वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
प्रतिपादन करते हैं—
सूत्र ३९ ] अध्याय ३ ३१९ सम्बन्ध—अब अन्य धर्मोंकी अपेक्षा भागवतधर्मोंकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करते हैं— अतस्त्वितरज्याय्यो लिंगाच्च ॥ ३।४।३९ ॥ अतः=ऊपर बतलाये हुए इन सभी कारणोंसे (यह सिद्ध हुआ कि); इतरज्ज्यायः=अन्य सब धर्मोंकी अपेक्षा भगवान्की भक्तिविषयक धर्म श्रेष्ठ है; तु=इसके सिवा; लिंगात्=लक्षणोंसे (स्मृति-प्रमाणसे); च=भी (यही सिद्ध होता है)। व्याख्या—ऊपर बतलाये हुए कारणोंसे यह बात सिद्ध हो चुकी कि अन्य सभी प्रकारके धर्मोंसे भगवान्की भक्तिविषयक धर्म अधिक श्रेष्ठ है। इसके सिवा स्मृति-प्रमाणसे भी यही बात सिद्ध होती है। श्रीमद्भागवतमें कहा है— विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ- पादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम्। मन्ये तदर्पितमनोवचनेहितार्थ- प्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमानः॥ ‘बारह प्रकारके गुणोंसे युक्त ब्राह्मण भी यदि भगवान् पद्मनाभके चरण- कमलसे विमुख है तो उसकी अपेक्षा उस चाण्डालको मैं श्रेष्ठ मानता हूँ, जिसके मन, धन, वचन, कर्म और प्राण परमात्माको अर्पित हैं; क्योंकि वह भक्त चाण्डाल अपनी भक्तिके प्रतापसे सारे कुलको पवित्र कर सकता है, परंतु वह बहुत मानवाला ब्राह्मण ऐसा नहीं कर सकता।' (७।९।१०) अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्। तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते॥ ‘अहो! आश्चर्य है कि जिसकी जिह्वापर तुम्हारा पवित्र नाम रहता है, वह चाण्डाल भी श्रेष्ठ है; क्योंकि जो तुम्हारे नामका कीर्तन करते हैं, उन श्रेष्ठ
४०० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
४०० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ पुरुषोंने तप, यज्ञ, तीर्थस्थान और वेदाध्ययन आदि सब कुछ कर लिये।' (श्रीमद्भा० ३।३३।७) इसी प्रकार जगह-जगह भगवान्के भक्तोंके लक्षण बतलाते हुए वर्ण- आश्रम आदिके धर्मका पालन करनेवालोंकी अपेक्षा उनकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन किया गया है। सम्बन्ध- इस प्रकार उपासनाविषयक श्रवण, कीर्तन आदि विशेष धर्मोंका महत्त्व दिखलाया गया। अब यह जिज्ञासा होती है कि यदि कोई मनुष्य किसी कारणवश आश्रमका व्यतिक्रम करना चाहे तो कर सकता है या नहीं? यदि कर ले तो उसका व्यक्तित्व कैसा माना जाना चाहिये? इत्यादि। अतः इस विषयका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं- तद्भूतस्य नातद्भावो जैमिनेरपि नियमात्- द्रूपाभावेभ्यः ॥ ३।४।४०॥ तद्भूतस्य = उच्च आश्रममें स्थित मनुष्यका; [तु =] तो; अतद्भावः = उसे छोड़कर पूर्व आश्रममें लौट आना; न=नहीं बन सकता; नियमात्- द्रूपाभावेभ्यः = क्योंकि शास्त्रोंमें पीछे न लौटनेका ही नियम है, श्रुतिमें आश्रम बदलनेका जो क्रम कहा गया है, उससे यह विपरीत है और इस प्रकारका शिष्टाचार भी नहीं है; जैमिनेः अपि = जैमिनि ऋषिकी भी यही सम्मति है। व्याख्या - जो चतुर्थ आश्रम ग्रहण कर चुके हैं, उनका पुनः गृहस्थाश्रममें लौटना शास्त्रसम्मत नहीं है। इसी प्रकार वानप्रस्थका भी पुनः गृहस्थमें प्रवेश उचित नहीं है; क्योंकि ऊँचे आश्रमोंमें जाकर पुनः लौटनेका श्रुति-स्मृतियोंमें निषेध है तथा आश्रम बदलनेका जो क्रम श्रुतिमें बताया गया है, वह इस प्रकार है- 'ब्रह्मचर्यं परिसमाप्य गृही भवेत्। गृही भूत्वा वनी भवेत्। वनी भूत्वा प्रव्रजेत्। यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद् वा वनाद् वा।'-'ब्रह्मचर्यको पूरा करके गृहस्थ होवे, गृहस्थसे वानप्रस्थ हो और वानप्रस्थसे संन्यास ले अथवा दूसरे प्रकारसे यानी ब्रह्मचर्यसे या गृहस्थसे
सूत्र ४१-४२ ] अध्याय ३ ४०१
सूत्र ४१-४२ ] अध्याय ३ ४०१ अथवा वानप्रस्थसे ही संन्यास ले' (जाबाल० उ० ४)। अतः पीछे लौटना उस क्रमसे विपरीत है। इसके सिवा इस प्रकारका शिष्टाचार भी नहीं है। इन सब कारणोंसे जैमिनि ऋषिकी भी यही सम्मति है कि उच्च आश्रमसे पुनः लौटना नहीं हो सकता। इसलिये यही सिद्ध हुआ कि वेद और स्मृतियोंमें जो एक आश्रमसे दूसरे आश्रममें प्रवेश करनेकी रीति बतायी गयी है, उसको छोड़कर आश्रमका व्यतिक्रम करना किसी प्रकार भी न्यायसंगत नहीं है। सम्बन्ध — इस प्रकारका मनुष्य प्रायश्चित्त कर लेनेपर तो शुद्ध हो जाता होगा ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— न चाधिकारिकमपि पतनानुमानात्तदयोगात् ॥ ३।४।४१ ॥ च=इसके सिवा; आधिकारिकम्=प्रायश्चित्तके अधिकारी अन्य आश्रम- वालोंके लिये जो प्रायश्चित्त बताया गया है, वह; अपि=भी; न=उसके लिये विहित नहीं है; पतनानुमानात्=क्योंकि स्मृतिमें उसका महान् पतन माना गया है; तदयोगात्=इसलिये वह प्रायश्चित्तके उपयुक्त नहीं रहा। व्याख्या—ब्रह्मचर्य-आश्रममें यदि ब्रह्मचारीका व्रत भंग हो जाय तो वेद और स्मृतियोंमें उसका प्रायश्चित्त बताया गया है (मनु० २।१८१) तथा गृहस्थ भी ऋतुकाल आदिका नियमपालन भंग कर दे तो उसका प्रायश्चित्त है; क्योंकि वे प्रायश्चित्तके अधिकारी हैं। परंतु जिन्होंने वानप्रस्थ या संन्यास आश्रम स्वीकार कर लिया, वे यदि पुनः गृहस्थ आश्रममें लौटकर स्त्री- प्रसंगादिमें प्रवृत्त होकर पतित हो गये हैं तो उनके लिये शास्त्रोंमें किसी प्रकारके प्रायश्चित्तका विधान नहीं है; क्योंकि स्मृतियोंमें उनका अतिशय पतन माना गया है। इसलिये वे प्रायश्चित्तके अधिकारी नहीं रहे। जैमिनि आचार्यकी भी सूत्रकारके मतानुसार यही सम्मति है कि उनके लिये प्रायश्चित्तका विधान नहीं है। सम्बन्ध—इसपर अन्य आचार्योंका मत बताते हैं— उपपूर्वमपि त्वेके भावमशनवत्तदुक्तम् ॥ ३ । ४ । ४२ ॥ एके=कई एक आचार्य; तु=तो; उपपूर्वम्=इसे उपपातक; अपि=भी
४०२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ मानते हैं, (इसलिये वे); अशनवत् = भोजनके नियमभंगके प्रायश्चित्तकी भाँति; भावम् = इसके लिये भी प्रायश्चित्तका भाव मानते हैं; तदुक्तम् = यह बात शास्त्रमें कही है (यह भी उनका कहना है)। व्याख्या—कई एक आचार्योंका कहना है कि जिस प्रकार ब्रह्मचारी अपने व्रतसे भ्रष्ट होकर प्रायश्चित्तका अधिकारी होता है, वैसे ही वानप्रस्थी और संन्यासियोंका भी प्रायश्चित्तमें अधिकार है; क्योंकि यह महापातक नहीं है, किंतु उपपातक है और उपपातकके प्रायश्चित्तका शास्त्रमें विधान है ही। अतः अभक्ष्य-भक्षण आदिके प्रायश्चित्तकी भाँति इसका भी प्रायश्चित्त अवश्य होना उचित है। सम्बन्ध—इसपर आचार्य अपनी सम्मति बताते हैं— बहिस्तूभयथापि स्मृतेराचाराच्च ॥ ३।४।४३॥ तु = किंतु; उभयथापि = दोनों प्रकारसे ही; बहिः = वह अधिकारसे बहिष्कृत है; स्मृतेः = क्योंकि स्मृतिप्रमाणसे; च = और; आचारात् = शिष्टाचारसे भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—वे उच्च आश्रमसे पतित हुए संन्यासी और वानप्रस्थी लोग महापातकी हों या उपपातकी, दोनों प्रकारसे ही शिष्ट सम्प्रदाय और वैदिक ब्रह्मविद्याके अधिकारसे सर्वथा बहिष्कृत हैं; क्योंकि स्मृतिप्रमाण और शिष्टोंके आचार-व्यवहारसे यही बात सिद्ध होती है। उनका पतन भोगोंकी आसक्तिसे ही होता है। अतः वे ब्रह्मविद्याके अधिकारी नहीं हैं। श्रेष्ठ पुरुष उनके साथ यज्ञ, स्वाध्याय और विवाह आदि सम्बन्ध भी नहीं करते हैं। सम्बन्ध—इस प्रकार उच्च आश्रमसे भ्रष्ट हुए द्विजोंका विद्यामें अधिकार नहीं है, यह सिद्ध किया गया। अब जो कर्मोंके अंगभूत उद्गीथ आदिमें उपासना की जाती है, उसका कर्ता यजमान होता है या कर्म करनेवाला ऋत्विक्—इसपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
सूत्र ४४-४५ ] अध्याय ३ ४०३
सूत्र ४४-४५ ] अध्याय ३ ४०३ स्वामिनः फलश्रुतेरित्यात्रेयः ॥ ३ । ४ । ४४ ॥ स्वामिनः=उस उपासनामें यजमानका ही कर्तापन है; इति=ऐसा; आत्रेयः=आत्रेय मानते हैं; फलश्रुतेः=क्योंकि श्रुतिमें यजमानके लिये ही फलका वर्णन किया गया है। व्याख्या—आत्रेय ऋषि मानते हैं कि श्रुतिमें 'जो इस उपासनाको इस प्रकार जानता है, वह पुरुष वृष्टिमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करता है, उसके लिये वर्षा होती है, वह वर्षा करानेमें समर्थ होता है।' (छा० उ० २। ३।२) बृहदारण्यकोपनिषद्में प्रस्तोताद्वारा की जानेवाली अनेक प्रार्थनाओंका उल्लेख करके अन्तमें उद्गाताका कर्म बताते हुए कहा है कि 'उद्गाता अपने या यजमानके लिये जिसकी कामना करता है, उसका आगान करता है' (बृह० उ० १।३।३८)। इस प्रकार फलका वर्णन करनेवाली श्रुतियोंसे सिद्ध होता है कि यज्ञके स्वामीको उसका फल मिलता है, अतएव इन फल-कामनायुक्त उपासनाओंका कर्तापन भी स्वामीका अर्थात् यजमानका ही होना उचित है। सम्बन्ध — इसपर दूसरे आचार्यका मत कहते हैं- आर्त्विज्यमित्यौडुलोमिस्तस्मै हि परिक्रीयते ॥ ३ । ४ । ४५ ॥ आर्त्विज्यम्=कर्तापन ऋत्विक्का है; इति=ऐसा; औडुलोमिः=औडुलोमि आचार्य मानते हैं; हि=क्योंकि; तस्मै = उस कर्मके लिये, परिक्रीयते = वह ऋत्विक् यजमानद्वारा धनदानादिसे वरण कर लिया जाता है। व्याख्या- आचार्य औडुलोमि ऐसा मानते हैं कि कर्तापन यजमानका नहीं, किंतु ऋत्विक्का ही है; तथापि फल यजमानको मिलता है, क्योंकि वह ऋत्विक् उस कर्मके लिये यजमानके द्वारा धनदानादिसे वरण कर लिया जाता है। अतः वह दाताद्वारा दी हुई दक्षिणाका ही अधिकारी है; उसका फलमें अधिकार नहीं है। सम्बन्ध - सूत्रकार श्रुतिप्रमाणसे अपनी सम्मति प्रकट करते हैं-
४०४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
४०४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ श्रुतेश्च ॥ ३ । ४ । ४६ ॥ श्रुतेः=श्रुतिप्रमाणसे; च=भी (औडुलोमिका ही मत उचित सिद्ध होता है) । व्याख्या—यज्ञका ऋत्विक् जो कुछ भी कामना करता है, वह निःसंदेह यजमानके लिये ही करता है (शत० १।३।१।१६), इसलिये इस प्रकार जाननेवाला उद्गाता यजमानसे कहे कि 'मैं तेरे लिये किन-किन भोगोंका आगान करूँ' (छा० उ० १।७।८) इत्यादि श्रुतियोंसे भी कर्मका कर्तापन ऋत्विक्का और फलमें अधिकार यजमानका सिद्ध होता है। सम्बन्ध—इस प्रकार प्रसंगानुसार सकाम उपासनाके फल और कर्तापनका निर्णय किया गया। अब ब्रह्मविद्याका अधिकार किसी एक ही आश्रममें है या सभी आश्रमोंमें? इस बातका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— सहकार्यन्तरविधिः पक्षेण तृतीयं तद्वतो विध्यादिवत् ॥ ३ । ४ । ४७ ॥ तद्वतः=ब्रह्मविद्यासम्बन्धी साधनयुक्त साधकके लिये; तृतीयम्= बालकपन और पाण्डित्यके साथ कहा हुआ जो तीसरा मौन साधन है, वह विधेय है; सहकार्यन्तरविधिः=(क्योंकि) उसका दूसरे सहकारी साधनके रूपमें विधान है; विध्यादिवत्=दूसरे स्थलमें कहे हुए विधिवाक्योंकी भाँति; पक्षेण=एक पक्षको लेकर यह भी विधि है। व्याख्या—कहोलने याज्ञवल्क्यसे साक्षात् परब्रह्मका स्वरूप पूछा; उसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने सबके अन्तरात्मा परमात्माका स्वरूप संकेतसे बताकर कहा कि 'जो शोक, मोह, भूख, प्यास, बुढ़ापा और मृत्युसे अतीत है, वह परमात्मा है, ऐसे इस परमात्माको जानकर ब्राह्मण पुत्रकामना, धन- कामना तथा मान-बड़ाई और स्वर्गसम्बन्धी लोककामनासे विरक्त होकर भिक्षासे निर्वाह करनेवाले मार्गसे विचरता है।' इसके बाद इन तीनों कामनाओंकी एकता करके कामनामात्रको त्याज्य बताया और अन्तमें कहा कि 'वह ब्राह्मण उस पाण्डित्यको भलीभाँति समझकर बाल्यभावसे
सूत्र ४८ ] अध्याय ३ ४०५
सूत्र ४८ ] अध्याय ३ ४०५ स्थित रहनेकी इच्छा करे, फिर उससे भी उपरत होकर मुनि हो जाय, फिर वह मौन और अमौन—दोनोंसे उपरत होकर ब्राह्मण हो जाता है अर्थात् ब्रह्मको भलीभाँति प्राप्त हो जाता है' इत्यादि (बृह० उ० ३।५।१)। इस प्रकरणमें संन्यास-आश्रममें परमात्माकी प्राप्तिका वर्णन किया गया। इस वर्णनमें पाण्डित्य और बाल्यभावके अन्तमें तो 'तिष्ठासेत्' (स्थित रहनेकी इच्छा करे) यह विधिवाक्य है, परंतु मुनि शब्दके बाद कोई विधि नहीं है, इसलिये सूत्रकारका कहना है कि जिस प्रकार अन्यत्र कहे हुए वचनोंमें स्पष्ट विधिका प्रयोग न होनेपर सहकारीभावसे एकके लिये प्रयुक्त विधिवाक्य दूसरेके लिये भी मान लिये जाते हैं, वैसे ही यहाँ भी पाण्डित्य और बाल्यभाव—इन दो सहकारी साधनोंसे युक्त साधकके प्रति उनके साथ कहे हुए इस तीसरे साधन मुनिभावके लिये भी विधिवाक्यका प्रयोग पक्षान्तरसे समझ लेना चाहिये। ध्यान रहे, इस प्रकरणमें आये हुए बाल्यभावसे तो दम्भ, मान आदि विकारोंका अभाव दिखाया गया है और मननशीलताको मौन कहा गया है। अतः ब्रह्मका शास्त्रीय ज्ञान (पाण्डित्य), उक्त विकारोंका अभाव (बाल्य- भाव) और निरन्तर मनन तथा निदिध्यासन (मौन) इन तीनोंकी परिपक्व- अवस्था होनेसे ही ब्रह्मसाक्षात्कार होता है, यही इस प्रकरणका भाव है। सम्बन्ध—पूर्व सूत्रमें जिस प्रकरणपर विचार किया गया है; वह संन्यास- आश्रमका द्योतक है, अतः यह जिज्ञासा होती है कि संन्यास-आश्रममें ही ब्रह्मविद्याका साधन हो सकता है या अन्य आश्रमोंमें भी उसका अधिकार है। यदि संन्यास-आश्रममें ही उसका साधन हो सकता है तो (छा० उ० ८।१५। १ की) श्रुतिमें गृहस्थ-आश्रमके साथ-साथ ब्रह्मविद्याका प्रकरण क्यों समाप्त किया गया है। वहाँके वर्णनसे तो गृहस्थका ही अधिकार स्पष्टरूपसे सूचित होता है, अतः इसका निर्णय करनेके लिये कहते हैं— कृत्स्नभावात्तु गृहिणोपसंहारः ॥ ३।४।४८॥ कृत्स्नभावात्=गृहस्थ-आश्रममें सम्पूर्ण आश्रमोंका भाव है, इसलिये;
४०६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
४०६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ तु = ही; गृहिणा = (उस प्रकरणमें) गृहस्थ आश्रमके साथ; उपसंहारः = ब्रह्म- विद्याके प्रकरणका उपसंहार किया गया है। व्याख्या-गृहस्थ-आश्रमके चारों आश्रमोंका भाव है; क्योंकि ब्रह्मचारी भी गृहस्थ-आश्रममें स्थित गुरुके पास ही ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करता है, वानप्रस्थ और संन्यासीका भी मूल गृहस्थ ही है। इस प्रकार चारों आश्रमोंका गृहस्थमें अन्तर्भाव है और ब्रह्मविद्याका अधिकार सभी आश्रमोंमें है, यह भी श्रुतिका अभिप्राय है, इसलिये वहाँ उस प्रकरणका गृहस्थके वर्णनके साथ-साथ उपसंहार किया गया है तथा पूर्व प्रकरणमें जो संन्यास-आश्रमका संकेत है, वह साधनोंकी सुगमताको लक्ष्य करके कहा गया है; क्योंकि किसी भी आश्रममें स्थित साधकको ब्रह्मज्ञानसम्पादनके लिये पुत्रैषणा आदि सभी प्रकारकी कामनाओं तथा रागद्वेषादि विकारोंका सर्वथा नाश करके मननशील तो होना ही पड़ेगा। दूसरे आश्रमोंमें विघ्नोंकी अधिकता है और संन्यास-आश्रममें स्वभावसे ही उनका अभाव है। इस सुगमताको दृष्टिमें रखकर वैसा कहा गया है, न कि अन्य आश्रमोंमें ब्रह्मविद्याके अधिकारका निषेध करनेके लिये। सम्बन्ध - प्रकारान्तरसे पुनः सभी आश्रमोंमें ब्रह्मविद्याका अधिकार सिद्ध किया जाता है— मौनवदितरेषामप्युपदेशात् ॥ ३।४।४९ ॥ इतरेषाम् = अन्य आश्रमवालोंके लिये; अपि = भी; मौनवत् = मनन- शीलताकी भाँति; उपदेशात् = (विद्योपयोगी सभी साधनोंका) उपदेश होनेके कारण (सभी आश्रमोंमें ब्रह्मविद्याका अधिकार सिद्ध होता है।) व्याख्या - जिस प्रकार पूर्व प्रकरणमें मननशीलता (मौन)-रूप साधनका सबके लिये विधान बताया गया है, इसी प्रकार श्रुतिमें अन्य आश्रमवालोंके लिये भी विद्योपयोगी सभी साधनोंका उपदेश दिया गया है। जैसे—'इस प्रकार ब्रह्मवेत्ताकी महिमाको जाननेवाला शान्त (मनको वशमें करनेवाला मननशील), दान्त (इन्द्रियसमुदायको वशमें करनेवाला), उपरत (भोगोंसे
सूत्र ५० ] अध्याय ३ ४०७
सूत्र ५० ] अध्याय ३ ४०७ सम्बन्धरहित), तितिक्षु (सुख-दुःखसे विचलित न होनेवाला) और समाहित (ध्यानस्थ) होकर अपने ही भीतर उस सबके आत्मस्वरूप परमात्माका साक्षात्कार करता है।' (बृह० उ० ४।४।२३) ऐसी ही बात दूसरे प्रकरणोंमें भी कही है। इससे यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्याका अधिकार सभी आश्रमोंमें है। सम्बन्ध - सैंतालीसवें सूत्रके प्रकरणमें जो बाल्यभावसे स्थित होनेकी बात कही गयी थी, उसमें बालकके कौन-से भावोंका ग्रहण है, यह स्पष्ट करनेके लिये कहते हैं- अनाविष्कुर्वन्नन्वयात् ॥ ३।४।५० ॥ अनाविष्कुर्वन् = अपने गुणोंको प्रकट न करता हुआ बालककी भाँति दम्भ और अभिमानसे रहित होवे; अन्वयात् = क्योंकि ऐसे भावोंका ही ब्रह्म- विद्यासे सम्बन्ध है। व्याख्या - अपने गुणोंको प्रकट न करते हुए बालकके भावको स्वीकार करनेके लिये श्रुतिका कहना है; अतः जैसे बालकमें मान, दम्भ तथा राग- द्वेष आदि विकारोंका प्रादुर्भाव नहीं तथा गुणोंका अभिमान या उनको प्रकट करनेका भाव नहीं है उसी प्रकार उन विकारोंसे रहित होना ही यहाँ बाल्यभाव है। अपवित्र-भक्षण, आचारहीनता, अशौच और स्वेच्छाचारिता आदि निषिद्ध भावोंको ग्रहण करना यहाँ अभीष्ट नहीं है; क्योंकि विद्याके सहकारी साधन- रूपसे श्रुतिमें बाल्यभावका उल्लेख हुआ है। अतः उसके उपयोगी भाव ही लिये जा सकते हैं, विरोधी भाव नहीं। इससे श्रुतिका यही भाव मालूम होता है कि ब्रह्मविद्याका साधक बालककी भाँति अपने गुणोंका प्रदर्शन न करता हुआ दम्भ, अभिमान तथा राग-द्वेष आदिसे रहित होकर विचरे। सम्बन्ध - यहाँतक यह निश्चय किया गया कि सभी आश्रमोंमें ब्रह्मविद्याका अधिकार है। अब यह जिज्ञासा होती है कि शास्त्रोंमें जो ब्रह्मविद्याका फल जन्म-मृत्यु आदि दुःखोंसे छूटना और परमात्माको प्राप्त हो जाना बताया गया है, वह इसी जन्ममें प्राप्त हो जाता है या जन्मान्तरमें ? इसपर कहते हैं-
४०८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
४०८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनात् ॥ ३।४।५१ ॥ अप्रस्तुतप्रतिबन्धे=किसी प्रकारका प्रतिबन्ध उपस्थित न होनेपर; ऐहिकम् = इसी जन्ममें वह फल प्राप्त हो सकता है; अपि= (प्रतिबन्ध होनेपर) जन्मान्तरमें भी हो सकता है; तद्दर्शनात् = क्योंकि यही बात श्रुतियों और स्मृतियोंमें देखी जाती है। व्याख्या - श्रुतिमें कहा गया है कि गर्भमें स्थित वामदेव ऋषिको ब्रह्मभावकी प्राप्ति हो गयी थी। (ऐ० उ० २।५) भगवद्गीतामें कहा है कि 'न हि कल्याणकृत् कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ॥' 'कल्याणमय कर्म अर्थात् परमात्माकी प्राप्तिके लिये साधन करनेवालेकी कभी दुर्गति नहीं होती' (६।४०) । 'किंतु वह दूसरे जन्ममें पूर्वजन्म-सम्बन्धी शरीरद्वारा प्राप्त की हुई बुद्धिसे युक्त हो जाता है और पुनः परमात्माकी प्राप्तिके साधनमें लग जाता है। * (गीता ६। ४३) इस प्रकार श्रुतियों और स्मृतियोंके प्रमाणोंको देखनेसे यही सिद्ध होता है कि यदि किसी प्रकारका कोई प्रतिबन्ध उपस्थित नहीं होता, तब तो इसी जन्ममें उसको मुक्तिरूप फलकी प्राप्ति हो जाती है और यदि कोई विघ्न पड़ जाता है तो जन्मान्तरमें वह फल मिलता है। तथापि यह निश्चय है कि किया हुआ अभ्यास व्यर्थ नहीं जाता। सम्बन्ध - उपर्युक्त ब्रह्मविद्याका मुक्तिरूप फल किसी प्रकारका प्रतिबन्ध न रहनेके कारण जिस साधकको इसी जन्ममें मिलता है, उसे यहाँ मृत्युलोकमें ही मिल जाता है या लोकान्तरमें जाकर मिलता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं- एवं मुक्तिफलानियमस्तदवस्थावधृतेस्त- दवस्थावधृतेः ॥ ३।४।५२ ॥ एवम् = इसी तरह; मुक्तिफलानियमः = किसी एक लोकमें ही मुक्तिरूप फल प्राप्त होनेका नियम नहीं है; तदवस्थावधृतेः = क्योंकि
- तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥
सूत्र ५२ ] अध्याय ३ ४०९
सूत्र ५२ ] अध्याय ३ ४०९ उसकी अवस्था निश्चित की गयी है; तदवस्थावधृतेः=उसकी अवस्था निश्चित की गयी है। (इस कथनकी पुनरावृत्ति अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है)। व्याख्या—ब्रह्मविद्यासे मिलनेवाले मुक्तिरूप फलके विषयमें जिस प्रकार यह नियम नहीं है कि 'वह इसी जन्ममें मिलता है या जन्मान्तरमें।' उसी प्रकार उसके विषयमें यह भी नियम नहीं है कि वह इस लोकमें मिलता है या ब्रह्मलोकमें? क्योंकि 'जब इसके हृदयमें स्थित समस्त कामनाओंका सर्वथा अभाव हो जाता है, तब वह साधक अमृत हो जाता है और यहीं ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।' (क० उ० २।३।१४)* इत्यादि वचनोंद्वारा श्रुतिमें मुक्तावस्थाका स्वरूप निश्चित किया गया है। अतः जिसको वह स्थिति शरीरके रहते-रहते प्राप्त हो जाती है, वह तो यहीं परमात्माको प्राप्त हो जाता है और जिसकी वैसी अवस्था यहाँ नहीं होती, वह ब्रह्मलोकमें जाकर परमात्माको प्राप्त हो जाता है। चौथा पाद सम्पूर्ण श्रीवेदव्यास रचित वेदान्त-दर्शन (ब्रह्मसूत्र)-का तीसरा अध्याय पूरा हुआ।
- यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥
चौथा अध्याय
॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥ चौथा अध्याय पहला पाद तीसरे अध्यायमें परमात्माकी प्राप्तिके भिन्न-भिन्न साधनोंको बतलानेवाली श्रुतियोंपर विचार किया गया; अब उन उपासनाओंके फलविषयक श्रुतियोंपर विचार करनेके लिये फलाध्याय नामक चौथा अध्याय आरम्भ किया जाता है। यहाँपर यह जिज्ञासा होती है कि पूर्वोक्त उपासनाएँ गुरुद्वारा अध्ययन कर लेनेमात्रसे ही अपना फल देनेमें समर्थ हैं या उनके साधनोंका बार-बार अभ्यास करना चाहिये? इसपर कहते हैं— आवृत्तिरसकृदुपदेशात् ॥ ४।१।१॥ आवृत्तिः = अध्ययन की हुई उपासनाका आवर्तन (बार-बार अभ्यास) करना चाहिये; असकृदुपदेशात् = क्योंकि श्रुतिमें अनेक बार इसके लिये उपदेश किया गया है। व्याख्या—श्रुतिमें कहा है—'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।'—'वह परमात्मा ही दर्शन करनेयोग्य, सुननेयोग्य, मनन करनेयोग्य और ध्यान करनेयोग्य है' (बृह० उ० ४।५।६)। 'ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः॥' अर्थात् 'विशुद्ध अन्तःकरणवाला साधक उस अवयवरहित परमेश्वरको निरन्तर ध्यान करता हुआ ज्ञानकी निर्मलतासे देखता है' (मु० उ० ३।१।८)। 'उपासते पुरुषं ये ह्यकामास्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः ॥'—जो कामनारहित साधक उस परमपुरुषकी उपासना करते हैं, वे इस रजोवीर्यमय शरीरको अतिक्रमण कर जाते हैं' (मु० उ० ३। २।१)। इस प्रकार जगह-जगह ब्रह्मविद्यारूप उपासनाका
सूत्र २-३ ] अध्याय ४ ४११ अभ्यास करनेके लिये बार-बार उपदेश दिया गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि आचार्यसे भलीभाँति ब्रह्मविद्याका अध्ययन करके उसपर बार-बार विचार करते हुए उस परमात्मामें संलग्न होना चाहिये। सम्बन्ध — प्रकारान्तरसे इसी बातको सिद्ध करते हैं— लिंगाच्च ॥ ४।१।२॥ लिंगात् = स्मृतिके वर्णनरूप लिंग (प्रमाण)-से; च = भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या — भगवद्गीतामें जगह-जगह यह बात कही है कि ‘सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर’—‘सब कालमें मेरा स्मरण कर’ (गीता ८।७)। ‘परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥’ ‘बार-बार चिन्तन करता हुआ साधक परम पुरुषको प्राप्त होता है।’ (गीता ८।८) ‘जो मेरा अनन्य भक्त मुझे नित्य-निरन्तर स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगीके लिये मैं सुलभ हूँ।’* (गीता ८।१४) ‘मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।’ ‘जो मेरे नित्ययुक्त भक्त मुझमें मन लगाकर मेरी उपासना करते हैं।’ (गीता १२।२) इसी प्रकार दूसरी स्मृतियोंमें भी कहा है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्याका निरन्तर अभ्यास करते रहना चाहिये। सम्बन्ध — उस परम प्राप्य परब्रह्मका किस भावसे निरन्तर चिन्तन करना चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च॥ ४।१।३॥ आत्मा = वह मेरा आत्मा है; इति = इस भावसे; तु = ही; उपगच्छन्ति = ज्ञानी- जन उसे जानते या प्राप्त करते हैं; च = और; ग्राहयन्ति = ऐसा ही ग्रहण कराते या समझाते हैं। व्याख्या — ‘यह आत्मा ब्रह्म है, यह आत्मा चार पादवाला है’ इत्यादि
- अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥
४१२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
४१२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ (मा० उ० २) 'सबका अन्तर्वर्ती यह तेरा आत्मा है।' (बृह० उ० ३। ४।१) 'यह तेरा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है।' (बृह० उ० ३।७।३) इसी प्रकार उद्दालकने अपने पुत्र श्वेतकेतुसे बार-बार कहा है कि 'वह सत्य है, वह आत्मा है, वह तू है।' (छा० उ० ६।८ से १६ वें खण्डतक) 'जो आत्मामें स्थित हुआ आत्माका अन्तर्यामी है, जिसको आत्मा नहीं जानता, जिसका आत्मा शरीर है, वह तेरा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है' (शतपथब्रा० १४।५।३०)।* इस प्रकार श्रुतिमें उस परब्रह्म परमात्माको अपना अन्तर्यामी आत्मा मानकर उपासना करनेका विधान आता है तथा भगवद्गीतामें भी भगवान्ने अपनेको सबका अन्तर्यामी बताया है (गीता १८। ६१)। दूसरी श्रुतिमें भी उस ब्रह्मको हृदयरूप गुहामें निहित बताकर उसे जाननेवाले विद्वान्की महिमाका वर्णन किया गया है। (तै० उ० २।१) इसलिये साधकको उचित है कि वह परमेश्वरको अपना अन्तर्यामी आत्मा समझकर उसी भावसे उसकी उपासना करे। सम्बन्ध— क्या प्रतीकोपासनामें भी ऐसी ही भावना करनी चाहिये? इस जिज्ञासापर कहते हैं— न प्रतीके न हि सः॥ ४। १।४॥ प्रतीके=प्रतीकमें; न=आत्मभाव नहीं करना चाहिये; हि=क्योंकि; सः=वह; न=उपासकका आत्मा नहीं है। व्याख्या—'मन ही ब्रह्म है, इस प्रकार उपासना करे।' (छा० उ० ३।१८।१) 'आकाश ब्रह्म है, ऐसी उपासना करे।' (छा० उ० ३।१८।१) 'आदित्य ब्रह्म है, यह आदेश है।' (छा० उ० ३।१९। १) इस प्रकार जो भिन्न-भिन्न पदार्थोंमें ब्रह्मरूपसे उपासना करनेका कथन है, वही प्रतीकोपासना है। वहाँ प्रतीकमें आत्मभाव नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह
- यह मन्त्र सूत्र १।२।२० की टिप्पणीमें आ गया है।
सूत्र ५ ] अध्याय ४ ४१३
सूत्र ५ ] अध्याय ४ ४१३ उपासकका अन्तरात्मा नहीं है। प्रत्युत प्रतीकमें जिसकी उपासना की जाती है वह साधकका आत्मा है। जैसे मूर्ति आदिमें भगवान्की भावना करके उपासना की जाती है, उसी प्रकार मन आदि प्रतीकमें भी उपासना करनेका विधान है। भाव यह है कि पूर्वोक्त मन, आकाश, आदित्य आदिको प्रतीक बनाकर उनमें भगवान्के उद्देश्यसे की हुई जो उपासना है, उसे परम दयालु पुरुषोत्तम परमात्मा अपनी ही उपासना मानकर ग्रहण करते हैं और उपासकको उसकी भावनाके अनुसार फल भी देते हैं; इसीलिये वैसी उपासनाका भी विधान किया गया है, परंतु प्रतीकको अपना अन्तर्यामी आत्मा नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध—प्रतिकोपासना करनेवालेको प्रतीकमें ब्रह्मभाव करना चाहिये या ब्रह्ममें उस प्रतीकका भाव करना चाहिये? इस जिज्ञासापर कहते हैं— ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्षात् ॥ ४ । १ । ५ ॥ उत्कर्षात् = ब्रह्म ही सर्वश्रेष्ठ है, इसलिये; ब्रह्मदृष्टिः = प्रतीकमें ब्रह्मदृष्टि करनी चाहिये (क्योंकि निकृष्ट वस्तुमें ही उत्कृष्टकी भावना की जाती है)। व्याख्या—जब किसी देवताकी प्रत्यक्ष उपासना करनेका साधन सुलभ नहीं हो, तब सुविधापूर्वक उपलब्ध हुई साधारण वस्तुमें उस देवताकी भावना करके उपासना की जाती है, देवतामें उस वस्तुकी भावना नहीं की जाती है; क्योंकि वैसा करनेका कोई उपयोग ही नहीं है। उसी प्रकार जो साधक उस परब्रह्म परमात्माके तत्त्वको नहीं समझ सकता, उसके लिये प्रतीकोपासनाका विधान किया गया है, अतः उसे चाहिये कि इन्द्रिय आदिसे प्रत्यक्ष अनुभवमें आनेवाले प्राण, मन, सूर्य, चन्द्रमा आदि किसी भी पदार्थको उस परब्रह्म परमात्माका प्रतीक बनाकर उसमें ब्रह्मकी भावना करके उपासना करे, क्योंकि परब्रह्म परमात्मा ही सर्वश्रेष्ठ है और निकृष्टमें ही श्रेष्ठकी भावना की जाती हैं, श्रेष्ठमें निकृष्टकी नहीं। इस प्रकार प्रतीकमें ब्रह्मभाव करके उपासना करनेसे वह परब्रह्म परमात्मा उस उपासनाको अपनी ही उपासना मानते हैं।
४१४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
४१४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ सम्बन्ध— अब कर्मके अंगभूत उद्गीथ आदिके विषयमें कहते हैं— आदित्यादिमतयश्चांग उपपत्तेः॥ ४। १। ६॥ च=तथा; अंगे=कर्मांगभूत उद्गीथ आदिमें; आदित्यादिमतयः=आदित्य आदिकी बुद्धि करनी चाहिये; उपपत्तेः=क्योंकि यही युक्तियुक्त है, ऐसा करनेसे कर्मसमृद्धिरूप फलकी सिद्धि होती है। व्याख्या—कर्मके अंगभूत उद्गीथ आदिमें जो आदित्य आदिकी भावनापूर्वक उपासना करनेका विधान किया गया है (छा० उ० १। ३। १ तथा २। २। १) वह अवश्य कर्तव्य है; क्योंकि ऐसा करनेसे कर्मसमृद्धिरूप फलकी सिद्धि होती है। आत्मभाव करनेका ऐसा कोई फल नहीं दिखायी देता। इसलिये यही सिद्ध होता है कि कनिष्ठ वस्तुमें श्रेष्ठकी भावनाका नाम प्रतीक-उपासना है। सम्बन्ध—यह जिज्ञासा होती है कि साधकको किसी आसनपर बैठकर उपासना करनी चाहिये या चलते-फिरते प्रत्येक परिस्थितिमें वह उपासना कर सकता है? इसपर कहते हैं— आसीनः सम्भवात् ॥ ४। १। ७॥ आसीनः=बैठे हुए ही (उपासना करनी चाहिये); सम्भवात्=क्योंकि बैठकर ही निर्विघ्न उपासना करना सम्भव है। व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वरका जैसा रूप सुनने और विचार करनेपर समझमें आया है, उसका बार-बार तैलधाराकी भाँति निरन्तर चिन्तन करते रहनेका नाम उपासना है। यह उपासना चलते-फिरते या अन्य शरीर- सम्बन्धी काम करते समय नहीं हो सकती, क्योंकि उस समय चित्त विक्षिप्त रहता है। तथा सोते हुए करनेमें भी निद्रारूप विघ्नका आना स्वाभाविक है; अतः केवल बैठकर करनेसे ही निर्विघ्न उपासना हो सकती है। इसलिये उपासनाका अभ्यास बैठकर ही करना चाहिये। भगवान् श्रीकृष्णने भी कहा है कि 'उपविश्यासने युञ्ज्याद् योगमात्मविशुद्धये ॥'
सूत्र ८-९ ] अध्याय ४ ४१५ अर्थात् 'आसनपर बैठकर अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये योगका अभ्यास करे' (गीता ६। १२)। सम्बन्ध — उसी बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरा हेतु उपस्थित करते हैं— ध्यानाच्च ॥ ४ । १ । ८ ॥ ध्यानात् = उपासनाका स्वरूप ध्यान है, इसलिये; च = भी (यही सिद्ध होता है कि बैठकर उपासना करनी चाहिये) । व्याख्या — अपने इष्टदेवका ध्यान ही उपासनाका स्वरूप है (मु० उ० ३। १। ८) और चित्तकी एकाग्रताका नाम ध्यान है। अतएव यह बैठकर ही किया जा सकता है; चलते-फिरते या सोकर नहीं किया जा सकता। सम्बन्ध — पुनः उसी बातको दृढ़ करते हैं— अचलत्वं चापेक्ष्य ॥ ४।१।९॥ च=तथा श्रुतिमें; अचलत्वम्=शरीरकी निश्चलताको; अपेक्ष्य=आवश्यक बताकर ध्यान करनेका उपदेश किया गया है। व्याख्या — श्रुतिमें कहा है कि— त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य । ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि ॥ 'ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये ध्यानका अभ्यास करनेवालेको चाहिये कि सिर, ग्रीवा और छाती—इन तीनोंको उठाये हुए, शरीरको सीधा और स्थिर करके समस्त इन्द्रियोंको मनके द्वारा हृदयमें निरुद्ध करके ॐकाररूप नौकाद्वारा समस्त भयदायक जन्मान्तररूप स्रोतोंसे तर जाय' (श्वेता० उ० २।८)। इस श्रुतिसे यह स्पष्ट हो जाता है कि उपासनाके लिये शरीरकी भी अचलता आवश्यक है, इसलिये भी उपासना बैठकर ही की जानी चाहिये। सम्बन्ध — उस बातको स्मृतिप्रमाणसे दृढ़ करते हैं—
४१६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
४१६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ स्मरन्ति च ॥ ४ । १ । १० ॥ च=तथा; स्मरन्ति=ऐसा ही स्मरण करते हैं। व्याख्या-स्मृतिमें भी यही बात कही गयी है- समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः। सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः। मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥ 'काया, सिर और ग्रीवाको सम और अचल धारण किये हुए स्थिर होकर, अपनी नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि लगाकर, अन्य दिशाओंको न देखता हुआ निर्भय होकर, भलीभाँति विक्षेपरहित, शान्तचित्त एवं ब्रह्मचर्य- व्रतमें स्थित रहते हुए मनको वशमें करके, मुझमें चित्त लगाये हुए, मुझे ही अपना परम प्राप्य मानकर साधन करनेके लिये बैठे' (गीता ६।१३-१४)। इस प्रकार स्मृतिप्रमाणसे भी यही सिद्ध होता है कि परम प्राप्य परमात्माके निरन्तर चिन्तनरूप ध्यानका अभ्यास बैठकर ही करना चाहिये। सम्बन्ध - उक्त साधन कैसे स्थानमें बैठकर करना चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं- यत्रैकाग्रता तत्राविशेषात् ॥ ४ । १ । ११ ॥ अविशेषात् किसी विशेष स्थान या दिशाका विधान न होनेके कारण (यही सिद्ध होता है कि); यत्र=जहाँ; एकाग्रता=चित्तकी एकाग्रता (सुगमतासे हो सके); तत्र=वहीं (बैठकर ध्यानका अभ्यास करे)। व्याख्या-श्रुतिमें कहा है कि- समे शुचौ शर्करावह्नवालुका- विवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः। मनोऽनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ॥
सूत्र १२ ] अध्याय ४ ४१७
सूत्र १२ ] अध्याय ४ ४१७ 'जो सब प्रकारसे शुद्ध, समतल, कंकड़, अग्नि और बालूसे रहित तथा शब्द, जल और आश्रयकी दृष्टिसे मनके अनुकूल हो, जहाँ आँखोंको पीड़ा पहुँचानेवाला दृश्य न हो और वायुका झोंका भी न लगता हो ऐसे गुहा आदि स्थानमें बैठकर परमात्माके ध्यानका अभ्यास करना चाहिये।' (श्वेता० उ० २।१०) इस प्रकार किसी विशेष दिशा या स्थानका निर्देश न होने तथा मनके अनुकूल देशमें अभ्यास करनेके लिये श्रुतिकी आज्ञा प्राप्त होनेके कारण यही सिद्ध होता है कि जहाँ सरलतासे मनकी एकाग्रता हो सके, ऐसा कोई भी पवित्र स्थान उपासनाके लिये उपयोगी हो सकता है। अतः जो अधिक प्रयास किये बिना प्राप्त हो सके, ऐसे निर्विघ्न और अनुकूल स्थानमें बैठकर ध्यानका अभ्यास करते रहना चाहिये। सम्बन्ध—इस प्रकार उपासनाका अभ्यास कबतक करना चाहिये? इस जिज्ञासापर कहते हैं— आ प्रायणात्तत्रापि हि दृष्टम्॥४।१।१२॥ आ प्रायणात्=मरणपर्यन्त (उपासना करते रहना चाहिये); हि=क्योंकि; तत्रापि=मरणकालमें भी; दृष्टम्=उपासना करते रहनेका विधान देखा जाता है। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्में प्रजापतिका यह वचन है कि—'स खल्वेवं वर्तयन् यावदायुषं ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते॥'—'वह इस प्रकार पूरी आयुतक उपासनामें तत्पर रहकर अन्तमें निःसंदेह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है।' (छा० उ० ८।१५।१) प्रश्नोपनिषद्की बात है, सत्यकामने अपने गुरु पिप्पलादसे पूछा—'भगवन्! मनुष्योंमेंसे जो मरणपर्यन्त ॐकारका ध्यान करता है, वह किस लोकको जीत लेता है?' (प्र० उ० ५।१) इसपर गुरुने ॐकारकी महिमा वर्णन करके (५।२) दो मन्त्रोंमें इस लोक और स्वर्गलोककी प्राप्तिके उद्देश्यसे की जानेवाली उपासनाका फल बताया (५।३-४); फिर अन्तमें कहा—'जो तीन मात्राओंवाले ॐ इस अक्षरके द्वारा इस (हृदयस्थ) परमपुरुषका निरन्तर ध्यान करता है, वह तेजोमय सूर्य-
४१८ वेदान्त-दर्शन [पाद १
४१८ वेदान्त-दर्शन [पाद १ लोकमें पहुँचता है तथा जिस प्रकार सर्प केंचुलीका त्याग कर देता है, ठीक उसी प्रकार, वह पापोंसे मुक्त होकर सामवेदकी श्रुतियोंके अभिमानी देवताओंद्वारा ऊपर ब्रह्मलोकमें ले जाया जाता है। वहाँ वह इस जीवघनरूप हिरण्यगर्भसे अत्यन्त श्रेष्ठ तथा सबके हृदयमें शयन करनेवाले परमपुरुषका साक्षात्कार करता है' (प्र० उ० ५। ५)। इस प्रकार मृत्युपर्यन्त निरन्तर उपासना करते रहनेका श्रुतिमें विधान होनेके कारण यही मानना उचित है कि आजीवन नित्य-निरन्तर उपासना करते रहना चाहिये। जिसको जीवनकालमें ही उस परमपुरुषका साक्षात्कार हो जाता है, उसका तो उस परमेश्वरसे कभी वियोग होता ही नहीं है, वह तो स्वभावसे ही उसमें संयुक्त हो जाता है तथापि वह जो मरणपर्यन्त निरन्तर उपासना करता रहता है, वह उसके अन्य कर्मोंकी भाँति लोकसंग्रहके लिये है, परंतु साधकके लिये तो मृत्युपर्यन्त उपासना परम आवश्यक है। अन्यथा योगभ्रष्ट हो जानेपर पुनर्जन्म अनिवार्य हो जाता है (गीता ६। ३७ से ४०) इसीलिये भगवान्ने मरणपर्यन्त साधन करते रहनेके लिये जगह-जगह कहा है (गीता २। ७२; ७। ३०; ८। ५, ८, ९, १०, १२, १३ इत्यादि)। सम्बन्ध — यहाँतक उपासनाविषयक वर्णनकी समाप्ति करके अब परमात्माकी प्राप्तिके लिये किये जानेवाले साधनोंके फलके सम्बन्धमें विचार आरम्भ किया जाता है। यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जिसको जीवनकालमें ही परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है, उसके पूर्वार्जित तथा भावी पुण्य-पापरूप कर्मोंका क्या होता है? इसपर कहते हैं— तदधिगमे उत्तरपूर्वाघयोरश्लेषविनाशौ तद्- व्यपदेशात् ॥ ४। १। १३ ॥ तदधिगमे = उस परब्रह्म परमात्माके प्राप्त हो जानेपर; उत्तरपूर्वाघयोः = आगे होनेवाले और पहले किये हुए पापोंका; अश्लेषविनाशौ = क्रमशः असम्पर्क एवं नाश होता है; तद्व्यपदेशात् = क्योंकि श्रुतिमें यही बात जगह-जगह कही गयी है।