कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
सप्तम लम्बक १७
सप्तम लम्बक १७ हे दिव्य प्रकाशधारी निर्मल बल-स्वरूप हे निर्दोष व्यक्तियों से देखे जानेवाले अत्यन्त आश्चर्यमय शिव ! तुम्हें प्रणाम है। हे आधे शरीरमें गिरिजा को धारण करनेवाले विशुद्ध ब्रह्मचारिन् ! हे सङ्कल्पमात्र से विश्व की रचना करनेवाले और स्वयं विश्वस्वरूप ! तुम्हें प्रणाम है ॥११ १०२॥ इस प्रकार, स्तुति करते हुए और तीन दिनों तक उपवास किये हुए राजा से प्रसन्न होकर शिव ने दर्शन देकर कहा—'राजन् ! उठो। तुम्हारे वंश का प्रवर्तक बालक उत्पन्न होगा और गौरी की कृपा से तुम्हें एक उत्तम कन्या भी होगी ॥१०३-१०४॥ वह कन्या तुम विद्याधरों के होनेवाले चक्रवर्ती नरवाहनदत्त की महारानी बनेगी' ॥११ ५॥ ऐसा कहकर शिव के अन्तर्धान होने पर वह विद्याधरों का राजा प्रातःकाल प्रसन्न चित्त होकर उठा और उसने अपनी महारानी अलङ्कारप्रभा को स्वप्न का समाचार सुनाकर आनन्दित किया रानी ने भी स्वप्न में पार्वती के द्वारा इसी प्रकार के वरदान प्राप्त करने का समाचार सुनाया ॥११ ६-११७॥ राजा ने उठकर स्नान करके शिव की पूजा की और दान दिया तथा व्रत का पारणोत्सव किया। कुछ दिन व्यतीत होने पर रानी अलङ्कारप्रभा ने गर्भ-धारण किया ॥११८-११९॥ वह रानी मधु से सुगन्धित और चंचल नेत्र भ्रमरवाले पाण्डुरवर्ण कमल के समान मुख से राजा को आनन्दित करने लगी ॥१२० ॥ तदनन्तर प्रसिद्ध और प्रशंसनीय जन्मवाले पुत्र को रानी ने इस प्रकार उत्पन्न किया जैसे आकाश सूर्य को उत्पन्न करता है ॥१२१॥ उत्पन्न होते ही उस कुमार ने अपने फैलते हुए तेज से उस प्रसूति-गृह को मानों सिन्दूर से लाल कर दिया ॥१२२॥ पिता हेमप्रभ ने शत्रुकुल का भय देनेवाले उस पुत्र का नाम आकाशवाणी के आज्ञानुसार वज्रप्रभ रखा ॥१२३॥ तब वह बालक पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान अपने तेज-रूपी गरुड़ को बढ़ाने के लिए क्रमशः बढ़ने लगा ॥१२४॥ तदनन्तर राजा हेमप्रभ की रानी अलङ्कारप्रभा ने पुनः थोड़े दिनों में ही गर्भ धारण किया ॥१२५ ॥ ३
१८ कथासरित्सागर
१८ कथासरित्सागर सगर्भा लावण्योद्भूतसविशेषद्युतिस्तथा। सत्यं हुताशमासाद्य मेजेऽन्तःपुररत्नताम् ॥११६॥ विद्याकल्पितसत्पक्षविमानेन नभस्तले। बभ्राम च तयाभूतविलसद्गर्भदोहदा ॥११७॥ प्राप्ते च समये तस्या देव्या कन्याजनिष्ट सा। पर्याप्तं वर्णनं यस्या जन्म गौरीप्रसादतः ॥११८॥ नरवाहनदत्तस्य भार्यैषा भाविनीति वाक्। तदाद्यापि हरदेशवचःसंवादिनी दिवः ॥११९॥ ततो राजा सुतोत्पत्तिनिर्वेशेऽकृष्टनोत्सवः। तां स हेमप्रभोऽकार्षीन्नाम्ना रत्नप्रभां सुताम् ॥१२० ॥ स्वविद्यासंस्कृता सा च तस्य रत्नप्रभा पितुः। अवर्धत गृहे दिक्षु प्रकाशस्तूदपद्यत ॥१२१॥ ततः स राजा तं कर्महरं वज्रप्रभं सुतम्। कृतदारक्रियं कृत्वा यौवराज्येऽभिषिक्तवान् ॥१२२॥ विन्यस्तराज्यभारश्च तस्मिन्नासीत्स निर्वृतः। सुताविवाहचिन्ता तु तस्यैकामूसदा हृदि ॥१२३॥ एकदा सोऽन्तिकासीनां प्रदेवीं बोध्य तां सुताम्। राजाप्रवीदमङ्गारप्रभां वशी समीपगाम् ॥१२४॥ कुलालङ्कारभूतापि पश्य देवि जगत्त्रये। कन्या नाम महद्दुःखं धिग्गहो महतामपि ॥१२५॥ विनीताप्याप्तविद्यापि रूपयौवनवत्यपि। रत्नप्रभा वरप्राप्त्या विर्नैपा यद्धुनोति माम् ॥१२६॥ नरवाहनदत्तस्य भार्योक्ता दैवतैरियम्। तत्किं न दीयते तस्मै भव्यसम्बन्धवर्तिने ॥१२७॥ इति प्रोक्तस्तया दथ्या स राजा पुनरब्रवीत्। बाढं सा कन्यका धन्या या तं वरमवाप्नुयात् ॥१२८॥ स हि कामावताराशत्र किं तु नाद्यापि सिद्ध्यताम्। प्राजन्मनेन मया तस्य विद्याप्राप्तिः प्रतीक्ष्यते ॥१२९॥ इत्यत्र बान्तस्तस्य मद्यस्तैर्वचनैः पितुः। वर्णप्रविष्ठे- कन्दर्पमोहम् रूपन्तेपमं ॥१३०॥ श्रान्तवाविशतिस्तत मुजव निदिरितव च । ममूरत्नप्रभा तन कृतचिता वरण गा ॥१३१॥
सप्तम लम्बक १९
सप्तम लम्बक १९ वह गर्भबती रानी रनिवास में सिंहासन पर बैठी हुई सचमुच रनिवास के रत्न-सी मालूम होती थी ॥११६॥ गर्भ के कारण होनेवाली इच्छा की पूर्ति के लिए वह अपनी विद्या के प्रभाव से व्योम- यान की कल्पना करके आकाश में विचरण करती थी ॥११७॥ गर्भ का समय (दस महीने) पूरा होने पर रानी ने कन्या को उत्पन्न किया। उस कन्या के वर्णन में इतना कहना ही पर्याप्त है कि उस का जन्म पार्वती की कृपा से हुआ था ॥११८॥ उसके उत्पन्न होने पर शिव की आज्ञा का अनुसरण करनेवाली यह आकाशवाणी हुई कि 'यह नरवाहनदत्त की भावी पत्नी होगी' ॥११९॥ राजा ने पुत्रोत्पत्ति के समान ही उसका जन्म-महोत्सव मनाया और उस कन्या का नाम रत्नप्रभा रखा ॥१२ ०॥ राजा ने उस कन्या को अपनी विद्याओं से शिक्षित कर दिया। वह कन्या घर में बढ़ने लगी और उसका प्रकाश चारों दिशाओं में फैलने लगा ॥१२१॥ तदनन्तर राजा ने उस कुमार को युद्ध-विद्याओं में निपुण देखकर उसका विवाह करके उसे युवराज बना दिया ॥१२२॥ पुत्र पर राज्य-भार देकर राजा हेमप्रभ निश्चिन्त और सुखी था किन्तु कन्या के विवाह की एक चिन्ता उसके हृदय में जगी हुई थी ॥१२३॥ एक बार वह राजा अपने पास बैठी हुई विवाह-योग्य कन्या को देखकर समीप में स्थित रानी अलंकारप्रभा से बोला—॥१२४॥ 'हे महारानी ! तीनों लोकों में कुल के अलंकार-रूप होने पर भी कन्या महान् लोगों के लिए भी अत्यन्त दुःखदायिनी होती है ॥१२५॥ यह रत्नप्रभा शिक्षिता रूपवती और विद्याओं की जानकार होने पर भी वर न मिलने के कारण मुझे दुख दे रही है' ॥१२६॥ रानी ने कहा कि 'देवताओं ने इसके नरवाहनदत्त की महारानी होने की आकाशवाणी की है अतः हमारे उस भावी चक्रवर्ती को इसे क्यों नहीं दे देते ? ॥१२७॥ रानी के इस प्रकार कहे गए राजा हेमप्रभ ने उनसे कहा—'ठीक है। वह कन्या धन्य है जो नरवाहनदत्त को पति-रूप में प्राप्त करे। वह कामदेव का अवतार है किन्तु उसने अभी स्थिरता नहीं प्राप्त की। अतः मैं उसकी विद्या प्राप्ति की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। (विद्या प्राप्त होने पर वह दिव्य विद्याधर हो जायगा) ॥१२८-१२९॥ इस प्रकार पिता के मुख से बाण व मोहन-मन्त्रों के समान उन अक्षरों के कान में जाने पर रत्नप्रभा उस पति द्वारा चित्त हरण कर लेने पर व्याकुल-सी मूर्च्छिता-सी सोई-सी और लिखी हुई-सी हो गई ॥१३ ०-१३१॥
१८ कथासरित्सागर
१८ कथासरित्सागर सगर्भा चाभवद्देव्यभूत्सविशेषद्युतिस्तथा। सत्यं हेमासमारूढा भेजेऽन्तःपुररत्नताम् ॥११६॥ विद्याकल्पितसत्पद्मविमानेन नभस्तले। बभ्राम च सप्रभाभूतविलसद्गर्भबोढृवा ॥११७॥ प्राप्ते च समये तस्या देव्याः कन्याऽजनिष्ट सा। पर्याप्तं वर्णनं यस्या जन्म गौरीप्रसादतः ॥११८॥ नरवाहनदत्तस्य भार्यैषा भाविनीति वाक्। तदाश्रावि सुरादेशवचःसंभाविनी दिवः ॥११९॥ ततो राजा सुतोत्पत्तिनिर्विशेषकृतोत्सवः। तां स हेमप्रभोऽकार्षीन्नाम्ना रत्नप्रभां सुताम् ॥१२०॥ स्वविद्यासंस्कृता सा च तस्य रत्नप्रभा पितुः। अवर्धत गृहे दिक्षु प्रकाशस्तूपपद्यत ॥१२१॥ ततः स राजा तं वर्महरं वज्रप्रभं सुतम्। कृतवारक्रियं कृत्वा यौवराज्येऽभ्यषिञ्चवान् ॥१२२॥ विन्यस्तराज्यभारश्च तस्मिन्नासीत्स निर्वृतः। सुताविवाहचिन्ता तु तस्यैकामूदथा हृदि ॥१२३॥ एकदा सोऽन्तिकासीनां प्रदेयां वीक्ष्य तां सुताम्। राजाऽब्रवीदलङ्कारप्रभां देवीं समीपगाम् ॥१२४॥ कुलालङ्कारभूतापि पश्य देवि जगत्त्रये। कन्या नाम महद्दुःखं धिग्ग्रहो महतामपि ॥१२५॥ विनीताऽप्याप्तविद्यापि रूपयौवनवत्यपि। रत्नप्रभा वरप्राप्त्या विनेया यद्धुनोति माम् ॥१२६॥ नरवाहनदत्तस्य भार्योक्ता दैवतैरियम्। तत्किं न दीयते तस्मै भाव्यस्मच्चक्रवर्तिने ॥१२७॥ इति चोक्तस्तया देव्या स राजा पुनरब्रवीत्। बाढं सा कन्यका धन्या या तं वरमवाप्नुयात् ॥१२८॥ स हि कामावतारोऽत्र किं तु नाद्यापि विद्यताम्। प्राप्तस्तेन मया तस्य विद्याप्राप्तिः प्रतीक्ष्यते ॥१२९॥ इत्येवं वदतस्तस्य सद्यस्तैर्वचनैः पितुः। कर्णप्रविष्टैः कन्दर्पमोहमु त्रपदोपमैः ॥१३०॥ भ्रान्तेवाविष्टचित्तेव सुप्तेव मिलितेव च। अभूद्रत्नप्रभा तेन हृतचित्ता वरणं सा ॥१३१॥
सप्तम लम्बक २१
सप्तम लम्बक २१ तब वह कन्या माता-पिता को प्रणाम करके और किसी प्रकार उठकर अपने निवास भवन में चली गई और अत्यन्त चिन्ता से व्याकुल होकर किसी प्रकार बड़ी देर के बाद सो गई ॥१३४॥ तब स्वप्न में उसे यशमयी पार्वती ने कहा—'बेटी ! यह शुभ दिन है। अतः तुम स्वयं कौशाम्बी में जाकर अपने पति को देखना। तब तुम्हारा पिता स्वयं वहाँ आकर तुम्हारा विवाह करेगा। पार्वती के उस प्रकार के आदेश को उसने प्रातःकाल उठकर अपनी माता से कह सुनाया ॥१३५॥ माता की आज्ञा पाकर और अपनी विद्या के प्रभाव से सब कुछ जानकर वह उद्यान में स्थित अपने पति को देखने के लिए अपने नगर से चली ॥१३६॥ 'हे आर्यपुत्र ! तुम मुझे वही रत्नप्रभा समझो जो उत्कण्ठित होकर तुम्हारे पास आई है। आगे तुम जैसा समझो' ॥१३७॥ इस प्रकार, उसके अमृत को नीचा दिखानेवाले मधुर वचन को सुनकर और नेत्रों के लिए अमृत के समान उस विद्याधरी के सुन्दर रूप को देखकर नरवाहनदत्त विधाता की निन्दा करने लगा कि उसने सारा शरीर ही नेत्रमय और कर्णमय क्यो नहीं बना दिया कि उसे मैं देखता ही रहता और उसके वचन सुनता ही रहता ॥१३८-१३९॥ और बोला—'मैं धन्य हूँ। आज मेरा जन्म सफल हुआ कि तुमने प्रेम से मेरे पास अभिगमन किया ॥१४०॥ इस प्रकार, उन दोनों के परस्पर नवीन प्रेम के कारण वार्तालाप करते हुए ही अकस्मात् आकाश में विद्याधरों की सेना दीख पड़ी ॥१४१॥ 'यह मेरे पिता आये'—रत्नप्रभा के इस प्रकार कहते ही राजा हेमप्रभ अपने पुत्र के साथ आकाश से तुरन्त उतरा ॥१४२॥ वह राजा हेमप्रभ अपने पुत्र वज्रप्रभ के साथ स्वागत करते हुए नरवाहनदत्त के पास आया ॥१४३॥ जबतक वे परस्पर शिष्टाचार करते हुए मिल रहे थे, इतने में ही उनका आगमन जानकर वत्सराज उदयन भी अपने मंत्री के साथ वहीं आ गया ॥१४४॥ अतिथि-सत्कार प्राप्त करने के बाद राजा हेमप्रभ ने उदयन को रत्नप्रभा के पूर्व कथनानुसार सारा वृत्तान्त सुनाया ॥१४५॥
२० कथासरित्सागर
२० कथासरित्सागर ततः कथञ्चित्पितरौ प्रणम्यान्तस्पुरं निजम्। गत्वा चिन्तातुरा निद्रां चिरेण कथमप्यगात् ॥१३२॥ प्रातः शुभे दिने पुत्रि वत्स वत्सेश्वरात्मजः। द्रष्टव्यः स्ववरो गत्वा कौशाम्बीं नगरीं त्वया ॥१३३॥ ततश्च स्वपुरेऽमुष्मिन्नानीय स्वपिता स्वयम्। तव तस्य च कल्याणि विवाहं संविधास्यति ॥१३४॥ इति स्वप्नेऽथ तां गौरी सानुकम्पा समादिशत्। प्रबुध्य सा च तं स्वप्नं प्रातर्मात्रे न्यवेदयत् ॥१३५॥ ततः सा तदनुज्ञाता बुद्ध्वा विद्याप्रभावतः। उद्यानस्थं वरं द्रष्टुं प्रावर्तत निजात्पुरात् ॥१३६॥ तामार्यपुत्र मामेतां वेत्थ रत्नप्रभामिति। प्राप्तामुक्त्वा क्षणेनाथ वित्थ यूयमतः परम् ॥१३७॥ एतत्तस्या वचः श्रुत्वा माधुर्यव्यक्ततामृतम्। विलोक्य नेत्रपीयूषं विद्याधर्या वपुश्च तत् ॥१३८॥ नरवाहनदत्तोऽन्तर्विधातारं निनिन्द सः। श्रोत्रनेत्रमयं कृत्स्नमकरोत्किं न मामिति ॥१३९॥ जगाद तां च धन्योऽहं जन्माद्य सफलं मम। योऽहमेवं स्वयं तन्वि स्नेहादभिसृतस्त्वया ॥१४०॥ इत्यन्योन्यनवप्रेमकृतसंलापयोस्तयोः। अकस्माद्ददृशे तत्र विद्याधरबलं दिवि ॥१४१॥ तातोऽयमागतोऽत्रेति त्राप्तरत्नप्रभोदिते। राजा हेमप्रभो व्योम्नः सपुत्रोऽवततार सः ॥१४२॥ उपाययौ च पुत्रेण सह बद्धप्रेमेण सः। नरवाहनदत्तं तं विहितस्वागतादरम् ॥१४३॥ अन्योन्यरचिताचारा यावत्तिष्ठन्ति ते क्षणात्। तावत्तत्रायायौ बुद्ध्वा वत्सराजः समन्त्रिकः ॥१४४॥ कृतातिथ्यविधिं तं च नृपं हेमप्रभाख्यं सः। यथा रत्नप्रभोक्तं तं वृत्तान्तं समबोधयत् ॥१४५॥
सप्तम लम्बक २१
सप्तम लम्बक २१ तब वह कुमारी माता-पिता को प्रणाम करके और किसी प्रकार उठकर अपने निवास भवन में चली गई और अत्यन्त चिन्ता से व्याकुल होकर किसी प्रकार बड़ी देर के बाद सो गई ॥१३४॥ तब स्वप्न में उस दयामयी पार्वती ने कहा—'बेटी ! कल शुभ दिन है। अतः तुम स्वयं कौशाम्बी में जाकर अपने पति को देखना। तब तुम्हारा पिता स्वयं वहाँ आकर तुम्हारा विवाह करेगा। पार्वती के उस प्रकार के आदेश को उसने प्रातःकाल उठकर अपनी माता से कह सुनाया ॥१३५॥ माता की आज्ञा पाकर और अपनी विद्या के प्रभाव से सब कुछ जानकर वह उद्यान में स्थित अपने पति को देखने के लिए अपने नगर से चली ॥१३६॥ 'हे आर्यपुत्र ! तुम मुझे वही रत्नप्रभा समझो जो उत्कण्ठित होकर तुम्हारे पास आई है। आगे तुम जैसा समझो' ॥१३७॥ इस प्रकार, उसके अमृत को नीचा दिखानेवाले मधुर वचन को सुनकर और नेत्रों के लिए अमृत के समान उस विद्याधरी के सुन्दर रूप को देखकर नरवाहनदत्त विधाता की निन्दा करने लगा कि उसने सारा शरीर ही नेत्रमय और कर्णमय क्यों नहीं बना दिया कि उसे मैं देखता ही रहता और उसके वचन सुनता ही रहता ॥१३८-१३९॥ और बोला—'मैं धन्य हूँ। आज मेरा जन्म सफल हुआ कि तुमने प्रेम से मेरे पास अभिगमन किया ॥१४०॥ इस प्रकार, उन दोनों के परस्पर नवीन प्रेम के कारण वार्तालाप करते हुए ही अकस्मात् आकाश में विद्याधरों की सेना दीख पड़ी ॥१४१॥ 'यह मेरे पिता आये'—रत्नप्रभा के इस प्रकार कहते ही राजा हेमप्रभ अपने पुत्र के साथ आकाश से तुरन्त उतरा ॥१४२॥ वह राजा हेमप्रभ अपने पुत्र वज्रप्रभ के साथ स्वागत करते हुए नरवाहनदत्त के पास आया ॥१४३॥ जबतक वे परस्पर शिष्टाचार करते हुए मिल रहे थे इतने में ही उनका आगमन जानकर वत्सराज उदयन भी अपने मन्त्री के साथ वहीं आ गया ॥१४४॥ आतिथ्य-सत्कार प्राप्त करने के बाद राजा हेमप्रभ ने उदयन को रत्नप्रभा के पूर्व वृत्तान्तानुसार सारा वृत्तान्त सुनाया ॥१४५॥
९२ कथासरित्सागर
९२ कथासरित्सागर जगाद च मया ज्ञेयं ज्ञाता विद्याप्रभावतः । इहागता सुता सर्वं वृत्तान्तं चात्र वेद्म्यहम् ॥१४६॥ चक्रवर्तिविमानं हि भाव्यग्रेऽमुष्य तादृशम् ॥१४७॥ अनुमन्यस्व तद्द्रक्ष्यस्यचिरादेवैतमात्मजम् । रत्नप्रभावधूयुक्तं युवराजमिहागतम् ॥१४८॥ एवं वत्सेशमभ्यर्थ्य तेनानुमतवाञ्छितः । सपुत्रं कल्पयित्वा तद्विमानं निजविद्यया ॥१४९॥ तमारोप्य नृपानन्दसूनुं रत्नप्रभायुतम् । नरवाहनदत्तं च सहितं गोमुखादिभिः ॥१५०॥ यौगन्धरायणेनापि पित्रानुप्रषितेन च। हेमप्रभो निनाय स्वं पुरं काञ्चनशृङ्गकम् ॥१५१॥ नरवाहनदत्तश्च ददर्श प्राप्य तत्पुरम् । श्वाशुरं काञ्चनमयं हेमप्राकारभासुरम् ॥१५२॥ रश्मिप्रतानैर्निर्यद्भिर्बहरुकृतमिवाभितः । प्रसारितानेकभुजं जामातृप्रीतिसम्भ्रमात् ॥१५३॥ तत्र तां विधिवत्तस्मै राजा हेमप्रभो ददौ । रत्नप्रभां महारम्भो हरयेऽब्धिरिव श्रियम् ॥१५४॥ प्रायच्छद्रत्नराशींश्च तदा तस्मै स भास्वरान् । प्रवीप्तानेकवीबाहुवलित्रिभ्रमशालिनः ॥१५५॥ सोत्सवस्य पुरे चास्य राज्ञो वित्तानि वर्षतः । स्रग्धवस्त्रा इव बभुः सपताका गृहा अपि ॥१५६॥ नरवाहनदत्तश्च निर्व्यूढोद्वाहमङ्गलः । दिव्यभोगभुगत्रास्त स रत्नप्रभया समम् ॥१५७॥ रेमे च दिव्यान्युद्यानवापीदेवकुलानि सः । पश्यंस्तया समादृत्य तद्विद्याबस्ततो नमः ॥१५८॥ एवं च तत्र कतिचिद्दिवसानुषित्वा विद्याधराधिपपुरे स वधूसहायः । वत्सेश्वरस्य तनयः स्वपुरीं प्रयातुं यौगन्धरायणमतेन मतिं चकार ॥१५९॥
सप्तम लम्बक २३
सप्तम लम्बक २३ और कहा कि 'मैंने विद्या के प्रभाव से यह जान लिया कि मेरी कन्या यहाँ आई है और सब भी मैं जानता हूँ ॥१४६॥ यह कुमार नरवाहनदत्त जब चक्रवर्ती होगा तब इसको भी ऐसा विमान होगा। आप लोग कुछ ही समय में रत्नप्रभा के साथ अपने पुत्र को यहाँ आया हुआ देखोगे ॥१४७-१४८॥ 'इस समय हम लोगों को जाने की आज्ञा दो इस प्रकार वत्सराज से निवेदन करके और उसकी आज्ञा प्राप्त करके अपनी विद्या के प्रभाव से विमान की रचना करके पुत्र के साथ उस विमान में लज्जा से नीचा मुँह किये हुए नरवाहनदत्त को उसके मित्र गोमुख आदि के साथ विमान में बिठाकर और वत्सराज के द्वारा प्रेषित यौगन्धरायण को साथ लेकर हेमप्रभ अपने काञ्चनशृंग नगर को गया ॥१४९-१५१॥ नरवाहनदत्त ने भी सुवर्णमय और सोने की चारदीवारी से घिरे हुए श्वसुर के नगर को देखा जो चारों ओर निकलती हुई प्रकाश की किरणों से ऐसा शोभित था मानो जामाता के स्नेह से अपने हाथों को ऊंचा करके फैलाये हुआ था ॥१५२ १५३॥ उस नगर में पहुँचकर राजा हेमप्रभ ने शास्त्र-विधि के अनुसार नरवाहनदत्त को अपनी कन्या इस प्रकार दी जैसे समुद्र ने विष्णु को लक्ष्मी दी थी ॥१५४॥ कन्या के साथ उसने रत्नों के चमकते हुए ढेर दहेज में दिये जो अनेक विवाहों में प्रज्वलित अग्नियों का भ्रम उत्पन्न कर रहे थे ॥१५५॥ समस्त कांचनपुर नगर में विवाह का उत्सव इस प्रकार हुआ कि ध्वजा (पताका) वाले घर भी ऐसे नृत्य रहे थे मानों राजा से वस्त्र प्राप्त किये हुए हों ॥१५६॥ नरवाहनदत्त विवाहोत्सव के हो जाने पर पत्नी रत्नप्रभा के साथ दिव्य भोगों का भोग करता हुआ उस नगर में रहने लगा ॥१५७॥ वह उस नगरी के दिव्य बाग-बगीचों वापियों और देव-मन्दिरों में विहार करता था और विद्या के प्रभाव से रत्नप्रभा के साथ आकाश में भी विचरण करता था ॥१५८॥ इस प्रकार, पत्नी के साथ नरवाहनदत्त ने उस विद्याधरों के नगर में कुछ दिनों तक रहकर अपने पिता के पास जाने के लिए यौगन्धरायण के साथ सम्मति की ॥१५९॥
२४ कथासरित्सागर
२४ कथासरित्सागर श्वश्र्वा ततो रचितमङ्गलसंविधान- सम्पूजितः ससचिवः श्वशुरेण भूयः। तेनैव पुत्रसहितेन सह प्रतस्थे कान्तासखस्तदधिरुह्य पुनर्विमानम् ॥१६०॥ प्राप्याशु तां प्रमदनिर्भरवत्सराज- बद्धोत्सवो स जननीनयनामृताभः। रत्नप्रभां वधूमथ स्वपुरीं विवेश हेमप्रभेण ससुतेन सहानुगेण ॥१६१॥ वत्सेश्वरोऽपि सह वासवदत्तया तं पावार्तं समभिनन्द्य सुतं वधूं च। हेमप्रभं सतनयं विभवानुरूपं सम्बन्धिर्न मवमपूजयदूर्जितश्रीः ॥१६२॥ अथ विद्याधरराजः तस्मिन्नापृच्छ्य वत्सराजादीन्। उत्पत्य नमः ससुते गतवति हेमप्रभे स्वपुरम् ॥१६३॥ नरवाहनदत्तोऽसौ रत्नप्रभया समदनमञ्जुकया। सह सुखितस्तत्रैवीदिवसः सचिवैर्निजैर्युक्तः ॥१६४॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे रत्नप्रभालम्बके प्रथमस्तरङ्गः।
द्वितीयस्तरङ्गः रत्नप्रभाकथा (पूर्वानुवृत्ता) एवं विद्याधरीं भार्या भव्यां रत्नप्रभां नवाम्। तस्य प्राप्तवतोऽन्येद्युस्तद्वेश्मनि तया सह ॥१॥ नरवाहनदत्तस्य स्थितस्य प्रातराययुः। दर्शनार्थमुपद्वारं सचिवा गोमुखादयः ॥२॥ द्वाःस्थया क्षणमद्येषु तेष्वत्रावेदितेष्वथ। प्रविष्टेष्वावृतवदनां द्वाःस्थां रत्नप्रभाम्यधात् ॥३॥ द्वारमेषां न रोद्धव्यमिह प्रविशतां पुनः। आर्यपुत्रवयस्यानां स्वं शरीरममी हि नः ॥४॥
सप्तम लम्बक २५
सप्तम लम्बक २५ तदनन्तर सास के द्वारा मंगल-विधान करने पर और ससुर के द्वारा सम्मानित किया गया नरवाहनदत्त पुत्र (साले) के सहित अपने ससुर के साथ अपनी पत्नी और मित्रों को लिये हुए विमान पर बैठकर कौशाम्बी की ओर चला ॥१६०॥ और, शीघ्र ही वत्सराज से किये गये उत्सव से अलंकृत राजधानी में माताओं की आँखों के लिए अमृत प्रवाहित करता हुआ नरवाहनदत्त अपने ससुर, साले और पत्नी रत्नप्रभा एवं अपने साथियों के साथ पहुँचा ॥१६१॥ वासवदत्ता के साथ उदयन ने भी पैरों पर गिरते हुए पुत्र और पुत्रवधू का अभिनन्दन किया और अपने विभव के अनुरूप अपने नये सम्बन्धी हेमप्रभ और उसके पुत्र वज्रप्रभ का स्वागत- सत्कार किया ॥१६२॥ तदनन्तर हेमप्रभ के उदयन से आज्ञा लेकर पुत्र के साथ आकाश में उड़कर अपने नगर को विदा होने पर, वह नरवाहनदत्त मदनमंचुका और रत्नप्रभा के साथ अपने मित्रों से मिलकर सुख से दिन बिताने लगा ॥ १६३-१६४ ॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का प्रथम तरंग समाप्त द्वितीय तरंग रत्नप्रभा की कथा (क्रमशः) इस प्रकार, विद्याधर-जाति की रत्नप्रभा नामक नई पत्नी को प्राप्त करके आनन्द का उपभोग करते हुए नरवाहनदत्त से मिलने के लिए उसके गोमुख आदि मित्र एक दिन प्रातः काल आये और रनिवास के द्वार पर खड़े हुए ॥१-२॥ द्वारपालिका के द्वारा कुछ समय तक रोके जाकर और फिर सूचना देकर भीतर प्रवेश पाने पर नरवाहनदत्त द्वारा उनका स्वागत-सत्कार किया गया। उसके बाद रत्नप्रभा ने द्वार- पालिका से कहा—'तुम अब इन लोगों को द्वार पर रोका न करो ये आर्यपुत्र के मित्र और हमारे ही अंग हैं ॥३-४॥ ४
२४ कथासरित्सागर
२४ कथासरित्सागर श्वश्र्वा ततो रचितमङ्गलसंविधान- सम्पूजितः ससचिवः श्वशुरेण भूयः । तेनैव पुत्रसहितेन सह प्रतस्थे कान्तासखस्तदधिरुह्य पुनर्विमानम् ॥१६०॥ प्राप्याथ तां प्रमदनिर्भरवत्सराज- बद्धोत्सवां स जननीनयनामृतौघः । रत्नप्रभां दधदथ स्वपुरीं विवेश हेमप्रभेण ससुतेन सहानुगीतः ॥१६१॥ वत्सेश्वरोऽपि सह वासवदत्तया तं पादानतं समभिनन्द्य सुतं वधूं च । हेमप्रभं सतनयं विभवानुरूपं सम्बन्धिनं समभिपूजयदूर्जितश्रीः ॥१६२॥ अथ विद्याधरराजे तस्मिन्नापृच्छ्य वत्सराजादीन् । उत्पत्य नभः ससुते गच्छति हेमप्रभे स्वपुरम् ॥१६३॥ नरवाहनदत्तोऽसौ रत्नप्रभया समदमच्छुकया । सह सुखितस्तदनेकैर्दिवसैः सखिभिर्निजैर्युक्तः ॥१६४॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे रत्नप्रभालम्बके प्रथमस्तरङ्गः ।
द्वितीयस्तरङ्गः रत्नप्रभाकथा (पूर्वानुवृत्ता) एवं विद्याधरीं भार्यां भव्यां रत्नप्रभां नवाम् । तस्य प्राप्तवतोऽन्येद्युस्तद्वेश्मनि तया सह ॥१॥ नरवाहनदत्तस्य स्थितस्य प्रातराययुः । दर्शनार्थमुपद्वारं सचिवा गोमुखादयः ॥२॥ द्वारस्थया क्षणहृदपु तेष्वत्रावेदितेष्वथ । प्रविष्टेष्वादृतश्चैतां द्वारस्थां रत्नप्रभाम्यभात् ॥३॥ द्वारमेषां न रोद्धव्यमिह प्रविशतां पुनः । मार्यपुत्रवयस्यानां स्वं शरीरममी हि नः ॥४॥
सप्तम लम्बक २७
सप्तम लम्बक २७ पतिव्रत्य पर ऐसी सङ्कल्प न होनी चाहिए—ऐसा मेरा विचार है। द्वारपालिका को ऐसा कहकर उसने अपने पति से कहा—'आर्यपुत्र ! इस प्रसंग में मैं कहती हूँ सुनो। स्त्रियों की रक्षा और नियन्त्रण का मैं सूक्ष्म नीति समझती हूँ या ईर्ष्या अथवा अज्ञानवश उसमें कोई कार्य सिद्ध नहीं होता। स्त्रियों का गहन चर तथा अन्य सम्भाषण से ही हानि होती है। पंचेन्द्रियवशकरण के बिना तो ब्रह्मा भी समर्थ नहीं हैं। मदोन्मत्ता नारी और नदी का नियमन कौन कर सकता है ! ॥५–८॥ राजा रत्नाधिप की कथा मैं इस सम्बन्ध में एक कथा कहती हूँ सुनो— गङ्गा के बीच में रत्नकूट नाम का एक विख्यात द्वीप है। वहाँ महा उत्साही और परम विष्णुभक्त पराक्रमसागर रत्नाधिपति नाम का राजा था। वह राजा पृथ्वी के सभी राजाओं की कन्याओं के साथ विवाह करता हुआ सारी पृथ्वी का विजय करने के लिए नित्य मन्त्रणा सलाह करने लगा॥ —११॥ उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने स्वयं दर्शन देकर कहा—'राजन् ! मैं तेरे तप पर प्रसन्न हूँ। जो कहता हूँ उसे सुनो—॥१२॥ कलिङ्ग देश में कार्पटिकेश्वर के मन्दिर पास श्वेत हाथी के रूप में उत्पन्न हुआ है। वह श्वेतभीम के नाम से प्रसिद्ध है ॥१३॥ वह हाथी दुर्जय की मन्त्रसिद्धि के कारण और मेरी भक्ति के कारण सभी कामरूपधारियों और दुर्धरत्व का अन्त करवाता है ॥१४॥ मैं तेरे स्वप्न में उसे कहता हूँ कि वह ब्राह्मण-धर्मी का रूप धरकर तुम्हारा दर्शन करेगा ॥१५॥ तू सवेरे हाथी का रूप बनाए उस ब्राह्मण के दर्शन से ही कृतकृत्य हो जाओगे व बहुत-सा धन देकर फिर शहर में लौटाकर उस ब्राह्मण के साथ हाथी का पूजन और दर्शन सदा करना ॥१६॥ फिर राजा जागकर उठा और प्रातः उठकर विधिपूर्वक उसने ब्राह्मण रूप श्वेतहस्ती के दर्शन किए ॥१७॥ राजाने उसका बहुत-सा पूजन कर उसे विदा किया और फिर उसने श्वेत हाथी का बहुत-सा पूजन किया और हाथी के प्रभाव से उसने सारी पृथ्वी को अपने वश किया
रक्षा चान्तःपुरेऽप्येवंदुर्लभैवेहसम्मत मम। इति त्रास्यामुदित्वा सा स्वपतिं तमभाषीत् ॥५॥ आर्यपुत्र प्रसङ्गेन वदामि एष तच्छृणु। नीतिमात्रमहं मन्ये स्त्रीणां रक्षानिमन्त्रणम् ॥६॥ ईर्ष्याकृतोऽथवा मोहः कार्यं तेन न किञ्चन। महत्तरेण रक्ष्यन्त शीलेनैव कुलस्त्रियः ॥७॥ धातापि न प्रभुः प्रायश्चपलानां तु रक्षणे। मत्ता नदी च नारी च नियन्तुं केन पार्यते ॥८॥ राज्ञो रत्नाधिपतेः कथा तथा च श्रूयतामत्र कथां वः कथयाम्यहम्। अस्तीह रत्नकूटाख्यं द्वीपं मध्येऽम्बुधेर्महत् ॥९॥ तत्र राजा महोत्साहः पुरा परमवैष्णवः। यथार्थेनाभिधानेन रत्नाधिपतिरित्यभूत् ॥१०॥ स राजा विजयं पृथ्व्याः सर्वराजात्मजास्तथा। भार्याः प्राप्तुं तपस्तेपे विष्णोराराधनं महत् ॥११॥ सन्तुष्टस्तपसा साक्षात् भगवानादिदेश तम्। उत्तिष्ठ राजंस्तुष्टोऽस्मि तदिदं वच्मि ते शृणु ॥१२॥ कलिङ्गविषये कोऽपि गन्धर्वो मुनिशापतः। समुत्पन्नो गजः श्वेतः श्वेतरश्मिरिति श्रुतः ॥१३॥ पूर्वजन्मतपःसिद्धियोगाम्दवमखितस्तपा । ज्ञानी गगनगामी च गजो जातिस्मरण सः ॥१४॥ दत्तादेशो मया स्वप्ने स च हस्ती महांस्तव। एत्य स्वयं द्युमार्गेण वाहनत्वं प्रपत्स्यते ॥१५॥ तमारुह्य गजं श्वेतं सुरेन्द्रमिव वज्रभृत्। व्योममार्गेण यं यं त्वं राजानमभियास्यसि ॥१६॥ स स दिव्यानुभावाय भीतस्तुभ्यं प्रदास्यति। स्वप्ने मयैव दत्ताशः कन्यादाननिभास्करम् ॥१७॥ एवं विजेष्यसे कृत्स्नां पृथ्वीमन्तःपुराणि च। राजपुत्रीसहस्राणि त्वमशीतिमवाप्स्यसि ॥१८॥ इत्युक्त्वाऽन्तर्हिते विष्णौ स राजा कृतपारणः। अभ्युद्यदुरागतं व्योम्ना तं ददर्श गजं शुभम् ॥१९॥
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२८ कथासरित्सागर
२८ कथासरित्सागर आरुह्योपनतं तं च यथादिष्टं स विष्णुना। तथा विजित्य पृथिवीमाजह्रे राजकन्यकाः ॥२०॥ सहस्राशीतिसंख्याभिस्ततस्ताभिः समं च सः। उवास रत्नकूटेऽत्र यथेच्छं विहरन्नृपः ॥२१॥ शान्त्यर्थं शीतरश्मेश्च तस्य दिव्यस्य दन्तिनः। प्रत्यहं भोजयामास विप्राणां शतपञ्चकम् ॥२२॥ कदाचिच्च समासाद्य परिभ्रम्य स भूपतिः। द्वीपान्तराणि स्वं द्वीप रत्ननाभिपत्तिराययौ ॥२३॥ तत्रावतरतस्तस्य गगनात्तु गजोत्तमम्। चञ्च्वा तार्क्ष्यावभवः पक्षी मूर्ध्नि चैवावताडयत् ॥२४॥ स च पक्षी प्रदुद्राव राज्ञा तीक्ष्णाङ्कुशाहतः। हस्ती तु भूमावपतच्चञ्च्वाघातेन मूर्च्छितः ॥२५॥ नृपेऽवतीर्णे स गजो लब्धसंज्ञोऽपि नाग्रहीत्। उत्थाप्यमानोऽप्युत्थातुं निरस्तकवलग्रहः ॥२६॥ पञ्चाहानि यथैवास्मिन्वारणे पतितस्थिते। दुःखितः स निराहारो राजा चाप्येवमब्रवीत् ॥२७॥ भो लोकपाला भूतास्मिन्नुपार्यं सङ्कटे मम। अन्यमोपहरिष्यामि छित्त्वाहं स्वशिरोऽद्य वः ॥२८॥ इत्युक्त्वैवासलग्नोऽतं स्वशिरश्छेत्तुमुद्यतम्। अशरीरा जगादैवं वाणी तत्क्षणमम्बरात् ॥२९॥ मा साहस कृथा राजन्साध्वी काचित्करोति चेत्। हस्तस्पर्शं गजस्यास्य सदुत्तिष्ठति नान्यथा ॥३०॥ तच्छ्रुत्वैवामृतलतां नाम दृष्ट्वा स भूपतिः। मुख्यामानाययामास निजां देवीं सुरक्षिताम् ॥३१॥ तया स्पृष्टः स हस्तन नोत्तिष्ठद् गजो यदा। तदा सोऽन्या निजाः सर्वा देवीरानाययन्नृपः ॥३२॥ ताभिः कृतकरस्पर्शः समस्ताभिरपि क्रमात्। नैवोत्तस्थौ द्विपः सोऽत्र न तास्वेकाप्यभूत्सती ॥३३॥ १ नोऽन्येष्यासन्नपर्वः।
सप्तम लम्बक २९
सप्तम लम्बक २९ उस आये हुए हाथी पर विष्णु भगवान् के आज्ञानुसार चढ़कर राजा ने सारी पृथ्वी को जीतकर राज-कन्याओं का आहरण किया ॥२०॥ वह राजा अस्सी हजार कन्याओं को लाकर रत्नकूटपुर में यथेच्छ विहार करता हुआ रहने लगा ॥२१॥ और उस श्वेतरश्मि¹ हाथी की शान्ति के लिए प्रतिदिन पाँच सौ ब्राह्मणों को भोजन कराता था ॥२२॥ किसी समय उस हाथी पर चढ़कर और अनेक द्वीपों का भ्रमण करके वह राजा अपने द्वीप में आया। वहाँ पर आकाश से भूमि पर उतरते हुए उस हाथी के मस्तक पर गरुड़जातीय पक्षी ने चोंच से प्रहार किया ॥२३ २४॥ राजा के तीखे अंकुश के प्रहार से वह पक्षी तो मारा गया किन्तु हाथी चोंच की मार से मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा ॥२५॥ राजा के उतर जाने पर होश में आया हुआ भी वह हाथी उठाये जाने पर भी न उठ सका और न आहार कर सका ॥२६॥ इस प्रकार, पाँच दिनों तक उस हाथी के निराहार पड़ रहने पर राजा भी निराहार रहकर दुःखित हुआ और बड़ी चिन्ता में पड़कर बोला—'हे लोकपालो मुझे इस संकट में कोई उपाय बताओ। नहीं तो मैं अपना सिर काटकर तुम्हें बलि दे दूँगा' ॥२७-२८॥ ऐसा कहकर और तलवार खींचकर अपना गला काटने को तैयार राजा से आकाशवाणी ने अप्रत्यक्ष रूप से कहा—॥२९॥ 'हे राजन् ! ऐसा दुस्साहस कार्य न करो। यदि कोई पतिव्रता स्त्री अपने हाथ से इस हाथी का स्पर्श करेगी तो यह उठ जायगा। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है' ॥३०॥ यह सुनकर प्रथम राजा ने अमृतलता नाम की सुप्रतिष्ठ प्रधान रानी को बुलवाया ॥३१॥ जब उसके छूने पर हाथी नहीं उठा तब उसने अन्य सभी रानियों को बुलवाया ॥३२॥ उनके छूने पर भी जब हाथी न उठा तब यह निश्चय हो गया कि इनमें कोई भी सच्चरित्रा और पतिव्रता नहीं है ॥३३॥ १ किसी-किसी पुस्तक में हाथी का नाम 'शीतरश्मि' लिखा है। किन्तु 'श्वेतरश्मि' नाम ही उचित प्रतीत होता है।—अनु.
२८ कथासरित्सागर
२८ कथासरित्सागर आरुह्योपनतं स च यथादिष्टः स विष्णुना। तया विजित्य पृथिवीमाजह्रे राजकन्यकाः ॥२०॥ सहस्राशीतिसंख्याभिस्ततस्ताभिः समं च सः। उवास रत्नकूटेऽत्र यथेच्छं विहरन्नृपः ॥२१॥ शान्त्यर्थं शीतरश्मेश्च तस्य दिव्यस्य दन्तिनः। प्रत्यहं भोजयामास विप्राणां शतपञ्चकम् ॥२२॥ कदाचिच्च तमारुह्य परिभ्रम्य स भूपतिः। द्वीपान्तराणि स्वं द्वीपं रत्नाधिपतिराययौ ॥२३॥ तत्रावतरतस्तस्य गगनात्तु गजोत्तमम् । चञ्च्वा तार्क्ष्योद्भवः पक्षी मूर्ध्नि दैवादताडयत् ॥२४॥ स च पक्षी प्रदुद्राव राज्ञा तीक्ष्णाङ्कुशाहतः। हस्ती तु भूमावपतच्चञ्च्वाघातेन मूर्च्छितः ॥२५॥ मुपेजातीर्णं स गजो लब्धसंज्ञोऽपि माद्यकन्। उत्थाप्यमानोऽप्युत्थातुं निरस्तकबलप्रग्रहः ॥२६॥ पञ्चाहानि तथैवास्मिन्वारणे पतितस्थिते। दुःखितः स निराहारो राजा चाप्यवमब्रवीत् ॥२७॥ भो लोकपाला ब्रूतास्मिन्नुपायः सङ्कटे मम। अद्यैवोपहरिष्यामि छित्त्वाहं स्वशिरोऽथ वः ॥२८॥ इत्युक्त्वैवात्तखङ्गं तं स्वशिरश्छेत्तुमुद्यतम्। अशरीरा जगादेव वाणी तत्क्षणमम्बरात् ॥२९॥ मा साहसं कृथा राजन्साध्वी काचित्करोति यत्। हस्तस्पर्शं गजस्यास्य तदुत्तिष्ठति नान्यथा ॥३०॥ सच्छ्रुत्वैवामृतलतां नाम दृष्टः स भूपतिः। मुख्यामानाययामास निजां देवीं सुरक्षिताम् ॥३१॥ तया स्पृष्टः स हस्तेन नोदतिष्ठद् गजो यदा। तदा सोऽन्या निजाः सर्वा देवीरानाययन्नृपः ॥३२॥ ताभिः कृतकरस्पर्शः समस्ताभिरपि क्रमात्। नैवोत्तस्थौ द्विपः सोऽत्र न तास्वेकाप्यभूत्सती ॥३३॥ १ भोजनेप्यसमर्थः।
सप्तम लम्बक २१
सप्तम लम्बक २१ उस आये हुए हाथी पर विष्णु भगवान के आज्ञानुसार चढ़कर राजा न सारी पृथ्वी को जीतकर राज-कन्याओं का आहरण किया ॥२ ॥ वह राजा अस्सी हजार कन्याओं को लाकर रत्नकूटपुर में यथेच्छ विहार करता हुआ रहने लगा ॥२१॥ और उस श्वेतरश्मि¹ हाथी की शान्ति के लिए प्रतिदिन पाँच सौ ब्राह्मणों को भोजन कराता था ॥२२॥ किसी समय उस हाथी पर चढ़कर और अनेक द्वीपों का भ्रमण करके वह राजा अपम द्वीप में आया। वहाँ पर आकाश से भूमि पर उतरते हुए उस हाथी के मस्तक पर गरुडजातीय पक्षी ने चोंच से प्रहार किया ॥२३-२४॥ राजा के तीखे अंकुश के प्रहार से वह पक्षी तो भाग गया किन्तु हाथी चोंच की मार से मूच्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा ॥२५॥ राजा के उतर जाने पर होश में आया हुआ भी वह हाथी उठाये जाने पर भी न उठ सका और न आहार कर सका ॥२६॥ इस प्रकार, पाँच दिनों तक उस हाथी के निराहार पड़े रहने पर राजा भी निराहार रहकर दुःखित हुआ और बड़ी चिन्ता में पड़कर बोला—'हे लोकपालो मुझे इस संकट में कोई उपाय बताओ। नहीं तो मैं अपना सिर काटकर तुम्हें बलि दे दूँगा' ॥२७-२८॥ ऐसा कहकर और तलवार खींचकर अपना गला काटने को तैयार राजा से आकाशवाणी ने अशरीर रूप से कहा—॥२९॥ 'हे राजन् ! ऐसा दुस्साहस कार्य न करो। यदि कोई पतिव्रता स्त्री अपने हाथ से इस हाथी का स्पर्श करेगी तो यह उठ जायगा। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है' ॥३ ॥ यह सुनकर प्रसन्न राजा ने अमृतलता नाम की सुरक्षित प्रधान रानी को बुलवाया ॥३१॥ जब उसके छूने पर हाथी नहीं उठा तब उसने अन्य सभी रानियों को बुलवाया ॥३२॥ उनके छूने पर भी जब हाथी न उठा तब यह निश्चय हो गया कि इनमें कोई भी सच्चरित्रा और पतिव्रता नहीं है ॥३३॥ १ किसी-किसी पुस्तक में हाथी का नाम 'शीतरश्मि' मिला है। किन्तु श्वेतरश्मि' नाम ही उचित प्रतीत होता है।—अनु.
३० कथासरित्सागर
३० कथासरित्सागर अन्तःपुरसहस्राणि साध्वीनीतमपि स्फुटम् । दृष्ट्वा विलब्धितान्येव स राजा जनसन्निधौ ॥३५॥ विसङ्क्य स्वपुरात्तस्मान्नानाय्य निखिलाः स्त्रियः। अशनं हस्तिनस्तस्य हस्तस्पर्शमकारयत् ॥३५॥ तथापि यस्य नोत्तस्थौ गजस्तस्तरसा भूपतिः। अस्मत् पुरे न साध्वी स्त्री नैकापीति त्रपां ययौ ॥३६॥ तावच्च दृढगुप्ताख्यस्ताम्रलिप्त्याः समागतः । वणिग्गवाक्षपो मुक्त्वा युक्तान्तं च गतोत्सुकः ॥३७॥ तस्य चामररी पश्चादाजगाम पतिव्रता। एषा शीलवती नाम सा तद्दृष्ट्वा तमब्रवीत् ॥३८॥ स्पृशाम्येष करेणैनं त्वमभूदपरो मया। मनसापि न भद्रपास्तन्मुक्तिस्त्वयं द्विपः ॥३९॥ इत्युक्त्वोरोचयद्धस्तेन सा च संस्पर्श तं गजम्। उत्तस्थौ च गजस्तस्य क्षणाच्च स ततोऽर्हणात् ॥४०॥ इमास्ताः पित्र्यतां प्राप्ता मान्त्रिन्वदवरोधमाः। गजाननन्नहारगर्मर्या जगतानन्य या ॥४१॥ इति शीलवतीं तत्र कृतकोलाहलो जनः। तां तुष्टाव गजं दृष्ट्वा स्वान्तर्गन्धे समुत्थितम् ॥४२॥ गजापि रक्षितामिति परितुष्याभिनन्द्य ताम्। प्रादूरकरोत्तदा रत्नैः शीलवतीं सतीम् ॥४३॥ नृपस्वामिन न यन्मित्रं ह्रीङ्गुणं मन्येष तवम्। अश्रूयतेऽने भाग्यं शृणु गच्छङ्गतामिव ॥४४॥ तस्मिंस्तत्त्वविदित्वा निजभार्य्यापराद्धतः। विससर्जाऽऽत्मनाऽपत्रस्तन्निनाय्यरवागतः ॥४५॥ अथैतादृक् शृङ्गालाख्यः स्वगृहस्य सन्निधौ। गच्छन् ददर्श सा च स्नात्वा विश्रान्त मूता ॥४६॥ दीक्षिताङ्गीव न चारित्रवता विशङ्कितेति। सा च राज्ञाऽब्रवीत् किं मां त्वमन्वागच्छसीति ॥४७॥ स्पृष्टा मया सा गत्वा शीलावत्युवाचतः। उपसर्गेण शङ्केयं च साध्वित्यागता मया ॥४८॥ ततस्तस्याः सा तत्र प्रच्छन्नाऽभूत् कौतुकात्।