भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

' अपवाद-निरूपण २२७ इसके अतिरिक्त अपने स्वरूप का परित्याग न करते हुए जब किसी वस्तु में अन्य वस्तु की मिथ्याप्रतीति होती है, तो इस प्रक्रिया को हम 'विवर्त' कहेंगे। जैसे रस्सी में सर्प की प्रतीति होना, सीपी में चांदी की भ्रान्ति होना विवर्त है, क्योंकि इन दोनों स्थानों पर रस्सी एवं सीपी अपने स्वरूप का परित्याग किए बिना ही अन्यरूप को ग्रहण कर लेती हैं। यद्यपि यह रूप भ्रान्ति ही है, फिर भी इसके, क्षणिक ही सही, अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता है। ठीक इसीप्रकार चराचररूप सम्पूर्णप्रपञ्च शुद्धचैतन्यस्वरूप परमब्रह्म का विवर्त है परिणाम नहीं, क्योंकि सत्यवस्तु ब्रह्म में प्रपञ्च की प्रतीति वस्तुतः मिथ्या है। ज्ञान आदि द्वारा इस मिथ्याप्रतीति को दूर करके तुरीयचैतन्य ब्रह्म ' की तात्त्विकप्रतीति होना ही 'अपवाद' है। जब प्रमाता को इस बात का भलीप्रकार ज्ञान हो जाता है तो यह सम्पूर्ण चराचरप्रपञ्च अपनी उत्पत्ति के विपरीतक्रम में अपने-अपने कारणों में विलीन होता जाता है। इसप्रकार वह मिथ्याप्रतीति विनष्ट हो जाती है तथा अन्त में अद्वैतब्रह्म की सत्ता विद्यमान रहती है, जिसे 'तुरीय' संज्ञा भी प्रदान की गई है, क्योंकि यह स्थूलप्रपञ्च, सूक्ष्मप्रपञ्च एवं कारणशरीर से भिन्न अर्थात् चतुर्थ होता है। वेदान्त की दृष्टि में साधक की यही सर्वोत्कृष्ट स्थिति है। ज्ञान होने के अनन्तर सम्पूर्ण चराचरप्रपञ्च के अपने-अपने कारण में विलय होने के क्रम को ग्रन्थकार ने 'तथाहि' इत्यादि गद्यांश में वर्णित किया है- सुख-दुःख आदि को भोगने वाले जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज नामक चार प्रकार के सभी स्थूलशरीर, अन्नपान आदि सभी भोग्यपदार्थ, भूः भुवः स्वः, महः, जनः तपः और सत्यम् ये सात ऊर्ध्व लोक तथा अतल, वितल, सुतल, रसातल, महातल एवं पाताल आदि सात अधःलोक इसप्रकार कुल मिलाकर चौदहभुवन एवं इन सबका आधारभूत सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, ये सभी अपने कारणरूप पञ्चीकृतमहाभूतों आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी में विलीन हो जाते हैं। तत्पश्चात् अपने शब्दादिगुणों सहित सभी पञ्चीकृतमहाभूत एवं सत्रह अवयवों से युक्त सूक्ष्मशरीर ये सभी अपने कारणरूप अपञ्चीकृतभूतों में विलीन हो जाते हैं। उसके बाद ये अपञ्चीकृतभूत भी अपने-अपने कारण में उल्टेक्रम से इसप्रकार विलीन होते हैं-'पृथिवी जल में, जल अग्नि में,

२२८ वेदान्तसार अग्नि वायु में, वायु अपने कारण आकाश में तथा आकाश अपने कारण अज्ञान से उपहितचैतन्य में विलीन होकर तन्मात्ररूप में विद्यमान हो जाते हैं। इसके पश्चात् यह अज्ञान एवं इससे उपहितसर्वज्ञ आदि गुणों से युक्त चैतन्य ईश्वर आदि भी अपने आधारभूत अनुपहितशुद्धचैतन्यरूप तुरीय ब्रह्म में विलीन हो जाता है। इसप्रकार तुरीयमात्र एक तत्त्व ही शेष बचता है और यही वेदान्त का अद्वैतभाव भी है एवं यही अपवाद का स्वरूप भी, क्योंकि यही परमशुद्धचैतन्य ही वस्तु है, जिसका प्रमाता को तात्त्विकज्ञान हो जाता है। विशेष-(1) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं- चित्र-४८ सृष्टि के विलय की अपवादरूप प्रक्रिया ┌──────────────┬──────────────┬──────────────┐ चतुर्विध शरीर भोग्य अन्नपानादि भूःभुवःस्वः आदि इन सबका └───────┬──────┘ └──────┬──────┘ आधारभूत ब्रह्माण्ड │ │ │ └────────────►┌──────────────┴───────────────┴─┐◄──────────────┘ │ का अपने कारण पञ्चीकृत │ │ आकाश आदि में विलय │ └──────────────┬────────────────┘ │ पञ्चीकृत ┌──────────────┬─────────────┴┬──────────────┬──────────────┐ आकाश वायु अग्नि जल पृथिवी └──────────────┼─────────────►│◄─────────────┼──────────────┘ │ ┌──────────┴──────────┐ │ └──►│ अपने कारण अपञ्चीकृत │◄──┘ │ आकाश आदि में विलय │ └──────────┬──────────┘ │ अपञ्चीकृत │ आकाश ◄────────── वायु ◄───────── अग्नि ──────────► जल ◄───────── पृथिवी │ │ अज्ञानोपहित शुद्धचैतन्य ───────────────► ┌───────────────┐ ▼ │ शुद्धचैतन्य तुरीय │ ┌───────┐ └───────┬───────┘ │ ईश्वर │ ▼ └───────┘ ( अवशिष्ट ) अवतरणिका-तत्पश्चात् 'अध्यारोप', 'अपवाद' की इन दोनों प्रक्रियाओं से 'तत्त्वमसि' महावाक्य के तत् एवं त्वम् पदार्थों के अर्थों को समझने में इनके सहयोग का कथन करते हैं-

अपवाद-निरूपण २२९ आभ्यामध्यारोपापवादाभ्यां तत्त्वम्पदार्थशोधनमपि सिद्धं भवति। तथाहि। अज्ञानादिसमष्टिरेतदुपहितं सर्वज्ञत्वादिविशिष्टं चैतन्यमेतदनुपहितं चैतत्रयं तप्तायः पिण्डवदेकत्वेनावभासमानं तत्पदवाच्यार्थो भवति। एतदुपाध्युपहिताधारभूतमनुपहितं चैतन्यं तत्पदलक्ष्यार्थो भवति। अज्ञानादिव्यष्टिरेतदुपहितालपज्ञत्वादिविशिष्ट चैतन्यमेतदनुपहितं चैतत्रयं तप्तायःपिण्डवदेकत्वेनावभासमानं त्वम्पदवाच्यार्थो भवति। एतदुपाध्युपहिताधारभूतमनुपहितं प्रत्यगानन्दं तुरीयं चैतन्यं त्वम्पदलक्ष्यार्थो भवति॥२२॥ पदच्छेद-आभ्याम् अध्यारोप-अपवादाभ्याम् तत्-त्वम् पदार्थशोधनम् अपि सिद्धम् भवति। तथाहि, अज्ञानादिसमष्टिः, एतद् उपहितम् सर्वज्ञत्वादि विशिष्टम् चैतन्यम्, एतद् अनुपहितम् च एतत् त्रयम्-तप्त-अयः पिण्डवद् एकत्वेन अवभासमानम् तत्-पद-वाच्यार्थः भवति। एतद् उपाधि-उपहित- आधारभूतम्-अनुपहितम् चैतन्यम् तत् पदलक्ष्यार्थः भवति। अज्ञान-आदि व्यष्टिः एतद् उपहित-अल्पज्ञत्व-आदि विशिष्टचैतन्यम् एतद् अनुपहितम् च एतत् त्रयम् तप्त-अयःपिण्डवद् एकत्वेन अवभासमानम् त्वम् पदवाच्यार्थः भवति। एतद् उपाधि-उपहित-आधारभूतम् अनुपहितम् प्रत्यक् आनन्दम् तुरीयम् चैतन्यम् त्वम् पद-लक्ष्यार्थः भवति॥२२॥ अनुवाद-इन दोनों अध्यारोप-अपवाद द्वारा तत् एवम् त्वम् पदों के अर्थों का स्पष्टीकरण भी सिद्ध हो जाता है, क्योंकि-अज्ञान आदि की समष्टि, इन सर्वज्ञत्वादि विशेषणों की उपाधि से युक्त चैतन्य (अर्थात् ईश्वर) एवं इस उपाधि से शून्य (शुद्धचैतन्य), ये तीनों-तप्तलोहपिण्ड के समान एक ही प्रतीत होने के कारण, तत् पद के वाच्यार्थ होते हैं तथा इस उपाधि से युक्त (उन सबका) आधारभूत अनुपहित चैतन्य, तत् पद का लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा प्रतिपादित लक्ष्यार्थ होता है। अज्ञान आदि व्यष्टि, इसकी उपाधि अल्पज्ञत्व आदि विशेषताओं से युक्त चैतन्य (अर्थात् जीव) तथा इसकी उपाधि से रहित शुद्धचैतन्य, ये तीनों (एक साथ) तप्तलोहपिण्ड के समान अभिन्न प्रतीत होने के कारण, त्वम् पद के वाच्यार्थ होते हैं। इस उपाधि से युक्त (उन सबका) आधारभूत अनुपहित आनन्दरूप तुरीयचैतन्य त्वम् पद (लक्षणाशब्दशक्ति द्वारा प्राप्त) का लक्ष्यार्थ होता है। 1

२३० वेदान्तसार 'चन्द्रिका'—इसप्रकार अध्यारोप एवं अपवादरूप दोनों सिद्धान्तों को भलीप्रकार समझने के बाद यह बात पूर्णतया स्पष्ट हो जाती है कि सम्पूर्ण चराचर नामरूपात्मक जगत् ही वस्तुतः ब्रह्म है तथा ब्रह्म ही सम्पूर्ण चराचर नामरूपात्मक संसार है। साथ ही 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य में प्रयुक्त 'तत्' एवं 'त्वम्' पदों के अर्थों का अभिप्राय भी पूर्णरूप से स्पष्ट हो जाता है। तदनुसार-अज्ञान, कारणशरीर, सूक्ष्मशरीर एवं स्थूलशरीर की समष्टि तथा इनकी उपाधि से युक्त चैतन्य, सर्वज्ञता, व्यापकता आदि गुणों से विशिष्ट ईश्वर, हिरण्यगर्भ (सूत्रात्मा) और विराट् (वैश्वानर) रूप चैतन्य एवं इन सब उपाधियों से रहित तुरीय ब्रह्मरूप शुद्धचैतन्य, इन सब में ठीक उसीप्रकार अभिन्नता विद्यमान है, जिसप्रकार तप्त लोहपिण्ड कहने पर लोहपिण्ड एवं अग्नि में अभिन्नता की प्रतीति होती है। यही इस तत् पद का वाच्यार्थ अर्थात् अभिधा शब्दशक्ति द्वारा प्राप्त सीधा अर्थ है। इसके अतिरिक्त अज्ञान से उपहित ईश्वररूप चैतन्य का आधार जो उपाधिरहित शुद्धचैतन्य है, उसका अज्ञान एवं उससे आच्छादित ईश्वर रूप चैतन्य से अलग-अलगरूप में प्रकाशित होना ही 'तत्त्वमसि' महावाक्य में प्रयुक्त 'तत्' पद का लक्ष्यार्थ है। इस भाव को 'तप्तायः पिण्डः' इस उदाहरण द्वारा भलीप्रकार समझा जा सकता है। तपे हुए लोहपिण्ड से जलने पर 'मैं लोहे से जल गया' ऐसा सामान्यरूप से कहा जाता है, जबकि दाहकताशक्ति लोहे में न होकर अग्नि में विद्यमान रहती है। इसलिए अभिधा शब्दशक्ति द्वारा प्रतिपादित इस साक्षात् संकेतित अर्थ, वाच्यार्थ में अग्नि एवं लोह में अभिन्नतारूप अर्थ ही प्रमुखता लिए होता है। ठीक इसीप्रकार 'तत्त्वमसि' महावाक्य में भी 'तत्' अर्थात् शुद्धचैतन्य (तुरीय) एवं त्वम् अर्थात् उपाधियुक्त चैतन्य (जीव) की अभिन्नता का कथन ही मुख्यप्रयोजन होने से इसका वाच्यार्थ अर्थात् सीधा अर्थ कहलाएगा। इसके अतिरिक्त 'तप्तायः पिण्ड' इत्यादि उदाहरण में दाहकताशक्ति लोहे में विद्यमान न होने के कारण 'लोहे से जल गया' ऐसा कहने पर मुख्य अर्थ का बाध होने पर लक्षणा शब्दशक्ति से 'अग्नि' रूप अर्थ के साथ 'लोहे में स्थित अग्नि से जल गया' इसप्रकार लक्ष्यार्थ की प्रतीति में अग्नि एवं लोहे की भिन्नता की प्रतीति कराना ही मुख्यप्रयोजन होगा। ठीक इसीप्रकार 'तत्त्वमसि' महावाक्य के 'तत्' पद से प्रतीत होने वाले शुद्धचैतन्य

महावाक्यार्थ-निरूपण २३१ एवं 'त्वम्' से प्रतीत होने वाले उपाधियुक्त चैतन्य में, दोनों की विशिष्टता में अभिप्राय होने की दृष्टि से, दोनों को भिन्न-भिन्न प्रतिपादित करना रूप अर्थ लक्ष्यार्थ होगा। कहने का अभिप्राय यह है कि 'तत्त्वमसि' महावाक्य में प्रयुक्त 'तत्' एवं 'त्वम्' पदों में प्रत्येक के दो-दो अर्थ हैं-प्रथम वाच्यार्थ एवं द्वितीय लक्ष्यार्थ। इस दृष्टि से अज्ञान की सम्पूर्ण समष्टि, तद् अवच्छिन्न चैतन्यरूप ईश्वर, हिरण्यगर्भ और वैश्वानर एवं इन सबसे भिन्न अनुपहित शुद्धचैतन्य जिसे अक्षर एवं सच्चिदानन्दस्वरूप तुरीय कहा गया है, ये तीनों तपे हुए लोहपिण्ड के समान एक ही हैं और यही यहाँ तत् शब्द का वाच्यार्थ है। इसके अलावा अज्ञान एवं उसका कार्यरूप समस्त चराचरप्रपञ्च, उसे स्फूर्ति प्रदान करने वाली, यहाँ तक कि ईश्वर आदि चैतन्य की भी आधारस्वरूप सच्चिदानन्दस्वरूप, अज्ञान आदि की उपाधि से रहित, परमशुद्धचैतन्य तुरीय नामक यथार्थवस्तु इन सबकी अलग-अलग प्रतीति ही तत् पद का लक्ष्यार्थ है। इसीप्रकार व्यष्टिभूत अज्ञान, उससे अवच्छिन्न अल्पज्ञत्व आदि गुणों से विशिष्ट प्राज्ञ, तैजस् एवं विश्वचैतन्य एवं इन सभी का आधारभूत शुद्ध चैतन्य ये तीनों भी 'तपे हुए लोहपिण्ड' के समान एक ही हैं। यह यहाँ त्वम् पद का वाच्यार्थ है तथा अज्ञान आदि उपाधियों से युक्त प्राज्ञ, तैजस् और विश्व एवं इन सबका आधार अनुपहित शुद्धचैतन्य जिसे प्रत्यगानन्द तुरीय भी कहा गया है ये सभी अलग-अलग हैं, यह 'त्वम्' पद का लक्ष्यार्थ है। अतः अनुपहित शुद्धचैतन्य तत् एवं त्वम् इन दोनों पदों का लक्ष्यार्थ है। इसीलिए तत् एवं त्वम् ये दोनों पद यहाँ लक्षण हैं तथा शुद्धचैतन्य लक्ष्य है। विशेष-(1) प्रस्तुत खण्ड में ग्रन्थकार ने अब तक प्रतिपादित अध्यारोप एवं अपवाद के सिद्धान्तों द्वारा 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्य में प्रयुक्त तत् एवं त्वम् पदों के वाच्यार्थ एवं लक्ष्यार्थ को बताते हुए उनके अर्थों को स्पष्ट किया है। (2) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी अभिव्यक्त कर सकते हैं-

महावाक्यार्थ-निरूपण (तत्त्वमसि)

२३२ वेदान्तसार चित्र-४९ विशुद्ध सत्त्वप्रधान अज्ञान उपाधिरहित शुद्ध मलिनसत्त्व प्रधान अज्ञान से उपहित समष्टि चैतन्य तुरीय से उपहित व्यष्टि ↓ ↓ ↓ ईश्वर जीव/प्राज्ञ ↓ ↓ हिरण्यगर्भ (सूत्रात्मा) तैजस ↓ ↓ वैश्वानर ← तत् तत्त्वमसि त्वम् → विश्व वाच्यार्थ लक्ष्यार्थ अभिन्नता की प्रतीति लोहपिण्डवत् भिन्नता की प्रतीति अज्ञान की समष्टि अवतरणिका-तत्पश्चात् वेदान्त प्रतिपादित महावाक्यों में से 'तत्त्वमसि' इत्यादि उपदेशवाक्य का वर्णन करते हैं- अथ महावाक्यार्थो वर्ण्यते। इदं तत्त्वमसीतिवाक्यं सम्बन्धत्रयेणाखण्डार्थबोधकं भवति। सम्बन्धत्रयं नाम पदयोः सामानाधिकरण्यं पदार्थयोर्विशेषणविशेष्यभावः प्रत्यगात्मलक्षणयो- र्लक्ष्यलक्षणभावश्चेति। तदुक्तम्- “सामानाधिकरण्यं च विशेषणविशेष्यता। लक्ष्यलक्षणसम्बन्धः पदार्थप्रत्यगात्मनाम्” इति॥ सामानाधिकरण्यसम्बन्धस्तावद्यथा सोऽयं देवदत्त इत्यस्मिन्वाक्ये तत्कालविशिष्टदेवदत्तवाचक स शब्दस्यैतत्कालविशिष्टदेवदत्तवाचकायं शब्दस्य चैकस्मिन्पिण्डे तात्पर्यसम्बन्धः। तथा च तत्त्वमसीति वाक्येऽपि परोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्यवाचकतत्पदस्यापरोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्यवाचकत्व म्पदस्य चैकस्मिंश्चैतन्ये तात्पर्यसम्बन्धः। विशेषणविशेष्यभावसम्बन्धस्तु यथा तत्रैव वाक्ये सशब्दार्थतत्कालविशिष्टदेवदत्तस्यायं शब्दार्थैतत्कालविशिष्टदेवदत्तस्य चान्योन्यभेदव्यावर्तकतया विशेषणविशेष्यभावः। तथात्रापि वाक्ये तत्पदार्थपरोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्यस्य त्वम्पदार्थापरोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्यस्य चान्योन्यभेदव्यावर्तकतया विशेषणविशेष्यभावः।

महावाक्यार्थ-निरूपण २३३ लक्ष्यलक्षणसम्बन्धस्तु यथा तत्रैव वाक्ये स शब्दांयशब्दयोस्तदर्थयोर्वा विरुद्धतत्कालैतत्कालविशिष्टत्वपरित्यागेनाविरुद्धदेवदत्तेन सह लक्ष्यलक्षणभावः। तथात्रापि वाक्ये तत्त्वम्पदयोस्तदर्थयोर्वा विरुद्धपरोक्षत्वापरोक्षत्वादि विशिष्टत्वपरित्यागेनाविरुद्धचैतन्येन सह लक्ष्यलक्षणभावः। इयमेव भागलक्षणेत्युच्यते॥२३॥ पदच्छेद-अथ महावाक्यार्थः वर्ण्यते। इदम् 'तत् त्वम् असि' इति वाक्यम् सम्बन्धत्रयेण अखण्डार्थबोधकम् भवति। सम्बन्धत्रयम् नाम पदयोः सामानाधिकरण्यम् पदार्थयोः विशेषणविशेष्यभावः प्रत्यक् आत्मलक्षणयोः लक्ष्यलक्षणभावः च इति। तद् उक्तम्- 'समानाधिकरण्यम् च विशेषणविशेष्यता। लक्ष्यलक्षणसम्बन्धः पदार्थ-प्रत्यग्-आत्मनाम्॥ (1) समानाधिकरण्यसम्बन्धः- तावत्-यथा, 'सः अयम् देवदत्तः' इति अस्मिन् वाक्ये तत्कालविशिष्टदेवदत्तवाचक-स-शब्दस्य एतत्काल विशिष्ट-देवदत्त-वाचक-अयम् शब्दस्य च एकस्मिन् पिण्डे तात्पर्यसम्बन्धः। तथा च 'तत्त्वमसि' इति वाक्ये अपि परोक्षत्व-आदि विशिष्ट-चैतन्यवाचक-'तत्' पदस्य, अपरोक्षत्वादि विशिष्ट-चैतन्य-वाचक- 'त्वम्' पदस्य च एकस्मिन् चैतन्ये तात्पर्यसम्बन्धः। (2) विशेषणविशेष्यभावसम्बन्धः-तु यथा तत्र एव वाक्ये 'सः' शब्दार्थः तत्कालविशिष्टदेवदत्तस्य, अयम् शब्दार्थ-एतत्कालविशिष्ट देवदत्तस्य च अन्योन्य-भेद- व्यावर्तकतया विशेषणविशेष्यभावः। तथा अत्र अपि वाक्ये 'तत्' पदार्थ-परोक्षत्वादि-विशिष्टचैतन्यस्य 'त्वम्' पदार्थ-अपरोक्षत्वादि विशिष्टचैतन्यस्य च अन्योन्यभेदव्यावर्तकतया विशेषणविशेष्यभावः। (3) लक्ष्यलक्षणसम्बन्धः- तु यथा तत्र एव वाक्ये :'सः'-शब्द-अयम् शब्दयोः तद् अर्थयोः। वा विरुद्ध तत् काल एतत् काल-विंशिष्टत्व परित्यागेन अविरुद्धदेवदत्तेन सह लक्ष्यलक्षणभावः। तथा अत्रापि वाक्ये तत्-त्वम् पदयोः तद् अर्थयोः वा विरुद्धपरोक्षत्व अपरोक्षत्वादि विशिष्टत्व परित्यागेन अविरुद्ध- चैतन्येन सह लक्ष्यलक्षणभावः। इयम् एव भागलक्षणा इति उच्यते॥23॥ अनुवाद-इसके पश्चात् महावाक्य के अर्थ का वर्णन किया जा रहा है। यह 'तत्त्वमसि' (वह तू है) इत्यादि वाक्य तीन सम्बन्धों से 'अखण्ड' अर्थ

२३४ वेदान्तसार का बोध कराने वाला होता है। वे तीन सम्बन्ध वस्तुतः-दो पदों का समानाधिकरण्यसम्बन्ध, दो पदों के अर्थों का विशेषणविशेष्यभावसम्बन्ध एवं आन्तरिक आत्मा तथा उसको बताने वाले लक्षण दोनों में लक्ष्यलक्षणभाव- सम्बन्ध है। इसीलिए कहा गया है- अन्तरात्मा के पदों एवं अर्थों में-समानाधिकरण्य, विशेषणविशेष्यभाव एवं लक्ष्यलक्षणभाव ये तीन सम्बन्ध होते हैं। (1) समानाधिकरण्यसम्बन्ध-जैसा कि 'यह वही देवदत्त है' इत्यादि वाक्य में तत्कालविशिष्ट देवदत्त का बोध कराने वाला 'सः' (वह) इस शब्द का तथा एतत् कालविशिष्ट देवदत्त का कथन करने वाले 'अयम्' (यह) इस शब्द का, एक ही शरीर में तात्पर्यबोध करानारूप सम्बन्ध है। इसके अतिरिक्त 'तत्त्वमसि' (वह तुम हो) इत्यादि वाक्य में भी परोक्षत्व आदि गुणों से युक्त चैतन्य का कथन करने वाले 'तत्' (वह) इस पद का तथा अपरोक्षत्व आदि गुणों से विशिष्ट चैतन्य का प्रतिपादन करने वाले 'त्वम्' (तुम) इस पद का एक ही (तुरीय) चैतन्य में तात्पर्य का बोध कराने वाला सम्बन्ध है। (2) विशेषणविशेष्यभावसम्बन्ध- तो, जैसाकि उसी वाक्य में 'सः' (वह) शब्द का अर्थ तत्कालविशिष्ट देवदत्त के, 'अयम्' (यह) शब्दार्थ एतत्कालविशिष्ट देवदत्त के परस्परभेद को दूर करने के कारण विशेषण-विशेष्यभावसम्बन्ध है। उसीप्रकार इस 'तत्त्वमसि' वाक्य में भी 'तत्' पद का अर्थ परोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्य के 'त्वम्' शब्द का अर्थ अपरोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्य के परस्परभेद को दूर करने के कारण विशेषणविशेष्यभावसम्बन्ध है। (3) लक्ष्यलक्षणभावसम्बन्ध-तो, जैसाकि उसी वाक्य में 'सः' (वह) और अयम् (यह) इन दोनों शब्दों एवं उनके अर्थों में से परस्पर विरुद्ध (प्रतीत होने वाले) अतीत और वर्तमान की विशिष्टता का परित्याग करके, समानरूप से स्थित देवदत्तरूप अंश में (तात्पर्य का बोध कराना ही) लक्ष्यलक्षणभावसम्बन्ध है। इसके अतिरिक्त इस वाक्य में भी 'तत्' और 'त्वम्' इन दोनों पदों का अथवा उन दोनों अर्थों के परस्पर विरुद्ध परोक्षत्व-अपरोक्षत्वादि के वैशिष्ट्य का परित्याग करके अविरुद्धचैतन्य के साथ लक्ष्यलक्षणभावसम्बन्ध है। यही भागलक्षणा कही जाती है।

महावाक्यार्थ-निरूपण २३५ ‘चन्द्रिका’—प्रस्तुत अंश की विस्तृत व्याख्या के लिए द्रष्टव्य, भूमिका में वर्णित महावाक्य (अ) ‘तत्त्वमसि’ (पृष्ठ संख्या-103) विशेष—(1) यद्यपि महावाक्यविवरण नामक ग्रन्थ में 11 महावाक्य उद्धृत किए गए हैं तथापि वेदान्त में चार महावाक्यों की विशेषचर्चा की गई है। जो इसप्रकार है— (क) प्रज्ञानं ब्रह्म (ऐतरेयोपनिषद्-5) (ख) तत्त्वमसि (छान्दोग्योपनिषद् 6.8.7) (ग) अहं ब्रह्मास्मि (बृहदारण्यकोपनिषद्-1.4.10) (घ) अयमात्मा ब्रह्म (माण्डूक्य० 2) (2) महावाक्यों का वर्ण्यविषय ब्रह्म के स्वरूप एवं अद्वैत का प्रतिपादन करना है। (3) ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य वस्तुतः उपदेशवाक्य है। जो एक गुरु द्वारा अधिकारी प्रमाता को उपदेश रूप में दिया जाता है। (4) यहाँ लक्ष्यलक्षणसम्बन्ध को ‘भागलक्षणा’ भी कहा गया है ग्रन्थकार ने इसकी व्याख्या आगे विस्तार से की है। (5) लक्षणा तीन प्रकार की होती है (क) जहत् लक्षणा (ख) अजहत् लक्षणा (ग) जहत् अजहत् लक्षणा (इसीको भागलक्षणा भी कहा गया है) (6) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं— चित्र-५० तत्त्वमसि ───> सोऽयं देवदत्तः वत् सम्बन्ध त्रयम् पदों में पदों के अर्थों में (आन्तरिक गुणों के कारण) समानाधिकरण्य विशेषण विशेष्यभाव लक्ष्यलक्षणभाव (भागलक्षणा) तत्काल विशिष्ट एतत् कालविशिष्ट (सः अयम् त्वम् तत्) देवदत्त परोक्षादि गुणयुक्त अपरोक्षादि गुणयुक्त देवदत्त सः अयम् त्वम् तत् चैतन्य रूप समान आधार होने से चैतन्य समान अंश के तात्पर्य का बोधक चैतन्य में भेद का अभाव होने से

२३६ वेदान्तसार अवतरणिका-इन सम्बन्धत्रय में प्रतिपादित 'विशेषणविशेष्यभाव' एवं 'नीलकमल' में स्थित विशेषणविशेष्यसम्बन्ध' की भिन्नता प्रतिपादित करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं- अस्मिन्वाक्ये नीलमुत्पलमिति वाक्यवद्वाक्यार्थो न सङ्गच्छते। तत्र तु नीलपदार्थनीलगुणस्योत्पलपदार्थोत्पलद्रव्यस्य च शौक्ल्यपटादि- भेदव्यावर्तकतयान्योन्यविशेषणविशेष्यभाव संसर्गस्यान्यतर- विशिष्टस्यान्यतरस्य तदैक्यस्य वा वाक्यार्थत्वाङ्गीकारे प्रमाणान्तरविरोधाभावात्तद्वाक्यार्थः सङ्गच्छते। अत्र तु तदर्थपरोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्यस्य त्वमर्थापरोक्षत्वादि- विशिष्टचैतन्यस्य चान्योन्यभेदव्यावर्तकतया विशेषण विशेष्य भावसं सर्गस्यान्यतरविशिष्टस्यान्यतरस्य तदैक्यस्य च वाक्यार्थत्वाङ्गीकारे प्रत्यक्षादिप्रमाणविरोधाद्वाक्यार्थो न सङ्गच्छते। तदुक्तम्- “संसर्गो वा विशिष्टो वा वाक्यार्थो नात्र सम्मतः। अखण्डैकरसत्वेन वाक्यार्थो विदुषां मत” इति॥२४॥ पदच्छेद-अस्मिन् वाक्ये 'नीलम् उत्पलम्' इति वाक्यवद् वाक्यार्थः न सङ्गच्छते। तत्र तु नीलपदार्थनीलगुणस्य उत्पलपदार्थ-उत्पलद्रव्यस्य च शौक्ल्यपटादि-भेदव्यावर्तकतया अन्योन्य-विशेषण-विशेष्यभाव-संसर्गस्य अन्यतरविशिष्टस्य अन्यतरस्य तद् ऐक्यस्य वा वाक्यार्थत्व अङ्गीकारे प्रमाणान्तर-विरोध-अभावात् तद् वाक्यार्थः सङ्गच्छते। अत्र तु 'तत्' अर्थ-परोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्यस्य, 'त्वम्' अर्थ- अपरोक्षत्वादि-विशिष्टचैतन्यस्य च अन्योन्य-भेद-व्यावर्तकतया विशेषण विशेष्यभावसंसर्गस्य अन्यतरविशिष्टस्य अन्यतरस्य तद् ऐक्यस्य च वाक्यार्थत्व अङ्गीकारे प्रत्यक्षादि प्रमाणविरोधात् वाक्यार्थः न सङ्गच्छते। तद् उक्तम्- अन्वय-अत्र संसर्गः वा विशिष्टः वा वाक्यार्थः न सम्मतः। विदुषाम् अखण्डैकरसत्वेन वाक्यार्थः मतः (विद्यते)॥24॥ अनुवाद-इस वाक्य में 'नीला कमल' इत्यादि वाक्य के समान वाक्य का (विशेषणविशेष्यभावरूप) अर्थ करना उचित नहीं है, (क्योंकि) वहाँ तो नील पद के अर्थ-'नीलगुण' का तथा उत्पल पद के अर्थ 'कमल' नामक

महावाक्यार्थ-निरूपण २३७ द्रव्य का, अंपने से भिन्न श्वेत आदि गुणों एवं पट आदि द्रव्यों से भिन्नता रखने के कारण, परस्पर विशेषणविशेष्यभावसम्बन्ध तथा एक से विशिष्ट दूसरे अथवा उन दोनों के भेदरूप वाक्यार्थ को स्वीकार करने पर (प्रत्यक्षादि) अन्य प्रमाणों से विरोध के अभाव में (नील अभिन्न कमल) रूप वाक्यार्थ संगत हो जाता है। (जबकि) यहाँ तो 'तत्' पद के अर्थ 'परोक्षत्वादि गुणों से विशिष्ट चैतन्य' एवं त्वम् पद के अर्थ 'अपरोक्षत्वादिगुण विशिष्टचैतन्य' का परस्पर भेदकत्त्व होने से विशेषणविशेष्यभावसम्बन्ध का, एक से विशिष्ट दूसरे अथवा उन दोनों के भेदरूप वाक्यार्थ के भाव को स्वीकार करने पर, प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों के विरोध के कारण वाक्यार्थ संगत नहीं होता है। इसीलिए कहा भी गया है- (तत्त्वमसि महावाक्य में) संसर्ग अथवा विशेषणविशेष्यभाव द्वारा वाक्य का अर्थ करना उचित नहीं है, (अपितु) विद्वानों के (मतानुसार यहाँ) अखण्ड एकरस ही (तत्त्वमसि) महावाक्य का अर्थ है। 'चन्द्रिका'-ग्रन्थकार 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य में प्रयुक्त होने वाले सामानाधिकरण्य, विशेषणविशेष्यभाव एवं लक्ष्यलक्षणभाव सम्बन्धों को स्पष्ट करने के पश्चात् कहते हैं कि यहाँ 'नीलमुत्पलम्' इस वाक्य के समान 'विशेषणविशेष्यभाष्य' की परिकल्पना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'नीलमुत्पलम्' इस वाक्य में नील गुण है तथा उत्पल गुणी अर्थात् द्रव्य है। इसप्रकार गुण एवं गुणी इन दोनों का विशेषणविशेषणभावसम्बन्ध अथवा 'जो नील गुण की विशेषता लिए हुए है, यह वही कमल है', इसप्रकार इन दोनों के विशेष वाक्यार्थ को स्वीकार करने में किसीप्रकार का कोई विरोध नहीं है, क्योंकि यहाँ सम्बन्ध एवं विशिष्टवाक्यार्थ दोनों की अन्विति पूर्णरूप से उचित है। साथ ही प्रत्यक्षादिप्रमाणों से भी इस वाक्यार्थ की पुष्टि होती है। अतः नीलम् उत्पलम् में यह विशेषणविशेष्य सम्बन्ध करना संगत है। जबकि 'तत्त्वमसि' इस वाक्य में 'तत्' एवं 'त्वम्' दोनों ही द्रव्य हैं। इस कारण यहाँ पूर्ववत् विशेषणविशेष्यभावसम्बन्ध अथवा विशिष्टवाक्यार्थ दोनों ही सम्भव नहीं हैं, क्योंकि यहाँ प्रयुक्त 'तत्' पद का अर्थ परोक्षत्वादिगुण विशिष्ट चैतन्य एवं 'त्वम्' पद का अपरोक्षत्वादिगुणविशिष्ट चैतन्य अर्थ है।

२३८ वेदान्तसार अतः इन दोनों भिन्न-भिन्न द्रव्य पदार्थों का गुण-गुणी के समान विशेषण-विशेष्यभावरूपसम्बन्ध अथवा पूर्व में प्रतिपादित विशिष्ट वाक्यार्थ ये दोनों ही सम्भव नहीं हैं, क्योंकि उस स्थिति में विशिष्ट वाक्यार्थ की प्राणिति इसप्रकार करनी होगी-‘जो परोक्षत्वादि विशिष्ट चैतन्य है वही अपरोक्षत्वादि विशिष्टचैतन्य भी है। इस रूप में यहाँ संगति का औचित्य संदिग्ध रहेगा, क्योंकि यहाँ ‘तत्’ पद से अभिप्रेत ‘परोक्षत्वादि गुणविशिष्ट सर्वज्ञचैतन्यरूप अर्थ से है तथा ‘त्वम्’ पद से अभिप्राय ‘अपरोक्षत्वादिगुणविशिष्ट अल्पज्ञजीवरूपचैतन्य से है। अतः जो सर्वज्ञ है वह अल्पज्ञ नहीं हो सकता। साथ ही इन दोनों के परस्पर आश्रय भेद से पार्थक्य होने के कारण भी गुण-गुणी के समान विशेषणविशेष्यभावसम्भव नहीं है। इसके अतिरिक्त यदि हम इसप्रकार का वाक्यार्थ स्वीकार कर भी लें कि-‘जो परोक्षत्वादि विशिष्टचैतन्य है, वही अपरोक्षत्वादि विशिष्टचैतन्य भी है। ऐसी स्थिति में प्रत्यक्षादि प्रमाणों के साथ उसका विरोध होने से वाक्यार्थ संगत नहीं होगा। इसलिए निष्कर्षरूप में यही मानना उचित होगा कि ‘तत्त्वमसि’ इत्यादि वाक्य में ‘नीलमुत्पलम्’ के समान विशेषणविशेष्यभाव को मानना उचित नहीं है, अपितु इसका विशेषणविशेष्यभाव भिन्न है, जिसका पूर्व में प्रतिपादन किया जा चुका है। अपनी बात की पुष्टि में ग्रन्थकार पञ्चदशी की कारिका को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हैं। जिसमें ‘तत्त्वमसि’ वाक्य में भेदरूप सम्बन्ध अथवा विशिष्ट अभेदरूप सम्बन्धों का निषेध करके, अभिधा शब्दशक्ति द्वारा प्रतीत होने वाले वाच्यार्थ के प्रति असहमति व्यक्त करते हुए, लक्षणा शब्दशक्ति के सहयोग से प्रतीत होने वाले सर्वज्ञत्व एवं अल्पज्ञत्व का परित्याग करके भेदरहित वाक्यार्थ को ही अभिप्रेत माना गया है। जिसे वेदान्त के विशेषज्ञ विद्वानों द्वारा ‘अखण्ड एवं एकरस’ के रूप में मान्यता प्रदान की है। विशेष-(1) प्रस्तुत अंश में ‘नीलमुत्पलम्’ के समान गुण-गुणी के विशेषणविशेष्यभाव का ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य में निषेध किया गया है। (2) प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है-

महावाक्यार्थ-निरूपण २३९ चित्र-५१ [नीलमुत्पलम्] गुण गुणी नीलगुण विशिष्ट उत्पल प्रत्यक्षादि प्रमाण से नील उत्पल रूप वाक्यार्थ की अभिन्नता विरोध न होने से [सम्बन्ध का अभाव] ← [विशेषण विशेष्यभाव सम्बन्ध] → [सम्बन्ध का अभाव] तुरीय प्राज्ञः→ [सम्बन्ध का अभाव] परोक्षत्वादि विशिष्ट चैतन्य अपरोक्षत्वादि विशिष्ट चैतन्य तत् त्वम् [परोक्षत्वादि विशिष्ट चैतन्य] प्रत्यक्षादि प्रमाण के [ही अपरोक्षत्वादि विशिष्ट] साथ विरोध होने से [चैतन्य है] आधारभेद [तत्त्वमसि] अवतरणिका-गुणगुणी के समान विशेषणविशेष्यभाव का ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य में निषेध करने के बाद ‘गंगायां घोष:’ इत्यादि वाक्य के समान ‘तत्त्वमसि’ में ‘जहत् लक्षणा’ का निषेध करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं- अत्र गङ्गायां घोषः प्रतिवसतीतिवाक्यवज्जहल्लक्षणापि न सङ्गच्छते। तत्र तु गङ्गाघोषयोराधाराधेयभावलक्षणस्य वाक्यार्थस्याशेषतो विरुद्धत्वाद्वाक्यार्थमशेषतः परित्यज्य तत्सम्बन्धितीरलक्षणाया युक्तत्वाज्जहल्लक्षणा सङ्गच्छते। अत्र तु परोक्षापरोक्षचैतन्यैकत्वलक्षणस्य वाक्यार्थस्य भागमात्रे विरोधाद्भागान्तरमपि परित्यज्यान्यलक्षणाया अयुक्तत्वाज्जहल्लक्षणा न सङ्गच्छते। न च गङ्गापदं स्वार्थपरित्यागेन तीरपदार्थं यथा लक्षयति तथा तत्पदं त्वम्पदं वा स्वार्थपरित्यागेन त्वम्पदार्थं तत्पदार्थं वा लक्षयत्वतः कुतो जहल्लक्षणा न सङ्गच्छत इति वाच्यम्। तत्र तीरपदाश्रवणेन तदर्थप्रतीतौ लक्षणाया तत्प्रतीत्यपेक्षायामपि तत्त्वम्पदयोः श्रूयमाणत्वेन तदर्थप्रतीतौ लक्षणाया पुनरन्यतरपदेनान्यतरपदार्थप्रतीत्यपेक्षाभावात्॥२५॥ पदच्छेद-अत्र ‘गङ्गायाम् घोषः प्रतिवसति’ इति वाक्यवत् ‘जहत् लक्षणा’ अपि न सङ्गच्छते। तत्र तु गङ्गाघोषयोः आधार-आधेयभावलक्षणस्य वाक्यार्थस्य अशेषतः विरुद्धत्वात् वाक्यार्थम् अशेषतः परित्यज्य तत् सम्बन्धितीरलक्षणाया युक्तत्वात् जहत् लक्षणा सङ्गच्छते।

२४० वेदान्तसार अत्र तु परोक्ष-अपरोक्ष चैतन्य-एकत्व लक्षणस्य वाक्यार्थस्य भागमात्रे विरोधाद् भागान्तरम् अपि परित्यज्य अन्य लक्षणायाः अयुक्तत्वात् ‘जहत् लक्षणा’ न सङ्गच्छते। न च गङ्गापदम् स्वार्थपरित्यागेन तीरपदार्थम् यथा लक्षयति तथा तत् पदम् त्वम् पदम् वा स्वार्थपरित्यागेन त्वम् पदार्थम् तत् पदार्थम् वा लक्षयतु अतः कुतः जहल्लक्षणा न सङ्गच्छते इति वाच्यम्। तत्र तीरपद-अश्रवणेन तद् अर्थ-अप्रतीतौ लक्षणया तत् प्रतीति-अपेक्षायाम् अपि तत् त्वम् पदयोः श्रूयमाणत्वेन तद् अर्थप्रतीतौ लक्षणया पुनः अन्यतरपदेन अन्यतरपदार्थप्रतीति-अपेक्षा-अभावात्॥25॥ अनुवाद-यहाँ ‘गङ्गा में अहीरों की बस्ती रहती है’ इत्यादि वाक्य के समान ‘जहत् लक्षणा’ भी सङ्गत नहीं है। वहाँ तो गङ्गा एवं घोष के आधार-आधेयभावरूप सम्बन्ध का लक्षण होने से सम्पूर्णवाक्य का अर्थ विरुद्ध होने के कारण, सम्पूर्णवाक्य के अर्थ को छोड़कर, उससे सम्बद्ध तट रूप अर्थ में लक्षणा होने से ‘जहत् लक्षणा’ ठीक बैठ जाती है। यहाँ तो परोक्ष एवं अपरोक्षरूप चैतन्यों की एकता का सूचक वाक्यार्थ एक अंशमात्र में विरुद्ध होने से, (अविरुद्धरूप), दूसरे भाग के अर्थ को छोड़ देने पर भी अन्य में लक्षणा के असम्भव होने से ‘जहत् लक्षणा’ असङ्गत हो जाती है और यदि जिसप्रकार (गंगायां घोषः में) गंगा पद अपने अर्थ का परित्याग करके तटरूप अर्थ को लक्षित करता है, ठीक उसीप्रकार तत् एवं त्वम् पद अपने (सर्वज्ञत्व एवं अल्पज्ञत्व रूप) अर्थ का परित्याग करके, तत् अथवा त्वम् पद के (चैतन्यरूप) अर्थ को लक्षित करता है तो फिर यहाँ ‘जहत् लक्षणा’ सङ्गत क्यों नहीं हो सकती? यह कहा जाए तो (यह भी ठीक नहीं है।) क्योंकि वहाँ (गंगायां घोषः में) तट पद के सुनायी न देने से उसके अर्थ की प्रतीति नहीं होती है। अतः लक्षणा से उसकी प्रतीति हो जाती है। जबकि तत् एवं त्वम् दोनों पदों के श्रूयमान होने के कारण दोनों के अर्थ की प्रतीति भी (सहज ही) हो जाती है। इसलिए यहाँ एक पद द्वारा दूसरे के अर्थ की प्रतीति की अपेक्षा ही नहीं रह जाती है। (इसलिए यहाँ जहत् लक्षणा करना उचित नहीं है) ‘चन्द्रिका’—तत्त्वमसि महावाक्य का वर्णन करते हुए ग्रन्थकार ने खण्ड-23 में समानाधिकरण्य, विशेषणविशेष्यभाव तथा लक्ष्यलक्षणभाव

महावाक्यार्थ-निरूपण २४१ सम्बन्धों का उल्लेख करते हुए 'भागलक्षणा' द्वारा तत्त्वमसि वाक्य के अर्थ को स्पष्ट किया था। तत्पश्चात् उन्होंने 'नीलमुत्पलम्' में प्रयुक्त होने वाले विशेषणविशेष्य- भाव का तथा यहाँ 'तत्त्वमसि' वाक्य में इसका तर्कपूर्वक निषेध किया तथा यहाँ प्रयुक्त होने वाले विशेषणविशेष्यभाव को गुणगुणी के विशेषणविशेष्य- भाव से भिन्न 'सोऽयं देवदत्तः' इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त होने वाले विशेषणविशेष्यभाव के समान बताया। पुनः लक्ष्यलक्षणभावसम्बन्ध द्वारा लक्षणा शब्दशक्ति से 'तत्त्वमसि' वाक्य में प्रतीत होने वाले अर्थ को बताने से पूर्व 'जहल्लक्षणा' और 'अजहल्लक्षणा' द्वारा यहाँ अर्थप्रतीति का निषेध करते हुए, सर्वप्रथम 'गंगायां घोषः प्रतिवसति' के समान 'जहत् लक्षणा' का तर्कपूर्वक निषेध करते हुए कहते हैं- 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्य में 'गंगा के जलप्रवाह में अहीरों का गाँव निवास करता है' (गंगायां घोषः प्रतिवसति') इत्यादि वाक्य के समान 'जहत् लक्षणा' द्वारा वाक्यार्थ संगत नहीं हो सकता है, क्योंकि 'गंगायां घोषः' इत्यादि वाक्य में जलप्रवाह में किसी बस्ती का निवास असम्भव है। अतः वहाँ मुख्य अर्थ अर्थात् जलप्रवाहरूप अर्थ का बाध हो जाता है। तत्पश्चात् लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा उससे सम्बद्ध 'तट' रूप अर्थ की प्रतीति होती है। उस स्थिति में वाक्य का लक्ष्यार्थ होता है- 'गंगा के तट पर बस्ती'। इस सम्पूर्णप्रक्रिया में 'गंगा' शब्द के मुख्य अर्थ रूप 'जलप्रवाह' का बाध होने से यहाँ लक्षणा शब्दशक्ति के प्रयोग के कारण उसका परित्याग किया गया, साथ ही इसी शक्ति द्वारा तत् सम्बद्ध 'तट' रूप अर्थ प्रतीत कराने में सहयोग प्रदान किया है। अतः अपने 'जलप्रवाह' रूप मुख्यार्थ का पूर्णतया त्याग करने के कारण, यहाँ प्रयुक्त होने वाली इस लक्षणा को साहित्यशास्त्र के विद्वानों द्वारा 'लक्षणलक्षणा' अथवा 'जहल्लक्षणा' इन नामों से पुकारा गया है, जो उचित भी है। तत्पश्चात् इसी प्रक्रिया को 'तत्त्वमसि' वाक्य में प्रदर्शित करते हुए ग्रन्थकार 'जहल्लक्षणा' के अनौचित्य का प्रतिपादन करते हुए कहते हैं कि यहाँ यह लक्षणा संगत नहीं हो सकती, क्योंकि इस वाक्य में प्रयुक्त 'तत्' शब्द का अभिधा शब्दशक्ति द्वारा प्रतीत होने वाला वाच्यार्थ-परोक्षतादि गुणों

२४२ वेदान्तसार

से युक्त चैतन्य तथा ‘त्वम्’ शब्द का अभिधेयार्थ अपरोक्षतादि विशिष्ट चैतन्य है। ये दोनों अर्थ पूर्णतया विरुद्ध हैं तथा यह विरोध वस्तुतः परोक्षता एवं अपरोक्षतारूपवैशिष्ट्य वाले अंश में विद्यमान है, शेष चैतन्यरूप अंश दोनों में समानरूप से स्थित हैं, जिसमें किसीप्रकार का कोई विरोध नहीं है। इसलिए यदि हम यहाँ ‘जहत्-लक्षणा’ करके अर्थ करना चाहते हैं तो वह उचित नहीं होगा, क्योंकि ‘तत्त्वमसि’ इत्यादि वाक्य के तत् एवं त्वम् पदों द्वारा प्रतीत होने वाले अर्थों में हमें परोक्षता एवं अपरोक्षतारूप अर्थ छोड़ना तो अभिप्रेत है, किन्तु उन दोनों में समानरूप से विद्यमान सामान्य चैतन्यांश का परित्याग हमें वाञ्छनीय नहीं है। अतः यहाँ जहल्लक्षणा संगत नहीं होगी। इसी प्रसङ्ग में ग्रन्थकार प्रतिपक्षी द्वारा उठायी गयी शङ्का को प्रस्तुत करते हैं-जिसप्रकार ‘गङ्गा’ यह शब्द अपने ‘जलप्रवाह’ रूप वाच्यार्थ को छोड़कर ‘तट’ रूप लक्ष्यार्थ की प्रतीति लक्षणा शब्दशक्ति ‘जहल्लक्षणा’ से कराता है। ठीक उसीप्रकार ‘तत्त्वमसि’ इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त ‘तत्’ अथवा ‘त्वम्’ पदों में से कोई एक अपने परोक्षता अथवा अपरोक्षता रूप अर्थ का परित्याग करके अपरोक्षतादिविशिष्ट चैतन्य अथवा परोक्षतादि विशिष्ट चैतन्यरूप अर्थ को लक्षित करे, तो इस स्थिति में जहल्लक्षणा द्वारा ही दोनों पदों का एकत्व सिद्ध हो सकेगा, फिर आप इस प्रसङ्ग में ‘जहल्लक्षणा’ की उपादेयता का निषेध भला क्यों कर रहे हैं? प्रतिपक्षी द्वारा इसप्रकार की शङ्का अभिव्यक्त करने पर ग्रन्थकार उत्तर प्रस्तुत करते हैं-‘गंगायां घोषः' इत्यादि वाक्य में 'तट' रूप अर्थ का प्रयोग न करने तथा मुख्यार्थ का बाध होने की स्थिति में ही ‘तट’ रूप अर्थ की प्रतीति के लिए लक्षणा शब्दशक्ति का सहयोग लिया गया था, किन्तु 'तत्' एवं ‘त्वम्' इन दोनों पदों के सुनने के पश्चात्, इन दोनों द्वारा प्रतिपादित अर्थों की प्रतीति भी सहज ही हो जाती है-अर्थात् तत् से अभिप्राय है-परोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्य तथा ‘त्वम्’ से अभिप्राय है-अपरोक्षतादि विशिष्ट चैतन्य। साथ ही यहाँ दोनों ही पदों का प्रयोग भी हुआ है। अतः लक्षणा द्वारा एक पद से दूसरे पद के अर्थ का बोध कराने की आवश्यकता भी नहीं है। इसलिए ‘गंगायां घोषः' इत्यादि वाक्य के समान इस ‘तत्त्वमसि’ वाक्य की स्थिति न होने से 'जहल्लक्षणा' का औचित्य ही यहाँ संदिग्ध है। विशेष-(1) ग्रन्थकार ने ‘तत्त्वमसि’ वाक्य में ‘जहल्लक्षणा’ का अनौचित्य सिद्ध किया है।

महावाक्यार्थ-निरूपण २४३

(२) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी समझा जा सकता है- चित्र-५२ गङ्गायां घोषः (बस्ती) घोषः ← जलप्रवाह ← वाच्यार्थ, मुख्यार्थ बाध होने पर ↓ तटरूप अर्थ की प्रतीति लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा (गङ्गायाः तटे घोषः-लक्ष्यार्थ) जल प्रवाह ← रूप वाच्यार्थ का परित्याग करने से जहल्लक्षणा (चित्र-५३) तत्त्वमसि तत् त्वम् (परोक्षत्वादि विशिष्ट चैतन्य) (अपरोक्षत्वादि विशिष्ट चैतन्य) तुरीय (शुद्ध चैतन्य) प्राज्ञ (जीव) जहल्लक्षणा का अनौचित्य दोनों पदों का प्रयोग दोनों पदों द्वारा स्वतन्त्र अर्थ की प्रतीति अतः मुख्यार्थबाध का अभाव अवतरणिका-इसप्रकार जहल्लक्षणा का अनौचित्य 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्य में प्रदर्शित करने के पश्चात् ग्रन्थकार 'शोणो धावति' लाल (घोड़ा) दौड़ रहा है, इत्यादि वाक्य के समान 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्य में अजहल्लक्षणा के अनौचित्य को भी सिद्ध करते हैं- अत्र शोणो धावतीतिवाक्यवदजहल्लक्षणापि न सम्भवति। तत्र शोणगुणगमनलक्षणस्य वाक्यार्थस्य विरुद्धत्वात्तदपरित्यागेन तदाश्रया श्वादिलक्षणया तद्विरोधपरिहारसम्भवादजहल्लक्षणा सम्भवति। अत्र तु परोक्षत्वापरोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्यैकत्वस्य वाक्यार्थस्य विरुद्धत्वात्तद- परित्यागेन तत्सम्बन्धिनो यस्य कस्यचिदर्थस्य लक्षितत्वेऽपि तद्विरोधपरिहारासम्भवादजहल्लक्षणा न सम्भवत्येव। न च तत्पदं त्वम्पदं वा स्वार्थविरुद्धांशपरित्यागेनांशान्तरसहितं त्वम्पदार्थं तत्पदार्थं वा लक्षयत्वतः कथं प्रकारान्तरेण भागलक्षणाङ्गीकरणमिति वाच्यम्। एकेन पदेन स्वांशांशपदार्थान्तरोभयलक्षणाया असम्भवात्पदान्तरेण तदर्थप्रतीतौ लक्षणाया पुनस्तत्प्रतीत्यपेक्षाभावाच्च॥२६॥

२४४ वेदान्तसार पदच्छेद-अत्र 'शोणः धावति' इति वाक्यवद् 'अजहल्लक्षणा' अपि न सम्भवति। तत्र शोण-गुण-गमन-लक्षणस्य वाक्यार्थस्य विरुद्धत्वात्, तद् अपरित्यगेन तद् आश्रय-अश्वादिलक्षणया तद् विरोध-परिहारसम्भवाद्, अजहल्लक्षणा सम्भवति। अत्र तु परोक्षत्व-अपरोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्य-एकत्वस्य वाक्यार्थस्य विरुद्धत्वात् तद् अपरित्यगेन तत् सम्बन्धिनः यस्य कस्यचिद् अर्थस्य लक्षितत्वे अपि तद् विरोध-परिहार-असम्भवाद् अजहल्लक्षणा न सम्भवति एव। न च तत् पदम् त्वम् पदम् वा स्वार्थविरुद्ध-अंशपरित्यागेन अंशान्तर-सहितम् त्वम् पदार्थम् तत् पदार्थम् वा लक्षयतु, अतः कथम् प्रकारान्तरेण भागलक्षणा-अङ्गीकरणम् इति वाच्यम्। एकेन पदेन स्वार्थांश-पदार्थान्तर-उभय लक्षणायाः असम्भवात्, पदान्तरेण तद् अर्थप्रतीतौ लक्षणया पुनः तत् प्रतीतिः अपेक्षा अभावात् च॥26॥ अनुवाद-यहाँ (तत्त्वमसि इत्यादि वाक्य में) 'लाल' दौड़ रहा है' इत्यादि वाक्य के समान 'अजहल्लक्षणा' (करना) भी सम्भव नहीं है। (क्योंकि) वहाँ लालगुण का गमनरूप जो वाक्यार्थ है, असंगत है। अतः (उसकी संगति हेतु) उस अर्थ का परित्याग किए बिना, उसके आश्रयभूत अश्वादि में लक्षणा द्वारा अर्थ करके उस विरोध का परिहार हो जाता है (अतः इस वाक्य में) अजहल्लक्षणा सम्भव है। जबकि (तत्त्वमसि इत्यादि वाक्य में) तो परोक्षत्व एवं अपरोक्षत्व आदि विशिष्ट (दो) चैतन्यों की एकता, अभिन्नवाक्यार्थ के विरुद्ध होने के कारण उसका परित्याग किए बिना उससे सम्बन्धित जिस किसी भी अर्थ की लक्षणा से प्रतीति होने पर भी, उस विरोध का परिहार असम्भव होने से, अजहल्लक्षणा भी सम्भव नहीं है। (और यदि यह कहा जाए कि) 'तत्' अथवा 'त्वम्' पद अपने अर्थ में विरुद्ध अंश का परित्याग करके, दोनों में सामान्य (चैतन्य) रूप अंश सहित त्वम् एवं तत् पदों के अर्थ को लक्षणा से प्रदर्शित करें, (तो भी ठीक नहीं), क्योंकि तब तो (हमारे द्वारा कथित) भागलक्षणा को ही प्रकारान्तर से क्यों न स्वीकार कर लिया जाए? (क्योंकि) एक पद द्वारा अपने (विरुद्ध) अंश का परित्याग करके तथा दूसरे पद के अविरुद्ध अर्थ की प्रतीति दोनों कार्यों में लक्षणा (एक साथ)

महावाक्यार्थ-निरूपण २४५ प्रवृत्त नहीं हो सकती। (फिर) दूसरे पद द्वारा (अभिधा से ही) उस अर्थ की प्रतीति हो जाने के कारण, पुनः लक्षणा से उसकी प्रतीति कराने की आवश्यकता ही नहीं है। 'चन्द्रिका'-'तत्त्वमसि' इस वाक्य में 'शोणो धावति' इस वाक्य के समान 'अजहल्लक्षणा' मानकर भी अखण्ड अर्थ की प्रतीति नहीं करायी जा सकती है, क्योंकि 'शोणो धावति' का सीधा अर्थ है-'लाल दौड़ता' है। यहाँ लाल रंग तो वस्तुतः गुण है, इसलिए उसका दौड़ना सम्भव नहीं है। अतः मुख्य अर्थ का बाध होने के कारण उक्त वाक्य की संगति बैठाने के लिए लाल रंग है जिसका, ऐसा घोड़ा दौड़ रहा है। इस अर्थ में लक्षणा कर ली जाती है। अतः यहाँ लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा 'शोण' शब्द अपने लालरूप अर्थ का परित्याग किए बिना ही (अजहत्) अर्थात् बिना छोड़े अश्व का बोधक होता है। ऐसा करने पर 'शोणो धावति' वाक्य के अर्थ में किसीप्रकार का विरोध नहीं रह जाता है। इस वाक्य में पूर्व अर्थ-'लाल' रंग के साथ-साथ 'अश्व' रूप अन्य अर्थ की प्रतीति लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा करायी जा रही है। इसीलिए इस लक्षणा को 'अजहत्-लक्षणा' कहा गया है। किन्तु 'तत्त्वमसि' वाक्य में इसप्रकार की विशेषता से युक्त अजहल्लक्षणा नहीं की जा सकती है, क्योंकि यहाँ तत् पद का अर्थ है-'परोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्य एवं त्वम् पद का अर्थ है-अपरोक्षत्वादि विशिष्टचैतन्य। ये दोनों, चैतन्यांश की दृष्टि से एकत्व के प्रतिपादक होते हुए भी परोक्षत्व तथा अपरोक्षत्व रूप अर्थ में परस्पर विरुद्ध हैं। इसलिए यदि 'शोणो धावति' के समान अजहल्लक्षणा मानकर परोक्षत्व-अपरोक्षत्वादि विशिष्ट तत् एवं त्वम् पदों द्वारा केवल चैतन्यरूप अंश के एकत्व की कल्पना कर भी ली जाए तो भी परोक्षत्व अपरोक्षत्वादि विशिष्टरूप भेद के बने रहने के कारण अभेद की प्रतीति तो हो ही नहीं सकती तथा इसप्रकार की अभेदप्रतीति यदि नहीं होती है तो फिर लक्षणा मानने का कोई लाभ नहीं होगा। इसलिए यहाँ अजहल्लक्षणा को नहीं माना जा सकता है। इसके अतिरिक्त यदि कोई व्यक्ति यह कहे कि यहाँ प्रयुक्त तत् पद त्वम् पद के विरुद्ध अपने परोक्षत्वादिवैशिष्ट्य का परित्याग करता हुआ, दोनों में समानरूप से स्थित चैतन्यरूप अंश को ग्रहण करते हुए, त्वम् पद

२४६ वेदान्तसार में स्थित अल्पत्वादि विशिष्ट जीवरूप चैतन्य को लक्षणा द्वारा बोधित करा सकता है। इसीप्रकार त्वम् पद भी 'तत्' पद के विरुद्ध अपने अपरोक्षत्वादिधर्म का परित्याग करके तथा दोनों में समानरूप से स्थित चैतन्यांश को न छोड़ता हुआ, तत् पद के सर्वज्ञत्व आदि विशिष्ट ईश्वररूपचैतन्य को लक्षणा द्वारा बोधित करा सकता है। इसलिए यहाँ 'भागलक्षणा' को मानने की आवश्यकता नहीं है, तो यह भी संगत नहीं है। क्योंकि एक ही तत् अथवा त्वम् पद परित्याग किए हुए अपने परोक्षत्व-अपरोक्षत्वादि रूप अर्थ को तथा दूसरे पद के अर्थ को भी एक साथ लक्षणा द्वारा बोध कराएँ, ऐसी उभयलक्षणा ठीक उसीप्रकार नहीं होती है, जैसे-शोणो धावति में प्रयुक्त 'शोण' पद अपने लाल अर्थ को बताने के साथ-साथ लक्षणा से काले, नीले, पीले आदि रंगों का कथन नहीं करता है। इसके अलावा यहाँ तत् एवं त्वम् दोनों पदों का प्रयोग हुआ ही है। अतः उन्हीं के द्वारा अपने-अपने अर्थों की अभिधा शब्दशक्ति से स्वतःप्रतीति हो ही जाएगी। इसलिए लक्षणा द्वारा दूसरे पद से, अन्य पद के अर्थ की प्रतीति कराने की कोई आवश्यकता नहीं है। विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में ग्रन्थकार ने 'शोणो धावति' के समान 'तत्त्वमसि' वाक्य में अजहल्लक्षणा के अनौचित्य का प्रतिपादन किया है। (2) लक्षणा दो प्रकार की होती हैं (क) जहल्लक्षणा इसीको लक्षण लक्षणा भी कहते हैं (ख) अजहल्लक्षणा इसे उपादानलक्षणा भी कहा जाता है। (3) 'तत्त्वमसि' वाक्य में प्रयुक्त 'तत्' एवं 'त्वम्' पदों के उभय सामान्यधर्म की प्रतीति कराने के लिए ग्रन्थकार ने उक्त दोनों लक्षणाओं से भिन्न जहदजहल्लक्षणा की परिकल्पना की है, जिसे भागलक्षणा भी कहा जाता है। (4) प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-