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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 351)

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सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

अभिमन्युका पराक्रम, छः महारथियोंके साथ घोर युद्ध और उसके द्वारा वृन्दारक तथा दस हजार अन्य राजाओंके सहित कोसलनरेश बृहद्वलका वध

धृतराष्ट्र उवाच

तथा प्रविष्टं तरुणं सौभद्रमपराजितम् ।
कुलानुरूपं कुर्वाणं संग्रामेष्वपलायिनम् ॥ १ ॥
आजानैयैः सुबलिभिर्यान्तमश्वैस्त्रिहायनैः ।
प्लवमानमिवाकाशे के शूराः समवारयन् ॥ २ ॥

**धृतराष्ट्र बोले—**संजय! कभी पराजित न होनेवाला तथा युद्धमें पीठ न दिखानेवाला तरुण, सुभद्राकुमार अभिमन्यु जब इस प्रकार जयद्रथकी सेनामें प्रवेश करके अपने कुलके अनुरूप पराक्रम प्रकट कर रहा था और तीन वर्षकी अवस्थावाले अच्छी जातिके बलवान् घोड़ोंद्वारा मानो आकाशमें तैरता हुआ आक्रमण करता था, उस समय किन शूरवीरोंने उसे रोका था? ॥

संजय उवाच

अभिमन्युः प्रविश्यैतांस्तावकान् निशितैः शरैः ।
अकरोत् पार्थिवान् सर्वान् विमुखान् पाण्डुनन्दनः ॥ ३ ॥

**संजयने कहा—**राजन्! पाण्डुकुलनन्दन अभिमन्युने उस सेनामें प्रविष्ट होकर आपके इन सभी राजाओंको अपने तीखे बाणोंद्वारा युद्धसे विमुख कर दिया ॥ ३ ॥

तं तु द्रोणः कृपः कर्णो द्रौणिश्च स बृहद्बलः ।
कृतवर्मा च हार्दिक्यः षड् रथाः पर्यवारयन् ॥ ४ ॥

तब द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, बृहद्वल और हृदिकपुत्र कृतवर्मा—इन छः महारथियोंने उसे चारों ओरसे घेर लिया ॥ ४ ॥

दृष्ट्वा तु सैन्धवे भारमतिमात्रं समाहितम् ।
सैन्यं तव महाराज युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ॥ ५ ॥

महाराज! सिंधुराज जयद्रथपर बहुत भार आया देख आपकी सेनाने राजा युधिष्ठिरपर धावा किया ॥ ५ ॥

सौभद्रमितरे वीरमभ्यवर्षन् शराम्बुभिः ।
तालमात्राणि चापानि विकर्षन्तो महाबलाः ॥ ६ ॥

तथा कुछ अन्य महाबली योद्धाओंने अपने चार हाथके धनुष खींचते हुए वहाँ सुभद्रकुमार वीर अभिमन्युपर बाणरूपी जलकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ ६ ॥ तांस्तु सर्वान् महेष्वासान् सर्वविद्यासु निष्ठितान् । व्यष्टम्भयद् रणे बाणैः सौभद्रः परवीरहा ॥ ७ ॥ परंतु शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अभिमन्युने सम्पूर्ण विद्याओंमें प्रवीण उन समस्त महाधनुर्धरोंको रणक्षेत्रमें अपने बाणोंद्वारा स्तब्ध कर दिया ॥ ७ ॥ द्रोणं पञ्चाशताविध्यद् विंशत्या च बृहद्बलम् । अशीत्या कृतवर्माणं कृपं षष्ट्या शिलीमुखैः ॥ ८ ॥ रुक्मपुङ्खैर्महावेगैराकर्णसमचोदितैः । अविध्यद् दशभिर्बाणैरश्वत्थामानमार्जुनः ॥ ९ ॥ अर्जुनकुमार अभिमन्युने द्रोणको पचास, बृहद्बलको बीस, कृतवर्माको अस्सी, कृपाचार्यको साठ और अश्वत्थामाको कानतक खींचकर छोड़े हुए स्वर्णमय पंखयुक्त, महावेगशाली दस बाणोंद्वारा घायल कर दिया ॥ स कर्णं कर्णिना कर्णे पीतेन च शितेन च । फाल्गुनिर्द्विषतां मध्ये विव्याध परमेषुणा ॥ १० ॥ अर्जुनकुमारने शत्रुओंके मध्यमें खड़े हुए कर्णके कानमें पानीदार पैने और उत्तम बाणद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ १० ॥ पातयित्वा कृपस्याश्वांस्तथोभौ पार्ष्णिसारथी । अथैनं दशभिर्बाणैः प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे ॥ ११ ॥ कृपाचार्यके चारों घोड़ों तथा उनके दो पार्श्विक्षकोंको धराशायी करके छातीमें दस बाणोंद्वारा प्रहार किया ॥ ततो वृन्दारकं वीरं कुरूणां कीर्तिवर्धनम् । पुत्राणां तव वीराणां पश्यतामवधीद् बली ॥ १२ ॥ तदनन्तर बलवान् अभिमन्युने कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले वीर वृन्दारकको आपके वीर पुत्रोंके देखते-देखते मार डाला ॥ १२ ॥ तं द्रौणिः पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समर्पयत् । वरं वरममित्राणामारुजन्तमभीतवत् ॥ १३ ॥ तब शत्रुदलके प्रधान-प्रधान वीरोंका बेखटके वध करते हुए अभिमन्युको अश्वत्थामाने पचीस बाण मारे ॥ स तु बाणैः शितैस्तूर्णं प्रत्यविध्यत मारिष । पश्यतां धार्तराष्ट्राणामश्वत्थामानमार्जुनः ॥ १४ ॥ आर्य! अर्जुनकुमारने भी आपके पुत्रोंके देखते-देखते तुरंत ही अश्वत्थामाको पैने बाणोंद्वारा बींध डाला ॥

षष्ट्या शराणां तं द्रौणिस्तिग्मधारैः सुतेजनैः ।
उग्रैर्नाकम्पयद् विद्ध्वा मैनाकमिव पर्वतम् ।। १५ ।।
तब द्रोणपुत्रने तीखी धारवाले तेज और भयंकर साठ बाणोंद्वारा अभिमन्युको बींध डाला; परंतु बींधकर भी वह मैनाक पर्वतके समान स्थित अभिमन्युको कम्पित न कर सका ।। १५ ।।

स तु द्रौणिं त्रिसप्तत्या हेमपुङ्खैरजिह्मगैः ।
प्रत्यविध्यन्महातेजा बलवानपकारिणम् ।। १६ ।।
महातेजस्वी बलवान् अभिमन्युने सुवर्णमय पंखसे युक्त तिहत्तर बाणोंद्वारा अपने अपकारी अश्वत्थामाको पुनः घायल कर दिया ।। १६ ।।

तस्मिन् द्रोणो बाणशतं पुत्रगृद्धी न्यपातयत् ।
अश्वत्थामा तथाष्टौ च परीप्सन् पितरं रणे ।। १७ ।।
तब अपने पुत्रके प्रति स्नेह रखनेवाले द्रोणाचार्यने अभिमन्युको सौ बाण मारे। साथ ही अश्वत्थामाने भी अपने पिताकी रक्षा करते हुए रणक्षेत्रमें उसपर आठ बाण चलाये ।। १७ ।।

कर्णो द्वाविंशतिं भल्लान् कृतवर्मा च विंशतिम् ।
बृहद्बलस्तु पञ्चाशत् कृपः शारद्वतो दश ।। १८ ।।
तत्पश्चात् कर्णने बाईस, कृतवर्माने बीस, बृहद्बलने पचास तथा शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्यने अभिमन्युको दस भल्ल मारे ।। १८ ।।

तांस्तु प्रत्यवधीत् सर्वान् दशभिर्दशभिः शरैः ।
तैरर्द्यमानः सौभद्रः सर्वतो निशितैः शरैः ।। १९ ।।
उन सबके चलाये हुए तीखे बाणोंद्वारा सब ओरसे पीड़ित हुए सुभद्राकुमारने उन सभीको दस-दस बाणोंसे घायल कर दिया ।। १९ ।।

तं कोसलानामधिपः कर्णिनाताडयद्धृदि ।
स तस्याश्वान् ध्वजं चापं सूतं चापातयत् क्षितौ ।। २० ।।
तत्पश्चात् कोसलनरेश बृहद्बलने एक बाणद्वारा अभिमन्युकी छातीमें चोट पहुँचायी। यह देख अभिमन्युने उनके चारों घोड़ों तथा ध्वज, धनुष एवं सारथिको भी पृथ्वीपर मार गिराया ।। २० ।।

अथ कोसलराजस्तु विरथः खड्गचर्मभृत् ।
इयेष फाल्गुनेः कायाच्छिरो हर्तुं सकुण्डलम् ।। २१ ।।
रथहीन होनेपर कोसलनरेशने हाथमें ढाल और तलवार ले ली तथा अभिमन्युके शरीरसे उसके कुण्डलयुक्त मस्तकको काट लेनेका विचार किया ।। २१ ।।

स कोसलानामधिपं राजपुत्रं बृहद्बलम् ।
हृदि विव्याध बाणेन स भिन्नहृदयोऽपतत् ।। २२ ।।

इतनेहीमें अभिमन्युने एक बाणद्वारा कोसलनरेश राजपुत्र बृहद्वलके हृदयमें गहरी चोट पहुँचायी। इससे उनका वक्षःस्थल विदीर्ण हो गया और वे गिर पड़े ॥ २२ ॥ बभञ्ज च सहस्राणि दश राज्ञां महात्मनाम् । सृजतामशिवा वाचः खड्गकार्मुकधारिणाम् ॥ २३ ॥ इसके बाद अशुभ वचन बोलनेवाले तथा खड्ग एवं धनुष धारण करनेवाले दस हजार महामनस्वी राजाओंका भी उसने संहार कर डाला ॥ २३ ॥ तथा बृहद्बलं हत्वा सौभद्रो व्यचरद् रणे । व्यष्टम्भयन्महेष्वासो योधांस्तव शराम्बुभिः ॥ २४ ॥ इस प्रकार महाधनुर्धर अभिमन्यु बृहद्वलका वध करके आपके योद्धाओंको अपने बाणरूपी जलकी वर्षासे स्तब्ध करता हुआ रणक्षेत्रमें विचरने लगा ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि बृहद्वलवधे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें बृहद्वलवधविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७ ॥

अध्याय (पृष्ठ 355)

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अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

अभिमन्युद्वारा अश्वकेतु, भोज और कर्णके मन्त्री आदिका वध एवं छः महारथियोंके साथ घोर युद्ध और उन महारथियोंद्वारा अभिमन्युके धनुष, रथ, ढाल और तलवारका नाश

संजय उवाच

स कर्णं कर्णिना कर्णे पुनर्विव्याध फाल्गुनिः ।
शरैः पञ्चाशता चैनमविध्यत् कोपयन् भृशम् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर अर्जुनकुमार अभिमन्युने एक बाणद्वारा कर्णके कानमें पुनः चोट पहुँचायी और उसे क्रोध दिलाते हुए उसने पचास बाण मारकर अत्यन्त घायल कर दिया ॥ १ ॥

प्रतिविव्याध राधेयस्तावद्भिरथ तं पुनः ।
शरैराचितसर्वाङ्गो बह्वशोभत भारत ॥ २ ॥
भरतनन्दन! तब राधापुत्र कर्णने भी अभिमन्युको उतने ही बाणोंसे बींध डाला। उसका सारा अंग बाणोंसे व्याप्त होनेके कारण वह बड़ी शोभा पा रहा था ॥ २ ॥

कर्णं चाप्यकरोत् क्रुद्धो रुधिरोत्पीडवाहिनम् ।
कर्णोऽपि विबभौ शूरः शरैश्छिन्नोऽसृगाप्लुतः ॥ ३ ॥
(संध्यानुगतपर्यन्तः शरदीव दिवाकरः ।)
फिर क्रोधमें भरे हुए अभिमन्युने कर्णको भी बाणोंसे क्षत-विक्षत करके उसे रक्तकी धारा बहानेवाला बना दिया। उस समय शूरवीर कर्ण भी बाणोंसे छिन्न-भिन्न और खूनसे लथपथ हो बड़ी शोभा पाने लगा, मानो शरत्कालका सूर्य संध्याके समय सम्पूर्णरूपसे लाल दिखायी दे रहा हो ॥ ३ ॥

तावुभौ शरचित्राङ्गौ रुधिरेण समुक्षितौ ।
बभूवतुर्महात्मानौ पुष्पिताविव किंशुकौ ॥ ४ ॥
उन दोनोंके शरीर बाणोंसे व्याप्त होनेके कारण विचित्र दिखायी देते थे। दोनों ही रक्तसे भींग गये तथा वे दोनों महामनस्वी वीर फूलोंसे भरे हुए पलाश-वृक्षके समान प्रतीत होते थे ॥ ४ ॥

अथ कर्णस्य सचिवान् षट् शूरांश्चित्रयोधिनः ।
साश्वसूतध्वजरथान् सौभद्रो निजघान ह ॥ ५ ॥

तदनन्तर सुभद्राकुमारने कर्णके विचित्र युद्ध करनेवाले छः शूरवीर मन्त्रियोंको उनके घोड़े, सारथि, रथ तथा ध्वजसहित मार डाला ॥ ५ ॥ तथेतरान् महेष्वासान् दशभिर्दशभिः शरैः । प्रत्यविध्यदसम्भ्रान्तस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ६ ॥ इतना ही नहीं, उसने बिना किसी घबराहटके दस-दस बाणोंद्वारा अन्य महाधनुर्धरोंको भी आहत कर दिया। वह अद्भुत-सी बात थी ॥ ६ ॥ मागधस्य तथा पुत्रं हत्वा षड्भिरजिह्मगैः । साश्वं ससूतं तरुणमश्वकेतुमपातयत् ॥ ७ ॥ इसी प्रकार उसने मगधराजके तरुण पुत्र अश्वकेतुको छः बाणोंद्वारा मारकर उसे घोड़ों और सारथिसहित रथसे नीचे गिरा दिया ॥ ७ ॥ मार्त्तिकावतकं भोजं ततः कुञ्जरकेतनम् । क्षुरप्रेण समुन्मथ्य ननाद विसृजन् शरान् ॥ ८ ॥ तत्पश्चात् हाथीके चिह्नसे युक्त ध्वजावाले मार्त्तिकावतक नरेश भोजको एक क्षुरप्रद्वारा नष्ट करके अभिमन्युने बाणोंकी वर्षा करते हुए सिंहनाद किया ॥ ८ ॥ तस्य दौःशासनिर्विद्ध्वा चतुर्भिश्चतुरो हयान् । सूतमेकेन विव्याध दशभिश्चार्जुनात्मजम् ॥ ९ ॥ तब दुःशासनकुमारने चार बाणोंद्वारा अभिमन्युके चारों घोड़ोंको घायल करके एकसे सारथिको और दस बाणोंद्वारा स्वयं अभिमन्युको बींध डाला ॥ ९ ॥ ततो दौःशासनिं कार्ष्णिर्विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः । संरम्भाद् रक्तनयनो वाक्यमुच्चैरथाब्रवीत् ॥ १० ॥ यह देख अर्जुनकुमारने क्रोधसे लाल आँखें करके सात बाणोंद्वारा दुःशासनपुत्रको बींध डाला और उच्च स्वरसे यह बात कही— ॥ १० ॥ पिता तवाहवं त्यक्त्वा गतः कापुरुषो यथा । दिष्ट्या त्वमपि जानीषे योद्धुं न त्वद्य मोक्ष्यसे ॥ ११ ॥ 'अरे! तेरा पिता कायरकी भाँति युद्ध छोड़कर भाग गया है। सौभाग्यकी बात है कि तू भी युद्ध करना जानता है; किंतु आज तू जीवित नहीं छूट सकेगा' ॥ ११ ॥ एतावदुक्त्वा वचनं कर्मारपरिमार्जितम् । नाराचं विससर्जास्मै तं द्रौणिस्त्रिभिराच्छिनत् ॥ १२ ॥ यह वचन कहकर अभिमन्युने कारीगरके माँजे हुए एक नाराचको दुःशासनपुत्रपर चलाया; परंतु अश्वत्थामाने तीन बाण मारकर उसे बीचमें ही काट दिया ॥ १२ ॥ तस्यार्जुनिर्ध्वजं छित्त्वा शल्यं त्रिभिरताडयत् । तं शल्यो नवभिर्बाणैर्गार्ध्रपत्रैरताडयत् ॥ १३ ॥ हृद्यसम्भ्रान्तवद् राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ।

तब अर्जुनकुमारने अश्वत्थामाका ध्वज काटकर शल्यको तीन बाण मारे। राजन्! शल्यने भी मनमें तनिक भी सम्भ्रम या घबराहटका अनुभव न करते हुए-से गीधके पंखसे युक्त नौ बाणोंद्वारा अभिमन्युको आहत कर दिया। वह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥ १३ १/२ ॥
तस्यार्जुनिर्ध्वजं छित्त्वा हत्वोभौ पार्ष्णिसारथी ॥ १४ ॥
तं विव्याधायसैः षड्भिः सोपाक्रामद् रथान्तरम् ।
उस समय अभिमन्युने शल्यके ध्वजको काटकर उनके दोनों पार्श्वरक्षकोंको भी मार डाला और उनको भी लोहेके बने हुए छः बाणोंसे बींध दिया; फिर तो शल्य भागकर दूसरे रथपर चले गये ॥ १४ १/२ ॥
शत्रुंजयं चन्द्रकेतुं मेघवेगं सुवर्चसम् ॥ १५ ॥
सूर्यभासं च पञ्चैतान् हत्वा विव्याध सौबलम् ।
तं सौबलस्त्रिभिर्विद्ध्वा दुर्योधनमथाब्रवीत् ॥ १६ ॥
तत्पश्चात् शत्रुंजय, चन्द्रकेतु, मेघवेग, सुवर्चा और सूर्यभास—इन पाँच वीरोंको मारकर अभिमन्युने सुबलपुत्र शकुनिको भी घायल कर दिया। तब शकुनिने भी तीन बाणोंसे अभिमन्युको घायल करके दुर्योधनसे इस प्रकार कहा— ॥ १५-१६ ॥
सर्व एनं विमथ्नीमः पुरैकैकं हिनस्ति नः ।
अथाब्रवीत् पुनर्द्रोणं कर्णो वैकर्तनो रणे ॥ १७ ॥
'राजन्! यह एक-एकके साथ युद्ध करके हमें मारे, इसके पहले ही हम सब लोग मिलकर इस अभिमन्युको मथ डालें।' तदनन्तर विकर्तनपुत्र कर्णने रणक्षेत्रमें पुनः द्रोणाचार्यसे पूछा— ॥ १७ ॥
पुरा सर्वान् प्रमथ्नाति ब्रूह्यस्य वधमाशु नः ।
ततो द्रोणो महेष्वासः सर्वांस्तान् प्रत्यभाषत ॥ १८ ॥
'आचार्य! अभिमन्यु हमलोगोंको मार डाले' इसके पहले ही हमें शीघ्र यह बताइये कि इसका वध किस प्रकार होगा?' तब महाधनुर्धर द्रोणाचार्यने उन सबसे कहा— ॥ १८ ॥
अस्ति वास्यान्तरं किंचित् कुमारस्याथ पश्यत ।
अण्वप्यस्यान्तरं ह्यद्य चरतः सर्वतोदिशम् ॥ १९ ॥
'देखो, क्या इस कुमार अभिमन्युमें कहीं कोई दुर्बलता या छिद्र है? सम्पूर्ण दिशाओंमें विचरते हुए अभिमन्युमें आज कोई छोटा-सा भी छिद्र हो तो देखो ॥ १९ ॥
शीघ्रतां नरसिंहस्य पाण्डवेयस्य पश्यत ।
धनुर्मण्डलमेवास्य रथमार्गेषु दृश्यते ॥ २० ॥
संदधानस्य विशिखान् शीघ्रं चैव विमुञ्चतः ।
'इस पुरुषसिंह पाण्डवपुत्रकी शीघ्रता तो देखो। शीघ्रतापूर्वक बाणोंका संधान करते और छोड़ते समय रथके मार्गोंमें इसके धनुषका मण्डलमात्र दिखायी देता है ॥ २० १/२ ॥
आरुजन्नपि मे प्राणान् मोहयन्नपि सायकैः ॥ २१ ॥

प्रहर्षयति मां भूयः सौभद्रः परवीरहा । अति मां नन्दयत्येष सौभद्रो विचरन् रणे ॥ २२ ॥ 'शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला सुभद्राकुमार अभिमन्यु यद्यपि अपने बाणोंद्वारा मेरे प्राणोंको अत्यन्त कष्ट दे रहा है, मुझे मूर्च्छित किये देता है, तथापि बारंबार मेरा हर्ष बढ़ा रहा है। रणक्षेत्रमें विचरता हुआ सुभद्राका यह पुत्र मुझे अत्यन्त आनन्दित कर रहा है॥ २१-२२॥

अन्तरं यस्य संरब्धा न पश्यन्ति महारथाः । अस्यतो लघुहस्तस्य दिशः सर्वा महेषुभिः ॥ २३ ॥ न विशेषं प्रपश्यामि रणे गाण्डीवधन्वनः । 'क्रोधमें भरे हुए महारथी इसके छिद्रको नहीं देख पाते हैं। यह शीघ्रतापूर्वक हाथ चलाता हुआ अपने महान् बाणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको व्याप्त कर रहा है। मैं युद्धस्थलमें गाण्डीवधारी अर्जुन और इस अभिमन्युमें कोई अन्तर नहीं देख पाता हूँ'॥ २३१/२॥

अथ कर्णः पुनर्द्रोणमार्जुनिशराहतः ॥ २४ ॥ स्थातव्यमिति तिष्ठामि पीड्यमानोऽभिमन्युना । तदनन्तर कर्णने अभिमन्युके बाणोंसे आहत होकर पुनः द्रोणाचार्यसे कहा—'आचार्य! मैं अभिमन्युके बाणोंसे पीड़ित होता हुआ भी केवल इसलिये यहाँ खड़ा हूँ कि युद्धके मैदानमें डटे रहना ही क्षत्रियका धर्म है (अन्यथा मैं कभी भाग गया होता) ॥ २४१/२॥

तेजस्विनः कुमारस्य शराः परमदारुणाः ॥ २५ ॥ क्षिण्वन्ति हृदयं मेऽद्य घोराः पावकतेजसः । तमाचार्योऽब्रवीत् कर्णं शनकैः प्रहसन्निव ॥ २६ ॥ 'तेजस्वी कुमार अभिमन्युके ये अत्यन्त दारुण और अग्निके समान तेजस्वी घोर बाण आज मेरे वक्षःस्थलको विदीर्ण किये देते हैं।' यह सुनकर द्रोणाचार्य ठहाका मारकर हँसते हुए-से धीरे-धीरे कर्णसे इस प्रकार बोले— ॥ २५-२६ ॥

अभेद्यमस्य कवचं युवा चाशुपराक्रमः । उपदिष्टा मया चास्य पितुः कवचधारणा ॥ २७ ॥ तामेष निखिलां वेत्ति ध्रुवं परपुरंजयः । शक्यं त्वस्य धनुश्छेत्तुं ज्यां च बाणैः समाहितैः ॥ २८ ॥ 'कर्ण! अभिमन्युका कवच अभेद्य है। यह तरुण वीर शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाला है। मैंने इसके पिताको कवच धारण करनेकी विधि बतायी है। शत्रुनगरीपर विजय पानेवाला यह वीर कुमार निश्चय ही वह सारी विधि जानता है (अतः इसका कवच तो अभेद्य ही है); परंतु मनोयोगपूर्वक चलाये हुए बाणोंसे इसके धनुष और प्रत्यंचाको काटा जा सकता है॥ २७-२८॥

अभीषूंश्च हयांश्चैव तथोभौ पार्ष्णिसारथी ।

एतत् कुरु महेष्वास राधेय यदि शक्यते ॥ २९ ॥ 'साथ ही इसके घोड़ोंकी वागडोरोंको, घोड़ोंको तथा दोनों पार्श्वरक्षकोंको भी नष्ट किया जा सकता है। महाधनुर्धर राधापुत्र! यदि कर सको तो यही करो ॥ २९ ॥

अथैनं विमुखीकृत्य पश्चात् प्रहरणं कुरु । सधनुष्को न शक्योऽयमपि जेतुं सुरासुरैः ॥ ३० ॥ 'अभिमन्युको युद्धसे विमुख करके पीछे इसके ऊपर प्रहार करो, धनुष लिये रहनेपर तो इसे सम्पूर्ण देवता और असुर भी जीत नहीं सकते ॥ ३० ॥

विरथं विधनुष्कं च कुरुष्वैनं यदिच्छसि । तदाचार्यवचः श्रुत्वा कर्णो वैकर्तनस्त्वरन् ॥ ३१ ॥ अस्यतो लघुहस्तस्य पृषत्कैर्धनुराच्छिनत् । अश्वानस्यावधीद् भोजो गौतमः पार्ष्णिसारथी ॥ ३२ ॥ 'यदि तुम इसे परास्त करना चाहते हो तो इसके रथ और धनुषको नष्ट कर दो।' आचार्यकी यह बात सुनकर विकर्तनपुत्र कर्णने बड़ी उतावलीके साथ अपने बाणोंद्वारा शीघ्रतापूर्वक हाथ चलाते हुए अस्त्रोंका प्रयोग करनेवाले अभिमन्युके धनुषको काट दिया। भोजवंशी कृतवर्मानि उसके घोड़े मार डाले और कृपाचार्यने दोनों पार्श्वरक्षकोंका काम तमाम कर दिया ॥ ३१-३२ ॥

शेषास्तु च्छिन्नधन्वानं शरवर्षैरवाकिरन् । त्वरमाणास्त्वराकाले विरथं षण्महारथाः ॥ ३३ ॥ शरवर्षैरकरुणा बालमेकमवाकिरन् । शेष महारथी धनुष कट जानेपर अभिमन्युके ऊपर बाणोंकी वर्षा करने लगे। इस प्रकार शीघ्रता करनेके अवसरपर शीघ्रता करनेवाले छः निर्दय महारथी एक रथहीन बालकपर बाणोंकी बौछार करने लगे ॥ ३३ १/२ ॥

स च्छिन्नधन्वा विरथः स्वधर्ममनुपालयन् ॥ ३४ ॥ खड्गचर्मधरः श्रीमानुत्पपात विहायसा । धनुष कट जाने और रथ नष्ट हो जानेपर तेजस्वी वीर अभिमन्यु अपने धर्मका पालन करते हुए ढाल और तलवार हाथमें लेकर आकाशमें उछल पड़ा ॥ ३४ १/२ ॥

मार्गैः सकौशिकाद्यैश्च लाघवेन बलेन च ॥ ३५ ॥ आर्जुनिर्व्यचरद् व्योम्नि भृशं वै पक्षिराडिव । अर्जुनकुमार अभिमन्यु कौशिक आदि मार्गों (पैतरों) द्वारा तथा शीघ्रकारिता और बल-पराक्रमसे पक्षिराज गरुड़की भाँति भूतलकी अपेक्षा आकाशमें ही अधिक विचरण करने लगा ॥ ३५ १/२ ॥

मय्येव निपतत्येष सासिरित्यूर्ध्वदृष्टयः ॥ ३६ ॥ विव्यधुस्तं महेष्वासं समरे छिद्रदर्शिनः ।

समरांगणमें छिद्र देखनेवाले योद्धा 'जान पड़ता है यह मेरे ही ऊपर तलवार लिये टूटा पड़ता है' इस आशंकासे ऊपरकी ओर दृष्टि करके महाधनुर्धर अभिमन्युको बींधने लगे ॥ ३६ १/२ ॥

तस्य द्रोणोऽच्छिनन्मुष्टौ खड्गं मणिमयत्सरुम् ॥ ३७ ॥ क्षुरप्रेण महातेजास्त्वरमाणः सपत्नजित् । उस समय शत्रुओंपर विजय पानेवाले महातेजस्वी द्रोणाचार्यने शीघ्रता करते हुए एक क्षुरप्रके द्वारा अभिमन्युकी मुट्ठीमें स्थित हुए मणिमय मूठसे युक्त खड्गको काट डाला ॥ ३७ १/२ ॥

राधेयो निशितैर्बाणैर्व्यधमच्चर्म चोत्तमम् ॥ ३८ ॥ व्यसिचर्मेषुपूर्णाङ्गः सोऽन्तरिक्षात् पुनः क्षितिम् । आस्थितश्चक्रमुद्यम्य द्रोणं क्रुद्धोऽभ्यधावत ॥ ३९ ॥ राधानन्दन कर्णने अपने पैने बाणोंद्वारा उसके उत्तम ढालके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। ढाल और तलवारसे वंचित हो जानेपर बाणोंसे भरे हुए शरीरवाला अभिमन्यु पुनः आकाशसे पृथ्वीपर उतर आया और चक्र हाथमें ले कुपित हो द्रोणाचार्यकी ओर दौड़ा ॥ ३८-३९ ॥

अध्याय (पृष्ठ 361)

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अभिमन्युपर अनेक महारथियोंद्वारा एक साथ प्रहार

स चक्ररेणूज्ज्वलशोभिताङ्गो बभावतीवोज्ज्वलचक्रपाणिः । रणेऽभिमन्युः क्षणमास रौद्रः स वासुदेवानुकृतिं प्रकुर्वन् ॥ ४० ॥

अभिमन्युका शरीर चक्रकी प्रभासे उज्ज्वल तथा धूलराशिसे सुशोभित था। उसके हाथमें तेजोमय उज्ज्वल चक्र प्रकाशित हो रहा था। इससे उसकी बड़ी शोभा हो रही थी। उस रणक्षेत्रमें चक्रधारणद्वारा भगवान् श्रीकृष्णका अनुकरण करता हुआ अभिमन्यु क्षणभरके लिये बड़ा भयंकर प्रतीत होने लगा ॥ ४० ॥

सुतरुधिरकृतैकरागवस्त्रो भ्रुकुटिपुटाकुटिलोऽतिसिंहनादः । प्रभुरमितबलो रणेऽभिमन्यु- र्नृपवरमध्यगतो भृशं व्यराजत् ॥ ४१ ॥

अभिमन्युके वस्त्र उसके शरीरसे बहनेवाले एकमात्र रुधिरके रंगमें रँग गये थे। भौंहें टेढ़ी होनेसे उसका मुख-मण्डल सब ओरसे कुटिल प्रतीत होता था और वह बड़े जोर-जोरसे सिंहनाद कर रहा था। ऐसी अवस्थामें प्रभावशाली अनन्त बलवान् अभिमन्यु उस रणक्षेत्रमें पूर्वोक्त नरेशोंके बीचमें खड़ा होकर अत्यन्त प्रकाशित हो रहा था ॥ ४१ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि अभिमन्युविरथकरणे अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें अभिमन्युको रथहीन करनेसे सम्बन्ध रखनेवाला अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४१ १/३ श्लोक हैं।)

अध्याय (पृष्ठ 363)

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एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

अभिमन्युका कालिकेय, वसाति और कैकय रथियोंको मार डालना एवं छः महारथियोंके सहयोगसे अभिमन्युका वध और भागती हुई अपनी सेनाको युधिष्ठिरका आश्वासन देना

संजय उवाच

विष्णोः स्वसुर्नन्दकरः स विष्णुवायुधभूषणः ।
रराजातिरथः संख्ये जनार्दन इवापरः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! भगवान् श्रीकृष्णकी बहिन सुभद्राको आनन्दित करनेवाला तथा श्रीकृष्णके ही समान चक्ररूपी आयुधसे सुशोभित होनेवाला अतिरथी वीर अभिमन्यु उस युद्धस्थलमें दूसरे श्रीकृष्णके समान प्रकाशित हो रहा था ॥ १ ॥

मारुतोद्धूतकेशान्तमुद्यतारिवरायुधम् ।
वपुः समीक्ष्य पृथ्वीशा दुःसमीक्ष्यं सुरैरपि ॥ २ ॥
तच्चक्रं भृशमुद्विग्नाः संचिच्छिदुरनेकधा ।
हवा उसके केशान्तभागको हिला रही थी। उसने अपने हाथमें चक्रनामक उत्तम आयुध उठा रखा था। उस समय उसके शरीर और उस चक्रको—जिसकी ओर दृष्टिपात करना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन था—देखकर समस्त भूपालगण अत्यन्त उद्विग्न हो उठे और उन सबने मिलकर उस चक्रके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ २ १/२ ॥

महारथस्ततः कार्ष्णिः संजग्राह महागदाम् ॥ ३ ॥
विधनुःस्यन्दनासिस्तैर्विचक्रश्चारिभिः कृतः ।
अभिमन्युर्गदापाणिरश्वत्थामानमर्दयत् ॥ ४ ॥
तब महारथी अभिमन्युने एक विशाल गदा हाथमें ले ली। शत्रुओंने उसे धनुष, रथ, खड्ग और चक्रसे भी वंचित कर दिया था। इसलिये गदा हाथमें लिये हुए अभिमन्युने अश्वत्थामापर धावा किया ॥ ३-४ ॥

स गदामुद्यतां दृष्ट्वा ज्वलन्तीमशनीमिव ।
अपाक्रामद् रथोपस्थाद् विक्रमांस्त्रीन् नरर्षभः ॥ ५ ॥
प्रज्वलित वज्रके समान उस गदाको ऊपर उठी हुई देख नरश्रेष्ठ अश्वत्थामा अपने रथकी बैठकसे तीन पग पीछे हट गया ॥ ५ ॥

तस्याश्वान् गदया हत्वा तथोभौ पार्ष्णिसारथी । शराचिताङ्गः सौभद्रः श्वाविद्वत् समदृश्यत ।। ६ ।। उस गदासे अश्वत्थामाके चारों घोड़ों तथा दोनों पार्श्विक्षकोंको मारकर बाणोंसे भरे हुए शरीरवाला सुभद्राकुमार साहीके समान दिखायी देने लगा ।। ६ ।।

ततः सुबलदायादं कालिकेयमपोथयत् । जघान चास्यानुचरान् गान्धारान् सप्तसप्ततिम् ।। ७ ।। तदनन्तर उसने सुबलपुत्र कालिकेयको मार गिराया और उसके पीछे चलनेवाले सतहत्तर गान्धारोंका भी संहार कर डाला ।। ७ ।।

पुनश्चैव वसातीयाञ्जघान रथिनो दश । केकयानां रथान् सप्त हत्वा च दश कुञ्जरान् ।। ८ ।। दौःशासनिरथं साश्वं गदया समपोथयत् । इसके बाद दस वसातीय रथियोंको मार डाला। केकयोंके सात रथों और दस हाथियोंको मारकर दुःशासनकुमारके घोड़ोंसहित रथको भी गदाके आघातसे चूर-चूर कर डाला ।। ८ १/२ ।।

ततो दौःशासनिः क्रुद्धो गदामुद्यम्य मारिष ।। ९ ।। अभिदुद्राव सौभद्रं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् । आर्य! इससे दुःशासनपुत्र कुपित हो गदा हाथमें लेकर अभिमन्युकी ओर दौड़ा और इस प्रकार बोला—'अरे! खड़ा रह, खड़ा रह' ।। ९ १/२ ।।

तावुद्यतगदौ वीरावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ ।। १० ।। भ्रातृव्यौ सम्प्रजह्नाते पुरेव त्र्यम्बकान्धकौ ।

वे दोनों वीर एक-दूसरेके शत्रु थे। अतः गदा हाथमें लेकर एक-दूसरेका वध करनेकी इच्छासे परस्पर प्रहार करने लगे। ठीक उसी तरह, जैसे पूर्वकालमें भगवान् शंकर और अन्धकासुर परस्पर गदाका आघात करते थे ॥ तावन्योन्यं गदाग्राभ्यामाहत्य पतितौ क्षितौ ॥ ११ ॥ इन्द्रध्वजाविवोत्सृष्टौ रणमध्ये परंतपौ । शत्रुओंको संताप देनेवाले वे दोनों वीर रणक्षेत्रमें गदाके अग्रभागसे एक-दूसरेको चोट पहुँचाकर नीचे गिराये हुए दो इन्द्र-ध्वजोंके समान पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ दौःशासनिरथोत्थाय कुरूणां कीर्तिवर्धनः ॥ १२ ॥ उत्तिष्ठमानं सौभद्रं गदया मूर्ध््न्यताडयत् । तत्पश्चात् कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले दुःशासनपुत्रने पहले उठकर उठते हुए सुभद्राकुमारके मस्तकपर गदाका प्रहार किया ॥ १२ ½ ॥ गदावेगेन महता व्यायामेन च मोहितः ॥ १३ ॥ विचेता न्यपतद् भूमौ सौभद्रः परवीरहा । एवं विनिहतो राजन्नेको बहुभिराहवे ॥ १४ ॥ गदाके उस महान् वेग और परिश्रमसे मोहित होकर शत्रुवीरोंका नाश करनेवाला अभिमन्यु अचेत हो पृथ्वीपर गिर पड़ा। राजन्! इस प्रकार उस युद्धस्थलमें बहुत-से योद्धाओंने मिलकर एकाकी अभिमन्युको मार डाला ॥ १३-१४ ॥ क्षोभयित्वा चमूं सर्वां नलिनीमिव कुञ्जरः । अशोभत हतो वीरो व्याधैर्वनगजो यथा ॥ १५ ॥ जैसे हाथी कभी सरोवरको मथ डालता है, उसी प्रकार सारी सेनाको क्षुब्ध करके व्याधोंके द्वारा जंगली हाथीकी भाँति मारा गया वीर अभिमन्यु वहाँ अद्भुत शोभा पा रहा था ॥ १५ ॥ तं तथा पतितं शूरं तावकाः पर्यवारयन् । दावं दग्ध्वा यथा शान्तं पावकं शिशिरात्यये ॥ १६ ॥ विमृद्य नगशृङ्गाणि संनिवृत्तमिवानिलम् । अस्तंगतमिवादित्यं तप्त्वा भारतवाहिनीम् ॥ १७ ॥ उपप्लुतं यथा सोमं संशुष्कमिव सागरम् । पूर्णचन्द्राभवदनं काकपक्षकवृताक्षिकम् ॥ १८ ॥ तं भूमौ पतितं दृष्ट्वा तावकास्ते महारथाः । मुदा परमया युक्ताश्चक्रुशुः सिंहवन्मुहुः ॥ १९ ॥ इस प्रकार रणभूमिमें गिरे हुए शूरवीर अभिमन्युको आपके सैनिकोंने चारों ओरसे घेर लिया। जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें जंगलको जलाकर आग बुझ गयी हो, जिस प्रकार वायु वृक्षोंकी शाखाओंको तोड़-फोड़कर शान्त हो रही हो, जैसे संसारको संतप्त करके सूर्य अस्ताचलको

चले गये हों, जैसे चन्द्रमापर ग्रहण लग गया हो तथा जैसे समुद्र सूख गया हो, उसी प्रकार समस्त कौरव-सेनाको संतप्त करके पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखवाला अभिमन्यु पृथ्वीपर पड़ा था; उसके सिरके बड़े-बड़े बालों (काकपक्ष)-से उसकी आँखें ढक गयी थीं। उस दशामें उसे देखकर आपके महारथी बड़ी प्रसन्नताके साथ बारंबार सिंहनाद करने लगे ॥ १६–१९ ॥

आसीत् परमो हर्षस्तावकानां विशाम्पते ।
इतरेषां तु वीराणां नेत्रेभ्यः प्रापतज्जलम् ॥ २० ॥
प्रजानाथ! आपके पुत्रोंको तो बड़ा हर्ष हुआ; परंतु पाण्डववीरोंके नेत्रोंसे आँसू बहने लगा ॥ २० ॥

अन्तरिक्षे च भूतानि प्राक्रोशन्त विशाम्पते ।
दृष्ट्वा निपतितं वीरं च्युतं चन्द्रमिवाम्बरात् ॥ २१ ॥
महाराज! उस समय अन्तरिक्षमें खड़े हुए प्राणी आकाशसे गिरे हुए चन्द्रमाके समान वीर अभिमन्युको रणभूमिमें पड़ा देख उच्च स्वरसे आपके महारथियोंकी निन्दा करने लगे ॥ २१ ॥

द्रोणकर्णमुखैः षड्भिर्धार्तराष्ट्रैर्महारथैः ।
एकोऽयं निहतः शेते नैष धर्मो मतो हि नः ॥ २२ ॥
द्रोण और कर्ण आदि छः कौरव महारथियोंके द्वारा असहाय अवस्थामें मारा गया यह एक बालक यहाँ सो रहा है। हमारे मतमें यह धर्म नहीं है ॥ २२ ॥

तस्मिन् विनिहते वीरे बह्वशोभत मेदिनी ।
द्यौर्र्यथा पूर्णचन्द्रेण नक्षत्रगणमालिनी ॥ २३ ॥
वीर अभिमन्युके मारे जानेपर वह रणभूमि पूर्ण चन्द्रमासे युक्त तथा नक्षत्रमालाओंसे अलंकृत आकाशकी भाँति बड़ी शोभा पा रही थी ॥ २३ ॥

रुक्मपुङ्खैश्च सम्पूर्णा रुधिरौघपरिप्लुता ।
उत्तमाङ्गैश्च शूराणां भ्राजमानैः सकुण्डलैः ॥ २४ ॥
विचित्रैश्च परिस्तोमैः पताकाभिश्च संवृता ।
चामरैश्च कुथाभिश्च प्रविद्धैश्चाम्बरोत्तमैः ॥ २५ ॥
तथाश्वनरनागानामलंकारैश्च सुप्रभैः ।
खड्गैः सुनिशितैः पीतैर्निर्मुक्तैर्भुजगैरिव ॥ २६ ॥
चापैश्च विविधैश्छिन्नैः शक्त्यृष्टिप्रासकम्पनैः ।
विविधैश्चायुधैश्चान्यैः संवृता भूरशोभत ॥ २७ ॥
सुवर्णमय पंखवाले बाणोंसे वहाँकी भूमि भरी हुई थी। रक्तकी धाराओंमें डूबी हुई थी। शूरवीरोंके कुण्डल-मण्डित तेजस्वी मस्तकों, हाथियोंके विचित्र झूलों, पताकाओं, चामरों, हाथीकी पीठपर बिछाये जानेवाले कम्बलों, इधर-उधर पड़े हुए उत्तम वस्त्रों, हाथी, घोड़े

और मनुष्योंके चमकीले आभूषणों, केंचुलसे निकले हुए सर्पोंके समान पैने और पानीदार खड्गों, भाँति-भाँतिके कटे हुए धनुषों, शक्ति, ऋष्टि, प्रास, कम्पन तथा अन्य नाना प्रकारके आयुधोंसे आच्छादित हुई रणभूमिकी अद्भुत शोभा हो रही थी॥ २४—२७॥ वाजिभिश्चापि निर्जीवैः श्वसद्भिः शोणितोक्षितैः। सारोहैर्विषमा भूमिः सौभद्रेण निपातितैः॥ २८॥ सुभद्रकुमार अभिमन्युके द्वारा मार गिराये हुए रक्तस्नात निर्जीव और सजीव घोड़ों और घुड़सवारोंके कारण वह भूमि विषम एवं दुर्गम हो गयी थी॥ २८॥ साङ्कुशैः समहामात्रैः सवर्मायुधकेतुभिः। पर्वतैरिव विध्वस्तैर्विशिखैर्मथितैर्गजैः॥ २९॥ पृथिव्यामनुकीर्णैश्च व्यश्वसारथियोधिभिः। हृदैरिव प्रक्षुभितैर्हतनागै रथोत्तमैः॥ ३०॥ पदातिसंघैश्च हतैर्विविधायुधभूषणैः। भीरूणां त्रासजननी घोररूपाभवन्मही॥ ३१॥ अंकुश, महावत, कवच, आयुध और ध्वजाओंसहित बड़े-बड़े गजराज बाणोंद्वारा मथित होकर भहराये हुए पर्वतोंके समान जान पड़ते थे। जिन्होंने बड़े-बड़े गजराजोंको मार डाला था, वे श्रेष्ठ रथ घोड़े, सारथि और योद्धाओंसे रहित हो मथे गये सरोवरोंके समान चूर-चूर होकर पृथ्वीपर बिखरे पड़े थे। नाना प्रकारके आयुधों और आभूषणोंसे युक्त पैदल सैनिकोंके समूह भी उस युद्धमें मारे गये थे। इन सबके कारण वहाँकी भूमि अत्यन्त भयानक तथा भीरु पुरुषोंके मनमें भय उत्पन्न करनेवाली हो गयी थी॥ २९-३१॥ तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ चन्द्रार्कसदृशद्युतिम्। तावकानां परा प्रीतिः पाण्डूनां चाभवद् व्यथा॥ ३२॥ चन्द्रमा और सूर्यके समान कान्तिमान् अभिमन्युको पृथ्वीपर पड़ा देख आपके पुत्रोंको बड़ी प्रसन्नता हुई और पाण्डवोंकी अन्तरात्मा व्यथित हो उठी॥ ३२॥ अभिमन्यौ हते राजन् शिशुकेऽप्राप्तयौवने। सम्प्राद्रवच्चमूः सर्वा धर्मराजस्य पश्यतः॥ ३३॥ राजन्! जो अभी युवावस्थाको प्राप्त नहीं हुआ था, उस बालक अभिमन्युके मारे जानेपर धर्मराज युधिष्ठिरके देखते-देखते उनकी सारी सेना भागने लगी॥ ३३॥ दीर्यमाणं बलं दृष्ट्वा सौभद्रे विनिपातिते। अजातशत्रुस्तान् वीरानिदं वचनमब्रवीत्॥ ३४॥ सुभद्रकुमारके धराशायी होनेपर अपनी सेनामें भगदड़ पड़ी देख अजातशत्रु युधिष्ठिरने अपने पक्षके उन वीरोंसे यह वचन कहा—॥ ३४॥ स्वर्गमेष गतः शूरो यो हतो न पराङ्मुखः। संस्तम्भयत मा भैष्ट विजेष्यामो रणे रिपून्॥ ३५॥

'यह शूरवीर अभिमन्यु जो प्राणोंपर खेल गया, परंतु युद्धमें पीठ न दिखा सका, निश्चय ही स्वर्गलोकमें गया है। तुम सब लोग धैर्य धारण करो। भयभीत न होओ। हमलोग रणक्षेत्रमें शत्रुओंको अवश्य जीतेंगे' ॥ ३५ ॥

इत्येवं स महातेजा दुःखितेभ्यो महाद्युतिः ।
धर्मराजो युधां श्रेष्ठो ब्रुवन् दुःखमपानुदत् ॥ ३६ ॥
महातेजस्वी और परम कान्तिमान् योद्धाओंमें श्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरने अपने दुःखी सैनिकोंसे ऐसा कहकर उनके दुःखका निवारण किया ॥ ३६ ॥

युद्धे ह्याशीविषाकारान् राजपुत्रान् रणे रिपून् ।
पूर्वं निहत्य संग्रामे पश्चादार्जुनिरभ्ययात् ॥ ३७ ॥
युद्धमें विषधर सर्पके समान भयंकर शत्रुरूप राजकुमारोंको पहले मारकर पीछेसे अर्जुनकुमार अभिमन्यु स्वर्गलोकमें गया था ॥ ३७ ॥

हत्वा दश सहस्राणि कौसल्यं च महारथम् ।
कृष्णार्जुनसमः कार्ष्णिः शक्रलोकं गतो ध्रुवम् ॥ ३८ ॥
दस हजार रथियों और महारथी कोसलनरेश बृहद्बलको मारकर श्रीकृष्ण और अर्जुनके समान पराक्रमी अभिमन्यु निश्चय ही इन्द्रलोकमें गया है ॥ ३८ ॥

रथाश्वनरमातङ्गान् विनिहत्य सहस्रशः ।
अवितृप्तः स संग्रामादशोच्यः पुण्यकर्मकृत् ।
गतः पुण्यकृतां लोकान् शाश्वतान् पुण्यनिर्जितान् ॥ ३९ ॥
रथ, घोड़े, पैदल और हाथियोंका सहस्रोंकी संख्यामें संहार करके भी वह युद्धसे तृप्त नहीं हुआ था। पुण्यकर्म करनेके कारण अभिमन्यु शोकके योग्य नहीं है। वह पुण्यात्माओंके पुण्योपार्जित सनातन लोकोंमें जा पहुँचा है ॥ ३९ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि अभिमन्युवधे एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें अभिमन्युवधविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४९ ॥

तीसरे (तेरहवें) दिनके युद्धकी समाप्तिपर सेनाका शिविरको प्रस्थान एवं रणभूमिका वर्णन

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पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तीसरे (तेरहवें) दिनके युद्धकी समाप्तिपर सेनाका शिविरको प्रस्थान एवं रणभूमिका वर्णन

संजय उवाच

वयं तु प्रवरं हत्वा तेषां तैः शरपीडिताः ।
निवेशायाभ्युपायामः सायाह्ने रुधिरोक्षिताः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! हमलोग शत्रुओंके उस प्रमुख वीरका वध करके उनके बाणोंसे पीड़ित हो संध्याके समय शिविरमें विश्रामके लिये चले आये। उस समय हमलोगोंके शरीर रक्तसे भीग गये थे ॥ १ ॥

निरीक्षमाणास्तु वयं परे चायोधनं शनैः ।
अपयाता महाराज ग्लानिं प्राप्ता विचेतसः ॥ २ ॥
महाराज! हम और शत्रुपक्षके लोग युद्धस्थलको देखते हुए धीरे-धीरे वहाँसे हट गये। पाण्डवदलके लोग अत्यन्त शोकग्रस्त हो अचेत हो रहे थे ॥ २ ॥

ततो निशाया दिवसस्य चाशिवः
शिवारुतैः संधिरवर्तताद्भुतः ।
कुशेशयापीडनिभे दिवाकरे
विलम्बमानेऽस्तमुपेत्य पर्वतम् ॥ ३ ॥
उस समय जब सूर्य अस्ताचलपर पहुँचकर ढल रहे थे, कमलनिर्मित मुकुटके समान जान पड़ते थे। दिन और रात्रिकी संधिरूप वह अद्भुत संध्या सियारिनोंके भयंकर शब्दोंसे अमंगलमयी प्रतीत हो रही थी ॥ ३ ॥

वरासिशक्त्यृष्टिवरूथचर्मणां
विभूषणानां च समाक्षिपन् प्रभाः ।
दिवं च भूमिं च समानयन्निव
प्रियां तनुं भानुरुपैति पावकम् ॥ ४ ॥
सूर्यदेव श्रेष्ठ तलवार, शक्ति, ऋष्टि, वरूथ, ढाल और आभूषणोंकी प्रभाको छीनते तथा आकाश और पृथ्वीको समान अवस्थामें लाते हुए-से अपने प्रिय शरीर—अग्निमें प्रवेश कर रहे थे ॥ ४ ॥

महाभ्रकूटाचलशृङ्गसंनिभै-
र्गजैरनेकैारिव वज्रपातितैः ।
स वैजयन्त्यङ्कुशवर्मयन्तृभि-

निपातितैर्नष्टगतिश्रिता क्षितिः ॥ ५ ॥
महान् मेघोंके समुदाय तथा पर्वतशिखरोंके समान विशालकाय बहुसंख्यक हाथी इस प्रकार पड़े थे, मानो वज्रसे मार गिराये गये हों। वैजयन्ती पताका, अंकुश, कवच और महावतोंसहित धराशायी किये गये उन गजराजोंकी लाशोंसे सारी धरती पट गयी थी, जिसके कारण वहाँ चलने-फिरनेका मार्ग बंद हो गया था ॥ ५ ॥

हतेश्वरैश्चूर्णितपत्त्युपस्करै-
र्हताश्वसूतैर्विपताककेतुभिः ।
महारथैर्भूः शुशुभे विचूर्णितैः
पुरैरिवामित्रहतैर्नराधिप ॥ ६ ॥
नरेश्वर! शत्रुओंके द्वारा तहस-नहस किये गये विशाल नगरोंके समान बड़े-बड़े रथ चूर-चूर होकर गिरे थे। उनके घोड़े और सारथि मार दिये गये थे तथा ध्वजा-पताकाएँ नष्ट कर दी गयी थीं। इसी प्रकार उनके सवार मरे पड़े थे, पैदल सैनिक तथा युद्धसम्बन्धी अन्य उपकरण चूर-चूर हो गये थे। इन सबके द्वारा उस रणभूमिकी अद्भुत शोभा हो रही थी ॥ ६ ॥

रथाश्ववृन्दैः सह सादिभिर्हतैः
प्रविद्धभाण्डाभरणैः पृथग्विधैः ।
निरस्तजिह्वादशनान्त्रलोचनै-
र्धरा बभौ घोरविरूपदर्शना ॥ ७ ॥
रथों और अश्वोंके समूह सवारोंके साथ नष्ट हो गये थे। भिन्न-भिन्न प्रकारके भाण्ड और आभूषण छिन्न-भिन्न होकर पड़े थे। मनुष्यों और पशुओंकी जिह्वा, दाँत, आँत और आँखें बाहर निकल आयी थीं। इन सबसे वहाँकी भूमि अत्यन्त घोर और विकराल दिखायी देती थी ॥ ७ ॥

प्रविद्धवर्माभरणाम्बरायुधा
विपन्नहस्त्यश्वरथानुगा नराः ।
महार्हशय्यास्तरणोचितास्तदा
क्षितावनाथा इव शेरते हताः ॥ ८ ॥
योद्धाओंके कवच, आभूषण, वस्त्र और आयुध छिन्न-भिन्न हो गये। हाथी, घोड़े तथा रथोंका अनुसरण करनेवाले पैदल मनुष्य अपने प्राण खोकर पड़े थे। जो राजा और राजकुमार बहुमूल्य शय्याओं तथा बिछौनोंपर शयन करनेके योग्य थे, वे ही उस समय मारे जाकर अनाथकी भाँति पृथ्वीपर पड़े थे ॥ ८ ॥

अतीव हृष्टाः श्वशृगालवायसा
बकाः सुपर्णाश्च वृकास्तरक्षवः ।
वयांस्थ्यसृक्पान्यथ रक्षसां गणाः