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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished486 pages

सूत्र १०] अध्याय १ ८३

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सूत्र १०] अध्याय १ ८३ इन सब धर्मोंकी संगति परब्रह्म परमात्मामें ही लग सकती है; अतः वही इस प्रकरणमें 'भूमा' के नामसे कहा गया है। सम्बन्ध—पूर्व प्रकरणमें भूमाके जो धर्म बताये गये हैं, वे ही बृहदारण्यकोपनिषद् (३।८।७)-में 'अक्षर' के भी धर्म कहे गये हैं। अक्षर शब्द प्रणवरूप वर्णका भी वाचक है; अतः यहाँ 'अक्षर' शब्द किसका वाचक है? इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— अक्षरमम्बरान्तधृतेः ॥ १। ३। १०॥ अक्षरम् = (उक्त प्रकरणमें) अक्षर शब्द परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है; अम्बरान्तधृतेः = क्योंकि उसको आकाशपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाला बताया गया है। व्याख्या—यह प्रकरण इस प्रकार है—'सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद् भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिन् तदोतं च प्रोतं चेति॥' (३।८।६) गार्गीने याज्ञवल्क्यसे पूछा—'याज्ञवल्क्य! जो द्युलोकसे भी ऊपर, पृथिवीसे भी नीचे और इन दोनोंके बीचमें भी हैं तथा जो यह पृथिवी और द्युलोक हैं, ये सब-के-सब एवं जिसको भूत, भविष्यत् और वर्तमान कहते हैं, वह काल किसमें ओत-प्रोत है?' इसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने कहा— 'गार्गि ! यह सब आकाशमें ओत-प्रोत है।' इसपर गार्गीने पूछा—'वह आकाश किसमें ओत-प्रोत है?' (३।८।७) तब याज्ञवल्क्यने कहा— 'एतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहित- मस्नेहम्······ इत्यादि।' 'हे गार्गि ! उस तत्त्वको तो ब्रह्मवेत्तालोग 'अक्षर' कहते हैं। जो कि न स्थूल है, न सूक्ष्म है, न छोटा है, न बड़ा है, न लाल है, न पीला है, इत्यादि।' (३।८।८) इस प्रकार वह अक्षर आकाशपर्यन्त सबको धारण करनेवाला बताया गया है, इसलिये यहाँ 'अक्षर' नामसे उस परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है, अन्य किसीका नहीं।

८४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

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८४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध - कारण अपने कार्यको धारण करता है, यह सभी मानते हैं। जिनके मतमें प्रकृति ही जगत्का कारण है, वे उसे ही आकाशपर्यन्त सभी भूतोंको धारण करनेवाली मान सकते हैं। अतः उनके मतानुसार यहाँ 'अक्षर' शब्द प्रकृतिका ही वाचक हो सकता है। इस शंकाका निवारण करनेके लिये कहते हैं- सा च प्रशासनात् ॥ १ । ३ । ११ ॥ च=और; सा=वह आकाशपर्यन्त सब भूतोंको धारण करनारूप क्रिया (परमेश्वरकी ही है); प्रशासनात् =क्योंकि उस अक्षरको सबपर भलीभाँति शासन करनेवाला कहा है। व्याख्या- इस प्रकरणमें आगे चलकर कहा है कि 'एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठत - इत्यादि' अर्थात् 'इसी अक्षरके प्रशासनमें सूर्य और चन्द्रमा धारण किये हुए स्थित हैं, एवं द्युलोक, पृथिवी, निमेष, मुहूर्त, दिन-रात आदि नामोंसे कहा जानेवाला काल - ये सब विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित हैं। इसीके प्रशासनमें पूर्व और पश्चिमकी ओर बहनेवाली सब नदियाँ अपने-अपने निर्गम-स्थान पर्वतोंसे निकलकर बहती हैं।' इत्यादि। (बृह० उ० ३।८।९) इस प्रकार उस अक्षरको सबपर भलीभाँति शासन करते हुए आकाशपर्यन्त सबको धारण करनेवाला बताया गया है। यह कार्य जडप्रकृतिका नहीं हो सकता। अतः वह सबको धारण करनेवाला अक्षरतत्त्व ब्रह्म ही है, अन्य कोई नहीं। सम्बन्ध - इसके सिवा- अन्यभावव्यावृत्तेश्च ॥ १ । ३ । १२ ॥ अन्यभावव्यावृत्तेः = यहाँ अक्षरमें अन्य (प्रधान आदि)-के लक्षणोंका निराकरण किया गया है इसलिये; च = भी ('अक्षर' शब्द ब्रह्मका ही वाचक है)।

सूत्र १३ ] अध्याय १ ८५

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सूत्र १३ ] अध्याय १ ८५ व्याख्या - उक्त प्रसंगमें आगे चलकर कहा गया है— 'वह अक्षर देखनेमें न आनेवाला किंतु स्वयं सबको देखनेवाला है; सुननेमें न आनेवाला, किंतु स्वयं सुननेवाला है; मनन करनेमें न आनेवाला किंतु स्वयं मनन करनेवाला है; जाननेमें न आनेवाला, किंतु स्वयं सबको भलीभाँति जाननेवाला है' इत्यादि। (बृह० उ० ३।८।११) इस प्रकार यहाँ उस अक्षरमें देखने, सुनने और जाननेमें आनेवाले प्रधान आदिके धर्मोंका निराकरण किया गया है,* इसलिये भी 'अक्षर' शब्द विनाशशील जड प्रकृतिका वाचक नहीं हो सकता। अतः यही सिद्ध होता है कि यहाँ 'अक्षर' नामसे परब्रह्मका ही प्रतिपादन किया गया है। सम्बन्ध - उपर्युक्त प्रकरणमें 'अक्षर' शब्दको परब्रह्मका वाचक सिद्ध किया गया; किंतु प्रश्नोपनिषद् (५। २-७)-में ॐकार अक्षरको परब्रह्म और अपरब्रह्म दोनोंका प्रतीक बताया गया है अतः वहाँ अक्षरको अपरब्रह्म भी माना जा सकता है, इस शंकाकी निवृत्तिके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् सः ॥ १ । ३ । १३ ॥ ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् = यहाँ परमपुरुषको 'ईक्षते' क्रियाका कर्म बताये जानेके कारण; सः = वह परब्रह्म परमेश्वर ही (त्रिमात्रासम्पन्न 'ओम्' इस अक्षरके द्वारा चिन्तन करनेयोग्य बताया गया है)। व्याख्या - इस सूत्रमें जिस मन्त्रपर विचार चल रहा है, वह इस प्रकार है— 'यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः। यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात् परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते।' (प्र० उ० ५। ५) अर्थात् 'जो तीन मात्राओंवाले 'ओम्' रूप इस अक्षरके द्वारा ही इस परम पुरुषका निरन्तर

  • उपर्युक्त श्रुतिमें अक्षरको सर्वद्रष्टा बताकर उसमें प्रकृतिके जडत्व और जीवात्माके अल्पज्ञत्व आदि धर्मोंका भी निराकरण किया गया है।

८६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

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८६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ ध्यान करता है, वह तेजोमय सूर्यलोकमें जाता है तथा जिस प्रकार सर्प केंचुलीसे अलग हो जाता है, ठीक उसी तरह वह पापोंसे सर्वथा मुक्त हो जाता है। इसके बाद वह सामवेदकी श्रुतियोंद्वारा ऊपर ब्रह्मलोकमें ले जाया जाता है। वह इस जीव-समुदायरूप परतत्त्वसे अत्यन्त श्रेष्ठ अन्तर्यामी परम पुरुष पुरुषोत्तमको साक्षात् कर लेता है।' इस मन्त्रमें जिसको तीनों मात्राओंसे सम्पन्न ॐकारके द्वारा ध्येय बतलाया गया है, वह पूर्ण ब्रह्म परमात्मा ही है, अपरब्रह्म नहीं; क्योंकि उस ध्येयको, जीव- समुदायके नामसे वर्णित हिरण्यगर्भरूप अपरब्रह्मसे अत्यन्त श्रेष्ठ बताकर ‘ईक्षते’ क्रियाका कर्म बतलाया गया है। सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकरणमें मनुष्यशरीररूप पुरमें शयन करनेवाले पुरुषको परब्रह्म परमात्मा सिद्ध किया गया है। किंतु छान्दोग्योपनिषद् (८। १।१)-में ब्रह्मपुरान्तर्गत दहर (सूक्ष्म) आकाशका वर्णन करके उसमें स्थित वस्तुको जाननेके लिये कहा है। वह एकदेशीय वर्णन होनेके कारण जीवपरक हो सकता है। इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उक्त प्रकरणमें ‘दहर’ नामसे कहा हुआ तत्त्व क्या है? इसपर कहते हैं— दहर उत्तरेभ्यः ॥ १। ३। १४॥ दहरः = उक्त प्रकरणमें ‘दहर’ शब्दसे जिस ज्ञेय तत्त्वका वर्णन किया गया है, वह ब्रह्म ही है; उत्तरेभ्यः = क्योंकि उसके पश्चात् आये हुए वचनोंसे यही सिद्ध होता है। व्याख्या—छान्दोग्य० (८।१।१)-में कहा है कि 'अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्म, पुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन् यदन्तस्त- दन्वेष्टव्यं तद् वाव विजिज्ञासितव्यम्।' अर्थात् 'इस ब्रह्मके नगररूप मनुष्य- शरीरमें कमलके आकारवाला एक घर (हृदय) है, उसमें सूक्ष्म आकाश है। उसके भीतर जो वस्तु है, उसको जाननेकी इच्छा करनी चाहिये।' इस वर्णनमें जिसे ज्ञातव्य बताया गया है, वह ‘दहर’ शब्दका लक्ष्य परब्रह्म परमेश्वर ही है; क्योंकि आगेके वर्णनमें इसीके भीतर समस्त ब्रह्माण्डको निहित बताया है

सूत्र १५ ] अध्याय १ ८७

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सूत्र १५ ] अध्याय १ ८७ तथा उसके विषयमें यह भी कहा है कि 'यह आत्मा सब पापोंसे रहित, जरामरणवर्जित, शोकशन्य, भूख-प्याससे रहित, सत्यकाम तथा सत्यसंकल्प है' इत्यादि (८।१।५)। तदनन्तर आगे चलकर (छा० उ० ८।३।४ में) कहा है कि यही आत्मा, अमृत, अभय और ब्रह्म है। इसीका नाम सत्य है।' इससे सिद्ध होता है कि यहाँ 'दहर' शब्द परब्रह्मका ही बोधक है। सम्बन्ध - प्रकारान्तरसे इसी बातको सिद्ध करते हैं- गतिशब्दाभ्यां तथा दृष्टं लिंगं च ॥ १ । ३ । १५ ॥ गतिशब्दाभ्याम् = ब्रह्ममें गतिका वर्णन और ब्रह्मवाचक शब्द होनेसे; तथा दृष्टम्=एवं दूसरी श्रुतियोंमें ऐसा ही वर्णन देखा गया है; च=और; लिंगम्=इस वर्णनमें आये हुए लक्षण भी ब्रह्मके हैं; इसलिये यहाँ 'दहर' नामसे ब्रह्मका ही वर्णन है। व्याख्या-इस प्रसंगमें यह बात कही गयी है कि- 'इमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः ॥' (छा० उ० ८।३।२) अर्थात् 'ये जीव-समुदाय प्रतिदिन सुषुप्तिकालमें इस ब्रह्मलोकको जाते हैं परंतु असत्यसे आवृत रहनेके कारण उसे जानते नहीं हैं।' इस वाक्यमें प्रतिदिन ब्रह्मलोकमें जानेके लिये कहना तो गतिका वर्णन है और उस 'दहर' को ब्रह्मलोक कहना उसका वाचक शब्द है। इन दोनों कारणोंसे यह सिद्ध होता है कि यहाँ 'दहर' शब्द ब्रह्मका ही बोधक है। इसके सिवा दूसरी जगह (६।८।१ में) भी ऐसा ही वर्णन पाया जाता है—यथा- 'सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति।' अर्थात् 'हे सौम्य ! उस सुषुप्त-अवस्था में जीव 'सत्' नामसे कहे जानेवाले परब्रह्म परमात्मासे संयुक्त होता है' इत्यादि । तथा आगे बताये गये, अमृत, अभय आदि लक्षण भी ब्रह्ममें ही सुसंगत होते हैं। इन दोनों कारणोंसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ 'दहर' नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है। सम्बन्ध - उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये दूसरा कारण बताते हैं—

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८८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ धृतेश्च महिम्नोऽस्यास्मिन्नुपलब्धेः ॥ १। ३। १६ ॥ धृतेः = इस 'दहर'में समस्त लोकोंको धारण करनेकी शक्ति बतायी जानेके कारण; च = भी; (यह परब्रह्मका ही वाचक है क्योंकि) अस्य = इसकी; महिम्नः = (समस्त लोकोंको धारण करनेकी सामर्थ्यरूप) महिमाका; अस्मिन् = इस परब्रह्म परमात्मामें होना; उपलब्धेः = अन्य श्रुतियोंमें भी पाया जाता है, इसलिये ('दहर' नामसे ब्रह्मका वर्णन मानना सर्वथा उचित है)। व्याख्या—छान्दोग्य० (८। ४। १)-में कहा गया है कि 'अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिरेषां लोकानाम्।' अर्थात् 'यह जो आत्मा है, वही इन सब लोकोंको धारण करनेवाला सेतु है।' इस प्रकार यहाँ उस 'दहर' शब्दवाच्य आत्मामें समस्त लोकोंको धारण करनेकी शक्तिका वर्णन होनेके कारण 'दहर' यहाँ परमात्माका ही वाचक है; क्योंकि दूसरी श्रुतियोंमें भी परमेश्वरमें ऐसी महिमा होनेका वर्णन इस प्रकार उपलब्ध होता है—'एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः' (बृह० उ० ३। ८। ९) अर्थात् 'हे गार्गि! इस अक्षर परमात्माके ही शासनमें रहकर सूर्य और चन्द्रमा भलीभाँति धारण किये हुए स्थित हैं' इत्यादि। इसके सिवा यह भी कहा है कि 'एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसम्भेदाय।' (बृ० उ० ४। ४। २२) अर्थात् 'यह सबका ईश्वर है, यह सम्पूर्ण प्राणियोंका स्वामी है। यह सब भूतोंका पालन-पोषण करनेवाला है तथा यह इन समस्त लोकोंको विनाशसे बचानेके लिये उनको धारण करनेवाला सेतु है।' परब्रह्मके अतिरिक्त अन्य कोई भी इन सम्पूर्ण लोकोंको धारण करनेमें समर्थ नहीं हो सकता; इसलिये यहाँ 'दहर' नामसे परब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है। सम्बन्ध—अब दूसरा हेतु देकर उसी बातकी पुष्टि करते हैं— प्रसिद्धेश्च ॥ १। ३। १७ ॥ प्रसिद्धेः = आकाश शब्द परमात्माके अर्थमें प्रसिद्ध है, इस कारण; च = भी ('दहर' नाम परब्रह्मका ही है)।

सूत्र १८ ] अध्याय १ ८९

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सूत्र १८ ] अध्याय १ ८९ व्याख्या—श्रुतिमें 'दहराकाश' नाम आया है। आकाश शब्द परमात्माके अर्थमें प्रसिद्ध है। यथा—'को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्।' (तै० उ० २।७।१) अर्थात् 'यदि यह आनन्दस्वरूप आकाश (सबको अवकाश देनेवाला परमात्मा) न होता तो कौन जीवित रह सकता ? कौन प्राणोंकी क्रिया कर सकता?' तथा—'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते।' (छा० उ० १। ९। १) अर्थात् 'निश्चय ही ये सब प्राणी आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं।' इसलिये भी 'दहर' शब्द परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है। सम्बन्ध—अब 'दहर' शब्दसे जीवात्माका ग्रहण क्यों न किया जाय— यह शंका उठाकर समाधान करते हैं— इतरपरामर्शात् स इति चेन्नासम्भवात्॥ १। ३। १८॥ चेत्=यदि कहो; इतरपरामर्शात्=दूसरे अर्थात् जीवात्माका संकेत होनेके कारण; सः=वही 'दहर' नामसे कहा गया है; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; असम्भवात्=क्योंकि वहाँ कहे हुए लक्षण जीवात्मामें सम्भव नहीं हैं। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद् (८। १। ५)-में इस प्रकार वर्णन आया है—'स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत्सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन् कामाः समाहिता एष आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पो यथा ह्येवेह प्रजा अन्वाविशन्ति यथानुशासनं यं यमन्तमभिकामा भवन्ति यं जनपदं यं क्षेत्रभागं तं तमेवोपजीवन्ति॥' अर्थात् '(शिष्योंके पूछनेपर) आचार्यने इस प्रकार कहा कि 'इस (देह)- की जरावस्थासे यह जीर्ण नहीं होता, इसके वधसे इसका नाश नहीं होता। यह ब्रह्मपुर सत्य है। इसमें सम्पूर्ण काम-विषय सम्यक् प्रकारसे स्थित है। यह आत्मा पुण्य-पापसे रहित, जरा-मृत्युसे शून्य, शोकहीन, भूख-प्याससे रहित, सत्यकाम तथा सत्यसंकल्प है। जैसे इस लोकमें प्रजा यदि राजाकी आज्ञाका अनुसरण करती है तो वह जिस-जिस वस्तुकी कामना तथा जिस-जिस जनपद

९० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

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९० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ एवं क्षेत्रभागकी अभिलाषा करती है, उसी-उसीको पाकर सुखपूर्वक जीवन धारण करती है।' इस मन्त्रके अनुसार 'देहकी जरावस्थासे यह जीर्ण नहीं होता और इसके वधसे इसका नाश नहीं होता'—इस कथनसे जीवात्माको लक्ष्य करानेवाला संकेत मिलता है; क्योंकि इसके आगेवाले मन्त्रमें कर्मफलकी अनित्यता बतायी गयी है और कर्मफल-भोगका सम्बन्ध जीवात्मासे ही है। इस प्रकार जीवात्माको लक्ष्य करानेवाला संकेत होनेके कारण वहाँ 'दहर' नामसे 'जीवात्मा' का ही प्रतिपादन है, ऐसा कहा जाय तो यह ठीक नहीं है; क्योंकि पूर्वोक्त मन्त्रमें ही जो 'सत्यसंकल्प' आदि लक्षण बताये गये हैं, उनका जीवात्मामें होना सम्भव नहीं है। इसलिये यहाँ 'दहर' शब्दसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन हुआ है, ऐसा मानना सर्वथा उचित है। सम्बन्ध—पूर्वोक्त मतकी ही पुष्टिके लिये पुनः शंका उठाकर उसका समाधान करते हैं— उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु ॥ १ । ३ । १९ ॥ चेत्=यदि कहो; उत्तरात्=उसके बादवाले वर्णनसे भी 'दहर' शब्द जीवात्माका ही बोधक सिद्ध होता है; तु=तो यह कथन ठीक नहीं है, (क्योंकि) आविर्भूतस्वरूपः=उस मन्त्रमें जिसका वर्णन है, वह अपने शुद्धस्वरूपको प्राप्त हुआ आत्मा है। व्याख्या—''छान्दोग्योपनिषद् (८।३।४)-में कहा है कि 'अथ य एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मणो नाम सत्यम् ॥' अर्थात् 'यह जो सम्प्रसाद है, वह इस शरीरसे निकलकर परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने शुद्धस्वरूपसे सम्पन्न हो जाता है। यह आत्मा है, यह अमृत एवं अभय है और यही ब्रह्म है—ऐसा आचार्यने कहा। उस इस ब्रह्मका नाम सत्य है।' इस मन्त्रमें 'सम्प्रसाद' के नामसे स्पष्ट ही जीवात्माका वर्णन है और उसके लिये भी वे ही अमृत, अभय आदि विशेषण दिये गये हैं,

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सूत्र २०-२१ ] अध्याय १ ९१ जो अन्यत्र ब्रह्मके लिये आते हैं, इसलिये इन लक्षणोंका जीवात्मामें होना असम्भव नहीं है, अतएव 'दहर' शब्दको 'जीवात्मा' का वाचक माननेमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये।'' ऐसी शंका उठायी जाय तो ठीक नहीं है, क्योंकि उक्त मन्त्रमें अपने शुद्ध स्वरूपको प्राप्त हुए जीवात्माके लिये वैसे विशेषण आये हैं। इसलिये उसके आधारपर 'दहर' शब्दको जीवात्माका वाचक नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध— यदि ऐसी बात है, तो उक्त प्रकरणमें जीवात्माको लक्ष्य करानेवाले शब्दोंका प्रयोग क्यों किया गया है? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं— अन्यार्थश्च परामर्शः॥ १। ३। २०॥ परामर्शः= (उक्त प्रकरणमें) जीवात्माको लक्ष्य करानेवाला संकेत, च=भी; अन्यार्थः=दूसरे ही प्रयोजनके लिये है। व्याख्या— पूर्वोक्त प्रकरणमें जो जीवात्माको लक्ष्य करानेवाले शब्दोंका प्रयोग हुआ है, वह 'दहर' शब्दसे जीवात्माका ग्रहण करानेके लिये नहीं, अपितु दूसरे ही प्रयोजनसे है। अर्थात् उस दहर शब्दवाच्य परमात्माके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान हो जानेपर जीवात्मा भी वैसे ही गुणोंवाला बन जाता है, यह भाव प्रदर्शित करनेके लिये ही वहाँ जीवात्माका उस रूपमें वर्णन है। परब्रह्मका ज्ञान हो जानेपर बहुत- से दिव्य गुण जीवात्मामें आ जाते हैं, यह बात भगवद्गीतामें भी कही गयी है (१४।२)। इसलिये उक्त प्रकरणमें जीवात्माका वर्णन आ जानेमात्रसे यह नहीं सिद्ध होता कि वहाँ 'दहर' शब्द जीवात्माका वाचक है। सम्बन्ध—इसी बातकी सिद्धिके लिये सूत्रकार पुनः शंका उठाकर उसका समाधान करते हैं— अल्पश्रुतेरिति चेत्तदुक्तम् ॥ १। ३। २१ ॥ चेत्=यदि कहो; अल्पश्रुतेः = श्रुतिमें 'दहर' को बहुत छोटा बताया गया

९२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

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९२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ है, इसलिये; ('दहर' शब्दसे यहाँ जीवात्माका ही ग्रहण है) इति=ऐसा मानना चाहिये; तदुक्तम्=तो इसका उत्तर दिया जा चुका है। व्याख्या—'श्रुतिमें दहराकाशको अत्यन्त अल्प (लघु) बताया गया है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि वह जीवात्मा है; क्योंकि उसीका स्वरूप 'अणु' माना गया है।' परंतु ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये; क्योंकि इसका उत्तर पहले (सूत्र १। २। ७ में) दिया जा चुका है। अतः बारंबर उसीको दुहरानेकी कोई आवश्यकता नहीं है। सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें उठायी हुई शंकाका उत्तर प्रकारान्तरसे दिया जाता है— अनुकृतेस्तस्य च॥ १। ३। २२॥ तस्य=उस जीवात्माका; अनुकृतेः=अनुकरण करनेके कारण; च=भी; (परमात्माको अल्प परिमाणवाला कहना उचित है)। व्याख्या—मनुष्यके हृदयका माप अंगुष्ठके बराबर माना गया है; उसीमें जीवात्माके साथ परमात्माके प्रविष्ट होनेकी बात श्रुतिमें इस प्रकार बतायी गयी है—'तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्।' (तै० उ० २।६) 'परमात्मा उस जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्की रचना करके स्वयं भी जीवात्माके साथ उसमें प्रविष्ट हो गया।' 'सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत्॥' (छा० उ० ६।३।३) 'उस परमात्माने त्रिविध तत्त्वरूप देवता अर्थात् उनके कार्यरूप मनुष्य-शरीरमें जीवात्माके सहित प्रविष्ट होकर नाम-रूपका विस्तार किया।' तथा—'ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे।' (क० उ० १।३।१) अर्थात् 'शुभ कर्मोंके फलरूप मनुष्य-शरीरमें परब्रह्मके निवासस्थानरूप हृदयाकाशके अन्तर्गत बुद्धिरूप गुहामें छिपे हुए सत्यका पान करनेवाले दो (जीवात्मा और परमात्मा) हैं' इत्यादि। इस प्रकार उस परमात्माको जीवात्माका अनुकरण करनेवाला बताया जानेके कारण भी उसे अल्प परिमाणवाला कहना सर्वथा उचित ही है। इसी भावको लेकर वेदोंमें जगह-जगह परमात्माका स्वरूप 'अणोरणीयान्'— छोटे-से-छोटा तथा 'महतो महीयान्'—बड़े-से-बड़ा बताया गया है।

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सूत्र २३-२४ ] अध्याय १ ९३ सम्बन्ध—इस विषयमें स्मृतिका भी प्रमाण देते हैं— अपि च स्मर्यते ॥ १ । ३ । २३ ॥ च = इसके सिवा; स्मर्यते अपि = यही बात स्मृतिमें भी कही गयी है। व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वर सबके हृदयमें स्थित है और वह छोटेसे भी छोटा है—ऐसा वर्णन स्मृतियोंमें इस प्रकार आया है— 'सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टः।' (गीता १५।१५)। 'हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।' (गीता १३।१७)। 'ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।' (गीता १८।६१)। 'अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।' (गीता १३।१६) 'अणोरणीयांसम्।' (गीता ८।९) इत्यादि। ऐसा वर्णन होनेके कारण उस सर्वव्यापी परब्रह्म परमेश्वरको स्थानकी अपेक्षासे छोटे आकारवाला कहना उचित ही है। अतः 'दहर' शब्दसे परब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है, जीवात्माका नहीं। सम्बन्ध—उपर्युक्त विवेचन पढ़कर यह जिज्ञासा होती है कि कठोपनिषद् (२। १। १२, १३ तथा २। ३। १७)-में जिसे अंगुष्ठके बराबर बताया गया है, वह जीवात्मा है या परमात्मा ? अतः इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— शब्दादेव प्रमितः ॥ १ । ३ । २४॥ शब्दात् = (उक्त प्रकरणमें आये हुए) शब्दसे; एव = ही; (यह सिद्ध होता है कि) प्रमितः = अंगुष्ठमात्र परिमाणवाला पुरुष (परमात्मा ही है)। व्याख्या—कठोपनिषद्में कहा है कि 'अंगुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति।' (२।१।१२) तथा 'अंगुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः' 'ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः।' (२।१।१३) अर्थात् 'अंगुष्ठके बराबर मापवाला परम पुरुष शरीरके मध्यभाग (हृदय)-में स्थित है।' तथा 'अंगुष्ठके बराबर मापवाला परम पुरुष धूमरहित ज्योतिकी भाँति एकरस है, वह भूत, वर्तमान और भविष्यपर शासन करनेवाला है। वह आज भी

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९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ है और कल भी रहेगा; अर्थात् वह नित्य सनातन है।' इस प्रकरणमें जिसे अंगुष्ठके बराबर मापवाला पुरुष बताया गया है, वह परब्रह्म परमात्मा ही है; यह बात उन्हीं मन्त्रोंमें कहे हुए शब्दोंसे सिद्ध होती है; क्योंकि वहाँ उस पुरुषको भूत, वर्तमान और भविष्यमें होनेवाली समस्त प्रजाका शासक, धूमरहित अग्निके सदृश एकरस और सदा रहनेवाला बताया गया है तथा आगे चलकर उसीको विशुद्ध अमृतस्वरूप जाननेके लिये कहा गया है (२। ३। १७)। सम्बन्ध—अब यह जिज्ञासा होती है कि उस परब्रह्म परमात्माको अंगुष्ठके बराबर मापवाला क्यों बताया गया है? इसपर कहते हैं— हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात् ॥ १ । ३ । २५ ॥ तु=उस परमपुरुषको अंगुष्ठके बराबर मापवाला कहना तो; हृदि=हृदयमें स्थित बताये जानेकी; अपेक्षया=अपेक्षासे है; मनुष्याधिकारत्वात्=क्योंकि (ब्रह्मविद्यामें) मनुष्यका ही अधिकार है। व्याख्या—उपनिषदोंमें वर्णित ब्रह्मविद्याके द्वारा ब्रह्मको जाननेका अधिकार मनुष्यको ही है। अन्य पशु-पक्षी आदि अधम योनियोंमें यह जीवात्मा उस परब्रह्म परमात्माको नहीं जान सकता और मनुष्यके हृदयका माप अंगुष्ठके बराबर माना गया है; इस कारण यहाँ मनुष्य-हृदयके मापकी अपेक्षासे उस परब्रह्म परमेश्वरको ‘अंगुष्ठमात्र पुरुष' कहा गया है। सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें अधिकारीकी बात आ जानेसे प्रसंगवश दूसरा प्रकरण चल पड़ा। पहले यह बताया गया है कि वेदाध्ययनपूर्वक ब्रह्मविद्याके द्वारा ब्रह्मको प्राप्त करनेका अधिकार मनुष्योंका ही है। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि क्या मनुष्यको छोड़कर अन्य किसीका भी अधिकार नहीं है? इसपर कहते हैं— तदुपर्यपि बादरायणः सम्भवात् ॥ १ । ३ । २६ ॥ बादरायणः=आचार्य बादरायण कहते हैं कि; तदुपरि=मनुष्यसे ऊपर जो

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सूत्र २७ ] अध्याय १ ९५ देवता आदि हैं, उनका; अपि=भी (अधिकार है); सम्भवात्=क्योंकि उन्हें वेद-ज्ञानपूर्वक ब्रह्मज्ञान होना सम्भव है। व्याख्या—मनुष्यसे नीचेकी योनियोंमें तो वेदविद्याको पढ़ने तथा उनके द्वारा परमात्मज्ञान प्राप्त करनेकी सामर्थ्य ही नहीं है; इसलिये उनका अधिकार न बतलाना तो उचित ही है। परंतु देवादि योनि मनुष्ययोनिसे ऊपर है। जो मनुष्य धर्म तथा ज्ञानमें श्रेष्ठ होते हैं, उन्हींको देवादि योनि प्राप्त होती है। अतः उनमें पूर्वजन्मके अभ्याससे ब्रह्मविद्याको जाननेकी सामर्थ्य होती ही है। अतएव साधन करनेपर उन्हें ब्रह्मका ज्ञान होना सम्भव है। इसलिये भगवान् बादरायणका कहना है कि मनुष्योंसे ऊपरवाली योनियोंमें भी ब्रह्मज्ञान प्राप्त करनेका अधिकार है। सम्बन्ध—उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये ही सूत्रकार स्वयं शंका उठाकर उसका समाधान करते हैं— विरोधः कर्मणीति चेन्नानेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात् ॥ १। ३। २७॥ चेत्=यदि कहो (देवता आदिको शरीरधारी मान लेनेसे); कर्मणि= यज्ञादि कर्ममें; विरोधः=विरोध आता है; इति न=तो यह कथन ठीक नहीं है; अनेकप्रतिपत्तेः=क्योंकि उनके द्वारा एक ही समय अनेक रूप धारण करना सम्भव है; दर्शनात्=शास्त्रमें ऐसा देखा गया है। व्याख्या—'यदि देवता आदिको भी मनुष्योंके समान विशेष आकृतियुक्त या शरीरधारी मान लिया जायगा तो वे एक देशमें ही रहनेवाले माने जा सकते हैं। ऐसी दशामें एक ही समय अनेक यज्ञोंमें उनके निमित्त दी जानेवाली हविष्यकी आहुतिको वे कैसे ग्रहण कर सकते हैं? अतः पृथक्-पृथक् अनेक याज्ञिकोंद्वारा एक समय यज्ञादि कर्ममें जो उनके लिये हवि समर्पित करनेका विधान है, उसमें विरोध आयेगा। इस विरोधकी निवृत्ति तभी हो सकती है, जब देवताओंको एकदेशीय न मानकर व्यापक माना जाय।' परंतु ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये, क्योंकि देवोंमें अनेक विग्रह धारण करनेकी सहज शक्ति

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होती है। अतः वे योगीकी भाँति एक ही कालमें अनेक शरीर धारण करके अनेक स्थानोंमें एक साथ उनके लिये समर्पित की हुई हविको ग्रहण कर सकते हैं। शास्त्रमें भी देवताओंके सम्बन्धमें ऐसा वर्णन देखा जाता है। बृहदारण्यकोपनिषद् (३।९।१-२)-में एक प्रसंग आता है, जिसमें शाकल्य तथा याज्ञवल्क्यका संवाद है। शाकल्यने पूछा—'देवता कितने हैं?' याज्ञवल्क्य बोले—'तीन और तीन सौ तथा तीन और तीन सहस्र।' फिर प्रश्न हुआ—'कितने देवता हैं?' उत्तर मिला—'तैंतीस।' बार-बार प्रश्नोत्तर होनेपर अन्तमें याज्ञवल्क्यने कहा—'ये सब तो इनकी महिमा हैं अर्थात् ये एक-एक ही अनेक हो जाते हैं। वास्तवमें देवता तैंतीस ही हैं' इत्यादि। इस प्रकार श्रुतिने देवताओंमें अनेक रूप धारण करनेकी शक्तिका वर्णन किया है। योगियोंमें भी ऐसी शक्ति देखी जाती है; इसलिये कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—देवताओंको शरीरधारी माननेसे उन्हें विनाशशील मानना पड़ेगा; ऐसी दशामें वेदोंमें जिन-जिन देवताओंका वर्णन आता है, उनकी नित्यता नहीं सिद्ध होगी और इसीलिये वेदको भी नित्य एवं प्रमाणभूत नहीं माना जा सकेगा; इस विरोधका परिहार कैसे हो ? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं— शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ॥ १ । ३ । २८ ॥ चेत् = यदि कहो; शब्दे = (देवताको शरीरधारी माननेपर) वैदिक शब्दमें विरोध आता है; इति न = तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; अतः प्रभवात् = क्योंकि इस वेदोक्त शब्दसे ही देवता आदि जगत्‌की उत्पत्ति होती है; प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् = यह बात प्रत्यक्ष (वेद) और अनुमान (स्मृति) दोनों प्रमाणोंसे सिद्ध होती है। व्याख्या—“देवताओंमें अनेक शरीर धारण करनेकी शक्ति मान लेनेसे कर्ममें विरोध नहीं आता, यह तो ठीक है; परंतु ऐसा माननेसे जो वेदोक्त शब्दोंको नित्य एवं प्रमाणभूत माना जाता है, उसमें विरोध आयेगा; क्योंकि

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सूत्र २८ ] अध्याय १ ९७ शरीरधारी होनेपर देवताओंको भी जन्म-मरणशील मानना पड़ेगा। ऐसी दशामें वे नित्य नहीं होंगे तथा नित्य वैदिक शब्दोंके साथ उनके नाम- रूपोंका नित्य सम्बन्ध भी नहीं रह सकेगा।' ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये; क्योंकि जहाँ कल्पके आदिमें देवादिकी उत्पत्तिका वर्णन आता है, वहाँ यह बतलाया गया है कि 'किस रूप और ऐश्वर्यवाले देवताका क्या नाम होगा।' इस प्रकार वेदोक्त शब्दसे ही उनके नाम, रूप और ऐश्वर्य आदिकी कल्पना की जाती है अर्थात् पूर्वकल्पमें जितने देवता, जिस- जिस नाम, रूप तथा ऐश्वर्यवाले थे, वर्तमान कल्पमें भी उतने ही देवता वैसे ही नाम, रूप और ऐश्वर्यसे युक्त उत्पन्न किये जाते हैं। इससे यह ज्ञात होता है कि कल्पान्तरमें देवता आदिके जीव तो बदल जाते हैं, परंतु नाम-रूप पूर्वकल्पके अनुसार ही रहते हैं। यह बात प्रत्यक्ष (श्रुति) और अनुमान (स्मृति)-के प्रमाणसे भी सिद्ध है। श्रुतियों और स्मृतियोंमें उपर्युक्त बातका वर्णन इस प्रकार आता है—'स भूरिति व्याहरत् स भूमिमसृजत' 'स भुवरिति व्याहरत् सोऽन्तरिक्षमसृजत्।' (तै० ब्रा० २।२।४) 'उसने मन-ही-मन 'भूः' का उच्चारण किया, फिर भूमिकी सृष्टि की,' उसने मनमें 'भुवः' का उच्चारण किया, फिर अन्तरिक्षकी सृष्टि की' इत्यादि। इस वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि प्रजापतिने पहले वाचक शब्दका स्मरण करके उसके अर्थभूत स्वरूपका निर्माण किया। इसी प्रकार स्मृतिमें भी कहा है— सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक्। वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे॥ (मनु० १। २१) 'उन सृष्टिकर्ता परमात्माने पहले सृष्टिके प्रारम्भमें सबके नाम और पृथक्-पृथक् कर्म तथा उन सबकी अलग-अलग व्यवस्थाएँ भी वेदोक्त शब्दोंके अनुसार ही बनायीं।' सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनको ही वेदकी नित्यतामें हेतु बतलाते हैं—

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९८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ अतएव च नित्यत्वम् ॥ १। ३। २९ ॥ अतएव = इसीसे; नित्यत्वम् = वेदकी नित्यता; च = भी (सिद्ध होती है)। व्याख्या—सृष्टिकर्ता परमेश्वर वैदिक शब्दोंके अनुसार ही समस्त जगत्की रचना करते हैं, यह कहा गया है। इससे वेदोंकी नित्यता स्वतःसिद्ध हो जाती है; क्योंकि प्रत्येक कल्पमें परमेश्वरद्वारा वेदोंकी भी नयी रचना की जाती है; यह बात कहीं नहीं कही गयी है। सम्बन्ध—प्रत्येक कल्पमें देवताओंके नाम-रूप बदल जानेके कारण वेदोक्त शब्दोंकी नित्यतामें विरोध कैसे नहीं आयेगा? इस जिज्ञासापर कहते हैं— समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात् स्मृतेश्च ॥ १। ३। ३० ॥ च = तथा; समाननामरूपत्वात् = (कल्पान्तरमें उत्पन्न होनेवाले देवादिकों- के) नाम-रूप पहलेके ही समान होते हैं, इस कारण; आवृत्तौ = पुनः आवृत्ति होनेपर; अपि = भी; अविरोधः = किसी प्रकारका विरोध नहीं है; दर्शनात् = क्योंकि (श्रुतिमें) ऐसा ही वर्णन देखा गया है; च = और; स्मृतेः = स्मृतिसे भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—वेदमें कहा गया है कि 'सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्व- मकल्पयत्।' (ऋ० १०। १९०। ३) अर्थात् 'जगत्स्रष्टा परमेश्वरने सूर्य, चन्द्रमा आदि सबको पहलेकी भाँति बनाया।' श्वेताश्वतरोपनिषद् (६। १८)- में इस प्रकार वर्णन आता है— यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै। तँ ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥ 'जो परमेश्वर निश्चय ही सृष्टिकालमें सबसे पहले ब्रह्माको उत्पन्न करता है और उन्हें समस्त वेदोंका उपदेश देता है, उस आत्मज्ञानविषयक बुद्धिको प्रकट करनेवाले प्रसिद्ध देव परमेश्वरकी मैं मुमुक्षुभावसे शरण ग्रहण करता हूँ।' इसी प्रकार स्मृतिमें भी कहा गया है कि—

सूत्र ३१ ] अध्याय १ ९९

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सूत्र ३१ ] अध्याय १ ९९ तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे। तान्येव ते प्रपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः॥ (महा०) 'पूर्वकल्पकी सृष्टिमें जिन्होंने जिन कर्मोंको अपनाया था, बादकी सृष्टिमें बार-बार रचे हुए वे प्राणी फिर उन्हीं कर्मोंको प्राप्त होते हैं।' इस प्रकार श्रुतियों तथा स्मृतियोंके वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि कल्पान्तरमें उत्पन्न होनेवाले देवादिकोंके नाम, रूप पहलेके सदृश ही वेद- वचनानुसार रचे जाते हैं, इसलिये उनकी बार-बार आवृत्ति होती रहनेपर भी वेदकी नित्यता तथा प्रामाणिकतामें किसी प्रकारका विरोध नहीं आता है। सम्बन्ध— २६ वें सूत्रमें जो प्रसंगवश यह बात कही गयी थी कि ब्रह्मविद्यामें देवादिका भी अधिकार है; ऐसा वेदव्यासजी मानते हैं, उसीकी पुष्टि तीसवें सूत्रतक की गयी। अब आचार्य जैमिनिके मतानुसार यह बात कही जाती है कि ब्रह्मविद्यामें देवता आदिका अधिकार नहीं है— मध्वादिष्वसम्भवादनधिकारं जैमिनिः ॥ १ । ३ । ३१ ॥ जैमिनिः = जैमिनि नामक आचार्य; मध्वादिषु = मधु-विद्या आदिमें; अनधिकारम् (आह) = देवता आदिका अधिकार नहीं बताते हैं; असम्भवात् = क्योंकि यह सम्भव नहीं है। व्याख्या— छान्दोग्योपनिषद्के तीसरे अध्यायमें प्रथमसे लेकर ग्यारहवें खण्डतक मधुविद्याका प्रकरण है। वहाँ 'सूर्य' को देवताओंका 'मधु' बताया गया है। मनुष्योंके लिये साधनद्वारा प्राप्त होनेवाली वस्तु देवताओंको स्वतः प्राप्त है; इस कारण देवताओंके लिये मधुविद्या अनावश्यक है; अतः उस विद्यामें उनका अधिकार मानना सम्भव नहीं है। इसी प्रकार स्वर्गादि देवलोकके भोगोंकी प्राप्तिके लिये जो वेदोंमें यज्ञादिके द्वारा देवताओंकी सकाम उपासनाका वर्णन है, उसका अनुष्ठान भी देवताओंके लिये अनावश्यक होनेके कारण उनके द्वारा किया जाना सम्भव नहीं है। अतएव उसमें भी उनका अधिकार नहीं है, इसलिये यह सिद्ध होता है कि जैसे मनुष्योंके लिये यज्ञादि कर्मद्वारा स्वर्गादिकी प्राप्ति

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१०० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ करानेवाली वेदवर्णित विद्याओंमें देवताओंका अधिकार नहीं है, उसी प्रकार ब्रह्मविद्यामें भी उनका अधिकार नहीं है? यों आचार्य जैमिनि कहते हैं। सम्बन्ध— इसी बातको पुष्ट करनेके लिये आचार्य जैमिनि दूसरी युक्ति देते हैं— ज्योतिषि भावाच्च ॥ १ । ३ । ३२ ॥ ज्योतिषि=ज्योतिर्मय लोकोंमें; भावात्=देवताओंकी स्थिति होनेके कारण; च=भी (उनका यज्ञादि कर्म और ब्रह्मविद्यामें अधिकार नहीं है)। व्याख्या—वे देवता स्वभावसे ही ज्योतिर्मय देवलोकोंमें निवास करते हैं, वहाँ उन्हें स्वभावसे ही सब प्रकारका ऐश्वर्य प्राप्त है, नये कर्मोंद्वारा उनको किसी प्रकारका नूतन ऐश्वर्य नहीं प्राप्त करना है; अतएव उन सब लोकोंकी प्राप्तिके लिये बताये हुए कर्मोंमें उनकी प्रवृत्ति सम्भव नहीं है; इसलिये जिस प्रकार वेदविहित अन्य विद्याओंमें उनका अधिकार नहीं है, उसी प्रकार ब्रह्मविद्यामें भी नहीं है। सम्बन्ध— पूर्वोक्त दो सूत्रोंमें जैमिनिके मतानुसार पूर्वपक्षकी स्थापना की गयी। अब उसके उत्तरमें सूत्रकार अपना निश्चित मत बतलाकर देवताओंके अधिकार-विषयक प्रकरणको समाप्त करते हैं— भावं तु बादरायणोऽस्ति हि ॥ १ । ३ । ३३ ॥ तु=किंतु; बादरायणः=बादरायण आचार्य (यज्ञादि कर्म तथा ब्रह्म- विद्यामें); भावम् (मन्यते)=देवता आदिके अधिकारका भाव (अस्तित्व) मानते हैं; हि=क्योंकि; अस्ति=श्रुतिमें (उनके अधिकारका) वर्णन है। व्याख्या—बादरायण आचार्य अपने मतका दृढ़तापूर्वक प्रतिपादन करते हुए 'तु' इस अव्यय पदके द्वारा यह सूचित करते हैं कि पूर्वपक्षीका मत शब्द- प्रमाणसे रहित होनेके कारण मान्य नहीं है। निश्चय ही यज्ञादि कर्म तथा ब्रह्मविद्यामें देवताओंका भी अधिकार है; क्योंकि वेदमें उनका यह अधिकार सूचित करनेवाले वचन मिलते हैं। जैसे—'प्रजापतिरकामयत प्रजायेयेति स एतदग्निहोत्रं मिथुनमपश्यत्। तदुदिते सूर्येऽजुहोत्।' (तै० ब्रा० २। १। २।८) तथा

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सूत्र ३४ ] अध्याय १ १०१ 'देवा वै सत्रमासत्।' (तै० सं० २।३।३) अर्थात् 'प्रजापतिने इच्छा की कि मैं उत्पन्न होऊँ, भलीभाँति जन्म ग्रहण करूँ, उन्होंने अग्निहोत्ररूप मिथुनपर दृष्टिपात किया और सूर्योदय होनेपर उसका हवन किया।' तथा 'निश्चय ही देवताओंने यज्ञका अनुष्ठान किया।' इत्यादि वचनोंद्वारा देवताओंका कर्माधिकार सूचित होता है। इसी प्रकार ब्रह्मविद्यामें देवताओंका अधिकार बतानेवाले वचन ये हैं—'तद् यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्।' (बृह० उ० १।४।१०) अर्थात् 'देवताओंमेंसे जिसने उस ब्रह्मको जान लिया, वही वह—ब्रह्म हो गया' इत्यादि। इसके सिवा, छान्दोग्योपनिषद्में (८।७।२ से ८।१२।६ तक) यह प्रसंग आता है कि इन्द्र और विरोचनने ब्रह्माजीकी सेवामें रहकर बहुत वर्षोंतक ब्रह्मचर्य-पालन करनेके पश्चात् ब्रह्मविद्या प्राप्त की। इन सब प्रमाणोंसे यही सिद्ध होता है कि देवता आदिका भी कर्म और ब्रह्मविद्यामें अधिकार है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि क्या सभी वर्णके मनुष्योंका वेदविद्यामें अधिकार है? क्योंकि छान्दोग्योपनिषद्में ऐसा वर्णन मिलता है कि रैक्वने राजा जानश्रुतिको शूद्र कहते हुए भी उन्हें ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया। इससे तो यही सिद्ध होता है कि शूद्रका भी ब्रह्मविद्यामें अधिकार है। अतः इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— शुगस्य तदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात् सूच्यते हि ॥ १। ३ । ३४ ॥ तदनादरश्रवणात्=उन हंसोंके मुखसे अपना अनादर सुनकर, अस्य=इस राजा जानश्रुतिके मनमें, शुक्=शोक उत्पन्न हुआ; तत्=तदनन्तर; आद्रवणात्=(जिनकी अपेक्षा अपनी तुच्छता सुनकर शोक हुआ था) उन रैक्वमुनिके पास वह विद्याप्राप्तिके लिये दौड़ा गया; (इस कारण उन रैक्वने उसे शूद्र कहकर पुकारा) हि=क्योंकि (इससे); सूच्यते=(रैक्वमुनिकी सर्वज्ञता) सूचित होती है। व्याख्या—इस प्रकरणमें रैक्वने राजा जानश्रुतिको जो शूद्र कहकर सम्बोधित किया, इसका यह अभिप्राय नहीं है कि वह जातिसे शूद्र था; अपितु

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१०२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ वह शोकसे व्याकुल होकर दौड़ा आया था, इसलिये उसे शूद्र* कहा। यही बात उस प्रकरणकी समालोचनासे सिद्ध होती है। छान्दोग्योपनिषद्में (४।१।१ से ४ तक) वह प्रकरण इस प्रकार है— 'राजा जानश्रुति श्रद्धापूर्वक बहुत दान देनेवाला था। वह अतिथियोंके भोजन- के लिये बहुत अधिक अन्न तैयार कराकर रखता था। उनके ठहरनेके लिये उसने बहुत-सी विश्रामशालाएँ भी बनवा रखी थीं। एक दिनकी बात है, राजा जानश्रुति रातके समय अपने महलकी छतपर बैठा था। उसी समय उसके ऊपरसे आकाशमें कुछ हंस उड़ते हुए जा रहे थे। उनमेंसे एक हंसने दूसरेको पुकारकर कहा—'अरे! सावधान, इस राजा जानश्रुतिका महान् तेज आकाशमें फैला हुआ है, कहीं भूलसे उसका स्पर्श न कर लेना, नहीं तो वह तुझे भस्म कर देगा।' यह सुनकर आगे जानेवाले हंसने कहा—अरे भाई! तू किस महत्ताको लेकर इस राजाको इतना महान् मान रहा है, क्या तू इसको गाड़ीवाले रैक्वके समान समझता है?' इसपर पीछेवाले हंसने पूछा— 'रैक्व कैसा है?' अगले हंसने उत्तर दिया—'यह सारी प्रजा जो कुछ भी शुभ कर्म करती है, वह सब उस रैक्वको प्राप्त होता है तथा जिस तत्त्वको रैक्व जानता है, उसे जो कोई भी जान ले, उसकी भी ऐसी ही महिमा हो जाती है।' इस प्रकार हंसोंसे अपनी तुच्छताकी बात सुनकर राजाके मनमें शोक हुआ; फिर वह रैक्वकी खोज कराकर उनके पास विद्याग्रहणके लिये गया। रैक्व- मुनि सर्वज्ञ थे, वे राजाकी मनःस्थितिको जान गये। उन्होंने उसके मनमें जगे हुए ईर्ष्याभावको दूर करके उसमें श्रद्धाका भाव उत्पन्न करनेका विचार किया और अपनी सर्वज्ञता सूचित करके उसे सावधान करते हुए 'शूद्र' कहकर पुकारा। यह जानते हुए भी कि जानश्रुति क्षत्रिय है, रैक्वने उसे 'शूद्र' इसलिये कहा कि वह शोकके वशीभूत होकर दौड़ा आया था। अतः इससे यह नहीं सिद्ध होता कि वेदविद्यामें शूद्रका अधिकार है।

  • शुचम् आद्रवति इति शूद्रः—जो शोकके पीछे दौड़ता है, वह शूद्र है, इस व्युत्पत्तिके अनुसार रैक्वने उसे 'शूद्र' कहा।