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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

२२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

२२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध—शरीरके एक देशमें आत्माकी स्थिति है—यह सिद्ध करनेके लिये पूर्वपक्षी कहता है— अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्नाध्युपगमाद्धृदि हि ॥ २।३।२४॥ चेत् = यदि कहो; अवस्थितिवैशेष्यात् = चन्दन और आत्माकी स्थितिमें भेद है, इसलिये (चन्दनका दृष्टान्त उपयुक्त नहीं है); इति न = तो यह बात नहीं है; हि = क्योंकि; हृदि = हृदय-देशमें; अध्युपगमात् = उसकी स्थिति स्वीकार की गयी है। व्याख्या—यदि कहो कि चन्दनकी स्थिति तो एक देशमें प्रत्यक्ष है; किंतु उसके समान आत्माकी स्थिति शरीरके एक देशमें प्रत्यक्ष नहीं है; इसलिये यह दृष्टान्त उपयुक्त नहीं है। तो यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि श्रुतिने आत्माको हृदयमें स्थित बताकर उसकी एक देशमें स्थिति स्पष्ट स्वीकार की है, जैसे—'हृदि ह्येष आत्मा' 'यह आत्मा हृदयमें स्थित है।' (प्र० उ० ३। ६) तथा 'कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः'—'आत्मा कौन है', ऐसा पूछनेपर कहा है कि 'प्राणोंमें हृदयके अंदर जो यह विज्ञानमय ज्योतिःस्वरूप पुरुष है।' (बृह० उ० ४। ३। ७) इत्यादि। सम्बन्ध—उसी बातको प्रकारान्तरसे कहते हैं— गुणाद्वा लोकवत् ॥ २।३।२५॥ वा = अथवा यह समझो कि अणुपरिमाणवाले जीवात्माका; गुणात् = चेतनतारूप गुणसे समस्त शरीरको चेतनायुक्त कर देना सम्भव है; लोकवत् = क्योंकि लोकमें ऐसा देखा जाता है। व्याख्या—अथवा जिस प्रकार लोकमें यह बात प्रत्यक्ष देखी जाती है कि घरके किसी एक देशमें रखा हुआ दीपक अपने प्रकाशरूप गुणसे समस्त घरको प्रकाशित कर देता है वैसे ही शरीरके एक देशमें स्थित अणु मापवाला जीवात्मा अपने चेतनतारूप गुणके द्वारा समस्त शरीरको चेतनायुक्त कर देता है; अतः इसमें कोई विरोध नहीं है।

सूत्र २६-२७ ] अध्याय २ २२३ सम्बन्ध — गुण अपने गुणीसे अलग कैसे होता है ? इसपर कहते हैं— व्यतिरेको गन्धवत् ॥ २ । ३ । २६ ॥ गन्धवत् = गन्धकी भाँति; व्यतिरेकः = गुणका गुणीसे अलग होना बन सकता है (अतः कोई विरोध नहीं है)। व्याख्या — यहाँ यह शंका भी नहीं करनी चाहिये कि गुण तो गुणीके साथ ही रहता है, वह गुणीसे अलग होकर कोई कार्य कैसे कर सकता है; क्योंकि जैसे गन्ध अपने गुणी पुष्प आदिसे अलग होकर स्थानान्तरमें फैल जाती है, उसी प्रकार आत्माका चेतनतारूप गुण भी आत्मासे अलग होकर समस्त शरीरमें व्याप्त हो जाता है; अतः कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध — इसी बातको श्रुतिप्रमाणसे दृढ़ करते हैं— तथा च दर्शयति ॥ २ । ३ । २७ ॥ तथा = ऐसा; च = ही; दर्शयति = श्रुति भी दिखलाती है। व्याख्या — केवल युक्तिसे ही यह बात सिद्ध होती हो, ऐसा नहीं; श्रुतिमें भी आत्माका एक जगह रहकर अपने गुणके द्वारा समस्त शरीरमें नखसे लोमतक व्याप्त होना दिखाया गया है। * अतः यह सिद्ध होता है कि आत्मा अणु है। सम्बन्ध — इस प्रकार पूर्वपक्षीद्वारा इक्कीसवें सूत्रसे लेकर सत्ताईसवें सूत्रतक जीवात्माका अणु होना सिद्ध किया गया; किंतु उसमें दी हुई युक्तियाँ सर्वथा निर्बल हैं और पूर्वपक्षीद्वारा उद्धृत श्रुति-प्रमाण तो आभासमात्र है ही, इसलिये अब सिद्धान्तीकी ओरसे अणुवादका खण्डन करके आत्माके विभुत्वकी सिद्धि की जाती है—

  • स एष इह प्रविष्टः । आ नखाग्रेभ्यः । (बृह० उ० १।४।७) तौ होचतुः सर्वमेवेदमावां भगव आत्मानं पश्याव आ लोमभ्य आ नखेभ्यः प्रतिरूपमिति ॥ (छा० उ० ८।८।१)

२२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

२२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ पृथगुपदेशात् ॥ २ । ३ । २८ ॥ पृथक् = (जीवात्माके विषयमें) अणुपरिमाणसे भिन्न; उपदेशात् = उपदेश श्रुतिमें मिलता है, इसलिये (जीवात्मा अणु नहीं, विभु है)। व्याख्या - पूर्वपक्षकी ओरसे जीवात्माको अणु बतानेके लिये जो प्रमाण दिया गया, उसी श्रुतिमें स्पष्ट शब्दोंमें जीवात्माको विभु बताया गया है। भाव यह कि जहाँ जीवात्माका स्वरूप बालाग्रके दस हजारवें भागके समान बताया है, वहीं उसको 'स चानन्त्याय कल्पते।' इस वाक्यसे अनन्त अर्थात् विभु होनेमें समर्थ कहा गया है (श्वेता० उ० ५। ९)। अतः प्रमाण देनेवालेको श्रुतिके अगले उपदेशपर भी दृष्टिपात करना चाहिये। इसके सिवा, कठोपनिषद् (१। ३। १०, १३; २। ३। ७) -में स्पष्ट ही जीवात्माका विशेषण 'महान्' आया है तथा गीतामें भी जीवात्माके स्वरूपका वर्णन करते हुए स्पष्ट कहा है कि 'यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है' (गीता २। २४)। 'जिस प्रकार सब जगह व्याप्त हुआ भी आकाश सूक्ष्म होनेके कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही आत्मा भी शरीरमें सब जगह स्थित है तो भी उससे लिप्त नहीं होता।' (गीता १३। ३२) तथा 'उस आत्माको तू अविनाशी समझ, जिससे यह समस्त जडसमुदाय व्याप्त है।' (गीता २। १७) - इन प्रमाणोंके विषयमें यह नहीं कहा जा सकता कि ये परमात्माके प्रकरणमें आये हैं। सम्बन्ध - इसपर यह जिज्ञासा होती है कि यदि ऐसी बात है तो श्रुतिमें जो स्पष्ट शब्दोंमें आत्माको अणु और अंगुष्ठमात्र कहा है, उसकी संगति कैसे होगी? इसपर कहते हैं- तद्गुणसारत्वात्तु तद्व्यपदेशः प्राज्ञवत् ॥ २ । ३ । २९ ॥ तद्व्यपदेशः = वह कथन; तु = तो; तद्गुणसारत्वात् = उस बुद्धि आदिके गुणोंकी प्रधानताको लेकर है; प्राज्ञवत् = जैसे परमेश्वरको अणु और हृदयमें स्थित अंगुष्ठमात्र बताया है, वैसे ही जीवात्माके लिये भी समझना चाहिये।

सूत्र २९ ] अध्याय २ २२५ व्याख्या—श्रुतिमें जीवात्माको अंगुष्ठमात्र परिमाणवाला कहते हुए इस प्रकार वर्णन किया गया है— अंगुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः संकल्पाहंकारसमन्वितो यः। बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव आराग्रमात्रो ह्यपरोऽपि दृष्टः॥ 'जो अंगुष्ठमात्र परिमाणवाला, सूर्यके सदृश प्रकाशस्वरूप तथा संकल्प और अहंकारसे युक्त है, वह बुद्धिके गुणोंसे और शरीरके गुणोंसे ही आरेकी नोक-जैसे सूक्ष्म आकारवाला है—ऐसा परमात्मासे भिन्न जीवात्मा भी निःसंदेह ज्ञानियोंद्वारा देखा गया है।' (श्वेता० उ० ५।८) जीवात्माकी गति-आगतिका वर्णन भी शरीरादिके सम्बन्धसे ही है, (कौ० उ० ३।६; प्र० उ० ३।९, १०)¹। इससे यह बात बिलकुल स्पष्ट हो जाती है कि श्रुतिमें जहाँ कहीं जीवात्माको एकदेशी 'अंगुष्ठमात्र' या 'अणु' कहा गया है, वह बुद्धि और शरीरके गुणोंको लेकर ही है; जैसे परमात्माको भी जगह-जगह जीवात्माके हृदयमें स्थित (क० उ० १।३। १; प्र० उ० ६।२; मु० उ० २।१।१० तथा २।२।१; ३।१।५, ७; श्वेता० उ० ३।२०) तथा अंगुष्ठमात्र भी (क० उ० २।१।१२-१३) बताया है। वह कथन स्थानकी अपेक्षासे ही है, उसी प्रकार जीवात्माके विषयमें भी समझना चाहिये। वास्तवमें वह अणु नहीं, विभु है; इसमें कोई शंका नहीं है। पूर्वपक्षीने जो बृहदारण्यक और छान्दोग्य-श्रुतिका प्रमाण देकर यह बात कही कि 'वह एक जगह स्थित रहते हुए ही नखसे लोमतक व्याप्त है', वह कहना सर्वथा प्रकरणविरुद्ध है; क्योंकि उस प्रकरणमें आत्माके गुणकी व्याप्तिविषयक कोई बात ही नहीं कही गयी है।² तथा गन्ध, प्रदीप आदिका दृष्टान्त देकर जो गुणके द्वारा आत्माके चैतन्यकी व्याप्ति बतायी है, वह भी युक्तिसंगत १-यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति। २-देखो सूत्र २।३।२७ की टिप्पणी।

२२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

२२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ नहीं है; क्योंकि श्रुतिमें आत्माका चैतन्यगुण विशिष्ट नहीं माना गया है, बल्कि परमेश्वरकी भाँति सत्, चेतन और आनन्द—ये उसके स्वरूपभूत लक्षण माने गये हैं। अतः जीवात्माको अणु मानना किसी प्रकार भी उचित नहीं है। सम्बन्ध— यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि इस प्रकार बुद्धि आदिके गुणोंके संयोगसे आत्माको अंगुष्ठमात्र तथा एकदेशी माना जायगा, स्वरूपसे नहीं, तब तो जब प्रलयकालमें आत्माके साथ बुद्धि आदिका सम्बन्ध नहीं रहेगा, उस समय समस्त जीवोंकी मुक्ति हो जायगी। अतः प्रलयके बाद सृष्टि भी नहीं हो सकेगी। यदि मुक्त जीवोंका पुनः उत्पन्न होना मान लिया जाय तो मुक्तिके अभावका प्रसंग उपस्थित होगा, इसपर कहते हैं— यावदात्मभावित्वाच्च न दोषस्तद्दर्शनात् ॥ २ । ३ । ३० ॥ यावदात्मभावित्वात् = जबतक स्थूल, सूक्ष्म या कारण—इनमेंसे किसी भी शरीरके साथ जीवात्माका सम्बन्ध रहता है, तबतक वह उस शरीरके अनुरूप, एकदेशी-सा रहता है, इसलिये; च = भी; दोषः = उक्त दोष; न = नहीं है; तद्दर्शनात् = श्रुतिमें भी ऐसा ही देखा गया है। व्याख्या— श्रुतिमें कहा गया है कि जीवका एक शरीरसे दूसरेमें जाते समय भी सूक्ष्मशरीरसे सम्बन्ध बना रहता है (प्र० उ० ३ । ९, १०), परलोकमें भी उसका शरीरसे सम्बन्ध माना गया है तथा सुषुप्ति और स्वप्नकालमें भी देहके साथ उसका सम्बन्ध बताया गया है (प्र० उ० ४ । २, ५)।*

  • तस्मै स होवाच यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति। ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति। तेन तर्ह्येष पुरुषो न श्रृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥ 'उससे उन सुप्रसिद्ध महर्षि पिप्पलादने कहा—गार्ग्य ! जिस प्रकार अस्त होते हुए सूर्यकी सब किरणें इस तेजोमण्डलमें एक हो जाती हैं; फिर उदय होनेपर वे सब पुनः- पुनः सब ओर फैलती रहती हैं। ठीक ऐसे ही (निद्राके समय) वे सब इन्द्रियाँ भी परमदेव

सूत्र ३१ ] अध्याय २ २२७

सूत्र ३१ ] अध्याय २ २२७ इसी प्रकार प्रलयकालमें भी कर्मसंस्कारोंके सहित कारणशरीरसे जीवात्माका सम्बन्ध रहता है; क्योंकि श्रुतिमें यह बात स्पष्ट कही है कि प्रलयकालमें यह विज्ञानात्मा समस्त इन्द्रियोंके सहित उस परब्रह्ममें स्थित होता है (प्र० उ० ४।११)* इसलिये सुषुप्ति और प्रलयकालमें समस्त जीवोंके मुक्त होनेका तथा मुक्त पुरुषोंके पुनर्जन्म आदिका कोई दोष नहीं आ सकता। सम्बन्ध—प्रलयकालमें तो समस्त जगत् परमात्मामें विलीन हो जाता है, वहाँ बुद्धि आदि तत्त्वोंकी भी परमात्मासे भिन्न सत्ता नहीं रहती। इस स्थितिमें बुद्धि आदिके समुदायरूप सूक्ष्म या कारणशरीरके साथ जीवात्माका सम्बन्ध कैसे रह सकता है? और यदि उस समय नहीं रहता है तो सृष्टिकालमें कैसे सम्बन्ध हो जाता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— पुंस्त्वादिवत्त्वस्य सतोऽभिव्यक्तियोगात्॥ २।३।३१॥ पुंस्त्वादिवत् = पुरुषत्व आदिकी भाँति; सतः = पहलेसे विद्यमान; अस्य = इस मनमें एक हो जाती हैं; इस कारण उस समय वह जीवात्मा न तो सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न मैथुनका आनन्द भोगता है, न मल-मूत्रका त्याग करता है और न चलता ही है। उस समय 'वह सो रहा है' ऐसा लोग कहते हैं।' अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति। यद् दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति। देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चानुभूतं च सच्चासच्व सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति॥ 'इस स्वप्नावस्थामें यह जीवात्मा अपनी विभूतिका अनुभव करता है, जो बार-बार देखा हुआ है, उसीको बार-बार देखता है। बार-बार सुनी हुई बातको पुनः-पुनः सुनता है। नाना देश और दिशाओंमें बार-बार अनुभव किये हुए विषयोंको पुनः-पुनः अनुभव करता है। इतना ही नहीं, देखे और न देखे हुएको भी, सुने हुए और न सुने हुएको भी, अनुभव किये हुए और अनुभव न किये हुएको भी तथा विद्यमान और अविद्यमानको भी देखता है, इस प्रकार वह सारी घटनाओंको देखता है और सब कुछ स्वयं बनकर देखता है।'

  • विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र। तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति॥

२२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

२२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ (कारण शरीरादिके) सम्बन्धका; तु=ही; अभिव्यक्तियोगात्=(सृष्टिकालमें) प्रकट होनेका योग है, इसलिये (कोई दोष नहीं है)। व्याख्या—प्रलयकालमें यद्यपि बुद्धि आदि तत्त्व स्थूलरूपमें न रहकर अपने कारणरूप परब्रह्म परमेश्वरमें विलीन हो जाते हैं, तथापि भगवान्‌की अचिन्त्य शक्तिके रूपमें वे अव्यक्तरूपसे सब-के-सब विद्यमान रहते हैं। तथा सब जीवात्मा भी अपने-अपने कर्मसंस्काररूप कारणशरीरोंके सहित अव्यक्तरूपसे उस परब्रह्म परमेश्वरमें विलीन रहते हैं (प्र० उ० ४।११)।* उनके सम्बन्धका सर्वथा नाश नहीं होता। अतः सृष्टिकालमें उस परब्रह्म परमात्माके संकल्पसे वे उसी प्रकार सूक्ष्म और स्थूल रूपोंमें प्रकट हो जाते हैं, जैसे बीजरूपमें पहलेसे ही विद्यमान पुरुषत्व बाल्यकालमें प्रकट नहीं होता, किंतु युवावस्थामें शक्तिके संयोगसे प्रकट हो जाता है। यही बात बीज- वृक्षके सम्बन्धमें भी समझी जा सकती है। (गीता अध्याय १४ श्लोक ३ और ४ में यही बात स्पष्ट की गयी है) इसलिये कोई विरोध नहीं है। जिस साधकका अन्तःकरण साधनाके द्वारा जितना शुद्ध और व्यापक होता है, वह उतना ही विशाल हो जाता है। यही कारण है कि योगीमें दूर देशकी बात जानने आदिकी सामर्थ्य आ जाती है, क्योंकि जीवात्मा तो पहलेसे सर्वत्र व्याप्त है ही, अन्तःकरण और स्थूलशरीरके सम्बन्धसे ही वह उसके अनुरूप आकारवाला हो रहा है। सम्बन्ध— जीवात्मा तो स्वयंप्रकाशस्वरूप है, उसे मन, बुद्धिके सम्बन्धसे वस्तुका ज्ञान होता है, यह माननेकी क्या आवश्यकता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसंगोऽन्यतरनियमो वान्यथा ॥ २ । ३ । ३२ ॥ अन्यथा=जीवको अन्तःकरणके सम्बन्धसे विषय-ज्ञान होता है; ऐसा

  • यह मन्त्र पूर्वसूत्रकी टिप्पणीमें आ गया है।

सूत्र ३२ ] अध्याय २ २२९

सूत्र ३२ ] अध्याय २ २२९ न माननेपर; नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसंगः = उसे सदा ही विषयोंके अनुभव होनेका या कभी भी न होनेका प्रसंग उपस्थित होगा; वा = अथवा; अन्यतरनियमः = आत्माकी ग्राहक-शक्ति या विषयकी ग्राह्य-शक्तिके नियमन (प्रतिबन्ध)-की कल्पना करनी पड़ेगी (ऐसी दशामें अन्तःकरणका सम्बन्ध मानना ही युक्तिसंगत है)। व्याख्या—यदि यह नहीं माना जाय कि यह जीवात्मा अन्तःकरणके सम्बन्धसे समस्त वस्तुओंका अनुभव करता है तो प्रत्यक्षमें जो यह देखा जाता है कि यह जीवात्मा कभी किसी वस्तुका अनुभव करता है और कभी नहीं करता, इसकी सिद्धि नहीं होगी; क्योंकि इसको यदि प्रकाशस्वरूप होनेके कारण स्वतः अनुभव करनेवाला मानेंगे, तब तो इसे सदैव एक साथ प्रत्येक वस्तुका ज्ञान रहता है, ऐसा मानना पड़ेगा। यदि इसमें जाननेकी शक्ति स्वाभाविक नहीं मानेंगे तो कभी किसी भी कालमें न जाननेका प्रसंग आ जायगा अथवा दोनोंमेंसे किसी एककी शक्तिका नियमन (संकोच) मानना पड़ेगा। अर्थात् या तो यह स्वीकार करना पड़ेगा कि किसी निमित्तसे जीवात्माकी ग्राहकशक्तिका प्रतिबन्ध होता है या यह मानना पड़ेगा कि विषयकी ग्राह्य-शक्तिमें किसी कारणवश प्रतिबन्ध आ जाता है। प्रतिबन्ध हट जानेपर विषयकी उपलब्धि होती है और उसके रहनेपर विषयोपलब्धि नहीं होती। परंतु यह गौरवपूर्ण कल्पना करनेकी अपेक्षा अन्तःकरणके सम्बन्धको स्वीकार कर लेनेमें ही लाघव है। इसलिये यही मानना ठीक है कि अन्तःकरणके सम्बन्धसे ही जीवात्माको समस्त लौकिक पदार्थोंका अनुभव होता है। ‘मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति’ (बृह० उ० १।५।३) अर्थात् ‘मनसे ही देखता है, मनसे सुनता है’ इत्यादि मन्त्र-वाक्योंद्वारा श्रुति भी अन्तःकरणके सम्बन्धको स्वीकार करती है। जीवात्माका अन्तःकरणसे सम्बन्ध रहते हुए भी वह कभी तो कार्यरूपमें प्रकट रहता है और कभी कारणरूपसे अप्रकट रहता है। इस प्रकार यहाँतक यह बात सिद्ध हो गयी कि जीवात्माको जो अणु कहा

२३० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

२३० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ गया है, वह उसकी सूक्ष्मताका बोधक है, न कि एकदेशिता (छोटेपन)- का; और उसको जो अंगुष्ठमात्र कहा गया है, वह मनुष्य-शरीरके हृदयके मापके अनुसार कहा गया है तथा उसे जो छोटे आकारवाला बताया गया है, वह भी संकीर्ण अन्तःकरणके सम्बन्धसे है, वास्तवमें वह विभु (समस्त जड पदार्थोंमें व्याप्त) और अनन्त (देश-कालकी सीमासे अतीत है)। सम्बन्ध—सांख्यमतमें जड प्रकृतिको स्वतन्त्र कर्ता माना गया है और पुरुषको असंग माना गया है, किंतु जड प्रकृतिको स्वभावसे कर्ता मानना युक्तिसंगत नहीं है तथा पुरुष असंग होनेसे उसको भी कर्ता मानना नहीं बन सकता। अतः यह निश्चय करनेके लिये कि कर्ता कौन है, अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। वहाँ गौणरूपसे 'जीवात्मा कर्ता है' यह बात सिद्ध करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं— कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात्॥ २। ३। ३३॥ कर्ता=कर्ता जीवात्मा है; शास्त्रार्थवत्त्वात्=क्योंकि विधि-निषेधबोधक शास्त्रकी इसीमें सार्थकता है। व्याख्या—श्रुतियोंमें जो बार-बार यह कहा गया है कि अमुक काम करना चाहिये, अमुक नहीं करना चाहिये। अमुक शुभ कर्म करनेवालेको अमुक श्रेष्ठ फल मिलता है, अमुक पापकर्म करनेवालेको अमुक दुःख भोग करना पड़ता है, इत्यादि; यह जो शास्त्रका कथन है; वह किसी चेतनको कर्ता न माननेसे और जड प्रकृतिको कर्ता माननेसे भी व्यर्थ होता है; किंतु शास्त्र-वचन कभी व्यर्थ नहीं हो सकता। इसलिये जीवात्माको ही समस्त कर्मोंका कर्ता मानना उचित है। इसके सिवा, श्रुति स्पष्ट शब्दोंमें जीवात्माको कर्ता बतलाती है;* यहाँ यह ध्यानमें रखना चाहिये कि अनादिकालसे जो जीवात्माका कारण-शरीरके साथ सम्बन्ध है उसीसे जीवको कर्ता माना गया

  • एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः। (प्र० उ० ४। ९)

सूत्र ३४-३५] अध्याय २ २३१

सूत्र ३४-३५] अध्याय २ २३१

है, स्वरूपसे वह कर्ता नहीं है; क्योंकि श्रुतिमें उसका स्वरूप निष्क्रिय बताया गया है। (श्वेता० ६।१२) यह बात इस प्रकरणके अन्तमें सिद्ध की गयी है। सम्बन्ध — जीवात्माके कर्ता होनेमें दूसरा हेतु बताया जाता है— विहारोपदेशात् ॥ २। ३। ३४ ॥ विहारोपदेशात् = स्वप्नमें स्वेच्छासे विहार करनेका वर्णन होनेसे भी (यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा 'कर्ता' है)। व्याख्या — शास्त्रके विधि-निषेधके सिवा, यह स्वप्नावस्थामें स्वेच्छापूर्वक घूमना-फिरना, खेल-तमाशा करना आदि कर्म करता है, ऐसा वर्णन है (बृह० उ० ४। ३। १३; २। १। १८) इसलिये भी यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा कर्ता है, जड प्रकृतिमें स्वेच्छापूर्वक कर्म करना नहीं बनता। सम्बन्ध — तीसरा कारण बताते हैं— उपादानात् ॥ २। ३। ३५ ॥ उपादानात् = इन्द्रियोंको ग्रहण करके विचरनेका वर्णन होनेसे (भी यही सिद्ध होता है कि इन्द्रिय आदिके सम्बन्धसे जीवात्मा 'कर्ता' है)। व्याख्या — यहाँ 'उपादान' शब्द उपादान कारणका वाचक नहीं; किंतु 'ग्रहण' रूप क्रियाका बोधक है। श्रुतिमें कहा है— 'स यथा महाराजो जानपदान् गृहीत्वा स्वे जनपदे यथाकामं परिवर्तेतैवमेवैष एतत्प्राणान् गृहीत्वा स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते ॥' (बृह० उ० २। १। १८) अर्थात् 'जिस प्रकार कोई महाराज प्रजाजनोंको साथ लेकर अपने देशमें इच्छानुसार भ्रमण करता है, वैसे ही यह जीवात्मा स्वप्नावस्थामें प्राणशब्दवाच्य इन्द्रियोंको ग्रहण करके इस शरीरमें इच्छानुसार विचरता है। इस प्रकार इन्द्रियोंके द्वारा कर्म करनेका वर्णन होनेसे यह सिद्ध होता है कि प्रकृति या इन्द्रियाँ स्वतन्त्र 'कर्ता' नहीं हैं; उनसे युक्त हुआ जीवात्मा ही कर्ता है (गीता १५। ७, ९)। सम्बन्ध — प्रकारान्तरसे जीवात्माका कर्तापन सिद्ध करते हैं—

२३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

२३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्यपदेशाच्च क्रियायां न चेन्निर्देशविपर्ययः ॥ २ । ३ । ३६ ॥ क्रियायाम् = क्रिया करनेमें; व्यपदेशात् = जीवात्माके कर्तापनका श्रुतिमें कथन है, इसलिये; च = भी (जीवात्मा कर्ता है); चेत् = यदि; न = जीवात्माको कर्ता बताना अभीष्ट न होता तो; निर्देशविपर्ययः = श्रुतिका संकेत उसके विपरीत होता। व्याख्या—श्रुतिमें कहा है कि 'विज्ञानं यज्ञं तनुते। कर्माणि तनुतेऽपि च।' (तै० उ० २।५) अर्थात् 'यह जीवात्मा यज्ञका विस्तार करता है और उसके लिये कर्मोंका विस्तार करता है।' इस प्रकार जीवात्माको कर्मोंका विस्तार करनेवाला कहा जानेके कारण उसका कर्तापन सिद्ध होता है। यदि कहो 'विज्ञान' शब्द बुद्धिका वाचक है, अतः यहाँ बुद्धिको ही कर्ता बताया गया है तो यह कहना उस प्रसंगके विपरीत होगा; क्योंकि वहाँ विज्ञानमयके नामसे जीवात्माका ही प्रकरण है। यदि 'विज्ञान' नामसे बुद्धिको ग्रहण करना अभीष्ट होता तो मन्त्रमें 'विज्ञान' शब्दके साथ प्रथमा विभक्तिका प्रयोग न होकर करणद्योतक तृतीया विभक्तिका प्रयोग होता। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जीव यदि स्वतन्त्र कर्ता है, तब तो इसे अपने हितका ही काम करना चाहिये, अनिष्टकार्यमें इसकी प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिये; किंतु ऐसा नहीं देखा जाता, इसका क्या कारण है? इसपर कहते हैं— उपलब्धिवदनियमः ॥ २ । ३ । ३७ ॥ उपलब्धिवत् = सुख-दुःखादि भोगोंकी प्राप्तिकी भाँति; अनियमः = कर्म करनेमें भी नियम नहीं है। व्याख्या—जिस प्रकार इस जीवात्माको सुख-दुःख आदि भोगोंकी प्राप्ति होती है, उसमें यह निश्चित नियम नहीं है कि उसे अनुकूल-ही- अनुकूल भोग प्राप्त हों, प्रतिकूल न हों; इसी प्रकार कर्म करनेमें भी यह नियम नहीं है कि वह अपने हितकारक ही कर्म करे, अहितकारक न करे।

सूत्र ३८ ] अध्याय २ २३३

सूत्र ३८ ] अध्याय २ २३३ यदि कहो कि फल-भोगमें तो जीव प्रारब्धके कारण स्वतन्त्र नहीं है, उसके प्रारब्धानुसार परमेश्वरके विधानसे जैसे भोगोंका मिलना उचित होता है, वैसे भोग मिलते हैं; परंतु नये कर्मोंके करनेमें तो वह स्वतन्त्र है; फिर अहितकर कर्ममें प्रवृत्त होना कैसे उचित है, तो इसका उत्तर यह है कि वह जिस प्रकार फल भोगनेमें प्रारब्धके अधीन है, वैसे ही नये कर्म करनेमें अनादिकालसे संचित कर्मोंके अनुसार जो जीवात्माका स्वभाव बना हुआ है, उसके अधीन है; इसलिये यह सर्वथा हितमें ही प्रयुक्त हो, ऐसा नियम नहीं हो सकता। अतः कोई विरोध नहीं है। भगवान्का आश्रय लेकर यदि यह प्रभुकी कृपासे मिले हुए विवेकका आदर करे, प्रमाद न करे तो बड़ी सुगमतासे अपने स्वभावका सुधार कर सकता है। उसका पूर्णतया सुधार हो जानेपर अहितकारक कर्मोंमें होनेवाली प्रवृत्ति बंद हो सकती है। सम्बन्ध — उपर्युक्त कथनकी पुष्टिके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं— शक्तिविपर्ययात् ॥ २।३।३८ ॥ शक्तिविपर्ययात् = शक्तिका विपर्यय होनेके कारण भी (विवेकका आदर किये बिना उसके द्वारा सर्वथा हिताचरण होनेका नियम नहीं हो सकता)। व्याख्या — जीवात्माका जो कर्तापन है, वह स्वरूपसे नहीं है; किंतु अनादि कर्मसंस्कार तथा इन्द्रियों और शरीर आदिके सम्बन्धसे है यह बात पहले बता आये हैं। इसलिये वह नियमितरूपसे अपने हितका आचरण नहीं कर सकता; क्योंकि प्रत्येक काम करनेमें सहकारी कारणोंकी और बाह्य सामग्रीकी आवश्यकता होती है, उन सबकी उपलब्धिमें यह सर्वथा परतन्त्र है एवं अन्तःकरणकी, इन्द्रियोंकी और शरीरकी शक्ति भी कभी अनुकूल हो जाती है और कभी प्रतिकूल हो जाती है। इस प्रकार शक्तिका विपर्यय होनेके कारण भी विवेकका आदर किये बिना जीवात्मा अपने हितका आचरण करनेमें सर्वथा स्वतन्त्र नहीं है।

२३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

२३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि जीवात्माका कर्तापन उसमें स्वरूपसे ही मान लिया जाय तो क्या हानि है? इसपर कहते हैं— समाध्यभावाच्च ॥ २।३।३९॥ समाध्यभावात्=समाधि-अवस्थाका अभाव प्राप्त होनेसे; च=भी (जीवात्माका कर्तापन स्वाभाविक नहीं मानना चाहिये)। व्याख्या—समाधि-अवस्थामें कर्मोंका सर्वथा अभाव हो जाता है। यदि जीवमें कर्तापन उसका स्वाभाविक धर्म मान लिया जायगा तो समाधि-अवस्थाका होना सिद्ध नहीं होगा, क्योंकि जिस प्रकार जीवात्मामें चेतनता स्वरूपगत धर्म है, उसी प्रकार यदि कर्म भी हो तो वह कभी भी निष्क्रिय नहीं हो सकता; किंतु वास्तवमें ऐसी बात नहीं है; जीवात्माका स्वरूप निष्क्रिय माना गया है; (श्वेता० ६।१२) अतः उसमें जो कर्तापन है, वह अनादिसिद्ध अन्तःकरण आदिके सम्बन्धसे है, स्वरूपगत नहीं है। सम्बन्ध—इस बातको दृढ़ करनेके लिये फिर कहा जाता है— यथा च तक्षोभयथा ॥ २।३।४०॥ च=इसके सिवा; यथा=जैसे; तक्षा=कारीगर; उभयथा=कभी कर्म करता है, कभी नहीं करता, ऐसे दो प्रकारकी स्थितिमें देखा जाता है (उसी प्रकार जीवात्मा भी दोनों प्रकारकी स्थितिमें रहता है, इसलिये उसका कर्तापन स्वरूपगत नहीं है)। व्याख्या—जिस प्रकार रथ आदि वस्तुओंको बनानेवाला कारीगर जब अपने सहकारी नाना प्रकारके हथियारोंसे सम्पन्न होकर कार्यमें प्रवृत्त होता है, तब तो वह उस कार्यका कर्ता है और जब हथियारोंको अलग रखकर चुपचाप बैठ जाता है, तब उस क्रियाका कर्ता नहीं है। इस प्रकार यह जीवात्मा भी जब अन्तःकरण और इन्द्रियोंका अधिष्ठाता होता है, तब तो उनके द्वारा किये जानेवाले कर्मोंका वह कर्ता है और जब उनसे सम्बन्ध छोड़ देता है, तब कर्ता नहीं

सूत्र ४० ] अध्याय २ २३५

सूत्र ४० ] अध्याय २ २३५ है। अतः जीवात्माका कर्तापन स्वभावसिद्ध नहीं है। इसके सिवा, यदि जीवात्माको स्वरूपसे कर्ता मान लिया जाय तो श्रीमद्भगवद्गीताका निम्नलिखित वर्णन सर्वथा असंगत ठहरेगा— प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥ 'हे अर्जुन ! वास्तवमें सम्पूर्ण कर्म प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये हुए हैं, तो भी जो अहंकारसे मोहित हो गया है वह पुरुष 'मैं कर्ता हूँ' ऐसे मान लेता है।' (गीता ३। २७) नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्। पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ॥ प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥ 'हे अर्जुन! तत्त्वको जाननेवाला योगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ; सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखोंको खोलता और मीचता हुआ भी सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थोंमें बर्त रही हैं, इस प्रकार समझता हुआ, निःसंदेह ऐसे माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ।' (गीता ५। ८-९) प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः। यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति॥ 'जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मोंको सब प्रकारसे प्रकृतिके ही किये हुए देखता है अर्थात् इस बातको तत्त्वसे समझ लेता है कि प्रकृतिसे उत्पन्न हुए सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बर्तते हैं तथा आत्माको अकर्ता देखता है, वही देखता है।' (गीता १३। २९)

२३६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ इसी प्रकार भगवद्गीतामें जगह-जगह जीवात्मामें कर्तापनका निषेध किया है, इससे यही सिद्ध होता है कि जीवात्माका कर्तापन अन्तःकरण और संस्कारोंके सम्बन्धसे है, केवल शुद्ध आत्मामें कर्तापन नहीं है। (गीता १८। १६) सम्बन्ध- पूर्वसूत्रोंसे यह निश्चय किया गया कि प्रकृति स्वतन्त्र कर्ता नहीं है तथा जीवात्माका जो कर्तापन है वह भी बुद्धि, मन और इन्द्रिय आदिके सम्बन्धसे है; स्वभावसे नहीं है, इस कारण यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि उपर्युक्त जीवात्माका कर्तापन स्वाधीन है या पराधीन, इसपर कहते हैं- परात्तु तच्छ्रुतेः ॥ २ । ३ । ४१ ॥ तत्=वह जीवात्माका कर्तापन; परात्=परमेश्वरसे; तु=ही है; श्रुतेः= क्योंकि श्रुतिके वर्णनसे यही सिद्ध होता है। व्याख्या- बृहदारण्यकमें कहा है कि 'जो जीवात्मामें रहकर उसका नियमन करता है, वह अन्तर्यामी तेरा आत्मा है' (३।७।२२); छान्दोग्यमें कहा है कि 'मैं इस जीवात्माके सहित प्रविष्ट होकर नाम-रूपको प्रकट करूँगा। (६। ३। २) तथा केनोपनिषद्में जो यक्षकी आख्यायिका है, उसमें भी यह सिद्ध किया गया है कि 'अग्नि और वायु आदि देवताओंमें अपना कार्य करनेकी स्वतन्त्र शक्ति नहीं है, उस परब्रह्मसे शक्ति पाकर ही वे अपना-अपना कार्य करनेमें समर्थ होते हैं।' (३।१-१०) इत्यादि। श्रुतियोंके इस वर्णनसे यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा स्वतन्त्रतापूर्वक कुछ भी नहीं कर सकता, वह जो कुछ करता है, परब्रह्म परमेश्वरके सहयोगसे, उसकी दी हुई शक्तिके द्वारा ही करता है। जीवका कर्तापन ईश्वराधीन है, यह बात गीतामें स्पष्ट कही गयी है- ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ 'हे अर्जुन ! शरीररूपी यन्त्रमें आरूढ़ हुए सब प्राणियोंको अपनी मायासे

सूत्र ४२ ] अध्याय २ २३७

सूत्र ४२ ] अध्याय २ २३७ कर्मोंके अनुसार चलाता हुआ ईश्वर सबके हृदयमें निवास करता है।' (१८।६१) विष्णुपुराणमें जहाँ प्रह्लादका प्रसंग आया है, वहाँ प्रह्लादने अपने पितासे कहा है—'पिताजी! वे भगवान् विष्णु केवल मेरे ही हृदयमें नहीं हैं, अपितु समस्त लोकोंको सब ओरसे व्याप्त करके स्थित हो रहे हैं, वे ही सर्वव्यापी परमेश्वर मुझे और आपके सहित अन्य सब प्राणियोंको भी समस्त चेष्टाओंमें नियुक्त करते हैं।' (विष्णु० १।१७।२६)* इससे भी यह सिद्ध होता है कि जीवात्माका कर्तापन सर्वथा ईश्वराधीन है। यह जो कुछ करता है, उसीकी दी हुई शक्तिसे करता है, तथापि अभिमानवश अपनेको कर्ता मानकर प्राप्त शक्तिका दुरुपयोग करनेके कारण फँस जाता है (गीता ३।२७)। सम्बन्ध— पूर्वसूत्रमें जीवात्माका कर्तापन ईश्वराधीन बताया गया, इसे सुनकर यह जिज्ञासा होती है कि ईश्वर पहले तो जीवोंसे शुभाशुभ कर्म करवाता है और फिर उसका फल-भोग करवाता है, यह माननेसे ईश्वरमें विषमता और निर्दयताका दोष आयेगा, उसका निराकरण कैसे होगा, इसपर कहते हैं— कृतप्रयत्नापेक्षस्तु विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्या- दिभ्यः ॥ २।३।४२ ॥ तु=किंतु; कृतप्रयत्नापेक्षः=ईश्वर जीवके पूर्वकृत कर्म-संस्कारोंकी अपेक्षा रखते हुए ही उसको नवीन कर्म करनेकी शक्ति और सामग्री प्रदान करता है इसलिये तथा; विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः=विधि-निषेध शास्त्रकी सार्थकता आदि हेतुओंसे भी ईश्वर सर्वथा निर्दोष है। व्याख्या—ईश्वरद्वारा जो जीवात्माको नवीन कर्म करनेकी शक्ति और सामग्री दी जाती है, वह उस जीवात्माके जन्म-जन्मान्तरमें संचित किये हुए कर्म-संस्कारोंकी अपेक्षासे ही दी जाती है, बिना अपेक्षाके नहीं तथा उसीके साथ परम सुहृद् प्रभुने उस शक्ति और सामग्रीका सदुपयोग करनेके

  • न केवलं मद्हृदयं स विष्णुराक्रम्य लोकानखिलानवस्थितः । स मां त्वदादींश्च पितः समस्तान् समस्तचेष्टासु युनक्ति सर्वगः ॥

२३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

२३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ लिये मनुष्यको विवेक भी प्रदान किया है एवं उस विवेकको जाग्रत् करनेके लिये शास्त्रमें अच्छे कर्मोंका विधान और बुरे कर्मोंका निषेध भी किया है, इससे यह सिद्ध हो जाता है कि अपने स्वभावका सुधार करनेके लिये मनुष्यको प्रभुने पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान की है अतः ईश्वर सर्वथा निर्दोष है। भाव यह कि मनुष्य जो कुछ भी कर्म करता है वह ईश्वरके सहयोगसे ही कर सकता है इसलिये वह पराधीन अवश्य है। परंतु प्राप्त शक्ति और सामग्रीका सदुपयोग या दुरुपयोग करनेमें पराधीन नहीं है। इसीलिये शुभाशुभ कर्मोंके फलका दायित्व जीवपर है। इस स्वतन्त्रताको भी यदि वह ईश्वरके समर्पण करके सर्वथा उनपर निर्भर हो जाय तो सहजमें ही कर्मबन्धनसे छूट सकता है। इसी भावको स्पष्ट करनेके लिये इस प्रसंगमें भगवान्ने कहा है कि— तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥ अर्थात्—जिस परमेश्वरने कर्म करनेकी शक्ति-सामग्री प्रदान की है, जो तुम्हारे हृदयमें स्थित है और तुम्हारा प्रेरक है उसीकी सब प्रकारसे शरण ग्रहण करो। उसीकी कृपासे परम शान्ति और निश्चल परम धामको प्राप्त होओगे। (गीता १८।६२) सम्बन्ध—पूर्वप्रकरणमें यह सिद्ध किया गया कि जीवात्मा कर्ता है और परमेश्वर उसको कर्मोंमें नियुक्त करनेवाला है, इससे जीवात्मा और परमात्माका भेद सिद्ध होता है। श्रुतियोंमें भी जगह-जगह भेदका प्रतिपादन किया गया है (श्वेता० उ० ४। ६-७), परंतु कहीं-कहीं अभेदका भी प्रतिपादन है (बृह० उ० ४।४।५) तथा समस्त जगत्का कारण एक परब्रह्म परमेश्वर ही बताया गया है, इससे भी अभेद सिद्ध होता है। अतः उक्त विरोधका निराकरण करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवादित्व- मधीयत एके ॥ २।३।४३॥ नानाव्यपदेशात्=श्रुतिमें जीवोंको बहुत और अलग-अलग बताया गया

सूत्र ४३ ] अध्याय २ २३९

सूत्र ४३ ] अध्याय २ २३९ है, इसलिये; च=तथा; अन्यथा=दूसरे प्रकारसे; अपि=भी; (यही सिद्ध होता है कि) अंशः=जीव ईश्वरका अंश है; एके=क्योंकि एक शाखावाले; दाशकितवादित्वम्=ब्रह्मको दाशकितव आदिरूप कहकर; अधीयते=अध्ययन करते हैं। व्याख्या-श्वेताश्वतरोपनिषद् (६। १२-१३)-में कहा है कि- एको वशी निष्क्रियाणां बहूनामेकं बीजं बहुधा यः करोति। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्। तत् कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ 'बहुत-से निष्क्रिय जीवोंपर शासन करनेवाला जो एक परमेश्वर एक बीज (अपनी प्रकृति)-को अनेक प्रकारसे विस्तृत करता है, उस अपने हृदयमें स्थित परमेश्वरको जो ज्ञानीजन निरन्तर देखते हैं, उन्हींको सदा रहनेवाला सुख मिलता है, दूसरोंको नहीं। जो एक नित्य चेतन परब्रह्म परमेश्वर बहुत-से नित्य चेतन जीवोंके कर्मफलभोगोंका विधान करता है, वही सबका कारण है, उस ज्ञानयोग और कर्मयोगद्वारा प्राप्त किये जानेयोग्य परमदेव परमेश्वरको जानकर जीवात्मा समस्त बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है।' इस प्रकार श्रुतिमें जीवोंके नानात्वका प्रतिपादन किया गया है; साथ ही उसको नित्य और चेतन भी कहा गया है और ईश्वरको जगत्का कारण बताया गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि जीवगण परमेश्वरके अंश हैं। केवल इतनेसे ही नहीं, प्रकारान्तरसे भी जीवगण ईश्वरके अंश सिद्ध होते हैं; क्योंकि अथर्ववेदकी शाखावालोंके ब्रह्मसूक्तमें यह पाठ है कि 'ब्रह्म दाशा ब्रह्म दासा ब्रह्मैवेमे कितवाः' अर्थात् 'ये केवट ब्रह्म हैं, दास ब्रह्म हैं तथा ये जुआरी भी ब्रह्म ही हैं।' इस प्रकार जीवोंके बहुत्व और ब्रह्मरूपताका भी वर्णन होनेसे यही सिद्ध होता है कि जीव ईश्वरके अंश हैं। यदि जीवोंको परमेश्वरका अंश न मानकर सर्वथा भिन्न तत्त्व माना जाय तो जो पूर्वोक्त श्रुतियोंमें ब्रह्मको

२४० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

जगत्का एकमात्र कारण कहा गया है और उन दाश, कितवोंको ब्रह्म कहा गया है, उस कथनमें विरोध आयेगा, इसलिये सर्वथा भिन्न तत्त्व नहीं माना जा सकता। इसलिये अंश मानना ही युक्तिसंगत है, किंतु जिस प्रकार साकार वस्तुके टुकड़ोंको उसका अंश कहा जाता है, वैसे जीवोंको ईश्वरका अंश नहीं कहा जा सकता; क्योंकि अवयवरहित अखण्ड परमेश्वरके खण्ड नहीं हो सकते। अतएव कार्यकारणभावसे ही जीवोंको परमेश्वरका अंश मानना उचित है तथा वह कार्यकारणभाव भी इसी रूपमें है कि प्रलयकालमें अव्यक्तरूपसे परब्रह्म परमेश्वरमें विलीन रहनेवाले नित्य और चेतन जीव, सृष्टिकालमें उसी परमेश्वरसे प्रकट हो जाते हैं और पुनः संहारके समय उन्हींमें उन जीवोंका लय होता है तथा उनके शरीरोंकी उत्पत्ति भी उस ब्रह्मसे ही होती है। यह बात श्रीमद्भगवद्गीतामें इस प्रकार स्पष्ट की गयी है— मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्। सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ 'हे अर्जुन ! मेरी महत् ब्रह्मरूप प्रकृति अर्थात् त्रिगुणमयी माया सम्पूर्ण भूतोंकी योनि है अर्थात् गर्भाधानका स्थान है और मैं उस योनिमें चेतनरूप बीजको स्थापित करता हूँ, उस जड-चेतनके संयोगसे सब भूतोंकी उत्पत्ति होती है। तथा हे अर्जुन ! नाना प्रकारकी सब योनियोंमें जितनी मूर्तियाँ अर्थात् शरीर उत्पन्न होते हैं, उन सबकी त्रिगुणमयी मेरी प्रकृति तो गर्भको धारण करनेवाली माता है और मैं बीजको स्थापित करनेवाला पिता हूँ।' (गीता १४। ३-४) इसलिये पिता और संतानकी भाँति जीवोंको ईश्वरका अंश मानना ही शास्त्रके कथनानुसार ठीक मालूम होता है और ऐसा होनेसे जीव तथा ब्रह्मका अभेद कहनेवाली श्रुतियोंकी भी सार्थकता हो जाती है। सम्बन्ध—प्रमाणान्तरसे जीवके अंशत्वको सिद्ध करते हैं—

अधिक भी है, समस्त जीवसमुदाय इस परब्रह्मका एक पाद (अंश) है

सूत्र ४४-४५ ] अध्याय २ २४१ मन्त्रवर्णाच्च ॥ २ । ३ । ४४ ॥ मन्त्रवर्णात् = मन्त्रके शब्दोंसे; च = भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—मन्त्रमें कहा है कि पहले जो कुछ वर्णन किया गया है उतना तो इस परब्रह्म परमेश्वरका महत्त्व है ही; वह परमपुरुष उससे अधिक भी है, समस्त जीवसमुदाय इस परब्रह्मका एक पाद (अंश) है और इसके तीन पाद अमृतस्वरूप दिव्य (सर्वथा अलौकिक अपने ही विज्ञानानन्दस्वरूपमें) हैं,* (छा० उ० ३।१२।६)। इस प्रकार मन्त्रके शब्दोंमें स्पष्ट ही समस्त जीवोंको ईश्वरका अंश बताया गया है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि जीवगण परमेश्वरके अंश हैं। सम्बन्ध— उसी बातको स्मृतिप्रमाणसे सिद्ध करते हैं— अपि च स्मर्यते ॥ २ । ३ । ४५ ॥ अपि=इसके सिवा; स्मर्यते च=(भगवद्गीता आदिमें) यही स्मरण भी किया गया है। व्याख्या—यह बात केवल मन्त्रमें ही नहीं कही गयी है, अपितु गीता (१५।७)-में साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने भी इसका अनुमोदन किया है— ‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।’ ‘इस जीवलोकमें यह जीवसमुदाय मेरा ही अंश है।’ इसी प्रकार दसवें अध्यायमें अपनी मुख्य- मुख्य विभूतियों अर्थात् अंशसमुदायका वर्णन करके अन्त (१०।४२)- में कहा है कि— अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन। विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥ ‘अर्जुन! तुझे इस बहुत भेदोंको अलग-अलग जाननेसे क्या प्रयोजन है, तू बस इतना ही समझ ले कि मैं अपनी शक्तिके किसी एक अंशसे इस

  • यह मन्त्र पहले पृष्ठ ४० में आ गया है।