भारतकोश
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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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( १३ ) में भी देवी पुनः प्रश्न करती है कि परापर और अपरा का १सकल स्वरूप बन सकता है, किन्तु परा देवी को भी यदि सकल (साकार) माना जायगा तो उसका परत्व ही नष्ट हो जायगा । अतः परा का स्वरूप निष्कल (निराकार) ही मानना पड़ेगा और जब यह निष्कल है, तब पूजा, ध्यान आदि की स्थिति कैसे बन सकेगी ? क्योंकि पूजा आदि तो सकल स्वरूप की ही की जा सकती है ? परम तत्त्व का स्वरूप इन प्रश्नों के उत्तर में भगवान् शिव कहते हैं कि इन्द्रजाल या माया से निर्मित अथवा स्वप्न में देखी गई वस्तु की जैसे कोई वास्तविक सत्ता नहीं है, उसी तरह से भगवान् के सकल स्वरूप की भी कोई सत्ता नहीं है । मिथ्या आडम्बर में रुचि रखने वाले अज्ञानी जीवों के लिये ही शास्त्रों में सकल स्वरूप वर्णित है । भगवान् शिव ऊपर वर्णित सभी स्वरूपों को नकार देते हैं और कहते हैं कि अज्ञानी जीवों को गलत रास्ते पर जाने से रोकने के लिये शास्त्रों में सकल स्वरूप का वर्णन किया गया है । भगवान् के निष्कल स्वरूप का वर्णन नहीं हो सकता । यह तो निर्विकल्प बोधस्वरूप है । केवल स्वानुभवगम्य है । यह सारा विश्व उसी का विलास है । ऐसी स्थिति में उससे भिन्न किसी की परमार्थ सत्ता न होने से कौन किसकी पूजा करेगा और कौन किस पर अनुग्रह करेगा ? भगवान् भैरव का यह परमार्थ स्वरूप ही परा देवी का निष्कल-स्वरूप है । अग्नि और उसकी दाहक शक्ति जैसे अलग-अलग नहीं है, उसी तरह से बोधभैरव और उसकी परा शक्ति भी अलग अलग नहीं है । जैसे दाहक शक्ति की सहायता से अग्नि की पहचान हो जाती है, उसी तरह से परा शक्ति की सहायता से शिव को भी पहचाना जा सकता है । शिव की यह परा शक्ति शिव तक पहुँचने का मुख (द्वार) है । जैसे मुख को देखकर व्यक्ति पहचाना जाता है, उसी तरह से परा शक्ति की सहायता से शिव का स्वरूप पहचान में आता है । जैसे दीपक या सूर्य के प्रकाश से हमको दिशाओं का ज्ञान होता है, उसी तरह से २शक्ति से शिव का ज्ञान होता है । भगवान् भैरव के इतना कहने पर देवी उनके द्वारा प्रतिपादित परम तत्त्व की प्राप्ति का उपाय पूछती है कि किन उपायों का सहारा लेकर परा देवी की सहायता से उस परम १. यावदुच्चार्यते वाचा यावल्लेख्येऽपि तिष्ठति । तावत् स सकलो ज्ञेयो निष्कलो भेदवर्जितः ॥ स्वच्छन्दतन्त्र (७।२३८-२३९) के इस श्लोक में बताया गया है कि जब तक इसका उच्चारण किया जा सकता है और जब तक इसको लिखा जा सकता है, या चित्रित किया जा सकता है, तभी तक यह सकल रहता है । निष्कल स्वरूप भेदातीत है । इसका अभिप्राय यह है कि सकल स्वरूप ही भेदातीत स्थिति में पहुँच कर निष्कल हो जाता है । २. शिव और शक्ति के स्वरूप के संबन्ध में ग्रन्थ की व्याख्या करते समय पर्याप्त लिखा जा चुका है । अब यहाँ उसको दोहराने की आवश्यकता नहीं है ।

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( १४ ) तत्त्व तक पहुँचा जा सकता है ? इसके उत्तर में भगवान् शिव ११२ धारणाओं का उपदेश करते हैं। धारणाओं का वर्गीकरण ११२ धारणाओं को विज्ञानभैरव (श्लोक ११६) में 'निस्तरंग उपदेश' के नाम से कहा गया है। इनके लिये धारणा शब्द का प्रयोग भट्ट आनन्द ने किया है। उन्होंने धारणा शब्द का अर्थ कहीं नहीं दिया। दर्शन ग्रन्थों में इस शब्द के अनेक तरह के अर्थ किये गये हैं। सर्वदर्शनसंग्रह में अन्य अर्थों के साथ एक अर्थ यह भी दिया है कि १नाभिचक्र, हृदय पुण्डरीक, नासाग्र प्रभृति आध्यात्मिक स्थानों में, हिरण्यगर्भ, इन्द्र, प्रजापति प्रभृति इष्ट देवों के सकल स्वरूप में अथवा बाह्य देश में अन्य सभी विषयों से हटाकर चित्त को स्थिर करना ही धारणा कहलाती है। विज्ञानभैरव की धारणाओं में इस लक्षण की पूरी संगति बैठती है। प्रत्यभिज्ञा दर्शन में स्वात्मस्वरूप की प्रत्यभिज्ञा (पहचान) के लिये चार उपाय वर्णित हैं। ये हैं—आणव, शाक्त, शाम्भव उपाय और चौथा अनुपाय। टीकाकारों ने प्रायः सभी धारणाओं का इन्हीं चार उपायों में समावेश किया है। वास्तव में देखा जाय तो इसमें प्रायः सभी पूर्ववर्ती यौगिक पद्धतियों का सुन्दर संग्रह किया गया है। भगवद्गीता और त्रिपिटकों में प्रतिपादित प्राणापान२ प्रक्रिया आदि का, ३शून्यवाद और ४विज्ञानवाद का, ५कुल और ६क्रम दर्शन में प्रकाशित योग विधियों का ही नहीं, ७शब्दयोग, ८नादयोग, ९हठयोग में प्रद- शित विधियों का ही नहीं, अपितु १०बालकों की चक्करघानी, ११क्रान्तिकारियों की सी सहन- १. “नाभिचक्र-हृदयपुण्डरीक-नासाग्रादावाध्यात्मिके हिरण्यगर्भ-वासव-प्रजापतिप्रभृतिके बाह्ये वा देशे चित्तस्य विषयान्तरपरिहारेण स्थिरीकरणं धारणा” (आनन्दाश्रम संस्करण, पृ० १४०)। २. धारणा संख्या १-४, २८-२९, ४१ देखिये। ३. धारणा संख्या २०-२३, ३४, ६४, ६७, ७७, ९४, ९६ द्रष्टव्य। ४. धारणा संख्या ७४ देखिये। ५. धारणा संख्या ६५-६६ द्रष्टव्य। ६. धारणा संख्या ५३-५८ देखिये। ७. धारणा संख्या १७-१८ देखिये। ८. धारणा संख्या १५-१६, १९ द्रष्टव्य। ९. धारणा संख्या ३, ८, १३-१४, ५२, ८८ द्रष्टव्य। १०. धारणा संख्या ८६ देखिये। ११. धारणा संख्या ६८ द्रष्टव्य।

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( १५ ) शक्ति की परीक्षा, १अद्भुत, २भयानक, ३आनन्द दायक स्थितियां, ४तिमिर भावना, ५चला- सन प्रभृति में भी धारणा को स्थिर करने की बात यहाँ कहो गई है और बताया गया है कि इनमें से किसी एक भी धारणा में मन को स्थिर करने पर व्यक्ति जीवन्मुक्त हो जाता है । जीवन्मुक्ति से अभिप्राय यहाँ विश्वाहन्ता के विकास से है । इस प्रकार हम कह सकते हैं कि विज्ञानभैरव भारतीय मनीषा के द्वारा बटोरी गई सभी उत्कृष्ट मणियों का एक उज्ज्वल संग्रह है । यहाँ हम सबसे पहले उपाय-चतुष्टय का परिचय प्रस्तुत करते हैं । त्रिविध उपाय और समावेश उच्चारकरणध्यानवर्णस्थानप्रकल्पनैः । यो भवेत् स समावेशः सम्यगाणव उच्यते ॥ उच्चाररहितं वस्तु चेतसैव विचिन्तयन् । यं समावेशमाप्नोति शाक्तः सोऽत्राभिधीयते ॥ अकिञ्चिच्चिन्तकस्यैव गुरुणा प्रतिबोधतः । जायते यः समावेशः शाम्भवोऽसावुदाहृतः ॥ मालिनीविजय तन्त्र (२।२१-२३) के इन तीन श्लोकों में संक्षेप में आणव, शाक्त और शाम्भव उपाय तथा उनकी सहायता से प्राप्त होने वाली त्रिविध समावेश (समाधि) दशाओं का वर्णन किया गया है। अभिनवगुप्त ने तन्त्रालोक में तृतीय से लेकर द्वादश आह्निक तक अत्यन्त विस्तार से और तन्त्रसार (पृ० १०-११४) में अपेक्षाकृत कम विस्तार से, महे- श्वरानन्द ने महार्थमंजरी की चार कारिकाओं (५६-५९) तथा उनकी परिमल व्याख्या (पृ० १३८-१५३) में संक्षेप में इस विषय को समझाया है। इन्हीं ग्रन्थों के आधार पर ऊपर के श्लोकों की व्याख्या करते हुए हम यहाँ इनका अत्यन्त संक्षिप्त परिचय देते हैं । आणव उपाय उच्चार, करण, ध्यान, वर्ण और स्थान-कल्पना का अभ्यास आणव उपाय है । इनमें से किसी एक के अभ्यास से प्राप्त होने वाली एकाग्रता को आणव समावेश दशा कहते हैं । अणु अर्थात् परिमित प्रमाता परिमित स्वरूप वाले बुद्धि, प्राण, देह, देश, प्रभृति को उपाय के रूप में स्वीकार करता है, इसलिये इसको आणव उपाय कहा जाता है। इनमें से ध्यान बुद्धि का व्यापार है । प्राण स्थूल और सूक्ष्म के भेद से दो प्रकार का होता है । स्थूल प्राण का व्यापार उच्चार है। यह प्राण आदि की वृत्तियों के रूप में प्रकट होता है । सूक्ष्म प्राण को वर्ण शब्द से कहा जाता है । शरीर के अंगों को किसी विशेष प्रकार की स्थिति में १. धारणा संख्या ४२,८९,९२ देखिये । २. धारणा संख्या १०५ देखिये । ३, धारणा संख्या ४०,४५-५० देखिये ४. धारणा संख्या ६०-६३ द्रष्टव्य । ५. धारणा संख्या ५९ द्रष्टव्य । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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( १६ ) रखने का नाम करण है। घट-स्थापन, मण्डल-निर्माण, मंदिर, मूर्ति, चित्र आदि की रचना जैसी विधियों का समावेश स्थान-कल्पना में होता है। अपि च, सगुण स्वरूप में चित्त की एका- ग्रता को ध्यान कहते हैं। १प्राण, अपान आदि वायु की श्वास-प्रश्वास, क्षुत्२ (छींक) प्रभृति वृत्तियाँ उच्चार३ कहलाती हैं। प्राण के उच्चार के साथ स्वाभाविक रूप से उच्चरित होने वाले४ सकार और हकार वर्ण कहे जाते हैं। ये सभी वर्णों और मन्त्रों का बोध कराते हैं। अथवा वर्ण शब्द ५काले-पीले आदि रंगों का भो बोधक है। त्रिशिरोभैरव के आधार पर तन्त्रालोक (भा० ३, आ० ५, पृ० ४३८-४४३) में करण के सात भेद बताये गये हैं। इनके नाम हैं—ग्राह्य,६ ग्राहक, संवित्ति, ७संनिवेश, व्याप्ति,८ आक्षेप और त्याग। तन्त्रालोक के १६ वें आह्निक में ग्राह्य और ग्राहक का, ११ वें आह्निक में संवित्ति का, १५ वें आह्निक में व्याप्ति का, २९ वें आह्निक में त्याग और आक्षेप का और ३२ वें आह्निक में संनिवेश (मुद्रा) का विस्तार से वर्णन किया गया है। जिज्ञासु जनों को इनका वहीं अवलोकन करना चाहिये। ९प्राणशक्ति, अर्थात् हृदय के स्पन्दनात्मक सामान्य व्यापार में, शरीर में विद्यमान नाडियों तथा चक्रों में तथा बाहर लिंग, चत्वर, प्रतिमा प्रभृति में स्थान-कल्पना की विधि संपन्न की जाती है। सामान्य स्पन्द तत्त्व के उन्मेष के बाद ही उनमें षडध्व का स्फुरण होता १ प्राण और अपान की श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया पर १-४, २८-२९, ४१ धारणाएँ वर्णित हैं। २. धारणा संख्या ९२ का क्षुत् प्रभृति से संबन्ध है। ३. स्वच्छन्दतन्त्र की टीका (प० ७, पृ० ३०६) में क्षेमराज ने किसी मुद्रा (करण) या बन्ध में बैठकर मन्त्र के जप करने को उच्चार बताया है (उच्चारः करणबन्धादिपूर्व मन्त्रो- दीरणम्)। ४. इस स्थिति को अजपा जप कहा गया है। प्राणापान अथवा प्राणशक्ति से संबद्ध धार- णाओं में इसकी अनुभूति होती है। पृ० २७, ४५, ७६, ९१-९२, १६६-१७३ में इस विषय पर पर्याप्त विचार किया गया है। ५. धारणा संख्या ६३ में कृष्ण वर्ण की भावना वर्णित है। तिमिर भावना (६०-६२ धार- णाएँ) का भी इसी में समावेश किया जा सकता है। बौद्ध योगशास्त्र में कसिण भावना के अन्तर्गत नील, पीत प्रभृति कसिणों का उल्लेख मिलता है। द्रष्टव्य—बौद्ध-धर्म-दर्शन, पृ० ७६। ६. धारणा संख्या ८१ द्रष्टव्य। इस धारणा का उल्लेख विज्ञानभैरव के ही श्लोक में सामान्य सा परिवर्तन कर योगवासिष्ठ (नि० पृ० ४३१८) में भी किया गया है। ७. धारणा संख्या ३, ८, १३-१४, ५२-५८, ८८ द्रष्टव्य। ८. धारणा संख्या २४, ३०, ३९, ७९-८०, ८२-८५, ९०-९१, ९३, ९८, ११०-११२ द्रष्टव्य। ९. धारणा संख्या ५-८, १०, ३१, ४३-४४ द्रष्टव्य।

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( १७ ) है। कार्यकारण स्थल में क्रम से और कुहनप्रयोग (इन्द्रजाल से निर्मित पदार्थ) आदि में अक्रम से सभी पदार्थों की कलना करने वाला परमेश्वर का काल नामक स्वरूप सबसे पहले भासित होता है। भगवान् का स्वरूप भेदावस्था में काली शक्ति और भेदावस्था में प्राणशक्ति के नाम से जाना जाता है। संवित्स्वरूपा काली शक्ति में अपनी इच्छा से क्रम और अक्रम रूप से नाना रूपों में भासित होने के लिये क्रिया शक्ति का उन्मेष होता है। इस क्रिया शक्ति का प्रथम उन्मेष प्राण व्यापार है। 'प्राक् संवित् प्राणे परिणता' कल्लट के इस वचन में यही बात प्रतिपादित है। यह प्राणशक्ति अपने प्राण, अपान आदि पाँच रूपों में जीव को आप्यायित किये रहती है। इसी के रहने पर यह चेतन कहलाता है। इस क्रिया शक्ति के पूर्व भाग में कालाध्वा और उत्तर भाग में देशाध्वा की स्थिति है। कालाध्वा में पर, सूक्ष्म और स्थूल रूप वर्ण, मन्त्र और पद की तथा देशाध्वा में कला, तत्त्व और भुवन की स्थिति है। शब्द और अर्थ स्वरूप शिव और शक्ति में व्याप्यव्यापक भाव से पर, सूक्ष्म और स्थूल रूप से विद्यमान वर्ण, पद, मन्त्र और कला, तत्त्व, भुवन नामक षडध्व का विवेचन हम ५५-५६ संख्या के श्लोकों की व्याख्या में कर चुके हैं। इस तरह से प्रक्रिया भेद से यहाँ देशाध्वा और कालाध्वा के रूप में षडध्व का प्रतिपादन किया गया है। यह सारा षडध्वात्मक जगत् इस क्रिया शक्ति का ही उन्मेष है। सारे षडध्वात्मक जगत् में बाहर-भीतर सब जगह प्राणशक्ति का स्पन्द सतत प्रवृत्त है, तो भी हृदय प्रभृति स्थानों में ही इसके स्फुरण की अनुभूति होती है। १प्राणशक्ति के स्फुरण में ईश्वर की शक्ति, जीव की शक्ति और उसका प्रयत्न इन तीनों की उपयोगिता है। हृदय प्रभृति स्थानों में स्पन्दमान इस प्राणशक्ति में चित्त को विलीन कर देना भी स्थान-कल्पना नामक आणव उपाय का अंग है। इसी तरह से शरीर के भीतर विद्यमान नाडी, चक्र प्रभृति स्थानों में और लिंग, चत्वर, प्रतिमा आदि में चित्त को नियोजित करना भी स्थान-कल्पना के अन्तर्गत है। वस्तुतः बुद्धि, प्राण देह प्रभृति की कोई पारमार्थिक सत्ता नहीं है। ये सब विक- ल्पात्मक हैं। तो भी इनके सहारे २परमार्थ स्वरूप तक पहुँचा जा सकता है। इन विकल्पात्मक स्थूल उपायों को ही यहाँ आणव उपाय कहा गया है। शाक्त उपाय सत्तर्क, सदागम और सद्गुरु की सहायता से जब साधक उक्त उच्चार, करण प्रभृति विकल्प व्यापारों का शोधन कर लेता है, अर्थात् इन सब में स्वात्मस्वरूप का ही दर्शन करने लगता है, तो उसके चित्त में विश्वाहन्ता का विकास होता है। वह जान जाता है कि यह सारा विश्व मेरा ही स्वरूप है, मेरा शुद्ध स्वात्मस्वरूप तो इससे भी परे है। इस तरह १. धारणा संख्या ११२ द्रष्टव्य । २. अपारमार्थिकेऽप्यस्मिन् परमार्थः प्रकाशते । (तन्त्रा० ५।७) बुद्धौ प्राणे तथा देहे देशे वा जडता स्थिता । तां तिरोधाय मेधावी संविद्रश्मिमयो भवेत् ॥ (तन्त्रा० ५।१० विवेक में उद्धृत)

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( १८ ) सर्वात्म्य भावना के सहारे साधक के चित्त में शुद्ध¹ विकल्पों की सृष्टि होने लगती है, अर्थात् वह सभी जागतिक पदार्थों को अपने शुद्ध स्वरूप से पृथक् नहीं देखता, उन सब में अपने शुद्ध स्वरूप की ही भावना करता है । शाम्भव उपाय यह सारा जगत् शिवमय है, विज्ञानभैरव स्वरूप है । यह जगत् बोधगगन में उसी प्रकार प्रकाशित हो रहा है, जैसे कि दर्पण में मुँह का प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है । जिसकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है और जो किसी दूसरे पदार्थ में संक्रान्त होकर ही प्रकाशित होता है, उसको प्रतिबिम्ब² कहते हैं । जैसे कि दर्पण आदि में दिखाई पड़ने वाली प्रतिकृति की कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है और दर्पण आदि में संक्रान्त होने पर वह दिखाई पड़ती है । बिम्ब की स्वतन्त्र सत्ता होती है । यह बिना किसी की सहायता के प्रकाशित होता है । जैसे कि मुख स्वयं भासित होता है । इसको प्रकाशित करने के लिये दर्पण जैसे पदार्थ की आवश्यकता नहीं पड़ती । यह विश्व भी दर्पण में प्रतिबिम्बित नगरी के समान शिवमय दर्पण में भासित हो रहा है । यहाँ एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि दर्पण में भासित हो रहा प्रतिबिम्ब (मुख की प्रतिकृति) बिना बिम्ब (मुख) के प्रकाशित नहीं होता । इसी तरह से दर्पणस्थानीय शिव में प्रकाशित हो रहे प्रतिबिम्बस्थानीय इस जगत् के बिम्ब की भी सत्ता होनी चाहिये । आप यह बताइये कि यह बिम्बस्थानीय पदार्थ क्या है ? शास्त्रकारों ने इसका उत्तर यह दिया है कि वस्तु के स्वभाव के संबन्ध में प्रश्न करना व्यर्थ है । आग गरम होती है । पानी ठंडा होता है । यह इनका स्वभाव है । इस तरह से शिव का यह स्वभाव है कि वह अपने में ही अपने विज्ञानमय स्वरूप को जगत् के रूप में भासित होने देता है । ईश्वर की स्वातन्त्र्य शक्ति का ही यह सारा खेल है कि शिवमय दर्पण में बिना किसी बिम्ब की सत्ता के भी यह जगत् रूपी प्रतिबिम्ब भासित होता है । इस दृष्टि से विचार करने पर शिव के निर्विकल्प स्वरूप के अतिरिक्त इस जगत् की कोई वास्तविक सत्ता नहीं है । इस निर्विकल्प शून्य³ स्थिति में अपने चित्त को समाहित करने का प्रयास ही शाम्भव उपाय है । त्रिविध समावेश इन तीनों उपायों के उदाहरण के रूप में २४ वें श्लोक की छः प्रकार की व्याख्या की गई है । उनको और यथास्थान दी गई टिप्पणियों को देखने से इन उपायों के स्वरूप को १. धारणा संख्या ३९, ७०-७६, ९७ द्रष्टव्य । २. तन्त्रसार में अभिनवगुप्त ने प्रतिबिम्ब का लक्षण यह किया है—‘‘यद भेदेन भासितु- मशक्तमन्यव्यामिश्रत्वेनैव भाति तत् प्रतिबिम्बम्, मुखरूपमिव दर्पणे’’ (पृ० १०) । तन्त्रा- लोक में बिम्ब का लक्षण इस प्रकार है—‘‘अन्यामिश्रं स्वतन्त्रं सद्भासमानं मुखं यथा’’ (३।५३) । ३. धारणा संख्या ३६, ८४-८५, ८७, १०१-१०८, ११०-११२ देखिये ।

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( १९ ) समझने में सहायता मिलेगी । इन उपायों का सहारा लेकर साधक आणव, शाक्त और शाम्भव स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है । भगवद्गीता (९।२३ तथा १२।३-५) में बताया गया है कि अन्य देवताओं की उपासना करने से और अक्षर ब्रह्म की उपासना करने से भी भगवत्पद की ही प्राप्ति होती है, किन्तु इनमें अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है । इसी तरह से आणव प्रभृति विभिन्न उपायों का सहारा लेने पर भी साधक को एक ही परम पद की प्राप्ति होती है । फल की प्राप्ति में कोई भेद नहीं रहता । उपायों के अनुष्ठान में ही तरतमभाव रहता है । उपायों की भिन्नता में शक्तिपात के तीव्र, मध्य, मन्द आदि भेदों को ही कारण माना जाता है । ऐसा कहा जा सकता है कि मन्द शक्तिपात होने पर आणव उपाय का, मध्य शक्तिपात में शाक्त उपाय का और तीव्र शक्तिपात में शाम्भव उपाय का सहारा लेने में साधक समर्थ हो जाता है । इन सबका प्रयोजन स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित होना है । अनुपाय प्रक्रिया से भी वही स्वात्मस्वरूप प्रकाशित होता है और आणव उपाय से भी । इस प्रकार आलम्बन का भेद होने पर भी समावेश दशा में कोई भेद नहीं रहता । आणव समावेश, शाक्त समावेश और शाम्भव समावेश दशा एक ही है । उपायों के भेद के कारण समावेश दशा में भेद आरोपित कर लिया जाता है । इसी अभिप्राय को व्यक्त करते हुए अभिनवगुप्त ने तन्त्रसार (पृ० ४३) में कहा है— नैषां परफलविधौ कापि हि भिदा । अनुपाय प्रक्रिया अनुपाय पद की निरुक्ति हम व्याख्या (पृ० ३) में कर चुके हैं । वहाँ यह भी बता चुके हैं कि सिद्ध साहित्य में प्रचलित 'सहज' शब्द को हम अनुपम शब्द का पर्याय मान सकते हैं । किन्तु इस कथन को सिद्ध करने के लिये प्रमाण अपेक्षित हैं । तन्त्रसार (पृ० ८-९) में अनुपाय प्रक्रिया का विवेचन इस तरह से किया गया है—तीव्र शक्तिपाद के होने पर साधक गुरु के एक बार के उपदेश से ही नित्योदित समावेश दशा में लीन हो जाता है । उपाय के रूप में वह षडंग १ योग में प्रतिपादित तर्क नामक अंग का सहारा लेता है । वह सोचता है कि स्वयंप्रकाश स्वात्मस्वरूप ही तो परमेश्वर है । इसके लिए किसी उपाय की क्या आवश्यकता है ? यह स्वात्मस्वरूप नित्य, स्वयं-प्रकाश, निरावरण तत्त्व है । इसलिये किसी उपाय से इसके स्वरूप की प्राप्ति (लाभ) या प्रतीति (ज्ञप्ति) होगी, अथवा किसी आवरण को हटाया जायगा, इन सब बातों का कोई प्रसंग नहीं है । इस स्वात्म- स्वरूप में लीन (अनुप्रवेश) होने का भी कोई प्रसंग नहीं है, क्योंकि शुद्ध स्वात्मस्वरूप के अतिरिक्त उसमें प्रविष्ट होने वाले की अलग से कोई सत्ता नहीं है । फिर उपाय भी तो उससे अलग नहीं हैं । इसलिए यह सारा जगत् चिन्मात्र सार है। काल इसकी कलना नहीं कर सकता । देश इसको परिच्छिन्न नहीं कर सकता । उपाधि इसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती । इसकी कोई आकृति नहीं है । शब्दों की सहायता से इसको समझा नहीं जा सकता और न किसी प्रमाण की १. षडंग योग और तर्क का परिचय आगे दिया जा रहा है ।

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( २० ) ही यहाँ प्रवृत्ति हो सकती है। स्वतन्त्र, आनन्दघन यह स्वात्मस्वरूप ही काल से लेकर प्रमाण पर्यन्त ऊपर बताये गये सभी तत्त्वों को स्वरूप प्रदान करने वाला है। मैं इस स्वात्मस्वरूप से भिन्न नहीं हूँ और इस अहमात्मक स्वात्मस्वरूप में ही यह सारा विश्व प्रतिबिम्बित हो रहा है। इस तरह की प्रत्यभिज्ञा के जाग्रत् होने पर साधक नित्योदित पारमेश्वर स्वरूप में समा-¹ विष्ट हो जाता है। इसके लिये मन्त्र, पूजा, ध्यान, चर्या आदि की कोई आवश्यकता नहीं रहती ! इस प्रकरण का उपसंहार अभिनवगुप्त ने इस श्लोक के साथ किया है— उपायजालं न शिवं प्रकाशयेद् घटेन किं भाति सहस्रदीधितिः । विवेचयन्नित्यमुदारदर्शनः स्वयंप्रकाशं शिवमाविशेत् क्षणात् ॥ इसकी व्याख्या हम पृ० १३५ पर कर चुके हैं। श्लो० १२०-१२१ की व्याख्या में मालिनीविजय प्रभृति ग्रन्थों के प्रमाण पर इस अनु- पाय प्रक्रिया का विशद विवेचन किया गया है। स्वच्छन्दतन्त्र, संकेतपद्धति, तन्त्रालोक, महार्थमंजरी प्रभृति अनेक ग्रन्थों में इसका प्रतिपादन किया गया है। आगे हम यह सिद्ध करने का प्रयास करेंगे कि उपक्रम, उपसंहार प्रभृति षड्विध लिंग की मीमांसक पद्धति से इस शास्त्र का विनियोग अनुपाय प्रक्रिया के प्रतिपादन में ही है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि यह अनुपाय प्रक्रिया सहज योग से भिन्न नहीं है। अभिनवगुप्त प्रभृति ने इन उपायों का जिस तरह का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया है, उसके आधार पर हम यह कह सकते हैं कि उन्होंने आणव उपाय में क्रम और कुल दर्शन से भिन्न समस्त तान्त्रिक और यौगिक विधियों का समावेश किया है। शाक्त उपाय के रूप में क्रमदर्शन की, शाम्भव उपाय के रूप में उन्होंने कुलदर्शन की व्याख्या की है और प्रत्यभिज्ञा दर्शन को अनुपाय प्रक्रिया माना है। हमने ऊपर बताया था कि यहाँ प्रदर्शित सभी धारणाओं का उक्त उपाय-चतुष्टय में समावेश किया जा सकता है, किन्तु इस ग्रन्थ में अन्य अनेक योग-विधियों का भी समावेश है। उपर्युक्त प्रतिपादन से हमारी यह बात पुष्ट हो जाती है। अब हम विज्ञानभैरव में वर्णित धारणाओं के प्रमुख विषयों का यहाँ वर्णन करना चाहते हैं। सबसे पहले हम प्राणशक्ति को लेते हैं। प्राणशक्ति या प्राणकुण्डलिनी अनच्क पद की और आणव उपाय की व्याख्या के प्रसंग में प्राणशक्ति के सम्बन्ध में कहा जा चुका है। इसको कुण्डलिनी इसलिये कहते हैं कि मूलाधार स्थित कुण्डलिनी की तरह इसकी भी आकृति कुटिल होती है। जिस प्राण वायु का अपान अनुवर्तन करता है, उसकी गति १. धारणा संख्या ४१, ९७-९९, १०९ देखिये ।

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( २१ ) हकार की लिखावट की तरह टेढ़ी-मेढ़ी होती है । अतः प्राणशक्ति अपनी इच्छा से ही प्राण के अनुरूप कुटिल (घुमावदार) आकृति धारण कर लेती है । प्राणशक्ति की यह वक्रता (कुटिलता= घुमावदार आकृति) परमेश्वर की स्वतन्त्र इच्छा-शक्ति का ही खेल है। प्राणशक्ति का एक लपेटा वाम नाडी इडा में और दूसरा लपेटा दक्षिण नाडी पिंगला में रहता है । इस तरह से उसके दो वलय (घेरे) बनते हैं । सुषुम्णा नाम की मध्य नाडी सार्ध कहलाती है । इस प्रकार यह प्राण- शक्ति भी सार्धत्रिवलया है । वस्तुतः मूलाधार स्थित कुण्डलिनी में भी प्राणशक्ति का ही निवास है, किन्तु हृदय में उसकी स्पष्ट अभिव्यक्ति होने से ब्राह्मणवशिष्ठ न्याय से उसका यहाँ पृथक् उल्लेख कर दिया गया है । इसका प्रयोजन अजपा (हंस गायत्री) जप को सम्पन्न करना है । इस विषय पर ग्रन्थ में विशेष कर १५१ वें श्लोक की व्याख्या में पर्याप्त लिखा जा चुका है । भर-पेट भोजन-पानी पाने से मोटी अकल के आरामतलबी आदमी का शरीर ही नहीं, प्राणशक्ति भी मोटी हो जाती है । बाद में सद्गुरु का उपदेश पाकर जब वह योगाभ्यास में लग जाता है, कुम्भक प्रभृति प्राणायामों का अभ्यास करता है, तो धीरे-धीरे उसके शरीर के मोटापे के साथ ही प्राणशक्ति भी कृश होती जाती है, सूक्ष्म से सूक्ष्मतर हो जाती है । श्रोत्र, चक्षु, नासिका, मुख, गुह्य, उपस्थ प्रभृति प्राण और अपान आदि वायुओं के निकलने के मार्गों को रोक देने पर वायु की गति ऊपर की ओर उठने लगती है । मूलाधार में अथवा हृदय में विद्यमान प्राणशक्ति यौगिक पद्धति के अनुसार सुषुम्णा मार्ग से अथवा मध्यदशा के विकास के कारण द्वादशान्त तक जाते-जाते अत्यन्त सूक्ष्म होकर अन्त में प्रकाश में विलीन हो जाती है । आधार से लेकर द्वादशान्त पर्यन्त क्रमशः धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठ रही इस प्राणशक्ति के द्वादशान्त में प्रविष्ट हो जाने पर स्वात्मस्वरूप का अनुभव होने लगता है । योगशास्त्र की परिभाषा में इसको १ पिपीलस्पर्श वेला कहा जाता है, जिसमें कि प्राण के ऊपर उठते समय जन्माग्र से लेकर मूल, कन्द प्रभृति स्थानों का स्पर्श होने पर उसी तरह की अनुभूति होती है, जैसी कि देह पर चींटी के चलने से होती है । इसी अवस्था में योगी इसकी परीक्षा कर पाते हैं कि प्राण आज अमुक स्थान से चलकर अमुक स्थान तक उठा । इस स्थिति तक पहुँच जाने पर योगी का चित्त परम आनन्द से भर जाता है और वह इसी अन्तर्मुख वृत्ति में रम जाता है । सुषुम्णा (मध्यधाम) मध्यनाडी सुषुम्णा २ की अभी चर्चा आई है । इसी को शून्यातिशून्य पदवी और १. धारणा संख्या ४३ देखिये । २. तन्त्रालोक (५।१२१) में आणव उपाय के प्रसंग में लिंग पद की व्याख्या की गई है । इसकी व्याख्या करते हुए जयरथ ने एक श्लोक उद्धृत किया है, जिसके अनुसार उपस्थ को सौषुम्न पद माना गया है— आनन्दस्यन्दि यद् गीतं सर्वप्रसवकारणम् । उपस्थाख्येयमेतत्तु सौषुम्नं रूपमुच्यते ॥

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( २२ ) मध्यधाम कहा जाता है । वस्तुतः मध्यधाम सुषुम्णा को शून्य और शिवतत्त्व को शून्यातिशून्य कहते हैं । मध्यधाम या मध्यदशा को शून्यस्वभाव इसलिये कहा जाता है कि यहाँ ज्ञाता-ज्ञान- ज्ञेय, प्रमाता-प्रमाण-प्रमेय प्रभृति त्रिपुटियों की कोई सत्ता नहीं बची रहती । मध्यधाम के लिए शून्यातिशून्य शब्द का प्रयोग लाक्षणिक है । इसका मुख्य प्रयोग शिवतत्त्व और उसकी अभिव्यक्ति के स्थान द्वादशान्त के लिए ही किया जाता है । सुषुम्णा नामक मध्यनाडी शून्यातिशून्य धाम द्वादशान्त में जाकर लीन हो जाती है, अतः इसको भी शून्यातिशून्य धाम कह दिया जाता है । इस शून्यातिशून्य स्वभाव मध्यधाम में विश्रान्ति ही योगी के लिए उपेय (प्राप्तव्य) है । हृदय के मध्य में इसका निवास है । यह कमलनाल में विद्यमान अत्यन्त सूक्ष्म तन्तुओं के समान कृश आकार वाली है । इस मध्यनाडी के भीतर चिदाकाशरूप शून्य का निवास है । उससे प्राणशक्ति निकलती है । साधक जब मध्यनाडी की सहायता से चिदाकाश में प्रविष्ट होता है, तब सोम और सूर्य अर्थात् अपान और प्राण अथवा मन और प्राण सुषुम्णा में अपने आप विलीन हो जाते हैं । प्राण और अपान के मध्यवर्ती धाम सुषुम्णा (मध्यनाडी) में जिसका आन्तर और बाह्य इन्द्रियचक्र (मन और उससे नियन्त्रित चक्षुरादि इन्द्रियाँ) लीन हो जाता है और जो ऊर्ध्व स्थान और अधर स्थान में विद्यमान पद्मों के संपुट के मध्य में भावना के बल से प्रविष्ट हो गया है, अर्थात् ऊर्ध्वगत प्रमाणरूपी पद्म और अधःस्थित प्रमेय रूपी पद्म के मध्य में चिन्मात्र प्रमाता के अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है और इसीलिए चिन्मात्रता के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु में जिसका चित्त संलग्न नहीं है, वह योगी स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है । यहाँ प्रमेय रूप संसार का निमेष और उन्मेष व्यापार पद्मदल के संकोच और विकास के तुल्य है । इसीलिये इसकी पद्मसंपुट से तुलना की गई है । मध्यविकास प्राण और अपान के आधारभूत स्थान आन्तर आकाश हृदय और बाह्य आकाश द्वादशान्त में प्रत्यावृत्ति के अभाव में एक क्षण के लिये उसकी वृत्ति अन्तर्मुख हो जाती है । तब ऐसी प्रतीति होती है कि मानों प्राण और अपान कहीं विलीन हो गये हैं । इस स्थिति को मध्यदशा के नाम से जाना जाता है । इस मध्यदशा का जब विकास किया जाता है, तब धीरे-धीरे उसकी भेद-दृष्टि (दूसरे से अपने को अलग समझने का स्वभाव) घटती जाती है और उसकी बाह्य और आन्तर इन्द्रियाँ अन्तर्मुख हो जाती हैं । क्रमशः उसका प्राणचार (प्राण और अपान की गति) मध्यनाड़ी सुषुम्णा में लीन हो जाता है और तब परा शक्ति भैरवी से अभिन्न रूप में विद्यमान भगवान् भैरव का स्वरूप प्रकाशित हो उठता है । हृदय, कण्ठ, तालु, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र और द्वादशान्त में प्राण की गति रहती है और हृदय-कमल, मुख का संकोच-विकास तथा द्वादशान्त—ये अपान की गति के स्थान हैं । इनमें एक क्षण के लिए प्राण के अस्त हो जाने पर और अपान का उदय न होने पर बिना प्रयत्न के बाह्य कुम्भक की प्राप्ति होती है । इसी तरह से एक क्षण के लिए अपान के अस्त हो जाने पर और Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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( २३ ) प्राण का उदय न होने पर बिना प्रयत्न के अन्तः कुम्भक की प्राप्ति होती है। यह मध्यदशा ही परम पद कहलाती है। प्राण-अपान की इस मध्यदशा को योगी ही जान सकते हैं। एक त्रुटि, लव अथवा क्षण के लिये भी अन्तर्मुख हो जाने पर योगी में इस मध्यदशा का विकास हो जाता है और तब प्राण और अपान की पुनः प्रत्यावृत्ति नहीं होती, अर्थात् वह मुक्त हो जाता है। यह प्राणात्मक और अपानात्मक शक्ति हृदय से द्वादशान्त तक न तो जायगी और न द्वादशान्त से हृदय की ओर वापस ही लौटेगी, जब कि मध्यनाडी का धाम (स्थान) विकल्प हानि रूप उपाय से विकसित कर दिया जाय। प्राण और अपान की गति के शान्त हो जाने से, हृदय और द्वादशान्त में प्राण और अपान की अस्पन्द अवस्था में स्थिति हो जाने से १मध्यदशा का विकास होने पर साधक अपने भैरवीय स्वरूप को पहचान लेता है। वह साक्षात् भैरव हो जाता है। ६७वें श्लोक की व्याख्या में इस विषय को अधिक विस्तार से समझाया है। प्रत्यभिज्ञाहृदय के १८वें सूत्र में विकल्पक्षय प्रभृति मध्यविकास के उपाय बताये गये हैं। स्पन्दकारिका में उन्मेष दशा के नाम से इसका वर्णन किया गया है। ग्रन्थ में अनेक स्थलों पर इसकी व्याख्या हो चुकी है। द्वादश आधार तन्त्रशास्त्र में ऋ ॠ ऌ ॡ ये चार स्वर षण्ढ (नपुंसक) कहे गये हैं, अतः ध्यान आदि में इनका उपयोग नहीं किया जाता। सोलह स्वरों में से इन चार षण्ढ स्वरों को निकाल देने पर इनकी संख्या १२ रह जाती है। इन बारह स्वरों की जन्माग्र, मूल, कन्द, नाभि, हृदय, कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट, २ब्रह्मरन्ध्र, शक्ति और व्यापिनी—इन बारह चक्रों या आधारों में भावना करनी चाहिये। इन्हीं बारह स्थानों में अन्य धारणाओं का भी विधान है। किन्तु इनके नामों में अन्तर मिलता है। जैसे कि पृ० ३७ पर जन्माग्र और मूल शब्द के स्थान पर गुदाधार और जन्म ये नाम मिलते हैं, किन्तु पृ० ७२ पर जन्माग्र, मूल, कन्द यही क्रम स्वीकृत है। पृ० ३३ पर हृदय से या जन्माधार से द्वादशान्त पर्यन्त प्राणशक्ति की गति मानी गई है, पृ० ३३ पर ही कन्द से ब्रह्मरन्ध्र तक, पृ० ३५ पर जन्माग्र से द्वादशान्त तक और पृ० ७२ पर आधार से द्वादशान्त तक प्राण की गति मानी गई है। इनमें जन्माग्र और जन्म तथा मूल और गुदाधार शब्द पर्यायवाची हैं। नेत्रतन्त्र (७।१-५) की व्याख्या में क्षेमराज ने अंगुष्ठ, १. मध्यमधाम (सुषुम्णा) में मध्यदशा के विकास के लिये १२, २५-२७ संख्या की धारणाएँ देखनी चाहिये। मध्यदशा का विकास अन्य स्थितियों में भी होता है। इसके लिये ३७-३८, ५१, ७८, १०० धारणाएँ देखिये। २. प्रस्तुत ग्रन्थ में द्वादश आधारों में ब्रह्मरन्ध्र को दसवां स्थान दिया गया है और द्वादशान्त की स्थिति इन सबके ऊपर है। व्याख्या में पृ० ३६ और ४५ पर ब्रह्मरन्ध्र पद को द्वादशान्त का पर्यायवाची मान लिया गया है। इसकी संगति सम्प्रदाय भेद से बैठाई जा सकती है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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( २४ ) गुल्फ, जानु, मेढ्र, पायु, कन्द, 'नाडि, जठर, हृदय, कूर्मनाडी, कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र और द्वादशान्त ये सोलह आधार गिनाये हैं। इनके अनुसार जन्माग्र या जन्म मेढ्र का तथा मूल या गुदाधार पायु का पर्यायवाची है। योगिनीहृदय के टीकाकार अमृतानन्द (पृ० ५९) और भास्करराय ने कन्द को सुषुम्णा नाडी का मूल स्थान और उसमें रहने वाली कुण्डलिनी शक्ति का पर्यायवाची माना है। ब्रह्मरन्ध्र के ऊपर यहाँ शक्ति और व्यापिनी का स्थान माना गया है। योगिनीहृदय (१।२५-३४) में अकुल, विष, वह्नि, शक्ति, नाभि, अनाहत (हृदय), विशुद्धि, लम्बिकाग्र, भ्रूमध्य (आज्ञा) के ऊपर ललाट में क्रमशः एक दूसरे के ऊपर बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिनी, समना और उन्मना की स्थिति मानी गई है। शिवोपाध्याय ने इस विषय को अधिक स्पष्ट किया है। प्रणव की बारह कलाओं की स्थिति बताते हुए वे कहते हैं कि अकार की नाभि में, उकार की हृदय में, मकार की मुख में, बिन्दु की भ्रूमध्य में, अर्धचन्द्र की ललाट में, निरोधिनी की ललाट के ऊर्ध्व भाग में, नाद को शिर में, नादान्त की ब्रह्मरन्ध्र में, शक्ति की त्वक् में, व्यापिनी की शिखा के मूल में, समना की शिखा में और उन्मना की स्थिति शिखा के अन्तिम भाग में है। शिवो- पाध्याय ने यहाँ (पृ० ३७) सोलह भूमियों का उल्लेख किया है। ऊपर गिनाये गये सोलह आधारों से इनकी कोई संगति नहीं बैठती। कुलागम संमत सोलह आधारों की चर्चा ६७वें श्लोक में आई है। इनका विस्तृत वर्णन भी नेत्रतन्त्र (७।१-५) की क्षेमराज कृत व्याख्या में मिलता है। नामों में भिन्नता होते हुए भी इनका क्रम योगिनीहृदय से मिलता है। अधिक जानकारी के लिये इस विषय को वहीं देखना चाहिये। द्वादशान्त प्राण और अपान की गति की जिस स्थान पर उत्पत्ति होती है अथवा जहाँ जाकर रुक जाती है, उसको हृदय और द्वादशान्त कहते हैं। बाह्य और आन्तर शिव द्वादशान्त और शक्ति द्वादशान्त के भेद से द्वादशान्त की स्थिति मानी गई है। कभी-कभी शून्यातिशून्य मध्यधाम, अर्थात् सुषुम्णा नाडी को भी द्वादशान्त कहा जाता है। जैसा कि ४९वें श्लोक की व्याख्या में किया गया है। तन्त्रालोक (५।७१) की टीका में २सभी नाड़ियों के अग्र भाग में १. नाडि के स्थान पर नाभि शब्द अधिक संगत प्रतीत होता है। अथवा नाभि सभी नाड़ियों का केन्द्र स्थल है, अतः इसी अभिप्राय को व्यक्त करने के लिये यहाँ नाभि को नाडि शब्द से अभिहित किया गया है। २. "सर्वनाडीनामग्रगोचरे प्रधाने पार्यन्तिके वा विषये द्वादशान्ते।" द्वादशान्त पद की व्याख्या करते हुए शिवोपाध्याय कहते हैं—"सर्वतो रोमकूपान्तरेष्वपि चैतन्यदेवस्य प्रवेशेन शरीरे द्वादशान्तो योऽस्ति" (पृ० ४३) इसके अनुसार शरीर के प्रत्येक रोम- कूप में द्वादशान्त की स्थिति मानी गई है। यहाँ द्वादशान्त पद का प्रयोग लाक्ष- णिक है। जैसे मुख्य द्वादशान्त की स्थिति द्वादश आधारों के अन्त में है, इसी तरह सभी नाड़ियों के अन्त (रोमकूप) में भी प्राणशक्ति की स्थिति है। अतः यहाँ विद्यमान प्राण- शक्ति को भी द्वादशान्त कह दिया जाय तो कोई अनौचित्य नहीं है।

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( २५ ) द्वादशान्त की स्थिति मानी गई है । १हकार की उत्पत्ति हृदय में और सकार की उत्पत्ति द्वादशान्त में मानी जाती है । हृदय स्थित कमलकोश में प्राण का उदय होता है । नासिका मार्ग से बाहर निकल कर यह बारह अंगुल चल कर अन्त में आकाश में विलीन हो जाता है । इसी लिये बाह्य आकाश योगशास्त्र में द्वादशान्त के नाम से प्रसिद्ध है । द्विषट्कान्त, मुष्टित्रयान्त या शिखान्त शब्द द्वादशान्त के पर्यायवाची हैं । नेत्रतन्त्र (८।४१) की टीका में क्षेमराज ने तथा तन्त्रालोक (५।८९-९१) की टीका में जयरथ ने द्वादशान्त पद का अर्थ ऊर्ध्व द्वादशान्त किया है, जिसकी कि स्थिति शिखा के अन्त में है । इसमें उन्मना शक्ति का निवास है । इस प्रकार इस शास्त्र में द्वादशान्त की स्थिति ब्रह्मरन्ध्र से पृथक् मानी गई है । इसको द्वादशान्त इस लिये कहते हैं कि द्वादश आधारों के अन्त में इसकी स्थिति है । निर्विकल्प योगी द्वादशान्त के भी ऊपर स्थित परमाकाश में जब पहुँच जाता है, तो सर्वात्मता का विकास हो जाता है, वह अनुत्तर शून्य में लीन हो जाता है । योगिनीहृदय (१।२७, ३४) में इसको महाबिन्दु कहा गया है । वहां आज्ञाचक्र तक की स्थिति को सकल, उन्मना पर्यन्त स्थिति को सकल-निष्कल और महाबिन्दु को निष्कल माना गया है । इस निष्कल स्वरूप में भगवती त्रिपुरसुन्दरी निवास करती है । यही वह शक्ति तत्त्व है, जिसकी कि सहायता के बिना शिव निष्प्राण (शव) रहता है । इसी निष्कल स्वरूप को प्रस्तुत ग्रन्थ में पराशक्ति और शिव का मुख कहा गया है । इस निष्कल (परा) शक्ति की सहायता से ही शिव स्वरूप की अभिव्यक्ति हो सकती है । प्राण और अपान ऊपर हृदय से बाह्य द्वादशान्त तक जाने वाला प्राण और नीचे बाह्य द्वादशान्त से हृदय तक आने वाला जीव नामक अपान, यह प्राणशक्ति का उच्चारण है । प्राणशक्ति इनका निरन्तर उच्चारण करती रहती है, अर्थात् प्राण और अपान के रूप में स्पन्दित होती रहती है । स्वच्छन्दतन्त्र २ में प्राण और अपान को प्राणशक्ति का विसर्ग और आपूरण व्यापार बताया गया है । तदनुसार प्राण का अर्थ है श्वास छोड़ना और अपान का अर्थ है श्वास लेना । पालि बौद्ध वाङ्मय में इनके लिये आनापान (आश्वास-प्रश्वास) शब्द प्रयुक्त है । किन्तु वहां इनके १. "हकारस्तु स्मृतः प्राणः स्वप्रवृत्तो हलाकृतिः" (४।२५७) स्वच्छन्दतन्त्र के इस वचन में स्वाभाविक रूप से निरन्तर नदन करने वाले हलाकृति प्राण को ही हकार कहा गया है । अनच्क हकार की आकृति वाले प्राण का यह नदन व्यापार ही हंसोच्चार कहलाता है । इसी को अनाहत ध्वनि अथवा नादभट्टारक भी कहा जाता है । यही हृदय का स्वाभाविक स्पन्दन व्यापार है । ५७ वीं धारणा में इसी का वर्णन किया गया है । २. प्राणापानमयः प्राणो विसर्गापूरणं प्रति । नित्यमापूरयन्नेव प्राणिनामुरसि स्थितः ॥ प्राणनं कुरुते यस्मात् तस्मात् प्राणः प्रकीर्तितः । (७।२५-२६)

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( २६ ) अर्थ के विषय में विवाद है, जिसको कि चर्चा पृ० २९-३० की टिप्पणी में की गई है। योगभाष्य में वायु के आचमन (ग्रहण) को श्वास और निःसारण को प्रश्वास बताया गया है। विज्ञान- भैरव में प्राण और अपान शब्द का योगभाष्य संमत (श्वास-प्रश्वास) अर्थ करने से भ्रम हो सकता है। आचार्य बुद्धघोष का कहना है कि बालक माता की कोख से बाहर आता है तो पहले भीतर की हवा बाहर जाती है और पीछे बाहर की हवा भीतर प्रवेश करती है इसके अनुसार आश्वास (आन = प्राण) वह वायु है, जिसका कि निःसारण होता है और प्रश्वास वह वायु है, जिसका कि ग्रहण होता है। विज्ञानभैरव के 'ऊर्ध्वे प्राणः' प्रभृति श्लोक में प्राण और अपान शब्द का यही अर्थ स्वीकृत है। ऊर्ध्व और अधः शब्द का अर्थ पहले और बाद में किया जाना चाहिये। पहले प्राण बाहर निकलता है और बाद में अपान का प्रवेश होता है। अपान को जीव इसलिये कहा जाता है कि प्राण के बाहर निकलने के बाद अपान जब शरीर में पुनः प्रविष्ट होता है, तभी वह बोध हो सकता है कि शरीर में जीवात्मा विद्यमान है। अपान के प्रवेश न करने पर शरीर शव कहा जायगा। अपान के कारण ही शरीर में जीवात्मा की स्थिति बनी रहती है, अतः स्वाभाविक है कि अपान को जीव के नाम से जाना जाय। ऊपर उद्धृत स्वच्छन्दतन्त्र भी इसी स्थिति को मान्यता देता है। "प्राणापानौ समौ कृत्वा" इस गीता वचन में भी यही अर्थ स्वीकृत है। इसका उल्लेख हम पृ० ९२ की टिप्पणी में कर चुके हैं। श्रीधरी टीका में प्राण और अपान के लिये उच्छ्वास और निश्वास शब्द प्रयुक्त हैं। लोक व्यवहार में संकेत (शक्ति=समय) के अनुसार शब्दों के अर्थ बदलते रहते हैं। कभी-कभी ये परस्पर विरोधी अर्थों में भी प्रयुक्त होने लगते हैं। जैसा कि प्राण और अपान और उनके पर्यायवाची श्वास-प्रश्वास शब्दों के सम्बन्ध में यहाँ देखा जाता है। इन शब्दों का हृदय स्थित प्राण वायु और पायु स्थित अपान वायु से कोई सम्बन्ध नहीं है, किन्तु प्राणशक्ति की श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया से इनका सम्बन्ध है। 'प्राणशक्ति की प्राण, १. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकार ने 'प्राणापानमयः प्राणः' (३।२।१९) इत्यादि में प्राण प्रभृति पाँच वायुओं का वर्णन करते हुए प्राण वायु को प्राणापानमय माना है। वस्तुतः यहाँ पर प्राण वायु के लिये प्राण शब्द का प्रयोग लाक्षणिक है, क्योंकि प्राण वायु की स्थिति केवल प्राणापानमय प्राण में है, जब कि प्राणशक्ति की स्थिति पूरे शरीर में है। अथवा सामान्य स्पन्द को प्राणशक्ति का तथा प्राणापान को प्राण वायु का व्यापार मानना उचित होगा। प्राण वायु में भी प्राणशक्ति का आरोप इस लिये किया जा सकता है कि प्राणा- पान व्यापार के चलते रहने पर ही सामान्य स्पन्द भी चलता रहता है। किन्तु इतना ध्यान रखना चाहिये कि प्राणापान व्यापार के आरम्भ होने से पहले और अन्त में भी मुख्य स्पन्द की ही स्थिति रहती है। स्पन्दनिर्णय (पृ० ४०-४१) में बताया गया है कि विज्ञानभैरव के ७०, ९९, और ११६ संख्या के श्लोकों में स्पन्द तत्त्व सम्बन्धी धारणाएं वर्णित हैं।

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( २७ ) अपान प्रभृति पाँच या दस वृत्तियाँ इनसे भिन्न हैं। अतः प्रस्तुत ग्रन्थ में ऊपर उद्धृत प्रमाणों के अनुसार प्राण और अपान शब्दों का संबन्ध प्राणशक्ति की विसर्ग (त्याग) और आपूरण (ग्रहण) क्रियाओं से ही मानना चाहिये । पृ० ९२ पर बताया गया है कि प्राण की उच्छ्वास दशा में स्वाभाविक रूप से हं का तथा निश्वास दशा में सः का उच्चारण होता है। इस बात को पुष्ट करने के लिये 'सका- रेण बहिर्याति' प्रभृति विज्ञानभैरव के श्लोक को उद्धृत किया गया है। तदनुसार यह प्राण सकार के साथ बाहर निकलता है और हकार के साथ अपान पुनः प्रविष्ट होता है। यहाँ प्रश्न उठता है कि हंसगायत्री में विद्यमान सकार प्राण और प्रकाश (सूर्य अथवा दिन) का प्रतिनिधित्व करता है तथा हकार जीव (अपान) तथा क्षपा (रात्रि) का, तो स्वच्छन्दतन्त्र में प्रतिपादित इस स्थिति से संगति कैसे बैठेगी कि प्राण निरन्तर अनाहतनाद रूप अनच्क हकार का उच्चारण (हंसोच्चार) करता रहता है। शक्तिसंगम तन्त्र में "हकारेण बहिर्याति सकारेण विशेत् पुनः" (१ ३.७८) ऐसा पाठ है। इसका उत्तर ८० वें श्लोक की व्याख्या में दे दिया गया है कि खेचरी मुद्रा की साधना में जिह्वा के तालु प्रदेश में रहने से सकार का बहिर्गमन नहीं होने पाता, अर्थात् सकार का उच्चारण नहीं हो सकता। अतः उस अवस्था में केवल स्वर रहित हकार का उच्चारण होता है। इसका अभिप्राय यह है कि नादात्मक अनच्क हकार का उच्चारण प्राणशक्ति का व्यापार है। इसको स्वच्छन्दतन्त्र में हंसोच्चार कहा गया है। हंसगायत्री के अंगभूत सकार और हकार का उच्चारण प्राण वायु की प्राण और अपान शक्तियों का व्यापार है। प्राण के बाहर निकलते समय ही सकार का उच्चारण होता है। इस व्याख्या के अनुसार शक्तिसंगम के वचन की कोई संगति नहीं बैठती। किन्तु १५१ वें श्लोक की व्याख्या में बताया गया है कि मध्यनाडी सुषुम्णा के सहारे प्राण जब हृदयाकाश से ऊपर की ओर चढ़ता है, तब 'हं' वर्ण की उत्पत्ति होती है और जब वह द्वादशान्त से उतरता है, तो उसकी अपान दशा में 'सः' वर्ण उत्पन्न होता है। इस कथन की पृष्ठभूमि में शक्तिसंगम के वचन की संगति इस प्रकार बैठाई जा सकती है कि प्राण हकार के उच्चारण के साथ हृदय से बाहर निकल कर द्वादशान्त में प्रविष्ट होता है और अपान सकार के उच्चा- रण के साथ पुनः हृदय में प्रविष्ट होता है। हंसगायत्री का आध्यात्मिक स्वरूप भी यही है। इसका विवेचन यहाँ अनेक श्लोकों की व्याख्या में विशेष कर १५१ वें श्लोक की व्याख्या में किया जा चुका है। १५२ वें श्लोक में सकार और हकार के संमिलन से महानन्द की उत्पत्ति की बात कही गई है। इसका अभिप्राय यह है कि उक्त प्रक्रिया के अभ्यास से "प्राणापानौ समो कृत्वा" इस भगवद्गीता के वचन के अनुसार प्राण और अपान की गति जब समान हो जाती है, मध्य- नाडी सुषुम्णा के माध्यम से द्वादशान्त में विलीन हो जाती है, तो सच्चिदानन्दघन स्वात्म- ज्योति प्रकाशित हो उठती है। साधक स्वात्मस्वरूप में लीन हो जाता है।

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( २८ ) प्राणायाम प्राण की पूरक, कुम्भक और रेचक अवस्थाएँ स्वाभाविक रूप से बिना प्रयत्न के निरन्तर गतिशील रहती हैं । हृदय स्थित कमलकोश में प्राण का उदय होता है । नासिका मार्ग से बाहर निकल कर यह बारह अंगुल चलकर अन्त में आकाश में विलीन हो जाता है । यह बाह्य आकाश योगशास्त्र में बाह्य द्वादशान्त के नाम से प्रसिद्ध है । प्राण की इस स्वाभाविक गति को रेचक कहते हैं । बाह्य द्वादशान्त में अपान का उदय होता है और नासिका मार्ग से ही चलकर यह हृदय स्थित कमलकोश में विलीन हो जाता है । अपान की यह स्वाभाविक आन्तर गति पूरक कही जाती है। प्राण द्वादशान्त में और अपान हृदय में क्षण मात्र के लिये विलीन हो जाता है । यही प्राण की कुंभक अवस्था है । बाहर और भीतर दोनों स्थलों में निष्पन्न होने से इसके बाह्य और आन्तर ये दो भेद होते हैं । इस तरह से प्राणशक्ति की ये चार क्रियाएँ बिना प्रयत्न के निरन्तर गतिशील हैं । अर्थात् प्राण और अपान की यह चतुर्विध गति पुरुष के प्रयत्न के बिना निरन्तर स्वाभाविक रूप से चलती रहती है । पुरुष जब अपने विशेष प्रयत्न से मध्यदशा के विकास के लिये क्रमशः अथवा एकाएक इसकी गति को रोकता है, इस पर अपना नियन्त्रण स्थापित करना चाहता है, तो प्राण और अपान की गति की यह अवरोध प्रक्रिया योगशास्त्र में प्राणायाम के नाम से जानी जाती है । २५, ६६ और ८८ वें श्लोक की व्याख्या में प्राणायाम के सम्बन्ध में विस्तार से विचार किया गया है । सहज योग में प्राणायाम के इस आयास साध्य अभ्यास की आवश्यकता नहीं रहती । वहाँ तो श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया के माध्यम से निरन्तर चल रहे प्राण के आयाम (विस्तार) का केवल सूक्ष्म निरीक्षण किया जाता है । जैसा कि २५वें श्लोक की व्याख्या में बताया गया है । क्षोभ मन की चंचलता को क्षोभ कहते हैं । ७३वें श्लोक में मन की किसी भी आह्लादात्मक स्थिति में धारणा के अभ्यास की विधि बताई गई है । शर्त यह है कि यह आह्लादात्मक स्थिति क्षोभ से न पैदा हुई हो । शिवोपाध्याय (पृ० ६३) ने क्षोभ दशा का विस्तार से वर्णन किया है । इस स्थिति को हेय माना गया है । स्पन्दकारिका में कहा गया है कि क्षोभ दशा का विराम हो जाने पर ही परम पद की प्राप्ति होती है । काम, क्रोध आदि से उत्पन्न होने वाले सभी आवेग क्षोभ कहलाते हैं । इनके शान्त होने पर ही निर्विकल्प स्वात्मस्वरूप प्रका- शित होता है । क्षोभ की उत्पत्ति विकल्प दशा में ही होती है । विकल्प व्यापार के शोधन के प्रसंग में प्रशस्तिभूतिपाद ने कहा है कि इस संसार में अपनी सुन्दर, लुभावनी आकृति के कारण मन को आह्लादित कर देने वाले जो भी पदार्थ दिखाई पड़ते हैं, उन सब में मेरा अपना ही स्वरूप तो प्रकाशित हो रहा है, वह सब मैं ही तो हूँ, इस तरह से अपनी स्थिति को पुष्ट करना ही सज्जनों का पुनीत कर्तव्य है । सभी पदार्थों में इस तरह से स्वात्मस्वरूप की भावना से मन का क्षोभ (चंचलता) शान्त हो जाता है ।

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( २९ ) ६९वें श्लोक की व्याख्या में अभिनवगुप्त के प्रमाण से बताया गया है कि उन्मुक्त बाह्य शाक्त स्पर्श के अभाव में भी आन्तर शाक्त स्पर्श के कारण वीर्य का क्षोभ, आनन्दोदय अवस्था की अभिव्यक्ति होती है। इस स्थिति में भी बाह्य क्षोभ की शान्ति अपेक्षित है । तभी लौकिक आनन्द से विलक्षण आनन्दोदय अवस्था, ब्रह्मानन्द दशा का प्रादुर्भाव हो सकता है । ७५, ८६-८७, ९०-९१ और १०३ संख्या की धारणाओं में इस बाह्य क्षोभ की शान्ति के लिये ही उपाय वर्णित है । विकल्प बाह्य नील-पीत (घट-पट) आदि से लेकर शून्य पर्यन्त सभी पदार्थ विकल्प स्वरूप माने गये हैं। अहं परामर्श दो प्रकार का होता है—शुद्ध और मायीय । इनमें से शुद्ध परामर्श विश्व से अभिन्न रूप में विद्यमान संविन्मात्र में अथवा विश्व की छाया से असंस्पृष्ट स्वच्छ आत्मा में होता है। मायीय अथवा अशुद्ध परामर्श वेद्यस्वरूप देह, बुद्धि, प्राण, शून्य आदि को अपना आलम्बन बनाता है, अर्थात् इन्हीं को अपना स्वरूप मान बैठता है। इनमें से शुद्ध परामर्श में किसी प्रतियोगी (विरोधी) पदार्थ की सत्ता न रहने से कोई भी अपोहनीय (त्याज्य) नहीं है । घट प्रभृति बाह्य पदार्थ भी उस प्रकाशस्वरूप परम तत्त्व से ही अपना अस्तित्व बनाते हैं, अतः वे उससे अभिन्न ही हैं, उसके विरोधी नहीं। इस अवस्था में जब कोई स्थिति अपोहनीय नहीं है, तो वह विकल्प कैसे हो सकती है ? इसके विपरीत अशुद्ध (मायीय) परामर्श से वेद्यरूप शरीर प्रभृति में उससे भिन्न देह आदि का और घट प्रभृति का भी व्यपोहन (व्यवच्छेद = भेद) विद्यमान है । इसी भेद दशा की प्रतीति को विकल्प के नाम से जाना जाता है । अपोहन परमार्थतः अपोहन व्यापार की कोई स्थिति नहीं है, किन्तु जागतिक व्यवहार का संचालन ज्ञान, स्मृति और अपोहन नाम की शक्तियों के सहारे चलता है । “मत्तः स्मृतिर्ज्ञान- मपोहनं१ च” (भ०गी० १५।१५), “स्यादेकश्चिद्रपुर्ज्ञानस्मृत्यपोहनशक्तिमान्” (ई०प्र० १।३।७) इत्यादि वचनों में इन्हीं व्यापारों की चर्चा की गई है । बौद्ध दर्शन में भी एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ को अलग करने के लिये, एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ का भेद बताने के लिये अपोह की कल्पना की गई है । बौद्ध विज्ञानवाद और शून्यवाद में भी विज्ञान अथवा शून्य के अतिरिक्त सभी जागतिक पदार्थ विकल्प स्वरूप ही माने गये हैं । १. काश्मीरी लेखकों के सिवाय अन्य सभी टीकाकारों ने अपोहन का अर्थ ज्ञान और स्मृति का प्रमोष किया है। रामानुजाचार्य के मत का उल्लेख षडंग योग के प्रकरण में तर्क पर विचार करते समय किया जायगा ।

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( ३० ) विज्ञान विज्ञानभैरव संमत विज्ञान की व्याख्या पहले की जा चुकी है, किन्तु ७४वीं धारणा बौद्ध संमत विज्ञान को अपना विषय बनाती है। विज्ञानवादी बौद्ध दार्शनिक मानते हैं कि घट आदि के ज्ञान का कोई आधार नहीं है, क्योंकि वस्तुतः किसी स्थिर आत्मा अथवा घट आदि वस्तुओं की कोई वास्तविक सत्ता नहीं है। चक्षु, आलोक (प्रकाश) आदि पदार्थों की भी वास्तविक सत्ता नहीं है। इसलिये यह सब कुछ भ्रमात्मक है, अत एव विकल्पस्वरूप है। ‘यह वही घट है’ इस तरह का ज्ञान ‘यह वही गंगा का प्रवाह है’ इस ज्ञान की तरह भ्रमा- त्मक ही माना जायगा। अर्थात् गंगा के प्रवाह में जैसे ‘यह वही प्रवाह है’ यह प्रत्यभिज्ञा भ्रान्ति-कल्पित है, उसी तरह से घट, पट, देवदत्त आदि की प्रत्यभिज्ञा को भी भ्रमात्मक ही मानना चाहिये। इस तरह से अन्ततः सब कुछ विज्ञानात्मक ही सिद्ध होता है। इस विज्ञान के अतिरिक्त अन्य किसी की भी सत्ता वास्तविक नहीं है। शून्य शून्य और शून्यातिशून्य (महाशून्य) शब्दों का यहाँ अनेक अर्थों में प्रयोग हुआ है। आणव उपाय और मध्यनाडी सुषुम्णा के प्रसंग में आये इन शब्दों की व्याख्या पहले की जा चुकी है। स्वच्छन्दतन्त्र (७।५७) की टीका में क्षेमराज ने शून्य को माया का और शून्याति- शून्य को महामाया का बोधक माना है। समना पर्यन्त ¹अर्धमात्रा की स्थिति शून्य में और उन्मना की स्थिति शून्यातिशून्य पदवी में मानी गई है। मध्य धाम सुषुम्णा और शिव तत्त्व के अर्थ में भी क्रमशः शून्य और शून्यातिशून्य शब्दों का प्रयोग मिलता है। ३५वें श्लोक में मध्यनाडी के भीतर चिदाकाश रूप शून्य का निवास माना गया है। ३९वें श्लोक में शून्याति- शून्य के उच्चारण का तात्पर्य उन्मना पर्यन्त पिण्ड मन्त्र के उच्चारण के अभ्यास से है। ४२वें श्लोक में उन्मना की स्थिति शून्यावस्था में मानी गई है और उसको ‘शून्या’ कहा गया है। इसी स्थल पर शिव तत्त्व को शून्यातिशून्य बताया है। ४९वें श्लोक में द्वादशान्त पद का अर्थ शून्यातिशून्य मध्यधाम, अर्थात् सुषुम्णा नाडी किया है। कुण्डलिनी शक्ति अथवा प्राणकुण्डलिनी मध्यनाडी सुषुम्णा के सहारे द्वादशान्त नामक शून्यातिशून्य धाम में पहुँचती है। इसलिये औपचारिक रूप से यहाँ उसको भी शून्यातिशून्य कह दिया गया है। वस्तुतः इस शब्द का मुख्य प्रयोग द्वादशान्त धाम या उसमें अभिव्यक्त होने वाले शिवस्वरूप के लिये ही होता है। ६१वें श्लोक में मध्य धाम को शून्य स्वरूप बताया है और १४६वें श्लोक में महामाया शक्ति को महाशून्य, अर्थात् शून्यातिशून्य पदवी कहा है। विज्ञानभैरव संमत शून्य तत्त्व परमार्थतः अभावात्मक नहीं है, किन्तु ²सभी आलम्बन धर्मों से, सभी तत्त्वों से और सभी क्लेशाशयों से शून्य पदार्थ को ही ‘शून्य’ कहा गया है। १. दुर्गा सप्तशती की टीका में भास्करराय ने भी अर्धचन्द्र प्रभृति आठ ध्वनियों को अर्धमा- त्रात्मक और अनुच्चार्य माना है। २. “सर्वालम्बनधर्मैश्च सर्वतत्त्वैरशेषतः। सर्वक्लेशाशयैः शून्यं न शून्यं परमार्थतः ॥” शैवागम

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( ३१ ) इस तरह से किसी अवर्णनीय, अविज्ञेय अवस्था (स्वातन्त्र्य शक्ति) को ही शाक्त और शैव मत में शून्यता माना गया है । इसका विवरण १२४वें श्लोक की व्याख्या में विमर्शदीपिका१ के और १३१वें श्लोक की व्याख्या में चन्द्रज्ञान२ के प्रमाण पर विस्तार से किया गया है । १५१वें श्लोक की व्याख्या में परा देवी को निरावरण भगवती प्रज्ञा पारमिता कहा गया है । प्रज्ञा पारमिता स्वरूप शून्यभूमि का ही इस विज्ञानभैरव तन्त्र में परमशिव ने परा शक्ति के रूप में सर्वत्र उपदेश किया है। ११० धारणाओं के प्रतिपादक प्रत्येक श्लोक के चतुर्थ चरण में परा देवी का निष्कल स्वरूप आलोकित हो उठता है । बौद्ध दर्शन में इस शून्यभूमि को ही मोक्ष मान लिया गया है, किन्तु यह स्मरण रखना चाहिये कि इस ग्रन्थ में परा शक्ति को शिवस्वरूप की प्राप्ति के लिये मुख (द्वार) माना है । इस विषय का विवेचन पहले किया जा चुका है । शून्यषटक ३२वें श्लोक में शून्यषट्क की और ४४वें श्लोक में शून्यत्रय की भावना का विधान है । स्वच्छन्दतन्त्र (४।२८९-२९६) और योगिनीहृदय (३।१७७-१७८) में शून्यषट्क का विवरण मिलता है । ३२वें श्लोक की व्याख्या में योगिनीहृदयदीपिका के अनुसार हीं बीज में छः शून्यों की स्थिति का विवरण दिया जा चुका है । दीपिकाकार ने बताया है कि छः शून्यों का स्वरूप विज्ञानभैरव के ३२वें श्लोक से जानना चाहिये । स्वच्छन्दतन्त्र में पहले ऊर्ध्व शून्य, अधः शून्य और मध्य शून्य ये तीन शून्य प्रतिपादित हैं । ४४वें श्लोक की टीका में उद्धृत वासुदेव के वचन में भी ये ही तीन शून्य गिनाये गये हैं । क्षेमराज ने नादान्त पर्यन्त समस्त पाशों के क्षय के कारणभूत शक्ति पद को ऊर्ध्व शून्य, हृदय को अधः शून्य और कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र को मध्य शून्य माना है । व्यापिनी में चतुर्थ, समना में संमत शून्य का लक्षण बताने वाला यह श्लोक शिवोपाध्याय द्वारा उद्धृत है (पृ० ११०) । नील-पीत, घट-पट प्रभृति बाह्य और सुख-दुःख प्रभृति आन्तर पदार्थों को आलम्बन धर्म कहा जाता है । योगसूत्र (२।३) में अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश—ये सब क्लेश माने गये हैं । क्लेशाशय का तात्पर्य इन्हीं के संस्कारों (वासनाओं) से है, जो कि चित्त में संचित रहते हैं । योगसूत्र (१।२४) में ही ईश्वर को क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से मुक्त माना है । १. तान्त्रिक साहित्य (पृ० ५९६) में शिवोपाध्याय कृत विज्ञानभैरव की टीका का नाम विमर्शदीपिका बताया गया है । शिवोपाध्याय ने विज्ञानभैरव की अपनी टीका (पृ० ११०-१११) में विमर्शदीपिका का नाम लेकर ये श्लोक उद्धृत किये हैं । अतः विमर्श- दीपिका इससे भिन्न एक स्वतन्त्र ग्रन्थ है । २. चन्द्रज्ञान और चन्द्रज्ञानविद्या के परिचय के लिये नित्याषोडशिकार्णव का उपोद्घात (पृ० २६-२७) तथा तान्त्रिक साहित्य (पृ० २०४-२०५) देखिये ।

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( ३२ ) पंचम और उन्मना में षष्ठ शून्य की स्थिति मानी गई है। ये सभी शून्य सामय (सहेतुक) माने गये हैं। इनका परित्याग कर सप्तम शून्य में लीन होने का साधक को प्रयत्न करना चाहिये। यह सप्तम शून्य परम सूक्ष्म है, सभी अवस्थाओं से अतीत है। वस्तुतः यह चिदा- नन्दघन परमशिव तत्त्व शून्य नहीं है, तो भी इसको शून्य कह दिया जाता है। शून्य अभावात्मक होता है। इस शिवतत्त्व को शून्य इसलिये कहा जाता है कि यहाँ आकर सभी जागतिक पदार्थों का क्षय (अभाव) हो जाता है। इस तरह से अभावात्मक शून्यों की संख्या छः ही है। यह सप्तम शून्य अभावात्मक नहीं है। अतः इसके कारण अभावात्मक शून्यों की संख्या में वृद्धि न होने से शास्त्रों में छः ही शून्य माने गये हैं। वस्तुतः शिवतत्त्व महासत्ता- त्मक, प्रकाशात्मक, परम शान्त कोई स्वरूप है। पूर्वोक्त सभी शून्यों में यह व्याप्त है, अर्थात् यही एक तत्त्व उपाधि के भेद से सभी शून्यों में वर्तमान है। इस प्रकार हमने यहाँ विज्ञानभैरव में वर्णित धारणाओं के सभी प्रमुख विषयों का संक्षेप में स्पष्टीकरण किया है। हमने प्रारम्भ में ही बताया है कि यह एक योगशास्त्र का ग्रन्थ है। अब हम इस विषय पर विचार करते हैं कि यह योगशास्त्र क्या है ? योगशास्त्र क्या है ? आस्तिक-नास्तिक, वैदिक-अवैदिक, सभी भारतीय दर्शनों में अपने अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचने में योगशास्त्र की सहायक भूमिका स्वीकार की गई है। प्रत्येक दर्शन में परम तत्त्व के निरूपण के साथ-साथ उस स्थिति तक पहुँचने के लिये शरीर और मन की शुद्धि आवश्यक मानी गई है। शरीर और विशेष कर मन की शुद्धि यौगिक प्रक्रिया के आधार पर ही की जा सकती है। अतः अनिवार्य रूप से प्रत्येक दर्शन में योग का निरूपण पाया जाता है। प्रत्येक दर्शन की विशेष यौगिक प्रक्रिया भी हो सकती है, किन्तु कुछ सामान्य नियम सर्वत्र एक स्वर से मान्य हैं, जिनका कि पातंजल योगसूत्र में विस्तार से प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकार योगशास्त्र को हम सर्वसामान्य अथवा आज की भाषा में धर्म-निरपेक्ष शास्त्र कह सकते हैं, जिसमें कि बिना किसी धार्मिक या लिंग-जाति आदि के भेद-भाव के मानव मात्र के शारीरिक परिष्कार के साथ-साथ मन के भी परिष्कार का मार्ग दिखाया गया है। आज कल योग शब्द को पातंजल योग दर्शन तक ही सीमित कर दिया गया है, किन्तु वास्तव में बात ऐसी नहीं है। भारतवर्ष में विविध योग-सम्प्रदाय समय-समय पर प्रचलित हुए हैं। उनमें से कुछ अब भी प्रचलित हैं और अनेक नामशेष हो गये हैं। मोहेंजो- दड़ो और हड़प्पा की खुदाई में सिन्धु-सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इनमें प्राचीन भारतीय योगपद्धति के अनेक चिह्न मिलते हैं। श्वेत से लेकर लकुलीश पर्यन्त २८ पाशुपत योगाचार्यों की और इनमें से प्रत्येक के चार-चार शिष्यों, अर्थात् ११२ योगियों की नामावली अनेक पुराणों में उपलब्ध है। पालि त्रिपिटक में, विशेषतः परवर्ती काल के विशुद्धिमग्गो और अभिधम्मत्थसंगहो जैसे ग्रन्थों में विशिष्ट यौगिक पद्धति के दर्शन होते हैं। तान्त्रिक षडंग योग का शैव, वैष्णव और बौद्ध तन्त्रों में प्रायः समान रूप से वर्णन मिलता है। मत्स्येन्द्रनाथ