कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
कबीर शरण विना मुक्ति नहीं
३८
कर्बारुक्षणगीता ।
सत्कवीर कहहु मनमाहीं । बहुरि प्रगट कहु काल नसाहीं ॥ सुनके भीम कवीर कहि बोला । सत्कवीरको आसन डोला ॥ छिनभै समर्थ पहुँचे आई । कवीरसुनत यम चला पराई ॥ छांड भीमकहँ भागेउ काला । सत्कवीर भेटा जंजाला ॥ कृष्ण उठाय भीम कहँ लीन्हा । तब कवीरके स्तुति कीन्हा ॥ सकल देव उठ ठाढे भयऊ । सत्कवीर कहँ सोस नवायऊ ॥
दोहा-पगु छूवन सब चाहे, काहु न आवे हाथ ॥ जापर दया कवीरके, जिन पगु देहीं माथ ॥
योगयज्ञसे सैर न कामा । जबलग भजै न सदुरुनामा ॥ सदुरु सत्यकवीर दयाला । शरण कवीर भिटे ययजाला ॥
दोहा-सत्यकवीरके स्तुति, करे निरंजनराय ॥
विष्णु व्यास सुख गुरु कहत है, भाग दृश्श सतनाम ॥ अधर विवान ग्रानभै सोहा । अद्भुत चंद सूर नख मोहा ॥ स्तुति आप २ सब करहीं । जै २ सत्यकवीर उच्चरहीं ॥ कोटिन चंद सूर उगआये । अद्भुत लीला कला दिखाये ॥ विष्णु व्यास जै स्तुति सारा । सत्यकवीर जै सब उच्चार ॥ जै २ नमो २ सब कहहीं । अधर स्तुति सब एकटक रहहीं ॥ जै २ सत्यकवीर सुखदाई । विष्णु व्यास पंडौ गुण गाई ॥ जै २ सत्यकवीर दयाला । कवीरकृपाते जीतेऊँ काला ॥ जै जै समर्थ सत्य कवीर । सब घट व्यापक अजर शरीरा ॥
कवीरुष्णगीता ।
३९
सत्यकवीर संसार तेहि दीन्हा । जै जै सत्यकवीर प्रवीना ॥ जै जै अकह सो नाम कवीरा । पुष्पवास घृत घ्राण शरीरा ॥ जै जै रुपाळ कवीर गोसाईं । गऊ कपिलहिं ले यमते छुडाईं ॥ जै जै अयर नाम कवीरा । लखा घर जरत खंभ मई चौरा ॥ थाके भीम खंभ नहि आना । वाचा वंध व्याकुल भगवाना ॥ तवहीं रुष्ण कवीर पुकारा । जै पतालते खंभ उखारा ॥ जै जै कहि बहु बार कवीरा । जै राम लक्ष्मण एक शरीरा ॥ जै भरथ शत्रुघन सीता सती । जै दशरथ दायो सो क्रांती ॥ जै कवीर अमोलख भाई । जै पुष्पवास प्रति रहे समाई ॥ जै काया दल वीर कवीरा । जै अधर धजा फहरात शरीरा ॥ जै एक स्वास बहु मूंदे आंखी । भीतर सबके कवीर सुतसाखी ॥ आप आप मन ध्यान औराधे । दसों द्वार मन पवन कस बांधे ॥ प्रेम भक्त बस साहेब सोईं । माया चहे सो प्रभु नहिं होईं ॥ सत्कवीर आप निरमाया । आप न्यारा माया जग छाया ॥ माया बस पर जीव कहावे । निहमाया सतकवीर रहावे ॥ जहां अस्मिमान कपट चतुराईं । तेहि नहिं सत्यकवीर दरसाईं ॥ तन मन धन जोवन बन फूला । मन भौरा ताके रस भूला ॥ जब वन्सपती बन गई सुखाईं । भौरहि भूख लाग अधिकाईं ॥ जेहि बन देखत भौर सुलाना । तेहि बन वरस अंगार सयाना ॥ तब भौरा सरवर दिशि धांसा । पुरइन कंबल जाय अलवासा ॥ कहे कंबल भौरा वनवासी । विपत परेउ आयउ मम पासी ॥
सब देवताओंका कबीरकी स्तुति करना और कबीरका उपदेश देना
४०
कबीरकृष्णगीता ।
जब बन डगठा आग धंधाना । तब बनते मधुकर विलगाना ॥ जैसे बिन निरास अल भयऊ । तैसे माया लोभित पछतयऊ ॥ चरण कमल गुरु प्रथम न सेवा । काल वस्य तब भयऊ बहेवा ॥ विपत परत को सभर्थ चीन्हा । होय सुशील उपकारसो चीन्हा । अनचीन्हे विपत जो होय सहाई । तो तेहि जानिय सभर्थ साई ॥ दोहा-सत्यकबीर मोहि अनचीन्ह, सियरे परिचय नाहि ॥
कपिलमुनि भज गाठे कबीर, छोड़ाय लीन्ह जमपाहीं बाघ निरंजन काल कसाई । तेहि सुख ते लिय कपिल छोड़ाई कपिला गऊ कपिल मुनि कहहीं । सतकबीर सो सभर्थ अहहीं ॥ उत्तर विवान आव सत सीसा । विष्णु व्यास सुख कपिलसिरदीसा स्तुति कीन्ह सिंहासन सारा । कंचन भर ले चरण पखारा ॥ महाप्राण कहैं दीजे अज्ञा । निराधार कबीर कहु सज्ञा ॥ पूछाहि ज्ञान विष्णु अरु व्यासा । छोटे बड़े सुनहि विश्वासा ॥
विष्णुवचन ।
कहैं कृष्णगीता मत सारा । पाठ कीय सुख लहे सो चारा ॥ पाठ करै समुझे पंथ चाले । सचदयासो जिव प्रति पाले ॥ आप जीवके रक्षा करई । ताके संकट साहेव हरई ॥ अपनी रक्षा औरकी हानी । ऐसे चाल नहा अघरानी ॥ कहैं कृष्ण सुन व्यास प्रवीना । सुनो कथा निरगुणको चीन्हा ॥
दोहा-कहैं कृष्ण कबीरसे, होय अधीन कर जोर ॥ कहिये कथा आदि उत्पतकी, सत कबीर बंदीछोर ॥
कवीरकृष्णगीता ।
४१
कवीरवचन ।
कहैं कवीर निर्गुणकी कथा । निर्गुण सर्गुण प्रगट जथा ॥ प्रथम सत्पुरुष निर्गुण सोई । तिनके निर्गुण सर्गुण होई ॥ त्रिगुण न्यारा निर्गुण सो जानी । सो सत्यपुरुष अमृततन खानी ॥ रचा लोक अमृतकी काया । देह हिरंमर सुवास सुहाया ॥ अमृत अयको लोक संवारा । इच्छा सुर्त सकल विस्तारा ॥ प्रथमहिं सुरत अंस प्रगटाये । सुरत विहंग सकल निरमाये ॥ शब्द अजर सतनाम वखाना । तासु अंस सुरति उत्पाना ॥ प्रथमहिं ज्ञान अंस सुखदाई । दुतिय विवेक विचार निरमाई ॥ त्रितय सहजशील निरबाना । चौथे क्षमा संतोष वखाना ॥ पंचय निरंजन छठयें भवानी । सतयें योगजीत जम हानी ॥ अठयें धीरज नवें शुचि भाऊ । दसयें दया दीनता आऊ ॥ एकादसे सत सुकित नामा । द्वादश दुरमत नाम निहकामा ॥ त्रैदस आद कुम निरमाऊ । चतुर्दश जलहरंग झलकाऊ ॥ पंचैदस सो प्रेम प्रमारथ । षट्यैदस अचित पद सारथ ॥ श्रवदास कहनकी छोटा । सत्रह सुतसे काल अटोटा ॥ सोरह सुत एकपुत्री वामअंगी । देख निरंजन प्रेम उभंगी ॥ जाहे सुत जो दीयदिय स्वामी । पुरुष आज्ञा बैठे सब धामी ॥ निरंजन धरहिं अकुलाने । चौसठ जुग छिन सेवा ठाने ॥ देख अंगी काल ललचाने । होय अधीन बहु विनती ठाने ॥ दीन्हो लाय संग अष्टभुजी । मानसरोवर राज करोजी ॥ अस जिवरा ताही कहैं दीन्ह। । पारस स्वास विस्तार जोकीन्ह। ॥
व्यासका कबीरसे सत्यलोक दिखानेकी प्रार्थना करना
४२
कबीररुणगीता ।
दोहा- उठी अवाज पुरुषकी, मानसरोवर जाहु ।
बांये दहिने जिन हेरहु, सन्मुख होय सुख लाहु ॥ अमर चोलना जीवको दीन्हा । बिसरहिंनहिंजिवपुरुषपरवीना ॥ चले निरंजन आज्ञा पाई । मानसरोवर वैठे जाई ॥ मानसरोवर हंसनि रहहीं । अद्भुत चंद्र सूर्य छवि लहहीं ॥ गावहिं सब मंगल अति प्रीति । होय झनकार अनाहद रीति ॥ एक २ हंसनि छवि अनलेखा । अमरचौर काछे बहु भेषा ॥ पग अंगुली नख चंद्रकी खानी । तरवन रवि शाशि जुथलोभानी ॥ जंघ नाभी कटि चंद्रकी रासी । उरसर कंमल नाल बिनु भांसी ॥ चंद्र सूर्यकी खान हंसनी । सुखछविनिरखअकहसुखहंसनी शोभा कौन हंसनि छवि कहऊँ । उपमा सरिस न कुछजगलहऊँ ॥ नित आरती समान सरोवर । लोककी नार नर्क न्यारा घर ॥ तहां हंसनी सुखुच्छि सयानी । शोभा अमल चंद्रकी खानी ॥ मांग टीका पटवासी सुंदर । चंद्र चौथ विधु अद्भुत दिनकर ॥ निरख हंस सब एक टक लाये । पुरुष कला छविरूप सुहाये ॥ एक कामनि सेंदुर रवि कोटी । सेंदुर सद्रु नाम अटोटी ॥ सोहे बेसर हंसनि नाका । उगे चंद्र जुथथप बांका ॥ बांका सोइ जेहि कौन नवावे । सो कबीर सब जगगुण गावे ॥ कबीरनाम भये अस सोभा । सोभा सुनत सबन मन लोबा ॥
व्यास उवाच ।
कहै व्यास देखे विन स्वाधी । कस पतिआव सो अंतयाभी ॥ कलउ भक्त गुरुवचन विश्वासी । तीनों जुग देखे विन रासी ॥
कबीरकृष्णगीता ।
४३
कबीरवचन ।
कहे कबीर देह धर देखौ । आप माहिं तुम सबहिं परेसौ ॥ कोट चंद्रके सोभा जिवके । नर्क देह धर सुख नहिं पिवके ॥ ऐसे समय हंस एक पूरा । सत्कबीर जये सो सूरा ॥ ठांका देह पूरा घट जाई । पुष्प विधान हंस बैठाई ॥ हंस सहस्र सठिहार बहुता । आसपास लागे सभ जुगता ॥ परिछन हंस विवान चढि आये । अधर धजा फहराय सहाये ॥ दोहा-वाजत वाजत सरस अति, होत अंजोर अपार । उतरे हंस वैकुंठ तब, नाम कबीर उचार ॥ भाये हंस वैकुंठ को जवहीं । अद्वुत चंद्र सूर्य उगे तवहीं ॥ चला हंस कबीर पगु पारा । मस्तक पग दीन्हा बलभारा ॥ सकल हंस परिक्रमा करहीं । कबीर चरण रज सिरपर धरहीं ॥
हंसवचन ।
कहे हंस कबीर यम बांचे । विना कबीर काल धर नाचे ॥ सदुरु मोकेह दीन्ह परवाना । सत्कबीर सभ गुरुकहैं जाना ॥ यम त्रिण तोड काल सुख भूका । पाय प्रवाना झगरा चूका ॥ सरगुण त्रिविध झगरा ठागा । तैतिस कोट देव सब भागा ॥ जेहि पूजहु सो कछु भल माने । बिन पूजे सब झगरा ठाने ॥ ताने निर्गुण भक्त अधारा । जप कबीर यमराजहिं छारा ॥
दोहा-धन्य कबीरको नाम है, धन्य कबीरको शरण । जो कबीर लौ लावे, ताको जरा न मरण ॥
कबीरका उपदेश
४४
कबीरकृष्णगीत ।
चरण टेक चले हंस सुजाना । सत्यकबीर कहत घर ताना ॥ पुन वैकुंठ भये अंधियारा । बोले कृष्ण धन्य करतारा ॥ सत्यकबीर जन गुप्तहोय फिरहीं । तिनके दास ऐसे सुख करहीं ॥ सबे देव विनती अनुसारा । ले चलहु जहां अस उजियारा ॥
कबीरवचन !
कहे कबीर सत्यलोक जो जाई । अस उजियार जो तोहिं मिलाई ॥
दोहा--कर्म भर्म सब त्यागे, त्यागे जगके आस ।
सबमहैं एक ब्रह्म लखि, कबीर भजन सुखरास ॥ सबे कहें शोहिं दीजे पाना । यमसे जीव बचजाय ठिकाना ॥ कहे कबीर सुनो सब कोई । सदुरु सेय मुकफल लेई ॥ कहौं सो करौं सबहिं तब तारौं । जन्ममरण दुख दारुण टारौं ॥ सबे देव सुमरो रामके नामा । छांडो भूत प्रेत अब कामा ॥ जो जाको गुरु रामसो ताही । गुरुविन राम न तारेउ काही ॥ करहु भक्त दाया सत ठानी । अंस पृथ्वी तन घर भर नामी ॥ करु नित संतनकी सेवकाई । हृदय कबीर नाम जौलाई ॥ निरगुण सरगुण एक समाना । बीज वृक्ष विस्तार बखाना ॥ सुखमंडन पितु मातु जथाई । हृदय प्रीत पिव सदुरु साई ॥ जो कोई भक्त करे गुरुसेवा । सेवा भक्त सार पद लेवा ॥ अमृत सेवे अमृतफल लेई । विषतरु सेवे विष मिल लेई ॥ अमृतफल गुरुराम कबीरा । आगे तारव पुण्य शरीरा ॥ विन कौडी सौदा मिल नाहीं । गुरु विनको गहिहै पुन बाहीं ॥ गुरु सोई जो अंतहु मीठा । जन्ममरण सब लागे सीठा ॥
कलियुगका वृत्तान्त
कबीरकृष्णगीता ।
४५
दोहा-जन्ममरण सरगुण गुरु, निरगुण अजर कबीर ।
शरण कबीरके जो गहे, सो बहुरन धरे शरीर ॥
कथा प्रसंग कहा सुनि व्यासा । भक्ति सुक्ति महिमा प्रकाशा ॥
भक्त सुक्त पंथ सत दाय। सत्यनाम भज अम्बर काया ॥
कहे कबीर सुनो विष्णु प्यासा । सत्यकबीर जपो हर स्वासा ॥
आद अनादिको नाम कबीरा । कल प्रगटहिं अघ नासन हीरा ॥
अब तोहिं अंत खोल हम कहा । सत्यकबीरजपकलिनिरवाहा ॥
ताहि न देउं मैं पान प्रवाना । जोजीवघातआमिश भषजाना ॥
दोहा-महापुनीत पवित्र जिव, गुरु भक्ता सोइ संत ।
पर आपन जिव एक लखे, ताहि कबीर मिल कंथ ॥
विष्णु-व्यासवचन ।
कहे सो विष्णु व्यास सिर नाई । कलयुग सुनिये जो आमिश खाई ॥
कहे कृष्ण कलयुग व्योहारा । कोइन करि है सत्य विचारा ॥
बूठहिं जगलग लेपवे साही । अतीत ब्राह्मणको धका दिवाही ॥
गुरुसे शिष्य सरवर करि बोले । तेहि दोष मरकट होय डोले ॥
गुरुके धन चौराय जो खाई । ताके घर फांसी सब जाई ॥
गुरुसे सरवर पितहिं दे गारी । साधुद्रोह जिवघात खुवारी ॥
जीवदयामय दाय। जानो । जीव घात मम घात बखानो ॥
काया विष्णु कंवल दल सोहा । भज कबीर गुरु पद मोहा ॥
सत्यकबीरको चाल निगारी । सुर नर सुनि गण जानेनहारी ॥
कलिमें होइ हैं प्रापत राजा । नृप बिगरे परजा अघ छाजा ॥
कलियुगमें तरनेका मार्ग
४६
कबीरकृष्णगीता ।
कलिके ब्राह्मण काल सुभाऊ । अजिया सुतवष झस परखाऊ ॥ प्रथम मीन भवै विष्णु सरुपा । पैठ पताल जला अंधकूपा ॥ कुर्मके नखसों मृतुका आना । राई प्रवान मृतुका सो जाना ॥ सो मृतुका हरमुख विवलई । फेनसमान उठा जब कई ॥ लै फेन पवन जल लाया । शीर साठी तस पृथ्वी जमाया ॥ पृथ्वी सात औ सात अकाशा । कदलीखंभदल पृथ्वीपर चासा ॥ विष्णु जल थलमाहि समाना । विष्णु अन्न पान पकवाना ॥ जो मीन दैह पूरण कर सेवे । जलमह भात डारि कर सेवे ॥ ताके संतत भक्त गर होई । पूजे कछु मुख पावे सोई ॥ विठल ब्रह्मरूप है मोरा । बावन नरसिंह राक्षस बल तोरा ॥ परसरामचंद्र सो हमही । कृष्ण चौध निहकलंकका जवहीं ॥ नारद व्यास औ सबमें वासा । रजगुण तमगुण सहगुण वासा ॥ चौथा स्वासा कबीरको दासा । स्वासा पार सतपुर वासा ॥ पंचयै निरंजन जिव घटवारा । कबीर मोहर लख पार उतारा ॥ जो नहीं भये कबीरके दासा । ता कहै काल निरंजन आसा ॥ पुण्य लीन्ह रस त्रस जिव केरा । पुन्यमान जस तरे विव भेरा ॥ पापिहिं डार दिये यम खाई । जार खोर चौरासी भमाई ॥ पाप पुण्य महीं नाहिं उबारा । दया सत् परमारथ सुधारा ॥ नाम कबीर प्रताप उबारा । क्रीतम नाम जपेउं यम मारा ॥ आद नाम कबीर दुखहरना । क्रीतम त्रिगुण नाम तप मरना ॥ जन्म मरण दुख बडे जंगाला । जन्म मरण झरकावे काला ॥
कबीरकृष्णगीता ।
४७
तेहि दुख कबीर गुरु पगु गहा। सत्यकबीर जप हंस निरवहा ॥ सरगुण श्रेष्ठ विष्णु अधिकारा । निर्गुण सत्यकबीर जिव तारा ॥ निर्गुण भक्त बिना जमलूटे । निर्गुण बिना न संगय छूटे ॥ नकल निर्गुण कहिये निराकारा । तिन जो जीवहि कीन्ह खुवारा ॥ दूजे निर्गुण मन यम अंसा । तजि धरती साध निहसंसा ॥ चाथे निर्गुण नीर लखाया । पंचये निर्गुण पवन बहाया ॥ छठये निर्गुण गगन बखाना । सतये सत्यकबीर निरबाना ॥ आतम पवन और तन आदी । सो राम कबीरका नादी ॥ नांद निरंजन नांद अष्टंगी । नांद सुरति सोहंग तरंगी ॥ नांद पुत्र शिष्य गुरु मुख जाये । बिना शिष्य कस मुख कहाये ॥ सीखे सुने शब्द कहैं खोजा । जहां सांच ताके भये सोजा ॥ असल सांच एक कपदी दूजा । असल बोलता तज भ्रम पूजा ॥ दोहा—असल सुरति साहेब का, नर सुरत अनुहार ॥ सबै रूप तन भासे, जोत पुंज उजियार ॥ नख सिख विमल सुठ आति लोना। अथर सिंहासन अंकित भवना ॥ सिंहासनके अथर सकल सब । अथर सिंहासन सत्यकबीर जप ॥ जाके दस्त पयाना लहजीऊ । कहे कबीर ताके सोइ पीऊ ॥ पुरुष सरूप यह हंस कडिहारा। पहुँचे हंस पुरुष दरवारा ॥ कंचन पृथ्वी हंस सब रहहीं । निज२दीप सबे मुख लहहीं ॥ जेते अंस प्रगट होय आवा । धर सरूप सो नाम धरावा ॥ पुरुष अमान सीलके खानी । समर्थ नाम अकह सो जानी ॥ सबे नाम है साहेब केरा । अकह नाम सो हंस निवैरा ॥
सद्गुरु और गुरुके लक्षण और चिह्न
( ४८ )
कविरक्तुणगीता ।
अकह नाम सो सद्गुरु भाषा । सद्गुरु सब पूरण अभिलाषा ॥ जासों डोरी पुरुषकी पावे । सत्पुरुष सम तेहि चित्तलोवे ॥ केने गुरुवा कपट कराहीं । सीखहिं शब्द सिखावत नाहीं ॥ कपटी गुरु जो शब्द न देई । पूजा पाठ लेख पुन लेई ॥ पूछे शिष्य तब ज्ञानके बाता । पूजा थोर क्रोध गुरु ताता ॥ गुरु सो जेहि अस कत सिष भाऊ। पूजे बिन पूजे एक ताऊ ॥ पूजा लेय पुनि राह बतावे । अमरलोक ले जिव पहुँचावे ॥ अकह कथाको गम न पावे । सो सद्गुरु कवीर समुझावे ॥ जे शिष्य बहुत गम्य कर बोले । गुरुकी सेवा करे दिल खोले ॥ मात पिताको सेवक जो सुत । सोइ सपूत जो गुरु सेवा जुगत ॥
दोहा-सेवा देवा लेवा करे, पखलधार तब जान ॥
गुरु सोई जो ज्ञान दे, सेवक सेवा ठान ॥
सेवक होय करे गुरु निंदा । ज्ञान पाय कहे गुरु दाहनबिंदा ॥
चेला गुरु पूंजी दे खोई । गुरु बिन सेवा लाभ न होई ॥
कविरचन ।
दोहा- कहैं कवीर सुन देव मुनि, कृष्णकपिल मुनि व्यास ।
तुम सब सेवो साधु गुरु, छोड़ धर्म विश्वास ॥
धर्म विश्वास कालकी फांसी । प्रेत भूत आस दुखरासी ॥
गुरु तज सकल आस दुखखानी । गुरु बिन नर्क परे अभियानी ॥
गुरु सोई जो अंतहु गीठा । जन्म मरण गुरु लागे सीठा ॥
सकलदेववचन व कुबेरका गुरु उपदेश लेना
कवीरकृष्णगीतः ।
४९
सकलदेव वचन ।
सकल देव उठ चरण यनावा । श्रीहरिविलस गलताव सुनावा ॥ हम सब परे निरंजन फांसा । सत्यकवीर काटे यम त्रासा ॥ जन्मत भरत बहुत दुख पावा । अब कवीरके चरण चितलावा ॥ यमसे एक तुम राखन हारा । कवीर वांचे सब यमके चारा ॥
कवीरवचन ।
कहैं कवीर तुम सब तन धरहूँ । क्रितम देह हरि सेवा करहूँ ॥ अमृतदेह अमर घर जाई । क्रितम देह घर ठार समाई ॥ सत्य देह हंसके संग। सत्य देह विदेह प्रसंगा ॥ अब सुनो ज्ञान पान परचाई । थित पान दे लोक पठाई ॥ उठे कुबेर हरिपद लपटाने । सत्य कवीर गुरु लरन सो ठाने ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण पुलाकित होय वाणी । सत्यकवीर सट्टुर सुखदानी ॥ कोट जन्म तप पुंज जेहि होई । सतकवीर कहैं सेवहिं सौई ॥ उठे हर्षित हरि आज्ञा पाई । कवीरके सन्मुख महिपर धाई ॥ कहैं कुबेर सीस महि लाई । आद पुरुष कवीर प्रगटाई ॥
कवीर वचन ।
कहैं कवीर तुम हरि गुरु भजहूँ । तजहु कुपंथ आमिख भष तजहूँ ॥ देवता आमिख लेय मधुवासा । और आमिख बहु देव गरासा ॥
कुबेर वचन ।
कहैं कुबेर मोहिं आपन करहूँ । दे परवाना कर्मज हरहूँ ॥ तुमही कर्ता मूल सकलके । तीन लोककर भक्त न कलके ॥ तुम्हरे अंस जीव सब स्वाभी । निरंजनके मूल तुम अंतर्थाभी ॥
५०
कबीरकृष्णगीता ।
कबीर वचन ।
सत्कबीर विहस कह बाता । सहि कुबेर शरण यम आता ॥ आरती साज अब आन तुरंता । नीरयर पान मिष्टान्न भुगंता ॥ बहुत सुगंध फूल बहुताई । सुरत सुवास सेत फललाई ॥ मेवा वस्तर पटंबर छाजा । लोक प्रभाव उदै मनु साजा ॥ अन्हद शब्द सो मंगलचारा । सानंद सट्टुर भक्त अपारा ॥ सबे देव मिल मंगल गावहिं । जै २ सत्कबीर उचारहिं ॥ साजेड थार जोत प्रकाशा । अथर थार सिंहासन स्वासा ॥ भोग लगाय पुरुष सतनामा । लियो छोर यम फंदते प्राणा ॥ यमराजा सो त्रिण नोडाई । काल भूतके सुंह भुकाई ॥ शब्द वाक्य कह दीन्हों बीरा । सुरति समानी सत्य कबीरा ॥ चरणामृत तुलसी माला । दीन्हें तिलक सर्व सुखचाला ॥ कहहिं सिखावन दंडवत गुरुसाता । तीन दंडवत साथ पिपुमाता ॥ रहिय गुरुके चरण लौलीना । रामनाम गुरु साधुहिं चीन्हा ॥ केतो पढके निडर रहई । गुरुकी शक्ति सबे निरवहई ॥ पढा देवता दया जेहि हिये । दयाहीन यम कातर हिये ॥ गुरु सिवायकछु आस न करिये । सट्टुर भज सतलोक पगु धरिये ॥ सट्टुर सत्यकबीर निज नामा । जहाँ प्रेम तँहँवा गुरुनामा ॥ बिना प्रेम जग होत बिगाना । तात मात बिन प्रेम बिगाना ॥ आन सो प्रेम करे सो सुरखा । कबीर कृष्ण तरे सब पुरखा ॥ कबीर बिना कोई तारे नाहीं । त्रिभुवन सब परंपची आहीं ॥
कृष्णका दीक्षा लेनेके लिये प्रार्थना करना
कवीरकृष्णगीता ।
५१
एक सत्यकवीर सत्य बोलहीं । और सबे माया बस डोलहीं ॥ धन्य सो सत्यकवीर कंडहारा । नरक परत बहु जीवहिं तारा ॥
दोहा--सर्वमई है साहेव, सबे रूप सत्यनाम ।
गुरुसरूप चित ध्यान धर, और ध्यान बेकाम ॥ धाय विष्णु धर चरण कवीरा । गहीर्ष कर कवीर मिल हीरा ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण मैं नाती तोरा । पिता निरंजन भक्षक गेरा ॥
दोहा--हमरी कौन बतावे, खाये सबे पितु काल ।
आज तारु मेरे आजा, देहौ मोहर टकसार ॥
कवीरवचन ।
कहे कवीर कृष्ण धर धीरा । कोई दिन गति तोहि देहौ वीरा ॥
पान प्रसाद नरियर मिष्ठाना । दीन्ह कवीर कृष्ण कई पाना ॥
सुनहु विष्णु मयशरगकी बाता । सत् सतोषुण मम अंस विधाता ॥
पारसपान प्रसाद यह खाहु । उपजे दृढ अंकुर गुरु पाहु ॥
पान प्रसादके अस प्रतापा । जन्म २ को भिटही पापा ॥
रहे मान कन्या वर जैसी । मनीह मनावे सेंदुर चढ तैसी ॥
विना लिखा सोइ मानद आना । चरणाघृतसे हंस निरवाना ॥
जब लिख बीरा दीन्ह पुन जाहीं । पूरा शिष्य सद्गुरु पंथ माहीं ॥
दोहा--सबे देवता दसकत, मोहर सत्यकवीर ।
विना मोहर सुलतानको, माल न लगे तीर ॥
जिन वनजारे लीन्ह प्रवाना । मोहर देख घटैत भय माना ॥
५२
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा--कहैं कबीर कृष्णसे, मनमो राखो धीर । आगे वीरा देव तोहि,हमार अंस तुम वीर ॥
व्यासवचन ।
कहैं व्यास कबीर हर वंसा । सबके मूल कबीर निहसंसा ॥ अपने मन सब सदुरु चेला । सदुरु शिष्य जेहि नाम थिला ॥ हम सब सदुरु निंदे सुनि जेतै । सबके सदुरु कबीर गति देतै ॥ रवि प्रकाश भौ तिगिर नासा । कीतम त्रिगुण तिगिर तन भासा ॥ निर्गुण भक्त प्रकाश रवि जाना । निरगुण सरगुण माहिं समाना ॥ निर्गुण स्वासा सरगुण देहीं । यमसे बांचे कबीर सनेहीं ॥
कबीरवचन ।
दोहा--कहैं कबीर हम सब घट, राम रूप तन स्वास । स्वासा पुरुष नार तन, स्वासा विकसत न नास ॥
व्यास सुखदेव वचन
कहैं व्यास सुखदेव कर जोरी । यम तन कांच जीव बंदी छोरी ॥ यह तन विनसत बार न लगे । ना जानो स्वासा कब वागे ॥ कपिलमुनि गाय सो तुमहि बचाया । जो बांचे सो कबीरकी दाया ॥ दीजे सुख पान मोहिं आतुर । सुखे प्रथम चेतै सो चातुर ॥ वाघ निरंजन सब जिव गार्ई । सवा लाख नित खाय कसाई ॥ सो जिव बांचे काल तुम आसा । नाम कबीर जाहिपर बासा ॥
दोहा--एक ठांव बन कपिल मुनि, दूसर स्वास सुखदेव । सब जिव प्रासे वाघ यम, तुम कबीर लख लेव ॥ तब कबीर जिव उपजी दाया । मानिद पान सो सबहिं खवाया ॥
मनका वर्णन - मनकी ४० प्रकृति
कवीरकृष्णगीता ।
५३
कवीरवचन ।
कहैं कवीर निःशंक अव होहू । निरंजन वाष न आसे तोहू ॥ अव तुम सुनहु और एक वाता । प्रथम गुरुहैं पिता औ माता ॥ रज बीज माता पिताके चोला । पुरुषअंश तेहि तेज अमोला ॥ पांच तत्व प्रकृति पचीसा । चौदह यम त्रिगुण तैंतीसा ॥ रोम २ सब आरि तन जिवके । तन मन काल मार वल पिवके ॥
दोहा--चालिस सेरको मन भयो, चालिसमहैं एक सार ।
एक सांच सब झूठा, स्वास सार तन छार ॥
गुप्त प्रगट दस इंद्री लखहू । पचीस प्रकृती तैंतीसा भाषहू ॥ गुणभा तीन मिले अठतीसा । अक्षा अंस एक मन दीसा ॥ भाउं न चालिस चालिस जीऊ । जीवके सत्यनाम है पीऊ ॥ जीव अमर सो अमर कवीरा । सत्यकवीर सुक्त मन हीरा ॥ शरे तत्व औ गुण प्रकृती । अमर सो हंस पुरुषको रीती ॥ पांच अफीके काया बाहर । अमरलोक आसन तेहि ठाहर ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश जग अधपत । अधपतकी मत क्रीतम मलगत ॥ निरंजन पुनि तन घर मरऊ । ऊंच नीच बहु क्रीतम कियऊ ॥ अजब दिल निरंजन नाऊ । नाना रंग बसाये गार्ऊ ॥ अहंकार बस राहु अलाहू । ताते कोई न पावे थाहू ॥ कुमत कुसंग क्रोध अध चाली । ये सब विकट निरंजन माली ॥ आप निरंजन अल्लह कहाये । अजानिल्ल एक और बनाये ॥ दुनिया अजजिल्ल जग जानो । असल अजानिल्ल प्रभुको मानो ॥
गुरु और गुरुओंका वर्णन
५४
कबीरकृष्णगीता ।
तुरक अजानिल्ल हिंदू धर्मराई । है भक्षक रक्षक नहि भाई ॥ आप अजानिल्ल अलह कहलावा । अलह अलाहकी रूप छिपावा ॥ जीव का करे काल छल कीन्हा । जीव भुलाने खसम न चीन्हा ॥ जीवके खसम सो अमर कबीरा । विन परचे धरे धर चीरा ॥ देवा देवी जार गवारा । सटुरु खसम सो अमर भतारा ॥ असछी सटुरु सत्य कबीरा । नकली सटुरु बहु भौ भीरा ॥ बोरहिं शिष्यको नरक मंझारा । कहहिंके भौजल पार उतारा ॥ वेद पुराण कुराण पढ़ै सब । गुरुभत त्याग मनमत गहै सब ॥ वोर छोर गायत्री माहीं । सत्य दया तेहि माहे दढाहीं ॥ पंडित काजी यमके अगुवा । आप बाल बालें पछ लगुवा ॥ द्विजके कहे चले संसारा । सो द्विज मनमत बात अपारा ॥ कलयुग आवत है चल भाई । लै २ पान लोक बलि जाई ॥ करिहै निरंजन कलिय विचारा । वट२ कुमत उपजहि संसारा ॥ ब्राह्मण कलिमें मछरी खैहैं । विष्णु देह धर नरके जैहैं ॥ धरिहैं निरंजन रूप मलीक्षा । गऊ विगहिं दुख देहिं अदीक्षा ॥ बडा प्रपंच करि है जिव लागी । अनंत रूप धर नट बट पागी ॥
दोहा—चोरी और छिनारी, आमिष भष जिव घात ।
यह सब करिहैं निरंजन, जीवन वड उत्पात ॥
काजी रूप निरंजन पांडे । एके काल दोऊ घर भांडे ॥ एके विष्णौ दुतिय दूबे । त्रिविध तिवारी पांडे चौबे ॥ छठयें सतयें अठयें नौवें । दसयें दस प्रकार द्विज सोमे ॥
कबीरकृष्णगीता ।
५५
नौवैं नौ नारी प्रमोधा । दसवैं दस द्वार जिन सोधा ॥ अठवैं अष्ट कमल जो भिन्ना । सतयै सत्य वाक गहि लीना ॥ षट्ये षड्स त्यागे भाई । पाठै पचर्यै वेद पढाई ॥ चौवै चार वेद जो राता । तिवारी त्रिगुण देव भगु माता ॥ दूवै दुवधा दूर बहावे । एक असल सत्यनाम समावे ॥ एक सो जन कबीर विष्णो गता । दयाशील पतिपाल अगतगत ॥
व्यास सुखदेव वचन ।
कहे सुखदेव व्यास कर जोरी । कहहु चौरासी केतिक खोरी ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो सब कोई । चार खान चौरासी लक्ष होई ॥ नौ लख जलमो जीव समाना । चौदह लक्ष पंछी परवाना ॥ ऊमि कीट सत्ताइस लाख । तीस लाख स्थावर भाषा ॥ चार लाख मालुष तन जाना । मालुष देह परमपद जाना ॥ चार खान अब सुनहु व्यासा । चौरासी चार निरंजन फांसा ॥ अंडज पिंडज ऊष्मज अंकुरा । चार खान जिव एकहिं पूरा ॥ पुरुष दीन्ह जिव अम्बर चोला । इच्छारूपी उडुगण खोला ॥ सौ चोला को निरंजन पैन्हा । नरक कलमा काया जिव दीन्हा ॥ भये असतो निरंजन जबते । आनके आप लियो अब जबते ॥ कुमत असत जिव घात निरंजन । जिव पालक सतनाम सो सज्जन ॥ आपन जनमल ताहु दुखदाई । त्रियसुत निराकार निज खाई ॥ कहेो जीव कैसेके बांचे । सत्यनाम विन यमघर नांचे ॥
मीन भक्षककी गतिका वर्णन
५६
कबीरकृष्णगीता ।
विष्णुवचन ।
उठके कृष्ण केहं कर जोरी । कल भखमीन कौनगति मोरी ॥ मीनरूप है विष्णुके स्वामी । जीव भक्षकके कस गत कामी ॥
कबीरवचन ।
कहैं कधीर सुनो भगवाना । मीन भक्ष गडघात निदाना ॥ परनारीरत नरक अधोरा । लोहू पीव भिक्षा मह बोरा ॥ द्वादश तेहि योजन भौसागर । भिक्षा मूत्र कमि दचागर ॥ नरकको कुंड सात यम कीन्हा । घोर नरक भौसागर चीन्हा ॥ भिक्षाकुंड ॥ १ ॥ मूत्रकुंड ॥ २ ॥ रावीकुंड ॥ ३ ॥ रक्तकुंड ४ खरवारकुंड ॥ ५ ॥ नासिकामलकुंड ॥ ६ ॥ धातुकुंड ॥ ७ ॥ सुनहु आठे अग्रिकुंड ॥ ८ ॥ पांचसौ ते रे बडे सुंड ॥ पांचसौ योजन चकराई भाई । लक्ष योजन के हैं गहराई ॥ भौसागरका भंवर भयावन । बूडे पापी अधिक अपावन ॥ राम चीन्ह पुन चीन्हे नामा । सत्यनाम सो सुखके धामा ॥ सत्यनामको वेद न जाने । निराकार कह वेद बखाने ॥ निरंजन के स्वासा ते आयवेदा । आगे कैसे जाने भेदा ॥ वेद नीत बहु विमल बखाने । तांत्रिक घात सुनी मन जाने ॥
दोहा-वेद मते वैकुंठ मिल, दया भाव सतसंग ।
तांत्रिक नरक बुडावे, वैदिक रामप्रसंग ॥
परे बाढ मछरी जस भाई । सलिता बूडे मीन उतराई ॥ पलटत पानी चले जो मीना । परे सलिठ नीको तिन कीन्हा ॥ देहैं लोभ चारा बहुताई । परे फांस मन मति अरुझाई ॥
जीव बधनेका पाप
कवीरकृष्णगीता ।
५७
यह विध सिरजन बट जिव आये । यहां निरंजन कीर वझाये ॥ छिन्न सुखदे सब सुख हर लीन्हा । अन्मर जन्म जीव नहिं दीन्हा ॥ कहा करो जो काल नसायो । विना पेयादा दाय न पायो ॥ कहैं कवीर जो संतका द्रोही । निश्चय काल गरासे बोही ॥ कोटिन जीव वधे कर पापा । तेहि जो अजिया सुख एक लापा ॥ अजियासुत दूध भाई दौई । सो सांचा जिन शब्द विलौई ॥ सद्गुरु शब्द लखे अरि हीता । सब भक्षक एक सद्गुरु मीता ॥ जो जेहि काटे सो तेहि मारे । मारन छल तेहि काल सुधारे ॥ कोट बालक वधे एक त्रिया बालक । कोट त्रिया वधे पाप एक गायक ॥ कोट गाय वधे एक झख सार्व । झख मछरी कोटिन बुधतार्व ॥ कोटिन पाप बसे तेहि माहीं । विप्रघातसम पातक तार्व ॥ कोट विप्र वधे विष्णव एका । विष्णव वध होय पाप अनेका ॥ जीवत महितन भरत प्रतमाळा । तब तक नरक भोग बस काळा ॥ मालुष तन धर भक्त न कीन्हा । भक्तही बूढे कमीना ॥ सद्गुरु भक्त प्राप्त जिव होई । कहैं कवीर सतलोक गये सोई ॥ सद्गुरु भक्त प्राप्त बडभागी । बडे भाग्य बैरागी अलुरागी ॥ जन्म अनेक तब पुण्य कमाई । होय मास बासी सो जन्मे आई ॥ बनवासी न करे विवाहा । काहु पुरुष सुख दधि न बाहा ॥ सात जन्म जो सततन राखा । तब सो सब पुरुष पत भाषा ॥ सात जन्म सो पियासंग जरई । तब सो पतिव्रता औतरई ॥ सात जन्म पतिव्रत कमावे । सत्तभक्त कर सद्गुरु पावे ॥ सात जन्म करे गुरुसेवा । तजे आस सब देवी देवा ॥
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