ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र २०-२३ ] अध्याय १ ६१
सूत्र २०-२३ ] अध्याय १ ६१ है, इसलिये; ( 'दहर' शब्दसे यहाँ जीवात्माका ही ग्रहण है ) इति=ऐसा मानना चाहिये; तदुक्तम्=तो इसका उत्तर दिया जा चुका है । व्याख्या-‘श्रुतिमे दहराकाशको अत्यन्त अल्प ( लघु ) बताया गया है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि वह जीवात्मा है; क्योकि उसीका स्वरूप ‘अणु’ माना गया है ।'' परन्तु ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योकि, इसका उत्तर पहले ( सूत्र १ । २ । ७ मे ) दिया जा चुका है । अतः वारम्बार उसीको दुहराने- की आवश्यकता नहीं है । सम्बन्ध-पूर्वसूत्रमे उठायी हुई शङ्काका उत्तर प्रकारान्तरसं दिया जाता है- अनुकृतेस्तस्य च ॥ १ । ३ । २२ ॥ तस्य=उस जीवात्माका; अनुकृतेः=अनुकरण करनेके कारण; च=भी; ( परमात्माको अल्प परिमाणवाला कहना उचित है ) । व्याख्या-मनुष्यके हृदयका माप अङ्गुष्ठके बराबर माना गया है; उसीमे जीवात्माके साथ परमात्माके प्रविष्ट होनेकी बात श्रुतिमे इस प्रकार बतायी गयी है- 'ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।' ( क० उ० १ । ३ । १ ) अर्थात् 'शुभ कर्मोंके फलरूप मनुष्य-शरीरमे परब्रह्मके निवास-स्थानरूप हृदयाकाशके अन्तर्गत बुद्धिरूप गुहामे छिपे हुए सत्यका पान करनेवाले दो ( जीवात्मा और परमात्मा ) है ।' 'तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ।' ( तै० उ० २ । ६ ) 'परमात्मा उस जड-चेतनात्मक संपूर्ण जगत्की रचना करके स्वयं भी जीवात्माके साथ उसमें प्रविष्ट हो गया ।' तथा-'सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत् ।' ( छा० उ० ६ । ३ । ३ ) 'उस परमात्माने त्रिविध तत्त्वरूप देवता अर्थात् उनके कार्यरूप मनुष्य- शरीरमे जीवात्माके सहित प्रविष्ट होकर नाम-रूपका विस्तार किया ।' इत्यादि । इस प्रकार उस परमात्माको जीवात्माका अनुकरण करनेवाला बताया जानेके कारण भी उसे अल्प परिमाणवाला कहना सर्वथा उचित ही है । इसी भावको लेकर वेदोमे जगह-जगह परमात्माका स्वरूप 'अणोरणीयान्'-छोटे-से-छोटा तथा 'महतो महीयान्'-बडे-से-बड़ा बताया गया है । सम्बन्ध-इस विषयमे स्मृतिका भी प्रमाण देते हैं- अपि च स्मर्यते ॥ १ । ३ । २३ ॥
६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ च=इसके सिवा; स्मर्यते अपि=यही बात स्मृतिमे भी कही गयी है । व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वर सबके हृदयमे स्थित है और वह छोटे-से भी छोटा है—ऐसा वर्णन स्मृतियोंमें इस प्रकार आया है—'सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः।' ( गीता १५। १५ ) । 'हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।' ( गीता १३। १७ ) । 'ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।' ( गीता १८। ६१ ) । 'अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।' ( गीता १३। १६ ) । 'अणोरणीयांसम्।' ( गीता ८। ९) इत्यादि। ऐसा वर्णन होनेके कारण उस सर्वव्यापी परब्रह्म परमेश्वरको स्थानकी अपेक्षासे छोटे आकारवाला कहना उचित ही है । अतः 'दहर' शब्दसे परब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है, जीवात्माका नहीं। सम्बन्ध—उपर्युक्त विवेचन पढकर यह जिज्ञासा होती है कि कठोपनिषद् ( २। १ । १२, १३ तथा २ । ३ । १७ ) में जिसे अङ्गुष्ठके बराबर बताया गया है, वह जीवात्मा हे या परमात्मा ? अतः इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— शब्दादेव प्रमितः ॥ १ । ३ । २४ ॥ शब्दात्=( उक्त प्रकरणमे आये हुए ) शब्दसे; एव=ही; ( यह सिद्ध होता है कि ) प्रमितः=अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला पुरुष ( परमात्मा ही है ) । व्याख्या—कठोपनिषद्मे कहा है कि 'अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति।' ( २ । १ । १२ ) तथा 'अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः । ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः ॥' ( २ । १ । १३ ) । अर्थात् 'अङ्गुष्ठके बराबर मापवाला परम पुरुष शरीरके मध्यभाग ( हृदय ) में स्थित है।' तथा अङ्गुष्ठके बराबर मापवाला परम पुरुष धूमरहित ज्योतिकी भाँति एकरस है, वह भूत, वर्तमान और भविष्यपर शासन करनेवाला है । वह आज भी है और कल भी रहेगा; अर्थात् वह नित्य सनातन है।' इस प्रकरणमे जिसे अङ्गुष्ठके बराबर मापवाला पुरुष बताया गया है, वह परब्रह्म परमात्मा ही है; यह बात उन्हीं मन्त्रोमे कहे हुए शब्दोंसे सिद्ध होती है । क्योंकि वहाँ उस पुरुषको भूत, वर्तमान और भविष्यमे होनेवाली समस्त प्रजाका शासक, धूमरहित अग्निके सदृश एकरस और सदा रहनेवाला बताया गया है तथा आगे चलकर उसीको विशुद्ध अमृतस्वरूप जाननेके लिये कहा गया है ( २ । ३ । १७ ) ।
सूत्र २४—२६ ] अध्याय १ ६३
सूत्र २४—२६ ] अध्याय १ ६३ सम्बन्ध—अब यह जिज्ञासा होती है कि उस परब्रह्म परमात्माको अङ्गुष्ठके बराबर मापवाला क्यों बताया गया है ? इसपर कहते हैं— हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात् ॥ १ । ३ । २५ ॥ तु=उस परमपुरुषको अङ्गुष्ठके बराबर मापवाला कहना तो; हृदि= हृदयमे स्थित बताये जानेकी; अपेक्षया=अपेक्षासे है; मनुष्याधिकारत्वात्= क्योकि ( ब्रह्मविद्यामे ) मनुष्यका ही अधिकार है । व्याख्या—उपनिषदोंमे वर्णित ब्रह्मविद्याके द्वारा ब्रह्मको जाननेका अधिकार मनुष्यको ही है । अन्य पशु-पक्षी आदि अधम योनियोंमे यह जीवात्मा उस परब्रह्म परमात्माको नहीं जान सकता और मनुष्यके हृदयका माप अङ्गुष्ठके बराबर माना गया है; इस कारण यहाँ मनुष्य-हृदयके मापकी अपेक्षासे उस परब्रह्म परमेश्वरको 'अङ्गुष्ठमात्र पुरुष' कहा गया है । सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें अधिकारकी बात आ जानेसे प्रसङ्गवश दूसरा प्रकरण चल पड़ा । पहले यह बताया गया है कि वेदाध्ययनपूर्वक ब्रह्मविद्याके द्वारा ब्रह्मको प्राप्त करनेका अधिकार मनुष्योंका ही है । इसपर यह जिज्ञासा होती है कि क्या मनुष्यको छोड़कर अन्य किसीका भी अधिकार नहीं है ? इसपर कहते हैं— तदुपर्यपि बादरायणः संभवात् ॥ १ । ३ । २६ ॥ बादरायणः=आचार्य बादरायण कहते है कि; तदुपरि=मनुष्यसे ऊपर जो देवता आदि हैं, उनका; अपि=भी ( अधिकार है ), संभवात्=क्योकि उन्हें वेद-ज्ञानपूर्वक ब्रह्मज्ञान होना संभव है । व्याख्या—मनुष्यसे नीचेकी योनियोमे तो वेदविद्याको पढ़ने तथा उसके द्वारा परमात्म-ज्ञान प्राप्त करनेकी सामर्थ्य ही नहीं है, इसलिये उनका अधिकार न बतलाना तो उचित ही है । परन्तु देवादि योनि मनुष्ययोनिसे ऊपर है । जो मनुष्य धर्म तथा ज्ञानमे श्रेष्ठ होते हैं, उन्हींको देवादि योनि प्राप्त होती है । अतः उनमे पूर्वजन्मके अभ्याससे ब्रह्मविद्याको जाननेकी सामर्थ्य होती ही है । अतएव साधन करनेपर उन्हे ब्रह्मका ज्ञान होना सम्भव है । इसलिये भगवान् बादरायणका कहना है कि मनुष्योंसे ऊपरवाली योनियोंमे भी ब्रह्मज्ञान प्राप्त करनेका अधिकार है ।
६४ वेदान्त-दर्शन [ पाद-३ सम्बन्ध—उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये ही सूत्रकार स्वयं शङ्का उठाकर उसका समाधान करते हैं— विरोधः कर्मणीति चेन्नानेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात् ॥ १ । ३ । २७ ॥ चेत्=यदि कहो (देवता आदिको शरीरधारी मान लेनेसे); कर्मणि=यज्ञादि कर्ममे; विरोधः=विरोध आता है; इति न=तो यह कथन ठीक नहीं है; अनेकप्रतिपत्तेः=क्योकि उनके द्वारा एक ही समय अनेक रूप धारण करना संभव है; दर्शनात्=शास्त्रमें ऐसा देखा गया है । व्याख्या—"यदि देवता आदिको भी मनुष्योके समान विशेष आकृतियुक्त या शरीरधारी मान लिया जायगा तो वे एक देशमे ही रहनेवाले माने जा सकते है । ऐसी दशामे एक ही समय अनेक यज्ञोमें उनके निमित्त दी जानेवाली हविष्यकी आहुतिको वे कैसे ग्रहण कर सकते हैं । अतः पृथक्-पृथक् अनेक याज्ञिकोंद्वारा एक समय यज्ञादि कर्ममे जो उनके लिये हवि समर्पित करनेका विधान है, उसमे विरोध आवेगा । इस विरोधकी निवृत्ति तभी हो सकती है, जब देवताओंको एकदेशीय न मानकर व्यापक माना जाय ।' परन्तु ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योंकि देवोमे अनेक विग्रह धारण करनेकी सहज शक्ति होती है । अतः वे योगीकी भाँति एक ही कालमे अनेक शरीर धारण करके अनेक स्थानोमे एक साथ उनके लिये समर्पित की हुई हविको ग्रहण कर सकते है । शास्त्रमे भी देवताओंके सम्बन्धमे ऐसा वर्णन देखा जाता है । बृहदारण्यकोपनिषद् (३।९।१-२) मे एक प्रसङ्ग आता है, जिसमें शाकल्य तथा याज्ञवल्क्यका संवाद है । शाकल्यने पूछा—'देवता कितने है ?' याज्ञवल्क्य बोले—'तीन और तीन सौ तथा तीन और तीन सहस्र ।' फिर प्रश्न हुआ 'कितने देवता है ?' उत्तर मिला—'तैंतीस ।' बार-बार प्रश्नोत्तर होनेपर अन्तमे याज्ञवल्क्यने कहा—'ये सब तो इनकी महिमा हैं अर्थात् ये एक-एक ही अनेक हो जाते है । वास्तवमें देवता तैंतीस ही है ।' इत्यादि । इस प्रकार श्रुतिने देवताओमे अनेक रूप धारण करनेकी शक्तिका वर्णन किया है । योगियोमे भी ऐसी शक्ति देखी जाती है; इसलिये कोई विरोध नहीं है । सम्बन्ध—देवताओंको शरीरधारी माननेसे उन्हे विनाशशील मानना पड़ेगा; ऐसी दशामें वेदोंमें जिन-जिन देवताओंका वर्णन आता है, उनकी नित्यता नहीं
सूत्र २७-२८ ] अध्याय १ ६५
सूत्र २७-२८ ] अध्याय १ ६५ सिद्ध होगी और इसीलिये वेदको भी नित्य एवं प्रमाणभूत नहीं माना जा सकेगा; इस विरोधका परिहार कैसे हो ? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं— शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ॥ १ । ३ । २८ ॥ चेत्=यदि कहो; शब्दे=( देवताको शरीरधारी माननेपर ) वैदिक शब्दमे विरोध आता है; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; अतः प्रभवात्=क्योंकि इस वेदोक्त शब्दसे ही देवता आदि जगत्की उत्पत्ति होती है; प्रत्यक्षानु- मानाभ्याम्=यह बात प्रत्यक्ष ( वेद ) और अनुमान ( स्मृति ) दोनो प्रमाणोंसे सिद्ध होती है। व्याख्या—"देवताओमे अनेक शरीर धारण करनेकी शक्ति मान लेनेसे कर्ममे विरोध नहीं आता, यह तो ठीक है; परन्तु ऐसा माननेसे जो वेदोक्त शब्दोंको नित्य एवं प्रमाणभूत माना जाता है, उसमे विरोध आवेगा; क्योकि शरीरधारी होनेपर देवताओको भी जन्म-मरणशील मानना पड़ेगा। ऐसी दशामे वे नित्य नहीं होंगे तथा नित्य वैदिक शब्दोके साथ उनके नाम-रूपोका नित्य सम्बन्ध भी नहीं रह सकेगा।" ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योकि जहाँ कल्पके आदिमे देवादिकी उत्पत्तिका वर्णन आता है, वहाँ यह बताया गया है कि 'किस रूप और ऐश्वर्यवाले देवताका क्या नाम होगा।' इस प्रकार वेदोक्त शब्दसे ही उनके नाम, रूप और ऐश्वर्य आदिकी कल्पना की जाती है अर्थात् पूर्वकल्पमे जितने देवता, जिस-जिस नाम, रूप तथा ऐश्वर्यवाले थे, वर्तमान कल्पमें भी उतने ही देवता वैसे ही नाम, रूप और ऐश्वर्यसे युक्त उत्पन्न किये जाते हैं। इससे यह ज्ञात होता है कि कल्पान्तरमे देवता आदिके जीव तो बदल जाते हैं, परन्तु नाम-रूप पूर्वकल्पके अनुसार ही रहते हैं। यह बात प्रत्यक्ष ( श्रुति ) और अनुमान ( स्मृति ) के प्रमाणसे भी सिद्ध है। श्रुतियो और स्मृतियोमे उपर्युक्त बातका वर्णन इस प्रकार आता है—'स भूरिति व्याहरत् स भूमिमसृजत' 'स भुवरिति व्याहरत् सोऽन्तरिक्षमसृजत।' ( तै० ब्रा० २ । २ । ४ । २ ) 'उसने मन-ही-मन 'भूः' का उच्चारण किया, फिर भूमिकी सृष्टि की।' 'उसने मनमे 'भुवः' का उच्चारण किया, फिर अन्तरिक्षकी सृष्टि की।' इत्यादि। इस वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि प्रजापतिने पहले वाचक शब्दका स्मरण करके उसके अर्थभूत स्वरूपका निर्माण किया। इसी प्रकार स्मृतिमे भी कहा है— वे० द० ५—
६६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् । वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे ॥ ( मनु० १ । २१ ) 'उन सृष्टिकर्ता परमात्माने पहले सृष्टिके प्रारम्भमे सबके नाम और पृथक्- पृथक् कर्म तथा उन सबकी अलग-अलग व्यवस्थाएँ भी वेदोक्त शब्दोके अनुसार ही बनायीं ।' सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनको ही वेदकी नित्यतामे हेतु बतलाते हैं— अतएव च नित्यत्वम् ॥ १ । ३ । २९ ॥ अतएव=इसीसे; नित्यत्वम्=वेदकी नित्यता; च=भी; ( सिद्ध होती है )। व्याख्या—सृष्टिकर्त्ता परमेश्वर वैदिक शब्दोके अनुसार ही समस्त जगत्की रचना करते हैं, यह कहा गया है। इससे वेदोकी नित्यता स्वतः सिद्ध हो जाती है; क्योकि प्रत्येक कल्पमे परमेश्वरद्वारा वेदोकी भी नयी रचना की जाती है; यह बात कहीं नहीं कही गयी है। सम्बन्ध—प्रत्येक कल्पमें देवताओके नाम-रूप बदल जानेके कारण वेदोक्त शब्दोंकी नित्यतामें विरोध कैसे नही आयेगा ? इस जिज्ञासापर कहते है— समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात् स्मृतेश्च ॥ १ । ३ । ३० ॥ च=तथा; समाननामरूपत्वात्=( कल्पान्तरमे उत्पन्न होनेवाले देवादिको- के ) नाम-रूप पहलेके ही समान होते है, इस कारण; आवृत्तौ=पुनः आवृत्ति होनेपर; अपि=भी; अविरोधः=किसी प्रकारका विरोध नहीं है; दर्शनात्= क्योकि ( श्रुतिमे ) ऐसा ही वर्णन देखा गया है; च=और; स्मृतेः=स्मृतिसे भी ( यही बात सिद्ध होती है )। व्याख्या—वेदमें यह कहा गया है कि 'सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वम- कल्पयत् ।' ( ऋ० १० । १९० । ३ ) अर्थात् 'जगत्-स्रष्टा परमेश्वरने सूर्य, चन्द्रमा आदि सबको पहलेकी भाँति बनाया।' श्वेताश्वतरोपनिषद् ( ६ । १८ ) मे इस प्रकार वर्णन आता है— यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । त५ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥
सूत्र २९—३१ ] अध्याय १ ६७
सूत्र २९—३१ ] अध्याय १ ६७ 'जो परमेश्वर निश्चय ही, सृष्टिकालमें सबसे पहले ब्रह्माको उत्पन्न करता है और उन्हें समस्त वेदोंका उपदेश देता है, उस आत्मज्ञानविषयक बुद्धिको प्रकट करनेवाले प्रसिद्ध देव परमेश्वरकी मैं मुमुक्षुभावसे शरण ग्रहण करता हूँ।' इसी प्रकार स्मृतिमें भी कहा गया है कि— तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्या प्रतिपेदिरे । तान्येव ते प्रपद्यन्ते सृज्यमाना पुनः पुनः ॥ ( महा० ) 'पूर्वकल्पकी सृष्टिमें जिन्होंने जिन कर्मोंको अपनाया था, बादकी सृष्टिमें बारंबार रचे हुए वे प्राणी फिर उन्हीं कर्मोंको प्राप्त होते हैं।' इस प्रकार श्रुतियों तथा स्मृतियोंके वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि कल्पान्तर- में उत्पन्न होनेवाले देवादिकोंके नाम, रूप पहलेके सदृश ही वेद-वचनानुसार रचे जाते हैं; इसलिये उनकी बार-बार आवृत्ति होती रहनेपर भी वेदोंकी नित्यता तथा प्रामाणिकतामें किसी प्रकारका विरोध नहीं आता है। सम्बन्ध—२६ वें सूत्रमें जो प्रसङ्गवश यह बात कही गयी थी कि ब्रह्म- विद्यामें देवादिका भी अधिकार है, ऐसा वेदव्यासजी मानते हैं, उसीकी पुष्टि तीसवें सूत्रतक की गयी। अब आचार्य जैमिनिके मतानुसार यह बात कही जाती है कि ब्रह्मविद्यामें देवता आदिका अधिकार नहीं है— मध्वादिष्वसंभवादनधिकारं जैमिनिः ॥ १ । ३ । ३१ ॥ जैमिनिः=जैमिनि नामक आचार्य; मध्वादिषु=मधु-विद्या आदिमें; अनधिकारम् (आह) =देवता आदिका अधिकार नहीं बताते हैं; असंभवात्= क्योंकि यह संभव नहीं है। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्के तीसरे अध्यायमें प्रथमसे लेकर ग्यारहवें खण्डतक मधुविद्याका प्रकरण है। यहाँ 'सूर्य' को देवताओंका 'मधु' बताया गया है। मनुष्योंके लिये साधनद्वारा प्राप्त होनेवाली वस्तु देवताओंको स्वतः प्राप्त है, इस कारण देवताओंके लिये मधु-विद्या अनावश्यक है; अतः उस विद्यामें उनका अधिकार मानना सम्भव नहीं है। इसी प्रकार स्वर्गादि देवलोकके भोगोंकी प्राप्तिके लिये जो वेदोंमें यज्ञादिके द्वारा देवताओंकी सकाम उपासनाका वर्णन है, उसका अनुष्ठान भी देवताओंके लिये अनावश्यक होनेके कारण उनके द्वारा किया जाना सम्भव नहीं है। अतएव उसमें भी उनका अधिकार नहीं है,
६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ इसलिये यह सिद्ध होता है कि जैसे मनुष्योंके लिये यज्ञादि कर्मद्वारा स्वर्गादिकी प्राप्ति करानेवाली वेदवर्णित विद्याओंमें देवताओंका अधिकार नहीं है, उसी प्रकार ब्रह्मविद्यामे भी उनका अधिकार नहीं है । यों आचार्य जैमिनि कहते हैं । सम्बन्ध—इसी बातको पुष्ट करनेके लिये आचार्य जैमिनि दूसरी युक्ति देते हैं— ज्योतिषि भावाच्च ॥ १ । ३ । ३२ ॥ ज्योतिषि=ज्योतिर्मय लोकोमें; भावात्=देवताओंकी स्थिति होनेके कारण; च=भी; ( उनका यज्ञादि कर्म और ब्रह्मविद्यामें अधिकार नहीं है ) । व्याख्या—वे देवता स्वभावसे ही ज्योतिर्मय देवलोकोंमें निवास करते हैं, वहाँ उन्हें स्वभावसे ही सब प्रकारका ऐश्वर्य प्राप्त है; नये कर्मोंद्वारा उनको किसी प्रकारका नूतन ऐश्वर्य नहीं प्राप्त करना है; अतएव उन सब लोकोंकी प्राप्तिके लिये बताये हुए कर्मोंमें उनकी प्रवृत्ति सम्भव नहीं है; इसलिये जिस प्रकार वेदविहित अन्य विद्याओंमें उनका अधिकार नहीं है, उसी प्रकार ब्रह्मविद्यामें भी नहीं है । सम्बन्ध—पूर्वोक्त दो सूत्रोंसे जैमिनिके मतानुसार पूर्वपक्षकी स्थापना की गयी । अब उसके उत्तरमें सूत्रकार अपना निश्चित मत बतलाकर देवताओंके अधिकारविषयक प्रकरणको समाप्त करते हैं— भावं तु बादरायणोऽस्ति हि ॥ १ । ३ । ३३ ॥ तु=किन्तु; बादरायणः=बादरायण आचार्य ( यज्ञादि कर्म तथा ब्रह्म- विद्यामें ) देवता आदिके भी अधिकारका; भावम् ( मन्यते ) =भाव ( अस्तित्व ) मानते हैं; हि=क्योकि; अस्ति=श्रुतिमे ( उनके अधिकारका ) वर्णन है । व्याख्या—बादरायण आचार्य अपने मतका दृढ़तापूर्वक प्रतिपादन करते हुए 'तु' इस अव्यय पदके द्वारा यह सूचित करते हैं कि पूर्वपक्षीका मत शब्द- प्रमाणसे रहित होनेके कारण मान्य नहीं है । निश्चय ही यज्ञादि कर्म तथा ब्रह्म- विद्यामे देवताओंका भी अधिकार है; क्योकि वेदमें उनका यह अधिकार सूचित करनेवाले वचन मिलते हैं । जैसे—'प्रजापतिरकामयत प्रजायेयेति स एतदग्नि-
सूत्र ३२-३४ ] अध्याय १ ६९
सूत्र ३२-३४ ] अध्याय १ ६९ होत्रं मिथुनमपश्यत् । तदुदिते सूर्येऽजुहोत् ।' (तै० ब्रा० २ । १ । २ । ८ ) तथा 'देवा वै सत्रमासत ।' ( तै० सं० २ । ३ । ३ ) अर्थात् 'प्रजापतिने इच्छा की कि मैं प्रजारूपसे उत्पन्न होऊँ' उन्होंने अग्निहोत्ररूप मिथुनपर दृष्टिपात किया और सूर्योदय होनेपर उसका हवन किया।' तथा 'निश्चय ही देवताओने यज्ञका अनुष्ठान किया।' इत्यादि वचनोंद्वारा देवताओका कर्माधिकार सूचित होता है। इसी प्रकार ब्रह्मविद्यामे देवताओका अधिकार बतानेवाले वचन ये है—'तद् यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत् ।' ( बृह० १ । ४ । १० ) अर्थात् 'देवताओंमेंसे जिसने उस ब्रह्मको जान लिया, वही वह ब्रह्म हो गया।' इत्यादि । इसके सिवा, छान्दोग्योपनिषद्मे ( ८ । ७ । २ से ८ । १२ । ६ तक ) यह प्रसङ्ग आता है कि इन्द्र और विरोचनने ब्रह्माजीकी सेवामे रहकर बहुत वर्षोंतक ब्रह्मचर्य पालन करनेके पश्चात् ब्रह्मविद्या प्राप्त की। इन सब प्रमाणोंसे यही सिद्ध होता है कि देवता आदिका भी कर्म और ब्रह्मविद्यामे अधिकार है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि क्या सभी वर्णके मनुष्योंका वेदविद्यामें अधिकार है ? क्योंकि छान्दोग्योपनिषद्में ऐसा वर्णन मिलता है कि रैक्वने राजा जानश्रुतिको शूद्र कहते हुए भी उन्हें ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया। इससे तो यही सिद्ध होता है कि शूद्रका भी ब्रह्मविद्यामें अधिकार है। अतः इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— शुगस्य तदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात् सूच्यते हि ॥ १ । ३ । ३४ ॥ तदनादरश्रवणात् = उन हंसोंके मुखसे अपना अनादर सुनकर; अस्य= इस राजा जानश्रुतिके मनमे; शुक् = शोक उत्पन्न हुआ; तत्=तदनन्तर; आद्रवणात् = (जिनकी अपेक्षा अपनी तुच्छता सुनकर शोक हुआ था ) उन रैक्वमुनिके पास वह विद्या-प्राप्तिके लिये दौड़ा गया; ( इस कारण उस रैक्वने उसे शूद्र कहकर पुकारा ) हि=क्योकि (इससे); सूच्यते=(रैक्वमुनिकी सर्वज्ञता ) सूचित होती है। व्याख्या—इस प्रकरणमे रैक्वने राजा जानश्रुतिको जो शूद्र कहकर संबोधित किया, इसका यह अभिप्राय नहीं है कि वह जातिसे शूद्र था; अपि तु वह शोकसे व्याकुल होकर दौड़ा आया था, इसलिये उसे शूद्रं कहा। यही बात उस प्रकरणकी समालोचनासे सिद्ध होती है। १- शुचम् आद्रवति इति शूद्रः—जो शोकके पीछे दौड़ता है, वह शूद्र है, इस व्युत्पत्तिके अनुसार रैक्वने उसे 'शूद्र' कहा।
७० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ छान्दोग्योपनिषद्मे ( ४ । १ । १ से ४ तक ) वह प्रकरण इस प्रकार है—'राजा जानश्रुति श्रद्धापूर्वक बहुत दान देनेवाला था । वह अतिथियोंके भोजनके लिये बहुत अधिक अन्न तैयार कराकर रखता था । उनके ठहरनेके लिये उसने बहुत-सी विश्रामशालाएँ भी बनवा रक्खी थीं । एक दिनकी बात है, राजा जानश्रुति रातके समय अपने महलकी छतपर बैठा था । उसी समय उसके ऊपरसे आकाशमे कुछ हंस उड़ते हुए जा रहे थे । उनमेसे एक हंसने दूसरेको पुकारकर कहा—'अरे ! सावधान, इस राजा जानश्रुतिका महान् तेज आकाशमे फैला हुआ है, कहीं भूलसे उसका स्पर्श न कर लेना, नहीं तो वह तुझे भस्म कर देगा ।' यह सुनकर आगे जानेवाले हंसने कहा— 'अरे भाई ! तू किस महत्ताको लेकर इस राजाको इतना महान् मान रहा है, क्या तू इसको गाड़ीवाले रैक्वके समान समझता है !' इसपर पीछेवाले हंसने पूछा—'रैक्व कैसा है ?' अगले हंसने उत्तर दिया—'यह सारी प्रजा जो कुछ भी शुभ कर्म करती है, वह सब उस रैक्वको प्राप्त होता है, तथा जिस तत्त्वको रैक्व जानता है, उसे जो कोई भी जान ले, उसकी भी ऐसी ही महिमा हो जाती है ।' इस प्रकार हसोसे अपनी तुच्छताकी बात सुनकर राजाके मनमे शोक हुआ; फिर वह रैक्वकी खोज कराकर उनके पास विद्या-ग्रहणके लिये गया । रैक्व मुनि सर्वज्ञ थे, वे राजाकी मनःस्थितिको जान गये । उन्होंने उसके मनमें जगे हुए ईर्ष्याभावको दूर करके उसमें श्रद्धाका भाव उत्पन्न करनेका विचार किया और अपनी सर्वज्ञता सूचित करके उसे सावधान करते हुए 'शूद्र' कहकर पुकारा । यह जानते हुए भी कि जानश्रुति क्षत्रिय है, रैक्वने उसे 'शूद्र' इसलिये कहा कि वह शोकके वशीभूत होकर दौड़ा आया था । अतः इससे यह नहीं सिद्ध होता कि वेदविद्यामे शूद्रका अधिकार है । सम्बन्ध—राजा जानश्रुतिका क्षत्रिय होना कैसे सिद्ध होता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— क्षत्रियत्वावगतेश्चोत्तरत्र चैत्ररथेन लिङ्गात् ॥ १ । ३ । ३५ ॥ क्षत्रियत्वावगतेः = जानश्रुतिका क्षत्रिय होना प्रकरणमें आये हुए लक्षणसे जाना जाता है इससे; च = तथा; उत्तरत्र = बादमे कहे हुए; चैत्ररथेन = चैत्ररथके सम्बन्धसे; लिङ्गात् = जो क्षत्रियत्वसूचक चिह्न या प्रमाण प्राप्त होता है, उससे भी ( उसका क्षत्रिय होना ज्ञात होता है ) ।
सूत्र ३५-३६ ] अध्याय १ ७१
सूत्र ३५-३६ ] अध्याय १ ७१ व्याख्या-उक्त प्रकरणमे जानश्रुतिको श्रद्धापूर्वक बहुत दान देनेवाला और अतिथियोंके लिये ही तैयार कराकर रक्खी हुई रसोईसे प्रतिदिन उनका सत्कार करानेवाला बताया गया है। उसके राजोचित ऐश्वर्यका .भी वर्णन है, साथ ही यह भी कहा गया है कि राजाकी कन्याको रैकने पत्नीरूपमें ग्रहण किया। इन सब बातोंसे यह सिद्ध होता है कि वह शूद्र नहीं, क्षत्रिय था। इसलिये यही सिद्ध होता है कि वेद-विद्यामे जाति-शूद्रका अधिकार नहीं है। इसके सिवा, इस प्रसङ्गके अन्तिम भागमे रैकने वायु तथा प्राणको सबका भक्षण करनेवाला कहकर उन दोनोंकी स्तुतिके लिये एक आख्यायिका उपस्थित की है। उसमे ऐसा कहा है कि 'शौनक और अभिप्रतारी चैत्ररथ-इन दोनोको जब भोजन परोसा जा रहा था, उस समय एक ब्रह्मचारीने भिक्षा माँगी' इत्यादि। इस आख्यायिकामे राजा जानश्रुतिके यहाँ शौनक और चैत्ररथको भोजन परोसे जाने- की बात कही गयी है, इससे जानश्रुतिका क्षत्रिय होना सिद्ध होता है; क्योकि शौनक ब्राह्मण और चैत्ररथ क्षत्रिय थे; वे शूद्रके यहाँ भोजन नहीं कर सकते थे। अतः यही सिद्ध होता है कि जाति-शूद्रका वेद-विद्यामें अधिकार नहीं है। सम्बन्ध-उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये ही दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं- संस्कारपरामर्शात्तदभावाभिलापाच्च ॥ १ । ३ । ३६ ॥ संस्कारपरामर्शात्=श्रुतिमे वेदविद्या ग्रहण करनेके लिये पहले उपनयन आदि संस्कारोंका होना आवश्यक बताया गया है, इसलिये; च=तथा; तदभावाभि- लापात्=शूद्रके लिये उन संस्कारोंका अभाव कहा गया है; इसलिये भी ( जाति-शूद्रका वेदविद्यामे अधिकार नहीं है )। व्याख्या-उपनिषदोंमे जहाँ-जहाँ वेदविद्याके अध्ययनका प्रसङ्ग आया है, वहाँ सब जगह यह देखा जाता है कि आचार्य पहले शिष्यका उपनयनादि संस्कार करके ही उसे वेद-विद्याका उपदेश देते हैं। यथा-'तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद् यैस्तु चीर्णम् ॥' ( मु० उ० ३ । २ । १० ) अर्थात् 'उन्हींको इस ब्रह्मविद्याका उपदेश दे, जिन्होने विधिपूर्वक उपनयनादि संस्कार कराकर ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन किया हो।' 'उप त्वा नेष्ये' ('छा० उ० ४ । ४ । ५) 'तेरा उपनयन संस्कार करूँगा।' 'तꣲ होप-
७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ निन्ये।' ( श० ब्रा० ११ । ५ । ३ । १३ ) 'उसका उपनयन- संस्कार किया।' इत्यादि । इस प्रकार वेदविद्याके अध्ययनमें उपनयन आदि संस्कारोंका होना परम आवश्यक माना गया है तथा शूद्रोंके लिये उन संस्कारोंका विधान नहीं किया है; इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि शूद्रोंका वेदविद्यामे अधिकार नहीं है । सम्बन्ध—इसी बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरा कारण बताते हैं— तदभावनिर्धारणे च प्रवृत्तेः ॥ १ । ३ । ३७ ॥ तदभावनिर्धारणे=शिष्यमे शूद्रत्वका अभाव निश्चित करनेके लिये; प्रवृत्तेः=आचार्यकी प्रवृत्ति पायी जाती है, इससे; च=भी ( यही सिद्ध होता है कि वेदाध्ययनमें शूद्रका अधिकार नहीं है ) । व्याख्या—जानश्रुति तथा रैक्वकी कथाके बाद ही सत्यकाम जावालका प्रसङ्ग इस प्रकार आया है—'जबालाके पुत्र सत्यकामने गौतमनामक आचार्यकी शरणमे जाकर कहा—'भगवन् ! मै ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक आपकी सेवामे रहनेके लिये उपस्थित हुआ हूँ।' तब गौतमने उसकी जातिका निश्चय करनेके लिये पूछा—'तेरा गोत्र क्या है ?' इसपर उसने स्पष्ट शब्दोमे कहा—'मैं अपना गोत्र नहीं जानता । मैंने अपनी मातासे गोत्र पूछा था, उसने कहा कि—'मुझे गोत्र नहीं मालूम है, मेरा नाम जवाला है और तेरा नाम सत्यकाम है।' इसलिये मैं तो इतना ही कह सकता हूँ कि 'मैं जबालाका पुत्र सत्यकाम हूँ।' तब गुरुने कहा—'इतना स्पष्ट और सत्य भाषण ब्राह्मण ही कर सकता है, दूसरा कोई नहीं।' इस प्रकार सत्य भाषणरूप हेतुसे यह निश्चय करके कि सत्यकाम ब्राह्मण है, शूद्र नहीं है, उसे आचार्य गौतमने समिधा लानेका आदेश दिया और उसका उपनयन-संस्कार कर दिया।' ( छा० उ० ४ । ४ । ३-५ ) इस तरह इस प्रकरणमे आचार्यद्वारा पहले यह निश्चय कर लिया गया कि 'सत्यकाम शूद्र नहीं, ब्राह्मण है, फिर उसका उपनयन-संस्कार करके उसे विद्याध्ययनका अधिकार प्रदान किया गया; इससे यही सिद्ध होता है कि शूद्रका वेद-विद्यामे अधिकार नहीं है ।
सूत्र ३७-३८ ] अध्याय १ ७३
सूत्र ३७-३८ ] अध्याय १ ७३ सम्बन्ध—अब प्रमाण द्वारा शूद्रके वेद-विद्यामें अधिकारका निषेध करते हैं— श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात् स्मृतेश्च ॥ १ । ३ । ३८ ॥ श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात् = शूद्रके लिये, वेदोंके श्रवण, अध्ययन तथा अर्थज्ञानका भी निषेध किया गया है, इससे; च=तथा; स्मृतेः=स्मृति-प्रमाणसे भी ( यही सिद्ध होता है कि वेद-विद्यामे शूद्रका अधिकार नहीं है ) । व्याख्या—श्रुतिमे शूद्रके लिये वेदके श्रवण, अध्ययन तथा अर्थज्ञानका भी निषेध किया गया है । यथा—'एतच्छुश्मशानं यच्छूद्रस्तस्माच्छूद्रस्य समीपे नाध्ये- तव्यम्।' अर्थात् 'जो शूद्र है, वह श्मशानके तुल्य है, अतः शूद्रके समीप वेदाध्ययन नहीं करना चाहिये ।' इसके द्वारा शूद्रके वेद-श्रवणका निषेध सूचित होता है । जब सुनने तकका निषेध है, तब अध्ययन और अर्थज्ञानका निषेध स्वतः सिद्ध हो जाता है । इससे तथा स्मृतिके वचनसे भी यही सिद्ध होता है कि 'शूद्रको वेदाध्ययनका अधिकार नहीं है।' इस विषयमे पराशर-स्मृतिका वचन इस प्रकार है—'वेदाक्षरविचारेण शूद्रः पतति तत्क्षणात् ।' ( १ । ७३ ) अर्थात् 'वेदके अक्षरोंका अर्थ समझनेके लिये विचार करनेपर शूद्र तत्काल पतित हो जाता है।' मनुस्मृतिमें भी कहा है कि 'न शूद्राय मतिं दद्यात्।' ( ४ । ८० ) अर्थात् 'शूद्रको वेद-विद्याका ज्ञान नहीं देना चाहिये।' इसी प्रकार अन्य स्मृतियोंमे भी जगह-जगह शूद्रके लिये वेदके श्रवण, अध्ययन तथा अर्थज्ञानका निषेध किया गया है । इससे यही मानना चाहिये कि वेद- विद्यामे शूद्रका अधिकार नहीं है। इतिहासमे जो विदुर आदि शूद्रजातीय सत्पुरुषो- को ज्ञान प्राप्त होनेकी बात पायी जाती है, उसका भाव यो समझना चाहिये कि इतिहास-पुराणोको सुनने और पढ़नेमें चारो वर्णोंका समान रूपसे अधिकार है । इतिहास-पुराणोके द्वारा शूद्र भी परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर सकता है । इस प्रकार उसे भी भक्ति एवं ज्ञानका फल प्राप्त हो सकता है । फल-प्राप्तिमे कोई विरोध नहीं है; क्योकि भगवान्की भक्तिद्वारा परम गति प्राप्त करनेमे मनुष्यमात्रका अधिकार है ( गीता ९ । ३२ ) । सम्बन्ध—यहाँतकके प्रकरणमें प्रसङ्गवश प्राप्त हुए अधिकारविषयक वर्णनको पूरा करके यह सिद्धान्त स्थिर किया कि ब्रह्मविद्यामें देवादिका अधिकार है और शूद्रका अधिकार नहीं है। अब इस विषयको यहीं समाप्त करके
प्रकरण चलता रहा। वहाँ यह बताया गया कि 'दहर' शब्द परब्रह्म परमात्मा-
७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ पुनः पूर्वोक्त अङ्गुष्ठमात्र पुरुषके स्वरूपपर विचार किया जाता है— कम्पनात् ॥ १ । ३ । ३९ ॥ ( पूर्वोक्त अङ्गुष्ठमात्र पुरुष परब्रह्म परमात्मा ही है; ) कम्पनात्=क्योंकि उसीमे सम्पूर्ण जगत् चेष्टा करता है और उसीके भयसे सब काँपते हैं। व्याख्या—कठोपनिषद्के दूसरे अध्यायमे प्रथम वल्लीसे लेकर तृतीय वल्ली- तक अङ्गुष्ठमात्र पुरुषका प्रकरण आया है। ( देखिये २ । १ । १२, १३ तथा २ । ३ । १७ के मन्त्र ) । वहाँ अङ्गुष्ठमात्र पुरुषके रूपमें वर्णित उस परम पुरुष परमात्माके प्रभावका वर्णन करते हुए यह बात कही गयी है कि— यदिदं किं च जगत् सर्वं प्राण एजति निःसृतम् । महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ( क० उ० २ । ३ । २ ) 'उस परमात्मासे निकला हुआ यह जो कुछ भी सम्पूर्ण जगत् है, वह उस प्राणस्वरूप ब्रह्ममे ही चेष्टा करता है, उस उठे हुए वज्रके समान महान् भयानक सर्वशक्तिमान् परमेश्वरको जो जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं।' तथा— भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः । भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ ( क० उ० २ । ३ । ३ ) 'इसीके भयसे अग्नि तपता है, इसीके भयसे सूर्य तपता है, इसीके भयसे इन्द्र, वायु तथा पाँचवें मृत्यु देवता—ये सब अपने-अपने कार्यमे दौड़ रहे हैं।' इस वर्णनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि अङ्गुष्ठमात्र पुरुष ब्रह्म ही है; क्योंकि सम्पूर्ण जगत् जिसमे चेष्टा करता है अथवा जिसके भयसे कम्पित होकर सब देवता अपने-अपने कार्यम् संलग्न रहते हैं, वह न तो प्राणवायु हो सकता है और न इन्द्र ही। वायु और इन्द्र तो स्वयं ही उसकी आज्ञाका पालन करनेके लिये भयभीत रहते हैं। अतः यहाँ अङ्गुष्ठमात्र पुरुष ब्रह्म ही है, इसमे लेशमात्र भी संशयके लिये स्थान नहीं है। सम्बन्ध—इस पादके चौदहवें सूत्रसे लेकर तेईसवेंतक 'दहराकाश' का प्रकरण चलता रहा। वहाँ यह बताया गया कि 'दहर' शब्द परब्रह्म परमात्मा-
सूत्र ३९-४० ] अध्याय १ ७५
सूत्र ३९-४० ] अध्याय १ ७५ का वाचक है; फिर २४वें सूत्रसे कठोपनिषद्में वर्णित अङ्गुष्ठमात्र पुरुषके स्वरूपपर विचार चल पड़ा; क्योंकि दहराकाशकी भाँति वह भी हृदयमें ही स्थित बताया गया है। उसी प्रकरणमें देवादिके वेदविद्यामे अधिकार-सम्बन्धी प्रासङ्गिक विषयपर विचार चल पड़ा और अड़तीसवें सूत्रमे वह प्रसङ्ग समाप्त हुआ। फिर उनतालीसवें सूत्रमे पहलेके छोड़े हुए अङ्गुष्ठमात्र पुरुषके स्वरूपपर विचार किया गया। इस प्रकार बीचमें आये हुए प्रसङ्गान्तरोंपर विचार करके अब पुनः दहराकाशविषयक छूटे हुए प्रकरणपर विचार आरम्भ किया जाता है— ज्योतिर्दर्शनात् ॥ १ । ३ । ४० ॥ ज्योतिः = यहाँ 'ज्योति' शब्द परब्रह्मका ही वाचक है; दर्शनात् = क्योंकि श्रुतिमे ( अनेक स्थलोपर ) ब्रह्मके अर्थमे 'ज्योतिः' शब्दका प्रयोग देखा जाता है। व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद्के अन्तर्गत दहराकाशविषयक प्रकरणमे यह कहा गया है कि 'य एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते।' (८।३।४) अर्थात् 'यह जो संप्रसाद (जीवात्मा) है, वह शरीरसे निकलकर परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपसे सम्पन्न हो जाता है।' इस वर्णनमे जो 'ज्योतिः' शब्द आया है, वह परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है; क्योंकि श्रुतिमे अनेक स्थलोपर ब्रह्मके अर्थमें 'ज्योतिः' शब्दका प्रयोग देखा जाता है। उदाहरणके लिये यह श्रुति उद्धृत की जाती है— 'अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते।' (छा० उ० ३। १३।७) अर्थात् 'इस द्युलोकसे परे जो परम ज्योति प्रकाशित हो रही है।' इसमे 'ज्योतिः' पद परमात्माके ही अर्थमे है; इसका निर्णय पहले भी किया जा चुका है। ऊपर दी हुई (८।३।४) श्रुतिमे 'ज्योतिः' पदका 'परम्' विशेषण आया है; इससे भी यही सिद्ध होता है कि परब्रह्मको ही यहाँ 'परम ज्योति' कहा गया है। सम्बन्ध—उपर्युक्त सूत्रमें 'दहर'के प्रकरणमें आये हुए 'ज्योतिः' पदको परब्रह्मका वाचक बताकर उस प्रसङ्गको वहीं समाप्त कर दिया गया। अब यह जिज्ञासा होती है कि 'दहराकाश'के प्रकरणमें आया हुआ 'आकाश' शब्द परब्रह्मका वाचक हो, परन्तु छा० उ० (८।१४।१) मे जो 'आकाश' शब्द आया है, वह किस अर्थमे है? अतः इसका निर्णय करनेके लिये आगेका सूत्र प्रारम्भ करते हैं--
७६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् ॥ १ । ३ । ४१ ॥ ९ आकाशः= (वहाँ) 'आकाश' शब्द परब्रह्मका ही वाचक है; अर्थान्तर- त्वादिव्यपदेशात्=क्योकि उसे नाम-रूपमय जगत्से भिन्न वस्तु बताया गया है। व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद् (८ । १४ । १) मे कहा गया है कि 'आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म तदमृतम् स आत्मा ।' अर्थात् 'आकाश नामसे प्रसिद्ध तत्त्व नाम और रूपका निर्वाह करनेवाला है, वे दोनो जिसके भीतर है, वह ब्रह्म है, वह अमृत है और वही आत्मा है।' इस प्रसङ्गमें 'आकाश'को नामरूपसे भिन्न तथा नामरूपात्मक जगत्को धारण करने- वाला बताया गया है; इसलिये वह भूताकाश अथवा जीवात्माका वाचक नहीं हो सकता; क्योकि भूताकाश तो स्वयं नामरूपात्मक प्रपञ्चके अन्तर्गत है और जीवात्मा सबको धारण करनेमे समर्थ नहीं है। इसलिये जो भूताकाशसहित समस्त जडचेतनात्मक जगत्को अपनेमे धारण करनेवाला है, वह परब्रह्म परमात्मा ही यहाँ 'आकाश' नामसे कहा गया है। वहाँ जो ब्रह्म, अमृत और आत्मा- ये विशेषण दिये गये है, वे भी भूताकाश अथवा जीवात्माके उपयुक्त नहीं है; इसलिये उनसे भिन्न परब्रह्म परमात्माका ही वहाँ 'आकाश' नामसे वर्णन हुआ है। सम्बन्ध-यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि मुक्तात्मा जब ब्रह्मको प्राप्त होता है, उस समय उसमें ब्रह्मके सभी लक्षण आ जाते हैं। अतः यहाँ उसीको आकाश नामसे कहा गया है, ऐसा मान लें तो क्या हानि है? इसपर कहते हैं- सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन ॥ १ । ३ । ४२ ॥ सुषुप्त्युत्क्रान्त्योः = सुषुप्ति तथा मृत्युकालमे भी; भेदेन = (जीवात्मा और परमात्माका) भेदपूर्वक वर्णन है; (इसलिये 'आकाश' शब्द यहाँ परमात्माका ही बोधक है)। व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद् (६।८।१) मे कहा है कि 'जिस अवस्थामे यह पुरुष सोता है, उस समय यह सत् (अपने कारण) से सम्पन्न (संयुक्त) होता है। * यह वर्णन सुषुप्तिकालका है। इसमे जीवात्माका 'पुरुष' नामसे और कारणभूत परमात्माका 'सत्' नामसे भेदपूर्वक उल्लेख हुआ है। इसी तरह उत्क्रान्तिका भी इस प्रकार वर्णन मिलता है-'यह जीवात्मा इस शरीरसे
- यह मन्त्र अर्थसहित पृष्ठ ६ में आ गया है।
सूत्र ४१-४३ ] अध्याय १ ७७
सूत्र ४१-४३ ] अध्याय १ ७७ • निकलकर परमज्योतिःस्वरूप परमात्माको प्राप्त हो अपने शुद्धरूपसे सम्पन्न हो जाता है।' (छा० उ० ८ । ३ । ४) इसमें भी संप्रसाद नामसे जीवात्मा- का और 'परमज्योति' नामसे परमात्माका भेदपूर्वक निरूपण है। इस प्रकार सुषुप्ति और उत्क्रान्तिकालमे भी जीवात्मा और परमात्माका भेदपूर्वक वर्णन होनेसे उपर्युक्त आकाशशब्द मुक्तात्माका वाचक नहीं हो सकता; क्योंकि मुक्तात्मामे ब्रह्मके सदृश कुछ सद्गुणोंका आविर्भाव होनेपर भी उसमे नाम- रूपात्मक जगत्को धारण करनेकी शक्ति नहीं आती। सम्बन्ध-उपर्युक्त कथनकी पुष्टिके लिये ही दूसरा हेतु उपस्थित करते हैं- पत्यादिशब्देभ्यः ॥ १ । ३ । ४३ ॥ पत्यादिशब्देभ्यः = उस परब्रह्मके लिये श्रुतिमे पति, परम पति, परम- महेश्वर आदि विशेष शब्दोका प्रयोग होनेसे भी ( यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा और परमात्मामे भेद है ) । व्याख्या-श्वेताश्वतरोपनिषद् ( ६ । ७ ) मे परमात्माके स्वरूपका इस प्रकार वर्णन आया है- तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम् । पतिं पतीनां परमं परस्ताद् विदाम देवं भुवनेशमीड्यम् ॥ 'ईश्वरोके भी परम महेश्वर, देवताओके भी परमदेवता तथा पतियोंके भी परम पति, अखिल ब्रह्माण्डके स्वामी एवं स्तवन करनेयोग्य उस प्रकाशस्वरूप परमात्माको हमलोग सबसे परे जानते हैं।' इस मन्त्रमे देवता आदिकी कोटिमें जीवात्मा है और परम देवता, परम महेश्वर एवं परम पतिके नामसे परमात्माका वर्णन किया गया है। इससे भी यही निश्चय होता है कि जीवात्मा और परमात्मामे भेद है। इसलिये 'आकाश' शब्द परमात्माका ही वाचक है, मुक्त जीवका नहीं। तीसरा पाद सम्पूर्ण ।
चौथा पाद सम्बन्ध—पहलेके तीन पादोंमें ब्रह्मको जगत्के जन्म आदिका कारण बताकर वेदवाक्योंद्वारा वह बात प्रमाणित की गयी। श्रुतियोंमें जहाँ-जहाँ सन्देह होता था, उन स्थलोंपर विचार करके उस सन्देहका निवारण किया गया। आकाश, आनन्दमय, ज्योति, प्राण आदि जो शब्द या नाम ब्रह्मपरक नहीं प्रतीत होते थे, जीवात्मा या जडप्रकृतिके बोधक जान पड़ते थे, उन सबको परब्रह्म परमात्मा- का वाचक सिद्ध किया गया। प्रसङ्गवश आयी हुई दूसरी-दूसरी बातोंका भी निर्णय किया गया। अब यह जिज्ञासा होती है कि वेदमें कहीं प्रकृतिका वर्णन है या नहीं? यदि है तो उसका स्वरूप क्या माना गया है? इत्यादि। इन्हीं सब ज्ञातव्य विषयोंपर विचार करनेके लिये चतुर्थ पाद आरम्भ किया जाता है। कठोपनिषद्में 'अव्यक्त' नाम आया है; वहाँ 'अव्यक्तम्' पद प्रकृतिका वाचक है या अन्य किसीका? इस शङ्काका निवारण करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं— आनुमानिकमप्येकेषामिति चेन्न शरीररूपकविन्यस्त- गृहीतेर्दर्शयति च ॥ १ । ४ । १ ॥ चेत्=यदि कहो; आनुमानिकम्=अनुमानकल्पित जडप्रकृति; अपि= भी; एकेषाम्=किन्हींके मतमे वेदप्रतिपादित है; इति न=तो यह कथन ठीक नहीं है; शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेः=क्योकि शरीर ही यहाँ रथके रूपकमे पड़कर 'अव्यक्त' शब्दसे गृहीत होता है। दर्शयति च=यही बात श्रुति दिखाती भी है। व्याख्या—कठोपनिषद् ( १ । ३ । ११ ) मे जो 'अव्यक्तम्' पद आया है, वह अनुमानकल्पित या सांख्यप्रतिपादित प्रकृतिका वाचक नहीं है; किन्तु आत्मा, शरीर, बुद्धि, मन, इन्द्रिय और विषय आदिकी जो रथ, रथी एवं सारथि आदिके रूपमे कल्पना की गयी है; उस कल्पनामे रथके स्थानपर शरीरको रक्खा गया है। उसीका नाम यहाँ 'अव्यक्त' है। कठोपनिषद्के इस रूपक-प्रकरणमे आत्माको रथी, शरीरको रथ, बुद्धिको सारथि, मनको लगाम, इन्द्रियोको घोड़ा और विषयोंको उन घोड़ोका चारा बताया गया है। इन उपकरणोद्वारा परमपद-
सूत्र १-२ ] अध्याय १ ७९
सूत्र १-२ ] अध्याय १ ७९ स्वरूप परमेश्वरको ही प्राप्त करनेयोग्य कहा गया है। इस प्रकार पूरे रूपकमें सात वस्तुओंकी कल्पना हुई है। उन्हीं सातोंका वर्णन एकसे दूसरेको बलवान् बतानेमें भी होना चाहिये। वहाँ इन्द्रियोंकी अपेक्षा विषयोंको बलवान् बताया गया है। जैसे घास या चारा-दाना देखकर घोडे हठात् उस ओर आकृष्ट होते हैं; उसी प्रकार इन्द्रियाँ भी हठात् विषयोंकी ओर खिंच जाती हैं। फिर विषयोंसे परे मनकी स्थिति कही गयी है; क्योंकि यदि सारथि लगामको खींचे रक्खे तो घोडे चारा-दानाकी ओर हठात नहीं जा सकते हैं। उसके बाद मनसे परे बुद्धिका स्थान माना गया है; वही सारथि है। लगामकी अपेक्षा सारथिको श्रेष्ठ बतलाना उचित ही है, क्योंकि लगाम सारथिके ही अधीन रहती है। बुद्धिसे परे महान् आत्मा है; यह 'रथी' के रूपमें कहा हुआ जीवात्मा ही होना चाहिये। 'महान् आत्मा' का अर्थ महत्तत्त्व मान लें तो इस रूपकमें दो दोष आते हैं। एक तो बुद्धिरूप सारथिके स्वामी रथी आत्माको छोड देना और दूसरा जिसका रूपकमें वर्णन नहीं है, उस महत्तत्त्वकी व्यर्थ कल्पना करना। अत महान् आत्मा यहाँ रथीके रूपमें बताया हुआ जीवात्मा ही है। फिर महान् आत्मासे परे जो अव्यक्त कहा गया है, वह है भगवान्की मायाशक्ति। उसीका अंश कारण-शरीर है। उसे ही इस प्रसङ्गमें रथका रूप दिया गया है। अन्यथा रूपकमें रथकी जगह बताया हुआ शरीर एकसे दूसरेको श्रेष्ठ बतानेकी परम्परा- में छूट जाता है और अव्यक्त नामसे किसी अन्य तत्त्वकी अप्रासङ्गिक कल्पना करनी पडती है। अतः कारणशरीर भगवान्की प्रकृतिका अंश होनेसे उसे 'अव्यक्त' नामसे कहना अनुचित नहीं मालूम होता। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि शरीरको 'अव्यक्त' कहना कैसे ठीक होगा; क्योंकि यह तो प्रत्यक्ष ही व्यक्त है। इसपर कहते हैं— सूक्ष्मं तु तदर्हत्वात् ॥ १ । ४ । २ ॥ तु=किन्तु; सूक्ष्मम्=(इस प्रकरणमे 'शरीर' शब्दसे ) सूक्ष्म शरीर गृहीत होता है; तदर्हत्वात् =क्योंकि वही 'अव्यक्त' कहलानेके योग्य है। व्याख्या—परमात्माकी शक्तिरूप प्रकृति सूक्ष्म है, वह देखने और वर्णन करनेमें नहीं आती, उसीका अंश करणशरीर है; अतः उसको अव्यक्त कहना उचित ही है।
८० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जब प्रकृतिके अंशको 'अव्यक्त' नामसे स्वीकार कर लिया, तब सांख्यशास्त्रमें कहे हुए प्रधानको स्वीकार करनेमें क्या आपत्ति है ? सांख्यशास्त्र भी तो भूतोंके कारणरूप सूक्ष्म तत्त्वको ही 'प्रधान' या 'प्रकृति' कहता है, इसपर कहते हैं— तदधीनत्वादर्थवत् ॥ १ । ४ । ३ ॥ तदधीनत्वात्=उस परमात्माके अधीन होनेके कारण; अर्थवत्=वह ( शक्तिरूपा प्रकृति ) सार्थक है । व्याख्या—सांख्यमतावलम्बी प्रकृतिको स्वतन्त्र और जगत्का कारण मानते हैं । परन्तु वेदका ऐसा मत नहीं है । वेदमे उस प्रकृतिको परब्रह्म परमेश्वरके ही अधीन रहनेवाली उसीकी एक शक्ति बताया गया है । शक्ति शक्तिमान्से भिन्न नहीं होती, अतः उसका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं माना जाता । इस प्रकार परमात्माके अधीन उसीकी एक शक्ति होनेके कारण उसकी सार्थकता है । क्योकि शक्ति होनेसे ही शक्तिमान् परमेश्वरके द्वारा जगत्की सृष्टि आदि कार्य होने सम्भव है । यदि परब्रह्म परमेश्वरको शक्तिहीन मान लिया जाय, तब वह इस जडचेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्का कर्ता-धर्ता और संहर्ता कैसे हो सकता है ? फिर तो उसे सर्वशक्तिमान् भी कैसे माना जा सकता है ? श्वेताश्वतरोपनिषद्मे स्पष्ट कहा गया है कि 'महर्षियोंने ध्यानयोगमे स्थित होकर परमात्मदेवकी स्वरूप- भूता अचिन्त्य शक्तिका साक्षात्कार किया जो अपने गुणोंसे आवृत है ।'* वहीं यह भी कहा गया है कि उस परमेश्वरकी स्वाभाविक ज्ञान, बल और क्रियारूप शक्तियाँ नाना प्रकारकी सुनी जाती हैं ।† सम्बन्ध—वेदमे बतायी हुई प्रकृति सांख्योक्त प्रधान नहीं है, इस बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरा कारण बताते हैं । ज्ञेयत्वावचनाच्च ॥ १ । ४ । ४ ॥ ज्ञेयत्वावचनात्=वेदमे प्रकृतिको ज्ञेय नहीं बताया गया है । इसलिये; च= भी ( यह सांख्योक्त प्रधान नहीं है ) ।
- ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् ।' ( श्वेता० १ । ३ ) † यह मन्त्र पृष्ठ दोमे आ गया है ।