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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

सध्वजाः सपताकाश्च सघण्टाः सपरश्वधाः ॥ २९ ॥ उनकी पीठोंपर तरकस बँधे थे। वे विचित्र बाण लिये युद्धके लिये उन्मत्त जान पड़ते थे। उनके पास ध्वजा, पताका, घंटे और फरसे मौजूद थे ॥ २९ ॥

महापाशोद्यतकरास्तथा लगुडपाणयः । स्थूणाहस्ताः खड्गहस्ताः सर्पोच्छितकिरीटिनः ॥ ३० ॥ उन्होंने अपने हाथोंमें बड़े-बड़े पाश उठा रखे थे, कितनोंके हाथोंमें डंडे, खम्भे और खड्ग शोभा पाते थे तथा कितनोंके मस्तकपर सर्पोंके उन्नत किरीट सुशोभित होते थे ॥ ३० ॥

महासर्पाङ्गदधराश्चित्राभरणधारिणः । रजोध्वस्ताः पङ्कदिग्धाः सर्वे शुक्लाम्वरस्रजः ॥ ३१ ॥ कितनोंने बाजूबंदोंके स्थानमें बड़े-बड़े सर्प धारण कर रखे थे। कितने ही विचित्र आभूषणोंसे विभूषित थे, बहुतोंके शरीर धूलि-धूसर हो रहे थे। कितने ही अपने अंगोंमें कीचड़ लपेटे हुए थे। उन सबने श्वेत वस्त्र और श्वेत फूलोंकी माला धारण कर रखी थी ॥

नीलाङ्गाः पिङ्गलाङ्गाश्च मुण्डवक्त्रास्तथैव च । भेरीशङ्खमृदङ्गांश्च झर्झरानकगोमुखान् ॥ ३२ ॥ अवादयन् पारिषदाः प्रहृष्टाः कनकप्रभाः । गायमानास्तथैवान्ये नृत्यमानास्तथा परे ॥ ३३ ॥ कितनोंके अंग नील और पिंगलवर्णके थे। कितनोंने अपने मस्तकके बाल मुँड़वा दिये। कितने ही सुनहरी प्रभासे प्रकाशित हो रहे थे। वे सभी पार्षद हर्षसे उत्फुल्ल हो भेरी, शंख, मृदंग, झाँझ, ढोल और गोमुख बजा रहे थे। कितने ही गीत गा रहे थे और दूसरे बहुत-से पार्षद नाच रहे थे ॥ ३२-३३ ॥

लङ्घन्तः प्लवन्तश्च वल्गन्तश्च महारथाः । धावन्तो जवना मुण्डाः पवनोद्धूतमूर्धजाः ॥ ३४ ॥ वे महारथी भूतगण उछलते, कूदते और लाँघते हुए बड़े वेगसे दौड़ रहे थे। उनमेंसे कितने तो माथ मुँड़ाये हुए थे और कितनोंके सिरके बाल हवाके झोंकेसे ऊपरकी ओर उठ गये थे ॥ ३४ ॥

मत्ता इव महानागा विनदन्तो मुहुर्मुहुः । सुभीमा घोररूपाश्च शूलपट्टिशपाणयः ॥ ३५ ॥ वे मतवाले गजराजोंके समान बारंबार गर्जना करते थे। उनके हाथोंमें शूल और पट्टिश दिखायी देते थे। वे घोर रूपधारी और भयंकर थे ॥ ३५ ॥

नानाविरागवसनाश्चित्रमाल्यानुलेपनाः । रत्नचित्राङ्गदधराः समुद्यतकरास्तथा ॥ ३६ ॥

उनके वस्त्र नाना प्रकारके रंगोंमें रँगे हुए थे। वे विचित्र माला और चन्दनसे अलंकृत थे। उन्होंने रत्ननिर्मित विचित्र अंगद धारण कर रखे थे और उन सबके हाथ ऊपरकी ओर उठे हुए थे ।। ३६ ।।

हन्तारो द्विषतां शूराः प्रसह्यासह्यविक्रमाः ।
पातारोऽसृग्वसौघानां मांसान्त्रकृतभोजनाः ।। ३७ ।।
वे शूरवीर पार्षद हठपूर्वक शत्रुओंका वध करनेमें समर्थ थे। उनका पराक्रम असह्य था। वे रक्त और वसा पीते तथा आँत और मांस खाते थे ।। ३७ ।।

चूडालाः कर्णिकाराश्च प्रहृष्टाः पिठरोदराः ।
अतिह्रस्वातिदीर्घाश्च प्रलम्बाश्चातिभैरवाः ।। ३८ ।।
कितनोंके मस्तकपर शिखाएँ थीं। कितने ही कनेरके फूल धारण करते थे। बहुतेरे पार्षद अत्यन्त हर्षसे खिल उठे थे। कितनोंके पेट बटलोई या कड़ाहीके समान जान पड़ते थे। कोई बहुत नाटे, कोई बहुत मोटे, कोई बहुत लंबे और कोई अत्यन्त भयंकर थे ।। ३८ ।।

विकटाः काललम्बोष्ठा बृहच्छेफाण्डपिण्डिकाः ।
महार्हनानामुकुटा मुण्डाश्च जटिलाः परे ।। ३९ ।।
कितनोंके आकार बहुत विकट थे, कितनोंके काले-काले और लंबे ओठ लटक रहे थे, किन्हींके लिंग बड़े थे तो किन्हींके अण्डकोष। किन्हींके मस्तकोंपर नाना प्रकारके बहुमूल्य मुकुट शोभा पाते थे, कुछ लोग मथमुंडे थे और कुछ जटाधारी ।। ३९ ।।

सार्केन्दुग्रहनक्षत्रां द्यां कुर्युस्ते महीतले ।
उत्सहेरंश्च ये हन्तुं भूतग्रामं चतुर्विधम् ।। ४० ।।
वे सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह और नक्षत्रोंसहित सम्पूर्ण आकाश-मण्डलको पृथ्वीपर गिरा सकते थे और चार प्रकारके समस्त प्राणिसमुदायका संहार करनेमें समर्थ थे ।। ४० ।।

ये च वीतभया नित्यं हरस्य भृकुटीसहाः ।
कामकारकरा नित्यं त्रैलोक्यस्येश्वरेश्वराः ।। ४१ ।।
वे सदा निर्भय होकर भगवान् शंकरके भ्रूभंगको सहन करनेवाले थे। प्रतिदिन इच्छानुसार कार्य करते और तीनों लोकोंके ईश्वरोंपर भी शासन कर सकते थे ।। ४१ ।।

नित्यानन्दप्रमुदिता वागीशा वीतमत्सराः ।
प्राप्याष्टगुणमैश्वर्यं ये न यास्यन्ति वै स्मयम् ।। ४२ ।।
वे पार्षद नित्य आनन्दमें मग्न रहते थे, वाणीपर उनका अधिकार था। उनके मनमें किसीके प्रति ईर्ष्या और द्वेष नहीं रह गये थे। वे अणिमा-महिमा आदि आठ प्रकारके ऐश्वर्यको पाकर भी कभी अभिमान नहीं करते थे ।। ४२ ।।

येषां विस्मयते नित्यं भगवान् कर्मभिर्हरः ।
मनोवाक्कर्मभिर्युक्तैर्नित्यमाराधितश्च यैः ।। ४३ ।।

साक्षात् भगवान् शंकर भी प्रतिदिन उनके कर्मोंको देखकर आश्चर्यचकित हो जाते थे। वे मन, वाणी और क्रियाओंद्वारा सदा सावधान रहकर महादेवजीकी आराधना करते थे॥ ४३॥
मनोवाक्कर्मभिर्भक्तान् पाति पुत्रानिवौरसान्।
पिबन्तोऽसृग्वसाश्चान्ये क्रुद्धा ब्रह्मद्विषां सदा ॥ ४४ ॥
मन, वाणी और कर्मसे अपने प्रति भक्ति रखनेवाले उन भक्तोंका भगवान् शिव सदा औरस पुत्रोंकी भाँति पालन करते थे। बहुत-से पार्षद रक्त और वसा पीकर रहते थे। वे ब्रह्मद्रोहियोंपर सदा क्रोध प्रकट करते थे॥ ४४॥
चतुर्विधात्मकं सोमं ये पिबन्ति च सर्वदा ।
श्रुतेन ब्रह्मचर्येण तपसा च दमेन च ॥ ४५ ॥
ये समाराध्य शूलाङ्कं भवसायुज्यमागताः ।
अन्न, सोमलताका रस, अमृत और चन्द्रमण्डल—ये चार प्रकारके सोम हैं, वे पार्षदगण इनका सदा पान करते हैं। उन्होंने वेदोंके स्वाध्याय, ब्रह्मचर्यपालन, तपस्या और इन्द्रिय-संयमके द्वारा त्रिशूल-चिह्नित भगवान् शिवकी आराधना करके उनका सायुज्य प्राप्त कर लिया है॥ ४५ १/२ ॥
यैरात्मभूतैर्भगवान् पार्वत्या च महेश्वरः ॥ ४६ ॥
महाभूतगणैर्भुङ्क्ते भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
वे महाभूतगण भगवान् शिवके आत्मस्वरूप हैं, उनके तथा पार्वतीदेवीके साथ भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी महेश्वर यज्ञ-भाग ग्रहण करते हैं॥
नानावादित्रहसितश्वेडितोत्कृष्टगर्जितैः ॥ ४७ ॥
संत्रासयन्तस्ते विश्वमश्वत्थामानमभ्ययुः ।
भगवान् शिवके वे पार्षद नाना प्रकारके बाजे बजाने, हँसने, सिंहनाद करने, ललकारने तथा गर्जने आदिके द्वारा सम्पूर्ण विश्वको भयभीत करते हुए अश्वत्थामाके पास आये ॥ ४७ १/२ ॥
संस्तुवन्तो महादेवं भाः कुर्वाणाः सुवर्चसः ॥ ४८ ॥
विवर्धयिषवो द्रौणेर्महिमानं महात्मनः ।
जिज्ञासमानास्तेजः सौप्तिकं च दिदृक्षवः ॥ ४९ ॥
भीमोग्रपरिघालातशूलपट्टिशपाणयः ।
घोररूपाः समाजग्मुर्भूतसङ्घाः समन्ततः ॥ ५० ॥
भूतोंके वे समूह बड़े भयंकर और तेजस्वी थे तथा सब ओर अपनी प्रभा फैला रहे थे। अश्वत्थामामें कितना तेज है, इस बातको वे जानना चाहते थे और सोते समय जो महान् संहार होनेवाला था, उसे भी देखनेकी इच्छा रखते थे। साथ ही महामनस्वी द्रोणकुमारकी महिमा बढ़ाना चाहते थे; इसीलिये महादेवजीकी स्तुति करते हुए वे चारों ओरसे वहाँ आ

पहुँचे। उनके हाथोंमें अत्यन्त भयंकर परिघ, चलते लुआठे, त्रिशूल और पट्टिश शोभा पा रहे थे॥ ४८–५०॥
जनयेयुर्भयं ये स्म त्रैलोक्यस्यापि दर्शनात्।
तान् प्रेक्षमाणोऽपि व्यथां न चकार महाबलः॥ ५१॥
भगवान् भूतनाथके वे गण दर्शन देनेमात्रसे तीनों लोकोंके मनमें भय उत्पन्न कर सकते थे, तथापि महाबली अश्वत्थामा उन्हें देखकर तनिक भी व्यथित नहीं हुआ॥
अथ द्रौणिर्धनुष्पाणिर्बद्धगोधाङ्गुलित्रवान्।
स्वयमेवात्मनात्मानमुपहारमुपाहरत्॥ ५२॥
तदनन्तर हाथमें धनुष लिये और गोहके चर्मके बने दस्ताने पहने हुए द्रोणकुमारने स्वयं ही अपने-आपको भगवान् शिवके चरणोंमें भेंट चढ़ा दिया॥ ५२॥
धनूंषि समिधस्तत्र पवित्राणि शिताः शराः।
हविरात्मवतश्चात्मा तस्मिन् भारत कर्मणि॥ ५३॥
भारत! उस आत्मसमर्पणरूपी यज्ञकर्ममें आत्मबल-सम्पन्न अश्वत्थामाका धनुष ही समिधा, तीखे बाण ही कुशा और शरीर ही हविष्यरूपमें प्रस्तुत हुए॥ ५३॥
ततः सौम्येन मन्त्रेण द्रोणपुत्रः प्रतापवान्।
उपहारं महामन्युरथात्मानमुपाहरत्॥ ५४॥
फिर महाक्रोधी प्रतापी द्रोणपुत्रने सोमदेवता-सम्बन्धी मन्त्रके* द्वारा अपने शरीरको ही उपहारके रूपमें अर्पित कर दिया॥ ५४॥
तं रुद्रं रौद्रकर्माणं रौद्रैः कर्मभिरच्युतम्।
अभिष्टुत्य महात्मानमित्युवाच कृताञ्जलिः॥ ५५॥
भयंकर कर्म करनेवाले तथा अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले महात्मा रुद्रदेवकी रौद्रकर्मोंद्वारा ही स्तुति करके अश्वत्थामा हाथ जोड़कर इस प्रकार बोला॥

द्रौणिरुवाच

इममात्मानमद्याहं जातमाङ्गिरसे कुले।
स्वग्नौ जुहोमि भगवन् प्रतिगृह्णीष्व मां बलिम्॥ ५६॥
**अश्वत्थामाने कहा—**भगवन्! आज मैं आंगिरस कुलमें उत्पन्न हुए अपने शरीरकी प्रज्वलित अग्निमें आहुति देता हूँ। आप मुझे हविष्यरूपमें ग्रहण कीजिये॥
भवद्भक्त्या महादेव परमेण समाधिना।
अस्यामापदि विश्वात्मन्नुपाकुर्मि तवाग्रतः॥ ५७॥
विश्वात्मन्! महादेव! इस आपत्तिके समय आपके प्रति भक्तिभावसे अपने चित्तको पूर्ण एकाग्र करके आपके समक्ष यह भेंट समर्पित करता हूँ (आप इसे स्वीकार करें)॥
त्वयि सर्वाणि भूतानि सर्वभूतेषु चासि वै।

गुणानां हि प्रधानानामेकत्वं त्वयि तिष्ठति ॥ ५८ ॥ प्रभो! सम्पूर्ण भूत आपमें स्थित हैं और आप सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित हैं। आपमें ही मुख्य-मुख्य गुणोंकी एकता होती है ॥ ५८ ॥ सर्वभूताश्रय विभो हविर्भूतमवस्थितम् । प्रतिगृहाण मां देव यद्यशक्याः परे मया ॥ ५९ ॥ विभो! आप सम्पूर्ण भूतोंके आश्रय हैं। देव! यदि शत्रुओंका मेरे द्वारा पराभव नहीं हो सकता तो आप हविष्यरूपमें सामने खड़े हुए मुझ अश्वत्थामाको स्वीकार कीजिये ॥ ५९ ॥ इत्युक्त्वा द्रौणिरास्थाय तां वेदीं दीप्तपावकाम् । संत्यज्यात्मानमारुह्य कृष्णवर्त्मन्युपाविशत् ॥ ६० ॥ ऐसा कहकर द्रोणकुमार अश्वत्थामा प्रज्वलित अग्निसे प्रकाशित हुई उस वेदीपर चढ़ गया और प्राणोंका मोह छोड़कर आगके बीचमें बैठ गया ॥ ६० ॥ तमूर्ध्वबाहुं निश्चेष्टं दृष्ट्वा हविरुपस्थितम् । अब्रवीद् भगवान् साक्षान्महादेवो हसन्निव ॥ ६१ ॥ उसे हविष्यरूपसे दोनों बाँहें ऊपर उठाये निश्चेष्ट भावसे बैठे देख साक्षात् भगवान् महादेवने हँसते हुए-से कहा— ॥ ६१ ॥ सत्यशौचार्जवत्यागैस्तपसा नियमेन च । क्षान्त्या भक्त्या च धृत्या च बुद्ध्या च वचसा तथा ॥ ६२ ॥ यथावदहमाराद्धः कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा । तस्मादिष्टतमः कृष्णादन्यो मम न विद्यते ॥ ६३ ॥ 'अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीकृष्णने सत्य, शौच, सरलता, त्याग, तपस्या, नियम, क्षमा, भक्ति, धैर्य, बुद्धि और वाणीके द्वारा मेरी यथोचित आराधना की है; अतः श्रीकृष्णसे बढ़कर दूसरा कोई मुझे परम प्रिय नहीं है ॥ ६२-६३ ॥ कुर्वता तात सम्मानं त्वां च जिज्ञासता मया । पञ्चालाः सहसा गुप्ता मायाश्च बहुशः कृताः ॥ ६४ ॥ 'तात! उन्हींका सम्मान और तुम्हारी परीक्षा करनेके लिये मैंने पांचालोंकी सहसा रक्षा की है और बारंबार मायाओंका प्रयोग किया है ॥ ६४ ॥ कृतस्तस्यैव सम्मानः पञ्चालान् रक्षता मया । अभिभूतास्तु कालेन नैषामद्यास्ति जीवितम् ॥ ६५ ॥ 'पांचालोंकी रक्षा करके मैंने श्रीकृष्णका ही सम्मान किया है; परंतु अब वे कालसे पराजित हो गये हैं, अब इनका जीवन शेष नहीं है' ॥ ६५ ॥ एवमुक्त्वा महात्मानं भगवानात्मनस्तनुम् । आविवेश ददौ चास्मै विमलं खड्गमुत्तमम् ॥ ६६ ॥

महामना अश्वत्थामासे ऐसा कहकर भगवान् शिवने अपने स्वरूपभूत उसके शरीरमें प्रवेश किया और उसे एक निर्मल एवं उत्तम खड्ग प्रदान किया।।

अथाविष्टो भगवता भूयो जज्वल तेजसा ।
वेगवांश्चाभवद् युद्धे देवसृष्टेन तेजसा ॥ ६७ ॥
भगवान्‌का आवेश हो जानेपर अश्वत्थामा पुनः अत्यन्त तेजसे प्रज्वलित हो उठा। उस देवप्रदत्त तेजसे सम्पन्न हो वह युद्धमें और भी वेगशाली हो गया ॥ ६७ ॥

तमदृश्यानि भूतानि रक्षांसि च समाद्रवन् ।
अभितः शत्रुशिविरं यान्तं साक्षादिवेश्वरम् ॥ ६८ ॥
साक्षात् महादेवजीके समान शत्रुशिविरकी ओर जाते हुए अश्वत्थामाके साथ-साथ बहुत-से अदृश्य भूत और राक्षस भी दौड़े गये ॥ ६८ ॥

इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिकृतशिवार्चने सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वमें द्रोणपुत्रद्वारा की हुई भगवान् शिवकी पूजाविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥


* वह मन्त्र इस प्रकार है— 'आप्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यम् । भवा वाजस्य सङ्गथे ।।'

अध्याय (पृष्ठ 3023)

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टमोऽध्यायः

अश्वत्थामाके द्वारा रात्रिमें सोये हुए पांचाल आदि समस्त वीरोंका संहार तथा फाटकसे निकलकर भागते हुए योद्धाओंका कृतवर्मा और कृपाचार्य द्वारा वध

धृतराष्ट्र उवाच

तथा प्रयाते शिविरं द्रोणपुत्रे महारथे ।
कच्चित् कृपश्च भोजश्च भयार्तौ न व्यवर्तताम् ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! जब महारथी द्रोणपुत्र इस प्रकार शिविरकी ओर चला, तब कृपाचार्य और कृतवर्मा भयसे पीड़ित हो लौट तो नहीं गये? ॥ १ ॥

कच्चिन्न वारितौ क्षुद्रै रक्षिभिर्नोपलक्षितौ ।
असह्यमिति मन्वानौ न निवृत्तौ महारथौ ॥ २ ॥
कच्चिदुन्मथ्य शिविरं हत्वा सोमकपाण्डवान् ।
(कृता प्रतिज्ञा सफला कच्चित् संजय सा निशि ।)
कहीं नीच द्वार-रक्षकोंने उन्हें रोक तो नहीं दिया? किसीने उन्हें देखा तो नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि वे दोनों महारथी इस कार्यको असह्य मानकर लौट गये हों? संजय! क्या उस शिविरको मथकर सोमकों और पाण्डवोंकी हत्या करके रातमें अश्वत्थामाने अपनी प्रतिज्ञा सफल कर ली? ॥ २ १/२ ॥

दुर्योधनस्य पदवीं गतौ परमिकां रणे ॥ ३ ॥
पञ्चालैर्निहतौ वीरौ कच्चिन्नास्वपतां क्षितौ ।
कच्चित् ताभ्यां कृतं कर्म तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ४ ॥
वे दोनों वीर पांचालोंके द्वारा मारे जाकर धरतीपर सदाके लिये सो तो नहीं गये? रणभूमिमें मरकर दुर्योधनके ही उत्तम मार्गपर चले तो नहीं गये? क्या उन दोनोंने भी वहाँ कोई पराक्रम किया? संजय! ये सब बातें मुझे बताओ ॥ ३-४ ॥

संजय उवाच

तस्मिन् प्रयाते शिविरं द्रोणपुत्रे महात्मनि ।
कृपश्च कृतवर्मा च शिविरद्वार्यतिष्ठताम् ॥ ५ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! महामनस्वी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा जब शिविरके भीतर जाने लगा, उस समय कृपाचार्य और कृतवर्मा भी उसके दरवाजेपर जा खड़े हुए ॥

अश्वत्थामा तु तौ दृष्ट्वा यत्नवन्तौ महारथौ ।
प्रहृष्टः शनकै राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥ ६ ॥

महाराज! उन दोनों महारथियोंको अपना साथ देनेके लिये प्रयत्नशील देख अश्वत्थामाको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने उनसे धीरेसे इस प्रकार कहा— ।। ६ ।।

यत्तौ भवन्तौ पर्याप्तौ सर्वक्षत्रस्य नाशने ।
किं पुर्नयोधशेषस्य प्रसुप्तस्य विशेषतः ।। ७ ।।
‘यदि आप दोनों सावधान होकर चेष्टा करें तो सम्पूर्ण क्षत्रियोंका विनाश करनेके लिये पर्याप्त हैं। फिर इन बचे-खुचे और विशेषतः सोये हुए योद्धाओंको मारना कौन बड़ी बात है? ।। ७ ।।

अहं प्रवेक्ष्ये शिविरं चरिष्यामि च कालवत् ।
यथा न कश्चिदपि वा जीवन् मुच्येत मानवः ।। ८ ।।
तथा भवद्भ्यां कार्यं स्यादिति मे निश्चिता मतिः ।
‘मैं तो इस शिविरके भीतर घुस जाऊँगा और वहाँ कालके समान विचरूँगा। आपलोग ऐसा करें जिससे कोई भी मनुष्य आप दोनोंके हाथसे जीवित न बच सके, यही मेरा दृढ़ विचार है’ ।। ८ १/२ ।।

इत्युक्त्वा प्राविशद् द्रौणिः पार्थानां शिविरं महत् ।। ९ ।।
अद्वारेणाभ्यवस्कन्द्य विहाय भयमात्मनः ।
ऐसा कहकर द्रोणकुमार पाण्डवोंके विशाल शिविरमें बिना दरवाजेके ही कूदकर घुस गया। उसने अपने जीवनका भय छोड़ दिया था ।। ९ १/२ ।।

स प्रविश्य महाबाहुरुद्देशज्ञश्च तस्य ह ।। १० ।।
धृष्टद्युम्नस्य निलयं शनकैरभ्युपागमत् ।
वह महाबाहु वीर शिविरके प्रत्येक स्थानसे परिचित था, अतः धीरे-धीरे धृष्टद्युम्नके खेमेमें जा पहुँचा ।।

ते तु कृत्वा महत् कर्म श्रान्ताश्च बलवद् रणे ।। ११ ।।
प्रसुप्ताश्चैव विश्वस्ताः स्वसैन्यपरिवारिताः ।
वहाँ वे पांचाल वीर रणभूमिमें महान् पराक्रम करके बहुत थक गये थे और अपने सैनिकोंसे घिरे हुए निश्चिन्त सो रहे थे ।। ११ १/२ ।।

अथ प्रविश्य तद् वेश्म धृष्टद्युम्नस्य भारत ।। १२ ।।
पाञ्चाल्यं शयने द्रौणिरपश्यत् सुप्तमन्तिकात् ।
क्षौमावदाते महति स्पर्ध्यास्तरणसंवृते ।। १३ ।।
माल्यप्रवरसंयुक्ते धूपैश्चूर्णैश्च वासिते ।
भरतनन्दन! धृष्टद्युम्नके उस डेरेमें प्रवेश करके द्रोणकुमारने देखा कि पांचालराजकुमार पास ही बहुमूल्य बिछौनोंसे युक्त तथा रेशमी चादरसे ढकी हुई एक विशाल शय्यापर सो रहा है। वह शय्या श्रेष्ठ मालाओंसे सुसज्जित तथा धूप एवं चन्दन चूर्णसे सुवासित थी ।। १२-१३ १/२ ।।

तं शयानं महात्मानं विश्रब्धमकुतोभयम् ।। १४ ।।
प्राबोधयत पादेन शयनस्थं महीपते ।
भूपाल! अश्वत्थामाने निश्चिन्त एवं निर्भय होकर शय्यापर सोये हुए महामनस्वी धृष्टद्युम्नको पैरसे ठोकर मारकर जगाया ।। १४ ½ ।।
सम्बुध्य चरणस्पर्शादुत्थाय रणदुर्मदः ।। १५ ।।
अभ्यजानादमेयात्मा द्रोणपुत्रं महारथम् ।
अमेय आत्मबलसे सम्पन्न रणदुर्मद धृष्टद्युम्न उसके पैर लगते ही जाग उठा और जागते ही उसने महारथी द्रोणपुत्रको पहचान लिया ।। १५ ½ ।।
तमुत्पतन्तं शयनादश्वत्थामा महाबलः ।। १६ ।।
केशेष्वालभ्य पाणिभ्यां निष्पिपेप महीतले ।
अब वह शय्यासे उठनेकी चेष्टा करने लगा। इतनेहीमें महाबली अश्वत्थामाने दोनों हाथसे उसके बाल पकड़कर पृथ्वीपर पटक दिया और वहाँ अच्छी तरह रगड़ा ।। १६ ½ ।।
सबलं तेन निष्पिष्टः साध्वसेन च भारत ।। १७ ।।
निद्रया चैव पाञ्चाल्यो नाशकच्चेष्टितुं तदा ।
भारत! धृष्टद्युम्न भय और निद्रासे दबा हुआ था। उस अवस्थामें जब अश्वत्थामाने उसे जोरसे पटककर रगड़ना आरम्भ किया, तब उससे कोई भी चेष्टा करते न बना ।। १७ ½ ।।
तमाक्रम्य पदा राजन् कण्ठे चोरसि चोभयोः ।। १८ ।।
नदन्तं विस्फुरन्तं च पशुमारममारयत् ।
राजन्! उसने पैरसे उसकी छाती और गला दोनोंको दबा दिया और उसे पशुकी तरह मारना आरम्भ किया। वह बेचारा चीखता और छटपटाता रह गया ।। १८ ½ ।।
तुदन्नखैस्तु स द्रौणिं नातिव्यक्तमुदाहरत् ।। १९ ।।
आचार्यपुत्र शस्त्रेण जहि मां मा चिरं कृथाः ।
त्वत्कृते सुकृताँल्लोकान् गच्छेयं द्विपदां वर ।। २० ।।
उसने अपने नखोंसे द्रोणकुमारको बकोटते हुए अस्पष्ट वाणीमें कहा—'मनुष्योंमें श्रेष्ठ आचार्यपुत्र! अब देरी न करो। मुझे किसी शस्त्रसे मार डालो, जिससे तुम्हारे कारण मैं पुण्यलोकोंमें जा सकूँ' ।। १९-२० ।।
एवमुक्त्वा तु वचनं विरराम परंतपः ।
सुतः पाञ्चालराजस्य आक्रान्तो बलिना भृशम् ।। २१ ।।
ऐसा कहकर बलवान् शत्रुके द्वारा बड़े जोरसे दबाया हुआ शत्रुसंतापी पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न चुप हो गया ।। २१ ।।
तस्याव्यक्तां तु तां वाचं संश्रुत्य द्रौणिरब्रवीत् ।
आचार्यघातिनां लोका न सन्ति कुलपांसन ।। २२ ।।

तस्माच्छस्त्रेण निधनं न त्वमर्हसि दुर्मते ।
उसकी उस अस्पष्ट वाणीको सुनकर द्रोणपुत्रने कहा—'रे कुलकलंक! अपने आचार्यकी हत्या करनेवाले लोगोंके लिये पुण्यलोक नहीं हैं; अतः दुर्मते! तू शस्त्रके द्वारा मारे जानेके योग्य नहीं है' ॥ २२ १/२ ॥
एवं ब्रुवाणस्तं वीरं सिंहो मत्तमिव द्विपम् ॥ २३ ॥
मर्मस्वभ्यवधीत् क्रुद्धः पादाष्ठीलैः सुदारुणैः ।
उस वीरसे ऐसा कहते हुए क्रोधी अश्वत्थामाने मतवाले हाथीपर चोट करनेवाले सिंहके समान अपनी अत्यन्त भयंकर एड़ियोंसे उसके मर्मस्थानोंपर प्रहार किया ॥
तस्य वीरस्य शब्देन मार्यमाणस्य वेश्मनि ॥ २४ ॥
अबुध्यन्त महाराज स्त्रियो ये चास्य रक्षिणः ।
महाराज! उस समय मारे जाते हुए वीर धृष्टद्युम्नके आर्तनादसे उस शिविरकी स्त्रियाँ तथा सारे रक्षक जाग उठे ॥ २४ १/२ ॥
ते दृष्ट्वा धर्षयन्तं तमतिमानुषविक्रमम् ॥ २५ ॥
भूतमेवाध्यवस्यन्तो न स्म प्रव्‍याहरन् भयात् ।
उन्होंने उस अलौकिक पराक्रमी पुरुषको धृष्टद्युम्नपर प्रहार करते देख उसे कोई भूत ही समझा; इसीलिये भयके मारे वे कुछ बोल न सके ॥ २५ १/२ ॥
तं तु तेनाभ्युपायेन गमयित्वा यमक्षयम् ॥ २६ ॥
अध्यतिष्ठत तेजस्वी रथं प्राप्य सुदर्शनम् ।
स तस्य भवनाद् राजन् निष्क्रम्यानादयन् दिशः ॥ २७ ॥
रथेन शिविरं प्रायाज्जिघांसुर्द्विषतो बली ।
राजन्! इस उपायसे धृष्टद्युम्नको यमलोक भेजकर तेजस्वी अश्वत्थामा उसके खेमेसे बाहर निकला और सुन्दर दिखायी देनेवाले अपने रथके पास आकर उसपर सवार हो गया। इसके बाद वह बलवान् वीर अन्य शत्रुओंको मार डालनेकी इच्छा रखकर अपनी गर्जनासे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करता हुआ रथके द्वारा प्रत्येक शिविरपर आक्रमण करने लगा ॥ २६-२७ १/२ ॥
अपक्रान्ते ततस्तस्मिन् द्रोणपुत्रे महारथे ॥ २८ ॥
सहितै रक्षिभिः सर्वैः प्राणेदुर्योषितस्तदा ।
महारथी द्रोणपुत्रके वहाँसे हट जानेपर एकत्र हुए सम्पूर्ण रक्षकोंसहित धृष्टद्युम्नकी रानियाँ फूट-फूटकर रोने लगीं ॥ २८ १/२ ॥
राजानं निहतं दृष्ट्वा भृशं शोकपरायणाः ॥ २९ ॥
व्याक्रोशन् क्षत्रियाः सर्वे धृष्टद्युम्नस्य भारत ।

भरतनन्दन! अपने राजाको मारा गया देख धृष्टद्युम्नकी सेनाके सारे क्षत्रिय अत्यन्त शोकमें मग्न हो आर्तस्वरसे विलाप करने लगे ॥ २९ १/२ ॥ तासां तु तेन शब्देन समीपे क्षत्रियर्षभाः ॥ ३० ॥ क्षिप्रं च समनह्यन्त किमेतदिति चाब्रुवन् । स्त्रियोंके रोनेकी आवाज सुनकर आस-पासके सारे क्षत्रियशिरोमणि वीर तुरंत कवच बाँधकर तैयार हो गये और बोले—'अरे! यह क्या हुआ?' ॥ ३० १/२ ॥ स्त्रियस्तु राजन् वित्रस्ता भारद्वाजं निरीक्ष्य ताः ॥ ३१ ॥ अब्रुवन् दीनकण्ठेन क्षिप्रमाद्रवतेति वै । राक्षसो वा मनुष्यो वा नैनं जानीमहे वयम् ॥ ३२ ॥ हत्वा पाञ्चालराजानं रथमारुह्य तिष्ठति । राजन्! वे सारी स्त्रियाँ अश्वत्थामाको देखकर बहुत डर गयी थीं; अतः दीन कण्ठसे बोलीं—'अरे! जल्दी दौड़ो! जल्दी दौड़ो! हमारी समझमें नहीं आता कि यह कोई राक्षस है या मनुष्य। देखो, यह पांचालराजकी हत्या करके रथपर चढ़कर खड़ा है' ॥ ३१-३२ १/२ ॥ ततस्ते योधमुख्याश्च सहसा पर्यवारयन् ॥ ३३ ॥ स तानापततः सर्वान् रुद्रास्त्रेण व्यपोथयत् । तब उन श्रेष्ठ योद्धाओंने सहसा पहुँचकर अश्वत्थामाको चारों ओरसे घेर लिया; परंतु अश्वत्थामाने पास आते ही उन सबको रुद्रास्त्रसे मार गिराया ॥ ३३ १/२ ॥ धृष्टद्युम्नं च हत्वा स तांश्चैवास्य पदानुगान् ॥ ३४ ॥ अपश्यच्छयने सुप्तमुत्तमौजसमन्तिके । इस प्रकार धृष्टद्युम्न और उसके सेवकोंका वध करके अश्वत्थामाने निकटके ही खेमेमें पलंगपर सोये हुए उत्तमौजाको देखा ॥ ३४ १/२ ॥ तमप्याक्रम्य पादेन कण्ठे चोरसि तेजसा ॥ ३५ ॥ तथैव मारयामास विनर्दन्तमरिंदमम् । फिर तो शत्रुदमन उत्तमौजाके भी कण्ठ और छातीको बलपूर्वक पैरसे दबाकर उसने उसी प्रकार पशुकी तरह मार डाला। वह बेचारा भी चीखता-चिल्लाता रह गया था ॥ ३५ १/२ ॥ युधामन्युश्च सम्प्राप्तो मत्वा तं रक्षसा हतम् ॥ ३६ ॥ गदामुद्यम्य वेगेन हृदि द्रौणिमताडयत् । उत्तमौजाको राक्षसद्वारा मारा गया समझकर युधामन्यु भी वहाँ आ पहुँचा। उसने बड़े वेगसे गदा उठाकर अश्वत्थामाकी छातीमें प्रहार किया ॥ ३६ १/२ ॥ तमभिद्रुत्य जग्राह क्षितौ चैनमपातयत् ॥ ३७ ॥ विस्फुरन्तं च पशुवत् तथैवेनममारयत् ।

अश्वत्थामाने झपटकर उसे पकड़ लिया और पृथ्वीपर दे मारा। वह उसके चंगुलसे छूटनेके लिये बहुतेरा हाथ-पैर मारता रहा; किंतु अश्वत्थामाने उसे भी पशुकी तरह गला घोंटकर मार डाला ।। ३७ १/२ ।। तथा स वीरो हत्वा तं ततोऽन्यान् समुपाद्रवत् ॥ ३८ ॥ संसुप्तानेव राजेन्द्र तत्र तत्र महारथान् । स्फुरतो वेपमानांश्च शमितेव पशून् मखे ॥ ३९ ॥ राजेन्द्र! इस प्रकार युधामन्युका वध करके वीर अश्वत्थामाने अन्य महारथियोंपर भी वहाँ सोते समय ही आक्रमण किया। वे सब भयसे काँपने और छटपटाने लगे। परंतु जैसे हिंसाप्रधान यज्ञमें वधके लिये नियुक्त हुआ पुरुष पशुओंको मार डालता है, उसी प्रकार उसने भी उन्हें मार डाला ॥ ३८-३९ ॥ ततो निस्त्रिंशमादाय जघानान्यान् पृथक् पृथक् । भागशो विचरन् मार्गानसियुद्धविशारदः ॥ ४० ॥ तदनन्तर तलवारसे युद्ध करनेमें कुशल अश्वत्थामाने हाथमें खड्ग लेकर प्रत्येक भागमें विभिन्न मार्गोंसे विचरते हुए वहाँ बारी-बारीसे अन्य वीरोंका भी वध कर डाला ॥ ४० ॥ तथैव गुल्मे सम्प्रेक्ष्य शयानान् मध्यगौल्मिकान् । श्रान्तान् व्यस्तायुधान् सर्वान् क्षणेनैव व्यपोथयत् ॥ ४१ ॥ इसी प्रकार खेमेमें मध्य श्रेणीके रक्षक सैनिक भी थककर सो रहे थे। उनके अस्त्र-शस्त्र अस्त-व्यस्त होकर पड़े थे। उन सबको उस अवस्थामें देखकर अश्वत्थामाने क्षणभरमें मार डाला ॥ ४१ ॥ योधान्श्चान् द्विपांश्चैव प्राच्छिनत् स वरासिना । रुधिरोक्षितसर्वाङ्गः कालसृष्ट इवान्तकः ॥ ४२ ॥ उसने अपनी अच्छी तलवारसे योद्धाओं, घोड़ों और हाथियोंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले। उसके सारे अंग खूनसे लथपथ हो रहे थे, वह कालप्रेरित यमराजके समान जान पड़ता था ॥ ४२ ॥ विस्फुरद्भिश्च तैर्द्रोणिर्निस्त्रिंशस्योद्यमेन च । आक्षेपणेन चैवासेस्त्रिधा रक्तोक्षितोऽभवत् ॥ ४३ ॥ मारे जानेवाले योद्धाओंका हाथ-पैर हिलाना, उन्हें मारनेके लिये तलवारको उठाना तथा उसके द्वारा सब ओर प्रहार करना—इन तीन कारणोंसे द्रोणपुत्र अश्वत्थामा खूनसे नहा गया था ॥ ४३ ॥ तस्य लोहितरक्तस्य दीप्तखड्गस्य युध्यतः । अमानुष इवाकारो बभौ परमभीषणः ॥ ४४ ॥ वह खूनसे रँग गया था। जूझते हुए उस वीरकी तलवार चमक रही थी। उस समय उसका आकार मानवेतर प्राणीके समान अत्यन्त भयंकर प्रतीत होता था ॥ ४४ ॥

ये त्वजाग्रन्त कौरव्य तेऽपि शब्देन मोहिताः । निरीक्ष्यमाणा अन्योन्यं दृष्ट्वा दृष्ट्वा प्रविव्यथुः ॥ ४५ ॥ कुरुनन्दन! जो जाग रहे थे, वे भी उस कोलाहलसे किंकर्तव्यविमूढ हो गये थे। परस्पर देखे जाते हुए वे सभी सैनिक अश्वत्थामाको देख-देखकर व्यथित हो रहे थे ॥ ४५ ॥

तद् रूपं तस्य ते दृष्ट्वा क्षत्रियाः शत्रुकर्षणः । राक्षसं मन्यमानास्तं नयनानि न्यमीलयन् ॥ ४६ ॥ वे शत्रुसूदन क्षत्रिय अश्वत्थामाका वह रूप देख उसे राक्षस समझकर आँखें मूँद लेते थे ॥ ४६ ॥

स घोररूपो व्यचरत् कालवच्छिविरे ततः । अपश्यद् द्रौपदीपुत्रानवशिष्टांश्च सोमकान् ॥ ४७ ॥ वह भयानक रूपधारी द्रोणकुमार सारे शिविरमें कालके समान विचरने लगा। उसने द्रौपदीके पाँचों पुत्रों और मरनेसे बचे हुए सोमकोंको देखा ॥ ४७ ॥

तेन शब्देन वित्रस्ता धनुर्हस्ता महारथाः । धृष्टद्युम्नं हतं श्रुत्वा द्रौपदेया विशाम्पते ॥ ४८ ॥ प्रजानाथ! धृष्टद्युम्नको मारा गया सुनकर द्रौपदीके पाँचों महारथी पुत्र उस शब्दसे भयभीत हो हाथमें धनुष लिये आगे बढ़े ॥ ४८ ॥

अवाकिरन् शरव्रातैर्भारद्वाजमभीतवत् । ततस्तेन निनादेन सम्प्रबुद्धाः प्रभद्रकाः ॥ ४९ ॥ शिलीमुखैः शिखण्डी च द्रोणपुत्रं समार्दयन् । उन्होंने निर्भय-से होकर अश्वत्थामापर बाण-समूहोंकी वर्षा आरम्भ कर दी। तदनन्तर वह कोलाहल सुनकर वीर प्रभद्रकगण जाग उठे। शिखण्डी भी उनके साथ हो लिया। उन सबने द्रोणपुत्रको पीड़ा देना आरम्भ किया ॥ ४९ १/२ ॥

भारद्वाजः स तान् दृष्ट्वा शरवर्षाणि वर्षतः ॥ ५० ॥ ननाद बलवन्नादं जिघांसुस्तान् महारथान् । उन महारथियोंको बाणोंकी वर्षा करते देख अश्वत्थामा उन्हें मार डालनेकी इच्छासे जोर-जोरसे गर्जना करने लगा ॥ ५० १/२ ॥

ततः परमसंक्रुद्धः पितुर्वधमनुस्मरन् ॥ ५१ ॥ अवरुह्य रथोपस्थात् त्वरमाणोऽभिदुद्रुवे । सहस्रचन्द्रविमलं गृहीत्वा चर्म संयुगे ॥ ५२ ॥ खड्गं च विमलं दिव्यं जातरूपपरिष्कृतम् । तदनन्तर पिताके वधका स्मरण करके वह अत्यन्त कुपित हो उठा और रथकी बैठकसे उतरकर सहस्रों चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त चमकीली ढाल और सुवर्णभूषित दिव्य एवं निर्मल खड्ग लेकर युद्धमें बड़ी उतावलीके साथ उनकी ओर दौड़ा ॥ ५१-५२ १/२ ॥

द्रौपदेयानभिद्रुत्य खड्गेन व्यधमद् बली ॥ ५३ ॥ ततः स नरशार्दूलः प्रतिविन्ध्यं महाहवे । कुक्षिदेशेऽवधीद् राजन् स हतो न्यपतद् भुवि ॥ ५४ ॥ उस बलवान् वीरने द्रौपदीके पुत्रोंपर आक्रमण करके उन्हें खड्गसे छिन्न-भिन्न कर दिया। राजन्! उस समय पुरुषसिंह अश्वत्थामाने उस महासमरमें प्रतिविन्ध्यको उसकी कोखमें तलवार भोंककर मार डाला। वह मरकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ५३-५४ ॥

प्रासेन विद्ध्वा द्रौणिं तु सुतसोमः प्रतापवान् । पुनश्चासिं समुद्यम्य द्रोणपुत्रमुपाद्रवत् ॥ ५५ ॥ तत्पश्चात् प्रतापी सुतसोमने द्रोणकुमारको पहले प्राससे घायल करके फिर तलवार उठाकर उसपर धावा किया ॥ ५५ ॥

सुतसोमस्य सासिं तं बाहुं छित्त्वा नरर्षभ । पुनरप्याहनत् पार्श्वे स भिन्नहृदयोऽपतत् ॥ ५६ ॥ नरश्रेष्ठ! तब अश्वत्थामाने तलवारसहित सुतसोमकी बाँह काटकर पुनः उसकी पसलीमें आघात किया। इससे उसकी छाती फट गयी और वह धराशायी हो गया ॥ ५६ ॥

नाकुलिस्तु शतानीको रथचक्रेण वीर्यवान् । दोर्भ्यामुत्क्षिप्य वेगेन वक्षस्येनमताडयत् ॥ ५७ ॥ इसके बाद नकुलके पराक्रमी पुत्र शतानीकने अपनी दोनों भुजाओंसे रथचक्रको उठाकर उसके द्वारा बड़े वेगसे अश्वत्थामाकी छातीपर प्रहार किया ॥ ५७ ॥

अताडयच्छतानीकं मुक्तचक्रं द्विजस्तु सः । स विह्वलो ययौ भूमिं ततोऽस्यापाहरच्छिरः ॥ ५८ ॥ शतानीकने जब चक्र चला दिया, तब ब्राह्मण अश्वत्थामाने भी उसपर गहरा आघात किया। इससे व्याकुल होकर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। इतनेहीमें अश्वत्थामाने उसका सिर काट लिया ॥ ५८ ॥

श्रुतकर्मा तु परिघं गृहीत्वा समताडयत् । अभिद्रुत्य ययौ द्रौणिं सव्ये सफलके भृशम् ॥ ५९ ॥ अब श्रुतकर्मा परिघ लेकर अश्वत्थामाकी ओर दौड़ा। उसने उसके ढालयुक्त बायें हाथमें भारी चोट पहुँचायी ॥ ५९ ॥

स तु तं श्रुतकर्मार्णमास्ये जघ्ने वरासिना । स हतो न्यपतद् भूमौ विमूढो विकृताननः ॥ ६० ॥ अश्वत्थामाने अपनी तेज तलवारसे श्रुतकर्माके मुखपर आघात किया। वह चोट खाकर बेहोश हो पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस समय उसका मुख विकृत हो गया था ॥ ६० ॥

तेन शब्देन वीरस्तु श्रुतकीर्तिर्महारथः । अश्वत्थामानमासाद्य शरवर्षैरवाकिरत् ॥ ६१ ॥

वह कोलाहल सुनकर वीर महारथी श्रुतकीर्ति अश्वत्थामाके पास आकर उसके ऊपर बाणोंकी वर्षा करने लगा ।। ६१ ।।

तस्यापि शरवर्षाणि चर्मणा प्रतिवार्य सः ।
सकुण्डलं शिरः कायाद् भ्राजमानमुपाहरत् ।। ६२ ।।
उसकी बाण-वर्षाको ढालसे रोककर अश्वत्थामाने उसके कुण्डलमण्डित तेजस्वी मस्तकको धड़से अलग कर दिया ।। ६२ ।।

ततो भीष्मनिहन्ता तं सह सर्वैः प्रभद्रकैः ।
अहनत् सर्वतो वीरं नानाप्रहरणैर्बली ।। ६३ ।।
शिलीमुखेन चान्येन भ्रुवोर्मध्ये समापर्यत् ।
तदनन्तर समस्त प्रभद्रकोंसहित बलवान् भीष्महन्ता शिखण्डी नाना प्रकारके अस्त्रोंद्वारा अश्वत्थामापर सब ओरसे प्रहार करने लगा तथा एक दूसरे बाणसे उसने उसकी दोनों भौंहोंके बीचमें आघात किया ।। ६३ १/२ ।।

स तु क्रोधसमाविष्टो द्रोणपुत्रो महाबलः ।। ६४ ।।
शिखण्डिनं समासाद्य द्विधा चिच्छेद सोऽसिना ।
तब महाबली द्रोणपुत्रने क्रोधके आवेशमें आकर शिखण्डीके पास जा अपनी तलवारसे उसके दो टुकड़े कर डाले ।। ६४ १/२ ।।

शिखण्डिनं ततो हत्वा क्रोधाविष्टः परंतपः ।। ६५ ।।
प्रभद्रकगणान् सर्वानभिदुद्राव वेगवान् ।
यच्च शिष्टं विराटस्य बलं तु भृशमाद्रवत् ।। ६६ ।।
क्रोधसे भरे हुए शत्रुसंतापी अश्वत्थामाने इस प्रकार शिखण्डीका वध करके समस्त प्रभद्रकोंपर बड़े वेगसे धावा किया। साथ ही, राजा विराटकी जो सेना शेष थी, उसपर भी जोरसे चढ़ाई कर दी ।। ६५-६६ ।।

द्रुपदस्य च पुत्राणां पौत्राणां सुहृदामपि ।
चकार कदनं घोरं दृष्ट्वा दृष्ट्वा महाबलः ।। ६७ ।।
उस महाबली वीरने द्रुपदके पुत्रों, पौत्रों और सुहृदोंको ढूँढ़-ढूँढ़कर उनका घोर संहार मचा दिया ।।

अन्यानन्यांश्च पुरुषानभिसृत्याभिसृत्य च ।
न्यकृन्तदसिना द्रौणिरसिमार्गविशारदः ।। ६८ ।।
तलवारके पैंतरोंमें कुशल द्रोणपुत्रने दूसरे-दूसरे पुरुषोंके भी निकट जाकर तलवारसे ही उनके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ।। ६८ ।।

कालीं रक्तास्यनयनां रक्तमाल्यानुलेपनाम् ।
रक्ताम्बरधरामेकां पाशहस्तां कुटुम्बिनीम् ।। ६९ ।।
ददृशुः कालरात्रिं ते गायमानामवस्थिताम् ।

नरांश्चकुञ्जरान् पाशैर्बद्ध्वा घोरैः प्रतस्थुषीम् ॥ ७० ॥ उस समय पाण्डवपक्षके योद्धाओंने मूर्तिमती कालरात्रिको देखा, जिसके शरीरका रंग काला था, मुख और नेत्र लाल थे। वह लाल फूलोंकी माला पहने और लाल चन्दन लगाये हुए थी। उसने लाल रंगकी ही साड़ी पहन रखी थी। वह अपने ढंगकी अकेली थी और हाथमें पाश लिये हुए थी। उसकी सखियोंका समुदाय भी उसके साथ था। वह गीत गाती हुई खड़ी थी और भयंकर पाशोंद्वारा मनुष्यों, घोड़ों एवं हाथियोंको बाँधकर लिये जाती थी ॥ ६९-७० ॥

वहन्तीं विविधान् प्रेतान् पाशबद्धान् विमूर्धजान् । तथैव च सदा राजन् न्यस्तशस्त्रान् महारथान् ॥ ७१ ॥ स्वप्ने सुप्तान्रायन्तीं तां रात्रिष्वन्यासु मारिष । ददृशुर्योधमुख्यास्ते घ्नन्तं द्रौणिं च सर्वदा ॥ ७२ ॥ माननीय नरेश! मुख्य-मुख्य योद्धा अन्य रात्रियोंमें भी सपनेमें उस कालरात्रिको देखते थे। राजन्! वह सदा नाना प्रकारके केशरहित प्रेतोंको अपने पाशोंमें बाँधकर लिये जाती दिखायी देती थी, इसी प्रकार हथियार डालकर सोये हुए महारथियोंको भी लिये जाती हुई स्वप्नमें दृष्टिगोचर होती थी। वे योद्धा सबका संहार करते हुए द्रोणकुमारको भी सदा सपनोंमें देखा करते थे ॥ ७१-७२ ॥

यतः प्रभृति संग्रामः कुरुपाण्डवसेनयोः । ततः प्रभृति तां कन्यामपश्यन् द्रौणिमेव च ॥ ७३ ॥ तांस्तु दैवहतान् पूर्वं पश्चाद् द्रौणिर्व्यपातयत् । त्रासयन् सर्वभूतानि विनदन् भैरवान् रवान् ॥ ७४ ॥ जबसे कौरव-पाण्डव सेनाओंका संग्राम आरम्भ हुआ था, तभीसे वे योद्धा कन्यारूपिणी कालरात्रिको और कालरूपधारी अश्वत्थामाको भी देखा करते थे। पहलेसे ही दैवके मारे हुए उन वीरोंका द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने पीछे वध किया था। वह अश्वत्थामा भयानक स्वरसे गर्जना करके समस्त प्राणियोंको भयभीत कर रहा था ॥

तदनुस्मृत्य ते वीरा दर्शनं पूर्वकालिकम् । इदं तदित्यमन्यन्त दैवेनोपनिपीड़िताः ॥ ७५ ॥ वे दैवपीड़ित वीरगण पूर्वकालके देखे हुए सपनेको याद करके ऐसा मानने लगे कि 'यह वही स्वप्न इस रूपमें सत्य हो रहा है' ॥ ७५ ॥

ततस्तेन निनादेन प्रत्यबुध्यन्त धन्विनः । शिबिरे पाण्डवेयानां शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ७६ ॥ तदनन्तर अश्वत्थामाके उस सिंहनादसे पाण्डवोंके शिविरमें सैकड़ों और हजारों धनुर्धर वीर जाग उठे ॥

सोऽच्छिनत् कस्यचित् पादौ जघनं चैव कस्यचित् ।

कांश्चिद् बिभेद पार्श्वेषु कालसृष्ट इवान्तकः ।। ७७ ।।
उस समय कालप्रेरित यमराजके समान उसने किसीके पैर काट लिये, किसीकी कमर टूक-टूक कर दी और किन्हींकी पसलियोंमें तलवार भोंककर उन्हें चीर डाला ।। ७७ ।।
अत्युग्रप्रतिपिष्टैश्च नदद्भिश्च भृशोत्कटैः ।
गजाश्वमथितैश्चान्यैर्मही कीर्णाभवत् प्रभो ।। ७८ ।।
वे सब-के-सब भयानक रूपसे कुचल दिये गये थे, अतः उन्मत्त-से होकर जोर-जोरसे चीखते और चिल्लाते थे। इसी प्रकार छूटे हुए घोड़ों और हाथियोंने भी अन्य बहुत-से योद्धाओंको कुचल दिया था। प्रभो! उन सबकी लाशोंसे धरती पट गयी थी ।। ७८ ।।
क्रोशतां किमिदं कोऽयं कः शब्दः किं नु किं कृतम् ।
एवं तेषां तथा द्रौणिरन्तकः समपद्यत ।। ७९ ।।
घायल वीर चिल्ला-चिल्लाकर कहते थे कि 'यह क्या है? यह कौन है? यह कैसा कोलाहल हो रहा है? यह क्या कर डाला?' इस प्रकार चीखते हुए उन सब योद्धाओंके लिये द्रोणकुमार अश्वत्थामा काल बन गया था ।। ७९ ।।
अपेतशस्त्रसन्नाहान् सन्नद्धान् पाण्डुसंजयान् ।
प्राहिणोन्मृत्युलोकाय द्रौणिः प्रहरतां वरः ।। ८० ।।
पाण्डवों और संजयोंमेंसे जिन्होंने अस्त्र-शस्त्र और कवच उतार दिये थे तथा जिन लोगोंने पुनः कवच बाँध लिये थे, उन सबको प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें श्रेष्ठ द्रोणपुत्रने मृत्युके लोकमें भेज दिया ।। ८० ।।
ततस्तच्छब्दवित्रस्ता उत्पतन्तो भयातुराः ।
निद्रान्धा नष्टसंज्ञाश्च तत्र तत्र निलिल्यिरे ।। ८१ ।।
जो लोग नींदके कारण अंधे और अचेत-से हो रहे थे, वे उसके शब्दसे चौंककर उछल पड़े; किंतु पुनः भयसे व्याकुल हो जहाँ-तहाँ छिप गये ।। ८१ ।।
ऊरुस्तम्भगृहीताश्च कश्मलाभिहतौजसः ।
विनदन्तो भृशं त्रस्ताः समासीदन् परस्परम् ।। ८२ ।।
उनकी जाँघें अकड़ गयी थीं। मोहवश उनका बल और उत्साह मारा गया था। वे भयभीत हो जोर-जोरसे चीखते हुए एक-दूसरेसे लिपट जाते थे ।। ८२ ।।
ततो रथं पुनद्रौणिरास्थितो भीमनिःस्वनम् ।
धनुष्पाणिः शरैरन्यान् प्रैषयद् वै यमक्षयम् ।। ८३ ।।
इसके बाद द्रोणकुमार अश्वत्थामा पुनः भयानक शब्द करनेवाले अपने रथपर सवार हुआ और हाथमें धनुष ले बाणोंद्वारा दूसरे योद्धाओंको यमलोक भेजने लगा ।।
पुनरुत्पततश्चापि दूरादपि नरोत्तमान् ।
शूरान् सम्पततश्चान्यान् कालरात्र्यै न्यवेदयत् ।। ८४ ।।

अश्वत्थामा पुनः उछलने और अपने ऊपर आक्रमण करनेवाले दूसरे-दूसरे नरश्रेष्ठ शूरवीरोंको दूरसे भी मारकर कालरात्रिके हवाले कर देता था ।। तथैव स्यन्दनाग्रेण प्रमथन् स विधावति । शरवर्षैश्च विविधैर्वर्षञ्छात्रांस्ततः ।। ८५ ।। वह अपने रथके अग्रभागसे शत्रुओंको कुचलता हुआ सब ओर दौड़ लगाता और नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षासे शत्रुसैनिकोंको घायल करता था ।। ८५ ।। पुनश्च सुविचित्रेण शतचन्द्रेण चर्मणा । तेन चाकाशवर्णेन तथाचरत सोऽसिना ।। ८६ ।। फिर वह सौ चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त विचित्र ढाल और आकाशके रंगवाली चमचमाती तलवार लेकर सब ओर विचरने लगा ।। ८६ ।। तथा च शिबिरं तेषां द्रौणिराहवदुर्मदः । व्यक्षोभयत राजेन्द्र महाह्रदमिव द्विपः ।। ८७ ।। राजेन्द्र! रणदुर्मद द्रोणकुमारने उन शत्रुओंके शिविरको उसी प्रकार मथ डाला, जैसे कोई गजराज किसी विशाल सरोवरको विक्षुब्ध कर डालता है ।। ८७ ।। उत्पेतुस्तेन शब्देन योधा राजन् विचेतसः । निद्रार्ताश्च भयार्ताश्च व्यधावन्त ततस्ततः ।। ८८ ।। राजन्! उस मार-काटके कोलाहलसे निद्रामें अचेत पड़े हुए योद्धा चौंककर उछल पड़ते और भयसे व्याकुल हो इधर-उधर भागने लगते थे ।। ८८ ।। विस्वरं चुक्रुशुश्चान्ये बह्वबद्धं तथा वदन् । न च स्म प्रत्यपद्यन्त शस्त्राणि वसनानि च ।। ८९ ।। कितने ही योद्धा गला फाड़-फाड़कर चिल्लाते और बहुत-सी ऊटपटाँग बातें बकने लगते थे। वे अपने अस्त्र-शस्त्र तथा वस्त्रोंको भी नहीं ढूँढ़ पाते थे ।। ८९ ।। विमुक्तकेशाश्चाप्यन्ये नाभ्यजानन् परस्परम् । उत्पतन्तोऽपतन् श्रान्ताः केचित् तत्राभ्रमंस्तदा ।। ९० ।। दूसरे बहुत-से योद्धा बाल बिखेरे हुए भागते थे। उस दशामें वे एक-दूसरेको पहचान नहीं पाते थे। कोई उछलते हुए भागते और थककर गिर जाते थे तथा कोई उसी स्थानपर चक्कर काटते रहते थे ।। ९० ।। पुरीषमसृजन् केचित् केचिन्मूत्रं प्रसुस्रुवुः । बन्धनानि च राजेन्द्र संच्छिद्य तुरगा द्विपाः ।। ९१ ।। समं पर्यपतंश्चान्ये कुर्वन्तो महदाकुलम् । कितने ही मलत्याग करने लगे। कितनोंके पेशाब झड़ने लगे। राजेन्द्र! दूसरे बहुत-से घोड़े और हाथी बन्धन तोड़कर एक साथ ही सब ओर दौड़ने और लोगोंको अत्यन्त व्याकुल करने लगे ।। ९१ १/२ ।।

तत्र केचिन्नरा भीता व्यलीयन्त महीतले ।। ९२ ।। तथैव तान् निपतितानपिंषन् गजवाजिनः । कितने ही योद्धा भयभीत हो पृथ्वीपर छिपे पड़े थे। उन्हें उसी अवस्थामें भागते हुए घोड़ों और हाथियोंने अपने पैरोंसे कुचल दिया ।। ९२ १/२ ।। तस्मिंस्तथा वर्तमाने रक्षांसि पुरुषर्षभ ।। ९३ ।। हृष्टानि व्यनदन्नुच्चैर्मुदा भरतसत्तम । पुरुषप्रवर! भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार जब वह मार-काट मची हुई थी, उस समय हर्षमें भरे हुए राक्षस बड़े जोर-जोरसे गर्जना करते थे ।। ९३ १/२ ।। स शब्दः पूरितो राजन् भूतसंघैर्मुदायुतैः ।। ९४ ।। अपूरयद् दिशः सर्वा दिवं चातिमहान् स्वनः । राजन्! आनन्दमग्न हुए भूतसमुदायोंके द्वारा किया हुआ वह महान् कोलाहल सम्पूर्ण दिशाओं तथा आकाशमें गूँज उठा ।। ९४ १/२ ।। तेषामार्तरवं श्रुत्वा वित्रस्ता गजवाजिनः ।। ९५ ।। मुक्ताः पर्यपतन् राजन् मृद्नन्तः शिबिरे जनम् । राजन्! मारे जानेवाले योद्धाओंका आर्तनाद सुनकर हाथी और घोड़े भयसे थर्रा उठे और बन्धनमुक्त हो शिविरमें रहनेवाले लोगोंको रौंदते हुए चारों ओर दौड़ लगाने लगे ।। ९५ १/२ ।। तैस्तत्र परिधावद्भिश्चरणोदीरितं रजः ।। ९६ ।। अकरोच्छिबिरे तेषां रजन्यां द्विगुणं तमः । उन दौड़ते हुए घोड़ों और हाथियोंने अपने पैरोंसे जो धूल उड़ायी थी, उसने पाण्डवोंके शिविरमें रात्रिके अन्धकारको दुगुना कर दिया ।। ९६ १/२ ।। तस्मिंस्तमसि संजाते प्रमूढाः सर्वतो जनाः ।। ९७ ।। नाजानन् पितरः पुत्रान् भ्रातॄन् भ्रातर एव च । वह घोर अन्धकार फैल जानेपर वहाँ सब लोगोंपर मोह छा गया। उस समय पिता पुत्रोंको और भाई भाइयोंको नहीं पहचान पाते थे ।। ९७ १/२ ।। गजा गजानतिक्रम्य निर्मनुष्या हया हयान् ।। ९८ ।। अताडयंस्तथाभञ्जंस्तथामृद्नंश्च भारत । भारत! हाथी हाथियोंपर और बिना सवारके घोड़े घोड़ोंपर आक्रमण करके एक-दूसरेपर चोट करने लगे। उन्होंने अंग-भंग करके एक-दूसरेको रौंद डाला ।। ९८ १/२ ।। ते भग्नाः प्रपतन्ति स्म निघ्नन्तश्च परस्परम् ।। ९९ ।। न्यपातयंस्तथा चान्यान् पातयित्वा तदापिषन् ।

परस्पर आघात करते हुए वे हाथी, घोड़े स्वयं भी घायल होकर गिर जाते थे तथा दूसरोंको भी गिरा देते और गिराकर उनका कचूमर निकाल देते थे ।। ९९ १/२ ।। विचेतसः सनिद्राश्च तमसा चावृता नराः ।। १०० ।। जग्मुः स्वानेव तत्राथ कालेनैव प्रचोदिताः । कितने ही मनुष्य निद्रामें अचेत पड़े थे और घोर अन्धकारसे घिर गये थे। वे सहसा उठकर कालसे प्रेरित हो आत्मीय जनोंका ही वध करने लगे ।। १०० १/२ ।। त्यक्त्वा द्वाराणि च द्वाःस्थास्तथा गुल्मानि गौल्मिकाः ।। १०१ ।। प्राद्रवन्त यथाशक्ति कांदिशीका विचेतसः । द्वारपाल दरवाजोंको और तम्बूकी रक्षा करनेवाले सैनिक तम्बूओंको छोड़कर यथाशक्ति भागने लगे। वे सब-के-सब अपनी सुध-बुध खो बैठे थे और यह भी नहीं जानते थे कि ‘उन्हें किस दिशामें भागकर जाना है’ ।। १०१ १/२ ।। विप्रणष्टाश्च तेऽन्योन्यं नाजानन्त तथा विभो ।। १०२ ।। क्रोशन्तस्तात पुत्रेति दैवोपहतचेतसः । प्रभो! वे भागे हुए सैनिक एक-दूसरेको पहचान नहीं पाते थे। दैववश उनकी बुद्धि मारी गयी थी। वे ‘हा तात! हा पुत्र!’ कहकर अपने स्वजनोंको पुकार रहे थे ।। १०२ १/२ ।। पलायतां दिशस्तेषां स्वानप्युत्सृज्य बान्धवान् ।। १०३ ।। गोत्रनामभिरन्योन्यमाक्रन्दन्त ततो जनाः । हाहाकारं च कुर्वाणाः पृथिव्यां शेरते परे ।। १०४ ।। अपने सगे सम्बन्धियोंको भी छोड़कर सम्पूर्ण दिशाओंमें भागते हुए योद्धाओंके नाम और गोत्रको पुकार-पुकारकर लोग परस्पर बुला रहे थे। कितने ही मनुष्य हाहाकार करते हुए धरतीपर पड़ गये थे ।। तान् बुद्ध्वा रणमत्तोऽसौ द्रोणपुत्रो व्यपोथयत् । तत्रापरे वध्यमाना मुहुर्मुहुरचेतसः ।। १०५ ।। शिबिरान् निष्पतन्ति स्म क्षत्रिया भयपीडिताः । युद्धके लिये उन्मत्त हुआ द्रोणपुत्र अश्वत्थामा उन सबको पहचान-पहचानकर मार गिराता था। बारंबार उसकी मार खाते हुए दूसरे बहुत-से क्षत्रिय भयसे पीड़ित और अचेत हो शिविरसे बाहर निकलने लगे ।। १०५ १/२ ।। तांस्तु निष्पतितांस्त्रस्तान् शिबिराज्जीवितैषिणः ।। १०६ ।। कृतवर्मा कृपश्चैव द्वारदेशे निजघ्नतुः । प्राण बचानेकी इच्छासे भयभीत हो शिविरसे निकले हुए उन क्षत्रियोंको कृतवर्मा और कृपाचार्यने दरवाजेपर ही मार डाला ।। १०६ १/२ ।। विस्रस्तयन्त्रकवचान् मुक्तकेशान् कृताञ्जलीन् ।। १०७ ।।