विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० १७ ] * प्रथम अंश * ८७
जन्मन्यत्र महद्दुःखं म्रियमाणस्य चापि तत्।
यातनासु यमस्योग्रं गर्भसङ्क्रमणेषु च॥ ६८
गर्भेषु सुखलेशोऽपि भवद्भिरनुमीयते।
यदि तत्कथ्यतामेवं सर्वं दुःखमयं जगत्॥ ६९
तदेवमतिदुःखानामास्पदेऽत्र भवार्णवे।
भवतां कथ्यते सत्यं विष्णुरेकः परायणः॥ ७०
मा जानीत वयं बाला देही देहेषु शाश्वतः।
जरायौवनजन्माद्या धर्मा देहस्य नात्मनः॥ ७१
बालोऽहं तावदिच्छातो यतिष्ये श्रेयसे युवा।
युवाहं वार्द्धके प्राप्ते करिष्याम्यात्मनो हितम्॥ ७२
वृद्धोऽहं मम कार्याणि समस्तानि न गोचरे।
किं करिष्यामि मन्दात्मा समर्थेन न यत्कृतम्॥ ७३
एवं दुराशया क्षिप्तमानसः पुरुषः सदा।
श्रेयसोऽभिमुखं याति न कदाचित्पिपासितः॥ ७४
बाल्ये क्रीडनकासक्ता यौवने विषयोन्मुखाः।
अज्ञा नयन्त्यशक्त्या च वार्द्धकं समुपस्थितम्॥ ७५
तस्माद्बाल्ये विवेकात्मा यतेत श्रेयसे सदा।
बाल्ययौवनवृद्धाद्यैर्देहभावैरसंयुतः ॥ ७६
तदेतद्भो मयाख्यातं यदि जानीत नानृतम्।
तदस्मत्प्रीतये विष्णुः स्मर्यतां बन्धमुक्तिदः॥ ७७
प्रयासः स्मरणे कोऽस्य स्मृतो यच्छति शोभनम्।
पापक्षयश्च भवति स्मरतां तमहर्निशम्॥ ७८
सर्वभूतस्थिते तस्मिन्मतिमैत्री दिवानिशम्।
भवतां जायतामेवं सर्वक्लेशान्प्रहास्यथ॥ ७९
तापत्रयेणाभिहतं यदेतदखिलं जगत्।
तदा शोच्येषु भूतेषु द्वेषं प्राज्ञः करोति कः॥ ८०
इस प्रकार जीते-जी तो यहाँ महान् दुःख होता ही है, मरनेपर भी यम-यातनाओंका और गर्भ-प्रवेशका उग्र कष्ट भोगना पड़ता है॥ ६८॥ यदि तुम्हें गर्भवासमें लेशमात्र भी सुखका अनुमान होता हो तो कहो। सारा संसार इसी प्रकार अत्यन्त दुःखमय है॥ ६९॥ इसलिये दुःखोंके परम आश्रय इस संसार-समुद्रमें एकमात्र विष्णुभगवान् ही आप लोगोंकी परमगति हैं—यह मैं सर्वथा सत्य कहता हूँ॥ ७०॥
ऐसा मत समझो कि हम तो अभी बालक हैं, क्योंकि जरा, यौवन और जन्म आदि अवस्थाएँ तो देहके ही धर्म हैं, शरीरका अधिष्ठाता आत्मा तो नित्य है, उसमें यह कोई धर्म नहीं है॥ ७१॥ जो मनुष्य ऐसी दुराशाओंसे विक्षिप्तचित्त रहता है कि 'अभी मैं बालक हूँ इसलिये इच्छानुसार खेल-कूद लूँ, युवावस्था प्राप्त होनेपर कल्याण-साधनका यत्न करूँगा।' [फिर युवा होनेपर कहता है कि] 'अभी तो मैं युवा हूँ, बुढ़ापेमें आत्मकल्याण कर लूँगा।' और [वृद्ध होनेपर सोचता है कि] 'अब मैं बूढ़ा हो गया, अब तो मेरी इन्द्रियाँ अपने कर्मोंमें प्रवृत्त ही नहीं होतीं, शरीरके शिथिल हो जानेपर अब मैं क्या कर सकता हूँ? सामर्थ्य रहते तो मैंने कुछ किया ही नहीं।' वह अपने कल्याण-पथपर कभी अग्रसर नहीं होता; केवल भोग-तृष्णामें ही व्याकुल रहता है॥ ७२—७४॥ मूर्खलोग अपनी बाल्यावस्थामें खेल-कूदमें लगे रहते हैं, युवावस्थामें विषयोंमें फँस जाते हैं और बुढ़ापा आनेपर उसे असमर्थताके कारण व्यर्थ ही काटते हैं॥ ७५॥ इसलिये विवेकी पुरुषको चाहिये कि देहकी बाल्य, यौवन और वृद्ध आदि अवस्थाओंकी अपेक्षा न करके बाल्यावस्थामें ही अपने कल्याणका यत्न करे॥ ७६॥
मैंने तुमलोगोंसे जो कुछ कहा है उसे यदि तुम मिथ्या नहीं समझते तो मेरी प्रसन्नताके लिये ही बन्धनको छुटानेवाले श्रीविष्णुभगवान्का स्मरण करो॥ ७७॥ उनका स्मरण करनेमें परिश्रम भी क्या है? और स्मरणमात्रसे ही वे अति शुभ फल देते हैं तथा रात-दिन उन्हींका स्मरण करनेवालोंका पाप भी नष्ट हो जाता है॥ ७८॥ उन सर्वभूतस्थ प्रभुमें तुम्हारी बुद्धि अहर्निश लगी रहे और उनमें निरन्तर तुम्हारा प्रेम बढ़े; इस प्रकार तुम्हारे समस्त क्लेश दूर हो जायँगे॥ ७९॥
जब कि यह सभी संसार तापत्रयसे दग्ध हो रहा है तो इन बेचारे शोचनीय जीवोंसे कौन बुद्धिमान् द्वेष करेगा?॥ ८०॥
८८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १७
अथ भद्राणि भूतानि हीनशक्तिरहं परम्।
मुदं तदापि कुर्वीत हानिर्द्वेषफलं यतः॥ ८१
बद्धवैराणि भूतानि द्वेषं कुर्वन्ति चेत्ततः।
सुशोच्यान्यतिमोहेन व्याप्तानीति मनीषिणाम्॥ ८२
एते भिन्नदृशां दैत्या विकल्पाः कथिता मया।
कृत्वाभ्युपगमं तत्र सङ्क्षेपः श्रूयतां मम॥ ८३
विस्तारः सर्वभूतस्य विष्णोः सर्वमिदं जगत्।
द्रष्टव्यमात्मवत्तस्मादभेदेन विचक्षणैः॥ ८४
समुत्सृज्यासुरं भावं तस्माद्ययं तथा वयम्।
तथा यत्नं करिष्यामो यथा प्राप्स्याम निर्वृतिम्॥ ८५
या नाग्निना न चार्केण नेन्दुना च न वायुना।
पर्जन्यवरुणाभ्यां वा न सिद्धैर्न च राक्षसैः॥ ८६
न यक्षैर्न च दैत्येन्द्रैर्नोरगैर्न च किन्नरैः।
न मनुष्यैर्न पशुभिर्दोषैर्नैवात्मसम्भवैः॥ ८७
ज्वराक्षिरोगातीसारप्लीहगुल्मादिकैस्तथा।
द्वेषेष्र्याँमत्सराद्यैर्वा रागलोभादिभिः क्षयम्॥ ८८
न चान्यैर्नीयते कैश्चिन्नित्या यात्यन्तनिर्मला।
तामाप्नोत्यमले न्यस्य केशवे हृदयं नरः॥ ८९
असारसंसारविवर्तनेषु
मा यात तोषं प्रसभं ब्रवीमि।
सर्वत्र दैत्यास्समतामुपेत
समत्वमाराधनमच्युतस्य॥ ९०
तस्मिन्प्रसन्ने किमिहास्त्यलभ्यं
धर्मार्थकामैरलमल्पकास्ते।
समाश्रिताद्ब्रह्मतरोरनन्ता-
न्निःसंशयं प्राप्स्यथ वै महत्फलम्॥ ९१
यदि [ ऐसा दिखायी दे कि ] 'और जीव तो आनन्दमें हैं, मैं ही परम शक्तिहीन हूँ' तब भी प्रसन्न ही होना चाहिये, क्योंकि द्वेषका फल तो दुःखरूप ही है॥ ८१॥ यदि कोई प्राणी वैरभावसे द्वेष भी करें तो विचारवानोंके लिये तो वे 'अहो! ये महामोहसे व्याप्त हैं!' इस प्रकार अत्यन्त शोचनीय ही हैं॥ ८२॥
हे दैत्यगण! ये मैंने भिन्न-भिन्न दृष्टिवालोंके विकल्प (भिन्न-भिन्न उपाय) कहे। अब उनका समन्वयपूर्वक संक्षिप्त विचार सुनो॥ ८३॥ यह सम्पूर्ण जगत् सर्वभूतमय भगवान् विष्णुका विस्तार है, अतः विचक्षण पुरुषोंको इसे आत्माके समान अभेदरूपसे देखना चाहिये॥ ८४॥ इसलिये दैत्यभावको छोड़कर हम और तुम ऐसा यत्न करें जिससे शान्ति लाभ कर सकें॥ ८५॥ जो [ परम शान्ति ] अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, वायु, मेघ, वरुण, सिद्ध, राक्षस, यक्ष, दैत्यराज, सर्प, किन्नर, मनुष्य, पशु और अपने दोषोंसे तथा ज्वर, नेत्ररोग, अतिसार, प्लीहा (तिल्ली) और गुल्म आदि रोगोंसे एवं द्वेष, ईर्ष्या, मत्सर, राग, लोभ और किसी अन्य भावसे भी कभी क्षीण नहीं होती, और जो सर्वदा अत्यन्त निर्मल है उसे मनुष्य अमलस्वरूप श्रीकेशवमें मनोनिवेश करनेसे प्राप्त कर लेता है॥ ८६-८९॥
हे दैत्यो! मैं आग्रहपूर्वक कहता हूँ, तुम इस असार संसारके विषयोंमें कभी सन्तुष्ट मत होना। तुम सर्वत्र समदृष्टि करो, क्योंकि समता ही श्रीअच्युतकी [ वास्तविक ] आराधना है॥ ९०॥ उन अच्युतके प्रसन्न होनेपर फिर संसारमें दुर्लभ ही क्या है? तुम धर्म, अर्थ और कामकी इच्छा कभी न करना; वे तो अत्यन्त तुच्छ हैं। उस ब्रह्मरूप महावृक्षका आश्रय लेनेपर तो तुम निःसन्देह [ मोक्षरूप ] महाफल प्राप्त कर लोगे॥ ९१॥
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
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अ० १८ ] * प्रथम अंश * ८९
अठारहवाँ अध्याय
प्रह्लादको मारनेके लिये विष, शस्त्र और अग्नि आदिका प्रयोग एवं प्रह्लादकृत भगवत्-स्तुति
श्रीपराशर उवाच
तस्यैतां दानवाश्चेष्टां दृष्ट्वा दैत्यपतेर्भयात्।
आचचक्षुः स चोवाच सूदानाहूय सत्वरः ॥ १
हिरण्यकशिपुरुवाच
हे सूदा मम पुत्रोऽसावन्येषामपि दुर्मतिः।
कुमार्गदेशिको दुष्टो हन्यतामविलम्बितम् ॥ २
हालाहलं विषं तस्य सर्वभक्षेषु दीयताम्।
अविज्ञातमसौ पापो हन्यतां मा विचार्यताम् ॥ ३
श्रीपराशर उवाच
ते तथैव ततश्चक्रुः प्रह्लादाय महात्मने।
विषदानं यथाज्ञप्तं पित्रा तस्य महात्मनः ॥ ४
हालाहलं विषं घोरमनन्तोच्चारणेन सः।
अभिमन्त्र्य सहान्नेन मैत्रेय बुभुजे तदा॥ ५
अविकारं स तद्भुक्त्वा प्रह्लादः स्वस्थमानसः।
अनन्तख्यातिनिर्वीर्यं जरयामास तद्विषम् ॥ ६
ततः सूदा भयत्रस्ता जीर्णं दृष्ट्वा महद्विषम्।
दैत्येश्वरमुपागम्य प्रणिपत्येदमब्रुवन्॥ ७
सूदा ऊचुः
दैत्यराज विषं दत्तमस्माभिरतिभीषणम्।
जीर्णं तेन सहान्नेन प्रह्लादेन सुतेन ते॥ ८
हिरण्यकशिपुरुवाच
त्वर्यतां त्वर्यतां हे हे सद्यो दैत्यपुरोहिताः।
कृत्यां तस्य विनाशाय उत्पादयत मा चिरम् ॥ ९
श्रीपराशर उवाच
सकाशमागम्य ततः प्रह्लादस्य पुरोहिताः।
सामपूर्वमथोचुस्ते प्रह्लादं विनयान्वितम् ॥ १०
पुरोहिता ऊचुः
जातस्त्रैलोक्यविख्यात आयुष्मान्ब्रह्मणः कुले।
दैत्यराजस्य तनयो हिरण्यकशिपोर्भवान्॥ ११
किं देवैः किमनन्तेन किमन्येन तवाश्रयः।
पिता ते सर्वलोकानां त्वं तथैव भविष्यसि ॥ १२
**श्रीपराशरजी बोले—**उनकी ऐसी चेष्टा देख दैत्यों ने दैत्यराज हिरण्यकशिपुसे डरकर उससे सारा वृत्तान्त कह सुनाया, और उसने भी तुरन्त अपने रसोइयोंको बुलाकर कहा॥ १॥
**हिरण्यकशिपु बोला—**अरे सूदगण! मेरा यह दुष्ट और दुर्मति पुत्र औरोंको भी कुमार्गका उपदेश देता है, अतः तुम शीघ्र ही इसे मार डालो॥ २॥ तुम उसे उसके बिना जाने समस्त खाद्यपदार्थों में हलाहल विष मिलाकर दो और किसी प्रकारका सोच-विचार न कर उस पापीको मार डालो॥ ३॥
**श्रीपराशरजी बोले—**तब उन रसोइयोंने महात्मा प्रह्लादको, जैसी कि उनके पिताने आज्ञा दी थी उसीके अनुसार विष दे दिया॥ ४॥ हे मैत्रेय! तब वे उस घोर हलाहल विषको भगवन्नामके उच्चारणसे अभिमन्त्रित कर अन्नके साथ खा गये॥ ५॥ तथा भगवन्नामके प्रभावसे निस्तेज हुए उस विषको खाकर उसे बिना किसी विकारके पचाकर स्वस्थ चित्तसे स्थित रहे॥ ६॥ उस महान् विषको पचा हुआ देख रसोइयोंने भयसे व्याकुल हो हिरण्यकशिपुके पास जा उसे प्रणाम करके कहा॥ ७॥
**सूदगण बोले—**हे दैत्यराज! हमने आपकी आज्ञासे अत्यन्त तीक्ष्ण विष दिया था, तथापि आपके पुत्र प्रह्लादने उसे अन्नके साथ पचा लिया॥ ८॥
**हिरण्यकशिपु बोला—**हे पुरोहितगण! शीघ्रता करो, शीघ्रता करो! उसे नष्ट करनेके लिये अब कृत्या उत्पन्न करो; और देरी न करो॥ ९॥
**श्रीपराशरजी बोले—**तब पुरोहितोंने अति विनीत प्रह्लादसे, उसके पास जाकर शान्तिपूर्वक कहा॥ १०॥
**पुरोहित बोले—**हे आयुष्मन्! तुम त्रिलोकीमें विख्यात ब्रह्माजीके कुलमें उत्पन्न हुए हो और दैत्यराज हिरण्यकशिपुके पुत्र हो॥ ११॥ तुम्हें देवता, अनन्त अथवा और भी किसीसे क्या प्रयोजन है? तुम्हारे पिता तुम्हारे तथा सम्पूर्ण लोकोंके आश्रय हैं और तुम भी ऐसे ही होगे॥ १२॥
९० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १८
तस्मात्परित्यजैनां त्वं विपक्षस्तवसंहिताम्।
श्लाघ्यः पिता समस्तानां गुरूणां परमो गुरुः॥ १३
प्रह्लाद उवाच
एवमेतन्महाभागाः श्लाघ्यमेतन्महाकुलम्।
मरीचेः सकलेऽप्यस्मिंस्त्रैलोक्ये नान्यथा वदेत्॥ १४
पिता च मम सर्वस्मिञ्जगत्युत्कृष्टचेष्टितः।
एतदप्यवगच्छामि सत्यमत्रापि नानृतम्॥ १५
गुरूणामपि सर्वेषां पिता परमो गुरुः।
यदुक्तं भ्रान्तिस्तत्रापि स्वल्पापि हि न विद्यते॥ १६
पिता गुरुर्न सन्देहः पूजनीयः प्रयत्नतः।
तत्रापि नापराध्यामीत्येवं मनसि मे स्थितम्॥ १७
यत्त्वेतत्किमनन्तेनेत्युक्तं युष्माभिरीदृशम्।
को ब्रवीति यथान्याय्यं किं तु नैतद्वचोऽर्थवत्॥ १८
इत्युक्त्वा सोऽभवन्मौनी तेषां गौरवयन्त्रितः।
प्रहस्य च पुनः प्राह किमनन्तेन साध्विति॥ १९
साधु भो किमनन्तेन साधु भो गुरवो मम।
श्रूयतां यदनन्तेन यदि खेदं न यास्यथ॥ २०
धर्मार्थकाममोक्षाश्च पुरुषार्था उदाहृताः।
चतुष्टयमिदं यस्मात्तस्मात्किं किमिदं वचः॥ २१
मरीचिमिश्रैर्दक्षाद्यैस्तथैवान्यैरनन्तः।
धर्मः प्राप्तस्तथा चान्यैरर्थः कामस्तथाऽपरैः॥ २२
तत्तत्त्ववेदिनो भूत्वा ज्ञानध्यानसमाधिभिः।
अवापुर्मुक्तिमपरे पुरुषा ध्वस्तबन्धनाः॥ २३
सम्पदैश्वर्यमाहात्म्यज्ञानसन्ततिकर्मणाम्।
विमुक्तेश्चैकतो लभ्यं मूलमाराधनं हरेः॥ २४
यतो धर्मार्थकामाख्यं मुक्तिश्चापि फलं द्विजाः।
तेनापि किं किमित्येवमनन्तेन किमुच्यते॥ २५
किं चापि बहुनोक्तेन भवन्तो गुरवो मम।
वदन्तु साधु वासाधु विवेकोऽस्माकमल्पकः॥ २६
इसलिये तुम यह विपक्षकी स्तुति करना छोड़ दो। तुम्हारे पिता सब प्रकार प्रशंसनीय हैं और वे ही समस्त गुरुओंमें परम गुरु हैं॥ १३॥
प्रह्लादजी बोले— हे महाभागगण! यह ठीक ही है। इस सम्पूर्ण त्रिलोकीमें भगवान् मरीचिका यह महान् कुल अवश्य ही प्रशंसनीय है। इसमें कोई कुछ भी अन्यथा नहीं कह सकता॥ १४॥ और मेरे पिताजी भी सम्पूर्ण जगत्में बहुत बड़े पराक्रमी हैं; यह भी मैं जानता हूँ। यह बात भी बिलकुल ठीक है, अन्यथा नहीं॥ १५॥ और आपने जो कहा कि समस्त गुरुओंमें पिता ही परम गुरु हैं—इसमें भी मुझे लेशमात्र सन्देह नहीं है॥ १६॥ पिताजी परम गुरु हैं और प्रयत्नपूर्वक पूजनीय हैं—इसमें कोई सन्देह नहीं। और मेरे चित्तमें भी यही विचार स्थित है कि मैं उनका कोई अपराध नहीं करूँगा॥ १७॥ किन्तु आपने जो यह कहा कि 'तुझे अनन्तसे क्या प्रयोजन है?' सो ऐसी बातको भला कौन न्यायोचित कह सकता है? आपका यह कथन किसी भी तरह ठीक नहीं है॥ १८॥
ऐसा कहकर वे उनका गौरव रखनेके लिये चुप हो गये और फिर हँसकर कहने लगे—'तुझे अनन्तसे क्या प्रयोजन है? इस विचारको धन्यवाद है!॥ १९॥ हे मेरे गुरुगण! आप कहते हैं कि तुझे अनन्तसे क्या प्रयोजन है? धन्यवाद है आपके इस विचारको! अच्छा, यदि आपको बुरा न लगे तो मुझे अनन्तसे जो प्रयोजन है सो सुनिये॥ २०॥ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चार पुरुषार्थ कहे जाते हैं। ये चारों ही जिनसे सिद्ध होते हैं, उनसे क्या प्रयोजन?—आपके इस कथनको क्या कहा जाय!॥ २१॥ उन अनन्तसे ही दक्ष और मरीचि आदि तथा अन्यान्य ऋषीश्वरोंको धर्म, किन्हीं अन्य मुनीश्वरोंको अर्थ एवं अन्य किन्हींको कामकी प्राप्ति हुई है॥ २२॥ किन्हीं अन्य महापुरुषोंने ज्ञान, ध्यान और समाधिके द्वारा उन्हींके तत्त्वको जानकर अपने संसार-बन्धनको काटकर मोक्षपद प्राप्त किया है॥ २३॥ अतः सम्पत्ति, ऐश्वर्य, माहात्म्य, ज्ञान, सन्तति और कर्म तथा मोक्ष—इन सबकी एकमात्र मूल श्रीहरिकी आराधना ही उपार्जनीय है॥ २४॥ हे द्विजगण! इस प्रकार, जिनसे अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष ये चारों ही फल प्राप्त होते हैं उनके लिये भी आप ऐसा क्यों कहते हैं कि 'अनन्तसे तुझे क्या प्रयोजन है?'॥ २५॥ और बहुत कहनेसे क्या लाभ? आपलोग तो मेरे गुरु हैं; उचित-अनुचित सभी कुछ कह सकते हैं। और मुझे तो विचार भी बहुत ही कम है॥ २६॥
अ० १८ ] * प्रथम अंश * ९१
बहुनात्र किमुक्तेन स एव जगतः पतिः।
स कर्ता च विकर्ता च संहर्ता च हृदि स्थितः॥ २७
स भोक्ता भोज्यमप्येवं स एव जगदीश्वरः।
भवद्भिरेतत्क्षन्तव्यं बाल्यादुक्तं तु यन्मया॥ २८
पुरोहिता ऊचुः
दह्यमानस्त्वमस्माभिरग्निना बाल रक्षितः।
भूयो न वक्ष्यसीत्येवं नैव ज्ञातोऽस्यबुद्धिमान्॥ २९
यदस्मद्वचनान्मोहग्राहं न त्यक्ष्यते भवान्।
ततः कृत्यां विनाशाय तव स्त्रक्ष्याम दुर्मते॥ ३०
प्रह्लाद उवाच
कः केन हन्यते जन्तुर्जन्तुः कः केन रक्ष्यते।
हन्ति रक्षति चैवात्मा ह्यसत्साधु समाचरन्॥ ३१
कर्मणा जायते सर्वं कर्मैव गतिसाधनम्।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन साधुकर्म समाचरेत्॥ ३२
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्तास्तेन ते क्रुद्धा दैत्यराजपुरोहिताः।
कृत्यामुत्पादयामासुर्ज्वालामालोज्ज्वलाकृतिम्॥ ३३
अतिभीमा समागम्य पादन्यासक्षतक्षितिः।
शूलेन साधु सङ्क्रुद्धा तं जघानाशु वक्षसि॥ ३४
तत्तस्य हृदयं प्राप्य शूलं बालस्य दीप्तिमत्।
जगाम खण्डितं भूमौ तत्रापि शतधा गतम्॥ ३५
यत्रानपायी भगवान् हृद्यास्ते हरिरीश्वरः।
भङ्गो भवति वज्रस्य तत्र शूलस्य का कथा॥ ३६
अपापे तत्र पापैश्च पातिता दैत्ययाजकैः।
तानेव सा जघानाशु कृत्या नाशं जगाम च॥ ३७
कृत्यया दह्यमानांस्तान्विलोक्य स महामतिः।
त्राहि कृष्णोत्यनन्तेति वदन्नभ्यवपद्यत॥ ३८
प्रह्लाद उवाच
सर्वव्यापिन् जगद्रूप जगत्स्रष्टर्जनार्दन।
पाहि विप्रानिमानस्माद्दुःसहान्मन्त्रपावकात्॥ ३९
इस विषयमें अधिक क्या कहा जाय ? [मेरे विचारसे तो] सबके अन्तःकरणोंमें स्थित एकमात्र वे ही संसारके स्वामी तथा उसके रचयिता, पालक और संहारक हैं॥ २७॥ वे ही भोक्ता और भोज्य तथा वे ही एकमात्र जगदीश्वर हैं। हे गुरुगण! मैंने बाल्यभावसे यदि कुछ अनुचित कहा हो तो आप क्षमा करें"॥ २८॥
पुरोहितगण बोले— अरे बालक! हमने तो यह समझकर कि तू फिर ऐसी बात न कहेगा तुझे अग्निमें जलनेसे बचाया है। हम यह नहीं जानते थे कि तू ऐसा बुद्धिहीन है?॥ २९॥ रे दुर्मते! यदि तू हमारे कहनेसे अपने इस मोहमय आग्रहको नहीं छोड़ेगा तो हम तुझे नष्ट करनेके लिये कृत्या उत्पन्न करेंगे॥ ३०॥
प्रह्लादजी बोले— कौन जीव किससे मारा जाता है और कौन किससे रक्षित होता है? शुभ और अशुभ आचरणोंके द्वारा आत्मा स्वयं ही अपनी रक्षा और नाश करता है॥ ३१॥ कर्मोंके कारण ही सब उत्पन्न होते हैं और कर्म ही उनकी शुभाशुभ गतियोंके साधन हैं। इसलिये प्रयत्नपूर्वक शुभकर्मोंका ही आचरण करना चाहिये॥ ३२॥
श्रीपराशरजी बोले— उनके ऐसा कहनेपर उन दैत्यराजके पुरोहितोंने क्रोधित होकर अग्निशिखाके समान प्रज्वलित शरीरवाली कृत्या उत्पन्न कर दी॥ ३३॥ उस अति भयंकरीने अपने पादाघातसे पृथिवीको कम्पित करते हुए वहाँ प्रकट होकर बड़े क्रोधसे प्रह्लादजीकी छातीमें त्रिशूलसे प्रहार किया॥ ३४॥ किन्तु उस बालकके वक्षःस्थलमें लगते ही वह तेजोमय त्रिशूल टूटकर पृथिवीपर गिर पड़ा और वहाँ गिरनेसे भी उसके सैकड़ों टुकड़े हो गये॥ ३५॥ जिस हृदयमें निरन्तर अक्षुण्णभावसे श्रीहरिभगवान् विराजते हैं उसमें लगनेसे तो वज्रके भी टूक-टूक हो जाते हैं, त्रिशूलकी तो बात ही क्या है?॥ ३६॥
उन पापी पुरोहितोंने उस निष्पाप बालकपर कृत्याका प्रयोग किया था; इसलिये तुरन्त ही उसने उनपर वार किया और स्वयं भी नष्ट हो गयी॥ ३७॥ अपने गुरुओंको कृत्याद्वारा जलाये जाते देख महामति प्रह्लाद 'हे कृष्ण ! रक्षा करो ! हे अनन्त ! बचाओ!' ऐसा कहते हुए उनकी ओर दौड़े॥ ३८॥
प्रह्लादजी कहने लगे— हे सर्वव्यापी, विश्वरूप, विश्वस्रष्टा जनार्दन ! इन ब्राह्मणोंकी इस मन्त्राग्निरूप दुःसह दुःखसे रक्षा करो॥ ३९॥
| ९२ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० १९ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| यथा सर्वेषु भूतेषु सर्वव्यापी जगद्गुरुः।<br>विष्णुरेव तथा सर्वे जीवन्त्वेते पुरोहिताः॥ ४०<br>यथा सर्वगतं विष्णुं मन्यमानोऽनपायिनम्।<br>चिन्तयाम्यरिपक्षेऽपि जीवन्त्वेते पुरोहिताः॥ ४१<br>ये हन्तुमागता दत्तं यैर्विषं यैर्हुताशनः।<br>यैर्दिग्गजैरहं क्षुण्णो दष्टः सर्पैश्च यैरपि॥ ४२<br>तेष्वहं मित्रभावेन समः पापोऽस्मि न क्वचित्।<br>यथा तेनाद्य सत्येन जीवन्त्वसुरयाजकाः॥ ४३ | 'सर्वव्यापी जगद्गुरु भगवान् विष्णु सभी प्राणियोंमें व्याप्त हैं'—इस सत्यके प्रभावसे ये पुरोहितगण जीवित हो जायँ॥ ४०॥ यदि मैं सर्वव्यापी और अक्षय श्रीविष्णुभगवान्को अपने विपक्षियोंमें भी देखता हूँ तो ये पुरोहितगण जीवित हो जायँ॥ ४१॥ जो लोग मुझे मारनेके लिये आये, जिन्होंने मुझे विष दिया, जिन्होंने आगमें जलाया, जिन्होंने दिग्गजोंसे पीड़ित कराया और जिन्होंने सर्पोंसे डँसाया उन सबके प्रति यदि मैं समान मित्रभावसे रहा हूँ और मेरी कभी पाप-बुद्धि नहीं हुई तो उस सत्यके प्रभावसे ये दैत्यपुरोहित जी उठें॥ ४२-४३॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्तास्तेन ते सर्वे संस्पृष्टाश्च निरामयाः।<br>समुत्तस्थुर्द्विजा भूयस्तमूचुः प्रश्रयान्वितम्॥ ४४ | **श्रीपराशरजी बोले—**ऐसा कहकर उनके स्पर्श करते ही वे ब्राह्मण स्वस्थ होकर उठ बैठे और उस विनयावनत बालकसे कहने लगे॥ ४४॥ |
| पुरोहिता ऊचुः<br>दीर्घायुरप्रतिहतो बलवीर्यसमन्वितः।<br>पुत्रपौत्रधनैश्वर्यैर्युक्तो वत्स भवोत्तमः॥ ४५ | **पुरोहितगण बोले—**हे वत्स! तू बड़ा श्रेष्ठ है। तू दीर्घायु, निर्द्वन्द्व, बल-वीर्यसम्पन्न तथा पुत्र, पौत्र एवं धन-ऐश्वर्यादिसे सम्पन्न हो॥ ४५॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्त्वा तं ततो गत्वा यथावृत्तं पुरोहिताः।<br>दैत्यराजाय सकलमाचचक्षुर्महामुने॥ ४६ | **श्रीपराशरजी बोले—**हे महामुने! ऐसा कह पुरोहितोंने दैत्यराज हिरण्यकशिपुके पास जा उसे सारा समाचार ज्यों-का-त्यों सुना दिया॥ ४६॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
उन्नीसवाँ अध्याय
प्रह्लादकृत भगवत्-गुण-वर्णन और प्रह्लादकी रक्षाके लिये भगवान्का सुदर्शनचक्रको भेजना
</div>| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| श्रीपराशर उवाच<br>हिरण्यकशिपुः श्रुत्वा तां कृत्यां वितथीकृताम्।<br>आहूय पुत्रं पप्रच्छ प्रभावस्यास्य कारणम्॥ १ | **श्रीपराशरजी बोले—**हिरण्यकशिपुने कृत्याको भी विफल हुई सुन अपने पुत्र प्रह्लादको बुलाकर उनके इस प्रभावका कारण पूछा॥ १॥ |
| हिरण्यकशिपुरुवाच<br>प्रह्लाद सुप्रभावोऽसि किमेतत्ते विचेष्टितम्।<br>एतन्मन्त्रादिजनितमुताहो सहजं तव॥ २ | **हिरण्यकशिपु बोला—**अरे प्रह्लाद! तू बड़ा प्रभावशाली है! तेरी ये चेष्टाएँ मन्त्रादिजनित हैं या स्वाभाविक ही हैं॥ २॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>एवं पृष्टस्तदा पित्रा प्रह्लादोऽसुरबालकः।<br>प्रणिपत्य पितुः पादाविदं वचनमब्रवीत्॥ ३ | **श्रीपराशरजी बोले—**पिताके इस प्रकार पूछनेपर दैत्यकुमार प्रह्लादजीने उसके चरणोंमें प्रणाम कर इस प्रकार कहा— ॥ ३॥ |
अ० १९] * प्रथम अंश * ९३
| न मन्त्रादिकृतं तात न च नैसर्गिकं मम।<br>प्रभाव एष सामान्यो यस्य यस्याच्युतो हृदि॥ ४<br>अन्येषां यो न पापानि चिन्तयत्यात्मनो यथा।<br>तस्य पापागमस्तात हेत्वभावान्न विद्यते॥ ५<br>कर्मणा मनसा वाचा परपीडां करोति यः।<br>तद्बीजं जन्म फलति प्रभूतं तस्य चाशुभम्॥ ६<br>सोऽहं न पापमिच्छामि न करोमि वदामि वा।<br>चिन्तयन्सर्वभूतस्थमात्मन्यपि च केशवम्॥ ७<br>शारीरं मानसं दुःखं दैवं भूतभवं तथा।<br>सर्वत्र शुभचित्तस्य तस्य मे जायते कुतः॥ ८<br>एवं सर्वेषु भूतेषु भक्तिरव्यभिचारिणी।<br>कर्तव्या पण्डितैर्ज्ञात्वा सर्वभूतमयं हरिम्॥ ९<br>श्रीपराशर उवाच<br>इति श्रुत्वा स दैत्येन्द्रः प्रासादशिखरे स्थितः।<br>क्रोधान्धकारितमुखः प्राह दैतेयकिङ्करान्॥ १०<br>हिरण्यकशिपुरुवाच<br>दुरात्मा क्षिप्यतामस्मात्प्रासादाच्छतयोजनात्।<br>गिरिपृष्ठे पतत्वस्मिन् शिलाभिन्नाङ्गसंहतिः॥ ११<br>ततस्तं चिक्षिपुः सर्वे बालं दैतेयदानवाः।<br>पपात सोऽधधः क्षिप्तो हृदयेनोद्वहन्हरिम्॥ १२<br>पतमानं जगद्धात्री जगद्धातरि केशवे।<br>भक्तियुक्तं दधारैनमुपसङ्गम्य मेदिनी॥ १३<br>ततो विलोक्य तं स्वस्थमविशीर्णास्थिपञ्जरम्।<br>हिरण्यकशिपुः प्राह शम्बरं मायिनां वरम्॥ १४<br>हिरण्यकशिपुरुवाच<br>नास्माभिः शक्यते हन्तुमसौ दुर्बुद्धिबालकः।<br>मायां वेत्ति भवांस्तस्मान्माययैनं निष्षूदय॥ १५<br>शम्बर उवाच<br>सूदयाम्येव दैत्येन्द्र पश्य मायाबलं मम।<br>सहस्रमत्र मायानां पश्य कोटिशतं तथा॥ १६<br>श्रीपराशर उवाच<br>ततः स ससृजे मायां प्रह्लादे शम्बरोऽसुरः।<br>विनाशमिच्छन्दुबुद्धिः सर्वत्र समदर्शिनि॥ १७ | "पिताजी! मेरा यह प्रभाव न तो मन्त्रादिजनित है<br>और न स्वाभाविक ही है, बल्कि जिस-जिसके हृदयमें<br>श्रीअच्युतभगवान्का निवास होता है उसके लिये यह सामान्य<br>बात है॥ ४॥ जो मनुष्य अपने समान दूसरोंका बुरा नहीं<br>सोचता, हे तात! कोई कारण न रहनेसे उसका भी कभी<br>बुरा नहीं होता॥ ५॥ जो मनुष्य मन, वचन या कर्मसे<br>दूसरोंको कष्ट देता है उसके उस परपीडारूप बीजसे ही<br>उत्पन्न हुआ उसको अत्यन्त अशुभ फल मिलता<br>है॥ ६॥ अपने सहित समस्त प्राणियोंमें श्रीकेशवको वर्तमान<br>समझकर मैं न तो किसीका बुरा चाहता हूँ और न कहता<br>या करता ही हूँ॥ ७॥ इस प्रकार सर्वत्र शुभचित्त होनेसे<br>मुझको शारीरिक, मानसिक, दैविक अथवा भौतिक दुःख<br>किस प्रकार प्राप्त हो सकता है?॥ ८॥ इसी प्रकार भगवान्को<br>सर्वभूतमय जानकर विद्वानोंको सभी प्राणियोंमें अविचल<br>भक्ति (प्रेम) करनी चाहिये"॥ ९॥<br> **श्रीपराशरजी बोले—**अपने महलकी अट्टालिकापर<br>बैठे हुए उस दैत्यराजने यह सुनकर क्रोधान्ध हो<br>अपने दैत्य अनुचरोंसे कहा॥ १०॥<br> **हिरण्यकशिपु बोला—**यह बड़ा दुरात्मा है, इसे<br>इस सौ योजन ऊँचे महलसे गिरा दो, जिससे यह इस<br>पर्वतके ऊपर गिरे और शिलाओंसे इसके अंग-अंग छिन्न-<br>भिन्न हो जायँ॥ ११॥<br> तब उन समस्त दैत्य और दानवोंने उन्हें महलसे<br>गिरा दिया और वे भी उनके ढकेलनेसे हृदयमें श्रीहरिका<br>स्मरण करते-करते नीचे गिर गये॥ १२॥ जगत्कर्ता भगवान्<br>केशवके परमभक्त प्रह्लादजीके गिरते समय उन्हें जगद्धात्री<br>पृथिवीने निकट जाकर अपनी गोदमें ले लिया॥ १३॥<br>तब बिना किसी हड्डी-पसलीके टूटे उन्हें स्वस्थ देख दैत्यराज<br>हिरण्यकशिपुने परममायावी शम्बरासुरसे कहा॥ १४॥<br> **हिरण्यकशिपु बोला—**यह दुर्बुद्धि बालक कोई<br>ऐसी माया जानता है जिससे यह हमसे नहीं मारा जा<br>सकता, इसलिये आप मायासे ही इसे मार डालिये॥ १५॥<br> **शम्बरासुर बोला—**हे दैत्येन्द्र! इस बालकको मैं<br>अभी मारे डालता हूँ, तुम मेरी मायाका बल देखो। देखो,<br>मैं तुम्हें सैकड़ों-हजारों-करोड़ों मायाएँ दिखलाता हूँ॥ १६॥<br> **श्रीपराशरजी बोले—**तब उस दुर्बुद्धि शम्बरासुरने<br>समदर्शी प्रह्लादके लिये, उनके नाशकी इच्छासे बहुत-<br>सी मायाएँ रचीं॥ १७॥ |
९४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १९
समाहितमतिर्भूत्वा शम्बरेऽपि विमत्सरः ।
मैत्रेय सोऽपि प्रह्लादः सस्मार मधुसूदनम् ॥ १८
ततो भगवता तस्य रक्षार्थं चक्रमूत्तमम् ।
आजगाम समाजप्तं ज्वालामालि सुदर्शनम् ॥ १९
तेन मायासहस्रं तच्छम्बरस्याशुगामिना ।
बालस्य रक्षता देहमेकैकं च विशोधितम् ॥ २०
संशोषकं तथा वायुं दैत्येन्द्रस्त्विदमब्रवीत् ।
शीघ्रमेष ममादेशादुरात्मा नीयतां क्षयम् ॥ २१
तथेत्युक्त्वा तु सोऽप्येनं विवेश पवनो लघु ।
शीतोऽतिरूक्षः शोषाय तद्देहस्यातिदुःसहः ॥ २२
तेनाविष्टमथात्मानं स बुद्ध्वा दैत्यबालकः ।
हृदयेन महात्मानं दधार धरणीधरम् ॥ २३
हृदयस्थस्ततस्तस्य तं वायुमतिभीषणम् ।
पपौ जनार्दनः क्रुद्धः स ययौ पवनः क्षयम् ॥ २४
क्षीणासु सर्वमायासु पवने च क्षयं गते ।
जगाम सोऽपि भवनं गुरोरेव महामतिः ॥ २५
अहन्यहन्यथाचार्यो नीतिं राज्यफलप्रदाम् ।
ग्राहयामास तं बालं राज्ञामुशनसा कृताम् ॥ २६
गृहीतनीतिशास्त्रं तं विनीतं च यदा गुरुः ।
मेने तदैनं तत्पित्रे कथयामास शिक्षितम् ॥ २७
आचार्य उवाच
गृहीतनीतिशास्त्रस्ते पुत्रो दैत्यपते कृतः ।
प्रह्लादस्तत्त्वतो वेत्ति भार्गवेण यदीरितम् ॥ २८
हिरण्यकशिपुरुवाच
मित्रेषु वर्तेत कथमरिवर्गेषु भूपतिः ।
प्रह्लाद त्रिषु लोकेषु मध्यस्थेषु कथं चरेत् ॥ २९
कथं मन्त्रिष्वमात्येषु बाह्येष्वाभ्यन्तरेषु च ।
चारेषु पौरवर्गेषु शङ्कितेष्वितरेषु च ॥ ३०
कृत्याकृत्यविधानञ्च दुर्गाटविकसाधनम् ।
प्रह्लाद कथ्यतां सम्यक् तथा कण्टकशोधनम् ॥ ३१
किन्तु, हे मैत्रेय! शम्बरासुरके प्रति भी सर्वथा द्वेषहीन रहकर प्रह्लादजी सावधान चित्तसे श्रीमधुसूदनभगवान्का स्मरण करते रहे ॥ १८ ॥ उस समय भगवान्की आज्ञासे उनकी रक्षाके लिये वहाँ ज्वाला-मालाओंसे युक्त सुदर्शनचक्र आ गया ॥ १९ ॥ उस शीघ्रगामी सुदर्शनचक्रने उस बालककी रक्षा करते हुए शम्बरासुरकी सहस्रों मायाओंको एक-एक करके नष्ट कर दिया ॥ २० ॥
तब दैत्यराजने सबको सुखा डालनेवाले वायुसे कहा कि मेरी आज्ञासे तुम शीघ्र ही इस दुरात्माको नष्ट कर दो ॥ २१ ॥ अतः उस अति तीव्र शीतल और रूक्ष वायुने, जो अति असहनीय था 'जो आज्ञा' कह उनके शरीरको सुखानेके लिये उसमें प्रवेश किया ॥ २२ ॥ अपने शरीरमें वायुका आवेश हुआ जान दैत्यकुमार प्रह्लादने भगवान् धरणीधरको हृदयमें धारण किया ॥ २३ ॥ उनके हृदयमें स्थित हुए श्रीजनार्दनने क्रुद्ध होकर उस भीषण वायुको पी लिया, इससे वह क्षीण हो गया ॥ २४ ॥
इस प्रकार पवन और सम्पूर्ण मायाओंके क्षीण हो जानेपर महामति प्रह्लादजी अपने गुरुके घर चले गये ॥ २५ ॥ तदनन्तर गुरुजी उन्हें नित्यप्रति शुक्राचार्यजीकी बनायी हुई राज्यफलप्रदायिनी राजनीतिका अध्ययन कराने लगे ॥ २६ ॥ जब गुरुजीने उन्हें नीतिशास्त्रमें निपुण और विनयसम्पन्न देखा तो उनके पितासे कहा—'अब यह सुशिक्षित हो गया है' ॥ २७ ॥
आचार्य बोले— हे दैत्यराज ! अब हमने तुम्हारे पुत्रको नीतिशास्त्रमें पूर्णतया निपुण कर दिया है, भृगुनन्दन शुक्राचार्यजीने जो कुछ कहा है उसे प्रह्लाद तत्त्वतः जानता है ॥ २८ ॥
हिरण्यकशिपु बोला— प्रह्लाद ! [ यह तो बता ] राजाको मित्रोंसे कैसा बर्ताव करना चाहिये? और शत्रुओंसे कैसा? तथा त्रिलोकीमें जो मध्यस्थ (दोनों पक्षोंके हितचिन्तक) हों, उनसे किस प्रकार आचरण करे? ॥ २९ ॥ मन्त्रियों, अमात्यों, बाह्य और अन्तःपुरके सेवकों, गुप्तचरों, पुरवासियों, शंकितों (जिन्हें जीतकर बलात् दास बना लिया हो) तथा अन्यान्य जनोंके प्रति किस प्रकार व्यवहार करना चाहिये? ॥ ३० ॥ हे प्रह्लाद! यह ठीक-ठीक बता कि करने और न करनेयोग्य कार्योंका विधान किस प्रकार करे, दुर्ग और आटविक (जंगली मनुष्य) आदिको किस प्रकार वशीभूत करे और गुप्त शत्रुरूप काँटेको कैसे निकाले? ॥ ३१ ॥
अ० १९ ] * प्रथम अंश * ९५
| एतच्चान्यच्च सकलमधीतं भवता यथा ।<br>तथा मे कथ्यतां ज्ञातुं तवेच्छामि मनोगतम् ॥ ३२ | यह सब तथा और भी जो कुछ तूने पढ़ा हो वह सब मुझे सुना, मैं तेरे मनके भावोंको जाननेके लिये बहुत उत्सुक हूँ॥ ३२॥ |
| श्रीपराशर उवाच | **श्रीपराशरजी बोले—**तब विनयभूषण प्रह्लादजीने पिताके चरणोंमें प्रणाम कर दैत्यराज हिरण्यकशिपुसे हाथ जोड़कर कहा॥ ३३ ॥ |
| प्रणिपत्य पितुः पादौ तदा प्रश्रयभूषणः ।<br>प्रह्लादः प्राह दैत्येन्द्रं कृताञ्जलिपुटस्तथा ॥ ३३ | |
| प्रह्लाद उवाच | **प्रह्लादजी बोले—**पिताजी ! इसमें सन्देह नहीं, गुरुजीने तो मुझे इन सभी विषयोंकी शिक्षा दी है, और मैं उन्हें समझ भी गया हूँ; परन्तु मेरा विचार है कि वे नीतियाँ अच्छी नहीं हैं॥ ३४॥ साम, दान तथा दण्ड और भेद—ये सब उपाय मित्रादिके साधनेके लिये बतलाये गये हैं॥ ३५॥ किन्तु, पिताजी ! आप क्रोध न करें, मुझे तो कोई शत्रु-मित्र आदि दिखायी ही नहीं देते; और हे महाबाहो! जब कोई साध्य ही नहीं है तो इन साधनोंसे लेना ही क्या है? ॥ ३६ ॥ हे तात! सर्वभूतात्मक जगन्नाथ जगन्मय परमात्मा गोविन्दमें भला शत्रु-मित्रकी बात ही कहाँ है? ॥ ३७ ॥ श्रीविष्णुभगवान् तो आपमें, मुझमें और अन्यत्र भी सभी जगह वर्तमान हैं, फिर 'यह मेरा मित्र है और यह शत्रु है' ऐसे भेदभावको स्थान ही कहाँ है? ॥ ३८ ॥ इसलिये, हे तात ! अविद्याजन्य दुष्कर्मोंमें प्रवृत्त करनेवाले इस वाग्जालको सर्वथा छोड़कर अपने शुभके लिये ही यत्न करना चाहिये ॥ ३९ ॥ हे दैत्यराज ! अज्ञानके कारण ही मनुष्योंकी अविद्यामें विद्या-बुद्धि होती है। बालक क्या अज्ञानवश खद्योतको ही अग्नि नहीं समझ लेता? ॥ ४० ॥ कर्म वही है जो बन्धनका कारण न हो और विद्या भी वही है जो मुक्तिकी साधिका हो। इसके अतिरिक्त और कर्म तो परिश्रमरूप तथा अन्य विद्याएँ कला-कौशलमात्र ही हैं ॥ ४१ ॥<br><br>हे महाभाग ! इस प्रकार इन सबको असार समझकर अब आपको प्रणाम कर मैं उत्तम सार बतलाता हूँ, आप श्रवण कीजिये ॥ ४२ ॥ राज्य पानेकी चिन्ता किसे नहीं होती और धनकी अभिलाषा भी किसको नहीं है? तथापि ये दोनों मिलते उन्हींको हैं जिन्हें मिलनेवाले होते हैं॥ ४३ ॥ हे महाभाग ! महत्त्व-प्राप्तिके लिये सभी यत्न करते हैं, तथापि वैभवका कारण तो मनुष्यका भाग्य ही है, उद्यम नहीं ॥ ४४॥ हे प्रभो! जड, अविवेकी, निर्बल और अनीतिज्ञोंको भी भाग्यवश नाना प्रकारके भोग और राज्यादि प्राप्त होते हैं ॥ ४५ ॥ इसलिये जिसे महान् वैभवकी इच्छा हो उसे केवल पुण्यसंचयका ही यत्न करना चाहिये; और जिसे मोक्षकी इच्छा हो उसे भी समत्वलाभका ही प्रयत्न करना चाहिये ॥ ४६ ॥ |
| ममोपदिष्टं सकलं गुरुणा नात्र संशयः ।<br>गृहीतं तु मया किन्तु न सदेतन्मतं मम ॥ ३४ | |
| साम चोपप्रदानं च भेददण्डौ तथापरौ ।<br>उपायाः कथिताः सर्वे मित्रादीनां च साधने ॥ ३५ | |
| तानेवाहं न पश्यामि मित्रादींस्तात मा क्रुधः ।<br>साध्याभावे महाबाहो साधनैः किं प्रयोजनम् ॥ ३६ | |
| सर्वभूतात्मके तात जगन्नाथे जगन्मये ।<br>परमात्मनि गोविन्दे मित्रामित्रकथा कुतः ॥ ३७ | |
| त्वय्यस्ति भगवान् विष्णुर्मयि चान्यत्र चास्ति सः ।<br>यतस्ततोऽयं मित्रं मे शत्रुश्चेति पृथक्कुतः ॥ ३८ | |
| तदेभिरलमल्यर्थं दुष्टारम्भोक्तिविस्तरैः ।<br>अविद्यान्तर्गतैर्यत्नैः कर्त्तव्यस्तात शोभने ॥ ३९ | |
| विद्याबुद्धिरविद्यायामज्ञानात्तात जायते ।<br>बालोऽग्निं किं न खद्योतमसुरेश्वर मन्यते ॥ ४० | |
| तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये ।<br>आयासायापरं कर्म विद्यान्या शिल्पनैपुणम् ॥ ४१ | |
| तदेतदवगम्याहमसारं सारमुत्तमम् ।<br>निशामय महाभाग प्रणिपत्य ब्रवीमि ते ॥ ४२ | |
| न चिन्तयति को राज्यं को धनं नाभिवाञ्छति ।<br>तथापि भव्यमेवैतदुभयं प्राप्यते नरैः ॥ ४३ | |
| सर्व एव महाभाग महत्त्वं प्रति सोद्यमाः ।<br>तथापि पुंसां भाग्यानि नोद्यमा भूतिहेतवः ॥ ४४ | |
| जडानामविवेकानामशूराणामपि प्रभो ।<br>भाग्यभोज्यानि राज्यानि सन्त्यनीतिम तामपि ॥ ४५ | |
| तस्माद्यतेत पुण्येषु य इच्छेन्महतीं श्रियम् ।<br>यतितव्यं समत्वे च निर्वाणमपि चेच्छता ॥ ४६ |
| ९६ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० १९ |
|---|
देवा मनुष्याः पशवः पक्षिवृक्षसरीसृपाः ।
रूपमेतदनन्तस्य विष्णोर्भिन्नमिव स्थितम् ॥ ४७
एतद्विजानता सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ।
द्रष्टव्यमात्मवद्विष्णुर्यतोऽयं विश्वरूपधृक् ॥ ४८
एवं ज्ञाते स भगवाननादिः परमेश्वरः ।
प्रसीदत्यच्युतस्तस्मिन्प्रसन्ने क्लेशसङ्क्षयः ॥ ४९
श्रीपराशर उवाच
एतच्छ्रुत्वा तु कोपेन समुत्थाय वरासनात् ।
हिरण्यकशिपुः पुत्रं पदा वक्षस्यताडयत् ॥ ५०
उवाच च स कोपेन सामर्षः प्रज्वलन्निव ।
निष्पिष्य पाणिना पाणिं हन्तुकामो जगत्तथा ॥ ५१
हिरण्यकशिपुरुवाच
हे विप्रचित्ते हे राहो हे बलैष महार्णवे ।
नागपाशैर्दृढैर्बद्ध्वा क्षिप्यतां मा विलम्ब्यताम् ॥ ५२
अन्यथा सकला लोकास्तथा दैतेयदानवाः ।
अनुयास्यन्ति मूढस्य मतमस्य दुरात्मनः ॥ ५३
बहुशो वारितोऽस्माभिरयं पापस्तथाप्यरेः ।
स्तुतिं करोति दुष्टानां वध एवोपकारकः ॥ ५४
श्रीपराशर उवाच
ततस्ते सत्वरा दैत्या बद्ध्वा तं नागबन्धनैः ।
भर्तुराज्ञां पुरस्कृत्य चिक्षिपुः सलिलार्णवे ॥ ५५
ततश्चचाल चलता प्रह्लादेन महार्णवः ।
उद्वेलोऽभूत्परं क्षोभमुपेत्य च समन्ततः ॥ ५६
भूर्लोकमखिलं दृष्ट्वा प्लाव्यमानं महाम्भसा ।
हिरण्यकशिपुर्दैत्यानिदमाह महामते ॥ ५७
हिरण्यकशिपुरुवाच
दैतेयाः सकलैः शैलैरत्रैव वरुणालये ।
निश्छिद्रैः सर्वशः सर्वैश्चीयतामेष दुर्मतिः ॥ ५८
नाग्निर्दहति नैवायं शस्त्रैश्छिन्नो न चोरगैः ।
क्षयं नीतो न वातेन न विषेण न कृत्यया ॥ ५९
न मायाभिर्न चैवोच्चात्पातितो न च दिग्गजैः ।
बालोऽतिदुष्टचित्तोऽयं नानेनार्थोऽस्ति जीवता ॥ ६०
|
देव, मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष और सरीसृप-ये सब भगवान् विष्णुसे भिन्न-से स्थित हुए भी वास्तवमें श्रीअनन्तके ही रूप हैं॥ ४७॥ इस बातको जाननेवाला पुरुष सम्पूर्ण चराचर जगत्को आत्मवत् देखे, क्योंकि यह सब विश्व-रूपधारी भगवान् विष्णु ही हैं॥ ४८॥ ऐसा जान लेनेपर वे अनादि परमेश्वर भगवान् अच्युत प्रसन्न होते हैं और उनके प्रसन्न होनेपर सभी क्लेश क्षीण हो जाते हैं॥ ४९॥
**श्रीपराशरजी बोले—**यह सुनकर हिरण्यकशिपुने क्रोधपूर्वक अपने राजसिंहासनसे उठकर पुत्र प्रह्लादके वक्षःस्थलमें लात मारी॥ ५०॥ और क्रोध तथा अमर्षसे जलते हुए मानो सम्पूर्ण संसारको मार डालेगा इस प्रकार हाथ मलता हुआ बोला॥ ५१॥
**हिरण्यकशिपुने कहा—**हे विप्रचित्ते! हे राहो! हे बल! तुमलोग इसे भली प्रकार नागपाशसे बाँधकर महासागरमें डाल दो, देरी मत करो॥ ५२॥ नहीं तो सम्पूर्ण लोक और दैत्य-दानव आदि भी इस मूढ़ दुरात्माके मतका ही अनुगमन करेंगे [ अर्थात् इसकी तरह वे भी विष्णुभक्त हो जायेंगे ] ॥ ५३॥ हमने इसे बहुतेरा रोका, तथापि यह दुष्ट शत्रुको ही स्तुति किये जाता है। ठीक है, दुष्टोंको तो मार देना ही लाभदायक होता है॥ ५४॥
**श्रीपराशरजी बोले—**तब उन दैत्यों ने अपने स्वामीकी आज्ञाको शिरोधार्य कर तुरन्त ही उन्हें नागपाशसे बाँधकर समुद्रमें डाल दिया॥ ५५॥ उस समय प्रह्लादजीके हिलने-डुलनेसे सम्पूर्ण महासागरमें हलचल मच गयी और अत्यन्त क्षोभके कारण उसमें सब ओर ऊँची-ऊँची लहरें उठने लगीं ॥ ५६॥ हे महामते! उस महान् जल-पूरसे सम्पूर्ण पृथिवीको डूबती देख हिरण्यकशिपुने दैत्योंसे इस प्रकार कहा ॥ ५७॥
**हिरण्यकशिपु बोला—**अरे दैत्यो! तुम इस दुर्मतिको इस समुद्रके भीतर ही किसी ओरसे खुला न रखकर सब ओरसे सम्पूर्ण पर्वतोंसे दबा दो॥ ५८॥ देखो, इसे न तो अग्निने जलाया, न यह शस्त्रोंसे कटा, न सर्पोंसे नष्ट हुआ और न वायु, विष और कृत्यासे ही क्षीण हुआ, तथा न यह मायाओंसे, ऊपरसे गिरानेसे अथवा दिग्गजोंसे ही मारा गया। यह बालक अत्यन्त दुष्ट-चित्त है, अब इसके जीवनका कोई प्रयोजन नहीं है॥ ५९-६०॥
अ० १९ ] * प्रथम अंश * ९७
| तदेष तोयमध्ये तु समाक्रान्तो महीधरैः।<br>तिष्ठत्वब्दसहस्रान्तं प्राणान्हास्यति दुर्मतिः॥ ६१ | अतः अब यह पर्वतोंसे लदा हुआ हजारों वर्षतक जलमें ही पड़ा रहे, इससे यह दुर्मति स्वयं ही प्राण छोड़ देगा॥ ६१॥ |
| ततो दैत्या दानवाश्च पर्वतैस्तं महोदधौ।<br>आक्रम्य चयनं चक्रुर्योजनानि सहस्रशः॥ ६२ | तब दैत्य और दानवोंने उसे समुद्रमें ही पर्वतोंसे ढँककर उसके ऊपर हजारों योजनका ढेर कर दिया॥ ६२॥ |
| स चित्तः पर्वतैरन्तः समुद्रस्य महामतिः।<br>तुष्टावाह्निकवेलायामेकाग्रमतिरच्युतम्॥ ६३ | उन महामतिने समुद्रमें पर्वतोंसे लाद दिये जानेपर अपने नित्यकर्मोंके समय एकाग्रचित्तसे श्रीअच्युतभगवान्की इस प्रकार स्तुति की॥ ६३॥ |
| प्रह्लाद उवाच | प्रह्लादजी बोले— |
| नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते पुरुषोत्तम।<br>नमस्ते सर्वलोकात्मन्नमस्ते तिग्मचक्रिणे॥ ६४ | हे कमलनयन! आपको नमस्कार है। हे पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। हे सर्वलोकात्मन्! आपको नमस्कार है। हे तीक्ष्णचक्रधारी प्रभो! आपको बारम्बार नमस्कार है॥ ६४॥ |
| नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च।<br>जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥ ६५ | गो-ब्राह्मण-हितकारी ब्रह्मण्यदेव भगवान् कृष्णको नमस्कार है। जगत्-हितकारी श्रीगोविन्दको बारम्बार नमस्कार है॥ ६५॥ |
| ब्रह्मत्वे सृजते विश्वं स्थितौ पालयते पुनः।<br>रुद्ररूपाय कल्पान्ते नमस्तुभ्यं त्रिमूर्तये॥ ६६ | आप ब्रह्मारूपसे विश्वकी रचना करते हैं, फिर उसके स्थित हो जानेपर विष्णुरूपसे पालन करते हैं और अन्तमें रुद्ररूपसे संहार करते हैं—ऐसे त्रिमूर्तिधारी आपको नमस्कार है॥ ६६॥ |
| देवा यक्षासुराः सिद्धा नागा गन्धर्वकिन्नराः।<br>पिशाचा राक्षसाश्चैव मनुष्याः पशवस्तथा॥ ६७<br>पक्षिणः स्थावराश्चैव पिपीलिकसरीसृपाः।<br>भूम्यापोऽग्निर्नभो वायुः शब्दः स्पर्शस्तथा रसः॥ ६८<br>रूपं गन्धो मनो बुद्धिरात्मा कालस्तथा गुणाः।<br>एतेषां परमार्थश्च सर्वमेतत्त्वमच्युत॥ ६९ | हे अच्युत! देव, यक्ष, असुर, सिद्ध, नाग, गन्धर्व, किन्नर, पिशाच, राक्षस, मनुष्य, पशु, पक्षी, स्थावर, पिपीलिका (चींटी), सरीसृप, पृथिवी, जल, अग्नि, आकाश, वायु, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, मन, बुद्धि, आत्मा, काल और गुण—इन सबके पारमार्थिक रूप आप ही हैं, वास्तवमें आप ही ये सब हैं॥ ६७–६९॥ |
| विद्याविद्ये भवान्सत्यमसत्यं त्वं विषामृते।<br>प्रवृत्तं च निवृत्तं च कर्म वेदोदितं भवान्॥ ७० | आप ही विद्या और अविद्या, सत्य और असत्य तथा विष और अमृत हैं तथा आप ही वेदोक्त प्रवृत्त और निवृत्त कर्म हैं॥ ७०॥ |
| समस्तकर्मभोक्ता च कर्मोपकरणानि च।<br>त्वमेव विष्णो सर्वाणि सर्वकर्मफलं च यत्॥ ७१ | हे विष्णो! आप ही समस्त कर्मोंके भोक्ता और उनकी सामग्री हैं तथा सर्व कर्मोंके जितने भी फल हैं वे सब भी आप ही हैं॥ ७१॥ |
| मय्यन्यत्र तथान्येषु भूतेषु भुवनेषु च।<br>तवैव व्याप्तिरैश्वर्यगुणसंसूचिकी प्रभो॥ ७२ | हे प्रभो! मुझमें तथा अन्यत्र समस्त भूतों और भुवनोंमें आपहीके गुण और ऐश्वर्यकी सूचिका व्याप्ति हो रही है॥ ७२॥ |
| त्वां योगिनश्चिन्तयन्ति त्वां यजन्ति च याजकाः।<br>हव्यकव्यभुगेकस्त्वं पितृदेवस्वरूपधृक्॥ ७३ | योगिगण आपहीका ध्यान धरते हैं और याज्ञिकगण आपहीका यजन करते हैं, तथा पितृगण और देवगणके रूपसे एक आप ही हव्य और कव्यके भोक्ता हैं॥ ७३॥ |
| रूपं महत्ते स्थितमत्र विश्वं<br>ततश्च सूक्ष्मं जगदेतदीश।<br>रूपाणि सर्वाणि च भूतभेदा-<br>स्तेष्वन्तरात्माख्यमतीव सूक्ष्मम्॥ ७४ | हे ईश! यह निखिल ब्रह्माण्ड ही आपका स्थूल रूप है, उससे सूक्ष्म यह संसार (पृथिवीमण्डल) है, उससे भी सूक्ष्म ये भिन्न-भिन्न रूपधारी समस्त प्राणी हैं; उनमें भी जो अन्तरात्मा है वह और भी अत्यन्त सूक्ष्म है॥ ७४॥ |
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| ९८ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० १९ |
|---|
तस्माच्च सूक्ष्मादिविशेषणाना-
मगोचरे यत्परमात्मरूपम्।
किमप्यचिन्त्यं तव रूपमस्ति
तस्मै नमस्ते पुरुषोत्तमाय॥ ७५
उससे भी परे जो सूक्ष्म आदि विशेषणोंका अविषय आपका कोई अचिन्त्य परमात्मस्वरूप है उन पुरुषोत्तमरूप आपको नमस्कार है॥ ७५॥
सर्वभूतेषु सर्वात्मन्या शक्तिरपरा तव।
गुणाश्रया नमस्तस्यै शाश्वतायै सुरेश्वर॥ ७६
हे सर्वात्मन्! समस्त भूतोंमें आपकी जो गुणाश्रया पराशक्ति है, हे सुरेश्वर! उस नित्यस्वरूपिणीको नमस्कार है॥ ७६॥
यातीतागोचरा वाचां मनसां चाविशेषणा।
ज्ञानिज्ञानपरिच्छेद्या तां वन्दे स्वेश्वरीं पराम्॥ ७७
जो वाणी और मनके परे है, विशेषणरहित तथा ज्ञानियोंके ज्ञानसे परिच्छेद्य है उस स्वतन्त्रा पराशक्तिकी मैं वन्दना करता हूँ॥ ७७॥
ॐ नमो वासुदेवाय तस्मै भगवते सदा।
व्यतिरिक्तं न यस्यास्ति व्यतिरिक्तोऽखिलस्य यः॥ ७८
ॐ उन भगवान् वासुदेवको सदा नमस्कार है, जिनसे अतिरिक्त और कोई वस्तु नहीं है तथा जो स्वयं सबसे अतिरिक्त (असंग) हैं॥ ७८॥
नमस्तस्मै नमस्तस्मै नमस्तस्मै महात्मने।
नाम रूपं न यस्यैको योऽस्तित्वेनोपलभ्यते॥ ७९
जिनका कोई भी नाम अथवा रूप नहीं है और जो अपनी सत्तामात्रसे ही उपलब्ध होते हैं उन महात्माको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है॥ ७९॥
यस्यावताररूपाणि समर्चन्ति दिवौकसः।
अपश्यन्तः परं रूपं नमस्तस्मै महात्मने॥ ८०
जिनके पर स्वरूपको न जानते हुए ही देवतागण उनके अवतार-शरीरोंका सम्यक् अर्चन करते हैं उन महात्माको नमस्कार है॥ ८०॥
योऽन्तस्तिष्ठन्नशेषस्य पश्यतीशः शुभाशुभम्।
तं सर्वसाक्षिणं विश्वं नमस्ये परेश्वरम्॥ ८१
जो ईश्वर सबके अन्तःकरणोंमें स्थित होकर उनके शुभाशुभ कर्मोंको देखते हैं उन सर्वसाक्षी विश्वरूप परमेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ८१॥
नमोऽस्तु विष्णवे तस्मै यस्याभिन्नमिदं जगत्।
ध्येयः स जगतामाद्यः स प्रसीदतु मेऽव्ययः॥ ८२
जिनसे यह जगत् सर्वथा अभिन्न है उन श्रीविष्णु-भगवान्को नमस्कार है, वे जगत्के आदिकारण और योगियोंके ध्येय अव्यय हरि मुझपर प्रसन्न हों॥ ८२॥
यत्रोतमेतत्प्रोतं च विश्वमक्षरमव्ययम्।
आधारभूतः सर्वस्य स प्रसीदतु मे हरिः॥ ८३
जिनमें यह सम्पूर्ण विश्व ओतप्रोत है वे अक्षर, अव्यय और सबके आधारभूत हरि मुझपर प्रसन्न हों॥ ८३॥
ॐ नमो विष्णवे तस्मै नमस्तस्मै पुनः पुनः।
यत्र सर्वं यतः सर्वं यः सर्वं सर्वसंश्रयः॥ ८४
ॐ जिनमें सब कुछ स्थित है, जिनसे सब उत्पन्न हुआ है और जो स्वयं सब कुछ तथा सबके आधार हैं, उन श्रीविष्णुभगवान्को नमस्कार है, उन्हें बारम्बार नमस्कार है॥ ८४॥
सर्वगत्वादनन्तस्य स एवाहमवस्थितः।
मत्तः सर्वमहं सर्वं मयि सर्वं सनातने॥ ८५
भगवान् अनन्त सर्वगामी हैं; अतः वे ही मेरे रूपसे स्थित हैं, इसलिये यह सम्पूर्ण जगत् मुझसे ही हुआ है, मैं ही यह सब कुछ हूँ और मुझ सनातनमें ही यह सब स्थित है॥ ८५॥
अहमेवाक्षयो नित्यः परमात्मात्मसंश्रयः।
ब्रह्मसंज्ञोऽहमेवाग्रे तथान्ते च परः पुमान्॥ ८६
मैं ही अक्षय, नित्य और आत्माधार परमात्मा हूँ; तथा मैं ही जगत्के आदि और अन्तमें स्थित ब्रह्मसंज्ञक परमपुरुष हूँ॥ ८६॥
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमोंऽशे एकोनविंशतितमोऽध्यायः॥ १९॥
अ० २० ] * प्रथम अंश * ९९
बीसवाँ अध्याय
प्रह्लादकृत भगवत्-स्तुति और भगवान्का आविर्भाव
श्रीपराशर उवाच
एवं सञ्चिन्तयन्विष्णुमभेदेनात्मनो द्विज।
तन्मयत्वमवाप्याग्र्यं मेने चात्मानमच्युतम्॥ १
विसस्मार तथात्मानं नान्यत्किञ्चिदजानत।
अहमेवाव्ययोऽनन्तः परमात्मेत्यचिन्तयत्॥ २
तस्य तद्भावनायोगात्क्षीणपापस्य वै क्रमात्।
शुद्धेऽन्तःकरणे विष्णुस्तस्थौ ज्ञानमयोऽच्युतः॥ ३
योगप्रभावात्प्रह्लादे जाते विष्णुमयेऽसुरे।
चलत्युरगबन्धैस्तैर्मैत्रेय त्रुटितं क्षणात्॥ ४
भ्रान्तग्राहगणः सोर्मिर्ययौ क्षोभं महार्णवः।
चचाल च मही सर्वा सशैलवनकानना॥ ५
स च तं शैलसङ्घातं दैत्यैर्न्यस्तमथोपरि।
उत्क्षिप्य तस्मात्सलिलान्निश्चक्राम महामतिः॥ ६
दृष्ट्वा च स जगद्भूयो गगनाद्युपलक्षणम्।
प्रह्लादोऽस्मीति सस्मार पुनरात्मानमात्मनि॥ ७
तुष्टाव च पुनर्धीमाननादिं पुरुषोत्तमम्।
एकाग्रमतिरव्यग्रो यतवाक्कायमानसः॥ ८
प्रह्लाद उवाच
ॐ नमः परमार्थार्थ स्थूलसूक्ष्म क्षराक्षर।
व्यक्ताव्यक्त कलातीत सकलेश निरञ्जन॥ ९
गुणाञ्जन गुणाधार निर्गुणात्मन् गुणस्थित।
मूर्त्तामूर्त्तमहामूर्ते सूक्ष्ममूर्ते स्फुटास्फुट॥ १०
करालसौम्यरूपात्मन्विद्याऽविद्यामयाच्युत।
सदसद्रूपसद्भाव सदसद्भावभावन॥ ११
नित्यानित्यप्रपञ्चात्मन्निष्प्रपञ्चामलाश्रित।
एकानेक नमस्तुभ्यं वासुदेवादिकारण॥ १२
श्रीपराशरजी बोले— हे द्विज! इस प्रकार भगवान् विष्णुको अपनेसे अभिन्न चिन्तन करते-करते पूर्ण तन्मयता प्राप्त हो जानेसे उन्होंने अपनेको अच्युत रूप ही अनुभव किया॥ १॥ वे अपने-आपको भूल गये; उस समय उन्हें श्रीविष्णुभगवान्के अतिरिक्त और कुछ भी प्रतीत न होता था। बस, केवल यही भावना चित्तमें थी कि मैं ही अव्यय और अनन्त परमात्मा हूँ॥ २॥ उस भावनाके योगसे वे क्षीण-पाप हो गये और उनके शुद्ध अन्तःकरणमें ज्ञानस्वरूप अच्युत श्रीविष्णुभगवान् विराजमान हुए॥ ३॥
हे मैत्रेय! इस प्रकार योगबलसे असुर प्रह्लादजीके विष्णुमय हो जानेपर उनके विचलित होनेसे वे नागपाश एक क्षणभरमें ही टूट गये॥ ४॥ भ्रमणशील ग्राहगण और तरलतरंगोंसे पूर्ण सम्पूर्ण महासागर क्षुब्ध हो गया, तथा पर्वत और वनोपवनोंसे पूर्ण समस्त पृथिवी हिलने लगी॥ ५॥ तथा महामति प्रह्लादजी अपने ऊपर दैत्योंद्वारा लादे गये उस सम्पूर्ण पर्वत-समूहको दूर फेंककर जलसे बाहर निकल आये॥ ६॥ तब आकाशादिरूप जगत्को फिर देखकर उन्हें चित्तमें यह पुनः भान हुआ कि मैं प्रह्लाद हूँ॥ ७॥ और उन महाबुद्धिमान्ने मन, वाणी और शरीरके संयमपूर्वक धैर्य धारणकर एकाग्रचित्तसे पुनः भगवान् अनादि पुरुषोत्तमकी स्तुति की॥ ८॥
प्रह्लादजी कहने लगे— हे परमार्थ! हे अर्थ (दृश्यरूप)! हे स्थूलसूक्ष्म (जाग्रत्-स्वप्नदृश्य-स्वरूप)! हे क्षराक्षर (कार्य-कारणरूप)! हे व्यक्ताव्यक्त (दृश्यादृश्यस्वरूप)! हे कलातीत! हे सकलेश्वर! हे निरंजन देव! आपको नमस्कार है॥ ९॥ हे गुणोंको अनुरंजित करनेवाले! हे गुणाधार! हे निर्गुणात्मन्! हे गुणस्थित! हे मूर्त्त और अमूर्तरूप महामूर्तिमन्! हे सूक्ष्ममूर्ते! हे प्रकाशाप्रकाशस्वरूप! [आपको नमस्कार है]॥ १०॥ हे विकराल और सुन्दररूप! हे विद्या और अविद्यामय अच्युत! हे सदसत् (कार्यकारण) रूप जगत्के उद्भवस्थान और सदसज्जगत्के पालक! [आपको नमस्कार है]॥ ११॥ हे नित्यानित्य (आकाशघटादिरूप) प्रपञ्चात्मन्! हे प्रपंचसे पृथक् रहनेवाले! हे ज्ञानियोंके आश्रयरूप! हे एकानेकरूप आदिकारण वासुदेव! [आपको नमस्कार है]॥ १२॥
| १०० | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० २० |
|---|
यः स्थूलसूक्ष्मः प्रकटप्रकाशो
यः सर्वभूतो न च सर्वभूतः।
विश्वं यतश्चैतदविश्वहेतो-
र्नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय॥ १३
जो स्थूल-सूक्ष्मरूप और स्फुट-प्रकाशमय हैं, जो अधिष्ठानरूपसे सर्वभूतस्वरूप तथापि वस्तुतः सम्पूर्ण भूतादिसे परे हैं, विश्वके कारण न होनेपर भी जिनसे यह समस्त विश्व उत्पन्न हुआ है; उन पुरुषोत्तम भगवान्को नमस्कार है॥ १३॥
श्रीपराशर उवाच
तस्य तच्चेतसो देवः स्तुतिमित्थं प्रकुर्वतः।
आविर्बभूव भगवान् पीताम्बरधरो हरिः॥ १४
ससम्भ्रमस्तमालोक्य समुत्थायाकुलाक्षरम्।
नमोऽस्तु विष्णवेत्येतद् व्याजहारासकृद् द्विज॥ १५
श्रीपराशरजी बोले— उनके इस प्रकार तन्मयता-पूर्वक स्तुति करनेपर पीताम्बरधारी देवाधिदेव भगवान् हरि प्रकट हुए॥ १४॥ हे द्विज! उन्हें सहसा प्रकट हुए देख वे खड़े हो गये और गद्गद वाणीसे 'विष्णुभगवान्को नमस्कार है! विष्णुभगवान्को नमस्कार है!' ऐसा बारम्बार कहने लगे॥ १५॥
प्रह्राद उवाच
देव प्रपन्नार्त्तिहर प्रसादं कुरु केशव।
अवलोकनदानेन भूयो मां पावयाच्युत॥ १६
प्रह्लादजी बोले— हे शरणागत-दुःखहारी श्रीकेशवदेव! प्रसन्न होइये। हे अच्युत! अपने पुण्य-दर्शनोंसे मुझे फिर भी पवित्र कीजिये॥ १६॥
श्रीभगवानुवाच
कुर्वतस्ते प्रसन्नोऽहं भक्तिमव्यभिचारिणीम्।
यथाभिलषितो मत्तः प्रह्लाद व्रियतां वरः॥ १७
श्रीभगवान् बोले— हे प्रह्लाद! मैं तेरी अनन्यभक्तिसे अति प्रसन्न हूँ; तुझे जिस वरकी इच्छा हो माँग ले॥ १७॥
प्रह्राद उवाच
नाथ योनिसहस्रेषु येषु येषु व्रजाम्यहम्।
तेषु तेष्वच्युताभक्तिरच्युतास्तु सदा त्वयि॥ १८
या प्रीतिरविवेकानां विषयेष्वनपायिनी।
त्वामनुस्मरतः सा मे हृदयान्मापसर्पतु॥ १९
प्रह्लादजी बोले— हे नाथ! सहस्रों योनियोंमेंसे मैं जिस-जिसमें भी जाऊँ उसी-उसीमें, हे अच्युत! आपमें मेरी सर्वदा अक्षुण्ण भक्ति रहे॥ १८॥ अविवेकी पुरुषोंकी विषयोंमें जैसी अविचल प्रीति होती है वैसी ही आपका स्मरण करते हुए मेरे हृदयसे कभी दूर न हो॥ १९॥
श्रीभगवानुवाच
मयि भक्तिस्तवास्त्येव भूयोऽप्येवं भविष्यति।
वरस्तु मत्तः प्रह्लाद व्रियतां यस्तवेप्सितः॥ २०
श्रीभगवान् बोले— हे प्रह्लाद! मुझमें तो तेरी भक्ति है ही और आगे भी ऐसी ही रहेगी; किन्तु इसके अतिरिक्त भी तुझे और जिस वरकी इच्छा हो मुझसे माँग ले॥ २०॥
प्रह्राद उवाच
मयि द्वेषानुबन्धोऽभूत्संस्तुतावुद्यते तव।
मत्पितुस्तत्कृतं पापं देव तस्य प्रणश्यतु॥ २१
शस्त्राणि पातितान्यङ्गे क्षिप्तो यच्चाग्निसंहतौ।
दंशितश्चोरगैर्दत्तं यद्विषं मम भोजने॥ २२
बद्धा समुद्रे यत्क्षिप्तो यच्चितोऽस्मि शिलोच्चयैः।
अन्यानि चाप्यसाधूनि यानि पित्रा कृतानि मे॥ २३
त्वयि भक्तिमतो द्वेषादघं तत्सम्भवं च यत्।
त्वत्प्रसादात्प्रभो सद्यस्तेन मुच्येत मे पिता॥ २४
प्रह्लादजी बोले— हे देव! आपकी स्तुतिमें प्रवृत्त होनेसे मेरे पिताके चित्तमें मेरे प्रति जो द्वेष हुआ है, उन्हें उससे जो पाप लगा है वह नष्ट हो जाय॥ २१॥ इसके अतिरिक्त [उनकी आज्ञासे] मेरे शरीरपर जो शस्त्राघात किये गये—मुझे अग्निसमूहमें डाला गया, सर्पोंसे कटवाया गया, भोजनमें विष दिया गया, बाँधकर समुद्रमें डाला गया, शिलाओंसे दबाया गया तथा और भी जो-जो दुर्व्यवहार पिताजीने मेरे साथ किये हैं, वे सब आपमें भक्ति रखनेवाले पुरुषके प्रति द्वेष होनेसे, उन्हें उनके कारण जो पाप लगा है, हे प्रभो! आपकी कृपासे मेरे पिता उससे शीघ्र ही मुक्त हो जायँ॥ २२—२४॥
श्रीभगवानुवाच
प्रह्लाद सर्वमेतत्ते मत्प्रसादाद्भविष्यति।
अन्यच्च ते वरं दद्मि व्रियतामसुरात्मज॥ २५
श्रीभगवान् बोले— हे प्रह्लाद! मेरी कृपासे तुम्हारी ये सब इच्छाएँ पूर्ण होंगी। हे असुरकुमार! मैं तुमको एक वर और भी देता हूँ, तुम्हें जो इच्छा हो माँग लो॥ २५॥
अ० २० ] * प्रथम अंश * १०१
| प्रह्लाद उवाच | प्रह्लादजी बोले— |
|---|---|
| कृतकृत्योऽस्मि भगवन्वरेणानेन यत्त्वयि।<br>भवित्री त्वत्प्रसादेन भक्तिरव्यभिचारिणी ॥ २६<br>धर्मार्थकामैः किं तस्य मुक्तिस्तस्य करे स्थिता।<br>समस्तजगतां मूले यस्य भक्तिः स्थिरा त्वयि ॥ २७ | हे भगवन्! मैं तो आपके इस वरसे ही कृतकृत्य हो गया कि आपकी कृपासे आपमें मेरी निरन्तर अविचल भक्ति रहेगी ॥ २६ ॥ हे प्रभो ! सम्पूर्ण जगत्के कारणरूप आपमें जिसकी निश्चल भक्ति है, मुक्ति भी उसकी मुट्ठीमें रहती है, फिर धर्म, अर्थ, कामसे तो उसे लेना ही क्या है ? ॥ २७ ॥ |
| श्रीभगवानुवाच | श्रीभगवान् बोले— |
| यथा ते निश्चलं चेतो मयि भक्तिसमन्वितम्।<br>तथा त्वं मत्प्रसादेन निर्वाणं परमाप्स्यसि ॥ २८ | हे प्रह्लाद! मेरी भक्तिसे युक्त तेरा चित्त जैसा निश्चल है उसके कारण तू मेरी कृपासे परम निर्वाणपद प्राप्त करेगा ॥ २८ ॥ |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
| इत्युक्त्वान्तर्दधे विष्णुस्तस्य मैत्रेय पश्यतः।<br>स चापि पुनरागम्य ववन्दे चरणौ पितुः ॥ २९<br>तं पिता मूर्घ्न्युपाघ्राय परिष्वज्य च पीडितम्।<br>जीवसीत्याह वत्सेति बाष्पार्द्रनयनो द्विज ॥ ३०<br>प्रीतिमांश्चाऽभवत्तस्मिन्ननुतापी महासुरः।<br>गुरुपित्रोश्चकारैवं शुश्रूषां सोऽपि धर्मवित् ॥ ३१<br>पितर्युपरतिं नीते नरसिंहस्वरूपिणा।<br>विष्णुना सोऽपि दैत्यानां मैत्रेयाभूत्पतिस्ततः ॥ ३२<br>ततो राज्यद्युतिं प्राप्य कर्मशुद्धिकरीं द्विज।<br>पुत्रपौत्रांश्च सुबहूनवाप्यैश्वर्यमेव च ॥ ३३<br>क्षीणाधिकारः स यदा पुण्यपापविवर्जितः।<br>तदा स भगवद्ध्यानात्परं निर्वाणमाप्तवान् ॥ ३४<br>एवंप्रभावो दैत्योऽसौ मैत्रेयासीन्महामतिः।<br>प्रह्लादो भगवद्भक्तो यं त्वं मामनुपृच्छसि ॥ ३५<br>यस्त्वेतच्चरितं तस्य प्रह्लादस्य महात्मनः।<br>शृणोति तस्य पापानि सद्यो गच्छन्ति सङ्क्षयम् ॥ ३६<br>अहोरात्रकृतं पापं प्रह्लादचरितं नरः।<br>शृण्वन् पठंश्च मैत्रेय व्यपोहति न संशयः ॥ ३७<br>पौर्णमास्याममावास्यामष्टम्यामथ वा पठन्।<br>द्वादश्यां वा तदाप्नोति गोप्रदानफलं द्विज ॥ ३८<br>प्रह्लादं सकलापत्सु यथा रक्षितवान्हरिः।<br>तथा रक्षति यस्तस्य शृणोति चरितं सदा ॥ ३९ | हे मैत्रेय ! ऐसा कह भगवान् उनके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये; और उन्होंने भी फिर आकर अपने पिताके चरणोंकी वन्दना की ॥ २९ ॥ हे द्विज ! तब पिता हिरण्यकशिपुने, जिसे नाना प्रकारसे पीड़ित किया था उस पुत्रका सिर सूँघकर, आँखोंमें आँसू भरकर कहा—'बेटा, जीता तो है !' ॥ ३० ॥ वह महान् असुर अपने कियेपर पछताकर फिर प्रह्लादसे प्रेम करने लगा और इसी प्रकार धर्मज्ञ प्रह्लादजी भी अपने गुरु और माता-पिताकी सेवा-शुश्रूषा करने लगे ॥ ३१ ॥ हे मैत्रेय ! तदनन्तर नृसिंहरूपधारी भगवान् विष्णुद्वारा पिताके मारे जानेपर वे दैत्योंके राजा हुए ॥ ३२ ॥ हे द्विज ! फिर प्रारब्धक्षयकारिणी राज्यलक्ष्मी, बहुत-से पुत्र-पौत्रादि तथा परम ऐश्वर्य पाकर, कर्माधिकारके क्षीण होनेपर पुण्य-पापसे रहित हो भगवान्का ध्यान करते हुए उन्होंने परम निर्वाणपद प्राप्त किया ॥ ३३-३४ ॥<br>हे मैत्रेय ! जिनके विषयमें तुमने पूछा था वे परम भगवद्भक्त महामति दैत्यप्रवर प्रह्लादजी ऐसे प्रभावशाली हुए ॥ ३५ ॥ उन महात्मा प्रह्लादजीके इस चरित्रको जो पुरुष सुनता है उसके पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ॥ ३६ ॥ हे मैत्रेय ! इसमें सन्देह नहीं कि मनुष्य प्रह्लाद-चरित्रके सुनने या पढ़नेसे दिन-रातके (निरन्तर) किये हुए पापसे अवश्य छूट जाता है ॥ ३७ ॥ हे द्विज ! पूर्णिमा, अमावास्या, अष्टमी अथवा द्वादशीको इसे पढ़नेसे मनुष्यको गोदानका फल मिलता है ॥ ३८ ॥ जिस प्रकार भगवान्ने प्रह्लादजीकी सम्पूर्ण आपत्तियोंसे रक्षा की थी उसी प्रकार वे सर्वदा उसकी भी रक्षा करते हैं जो उनका चरित्र सुनता है ॥ ३९ ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमंऽशे विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
१०२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २१
इक्कीसवाँ अध्याय
कश्यपजीकी अन्य स्त्रियोंके वंश एवं मरुद्गणकी उत्पत्तिका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| संह्लादपुत्र आयुष्माञ्छिबिर्बाष्कल एव च।<br>विरोचनस्तु प्राह्लादिर्बलिर्जज्ञे विरोचनात्॥ १ | संह्लादके पुत्र आयुष्मान् शिबि और बाष्कल थे तथा प्रह्लादके पुत्र विरोचन थे और विरोचनसे बलिका जन्म हुआ॥ १॥ |
| बलेः पुत्रशतं त्वासीद्बाणज्येष्ठं महामुने।<br>हिरण्याक्षसुताश्चासन्सर्व एव महाबलाः॥ २<br>उत्कुरः शकुनिश्चैव भूतसन्तापनस्तथा।<br>महानाभो महाबाहुः कालनाभस्तथापरः॥ ३ | हे महामुने! बलिके सौ पुत्र थे जिनमें बाणासुर सबसे बड़ा था। हिरण्याक्षके पुत्र उत्कुर, शकुनि, भूतसन्तापन, महानाभ, महाबाहु तथा कालनाभ आदि सभी महाबलवान् थे॥ २-३॥ |
| अभवन्द्वनुपुत्राश्च द्विमूर्द्धा शम्बरस्तथा।<br>अयोमुखः शङ्कुशिराः कपिलः शङ्करस्तथा॥ ४<br>एकचक्रो महाबाहुस्तारकश्च महाबलः।<br>स्वर्भानुर्वृषपर्वा च पुलोमश्च महाबलः॥ ५<br>एते दनोः सुताः ख्याता विप्रचित्तिश्च वीर्यवान्॥ ६ | (कश्यपजीकी एक दूसरी स्त्री) दनुके पुत्र द्विमूर्धा, शम्बर, अयोमुख, शंकुशिरा, कपिल, शंकर, एकचक्र, महाबाहु, तारक, महाबल, स्वर्भानु, वृषपर्वा, महाबली पुलोम और परमपराक्रमी विप्रचित्ति थे। ये सब दनुके पुत्र विख्यात हैं॥ ४-६॥ |
| स्वर्भानोस्तु प्रभा कन्या शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी।<br>उपदानी हयशिराः प्रख्याता वरकन्यकाः॥ ७ | स्वर्भानुकी कन्या प्रभा थी तथा शर्मिष्ठा, उपदानी और हयशिरा—ये वृषपर्वाकी परम सुन्दरी कन्याएँ विख्यात हैं॥ ७॥ |
| वैश्वानरसुते चोभे पुलोमा कालका तथा।<br>उभे सुते महाभागे मारीचेस्तु परिग्रहः॥ ८ | वैश्वानरकी पुलोमा और कालका दो पुत्रियाँ थीं। हे महाभाग! वे दोनों कन्याएँ मरीचिनन्दन कश्यपजीकी भार्या हुईं॥ ८॥ |
| ताभ्यां पुत्रसहस्राणि षष्टिर्दानवसत्तमाः।<br>पौलोमाः कालकेयाश्च मारीचतनयाः स्मृताः॥ ९ | उनके पुत्र साठ हजार दानव-श्रेष्ठ हुए। मरीचिनन्दन कश्यपजीके वे सभी पुत्र पौलोम और कालकेय कहलाये॥ ९॥ |
| ततोऽपरे महावीर्या दारुणास्त्वतिनिर्घृणाः।<br>सिंहिकायामथोत्पन्ना विप्रचित्तेः सुतास्तथा॥ १० | इनके सिवा विप्रचित्तिके सिंहिकाके गर्भसे और भी बहुत-से महाबलवान्, भयंकर और अतिक्रूर पुत्र उत्पन्न हुए॥ १०॥ |
| व्यंशः शल्यश्च बलवान् नभश्चैव महाबलः।<br>वातापी नमुचिश्चैव इल्वलः खसृमस्तथा॥ ११<br>अन्धको नरकश्चैव कालनाभस्तथैव च।<br>स्वर्भानुश्च महावीर्यो वक्त्रयोधी महासुरः॥ १२ | वे व्यंश, शल्य, बलवान् नभ, महाबली वातापी, नमुचि, इल्वल, खसृम, अन्धक, नरक, कालनाभ, महावीर, स्वर्भानु और महादैत्य वक्त्र योधी थे॥ ११-१२॥ |
| एते वै दानवाः श्रेष्ठा दनुवंशविवर्द्धनाः।<br>एतेषां पुत्रपौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः॥ १३ | ये सब दानवश्रेष्ठ दनुके वंशको बढ़ानेवाले थे। इनके और भी सैकड़ों-हजारों पुत्र-पौत्रादि हुए॥ १३॥ |
| प्रह्लादस्य तु दैत्यस्य निवातकवचाः कुले।<br>समुत्पन्नाः सुमहता तपसा भावितात्मनः॥ १४ | महान् तपस्याद्वारा आत्मज्ञानसम्पन्न दैत्यवर प्रह्लादजीके कुलमें निवातकवच नामक दैत्य उत्पन्न हुए॥ १४॥ |
| षट् सुताः सुमहास्तत्त्वास्ताम्रायाः परिकीर्त्तिताः।<br>शुकी श्येनी च भासी च सुग्रीवीशुचिगृध्रिकाः॥ १५ | कश्यपजीकी स्त्री ताम्राकी शुकी, श्येनी, भासी, सुग्रीवी, शुचि और गृध्रिका—ये छः अति प्रभावशालिनी कन्याएँ कही जाती हैं॥ १५॥ |
अ० २१ ] * प्रथम अंश * १०३
शुकी शुकानजनयदूलूकप्रत्युलूकिकान्।
श्येनी श्येनांस्तथा भासी भासान्गृध्रांश्च गृध्र्यपि॥ १६
शुच्यौदकान्पक्षिगणान्सुग्रीवी तु व्यजायत।
अश्वानुष्ट्रान्गर्दभांश्च ताम्रावंशः प्रकीर्त्तितः॥ १७
विनतायास्तु द्वौ पुत्रौ विख्यातौ गरुडारुणौ।
सुपर्णः पततां श्रेष्ठो दारुणः पन्नगाशनः॥ १८
सुरसायां सहस्रं तु सर्पाणाममितौजसाम्।
अनेकfilterशिरसां ब्रह्मन् खेचराणां महात्मनाम्॥ १९
काद्रवेयास्तु बलिनः सहस्त्रममितौजसः।
सुपर्णवशगा ब्रह्मन् जज्ञिरे नैक मस्तकाः॥ २०
तेषां प्रधानभूतास्तु शेषवासुकितक्षकाः।
शङ्खश्वेतो महापद्मः कम्बलाश्वतरौ तथा॥ २१
एलापुत्रस्तथा नागः कर्कोटकधनञ्जयौ।
एते चान्ये च बहवो दन्दशूका विषोल्बणाः॥ २२
गणं क्रोधवशं विद्धि तस्याः सर्वे च दंष्ट्रिणः।
स्थलजाः पक्षिणोऽब्जाश्च दारुणाः पिशिताशनाः॥ २३
क्रोधा तु जनयामास पिशाचांश्च महाबलान्।
गास्तु वै जनयामास सुरभिर्महिषांस्तथा।
इरावृक्षलतावल्लीस्तृणजातीश्च सर्वशः॥ २४
खसा तु यक्षरक्षांसि मुनिरप्सरसस्तथा।
अरिष्टा तु महासत्त्वान् गन्धर्वान्समजीजनत्॥ २५
एते कश्यपदायदाः कीर्त्तिताः स्थाणुजङ्गमाः।
तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः॥ २६
एष मन्वन्तरे सर्गो ब्रह्मन्स्वारोचिषे स्मृतः॥ २७
वैवस्वते च महति वारुणे वितते कृतौ।
जुह्वानस्य ब्रह्मणो वै प्रजासर्ग इहोच्यते॥ २८
पूर्वं यत्र तु सप्तर्षीनुत्पन्नान्सप्तमानसान्।
पितृत्वे कल्पयामास स्वयमेव पितामहः।
गन्धर्वभोगिदेवानां दानवानां च सत्तम॥ २९
दितिर्विनष्टपुत्रा वै तोषयामास काश्यपम्।
तया चाराधितः सम्यक् काश्यपस्तपसां वरः॥ ३०
वरेणच्छन्दयामास सा च वव्रे ततो वरम्।
पुत्रमिन्द्रवधार्थाय समर्थममितौजसम्॥ ३१
शुकीसे शुक, उलूक एवं उलूकोंके प्रतिपक्षी काक आदि उत्पन्न हुए तथा श्येनीसे श्येन (बाज), भासीसे भास और गृध्रिकासे गृद्ध्रोंका जन्म हुआ॥ १६॥ शुचिसे जलके पक्षिगण और सुग्रीवीसे अश्व, उष्ट्र और गर्दभोंकी उत्पत्ति हुई। इस प्रकार यह ताम्राका वंश कहा जाता है॥ १७॥ विनताके गरुड और अरुण ये दो पुत्र विख्यात हैं। इनमें पक्षियोंमें श्रेष्ठ सुपर्ण (गरुडजी) अति भयंकर और सर्पोंको खानेवाले हैं॥ १८॥ हे ब्रह्मन्! सुरसासे सहस्रों सर्प उत्पन्न हुए जो बड़े ही प्रभावशाली, आकाशमें विचरनेवाले, अनेक सिरोंवाले और बड़े विशालकाय थे॥ १९॥ और कद्रूके पुत्र भी महाबली और अमित तेजस्वी अनेक सिरवाले सहस्रों सर्प ही हुए जो गरुडजीके वशवर्ती थे॥ २०॥ उनमेंसे शेष, वासुकि, तक्षक, शंखश्वेत, महापद्म, कम्बल, अश्वतर, एलापुत्र, नाग, कर्कोटक, धनंजय तथा और भी अनेक उग्र विषधर एवं काटनेवाले सर्प प्रधान हैं॥ २१-२२॥ क्रोधवशाके पुत्र क्रोधवशगण हैं। वे सभी बड़ी-बड़ी दाढ़ोंवाले, भयंकर और कच्चा मांस खानेवाले जलचर, स्थलचर एवं पक्षिगण हैं॥ २३॥ महाबली पिशाचोंको भी क्रोधाने ही जन्म दिया है। सुरभिसे गौ और महिष आदिकी उत्पत्ति हुई तथा इरासे वृक्ष, लता, बेल और सब प्रकारके तृण उत्पन्न हुए हैं॥ २४॥ खसाने यक्ष और राक्षसोंको, मुनिने अप्सराओंको तथा अरिष्टाने अति समर्थ गन्धर्वोंको जन्म दिया॥ २५॥ ये सब स्थावर-जंगम कश्यपजीकी सन्तान हुए। इनके और भी सैकड़ों-हजारों पुत्र-पौत्रादि हुए॥ २६॥ हे ब्रह्मन्! यह स्वारोचिष-मन्वन्तरकी सृष्टिका वर्णन कहा जाता है॥ २७॥ वैवस्वत-मन्वन्तरके आरम्भमें महान् वरुण यज्ञ हुआ, उसमें ब्रह्माजी होता थे, अब मैं उनकी प्रजाका वर्णन करता हूँ॥ २८॥
हे साधुश्रेष्ठ! पूर्व-मन्वन्तरमें जो सप्तर्षिगण स्वयं ब्रह्माजीके मानसपुत्ररूपसे उत्पन्न हुए थे, उन्हींको ब्रह्माजीने इस कल्पमें गन्धर्व, नाग, देव और दानवादिके पितृरूपसे निश्चित किया॥ २९॥ पुत्रोंके नष्ट हो जानेपर दितिने कश्यपजीको प्रसन्न किया। उसकी सम्यक् आराधनासे सन्तुष्ट हो तपस्वियोंमें श्रेष्ठ कश्यपजीने उसे वर देकर प्रसन्न किया। उस समय उसने इन्द्रके वध करनेमें समर्थ एक अति तेजस्वी पुत्रका वर माँगा॥ ३०-३१॥
१०४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २१
स च तस्मै वरं प्रादाद्भार्यायै मुनिसत्तमः ।
दत्त्वा च वरमत्युग्रं कश्यपस्तामुवाच ह ॥ ३२
शक्रं पुत्रो निहन्ता ते यदि गर्भं शरच्छतम् ।
समाहितातिप्रयता शौचिनी धारयिष्यसि ॥ ३३
इत्येवमुक्त्वा तां देवीं सङ्गतः कश्यपो मुनिः ।
दधार सा च तं गर्भं सम्यक्छौचसमन्विता ॥ ३४
गर्भमात्मवधार्थाय ज्ञात्वा तं मघवानपि ।
शुश्रूषुस्तामथागच्छद्दिनयादमराधिपः ॥ ३५
तस्याश्चैवान्तरप्रेप्सुरतिष्ठत्पाकशासनः ।
ऊने वर्षशते चास्या ददर्शान्तरमात्मना ॥ ३६
अकृत्वा पादयोः शौचं दितिः शयनमाविशत् ।
निद्रा चाहारयामास तस्याः कुक्षिं प्रविश्य सः ॥ ३७
वज्रपाणिर्महागर्भं चिच्छेदाथ स सप्तधा ।
सम्पीड्यमानो वज्रेण स रुरोदातिदारुणम् ॥ ३८
मा रोदीरिति तं शक्रः पुनः पुनः पुनरभाषत ।
सोऽभवत्सप्तधा गर्भस्तमिन्द्रः कुपितः पुनः ॥ ३९
एकैकं सप्तधा चक्रे वज्रेणारिविदारिणा ।
मरुतो नाम देवास्ते बभूवुरतिवेगिनः ॥ ४०
यदुक्तं वै भगवता तेनैव मरुतोऽभवन् ।
देवा एकोनपञ्चाशत्सहाया वज्रपाणिनः ॥ ४१
मुनिश्रेष्ठ कश्यपजीने अपनी भार्या दितिको वह वर दिया और उस अति उग्र वरको देते हुए वे उससे बोले- ॥ ३२ ॥ "यदि तुम भगवान्के ध्यानमें तत्पर रहकर अपना गर्भ शौच* और संयमपूर्वक सौ वर्षतक धारण कर सकोगी तो तुम्हारा पुत्र इन्द्रको मारनेवाला होगा" ॥ ३३ ॥ ऐसा कहकर मुनि कश्यपजीने उस देवीसे संगमन किया और उसने बड़े शौचपूर्वक रहते हुए वह गर्भ धारण किया ॥ ३४ ॥
उस गर्भको अपने वधका कारण जान देवराज इन्द्र भी विनयपूर्वक उसकी सेवा करनेके लिये आ गये ॥ ३५ ॥ उसके शौचादिमें कभी कोई अन्तर पड़े- यही देखनेकी इच्छासे इन्द्र वहाँ हर समय उपस्थित रहते थे। अन्तमें सौ वर्षमें कुछ ही कमी रहनेपर उन्होंने एक अन्तर देख ही लिया ॥ ३६ ॥ एक दिन दिति बिना चरण-शुद्धि किये ही अपनी शय्यापर लेट गयी। उस समय निद्राने उसे घेर लिया। तब इन्द्र हाथमें वज्र लेकर उसकी कुक्षिमें घुस गये और उस महागर्भके सात टुकड़े कर डाले। इस प्रकार वज्रसे पीड़ित होनेसे वह गर्भ जोर-जोरसे रोने लगा ॥ ३७-३८ ॥ इन्द्रने उससे पुनः-पुनः कहा कि 'मत रो'। किन्तु जब वह गर्भ सात भागोंमें विभक्त हो गया, [और फिर भी न मरा ] तो इन्द्रने अत्यन्त कुपित हो अपने शत्रु-विनाशक वज्रसे एक-एकके सात-सात टुकड़े और कर दिये। वे ही अति वेगवान् मरुत् नामक देवता हुए ॥ ३९-४० ॥ भगवान् इन्द्रने जो उससे कहा था कि 'मा रोदीः' (मत रो) इसीलिये वे मरुत् कहलाये। ये उनचास मरुद्गण इन्द्रके सहायक देवता हुए ॥ ४१ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमंशे एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
* शौच आदि नियम मत्स्यपुराणमें इस प्रकार बतलाये गये हैं-
सन्ध्यायां नैव भोक्तव्यं गर्भिण्या वरवर्णिनि । न स्थातव्यं न गन्तव्यं वृक्षमूलेषु सर्वदा ॥
वर्जयेत् कलहं लोके गात्रभङ्गं तथैव च। नोन्मुक्तकेशी तिष्ठेच्च नाशुचिः स्यात् कदाचन ॥
हे सुन्दरि! गर्भिणी स्त्रीको चाहिये कि सायंकालमें भोजन न करे, वृक्षोंके नीचे न जाय और न वहाँ ठहरे ही तथा लोगोंके साथ कलह और अँगड़ाई लेना छोड़ दे, कभी केश खुला न रखे और न अपवित्र ही रहे।
तथा भागवतमें भी कहा है—'न हिंस्यात्सर्वभूतानि न शपेन्नानृतं वदेत्' इत्यादि। अर्थात् प्राणियोंकी हिंसा न करे, किसीको बुरा-भला न कहे और कभी झूठ न बोले।
अ० २२ ] * प्रथम अंश * १०५
बाईसवाँ अध्याय
विष्णुभगवान्की विभूति और जगत्की व्यवस्थाका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले—पूर्वकालमें महर्षियोंने जब महाराज पृथुको राज्यपदपर अभिषिक्त किया तो लोक-पितामह श्रीब्रह्माजीने भी क्रमसे राज्योंका बँटवारा किया॥ १॥ ब्रह्माजीने नक्षत्र, ग्रह, ब्राह्मण, सम्पूर्ण वनस्पति और यज्ञ तथा तप आदिके राज्यपर चन्द्रमाको नियुक्त किया॥ २॥ इसी प्रकार विश्रवाके पुत्र कुबेरजीको राजाओंका, वरुणको जलोंका, विष्णुको आदित्योंका और अग्निको वसुगणोंका अधिपति बनाया॥ ३॥ दक्षको प्रजापतियोंका, इन्द्रको मरुद्गणका तथा प्रह्लादजीको दैत्य और दानवोंका आधिपत्य दिया॥ ४॥ पितृगणके राज्यपदपर धर्मराज यमको अभिषिक्त किया और सम्पूर्ण गजराजोंका स्वामित्व ऐरावतको दिया॥ ५॥ गरुडको पक्षियोंका, इन्द्रको देवताओंका, उच्चैःश्रवाको घोड़ोंका और वृषभको गौओंका अधिपति बनाया॥ ६॥ प्रभु ब्रह्माजीने समस्त मृगों (वन्यपशुओं)-का राज्य सिंहको दिया और सर्पोंका स्वामी शेषनागको बनाया॥ ७॥ स्थावरोंका स्वामी हिमालयको, मुनिजनोंका कपिलदेवजीको और नख तथा दाढ़वाले मृगगणका राजा व्याघ्र (बाघ)-को बनाया॥ ८॥ तथा प्लक्ष (पाकर)-को वनस्पतियोंका राजा किया। इसी प्रकार ब्रह्माजीने और-और जातियोंके प्राधान्यकी भी व्यवस्था की॥ ९॥ |
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| यदाभिषिक्तः स पृथुः पूर्वं राज्ये महर्षिभिः।<br>ततः क्रमेण राज्यानि ददौ लोकपितामहः॥ १ | |
| नक्षत्रग्रहविप्राणां वीरुधां चाप्यशेषतः।<br>सोमं राज्ये दधद्ब्रह्मा यज्ञानां तपसामपि॥ २ | |
| राज्ञां वैश्रवणं राज्ये जलानां वरुणं तथा।<br>आदित्यानां पतिं विष्णुं वसूनामथ पावकम्॥ ३ | |
| प्रजापतीनां दक्षं तु वासवं मरुतामपि।<br>दैत्यानां दानवानां च प्रह्लादमधिपं ददौ॥ ४ | |
| पितॄणां धर्मराजं तं यमं राज्येऽभ्यषेचयत्।<br>ऐरावतं गजेन्द्राणामशेषाणां पतिं ददौ॥ ५ | |
| पतत्रिणां तु गरुडं देवानापि वासवम्।<br>उच्चैःश्रवसमश्वानां वृषभं तु गवामपि॥ ६ | |
| मृगाणां चैव सर्वेषां राज्ये सिंहं ददौ प्रभुः।<br>शेषं तु दन्दशूकानामकरोत्पतिमव्ययः॥ ७ | |
| हिमालयं स्थावराणां मुनीनां कपिलं मुनिम्।<br>नखिनां दंष्ट्रिणां चैव मृगाणां व्याघ्रमीश्वरम्॥ ८ | |
| वनस्पतीनां राजानं प्लक्षमेवाभ्यषेचयत्।<br>एवमेवान्यजातीनां प्राधान्येनाकरोत्प्रभून्॥ ९ | |
| एवं विभज्य राज्यानि दिशां पालाननन्तरम्।<br>प्रजापतिपतिर्ब्रह्मा स्थापयामास सर्वतः॥ १० | इस प्रकार राज्योंका विभाग करनेके अनन्तर प्रजापतियोंके स्वामी ब्रह्माजीने सब ओर दिक्पालोंकी स्थापना की॥ १०॥ उन्होंने पूर्व-दिशामें वैराज प्रजापतिके पुत्र राजा सुधन्वाको दिक्पालपदपर अभिषिक्त किया॥ ११॥ तथा दक्षिण-दिशामें कर्दम प्रजापतिके पुत्र राजा शंखपदकी नियुक्ति की॥ १२॥ कभी च्युत न होनेवाले रजसपुत्र महात्मा केतुमान्को उन्होंने पश्चिम-दिशामें स्थापित किया॥ १३॥ और पर्जन्य प्रजापतिके पुत्र अति दुर्द्धर्ष राजा हिरण्यरोमाको उत्तर-दिशामें अभिषिक्त किया॥ १४॥ वे आजतक सात द्वीप और अनेकों नगरोंसे युक्त इस सम्पूर्ण पृथिवीका अपने-अपने विभागानुसार धर्मपूर्वक पालन करते हैं॥ १५॥ |
| पूर्वस्यां दिशि राजानं वैराजस्य प्रजापतेः।<br>दिशापालं सुधन्वानं सुतं वै सोऽभ्यषेचयत्॥ ११ | |
| दक्षिणस्यां दिशि तथा कर्दमस्य प्रजापतेः।<br>पुत्रं शङ्खपदं नाम राजानं सोऽभ्यषेचयत्॥ १२ | |
| पश्चिमस्यां दिशि तथा रजसः पुत्रमच्युतम्।<br>केतुमन्तं महात्मानं राजानं सोऽभ्यषेचयत्॥ १३ | |
| तथा हिरण्यरोमाणं पर्जन्यस्य प्रजापतेः।<br>उदीच्यां दिशि दुर्द्धर्षं राजानमभ्यषेचयत्॥ १४ | |
| तैरियं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपत्तना।<br>यथाप्रदेशमद्यापि धर्मतः परिपाल्यते॥ १५ |
१०६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २२
| एते सर्वे प्रवृत्तस्य स्थितौ विष्णोर्महात्मनः।<br>विभूतिभूता राजानो ये चान्ये मुनिसत्तम॥ १६<br>ये भविष्यन्ति ये भूताः सर्वे भूतेश्वरा द्विज।<br>ते सर्वे सर्वभूतस्य विष्णोरंशा द्विजोत्तम॥ १७<br>ये तु देवाधिपतयो ये च दैत्याधिपास्तथा।<br>दानवानां च ये नाथा ये नाथाः पिशिताशिनाम्॥ १८<br>पशूनां ये च पतयः पतयो ये च पक्षिणाम्।<br>मनुष्याणां च सर्पाणां नागानामधिपाश्च ये॥ १९<br>वृक्षाणां पर्वतानां च ग्रहाणां चापि येऽधिपाः।<br>अतीता वर्त्तमानाश्च ये भविष्यन्ति चापरे।<br>ते सर्वे सर्वभूतस्य विष्णोरंशसमुद्भवाः॥ २०<br>न हि पालनसामर्थ्यमृते सर्वेश्वरं हरिम्।<br>स्थितं स्थितौ महाप्राज्ञ भवत्यन्यस्य कस्यचित्॥ २१<br>सृजत्येष जगत्सृष्टौ स्थितौ पाति सनातनः।<br>हन्ति चैवान्तकत्वेन रजःसत्त्वादि संश्रयः॥ २२<br>चतुर्विभागः संसृष्टौ चतुर्धा संस्थितः स्थितौ।<br>प्रलयं च करोत्यन्ते चतुर्भेदो जनार्दनः॥ २३<br>एकेनांशेन ब्रह्मासौ भवत्यव्यक्तमूर्त्तिमान्।<br>मरीचिमिश्राः पतयः प्रजानां चान्यभागशः॥ २४<br>कालस्तृतीयस्तस्यांशः सर्वभूतानि चापरः।<br>इत्थं चतुर्धा संसृष्टौ वर्त्ततेऽसौ रजोगुणः॥ २५<br>एकांशेनास्थितो विष्णुः करोति प्रतिपालनम्।<br>मन्वादिरूपश्चान्येन कालरूपोऽपरेण च॥ २६<br>सर्वभूतेषु चान्येन संस्थितः कुरुते स्थितिम्।<br>सत्त्वं गुणं समाश्रित्य जगतः पुरुषोत्तमः॥ २७<br>आश्रित्य तमसो वृत्तिमन्तकाले तथा पुनः।<br>रुद्रस्वरूपो भगवानेकांशेन भवत्यजः॥ २८<br>अग्न्यन्तकादिरूपेण भागेनान्येन वर्त्तते।<br>कालस्वरूपो भागो यस्सर्वभूतानि चापरः॥ २९<br>विनाशं कुर्वतस्तस्य चतुर्द्धैवं महात्मनः।<br>विभागकल्पना ब्रह्मन् कथ्यते सार्वकालिकी॥ ३०<br>ब्रह्मा दक्षादयः कालस्तथैवाखिलजन्तवः।<br>विभूतयो हरेरेता जगतः सृष्टिहेतवः॥ ३१ | हे मुनिसत्तम! ये तथा अन्य भी जो सम्पूर्ण राजालोग हैं वे सभी विश्वके पालनमें प्रवृत्त परमात्मा श्रीविष्णुभगवान्के विभूतिरूप हैं॥१६॥ हे द्विजोत्तम! जो-जो भूताधिपति पहले हो गये हैं और जो-जो आगे होंगे वे सभी सर्वभूत भगवान् विष्णुके अंश हैं॥१७॥ जो-जो भी देवताओं, दैत्यों, दानवों और मांसभोजियोंके अधिपति हैं, जो-जो पशुओं, पक्षियों, मनुष्यों, सर्पों और नागोंके अधिनायक हैं, जो-जो वृक्षों, पर्वतों और ग्रहोंके स्वामी हैं तथा और भी भूत, भविष्यत् एवं वर्तमानकालीन जितने भूतेश्वर हैं वे सभी सर्वभूत भगवान् विष्णुके अंशसे उत्पन्न हुए हैं॥१८-२०॥ हे महाप्राज्ञ! सृष्टिके पालन-कार्यमें प्रवृत्त सर्वेश्वर श्रीहरिको छोड़कर और किसीमें भी पालन करनेकी शक्ति नहीं है॥२१॥ रजः और सत्त्वादि गुणोंके आश्रयसे वे सनातन प्रभु ही जगत्की रचनाके समय रचना करते हैं, स्थितिके समय पालन करते हैं और अन्तसमयमें कालरूपसे संहार करते हैं॥२२॥<br>वे जनार्दन चार विभागसे सृष्टिके और चार विभागसे ही स्थितिके समय रहते हैं तथा चार रूप धारण करके ही अन्तमें प्रलय करते हैं॥२३॥ एक अंशसे वे अव्यक्तस्वरूप ब्रह्मा होते हैं, दूसरे अंशसे मरीचि आदि प्रजापति होते हैं, उनका तीसरा अंश काल है और चौथा सम्पूर्ण प्राणी। इस प्रकार वे रजोगुणविशिष्ट होकर चार प्रकारसे सृष्टिके समय स्थित होते हैं॥२४-२५॥ फिर वे पुरुषोत्तम सत्त्वगुणका आश्रय लेकर जगत्की स्थिति करते हैं। उस समय वे एक अंशसे विष्णु होकर पालन करते हैं, दूसरे अंशसे मनु आदि होते हैं तथा तीसरे अंशसे काल और चौथेसे सर्वभूतोंमें स्थित होते हैं॥२६-२७॥ तथा अन्तकालमें वे अजन्मा भगवान् तमोगुणकी वृत्तिका आश्रय ले एक अंशसे रुद्ररूप, दूसरे भागसे अग्नि और अन्तकादि रूप, तीसरेसे कालरूप और चौथेसे सम्पूर्ण भूतस्वरूप हो जाते हैं॥२८-२९॥ हे ब्रह्मन्! विनाश करनेके लिये उन महात्माकी यह चार प्रकारकी सार्वकालिक विभागकल्पना कही जाती है॥३०॥ ब्रह्मा, दक्ष आदि प्रजापतिगण, काल तथा समस्त प्राणी—ये श्रीहरिकी विभूतियाँ जगत्की सृष्टिकी कारण हैं॥३१॥ |