वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२१२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
२१२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या—उपर्युक्त प्रकारसे दोनों श्रुतियोंके कथनकी एकता होनेसे यह समझना चाहिये कि उक्त तेजसे जल उत्पन्न हुआ। सम्बन्ध—इस प्रकरणमें यह कहा गया है कि उस जलने अन्नको रचा, अतः यहाँ गेहूँ, जौ आदि अन्नकी उत्पत्ति जलसे हुई या पृथिवीसे ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— पृथिव्यधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः ॥ २ । ३ । १२ ॥ पृथिवी=(इस प्रकरणमें अन्नके नामसे) पृथिवी ही कही गयी है; अधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः=क्योंकि पाँचों तत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रकरण है, उसमें बताया हुआ काला रूप भी पृथिवीका ही माना गया है तथा दूसरी श्रुतिमें भी जलसे पृथिवीकी ही उत्पत्ति बतायी गयी है। व्याख्या—इस प्रकरणमें अन्न शब्द पृथिवीका ही बोधक है, ऐसा समझना ठीक है; क्योंकि यह तत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रकरण है तथा जो अन्नका रूप काला बताया गया है, वह भी अन्नका रूप नहीं है, पृथिवीका ही रूप काला माना गया है। इसके सिवा, तैत्तिरीयोपनिषद्में जहाँ इस क्रमका वर्णन है वहाँ भी जलसे पृथिवीका उत्पन्न होना बताया गया है, उसके बाद पृथिवीसे ओषधि और ओषधिसे अन्नकी उत्पत्तिका वर्णन है*। इसीलिये यहाँ सीधे जलसे ही अन्नकी उत्पत्ति मानना ठीक नहीं है। छान्दोग्यके उक्त प्रकरणमें जो यह बात कही गयी है कि ‘यत्र क्व च वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवति।’ (६।२।४) अर्थात् ‘जहाँ-जहाँ जल अधिक बरसता है, वहीं अन्नकी उत्पत्ति अधिक होती है।’ इसका भी यही भाव है कि जलके सम्बन्धमें पृथिवीमें पहले ओषधि अर्थात् अन्नका पौधा उत्पन्न होता है और उससे अन्न उत्पन्न होता है; ऐसा माननेपर पूर्वापरमें कोई विरोध नहीं रहेगा। सम्बन्ध—इस प्रकरणमें आकाशकी उत्पत्ति साक्षात् ब्रह्मसे बतायी गयी है और अन्य चार तत्त्वोंमें एकसे दूसरेकी क्रमशः उत्पत्ति बतायी है। अतः यह जिज्ञासा होती है कि एक तत्त्वके बाद दूसरे तत्त्वकी रचना
- देखिये पृष्ठ २०७ की टिप्पणी।
सूत्र १३-१४] अध्याय २ २१३
सूत्र १३-१४] अध्याय २ २१३ साक्षात् परमेश्वर करता है या एक तत्त्व दूसरे तत्त्वको स्वयं उत्पन्न करता है? इसपर कहते हैं- तदभिध्यानादेव तु तल्लिङ्गात्सः ॥ २।३।१३ ॥ तदभिध्यानात् = उन तत्त्वोंके भलीभाँति चिन्तन करनेका कथन होनेसे; एव=ही; तु=तो (यह सिद्ध होता है कि); सः = वह परमात्मा ही उन सबकी रचना करता है; तल्लिङ्गात् = क्योंकि उक्त लक्षण उसीके अनुरूप है। व्याख्या - इस प्रकरणमें बार-बार कार्यके चिन्तनकी बात कही गयी है, यह चिन्तनरूप कर्म जडमें सम्भव नहीं है, चेतन परमात्मामें ही संगत हो सकता है, इसलिये यही सिद्ध होता है कि वह परमात्मा स्वयं ही उत्पन्न किये हुए पहले तत्त्वसे दूसरे तत्त्वको उत्पन्न करता है। इसी उद्देश्यसे एक तत्त्वसे दूसरे तत्त्वकी उत्पत्तिका कथन है। उन तत्त्वोंको स्वतन्त्ररूपसे एक-दूसरेके कार्य-कारण बतानेके उद्देश्यसे नहीं। इसलिये यही समझना चाहिये कि मुख्यरूपसे सबकी रचना करनेवाला वह पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर ही है, अन्य कोई नहीं। सम्बन्ध - इस प्रकार जगत्की उत्पत्तिके वर्णनद्वारा ब्रह्मको जगत्का कारण बताकर अब प्रलयके वर्णनसे भी इसी बातकी पुष्टि करते हैं- विपर्ययेण तु क्रमोऽत उपपद्यते च ॥ २।३।१४ ॥ तु=किंतु; अतः = इस उत्पत्ति-क्रमसे; क्रमः = प्रलयका क्रम; विपर्ययेण = विपरीत होता है; उपपद्यते = ऐसा ही होना युक्तिसंगत है; च=तथा (स्मृतिमें भी ऐसा ही वर्णन है)। व्याख्या - उपनिषदोंमें जगत्की उत्पत्तिका जो क्रम बताया गया है, इससे विपरीत क्रम प्रलयकालमें होता है। प्रारम्भिक सृष्टिके समय ब्रह्मसे आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी आदिके क्रमसे जगत्की उत्पत्ति होती है। फिर जब प्रलयकाल आता है, तब ठीक उसके विपरीत क्रमसे पृथिवी आदि तत्त्वोंका अपने कारणोंमें लय होता है। जैसे पृथिवी जलमें, जल
विष्णुपुराण अंश ६, अध्याय ४, श्लोक १४ से ३८ तक)।
२९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ अग्निमें, अग्नि वायुमें, वायु आकाशमें और आकाश परमात्मामें विलीन हो जाता है। युक्तिसे भी यही क्रम ठीक जान पड़ता है। प्रत्येक कार्य अपने उपादान कारणमें ही लीन होता है। जैसे जलसे बर्फ बनता है और जलमें ही उसका लय होता है। स्मृतियोंमें भी ऐसा ही वर्णन आता है। (देखिये विष्णुपुराण अंश ६, अध्याय ४, श्लोक १४ से ३८ तक)। सम्बन्ध—यहाँ भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलयका क्रम तो बताया गया, परंतु मन, बुद्धि और इन्द्रियोंकी उत्पत्तिके विषयमें कोई निर्णय नहीं हुआ, अतः यह जिज्ञासा होती है कि इन सबकी उत्पत्ति भूतोंसे ही होती है या परमेश्वरसे ? यदि परमेश्वरसे होती है तो भूतोंके पहले होती है या पीछे ? अतः इसका निर्णय करनेके लिये कहते हैं— अन्तरा विज्ञानमनसी क्रमेण तल्लिंङ्गादिति चेन्नाविशेषात् ॥ २ । ३ । १५ ॥ चेत्=यदि कहो; विज्ञानमनसी=इन्द्रियाँ और मन; क्रमेण=उत्पत्ति- क्रमकी दृष्टिसे; अन्तरा (स्याताम्)=परमात्मा और आकाश आदि भूतोंके बीचमें होने चाहिये; तल्लिंङ्गात्=क्योंकि (श्रुतिमें) यही निश्चय करानेवाला लिंग (प्रमाण) प्राप्त होता है; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; अविशेषात्=क्योंकि श्रुतिमें किसी क्रम-विशेषका वर्णन नहीं है। व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्में पहले यह वर्णन आया है कि 'जैसे प्रज्वलित अग्निसे चिनगारियोंकी उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार ये नाना- रूपोंसे संयुक्त पदार्थ उस परमेश्वरसे उत्पन्न होते हैं और उसीमें विलीन हो जाते हैं।'* (मु० २।१।१) फिर जगत्के कारणरूप उस परमेश्वरके
- यथा सुदीप्तात् पावकाद् विस्फुलिंगाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः। तथाक्षराद् विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापि यन्ति॥ (मु० उ० २।१।१)
सूत्र १५ ] अध्याय २ २१५
सूत्र १५ ] अध्याय २ २१५ परात्पर स्वरूपका वर्णन करते हुए उसे अजन्मा, अविनाशी, दिव्य, निराकार, सब प्रकारसे परम शुद्ध और समस्त जगत्के बाहर-भीतर व्याप्त बताया गया है।१ तदनन्तर यह कहा गया है कि 'इसी परब्रह्म पुरुषोत्तमसे यह प्राण, मन, सब इन्द्रियाँ तथा आकाश, वायु, ज्योति, जल और सबको धारण करनेवाली पृथिवी उत्पन्न होती है।'२ इस वर्णनमें परमात्मासे पहले प्राण, मन और इन्द्रियोंके उत्पन्न होनेकी बात बताकर आकाश आदि भूतोंकी क्रमशः उत्पत्ति बतायी गयी है; अतः परमात्मा और आकाशके बीचमें मन-इन्द्रियोंका स्थान निश्चित होता है। तात्पर्य यह कि प्राण और इन्द्रियोंसहित मनकी उत्पत्तिके बाद ही आकाश आदि भूतोंकी सृष्टि माननी चाहिये; क्योंकि उपर्युक्त श्रुतिमें जैसा क्रम दिया गया है, वह इसी निश्चयपर पहुँचानेवाला है; ऐसा यदि कोई कहे तो उसका यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि इस वर्णनमें विशेषरूपसे कोई क्रम नहीं बताया गया है। इससे तो केवल यही बात सिद्ध होती है कि बुद्धि, मन और इन्द्रियोंकी उत्पत्ति भी परमेश्वरसे ही होती है; इतना ही क्यों, उक्त श्रुतिके पूरे प्रकरणको देखनेसे यह स्पष्ट हो जाता है कि श्रुतिका उद्देश्य किसी प्रकारके क्रमका प्रतिपादन करना नहीं है, उसे केवल यही बताना अभीष्ट है कि जगत्का उपादान और निमित्त कारण एकमात्र ब्रह्म है; क्योंकि भिन्न-भिन्न कल्पोंमें भिन्न-भिन्न क्रमसे जगत्की उत्पत्तिका वर्णन श्रुतियों और स्मृतियोंमें पाया जाता है। अतः किसी एक ही क्रमको निश्चित कर देना नहीं बन सकता (देखिये मु० उ० २।१।५ से ९ तक)। १-दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः। अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात् परतः परः॥ (मु० उ० २।१।२) २-एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च। खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी॥ (मु० उ० २।१।३)
२१६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
२१६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध— इस ग्रन्थमें अबतकके विवेचनसे परब्रह्म परमेश्वरको जड- चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण सिद्ध किया गया। इससे यह प्रतीत होता है कि उस परब्रह्मसे अन्य तत्त्वोंकी भाँति जीवोंकी भी उत्पत्ति होती है। यदि यही बात है तो फिर यह प्रश्न उठता है कि परमात्माका ही अंश होनेसे जीवात्मा तो अविनाशी, नित्य तथा जन्म-मरणसे रहित माना गया है, उसकी उत्पत्ति कैसे होती है? इसपर कहते हैं— चराचरव्यपाश्रयस्तु स्यात्तद्व्यपदेशो भाक्तस्तद्भाव- भावित्वात् ॥ २ । ३ । १६ ॥ तु=किंतु; चराचरव्यपाश्रयः=चराचर शरीरोंको लेकर कहा हुआ; तद्व्यपदेशः=वह जन्म-मरण आदिका कथन; भाक्तः स्यात्=जीवात्माके लिये गौणरूपसे हो सकता है; तद्भावभावित्वात्=क्योंकि वह उन-उन शरीरोंके भावसे भावित रहता है। व्याख्या—यह जीवात्मा वास्तवमें सर्वथा शुद्ध परमेश्वरका अंश, जन्म-मरणसे रहित विज्ञानस्वरूप नित्य अविनाशी है; इसमें कोई शंका नहीं है। तो भी यह अनादि परम्परागत अपने कर्मोंके अनुसार प्राप्त हुए स्थावर (वृक्ष-पहाड़ आदि), जंगम (देव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि) शरीरोंके आश्रित है, उन-उनके साथ तद्रूप हो रहा है, 'मैं शरीरसे सर्वथा भिन्न हूँ, इससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है,' इस वास्तविक तत्त्वको नहीं जानता; इस कारण उन-उन शरीरोंके जन्म-मरण आदिको लेकर गौणरूपसे जीवात्माका उत्पन्न होना श्रुतिमें कहा गया है, इसलिये कोई विरोध नहीं है। कल्पके आदिमें इस जड-चेतनात्मक अनादिसिद्ध जगत्का प्रकट हो जाना ही उस परमात्मासे इसका उत्पन्न होना है और कल्पके अन्तमें उस परमेश्वरमें विलीन हो जाना ही उसका लय है (गीता ९।७-१०) इसके सिवा, परब्रह्म परमात्मा किन्हीं नये जीवोंको उत्पन्न करते हों, ऐसी बात नहीं है। इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीन प्रकारके शरीरोंके आश्रित जीवात्माका
सूत्र १७ ] अध्याय २ २१७
सूत्र १७ ] अध्याय २ २१७ परमात्मासे उत्पन्न होना और उसमें विलीन होना श्रुति-स्मृतियोंमें जगह- जगह कहा गया है। जीवोंको भगवान् उनके परम्परागत संचित कर्मोंके अनुसार ही अच्छी-बुरी योनियोंमें उत्पन्न करते हैं, यह पहले सिद्ध कर दिया गया है (देखिये ब्र० सू० २।१।३४)। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जीवोंकी उत्पत्ति गौण न मानकर मुख्य मान ली जाय तो क्या आपत्ति है, इसपर कहते हैं— नात्माऽश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः ॥ २।३।१७॥ आत्मा=जीवात्मा; न=वास्तवमें उत्पन्न नहीं होता; अश्रुतेः=क्योंकि श्रुतिमें कहीं भी जीवात्माकी उत्पत्ति नहीं बतायी गयी है; च=इसके सिवा; ताभ्यः= उन श्रुतियोंसे ही; नित्यत्वात्=इसकी नित्यता सिद्ध की गयी है, इसलिये भी (जीवात्माकी उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती)। व्याख्या—श्रुतिमें कहीं भी जीवात्माका वास्तवमें उत्पन्न होना नहीं कहा गया है। मुण्डकोपनिषद्में जो अग्निके दृष्टान्तसे नाना भावोंकी उत्पत्तिका वर्णन है* (मु० उ० २।१।१) वह पूर्वसूत्रमें कहे अनुसार शरीरोंकी उत्पत्तिको लेकर ही है। इसी प्रकार दूसरी श्रुतियोंके कथनका उद्देश्य भी समझ लेना चाहिये। अतः श्रुतिका यही निश्चित सिद्धान्त है कि जीवात्माकी स्वरूपसे उत्पत्ति नहीं होती। इतना ही नहीं, श्रुतियोंद्वारा उसकी नित्यताका भी प्रतिपादन किया गया है। छान्दोग्योपनिषद्में सजीव वृक्षके दृष्टान्तसे श्वेतकेतुको समझाते हुए उसके पिताने कहा है कि 'जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियते।' अर्थात् 'जीवसे रहित हुआ यह शरीर ही मरता है, जीवात्मा नहीं मरता' (छा० उ० ६।११।३), कठोपनिषद्में कहा है कि यह विज्ञानस्वरूप जीवात्मा न तो जन्मता है और न मरता ही है। यह अजन्मा, नित्य, सदा रहनेवाला और पुराण है, शरीरका नाश होनेपर इसका नाश नहीं
- यह मन्त्र पृष्ठ २१४ की टिप्पणीमें आ गया है।
२१८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
२१८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ होता'* (क० उ० १।२।१८) इत्यादि। इसलिये यह सर्वथा निर्विवाद है कि जीवात्मा स्वरूपसे उत्पन्न नहीं होता। सम्बन्ध — जीवकी नित्यताको दृढ़ करनेके लिये पुनः कहते हैं— ज्ञोऽत एव॥ २।३।१८॥ अतः=(वह नित्य अर्थात् जन्म-मरणसे रहित है) इसलिये; एव=ही; ज्ञः=ज्ञाता है। व्याख्या—वह जीवात्मा स्वरूपसे जन्मने-मरनेवाला नहीं है, नित्य चेतन है, इसीलिये वह ज्ञाता है। भाव यह कि वह जन्मने-मरनेवाला या घटने-बढ़नेवाला और अनित्य होता तो ज्ञाता नहीं हो सकता। किंतु सिद्ध योगी अपने जन्म-जन्मान्तरोंकी बात जान लेता है तथा प्रत्येक जीवात्मा पहले शरीरसे सम्बन्ध छोड़कर जब दूसरे नवीन शरीरको धारण करता है, तब पूर्वस्मृतिके अनुसार स्तन-पानादिमें प्रवृत्त हो जाता है। इसी प्रकार पशु-पक्षी आदिको भी प्रजोत्पादनका ज्ञान पहलेके अनुभवकी स्मृतिसे हो जाता है। तथा बालकपन और युवा अवस्थाओंकी घटनाएँ जिसकी जानकारीमें रहती हैं वह नहीं बदलता, यह सबका अनुभव है, यदि आत्माका परिवर्तन होता तो वह ज्ञाता नहीं हो सकता। इससे यह सिद्ध होता है कि जीव नित्य है और ज्ञान-स्वरूप है, शरीरोंके बदलनेसे जीवात्मा नहीं बदलता। सम्बन्ध — जीवात्मा नित्य है, शरीरके बदलनेसे वह नहीं बदलता; इस बातको प्रकारान्तरसे पुनः सिद्ध करते हैं— उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम्॥ २।३।१९॥ उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम्=(एक ही जीवात्माके) शरीरसे उत्क्रमण करने,
- न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
सूत्र २० ] अध्याय २ २१९
सूत्र २० ] अध्याय २ २१९ परलोकमें जाने और पुनः लौटकर आनेका श्रुतिमें वर्णन है (इससे भी यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा नित्य है)। व्याख्या—कठोपनिषद् (२।२।७)-में कहा है कि— योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः। स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्॥ 'मरनेके बाद इन जीवात्माओंमेंसे अपने-अपने कर्मोंके अनुसार कोई तो वृक्षादि अचल शरीरको धारण कर लेते हैं और कोई देव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि जंगम शरीरोंको धारण कर लेते हैं।' प्रश्नोपनिषद्में कहा है—'अथ यदि द्विमात्रेण मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकम्। स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ॥' (प्र० उ० ५।४)। अर्थात् 'यदि कोई इस ॐकारकी दो मात्राओंको लक्ष्य करके मनमें ध्यान करता है, तो यजुर्वेदकी श्रुतियाँ उसे अन्तरिक्षवर्ती चन्द्रलोकमें ऊपरकी ओर ले जाती हैं; वहाँ स्वर्गलोकमें नाना प्रकारके ऐश्वर्योंका भोग करके वह पुनः मृत्युलोकमें लौट आता है। इसी प्रकार अन्यान्य श्रुतियोंमें जीवात्माके वर्तमान शरीरको छोड़ने, परलोकमें जाने तथा वहाँसे पुनः लौटकर आनेका वर्णन है; इससे भी यही सिद्ध होता है कि शरीरके नाशसे जीवात्माका नाश नहीं होता, वह नित्य और अपरिवर्तनशील है। सम्बन्ध—कही हुई बातसे ही पुनः आत्माका नित्यत्व सिद्ध करते हैं— स्वात्मना चोत्तरयोः ॥ २।३।२० ॥ उत्तरयोः=परलोकमें जाना और पुनः वहाँसे लौट आना—इन पीछे कही हुई दोनों क्रियाओंकी सिद्धि; स्वात्मना=स्वस्वरूपसे; च=ही होती है (इसलिये भी आत्मा नित्य है)। व्याख्या—उत्क्रान्तिका अर्थ है शरीरका वियोग। यह तो आत्माको नित्य न माननेपर भी होगा ही; किंतु बादमें बतायी हुई गति और आगति अर्थात् परलोकमें जाना और वहाँसे लौटकर आना—इन दो क्रियाओंकी सिद्धि अपने स्वरूपसे ही हो सकती है। जो परलोकमें जाता है, वही स्वयं लौटकर आता
२२० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
२२० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ है, दूसरा नहीं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि शरीरके नाशसे आत्माका नाश नहीं होता और वह सदा ही रहता है। सम्बन्ध—इस प्रकार श्रुतिप्रमाणसे जो आत्माका नित्यत्व सिद्ध किया गया, इसमें जीवात्माको गमनागमनशील—एक देशसे दूसरे देशमें जाने- आनेवाला कहा गया। यदि यही ठीक है तब तो आत्मा विभु नहीं माना जा सकता, उसको एकदेशी मानना पड़ेगा; अतः उसका नित्यत्व भी गौण ही होगा। इस शंकाका निराकरण करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। इसमें पूर्वपक्षकी ओरसे आत्माके अणुत्वकी स्थापना करके अन्तमें उसको विभु (व्यापक) सिद्ध किया गया है। नाणुरतच्छ्रुतेरिति चेन्नेतराधिकारात् ॥ २।३।२१॥ चेत्=यदि कहो कि; अणुः=जीवात्मा अणु; न=नहीं है; अतच्छ्रुतेः = क्योंकि श्रुतिमें उसको अणु न कहकर महान् और व्यापक बताया गया है; इति न=तो यह कहना ठीक नहीं; इतराधिकारात्=क्योंकि (जहाँ श्रुतियोंमें आत्माको महान् और विभु बताया है) वहाँ दूसरेका अर्थात् परमात्माका प्रकरण है। व्याख्या—'स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु।' (बृह० उ० ४।४।२२) अर्थात् 'जो यह विज्ञानमय आत्मा प्राणोंमें है, वही यह महान् अजन्मा आत्मा है।' इत्यादि श्रुतियोंके वर्णनको लेकर यदि यह कहा जाय कि श्रुतिमें उसको अणु नहीं कहा गया है, महान् कहा गया है, इसलिये जीवात्मा अणु नहीं है, व्यापक है तो यह सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि यह श्रुति परमात्माके प्रकरणकी है; अतः वहाँ आया हुआ 'आत्मा' शब्द जीवात्माका वाचक नहीं है। सम्बन्ध—केवल इतनी ही बात नहीं है, अपितु— स्वशब्दानुमानाभ्यां च ॥ २।३।२२॥ स्वशब्दानुमानाभ्याम् = श्रुतिमें अणुवाचक शब्द है, उससे और अनुमान (उपमा) वाचक दूसरे शब्दोंसे; च=भी। (जीवात्माका अणुत्व सिद्ध होता है)।
सूत्र २३ ] अध्याय २ २२१
सूत्र २३ ] अध्याय २ २२१ व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्में कहा है कि 'एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः' (३।१।९) अर्थात् 'यह अणु परिणामवाला आत्मा चित्तसे जाननेके योग्य है।' तथा श्वेताश्वतरमें कहा है कि 'बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च। भागो जीवः स विज्ञेयः।' (५।९) अर्थात् 'बालके अग्रभागके सौ टुकड़े किये जायँ और उनमेंसे एक टुकड़ेके पुनः एक सौ टुकड़े किये जायँ, तो उतना ही माप जीवात्माका समझना चाहिये।' इस प्रकार श्रुतिमें स्पष्ट शब्दोंमें जीवको 'अणु' कहा गया है तथा उपमासे भी उसका अणुके तुल्य माप बताया गया है एवं युक्तिसे भी यही समझमें आता है कि जीवात्मा अणु है; अन्यथा वह सूक्ष्मातिसूक्ष्म शरीरमें प्रविष्ट कैसे हो सकता ? अतः यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा अणु है। सम्बन्ध—जीवात्माको शरीरके एक देशमें स्थित मान लेनेसे उसको समस्त शरीरमें होनेवाले सुख-दुःखादिका अनुभव कैसे होगा ? इसपर पूर्वपक्षकी ओरसे कहा जाता है— अविरोधश्चन्दनवत् ॥ २।३।२३॥ चन्दनवत्=जिस प्रकार एक देशमें लगाया हुआ चन्दन अपने गन्धरूप गुणसे सब जगह फैल जाता है, वैसे ही एक देशमें स्थित आत्मा विज्ञानरूप गुणद्वारा समस्त शरीरको व्याप्त करके सुख-दुःखादिका ज्ञाता हो जाता है, अतः;, अविरोधः=कोई विरोध नहीं है। व्याख्या—जीवको अणु मान लेनेपर उसको शरीरके प्रत्येक देशमें होनेवाली पीड़ाका ज्ञान होना युक्तिविरुद्ध प्रतीत होता है, ऐसी शंका भी नहीं करनी चाहिये, क्योंकि जिस प्रकार किसी एक देशमें लगाया हुआ या मकानमें किसी एक जगह रखा हुआ चन्दन अपने गन्धरूप गुणसे सब जगह फैल जाता है, वैसे ही शरीरके भीतर एक जगह हृदयमें स्थित हुआ जीवात्मा अपने विज्ञानरूप गुणके द्वारा समस्त शरीरमें फैल जाता है और सभी अंगोंमें होनेवाले सुख-दुःखोंको जान सकता है।
२२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
२२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध—शरीरके एक देशमें आत्माकी स्थिति है—यह सिद्ध करनेके लिये पूर्वपक्षी कहता है— अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्नाध्युपगमाद्धृदि हि ॥ २।३।२४॥ चेत् = यदि कहो; अवस्थितिवैशेष्यात् = चन्दन और आत्माकी स्थितिमें भेद है, इसलिये (चन्दनका दृष्टान्त उपयुक्त नहीं है); इति न = तो यह बात नहीं है; हि = क्योंकि; हृदि = हृदय-देशमें; अध्युपगमात् = उसकी स्थिति स्वीकार की गयी है। व्याख्या—यदि कहो कि चन्दनकी स्थिति तो एक देशमें प्रत्यक्ष है; किंतु उसके समान आत्माकी स्थिति शरीरके एक देशमें प्रत्यक्ष नहीं है; इसलिये यह दृष्टान्त उपयुक्त नहीं है। तो यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि श्रुतिने आत्माको हृदयमें स्थित बताकर उसकी एक देशमें स्थिति स्पष्ट स्वीकार की है, जैसे—'हृदि ह्येष आत्मा' 'यह आत्मा हृदयमें स्थित है।' (प्र० उ० ३। ६) तथा 'कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः'—'आत्मा कौन है', ऐसा पूछनेपर कहा है कि 'प्राणोंमें हृदयके अंदर जो यह विज्ञानमय ज्योतिःस्वरूप पुरुष है।' (बृह० उ० ४। ३। ७) इत्यादि। सम्बन्ध—उसी बातको प्रकारान्तरसे कहते हैं— गुणाद्वा लोकवत् ॥ २।३।२५॥ वा = अथवा यह समझो कि अणुपरिमाणवाले जीवात्माका; गुणात् = चेतनतारूप गुणसे समस्त शरीरको चेतनायुक्त कर देना सम्भव है; लोकवत् = क्योंकि लोकमें ऐसा देखा जाता है। व्याख्या—अथवा जिस प्रकार लोकमें यह बात प्रत्यक्ष देखी जाती है कि घरके किसी एक देशमें रखा हुआ दीपक अपने प्रकाशरूप गुणसे समस्त घरको प्रकाशित कर देता है वैसे ही शरीरके एक देशमें स्थित अणु मापवाला जीवात्मा अपने चेतनतारूप गुणके द्वारा समस्त शरीरको चेतनायुक्त कर देता है; अतः इसमें कोई विरोध नहीं है।
सूत्र २६-२७ ] अध्याय २ २२३ सम्बन्ध — गुण अपने गुणीसे अलग कैसे होता है ? इसपर कहते हैं— व्यतिरेको गन्धवत् ॥ २ । ३ । २६ ॥ गन्धवत् = गन्धकी भाँति; व्यतिरेकः = गुणका गुणीसे अलग होना बन सकता है (अतः कोई विरोध नहीं है)। व्याख्या — यहाँ यह शंका भी नहीं करनी चाहिये कि गुण तो गुणीके साथ ही रहता है, वह गुणीसे अलग होकर कोई कार्य कैसे कर सकता है; क्योंकि जैसे गन्ध अपने गुणी पुष्प आदिसे अलग होकर स्थानान्तरमें फैल जाती है, उसी प्रकार आत्माका चेतनतारूप गुण भी आत्मासे अलग होकर समस्त शरीरमें व्याप्त हो जाता है; अतः कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध — इसी बातको श्रुतिप्रमाणसे दृढ़ करते हैं— तथा च दर्शयति ॥ २ । ३ । २७ ॥ तथा = ऐसा; च = ही; दर्शयति = श्रुति भी दिखलाती है। व्याख्या — केवल युक्तिसे ही यह बात सिद्ध होती हो, ऐसा नहीं; श्रुतिमें भी आत्माका एक जगह रहकर अपने गुणके द्वारा समस्त शरीरमें नखसे लोमतक व्याप्त होना दिखाया गया है। * अतः यह सिद्ध होता है कि आत्मा अणु है। सम्बन्ध — इस प्रकार पूर्वपक्षीद्वारा इक्कीसवें सूत्रसे लेकर सत्ताईसवें सूत्रतक जीवात्माका अणु होना सिद्ध किया गया; किंतु उसमें दी हुई युक्तियाँ सर्वथा निर्बल हैं और पूर्वपक्षीद्वारा उद्धृत श्रुति-प्रमाण तो आभासमात्र है ही, इसलिये अब सिद्धान्तीकी ओरसे अणुवादका खण्डन करके आत्माके विभुत्वकी सिद्धि की जाती है—
- स एष इह प्रविष्टः । आ नखाग्रेभ्यः । (बृह० उ० १।४।७) तौ होचतुः सर्वमेवेदमावां भगव आत्मानं पश्याव आ लोमभ्य आ नखेभ्यः प्रतिरूपमिति ॥ (छा० उ० ८।८।१)
२२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
२२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ पृथगुपदेशात् ॥ २ । ३ । २८ ॥ पृथक् = (जीवात्माके विषयमें) अणुपरिमाणसे भिन्न; उपदेशात् = उपदेश श्रुतिमें मिलता है, इसलिये (जीवात्मा अणु नहीं, विभु है)। व्याख्या - पूर्वपक्षकी ओरसे जीवात्माको अणु बतानेके लिये जो प्रमाण दिया गया, उसी श्रुतिमें स्पष्ट शब्दोंमें जीवात्माको विभु बताया गया है। भाव यह कि जहाँ जीवात्माका स्वरूप बालाग्रके दस हजारवें भागके समान बताया है, वहीं उसको 'स चानन्त्याय कल्पते।' इस वाक्यसे अनन्त अर्थात् विभु होनेमें समर्थ कहा गया है (श्वेता० उ० ५। ९)। अतः प्रमाण देनेवालेको श्रुतिके अगले उपदेशपर भी दृष्टिपात करना चाहिये। इसके सिवा, कठोपनिषद् (१। ३। १०, १३; २। ३। ७) -में स्पष्ट ही जीवात्माका विशेषण 'महान्' आया है तथा गीतामें भी जीवात्माके स्वरूपका वर्णन करते हुए स्पष्ट कहा है कि 'यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है' (गीता २। २४)। 'जिस प्रकार सब जगह व्याप्त हुआ भी आकाश सूक्ष्म होनेके कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही आत्मा भी शरीरमें सब जगह स्थित है तो भी उससे लिप्त नहीं होता।' (गीता १३। ३२) तथा 'उस आत्माको तू अविनाशी समझ, जिससे यह समस्त जडसमुदाय व्याप्त है।' (गीता २। १७) - इन प्रमाणोंके विषयमें यह नहीं कहा जा सकता कि ये परमात्माके प्रकरणमें आये हैं। सम्बन्ध - इसपर यह जिज्ञासा होती है कि यदि ऐसी बात है तो श्रुतिमें जो स्पष्ट शब्दोंमें आत्माको अणु और अंगुष्ठमात्र कहा है, उसकी संगति कैसे होगी? इसपर कहते हैं- तद्गुणसारत्वात्तु तद्व्यपदेशः प्राज्ञवत् ॥ २ । ३ । २९ ॥ तद्व्यपदेशः = वह कथन; तु = तो; तद्गुणसारत्वात् = उस बुद्धि आदिके गुणोंकी प्रधानताको लेकर है; प्राज्ञवत् = जैसे परमेश्वरको अणु और हृदयमें स्थित अंगुष्ठमात्र बताया है, वैसे ही जीवात्माके लिये भी समझना चाहिये।
सूत्र २९ ] अध्याय २ २२५ व्याख्या—श्रुतिमें जीवात्माको अंगुष्ठमात्र परिमाणवाला कहते हुए इस प्रकार वर्णन किया गया है— अंगुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः संकल्पाहंकारसमन्वितो यः। बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव आराग्रमात्रो ह्यपरोऽपि दृष्टः॥ 'जो अंगुष्ठमात्र परिमाणवाला, सूर्यके सदृश प्रकाशस्वरूप तथा संकल्प और अहंकारसे युक्त है, वह बुद्धिके गुणोंसे और शरीरके गुणोंसे ही आरेकी नोक-जैसे सूक्ष्म आकारवाला है—ऐसा परमात्मासे भिन्न जीवात्मा भी निःसंदेह ज्ञानियोंद्वारा देखा गया है।' (श्वेता० उ० ५।८) जीवात्माकी गति-आगतिका वर्णन भी शरीरादिके सम्बन्धसे ही है, (कौ० उ० ३।६; प्र० उ० ३।९, १०)¹। इससे यह बात बिलकुल स्पष्ट हो जाती है कि श्रुतिमें जहाँ कहीं जीवात्माको एकदेशी 'अंगुष्ठमात्र' या 'अणु' कहा गया है, वह बुद्धि और शरीरके गुणोंको लेकर ही है; जैसे परमात्माको भी जगह-जगह जीवात्माके हृदयमें स्थित (क० उ० १।३। १; प्र० उ० ६।२; मु० उ० २।१।१० तथा २।२।१; ३।१।५, ७; श्वेता० उ० ३।२०) तथा अंगुष्ठमात्र भी (क० उ० २।१।१२-१३) बताया है। वह कथन स्थानकी अपेक्षासे ही है, उसी प्रकार जीवात्माके विषयमें भी समझना चाहिये। वास्तवमें वह अणु नहीं, विभु है; इसमें कोई शंका नहीं है। पूर्वपक्षीने जो बृहदारण्यक और छान्दोग्य-श्रुतिका प्रमाण देकर यह बात कही कि 'वह एक जगह स्थित रहते हुए ही नखसे लोमतक व्याप्त है', वह कहना सर्वथा प्रकरणविरुद्ध है; क्योंकि उस प्रकरणमें आत्माके गुणकी व्याप्तिविषयक कोई बात ही नहीं कही गयी है।² तथा गन्ध, प्रदीप आदिका दृष्टान्त देकर जो गुणके द्वारा आत्माके चैतन्यकी व्याप्ति बतायी है, वह भी युक्तिसंगत १-यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति। २-देखो सूत्र २।३।२७ की टिप्पणी।
२२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
२२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ नहीं है; क्योंकि श्रुतिमें आत्माका चैतन्यगुण विशिष्ट नहीं माना गया है, बल्कि परमेश्वरकी भाँति सत्, चेतन और आनन्द—ये उसके स्वरूपभूत लक्षण माने गये हैं। अतः जीवात्माको अणु मानना किसी प्रकार भी उचित नहीं है। सम्बन्ध— यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि इस प्रकार बुद्धि आदिके गुणोंके संयोगसे आत्माको अंगुष्ठमात्र तथा एकदेशी माना जायगा, स्वरूपसे नहीं, तब तो जब प्रलयकालमें आत्माके साथ बुद्धि आदिका सम्बन्ध नहीं रहेगा, उस समय समस्त जीवोंकी मुक्ति हो जायगी। अतः प्रलयके बाद सृष्टि भी नहीं हो सकेगी। यदि मुक्त जीवोंका पुनः उत्पन्न होना मान लिया जाय तो मुक्तिके अभावका प्रसंग उपस्थित होगा, इसपर कहते हैं— यावदात्मभावित्वाच्च न दोषस्तद्दर्शनात् ॥ २ । ३ । ३० ॥ यावदात्मभावित्वात् = जबतक स्थूल, सूक्ष्म या कारण—इनमेंसे किसी भी शरीरके साथ जीवात्माका सम्बन्ध रहता है, तबतक वह उस शरीरके अनुरूप, एकदेशी-सा रहता है, इसलिये; च = भी; दोषः = उक्त दोष; न = नहीं है; तद्दर्शनात् = श्रुतिमें भी ऐसा ही देखा गया है। व्याख्या— श्रुतिमें कहा गया है कि जीवका एक शरीरसे दूसरेमें जाते समय भी सूक्ष्मशरीरसे सम्बन्ध बना रहता है (प्र० उ० ३ । ९, १०), परलोकमें भी उसका शरीरसे सम्बन्ध माना गया है तथा सुषुप्ति और स्वप्नकालमें भी देहके साथ उसका सम्बन्ध बताया गया है (प्र० उ० ४ । २, ५)।*
- तस्मै स होवाच यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति। ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति। तेन तर्ह्येष पुरुषो न श्रृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥ 'उससे उन सुप्रसिद्ध महर्षि पिप्पलादने कहा—गार्ग्य ! जिस प्रकार अस्त होते हुए सूर्यकी सब किरणें इस तेजोमण्डलमें एक हो जाती हैं; फिर उदय होनेपर वे सब पुनः- पुनः सब ओर फैलती रहती हैं। ठीक ऐसे ही (निद्राके समय) वे सब इन्द्रियाँ भी परमदेव
सूत्र ३१ ] अध्याय २ २२७
सूत्र ३१ ] अध्याय २ २२७ इसी प्रकार प्रलयकालमें भी कर्मसंस्कारोंके सहित कारणशरीरसे जीवात्माका सम्बन्ध रहता है; क्योंकि श्रुतिमें यह बात स्पष्ट कही है कि प्रलयकालमें यह विज्ञानात्मा समस्त इन्द्रियोंके सहित उस परब्रह्ममें स्थित होता है (प्र० उ० ४।११)* इसलिये सुषुप्ति और प्रलयकालमें समस्त जीवोंके मुक्त होनेका तथा मुक्त पुरुषोंके पुनर्जन्म आदिका कोई दोष नहीं आ सकता। सम्बन्ध—प्रलयकालमें तो समस्त जगत् परमात्मामें विलीन हो जाता है, वहाँ बुद्धि आदि तत्त्वोंकी भी परमात्मासे भिन्न सत्ता नहीं रहती। इस स्थितिमें बुद्धि आदिके समुदायरूप सूक्ष्म या कारणशरीरके साथ जीवात्माका सम्बन्ध कैसे रह सकता है? और यदि उस समय नहीं रहता है तो सृष्टिकालमें कैसे सम्बन्ध हो जाता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— पुंस्त्वादिवत्त्वस्य सतोऽभिव्यक्तियोगात्॥ २।३।३१॥ पुंस्त्वादिवत् = पुरुषत्व आदिकी भाँति; सतः = पहलेसे विद्यमान; अस्य = इस मनमें एक हो जाती हैं; इस कारण उस समय वह जीवात्मा न तो सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न मैथुनका आनन्द भोगता है, न मल-मूत्रका त्याग करता है और न चलता ही है। उस समय 'वह सो रहा है' ऐसा लोग कहते हैं।' अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति। यद् दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति। देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चानुभूतं च सच्चासच्व सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति॥ 'इस स्वप्नावस्थामें यह जीवात्मा अपनी विभूतिका अनुभव करता है, जो बार-बार देखा हुआ है, उसीको बार-बार देखता है। बार-बार सुनी हुई बातको पुनः-पुनः सुनता है। नाना देश और दिशाओंमें बार-बार अनुभव किये हुए विषयोंको पुनः-पुनः अनुभव करता है। इतना ही नहीं, देखे और न देखे हुएको भी, सुने हुए और न सुने हुएको भी, अनुभव किये हुए और अनुभव न किये हुएको भी तथा विद्यमान और अविद्यमानको भी देखता है, इस प्रकार वह सारी घटनाओंको देखता है और सब कुछ स्वयं बनकर देखता है।'
- विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र। तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति॥
२२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
२२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ (कारण शरीरादिके) सम्बन्धका; तु=ही; अभिव्यक्तियोगात्=(सृष्टिकालमें) प्रकट होनेका योग है, इसलिये (कोई दोष नहीं है)। व्याख्या—प्रलयकालमें यद्यपि बुद्धि आदि तत्त्व स्थूलरूपमें न रहकर अपने कारणरूप परब्रह्म परमेश्वरमें विलीन हो जाते हैं, तथापि भगवान्की अचिन्त्य शक्तिके रूपमें वे अव्यक्तरूपसे सब-के-सब विद्यमान रहते हैं। तथा सब जीवात्मा भी अपने-अपने कर्मसंस्काररूप कारणशरीरोंके सहित अव्यक्तरूपसे उस परब्रह्म परमेश्वरमें विलीन रहते हैं (प्र० उ० ४।११)।* उनके सम्बन्धका सर्वथा नाश नहीं होता। अतः सृष्टिकालमें उस परब्रह्म परमात्माके संकल्पसे वे उसी प्रकार सूक्ष्म और स्थूल रूपोंमें प्रकट हो जाते हैं, जैसे बीजरूपमें पहलेसे ही विद्यमान पुरुषत्व बाल्यकालमें प्रकट नहीं होता, किंतु युवावस्थामें शक्तिके संयोगसे प्रकट हो जाता है। यही बात बीज- वृक्षके सम्बन्धमें भी समझी जा सकती है। (गीता अध्याय १४ श्लोक ३ और ४ में यही बात स्पष्ट की गयी है) इसलिये कोई विरोध नहीं है। जिस साधकका अन्तःकरण साधनाके द्वारा जितना शुद्ध और व्यापक होता है, वह उतना ही विशाल हो जाता है। यही कारण है कि योगीमें दूर देशकी बात जानने आदिकी सामर्थ्य आ जाती है, क्योंकि जीवात्मा तो पहलेसे सर्वत्र व्याप्त है ही, अन्तःकरण और स्थूलशरीरके सम्बन्धसे ही वह उसके अनुरूप आकारवाला हो रहा है। सम्बन्ध— जीवात्मा तो स्वयंप्रकाशस्वरूप है, उसे मन, बुद्धिके सम्बन्धसे वस्तुका ज्ञान होता है, यह माननेकी क्या आवश्यकता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसंगोऽन्यतरनियमो वान्यथा ॥ २ । ३ । ३२ ॥ अन्यथा=जीवको अन्तःकरणके सम्बन्धसे विषय-ज्ञान होता है; ऐसा
- यह मन्त्र पूर्वसूत्रकी टिप्पणीमें आ गया है।
सूत्र ३२ ] अध्याय २ २२९
सूत्र ३२ ] अध्याय २ २२९ न माननेपर; नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसंगः = उसे सदा ही विषयोंके अनुभव होनेका या कभी भी न होनेका प्रसंग उपस्थित होगा; वा = अथवा; अन्यतरनियमः = आत्माकी ग्राहक-शक्ति या विषयकी ग्राह्य-शक्तिके नियमन (प्रतिबन्ध)-की कल्पना करनी पड़ेगी (ऐसी दशामें अन्तःकरणका सम्बन्ध मानना ही युक्तिसंगत है)। व्याख्या—यदि यह नहीं माना जाय कि यह जीवात्मा अन्तःकरणके सम्बन्धसे समस्त वस्तुओंका अनुभव करता है तो प्रत्यक्षमें जो यह देखा जाता है कि यह जीवात्मा कभी किसी वस्तुका अनुभव करता है और कभी नहीं करता, इसकी सिद्धि नहीं होगी; क्योंकि इसको यदि प्रकाशस्वरूप होनेके कारण स्वतः अनुभव करनेवाला मानेंगे, तब तो इसे सदैव एक साथ प्रत्येक वस्तुका ज्ञान रहता है, ऐसा मानना पड़ेगा। यदि इसमें जाननेकी शक्ति स्वाभाविक नहीं मानेंगे तो कभी किसी भी कालमें न जाननेका प्रसंग आ जायगा अथवा दोनोंमेंसे किसी एककी शक्तिका नियमन (संकोच) मानना पड़ेगा। अर्थात् या तो यह स्वीकार करना पड़ेगा कि किसी निमित्तसे जीवात्माकी ग्राहकशक्तिका प्रतिबन्ध होता है या यह मानना पड़ेगा कि विषयकी ग्राह्य-शक्तिमें किसी कारणवश प्रतिबन्ध आ जाता है। प्रतिबन्ध हट जानेपर विषयकी उपलब्धि होती है और उसके रहनेपर विषयोपलब्धि नहीं होती। परंतु यह गौरवपूर्ण कल्पना करनेकी अपेक्षा अन्तःकरणके सम्बन्धको स्वीकार कर लेनेमें ही लाघव है। इसलिये यही मानना ठीक है कि अन्तःकरणके सम्बन्धसे ही जीवात्माको समस्त लौकिक पदार्थोंका अनुभव होता है। ‘मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति’ (बृह० उ० १।५।३) अर्थात् ‘मनसे ही देखता है, मनसे सुनता है’ इत्यादि मन्त्र-वाक्योंद्वारा श्रुति भी अन्तःकरणके सम्बन्धको स्वीकार करती है। जीवात्माका अन्तःकरणसे सम्बन्ध रहते हुए भी वह कभी तो कार्यरूपमें प्रकट रहता है और कभी कारणरूपसे अप्रकट रहता है। इस प्रकार यहाँतक यह बात सिद्ध हो गयी कि जीवात्माको जो अणु कहा
२३० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
२३० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ गया है, वह उसकी सूक्ष्मताका बोधक है, न कि एकदेशिता (छोटेपन)- का; और उसको जो अंगुष्ठमात्र कहा गया है, वह मनुष्य-शरीरके हृदयके मापके अनुसार कहा गया है तथा उसे जो छोटे आकारवाला बताया गया है, वह भी संकीर्ण अन्तःकरणके सम्बन्धसे है, वास्तवमें वह विभु (समस्त जड पदार्थोंमें व्याप्त) और अनन्त (देश-कालकी सीमासे अतीत है)। सम्बन्ध—सांख्यमतमें जड प्रकृतिको स्वतन्त्र कर्ता माना गया है और पुरुषको असंग माना गया है, किंतु जड प्रकृतिको स्वभावसे कर्ता मानना युक्तिसंगत नहीं है तथा पुरुष असंग होनेसे उसको भी कर्ता मानना नहीं बन सकता। अतः यह निश्चय करनेके लिये कि कर्ता कौन है, अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। वहाँ गौणरूपसे 'जीवात्मा कर्ता है' यह बात सिद्ध करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं— कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात्॥ २। ३। ३३॥ कर्ता=कर्ता जीवात्मा है; शास्त्रार्थवत्त्वात्=क्योंकि विधि-निषेधबोधक शास्त्रकी इसीमें सार्थकता है। व्याख्या—श्रुतियोंमें जो बार-बार यह कहा गया है कि अमुक काम करना चाहिये, अमुक नहीं करना चाहिये। अमुक शुभ कर्म करनेवालेको अमुक श्रेष्ठ फल मिलता है, अमुक पापकर्म करनेवालेको अमुक दुःख भोग करना पड़ता है, इत्यादि; यह जो शास्त्रका कथन है; वह किसी चेतनको कर्ता न माननेसे और जड प्रकृतिको कर्ता माननेसे भी व्यर्थ होता है; किंतु शास्त्र-वचन कभी व्यर्थ नहीं हो सकता। इसलिये जीवात्माको ही समस्त कर्मोंका कर्ता मानना उचित है। इसके सिवा, श्रुति स्पष्ट शब्दोंमें जीवात्माको कर्ता बतलाती है;* यहाँ यह ध्यानमें रखना चाहिये कि अनादिकालसे जो जीवात्माका कारण-शरीरके साथ सम्बन्ध है उसीसे जीवको कर्ता माना गया
- एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः। (प्र० उ० ४। ९)
सूत्र ३४-३५] अध्याय २ २३१
सूत्र ३४-३५] अध्याय २ २३१
है, स्वरूपसे वह कर्ता नहीं है; क्योंकि श्रुतिमें उसका स्वरूप निष्क्रिय बताया गया है। (श्वेता० ६।१२) यह बात इस प्रकरणके अन्तमें सिद्ध की गयी है। सम्बन्ध — जीवात्माके कर्ता होनेमें दूसरा हेतु बताया जाता है— विहारोपदेशात् ॥ २। ३। ३४ ॥ विहारोपदेशात् = स्वप्नमें स्वेच्छासे विहार करनेका वर्णन होनेसे भी (यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा 'कर्ता' है)। व्याख्या — शास्त्रके विधि-निषेधके सिवा, यह स्वप्नावस्थामें स्वेच्छापूर्वक घूमना-फिरना, खेल-तमाशा करना आदि कर्म करता है, ऐसा वर्णन है (बृह० उ० ४। ३। १३; २। १। १८) इसलिये भी यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा कर्ता है, जड प्रकृतिमें स्वेच्छापूर्वक कर्म करना नहीं बनता। सम्बन्ध — तीसरा कारण बताते हैं— उपादानात् ॥ २। ३। ३५ ॥ उपादानात् = इन्द्रियोंको ग्रहण करके विचरनेका वर्णन होनेसे (भी यही सिद्ध होता है कि इन्द्रिय आदिके सम्बन्धसे जीवात्मा 'कर्ता' है)। व्याख्या — यहाँ 'उपादान' शब्द उपादान कारणका वाचक नहीं; किंतु 'ग्रहण' रूप क्रियाका बोधक है। श्रुतिमें कहा है— 'स यथा महाराजो जानपदान् गृहीत्वा स्वे जनपदे यथाकामं परिवर्तेतैवमेवैष एतत्प्राणान् गृहीत्वा स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते ॥' (बृह० उ० २। १। १८) अर्थात् 'जिस प्रकार कोई महाराज प्रजाजनोंको साथ लेकर अपने देशमें इच्छानुसार भ्रमण करता है, वैसे ही यह जीवात्मा स्वप्नावस्थामें प्राणशब्दवाच्य इन्द्रियोंको ग्रहण करके इस शरीरमें इच्छानुसार विचरता है। इस प्रकार इन्द्रियोंके द्वारा कर्म करनेका वर्णन होनेसे यह सिद्ध होता है कि प्रकृति या इन्द्रियाँ स्वतन्त्र 'कर्ता' नहीं हैं; उनसे युक्त हुआ जीवात्मा ही कर्ता है (गीता १५। ७, ९)। सम्बन्ध — प्रकारान्तरसे जीवात्माका कर्तापन सिद्ध करते हैं—