महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
जरिता और उसके बच्चोंका संवाद
त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
जरिता और उसके बच्चोंका संवाद
जरितोवाच
अस्माद् बिलान्निष्पतितमाखुं श्येनो जहार तम् ।
क्षुद्रं पद्ध्यां गृहीत्वा च यातो नात्र भयं हि वः ॥ १ ॥
जरिताने कहा— बच्चो! चूहा इस बिलसे निकला था, उस समय उसे बाज उठा ले गया; उस छोटेसे चूहेको वह अपने दोनों पंजोंसे पकड़कर उड़ गया। अतः अब इस बिलमें तुम्हारे लिये भय नहीं है ॥ १ ॥
शाङ्गँका ऊचुः
न हृतं तं वयं विद्मः श्येनेनाखुं कथंचन ।
अन्येऽपि भवितारोऽत्र तेभ्योऽपि भयमेव नः ॥ २ ॥
शाङ्गँक बोले— हम किसी तरह यह नहीं समझ सकते कि बाज चूहेको उठा ले गया। उस बिलमें दूसरे चूहे भी तो हो सकते हैं; हमारे लिये तो उनसे भी भय ही है ॥ २ ॥
संशयो वह्निरागच्छेदृ दृष्टं वायोर्निवर्तनम् ।
मृत्युर्नो बिलवासिभ्यो बिले स्यान्नात्र संशयः ॥ ३ ॥
आग यहाँतक आयेगी, इसमें संदेह है; क्योंकि वायुके वेगसे अग्निका दूसरी ओर पलट जाना भी देखा गया है। परंतु बिलमें तो उसके भीतर रहनेवाले जीवोंसे हमारी मृत्यु होनेमें कोई संशय ही नहीं है ॥ ३ ॥
निःसंशयात् संशयितो मृत्युर्मातर्विशिष्यते ।
चर खे त्वं यथान्यायं पुत्रानाप्स्यसि शोभनान् ॥ ४ ॥
माँ! संशयरहित मृत्युसे संशययुक्त मृत्यु अच्छी है (क्योंकि उसमें बच जानेकी भी आशा होती है); अतः तुम आकाशमें उड़ जाओ। तुम्हें फिर (धर्मानुकूल रीतिसे) सुन्दर पुत्रोंकी प्राप्ति हो जायगी ॥ ४ ॥
जरितोवाच
अहं वेगेन तं यान्तमद्राक्षं पततां वरम् ।
बिलादाखुं समादाय श्येनं पुत्रा महाबलम् ॥ ५ ॥
तं पतन्तं महावेगात् त्वरिता पृष्ठतोऽन्वगाम् ।
आशिषोऽस्य प्रयुञ्जाना हरतो मूषिकं बिलात् ॥ ६ ॥
जरिताने कहा— बच्चो! जब पक्षियोंमें श्रेष्ठ महाबली बाज बिलसे चूहेको लेकर वेगपूर्वक उड़ा जा रहा था, उस समय महान् वेगसे उड़नेवाले उस बाजके पीछे मैं भी बड़ी
तीव्र गतिसे गयी और बिलसे चूहेको ले जानेके कारण उसे आशीर्वाद देती हुई बोली — ॥ ५-६ ॥
यो नो द्वेष्टारमादाय श्येनराज प्रधावसि । भव त्वं दिवमास्थाय निरमित्रो हिरण्मयः ॥ ७ ॥ ‘श्येनराज! तुम मेरे शत्रुको लेकर उड़े जा रहे हो, इसलिये स्वर्गमें जानेपर तुम्हारा शरीर सोनेका हो जाय और तुम्हारे कोई शत्रु न रह जाय’ ॥ ७ ॥
स यदा भक्षितस्तेन श्येनेनाखुः पतत्त्रिणा । तदाहं तमनुज्ञाप्य प्रत्युपायां पुनर्गृहम् ॥ ८ ॥ जब उस पक्षिप्रवर बाजने चूहेको खा लिया, तब मैं उसकी आज्ञा लेकर पुनः घर लौट आयी ॥ ८ ॥
प्रविशध्वं बिलं पुत्रा विश्रब्धा नास्ति वो भयम् । श्येनेन मम पश्यन्त्या हृत आखुर्महात्मना ॥ ९ ॥ अतः बच्चो! तुमलोग विश्वासपूर्वक बिलमें घुसो। वहाँ तुम्हारे लिये भय नहीं है। महान् बाजने मेरी आँखोंके सामने ही चूहेका अपहरण किया था ॥ ९ ॥
शार्ङ्गका ऊचुः
न विद्महे हृतं मातः श्येनेनाखुं कथंचन । अविज्ञाय न शक्यामः प्रवेष्टुं विवरं भुवः ॥ १० ॥ शार्ङ्गका बोले—माँ! बाजने चूहेको पकड़ लिया, इसको हम नहीं जानते और जाने बिना हम इस बिलमें कभी प्रवेश नहीं कर सकते ॥ १० ॥
जरितोवाच
अहं तमभिजानामि हृतं श्येनेन मूषिकम् । नास्ति वोऽत्र भयं पुत्राः क्रियतां वचनं मम ॥ ११ ॥ जरिताने कहा—बेटो! मैं जानती हूँ, बाजने अवश्य चूहेको पकड़ लिया। तुमलोग मेरी बात मानो। इस बिलमें तुम्हें कोई भय नहीं है ॥ ११ ॥
शार्ङ्गका ऊचुः
न त्वं मिथ्योपचारेण मोक्षयेथा भयाद्धि नः । समाकुलेषु ज्ञानेषु न बुद्धिकृतमेव तत् ॥ १२ ॥ शार्ङ्गका बोले—माँ! तुम झूठे बहाने बनाकर हमें भयसे छुड़ानेकी चेष्टा न करो। संदिग्ध कार्योंमें प्रवृत्त होना बुद्धिमानीका काम नहीं है ॥ १२ ॥
न चोपकृतमस्माभिर्न चास्मान् वेत्थ ये वयम् । पीड्यमाना बिभर्ष्यास्मान् का सती के वयं तव ॥ १३ ॥
हमने तुम्हारा कोई उपकार नहीं किया है और हम पहले कौन थे, इस बातको भी तुम नहीं जानतीं। फिर तुम क्यों कष्ट सहकर हमारी रक्षा करना चाहती हो? तुम हमारी कौन हो और हम तुम्हारे कौन हैं? ।। १३ ।।
तरुणी दर्शनीयासि समर्था भर्तुरिषणे ।
अनुगच्छ पतिं मात: पुत्रानाप्स्यसि शोभनान् ।। १४ ।।
माँ! अभी तुम्हारी तरुण अवस्था है, तुम दर्शनीय सुन्दरी हो और पतिके अन्वेषणमें समर्थ भी हो। अतः पतिका ही अनुसरण करो। तुम्हें फिर सुन्दर पुत्र मिल जायँगे ।। १४ ।।
वयमग्निं समाविश्य लोकानाप्स्याम शोभनान् ।
अथास्मान् न दहेदग्निरायास्त्वं पुनरेव नः ।। १५ ।।
हम आगमें जलकर उत्तम लोक प्राप्त करेंगे और यदि अग्निने हमें नहीं जलाया तो तुम फिर हमारे पास चली आना ।। १५ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ता ततः शार्ङ्गी पुत्रानुत्सृज्य खाण्डवे ।
जगाम त्वरिता देशं क्षेममग्नेरनामयम् ।। १६ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! बच्चोंके ऐसा कहनेपर शार्ङ्गी उन्हें खाण्डववनमें छोड़कर तुरंत ऐसे स्थानमें चली गयी, जहाँ आगसे कुशलपूर्वक बिना किसी कष्टके बच जानेकी सम्भावना थी ।। १६ ।।
ततस्तीक्ष्णार्चिरभ्यागात् त्वरितो हव्यवाहनः ।
यत्र शार्ङ्गा बभूवुस्ते मन्दपालस्य पुत्रकाः ।। १७ ।।
तदनन्तर तीखी लपटोंवाले अग्निदेव तुरंत वहाँ आ पहुँचे, जहाँ मन्दपालके पुत्र शार्ङ्गक पक्षी मौजूद थे ।। १७ ।।
ततस्तं ज्वलितं दृष्ट्वा ज्वलनं ते विहंगमाः ।
जरितारिस्ततो वाक्यं श्रावयामास पावकम् ।। १८ ।।
तब उस जलती हुई आगको देखकर वे पक्षी आपसमें वार्तालाप करने लगे। उनमेंसे जरितारिने अग्निदेवको यह बात सुनायी ।। १८ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि शार्ङ्गकोपाख्याने
त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २३० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें शार्ङ्गकोपाख्यानविषयक दो सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २३० ।।
२३१-
एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
शार्ङ्गकोंके स्तवनसे प्रसन्न होकर अग्निदेवका उन्हें अभय देना
जरितारिरुवाच
पुरतः कृच्छ्रकालस्य धीमाञ्जागर्ति पूरुषः ।
स कृच्छ्रकालं सम्प्राप्य व्यथां नैवैति कर्हिचित् ॥ १ ॥
जरितारि बोला— बुद्धिमान् पुरुष संकटकाल आनेके पहले ही सजग हो जाता है, वह संकटका समय आ जानेपर कभी व्यथित नहीं होता ॥ १ ॥
यस्तु कृच्छ्रमनुप्राप्तं विचेता नावबुध्यते ।
स कृच्छ्रकाले व्यथितो न श्रेयो विन्दते महत् ॥ २ ॥
जो मूढ़चित्त जीव आनेवाले संकटको नहीं जानता, वह संकटके समय व्यथित होनेके कारण महान् कल्याणसे वंचित रह जाता है ॥ २ ॥
सारिसृक्क उवाच
धीरस्त्वमसि मेधावी प्राणकृच्छ्रमिदं च नः ।
प्राज्ञः शूरो बहूनां हि भवत्येको न संशयः ॥ ३ ॥
सारिसृक्कने कहा— भैया! तुम धीर और बुद्धिमान् हो और हमारे लिये यह प्राणसंकटका समय है (अतः इससे तुम्हीं हमारी रक्षा कर सकते हो); क्योंकि बहुतोंमें कोई एक ही बुद्धिमान् और शूरवीर होता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ३ ॥
स्तम्बमित्र उवाच
ज्येष्ठस्तातो भवति वै ज्येष्ठो मुञ्चति कृच्छ्रतः ।
ज्येष्ठश्चेन्न प्रजानाति कनीयान् किं करिष्यति ॥ ४ ॥
स्तम्बमित्र बोला— बड़ा भाई पिताके तुल्य है, बड़ा भाई ही संकटसे छुड़ाता है। यदि बड़ा भाई ही आनेवाले भय और उससे बचनेके उपायको न जाने तो छोटा भाई क्या करेगा? ॥ ४ ॥
द्रोण उवाच
हिरण्यरेतास्त्वरितो ज्वलन्नायाति नः क्षयम् ।
सप्तजिह्वाननः क्रूरो लेलिहानो विसर्पति ॥ ५ ॥
द्रोणने कहा— यह जाज्वल्यमान अग्नि हमारे घोंसलेकी ओर तीव्र वेगसे आ रहा है। इसके मुखमें सात जिह्वाएँ हैं और यह क्रूर अग्नि समस्त वृक्षोंको चाटता हुआ सब ओर
फैल रहा है ।। ५ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवं सम्भाष्य तेऽन्योन्यं मन्दपालस्य पुत्रकाः । तुष्टुवुः प्रयता भूत्वा यथाग्निं शृणु पार्थिव ।। ६ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार आपसमें बातें करके मन्दपालके वे पुत्र एकाग्रचित्त हो अग्निदेवकी स्तुति करने लगे; वह स्तुति सुनो ।। ६ ।।
जरितारिरुवाच
आत्मासि वायोज्र्वलन शरीरमसि वीरुधाम् । योनिरपश्च ते शुक्लं योनिस्त्वमसि चाम्भसः ।। ७ ।। **जरितारिने कहा—**अग्निदेव! आप वायुके आत्मस्वरूप और वनस्पतियोंके शरीर हैं। तृण-लता आदिकी योनि पृथ्वी और जल तुम्हारे वीर्य हैं, जलकी योनि भी तुम्हीं हो ।। ७ ।। ऊर्ध्वं चाधश्च सर्पन्ति पृष्ठतः पार्श्वतस्तथा । अर्चिषस्ते महावीर्य रश्मयः सवितुर्यथा ।। ८ ।। महावीर्य! आपकी ज्वालाएँ सूर्यकी किरणोंके समान ऊपर-नीचे, आगे-पीछे तथा अगल-बगल सब ओर फैल रही हैं ।। ८ ।।
सारिसृक्क उवाच
माता प्रणष्टा पितरं न विद्मः पक्षा जाता नैव नो धूमकेतो । न नस्त्राता विद्यते वै त्वदन्य- स्तस्मादस्मांस्त्राहि बालांस्त्वमग्ने ।। ९ ।। **सारिसृक्क बोला—**धूममयी ध्वजासे सुशोभित अग्निदेव! हमारी माता चली गयी, पिताका भी हमें पता नहीं है और हमारे अभी पंखतक नहीं निकले हैं। हमारा आपके सिवा दूसरा कोई रक्षक नहीं है; अतः आप ही हम बालकोंकी रक्षा करें ।। ९ ।। यदग्ने ते शिवं रूपं ये च ते सप्त हेतयः । तेन नः परिपाहि त्वमार्त्तान् वै शरणैषिणः ।। १० ।। अग्ने! आपका जो कल्याणमय स्वरूप है तथा आपकी जो सात ज्वालाएँ हैं, उन सबके द्वारा आप शरणमें आनेकी इच्छावाले हम आर्त प्राणियोंकी रक्षा कीजिये ।। १० ।। त्वमेवैकस्तपसे जातवेदो नान्यस्तप्ता विद्यते गोषु देव । ऋषीनस्मान् बालकान् पालयस्व परेणास्मान् प्रेहि वै हव्यवाह ।। ११ ।।
जातवेद! एकमात्र आप ही सर्वत्र तपते हैं। देव! सूर्यकी किरणोंमें तपनेवाला पुरुष भी आपसे भिन्न नहीं है। हव्यवाहन! हम बालक ऋषि हैं; हमारी रक्षा कीजिये। हमसे दूर चले जाइये ॥ ११ ॥
स्तम्बमित्र उवाच
सर्वमग्ने त्वमेवैकस्त्वयि सर्वमिदं जगत् । त्वं धारयसि भूतानि भुवनं त्वं बिभर्षि च ॥ १२ ॥ **स्तम्बमित्रने कहा—**अग्ने! एकमात्र आप ही सब कुछ हैं, यह सम्पूर्ण जगत् आपमें ही प्रतिष्ठित है। आप ही प्राणियोंका पालन और जगत्को धारण करते हैं ॥ १२ ॥ त्वमग्निर्हव्यवाहस्त्वं त्वमेव परमं हविः । मनीषिणस्त्वां जानन्ति बहुधा चैकधापि च ॥ १३ ॥ आप ही अग्नि, आप ही हव्यका वहन करनेवाले और आप ही उत्तम हविष्य हैं। मनीषी पुरुष आपको ही अनेक और एकरूपमें स्थित जानते हैं ॥ १३ ॥ सृष्ट्वा लोकांस्त्रीनिमान् हव्यवाह काले प्राप्ते पचसि पुनः समिद्धः । त्वं सर्वस्य भुवनस्य प्रसूति- स्त्वमेवाग्ने भवसि पुनः प्रतिष्ठा ॥ १४ ॥ हव्यवाह! आप इन तीनों लोकोंकी सृष्टि करके प्रलयकाल आनेपर पुनः प्रज्वलित हो इन सबका संहार कर देते हैं। अतः अग्ने! आप सम्पूर्ण जगत्के उत्पत्तिस्थान हैं और आप ही इसके लयस्थान भी हैं ॥ १४ ॥
द्रोण उवाच
त्वमन्नं प्राणिभिर्भुक्तमन्तर्भूतो जगत्पते । नित्यप्रवृद्धः पचसि त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥ **द्रोण बोला—**जगत्पते! आप ही शरीरके भीतर रहकर प्राणियोंद्वारा खाये हुए अन्नको सदा उद्दीप्त होकर पचाते हैं। सम्पूर्ण विश्व आपमें ही प्रतिष्ठित है ॥ १५ ॥ सूर्यो भूत्वा रश्मिभिर्जातवेदो भूमेरम्भो भूमिजातान् रसांश्च । विश्वानादाय पुनरुत्सृज्य काले दृष्ट्वा वृष्ट्या भावयसीह शुक्ल ॥ १६ ॥ शुक्लवर्णवाले सर्वज्ञ अग्निदेव! आप ही सूर्य होकर अपनी किरणोंद्वारा पृथ्वीसे जलको और सम्पूर्ण पार्थिव रसोंको ग्रहण करते हैं तथा पुनः समय आनेपर आवश्यकता देखकर वर्षाके द्वारा इस पृथ्वीपर जलरूपमें उन सब रसोंको प्रस्तुत कर देते हैं ॥ १६ ॥ त्वत्त एताः पुनः शुक्ल वीरुधो हरितच्छदाः ।
जायन्ते पुष्करिण्यश्च सुभद्रश्च महोदधिः ॥ १७ ॥
उज्ज्वलवर्णवाले अग्ने! फिर आपसे ही हरे-हरे पत्तोंवाले वनस्पति उत्पन्न होते हैं और आपसे ही पोखरियाँ तथा कल्याणमय महासागर पूर्ण होते हैं ॥ १७ ॥
इदं वै सद्म तिग्मांशो वरुणस्य परायणम् ।
शिवस्त्राता भवास्माकं मास्मानद्य विनाशय ॥ १८ ॥
प्रचण्ड किरणोंवाले अग्निदेव! हमारा यह शरीररूप घर रसनेन्द्रियाधिपति वरुणदेवका आलम्बन है। आप आज शीतल एवं कल्याणमय बनकर हमारे रक्षक होइये; हमें नष्ट न कीजिये ॥ १८ ॥
पिङ्गाक्ष लोहितग्रीव कृष्णवर्त्मन् हुताशन ।
परेण प्रेहि मुञ्चास्मान् सागरस्य गृवानिव ॥ १९ ॥
पिंगल नेत्र तथा लोहित ग्रीवावाले हुताशन! आप कृष्णवर्त्मा हैं। समुद्रतटवर्ती गृहोंकी भाँति हमें भी छोड़ दीजिये। दूरसे ही निकल जाइये ॥ १९ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तो जातवेदा द्रोणेन ब्रह्मवादिना ।
द्रोणमाह प्रतीतात्मा मन्दपालप्रतिज्ञया ॥ २० ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ब्रह्मवादी द्रोणके द्वारा इस प्रकार प्रार्थना की जानेपर प्रसन्नचित्त हुए अग्निने मन्दपालसे की हुई प्रतिज्ञाका स्मरण करके द्रोणसे कहा ॥ २० ॥
अग्निरुवाच
ऋषिर्द्रोणस्त्वमसि वै ब्रह्म तद् व्याहृतं त्वया ।
ईप्सितं ते करिष्यामि न च ते विद्यते भयम् ॥ २१ ॥
**अग्नि बोले—**जान पड़ता है, तुम द्रोण ऋषि हो; क्योंकि तुमने उस ब्रह्मका ही प्रतिपादन किया है। मैं तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध करूँगा, तुम्हें कोई भय नहीं है ॥ २१ ॥
मन्दपालेन वै यूयं मम पूर्वं निवेदिताः ।
वर्ज्येः पुत्रकान् मह्यं दहन् दावमिति स्म ह ॥ २२ ॥
मन्दपाल मुनिने पहले ही मुझसे तुमलोगोंके विषयमें निवेदन किया था कि 'आप खाण्डववनका दाह करते समय मेरे पुत्रोंको बचा दीजियेगा' ॥ २२ ॥
तस्य तद् वचनं द्रोण त्वया यच्चेह भाषितम् ।
उभयं मे गरीयस्तु ब्रूहि किं करवाणि ते ।
भृशं प्रीतोऽस्मि भद्रं ते ब्रह्मन् स्तोत्रेण सत्तम ॥ २३ ॥
द्रोण! तुम्हारे पिताका यह वचन और तुमने यहाँ जो कुछ कहा है, वह भी मेरे लिये गौरवकी वस्तु है। बोलो, तुम्हारी और कौन-सी इच्छा पूर्ण करूँ? ब्रह्मन्! साधुशिरोमणे!
तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे इस स्तोत्रसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ॥ २३॥
द्रोण उवाच
इमे मार्जारिकाः शुक्र नित्यमुद्वेजयन्ति नः। एतान् कुरुष्व दग्धांस्त्वं हुताशन सबान्धवान्॥ २४॥
**द्रोणने कहा—**शुक्लस्वरूप अग्ने! ये बिलाव हमें प्रतिदिन उद्विग्न करते रहते हैं। हुताशन! आप इन्हें बन्धु-बान्धवोंसहित भस्म कर डालिये॥ २४॥
वैशम्पायन उवाच
तथा तत् कृतवानग्निरभ्यनुज्ञाय शार्ङ्गकान्। ददाह खाण्डवं दावं समिद्धो जनमेजय॥ २५॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! शार्ङ्गकोंकी अनुमतिसे अग्निदेवने वैसा ही किया और प्रज्वलित होकर वे सम्पूर्ण खाण्डववनको जलाने लगे॥ २५॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि शार्ङ्गकोपाख्याने एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें शार्ङ्गकोपाख्यानविषयक दो सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३१॥
२३२-
द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
मन्दपालका अपने बाल-बच्चोंसे मिलना
वैशम्पायन उवाच
मन्दपालोऽपि कौरव्य चिन्तयामास पुत्रकान् ।
उक्त्वापि च स तिग्मांशुं नैव शर्म्माधिगच्छति ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मन्दपाल भी अपने पुत्रोंकी चिन्तामें पड़े थे। यद्यपि वे (उनकी रक्षाके लिये) अग्निदेवसे प्रार्थना कर चुके थे, तो भी उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी ॥ १ ॥
स तप्यमानः पुत्रार्थे लपितामिदमब्रवीत् ।
कथं नु शक्ताः शरणे लपिते मम पुत्रकाः ॥ २ ॥
पुत्रोंके लिये संतप्त होते हुए वे लपितासे बोले—'लपिते! मेरे बच्चे अपने घोंसलेमें कैसे बच सकेंगे? ॥ २ ॥
वर्धमाने हुतवहे वाते चाशु प्रवाति ।
असमर्था विमोक्षाय भविष्यन्ति ममात्मजाः ॥ ३ ॥
'जब अग्निका वेग बढ़ेगा और हवा तीव्र गतिसे चलने लगेगी, उस समय मेरे बच्चे अपनेको आगसे बचानेमें असमर्थ हो जायँगे ॥ ३ ॥
कथं त्वशक्ता त्राणाय माता तेषां तपस्विनी ।
भविष्यति हि शोकार्ता पुत्रत्राणमपश्यती ॥ ४ ॥
'उनकी तपस्विनी माता स्वयं असमर्थ है, वह बेचारी उनकी रक्षा कैसे करेगी? अपने बच्चोंके बचनेका कोई उपाय न देखकर वह शोकसे आतुर हो जायगी ॥ ४ ॥
कथमुड्डयनेऽशक्तान् पतने च ममात्मजान् ।
संतप्यमाना बहुधा वाशमाना प्रधावती ॥ ५ ॥
'मेरे बच्चे उड़ने और पंख फड़फड़ानेमें असमर्थ हैं। उन्हें उस दशामें देखकर संतप्त हो बार-बार चीत्कार करती और दौड़ती हुई जरिता किस दशामें होगी? ॥ ५ ॥
जरितारिः कथं पुत्रः सारिसृक्कः कथं च मे ।
स्तम्बमित्रः कथं द्रोणः कथं सा च तपस्विनी ॥ ६ ॥
'मेरा बेटा जरितारि कैसे होगा, सारिसृक्ककी क्या अवस्था होगी, स्तम्बमित्र और द्रोण कैसे होंगे? तथा वह तपस्विनी जरिता किस हालतमें होगी?' ॥ ६ ॥
लालप्यमानं तमृषिं मन्दपालं तथा वने ।
लपिता प्रत्युवाचेदं सासूयमिव भारत ॥ ७ ॥
भारत! मन्दपाल मुनि जब इस प्रकार वनमें (अपनी स्त्री एवं बच्चोंके लिये) विलाप कर रहे थे, उस समय लपिताने ईर्ष्यापूर्वक कहा— ॥ ७ ॥
न ते पुत्रेष्ववेक्षास्ति यानृषीनुक्तवानसि ।
तेजस्विनो वीर्यवन्तो न तेषां ज्वलनाद् भयम् ॥ ८ ॥
‘तुम्हें पुत्रोंको देखनेकी चिन्ता नहीं है। तुमने जिन ऋषियोंके नाम लिये हैं, वे तेजस्वी और शक्तिशाली हैं; उन्हें अग्निसे तनिक भी भय नहीं है ॥ ८ ॥
त्वयाग्नौ ते परीताश्च स्वयं हि मम संनिधौ ।
प्रतिश्रुतं तथा चेति ज्वलनेन महात्मना ॥ ९ ॥
‘मेरे पास ही तुमने अग्निदेवको स्वयं अपने पुत्र सौंपे थे और उन महात्मा अग्निने भी उनकी रक्षाके लिये प्रतिज्ञा की थी ॥ ९ ॥
लोकपालो न तां वाचमुक्त्वा मिथ्या करिष्यति ।
समक्षं बन्धुकृत्ये न तेन ते स्वस्थ मानसम् ॥ १० ॥
‘वे लोकपाल हैं। जब बात दे चुके हैं, तब उसे झूठी नहीं करेंगे। अतः स्वस्थ पुरुष! तुम्हारा मन अपने बच्चोंकी रक्षारूप बन्धुजनोचित कर्तव्यके पालनेके लिये उत्सुक नहीं है ॥ १० ॥
तामेव तु ममामित्रां चिन्तयन् परितप्यसे ।
ध्रुवं मयि न ते स्नेहो यथा तस्यां पुराभवत् ॥ ११ ॥
‘तुम तो मेरी दुश्मन उसी जरिता सौतके लिये चिन्ता करते हुए संतप्त हो रहे हो। पहले जरितामें तुम्हारा जैसा स्नेह था वैसा अवश्य ही मुझपर नहीं है ॥ ११ ॥
न हि पक्षवता न्याय्यं निःस्नेहेन सुहृज्जने ।
पीड्यमान उपद्रष्टुं शक्तेनात्मा कथंचन ॥ १२ ॥
‘जो सहायकोंसे सम्पन्न और शक्तिशाली है’ वह मुझ-जैसे अपने सुहृद् व्यक्तिपर स्नेह नहीं रखे और अपने आत्मीय जनको पीड़ित देखकर उसकी उपेक्षा करे, यह किसी प्रकार उचित नहीं कहा जा सकता ॥ १२ ॥
गच्छ त्वं जरितामेव यदर्थं परितप्यसे ।
चरिष्याम्यहमप्येका यथा कुपुरुषाश्रिता ॥ १३ ॥
‘अतः अब तुम उस जरिताके ही पास जाओ, जिसके लिये तुम इतने संतप्त हो रहे हो। मैं भी दुष्ट पुरुषके आश्रयमें पड़ी हुई स्त्रीकी भाँति अकेली ही विचरूँगी' ॥ १३ ॥
मन्दपाल उवाच
नाहमेवं चरे लोके यथा त्वमभिमन्यसे ।
अपत्यहेतोर्विचरे तच्च कृच्छ्रगतं मम ॥ १४ ॥
**मन्दपालने कहा—**अरी! तू जैसा समझती है, उस भावसे मैं इस संसारमें नहीं विचरता हूँ। मेरा विचरना तो केवल संतानके लिये होता है। मेरी वह संतान ही संकटमें पड़ी हुई है ।। १४ ।।
भूतं हित्वा च भाव्यर्थे योऽवलम्बेत स मन्दधीः ।
अवमन्येत तं लोको यथेच्छसि तथा कुरु ।। १५ ।।
जो पैदा हुए बच्चोंका परित्याग कर भविष्यमें होनेवालोंका भरोसा करता है, वह मूर्ख है; सब लोग उसका अनादर करते हैं; तेरी जैसी इच्छा हो, वैसा कर ।। १५ ।।
एष हि प्रज्वलन्नग्निर्लेलिहानो महीरुहान् ।
आविग्ने हृदि संतापं जनयत्यशिवं मम ।। १६ ।।
यह प्रज्वलित आग सारे वृक्षोंको अपनी लपटोंमें लपेटती हुई मेरे उद्विग्न हृदयमें अमंगलसूचक संताप उत्पन्न कर रही है ।। १६ ।।
वैशम्पायन उवाच
तस्माद् देशादतिक्रान्ते ज्वलने जरिता पुनः ।
जगाम पुत्रकानेव त्वरिता पुत्रगृद्धिनी ।। १७ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जब अग्निदेव उस स्थानसे हट गये, तब पुत्रोंकी लालसा रखनेवाली जरिता पुनः शीघ्रतापूर्वक अपने बच्चोंके पास गयी ।। १७ ।।
सा तान् कुशलिनः सर्वान् विमुक्ताञ्जातवेदसः ।
रूरूयमाणान् ददृशे वने पुत्रान् निरामयान् ।। १८ ।।
उसने देखा, सभी बच्चे आगसे बच गये हैं और सकुशल हैं। उन्हें कुछ भी कष्ट नहीं हुआ है और वे वनमें जोर-जोरसे चहक रहे हैं ।। १८ ।।
अश्रूणि मुमुचे तेषां दर्शनात् सा पुनः पुनः ।
एकैकश्येन तान् सर्वान् क्रोशमानानन्वपद्यत ।। १९ ।।
उन्हें बार-बार देखकर वह नेत्रोंसे आँसू बहाने लगी और बारी-बारीसे पुकारकर वह सभी बच्चोंसे मिली ।। १९ ।।
ततोऽभ्यगच्छत् सहसा मन्दपालोऽपि भारत ।
अथ ते सर्व एवैनं नाभ्यनन्दंस्तदा सुताः ।। २० ।।
भारत! इतनेमें ही मन्दपाल मुनि भी सहसा वहाँ आ पहुँचे; किंतु उन बच्चोंमेंसे किसीने भी उस समय उनका अभिनन्दन नहीं किया ।। २० ।।
लालप्यमानमेकैकं जरितां च पुनः पुनः ।
न चैवोचुस्तदा किंचित् तमृषिं साध्वसाधु वा ।। २१ ।।
वे एक-एक बच्चेसे बोलते और जरिताको भी बारबार बुलाते, परंतु वे लोग उन मुनिसे भला या बुरा कुछ भी नहीं बोले ।। २१ ।।
मन्दपाल उवाच
ज्येष्ठः सुतस्ते कतमः कतमस्तस्य चानुजः । मध्यमः कतमश्चैव कनीयान् कतमश्च ते ॥ २२ ॥ **मन्दपालने पूछा—**प्रिये! तुम्हारा ज्येष्ठ पुत्र कौन है, उससे छोटा कौन है, मझला कौन है और सबसे छोटा कौन है? ॥ २२ ॥ एवं ब्रुवन्तं दुःखार्तं किं मां न प्रतिभाषसे । कृतवानपि हि त्यागं नैव शान्तिमितो लभे ॥ २३ ॥ मैं इस प्रकार दुःखसे आतुर होकर तुमसे पूछ रहा हूँ, तुम मुझे उत्तर क्यों नहीं देती? यद्यपि मैंने तुम्हें त्याग दिया था, तो भी यहाँसे जानेपर मुझे शान्ति नहीं मिलती थी ॥ २३ ॥
जरितोवाच
किं नु ज्येष्ठेन ते कार्यं किमनन्तरजेन ते । किं वा मध्यमजातेन किं कनिष्ठेन वा पुनः ॥ २४ ॥ **जरिता बोली—**तुम्हें ज्येष्ठ पुत्रसे क्या काम है, उसके बादवालेसे भी क्या लेना है, मझले अथवा छोटे पुत्रसे भी तुम्हें क्या प्रयोजन है? ॥ २४ ॥ यां त्वं मां सर्वतो हीनामुत्सृज्यासि गतः पुरा । तामेव लपितां गच्छ तरुणीं चारुहासिनीम् ॥ २५ ॥ पहले तुम मुझे सबसे हीन समझकर त्यागकर जिसके पास चले गये थे, उसी मनोहर मुस्कानवाली तरुणी लपिताके पास जाओ ॥ २५ ॥
मन्दपाल उवाच
न स्त्रीणां विद्यते किंचिदमुत्र पुरुषान्तरात् । सापत्नकमृते लोके नान्यदर्थविनाशनम् ॥ २६ ॥ **मन्दपालने कहा—**परलोकमें स्त्रियोंके लिये परपुरुषसे सम्बन्ध और सौतियाडाहको छोड़कर दूसरा कोई दोष उनके परमार्थका नाश करनेवाला नहीं है ॥ २६ ॥ वैराग्निदीपनं चैव भृशमुद्वेगकारि च । सुव्रता चापि कल्याणी सर्वभूतेषु विश्रुता ॥ २७ ॥ अरुन्धती महात्मानं वसिष्ठं पर्यशङ्कत । विशुद्धभावमत्यन्तं सदा प्रियहिते रतम् ॥ २८ ॥ सप्तर्षिमध्यगं धीरमवमेने च तं मुनिम् । अपध्यानेन सा तेन धूमारुणसमप्रभा । लक्ष्यालक्ष्या नाभिरूपा निमित्तमिव पश्यति ॥ २९ ॥
यह सौतियाडाह वैरकी आगको भड़कानेवाला और अत्यन्त उद्वेगमें डालनेवाला है। समस्त प्राणियोंमें विख्यात और उत्तम व्रतका पालन करनेवाली कल्याणमयी अरुन्धतीने उन महात्मा वसिष्ठपर भी शंका की थी, जिनका हृदय अत्यन्त विशुद्ध है, जो सदा उनके प्रिय और हितमें लगे रहते हैं और सप्तर्षिमण्डलके मध्यमें विराजमान होते हैं। ऐसे धैर्यवान् मुनिका भी उन्होंने सौतियाडाहके कारण तिरस्कार किया था। इस अशुभ चिन्तनके कारण उनकी अंगकान्ति धूम और अरुणके समान (मंद) हो गयी। वे कभी लक्ष्य और कभी अलक्ष्य रहकर प्रच्छन्न वेषमें मानो कोई निमित्त देखा करती हैं॥ २७—२९॥
अपत्यहेतोः सम्प्राप्तं तथा त्वमपि मामिह ।
इष्टमेवं गते हि त्वं सा तथैवाद्य वर्तते ॥ ३० ॥
मैं पुत्रोंसे मिलनेके लिये आया हूँ, तो भी तुम मेरा तिरस्कार करती हो और इस प्रकार अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति हो जानेपर जैसे तुम मेरे साथ संदेहयुक्त व्यवहार करती हो, वैसा ही लपिता भी करती है॥ ३०॥
न हि भार्येति विश्वासः कार्यः पुंसा कथंचन ।
न हि कार्यमनुध्याति नारी पुत्रवती सती ॥ ३१ ॥
यह मेरी भार्या है, ऐसा मानकर पुरुषको किसी प्रकार भी स्त्रीपर विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि नारी पुत्रवती हो जानेपर पतिसेवा आदि अपने कर्तव्योंपर ध्यान नहीं देती॥ ३१॥
वैशम्पायन उवाच
ततस्ते सर्व एवैनं पुत्राः सम्यगुपासते ।
स च तानात्मजान् सर्वान्नाश्वासयितुमुद्यतः ॥ ३२ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**तदनन्तर वे सभी पुत्र यथोचितरूपसे अपने पिताके पास आ बैठे और वे मुनि भी उन सब पुत्रोंको आश्वासन देनेके लिये उद्यत हुए॥ ३२॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि शार्ङ्गकोपाख्याने
द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें शार्ङ्गकोपाख्यानविषयक दो सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३२॥
२३३-
त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
इन्द्रदेवका श्रीकृष्ण और अर्जुनको वरदान तथा श्रीकृष्ण, अर्जुन और मयासुरका अग्निसे विदा लेकर एक साथ यमुनातटपर बैठना
मन्दपाल उवाच
युष्माकमपवर्गार्थं विज्ञप्तो ज्वलनो मया ।
अग्निना च तथेत्येवं प्रतिज्ञातं महात्मना ॥ १ ॥
**मन्दपाल बोले—**मैंने अग्निदेवसे यह प्रार्थना की थी कि वे तुमलोगोंको दाहसे मुक्त कर दें। महात्मा अग्निने भी वैसा करनेकी प्रतिज्ञा कर ली थी ॥ १ ॥
अग्नेर्वचनमाज्ञाय मातुर्धर्मज्ञता च वः ।
भवतां च परं वीर्यं पूर्वं नाहमिहागतः ॥ २ ॥
अग्निके दिये हुए वचनको स्मरण करके, तुम्हारी माताकी धर्मज्ञताको जानकर और तुमलोगोंमें भी महान् शक्ति है, इस बातको समझकर ही मैं पहले यहाँ नहीं आया था ॥ २ ॥
न संतापो हि वः कार्यः पुत्रका हृदि मां प्रति ।
ऋषीन् वेद हुताशोऽपि ब्रह्म तद् विदितं च वः ॥ ३ ॥
बच्चो! तुम्हें मेरे प्रति अपने हृदयमें संताप नहीं करना चाहिये। तुमलोग ऋषि हो, यह बात अग्निदेव भी जानते हैं; क्योंकि तुम्हें ब्रह्मतत्त्वका बोध हो चुका है ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमाश्वासितान् पुत्रान् भार्यामादाय स द्विजः ।
मन्दपालस्ततो देशादन्यं देशं जगाम ह ॥ ४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस प्रकार आश्वस्त किये हुए अपने पुत्रों और पत्नी जरिताको साथ ले द्विज मन्दपाल उस देशसे दूसरे देशमें चले गये ॥ ४ ॥
भगवानपि तिग्मांशुः समिद्धः खाण्डवं ततः ।
ददाह सह कृष्णाभ्यां जनयञ्जगतो हितम् ॥ ५ ॥
उधर प्रज्वलित हुए प्रचण्ड ज्वालाओंवाले भगवान् हुताशनने भी जगत्का हित करनेके लिये भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनकी सहायतासे खाण्डववनको जला दिया ॥ ५ ॥
वसामेदोवहाः कुल्यास्तत्र पीत्वा च पावकः ।
जगाम परमां तृप्तिं दर्शयामास चार्जुनम् ॥ ६ ॥
वहाँ मज्जा और मेदकी कई नहरें बह चलीं और उन सबको पीकर अग्निदेव पूर्ण तृप्त हो गये। तत्पश्चात् उन्होंने अर्जुनको दर्शन दिया ।। ६ ।। ततोऽन्तरिक्षाद् भगवानवतीर्य पुरंदरः। मरुद्गणैर्वृतः पार्थं केशवं चेदमब्रवीत् ॥ ७ ॥ उसी समय भगवान् इन्द्र मरुद्गणों एवं अन्य देवताओंके साथ आकाशसे उतरे और अर्जुन तथा श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले— ।। ७ ।। कृतं युवाभ्यां कर्मेदममरैरपि दुष्करम्। वरं वृणीतं तुष्टोऽस्मि दुर्लभं पुरुषेष्विह ॥ ८ ॥ ‘आप दोनोंने यह ऐसा कार्य किया है, जो देवताओंके लिये भी दुष्कर है। मैं बहुत प्रसन्न हूँ। इस लोकमें मनुष्योंके लिये जो दुर्लभ हो ऐसा कोई वर आप दोनों माँग लें’ ।। ८ ।। पार्थस्तु वरयामास शक्रादस्त्राणि सर्वशः। प्रदातुं तच्च शक्रस्तु कालं चक्रे महाद्युतिः ॥ ९ ॥ तब अर्जुनने इन्द्रसे सब प्रकारके दिव्यास्त्र माँगे। महातेजस्वी इन्द्रने उन अस्त्रोंको देनेके लिये समय निश्चित कर दिया ।। ९ ।।
यदा प्रसन्नो भगवान् महादेवो भविष्यति। तदा तुभ्यं प्रदास्यामि पाण्डवास्त्राणि सर्वशः ॥ १० ॥
(वे बोले—) ‘पाण्डुनन्दन! जब तुमपर भगवान् महादेव प्रसन्न होंगे, तब मैं तुम्हें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र प्रदान करूँगा ॥ १० ॥
अहमेव च तं कालं वेत्स्यामि कुरुनन्दन ।
तपसा महता चापि दास्यामि भवतोऽप्यहम् ॥ ११ ॥
आग्नेयानि च सर्वाणि वायव्यानि च सर्वशः ।
मदीयानि च सर्वाणि ग्रहीष्यसि धनंजय ॥ १२ ॥
‘कुरुनन्दन! वह समय कब आनेवाला है, इसे भी मैं जानता हूँ। तुम्हारे महान् तपसे प्रसन्न होकर मैं तुम्हें सम्पूर्ण आग्नेय तथा सब प्रकारके वायव्य अस्त्र प्रदान करूँगा। धनंजय! उसी समय तुम मेरे सम्पूर्ण अस्त्रोंको ग्रहण करोगे’ ॥ ११-१२ ॥
वासुदेवोऽपि जग्राह प्रीतिं पार्थेन शाश्वतीम् ।
ददौ सुरपतिश्चैव वरं कृष्णाय धीमते ॥ १३ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने भी यह वर माँगा कि अर्जुनके साथ मेरा प्रेम निरन्तर बढ़ता रहे। इन्द्रने परम बुद्धिमान् श्रीकृष्णको वह वर दे दिया ॥ १३ ॥
एवं दत्त्वा वर ताभ्यां सह देवैर्मरुत्पतिः ।
हुताशनमनुज्ञाप्य जगाम त्रिदिवं प्रभुः ॥ १४ ॥
इस प्रकार दोनोंको वर देकर अग्निदेवकी आज्ञा ले देवताओंसहित देवराज भगवान् इन्द्र स्वर्गलोकको चले गये ॥ १४ ॥
पावकश्च तदा दावं दग्ध्वा समृगपक्षिणम् ।
अहानि पञ्च चैकं च विरराम सुतर्पितः ॥ १५ ॥
अग्निदेव भी मृगों और पक्षियोंसहित सम्पूर्ण वनको जलाकर पूर्ण तृप्त हो छः दिनोंतक विश्राम करते रहे ॥ १५ ॥
जग्ध्वा मांसानि पीत्वा च मेदांसि रुधिराणि च ।
युक्तः परमया प्रीत्या तावुवाचाच्युतार्जुनौ ॥ १६ ॥
जीव-जन्तुओंके मांस खाकर उनके मेद तथा रक्त पीकर अत्यन्त प्रसन्न हो अग्निने श्रीकृष्ण और अर्जुनसे कहा— ॥ १६ ॥
युवाभ्यां पुरुषाग्र्याभ्यां तर्पितोऽस्मि यथासुखम् ।
अनुजानामि वां वीरौ चरतं यत्र वाञ्छितम् ॥ १७ ॥
‘वीरो! आप दोनों पुरुषरत्नोंने मुझे आनन्दपूर्वक तृप्त कर दिया। अब मैं आपको अनुमति देता हूँ, जहाँ आपकी इच्छा हो, जाइये’ ॥ १७ ॥
एवं तौ समनुज्ञातौ पावकेन महात्मना ।
अर्जुनो वासुदेवश्च दानवश्च मयस्तथा ॥ १८ ॥
परिक्रम्य ततः सर्वे त्रयोऽपि भरतर्षभ ।
रमणीये नदीकूले सहिताः समुपाविशन् ॥ १९ ॥
भरतश्रेष्ठ! महात्मा अग्निदेवके इस प्रकार आज्ञा देनेपर अर्जुन, श्रीकृष्ण तथा मयासुर सबने उनकी परिक्रमा की। फिर तीनों ही यमुनानदीके रमणीय तटपर जाकर एक साथ बैठे ॥ १८-१९ ॥
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्यामादिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि वरप्रदाने त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतमें व्यासनिर्र्मित एक लाख श्लोकोंकी संहिताके अंतर्गत आदिपर्वके मयदर्शनपर्वमें इन्द्रवरदानविषयक दो सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३३ ॥
(आदिपर्व सम्पूर्णम्)
| अनुष्टुप् छन्द | (अन्य बड़े छन्द) | बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके अनुष्टुप्के अनुसार गिननेपर | गद्योंको अनुष्टुप् छन्द बनाकर जोड़नेपर | कुल | |
|---|---|---|---|---|---|
| उत्तरभारतीय पाठसे लिये गये श्लोक— | ७८७० ½ | (५११ ½) | ७३६ ½ | २८३ | ८८९० |
| दक्षिणभारतीय पाठसे लिये गये श्लोक— | ७१० ½ | (१८ ½) | २६ | X | ७३६ ½ |
आदिपर्वकी पूर्ण श्लोकसंख्या — ९६२६ ½
सभापर्व
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमहाभारतम्
सभापर्व
सभाक्रियापर्व
प्रथमोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञाके अनुसार मयासुरद्वारा सभाभवन बनानेकी तैयारी
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ १ ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, उनके नित्यसखा-नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततोऽब्रवीन्मयः पार्थं वासुदेवस्य संनिधौ ।
प्राञ्जलिः श्लक्ष्णया वाचा पूजयित्वा पुनः पुनः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! खाण्डवदाहके अनन्तर मयासुरने भगवान् श्रीकृष्णके पास बैठे हुए अर्जुनकी बारंबार प्रशंसा करके हाथ जोड़कर मधुर वाणीमें उनसे कहा ॥ २ ॥
मय उवाच
अस्मात् कृष्णात् सुसंरब्धात् पावकाच्च दिधक्षतः ।
त्वया त्रातोऽस्मि कौन्तेय ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ ३ ॥
**मयासुर बोला—**कुन्तीनन्दन! आपने अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए इन भगवान् श्रीकृष्णसे तथा जला डालनेकी इच्छावाले अग्निदेवसे भी मेरी रक्षा की है। अतः बताइये, मैं (इस उपकारके बदले) आपकी क्या सेवा करूँ? ॥ ३ ॥
अर्जुन उवाच
कृतमेव त्वया सर्वं स्वस्ति गच्छ महासुर ।
प्रीतिमान् भव मे नित्यं प्रीतिमन्तो वयं च ते ॥ ४ ॥
**अर्जुनने कहा—**असुरराज! तुमने इस प्रकार कृतज्ञता प्रकट करके मेरे उपकारका मानो सारा बदला चुका दिया। तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम जाओ। मुझपर प्रेम बनाये रखना। हम भी तुम्हारे प्रति सदा स्नेहका भाव रखेंगे ॥ ४ ॥
मय उवाच
युक्तमेतत् त्वयि विभो यथाऽऽत्थ पुरुषर्षभ ।
प्रीतिपूर्वमहं किंचित् कर्तुमिच्छामि भारत ॥ ५ ॥
मयासुर बोला—प्रभो! पुरुषोत्तम! आपने जो बात कही है, वह आप-जैसे महापुरुषके अनुरूप ही है; परंतु भारत! मैं बड़े प्रेमसे आपके लिये कुछ करना चाहता हूँ ।। ५ ।।
अहं हि विश्वकर्मा वै दानवानां महाकविः ।
सोऽहं वै त्वत्कृते कर्तुं किंचिदिच्छामि पाण्डव ।। ६ ।।
पाण्डुनन्दन! मैं दानवोंका विश्वकर्मा एवं शिल्प-विद्याका महान् पण्डित हूँ। अतः मैं आपके लिये किसी वस्तुका निर्माण करना चाहता हूँ ।। ६ ।।
(दानवानां पुरा पार्थ प्रासादा हि मया कृताः ।
रम्याणि सुखगर्भाणि भोगाढ्यानि सहस्रशः ।।
उद्यानानि च रम्याणि सरांसि विविधानि च ।
विचित्राणि च शस्त्राणि रथाः कामगमास्तथा ।।
नगराणि विशालानि साट्टप्राकारतोरणैः ।
वाहनानि च मुख्यानि विचित्राणि सहस्रशः ।।
बिलानि रमणीयानि सुखयुक्तानि वै भृशम् ।
एतत् कृतं मया सर्वं तस्मादिच्छामि फाल्गुन ।।)
कुन्तीनन्दन! पूर्वकालमें मैंने दानवोंके बहुत-से महल बनाये हैं। इसके सिवा देखनेमें रमणीय, सुख और भोगसाधनोंसे सम्पन्न अनेक प्रकारके रमणीय उद्यानों, भाँति-भाँतिके सरोवरों, विचित्र अस्त्र-शस्त्रों, इच्छानुसार चलनेवाले रथों, अट्टालिकाओं, चहारदीवारियों और बड़े-बड़े फाटकोंसहित विशाल नगरों, हजारों अद्भुत एवं श्रेष्ठ वाहनों तथा बहुत-सी मनोहर एवं अत्यन्त सुखदायक सुरंगोंका मैंने निर्माण किया है। अतः अर्जुन! मैं आपके लिये भी कुछ बनाना चाहता हूँ।
अर्जुन उवाच
प्राणकृच्छ्राद् विमुक्तं त्वमात्मानं मन्यसे मया ।
एवं गते न शक्ष्यामि किंचित् कारयितुं त्वया ।। ७ ।।
अर्जुन बोले—मयासुर! तुम मेरे द्वारा अपनेको प्राणसंकटसे मुक्त हुआ मानते हो और इसीलिये कुछ करना चाहते हो। ऐसी दशामें मैं तुमसे कोई काम नहीं करा सकूँगा ।। ७ ।।
न चापि तव संकल्पं मोघमिच्छामि दानव ।
कृष्णस्य क्रियतां किंचित् तथा प्रतिकृतं मयि ।। ८ ।।
दानव! साथ ही मैं यह भी नहीं चाहता कि तुम्हारा यह संकल्प व्यर्थ हो। इसलिये तुम भगवान् श्रीकृष्णका कोई कार्य कर दो, इससे मेरे प्रति तुम्हारा कर्तव्य पूर्ण हो जायगा ।। ८ ।।
चोदितो वासुदेवस्तु मयेन भरतर्षभ ।
मुहूर्तमिव संदध्यौ किमयं चोद्यतामिति ।। ९ ।।