वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
यत्किञ्चित् वेदान्तसार वेदान्तदर्शन का प्रकरणग्रन्थ है। इसके 38 खण्डों में ग्रन्थकार ने वेदान्तदर्शन के सिद्धान्तों का सरलरूप में प्रतिपादन करने का प्रयास किया है। इससे पूर्व ब्रह्मसूत्रादि में प्रतिपादित वेदान्त के सिद्धान्तों को समझना सामान्य व्यक्ति के लिए दुष्करकार्य हो गया था। इसीकारण आचार्य सदानन्द ने वेदान्तसार की रचना की आवश्यकता अनुभव की जो अत्यन्त लोकप्रिय हुई। इस पुस्तक की लोकप्रियता का ही परिणाम है कि वेदान्तदर्शन के अध्ययन हेतु प्रायः सभी विश्वविद्यालयों ने इसे स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में निर्धारित किया हुआ है। यद्यपि इस ग्रन्थ पर अनेक विद्वानों ने अपनी लेखनी चलाकर इसे पाठकों के लिए सुगम बनाने का प्रयास किया है, तथापि अपने विद्यार्थी जीवन से ही इसे नूतनशैली में प्रस्तुत करने की मेरी तीव्र अभिलाषा थी। इससे पूर्व प्रकाशित सांख्यकारिका के संस्करण को छात्रसमुदाय में जो अपनत्व एवं प्रशंसा प्राप्त हुई, साथ ही उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान ने उसकी सरल डायग्राम पद्धति की सराहना करते हुए उसे साहित्य पुरस्कार प्रदान किया, इन दोनों बातों से उत्साहित होकर वेदान्तसार की व्याख्या भी उसी शैली से प्रस्तुत करने का मैंने संकल्प किया। ईश्वर की असीम अनुकम्पा से आज यह पुस्तक आपके हाथ में है इससे न केवल मैं रोमांचित हूँ, अपितु असीम आनन्द का अनुभव कर रहा हूँ। निश्चय ही इसे भी पूर्व प्रकाशित पुस्तकों के समान ही विद्वानों के हृदय में स्थान प्राप्त होगा। यहाँ 108 पृष्ठों की विस्तृत भूमिका में जहाँ वेदान्त-विषयक अनेक जिज्ञासाओं का समाधान किया गया है। वहीं मूलग्रन्थ के रूप को सुरक्षित रखते हुए विषय को स्पष्ट किया गया है। सरलता की दृष्टि से मुख्य खण्डों को उपखण्डों में विभाजित किया गया है। प्रखण्डों के विभाजन में विषय-विशेष के सर्वांगीण विवेचन की दृष्टि ही प्रमुख रही है। पूर्व प्रतिपादित विषय को अग्रिम विषय के साथ जोड़ने के लिए अवतरणिका, पुनः पदच्छेद एवं हिन्दी अनुवाद के बाद 'चन्द्रिका' हिन्दी व्याख्या में विषय का सर्वांगीण एवं विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया गया है।
साथ ही विशेष शीर्षक में तत्सम्बन्धित अनेक महत्त्वपूर्ण विशेषताओं का उल्लेख किया है। तत्पश्चात् उस खण्ड के अभिप्राय को डायग्राम बनाकर अध्येता जिज्ञासु के लिए विषय को सहज हृदयंगम कराना ही मुख्य उद्देश्य है। मुझे आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि अन्य पुस्तकों के समान ही यह पुस्तक भी विद्वत्समुदाय में लोकप्रिय होगी एवं छात्रों की आवश्यकता को पूर्ण करेगी। इस पुस्तक के लेखन में अब तक प्रकाशित अनेक विद्वानों की टीका, एवं व्याख्याओं से सहायता ली गई है। अतः उनके विद्वान् लेखकों के प्रति श्रद्धा से अवनत होकर आभार व्यक्त करता हूँ। पुस्तक को और अधिक उपयोगी बनाने के लिए विद्वानों के सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी। इति शुभम्। 14 मार्च, 2002 राकेश शास्त्री 1-जे-38, हाउसिंग बोर्ड कालोनी बांसवाडा (राज०) 02962-250026
विषयानुक्रमणिका (i) दो शब्द (ii) समर्पण (iii) विषयानुक्रमणिका (iv) भूमिका 1 (क) दर्शन से अभिप्राय 1 (ख) दर्शन का विकास 1 (ग) भारतीयदर्शन एक परिचय 2 (घ) वेदान्तदर्शन के मूल स्रोत 8 (ङ) उपनिषदों में वेदान्तदर्शन 9 (च) वेदान्तदर्शन के प्रमुख आचार्य (57) एवं उनके ग्रन्थ 11 बादरायण, आत्रेय, आश्मरथ्य, औडुलोमि, कार्ष्णाजिनि, काशकृत्स्न, जैमिनि, बादरि, भर्तृप्रपञ्च, भर्तृमित्र, भर्तृहरि, उपवर्ष, बौधायन, टङ्क, ब्रह्मनन्दी, ब्रह्मदत्त, भारुचि, द्रविड़, गौडपाद, गोविन्दपाद, शङ्कराचार्य, पद्मपाद, मण्डनमिश्र, सर्वज्ञात्ममुनि, वाचस्पतिमिश्र, श्रीकृष्णमिश्रयति, प्रकाशात्मयति, अद्वैतानन्द, श्रीहर्षमिश्र, आनन्दबोध, अमलानन्द, चित्सुखाचार्य, शङ्करानन्द, विद्यारण्यमुनि, आनन्दगिरि, प्रकाशानन्दाचार्य, मल्लनाराध्य, नृसिंहाश्रम, रंगराजाध्वरी, अप्पयदीक्षित, भट्टोजिदीक्षित, सदाशिव ब्रह्मेन्द्र, नीलकण्ठ सूरि, सदानन्द योगीन्द्र, नृसिंह सरस्वती, रामतीर्थ, आपदेव, मधुसूदन सरस्वती, धर्मराज अध्वरीन्द्र, गोविन्दानन्द, रामानन्द सरस्वती, सदानन्द यति, ब्रह्मानन्द सरस्वती, अच्युत कृष्णानन्द, महादेव सरस्वती, सदाशिवेन्द्र सरस्वती, आयन्नदीक्षित। (छ) वेदान्तदर्शन के प्रमुख सिद्धान्त 44 (1) ब्रह्म 44 (2) आत्मा 48 (3) अज्ञान/माया 49 (4) अज्ञान के भेद 52
(5) अज्ञान की शक्तियाँ 53 (6) ईश्वर 54 (7) जीव 56 (8) जीव की चार अवस्थाएँ 57 (9) जगत् 59 (10) शरीरत्रय (कारण, सूक्ष्म, स्थूल) 60 (11) पञ्चकोश 67 (12) पञ्चीकरण प्रक्रिया 69 (13) त्रिवृत्करण 71 (14) प्रमाण 72 (15) कार्यकारणसिद्धान्त 80 (16) समष्टि-व्यष्टि सिद्धान्त 82 (17) सत्ता के त्रिविधरूप 84 (18) जीव की अवस्थाएँ 86 (19) सृष्टि प्रक्रिया 88 (20) अध्यारोप-अपवाद 92 (21) सविकल्पक निर्विकल्पक समाधि 94 (22) जीवन्मुक्त का लक्षण 95 (23) आत्मविषयक विभिन्न मत 98 (24) अरुन्धती न्याय 101 (25) महावाक्य 102 (अ) तत्त्वमसि (ब) अहं ब्रह्मास्मि वेदान्तसार मूल एवम् 'चन्द्रिका' हिन्दी व्याख्या मङ्गलाचरण 108 परिभाषा 116 अनुबन्ध चतुष्टय 119 अज्ञान-निरूपण 149
प्राज्ञ-ईश्वर निरूपण 164 तुरीय निरूपण 168 शक्तिद्वय-निरूपण 173 कारण-निरूपण 178 सूक्ष्म-शरीर 185 पञ्चीकरण प्रक्रिया 201 स्थूलसृष्टि-निरूपण 204 स्थूलमहाप्रपञ्च 212 चार्वाकादिमत निराकरण 216 अपवाद-निरूपण 224 महावाक्यार्थ-निरूपण 232 अनुभववाक्यार्थ-निरूपण 249 समाधि-निरूपण 265 जीवन्मुक्त-निरूपण 278 परिशिष्ट (क) पुस्तक में दिये गए डायग्राम्स की सूची 294 (ख) सहायकग्रन्थ-सूची 297
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भूमिका: (क) दर्शन से अभिप्राय व विकास
भूमिका (क) दर्शन से अभिप्राय-देखना अर्थ में प्रयुक्त √ दृश् धातु से ल्युट् प्रत्यय करने पर 'दर्शन' शब्द निष्पन्न होता है (अष्टाध्यायी-3/3/114 नपुंसके भावे क्त)। आचार्य पाणिनि के अनुसार 'ल्युट्' प्रत्यय का प्रयोग भाव, करण एवं अधिकरण- तीन अर्थों में होता है। (ल्युट् च-3/3/115) (करणाधिकरणयोश्च 3/3/117) यहां भाव से अभिप्राय पूर्णतया शुद्ध धातु के अर्थ से है। इसप्रकार 'दर्शन' शब्द का अर्थ हुआ-देखना। वह विद्या, ज्ञान अथवा उपकरण (साधन) जिसके द्वारा किसी विषय या वस्तु को देखा जाए या जाना जाए अथवा आधारभूत वह वस्तु जिसमें किसी को देखा जाए। दर्शन का मानवजीवन के साथ अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है, क्योंकि मानव के जीवन का कोई भी पक्ष दर्शन की परिधि से बाहर नहीं हो सकता। सृष्टि के आरम्भ में जब से मानव ने विचार करना प्रारम्भ किया, उसी समय से उसके कुछ अनुभव स्थायी आकार लेने लगे। स्थायी आकार से आकारित उसके वे अनुभव ही कालान्तर में दर्शनरूप में परिवर्तित हो गए। (ख) दर्शन का विकास-प्रकृति के विभिन्न व्यापारों को देखकर आदिकाल में मनुष्य अत्यधिक आश्चर्यचकित होता होगा। उसकी सदैव जिज्ञासा रही होगी कि प्रकृति क्या है? अर्थात् सूरज, चाँद, तारे, पर्वत, नदियाँ, वृक्ष आदि ये सब क्या हैं? मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? मुझे कहाँ जाना है? मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? यह संसार क्या है? इसे बनाने वाला कौन है? इस संसार को बनाने वाले और मनुष्य का क्या सम्बन्ध है? आदि। ये कुछ प्रश्न ही आदिमानव के मन में, मस्तिष्क में रहे होंगे, जिन्होंने उसे चिन्तन के लिए बाध्य किया होगा। आगे चलकर इन्हीं प्रश्नों के उत्तर विद्वान् मनीषियों ने दर्शनरूप में प्रतिष्ठित किए। इन समस्याओं पर अलग-अलग चिन्तकों ने अलग-अलग शैली द्वारा चिन्तन किया तथा उनके समाधान का अन्वेषण किया। इसीप्रकार अनेक दर्शनों का भारतवर्ष में प्रादुर्भाव हुआ। इन्हीं चिन्तन शैलियों को बाद में भारतीयदर्शन के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त हुई।
भूमिका: (ख) भारतीयदर्शन एक परिचय
२ वेदान्तसार इसप्रकार दर्शनरूपी ज्ञान की इस स्रोतस्विनी का प्रवाह आदिकाल से अबाधगति से चला आ रहा है। जिसका उद्गमस्थल हमें वैदिकज्ञान के अक्षयभण्डार ऋग्वेद में दृष्टिगोचर होता है। उसमें प्रयुक्त दार्शनिक सूक्त-नासदीय, पुरुष आदि तत्कालीन मानव की नैसर्गिकजिज्ञासा के परिचायक हैं। तत्पश्चात् उपनिषद्ग्रन्थों में साक्षात्कृतधर्मा ऋषियों का मौलिक एवं स्वतन्त्रचिन्तन उपलब्ध होता है। इन उपनिषदों की संख्या एक सौ आठ मानी गई है, जिनमें ग्यारह प्रमुख हैं। सभी भारतीय आस्तिकदर्शनों का मूल आधार ये उपनिषद् ग्रन्थ ही हैं। इनमें भी बृहदारण्यक, छान्दोग्य, तैत्तिरीय, श्वेताश्वतर, कठ, प्रश्न, माण्डूक्य आदि दार्शनिक विषयों के प्रतिपादन की दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं।¹ (ग) भारतीयदर्शन एक परिचय-भारतीयदर्शनविषयक विचारधाराओं को मुख्यरूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-(1) आस्तिक एवं (2) नास्तिक। जिनमें वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार किया गया, उन्हें आस्तिक तथा जो वेदों को महत्ता प्रदान नहीं करते हैं उन्हें 'नास्तिक' दर्शन की संज्ञा प्रदान की गई। नास्तिक-दर्शनों के अन्तर्गत मुख्यरूप से चार्वाक, जैन और बौद्धदर्शनों की गणना की गई तथा आस्तिकदर्शनों की संख्या छः मानी गई-पूर्वमीमांसा, उत्तरमीमांसा, (वेदान्त), सांख्य, योग, न्याय और वैशेषिकदर्शन। इन सभी दर्शनों का संक्षिप्त परिचय निम्न प्रकार है- (अ) नास्तिकदर्शन-(क) इनमें सर्वाधिक प्राचीन चार्वाक-दर्शन माना गया है। इसीको लोकायत के नाम से भी जाना जाता है। यह वस्तुतः भौतिकवादी दर्शन है। आचार्य बृहस्पति एवं चार्वाक इसके प्रमुख आचार्य रहे हैं। यह दर्शन आत्मा, परमात्मा, परलोक आदि को स्वीकार नहीं करता है। इसके अनुसार प्रत्यक्षरूप से दिखायी देने वाला जगत् ही सब कुछ है। अतः व्यक्ति इस संसार में जब तक जीवित रहे तब तक उसे सुखपूर्वक जीने का ही प्रयास करना चाहिए। दुःखों से हमेशा दूर रहना चाहिए, क्योंकि शरीर की मृत्यु के बाद जला दिए जाने पर इसका पुनः इस संसार में आगमन कैसे हो सकता है?
- विस्तृत अध्ययन के लिए द्रष्टव्य लेखककृत भारतीयदर्शन-मूलअवधारणाएँ।
भूमिका ३ (२) जैनदर्शन भी नास्तिकदर्शनों के अन्तर्गत ही आता है। प्रथम शती के 'उमा स्वाति' इसके प्राचीन आचार्य माने गए हैं तथा पञ्चम शती में स्थित 'सिद्धसेन दिवाकर' को जैनन्याय के प्रणेता के रूप में जाना जाता है। इसके अतिरिक्त अकलंकदेव, विद्यानन्द, प्रभासचन्द्र, हेमचन्द्र सूरि, मल्लिसेन आदि इस दर्शन के प्रमुख आचार्य हैं। इस दर्शन में जीवन की सूक्ष्मातिसूक्ष्म समस्याओं पर विचार किया गया है। इसका अनेकान्तवाद का सिद्धान्त सर्वाधिक प्रसिद्ध है, जो भिन्न-भिन्न दृष्टियों से वस्तु के अलग-अलग रूपों की सत्यता का प्रतिपादन करता है। इस विचारधारा में कुल चौबीस तीर्थंकर हुए, जिनमें प्रथम ऋषभदेव तथा अन्तिम भगवान् महावीर माने गए हैं। जैनदर्शन के अन्तर्गत तीर्थंकरों के उपदेश तथा जैन साधुओं के चरित्र को विशेष महत्ता प्रदान की गई है। इसके प्रमुखतया दो सम्प्रदाय हैं-(अ) श्वेताम्बर एवं (ब) दिगम्बर। यहाँ पञ्च परमेष्ठियों की पूजा का विधान किया गया है। जिनमें अर्हत्, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु आते हैं। दिगम्बरजैन साधु पूर्णतया नग्न रहते हैं तथा श्वेताम्बर श्वेतवस्त्र धारण करते हैं। इस दर्शन में अहिंसा का सर्वाधिक महत्त्व है। किसी भी प्राणी को मन, वचन अथवा कर्म द्वारा कष्ट पहुँचाना यहाँ हिंसा के अन्तर्गत माना गया है। इसके अतिरिक्त यह दर्शन पुनर्जन्म, कर्म तथा स्याद्वाद के सिद्धान्तों को भी मान्यता प्रदान करता है। (३) बौद्धदर्शन भी नास्तिकदर्शन के अन्तर्गत माना गया है। इसके मुख्यतया चार सम्प्रदायों का उल्लेख मिलता है-(1) वैभाषिक, (2) सौत्रान्तिक, (3) विज्ञानवादी तथा (4) शून्यवादी। पालिभाषा में लिखे गए त्रिपिटक ग्रन्थों में इस दर्शन के सिद्धान्तों का उल्लेख मिलता है। द्वितीय शती में स्थित 'नागार्जुन' इसके प्राचीन आचार्य हैं। इसके अतिरिक्त वसुबन्ध, दिङ्नाग, धर्मकीर्ति, शान्तरक्षित, कमलशील, रत्नकीर्ति तथा ज्ञानश्री मिश्र आदि भी प्रसिद्ध आचार्य हैं। इन आचार्यों द्वारा लिखे गए प्रमाण-समुच्चय, प्रमाण-वार्तिक, न्यायबिन्दु, हेतु-बिन्दु, तत्त्वसंग्रह तथा तत्त्वसंग्रहपञ्जिका इस दर्शन के आधारभूत ग्रन्थ माने गए हैं। यह दर्शन सविकल्पक ज्ञान को प्रत्यक्ष के अन्तर्गत स्वीकार नहीं करता है। साथ ही अवयवों से भिन्न अवयवी की सत्ता को भी नहीं मानता है। बुद्ध ने इसे जनमानस में प्रतिष्ठापित किया तथा संसार को दुःखमय मानते हुए निर्वाण का मार्ग प्रशस्त किया। इसके अनुसार दुःख का मूलकारण
४ वेदान्तसार तृष्णा है। इसलिए इच्छाओं के निरोध से ही दुःख की निवृत्ति सम्भव है। सम्यग्दृष्टि, सम्यक्संकल्प, सम्यक्वाक्, सम्यक्कर्म, सम्यक्आजीव, सम्यग्व्यायाम, सम्यक्स्मृति, सम्यक्समाधि इसके प्रमुख आठ मार्ग हैं। इसके मत में निर्वाण द्वारा ही व्यक्ति पुनर्जन्म के बन्धन से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। (ब) आस्तिकदर्शन-वेदों में आस्था प्रदर्शित करके उन्हें प्रमाणरूप में प्रस्तुत करने वाले आस्तिकदर्शनों की संख्या छः है- (१) पूर्वमीमांसा-आचार्य जैमिनी इसके प्रणेता माने गए हैं। यह वेद को स्वतः प्रमाणरूप में स्वीकार करता है। वेदसम्मत होने पर भी यह ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानता है। इसके अनुसार सृष्टि अनादि एवं नित्य है। अतः इसके कर्ता के रूप में ईश्वर की आवश्यकता नहीं है, किन्तु वैदिक क्रियाओं के सम्पादन हेतु यहाँ वैदिकदेवों की परिकल्पना को मान्यता प्रदान की गई है। कर्म एवं कर्मफल के बीच सम्बन्ध स्थापित करने हेतु यहाँ अपूर्व नामक तत्त्व की मौलिक कल्पना की गई है। शबरस्वामी, प्रभाकरभट्ट, कुमारिलभट्ट एवं पार्थसारथि मिश्र इस दर्शन के प्रसिद्ध आचार्य हैं। इस दर्शन में प्रत्यक्ष, अनुमान एवं शब्द के अतिरिक्त उपमान तथा अनुपलब्धि प्रमाणों को भी मान्यता प्रदान की गई है। यद्यपि सभी आचार्य इस सम्बन्ध में एकमत नहीं हैं। इस दर्शन का मुख्य उद्देश्य वस्तुतः कर्मकाण्ड एवं यज्ञादि विषयक वैदिकवाक्यों की व्याख्याओं के नियमों का प्रतिपादन करना रहा है। मोक्ष हेतु यहाँ कर्म एवं ज्ञान दोनों की ही आवश्यकता बतायी गयी है। इस दर्शन के आद्यग्रन्थ जैमिनीय सूत्र में 16 अध्याय 90 अधिकरण तथा 2644 सूत्र हैं, जिन पर शबरस्वामी ने उत्कृष्टभाष्य की संरचना की। (२) उत्तरमीमांसा (वेदान्तदर्शन)- आचार्य बादरायण विरचित 'ब्रह्मसूत्र' इसका आधारग्रन्थ है। इसी का दूसरा नाम 'वेदान्तसूत्र' भी है। इस दर्शन के प्रमुख आधार उपनिषद् ग्रन्थ रहे हैं, क्योंकि उन्हीं के वाक्यों को यहाँ पद-पद पर उद्धृत किया गया है। ब्रह्म, जीव, जगत् और माया इस दर्शन के प्रमुख विवेच्य रहे हैं। ब्रह्मसूत्र पर लिखा गया आचार्य शङ्कर का 'शारीरकभाष्य' इस दर्शन का अद्भुत ग्रन्थ माना गया है। इसमें ब्रह्मसूत्रों की अद्वैतवादी व्याख्या प्रस्तुत की गयी है। इस भाष्य के महत्त्व का इसी से
भूमिका ५ पता चलता है कि इसपर भी अनेक विद्वान् आचार्यों द्वारा अनेक टीकाएँ एवं व्याख्याएँ प्रस्तुत की गईं। वाचस्पति की 'भामती टीका' इनमें विशेषरूप से उल्लेखनीय है। इसके अतिरिक्त श्रीहर्ष का खण्डनखण्डखाद्य, चित्सुखाचार्य की तत्त्वदीपिका, विद्यारण्यस्वामी की पञ्चदशी, विवरणप्रमेयसंग्रह, जीवन्मुक्ति- विवेक, मधुसूदन सरस्वती की अद्वैतसिद्धि, अप्ययदीक्षित का सिद्धान्त-लेश संग्रह इस दर्शन के प्रमुख ग्रन्थ हैं, किन्तु सदानन्द विरचित वेदान्तसार को सरलतम होने के कारण सर्वाधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई। इस दर्शन के अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत, द्वैत एवं शुद्धाद्वैत आदि संम्प्रदाय भी हैं। ये सभी वैष्णव-वेदान्त के नाम से जाने जाते हैं। 'प्रस्थानत्रयी' के नाम से प्रसिद्ध उपनिषद्, गीता एवं ब्रह्मसूत्र सभी वेदान्त सम्प्रदायों के प्रमुख आधारग्रन्थ हैं। ब्रह्म एवं जीव का ऐक्य प्रतिपादन करना इस दर्शन का मुख्य उद्देश्य रहा है। (३) सांख्यदर्शन-महर्षि कपिल इसके प्रवर्तक आचार्य हैं। पुरुष एवं प्रकृति इन दो तत्त्वों को यहाँ नित्य माना गया है। इसलिए इसे द्वैतवादी दर्शन भी कहा जाता है। पुरुष चेतन एवं प्रकाशस्वरूप है, जबकि सत्त्व, रजस् एवं तमस् की साम्यावस्था का नाम प्रकृति है। इसे जड़ माना गया है। पुरुष का प्रकाश जब इसपर पड़ता है तो ये तीनों गुण एक-दूसरे को दबाने लगते हैं, परिणामस्वरूप सृष्टि की उत्पत्ति होती है। इस क्रम में सबसे पहले महत् अर्थात् बुद्धि उत्पन्न होती है। तत्पश्चात् महत् से अहंकार उत्पन्न होता है। इसी अहंकार से श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राण (पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ), वाक्, पाणी, पाद, पायु और उपस्थ (पञ्चकर्मेन्द्रियाँ), शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध (पञ्चतन्मात्राएँ) तथा मन यह सोलह का गण उत्पन्न होता है। तत्पश्चात् इन्हीं पञ्चतन्मात्राओं से क्रमशः आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी इन पञ्चमहाभूतों की उत्पत्ति मानी गई है। इसप्रकार यह दर्शन कुल 25 तत्त्वों को मान्यता प्रदान करता है। इसके अनुसार इन्हीं पच्चीस तत्त्वों के सम्यक्ज्ञान से व्यक्ति को मोक्षप्राप्ति होती है। ज्ञानप्राप्ति के लिए यहाँ प्रत्यक्ष, अनुमान एवं शब्द इन तीन प्रमाणों की आवश्यकता प्रतिपादित की गई है। सत्कार्यवाद इस दर्शन का महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है। जिसके अनुसार कारण में कार्य की उपस्थिति को पहले से ही
स्वीकार किया गया है। इसके अतिरिक्त यह दर्शन पुरुष बहुत्व के सिद्धान्त को भी मान्यता प्रदान करता है। ईश्वर की सत्ता को स्वीकार न करने के कारण इसे 'निरीश्वर सांख्य' भी कहा जाता है। तत्त्वों की संख्या को अत्यधिक महत्व प्रदान करने के कारण इसे सांख्यदर्शन कहा गया। आसुरि, पञ्चशिख, विन्ध्यवासी, जैगीषव्य, वार्षगण्य आदि इस दर्शन के प्रमुख आचार्य माने गए हैं तथा सांख्यसूत्र, षष्टितन्त्र, अर्वाचीन सांख्यसूत्र, समाससूत्र प्रसिद्धग्रन्थ हैं, किन्तु इन सभी में सर्वाधिक लोकप्रिय ईश्वरकृष्ण की सांख्यकारिका रही है। जिसपर गौडपादभाष्य, माठरवृत्ति, जयमंगला, युक्तिदीपिका तथा वाचस्पतिमिश्र की सांख्यतत्त्वकौमुदी आदि प्रमुख टीकाएँ लिखी गईं।¹ (४) योगदर्शन-भारतीयदर्शनों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण इसके प्रणेता आचार्य महर्षि पतञ्जलि रहे हैं। अतः उनके द्वारा विरचित 'योगसूत्र' इस दर्शन का आधारग्रन्थ है। इसी ग्रन्थ पर लिखा गया 'व्यासभाष्य' सर्वाधिक प्रामाणिक व्याख्याग्रन्थ माना गया है। जिसपर आचार्य वाचस्पतिमिश्र की 'तत्त्ववैशारदी' तथा आचार्य विज्ञानभिक्षु की 'योगवार्तिक' दो प्रसिद्ध टीकाएँ उपलब्ध हैं। इसके अलावा भोजवृत्ति, मणिप्रभा आदि व्याख्याग्रन्थ भी योगसूत्रों पर लिखे गए। यह दर्शन वस्तुतः सांख्य के सिद्धान्तों को ही स्वीकार करता है, अन्तर केवल इतना ही है कि यह ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करता है, सांख्य नहीं। इसीकारण कुछ विद्वानों ने इसे 'सेश्वर सांख्य' की संज्ञा प्रदान की है। प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति, ये पाँच चित्त की प्रवृत्तियाँ मानी गई हैं तथा चित्त की इन प्रवृत्तियों पर नियन्त्रण करना ही योग है-'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः'। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि, ये आठ योग के अंग माने गए हैं। इनके निरन्तर अभ्यास से चित्त की वृत्तियाँ स्वतः ही विलीन हो जाती हैं। बस इसी स्थिति में चित्त की एकाग्रता से यह दर्शन कैवल्य (मोक्ष) की प्राप्ति स्वीकार करता है। (५) न्यायदर्शन- बुद्धि को तीक्ष्ण, परिष्कृत एवं विशद बनाने वाले तर्कप्रधान न्यायदर्शन के प्रवर्तक आचार्य गौतम माने गए हैं। प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों द्वारा पदार्थ की परीक्षा करना ही न्याय है। इसके लिए 'आन्वीक्षिकी'
- विस्तृत अध्ययन हेतु द्रष्टव्य लेखककृत सांख्यकारिका 'चन्द्रिका' हिन्दी व्याख्या गौडपादभाष्य सहित - प्रकाशक संस्कृतग्रन्थागार, दिल्ली-1998
भूमिका ७ शब्द का प्रयोग भी किया जाता है। यहाँ प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान इन सोलह पदार्थों को मान्यता प्रदान की गई है। यह दर्शन आत्मा को गुणों का आश्रय मानता है। इसके अनुसार आत्मा के जीवात्मा और परमात्मा दो भेद होते हैं तथा आत्मा, शरीर, इन्द्रियाँ, अर्थ, बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रत्यभाव, फल, दुःख तथा अपवर्ग ये सभी प्रमेय विषय हैं। यह दर्शन जगत् की सत्ता में परमाणु को समवायी तथा ईश्वर को निमित्तकारण मानता है तथा आगमप्रमाण के माध्यम से ईश्वर की सत्ता को सिद्ध करता है। अन्य दर्शनों के समान ही यह जीवन का अन्तिम लक्ष्य दुःखों की हमेशा के लिए निवृत्ति मानता है। उसी को यहाँ मोक्ष माना गया है। आचार्य गौतम के अतिरिक्त गंगेश उपाध्याय, वात्स्यायन, उद्योतकर, वाचस्पतिमिश्र, जयन्तभट्ट, उदयनाचार्य, रघुनाथ शिरोमणि, मथुरानाथ, जगदीश, गदाधर भट्ट आदि उल्लेखनीय आचार्यों ने इस दर्शन के साहित्य में श्रीवृद्धि की है। इनमें भी आचार्य केशवमिश्र की तर्कभाषा को यहाँ विशेष प्रसिद्धि प्राप्त हुई। (६) वैशेषिकदर्शन-'विशेष' नामक एक विलक्षण पदार्थ को मानने के कारण इसे वैशेषिक कहा गया। सर्वदर्शनसंग्रह में इसे 'औलूक्यं दर्शन' भी कहा गया है। तदनुसार इसके प्रणेता 'उलूक' नामक आचार्य थे। महर्षि कणाद को भी इसका प्रणेता माना जाता है। जैन लेखक राजशेखर ने न्यायकन्दली टीका में जनश्रुति के आधार पर इस सम्बन्ध में अपनी सम्मति इसप्रकार दी है- “कणाद मुनि की तपस्या से प्रसन्न होकर परमपिता परमात्मा ने स्वयं उलूक के रूप में अवतरित होकर उन्हें इस दर्शन के सिद्धान्तों का उपदेश दिया था। इसीलिए इसे औलूक्य दर्शन कहा जाता है।” इसके अनुसार-पृथिवी, तेज, जल, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन ये नौ द्रव्य हैं। इनमें पृथिवी, तेज, वायु और आकाश भौतिक हैं। आत्मा के अस्तित्व, स्वरूप, सृष्टि तथा मोक्ष के सम्बन्ध में यह दर्शन न्याय के साथ मतैक्य रखता है। इस दर्शन के सिद्धान्तों का निरूपण प्रशस्तपाद नामक ग्रन्थ में भलीप्रकार किया गया है। तत्पश्चात् उदयनाचार्य, श्रीधराचार्य,
भूमिका: (ग) वेदान्तदर्शन के मूल स्रोत व उपनिषदें
८ वेदान्तसार व्योमशिवाचार्य आदि प्रमुख विद्वानों ने महत्त्वपूर्ण टीकाओं का भी प्रणयन किया। (घ) वेदान्तदर्शन के मूलस्रोत-वेदान्तदर्शन को भी अत्यन्त प्राचीन कहा जा सकता है, क्योंकि विश्व के सर्वाधिक प्राचीनग्रन्थ ऋग्वेद में इसके मूलस्रोत के दर्शन होते हैं। यद्यपि वहाँ यह व्यवस्थितरूप में प्रस्तुत नहीं हुआ है तथापि वहाँ इसके बीज अवश्य देखे जा सकते हैं। विश्व की संरचना एवं संचालन के लिए ब्रह्म, ईश्वर और जीव इन तीन तत्त्वों को वहां स्पष्टरूप से स्वीकार किया गया है। पुरुषसूक्त के आरम्भ में वर्णित आदिपुरुष, वेदान्त के ब्रह्म के सामर्थ्य से मेल खाता है- सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥ (10/90/1) इसीप्रकार आदिपुरुष से उत्पन्न विराट्पुरुष जो वेदान्त का ईश्वर है तथा उसका आश्रय लेकर उत्पन्न हुआ, पुरुष ही जीवात्मा अर्थात् वेदान्त का जीव है- तस्माद् विराळजायत विराजो अधि पूरुषः। स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः॥ (10/90/5) इसीप्रकार- द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं विश्वं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥ (1/164/20) यहाँ वर्णित विश्व, वेदान्त की माया तथा 'पिप्पल' उसके भोगने योग्य पदार्थ हैं। भोगने वाला पक्षी वेदान्त का 'जीव' तथा न भोगने वाला दूसरा पक्षी ईश्वर है। अतः ऋग्वेद में वेदान्त के तत्त्वों को सहज ही स्वीकार किया जा सकता है। हाँ इतना अवश्य है कि वेदान्तदर्शन के प्रकरणग्रन्थ वेदान्तसार के समान व्यवस्थित वेदान्तसिद्धान्तों के हमें यहाँ दर्शन नहीं होते हैं, किन्तु वेदान्तदर्शन का चिन्तन वैदिकसंहिताओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों से आरम्भ हो चुका था, इतना अवश्य स्वीकार किया जा सकता है। इस तथ्य की पुष्टि हेतु कुछ अन्य उदाहरण भी द्रष्टव्य हैं। ऋग्वेद के नासदीयसूक्त में वेदान्त की माया के रजस् एवं तमोगुण का उल्लेख हुआ है- नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् (ऋ. 10/129/1) तम आसीत्तमसा गूहळमग्रे (वही-10/129/3)
भूमिका ९ इसी सूक्त के अग्रिम मन्त्र में प्रयुक्त ‘सत्’ को विद्वानों ने ‘सत्त्व’ गुण के अर्थ में प्रयुक्त माना है– सतो बन्धुमसति निरविन्दन् (ऋ. 10/129/4) इसके अतिरिक्त ‘पुरुष एवेदं सर्वम्’ (ऋ. 10/90/2) तथा ‘यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्’ इत्यादि मन्त्रों में सम्पूर्ण सृष्टि के स्वामी, सत्यस्वरूप, प्रकाशमय, आनन्दस्वरूप ईश्वर अथवा ‘ब्रह्म’ के दर्शन भी किए जा सकते हैं। इसप्रकार सूक्ष्मरूप से अन्वेषण करने पर ऋग्वेद के मन्त्रों में अनेकस्थलों पर वेदान्त के सिद्धान्तों एवं तत्त्वों को मूलरूप में सहज ही देखा जा सकता है। इसी आधार पर यह भी कहा जा सकता है कि वेदान्त के सिद्धान्तों का पल्लवन संहिता एवं उपनिषद्काल के बीच ब्राह्मणग्रन्थों के समय में हुआ होगा, तभी उपनिषदों तक आते-आते हमें इस दर्शन का परिष्कृत एवं व्यवस्थितरूप देखने को मिलता है। जिसका हम आगे संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं– (ङ) उपनिषदों में वेदान्तदर्शन–उपनिषद् अध्यात्मविद्या अथवा ब्रह्मविद्या को कहते हैं। वेद का अन्तिम भाग होने से इसे वेदान्त भी कहा जाता है। ‘वेदान्तो नाम उपनिषत्प्रमाणम्’ परिभाषा के अनुसार उपनिषदों को प्रमाणरूप में मानकर चलने वाला शास्त्र वेदान्तदर्शन माना गया है। इस दृष्टि से उपनिषदों का स्वतः ही महत्त्व सिद्ध हो जाता है। उपनिषद् शब्द से ज्ञानकाण्ड के विशाल दार्शनिकसाहित्य का बोध होता है। जिसकी सृष्टि वैदिक कर्मकाण्ड की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप हुई। उपनिषद् शब्द ‘उप’ एवं ‘नि’ उपसर्गपूर्वक सद् धातु से क्विप् प्रत्यय करके निष्पन्न हुआ है। अतः अर्थ की दृष्टि से भी यह शब्द वेदान्तदर्शन के लक्ष्य को ही इंगित करता है, क्योंकि इनके अनुशीलन से मुमुक्षुओं की संसारबीजरूपी अविद्या नष्ट हो जाती है तथा मनुष्य के गर्भवास, जन्म, जरा, मृत्यु आदि विषयक दुःख सर्वथा शिथिल हो जाते हैं और उसे ब्रह्म की प्राप्ति होती है। इस दृष्टि से उपनिषद् एवं वेदान्तदर्शन को अभिन्न माना जा सकता है। इसीकारण वेदान्तदर्शन का प्रतिपादन करते हुए विद्वान् आचार्यों ने पदे-पदे उपनिषद्वाक्यों को प्रमाणरूप में उद्धृत किया है। अब प्रश्न उठता है कि प्राप्त उपनिषदों की संख्या तो 220 के लगभग है तो क्या सभी में वेदान्तदर्शन के सिद्धान्तों का उल्लेख हुआ है? इस सम्बन्ध में इतना ही कहा जा सकता है कि उपलब्ध उपनिषदों में से
१० वेदान्तसार लगभग 20 उपनिषद् सर्वाधिक प्राचीन माने गए हैं। शेष बहुत बाद की रचनाएँ हैं। ब्राह्मणग्रन्थों के अन्त में जुड़े हुए उपनिषद् सर्वाधिक प्राचीन कहे जा सकते हैं। जिनकी संख्या लगभग छः है- (1) ऐतरेय उपनिषद् (ऐतरेय ब्राह्मण, ऋग्वेद सम्बन्धी) (2) कौषीतकि उपनिषद् (कौषीतकि ब्राह्मण, ऋग्वेद सम्बन्धी) (3) तैत्तिरीय उपनिषद् (कृष्ण यजुर्वेदीय तैत्तिरीय आरण्यक विषयक) (4) बृहदारण्यकोपनिषद् (शुक्ल यजुर्वेदीय शतपथ ब्राह्मण विषयक) (5) छान्दोग्योपनिषद् (सामवेद की ताण्ड्यशाखा से सम्बन्धित छान्दोग्य ब्राह्मण में) (6) केनोपनिषद् (सामवेद की तलवकार शाखा से जुड़े जैमिनीय ब्राह्मण में) यद्यपि ये सभी छः उपनिषद् भारतीयदर्शन के विकास की प्रारम्भिक अवस्था को प्रदर्शित करते हैं तथापि इन सभी में वेदान्तदर्शन अपने शुद्ध एवं मूलरूप में सुरक्षित है। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे उपनिषद् भी हैं जो वेदान्तदर्शन का विवेचन तो करते हैं, किन्तु उतने परिशुद्ध रूप में नहीं, वहाँ उनमें सांख्य एवं योगदर्शन के तत्त्वों के भी दर्शन होते हैं। इनकी संख्या लगभग आठ है- (1) कठोपनिषद् (काठक संहिता, कृष्णयजुर्वेद विषयक) (2) श्वेताश्वतरोपनिषद् (तैत्तिरीय संहिता, कृष्णयजुर्वेद विषयक) (3) महानारायणोपनिषद् (तैत्तिरीय संहिता, कृष्णयजुर्वेद विषयक) (4) ईशोपनिषद् (वाजसनेयी संहिता, शुक्लयजुर्वेद विषयक) (5) मुण्डकोपनिषद् (अथर्ववेद सम्बन्धी) (6) प्रश्नोपनिषद् (अथर्ववेद सम्बन्धी) (7) मैत्रायणी उपनिषद् (कृष्ण-यजुर्वेद विषयक) अपेक्षाकृत अर्वाचीन। (8) माण्डूक्योपनिषद् (अथर्ववेद सम्बन्धी) अपेक्षाकृत अर्वाचीन। इसप्रकार उपर्युक्त 14 उपनिषद् वेदान्तदर्शन की आधारशिला माने गए हैं। इसीलिए वेदान्तदर्शन के भाष्यकारों एवं टीकाकारों ने इन्हीं के वाक्यों को पदे-पदे उद्धृत किया है। उपनिषदों का यही साहित्य 'वेदान्त' भी कहा जाता है, जो सूक्ष्मदृष्टि से उपयुक्त भी प्रतीत होता है क्योंकि वेदान्तदर्शन
भूमिका: (घ) वेदान्तदर्शन के प्रमुख ५७ आचार्य एवं उनके ग्रन्थ
भूमिका ११ का सम्पूर्ण कलेवर ही उपनिषद् है। विद्वानों ने वेदान्त को उपनिषद् के पुत्र की संज्ञा दी है। वस्तुतः वेदान्तदर्शन के जो सिद्धान्त उपनिषदों में इतस्ततः असम्बद्ध अवस्था में बिखरे पड़े हैं। तर्क की कसौटी पर कसे नहीं गए हैं। उन्हीं सिद्धान्तों को वेदान्तदर्शन में सुसम्बद्धरूपं में रखा गया है तथा उन्हें तर्क की कसौटी पर कसा गया है। इसीप्रकार का मन्तव्य आचार्य शङ्कर ने भी अभिव्यक्त किया है- वेदान्तवाक्यकुसुमग्रथनार्थत्वात् सूत्राणाम्। वेदान्तवाक्यानि हि सूत्रैरुदाहृत्य विचार्यन्ते॥ (ब्रह्मसूत्र-शांकरभाष्य) अतः वेदान्तदर्शन के गहन अध्ययन हेतु उपर्युक्त उपनिषदों का अवलोकन अत्यावश्यक है। (च) वेदान्तदर्शन के प्रमुख आचार्य एवं उनके ग्रन्थ-जैसाकि हमने अभी उल्लेख किया कि उपनिषदों में वेदान्तदर्शन के सिद्धान्तों का असम्बद्धरूप में प्रयोग हुआ है। उन्हें सर्वप्रथम व्यवस्थितरूप देने का श्रेय आचार्य बादरायण को जाता है। जिन्होंने ब्रह्मसूत्र नामक ग्रन्थ की संरचना की। इस दृष्टि से विद्वानों ने इन्हें वेदान्तदर्शन का संस्थापक अथवा प्रणेता आचार्य भी कहा है। ब्रह्मसूत्र पर अनेक विद्वानों ने वैदुष्यपूर्णभाष्य करके इस दर्शन के साहित्य की श्रीवृद्धि की। अनेक ग्रन्थ स्वतन्त्ररूप से भी लिखे गए। वस्तुतः वेदान्तदर्शन पर इतने विपुल साहित्य की रचना की गई यदि उसका विस्तार से उल्लेख किया जाए तो अपने आप में विशालग्रन्थ का ही निर्माण हो जाए, किन्तु हम यहाँ इनका अत्यन्त संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं। वेदान्तदर्शन के आचार्यों का व्यवस्थितरूप से अध्ययन हम इन्हें तीन श्रेणियों में विभाजित करके कर सकते हैं। प्रथम वे आचार्य जिनका महर्षि बादरायण के ब्रह्मसूत्र में नामोल्लेख हुआ है। द्वितीय, आचार्य शङ्कर के पूर्ववर्ती आचार्य। तृतीय, आचार्य शङ्कर के परवर्ती आचार्य। अब हम इनका क्रमशः उल्लेख करते हैं। (१) आचार्य बादरायण-इस दर्शन के प्रणेता आचार्य माने गए हैं। विद्वानों ने इनका समय 400 ई.पू. के लगभग निर्धारित किया है। महर्षि बदर का वंशज होने के कारण इन्हें इस नाम से जाना जाता है। (प्राचीन चरित्र कोश-पृ० 505)। भारतीयपरम्परा इन्हें तथा महर्षि पराशर के पुत्र
१२ वेदान्तसार कृष्णद्वैपायन वेदव्यास को एक ही स्वीकार करती है। इन्होंने वेदान्तदर्शन के प्रसिद्धग्रन्थ ब्रह्मसूत्र की संरचना की। इसके चार अध्याय, सोलह पाद, एक सौ बानवे अधिकरणों में पांच सौ बचपन सूत्र हैं। इसीको उत्तरमीमांसा, बादरायणसूत्र, ब्रह्ममीमांसा, वेदान्तसूत्र, व्याससूत्र, तथा शारीरकसूत्र के नाम से भी जाना जाता है। इस ग्रन्थ में बृहदारण्यक, छान्दोग्य, कौषीतकि, ऐतरेय, मुण्डक, प्रश्न, श्वेताश्वतर एवं जाबाल आदि उपनिषद्ग्रन्थों में प्राप्त वाक्यों पर विचार किया गया है। इसके प्रथम अध्याय में स्पष्ट, अस्पष्ट एवं संदिग्ध श्रुतियों का ब्रह्म में समन्वय किया गया है। द्वितीय अध्याय में अन्य दार्शनिक मतों का दोषप्रदर्शन करके युक्तिपूर्वक वेदान्तमत की स्थापना की गई है। तृतीय अध्याय में जीव और ब्रह्म का लक्षण करते हुए उसे मुक्ति का बहिरङ्ग एवं अन्तरङ्ग साधन बताया गया है। चतुर्थ अध्याय में जीवन्मुक्ति, जीव की उत्क्रान्ति तथा सगुण-निर्गुण उपासना का दिग्दर्शन कराया गया है। इन सूत्रों का प्रमुख उद्देश्य उपनिषदों के तत्त्वज्ञान का समन्वय करना है। इसमें सामान्यरूप से पहले पूर्वपक्ष की स्थापना पुनः सिद्धान्तपक्ष का प्रस्तुतीकरण, इस रचनापद्धति को अपनाया गया है, किन्तु कुछ स्थलों पर पहले सिद्धान्तपक्ष देकर बाद में पूर्वपक्ष को भी प्रस्तुत किया गया है। इसे 'प्रतिलोम पद्धति कहते' हैं। ब्रह्मसूत्र के अनेकभाष्य प्रचलित हैं। जिनमें शङ्कराचार्य का शारीरक- भाष्य, रामानुजाचार्य का श्रीभाष्य, मध्वाचार्य का पूर्णप्रज्ञभाष्य प्रसिद्ध हैं। इसके अतिरिक्त भास्कराचार्य ने भास्करभाष्य, निम्बार्काचार्य ने वेदान्तपारिजात, श्रीकण्ठ ने शैवभाष्य, श्रीपति ने श्रीकरभाष्य, बल्लभाचार्य ने अणुभाष्य, विज्ञानभिक्षु ने विज्ञानामृत तथा आचार्य बलदेव ने गोविन्दभाष्य की भी संरचना की।¹ इस ग्रन्थ में अनेकस्थलों पर महर्षि बादरायण का अन्यपुरुष के रूप में उल्लेख किया गया है। इस आधार पर कुछ विद्वानों ने इन सूत्रों का रचयिता उन्हें मानने में आपत्ति प्रदर्शित की है, किन्तु डॉ० राधाकृष्णन् आदि प्रसिद्ध दार्शनिक विद्वानों ने इस आधार पर इस मन्तव्य का खण्डन किया है कि ग्रन्थकार द्वारा स्वयं का उल्लेख अन्यपुरुष में करने की प्राचीन भारतीयपरम्परा रही है। अतः यह विचार मान्य नहीं है।
- भूमिका- ब्रह्मसूत्र शांकरभाष्य, प्रकाशक : गोविन्दमठ, वाराणसी
भूमिका १३
( i ) बादरायण विरचित ब्रह्मसूत्र में उल्लिखित आचार्य—महर्षि बादरायण ने ब्रह्मसूत्र में पूर्वकालिक अनेक आचार्यों के मतों की विवेचना उनके नामोल्लेखपूर्वक की है, किन्तु उन आचार्यों के ग्रन्थ आज उपलब्ध नहीं हैं। इनमें आत्रेय के नाम का उल्लेख एक बार (3/4/44) आश्मरथ्य का दो बार (1/2/19, 1/4/20), औडुलोमि का तीन बार (1/4/2, 3/4/45, 4/4/6), कार्ष्णाजिनि का एक बार (3/1/9), काशकृत्स्न का एक बार (1/4/22), जैमिनि का ग्यारह बार तथा बादरि पराशर का चार बार (1/2/30, 3/1/11, 4/3/7, 4/4/10) किया है। अब हम इनका संक्षेप में विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं। (2) आचार्य आत्रेय—ब्रह्मसूत्रकार ने एक स्थल पर इनके नाम का उल्लेख करते हुए “यजमान को ही यज्ञ की अङ्गभूत उपासना का फल प्राप्त होता है, ऋत्विक् को नहीं। इसलिए सम्पूर्ण उपासनाएँ स्वयं यजमान को ही करनी चाहिए, पुरोहित के माध्यम से इन्हें सम्पादित नहीं कराना चाहिए” इत्यादि मत का खण्डन आचार्य औडुलोमि के मत को प्रमाणरूप में उद्धृत करके किया है। आचार्य जैमिनि ने भी अपने मीमांसादर्शन में (5/2/18) आचार्य कार्ष्णाजिनि के मत का खण्डन करने के लिए आचार्य आत्रेय के मत का सिद्धान्तरूप में उल्लेख किया है। साथ ही उन्होंने बादरि के वैदिककर्म में सर्वाधिकार के मत का खण्डन करने के लिए भी आत्रेय के मत को प्रमाणरूप में प्रस्तुत किया है। (6/1/26) इस दृष्टि से ये मूलतः पूर्वमीमांसा के आचार्य प्रतीत होते हैं तथा साथ ही महर्षि बादरायण से पूर्व में इनकी स्थिति सिद्ध होती है। बृहदारण्यकोपनिषद् 2/6/3 में इनका मांटी के शिष्यरूप में, ऐतरेय ब्राह्मण (8/22) में अंगराज के पुरोहितरूप में इस नाम का उल्लेख हुआ है। किन्तु ये तीनों एक ही व्यक्ति हैं अथवा अलग-अलग, इस सम्बन्ध में निश्चितरूप से नहीं कहा जा सकता है। ( ३ ) आचार्य आश्मरथ्य—आचार्य जैमिनि ने मीमांसादर्शन में इनके मत का उल्लेख करके उसका खण्डन किया है। अतः इन्हें निःसंदेह वेदान्त का आचार्य स्वीकार किया जा सकता है। आश्मरथ का वंशज होने के कारण इनका यह नाम पड़ा (प्राचीन चरित्रकोश-पृ० 63)। सूत्रग्रन्थों में भी इनके नाम का उल्लेख मिलता है (आश्वलायन श्रौतसूत्र-6/10)। ब्रह्म के लिए
१४ वेदान्तसार वैश्वानर शब्द के प्रयोग प्रसङ्ग में ब्रह्मसूत्र में इनके नाम का दो बार उल्लेख हुआ है (1/2/21, 1/4/20)। अनेक विद्वान् इन्हें द्वैताद्वैत मत का सर्वाधिक प्राचीन आचार्य मानते हैं। ये परमात्मा और विज्ञानात्मा में भेदाभेद के समर्थक रहे। आचार्य शङ्कर एवं भामतीकार वाचस्पतिमिश्र ने इन्हें विशिष्टाद्वैतवादी सिद्ध किया है। इनके अनुसार परमेश्वर अनन्त होने पर भी उपासक के ऊपर अनुग्रह करने हेतु प्रदेशमात्र स्थान में प्रकट होते हैं। आगे चलकर इनके भेदाभेदवाद का यादवप्रकाश आदि द्वारा पल्लवन किया गया। (४) आचार्य औडुलोमि-ये परमतत्त्वज्ञानी थे। केवल ब्रह्मसूत्र में ही इनके नाम का उल्लेख हुआ है- (1/4/21, 3/4/45, 4/4/6)। मीमांसासूत्रकार ने इनके नाम का कथन नहीं किया है। ये भी वेदान्त के आचार्य तथा भेदाभेदवाद के समर्थक विद्वान् थे। इनके अनुसार-सांसारिक स्थिति में जीव और ब्रह्म में भेद होता है, किन्तु मुक्ति की स्थिति में इन दोनों में अभेद होता है। मीमांसक आचार्य आत्रेय के मत का खण्डन करने के लिए महर्षि बादरायण ने इनके मत का नामोल्लेखपूर्वक कथन किया है। ब्रह्मसूत्र में एक स्थल पर (4/4/51) ग्रन्थकार ने आचार्य जैमिनि के इस मत को प्रदर्शित करके कि-'मुक्त व्यक्ति ब्रह्म के स्वरूप को प्राप्त होता है, वह निष्पाप, सर्वज्ञ तथा ऐश्वर्य आदि का अधिकारी हो जाता है' औडुलोमि के इस मत द्वारा खण्डन किया है कि 'चैतन्य ही आत्मा का स्वरूप है। इसलिए वह मुक्ति की अवस्था में चैतन्यमात्र को ही प्राप्त होता है। सत्य संकल्पत्व, सर्वज्ञत्व तथा सर्वेश्वरत्व आदि धर्मों की स्थिति उसमें नहीं रहती है। (५) आचार्य कार्ष्णाजिनि-ये आचार्य बादरायण एवं महर्षि जैमिनि से पूर्ववर्ती आचार्य प्रतीत होते हैं, क्योंकि ब्रह्मसूत्र में एक स्थल पर (3/1/9) तथा जैमिनिसूत्र में दो स्थलों पर (4/3/17, 6/7/35) इनके नाम का उल्लेख हुआ है। ब्रह्मसूत्रकार ने इनके मत का उल्लेख अपने मत के समर्थन में-पृथ्वी पर जीव के पुनरागमन के प्रसङ्ग में किया है। तदनुसार जीव अपने अवशिष्ट कर्मों (अनुशयभूत कर्म) के साथ ही पृथ्वी पर आता है। ये अवशिष्टकर्म ही उसकी अन्य योनि में कारण होते हैं। जबकि मीमांसासूत्रकार ने इनके मत का खण्डन करते हुए इनके नाम का उल्लेख किया है।