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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४७१

सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४७१

सकृन्न मक्षिपोपेन भर्तुरारोग्यहेतवे । मोदकानपि दास्यामि विघ्नेशाय महात्मने ॥८८॥ मन्दवारे करिष्यामि भवेत्वहमपोषणम् । नोपभोक्ष्यामि मधुरं नोपभोक्ष्यामि वै घृतम् ॥८९॥ तैलाभ्यङ्गविहीनाऽहं सदा स्वप्स्यामि भूतले । जीवत्वयं रोगहीनो भर्ता मे शरदां शतम् ॥९०॥ एवं सा व्याहरद्देवी वासरे वासरे वने । तदा चागादृषिः कश्चिन्महात्मा देवलाह्वयः ॥९१॥ वैशाखमासे घर्मार्त्तः स ययौ तस्य वै गृहे । तदा ते भार्यया प्रोक्तं वैद्योऽयं गृहमागतः ॥९२॥ तेन ते रोगहानिः स्यात्स्यातिथ्यं करोम्यहम् । यद्याह पथ्यमिच्छ्वं मां नोचेन्नैव करोम्यहम् ॥९३॥ शान्त्या त्वां धर्मविन्मुखं भिषग्व्याजेन वञ्चितम् । तस्यातिथ्यं तु वै कर्तुं दत्ताऽऽज्ञा वै पुरा त्वया ॥९४॥ तस्य पत्नी तदा तुष्टा पूजयामास मा मुनिम् । पादावनेजनं कृत्वा तज्जलं मूर्ध्नि तेऽवहत् । ९५॥ पातुं तुभ्यं ददौ वीर्यं त्वामुक्त्वा भेषजं त्विति पानकं च ददौ तस्मै घर्मार्त्ताय महात्मने ॥९६॥ दिव्यान्नैर्भोजयामास सुगन्धव्यजने ददौ । त्वयाऽनुज्ञापिता साय धर्मतापं व्यशारयत् ॥९७॥ स प्रातःकदिते सूर्ये मुनिर्भाग्यान्तरं ययौ । अथ नाल्पेन कालेन सन्निपातोऽभवत्तव ॥९८॥ त्रिकटु मुश्व आधाय्मा भर्त्तारंङ्गुलिमव्यदन् । कफेन दन्तपङ्क्तिभ्यां मीलित्वाभ्यां दृढं तदा ॥९९॥ ते वक्त्रेऽङ्गुलिखण्डं तस्थितमभवन्निबोधतत् । गङपित्ताङ्गुले स्तस्याः पश्चात्त्वं सं गतः पुरा ॥१००॥ शय्यायां सुमनोहायां स्मरन्तां पुश्चलीं हृदि । मृतं विज्ञाय भर्त्तारं भार्या कांतिमता तव ॥१०१॥ विक्रीन्वा वलये स्वे त्वां गृहीत्वा चन्दनं बहु । चक्रे चितिंतनेन माध्वी मध्ये कृत्वा पतिं तदा ॥१०२॥ समालिङ्ग्य भुजाभ्यां ते पादौ चालिङ्ग्य पादयोः । मुखे मुखं निजं कृत्वा हृदये हृदयं तथा ॥१०३॥ गुह्ये कृत्वा तु गुह्यं स्वमेवं सा रायमागता । दाहयामास कल्याणी भर्तुरैहिकजान्वितम् ॥ आत्मना सह तन्वी ज्वलितं जातवेदसि । १०४ । एवं वरा सा ललना पतिव्रता ददाम ने सुखमित्युदी । विसृज्य देहं सहसा प्रयाथ पर्ति जयत्युच्च सुरादिरोद्यम् ॥१०५॥


और चण्डिकाके समीप यह प्रार्थना करता- हे देवि ! यदि मेरे पतिदेव शीघ्र अच्छे हो जायें तो मैं महिषके रक्त और मांससे मिला हुआ अन्न आपका समर्पण करूंगी वा देत यदि अच्छे हो जायें तो मैं गणेशजीको लड्डू चढ़ाऊंगी और प्रत्येक शनिवारको व्रत करूंगी । मैं मिठाई, मट्ठा छोड़ दूंगी, घी भी नहीं खाऊँगी, शरीरमे तेल और उबटन लगाना त्याग दूंगी और सदा जमीनपर सोऊंगी। लेकिन मेरे पतिदेव रोगमुक्त हो जायें और संवदा वर्ष जीवित रहें ॥८८-९०॥ इसतरह वह नित्य मानना माना करती थी । इसी बीच एक दिन महात्मा देवल ऋषि सहसा उसके घर पहुंचे। वह वैशाखका महीना था; स्तम्भको स्त्री पतिके पास आकर कहने लगी कि एक कोई वैद्य देवात् मेरे घर आ गया है। यह अवश्य किसी उपायसे आपका रोग नष्ट कर देगा। आप यदि आज्ञा दें तो मैं उसकी सेवा करूँ, नहीं तो नहीं ॥ ९१-९३ ॥ स्तम्भ (तुम) ने सेवा करनेकी आज्ञा दे दी। स्त्रीने प्रसन्न मनसे देवलकी पूजा की। इनके चरण धोकर उस जलको माथे चढ़ाया और थोड़ा-सा जल दवाके व्याजसे स्तम्भ (तुम) को भी पिला दिया। फिर उन देवल ऋषिको उसने शर्बत पिलाया। अच्छे-अच्छे पकवान बनाकर भोजन कराया और तुम्हारे कहनेसे उनकी पंखा भी झलकर उनका सन्ताप दूर किया ॥ ९४-९७ ॥ रातभर देवलऋषि उनके घर रहे और सवेरे दूसरे गाँवको चले गये। थोड़े दिन बाद स्तम्भको (तुमको) सन्निपात हो गया। स्त्रीने त्रिकटु (सोंठ, मिर्च, पीपल) का काढा बनाकर स्तम्भके (तुम्हारे) मुखमें दिया, इतनेमें कफके प्रकोपसे दांत अकड़ गये और तुमने स्त्रीकी एक ऊँगली काट ली। तुम्हारे मुखमें वह कोमल उँगली पड़ी ही रही और तुम्हारी मृत्यु हो गयी ॥ ९८-१०० ॥ मरणकालमें शय्यापर पड़े हुए उसी पुंश्चली वेश्याका स्मरण करते-करते तुमने प्राण त्याग दिया। जब उस सतीने जाना कि तुम्हारी मृत्यु हो गयी है तो अपने दोनों कङ्कण बेचकर बहुत-सी चन्दनकी लकड़ी खरीदी और उसकी चिता बनायी। फिर दोनों भुजाओंसे भुजायें पैरसे पैर, मुखसे मुख तथा हृदयसे

४८० आनन्दरामायणे [ सर्ग १४

त्वमन्तकाले गलिकेच्छया हि देहं त्यक्त्वा त्यक्तकर्मा दुरात्मा । व्याधजन्म प्राप्तसि घोरधर्मं हिंसात्मकः सर्वदोषैककारी ॥१०६॥ दत्ता त्वया पादरक्षौपुटे वै संस्मृत्य माधवे मद्धिताय । प्रियाङ्गनाजातेव जाता सुबुद्धिर्धर्मं नृते पादरक्षादिने वै ॥१०७॥ पूर्वं मूर्ध्ना पादरक्षावरोपे जलं मुनेः सर्वपापप्रहारि । तेनैव त संस्मृतिर्मे वनेऽस्मिन् जाता श्रोतुं स्वीयपुण्यं मनिश्व ॥१०८॥ हस्ते कृत्वांगुलिं यस्यान्मृतः पूर्वजन्मांतरे त माद्य वने मांसदाह्यनेऽभूद्देनेचर । १०९ । वेश्या सा झिल्लिका जाता भार्याया तव वर्तते शय्यायां माषानेऽद्य शयनं भुवि सर्वदा ॥११०॥ इति ते सर्वमाख्यातं पूर्वजन्मनि यत्कृतम् तत्कर्म पुण्यं पापं च दृष्टं दिव्येन चक्षुषा ॥१११॥ अतः परं भावि वृत्तं शृणु तेऽहं वदामि वै कृपनाम मुनिस्त्यग्रे करिष्यथ सरोवरे ॥११२॥ करिष्यति तपस्तीव्रं चान्द्रायणपरःस्थितः । पश्चात्प्रयोगिमाते तन्नेत्राभ्यां वहिः सूनम् ॥ ११३॥ वीर्यं दृष्ट्वोर्वी काचित्स्वयं स्खलितमद्भुतम् । ग्रहीष्यति स्वतः काले तस्मात्त्वम्पुत्रवस्तदा ॥११४॥ किराताः पालयिष्यंति किरातत्वं महिष्यसि । उपारक्षार्पणेनेऽद्य यस्मात्सम्पुण्यतस्तदा ॥११५॥ भविष्यति सङ्गविस्ते वने सप्तमुनीश्वरैः । तेषां प्रसादाद्वाल्मीकिर्मुनिरूत्त्व हि भविष्यसि ॥११६॥ यस्त्वं रामकथां दिव्यां सुप्रबन्धैः करिष्यसि ।

वाल्मीकिरुवाच इति व्याधं समादिश्य धर्मान्वैशाखजानपि ।११७। उपदिष्ट्य सविस्तारं प्रतस्थे गौतमीं तदा स द्विजः कुण्डलाद्यैश्च तद्दत्तैस्तुष्टमानसः ।।११८।। व्याधोऽपि शङ्खवचनं तस्मिन्नेव वने चरम् । सर्वान्त्याचमार्यान्तानर्चनान्पाऽकरोत्सुमान् ११९।।

हृदयका आलिंगन करके तुम्हारे साथ घबराता विमान द्वाराकी व्य वहर छह राममें रमी पतिव्रता स्त्री सती होकर वैकुण्ठलोकको चली गयी १०१-१०५ ॥ अथ ब्राह्मण चित्त कार्योंको त्यागे हुए तुमने अन्तसमय- में वेश्याका चिन्तन करते हुए प्राण त्यागे थे। इससे ऐसा उद्गाहारी नया हिंसासे आसक्त इस घोरकर्ममय काप्रिका वीजम उत्पन्न हुए हो। उस समय वैशाख इनंगो आये हुए दैवज्ञ ऋषिकी पूजाके लिए तुमने अपनी स्त्रीको आज्ञा दे दी थी, उसी पुण्यमे तुम्हारे हृदयमें धर्मबुद्धि उत्पन्न हुई है। इसीसे इस समय तुमने मेरे जूते वापस दे दिये हैं। तुम्हारे स्थान देवारुक वन्दके ब्राह्मणका चरण-जल तुम्हारे माथ चढाया था, उसी पुण्यसे बाज हमारी भेट हुई है और तुम अपने पूर्वजन्मका वृत्तांत सुन रहे हो ॥ १०६-१०८॥ तुमने पूर्वजन्ममें अपनी स्त्रीकी उंगली काट ली थी। इसलिए हे वनेचर ! इस समय तुम माँसाहारी हो । वह वेश्या इस समय में ल्ली है। मरने समय तुम शय्यापर हुए थे, इस कारण इस जन्ममें तुम्हे सर्वदा भूमिपर शयन करना पडता है। मैंने अपनी योगदृष्टिसे तुम्हारे पूर्वजन्मके पाप-पुण्य देखकर तुम्हें बतलाया है ॥ १०६-१११॥ इसके अनन्तर अब मैं तुम्हें तुम्हारे भावी जीवनका हाल बतलाता हूँ सुनो । कुपनामक कोई तपस्वी अमर त्यागकर एक सरोवरके निकट तपस्या बार । पश्चात् अन्तम उनकी आंखोंसे वीर्य निकलेगा। उसे देखकर काई सर्पिणी खा जायगी। उसीके उदरसे तुम किरातके रूपमें उत्पन्न होओगे ॥ ११२-११४॥ किरात लोग तुम्हारी रक्षा करेंगे और तुम उन्हींके साथ रहोगे। जो तुम इस समय मुझे मेरा जूता वापस दे रहे हो, इसी पुण्यसे एक बार तुम्हारा सप्त ऋषियांस भेट होगी और उनकी दयासे तुम वाल्मीक नामक ऋषि होओगे ॥ ११५, ११६ । अपनी अच्छी रचनासे तुम रामकथाका निर्माण करागे । वाल्मीकिजी कहते हैं कि इस प्रकार वैशाख मासका धर्म तथा विविध उपदेश देकर व्याधसे कुण्डल आदि पाकर प्रसन्न मन शंख गौतमी नदीकी ओर चले गये। व्याधने भी शंखके उपदेशसे वनमें फल-मूल द्वारा ही वैशाख मासके धर्मोकी

सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४८१

सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४८१

व्याधजन्मान्तरे जाते कण्वः पुत्रस्त्वहं ततः । पश्चाज्जातोग्रहं भूतस्त्वभवं रघुनन्दन ॥१२०॥ अहं पुन किरातेषु किरातैः सह वर्द्धितः । जन्ममात्रं द्विजत्वं मे शूद्राचाररतः सदा ॥१२१॥ शूद्रायां बहवः पुत्राश्चोत्पन्ना मेऽजितात्मनः । ततश्चौरैश्च सङ्गम्य चौरोऽहमभवं पुनः ॥१२२॥ धनुर्वाणधरो नित्यं जीवानामतकप्रमः । एकदा मुनयः सप्त दृष्टा महति कानने ॥१२३॥ स्वतेजसा प्रकाशन्ते ज्वलनाकैसमप्रभाः । तानन्वधावं लोभेन तेषां सर्वपरिच्छदान् ॥१२४॥ गृहीतुकामस्तत्राहं तिष्ठतां तिष्ठतामिति । अत्रवन् मुनयोऽपृच्छन् किमायासि द्विजाधम ॥१२५॥ अहं तानब्रुवं किञ्चिद्दात मुनिसत्तमाः । पुत्रदारादयः सन्ति बहवो मे बुभुक्षिताः ॥१२६॥ तेषां संरक्षणार्थाय चरामि गिरिकानने । ततो मामब्रुवन्सप्त्याः पृच्छगत्वा कुटुम्बकम् ॥१२७॥ यो यो मया प्रतिदिनं क्रियते पापसञ्चयः । यूयं तद्भागिनः किं वा नेति नेति पृथक् पृथक् ॥१२८॥ वयं स्थास्यामहे यावदागमिष्यसि निश्चयात् । यत्पापं ब्रह्महत्यायां यत्पापं मद्यपाततः ॥१२९॥ तेन पापेन लिम्पामो यदि गच्छामहे वयम् । यत्पापं हेमतीर्येण गुरुतल्पगमाच्च यत् ॥१३०॥ तेन पापेन लिंपामो त्वामपृष्ट्वा वनेचर । चेद्व्रजामो वयं भद्रे द्रक्ष्यसे शृण्वतो यदिः ॥१३१॥ संसर्गजनितं पापं ब्राह्मणस्वहरणाच्च यत् । तेन पापेन लिप्तामो यदि गच्छामहे वयम् ॥१३२॥ एवं तच्छपथैर्नानाविधैः प्रत्ययमागतः । तथेत्युक्त्वा गृहं गत्वा मुनिभिर्यदुदीरितम् ॥१३३॥ अपृच्छं पुत्रदारादींस्तैरुक्तोऽहं रघूत्तम । पापं तथैव मन्मत्रे वयं तु फलभागिनः ॥१३४॥ तच्छ्रुत्वा जातनिर्वेदो विचार्य पुनरागतः । मुनयो यत्र तिष्ठन्ति करुणापूर्णमानसाः ॥१३५॥ मुनीनां दर्शनादेव शुद्धान्तःकरणोऽभवम् । धनुरादि परित्यज्य दण्डवत्पतितोऽभवम् ॥१३६॥

निभाया । व्याधका जीवन बितानेके पश्चात् मैं पत्नीकी निस तृणका पुत्र होकर जन्मा । मै उस समय किरातों ही में बढ़ा और उन्हींके साथ रहन लगा । केवल जन्म मेरा ब्राह्मणके वीर्य्यसे हुआ था। किन्तु कर्म मेरा सर्वथा शूद्रोचित था ॥ १२०-१२१ ॥ एक शूद्रासे मेरा विवाह हुआ और उससे कई पुत्र उत्पन्न हुए। कुछ दिनों बाद मै चोरोंस जा मिला और धनुष-वाण धारण करके संसारी जीव के लिए यमराज सदृश भयान्तक चोर हो गया । एक बार मैंने एक विकराल जङ्गलमे सप्त ऋपियोंका देखा ॥ १२२ ॥ १२३ ॥ जलती हुई अग्नि तथा सूर्यके समान इनका प्रकाश था । उसे देखकर हा उनके कपड़े लने छींननेके लिए मै जोरोंसे दौड़ पड़ा और "ठहरो ठहरो" कहकर चिल्लाने लगा । तव ऋषियोंने कहा-अरे द्विजाधम ! क्यों दौड़ा आ रहा है ? । १२४ । १२५॥ मैन उनर दिया कि आपमे कुछ भोजन दिग्ये। क्योंकि मेरे परिवारके सब लोग भूखे बैठे हैं। उसीका पालन-पोषण करनेके लिए मैं वन वन घूम रहा हूँ। तब सप्तर्षियोंने हमसे कहा-अपने कुटुम्बियोंसे जाकर पूछो कि मैं जो नित्य यह पापकी कमाई कर रहा हूँ। तुम लोग अलग-अलग बतलाओ कि उस पापका फल भी भोगोगे या नहीं ? ॥ १२६-१२८ ॥ यह विश्वास रक्खो कि जबतक तुम लौटकर नहीं आओगे तब तक मै यहाँ ही रहूँगा। जो पाप ब्रह्महत्या करनेमें और जो पाप मद्य पीनेमे लगता है, हमलोग उन्हीं पापोंके भागी हों, जो बिना तुम्हारे आय यहाँसे जावें। जो पाप मोना चुराने या गुरुपत्नीके साथ व्यभिचार करनेमे होता है, हमलोग उन पापोंके भागी हों, यदि तुमसे बिना पूंछे यहाँस जाये ॥ १२९-१३१ ॥ संसर्गजनित अथवा ब्राह्मणका धन हरण लेनेसे जो पातक लगता हो हम सब उस पापके भागी हों, यदि यहाँसे पीठ पीछे हटें ॥ १३२ ॥ इस तरह उनके विविध प्रकारकी कसम खानेपर मुझे विश्वास हुआ और अपने घर गया । वहाँ जैसा उन ऋषियोंने कहा था, उसी तरह करक लोगोंको इकट्ठा करके मैने पुत्र-स्त्री आदिसे पूछा । उन्होंने उत्तर दिया कि तुम जो पाप कर रहे हो उससे हमें कोई मतलब नहीं। हम तो केवल फल चाहते हैं ॥ १३३ ॥ १३४॥ उनकी बात सुनकर मुझे बड़ा दुःख हुआ और मै लौटकर फिर वहीं आया, जहाँ दयासे परिपूर्ण हृदयवाले वे सप्तर्षि बैठे मेरा रास्ता देख रहे थे ॥ १३५ ॥ उन मुनियोंके दर्शन ही से मेरा हृदय पवित्र हो गया । तुरन्त धनुष-बाण आदि शस्त्रास्त्र फेंककर मैं उनके चरणोंम दण्डवत् लोट गया ॥ १३६॥

४८२आनन्दरामायणे[ सर्गः १४

रक्षोध्न मां मुनिश्रेष्ठाः पतितं नरकार्णवे । इत्यग्रे पतितं दृष्ट्वा मामूचुर्मुनिसत्तमाः ॥१३७॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते सफलः सङ्गमोऽयमः । उपदेश्यामहे तुभ्यं किञ्चित्तेनैव मोक्ष्यसे ॥१३८।
परस्परं समालोक्य दुर्वृत्तोऽयं द्विजाधमः । उपदेश्य एव सद्भिस्तथापि शरणं गतः ॥१३९।
रक्षणीयः प्रयत्नेन मोक्षमार्गोपदिशतः । इत्युक्त्वा राम ते नाम व्यत्यस्ताक्षरपूर्वकम् । १४०।
मुनयो मामूपदिदिशुन्मत्कृपारूध्वेमानसाः । एकाग्रमनसाऽत्रैव मरेति जप सर्वदा ॥ १४१.।
आगच्छामः पुनर्यावन्तावत्त्वं सदा जप इत्युक्त्वा प्रत्यूः सर्वे मुनयो दिव्यदर्शनाः ॥१४२॥
अहं यथोपदिष्टन्तैस्तथाऽकरवमञ्जसा । अपलेकाग्रमनसा चाद्य विस्मृतवानहम् ।। १४३॥
साक्ष्यथं तपमस्तत्र दण्डोऽग्रे स्थापितो मया एवं बहुतिथे काले गते निश्चलरूपिणः ।। १४४।
सर्वस्वङ्गेकिटीनस्य वल्मीकोऽभून्ममोपरि । दण्डाग्रे च नगो रम्यो बभूव मत्तपोबलात् ॥ १४५।
ततो युगसहस्रान्ते ऋषयः पुनरागमन् । मामूचुर्गमगमस्वेति तच्छ्रुत्वा तूर्णमुत्थितः ॥१४६॥
वल्मीकान्निर्गतेवाहं नीहारादिव भास्करः । मामप्याहर्मुनिगणा द्वाल्मीकिस्त्वं मुनीश्वरः । १४७।
वल्मीकात्सम्भवो यस्माद्द्वितीयं जन्म तेऽभवत् । इत्युक्त्वा ते ययुर्दिव्यां गतिं रघुकुलात्तम ।। १४८।
अहं ते रामनाम्नश्च प्रभावादीदृशोऽभवम् । एकदा शम्भुवचसाऽथ विधिः श्रुतवाँस्तव । १४९।
चरितं वेदवाक्यैश्च कैलासेऽग्ने शुभे । अनेन विधिना तच्च कथितं नारदाय हि ॥ १५०।
नारदः कथयामास वेदवाक्यैर्यथा तथा । ततः क्रौञ्च हतं दृष्ट्वा व्याधेन तमसातटे ॥ १५१॥
शोचन्तीं सान्त्वयन्क्रौञ्चीं ममास्यान्निर्गता तदा । द्वात्रिंशदक्षरः प्रोक्तः श्लोकः श्लोकत्वमागतः । १५२।

और कहने लगा-हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं नरकके महासमुद्रम गिर गया हूँ मेरा रक्षा करिए ॥ १३७॥ इस तरह मुझे आगे पड़ा देखकर उन्होंने कहा - "उठो ! उठो ! आज हम लोगोंका समागम तुम्हारे लिये बड़ा ही कल्याण-कारी हुआ। हम तुम्हें कोई ऐसा उपदेश देंगे, जिससे सब सब पापसे छूट जाओगे।' इसके बाद उन लोगों-ने परस्पर मंत्रणा करके कहा - नियम तो यह है कि सज्जन तो मनुष्योंको ही उपदेश देना चाहिये । यह ब्राह्मणाधम एक असाधारण दुराचारी है। फिर भी इससमयकी शरण आया है। इसलिये इसे कोई उपदेश देकर इसकी रक्षा करनी चाहिये। इस प्रकार निश्चय करके हे राम ! उन्होंने आपके उल्टे अक्षरोंके नाम (मरा) का उपदेश दिया और हमसे कहा कि तुम एकाग्र मनसे 'मरा' नामका जप करते रहो जब तक हमलोग उधरसे लौटकर न आय, तब तक तुम बराबर इस नामका जप करते रहना ऐसा कहकर वे दिव्यदृष्टि ऋषिगण वहाँसे चले गये ॥ १३८-१४२॥ जैसा उन्होंने बतलाया था, ठीक उसी तरह मैं एकाग्र मनसे जप करने लगा। मेरा मन उस जपमें इतना रम गया कि मुझे अपने शरीरकी भी सुधि नहीं रही ॥ १४३॥ साक्षीके लिए मैंने अपने सामने एक दण्ड गाड़ दिया था, इस तरह निश्चल भावसे भजन करते-करते बहुत दिन बीत गये और वल्मीकों (दीमकों) ने मेरे शरीरपर मिट्टीका ढेर लगा दिया। मेरे तपोबलसे वह सामनेका गड़ा हुआ दण्ड एक सुन्दर वृक्ष बन गया । १४४॥ १४५ । एक हजार युग बीतनेके बाद वे सप्तऋषिगण फिर लौटे और मेरे विमौटके समीप खड़े होकर उन्होंने पुकारा और कहा कि "निकलगे" । उसे सुनकर मैं तुरन्त उठ खड़ा हुआ। उस समय विमौटके भीतरसे मैं निकला, उस समय मेरी शोभा वैसी ही थी, जैसी कि कुहरेके भीतरसे निकले हुए सूर्यभगवान्की होती है। तब मुझसे मुनियोंने कहा कि वल्मीक (बिमौटे) से तुम्हारा पुनर्जन्म हुआ है। इसलिए तुम मुनीश्वर वाल्मीकि हो गये हो ।। १४६-१४८॥ इतना कहकर वे ऋषि दिव्य (आकाश) मार्गसे चले गये आपके रामनामके प्रभावसे मैं ऐसा ऋषि हो गया। एक बार ओषधिव्रजके मुखसे इन ब्रह्माजीने वेदसे सचकर लिखेहुए आपके चरित्रको सुना था ! १४९ ॥ तब इन्हीं (ब्रह्मा) ने उसे अपने बेटे नारदजी द्वारा और उन्होंने वह सारा चरित्र हमें सुनाया। कुछ समय बाद एक व्याधि द्वारा मारे गये क्रौञ्चके दुःखसे दुःखिता क्रौञ्चीको देखकर मुझे जो शोक हुआ, वही शोक बत्तीस अक्षरोंवाले श्लोकके रूपमें मेरे मुखग निकल पड़ा (श्लोक यह है-मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः

सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४८३

सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४८३


ततोऽपि विधिनानेन चरितं ते प्रणीतम् । समागत्य तु संक्षेपादपिंतो मे वरो अपि ॥१५३॥ ततोऽस्य ब्रह्मणो वाक्यात्कृतवांश्चरितं तव । आनन्ददायकं रम्यं शतकोटिप्रविस्तरम् ॥१५४॥ एवं त्वया यथा पृष्टं तथा सर्वं निवेदितम् । एवं वाल्मीकिवाक्यार्थं सर्वं जानन्नपि प्रभुः ॥१५५॥ पृष्ट्वा श्रोतुं जनान्सर्वान् श्रावयामास राघवः । एतस्मिन्नन्तरे रामं वाक्पतिः प्राह सादरम् ॥१५६॥ राम किं चरितं गेयं तवानन्दस्वरूपिणः । यस्य नामाद्यवर्णेच शब्दमात्रोऽत्र गीयते ॥१५७॥ लौकिका वैदिका चापि अकाराद्यास्तु षोडश । स्वरास्तथैव वर्णाश्च चतुस्त्रिंशच्छुभावहाः ॥१५८॥ ककाराद्याः क्षकारांता मन्त्ररूपाः शुभावहाः । एवं वर्णाश्च पञ्चाशद्ये कीर्त्यन्ते नरैर्भुवि ॥१५९॥ ते त्व नामाद्यवर्णाश्च सर्वं ज्ञेया रघूत्तम । तव नामाद्यवर्णेच व्याप्तं सर्वं चराचरम् ॥१६०॥ चराचराणां सर्वेषां यानि नामानि तानि वै। तेषु वर्णपरस्त्वेन नामान्यद्य वदामि ते ॥१६१। संक्षेपान्चैव पंचाशन्नानि शृण्वन्तु सज्जनाः । ओमनन्तो १ नन्दमय २ श्टापूर्तफलप्रदः ३ ॥१६२॥ ईश्वरश्च ४ उवोत्कृष्ट ५ ऊर्ध्वरेता ६ ऋतंभरः ७ । ॠयुक्तश्च ८ ऌश्चैव ९ लृपक १० एक ११ एव च ॥१६३॥ ऐश्वर्यद १२ ओजदश्च १३ तथौदार्यचंचुरः १४ । अंतरात्मा १५ चार्द्धगर्भ १६ स्तथैव करुणाकरः १७ ॥१६४॥ खङ्गो च १८ गतिदश्चैव १९ घनश्याम २० स्तथैव च । ङशन २१ चामिताशेषदुष्कृतश्च २२ तथैव हि ॥१६५॥ छत्री २३ जगन्मय २४ थैव झपरूपी २५ ञटेश्वरः २६ । टणत्कारिधनु २७ ठानबन्धो २८ डमरुमत्करः २९ ॥१६६। ढुण्ढुलुन्चितपापश्च ३० णकर्मश्च ३१ तथैव हि । तपोरूप ३२ स्थय ३३ थैव दक्षी ३४ धन्वी ३५ तथैव च ॥१६७॥

शाश्वतीः समाः ॥ यत्क्रौञ्चमिथुनावधम् यौ काममोहितम् ॥ } ॥ १५०-१५२ ॥ इसके अनन्तर उन ब्रह्माजीने आकर मुझे संक्षेपरूपसे आपका चरित्र सुनाया और वरदान भी दिया । तब इन्हीके कहनेसे मैने सौ करोड श्लोकोंमे आपका चरित्र रचा ॥ १५३ ॥ १५४ ॥ आपने जैसे पूछा वह सब वृत्तान्त मैने कह सुनाया । यद्यपि रामचन्द्रजी इन सब बातोंको जानते थे, किन्तु संसारके लागोंके सुनानेके लिये उन्होंने वाल्मीकिजीसे इस प्रकारके प्रश्न किये थे । इसके बाद ब्रह्माजी बाल, - १५५ । १५६ ॥ हे राम ! आप जैसे आनन्दस्वरूप-के चरित्रका कोई कहां तक गान करेगा । जिसके नामके पहिले ही अक्षरमें संसारके सारे शब्द आ जाते हैं। लौकिक तथा वैदिक अकारादि सोलह स्वर और ककारसे लेकर क्षकार पर्यन्त चौतीस वर्ण ये पचास अक्षर, जिन्हें कि संसारी लोग जानते हैं। वे सब आपके नामके पहले ही अक्षरमें आ जाते हैं, आपके नामके पहले अक्षरसे सारा विश्व व्याप्त है ॥ १५७-१६० ॥ इस चराचर संसारमें जितने नाम लिये जाते हैं। उन्हें वर्णक्रमसे मैं आपको बतला रहा हूँ। संक्षेपमें वे पचास नाम हैं। उनको सज्जन लोग सुनते जायें— अकारसे 'अनन्त' । आकारसे 'आनन्दमय' । इकारसे 'इष्टापूर्तफलप्रद' । ईकारसे 'ईश्वर' । उकारसे 'उत्कृष्ट' ऊकारसे 'ऊर्ध्वरेता' । ऋकारसे 'ऋतम्भर' । ॠकारसे 'ऋणयुक्त' । ऌसे 'ऌक्ष' । ॡसे 'लृपक' । एसे 'एक' । ऐसे 'ऐश्वर्यद' । ओसे 'ओजद' । औसे 'औदार्यचंचुर' । अंसे 'अंतरात्मा' । अःसे 'अर्द्धगर्भ' तथा कसे करुणाकर ॥ १६१-१६४ ॥ खसे 'खङ्गी' । गसे 'गतिद' । घसे 'घनश्याम' । ङसे ङशन' । चसे 'चमिताशेषदुष्कृत' । छसे 'छत्री' । जसे 'जगन्मय' । झसे 'झपरूपी', ञसे 'ञटेश्वर' । टसे 'टणत्कारिधनु' । ठसे 'ठानबन्ध' । डसे 'डमरुहस्तकर' ॥ १६५ ॥ ॥ १६६ ॥ ढसे 'ढुण्ढुलुन्चितपाप । णसे 'णकर्म' । तसे 'तपोरूप' थसे 'थय' । दसे 'दक्ष' । धसे 'धन्वी' । १६७॥

४८४आनन्दरामायणे[ सर्गः १४

नष्टोद्धरणधीरश्च ३६ तथैव परमेश्वरः ३७।
तथा फलप्रदश्चैव ३८ तथा बलिवरप्रदः ३९ ॥१६८॥
भगवान् ४० मधुघाती च ४१ तथा यज्ञफलप्रदः ४२।
रघुनाथश्च ४३ लक्ष्मीशो ४४ वसिष्ठश्च ४५ तथैव हि ॥१६९॥
शरभ्यः ४६ षड्गुणैश्वर्यसम्पन्नश्च ४७ तथैव हि।
सर्वेश्वरो ४८ हयग्रीवः ४९ क्षमी ५० नामानि ते त्विति ॥१७०॥
पञ्चाशद्वर्णचिह्नानि चैभिर्वर्णैर्जगत्त्रयम् । व्याप्तं श्रीराम सर्वत्र घवर्णेन घटः स्मृतः ॥१७१॥
पवर्णेन पटो ज्ञेयस्त्वेवं वर्णात्मकं जगत् एकैकस्य च वर्णस्य भेदैर्नामानि ते पृथक् ॥१७२॥
नाहं समर्थो व्याख्यातुं पञ्चास्योऽपि न चक्षमः यत्र शेषः सहस्रास्यो वर्णने कुंठितस्त्वभूत् ॥१७३॥
एवं ते महिमा राम कोऽत्र वर्णयितुं क्षमः । तथाप धन्यो वाल्मीकिर्येन ते चरितं कृतम् । १७४।
शतकोटिमितं राम तवैव कृपया प्रभो ।

श्रीरामदास उवाच
इत्युक्त्वा स गुरुर्देवै राघवेणापि पूजितः । १७५।
दृष्ट्वा रामं ययौ स्वर्गं सत्यलोकं ययौ विधिः । वाल्मीकिश्चापि प्रययौ चित्रकूटं निजाश्रमम् ॥१७६॥
तदारभ्य जनाः सर्व चक्रुर्हासं मुदैव ते । मांगल्यकर्माप्युत्साहकर्माणि जगतीतले १७७॥
चक्रुः सर्वे पूर्ववच्च नातिहास्यं प्रचक्रिरे । स्त्रीभिर्नराः सुसन्तुष्टाः क्रीडाहस्यादिकं चक्रिरे ॥१७८॥

इति श्रीमत्शतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे उत्तरार्धे वाल्मीकिजन्मवृत्तवर्णनं नाम चतुर्दशः सर्ग ॥ १४ ॥


नसे 'नष्टोद्धरणधीर'। वसे 'परमेश्वर'। फंसे 'फलप्रद'। बंसे बलिवरप्रद'। भंसे भगवान्'। मंसे 'मधुघाती'। यंसे 'यज्ञफलप्रद'। रंसे 'रघुनाथ'। लंसे 'लक्ष्मीश', वंसे 'वसिष्ठ'। शंसे 'शरभ्य'। षंसे षड्गुणैश्वर्यसम्पन्न'। संसे सर्वेश्वर'। हंसे 'हयग्रीव'। क्षंसे 'क्षमी' । १६८-१७० ।। ये ही पचास नाम पचासों अक्षरोंके आधार हैं और इन्हींसे आकाश, पाताल, मृत्यु ये तीनों लोक व्याप्त हो रहे हैं। घवर्णसे घटका बोध होता है और पवर्णसे पट जाना जाता है। घट और पट इन दोनों शब्दाक्त ही अन्तर्गत समस्त जगत् है। एक-एक वर्णके भरसे सम्पूर्ण नामोंका वर्णन करनेकी सामर्थ्य मुझमें नहीं है ॥ १७१ ॥ १७२ ॥ मै ही नहीं, यदि पंचास्य अर्थात् शिवजीको बतलाना पड़े तो वे भी असमर्थ ही रहेंग। जिसकी महिमाका वर्णन करनेय एक सहस्र मुखवाले शेषजी भी असमर्थ हो गये, उसका वर्णन कौन कर सकेगा। फिर भी वाल्मीकिजी धन्य हैं, जिन्होंने सौ करोड़ श्लोकोंसे आपके चरितका वर्णन किया है ॥ १७३ ॥ १७४ ॥ हे प्रभो ! जो कुछ वाल्मीकिजीने किया है, सो सब आपकी कृपा है। श्रीरामदास कहते हैं कि इतना कहकर समस्त देवताओंके साथ देवगुरु बृहस्पति स्वर्गलोकको चले गये और ब्रह्माजी भी रामसे पूछकर अपने सत्यलोकको लौट गये। वाल्मीकिजी अपने आश्रम चित्रकूटको चल दिये । १७५ ॥ १७६ ॥ उसी समय सब लोग आनन्दके साथ हँसने-खेलने और संसारमें पहलेकी तरह मंगलमय तथा उत्साहप्रय सारे कार्य करने लगे। सबसे लोग प्रसन्नताके साथ परस्पर हँसी-दिल्लगी करने लगे। फिर भी अतिहास्य कोई नहीं करता था ॥ १७७ ॥ १७८ ॥

इति श्रीमत्शतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते राज्यकाण्डे उत्तरार्धे चतुर्दशः सर्गः ॥ १४ ॥

सर्गः १५ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४८५

सर्गः १५ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४८५

पञ्चदशः सर्गः

( राम और रामराज्यकी विशेषतायें )

श्रीरामदास उवाच

रामराज्ये महानन्दः सर्वाननामपि जन्तुषु । नवीभत्सं क्वापि कस्यद्धैर्ये निदामयं तथा ॥ १ । राज्यमासीदमापन्नं समृद्धबलवाहनम् अशेषैर्भिक्षुभिस्तूर्णं रूप्य हाटकभूषणैः ॥ २ । संस्फुटमिष्टापूर्तानां धर्माणाम् नित्यकर्मभिः सदा संपन्नासस्य च सुचिरं क्षेत्रमण्डलम् ॥ ३ । सुदेशं सुप्रजं सुपथ्यं सुशुभं बहुगोधनम् । देशं वनानां च गजिभिः परिगर्जितम् ॥ ४ सुगुप्ता यत्र वै ग्रामाः सुनिविष्टाङ्गनाजनाः । गुप्तैर्भूरिनिवेशयैः मुमुदाः फलपादपाः ॥ ५ । सुपद्मार्कप्रकाशाभा राजन्ते यत्र भूमयः । मद्या निमज्जगागेऽपि मन्ति न मानवाः । ६ । कुलान्येव कुलीनानि न चान्यापधनानि च । विभ्रमो यत्र नारीणां न सिद्धान्तेषु च कर्हिचित् ॥ ७ । नद्यः कुटिलगामिन्यो न यत्र विषये प्रजाः । तमोयुक्ताः क्षपा यत्र वह्नितेजो न मानवाः । ८ ॥ रजोयुजः स्त्रियो यत्र न धर्मबहुला नराः । धर्मसम्बन्धो यत्रासिन्नना नेम च भोजनात् ॥ ९ ॥ अनपत्यास्पदं यत्र न च वै राजपुरुषाः । दण्डः परशुदण्डानामुद्धवेनागजिषु । १० ॥ आतपत्रेषु नान्यत्र कश्चिन क्रोधोऽप्रमाद्यतः । अन्यत्रातोद्वेगदेशेषु च, वैरं पाण्डित्यनम् । ११ । अक्षिका एव दृश्यन्ते यत्र पाणिषपाणयः न, अन्यत्रातः । उल्लेखाः सामधना एव दृश्याः । १२ ।

श्रीरामदास बोले—हे शिष्य ! रामचन्द्रजीके राज्यके समयके सब जीवोंको सदा अधिक ही आनन्द रहता था। उस समय न कहीं आग होता, न भय-झगड़ा होता, न कोई किसकी निन्दा करता और न कोई किसीसे डरता था ॥ १ ॥ राज्य था उस समय शत्रुओंसे रहित और विविध प्रकारके वाहन तथा सेनासे परिपूर्ण था। रामराज्यमें ब्राह्मण सुखी थे और राज्यके रहनेवाले लोग सान-चाँदीके गहनोंसे लदे रहते थे। इष्ट-आपूर्त आदि धार्मिक कृत्य होते रहते थे और सारे खेत धान्यसे परिपूर्ण रहा करते थे ॥ २ । ३ ॥ भाव यह है कि उस समय समस्त प्रजा सुखी थी, प्रजा प्रसन्न थी और रहन-सहन उत्तम था। गौओक चरनेको सुन्दर घास उपजता था। धनोंक अधिकता थी सारा देश दयालुओंसे भरा पड़ा था ॥ ४ । उस राज्यके सब गाँवामे योजक सुन्दर कूप गड़े हुए थे। प्रजाके सब लोग धन धान्यसे परिपूर्ण रहत थे और अच्छे-अच्छे फूलों तथा सदा फल देनेवाल बृक्षोंसे बगीचासे सारा राज्य भरा रहता था ॥ ५ ॥ सदा बहुमूल्यवाले कितन ही मणियों राज्यकी भूमिवर बह रहा थे। ऐसे ही कुछ स्थान बचे थे जहाँ कि मनुष्योंका निवास नहीं था। बाकी सारा पृथ्वी मनुष्यमय भरा थी ॥ ६ ॥ उस समयके सभी मनुष्य कुलीन थे। अन्याय नहीं होता था और धनकी कमी नहीं रहती थी। उस समय स्त्रियोंम विभ्रम (लज्जा) दीखता था, किन्तु पण्डितोंमें विभ्रम (बड़ी भूल) नहीं रहता था ॥ ७ ॥ उस समय देशमें कुटिल (टेढ़ी बेंगी) बहनेवाली नदियाँ थीं, किन्तु प्रजा कुटिलता (दुष्टता) से सर्वथा बची हुई थी कृष्णपक्षकी रात्रिमें केवल तम (अन्धकार) था, मनुष्योंमें तम (तामस गुण) नहीं दीखता था माना सारे मनुष्य उस समय सात्त्विक थे ॥ ८ ॥ स्त्रियाँ रजोगुण (रजस्वला) होती थीं, पुरुष रजोगुण (राजस गुणयुक्त) नहीं थे। उस समय राज्यके लोग पैसोंसे अन्ध; अन्धे नहीं थे, किन्तु अन्य (अन्न) से कोई अनन्य नहीं था। अर्थात् सब लोग खाने-पीनेमें सुखी दीखते थे। उस समय राजपुरुषों (अधिकारियों) में अन्याय नहीं दीखता था। दण्ड केवल कुल्हाड़ी, मुशल तथा पाँसों ही में दीखता था। प्रजापर प्रजाको दण्डप्रयोगकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी ॥ ९ ॥ १० ॥ सन्ताप (घाम) केवल छतरियोंपर रहता था। रामराज्यका प्रजामें सन्ताप मानसिक दुःख कहीं नहीं रहता था। केवल रथ हाँकनेवाले सारथियोंके हाथमें प्राश (घोड़े या बैलकी रास) रहता था, किन्तु प्रजाके किसी मनुष्यको पाश (फाँसीका दण्ड) मिलता नहीं देखा गया। जड़ता (ठंडक) की बात केवल जलमें रहती थी।

४८६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १५

कठोरहृदया यत्र योषितोऽपि न मानवाः । औषधेष्वेव यत्रास्ति कुशाग्रो न मानवे ॥१३॥ वेधोऽभ्यन्तरम् रत्नेषु शूलं मूर्ति... वै । कंपः सात्त्विकभावोत्थो न भयात्क्व पिकस्यचित् ॥१४॥ मत्ताः करिण एव यत्र दारिद्र्यं कुतुरेव न । दुर्लभत्वं पातकस्य सुलभं न च वस्तुनः ॥१५॥ इभा एव प्रमत्ता वै युद्धं चाप्याजितामये । दानहानिर्मदेष्वेव द्रुमष्वेव हि कण्टकाः ॥१६॥ जनेष्वेव दृढांग वै न कस्याप्युदरव्यथा । वनेषु गुणविश्लेषो बन्धोक्तिः पुस्तके दृढा ॥१७॥ दण्डत्यागं महेशास्ति यत्र दण्डधरे जने । दण्डवार्ता सदा यत्र कृताभ्यासकर्मणाम् ॥१८॥ मृगवास्तारकेष्वेव भिक्षुका ब्रह्मचारिणः । यत्र क्षपणका एव दृश्यन्ते मलधारिणः ॥१९॥ प्राणा मन्त्रधरा एव यत्र चञ्चलवृत्तयः । इत्यादि विविधै रामा राज्यं शशास सः ॥२०॥ धर्मराजो धर्मज्ञः श्रीरामः प्रतापवान् । ... दण्डमशोष्यायौ मुनिश्चलम् ॥२१॥ निश्चाय राज्यनीतिं विविधां पञ्चतामियात् । उपारूप महाबुद्धे प्रजा धर्मेण पालयन् ॥२२॥ तताप सूर्ये इव स दुहृदो हृदि नेत्रयोः । ... हृदयेऽप्यानन्दमानसेषु स्वकेष्वपि ॥२३॥ अवधूतमासण्डलान् कोदण्डं कलयन्मले । फलदानार्तगलोऽसि शत्रुसैन्यबलाहकैः ॥२४॥ स धर्मराजोऽभूद् धर्माधर्मविवेचकः । अदुष्टान्दण्डयन्नार्त्तो दण्ड्यांश्च परिदण्डयन् ॥२५॥ पाशेन पाशयाञ्चक्रे वैरिवर्गं द्विषद्गणम् । सेतुः पुण्यजनानाञ्चो रिपुराक्षसमर्द्दनः ॥२६॥ जगत्प्राणसमानश्च अगत्प्राणतनयस्य । राजराजः स एवाभूत्सर्वेषां धनदः सताम् ॥२७॥


किसी मनुष्यमें जड़ता (मूर्खता) नहीं थी। केवल स्त्रियोंकी कटिमें दुर्बलता रहती थी, मनुष्योंके हृदयमें नहीं ॥११॥१२॥ कल्पका विचार केवल रत्नमें रहता था, ... और औष्ण्यंभाव केवल (कूट औषधिविशेष) का नाम दाखता था, किसी मनुष्यमें कुष्ठरोग नहीं था ॥१३॥ वेध (छिद्र) केवल रत्नोंमें रहता था। शूल (छीनी) केवल मूर्ति बनानेवाले कारीगरोंके हाथमें रहता था, केवल सात्त्विक भावके उदय होनेपर लोगोंको कम्प होता था—भयसे नहीं। दुर्बलता पातकोंका था, और... इनमें कोई वस्तु अलभ्य नहीं थी ॥१४॥१५॥ मत्तवाले हाथी होते थे, मनुष्य नहीं। युद्ध जनक लवण ... में देखा जाता था। दानहानि (मदके प्रवाहका रुक जाना) केवल हाथियोंमें थी। वृक्षोंमें ही कटक (कांटे) रहते थे ॥१६॥ मनुष्योंमें विराग होता था, किन्तु किसीकी उदरव्यथा (खांसी) ऐसा नहीं देखा गया, जो कि वनोंमें गुणविश्लेष (प्रत्यञ्चाका वियोग) था, दृढ़बन्धाक्ति (कठिन बन्धन) केवल ग्रन्थों/पुस्तकोंके लिए थी ॥१७॥ शिवभक्तोंके लिए केवल दण्डत्याग किया जाता था। राजा दमन करता था प्रजाजनका, केवल सन्यासियोंमें दण्डवार्त्ता। दण्डग्रहण-सम्बन्धी रातदिन रहते थे। इसके सिवाय चारों वर्णके ऊपर प्रजा में कोई मागन (भिखारी) नहीं था। केवल ब्रह्मचारी भिक्षुक था। केवल क्षपणक (जैनधर्मके) लोग मल (कीचड़ वस्त्र) धारी थे ॥१९॥ प्राय श्रीराम चंचलता राखता था। इस प्रकारके गुणोंसे युक्त रामचन्द्रजी राज्य करते थे ॥२०॥ धर्मका तत्त्व जाननेवाले प्रतापशाली रामने इतने काल पर्यन्त तक निष्कंटक राज्य किया, उन्होंने अनेक प्रकारकी साङ्गोपाङ्ग सूर्याङ्गित करके अष्टाक्षर का अपना राज्यधानी यत्न से और धर्मपूर्वक प्रजापालन करते हुए प्रजाको भलीभांति उन्नत किया ॥२१॥२२॥ वे शत्रुओंके हृदयमें सदा सूर्यकी भांति तपते थे और मित्रोंके हृदयमें चन्द्रमाकी तरह हर्षके पहुंचाने वाले। इन्द्रके समान समराङ्गणमें अपना धनुष चमकाते हुए शत्रुसेनारूपी मेघोंका भङ्ग हेतु थे। ऐसा बराबर देखा गया है, महाराज रामचन्द्रजी धर्मराजकी तरह भलीभांति धर्म अधर्मकी विवेचना करके काम करते थे। जो दण्डके योग्य नहीं होते थे, उन्हें दण्ड नहीं देते थे और जो दण्डके योग्य होता, उसे अवश्य दण्ड देते थे शत्रुओंको समुद्रकी तरह रज्जुकी तरह उन्होंने बाँध रक्खा था। रिपुरूपी राक्षसोंका भी उपकार करके रामचन्द्रजी संसारमें सब महात्माओं में उच्च पदपर पहुँच चुके थे ॥२३-२६॥ जगत्की रक्षाके लिए रामचन्द्रजी जानके प्राण समान थे। अच्छे मनुष्योंको धनकी सहायता देकर वे स्वयं राजराज (कुबेर) हो रहे थे। शत्रुओंको भय दिखाकर रुद्र बन गये थे। यही कारण था कि जिससे

सर्गः १५ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४८७


स एव रुद्रमूर्तिश्च प्रैक्षिष्ट रिपुभीषणे । विश्वेदेवास्तमर्चन्तं तु स्तुवन्ति च भजन्ति च ॥ २८ ॥
अशक्यः स हि साध्यानां वसुभ्यो वसुनाधिकः । त्रयाणां विग्रहधरो दस्रोऽजस्ररूपधृक् ॥ २९ ॥
महद्गुणगणगण्यंस्तुतिनास्तोष्यन् गुणाः । यस्याध्वगो यस्तु नवाद्यधरोऽपि । ३० ॥
आक्रान्तेव गन्धर्वाभ्यश्शकं निवर्गान्तिः । रघुवक्षश्चामि तद्दुर्गं स्वर्गमोददम् ॥ ३१ ॥
नागा नागास्तिरश्चक्रुस्तस्य राज्ये बलाधमः । दनुज मनुजाकारं कृत्वा तं तु सिषेविरे ॥ ३२ ॥
आता गुप्तचरा यस्य गुप्तकाः पक्षिणो नृषु । मसेविष्यामहे राजन् मुग्ध्वां स्वस्ववैभवैः ॥ ३३ ॥
वयं ततस्त्वद्विषये सुरावामोऽपि दुर्लभः । इत्युक्त्वा गणचक्रं तं मघवायाः सिषेविरे ॥ ३४ ॥
अशिक्षयत्क्षितिपतेरिह यस्य तुरङ्गमान् । अभूगश्चाशत्रुचित् पक्ष्याने रथि स्थितः ॥ ३५ ॥
अशत्रान्यस्य तु मज्ञाश्चरणेषु वर्षणः । अमन्दिनो दृष्टामरुन्त्येऽपि दानिनः ॥ ३६ ॥
सदोऽजिरं च योद्धागे योद्वाश्च म्नाजिरे । न शास्त्रैर्जन कांधा शस्त्रैः केनचित्क्वचित् ॥ ३७ ॥
न नेत्रविषये जाता विषरे यस्य भूभृतः । सदा नृपवद्वा ऽप्यासतथा महावदः प्रजाः ॥ ३८ ॥
कलवानेक एवास्ति त्रिदिवेऽपि दिवौकसाम् । तस्य क्षोणीभृतः क्षोण्यां जनाः सर्वे कलाधराः ॥ ३९ ॥
एक एव हि कामोऽस्ति स्वर्गं सोऽप्यङ्गज केवलः । माहेता ह्यथ भूपाल सर्व कामा हि तद्भुवि ॥ ४० ॥
तम्योपवर्तनेऽप्येको न भूतो गोत्रभिन्क्वचित् । मद्य स्वर्गमहार्याजो गोत्रभिन्मार्गकीर्तितः ॥ ४१ ॥
क्षयी च तस्य रिपवे कोऽप्यक्षीण न केनचित् । त्रि विष्टपे अपानाथः पूर्व पक्षे क्षयिष्यते ॥ ४२ ॥
नाके नवग्रहाः भान्ति दृशास्तस्यानवग्रहाः । हिरण्यगर्भः स्वर्लोके चैक एव प्रकाशते ॥ ४३ ॥
हिरण्यगर्भाः सर्वेऽपि तन्मीषायामहालयाः । ममाश्र एकः स्वर्लोके निमलं भास्यशुमान् ॥ ४४ ॥


एव विश्वेदेव उनकी स्तुति और भजन करते थे । वे साध्य ( द्वादश गण विशेष ) के लिए भी अशक्य थे । वसु ( धन ) की अधिकतासे वे अष्टवसुओ से भी श्रेष्ठ थे । कामदेवके साक्षात स्वरूप थे और अश्विनीकुमारके समान सदा सुन्दर रूप धारण किये रहते थे ॥ २८-२९ ॥ वे अपने समाधारण पराक्रमसे गन्धर्वोसे भी श्रेष्ठ थे । कितने ही सद्गुणोंसे वे छतीस नृविद्याओं प्रमथ कर रहे थे । समस्त विद्याधर विद्या शिरोमणि थे और अपने गीतोके माधुर्यसे उन्होंने गन्धर्वोका भी मद क्षय कर दिया था । संसारभरक यशआवास स्वर्गके समान कमनीय रामके किल को रक्षा करते थे ॥ ३० ॥ ३१ ॥ दिग्गज तक हाथी रामके हस्तिसमूहसे पराजित हो गये थे । सारी दुनियाके दानव मनुजका रूप बना बनाकर रामका सेवा कर रहे थे ॥ ३२ ॥ उनके गुप्तचर राज्यके मनुष्योंम घुसकर अपना प्रभाव सिद्ध करनेके लिए गुप्तगो ( पक्षिभट दूतों ) से भी बाजी मार चुके थे । इन्द्रादि देवता रामके समीप आकर कहा कि हे महाराज ! हमारे पास जो कुछ वैभव है, वह सब लगाकर हम आपकी सेवा-शुश्रूषा करनेको प्रस्तुत हैं ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ इस युगमें जिसमें कोई वायु देवतासे भी जत्थ चलना सिखाते थे, जिसके पर्वतके समान ऊंचे बड़े-बड़े हाथियोंका अजस्रदानिहा (मस्त मदप्रवाह अथवा दानशीलता) देखकर संसारके कृपण मनुष्य भी दानी बन गये थे । जिसका राजसभाके बुद्धिमान पण्डित और सेनाके बड़े-बड़े योद्धा शास्त्र तथा शस्त्रसे कभी पराजित नहीं हुए थे ॥ ३५ ३७ ॥ उन रामके राज्यमें जैसे रुग्ण कहीं नहीं दीखता था, वैसे ही प्रजा में कभी किसी प्रकारकी विपत्ति भी नहीं दिखायी देती थी ॥ ३८ ॥ देवताओंके स्वर्ग जैसे राज्यमें केवल एक कलावान् चन्द्रमा था, किन्तु रामके राज्यमें सब मनुष्य कलाके भण्डार थे । स्वर्गमें केवल एक कामदेव था, सो भी अनङ्ग ( अर्थात् बिना शरीरका ) । किन्तु रामराज्यके सारे मनुष्य गुणवान् कामदेव (जैसे सुन्दर ) थे । रामके राज्यक्षेत्रमें खीझनेवाला भी कोई गोत्रभित् (जातिसे बहिष्कृत) मनुष्य नहीं मिल सकता था, किन्तु स्वर्गमे देवताओंके राजा स्वयं गोत्रभित् (इन्द्र थे ॥ ३९-४१ ॥ राम-राज्यमें कोई क्षयी (अपरेगी) नहीं सुना गया, किन्तु स्वर्गमें चन्द्रमा एक पक्षमें क्षय होत रहते हैं ॥ ४२ ॥ स्वर्गमें सर्वदा नौ ग्रह रहते हैं, किन्तु रामका राज्य अनवग्रह ( यानी आपको

४८८आनन्दरामायणे[ सर्गः १६

मदंशुकाः प्रतिगृहं बहुधाऽऽसन्पुरेश्वराः । मदप्सरा यथा स्वर्गस्त्वेक एव मदप्सराः ॥४५॥
एकैव पद्मा वैकुण्ठे गीयते विष्णुवल्लभा । नारीगणां गृहेष्वासंस्तत्पद्माः पृथक् पृथक् ॥ ४६॥
अनशन्यश्चलद्दामा न राजपुरुषाः क्वचित् । गृहे गृहेऽत्र धनदा नाक एकोऽल्पकापतिः ॥४७।
एवं रामो महान् श्रेष्ठः शौर्याद्यैर्गुणशोभनः । सौभाग्यशोभा रूपालयः शौर्योदार्यगुणान्वितः ॥४८॥
विजितानेकसमरः श्रियमप्यपवर्गदाम् । दत्वाऽरिजनवर्गेभ्य उग्रः परपुरंजयः ॥४९॥
अनेकगुणसंपूर्णः पूर्णचन्द्रनिभद्युतिः । मन्त्रावभृथक्लिन्नमूर्द्धजः क्षितिपर्षभः ॥५०॥
प्रजापालनतत्परः कोशपूर्त्यार्णभृद्गुरुः । सर्वदाऽक्षरनक्षत्रयुगलध्यानतत्परः ॥५१॥
विशेषककथालापपारिश्रित्यदिनक्षप । सीताप्रक्षालितपदम्भःक्रीडापरितोषितः ॥५२।
शशास राज्यं धर्मेण बन्धुपुत्रसमन्वित । रामे शासति साकेतपुर्यां राज्यं सुखेन वै ॥५३॥
हृष्टाः पुष्टा प्रजाः सर्वाः फलवन्तोऽभवन्द्नगाः । आमन्मदा सुकुसुमैर्विनम्राः सौरभोदा नृणाम् । ५४॥
एकपत्नीव्रताः सर्वे पुमांसस्तस्य मण्डले । नारीषु काचिन्नेवासीत्पवित्रव्रतधर्मिणी ॥५५॥
अनधीतो न विप्रोऽभून्न शूरो नैव बाहुजः । वंश्योऽनभिज्ञो नैवासीदथोपार्जनकर्मसु ॥५६॥
अनन्यवृत्तयः शूद्रा द्विजशुश्रूषणं प्रति । तस्य राष्ट्रे समभवन्सीतारामास्य भूपतेः ॥५७॥
अविप्लुतब्रह्मचर्य्यास्तद्राष्ट्रे ब्रह्मचारिणः । नित्यं गुरुकुलाधीना वेदग्रहणतत्पराः ॥५८॥

लड़ाई-झगड़ेसे रहित था । स्वर्गमें केवल एक हिरण्यगर्भ (विष्णुभगवान्) रहते हैं, किन्तु रामराज्यके प्रत्येक घर हिरण्यगर्भ थे अर्थात् उनमें सुवर्ण भरे हुए थे स्वर्गमें केवल एक मन्मथ अंशुमान् (सूर्य) हैं, किन्तु रामके राज्यमें प्रत्येक व्यक्ति अंशुमान् (वस्त्र कपड़े पहननेवाले) और बातको कौन कहे, जिनमे ही धोड़ बाँधनेवाले लोग विद्यमान थे। जिस तरह हृदयमे अच्छी-अच्छी अप्सराएं हैं, उसी तरह रामके राज्यमें भी बहुत-सी अच्छी-अच्छी अप्सराएं रहती थीं । ४३-४५ । ऐसा कहा जाता है कि स्वर्गमें केवल एक विष्णुकी प्रिया पद्मा (लक्ष्मी) हैं किन्तु रामके राज्यमं स्त्रियोंसे भी अधिक पद्मापति (पद्मसंख्यक रुपये रखनेवाले) लोग थे । रामके राज्यमे कभी किसी प्रकारका अकाल नहीं पड़ा और ऐसे राजपुरुष नहीं थे, जो कान्तिविहीन रहे हों । स्वर्गमें केवल कुबेर धनद (लेस दसके व्यवहारी) हैं किन्तु रामके राज्यमं असंख्य धनद थे ॥ ४६ । ४७ । इस तरह रामचन्द्र अनेक मद्गुणोंसे युक्त और सर्वश्रेष्ठ थे । रामचन्द्र सौभाग्य, रूप शौर्य और औदार्य आदि गुणोंसे युक्त थे। अनेक युद्धामं उन्होंने विजय पायी थी और संसारकी दरिद्रताको उन्होंने लक्ष्मोंके हाथ सौंप दिया था। उनके वामभागमें सीताजी बैठो रहती थीं । इस कारण उनकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। वे सबसे उग्र तथा शत्रुओंके नगरको विजय करनेमें सिद्धहस्त थे। अनेक गुणोंके एकत्रित होनेसे वे पूर्ण हो चुके थे और पूर्ण चन्द्रमाके समान उनकी कान्ति थी। सर्वदा अवभृथ (दक्षान्त) स्नान करनेसे उनके केश भीगे रहते थे और सब राजाओमे श्रेष्ठ माने जा चुके थे ॥४८-५०॥ प्रजाका पालन करनेम वे पूर्णतया दत्तचित्त रहते थ और खजानक धनस ब्राह्मणोंको प्रसन्न रखते थे। वे सदा शिवके ध्यानम तत्पर रहते थे। वे सर्वदा शिवजीक। कथाएँ कहन मनते दिन रात बिताने थे । सीता उनके पैर धोया करती थीं । उनके साथ विविध प्रकारकी क्रीड़ायें करनेमे राम प्रसन्न रहत थे ॥ ५१ । ५२ । उन्होंने भाइयो और पुत्रोके साथ रहकर अच्छी तरह राज किया । रामके शासनकालमे प्रजा मुखी तथा हृष्ट-पुष्ट रहती थी और वृक्ष फल-फूलसे लदे रहकर कारण झुक रहने और मनुष्योंको मुखी रखते थे ॥ ५३ । ५४ ॥ उनके राज्यमें सब पुरुष एकपत्नीव्रती थे और स्त्रियोंमें भी कोई ऐसी नहीं थीं, जो अपने पातिव्रतधर्मका पालन न करती हो ॥ ५५ ॥ उस समय कोई ऐसा ब्राह्मण नहीं था, जो बिना पढ़ा हो और कोई क्षत्रिय भी ऐसा नहीं था, जो योद्धा न रहा हो। कोई ऐसा वैश्य नहीं था, जो धन कमानेकी कला-से अनभिज्ञ हो। राजा रामके शासनकालमें राज्य भरके शूद्र और किसी प्रकारकी वृत्ति न करके एकमात्र द्विजों (ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्यों) की सेवामें लगे रहते थे। उनके राज्यमें ब्रह्मचर्य्यकी रक्षा करते हुए

सर्गः १६ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४८९

सर्गः १६ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४८९

अन्येऽनुलोमजन्मानः प्रतिलोमभवा अपि। स्वशास्त्रोक्तव्रतो दृष्टुं नातान्धर्म्यं न तत्त्यजुः ॥५९॥ अनपत्यो न तद्राष्ट्रे धनहीनस्तु कोऽपि न । विरुद्धसेवी ना कश्चिदकालमृतिभाङ् न कः॥६०॥ न शठा नैव वाचाटा वञ्चका नो न हिंस्रकाः। न पाखण्डा नैव षंण्डा न रण्डा नैव शौण्डिकाः ॥ ६१॥ श्रुतिघोषा द्विजैर्यत्र शास्त्रवादः पदे परे । सर्वत्र शुभगानानि मुदा मङ्गलगीतयः ॥६२॥ वीणावेणुप्रवादाश्च मृदङ्गगुरुस्वनाः। सोमपानं विनाऽन्यत्र पानगोष्ठी न कर्णगा ॥६३॥ मांसाशिनः पुरोडाशं नैवान्यत्र कथञ्चन । न दुरादर्शणो यत्राधर्म्मिणो न च तस्कराः ॥६४॥ पुत्रस्य पित्रोः पदयोः पूजनं देवपूजनम् । उपवासो व्रतं तीर्थं देवताराधनं परम् ॥६५॥ नारीणां भर्तृपदयोः स्मरणं तद्वचःश्रुतिः । समर्चयति सततं निजमग्रजमादरात् ॥६६॥ समर्चयंति मुदिता भृत्याः स्वामिदाभ्भृत्वम् । हीनवर्ग्योऽग्रवर्ग्यो वर्णने गुणगौरवं ॥६७॥ यतिष्यन्ति भूयोऽपि त्रिकाल भूमिसदेशः । सर्वत्र सर्वे विद्वांसः समर्चन्ते मनोरथैः ॥६८॥ विद्वद्भिय तपस्विभ्यस्तपोनिष्ठैर्जितेन्द्रियाः । जितेन्द्रियेभ्यंस्तान्निष्ठा ज्ञानिभ्यः खिन्नलिङ्गिनः ॥६९॥ मंत्रपूतं महार्हं च विधियुक्तं सुसंस्कृतम् । ब्राह्मणानां मुखाग्नौ च हूयतेऽहर्निशं हविः ॥७०॥ वापीकूपतडागानामागमणां पदे पदे । सुधिविद्वेन्प्रसंमार्गः कर्त्तारो यत्र भूरिशः ॥७१॥ तद्राष्ट्रे हृष्टपुष्टाश्च दृश्यन्ते सर्वजातयः । अनिन्द्येनेषामंपन्ना दिना मृगयुमैनिकान् ॥७२॥ यस्य राज्ये पताकासु चञ्चला श्रौर्न राष्टके । ऐरावतस्त्वेक एव शुभ्रः स्वर्गे गजो महान् ॥७३॥ चतुर्दन्तो रामराज्ये तद्रत्नागाः सहस्रशः । इन्दू सूर्योश्चमात्रेव शोभंते गगनांगणे ॥७४॥ रामराज्येऽथ नारीणां सीमंतस्था मनेकशः । वृपोऽप्यनेकः स कैलासे भीयते यस्यः मित्रः ॥७५॥

गुरुकुलमें रहकर वेदाध्ययन करते थे ॥ ५४-५८ ॥ अनुलोम जातिमें उत्पन्न लोगोने यह कभी नहीं कहा कि मैं अपने दर्जेसे ऊँच पद रहूँ । रामके राजमें कोई सन्तानविहीन तथा निधन नहीं था और कोई ऐसा भी नहीं था, जो अपनी मर्यादाके विरुद्ध आचरण करनेवाला हो । उनके राजमें कोई अकाल मृत्युका पात्र नहीं बन सका । उस समय न कोई शठ, न बकवादी, न वंचक, न हिंसक, न पाखण्डी, न षांड़, न व्यभिचारिणी और न धूर्त ही था ॥ ५९-६१ ॥ पद पदपर वेदध्वनि तथा शास्त्रसम्बन्धी वाद-विवाद सुनायी देता था । चारो ओर अच्छी-अच्छी बातें हंसी-खुशीके मांगलगौत, वीणा वेणी तथा मृदंगका मीठा स्वर सुनायी पड़ता था । सोमपानके सिवाय और किसी मादक वस्तुके खाने-पीनेकी बात नहीं सुनायी देती थी । यज्ञके अतिरिक्त दूसरे समयपर मांस न नेवाने मनुष्य, दुष्ट दृर्ष, अधर्मी और चोर कहीं भी नहीं थे ॥ ६२-६४ ॥ पुत्रक लिए माता-पिताके पदपूजन ही देवपूजन, उपवास व्रत, देवताराधन और तीर्थ था । नारीके लिए अपने पतिके चरण पूजन और उनकी बातें वेदवाक्य सदृश मानना ही सबसे श्रेष्ठ धर्म माना जाता था । सदा छोटा भाई बड़े भाईकी पूजा करता था। सेवक प्रसन्न मनसे अपने मालिककी सेवा करता था । नीच जातिका मनुष्य अपनेसे ऊँच वर्णवालिका गुण-गौरव बखानता था ॥ ६५-६७ ॥ सब लोग ब्राह्मणोंकी पूजा करते और विद्वानोंके मनोरथ पूर्णकरनेको उद्यत रहते थे । विद्वान्से तपस्वी, तपस्वीसे जितेन्द्रिय तथा जितेन्द्रियसे भी ज्ञानी मनुष्य श्रेष्ठ माना जाता था और ज्ञानीये भी संन्यासी उच्च पदपर माने जाते थे ॥ ६८ ॥ ६९ । सदा मंत्रसे पवित्र किया हुआ हवि विप्रोंके मुखाग्निमें पड़ता रहता था ॥ ७० ॥ बावली, कूप तड़ाग तथा वृक्षलगाकर बगीचा करानेवाले और पवित्र द्रव्योंको एकत्र करके यज्ञादि शुभ कर्म करनेवाले कितने ही धर्मात्मा रहा करते थे ॥ ७१ ॥ रामके राज्यमें सब जातिके मनुष्य हृष्ट-पुष्ट दिखायी पड़ते थे । शिकारी तथा सैनिकोक सिवाय सब लोग श्लाघनीय कार्योंमें लगे हुए थे । उनके राज्यम लक्ष्मीकी चंचलता केवल पताकामें रहनी थी, राष्ट्रमें नहीं। स्वर्गमे केवल एक ऐरावत हाथी बड़ा, चतुर्दन्त और श्वेत वर्णका है। किन्तु रामके राज्यमें हजारों हाथी चार दाँतवाले तथा श्वेत वर्णके थे । स्वर्गमें केवल सूर्य और चन्द्रमा प्रकाश करते हैं, किन्तु रामराज्य-की स्त्रियोंके केशाम ( माँगके ) वैसे-वैसे अनेक चन्द्रमा-सूर्य चमकते दिखाई देते थे ॥ ७२-७४ । मूना

४१० आनन्दरामायणे [ सर्गः १५


शङ्खवृषा रामराज्ये कृषिकर्मणि योजिताः । एणोऽस्त्येकश्चन्द्रलोके कृष्णवर्णो मनोरमः ॥७६॥
सङ्ख्यः शिशूनां हि क्रीडार्थं सन्त्यनेकशः । अप्सराःसु वरा स्वर्गे गीयते सा तिलोत्तमा ॥७७॥
गेहे गेहे सति नार्यः सर्वास्त्वत्र तिलोत्तमाः । रुक्मभूषणभूषाढ्या झणन्नूपुरनिःस्वनाः ॥७८।
सहस्राक्षोऽस्त्येक एव महान्स्वर्गे प्रगीयते । रामराज्ये चामराणि सहस्राक्षीण्यनेकशः ॥७९।
सुधापानं त्वेकमेव स्वर्गेऽस्ति परमं वरम् । तद्वन्माध्वीरसानां च पानमत्र गृहे गृहे ॥८०॥
सुधापानेन संहृष्टा यथा स्वर्गसुरोत्तमाः । दयिताऽधरपानेन तथाऽत्र सुखिनो जनाः ॥८१॥
सागरेष्वेव सा दृष्टा मर्यादा सर्वदा नरैः । रामराज्येऽत्र बालेषु मर्यादा सर्वदेक्ष्यते ॥८२।
विचरन्ति गजारूढाः भूपते पार्थिवाः पुरा । पौर जानपदाः सर्वे विचरन्त्यत्र ते गजः ॥८३.।
पूर्व भूतं शिशूनां हि चुंबनं दिवसे मुहुः । रामराज्येऽनिशं नारीचुम्बनानि मुहुर्मुहुः ॥८४।
क्रीडा परिमलद्रव्यैः फाल्गुने सा श्रुता पुरा । क्रीडा परिमलद्रव्यैः पौराश्चक्रुः सदाऽत्र ते ॥८५॥
एवं तद्रामराज्यं हि महामंगलसंयुक्तम् । आसीदनुपमेयं च श्रवणान्मंगलप्रदम् ॥८६॥

इति श्रीमत्कोटीरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे
उत्तरार्धे रामराज्यवर्णनं नाम पंचदशः सर्गः ॥ १५ ॥


षोडशः सर्गः

( रामका लव-कुश तथा भ्राताओंको राजनीतिक उपदेश )

श्रीरामदास उवाच

एकदा राघवः श्रीमान्समाहूय कुशं लवम् । लक्ष्मणं भरतं चापि शत्रुघ्नं रहसि स्थितः ॥ १ ॥


जाता है कि कैलासपर एक ऐसा बैल है, जो अतिशय धवल वर्णका है। किन्तु रामराज्यमें वैसे वैसे कितने ही बैल हल जोतनेका काम करते थे। चन्द्रलोकमें एक ऐसा मृग है, जो बड़ा सुन्दर और कृष्ण वर्णका है। किन्तु रामराज्यमे लड़कोंको खेलनेके लिए वैसे-वैसे कितने ही मृग रहा करते थे। सुनते हैं कि स्वर्गलोकमें कोई तिलोत्तमा नामकी बड़ी सुन्दरी अप्सरा है ॥ ७५-७७ ॥ किन्तु रामराज्यमे घर-घरकी स्त्रियां तिलोत्तमाके समान सुन्दरी तथा सुवर्णके भूषणोंसे भूषित होकर चलते समय नूपुरका झनझन शब्द करती चलती थीं ॥ ७८ ॥ सुनते हैं कि स्वर्गमें केवल एक सहस्राक्ष (इन्द्र) है, किन्तु रामके यहाँ अनेकों सहस्राक्ष चमर चलते थे। स्वर्गमें केवल अमृत पान करनेकी वस्तु है और रामराज्यमें घर-घर विविध प्रकारकी रसमयौ पेय वस्तुयें विद्यमान रहा करती थीं ॥ ७९ ॥ ८० । जिस तरह अमृतको पीकर देवता स्वर्गमें प्रसन्न रहते हैं, उसी प्रकार स्त्रीके अधरोष्ठका पान करके अयोध्याके सब मनुष्य प्रसन्न रहते थे ॥ ८१ ॥ आजतक संसारी मनुष्योंने केवल समुद्रकी मर्यादा देखी थी (यानी वह अपनी सीमाके बाहर जाता नहीं देखा गया), किन्तु रामके राज्यमे छोटे-छोटे बच्चोंमें भी मर्यादा दिखायी देती थीं ॥ ८२ ॥ सुनते हैं कि पहले राजा ही लोग हाथियोंपर चढ़कर इधर-उधर घूमते-फिरते थे, किन्तु रामके राज्यमे सारे पुरवासो और देशवासी हाथियोपर सवार होकर घूमते फिरत दिखायी देते थे ॥ ८३ ॥ सुनते हैं कि पहले लोग बच्चोंको ही बार-बार चूमते थे किन्तु रामके राज्यम स्त्रियत्को भी लोग बड़े आनन्दके साथ दिन रातमें अनेकों बार चूमते थे ॥ ८४ ॥ सुना जाता है कि पहले फाल्गुनके महीनेम ही रङ्ग तथा सुगन्धित वस्तुएं एक-दूसरेपर उछालते हुए लोग फाग खेलते थे, किन्तु रामके राज्यम लोग सर्वदा वैसे खेल खेला करते थे । ८५ ॥ इस प्रकार रामका राज्य महामङ्गलमय अनुपमेय और नाममात्र सुननेसे ही कल्याणदायक हो रहा था ॥ ८६ ॥ इति श्रीमत्कोटीरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते राज्यकाण्डे उत्तरार्धे पंचदशः सर्गः ॥१५॥

श्रीरामदासने कहा कि एक बार श्रीमान् रामने एकान्तमे लव, कुश, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्नको

सर्गः १६ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४२१

सर्गः १६ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४२१


राजनीतिं विस्तरेण शिक्षयामास सादरम् । शृणु वत्स कुशद्य त्वं यूयं सर्वे लवादिकाः ॥ २ ॥
शृणुयात्र स्वस्थचित्ता राजनीतिं वदाम्यहम् । कुश त्वं पृथिवीपालो भविष्यसि गते मयि ॥ ३ ॥
वैकुंठं शृणु तस्मात्त्वं सावधानमना भव । अनृतं नैव वक्तव्यं नृपेण चिरजीविना ॥ ४ ॥
नातिकामी न वै क्रोधी राजा च सुखमर्हति । परदारान्निषेव्याज्यः सर्वथा पार्थिवेन हि ॥ ५ ॥
सत्यं शौचं दया क्षांतिरार्जवं मधुरं वचः । द्विजगोयतिसद्भक्तिः सर्वैते शुभदा गुणाः ॥ ६ ॥
निद्रालस्यं मद्यपानं द्यूतं वारांगनारतिः । अतिक्रीडाऽतिमृगया सप्त दोषा नृपस्य च ॥ ७ ॥
पुत्रवत्पालनीयाश्च प्रजा नृपतिना भुवि । षष्ठांशः करमात्रश्च ग्राह्यः सर्वत्र हि ॥ ८ ॥
ज्ञेयं चारैः सदा वृत्तं पृथिव्याः पार्थिवेन वै । परराष्ट्रे सदा दूता नानावेशविरूपिताः ॥ ९ ॥
पंच पंचायवा द्वौ द्वौ प्रेषणीया नृपेण हि । न विश्वसेत्पारकीयजने दूते नृपोत्तमः ॥ १० ॥
दण्डो भेदस्तथा साम दानं कालोचितं चरेत् । स्वकार्यं साधयेद्युक्त्या काले प्राप्तं नृपोत्तमः ॥ ११ ॥
मनसा विदितं कार्यं कथनीयं न कस्यचित् । कृत्वा कार्यं दर्शनीयं जनान्मंत्रिजनानपि ॥ १२ ॥
मासे मासे स्वकोशस्य परामर्शो नृपोत्तमैः । गृहीणयः सर्वदेव विश्वसेत्सेवकेषु न ॥ १३ ॥
वर्षे वर्षे नगर्याश्च प्राकारस्य नृपोत्तमैः । परामर्श परामर्शः कार्यो मन्त्रिजनैः सह ॥ १४ ॥
चतुर्मासेषु शस्त्राणां मार्गाणां पार्थिवोत्तमः । परामर्शः सदा कोष्ठागारादीनां प्रकामयेत् ॥ १५ ॥
पक्षे पक्षे वारणानां तुरगाणां तथाऽष्टभिः । दिनैर्गवांमासमात्रेण वस्त्राणां पार्थिवोत्तमैः ॥ १६ ॥
परामर्शः सदा कार्यः पिकादीनां त्रिभिर्दिनैः । सीमान्तानां नराणां च षण्मासैश्च नृपोत्तमैः ॥ १७ ॥
परामर्शः सदा कार्यस्तथा जानपदस्य च । मासे मासे स्वसैन्यस्य वापीनाम्प्रयत्नेन हि ॥ १८ ॥


बुलाया । १ । उन्हें विस्तारपूर्वक राजनीतिका शिक्षा देते हुए कहने लगे—हे वत्स कुश तथा लवादिक भ्राताओ ! तुम लोग स्वस्थचित्त होकर सुनो मैं तुम्हें राजनीतीकी शिक्षा दे रहा हूँ। हे कुश ! मेरे वैकुण्ठ चले जानेपर तुम राजा होओगे। इसलिये तुम विशेष रीतिसे मेरी शिक्षाको सुन रखना। जिस राजाको चिरकाल तक इस संसारमें जीवित रहना हो, उसे चाहिये कि वह झूठ कभी न बोले। २-४ ॥ जो राजा कामी और क्रोधी नहीं होता, वही सुखसे रह सकता है। राजाको चाहिये कि वह दूसरेकी स्त्रीसे प्रेम न करे ॥ ५ ॥ सत्य, शौच (पवित्रता), दया, क्षमा, स्वभावम कोमलता, मीठी बातें, ब्राह्मण गौ सन्त तथा सज्जनोंपर श्रद्धा, ये सात गुण राजाके लिए परम कल्याणकारी हैं ॥ ६ ॥ निद्रा, आलस्य, मद्यपान, द्यूत (जुआ), वेश्याओम प्रेम, ज्यादा नाच कूद और अधिक शिकार खेलना, ये राजाके सात दोष हैं ॥ ७ ॥ राजाको चाहिए कि वह राज्यकी प्रजाको पुत्रके समान पालन करे और उसमे आपका षष्ठांश कर सर्वदा लेता जाय ॥ ८ ॥ राजाका यह कर्तव्य है कि वह गुप्तचरों द्वारा राज्य भरका समाचार मालूम करता रहे। दूसरे राजाके राज्यकी भी गति विधि इचनेके लिए वेष बदलकर पाँच पाँच या दो-दो दूत नियुक्त कर दे अपने दूतोंके सिवाय किसी और व्यक्तिपर विश्वास न करे ॥ ९, १० ॥ समय-समयपर जैसा उचित समझे, साम-दान आदि नीतियोंका प्रयोग करता रहे। समय पाकर युक्तिके साथ अपना कार्य साधन करे । ११ ॥ जो कार्य अपने मनमें सोचे, वह किसीसे न कहे। स्वयं चुपचाप करता रहे। नौकरोंके विश्वासपर राज काज न छोड़ दे। १२ ॥ महीने महीने अपने खजानेकी देखभाल स्वयं करे। नौकरोंके ही विश्वासपर न छोड़ दे ॥ १३ ॥ साल-सालभर बाद अपने मंत्रिगणके साथ नगरकी खाई आदिकी भी जांच करे ॥ १४ ॥ चार चार महीनेमे अपने शस्त्रों, मार्गों तथा कोठार आदिका निरीक्षण करता रहे ॥ १५ ॥ एक पक्षमें या आठवें रोज हाथी घोड़े आदि देखे । महीने-महीने कपड़ोंको देख-रेख करे ॥ १६ ॥ प्रति तीसरे दिन अपने यहाँ पाले हुए मृग-कोयल आदि चिड़ियोंको देखे और हर छठवें महीने अपनी सीमापर नियुक्त अधिकारियोंकी निगरानी करे । सर्वदा अपने राज्यमें रहनेवाले मनुष्योंपर ध्यान रक्खे। महीने महीने सेनाकी देखभाल करे और छठव महीने राज्यके कुएं-बावली आदि

४९२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १६


कार्यः पुष्पवाटिकानां मासे मासे नृपोत्तमैः। परामर्शः स्वयं गत्वाऽथ वा मन्त्रिजनोत्तमै ॥१९॥
वर्षे वर्षे समुद्योगः षण्मासैश्चाथवा त्रिभिः। मासैर्नृपेण स्वे राष्ट्रे कार्यः सैन्येन यत्नतः ॥२०॥
देवानां ब्राह्मणानां च गुरूणां यतिनां तथा। असंतोषो नैव कार्यः पार्थिवेन कदाऽपि हि ॥२१॥
द्रव्यादायं सदा पश्येत्स्वव्ययं तु निरीक्षयेत्। आदायस्य चतुर्थांशैर्व्ययः कार्यो नृपोत्तमैः ॥२२॥
तृतीयांशेन वा कार्यस्त्वर्धांशेन कदापि न। इष्टाः कार्या मन्त्रिणश्च नातिकोपं समाचरेत् ॥२३॥
नातिमान्या मन्त्रिणश्च वर्धनीयाः कदापि न। न विरोध्याः कदा राज्ञा सुरोगेलामन्त्रपंण च ॥२४॥
आकृषणां पद्धणानां दुर्गाणां गिरिवांसिनाम्। अरण्यवासिनां सिंधु उपद्वीपनिवासिनाम् ॥२५॥
सिंधुतीरस्थितानां च नानादेशनिवासिनाम्। वर्षान्तरस्थितानां च द्वीपांतरनिवासिनाम् ॥२६॥
द्वीपे द्वीपे पृथग्वर्षवासिनां पार्थिवोत्तमैः। परामर्शः सदा कार्यश्चारैः पक्षतरेण हि ॥२७॥
परराष्ट्रादशूद्रूपैः काषायांबरधारिभिः। अवधूतादिवेषैश्च तथा कार्पटिकोपमैः ॥२८॥
वणिग्रूपधरैर्दूतैर्वृत्तं ज्ञेयं नृपोत्तमैः। तत्र तत्राधिपाः सर्वेऽप्येकैके कार्यास्तु नूतनाः ॥२९॥
एक एव चिरं राज्ञा न स्थाप्यः सेवकः क्वचित्। परसैन्यानि ज्ञेयानि द्रष्टव्यं स्वबलं सदा ॥३०॥
परराष्ट्रागतो दूतः स्वीयराष्ट्र विलोकयेत्। पृष्टश्चैवं च दण्ड्यः स परदूतं न शिक्षयेत् ॥३१॥
परदूतो मोचनीयः सम्मानेन नृपोत्तमैः। स्वसीमवारक्षिणो दूताः शिक्षणीया मुहुर्मुहुः ॥३२॥
परदूतः कथं मुक्तः स्वीयराष्ट्रे पुरेऽथवा। अद्यारभ्य सूक्ष्मदृष्ट्या द्रष्टव्यं चेति पार्थिवैः ॥३३॥
अग्रेसरं पार्श्वगं च पश्चाद्भागस्य रक्षकम्। सेनापति मन्त्रिणं च स्वीयं प्रतिनिधिं तथा ॥३४॥
सूतं चामरहस्तं च दूतं निकटवर्त्तिनम्। दानमानैस्तोषयेच्च सदा राजा सुबुद्धिदा ॥३५॥
देशं कालं बलं कोशं नियोग्यं हं नृपोत्तमैः। आदौ बुद्ध्या निरूप्याथ नियोज्यापि परीक्षयेत् ॥३६॥


देंखे ॥ १७ ॥ १८ ॥ महीने-महीने बगीचोंमे स्वयं जाकर देखभाल करे या मन्त्रियोंको भेज दें ॥ १९ ॥ साल-साल भर बाद, छठे अथवा तीसरे महीने सैन्यके साथ-साथ राजा अपने राज्यमें दौरा करे। इस बातका सदा ध्यान रक्खे कि देवताओं, ब्राह्मणों, यतियों तथा गुरुजनोंमें किसी प्रकारका असंतोष न फैलने पाये ॥ २० ॥ २१ ॥ धनका आय-व्यय स्वयं देख और आयका चतुर्थांशमात्र व्यय करे। किसी विकट समस्याके आ जानेपर आयका तृतीयांश खर्च करे, किन्तु आयका आधा खर्च कभी भी न होने पावे। मन्त्रियोंको सदा प्रसन्न रक्खे न विशेष क्रोध करे और न विशेष विशेष प्रेम ही रक्खे। दुर्गकी रक्षा करनेवालोंके साथ कभी विरोध न करें ॥ २२-२४ ॥ खानोंके पास रहनेवाले, राजधानीसे दूर किसी नगरमें रहनेवाले, दुर्ग तथा पर्वतनिवासी, जंगलमें रहनेवाले, समुद्रके टापुओमें निवास करनेवाले समुद्र-तटपर रहनेवाले, विदेशोंमें रहनेवाले, द्वीपान्तरके निवासियों तथा किसी भी द्वारक रहनेवाले लोगोंकी प्रत्येक पक्षमें राजा देख भाल करता रहे ॥ २५-२७ ॥ गुप्तस्वरूपवाले, संन्यासीवेषधारी, अवधूत, वणिक् तथा नटांका वेष बनाकर दूसरेके राज्यमें घूमनेवाले गुप्तचरों से अन्य राष्ट्रका समाचार मालूम करता रहे। उन दूसरे-दूसरे देशामें प्रति वर्ष नये-नये अधिकारी बदलता जाय ॥ २८ ॥ २९ ॥ राजाका यह उचित है कि किसी प्रदेशका अधिकारी बनाकर किसी नौकरको ज्यादा दिनों तक उस प्रदेशमें न रहने दे। दूसरे राजाओंकी सेना तथा अपना सैन्यबल बराबर देखता रहे ॥ ३० ॥ यदि किसी दूसरे राष्ट्रका गुप्तचर अपने राष्ट्रमें दिखायी दे जाय तो उसे किसी प्रकारका दण्ड न दें। दूसरे राज्यके दूतको दण्ड न देना नीतिशास्त्रका नियम है। यदि दूसरे देशका दूत मिल जाय तो राजाको चाहिए कि उसे सम्मानपूर्वक छोड़ दे। अपने सीमाप्रांतमें रहने वाले निजी दूतोंको बराबर शिक्षा देना रहे। यदि दूसरे राष्ट्रका दूत मिल जाय तो राजाको चाहिए कि सूक्ष्मदृष्टिसे इस बातपर विचार करे कि उस देशके राजाने किस लिए मेरे राष्ट्रमें अपना दूत भेजा है ॥ ३१-३३॥ जो अपने आगे चलनेवाले हों या पीछे चलते हों, उनकी तथा सेनापति मन्त्री, अपने प्रतिनिधि, सारथी, चमर डुलानेवाले तथा पास रहनेवाले लोगोंको दान-मानसे प्रसन्न रक्खे ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ देश, काल,

सर्गः २५ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५१३


मित्रमित्रा नृपाः सर्वे तथा स्वसुहृदो नृपाः । सुहृदां सुहृदश्चापि मित्रमित्राग्रेरो नयेत् ॥३७॥
निजमित्रबलं दृष्ट्वा मित्रमित्रबलं तथा । बलं स्वसुहृदां चापि परसुहृन्मुहृदां बलम् ॥३८॥
आरो नृपैः परीक्ष्याथ निक्षिपैश्च निरीक्षयेत् । के स्वदीयाः पार्थिवा राष्ट्रे पारकाश्च नृपाश्च के ॥३९॥
सुहृदः स्वनृपाणां च बलं तेषां निरीक्षयेत् । दृष्ट्वा रिपवः स्वीया रिपूणां रिपवस्तथा ॥४०॥
शत्रुं रिपूणां रिपुभिः कार्या राजा हि मैत्रिकी । परस्य शत्रुः पाल्यो न चाप्यंशेन पराश्रयेत् ॥४१॥
बाल्यं शत्रुबलं दृष्ट्वा शत्रुमित्रबलं तथा । बाल्यं शत्रुसुहृत्सैन्यं दृष्ट्वा बाल्यं सुरक्षयेत् ॥४२॥
परराष्ट्रे चारनेत्रैर्नद्यो दुर्गाणि पर्वताः । गम्यानि दृष्ट्वामार्गांश्चारणानां जलाशयाः ॥४३॥
ज्ञात्वा स्वपुरे पूर्वसुयोगञ्च ततश्चरेत् । परराष्ट्रेऽपि बुद्ध्या हि गन्तव्यं पार्थिवैः सुखम् ॥४४॥
यत्राग्रे गमनं स्वीयं नैषां वाच्यं न तत्कदा । पूर्वे गन्तुं निदेशश्च पश्चिमेऽग्रेसरे बलम् ॥४५॥
उपचारमिदुकूलैः कार्यः सेनावासो नृपेण हि । अग्रेसरं बोलनं हि नृपैः क्वाप्य सादरम् ॥४६॥
क्रोशादद्धान्ते गतं दृष्ट्वा गच्छेदन्त्ये स्वयं नृपः । एव वन्नः कदा याम्ये पश्चिमे वा परादिशि ॥४७॥
परराष्ट्रे रोरणीयाश्चारैश्व तु वेदयेत् । स्वराष्ट्रे गमनं यस्यां दिशितस्यां नृपोत्तमैः ॥४८॥
रोरणीयां ध्वजः प्रोन्चैः सेनावामञ्चहाचरेत् । यन्त्राणामायुधानां च वाहनानां बलस्य च ॥४९॥
राज्ञा वृद्धिः सदा कार्या कार्यो धान्यादिसंग्रहः । राष्ट्रे दुर्गे पुरे तीर्थे पत्तने निर्जने वने ॥५०॥
जलाशयाः शुभा कार्याः कृत्वा कोशव्ययं बहु । प्राकारार्थञ्च दुर्गाणाञ्च व्ययो यो व्ययः कृतः ॥५१॥
न ज्ञेयः स व्ययो राज्ञा ज्ञेय रक्षणमात्मनः । धनाद्वयो व्ययो यतः सोऽग्रे ज्ञेयस्तु संग्रहः ॥५२॥
आपदर्थे धनं रक्षेद्दारान्संरक्षेद्वनैपि । आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि ॥५३॥
यद्मुद्रामितं द्रव्यं राज्ञा दारो निरीक्षयेत् । नावलोक्यं यथाकालं व्यये तच्छोतिमामितम् ॥५४॥


बल, वंश और अपना उत्साह देखकर अच्छी तरह विचारे और शत्रुके भी बल आदिका निरीक्षण-परीक्षण करे। फिर अपना बल, मित्रबल, मित्रके मित्रका बल और अपने सुहृदके पक्षद्रोंका बल देखकर राजाक चाहिये कि अपने शत्रु का अन्ताबाल देवे। उस इस बातपर विचार करे कि कौन राजे अपना साथ देनेवाले हैं और कौन शत्रुके ॥३६-४०॥ इसके बाद उसे चाहिए कि शत्रोके शत्रुसे मित्रता करे। दूसरेके शत्रु की बहुने भी रक्षा हात करे और यदि रक्षा करे भी तो खूब अच्छी तरह रक्षा-सम्हाल ॥४१॥ यदि शत्रु की सेना किसी प्रकार अपने वश में हो जाय तो उसकी रक्षा करे। शत्रुके मित्रकी सेना एवं शत्रुके सुहृदकी सेनाकी भी रक्षा करे ॥४२॥ दूसरेके राष्ट्रपर गुप्तचरोंको नियुक्त करके वहाँ के वनोंको, नदियों, वनों, दुर्गेके रास्तों, गुप्तचरोंके रास्तो तथा जलाशय वगैरह दृष्टि रखकर अच्छी तरह समझ ले। पहले अपने राज्यकी रक्षाका पूर्ण प्रबन्ध करके ही किसी दूसरेके राज्यपर चढ़ाई करे। ॥४३॥४४॥ जहाँ अपनेको जाना हो, वह अपनी बात कभी किसको न बतलाये। यदि पूर्वकी ओर यात्रा करनी हो तो उत्तरकी तरफ झण्डा भेजे और सेनाके ठहरनेका शिविर आदि भी उत्तरकी ओर ही बनवाये। सेना भी उत्तरकी ओर ही चले, किन्तु आधा कोस आगे जाकर पूर्वकी ओर मुडकर राजाको जहाँ जाना हो, वहाँ जाय। इसी तरह कभी अपनेको दक्षिणकी ओर तथा कभी पश्चिम दिशाकी ओर भेजे ॥४५-४७॥ किसी दूसरे राजाके राष्ट्रमें जानेकी गाड़ियोंपर गुप्तचरों द्वारा वहाँका हाल-चाल मालूम करे। अपने राज्यमें उसी ओर झण्डागाडे, जिस ओर अपनेको जाना हो ॥४८॥ शिविर आदि भी उसी तरफ बनवाये। राजाका चाहिये कि अपने यहाँ तोप-बन्दूक आदि यन्त्र तथा अन्य आयुध वाहन और सेनाका सदा बढाता हुआ धन-धान्य आदिका भी भली प्रकार संग्रह करता रहे। अपने राष्ट्र, किलोंमें, बाजारों, तीर्थों खास राजधानी तथा निर्जन वनोंमें प्रचुर धन खर्च करके बड़े-बड़े जलाशय बनवा दे। जो घर ग्राम-नगरकी खाई, किले, रक्षातत्व आदिमें खर्च हो, उसे खर्च न समझ । उसे तो अपने रक्षाका साधन माने। धर्मकार्यमें जो व्यय हो, उसे आगेके लिए संग्रह माने ॥४९-५२॥ आपत्तिके बचनेके लिए धनकी रक्षा करे, धनसे भी श्रेष्ठ समझकर स्त्रीकी रक्षा

४९४ ] आनन्दरामायणे [ सर्गः १६

न सेनारहितो राजा गच्छेन्नृपपुराद्वहिः । नैकाकी विचरेद्ग्रामे नैकाकी क्वापि संविशेत् ॥५५॥ नैकाकी क्वापि वै स्थेयं न पद्भ्यां विचरेद्बहिः । न गच्छेदपरगेहेषु बारं वारं नृपोत्तमः ॥५६॥ न विश्वसेद्द्वारपाल-जलद-रजक-धाय्य । धौतवस्त्राणि बुद्ध्या हि नृपः सम्यक् परीक्षयेत् ॥५७॥ ताम्बूलवीटिकां प्राप्तां तां दृष्ट्वा परीक्षितां परदत्तं जलं ग्राह्यं राज्ञाऽऽक्षिप्यां विलोक्य च ॥५८॥ फलानि परदत्तानि परीक्ष्येन्मतिमान्नृपः । दृष्ट्वाऽन्येनोर्ध्वतोऽन्यं न तेषां निकटे चरेत् ॥५९॥ सभां शङ्का प्रगन्तव्यं द्विवारं त्वेकदाऽथवा । नद्यशाम सभामध्ये स्वयं राजा न वै चिरम् ॥६०॥ स्वदेशा त्यागद्रोहाद्वहिः कार्यों नृपोत्तमैः । पादौ प्रसार्य न स्थेयं सभायां नृपसत्तमैः ॥६१ । न बाहुबन्धनं जान्वोः कृत्वा स्थेयं नृपोत्तमैः । नातिस्मितं कदा कार्यं सभायां पार्थिवोत्तमैः ॥६२॥ सभायां समलैर्वस्त्रैर्न गन्तव्यं कदा नृपैः । गणिका गणका वैद्या गायका बन्दिनो नटाः ॥६३॥ पण्डिता धर्मशास्त्रज्ञास्तार्किका वैदिका द्विजाः । सदा पाल्या नृपतिनै दानमानैरहर्निशम् ॥६४॥ न विश्वसेत्कर्णपिताय तोषयेत्तं धनार्दिभिः । प्रजानां गौरवं कार्ये दण्डयेन्न वृथा प्रजाः ॥६५॥ भवेद्युक्ता प्रजाः सर्वा नैव कार्याः कदाचन । राज्यद्वारस्थितैर्दूतेः सद्यः ते पार्थिवोत्तमम् ॥६६॥ मुक्तकर्णकबन्धश्च विमुक्तकञ्चिबन्धनः । सद्योद्दष्ट न्यस्तशस्त्राः प्रेषणीया नृपोत्तमम् ॥६७॥ राज्ञाज्ञया नृपं नन्त्वाऽऽपने चापविशेत्क्रमात् । नृपैर्माण्डलिकैः सर्वैः स्थातव्य पुरतोऽथवा ॥६८। सर्मत्य हस्तौ पादौ च राजन्वस्तशिलोचनैः । न हसेद्राजपुरतो न जृम्भेत क्षुवेन्मुहुः ॥६९। सदा न ग्रीवन कार्यं सर्वैर्भाण्डलिकैर्नृपैः । आगमे गमने सर्वैर्वन्दनीयो नृपो मुहुः ॥७०। नानुच्छैः श्यदेद्राजमाश्रित्ये पार्थिवेश्वरैः । कञ्चुकेन विना राजा सभायां नोपमविशेत् ॥७१॥

करे और स्त्री तथा धनपर भी बढ़कर आशा नहीं करनी चाहिए ॥५३॥ अपनी आयमेंसे एक तृतीयांश या तिहाई भाग ही लेकर छोड़ें । किन्तु समय पड़नेपर यदि करग्राहक सबको आवश्यकता पड़ जाय तो सर्वकर ले, रुपया मुंह न देख । अपने नगरके बाहर बिना सेनाके कभी न जाय । अपने ग्राममें भी अकेला न घूम-फिरे और न कही अकेला बैठे । ५४ । ५५ ॥ कहीं अकेला न ठहर न पैदल चले और बार बार किसोके घर न जाय । द्वारपाल, पानी देनेवाले सेवक और धात्री इनपर कभी भी विश्वास न कर कपड़ा धुलकर आये तो राजाको चाहिए कि अपनी बुद्धिसे खूब अच्छी तरह उसकी परीक्षा करके ही पहरे । पानका बीड़ा खानेको आये तो पहले उसे किस दूसरेको खिलाकर स्वयं दूसरा थोड़ा खाय । पाना पानीको अच्छे से अच्छा तरह उसकी परीक्षा करके अपने आगे डलवा कर पिये । ५६-५८ ॥ दूसरेके दिये फलोंकी भी भली भाँति परीक्षा कर ले । जो राज मिलने आयें, उनको दूरसे ही बातचीत करे । न स्वयं उनके पास जाय और न उन्हें अपने पास आने दे । प्रतिदिन एक या दो बार सभाम जाय और आधे पहरसे अधिक वहाँ न ठहरे । अपनेसे द्वेष करनेवालोंको नगरसे बाहर कर दे । सभामें कभी पैर फैलाकर न बैठे और न घुटनोंको सिकोड़कर ही बैठा करे । राजाको चाहिये कि सभामें कभी ज्यादा न हँसे ॥ ५९-६२ । सभाने कभी मैले कपड़े पहिनकर न जाय । गणिका, गणक ( ज्योतिषी ), वैद्य, गायक, बन्दीजन, नट, पंडित, धर्मशास्त्री, नैयिक, वैदिक तथा ब्राह्मण इनका दान मान औरोंसे सदा सम्मान करता रहे ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ नाईपर कभी भी विश्वास न करे । उसे हमेशा रुपये-पैसे देकर प्रसन्न रक्ख । सब लोगोंका सम्मान करता हुआ प्रजाको व्यर्थ दंड न दे ॥ ६५ ॥ इस बातका सदा ध्यान रक्खे कि प्रजाके लोगोंको किसी प्रकारका भय न होने पाये । राजद्वारपर रहनेवाले दूतोंका चाहिये कि जो राज मिलने आयें, उनके जनाने उतरवाकर परत्ले खुलवा दे । जो कुछ अन्य शस्त्र उनके पास हो, उन्हें अलग रखवा दे । फिर अच्छी तरह देख भालकर राजासे मिलनेको भीतर आने दे ॥ ६६ ॥ ६७ । जो कोई राजामें मिलने जाय वह राजाका प्रणाम करके संकेतित आसनपर बैठे । जो माण्डलिक राज हों, उनके लिये राजाके सामने कुसी डाला जाय । वे राजाके सामने हाथ पैर समेटकर राजाकी ओर निहारते हुए बैठे । राजाके सामने न हंसे, न जम्हाई लें और न बार-बार छींके ॥६८॥ न बार-बार

सर्गः १९ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४९५


मृगयायां वारणेन्द्रो नैव हन्यो नृपोत्तमैः । गर्भिणी मृगी शशा हन्तव्या विपिने कदा ॥७२॥
न निद्रितश्च हन्तव्यः पिबन्नीरे वनेचरः । तथा स्वशरणं प्राप्तो विश्वस्तो वा कदाचन ॥७३॥
क्रीडासक्तो वने प्राणी नैव हन्यो नृपोत्तमैः । मांसाशानन्ददृष्टिस्तु संस्थाप्य मृगयां चरेत् ॥७४॥
रात्रौ मित्रेण सहितस्तूर्णंमेव नृपोत्तमः । आत्मानं कम्बलेनैव समाच्छाद्य बहिर्भवेत् ॥७५॥
पुरद्वारस्थितानां च अर्गलादि निरीक्षयेत् । जनानां भाषितं सर्वं श्रोतव्यं हि शुभाशुभम् ॥७६॥
एवं स्वयं प्रगन्तव्यमथवा प्रेषयेज्जनम् । रात्रौ रात्रौ पुरे बुद्ध्या श्रोतव्य मकलेरितम् ॥७७॥
न कार्यः कलहो गेहे गृहकृत्यं सभास्थितैः । न वाच्यमणुमात्रं हि न तूष्णीं ष्ठीवनं चरेत् ॥७८॥
न कण्डूयेच्च शिरो राजा सभायां स्वकरेण वै । श्रुत्वा रिपुसमुत्कर्षं न त्यजेद्धैर्यमात्मनः ॥७९॥
पलायनं न संग्रामाद्राज्ञा कार्यं कदाचन । न द्विषतो निजा पृष्ठिर्दर्शनीया कदाचन ॥८०॥
मोद्गवेन सरेद्राजा नदीं मुग्ध्वा कदापि हि । सेतुं विना नदीं गङ्गां नोत्तीर्या हि कदाचन ॥८१॥
नोत्तीर्या नौकया गङ्गा नदी क्वापि सुतादिभिः । कार्या नैव जलक्रीडा नौकायां स्वसुतैः सह ॥८२॥
न स्थेयं हट्टमध्ये हि तथा नैव चतुष्पथे । न ताडयेन्निजां पत्नीं तथा पुत्रं न ताडयेत् ॥८३॥
स्वमुद्राङ्कितपत्रेण विना केषां पुराद्बहिः । न निर्गमः प्रकर्त्तव्यस्तथैवागमनं नृणाम् ॥८४॥
कर्तुमाज्ञापनीयं न मुद्रापत्राङ्कितं विना । नरण्ये नृन्टन चौरो पथि दार्थं नृपोत्तमैः ॥८५॥
न कार्यं मुण्डनं राज्ञा विना तीर्थं कदाचन । पर्वकाले गृहे नैव स्नातव्यं पार्थिवोत्तमैः ॥८६॥
न पादेन स्पृशेच्चापं न पादेन शरं स्पृशेत् । न निष्क्रीडेन्मक्षिकाभिर्द्विजैर्नादं न वै चरेत् ॥८७॥
न तिष्ठेद्द्वारदेशे वै न स्थास्तव्यं नृपेश्च्युति । राज्ञा मार्गे न वै स्थेयं न खेदं नृपतिर्भजेत् ॥८८॥
तोयानयनमार्गे हि स्त्रीणां स्थेयं नृपेण न । धान्यं समर्थं कर्तुं वै दण्डयेद्द्रव्यमायिन ॥८९॥


चुके। तब राजाके सामने जाय और लोट, तब बराबर रहकर प्रणाम कर । ६९॥ ७०॥ राजाके सामने जोर-जोरसे बात न करे। राजाको चाहिये कि बहु समय कवच धारण किये बिना न बैठे। जब शिकार खेलने जाय तो वहाँ हाथी तथा गर्भिणी मृगीका शिकार न करे ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ जो जीव पानी पी रहा हो, जो सोया हो और जो बाण करके शरण आया हो, ऐसे जीवोंका शिकार कभी न करे। शिकार खेलने जाय, तब ब्राह्मणों दिशाओंका कुछ लोगों का मिथुन करके शिकार खेले। रात्रिके समय अपने किसी मित्रके साथ कम्बल ओढ़कर सङ्कल्प बाहर निकले॥ ७३-७५ ॥ पुरद्वारके कटक में लगे हुए आला-दण्ड आदि देखे। रात्रिमं लोग जो अटपटा बात करें वह २१, उन्हें सावधान मनसे सुने। इस प्रकार प्रत्येक रात्रिको स्वयं जाय या अपन विश्व मपात्र मित्रका भेज दिया कर, जो हर रात्रिम लोगोंकी बातें सुनता रहे। घरमे लड़ाई झगड़ा न करे, सभाम कोई घरू काम-काज न करे। घर से सम्बन्ध रखनेवाली कोई बात भी न करे। सभामें चुपचाप बैठे और थूके नही नसभाम सिर न खजलावे। शत्रु का उत्कर्ष सुनकर धैर्य न छोड़े। राजाको चाहिए कि कभी संग्रामभूमिम भागे नहीं और शत्रूको कभी अपना पीठ न दिखलाये । ७६-८० ॥ राजाको चाहिए कि कभी अपने बाल-बच्चाके साथ नौकापर चढ़कर नदी न पार करे। अपने लड़कोंके साथ नौकापर बैठकर जलक्रीड़ा न करे ॥ ८१ ॥ ८२ ॥ बाजारम या किसी चौराहापर न बैठे। अपनी स्त्री और पुत्रको न धमकावे। राजाका हुआ मुद्रा पत्र देकर लोगोंको अपने नगरसे बाहर जाने दे। यही नियम नगरके भीतर आनेवालोंके लिए भी रक्खे। वनों तथा रास्ते में चोरी करनेवालोंको ऐसा मौका न मिलने पायें, जिससे वे चोरी कर सकें। ८३-८५ ॥ तीर्थके सिवाय किसी दूसरी जगह राजा मुण्डन न करावे। कोई पर्वकाल आ पहुंचे तो घरपर स्नान न कर, बल्कि किसी तीर्थको चला जाय। धनुष और बाणको पैरसे न छुए। चौपड़ पचीसी आदि न खेले। ब्राह्मणोंके साथ आधा वाद-विवाद न करे। अपने द्वारपर तथा खाली जमीनपर न बैठे। रास्तेम भी कभा न बैठे और किसी तरहका खेद न करे ॥ ८६-८८ ॥ जिस रास्तेसे स्त्रियाँ पानी भरने जाती-आती हों, वहाँ कभी न बैठे। अकीको सस्ते नाममै

४९६आनन्दरामायणे[ सर्गः १७

दृष्ट्वा किञ्चिन्महर्घं तु स्वीयराष्ट्रे हि भूपुता । न्यूनः कार्यः करभारः किंचिद्देशसुखाय च ॥९०॥
नातिशाठ्यं कदा कार्यमौदार्यं दर्शयेज्जनान् । द्रव्यं गृहीत्वा राजा हि मोचनीया न तस्कराः ॥९१॥
मुखं दृष्ट्वा न वै कार्यो राज्ञा न्यायः कदापि हि । न न्यायश्च परैः कार्यः स्वयमेव प्रकारयेत् ॥९२॥
अर्तानां सकलं वृत्तं श्रोतव्यं सादरं नृपैः । आर्त आकारणीयो हि निकटे कृपया नृपैः ॥९३॥
आत्मानं मानयेन्नैव वैद्यं च गणकं नटम् । पण्डितं वैदिकं वीरं गायकं कृतधर्मिणम् ॥९४॥
यज्ञो दानं जपो होमः सन्ध्या ध्यानं शिवार्चनम् । स्नानं पुराणश्रवणं भक्त्या कार्यं नृपोत्तमैः ॥९५॥
न मादकं वस्तु सेव्यं न कूटद्यूतादिकमाचरेत् । न यात्रा स्वपदा कार्या सप्तद्वीपाधिपेन हि ॥९६॥
फलाहारश्च कर्तव्यो राज्ञा ह्येकादशीदिने । निर्जलश्चोपवासश्च न कार्यः पृथिवीभृता ॥९७॥
येन यद्याचितं राज्ञे भूसुरेणार्पयेच्च तत् । तस्मै विप्राय राजा हि नृपा भूसुरदेवता ॥९८॥
उत्साहे बन्धनान्मोच्या ये ये क्रोधात्पुराद्विजाः । निजाज्ञाभंगतां दृष्ट्वा ज्ञेयं स्वीयं हृतं शिरः ॥९९॥
स्वीयदूतस्यापमानो यः स स्वीयश्चिन्तयेन्नृपः । स्वीयदूतस्य सम्मानो राज्ञा ज्ञेयः स आत्मनः ॥१००॥
एवं कुश मया प्रोक्ता राजनीतिः सविस्तरा । दिनचर्या मया यद्वत्क्रियते त्वं तथा कुरु ॥१०१॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे राज्यकांडे राजनीतिशिक्षणं
नाम षोडश सर्गः ॥ १६ ॥


सप्तदशः सर्गः

( कुशकी पुत्री हेमाका स्वयंवर )
श्रीरामदास उवाच
एकदा कुशकन्याया हेमायाश्च स्वयंवरम् । अयोध्यायां चकारार्थ रामश्चातिमहोत्सवैः ॥ १ ॥
समाहूता नृपाः सर्वे नानाद्वीपद्विपान्तरस्थिताः । समाजग्मुः सुवेषाश्च सभायां तच्छुशासने ॥ २ ॥

बिकानेके लिए बनियोंको दण्ड देता रहे। यदि अपने राष्ट्रमें महँगी बढ़ जाय तो राजाको चाहिये कि देशको सुखी रखनेके लिए करभार कुछ हल्का करदे ॥ ८६-९० ॥ कभी अतिशठता न करे और रुपये लेकर चोरोंको न छोड़े। राजाको यह उचित है कि मुँहदेखा न्याय न करे न्याय करनेका भार दूसरोंके ऊपर न डाल-कर स्वयं करे। यदि कोई दुःखी राजाके पास अपना दुःख सुनाने पहुँचे तो राजाको चाहिये कि दुखियोंके सारे दुःख आदरपूर्वक सुने । दुखिया मनुष्यसे किसी प्रकारकी घृणा न करके उसे अपने पास बुलावे और उसकी दुःखमयी कहानी सुने । किसी तरहका घमण्ड न करे वैद्य, ज्योतिषी, नट, पण्डित, वैदिक, वीर, गायक और धर्मात्मा इनका आदर करे। यज्ञ, दान, जप, होम, सन्ध्या, शिवार्चन, स्नान और पुराणश्रवण आदि शुभ कार्य भक्तिपूर्वक करता रहे ॥ ९१-६५ ॥ राजाको चाहिये कि प्रत्येक एकादशीको केवल फलाहार करके रहे और कभी भी निर्जल उपवासन करे । राजाके समीप पहुँचकर ब्राह्मण जो माँगे, सो दे। क्योंकि ब्राह्मण देवताके समान होता है। क्रोधवश जिन-जिन लोगोंको जेलमे डाल दिया गया हो, कोई उत्साहका समय आनेवर उन्हें छोड़ दे। यदि किसीके द्वारा आज्ञा भंग हो रहा हो तो अपना सिर कट गया समझे । अपने दूतका अपमान अपना अपमान और अपने दूतका सम्मान अपना सम्मान जाने। हे कुश इस प्रकार मैंने तुम्हें सारी राजनीति बतला दी। रह गयी दिनचर्याकी बात, सो मैं जैसा करता हूँ वैसे ही तुम भी करते चलो ॥ ९६-१०१ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयविरचित ज्योत्स्ना-भाषाटीकासमन्विते राज्यकांडे उत्तरार्द्धे षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥।

श्रीरामदास कहने लगे रामने एक समय कुशकी पुत्री हेमाका स्वयंवर बड़े धूमधामके साथ ठाना। इसमें द्वीप-द्वीपान्तरके अनेक राजे अच्छे-अच्छे वस्त्राभूषणसे सुसज्जित होकर आये और सुन्दर-सुन्दर

सर्गः १७ ] गद्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४९७

सर्गः १७ ] गद्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४९७

ययुर्देवाः सगन्धर्वा मुनयोऽपि समाययुः ॥ ३ ॥
यदा सभायामानीता हेमालङ्कारभूषिता । आरुह्य शिविकायां तु रुक्मवर्णा वरानना ॥ ४ ॥
नवरत्नमयीं मालां बिभ्रती सा स्वयम्बरा । ददर्श नृपनीम्बांश्चपुत्रामश्वविशारदान् ॥ ५ ॥
तद्भ्रचापविनिर्मुक्तेस्तत्कटाक्षपवत्रिभिः । सम्भग्नस्ते नृपाः सर्वे के वयं न विदुस्तदा ॥ ६ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्रान्वितपायसुतो महान् । चित्रांगदो सभायाश्च तां जहार कुशात्मजाम् ॥ ७ ॥
दृष्ट्वा कार्पान्तगन्धर्व्वान्नानादीग्वेंगसञ्चरः । मोहनास्त्रेण सकलान्वीरान् हन्त्वातिममोहितान् ॥ ८ ॥
रथे निवेश्य तां हेमां हेमाभां वेगवत्तरः । चित्रांगदो बहिर्गत्वा क्रोशमात्रे स्थितोऽभवत् ॥ ९ ॥
किं तृष्णीं चौरवन्नेया मयेयं कुशबालिका । इति निश्चित्य मेधावी तस्थौ चित्रांगदो महान् ॥१०॥
एतस्मिन्नन्तरे पुर्यां हाहाकारो महानभूत् । नीता हेमा योधवरैः पुत्रेणातिबलीयरसा ॥११॥
नृपाः सर्वे महोत्सृष्टुः सभायां खिन्नमानसाः । उपसंहृते तेन मोहनास्त्रेऽतिसम्भ्रमात् ॥ १२।
चित्रांगदेन योद्धुं ते स्वम्हैर्निन्यैर्युतैनृपाः । बहिः साकेतनगरात् क्रोधादारक्तलोचनाः १३।
तूष्णीमेत्रोप्रवाहुः स ददर्श पुत्रकौतुकम् । एतस्मिन्नन्तरे सर्वे तद्रथं पार्थिवोत्तमाः ॥१४।
सर्वेष्ट्य कोटिशः शस्त्रैर्ववर्षुश्चोग्रवाहूजम् । तदा चित्रांगदो वीरो वायव्यास्त्रेण पार्थिवान् ॥१५।
गमने भ्रामयामास वाहनाथैः समन्वितान् । ततो राजाज्ञया सह लक्षाद्या निर्ययुः पुरात् ॥१६।
उत्सवार्थं समायाताः स्वस्वराज्यान् बालकाः । अनुराध्या निजैः सैन्यैः सङ्गताः सङ्गरं ययुः ॥१७॥
तदा बभूव तुमुलं युद्धं सह्नोमहर्षणम् । चित्रांगदं वनंगुस्ते नानास्त्राणि राघवदाः ।१८।
चित्रांगदः स्ववर्णार्थमिश्च्छ। शस्त्राणि तानि हि । निजवाणैर्युपकेतुं चकार विरथं सपात् ॥१९॥
तथा चकार विरथं सुबाहुं पुष्करं तथा । तद्युक्तं चित्रकेतुं च सङ्गदं बलवत्तरः ॥२०॥

आसनेपर बैठे। यह बात राजाओं ही तक नह। थी, बल्कि देवता, गन्धर्व, ऋषि-मुनि, विद्याधर, नाग, किन्नर भी आ-आकर उस उत्सवमें सम्मिलित हुए थे। इन सबके आ जानेपर एक सुवर्णकी पालकीमें बैठो सुमुखी सुन्दरी हेमा हाथमें नवरत्नोंसे बना माला लिय आ पहुंची। सभाके प्राङ्गणम पहुंचकर उसने वहाँपर बैठे हुए समस्त राजाओं तथा राजपुत्रोंको भार प्रकारसे देखा ॥ १-५ ॥ हेमाकन भौंहरूपी धनुषस छूटे हुए कटाक्ष-रूपी बाणोसे घायल होकर सबके सब राज अपन अपक भूल गये। उनको यह भी ज्ञान न रहा कि हम कौन हैं। उसी समय अरिनन्दनके राजा अग्रबाहुका पुत्र चित्राङ्गद कुशकी पुत्रीका हरण करके ले भागा। उसने देखा कि गन्धर्वादि सर्व वृतान्त वर्ताव व्याप्त है। उस उसन एक महनास्त्र छोड़ा। जिससे वहाँ निम्नस्थानमें आये हुए राजे मोहित हो गये। तब वह सुवर्णके समान तेजस्विनी हेमाको रथपर बिठाकर भग ले गया और वहाँसे एक कोसकी दूरीपर जाकर रुका । उसने अपने मनमें सोचा कि चोरोंकी तरह हेमाको लेकर भग जाना ठीक नहीं है। इसलिए वहीं वह ठहर गया ॥६-१०॥ उधर सारी पुरीम यह हाहाकार मच गया कि राजा उग्रबाहुका पुत्र चित्रांगद हेमाका हरण कर के गया ॥ ११ ॥ चित्रांगदक द्वारा मोहनास्त्रका संवरण हो जानेपर सब राजे होशमे आकर उठे और अपनी-अपनी सेना लेकर क्रोधमें लाल-लाल आंखें किये अयोध्यासे बाहर निकले । १२ ॥ १३ ॥ वहींपर हीं बैठा हुआ राजा उग्रबाहु अपने पुत्रका कौतुक देख रहा था। उसी समय सब राज चित्रांगदके पास पहुंचे और उसका रथ बाणों औरमे घेरकर शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे। तब चित्रांगदने वायव्य अस्त्र चलाया। जिससे सब राजे अपनी सेना तथा वाहनके साथ आकाशमण्डलमें उड़न लगे। इसके अनन्तर रामकी आज्ञासे सब आदि सतो भट शहरसे निकल पड़े। उनके अतिरिक्त उत्सव-में आये हुए राजकुमार भी अपनी-अपनी सेना लेकर लड़नेको चल दिये। उस समय चित्रांगदके साथ रोंगटे खड़े कर देनेवाला तुमुल युद्ध होने लगा। रघुवंशके वे बालक चित्रांगदपर विविध प्रकारके अस्त्र-शस्त्र चलाने लगे ॥ १४- १७। अपने बाणोंसे प्रहार बचाते हुए चित्रांगदने अपने बाणोंके द्वाराझटवें यूपकेतुका रथ ध्वस्त कर डाला। उस वीर बालकने थोड़ी ही देरमें सुबाहु, पुष्कर, तक्ष, चित्रकेतु तथा आंगदको भी विरथ कर

४९८आनन्दरामायणे[ सर्गः १७

तद्दृष्ट्वा कौतुकं तस्य ज्ञात्वा तपसः फलम्। लवश्चिच्छेद बाणैर्हस्तस्थं दिव्यमुत्तमम् ॥२१॥ ततो लवः स्वबाणौघैरुग्रबाहुसुतं मुदा। चकार व्याकुलं शीघ्रं तद्दृष्ट्वा लवचेष्टितम् ॥२२॥ उग्रबाहुर्ययौ योद्धुं लवेन वेगतस्त्वरः। लवस्तमपि बाणौघैश्चकार विरथं क्षणात् ॥२३। उग्रबाहुस्तदा वीरोऽन्ये रथे चारुरोह सः। ववर्ष निशितैर्बाणैर्मूर्च्छयामास तं लवम् ॥२४॥ लवं विमूर्च्छितं दृष्ट्वा हाहाकारो महानभूत्। तदा ययौ कुशो योद्धुमुग्रबाहुनृपेण वै ॥२५। कुशमागतमाज्ञाय बद्धाद्यास्तदा पुनः। रथस्था युयुधुस्तेन उग्रबाहुनृपेण वै ॥२६॥ पुनस्तानङ्गदादींश्च चकार विरथान्नृपः। तदा कुशः स्वबाणौघैरुग्रबाहुं नृपं क्षणात् ॥२७। चकार विरथं वीरांश्चिच्छेद तस्य कार्मुकम्। उग्रबाहुस्तदा व्यग्रो बभूव चकितस्तदा ॥२८॥ तं धृत्वा स कुशस्तोषाह्वादयामास दुन्दुभीम्। अथोग्रबाहु मसुनं निन्ये श्रीरामसन्निधौ ॥२९॥ रामस्तं मोचयामास मत्वा तं सुहृदं वरम्। तदा रामो विजायिने कङ्कणं मुनिनाऽर्पितम्। ३०। ददौ कुशाय प्रीत्या स पुनः कुम्भजन्मनः। कुशस्तदाऽतिशुशुभे वरकङ्कणमण्डितः ॥३१॥ तदा कुशो मुनिं प्राह नत्वा तं कुम्भसम्भवम्। त्वया लब्धं कुतश्चेदं कङ्कणं वद मां मुने ॥३२। तत्तस्य वचनं श्रुत्वाऽगस्तिः प्राह कुशं मुदा। पुरेन्द्ररिपवो वत्स बहवः सागरेण हि। ३३॥ कृताः स्वौर्वनिवामाश्च तदाऽहं नाकपार्थिनः। कृत्वा सन्तुलनंऽब्धिं तं पीतवाँल्लीलयैव हि । ३४॥ ततो मुमो द्वीपयोर्हि मर्यादां मध्यवर्तिनीम्। दृष्ट्वा पुनर्नार्कपेन प्रार्थितो ह्यवधृणा ॥३५॥ मूत्रवन्तामरं भीमं सजीवं मुक्तवानदम्। तदाऽब्धिनाऽर्पितं मह्यं कुश यत्कङ्कणं वरम् ॥३६॥ नानारत्नविचित्रं च सूर्यतेजोवगर्जितम्। तद्रामस्यार्पितं पूर्वं मया तेन त्वयार्पितम् ॥३७॥

दिया। इस कौतुकको देखकर लवने समझ लिया कि यह सब चमत्कार उसकी तपस्याका है। यह विचार- कर लवने अपने बाणवर्षास चित्रांगदके उस उत्तम धनुषको काट डाला और इतनी शीघ्रतासे बाणवर्षा की कि चित्रांगद व्याकुल हो गया ॥ १६-२२। ऐसी अवस्थाम उपबाहु चित्रांगदका पिता, स्वयं लवके साथ युद्ध करनेके लिय रणमे उतर पड़ा, किन्तु लवने थोड़ी ही देरमें उसका भी रथ ध्वस्त कर दिया तब उप्रबाहु तुरन्त एक दूसरे रथपर बैठकर युद्ध करने लगा और अपने तीक्ष्ण बाणोंका मारस लवको मूर्च्छित कर दिया। उसे मूर्च्छित देखकर संग्रामभूमिमें हाहाकार मच गया। तभी उधर कुश युद्ध करनेके लिए रामका दूसरा पुत्र कुश भी आ पहुंचा। कुशको आया देखकर वे अङ्गद आदि रघुवंशी राजकुमार रथोंपर बैठ बैठकर उत्साहपूर्वक उग्रबाहुस युद्ध करने लग। किन्तु उपबाहुने अपने युद्धकौशलस था। ड़ी दरमें अङ्गद आदि सभी राजकुमारोकि रथोंको नष्ट कर डाला। उधर अपने भ्राताओंपर प्रहार करते देखकर कुशने उपबाहुको क्षणभरमे विरथ कर दिया और उसका धनुष काट डाला। उग्रबाहु इस समय आश्चर्यके साथ व्यग्र हो उठा ॥ २३-२७ ॥ तब कुशने झटपट उन बाण-बेगको बन्दी बना लिया और अपनी विजयदुन्दुभी बजवा दी। चित्रांगद तथा उग्रबाहुको अपने साथ लेकर कुश रामचन्द्रजीके सामने गये। वहाँ पहुँचनेपर उग्रबाहुको अपना मित्र समझ- कर रामने छुड़ा दिया और विजयी कुशको अगस्त्य ऋषिके समक्ष अगस्त्यका ही दिया हुआ कङ्कण दिया। उस कङ्कणके पहिननेसे कुशकी शोभा ओर भी बढ़ गयी २८-३१ ।। इसके बाद कुशने अगस्त्यऋषिसे कहा- हे मुने आपने यह कङ्कण कहाँ पाया था ? यह हमसे कहिए । ३२ । कुशकी बात सुनकर अगस्त्यने कहा- हे वत्स ! आजके बहुत समय पहले इन्द्रके बहुतरे शत्रु समुद्रके भितर घर बनाकर रहा करते थे। इन्द्रके प्रार्थना करनेपर मैंने समुद्रको चुल्लुक भरकर पी लिया। जब इन्द्रने अपने सारे शत्रुओंको मार डाला, तब दो द्वीपोंके मध्यकी सीमाको नष्ट देखकर इन्द्रने मुझसे समुद्रको फिर पूर्ववत् बना देनेकी प्रार्थना की ॥३३-३५॥ तब मैंने मूत्रके मार्गसे फिर समुद्रको सजीव करके बहा दिया। उसी समय समुद्रने मुझे उपहारके रूपमें यह कङ्कण दिया था ॥ ३६ ॥ अनेक प्रकारके रत्नोंसे जटित तथा सूर्यके तेजकी नाई तेजोमय यह कङ्कण मैंने रामको दे