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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

३३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

३३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ दर्शयति च॥ ३।३।२२॥ दर्शयति च=श्रुति यही बात दिखलाती भी है। व्याख्या—जहाँ इस प्रकार स्थान और नामका भेद हो, वहाँ एक जगह कहे हुए गुण दूसरी जगह नहीं लिये जाते; यह बात श्रुतिद्वारा इस प्रकार दिखलायी गयी है। छान्दोग्योपनिषद्‌में आधिदैविक सामके प्रसंगमें सूर्यस्थ पुरुषका वर्णन करके फिर आध्यात्मिक सामके प्रसंगमें आँखमें स्थित पुरुषका वर्णन किया गया है और वहाँ सूर्यस्थ पुरुषके नाम-रूप आदिका आँखमें स्थित पुरुषमें भी श्रुतिने स्वयं विधान करके दोनोंकी एकता की है (छा० उ० १।७।५)। इससे यह सूचित होता है कि ऐसे स्थलोंमें विद्याकी एकता मानकर एकके गुणोंका अन्यत्र उपसंहार साधारण नियम नहीं है; जहाँ विद्याकी एकता मानकर गुणोंका उपसंहार करना अभीष्ट होता है उस प्रसंगमें श्रुति स्वयं उसका विधान कर देती है जैसे कि उपर्युक्त प्रसंगमें सूर्यमें स्थित पुरुषके गुणोंका नेत्रवर्ती पुरुषमें विधान किया है। सम्बन्ध—नेत्रवर्ती तथा सूर्यमण्डलवर्ती आदि पुरुषोंमें ब्रह्मके किन- किन गुणोंका उपसंहार (अध्याहार) नहीं किया जा सकता ? इसका निर्णय ग्रन्थकार दो सूत्रोंद्वारा करते हैं— सम्भृतिद्युव्याप्त्यपि चातः॥ ३।३।२३॥ च=तथा; अतः =इसलिये अर्थात् विद्याकी एकता न होनेके कारण ही; सम्भृतिद्युव्याप्ती = समस्त लोकोंको धारण करना तथा द्युलोक आदि अखिल ब्रह्माण्डको व्याप्त करके स्थित होना—ये दोनों ब्रह्मसम्बन्धी गुण; अपि = भी अन्यत्र (नेत्रान्तर्वर्ती आदि पुरुषोंमें) नहीं लेने चाहिये। व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद् (३।८।३)-में गार्गी और याज्ञवल्क्यके संवादका वर्णन आता है। वहाँ गार्गीने याज्ञवल्क्यसे पूछा है—'जो द्युलोकसे ऊपर है, जो पृथ्वीसे नीचे है और जो द्युलोक एवं पृथ्वीके मध्यमें है तथा स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं। इनके सिवा जिसे भूत, वर्तमान और भविष्य कहते हैं; वह सब किसमें ओतप्रोत है?' इसके उत्तरमें

याज्ञवल्क्यने कहा—'द्युलोकसे ऊपर और पृथिवीसे नीचेतक यह सब कुछ आकाशमें ओतप्रोत है।' (३।८।४) गार्गीने पूछा—'आकाश किसमें ओतप्रोत है?' (३।८।७)। याज्ञवल्क्य बोले—'गार्गि ! उस तत्त्वको तो ब्रह्मवेत्ता पुरुष अक्षर कहते हैं; वह न मोटा है, न पतला है, न छोटा है, न बड़ा है, न लाल है, न चिकना है, न छाया है, न तम है, न वायु है, न आकाश है, न संग है, न रस है, न गन्ध है, न नेत्र है, न कान है, न वाणी है, न मन है, न तेज है, न प्राण है, न मुख है, न माप है, न भीतर है, न बाहर है, वह कुछ भी नहीं खाता, उसे कोई भी नहीं खाता।' (३।८।८) इस प्रकार अक्षरब्रह्मके स्वरूपका वर्णन करके याज्ञवल्क्यने यह भी बताया कि 'ये सूर्य, चन्द्रमा, द्युलोक और पृथिवी आदि इसीके शासनमें हैं, इसीने इन सबको धारण कर रखा है।' (३।८।९)। इस प्रसंगमें अक्षरब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन करते हुए दो बातें मुख्यरूपसे बतायी गयी हैं, एक तो वह द्युलोकसे ऊपर और पृथिवीके नीचेतक समस्त ब्रह्माण्डमें व्याप्त है और दूसरी बात यह है कि वही सबको धारण करनेवाला है। इन दोनों गुणोंका नेत्रान्तर्वर्ती और सूर्यमण्डलवर्ती पुरुषोंमें अध्याहार नहीं किया जा सकता; क्योंकि प्रतीक-उपासनाके लिये सीमित स्थानोंमें स्थित कहे हुए पुरुष न तो सर्वव्यापक हो सकते हैं और न सबको धारण ही कर सकते हैं। इसी प्रकार अन्यत्र भी, जहाँ पूर्ण ब्रह्मका वर्णन नहीं है, उन प्रतीकोंमें इन गुणोंका उपसंहार नहीं हो सकता; यह भलीभाँति समझ लेना चाहिये। सम्बन्ध—'उक्त पुरुषोंमें ब्रह्मके गुणोंका उपसंहार न हो, यह तो ठीक है, परन्तु पुरुषविद्यामें जो पुरुषके गुण बताये गये हैं, उनका उपसंहार तो अन्यत्र जहाँ-जहाँ पुरुषोंका वर्णन हो, उन सबमें होना ही चाहिये।' ऐसी आशंका होनेपर कहते हैं— पुरुषविद्यायामिव चेतरेषामनाम्नानात् ॥ ३। ३। २४॥ पुरुषविद्यायाम् इव=पुरुषविद्यामें जो गुण बताये गये हैं, वैसे गुण; च=भी; इतरेषाम्=अन्य पुरुषोंके नहीं हो सकते; अनाम्नानात्=क्योंकि श्रुतिमें उनके ऐसे गुण कहीं नहीं बताये गये हैं।

व्याख्या - मुण्डकोपनिषद्में (२।१।२ से १० तक) अक्षरब्रह्मका पुरुषके नामसे वर्णन किया गया है। वहाँ पहले अक्षरब्रह्मसे सबकी उत्पत्ति और उन्हींमें सबका लय (२।१।१) बताकर उसे दिव्य अमूर्त पुरुष कहा गया है (२।१।२)। फिर २।१।३ से लेकर २।१।९ तक उसीसे समस्त प्राण, इन्द्रिय, पंचभूत, सूर्य, चन्द्रमा, वेद, अग्नि, देवता, मनुष्य, अन्न, समुद्र तथा पर्वत आदिकी सृष्टि बतायी गयी है। तदनन्तर २।१। १० वें मन्त्रमें उस पुरुषकी महिमाका इस प्रकार वर्णन किया गया है— 'पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम्। एतद् यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य॥' अर्थात् 'पुरुष ही यह सब कुछ है, वही तप, कर्म और परम अमृतस्वरूप ब्रह्म है। हे सोम्य ! हृदयरूप गुफामें स्थित इस अन्तर्यामी परम पुरुषको जो जानता है, वह यहीं इस मनुष्य-शरीरमें ही अविद्याजनित गाँठको छिन्न-भिन्न कर देता है।' इस प्रकार इस पुरुषविद्याके प्रकरणमें जो पुरुषके सर्वोत्पादकत्व, परात्परत्व, सर्वव्यापकत्व तथा अविद्यानिवारकत्व आदि दिव्य गुण बताये गये हैं, उनका भी नेत्रान्तर्वर्ती और सूर्यमण्डलवर्ती आदि पुरुषोंमें तथा जहाँ-जहाँ स्थूल, सूक्ष्म या कारण-शरीरका वर्णन पुरुषके नामसे किया गया है, उन पुरुषोंमें (छा० उ० ५।९।१) (तै० उ० २।१ से ७ तक) अध्याहार नहीं किया जा सकता; क्योंकि श्रुतिमें कहीं भी उनके लिये वैसे गुणोंका प्रतिपादन नहीं किया गया है। उन प्रकरणोंमें उन पुरुषोंके अन्तरात्मा परमपुरुषको लक्ष्य करानेके लिये उनको पुरुष नाम दिया गया है। सम्बन्ध—इसी प्रकार— वेधाद्यर्थभेदात् ॥ ३। ३। २५ ॥ वेधादि=बींधने आदिका वर्णन करके जो ब्रह्मको वेधका लक्ष्य बताया गया है, इन सबका अध्याहार भी अन्य विद्याओंमें नहीं करना चाहिये; अर्थभेदात् = क्योंकि वहाँ प्रयोजनमें भेद है। व्याख्या - मुण्डकोपनिषद् (२।२।३)-में कहा है कि-

सूत्र २६ ] अध्याय ३ ३३५

सूत्र २६ ] अध्याय ३ ३३५ धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्युपासानिशितं सन्धयीत। आयम्य तद् भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि॥ 'हे सोम्य ! उपनिषद्में वर्णित प्रणवरूप महान् धनुषको लेकर उसपर उपासनाद्वारा तीक्ष्ण किया हुआ बाण चढ़ाना चाहिये। फिर भावपूर्ण चित्तके द्वारा उस बाणको खींचकर तुम परम अक्षर परमेश्वरको ही लक्ष्य बनाकर उसे बींधो।' इस वर्णनके पश्चात् दूसरे मन्त्रमें आत्माको ही बाणका रूप दिया गया है। इस प्रकार यहाँ जो ब्रह्मको आत्मरूप बाणके द्वारा बींधने- योग्य बताया गया है; उसके इस वेध्यत्व आदि गुणोंका तथा ॐकारके धनुर्भाव और आत्माके बाणत्वका भी जहाँ ओंकारके द्वारा परमात्माकी उपासना करनेका प्रकरण है, उन ब्रह्मविद्याओंमें उपसंहार नहीं करना चाहिये; क्योंकि यहाँ चिन्तनमें तन्मयताका स्वरूप बतानेके लिये वैसा रूपक लिया गया है। इस तरह रूपककी कल्पनाद्वारा जो विशेष बात कही जाय, वे अन्य प्रकरणमें अनुपयुक्त होनेके कारण लेनेयोग्य नहीं हैं। सम्बन्ध — बीसवें सूत्रसे पचीसवें सूत्रतक भिन्न-भिन्न श्रुतियोंपर यह विचार किया गया कि उनमें कौन-कौन-सी बातें एक जगहसे दूसरी जगह अध्याहार करनेयोग्य नहीं हैं। अब परमगति अर्थात् परमधाम और परमात्माकी प्राप्तिविषयक श्रुतियोंपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। श्रुतियोंमें ब्रह्मविद्याका फल कहीं तो केवल दुःख, शोक, बन्धन और शुभाशुभ कर्मोंकी निवृत्तिमात्र बतलाया है; कहीं उसके पश्चात् परम समता, परमधाम और परमात्माकी प्राप्तिका भी वर्णन है। अतः ब्रह्मविद्याके फलमें भेद है या नहीं? इस जिज्ञासापर कहते हैं— हानौ तूपायनशब्दशेषत्वात्कुशाच्छन्दस्तुत्युप- गानवत्तदुक्तम् ॥ ३। ३। २६ ॥ हानौ = जहाँ केवल दुःख, शोक, पुण्य, पाप आदिके नाशका ही वर्णन है ऐसी श्रुतिमें; तु = भी; उपायनशब्दशेषत्वात् = लाभरूप परमधामकी प्राप्ति

३३६ | वेदान्त-दर्शन | [ पाद ३

३३६ | वेदान्त-दर्शन | [ पाद ३

आदि फलका भी अध्याहार कर लेना चाहिये; क्योंकि वह वाक्यका शेष भाग है; कुशाच्छन्दस्तुत्युपगानवत् = यह बात कुशा, छन्द, स्तुति और उपगानकी भाँति समझनी चाहिये; तत् उक्तम् = ऐसा पूर्वमीमांसामें कहा गया है। व्याख्या—उद्दालक आदि छः ऋषियोंको वैश्वानरविद्याका उपदेश देकर राजा अश्वपति कहते हैं कि जो इस विद्याको जानकर हवन करता है, उसके समस्त पाप उसी तरह भस्म हो जाते हैं, जिस प्रकार सींकका अग्रभाग अग्निमें डालनेसे हो जाता है। (छा० उ० ५। २४। ३) इसी प्रकार कठमें परमात्मज्ञानका फल कहीं केवल हर्ष-शोकका नाश (१। २। १२) और कहीं मृत्यु-मुखसे छूटना बताया गया है (१। ३। १५)। मुण्डकमें अविद्याका नाश (२। १। १०) और कहीं हृदयकी ग्रन्थि, समस्त संशय तथा कर्मोंका नाश कहा गया है (२। २। ८)। श्वेताश्वतरमें समस्त पाशोंसे छूट जाना (श्वे० उ० १। ११; २। १५; ४। १५, १६; ५। १३; ६। १३) तथा शोकका नाश होना (श्वे० उ० ४। ७) आदि ब्रह्मज्ञानका फल बताया गया है। इस प्रकार उपनिषदोंमें जगह-जगह ब्रह्मविद्याका फल पुण्य, पाप और नाना प्रकारके विकारोंका नाश बतलाया गया है; उन मन्त्रोंमें परमात्माकी या परमपदकी अथवा परमधामकी प्राप्ति नहीं बतलायी गयी। अतः सूत्रकार कहते हैं कि ऐसे स्थलोंमें जहाँ केवल दुःख, बन्धन एवं कर्मोंके त्याग या नाश आदिकी बात बतायी गयी है, उसके वाक्यशेषके रूपमें दूसरी जगह कहे हुए उपलब्धिरूप फलका भी अध्याहार कर लेना चाहिये। जैसे परमात्माका प्राप्त होना (मु० उ० ३। २। ८), ब्रह्मधामकी प्राप्ति (मु० उ० ३। २। ४) ब्रह्ममें लीन होना (मु० उ० ३। २। ५), ब्रह्मलोकमें परम अमृतस्वरूप हो जाना (मु० उ० ३। २। ६), अर्चि आदि मार्गसे ब्रह्मलोकमें जाकर वहाँसे न लौटना (छा० उ० ४। १५। ५) आदि ही फलका वर्णन है; भाव यह कि जहाँ-जहाँ केवल हानि-पापनाश आदिका वर्णन है, वहाँ-वहाँ ब्रह्मलोक आदिकी प्राप्ति वाक्यशेष है और जहाँ केवल उपायन (ब्रह्मधामकी प्राप्ति आदि)-का ही वर्णन है,

सूत्र २६ ] अध्याय ३ ३३७

सूत्र २६ ] अध्याय ३ ३३७ वहाँ पूर्वोक्त हानि (दुःखनाश आदि) ही वाक्यशेष है। इसलिये प्रत्येक समान विद्यामें उसका अध्याहार कर लेना चाहिये; जिससे किसी प्रकारका विकल्प या फलभेद न रहे। इस प्रकार वाक्यशेष ग्रहण करनेका दृष्टान्त सूत्रकार देते हैं—जैसे कौषीतकि शाखावालोंने सामान्यतः वनस्पतिमात्रकी कुशा लेनेके लिये कहा है। परंतु शाट्यायन शाखावाले उसके स्थानमें गूलरके काठकी बनी हुई कुशा लेनेके लिये कहते हैं; इसलिये उनका वह विशेष वचन कौषीतकिके सामान्य वचनका वाक्यशेष माना जाता है और दोनों शाखावाले उसे स्वीकार करते हैं। इसी तरह एक शाखावाले 'छन्दोभिः स्तुवीत' (देव और असुरोंके) छन्दोंद्वारा स्तुति करे, इस प्रकार समान भावसे कहते हैं। किंतु पैङ्गी शाखावाले 'देवोंके छन्द पहले बोलने चाहिये' इस प्रकार विशेषरूपसे क्रम नियत कर देते हैं, तो उस क्रमको पूर्व कथनका वाक्यशेष मानकर सभी स्वीकार करते हैं। जैसे किसी शाखामें 'षोडशिनः स्तोत्रमुपाकरोति' (षोडशीका स्तवन करे) ऐसा सामान्य वचन मिलता है, परंतु तैत्तिरीय शाखावाले इस कर्मको ऐसे समयमें कर्तव्य बतलाते हैं, जब ब्रह्मवेलामें तारे छिप गये हों और सूर्योदय नहीं हुआ हो। अतः यह कालविशेषका नियम पूर्वकथित वाक्यका शेष होकर सबको मान्य होता है। तथा एक शाखावाले स्तुतिगानके विषयमें समान भावसे कहते हैं कि 'ऋत्विज उपगायन्ति'—'ऋत्विज् लोग स्तोत्रका गान करें' किंतु दूसरी शाखावाले यह विधान करते हैं कि 'नाध्वर्युंरुपगायति'—'अध्वर्युको स्तोत्र-गान नहीं करना चाहिये।' अतः इसको भी वाक्यशेष मानकर सब यह स्वीकार करते हैं कि 'अध्वर्युको छोड़कर अन्य ऋत्विजोंद्वारा स्तोत्रोंका गान होना चाहिये।' उसी प्रकार जहाँ केवल पाप आदिके नाशकी ही बात कही है, ब्रह्मलोकादिकी प्राप्ति नहीं बतलायी गयी है, वहाँ प्राप्तिरूप फलको भी वाक्यशेषके रूपमें ग्रहण कर लेना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'देवयानमार्गसे ब्रह्मलोकमें जानेवाले महापुरुषके पापकर्म नष्ट हो जाते हैं, परंतु पुण्यकर्म तो शेष रहते

३३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

३३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ ही होंगे, अन्यथा उसका ब्रह्मलोकमें गमन कैसे सम्भव होगा? क्योंकि ऊपरके लोकोंमें जाना शुभ कर्मोंका ही फल है।' इसपर कहते हैं— साम्पराये तर्तव्याभावात्तथा ह्यन्ये ॥ ३ । ३ । २७ ॥ साम्पराये = ज्ञानीके लिये परलोकमें; तर्तव्याभावात् = भोगके द्वारा पार करनेयोग्य कोई कर्मफल शेष नहीं रहता; इस कारण (उसके पुण्यकर्म भी यहीं समाप्त हो जाते हैं); हि = क्योंकि; तथा = यही बात; अन्ये = अन्य शाखावाले कहते हैं। व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद्में यह बात स्पष्ट शब्दोंमें बतायी गयी है कि ‘उभे उ हैवैष एते तरति।’ (४।४।२२) अर्थात् ‘यह ज्ञानी निश्चय ही पुण्य और पाप दोनोंको यहीं पार कर जाता है।’ इससे यह सिद्ध होता है कि ज्ञानी पुरुषका शरीर त्याग देनेके बाद शुभाशुभ कर्मोंसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता। उसे जो ब्रह्मलोक (नित्य धाम) प्राप्त होता है, वह किसी कर्मके फलरूपमें नहीं, अपितु ब्रह्मज्ञानके बलसे प्राप्त होता है। अतः उसके लिये परलोकमें जाकर भोगद्वारा पार करनेयोग्य कोई कर्मफल शेष नहीं रहता, इसलिये उसके पुण्यकर्म भी यहीं समाप्त हो जाते हैं। ज्ञानीके संचित आदि समस्त कर्मोंका सर्वथा नाश हो जाता है, इस बातका समर्थन मुण्डकोपनिषद्में भी इस प्रकार किया गया है—‘तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरंजनः परमं साम्यमुपैति ॥’ (मु० उ० ३।१।३)—‘उस समय ज्ञानी पुरुष पुण्य और पाप दोनोंको हटाकर निर्मल हो सर्वोत्तम साम्यरूप परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है।’ सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि ‘समस्त कर्मोंका नाश और ब्रह्मकी प्राप्तिरूप फल तो ब्रह्मज्ञानसे यहीं तत्काल प्राप्त हो जाता है। फिर देवयानमार्गसे ब्रह्मलोकमें जाकर परमात्माको प्राप्त करनेकी बात क्यों कही गयी है?’ इसपर कहते हैं— छन्दत उभयथाविरोधात् ॥ ३ । ३ । २८ ॥ छन्दतः = ज्ञानी पुरुषके संकल्पके अनुसार; उभयथा = दोनों प्रकारकी

सूत्र २९ ] अध्याय ३ ३३९

सूत्र २९ ] अध्याय ३ ३३९ स्थिति होनेमें; अविरोधात्=कोई विरोध नहीं है (इसलिये ब्रह्मलोकमें जानेका विधान है)। व्याख्या- छान्दोग्योपनिषद् (३।१४।१)-में कहा है कि 'अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति ॥' अर्थात् 'यह पुरुष निश्चय ही संकल्पमय है। इस लोकमें पुरुष जैसे संकल्पवाला होता है, वैसा ही देहत्यागके पश्चात् यहाँसे परलोकमें जानेपर भी होता है।' इससे यह सिद्ध होता है कि जो ज्ञानी पुरुष किसी लोकमें जानेकी इच्छा न करके यहीं मुक्त होनेका संकल्प रखता है, ब्रह्मज्ञानके लिये साधनमें प्रवृत्त होते समय भी जिसकी ऐसी ही भावना रही है, वह तो तत्काल यहीं ब्रह्म- सायुज्यको प्राप्त हो जाता है; परंतु जो ब्रह्मलोकके दर्शनकी इच्छा रखकर साधनमें प्रवृत्त हुआ था तथा जिसका वहाँ जानेका संकल्प है, वह देवयान- मार्गसे वहाँ जाकर ही ब्रह्मको प्राप्त होता है। इस प्रकार साधकके संकल्पानुसार दोनों प्रकारकी गति मान लेनेमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध - यदि इस प्रकार ब्रह्मलोकमें गये बिना यहाँ ही परमात्माको प्राप्त हो जाना मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं- गतेरर्थवत्त्वमुभयथान्यथा हि विरोधः ॥ ३।३।२९॥ गतेः=गतिबोधक श्रुतिकी; अर्थवत्त्वम्=सार्थकता; उभयथा=दोनों प्रकारसे ब्रह्मकी प्राप्ति माननेपर ही होगी; हि=क्योंकि; अन्यथा=यदि अन्य प्रकारसे माने तो; विरोधः=श्रुतिमें परस्पर विरोध आयेगा। व्याख्या-श्रुतियोंमें कहीं तो तत्काल ही ब्रह्मकी प्राप्ति बतलायी है। (क० उ० २।३।१४, १५), कहीं ब्रह्मलोकमें जानेपर बतायी है (मु० उ० ३।२।६) अतः यदि उपर्युक्त दोनों प्रकारसे उसकी व्यवस्था नहीं मानी जायगी तो दोनों प्रकारका वर्णन करनेवाली श्रुतियोंमें विरोध आयेगा। इसलिये यही मानना ठीक है कि साधकके संकल्पानुसार दोनों प्रकारसे ही परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है। ऐसा माननेपर ही देवयानमार्गसे गतिका वर्णन करनेवाली श्रुतिकी सार्थकता होगी और श्रुतियोंका परस्पर विरोध भी दूर हो जायगा।

३४० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध—पुनः उसी बातको सिद्ध करते हैं— उपपन्नस्तल्लक्षणार्थोपलब्धेर्लोकवत् ॥ ३ । ३ । ३० ॥ तल्लक्षणार्थोपलब्धेः=उस देवयानमार्गद्वारा ब्रह्मलोकमें जानेके उपयुक्त सूक्ष्म शरीरादि उपकरणोंकी प्राप्तिका कथन होनेसे; उपपन्नः=उनके लिये ब्रह्मलोकमें जानेका कथन युक्तिसंगत है; लोकवत्=लोकमें भी ऐसा देखा जाता है। व्याख्या—श्रुतिमें जहाँ साधकके लिये देवयानमार्गके द्वारा ब्रह्मलोकमें जानेकी बात कही है, उस प्रकरणमें उसके उपयोगी उपकरणोंका वर्णन भी पाया जाता है। श्रुतिमें कहा है कि यह जीवात्मा जिस संकल्पवाला होता है, उस संकल्पद्वारा मुख्य प्राणमें स्थित हो जाता है। मुख्य प्राण उदान वायुमें स्थित हो मन-इन्द्रियोंसे युक्त जीवात्माको उसके संकल्पानुसार लोकमें ले जाता है। (प्र० उ० ३।१०) इसी तरह दूसरी जगह अर्चि- अभिमानी देवतादिको प्राप्त होना कहा है। (छा० उ० ५।१०।१, २) इस प्रकार समस्त कर्मोंका अत्यन्त अभाव हो जानेपर भी उसका दिव्य- शरीरसे सम्पन्न होना बतलाया गया है; किंतु जिन साधकोंको शरीर रहते हुए परब्रह्म परमेश्वर प्रत्यक्ष हो जाते हैं, उनके लिये वैसा वर्णन नहीं आता* (क० उ० २।३।१४); अपितु उनके विषयमें श्रुतिने इस प्रकार कहा है कि—‘योऽकामो निष्काम आप्तकाम आप्तकामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति॥’ (बृह० उ० ४।४।६) अर्थात् ‘जो कामनारहित, निष्काम, पूर्णकाम तथा केवल परमात्माको ही चाहनेवाला है, उसके प्राण ऊपरके लोकोंमें नहीं जाते। वह ब्रह्म होकर ही (यहीं) ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।’ इसलिये यही मानना सुसंगत है कि साधकके संकल्पानुसार दोनों प्रकारसे ही ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। लोकमें भी देखा जाता है कि जिसको अपने स्थानसे कहीं अन्यत्र जाना

  • यह मन्त्र-सूत्र ३।४।५२ की टिप्पणीमें दे दिया गया है।

सूत्र ३१ ] अध्याय ३ ३४१

सूत्र ३१ ] अध्याय ३ ३४१ होता है, उसके साथ यात्रोपयोगी आवश्यक सामग्री रहती है; उसी प्रकार उपर्युक्त अधिकारी पुरुषके लिये दिव्य शरीर आदि उपकरणोंका वर्णन किया गया है, इसलिये उसका इस लोकसे ब्रह्मलोकमें जानेका कथन उचित ही है। सम्बन्ध - 'ब्रह्मविद्याका फल बताते हुए श्रुतिने बहुत जगह ब्रह्मलोकमें जानेकी बात तो कही है, परंतु देवयानमार्गसे जानेकी बात सर्वत्र नहीं कही है। इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि ब्रह्मलोकमें जानेवाले सभी ब्रह्मवेत्ता देवयानमार्गसे ही जाते हैं, या जिन-जिन विद्याओंके प्रकरणमें देवयानमार्गका वर्णन है, उन्हींके अनुसार उपासना करनेवाले पुरुष उस मार्गसे जाते हैं?' इसपर कहते हैं- अनियमः सर्वेषामविरोधः शब्दानुमानाभ्याम् ॥ ३ । ३ । ३१ ॥ अनियमः = ऐसा नियम नहीं है कि उन्हीं विद्याओंके अनुसार उपासना करनेवाले देवयानमार्गद्वारा जाते हैं; सर्वेषाम् = अपितु ब्रह्मलोकमें जानेवाले सभी साधकोंकी गति उसी मार्गसे होती है (यही बात); शब्दानुमानाभ्याम् = श्रुति और स्मृतियोंसे सिद्ध होती है (इसलिये); अविरोधः = कोई विरोध नहीं है। व्याख्या - श्रुतिमें कई जगह साधकको ब्रह्मलोक और परमधामकी प्राप्ति बतलायी गयी है, परंतु सब जगह देवयानमार्गका वर्णन नहीं है। उसी प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता आदि स्मृतियोंमें भी सब जगह मार्गका वर्णन नहीं है। अतः जहाँ ब्रह्मलोककी प्राप्ति बतलायी गयी है, वहाँ यदि मार्गका वर्णन न हो तो भी अन्य श्रुतियोंके वर्णनसे वह बात समझ लेनी चाहिये; क्योंकि ब्रह्मलोकमें गमन होगा तो किसी-न-किसी मार्गसे ही होगा। अतः यह नियम नहीं है कि जिन प्रकरणोंमें देवयानका वर्णन है, उसके अनुसार उपासना करनेवाले ही उस मार्गसे जाते हैं, दूसरे नहीं। अपितु जिनका ब्रह्मलोकमें गमन कहा गया है, वे सभी देवयानमार्गसे जाते हैं, ऐसा माननेसे श्रुतिके कथनमें किसी प्रकारका विरोध नहीं आयेगा। यहाँ यह भी समझ लेना चाहिये कि जो यहीं परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं, वे ब्रह्मलोकमें नहीं जाते।

३४२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

३४२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध—'वसिष्ठ और व्यास आदि जो अधिकारप्राप्त ऋषिगण हैं; उनकी अर्चिमार्गसे गति होती है या वे इसी शरीरसे ब्रह्मलोकतक जा सकते हैं?' इसपर कहते हैं— यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिकाणाम्॥ ३। ३। ३२॥ आधिकारिकाणाम्=जो अधिकारप्राप्त कारक पुरुष हैं, उनकी; यावदधिकारम्=जबतक अधिकारकी समाप्ति नहीं होती तबतक; अवस्थितिः= अपने इच्छानुसार स्थिति रहती है। व्याख्या—जो वसिष्ठ तथा व्यास आदि महापुरुष अधिकार लेकर परमेश्वरकी आज्ञासे यहाँ जगत्का कल्याण करनेके लिये आते हैं, उन कारक पुरुषोंका न तो साधारण जीवोंकी भाँति जाना-आना होता है और न जन्मना-मरना ही होता है। उनकी सभी क्रियाएँ साधारण जीवोंसे विलक्षण एवं दिव्य होती हैं। वे अपने इच्छानुसार शरीर धारण करनेमें समर्थ होते हैं, अतः उनके लिये अर्चि आदि देवताओंकी सहायता आवश्यक नहीं है। जबतक उनका अधिकार रहता है, तबतक वे इस जगत्में आवश्यकतानुसार सभी लोकोंमें स्वतन्त्रतापूर्वक जा सकते हैं, अन्तमें परमात्मामें विलीन हो जाते हैं। इसलिये अन्य साधक या मुक्त पुरुष उनके समान नहीं हो सकते। सम्बन्ध— बत्तीसवें सूत्रतक ब्रह्मलोक और परमात्माकी प्राप्तिके विषयमें आयी हुई श्रुतियोंपर विचार किया गया। अब ब्रह्म और जीवके स्वरूपका वर्णन करनेवाली श्रुतियोंपर विचार करनेके लिये प्रकरण आरम्भ किया जाता है— अक्षरधियां त्ववरोधः सामान्यतद्भावाभ्यामौपसदव- त्तदुक्तम्॥ ३। ३। ३३॥ अक्षरधियाम्=अक्षर अर्थात् परमात्माके निर्गुण-निराकार-विषयक लक्षणोंका; तु=भी; अवरोधः=सब जगह अध्याहार करना (उचित है); सामान्य- तद्भावाभ्याम्=क्योंकि ब्रह्मके सभी विशेषण समान हैं तथा उसीके स्वरूपको

सूत्र ३४ ] अध्याय ३ ३४३

सूत्र ३४ ] अध्याय ३ ३४३ लक्ष्य करानेवाले भाव हैं; औपसदवत्=अतः 'उपसत्' कर्मसम्बन्धी मन्त्रोंकी भाँति; तदुक्तम्=उनका अध्याहार कर लेना उचित है, यह बात कही गयी है। व्याख्या—बृहदारण्यकमें याज्ञवल्क्यने कहा है कि 'हे गार्गि! जिसको तुम पूछ रही हो, उस तत्त्वको ब्रह्मवेत्तालोग अक्षर कहते हैं अर्थात् निर्गुण- निराकार अविनाशी ब्रह्म बतलाते हैं। वह न मोटा है, न पतला है, न छोटा है, न बड़ा है' इत्यादि (बृह० उ० ३।८।८)। इस प्रकार वहाँ ब्रह्मको इन सब पदार्थोंसे, इन्द्रियोंसे और शरीरधारी जीवोंसे अत्यन्त विलक्षण बतलाया गया है। तथा मुण्डकोपनिषद्में अंगिरा ऋषिने शौनकसे कहा है कि 'वह परा विद्या है, जिससे उस अक्षर (परब्रह्म परमात्मा)-की प्राप्ति होती है, जो जानने और पकड़नेमें आनेवाला नहीं है, जो गोत्र, वर्ण, आँख, कान, पैर आदिसे रहित है, किंतु सर्वव्यापी, अतिसूक्ष्म, विनाशरहित और समस्त प्राणियोंका कारण है, उसको ज्ञानी पुरुष सब ओरसे देखते हैं (मु० उ० १। १। ५, ६)। इस प्रकार वेदमें उस अक्षरब्रह्मके जो विशेषण बतलाये गये हैं, उनको ब्रह्मके वर्णनमें सभी जगह ग्रहण कर लेना चाहिये; क्योंकि ब्रह्मके सविशेष और निर्विशेष सभी लक्षण समान हैं तथा सभी उसीके भाव हैं अर्थात् उस ब्रह्मके स्वरूपका लक्ष्य करानेके लिये ही कहे हुए भाव हैं, इसलिये 'उपसत्' कर्मसम्बन्धी मन्त्रोंकी भाँति उनका अध्याहार कर लेना उचित है। यह बात कही गयी है। सम्बन्ध—'मुण्डक (३।१।१) और श्वेताश्वतर (४।६)-में तो पक्षीके दृष्टान्तसे जीव और ईश्वरको मनुष्यके हृदयमें स्थित बतलाया है और कठोपनिषद्में छाया तथा धूपकी भाँति ईश्वर और जीवको मनुष्यके हृदयमें स्थित बतलाया है; इन श्रुतियोंमें जिस विद्या अथवा विज्ञानका वर्णन है, वह एक-दूसरेसे भिन्न है या अभिन्न?' इस जिज्ञासापर कहते हैं— इयदामननात् ॥ ३। ३। ३४॥ (उक्त तीनों मन्त्रोंमें एक ही ब्रह्मविद्याका वर्णन है) इयदामननात्= क्योंकि सभी जगह इयत्ता (इतनापन)-का वर्णन समान है।

३४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

३४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या—मुण्डक और श्वेताश्वतरमें जो कहा है कि 'एक साथ रहकर परस्पर सखाभाव रखनेवाले दो पक्षी (जीवात्मा और परमात्मा) एक ही शरीररूप वृक्षका आश्रय लेकर रहते हैं, उन दोनोंमेंसे एक तो कर्मफलरूप सुख-दुःखोंको भोगता है और दूसरा न खाता हुआ केवल देखता रहता है।१ इस प्रकार यह जीव शरीरकी आसक्तिमें निमग्न होकर असमर्थताके कारण मोहित हो चिन्ता करता रहता है। यदि यह भक्तोंद्वारा सेवित अपने पास रहनेवाले सखा परमेश्वरको और उसकी विचित्र महिमाको देख ले तो तत्काल ही शोकरहित हो जाय।'२ तथा कठोपनिषद्में कहा है कि 'मनुष्य-शरीरमें परब्रह्मके उत्तम निवासस्थान हृदयगुहामें छिपे हुए और अपने सत्यस्वरूपका अनुभव करनेवाले (जीव और ईश्वर) दोनों हैं, जो कि छाया और धूपकी भाँति भिन्न स्वभाववाले हैं। ऐसा ब्रह्मवेत्ता कहते हैं।' (क० उ० १।३।१)३ इन सभी स्थलोंमें द्विवचनान्त शब्दोंका प्रयोग करके जीव और ईश्वरको परिच्छिन्न स्थल— हृदयमें स्थित बताया गया है। इससे सिद्ध होता है कि तीनों जगह कही हुई विद्या एक है। इसी प्रकार जहाँ-जहाँ उस परब्रह्म परमेश्वरको प्राणियोंके हृदयमें स्थित बताया गया है, उन सब स्थलोंमें वर्णित विद्याकी भी एकता समझ लेनी चाहिये। सम्बन्ध—अब परमात्माको सर्वान्तर्यामी बतलानेवाली श्रुतियोंपर विचार आरम्भ करते हैं— अन्तरा भूतग्रामवत्स्वात्मनः ॥ ३।३।३५ ॥ भूतग्रामवत्=आकाशादि भूतसमुदायकी भाँति (वह परमात्मा); स्वात्मनः=साधकके अपने आत्माका भी; अन्तरा=अन्तरात्मा (अन्तर्यामी है); (आमननात्)=क्योंकि यही बात अन्य श्रुतिमें कही गयी है। १-यह मन्त्र सूत्र १। ३। ७ की व्याख्यामें आया है। २-यह मन्त्र सूत्र १। २। २२ की व्याख्यामें आया है। ३-यह मन्त्र सूत्र १। २। ११ की व्याख्यामें आया है।

सूत्र ३५ ] अध्याय ३ ३४५

सूत्र ३५ ] अध्याय ३ ३४५ व्याख्या—राजा जनककी सभामें याज्ञवल्क्यसे चक्रायणके पुत्र उषस्तने कहा कि 'जो अपरोक्ष ब्रह्म है, जो सबका अन्तरात्मा है, उसको मुझे समझाइये।' तब याज्ञवल्क्यने कहा—'जो तेरा अन्तरात्मा है, वही सबका है।' उसके पुनः जिज्ञासा करनेपर याज्ञवल्क्यने विस्तारसे समझाया कि 'जो प्राणके द्वारा सबको प्राणक्रियासम्पन्न करता है।' आदि। उसके बाद उषस्तके पुनः पूछनेपर बताया कि 'दृष्टिके द्रष्टाको देखा नहीं जा सकता, श्रुतिके श्रोताको सुना नहीं जा सकता, मतिके मन्ताको मनन नहीं किया जा सकता, विज्ञातिके विज्ञाताको जाना नहीं जा सकता, यह तेरा अन्तरात्मा ही सबका अन्तरात्मा है' (बृह० उ० ३।४।१, २)। फिर कहोल ऋषिने भी वही बात पूछी कि 'जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है, जो सबका अन्तरात्मा है, उसको मुझे समझावें।' याज्ञवल्क्यने उत्तरमें कहा कि 'जो तेरा अन्तरात्मा है, वही सबका अन्तरात्मा है। जो भूख, प्यास, शोक, मोह, बुढ़ापा और मृत्यु सबसे अतीत है' इत्यादि (बृह० उ० ३।५।१)। इन दोनों प्रकरणोंको दृष्टिमें रखकर इस तरहके सभी प्रकरणोंका एक साथ निर्णय करते हैं। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि 'इसमें जो अन्तरात्मा बतलाया गया है, वह जीवात्मा है या परमात्मा ? यदि परमात्मा है तो किस प्रकार ?' इसका उत्तर देते हुए सूत्रकार कहते हैं—जिस प्रकार भूतसमुदायमें पृथिवीका अन्तरात्मा जल है, जलका तेज है, तेजका वायु है और वायुका भी आकाश है। अतः सबका अन्तरात्मा आकाश है। उसी प्रकार समस्त जड तत्त्वोंका अन्तरात्मा जीवात्मा है और जो अपने-आप का अर्थात् जीवात्माका भी अन्तरात्मा है, वह सबका अन्तरात्मा है; क्योंकि अन्य श्रुतिमें यही बात कही गयी है। अर्थात् उसी प्रकरणके सातवें ब्राह्मणमें उद्दालकके प्रश्नका उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्यने उस परब्रह्म परमात्माको पृथिवी आदि समस्त भूतसमुदायका अन्तर्यामी बतलाते हुए

३४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

३४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ अन्तमें विज्ञानात्मा अर्थात् जीवात्माका भी अन्तर्यामी उसीको बतलाया है तथा प्रत्येक वाक्यके अन्तमें कहा है कि 'यही तेरा अन्तर्यामी अमृतस्वरूप आत्मा है।'१ श्वेताश्वतरमें भी कहा गया है कि 'सब प्राणियोंमें छिपा हुआ वह एक देव सर्वव्यापी और समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा है, वह सबके कर्मोंका अधिष्ठाता, सबका निवासस्थान, सबका साक्षी, सर्वथा विशुद्ध और गुणातीत है।'२ (श्वेता० उ० ६।११) इसलिये यही सिद्ध होता है कि सबका अन्तरात्मा वह परब्रह्म पुरुषोत्तम ही है। जीवात्मा सबका अन्तरात्मा नहीं हो सकता। सम्बन्ध—अब कही हुई बातमें शंका उठाकर उसका उत्तर देते हैं— अन्यथाभेदानुपपत्तिरिति चेन्नोपदेशान्तरवत् ॥ ३। ३। ३६ ॥ चेत्=यदि कहो कि; अन्यथा=दूसरे प्रकारसे; अभेदानुपपत्तिः=अभेदकी सिद्धि नहीं होगी, इसलिये (उक्त प्रकरणमें जीवात्मा और परमात्माका अभेद मानना ही उचित है); इति न=तो यह ठीक नहीं; उपदेशान्तरवत्=क्योंकि दूसरे उपदेशकी भाँति अभेदकी सिद्धि हो जायगी। व्याख्या—यदि कहो कि उक्त वर्णनके अनुसार जीवात्मा और परमात्माके भेदको उपाधिकृत न मानकर वास्तविक मान लेनेपर अभेदकी सिद्धि नहीं होगी तो ऐसी बात नहीं है। दूसरी जगहके उपदेशकी भाँति यहाँ भी अभेदकी सिद्धि हो जायगी। अर्थात् जिस प्रकार दूसरी जगह कार्यकारणभावके अभिप्रायसे परब्रह्म परमेश्वरकी जड-प्रपंच और जीवात्माके साथ एकता करके उपदेश दिया गया है, उसी प्रकार प्रत्येक स्थानमें अभेदकी सिद्धि हो जायगी। भाव यह कि श्वेतकेतुको उसके पिताने मिट्टी, लोहा और सोनेके १-यह मन्त्र सूत्र १।२।२० की टिप्पणीमें आया है तथा इसका विस्तार सूत्र १।२।१८ और १९ की व्याख्यामें भी देखना चाहिये। २-यह मन्त्र सूत्र १।१।२ की टिप्पणीमें आया है।

सूत्र ३७ ] अध्याय ३ ३४७

सूत्र ३७ ] अध्याय ३ ३४७ अंशद्वारा कार्यकारणकी एकता समझायी, उसके बाद (छा० उ० ६।८।७ से ६। १६। ३ तक) नौ बार पृथक्-पृथक् दृष्टान्त देकर प्रत्येकके अन्तमें यह बात कही है कि 'स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदँ सर्वं तत्सत्यँ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो' 'यह जो अणिमा अर्थात् अत्यन्त सूक्ष्म परमात्मा है, इसीका स्वरूप यह समस्त जगत् है, वही सत्य है; वह आत्मा है और वह तू है अर्थात् कार्य और कारणकी भाँति तेरी और उसकी एकता है।' उसी प्रकार सब जगह समझ लेना चाहिये। सम्बन्ध - यदि परमात्मा और जीवात्माका उपाधिकृत भेद और वास्तविक अभेद मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं- व्यतिहारो विशिंषन्ति हीतरवत् ॥ ३।३।३७॥ व्यतिहारः = परस्पर व्यत्यय करके अभेदका वर्णन है, इसलिये उपाधिकृत भेद सिद्ध नहीं होता; हि= क्योंकि; इतरवत् = सभी श्रुतियाँ दूसरेकी भाँति; विशिंषन्ति = विशेषण देकर वर्णन करती हैं। व्याख्या - परमात्माके साथ जीवात्माकी एकताका प्रतिपादन करते हुए श्रुतिने कहा है कि 'तद् योऽहं सोऽसौ योऽसौ सोऽहम्।' अर्थात् 'जो मैं हूँ सो वह है और जो वह है सो मैं हूँ' (ऐ० आ० २।४।३) तथा 'त्वं वाहमस्मि भगवो देवतेऽहं वै त्वमसि' (वराहोपनिषद् २। ३४) अर्थात् 'हे भगवन् ! हे देव ! निश्चय ही 'तुम' मैं हूँ और 'मैं' तुम हो।' इस प्रकार व्यतिहारपूर्वक अर्थात् एकमें दूसरेके धर्मोंका विनिमय करते हुए एकताका प्रतिपादन किया गया है। ऐसा वर्णन उन्हीं स्थलोंपर किया जाता है, जहाँ इतर वस्तुकी भाँति वास्तवमें भेद होते हुए भी प्रकारान्तरसे अभेद बतलाना अभीष्ट हो। जैसा कि दूसरी जगह श्रुतिमें देखा जाता है- 'अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथः।' (छा० उ० १।५।१) अर्थात् 'निश्चय ही जो उद्गीथ है, वह प्रणव है और जो प्रणव है, वह उद्गीथ है।' उद्गीथ और प्रणवमें भेद होते हुए भी यहाँ उपासनाके लिये श्रुतिने व्यतिहारवाक्यद्वारा

३४८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

३४८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ दोनोंकी एकताका प्रतिपादन किया है। इसी प्रकार यहाँ भी उपासनाके लिये परमात्माके साथ जीवात्माकी एकता बतायी गयी है, ऐसा समझना चाहिये। जहाँ उपाधिकृत भेद होता है, वहाँ ऐसा कथन संगत नहीं होता। यहाँ इस एकताके प्रतिपादनका प्रयोजन यही जान पड़ता है कि उपासक यदि उपासना- कालमें अपनेको परमात्माकी भाँति देह और उसके व्यवहारसे सर्वथा असंग तथा नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त समझकर तद्रूप हो ध्यान करे तो वह शीघ्र ही सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है। सम्बन्ध—पुनः प्रकारान्तरसे औपाधिक भेदकी मान्यताका निराकरण करते हैं— सैव हि सत्यादयः ॥ ३।३।३८॥ सा एव=(परमात्मा और जीवका औपाधिक भेद तथा वास्तवमें अत्यन्त अभेद माननेपर) वही अनुपपत्ति है; हि=क्योंकि; सत्यादयः=(परमात्माके) सत्यसंकल्पत्व आदि धर्म (जीवात्माके नहीं माने जा सकते)। व्याख्या—जैसे पूर्वसूत्रमें यह अनुपपत्ति दिखा आये हैं कि जीवात्मा और परमात्मामें अत्यन्त अभेद होनेपर श्रुतिके व्यतिहार-वाक्यद्वारा दोनोंकी एकताका स्थापन संगत नहीं हो सकता, वैसे ही अनुपपत्ति इस सूत्रमें भी प्रकारान्तरसे दिखायी जाती है। कहना यह है कि परमात्माके स्वरूपका जहाँ वर्णन किया गया है, वहाँ उसे सत्यकाम, सत्यसंकल्प, अपहतपाप्मा, अजर, अमर, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सबका परम कारण तथा सर्वाधार बताया गया है। ये सत्यकामत्व आदि धर्म जीवात्माके धर्मोंसे सर्वथा विलक्षण हैं। जीवात्मामें इनका पूर्णरूपसे होना सम्भव नहीं है। जब दोनोंमें धर्मकी समानता नहीं है, तब उनका अत्यन्त अभेद कैसे सिद्ध हो सकता है। इसलिये परमात्मा और जीवात्माका भेद उपाधिकृत है—यह मान्यता असंगत है। सम्बन्ध—यदि कहा जाय कि 'परब्रह्म परमेश्वरमें जो सत्यकामत्व आदि धर्म श्रुतिद्वारा बताये गये हैं, वे स्वाभाविक नहीं, किंतु उपाधिके सम्बन्धसे हैं, वास्तवमें ब्रह्मका स्वरूप तो निर्विशेष है। अतः इन धर्मोंको

सूत्र ३९ ] अध्याय ३ ३४९

सूत्र ३९ ] अध्याय ३ ३४९ लेकर जीवसे उसकी भिन्नता नहीं बतायी जा सकती है' तो यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि- कामादीतरत्र तत्र चायतनादिभ्यः ॥ ३।३।३९॥ (उस परब्रह्मके) इतरत्र = दूसरी जगह (बताये हुए); कामादि = सत्यकामत्वादि धर्म; तत्र च= जहाँ निर्विशेष स्वरूपका वर्णन है वहाँ भी हैं. आयतनादिभ्यः = क्योंकि वहाँ उसके सर्वाधारत्व आदि धर्मोंका वर्णन पाया जाता है। व्याख्या- उस परब्रह्म परमेश्वरके जो सत्यसंकल्पत्व, सर्वज्ञत्व तथा सर्वेश्वरत्वादि धर्म विभिन्न श्रुतियोंमें बतलाये गये हैं, वे सब जहाँ निर्विशेष ब्रह्मका वर्णन है, वहाँ भी हैं; क्योंकि निर्विशेष स्वरूपका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंमें भी ब्रह्मके सर्वाधारत्व आदि सविशेषधर्मोंका वर्णन है। इसलिये वैसे दूसरे धर्मोंका भी वहाँ अध्याहार कर लेना उचित है। बृहदारण्यकमें गार्गीके प्रश्नका उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्यने उस परम अक्षर परमात्माके स्वरूपका वर्णन किया है। वहाँ पहले 'अस्थूलमणणु' (न स्थूल है; न सूक्ष्म है) इत्यादि प्रकारसे निर्विशेष स्वरूपके लक्षणोंका वर्णन करके अन्तमें कहा है कि 'इस अक्षरके ही प्रशासनमें सूर्य और चन्द्रमा धारण किये हुए हैं, उस अक्षरके ही प्रशासनमें द्युलोक और पृथिवी धारण किये हुए हैं।' इस प्रकार याज्ञवल्क्यने यहाँ उस अक्षरब्रह्मको समस्त जगत्का आधार बतलाया है (बृह० उ० ३।८।८-९)१ इसी तरह मुण्डकोपनिषद्में 'जाननेमें न आनेवाला, पकड़नेमें न आनेवाला' इत्यादि प्रकारसे निर्विशेष स्वरूपके धर्मोंका वर्णन करनेके पश्चात् उस ब्रह्मको नित्य, विभु, सर्वगत, अत्यन्त सूक्ष्म और समस्त प्राणियोंका कारण बताकर उसे विशेष धर्मोंसे युक्त भी कहा गया है (मु० उ० १।१।६)२ इससे यह सिद्ध होता है कि 'वह परमात्मा दोनों १-यह मन्त्र १। ३। १० और ११ की व्याख्यामें आया है। २-यह मन्त्र सूत्र १। २। २१ की व्याख्यामें आया है।

३५० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ प्रकारके धर्मोंवाला है।' इसलिये दूसरी जगह कहे हुए सत्यसंकल्पत्व, सर्वज्ञत्व आदि जितने भी परमेश्वरके दिव्य गुण हैं, वे उनमें स्वाभाविक हैं, उपाधिकृत नहीं हैं। अतः जहाँ जिन लक्षणोंका वर्णन नहीं है, वहाँ उनका अध्याहार कर लेना चाहिये; इस प्रकार परमात्मा और जीवात्मामें समानधर्मता न होनेके कारण उनमें सर्वथा अभेद नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध—यदि जीव और ईश्वरका भेद उपाधिकृत नहीं माना जायगा, तब तो अनेक द्रष्टाओंकी सत्ता सिद्ध हो जायगी। इस परिस्थितिमें श्रुतिद्वारा जो यह कहा है कि 'इससे अन्य कोई द्रष्टा नहीं है' इत्यादि, उसकी व्यवस्था कैसे होगी? इसपर कहते हैं— आदरादलोपः ॥ ३। ३। ४० ॥ आदरात् = वह कथन परमेश्वरके प्रति आदरका प्रदर्शक होनेके कारण; अलोपः = उसमें अन्य द्रष्टाका लोप अर्थात् निषेध नहीं है। व्याख्या—उस परब्रह्म परमेश्वरको सर्वश्रेष्ठ बतलानेके लिये वहाँ आदरकी दृष्टिसे अन्य द्रष्टाका निषेध किया गया है, वास्तवमें नहीं। भाव यह है कि वह परब्रह्म परमेश्वर ऐसा द्रष्टा, ऐसा सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता है कि उसकी अपेक्षा अन्य सब जीव द्रष्टा होते हुए भी नहींके समान हैं; क्योंकि उनमें पूर्ण द्रष्टापन नहीं है। प्रलयकालमें जड तत्त्वोंकी भाँति जीवोंको भी किसी प्रकारका विशेष ज्ञान नहीं रहता तथा वर्तमानकालमें भी जो जीवोंका जानना, देखना, सुनना आदि है, वह सीमित है और उस अन्तर्यामी परमेश्वरके ही सकाशासे है। (ऐ० उ० १। ३। ११) तथा (प्र० उ० ४। ९) वही इसका प्रेरक है, अतः यह सर्वथा स्वतन्त्र नहीं है। इससे यही सिद्ध होता है कि श्रुतिका वह कहना भगवान्‌की श्रेष्ठता दिखलानेके लिये है, वास्तवमें अन्य द्रष्टाका निषेध करनेके लिये नहीं है। सम्बन्ध—उपर्युक्त कथन परमेश्वरके प्रति आदर सूचित करनेके लिये है, इस बातको प्रकारान्तरसे सिद्ध करते हैं—

सूत्र ४१ ] अध्याय ३ ३५१

सूत्र ४१ ] अध्याय ३ ३५१ उपस्थितेऽतस्तद्वचनात् ॥ ३ । ३ । ४१ ॥ उपस्थिते = उक्त वचनोंसे किसी प्रकार अन्य चेतनका निषेध प्राप्त होनेपर भी; अतः = इस ब्रह्मकी अपेक्षा अन्य द्रष्टाका निषेध बतानेके कारण (वह कथन आदरार्थक ही है); तद्वचनात् = क्योंकि उन वाक्योंके साथ बार-बार अतः शब्दका प्रयोग किया गया है। व्याख्या—जहाँ उस परमात्मासे अन्य द्रष्टा, श्रोता आदिका निषेध है (बृह० उ० ३।७।२३), वहाँ उस वर्णनमें बार-बार ‘अतः’ शब्दका प्रयोग किया गया है, इसलिये यही सिद्ध होता है कि इसकी अपेक्षा या इससे अधिक कोई द्रष्टा, श्रोता आदि नहीं है। यदि सर्वथा अन्य द्रष्टाका निषेध करना अभीष्ट होता तो ‘अतः’ शब्दकी कोई आवश्यकता नहीं होती। जैसे यह कहा जाय कि इससे अन्य कोई धार्मिक नहीं है तो इस कथनद्वारा अन्य धार्मिकोंसे उसकी श्रेष्ठता बताना ही अभीष्ट है, न कि अन्य सब धार्मिकोंका अभाव बतलाना। उसी प्रकार वहाँ जो यह कहा गया है कि ‘इस परमात्मासे अन्य कोई द्रष्टा आदि नहीं है’ उस कथनका भी यही अर्थ है कि इससे अधिक कोई द्रष्टापन आदि गुणोंसे युक्त पुरुष नहीं है; यह परमात्मा ही सर्वश्रेष्ठ द्रष्टा आदि है; क्योंकि उसी वर्णनके प्रसंगमें (बृह० उ० ३। ७। २२)* परब्रह्म परमात्माको जीवात्माका अन्तर्यामी और जीवात्माको उसका शरीर बताकर दोनोंके भेदका प्रतिपादन किया है। यदि ‘नान्योऽतो द्रष्टा’ इत्यादि वाक्योंसे अन्य द्रष्टा अर्थात् जीवात्माका निषेध बताना माना जाय तो पूर्व वर्णनसे विरोध आयेगा, इसलिये वहाँ अन्य द्रष्टाके निषेधका तात्पर्य परमात्माको सर्वश्रेष्ठ द्रष्टा बताकर उसके प्रति आदर प्रदर्शित करना ही समझना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँतक यह निर्णय किया गया कि जीवात्मा और परमात्माका

  • यह मन्त्र सूत्र १।२।२० की टिप्पणीमें आया है।