापि इसके विषय में कोई भी विद्वान् यह ऐसा ही है-'इदम् इत्थम्' यह कहने में समर्थ नहीं है। इसीकारण आचार्यों ने इसे 'यत्किञ्चित् (यह कुछ है), इसप्रकार कहकर इसकी व्याख्या की है। वस्तुतः यही अज्ञान की विलक्षणता एवं अनिर्वचनीयता को भी सिद्ध करता है। प्रस्तुत गद्यखण्ड के अन्त में ग्रन्थकार ने 'अहम् अज्ञः' इत्यादि अनुभव- वाक्य का कथन करके तथा 'देवात्म शक्तिः' इत्यादि श्रुतिवाक्य को प्रस्तुत करके, अपने कथन की, अज्ञान के लिए दिये गए विभिन्न विशेषणों की अथवा अज्ञान के अस्तित्व की पुष्टि की है। विशेष-(1) वस्तुतः वेदान्त के अज्ञान का वर्णन अत्यन्त कठिन है। पुनरपि ग्रन्थकार ने सूत्रात्मकरूप में उसके स्वरूप का कथन किया है। (2) यहाँ प्रयुक्त 'अज्ञान' पद वस्तुतः पारिभाषिकशब्द के रूप में प्रयुक्त हुआ है। अतः इसकी 'न ज्ञानम्, इति अज्ञानम्-नञ् समास' करते हुए व्युत्पत्ति उचित नहीं है। (3) वस्तुतः यहाँ अज्ञान 'ज्ञान का अभाव' न होकर ब्रह्म की अन्तरङ्ग शक्ति 'माया' अथवा अविद्या के रूप में प्रयुक्त हुआ है। (4) कुछ विद्वानों ने अज्ञान की व्याख्या 'सूर्य के रहते हुए अन्धे व्यक्ति द्वारा अन्धकार की परिकल्पना' का उदाहरण देकर भी की है। (5) प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है-
१५४ वेदान्तसार चित्र-२८ अज्ञान ┌────────────────────────┬─────────────────────────┬──────────────────────────┐ 1 2 3 सत् असत् सत्त्व रजस् तमस् सद्रूप असद्रूप सदसद्रूप (ब्रह्म) (वन्ध्यापुत्र) │ │ │ │ │ │ └───────┬────────┘ └────────┼────────┘ └──────────┼───────┘ से भिन्न अतः तीन गुणों से युक्त अतः से भिन्न अतः │ │ │ (अनिर्वचनीय) (त्रिगुणात्मक) (यत्किञ्चित्) ┌────────────────────────┬─────────────────────────┬──────────────────────────┘ 4 5 6 ┌──────────────────────┐ अहमज्ञोऽस्मि ┌──────────────────────┐ │ज्ञात होने पर समाप्ति अतः│ │ │देवात्मशक्ति इत्यादि │ └──────────┬───────────┘ │ │श्रुतिवचन से भी │ │ इत्यादि अनुभव से └──────────┬───────────┘ │ │ │ (ज्ञानविरोधी) (भावरूप) (पुष्टि) अवतरणिका- ज्ञान के स्वरूप का उल्लेख करके ग्रन्थकार उसके समष्टि-व्यष्टि दो भेदों का कथन करके, प्रथम 'समष्टि' भेद की व्याख्या करते हुए कहते हैं- इदमज्ञानं समष्टिव्यष्ट्यभिप्रायेणैकमनेकमिति च व्यवह्रियते। तथाहि। यथा वृक्षाणां समष्ट्यभिप्रायेण वनमित्येकत्वव्यपदेशो यथा वा जलानां समष्ट्यभिप्रायेण जलाशय इति तथा नानात्वेन प्रतिभासमानानां जीवगताज्ञानानां समष्ट्यभिप्रायेण तदेकत्वव्यपदेशो "ऽजामेकां" इत्यादिश्रुतेः। पदच्छेद-इदम् अज्ञानम् समष्टि-व्यष्टि-अभिप्रायेण एकम् अनेकम्, इति च व्यवह्रियते। तथाहि-यथा वृक्षाणाम् समष्टि-अभिप्रायेण वनम्, इति एकत्व व्यपदेशः। यथा वा-जलानाम् समष्टि-अभिप्रायेण जलाशयः, इति। तथा नानात्वेन प्रतिभासमानानाम् जीवगत-अज्ञानानाम् समष्टि-अभिप्रायेण तद् एकत्व व्यपदेशः "अजाम् एकाम्" इत्यादि श्रुतेः। अनुवाद-समष्टि, व्यष्टि अभिप्राय से यह अज्ञान (कहीं) एक तथा (कहीं) अनेक इसप्रकार (दो रूपों में) व्यवहृत होता है, क्योंकि-जिसप्रकार अनेक वृक्षों में समष्टि के अभिप्राय से 'वन' इसप्रकार एकत्वसूचक व्यवहार
अज्ञान निरूपण १५५
होता है। अथवा-जिसप्रकार जलों की समष्टि की विवक्षा से 'जलाशय' ऐसा (व्यवहार करते हैं)। ठीक उसीप्रकार अनेकसंख्या में प्रतीत होने वाले जीवों में स्थित अज्ञानों की समष्टि का कथन करने की आकाङ्क्षा से उनमें एकत्व का व्यवहार किया जाता है। 'अजन्मा एक' इत्यादि श्रुति के (कथन का आधार समष्टि ही है)। 'चन्द्रिका'-वेद एवं उपनिषद्ग्रन्थों में अज्ञान के लिए 'अजामेकां' इत्यादि वचनों में एकवचन का तथा 'इन्द्रो मायाभिः' इत्यादि श्रुतिवाक्यों में बहुवचन का प्रयोग किया है। अतः वास्तविकता से परिचित होने के लिए जिज्ञासा स्वाभाविक है। इसी की शान्ति के लिए ग्रन्थकार ने यहाँ समष्टि-व्यष्टि अभिप्राय से अज्ञान के दो रूपों का उल्लेख किया है। 'समष्टि' शब्द का प्रयोग यहाँ समुदाय, समूह या संघात अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है तथा 'व्यष्टि' यहाँ एक का सूचक है। इसप्रकार दूसरे शब्दों में समष्टि-व्यष्टि क्रमशः सामान्य और विशेष व्यवहार के वाचक हैं। वस्तुतः दोनों में अभेद है। ठीक उसीप्रकार जैसे-एक आम के वृक्ष का कथन करने के लिए हम कहेंगे-'यह आम का पेड़ है'। जबकि आम के बहुत से पेड़ों के समुदाय के लिए कहा जाएगा-'यह आम का 'वन' है'। अतः यहाँ इसे व्यष्टि अभिप्राय से 'वृक्ष' तथा समष्टि अभिप्राय से 'वन' कहना होगा। इसीप्रकार एक जीव में स्थित अज्ञान का कथन उसके व्यष्टिरूप को तथा अनेक जीवों में स्थित अज्ञान को कहने के लिए उसके समष्टिस्वरूप को अभिव्यक्त करेगा, किन्तु ये दोनों तत्त्व की दृष्टि से अभिन्न ही होंगे। वेदान्तदर्शन में समष्टि एवं व्यष्टि इन दोनों शब्दों का अनेकशः प्रयोग किया गया है। वेदान्त में प्रतिपादित सृष्टिप्रक्रिया को समझने के लिए भी इन दोनों शब्दों को अथवा समष्टि-व्यष्टि विषयक इस सिद्धान्त को समझना आवश्यक है। हमने भूमिका में (पृष्ठ 82) पर इस विषय में विस्तारपूर्वक चर्चा की है। अतः इसके विस्तृत अध्ययन के लिए उसका अवलोकन आवश्यक है। इस प्रसङ्ग में ग्रन्थकार के अभिप्राय को स्पष्ट करते हुए हम केवल इतना ही कहना चाहेंगे कि जिसप्रकार वृक्षों के समूह का कथन करने की दृष्टि से 'वन' कहकर एक संख्यासूचक शब्द का व्यवहार किया जाता है।
१५६ वेदान्तसार अथवा जिसप्रकार जल के कणों के समूह के कथन की इच्छा से 'जलाशय' कहते हैं। ठीक उसीप्रकार अनेक संख्या में प्रतीत होने वाले जीवों में स्थित अज्ञान के समूह को 'समष्टि' कहते हैं। वस्तुतः यह इन सभी में ऐक्य का सूचक भी है। अपने कथन की पुष्टि में ग्रन्थकार ने 'अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां' इत्यादि श्रुतिवचन को उद्धृत किया है। इसका अभिप्राय है कि वह अज्ञान अथवा माया वस्तुतः एक ही है। जो प्रजाओं में अनेकरूपों को धारण करता है। विशेष-(1) समष्टि- सम्+√अश् (व्याप्तौ संघाते च)+क्तिन्-सभी को व्याप्त करने वाला। (2) व्यष्टि- वि+अश् (व्याप्तौ संघाते च)+क्तिन्-सीमितस्थान में रहने वाला। (3) स्वामी रामतीर्थ ने समष्टि एवं व्यष्टि को क्रमशः सामान्य एवं विशेष अर्थ में प्रयुक्त माना है। (4) वेदान्तदर्शन में समष्टि अर्थ में 'माया' तथा व्यष्टि के लिए 'अविद्या' शब्द का प्रयोग किया गया है। "सत्त्वशुद्ध्यविशुद्धिभ्यां मायाविद्ये च ते मते" (पञ्चदशी1/16)। (5) यहाँ प्रयुक्त 'नानात्वेन' से अभिप्राय यह है कि जीव अनेक हैं तथा प्रत्येक जीव में अज्ञान की सत्ता पृथक्-पृथक् विद्यमान रहती है। अतः इस दृष्टि से ही यहाँ अज्ञान के अनेकत्व की परिकल्पना की गयी है। (6) प्रस्तुत खण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार सरलतापूर्वक समझा जा सकता है- चित्र-२९ अज्ञान समष्टि ➔ समूह व्यष्टि समूह का सूचक - वन वृक्ष - एकत्व का सूचक जलाशय जल जीव समुदाय समूह जीव अवतरणिका-समष्टि-व्यष्टि एवं इस आधार पर अज्ञान के भेदों का कथन करने के पश्चात् समष्टिगत अज्ञान द्वारा की गई सृष्टिप्रक्रिया का उल्लेख करते हैं-