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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

नौवां अध्याय

नौवां अध्याय देव सवितः प्रसुव यज्ञं प्रसुव यज्ञपतिं भगाय. दिव्यो गन्धर्वः केतपूः केतं नः पुनातु वाचस्पतिर्वाजं नः स्वदतु स्वाहा.. (१) हे सविता! हम आप की कृपा से इस यज्ञ को विधिवत पूरा करें. आप यज्ञपति को सौभाग्यवान बनाने की कृपा कीजिए. आप की किरणें दिव्य हैं. आप उन किरणों से हमारे अन्न को पवित्र कीजिए. हमारा वह अन्न वाचस्पति देव को भी बलवान बनाने वाला हो. वाचस्पति देव के लिए स्वाहा. वह अन्न हमें भी स्वादिष्ट लगे. ( १ ) ध्रुवसदं त्वा नृषदं मनःसद्मुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टमम्. अप्सुषदं त्वा घृतसदं व्योमसद्मुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टमम्. पृथिविसदं त्वान्तरिक्षसदं दिविसदं देवसदं नाकसदमुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टमम्.. (२) हे सोम! आप ध्रुव ( स्थिर ) रूप से प्रतिष्ठा प्राप्त हैं. आप मनुष्यों के मन में रमते हैं. आप इंद्र देव की योनि हैं. इंद्र देव भी आप को ग्रहण करते हैं. आप उपयाम ( पात्र ) में पधारिए. आप सर्वाधिक चाहे गए देव हैं. आप जल, घी व व्योम ( आकाश ) में वास करते हैं. हम आप को इंद्र के लिए ग्रहण करते हैं. आप इंद्र देव की योनि व इष्टतम हैं. आप बरतन में पधारने की कृपा कीजिए. आप पृथ्वी, अंतरिक्ष व स्वर्गलोक में निवास करते हैं. आप देवों के योग्य हैं. आप सोम को इंद्र देव के लिए ग्रहण करते हैं. आप इंद्र देव की योनि और आप इष्टतम हैं. ( २ ) अपा ँश रसमुद्वयस ँश सूर्ये सन्त ँश समाहितम्. अपा ँश रसस्य यो रसस्तं वो गृह्णाम्युत्तममुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टमम्.. (३) हे सोम! आप जल और रसों के सार, सूर्य में समाए व जल के सार के भी सार हैं. उस रस को हम पात्र में ग्रहण करते हैं. हम आप को इंद्र देव के लिए बरतन में ग्रहण यजुर्वेद - १०७

पूर्वार्ध नौवां अध्याय करते हैं. हम आप को वायु के लिए बरतन में ग्रहण करते हैं. आप इंद्र देव के इष्टतम और इंद्र की योनि हैं. हम यजमान इंद्र देव के लिए आप को ग्रहण करते हैं. ( ३ ) ग्रहा ऽ ऊर्जाहुतयो व्यन्तो विप्राय मतिम्. तेषां विशिप्रियाणां वोहमिषमूर्ज ꣳ समग्रभमुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टतमम्. सम्पृचौ स्थः सं मा भद्रेण पृङ्क्तं विपृचौ स्थो वि मा पाप्मना पृङ्क्तं.. (४) हे सोम और सोमरस के पात्रो! हम ऊर्जा पाने के लिए आप का आह्वान करते हैं. आप ब्राह्मणों की बुद्धि विस्तृत करते हैं. आप यजमानों के लिए ऊर्जस्वी रस को भलीभांति स्थापित करते हैं. हम आप दोनों को इंद्र देव के लिए उपयाम पात्र में स्थापित करते हैं. आप इंद्र देव की योनि हैं. आप दोनों इंद्र देव के अभीष्ट हैं. आप दोनों संपृक्त ( साथसाथ ) रह कर हमारा कल्याण व हमें सुख प्रदान कीजिए. आप दोनों पृथक् ( अलग ) रह कर हमें पापों से दूर करने की कृपा कीजिए. ( ४ ) इन्द्रस्य वज्रोसि वाजसास्त्वयायं वाज ꣳ सेत्. वाजस्य नु प्रसवे मातरं महीमदितिं नाम वचसा करामहे. यस्यामिदं विश्वं भुवनमाविवेश तस्यां नो देवः सविता धर्म ꣳ साविषत्.. (५) आप इंद्र देव के वज्र और अन्नमय हैं. आप से यजमान को भी अन्न प्राप्त हो. हम अपनी ( मंत्रमय ) वाणी से धरती को अन्न उपजाने के लिए प्रेरित करते हैं. पृथ्वी को देवों की माता अदिति के समान प्रेरित करते हैं. सारा संसार ( लोक ) सविता देव के वश में है. सविता हमें धार्मिक बनाएं. वे हमें गतिशील बनाने की कृपा करें. ( ५ ) अप्सवन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तिष्वश्वा भवत वाजिनः. देवीरापो यो व ऽ ऊर्मिः प्रकूर्त्तिः ककुन्मान् वाजसास्तेनायं वाज ꣳ सेत्.. (६) जल के भीतर अमृत व ओषधियां हैं. हम उन का सेवन कर के घोड़े की तरह बलवान हो जाएं. हे जल समूह! आप की तरंगें ऊंची हैं और लहरें वेगशाली हैं. आप की ऊंचीऊंची तरंगें हमें अन्न प्रदान करने की कृपा करें. ( ६ ) वातो वा मनो वा गन्धर्वाः सप्तवि ꣳ शतिः. ते अग्रेऽश्वमयुञ्जँस्ते अस्मिञ्जवमादधुः.. (७) वायु, मन, गंधर्व आदि ने पहले ही सात से तिगुने यानी सत्ताईस घोड़े अपने साथ जोत लिए हैं. वे आगेआगे ( जल्दीजल्दी ) आ कर हमारे यज्ञ की बढ़ोतरी करने की कृपा करें. ( ७ ) वातर ꣳ हा भव वाजिन्युज्यमान ऽ इन्द्रस्येव दक्षिणः श्रियैधि. युञ्जन्तु त्वा मरुतो विश्ववेदस ऽ आ ते त्वष्टा पत्सु जवं दधातु.. (८) १०८ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध नौवां अध्याय

पूर्वार्ध नौवां अध्याय हे अग्नि! आप बलवान हैं. आप रथ में जुत कर वायु की तरह वेगवान बन जाइए. आप इंद्र देव के दक्षिणी भाग की शोभा बढ़ाने की कृपा कीजिए. आप को मरुद्गण रथ में जोतने की कृपा करें. त्वष्टा देव! आप पैरों में बल धारण कीजिए. ( ८ ) जवो यस्ते वाजिन्निहितो गुहा यः श्येने परीत्तो अचरच्च वाते. तेन नो वाजिन् बलवान् बलेन वाजजिच्च भव समने च पारयिष्णुः. वाजिनो वाजजितो वाज ँ४ सरिष्यन्तो बृहस्पतेर्भागमवजिघ्रत.. (९) हे बलशाली! आप हमें भी अपने बल से बलवान बनाइए. हमें अपना वह वेग दे दीजिए जो आप के हृदय में है, श्येन पक्षी के उड़ने में है और वायु की गति में है. आप हमें बलवान बनाइए ताकि हम शत्रुओं के पार जा सकें. हे अन्न जीतने वाले! आप हमें बलदायी अन्न दीजिए. हम अन्न की चाह से बृहस्पति के भाग को सूंघ सकें. ( ९ ) देवस्याह ँ४ सवितुः सवे सत्यसवसो बृहस्पतेरुत्तमं नाक ँ४ रुहेयम्. देवस्याह ँ४ सवितुः सवे सत्यसवस ऽ इन्द्रस्योत्तमं नाक ँ४ रुहेयम्. देवस्याह ँ४ सवितुः सवे सत्यप्रसवसो बृहस्पतेरुत्तमं नाकमरुहम्. देवस्याह ँ४ सवितुः सवे सत्यप्रसवस ऽ इन्द्रस्योत्तमं नाकमरुहम्.. (१०) सविता देव की कृपा से हम सत्य मार्ग पर चल सकें. बृहस्पति के उत्तम स्वर्ग का आरोहण कर सकें. सविता देव की कृपा से हम सत्य मार्ग पर चल सकें. इंद्र देव के उत्तम स्वर्ग का आरोहण कर सकें. सत्य उपजाने वाले सविता देव की कृपा से हम बृहस्पति के श्रेष्ठ स्वर्ग में चढ़ गए. सत्य उपजाने वाले सविता देव की कृपा से इंद्र देव के श्रेष्ठ स्वर्ग में चढ़ गए. ( १० ) बृहस्पते वाजं जय बृहस्पतये वाचं वदत बृहस्पतिं वाजं जापयत. इन्द्र वाजं जयेन्द्राय वाचं वदतेन्द्रं वाजं जापयत.. (११) हे बृहस्पति! आप विजय पाइए. हे यजमानो! आप बृहस्पति देव के लिए मंत्र गाइए. आप व बृहस्पति देव को और अधिक बल मिल सके, इस के लिए जप कीजिए. हे इंद्र देव! आप विजय पाइए. हे यजमानो! आप इंद्र देव के लिए मंत्र गाइए. इंद्र देव को और अधिक बल मिल सके, इस के लिए आप जप कीजिए. ( ११ ) एषा वः सा सत्या संवागभूद्यया बृहस्पतिं वाजमजीजपताजीजपत बृहस्पतिं वाजं वनस्पतयो विमुच्यध्वम्. एषा वः सा सत्या संवागभूद्ययेन्द्रं वाजमजीजपताजीजपतेन्द्रं वाजं वनस्पतयो विमुच्यध्वम्.. (१२) हे वादको, वाद्य यंत्र बजाने वालो! आप एक साथ ऐसा स्वर निकालिए, जिस यजुर्वेद - १०९

पूर्वार्ध नौवां अध्याय से बृहस्पति देव की विजय हो. हे वनस्पतियो! हे वन के स्वामी! आप अपने घोड़े आदि छोड़ दीजिए. जिस से इंद्र देव की विजय हो सके. इस विजय के बाद हे सेनापतियो! आप घोड़े, हाथी आदि को आराम देने की कृपा कीजिए. ( १२ ) देवस्याह १४ सवितुः सवे सत्यप्रसवसो बृहस्पतेर्वाजजितो वाजं जेष्म्. वाजिनो वाजजितोध्वन स्कम्भुवन्तो योजना मिमानाः काष्ठां गच्छत.. (१३) सविता देव! सत्य मार्ग के प्रेरक व सभी को प्रकाशित करने वाले हैं. युद्ध में विजयी होने वाले बृहस्पति देव का बल पा कर हम भी युद्ध में विजय पाएं. हमारे बलशाली घोड़े बहुत वेगवान हैं. उन की कृपा से हम युद्ध में विजय पाते हैं. हम शत्रुओं का मार्ग रोक कर इन्हीं घोड़ों के कारण कोसों की दूरी नापते हैं. सीमा के पार पहुंच सकते हैं. ( १३ ) एष स्य वाजी क्षिपणिं तुरण्यति ग्रीवायां बद्धो अपिकक्ष ऽ आसनि. क्रतुं दधिक्रा ऽ अनु स १४ सनिष्यदत्पथामङ्का १४ स्यन्वापनीफणत् स्वाहा.. (१४) गरदन से लगाम, जीन आदि से बंधा हुआ यह घोड़ा वेग से चलता है. यह रास्ते की सभी बाधाओं को पार कर लेता है. यह यज्ञ का अनुकरण और घोड़े पर बैठा वीर शत्रुओं पर ( सफलता से ) प्रहार करता है. इस ( अश्व ) के लिए स्वाहा. ( १४ ) उत स्मास्य द्रवतस्तुरण्यतः पर्णं न वेरनुवाति प्रगर्धिनः. श्येनस्येव ध्रजतो अङ्कसं परि दधिक्राव्णः सहोर्जा तरित्रतः स्वाहा.. (१५) हे यजमानो! जो पराक्रमी है, जो तीर की तरह वेगवान है, जो घोड़े की तरह वेगशाली है, जो सत्यवादी है, जो बाज पक्षी की तरह वेगवान है, जिस घोड़े पर बैठ कर वीर युद्धों में शत्रुओं पर विजय पाता है, यह आहुति उसी के लिए समर्पित है. ( १५ ) शं नो भवन्तु वाजिनो हवेषु देवताता मितद्रवः स्वर्काः. जम्भयन्तोहिं वृक १७ रक्षा १७ सि सनेम्यस्मद्युयवनमीवाः... (१६) बलवान घोड़े हमारे लिए सुखदायी हों. वे दैवी आहुतियों में और भी सुशोभित हों. ये घोड़े भेड़ियों की तरह आक्रमण करने वाले शत्रुओं को दूर करने की कृपा करें. सांप जैसे विश्वासघातियों से हमारी रक्षा करें. विघ्न करने वालों को हम से दूर करने की कृपा करें. ( १६ ) ते नो अर्वन्तो हवनश्रुतो हवं विश्वे शृण्वन्तु वाजिनो मितद्रवः. सहस्रसा मेधसाता सनिष्यवो महो ये धन १४ समिथेषु जभ्रिरे.. (१७) हे यजमानो! वीर घोड़े पर सवारी करने वाले हैं. वे बहुत अधिक वेगवान हैं. वे वीर हमारी वाणी को सुनने की कृपा करें. जो वीर हजारों को आनंद देते हैं, जो ११० - यजुर्वेद

पूर्वार्ध नौवां अध्याय वीर लोगों की आवश्यकता की पूर्ति करते हैं, जो वीर यज्ञ के अधिष्ठाता हैं, वे वीर धनवान व महिमावान होते हैं. ( १७ ) वाजे-वाजे ऽ वत वाजिनो नो धनेषु विप्रा ऽ अमृता ऽ ऋतज्ञाः. अस्य मध्वः पिबत मादयध्वं तृप्ता यात पथिभिर्देवयानैः.. (१८) हे अश्वो! आप बलवान हैं. ब्राह्मण, सत्य के ज्ञाता हमें धनधान्यमय बनाएं. हमारा पालनपोषण करने की कृपा करें. बलवान घोड़े मधुर रस पी कर मदमस्त हो कर तृप्त होते हुए देवयान पथ से आगे बढ़ने की कृपा करें. ( १८ ) आ मा वाजस्य प्रसवो जगम्यादेमे द्यावापृथिवी विश्वरूपे. आ मा गन्तां पितरा मातरा चा मा सोमो अमृतत्वेन गम्यात्. वाजिनो वाजजितो वाज ꣳ ससृवा ꣳ सो बृहस्पतेर्भागमवजिघ्रत निमृजानाः.. (१९) स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक हमारी रक्षा के लिए पधारें. सभी देवता हमारी रक्षा के लिए आएं. मातापिता हमारी रक्षा के लिए आएं. हमें सोम रस के रूप में अमृत प्राप्त हो. युद्ध में जीतने वाले वीर और बलशाली हों. बृहस्पति देव के अन्न भाग को पवित्र मन से प्राप्त करने की कृपा कीजिए. ( १९) आपये स्वाहा स्वापये स्वाहापिजाय स्वाहा क्रतवे स्वाहा वसवे स्वाहाहर्पतये स्वाहाह्ने मुग्धाय स्वाहा मुग्धाय वैन् ꣳ शिनाय स्वाहा विन् ꣳ शिन ऽ आन्त्यायनाय स्वाहान्त्याय भौवनाय स्वाहा भुवनस्य पतये स्वाहाधिपतये स्वाहा.. (२०) देवताओं की कृपा के लिए स्वाहा. अपने सुख के लिए स्वाहा. बारबार जन्म लेने वाले देवता के लिए स्वाहा. यज्ञ देव के लिए स्वाहा. वसु देव के लिए स्वाहा. दिनपति के लिए स्वाहा. मोहित करने वाले दिन के लिए स्वाहा. अंतगति तक पहुंचाने वाले अविनाशी हेतु स्वाहा. लोक के लिए स्वाहा. भुवनपति के लिए स्वाहा. अधिपति के लिए स्वाहा. ( २० ) आयुर्यज्ञेन कल्पतां प्राणो यज्ञेन कल्पतां चक्षुर्यज्ञेन कल्पता ꣳ श्रोत्रं यज्ञेन कल्पतां पृष्ठं यज्ञेन कल्पतां यज्ञो यज्ञेन कल्पताम्. प्रजापतेः प्रजा ऽ अभूम स्वर्देवा ऽ अगन्मामृता ऽ अभूम.. (२१) यज्ञ से हमारी आयु बढ़े. यज्ञ से हमारे प्राणों की बढ़ोतरी हो. यज्ञ से हमारी नेत्रज्योति बढ़े. यज्ञ से हमारी श्रवणशक्ति बढ़े. यज्ञ से हमारी पीठ बढ़े. यज्ञ से हमारे यज्ञ का विस्तार हो. हम प्रजापति की प्रजा हों. हम अपने में देवत्व पाएं. हम अमरता पाएं. ( २१ ) अस्मे वो ऽ अस्त्विन्द्रियमस्मे नृम्णमुत क्रतुरस्मे वर्चा ꣳ सि सन्तु वः. नमो मात्रे पृथिव्यै नमो मात्रे पृथिव्या ऽ इयं ते राड्यन्तासि यमनो ध्रुवोसि धरुणः. कृष्यै त्वा क्षेमाय त्वा रय्यै त्वा पोषाय त्वा.. (२२) यजुर्वेद - १११

पूर्वार्ध नौवां अध्याय पृथ्वी माता आप को नमस्कार. पृथ्वी माता के लिए नमस्कार. आप के धन हमें प्राप्त हों. आप की क्षमता, तेजस्विता व अनुशासन हमें प्राप्त हो. आप स्थिर और धारणशील हैं. हम कृषि और अपनी कुशल क्षेम के लिए आप की शरण में आते हैं. हम धन प्राप्ति व अपने पोषण के लिए आप की शरण में आते हैं. ( २२ ) वाजस्येमं प्रसवः सुषुवे ऽ ग्रे सोम १७ राजानमोषधीष्वप्सु. ता ऽ अस्मभ्यं मधुमतीर्भवन्तु वय १७ राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः स्वाहा.. (२३) सोम ओषधियों, जल समूह के राजा और बलवान हैं. परमपिता ने सब से पहले सोम को प्रकटाया. वे सोमरस वाली ओषधियां हमें मधुमान बनाएं. हम राष्ट्र को जागृत कर सकें. पुरोहितों के लिए स्वाहा. ( २३ ) वाजस्येमां प्रसवः शिश्रिये दिवमिमा च विश्वा भुवनानि सम्राट्. अदित्सन्तं दापयति प्रजानन्स नो रयि १७ सर्ववीरं नियच्छतु स्वाहा.. (२४) परमात्मा ने अन्न उपजाया है. उन्होंने सारे लोकों को शरण दी है. उन्होंने स्वर्गलोक को शरण दी है. परमपिता देवताओं को आहुति प्रदान करने के लिए हमें धन प्रदान करने की कृपा करें. परमपिता हमें सर्वाधिक वीर संतति प्रदान करें. परमपिता ( शुभ कार्यों ) के लिए हमारी बुद्धि को प्रेरित करने की कृपा करें. ( २४ ) वाजस्य नु प्रसव ऽ आबभूवेमा च विश्वा भुवनानि सर्वतः. सनेमि राजा परियाति विद्वान् प्रजां पुष्टिं वर्धयमानो अस्मे स्वाहा.. (२५) परमपिता ने अन्न उपजाया. सारे लोकों को उपजाया. सब ओर से लोकों को उपजाया. परमपिता सर्वज्ञाता, विद्वान्, प्रजा पालक और बढ़ोतरी करने वाले हैं. उन परमपिता के लिए यह आहुति अर्पित है. ( २५ ) सोम १७ राजानमवसेग्निमन्वारभामहे. आदित्यान्विष्णु १७ सूर्य ब्रह्माणं च बृहस्पति १७ स्वाहा.. (२६) परमपिता ने हमारे लिए राजा, अग्नि आदि देवों को उपजाया. हम यज्ञ के आरंभ में उन देवताओं की उपासना करते हैं. आदित्य देवता के लिए स्वाहा. विष्णु देवता के लिए स्वाहा. सूर्य देवता के लिए स्वाहा. ब्रह्म देवता के लिए स्वाहा बृहस्पति देव के लिए स्वाहा. ( २६ ) अर्यमणं बृहस्पतिमिन्द्रं दानाय चोदय. वाचं विष्णु १७ सरस्वती १७ सवितारं च वाजिन १७ स्वाहा.. (२७) हे परमात्मा! आप अर्यमा बृहस्पति और इंद्र देव को दान के लिए प्रेरित करने की कृपा कीजिए. विष्णु देव, सरस्वती देवी, सविता देव के लिए वाणी सहित स्वाहा. ( २७ ) ११२ - यजुर्वेद 632/7

पूर्वार्ध नौवां अध्याय अग्ने अच्छा वदेह नः प्रति नः सुमना भव. प्र नो यच्छ सहस्रजित्त्व १४ हि धनदा ऽ असि स्वाहा.. (२८) हे अग्नि! आप हमारे प्रति अच्छा मन रखिए. आप हमारे लिए अच्छी तरह मार्ग निर्देश और उपदेश कीजिए. आप अकेले ही हजारों को जीत सकते हैं. आप धनदाता हैं. आप के लिए स्वाहा. ( २८ ) प्र नो यच्छत्वर्यमा प्र पूषा प्र बृहस्पतिः. प्र वाग्देवी ददातु नः स्वाहा.. (२९) अर्यमा देव, पूषा देव, बृहस्पति देव व वाग् देवी हमारी अभिलाषा पूरी करें. हम आप सब को आहुतियां प्रदान करते हैं. ( २९ ) देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. सरस्वत्यै वाचो यन्तुर्यन्त्रिये दधामि बृहस्पतेष्ट्वा साम्राज्येनाभिषिञ्चाम्यसौ.. (३०) सविता देव सब को उपजाने वाले हैं. हम अश्विनीकुमार की बाहु और पूषा देव के हाथों से यज्ञ देव की ऊर्जा को धारण करते हैं. सरस्वती देवी वाणी से नियंत्रित करती हैं. बृहस्पति देव श्रेष्ठ साम्राज्य के नियंत्रक हैं, संचालक हैं. हम आप को सींचते हैं. ( ३० ) अग्निरेकाक्षरेण प्राणमुदजयत्तमुज्जेषमश्विनौ द्व्यक्षरेण द्विपदो मनुष्यानुदजयतां तानुज्जेषं विष्णुस्त्र्यक्षरेण त्रींल्लोकानुदजयत्तानुज्जेष १४ सोमश्चतुरक्षरेण चतुष्पदः पशूनुदजयत्तानुज्जेषम्.. (३१) अग्नि ने एक अक्षर से ऊर्ध्वगामी प्राण पर विजय हासिल की वैसे ही हम भी विजय पाएं. दो अक्षर से अश्विनीकुमारों ने दो पैरों वाले मनुष्यों को जीता. हम भी उस जीत का अनुकरण करें. विष्णु देव ने तीन अक्षरों से तीनों लोकों पर विजय पाई. हम भी उस जीत का अनुसरण करें. सोम ने चार अक्षरों से चौपायों को जीता, उसी प्रकार हम भी उन की कृपा से उस जीत का अनुकरण करें. ( ३१ ) पूषा पञ्चाक्षरेण पञ्च दिश ऽ उदजयत्ता ऽ उज्जेष १४ सविता षडक्षरेण षडृतूनुदजयत्तानुज्जेषं मरुतः सप्ताक्षरेण सप्त ग्राम्यान् पशूनुदजयँस्तानुज्जेषं बृहस्पतिरष्टाक्षरेण गायत्रीमुदजयत्तामुज्जेषम्.. (३२) पूषा देवता ने पांच अक्षरों से पांचों दिशाओं पर विजय पाई, वैसे ही हम भी विजय पाएं. सविता देव ने छह अक्षरों से छह ऋतुओं पर विजय पाई, वैसे ही हम भी विजय पाएं. मरुद्गणों ने सात अक्षरों से सात गांवों और पशुओं पर विजय पाई. बृहस्पति देव ने आठ अक्षरों से गायत्री पर विजय पाई, उसी प्रकार हम भी विजय पाएं. ( ३२ ) यजुर्वेद - ११३

पूर्वार्ध नौवां अध्याय मित्रो नवाक्षरेण त्रिवृत ँ४ स्तोममुदजयत्तमुज्जेषं वरुणो दशाक्षरेण विराजमुदजयत्तामुज्जेषमिन्द्र ऽ एकादशाक्षरेण त्रिष्टुभमुदजयत्तामुज्जेषं विश्वेदेवा द्वादशाक्षरेण जगतीमुदजयँस्तामुज्जेषम्.. ( ३३ ) मित्र देव ने नव अक्षर से ज्ञान, कर्म और भक्ति पर विजय पाई, उसी प्रकार हम भी उस पर विजय प्राप्त करें. वरुण देव ने दस अक्षरों से विराट् पर विजय पाई, हम भी उसी प्रकार विजय पाएं. इंद्र देव ने ग्यारह अक्षर से त्रिष्टुभ् पर विजय पाई, वैसे ही हम भी विजय प्राप्त करें. विश्व ने बारह अक्षर से जगती पर विजय पाई, हम भी वैसे ही विजय पाएं. ( ३३ ) वसवस्त्रयोदशाक्षरेण त्रयोदश ँ४स्तोममुदजयँस्तमुज्जेष ँ४ रुद्राश्चतुर्दशाक्षरेण चतुर्दश ँ४ स्तोममुदजयँस्तमुज्जेषमादित्याः पञ्चदशाक्षरेण पञ्चदश ँ४ स्तोममुदजयँस्तमुज्जेषमदितिः षोडशाक्षरेण षोडश ँ४ स्तोममुदजयत्तमुज्जेषं प्रजापतिः सप्तदशाक्षरेण सप्तदश ँ४ स्तोममुदजयत्तमुज्जेषम्.. ( ३४ ) तेरह अक्षरों से वसुदेव ने त्रयोदश स्तोम को जीता, वैसे ही हम भी विजय प्राप्त करें. रुद्र देव ने चौदह अक्षरों के प्रभाव से चौदह स्तोम ( गुणगान ) पर विजय पाई, हम भी उस के प्रभाव से विजय पाएं. आदित्य देव ने पंद्रह अक्षरों के प्रभाव से पंद्रह स्तोत्रों पर विजय पाई, हम भी वैसे ही विजय पाएं. अदिति देवता ने सोलह स्तोम पर विजय पाई, हम भी उन पर विजय प्राप्त करें. सत्रह अक्षर से प्रजापति ने सत्रह स्तोम पर विजय पाई, हम भी उस विजय का अनुकरण करें. ( ३४ ) एष ते निर्ऋते भागस्तं जुषस्व स्वाहाग्निनेत्रेभ्यो देवेभ्यः पुरः सद्भ्यः स्वाहा यमनेत्रेभ्यो देवेभ्यो दक्षिणासद्भ्यः स्वाहा विश्वदेवनेत्रेभ्यो देवेभ्यः पश्चात्सद्भ्यः स्वाहा मित्रावरुणनेत्रेभ्यो वा मरुन्नेत्रेभ्यो वा देवेभ्य ऽ उत्तरासद्भ्यः स्वाहा सोमनेत्रेभ्यो देवेभ्य ऽ उपरिसद्भ्यो दुवस्वद्भ्यः स्वाहा.. ( ३५ ) हे पृथ्वी! यह आप का हिस्सा है. आप इसे स्वीकारिए. पृथ्वी माता के लिए स्वाहा. पूर्व दिशा का नेतृत्व करने वाले अग्नि के लिए स्वाहा. दक्षिणी दिशा का नेतृत्व करने वाले यम देव के लिए स्वाहा. पश्चिम दिशा में विश्व के लिए स्वाहा. उत्तर दिशा का नेतृत्व करने वाले मित्र और वरुण देव या मरुद्गणों के लिए स्वाहा. ऊपर और स्वर्गलोक में सोम के लिए स्वाहा. सभी देवगणों के लिए स्वाहा. ( ३५ ) ये देवा ऽ अग्निनेत्राः पुरःसदस्तेभ्यः स्वाहा ये देवा यमनेत्रा दक्षिणासदस्तेभ्यः स्वाहा ये देवा विश्वदेवनेत्राः पश्चात्सदस्तेभ्यः स्वाहा ये देवा मित्रावरुणनेत्रा वा मरुन्नेत्रा वोत्तरासदस्तेभ्यः स्वाहा ये देवाः सोमनेत्रा ऽ उपरिसदो दुवस्वन्तस्तेभ्यः स्वाहा.. ( ३६ ) अग्नि के साथ पूर्व दिशा का नेतृत्व करने वाले देवों के लिए स्वाहा. दक्षिण दिशा का नेतृत्व करने वाले यम देव के लिए स्वाहा. पश्चिम दिशा का नेतृत्व करने ११४ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध नौवां अध्याय वाले विश्वे देव सहित देवों के लिए स्वाहा. उत्तर दिशा का नेतृत्व करने वाले मित्रावरुण देव और मरुद्गण के लिए स्वाहा. ऊपर और स्वर्गलोक का नेतृत्व करने वाले सोम सहित अन्य देवों के लिए स्वाहा. ( ३६ ) अग्ने सहस्व पृतना ऽ अभिमातीरपास्य. दुष्टरस्तरन्नरातीयर्चोधा यज्ञवाहसि.. ( ३७) हे अग्नि! आप शत्रुओं को हराइए. आप शत्रुओं का नाश कीजिए. हे अग्नि! आप को जीतना दुर्लभ है. हे अग्नि! आप मंत्रपूर्वक यज्ञ करने वाले यजमान को अन्न दीजिए. तेजस्वी बनाइए. ( ३७ ) देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. उपा २४ शोर्वीर्येण जुहोमि हत २४ रक्षः स्वाहा रक्षासं त्वा वधायावधिष्म रक्षोवधिष्मामुमसौ हतः... ( ३८) हे सविता देव! आप संसार को उपजाने वाले हैं. हम अश्विनीकुमारों की भुजाओं और पूषा देवता के हाथों से आप को हवि चढ़ाते हैं. आप ने शूरवीरता से शत्रुओं को खदेड़ा, मारा. जैसे यह राक्षस मारा गया वैसे ही शत्रु भी मारे जाएं. ( ३८ ) सविता त्वा सवाना २४ सुवतामग्निर्गृहपतीना २४ सोमो वनस्पतीनाम्. बृहस्पतिर्वाच ऽ इन्द्रो ज्यैष्ठ्याय रुद्रः पशुभ्यो मित्रः सत्यो वरुणो धर्मपतीनाम्.. ( ३९) हे सविता देव! आप यजमानों को यज्ञ के लिए प्रेरित करने की कृपा कीजिए. हे अग्नि! आप गृहपतियों को ( यज्ञ के लिए ) प्रेरित करने की कृपा कीजिए. सोम यजमानों को वनस्पति प्रदान करने की कृपा करें. बृहस्पति देव हमें वाणी प्रदान करने की कृपा करें. इंद्र देव हमें ज्येष्ठता ( बड़ाई ) प्रदान करें. रुद्र देव हमें पशु प्रदान करने की कृपा करें. मित्र देव हमें सत्यवादी बनाने की कृपा करें. वरुण देव हमें धर्म पालक बनाने की कृपा करें. ( ३९ ) इमं देवा ऽ असपत्न २४ सुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायैन्द्रस्येन्द्रियाय. इमममुष्य पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश ऽ एष वोमी राजा सोमोस्माकं ब्राह्मणाना २४ राजा.. (४०) हे यजमानो! सोम राजा हैं. सोम हम ब्राह्मणों के राजा हैं. सोम अमुक पुत्र अमुक के पुत्र पर अपनी कृपा बनाए रखें. ये देवगण महान् क्षत्रिय जैसा बल पाने के लिए प्रेरित करें. महान् राज्य व महान जन राज्य के लिए प्रेरित करने की कृपा करें. हमें इंद्र देव जैसा समृद्धिशाली बनाने की कृपा करें. ( ४० ) यजुर्वेद - ११५

दसवां अध्याय

दसवां अध्याय अपो देवा मधुमतीरगृह्णन्नूर्जस्वती राजस्वश्चितानाः. याभिर्मित्रावरुणावभ्यषिञ्चन्याभिरिन्द्रमनयन्नत्यरातीः.. (१) देवताओं ने मधुर, ऊर्जस्वी, राजोचित व चेतना जगाने वाला जल ग्रहण किया. जिन जलों से मित्र, वरुण आदि देवताओं का अभिषेक किया तथा अन्य देवताओं ने जिन जलों से इंद्र देव का अभिषेक किया, हम यजमान उन जलों को ग्रहण करते हैं. ये जल शत्रुनाशक हैं. (१) वृष्ण ऽ ऊर्मिरसि राष्ट्रदा राष्ट्रं मे देहि स्वाहा वृष्ण ऽ ऊर्मिरसि राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै देहि वृषसेनोसि राष्ट्रदा राष्ट्रं मे देहि स्वाहा वृषसेनोसि राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै देहि.. (२) जलधाराएं लहरदार, बलवती, राष्ट्रदायिनी हैं. वे मुझे राष्ट्र प्रदान करें. इन के लिए स्वाहा. वे विशाल सेना वाली हैं. इन के लिए स्वाहा. वे राष्ट्रदायिनी हैं. इन के लिए स्वाहा. वे मुझे राष्ट्र प्रदान करें. इन के लिए स्वाहा. वे विशाल सेना वाली हैं. इन के लिए स्वाहा. वे विशाल राष्ट्रदायिनी हैं. इन के लिए स्वाहा. हमें राष्ट्र प्रदान करने की कृपा करें. (२) अर्थेत स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहार्थेत स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्तौजस्वती स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहौजस्वती स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्तापः परिवाहिणी स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहापः परिवाहिणी स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्तापां पतिरसि राष्ट्रदा राष्ट्रं मे देहि स्वाहापां पतिरसि राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै देह्यपां गर्भोसि राष्ट्रदा राष्ट्रं मे देहि स्वाहापां गर्भोसि राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै देहि.. (३) ये जल अर्थदायी हैं. हमें अर्थ प्रदान करने की कृपा करें. ये जल राष्ट्रदायी हैं. हमें राष्ट्र प्रदान करने की कृपा करें. इन के लिए स्वाहा. ये जल ऊर्जादायी हैं. हमें ऊर्जा प्रदान करने की कृपा करें. ये जल राष्ट्रदायी हैं. हमें राष्ट्र प्रदान करने की कृपा करें. ये जल पराक्रमदायी हैं. हमें पराक्रम प्रदान करें. ये जल राष्ट्रदायी हैं. हमें राष्ट्र प्रदान करें. इन के लिए स्वाहा. ये जल पराक्रमदायी हैं. हमें पराक्रम प्रदान करें. इन के लिए स्वाहा. ये जल सब जलों के पालकपोषक हैं तथा उन्हें अपने अधीन रखने में सक्षम हैं. हमें राष्ट्र प्रदान करें. इन के लिए स्वाहा. ये जल सब जलों ११६ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध दसवां अध्याय को गर्भ में रखते हैं. अपने शासन में रखने में सक्षम हैं. हमें राष्ट्र प्रदान करें. इन के लिए स्वाहा. ( ३ ) सूर्यत्वचस स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहा सूर्यत्वचस स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्त सूर्यवर्चस स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहा सूर्यवर्चस स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्त मान्दा स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहा मान्दा स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्त व्रजक्षित स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहा व्रजक्षित स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्त वाशा स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहा वाशा स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्त शविष्ठा स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहा शविष्ठा स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्त शक्वरी स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहा शक्वरी स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्त जनभृत स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहा जनभृत स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्त विश्वभृत स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहा विश्वभृत स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्तापः स्वराज स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्त. मधुमतीर्मधुमतीभिः पृच्यन्तां महि क्षत्रं क्षत्रियाय वन्वाना ऽ अनाधृष्टाः सीदत सहौजसो महि क्षत्रं क्षत्रियाय दधतीः.. (४) हे जल! आप सूर्य की त्वचा में स्थित हैं. आप राष्ट्रदायी हैं. आप हमें राष्ट्र प्रदान करें आप के लिए स्वाहा. हे जल! आप आनंददायी हैं. आप हमें आनंद प्रदान करने की कृपा करें. आप के लिए स्वाहा. हे जल! आप राष्ट्रदायी हैं. आप राष्ट्र प्रदान करने की कृपा करें. आप के लिए स्वाहा. हे जल! आप पशुपालक हैं. आप पशु प्रदान करने की कृपा करें. आप के लिए स्वाहा. हे जल! आप बलदायी हैं. आप बल प्रदान करने की कृपा करें. आप के लिए स्वाहा. हे जल! आप राष्ट्रदायी हैं. आप राष्ट्र प्रदान करने की कृपा करें. आप के लिए स्वाहा. हे जल! आप क्षमतादायी हैं. आप क्षमता प्रदान करने की कृपा करें. आप के लिए स्वाहा. हे जल! आप राष्ट्रदायी हैं. आप राष्ट्र प्रदान करने की कृपा करें. आप जनता का भरणपोषण करने वाले हैं. आप राष्ट्र प्रदान करें. आप के लिए स्वाहा. आप विश्व का भरणपोषण करने वाले हैं. आप राष्ट्र प्रदान करें. आप के लिए स्वाहा. आप हमें मधुरमधुर जलधाराओं में सींचने की कृपा करें. आप हमें क्षत्रियोचित बल प्रदान करने की कृपा करें. आप हमें साहस व बल प्रदान करने की कृपा करें. क्षत्रियोचित सामर्थ्य धारण करने की कृपा करें. यहां प्रतिष्ठित करने की कृपा करें. ( ४ ) सोमस्य त्विषिरसि तवेव मे त्विषिर्भूयात्. अग्नये स्वाहा सोमाय स्वाहा सवित्रे स्वाहा सरस्वत्यै स्वाहा पूष्णे स्वाहा बृहस्पतये स्वाहेन्द्राय स्वाहा घोषाय स्वाहा श्लोकाय स्वाहा ध्वं शाय स्वाहा भगाय स्वाहार्यम्णे स्वाहा.. (५) जिस प्रकार सोम आदि देवता ऐश्वर्यवान हैं, हम भी वैसे ही ऐश्वर्यवान हो जाएं. अग्नि के लिए स्वाहा. सोम देव के लिए स्वाहा. सविता देव के लिए स्वाहा. यजुर्वेद - ११७

पूर्वार्ध दसवां अध्याय

पूर्वार्ध दसवां अध्याय सरस्वती देवी के लिए स्वाहा. पूषा देव के लिए स्वाहा. बृहस्पति देव के लिए स्वाहा. इंद्र देव के लिए स्वाहा. घोष के लिए स्वाहा. श्लोक के लिए स्वाहा. घोष के लिए स्वाहा. ऐश्वर्य देव के लिए स्वाहा. सौभाग्य देवी के लिए स्वाहा. अर्यमा देव के लिए स्वाहा. सौभाग्य देव के लिए स्वाहा. ( ५ ) पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव ऽ उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः. अनिभृष्टमसि वाचो बन्धुस्तपोजाः सोमस्य दात्रमसि स्वाहा राजस्वः.. ( ६ ) आप पवित्रता में स्थित हैं. आप को विष्णु के लिए पवित्र किया जाता है. आप सविता देव से उत्पन्न होते हैं. पवित्र सूर्य की रश्मियों से छन कर जल आकाश में जाता है. आप को सूर्य पवित्र करने की कृपा करें. वाणी को पवित्र करने की कृपा करें. आप तपशक्ति प्रदाता हैं. आप सोम को राजोचित पात्रता प्रदान कर सकते हैं. आप के लिए स्वाहा. ( ६ ) सधमादो द्युम्निनीराप ऽ एता ऽ अनाधृष्टा ऽ अपस्यो वसानाः. पस्त्यासु चक्रे वरुणः सधस्थमपा ६४ शिशुर्मातृतमास्वन्तः.. ( ७ ) ये स्वर्गलोक के जल हैं. ये जल आनंददायी हैं. ये स्वर्गलोक के जल हैं. ये तेजस्विता प्रदान करने वाले हैं. ये स्वर्गलोक के जल हैं. ये उत्तम वास प्रदान करने वाले हैं. ये स्वर्गलोक के जल हैं. ये धारक हैं. ये स्वर्गलोक के जल हैं. ये माता की तरह पोषक हैं. हम यजमान सादर इन जलों को स्थापित करते हैं. ( ७ ) क्षत्रस्योल्बमसि क्षत्रस्य जरायु्वसि क्षत्रस्य योनिरसि क्षत्रस्य नाभिरसीन्द्रस्य वार्त्रघ्नमसि मित्रस्यासि वरुणस्यासि त्वयायं वृत्रं वधेत्. दृवासि रुजासि क्षुमासि पातैर्नं प्राञ्चं पातैर्नं प्रत्यञ्चं पातैर्नं तिर्यञ्चं दिग्भ्यः पात.. ( ८ ) हे जल! आप क्षत्रियों के गर्भपोषक हैं. आप क्षत्रियों की गर्भ रक्षक झिल्ली हैं. आप इंद्र देव की नाभि हैं. आप वृत्रासुर के नाशक हैं. आप मित्र देव की तरह शत्रुओं का वध करते हैं. आप वरुण देव की तरह शत्रुओं का वध करते हैं. आप शत्रुओं को विदीर्ण देते हैं. आप शत्रुओं को पीड़ा देते हैं. आप शत्रुओं को डरा देते हैं. आप पूर्व दिशा से रक्षा करने की कृपा करें. आप पश्चिम दिशा से ( इस यज्ञ की ) रक्षा करने की कृपा करें. आप उत्तर दिशा से ( इस यज्ञ की ) रक्षा करने की कृपा करें. आप दक्षिण दिशा से ( इस यज्ञ की ) रक्षा करने की कृपा करें. ( ८ ) आविर्मर्या आवित्तो अग्निर्गृहपतिरावित्त ऽ इन्द्रो वृद्धश्रवा ऽ आवित्तौ मित्रावरुणौ धृतव्रतावावित्तः पूषा विश्ववेदा ऽ आविन्ते द्यावापृथिवी विश्वशम्भुवावावित्तादितिरुरुशर्मा.. ( ९ ) सभी आर्य लोग ( इस यज्ञ स्थल की ) रक्षा करने की कृपा करें. गृहपति अग्नि ( इस यज्ञ स्थल की ) रक्षा करने की कृपा करें. यशस्वी इंद्र देव ( इस यज्ञ ११८ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध दसवां अध्याय स्थल की ) रक्षा करने की कृपा करें. ऐश्वर्यवान मित्र देव और वरुण देव ( इस यज्ञ स्थल की ) रक्षा करने की कृपा करें. व्रतधारी पूषा देव ( इस यज्ञ स्थल की ) रक्षा करने की कृपा करें. समस्त देव ( इस यज्ञ स्थल की ) रक्षा करने की कृपा करें. स्वर्गलोक ( इस यज्ञ स्थल की ) रक्षा करने की कृपा करें. पृथ्वी देवी विश्व का शुभ करने वाली है. ( इस यज्ञ स्थल की ) रक्षा करने की कृपा करें. सुखदायी अदिति माता शुभ करने वाली है. ( इस यज्ञ स्थल की ) रक्षा करने की कृपा करें. ( ९ ) अवेष्टा दन्दशूकाः प्राचीमारोह गायत्री त्वावतु रथन्तर १७ साम त्रिवृत्स्तोमो वसन्त ऽ ऋतुर्ब्रह्म द्रविणम्.. (१०) यज्ञ को हानि पहुंचाने वाले जीवजंतु नष्ट हो गए. आप पूर्व दिशा में आरोहण करने की कृपा कीजिए. गायत्री, रथंतर सोम व वसंत ऋतु आप की रक्षा करने की कृपा करें. ब्रह्म धन आप की रक्षा करने की कृपा करें. ( १० ) दक्षिणामारोह त्रिष्टुप् त्वावतु बृहत्साम पञ्चदश स्तोमो ग्रीष्म ऽ ऋतुः क्षत्रं द्रविणम्.. (११) आप दक्षिण दिशा में आरोहण करने की कृपा करें. त्रिष्टुप् रूपी धन आप की रक्षा करने की कृपा करें. बृहत्साम रूपी धन आप की रक्षा करने की कृपा करें. पंचदश स्तोम धन आप की रक्षा करने की कृपा करें. ग्रीष्म ऋतु रूपी व पौरुष रूपी धन आप की रक्षा करने की कृपा करें. ( ११ ) प्रतीचीमारोह जगती त्वावतु वैरूप १७ साम सप्तदश स्तोमो वर्षा ऋतुर्विड् द्रविणम्.. (१२) आप पश्चिम दिशा की ओर बढ़ने की कृपा करें. जगती रूपी धन आप की रक्षा करें. वैरूप सामरूपी, दश स्तोम रूपी व वर्षा ऋतु रूपी धन आप की रक्षा करें. ( १२ ) उदीचीमारोहानुष्टुप् त्वावतु वैराज १७ सामैकवि १७ श स्तोमः शरदृतुः फलं द्रविणम्.. (१३) आप उत्तर दिशा की ओर बढ़ने की कृपा करें. अनुष्टुप् रूपी फलदायी धन आप की रक्षा करने की कृपा करें. वैराज साम रूपी फलदायी धन आप की रक्षा करने की कृपा करें. एकविंश स्तोम फलदायी धन आप की रक्षा करने की कृपा करें. शरद ऋतु रूपी फलदायी धन आप की रक्षा करने की कृपा करें. ( १३ ) ऊर्ध्वामारोह पङ्क्तिस्त्वावतु शाक्वररैवते सामनी त्रिणवत्रयस्त्रि १७ शौ स्तोमौ हेमन्तशिशिरावृतू वर्चो द्रविणं प्रत्यस्तं नमुचेः शिरः.. (१४) आप ऊपर की ओर बढ़ने की कृपा करें. पंक्ति रूपी धन आप की रक्षा करें. शाक्वर रूपी धन आप की रक्षा करें. रैवत साम रूपी धन आप की रक्षा करें. यजुर्वेद - १११

पूर्वार्ध दसवां अध्याय त्रिणव, त्रयस्त्रिंश, स्तोम रूपी, हेमंत व शिशिर ऋतु रूपी धन आप की रक्षा करें. अनाचारियों को समूल नष्ट करने की कृपा करें. (१४) सोमस्य त्विषिरसि तवेव मे त्विषिर्भूयात्. मृत्योः पाह्योजोसि सहोस्यमृतमसि.. (१५) आप सोम के प्रकाशक व बलशाली हैं. हमारा ऐश्वर्य भी आप के ऐश्वर्य जैसा हो जाए. आप मृत्यु से हमारी रक्षा करने की कृपा करें. हम आप के ही समान अमर हो जाएं. (१५) हिरण्यरूपा ऽ उषसो विरोक ऽ उभाविन्द्रा ऽ उदिथः सूर्यश्च. आरोहतं वरुण मित्र गर्तं ततश्चक्षाथामदितिं दितिं च मित्रोसि वरुणोसि.. (१६) हे मित्र देव! आप सोने जैसे रूप वाले हैं. हे वरुण! आप सोने जैसे रूप वाले हैं. हे मित्र देव! आप उषाओं को प्रकाशित करने वाले हैं. हे वरुण! आप उषाओं को प्रकाशित करने वाले हैं. आप दोनों सूर्य व चंद्र देव की तरह उदित होते हैं. हे मित्र देव!, हे वरुण देव! आप रथ पर चढ़ने की कृपा कीजिए. आप दोनों अदिति, दिति, मित्र व वरुण स्वरूप हैं. (१६) सोमस्य त्वा द्युम्नेनाभिषिञ्चाम्यग्नेर्भ्राजसा सूर्यस्य वर्चसेन्द्रस्येन्द्रियेण. क्षत्राणां क्षत्रपतिरेध्यति दिद्यून् पाहि.. (१७) हे यजमान! हम आप का सोम से अभिषेक करते हैं. हे यजमान! हम आप का अग्नि के तेज से अभिषेक करते हैं. हे यजमान! हम आप का सूर्य के वर्चस्व से अभिषेक करते हैं. हम आप का इंद्र देव के बल से अभिषेक करते हैं. आप क्षत्रियों में क्षत्रपति बनें. आप प्रजा के रक्षक बनें. (१७) इमं देवा ऽ असपत्न ५७ सुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायैन्द्रस्येन्द्रियाय. इमममुष्य पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश ऽ एष वोमी राजा सोमोस्माकं ब्राह्मणाना ५७ राजा.. (१८) हे देवगण! शत्रुनाश, श्रेष्ठ कार्य, महान् क्षत्रिय बल, महान् बड़प्पन व महान् जनराज्य हेतु हमें शक्ति प्रदान करने की कृपा करें. हे देवगण! महान् इंद्र देव जैसी क्षमता हेतु हमें शक्ति प्रदान करने की कृपा करें. हे देवगण! अमुक पिता के पुत्र व अमुक माता के पुत्र को शक्ति प्रदान करने की कृपा करें. प्रजा पालन हेतु हमें शक्ति प्रदान करने की कृपा करें. ये सोम हम ब्राह्मणों के राजा हैं. (१८) प्र पर्वतस्य वृषभस्य पृष्ठान्नावश्चरन्ति स्वसिच ऽ इयानाः. ता ऽ आववृत्रन्नधरागुदक्ता ऽ अहिं बुध्य्मनु रीयमाणाः. विष्णोर्विक्रमणमसि विष्णोर्विक्रान्तमसि विष्णोः क्रान्तमसि.. (१९) १२० - यजुर्वेद

अभिषेक के समय बलवान सोम की धाराएं पर्वत की पीठ से बहने वाली

पूर्वार्ध दसवां अध्याय अभिषेक के समय बलवान सोम की धाराएं पर्वत की पीठ से बहने वाली जलधाराओं की तरह बहती हैं. जैसे जलधारा पर्वत को ढक कर के बहती है, वैसे ही सोम की धाराएं धन वैभव के पर्वत को ढक कर के बहती हैं. वैसे ही पृथ्वी विष्णु के प्रथम चरण में जीती गई. अंतरिक्ष विष्णु के द्वितीय चरण में जीता गया. स्वर्गलोक विष्णु के तृतीय चरण में जीता गया. ( १९ ) प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा रूपाणि परि ता बभूव. यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्त्वयममुष्य पितासावस्य पिता वय ᳪ स्याम पतयो रयीणा ᳪ स्वाहा. रुद्र यत्ते क्रिवि परं नाम तस्मिन्हुतमस्यमेष्टमसि स्वाहा.. (२०) हे प्रजापति! इस विश्व में आप के अलावा हमारा अन्य कोई नहीं हैं. आप ही विश्वरूप हैं. हम जिस कामना से यज्ञ करते हैं, आप हमारी उन कामनाओं को परिपूर्ण करने की कृपा कीजिए. यह अमुक का पिता है, हम अमुक के पिता हैं. हम धनों के स्वामी हो जाएं. आप के लिए स्वाहा. रुद्र देव के भीषण व कल्याणकारी रूप के लिए स्वाहा. ( २० ) इन्द्रस्य वज्रोसि मित्रावरुणयोस्त्वा प्रशास्त्रोः प्रशिषा युनज्मि. अव्यथायै त्वा स्वधायै त्वारिष्टो अर्जुनो मरुतां प्रसवेन जयापाम मनसा समिन्द्रियेण.. (२१) आप इंद्र देव के वज्र हैं. मित्र और वरुण देव आप के अस्त्रशस्त्र हैं. हम आप को ( शत्रुनाश हेतु ) नियुक्त करते हैं. आप के लिए स्वाहा. शत्रुनाशक हेतु स्वाहा. अर्जुन हेतु स्वाहा. मरुतों के लिए स्वाहा. हम मन व इंद्रियों से आप के साथ हैं. ( २१ ) मा त ऽ इन्द्र ते वयं तुराषाडयुक्तसो अब्रह्मता विदसाम. तिष्ठा रथमधि यं वज्रहस्ता रश्मीन् देव यमसे स्वश्वान्.. (२२) हे इंद्र देव! हम सब आप की कृपा से ज्ञानी हो जाएं. हम सब आप की कृपा से ब्रह्मज्ञानी हो जाएं. हम सब आप की कृपा से ज्ञाता हो जाएं. जैसे रथ में बैठ कर प्रशिक्षित घोड़ों की लगाम थाम ली जाती है, वैसे ही वज्र हाथ वाले आप यमराज से हमारे प्राण के घोड़ों की लगाम थामिए. ( २२ ) अग्नये गृहपतये स्वाहा सोमाय वनस्पतये स्वाहा मरुतामोजसे स्वाहेन्द्रस्येन्द्रियाय स्वाहा. पृथिवि मातर्मा मा हि ᳪ सीर्मो अहं त्वाम्.. (२३) गृहपति अग्नि के लिए स्वाहा. वनस्पति सोम के लिए स्वाहा. ओजस्वी मरुद् देव के लिए स्वाहा. इंद्रिय सामर्थ्यदाता इंद्र देव के लिए स्वाहा. हे पृथ्वी माता! हम आप के प्रति हिंसा न करें. हे पृथ्वी माता! आप हमारे प्रति हिंसा न करें. ( २३ ) यजुर्वेद - १२१

पूर्वार्ध दसवां अध्याय ह १७ सः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्. नृषद्वरसद्दतसद्वयोम सदब्जा गोजा ऽ ऋतजा ऽ अद्रिजा ऽ ऋतं बृहत्.. (२४) हे परमात्मा! आप पवित्र हैं, अंतरिक्ष के होता व यज्ञ वेदी पर प्रतिष्ठित हैं. आप अतिथि जैसे आदरणीय व नेतृत्व में अग्रणी, ऋत में प्रतिष्ठित, जलोत्पादक हैं. आप विशाल सत्य बल संपन्न हैं. ( २४ ) इयदस्यायुरस्यायुर्मयि धेहि युङ्ङसि वर्चोसि वर्चो मयि धेह्यूर्गस्यूर्जं मयि धेहि. इन्द्रस्य वां वीर्यकृतो बाहू अभ्युपावहरामि.. (२५) हे परमात्मा! आप की जितनी आयु है, आप इतनी ही आयु हमें दीजिए. आप जितने वर्चस्वी हैं, आप उतना ही वर्चस्व हमें दीजिए. आप जितने ऊर्जस्वी हैं, आप उतनी ही ऊर्जा हमें दीजिए. आप इंद्र देव की पराक्रमी बाहु जैसे हैं. हम यज्ञीय पदार्थ ले कर आप के पास आते हैं. ( २५ ) स्योनासि सुषदासि क्षत्रस्य योनिरसि. स्योनामासीद सुषदामासीद क्षत्रस्य योनिमासीद.. (२६) हे आसन देव! आप सुखद व सुख से बैठने योग्य हैं. आप बल का मूल स्थान व सुखद हैं. आप सुख से बैठने योग्य व बल का मूल स्थान हैं. ( २६ ) नि षसाद धृतव्रतो वरुणः पस्त्यास्वा. साम्राज्याय सुक्रतुः.. (२७) यजमान व्रतधारी हैं और वह अनिष्ट दूर करने में संलग्न हैं. यजमान श्रेष्ठ राज्य प्राप्ति हेतु इस सुयज्ञ को कर रहे हैं. वे प्रजापालक बनें. ( २७ ) अभिभूरस्येतास्ते पञ्च दिशः कल्पन्तां ब्रह्माँस्त्वं ब्रह्मासि सवितासि सत्यप्रसवो वरुणोसि सत्यौजा ऽ इन्द्रोसि विशौजा रुद्रोसि सुशैवः. बहुकार श्रेयस्कर भूयस्क्रेन्द्रस्य वज्रोसि तेन मे रध्य.. (२८) यजमान शत्रुओं को पराभूत करने वाले हैं. पांचों दिशाएं यजमान के लिए फलीभूत हों. आप ब्रह्मज्ञाता, ब्रह्मा, सविता व सत्य के उत्पादक हैं. आप वरुण, सत्यवान व ओजस्वी हैं. आप इंद्र व विशाल, ओजस्वी और रुद्र हैं. आप अच्छे कर्म वाले हैं. आप बहुत श्रेयस्कर हैं. आप वज्र हैं. आप अपने यजमान को धन प्रदान करने की कृपा कीजिए. ( २८ ) अग्निः पृथुधर्मणस्पतिर्जुषाणो अग्निः पृथुधर्मणस्पतिराज्यस्य वेतु स्वाहा. स्वाहाकृताः सूर्यस्य रश्मिभिर्यतध्व १७ सजातानां मध्यमेष्ठ्याय.. (२९) अग्नि विशाल हैं. अग्नि धर्म के पालक हैं. अग्नि यज्ञ में अग्रणी हैं. अग्नि से निवेदन है कि वे हमारा मन जानें. हमारी आहुति को स्वीकारने की कृपा करें. अग्नि के लिए स्वाहा. अग्नि सूर्य की किरणों से स्वयं भी बलवान हों तथा यजमान को १२२ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध दसवां अध्याय भी राजाओं के मध्य प्रतिष्ठित करने की कृपा करें. (२९) सवित्रा प्रसवित्रा सरस्वत्या वाचा त्वष्ट्रा रूपैः पूष्णा पशुभिरिन्द्रेणास्मे बृहस्पतिना ब्रह्मणा वरुणेनौजसाग्निना तेजसा सोमेन राज्ञा विष्णुना दशम्या देवतया प्रसूतः प्र सर्पामि.. (३०) सविता देव उत्पादक हैं. सरस्वती देवी से, उन की वाणी से हम प्रेरित होते हैं. हम त्वष्टा देव के रूप से व पशुवान पूषा देव से प्रेरित होते हैं. हम सामर्थ्यशाली बृहस्पति व अग्नि के तेज से प्रेरित होते हैं. हम राजा सोम से प्रेरित होते हैं. हम पालक विष्णु से प्रेरित होते हैं. हम देवताओं के दिव्य ( कर्म ) पथ पर ( जाने हेतु ) प्रेरित होते हैं. ( ३० ) अश्विभ्यां पच्यस्व सरस्वत्यै पच्यस्वेन्द्राय सुत्राम्णे पच्यस्व. वायुः पूतः पवित्रेण प्रत्यङ्क्सोमो अतिस्रुतः. इन्द्रस्य युज्यः सखा.. (३१) आप दोनों अश्विनीकुमारों के लिए परिपक्व होइए. आप सरस्वती देवी के लिए परिपक्व होइए. इंद्र देव अन्य देवताओं को योजित करते हैं. आप इंद्र देव के लिए परिपक्व होइए. वायु से पवित्र सोम का यज्ञ में श्रवण हो रहा है. सोम इंद्र देव से जुड़े हुए हैं. सोम इंद्र देव के मित्र ( सखा ) हैं. ( ३१ ) कुविदङ्ग यवमन्तो यवं चिद्यथा दान्त्यनुपूर्वं वियूय. इहेहैषां कृणुहि भोजनानि ये बर्हिषो नम ऽ उक्तिं यजन्ति. उपयामगृहीतोस्यश्विभ्यां त्वा सरस्वत्यै त्वेन्द्राय त्वा सुत्राम्णे.. (३२) हे सोम! आप को प्रजा के कल्याण हेतु बरतन में ग्रहण किया जाता है. आप यहां आइए और भोजन कीजिए. यजमान आप को बैठने के लिए कुशासन प्रदान करते हैं. यजमान आप के लिए उक्ति (मंत्रों से ) यज्ञ करते हैं. आप को अश्विनीकुमारों के लिए बरतन में ग्रहण किया जाता है. आप को सरस्वती देवी के लिए बरतन में ग्रहण किया जाता है. आप को इंद्र देव के लिए बरतन में ग्रहण किया जाता है. आप को शत्रु नाश हेतु बरतन में ग्रहण किया जाता है. ( ३२ ) युव ꣳ१ सुराममश्विना नमुचावासुरे सचा. विपिपाना शुभस्पती इन्द्रं कर्मस्वावतम्.. (३३) हे अश्विनीकुमारो! आप दोनों नमुचि राक्षस के पास स्थित सोम रस का भी पान करने वाले हैं. आप रमणीय सोमरस का भी पान करने वाले हैं. इंद्र देव शुभ कर्मा ( शुभ काम करने वाले ) हैं. आप दोनों इंद्र देव के रक्षक बनने की कृपा करें. ( ३३ ) यजुर्वेद - १२३

पूर्वार्ध दसवां अध्याय पुत्रमिव पितरावश्विनोभेन्द्रावथुः काव्यैर्दꣲ सनाभिः. यत्सुरामं व्यपिबः शचीभिः सरस्वती त्वा मघवन्नभिष्णक्.. (३४) हे इंद्र देव! जिस प्रकार पिता पुत्र की रक्षा करता है, उसी प्रकार अश्विनीकुमारों ने राक्षसों के संपर्क के कारण गलत मंत्रों से अशुद्ध हुए सोमरस को पी कर भी आप की रक्षा की. जब पवित्र मददायी सोमरस का आप ने पान किया तब वाणी की देवी सरस्वती आप के अनुकूल हुईं ( अर्थात् अशुद्धता जन्य दोष से नाराज हुईं तत्पश्चात उन की वह नाराजगी दूर हुई ). ( ३४ ) १२४ - यजुर्वेद

ग्यारहवां अध्याय

ग्यारहवां अध्याय युञ्जानः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः. अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या ऽ अध्याभरत.. (१) सविता देव सर्वप्रथम मन और बुद्धि को जोड़ते हैं. अग्नि में प्रकाश जगाते हैं. उस प्रकाश से पृथ्वी मंडल को पूरी तरह भर देते हैं. (१) युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितुः सवे. स्वर्ग्याय शक्त्या.. (२) हम सविता देव के साथ मन से जुड़ सकें. हम उन से स्वर्ग के योग्य शक्ति प्राप्त कर सकें. (२) युक्त्वाय सविता देवान्त्स्वर्यतो धिया दिवम्. बृहज्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्र सुवाति तान्.. (३) सविता देव सभी को प्रकाशित करने वाले हैं. वे बुद्धि और स्वर्गलोक को प्रकाशित करते हैं. वे अपनी विशाल ज्योति को पूरी तरह विस्तार देते हैं. (३) युञ्जते मन ऽ उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः. वि होत्रा दधे वयुनाविदेक ऽ इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः.. (४) विशेष रूप से ज्ञानी ऋत्विज् यजमान के विशाल यज्ञ को सफल बनाने के लिए मन और बुद्धि को जोड़ते हैं. वह होता सभी विज्ञानों को जानने वाला है. वही उन्हें धारण भी करता है. सविता देव की स्तुति महिमामयी व संतोषदायी है. (४) युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्वि श्लोक ऽ एतु पथ्येव सूरेः. शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा ऽ आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः.. (५) हे यजमान दंपती! हम परम शक्ति को नमस्कार करते हुए यज्ञ शुरू करते हैं. हम विशिष्ट श्लोकों से यह यज्ञ संपन्न करते हैं. हमारी यह उपासना सविता देव के पथ में पहुंचने की कृपा करे. अमरता के पुत्र दिव्य धाम में बैठे हुए देवगण हमारी इन स्तुतियों को सुनने की कृपा करें. (५) यजुर्वेद - १२५

पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय

पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय यस्य प्रयाणमन्वन्य ऽ इद्ययुर्देवा देवस्य महिमानमोजसा. यः पार्थिवानि विममे स ऽ एतशो रजा ᳪ सि देवः सविता महित्वना.. (६) जिस सविता देव के प्रयाण ( गमन ) महिमा और ओज का अन्य देवता गण अनुकरण करते हैं, वह सविता देव अपनी महिमा से सर्वत्र व्यापक हैं. ( ६ ) देव सवितः प्र सुव यज्ञं प्र सुव यज्ञपतिं भगाय. दिव्यो गन्धर्वः केतपूः केतं नः पुनातु वाचस्पतिर्वाचं नः स्वदतु.. (७) हे सविता देव! आप सभी को यज्ञ के लिए प्रेरित करने की कृपा करें. यज्ञपति को सौभाग्यशाली बनाने की कृपा कीजिए. आप दिव्य और पवित्रकारी हैं. वाणी के स्वामी हैं. हमारी वाणी को मधुरता से संचारित करने की कृपा करें. ( ७ ) इमं नो देव सवितर्यज्ञं प्रणय देवाय्व ᳪ सखिविद ᳪ सत्राजितं धनजित ᳪ स्वर्जितम्. ऋचा स्तोम ᳪ समर्धय गायत्रेण रथन्तरं बृहद्गायत्रवर्तनि स्वाहा.. (८) हे सविता देव! आप यज्ञ को और अधिक ऊर्जामय बनाते हैं. आप मित्रता को जानने वाले और धन जीतने वाले हैं. आप हमारे यज्ञ को बढ़ाइए. हम वैदिक मंत्रों से आप की स्तुति करते हैं. गायत्र साम से रथंतर और बृहत्साम को परिपुष्ट करने की कृपा कीजिए. सविता देव के लिए स्वाहा. ( ८ ) देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. आददे गायत्रेण छन्दसाङ्गिरस्वत्पृथिव्याः सधस्थादग्निं पुरीष्यमङ्गिरस्वदाभर त्रैष्टुभेन छन्दसाङ्गिरस्वत्.. (९) सविता देव सिरजनहार हैं. हम अश्विनीकुमार की बाहु और पूषा देव के हाथों से गायत्री छंद के प्रभाव से सविता देव को ग्रहण करते हैं. हम सविता देव को अंगिरा ऋषि की भांति ग्रहण करते हैं. त्रिष्टुप् छंद की प्रेरणा से आप अंगिरा ऋषि की भांति पृथ्वी को ऊर्जामय बनाने की कृपा करें. ( ९ ) अभ्रिरसि नार्यसि तया वयमग्नि ᳪ शकेम खनितु ᳪ सधस्थ ऽ आ. जागतेन छन्दसाङ्गिरस्वत्.. (१०) आप अभ्रि ( मिट्टी खोदने का साधन ) हैं. आप नारी हैं. हम आप की कृपा से जगती छंद के प्रभाव से अंगिरा ऋषि की भांति पृथ्वी पर अग्नि को धारण करने की सामर्थ्य पा सकें. ( १० ) हस्त ऽ आधाय सविता बिभ्रदभ्रि ᳪ हिरण्ययीम्. अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या ऽ अध्याभरदानुष्टुभेन छन्दसाङ्गिरस्वत्.. (११) सविता देव हाथ में स्वर्णमयी अभ्रि ( मिट्टी खोदने का साधन ) धारण करते १२६ - यजुर्वेद