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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages

राजाके सेवक, सचिव तथा सेनापति आदि और राजाके उत्तम गुणोंका वर्णन एवं उनसे लाभ

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अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः

राजाके सेवक, सचिव तथा सेनापति आदि और राजाके उत्तम गुणोंका वर्णन एवं उनसे लाभ

भीष्म उवाच

स श्वा प्रकृतिमापन्नः परं दैन्यमुपागतः ।
ऋषिणा हुङ्कृतः पापस्तपोवनबहिष्कृतः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार अपनी योनिमें आकर वह कुत्ता अत्यन्त दीनदशाको पहुँच गया। ऋषिने हुंकार करके उस पापीको तपोवनसे बाहर निकाल दिया ॥ १ ॥

एवं राज्ञा मतिमता विदित्वा सत्यशौचताम् ।
आर्जवं प्रकृतिं सत्यं श्रुतं वृत्तं कुलं दमम् ॥ २ ॥
अनुक्रोशं बलं वीर्यं प्रभावं प्रश्रयं क्षमाम् ।
भृत्या ये यत्र योग्याः स्युस्तत्र स्थाप्याः सुरक्षिताः ॥ ३ ॥
इसी प्रकार बुद्धिमान् राजाको चाहिये कि वह पहले अपने सेवकोंकी सच्चाई, शुद्धता, सरलता, स्वभाव, शास्त्रज्ञान, सदाचार, कुलीनता, जितेन्द्रियता, दया, बल, पराक्रम, प्रभाव, विनय तथा क्षमा आदिका पता लगाकर जो सेवक जिस कार्यके योग्य जान पड़ें, उन्हें उसीमें लगावे और उनकी रक्षाका पूरा-पूरा प्रबन्ध कर दे ॥ २-३ ॥

नापरीक्ष्य महीपालः सचिवं कर्तुमर्हति ।
अकुलीननराकीर्णो न राजा सुखमेधते ॥ ४ ॥
राजा परीक्षा लिये बिना किसीको भी अपना मन्त्री न बनावे; क्योंकि नीच कुलके मनुष्यका साथ पाकर राजाको न तो सुख मिलता है और न उसकी उन्नति ही होती है ॥ ४ ॥

कुलजः प्राकृतो राज्ञा स्वकुलीनतया सदा ।
न पापे कुरुते बुद्धिं भिद्यमानोऽप्यनागसि ॥ ५ ॥
कुलीन पुरुष यदि कभी राजाके द्वारा बिना अपराधके ही तिरस्कृत हो जाय और लोग उसे फोड़ें या उभाड़ें तो भी वह अपनी कुलीनताके कारण राजाका अनिष्ट करनेकी बात कभी मनमें नहीं लाता है ॥ ५ ॥

अकुलीनस्तु पुरुषः प्राकृतः साधुसंश्रयात् ।
दुर्लभैश्वर्यतां प्राप्तो निन्दितः शत्रुतां व्रजेत् ॥ ६ ॥
किंतु नीच कुलका मनुष्य साधुस्वभावके राजाका आश्रय पाकर यद्यपि दुर्लभ ऐश्वर्यका भोग करता है तथापि यदि राजाने एक बार भी उसकी निन्दा कर दी तो वह उसका शत्रु बन

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जाता है ।। ६ ।। कुलीनं शिक्षितं प्राज्ञं ज्ञानविज्ञानपारगम् । सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञं सहिष्णुं देशजं तथा ॥ ७ ॥ कृतज्ञं बलवन्तं च क्षान्तं दान्तं जितेन्द्रियम् । अलुब्धं लब्धसंतुष्टं स्वामिमित्रबुभूषकम् ॥ ८ ॥ सचिवं देशकालज्ञं सत्त्वसंग्रहणे रतम् । सततं युक्तमनसं हितैषिणमतन्द्रितम् ॥ ९ ॥ युक्तचारं स्वविषये संधिविग्रहकोविदम् । राज्ञस्त्रिवर्गवेत्तारं पौरजानपदप्रियम् ॥ १० ॥ खातकव्यूहतत्त्वज्ञं बलहर्षणकोविदम् । इङ्गिताकारतत्त्वज्ञं यात्राज्ञानविशारदम् ॥ ११ ॥ हस्तिशिक्षासु तत्त्वज्ञमहंकारविवर्जितम् । प्रगल्भं दक्षिणं दान्तं बलिनं युक्तकारिणम् ॥ १२ ॥ चौक्षं चौक्षजनाकीर्णं सुमुखं सुखदर्शनम् । नायकं नीतिकुशलं गुणचेष्टासमन्वितम् ॥ १३ ॥ अस्तब्धं प्रश्रितं श्लक्ष्णं मृदुवादिनमेव च । धीरं शूरं महर्द्धिं च देशकालोपपादकम् ॥ १४ ॥

अतः राजा उसीको मन्त्री बनावे, जो कुलीन, सुशिक्षित, विद्वान्, ज्ञान-विज्ञानमें पारंगत, सब शास्त्रोंका तत्त्व जाननेवाला, सहनशील, अपने देशका निवासी, कृतज्ञ, बलवान्, क्षमाशील, मनका दमन करनेवाला, जितेन्द्रिय, निर्लोभ, जो मिल जाय उसीसे संतोष करनेवाला, स्वामी और उसके मित्रकी उन्नति चाहनेवाला, देश-कालका ज्ञाता, आवश्यक वस्तुओंके संग्रहमें तत्पर, सदा मनको वशमें रखनेवाला, स्वामीका हितैषी, आलस्य-रहित, अपने राज्यमें गुप्तचर लगाये रखनेवाला, संधि और विग्रहके अवसरको समझनेमें कुशल, राजाके धर्म, अर्थ और कामकी उन्नतिका उपाय जाननेवाला, नगर और ग्रामवासी लोगोंका प्रिय, खाईं और सुरंग खुदवाने तथा व्यूह निर्माण करानेकी कलामें कुशल, अपनी सेनाका उत्साह बढ़ानेमें प्रवीण, शक्ल-सूरत और चेष्टा देखकर ही मनके यथार्थ भावको समझ लेनेवाला, शत्रुओंपर चढ़ाई करनेके अवसरको समझनेमें विशेष चतुर, हाथीकी शिक्षाके यथार्थ तत्त्वको जाननेवाला, अहंकाररहित, निर्भीक, उदार, संयमी, बलवान्, उचित कार्य करनेवाला, शुद्ध, शुद्ध पुरुषोंसे युक्त, प्रसन्नमुख, प्रियदर्शन, नेता, नीतिकुशल, श्रेष्ठ गुण और उत्तम चेष्टाओंसे सम्पन्न उद्धण्डतारहित, विनयशील, स्नेही, मृदुभाषी, धीर, शूरवीर, महान् ऐश्वर्यसे सम्पन्न तथा देश और कालके अनुसार कार्य करनेवाला हो ॥ ७—१४ ॥

सचिवं यः प्रकुरुते न चैनमवमन्यते ।

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तस्य विस्तीर्यते राज्यं ज्योत्स्ना ग्रहपतेरिव ॥ १५ ॥
जो राजा ऐसे योग्य पुरुषको सचिव (मन्त्री) बनाता है और उसका कभी अनादर नहीं करता है, उसका राज्य चन्द्रमाकी चाँदनीके समान चारों ओर फैल जाता है ॥ १५ ॥
एतैरेव गुणैर्युक्तो राजा शास्त्रविशारदः ।
एष्टव्यो धर्मपरमः प्रजापालनतत्परः ॥ १६ ॥
राजाको भी ऐसे ही गुणोंसे युक्त होना चाहिये। साथ ही उसमें शास्त्रज्ञान, धर्मपरायणता तथा प्रजापालनकी लगन भी होनी चाहिये; ऐसा ही राजा प्रजाजनोंके लिये वांछनीय होता है ॥ १६ ॥
धीरो मर्षी शुचिस्तीक्ष्णः काले पुरुषकारवित् ।
शुश्रूषुः श्रुतवान् श्रोता ऊहापोहविशारदः ॥ १७ ॥
राजा धीर, क्षमाशील, पवित्र, समय-समयपर तीक्ष्ण, पुरुषार्थको जाननेवाला, सुननेके लिये उत्सुक, वेदज्ञ, श्रवणपरायण तथा तर्क-वितर्कमें कुशल हो ॥ १७ ॥
मेधावी धारणायुक्तो यथान्यायोपपादकः ।
दान्तः सदा प्रियाभाषी क्षमावांश्च विपर्यये ॥ १८ ॥
मेधावी, धारणाशक्तिसे सम्पन्न, यथोचित कार्य करनेवाला, इन्द्रियसंयमी, प्रिय वचन बोलनेवाला, तथा शत्रुको भी क्षमा प्रदान करनेवाला हो ॥ १८ ॥
दानाच्छेदे स्वयंकारी श्रद्धालुः सुखदर्शनः ।
आर्तहस्तप्रदो नित्यमाप्तामात्यो नये रतः ॥ १९ ॥
राजाको दानकी परम्पराका कभी उच्छेद न करनेवाला, श्रद्धालु, दर्शनमात्रसे सुख देनेवाला, दीन-दुःखियोंको सदा हाथका सहारा देनेवाला, विश्वसनीय मन्त्रियोंसे युक्त तथा नीतिपरायण होना चाहिये ॥ १९ ॥
नाहंवादी न निर्द्वन्द्वो न यत्किंचनकारकः ।
कृते कर्मण्यमात्यानां कर्ता भृत्यजनप्रियः ॥ २० ॥
वह अहंकार छोड़ दे, द्वन्द्वोंसे प्रभावित न हो, जो ही मनमें आवे वही न करने लगे, मन्त्रियोंके किये हुए कर्मका अनुमोदन करे और सेवकोंपर प्रेम रखे ॥ २० ॥
संगृहीतजनोऽस्तब्धः प्रसन्नवदनः सदा ।
सदा भृत्यजनापेक्षी न क्रोधी सुमहामनाः ॥ २१ ॥
अच्छे मनुष्योंका संग्रह करे, जडताको त्याग दे, सदा प्रसन्नमुख रहे, सेवकोंका सदा ख्याल रखे, किसीपर क्रोध न करे, अपना हृदय विशाल बनाये रखे ॥ २१ ॥
युक्तदण्डो न निर्दण्डो धर्मकार्यानुशासनः ।
चारनेत्रः प्रजावेक्षी धर्मार्थकुशलः सदा ॥ २२ ॥
न्यायोचित दण्ड दे, दण्डका कभी त्याग न करे, धर्मकार्यका उपदेश दे, गुप्तचररूपी नेत्रोंद्वारा राज्यकी देखभाल करे, प्रजापर कृपादृष्टि रखे तथा सदा ही धर्म और अर्थके

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उपार्जनमें कुशलतापूर्वक लगा रहे ॥ २२ ॥ राजा गुणशताकीर्ण एष्टव्यस्तादृशो भवेत् । योधाश्चैव मनुष्येन्द्र सर्वे गुणगणैर्वृताः ॥ २३ ॥ अन्वेष्टव्याः सुपुरुषाः सहाया राज्यधारणे । न विमानयितव्यास्ते राज्ञा वृद्धिमभीप्सता ॥ २४ ॥ ऐसे सैकड़ों गुणोंसे सम्पन्न राजा ही प्रजाके लिये वांछनीय होता है। नरेन्द्र! राज्यकी रक्षामें सहायता देनेवाले समस्त सैनिक भी इसी प्रकार श्रेष्ठ गुण-समूहोंसे सम्पन्न होने चाहिये, इस कार्यके लिये अच्छे पुरुषोंकी ही खोज करनी चाहिये तथा अपनी उन्नतिकी इच्छा रखनेवाले राजाको कभी अपने सैनिकोंका अपमान नहीं करना चाहिये ॥ २३-२४ ॥ योधाः समरशौटीराः कृतज्ञाः शस्त्रकोविदाः । धर्मशास्त्रसमायुक्ताः पदातिजनसंवृताः ॥ २५ ॥ अभया गजपृष्ठस्था रथचर्याविशारदाः । इष्वस्त्रकुशला यस्य तस्येयं नृपतेर्मही ॥ २६ ॥ जिसके योद्धा युद्धमें वीरता दिखानेवाले, कृतज्ञ, शस्त्र चलानेकी कलामें कुशल, धर्मशास्त्रके ज्ञानसे सम्पन्न, पैदल सैनिकोंसे घिरे हुए, निर्भय, हाथीकी पीठपर बैठकर युद्ध करनेमें समर्थ, रथचर्यामें निपुण तथा धनुर्विद्यामें प्रवीण होते हैं, उसी राजाके अधीन इस भूमण्डलका राज्य होता है ॥ २५-२६ ॥ (ज्ञातीनामनवज्ञानं भृत्येष्वशठता सदा । नैपुण्यं चार्थचर्यासु यस्यैते तस्य सा मही ॥ जो जातिभाइयोंका अपमान तथा सेवकोंके प्रति शठता कभी नहीं करता और कार्यसाधनमें कुशल है, उसी राजाके अधिकारमें यह पृथ्वी रहती है ॥ आलस्यं चैव निद्रा च व्यसनान्यतिहास्यता । यस्यैतानि न विद्यन्ते तस्यैव सुचिरं मही ॥ जिस राजामें आलस्य, निद्रा, दुर्व्यसन तथा अत्यन्त हास्यप्रियता—ये दुर्गुण नहीं हैं, उसीके अधिकारमें यह पृथ्वी दीर्घकालतक रहती है ॥ वृद्धसेवी महोत्साहो वर्णानां चैव रक्षिता । धर्मचर्याः सदा यस्य तस्येयं सुचिरं मही ॥ जो बड़े-बूढ़ोंको सेवा करनेवाला, महान् उत्साही, चारों वर्णोंका रक्षक तथा सदा धर्माचरणमें तत्पर रहता है, उसीके पास यह पृथ्वी चिरकालतक स्थिर रहती है ॥ नीतिमार्गानुसरणं नित्यमुत्थानमेव च । रिपूणामनवज्ञानं तस्येयं सुचिरं मही ॥ जो राजा नीतिमार्गका अनुसरण करता, सदा ही उद्योगमें तत्पर रहता और शत्रुओंकी अवहेलना नहीं करता, उसके अधिकारमें दीर्घकालतक इस पृथ्वीका राज्य बना रहता है ॥

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उत्थानं चैव दैवं च तयोर्नानात्वमेव च ।
मनुना वर्णितं पूर्वं वक्ष्ये शृणु तदेव हि ॥
पूर्वकालमें मनुजीने पुरुषार्थ, दैव तथा उन दोनोंके अनेक भेदोंका वर्णन किया था। वह बताता हूँ, सुनो ॥
उत्थानं हि नरेन्द्राणां बृहस्पतिरभाषत ।
नयानयविधानज्ञः सदा भव कुरूद्वह ॥
कुरुश्रेष्ठ! बृहस्पतिजीने नरेशोंके लिये सदा ही उद्योगशील बने रहनेका उपदेश दिया है। तुम सदा नीति और अनीतिके विधानको जानो ॥
दुर्हृदां छिद्रदर्शी यः सुहृदामुपकारवान् ।
विशेषविच्च भृत्यानां स राज्यफलमश्नुते ॥)
जो शत्रुओंके छिद्र देखे, सुहृदोंका उपकार करे और सेवकोंकी विशेषताको समझे, वह राज्यके फलका भागी होता है ॥
सर्वसंग्रहणे युक्तो नृपो भवति यः सदा ।
उत्थानशीलो मित्राढ्यः स राजा राजसत्तमः ॥ २७ ॥
जो राजा सदा सबके संग्रहमें संलग्न, उद्योगशील और मित्रोंसे सम्पन्न होता है, वही सब राजाओंमें श्रेष्ठ है ॥
शक्या चाश्वसहस्रेण वीरारोहेण भारत ।
संगृहीतमनुष्येण कृत्स्ना जेतुं वसुन्धरा ॥ २८ ॥
भारत! जो उपर्युक्त मनुष्योंका संग्रह करता है, वह केवल एक सहस्र अश्वारोही वीरोंके द्वारा सारी पृथ्वीको जीत सकता है ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि श्वर्षिसंवादे
अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कुत्ता और ऋषिका संवादविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ श्लोक मिलाकर कुल ३५ श्लोक हैं।)

११९-

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एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

सेवकोंको उनके योग्य स्थानपर नियुक्त करने, कुलीन और सत्पुरुषोंका संग्रह करने, कोष बढ़ाने तथा सबकी देखभाल करनेके लिये राजाको प्रेरणा

भीष्म उवाच

एवं गुणयुतान् भृत्यान् स्वे स्वे स्थाने नराधिपः । नियोजयति कृत्येषु स राज्यफलमश्नुते ॥ १ ॥ भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इस प्रकार जो राजा गुणवान् भृत्योंको अपने-अपने स्थानपर रखते हुए कार्योंमें लगाता है, वह राज्यके यथार्थ फलका भागी होता है ॥ १ ॥

न श्वा स्वं स्थानमुत्क्रम्य प्रमाणमभिसत्कृतः । आरोप्यः श्वा स्वकात्स्थानादुत्क्रम्यान्यत् प्रमाद्यति ॥ २ ॥ पहले कहे हुए इतिहाससे यह सिद्ध होता है कि कुत्ता अपने स्थानको छोड़कर ऊँचे चढ़ जाय तो न वह विश्वासके योग्य रह जाता है और न कभी उसका सत्कार ही होता है। कुत्तेको उसकी जगहसे उठाकर ऊँचे कदापि न बिठावे; क्योंकि वह दूसरे किसी ऊँचे स्थानपर चढ़कर प्रमाद करने लगता है (इसी प्रकार किसी हीन कुलके मनुष्यको उसकी योग्यता और मर्यादासे ऊँचा स्थान मिल जाय तो वह अहंकारवश उच्छृंखल हो जाता है) ॥ २ ॥

स्वजातिगुणसम्पन्नाः स्वेषु कर्मसु संस्थिताः । प्रकर्तव्या ह्यमात्यास्तु नास्थाने प्रक्रिया क्षमा ॥ ३ ॥ जो अपनी जातिके गुणसे सम्पन्न हो अपने वर्णोचित कर्मोंमें ही लगे रहते हों, उन्हें मन्त्री बनाना चाहिये; किंतु किसीको भी उसकी योग्यतासे बाहरके कार्यमें नियुक्त करना उचित नहीं है ॥ ३ ॥

अनुरूपाणि कर्माणि भृत्येभ्यो यः प्रयच्छति । स भृत्यगुणसम्पन्नो राजा फलमुपाश्नुते ॥ ४ ॥ जो राजा अपने सेवकोंको उनकी योग्यताके अनुरूप कार्य सौंपता है, वह भृत्यके गुणोंसे सम्पन्न हो उत्तम फलका भागी होता है ॥ ४ ॥

शरभः शरभस्थाने सिंहः सिंह इवोर्जितः । व्याघ्रो व्याघ्र इव स्थाप्यो द्वीपी द्वीपी यथा तथा ॥ ५ ॥ शरभको शरभकी जगह, बलवान् सिंहको सिंहके स्थानमें, बाघको बाघकी जगह तथा चीतेको चीतेके स्थानपर नियुक्त करना चाहिये (तात्पर्य यह कि चारों वर्णोंके लोगोंको

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उनकी मर्यादाके अनुसार कार्य देना उचित है) ॥ ५ ॥ कर्मस्विहानुरूपेषु न्यस्या भृत्या यथाविधि ।
प्रतिलोमं न भृत्यास्ते स्थाप्याः कर्मफलैषिणा ॥ ६ ॥
सब सेवकोंको उनके योग्य कार्यमें ही लगाना चाहिये। कर्मफलकी इच्छा करनेवाले राजाको चाहिये कि वह अपने सेवकोंको ऐसे कार्योंमें न नियुक्त करे, जो उनकी योग्यता और मर्यादाके प्रतिकूल पड़ते हों ॥ ६ ॥
यः प्रमाणमतिक्रम्य प्रतिलोमं नराधिपः ।
भृत्यान् स्थापयतेऽबुद्धिर्न स रञ्जयते प्रजाः ॥ ७ ॥
जो बुद्धिहीन नरेश मर्यादाका उल्लंघन करके अपने भृत्योंको प्रतिकूल कार्योंमें लगाता है, वह प्रजाको प्रसन्न नहीं रख सकता ॥ ७ ॥
न बालिशा न च क्षुद्रा नाप्राज्ञा नाजितेन्द्रियाः ।
नाकुलीना नराः सर्वे स्थाप्या गुणगणैषिणा ॥ ८ ॥
उत्तम गुणोंकी इच्छा रखनेवाले नरेशको चाहिये कि वह उन सभी मनुष्योंको काममें न लगावे, जो मूर्ख, नीच, बुद्धिहीन, अजितेन्द्रिय और निन्दित कुलमें उत्पन्न हुए हों ॥ ८ ॥
साधवः कुलजाः शूरा ज्ञानवन्तोऽनसूयकाः ।
अक्षद्राः शुचयो दक्षाःस्युर्नराः पारिपार्श्वकाः ॥ ९ ॥
साधु, कुलीन, शूरवीर, ज्ञानवान्, अदोषदर्शी, अच्छे स्वभाववाले, पवित्र और कार्यदक्ष मनुष्योंको ही राजा अपना पार्श्ववर्ती सेवक बनावे ॥ ९ ॥
न्यग्भूतास्तत्पराः शान्ताश्चौक्षाः प्रकृतिजैः शुभाः ।
स्वस्थानानपकृष्टा ये ते स्यू राज्ञां बहिश्चराः ॥ १० ॥
जो विनीत, कार्यपरायण, शान्तस्वभाव, चतुर, स्वाभाविक शुभ गुणोंसे सम्पन्न तथा अपने-अपने पदपर निन्दासे रहित हों, वे ही राजाओंके बाह्य सेवक होने योग्य हैं ॥ १० ॥
सिंहस्य सततं पार्श्वे सिंह एवानुगो भवेत् ।
असिंहः सिंहसहितः सिंहवल्लभते फलम् ॥ ११ ॥
सिंहके पास सदा सिंह ही सेवक रहे। यदि सिंहके साथ सिंहसे भिन्न प्राणी रहने लगता है तो वह सिंहके तुल्य ही फल भोगने लगता है ॥ ११ ॥
यस्तु सिंहः श्वभिः कीर्णः सिंहकर्मफले रतः ।
न स सिंहफलं भोक्तुं शक्तः श्वभिरुपासितः ॥ १२ ॥
किंतु जो सिंह कुत्तोंसे घिरा रहकर सिंहोचित कर्म एवं फलमें अनुरक्त रहता है, वह कुत्तोंसे उपासित होनेके कारण सिंहोचित कर्मफलका उपभोग नहीं कर सकता ॥ १२ ॥
एवमेतन्मनुष्येन्द्र शूरैः प्राज्ञैर्बहुश्रुतैः ।
कुलीनैः सह शक्येत कृत्स्ना जेतुं वसुन्धरा ॥ १३ ॥

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नरेन्द्र! इसी प्रकार शूरवीर, विद्वान्, बहुश्रुत और कुलीन पुरुषोंके साथ रहकर ही सारी पृथ्वीपर विजय पायी जा सकती है ॥ १३ ॥
नाविद्यो नानृजुः पार्श्वे नाप्राज्ञो नामहाधनः ।
संग्राह्यो वसुधापालैर्भृत्यो भृत्यवतां वर ॥ १४ ॥
भृत्यवानोंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! भूपालोंको चाहिये कि अपने पास ऐसे किसी भृत्यका संग्रह न करें, जो विद्याहीन, सरलतासे रहित, मूर्ख और दरिद्र हो ॥ १४ ॥
बाणवद्विसृता यान्ति स्वामिकार्यपरा नराः ।
ये भृत्याः पार्थिवहितास्तेषां सान्त्वं प्रयोजयेत् ॥ १५ ॥
जो मनुष्य स्वामीके कार्यमें तत्पर रहनेवाले हैं, वे धनुषसे छूटे हुए बाणके समान लक्ष्यसिद्धिके लिये आगे बढ़ते हैं। जो सेवक राजाके हित-साधनमें संलग्न रहते हों, राजा मधुर वचन बोलकर उन्हें प्रोत्साहन देता रहे ॥ १५ ॥
कोशश्च सततं रक्ष्यो यत्नमास्थाय राजभिः ।
कोशमूला हि राजानः कोशो वृद्धिकरो भवेत् ॥ १६ ॥
राजाओंको पूरा प्रयत्न करके निरन्तर अपने कोशकी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि कोष ही उनकी जड़ है, कोष ही उन्हें आगे बढ़ानेवाला होता है ॥ १६ ॥
कोष्ठागारं च ते नित्यं स्फीतैर्धान्यैःसुसंवृतम् ।
सदास्तु सत्सु संन्यस्तं धनधान्यपरो भव ॥ १७ ॥
युधिष्ठिर! तुम्हारा अन्न-भण्डार सदा पुष्टिकारक अनाजोंसे भरा रहना चाहिये और उसकी रक्षाका भार श्रेष्ठ पुरुषोंको सौंप देना चाहिये। तुम सदा धन-धान्यकी वृद्धि करनेवाले बनो ॥ १७ ॥
नित्ययुक्ताश्च ते भृत्या भवन्तु रणकोविदाः ।
वाजिनां च प्रयोगेषु वैशारद्यमिहेष्यते ॥ १८ ॥
तुम्हारे सभी सेवक सदा उद्योगशील तथा युद्धकी कलामें कुशल हों। घोड़ोंकी सवारी करने अथवा उन्हें हाँकनेमें भी उनको विशेष चतुर होना चाहिये ॥ १८ ॥
ज्ञातिबन्धुजनावेक्षी मित्रसम्बन्धिसंवृतः ।
पौरकार्यहितान्वेषी भव कौरवनन्दन ॥ १९ ॥
कौरवनन्दन! तुम जातिभाइयोंपर ख्याल रखो, मित्रों और सम्बन्धियोंसे घिरे रहो तथा पुरवासियोंके कार्य और हितकी सिद्धिका उपाय ढूँढ़ा करो ॥ १९ ॥
एषा ते नैष्ठिकी बुद्धिः प्रजास्वभिहिता मया ।
शुनो निदर्शनं तात किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ २० ॥
तात! यह मैंने तुम्हारे निकट प्रजापालन-विषयक स्थिर बुद्धिका प्रतिपादन किया है और कुत्तेका दृष्टान्त सामने रखा है, अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ २० ॥

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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि श्वर्षिसंवादे एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कुत्ता और ऋषिका संवादविषयक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११९ ॥

राजधर्मका साररूपमें वर्णन

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विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

राजधर्मका साररूपमें वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

राजवृत्तान्यनेकानि त्वया प्रोक्तानि भारत ।
पूर्वैः पूर्वनियुक्तानि राजधर्मार्थवेदिभिः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**भारत! राजधर्मके तत्त्वको जाननेवाले पूर्ववर्ती राजाओंने पूर्वकालमें जिनका अनुष्ठान किया है, उन अनेक प्रकारके राजोचित बर्तावोंका आपने वर्णन किया ॥ १ ॥

तदेव विस्तरेणोक्तं पूर्वदृष्टं सतां मतम् ।
प्रणेयं राजधर्माणां प्रब्रूहि भरतर्षभ ॥ २ ॥
भरतश्रेष्ठ! आपने पूर्वपुरुषोंद्वारा आचरित तथा सज्जनसम्मत जिन श्रेष्ठ राजधर्मोंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है, उन्हींको इस प्रकार संक्षिप्त करके बताइये, जिससे उनका विशेषरूपसे पालन हो सके ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

रक्षणं सर्वभूतानामिति क्षात्रं परं मतम् ।
तद् यथा रक्षणं कुर्यात् तथा शृणु महीपते ॥ ३ ॥
**भीष्मजी बोले—**भूपाल! क्षत्रियके लिये सबसे श्रेष्ठ धर्म माना गया है समस्त प्राणियोंकी रक्षा करना; परंतु यह रक्षाका कार्य कैसे किया जाय, उसको बता रहा हूँ, सुनो ॥ ३ ॥

यथा बर्हाणि चित्राणि बिभर्ति भुजगाशनः ।
तथा बहुविधं राजा रूपं कुर्वीत धर्मवित् ॥ ४ ॥
जैसे साँप खानेवाला मोर विचित्र पंख धारण करता है, उसी प्रकार धर्मज्ञ राजाको समय-समयपर अपना अनेक प्रकारका रूप प्रकट करना चाहिये ॥ ४ ॥

तैक्ष्ण्यं जिह्मत्वमादाल्भ्यं सत्यमार्जवमेव च ।
मध्यस्थः सत्त्वमातिष्ठंस्तथा वै सुखमृच्छति ॥ ५ ॥
राजा मध्यस्थ-भावसे रहकर तीक्ष्णता, कुटिल नीति, अभय-दान, सत्य, सरलता तथा श्रेष्ठभावका अवलम्बन करे। ऐसा करनेसे ही वह सुखका भागी होता है ॥ ५ ॥

यस्मिन्नर्थे हितं यत् स्यात् तद्वर्णं रूपमादिशेत् ।
बहुरूपस्य राज्ञो हि सूक्ष्मोऽप्यर्थो न सीदति ॥ ६ ॥

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जिस कार्यके लिये जो हितकर हो, उसमें वैसा ही रूप प्रकट करे (उदाहरणके लिये अपराधीको दण्ड देते समय उग्र रूप और दीनोंपर अनुग्रह करते समय शान्त एवं दयालु रूप प्रकट करे)। इस प्रकार अनेक रूप धारण करनेवाले राजाका छोटा-सा कार्य भी बिगड़ने नहीं पाता है ॥ ६ ॥

नित्यं रक्षितमन्त्रः स्याद् यथा मूकः शरच्छिखी ।
श्लक्ष्णाक्षरतनुः श्रीमान् भवेच्छास्त्रविशारदः ॥ ७ ॥
जैसे शरद्-ऋतुका मोर बोलता नहीं, उसी प्रकार राजाको भी मौन रहकर सदा राजकीय गुप्त विचारोंको सुरक्षित रखना चाहिये। वह मधुर वचन बोले, सौम्य-स्वरूपसे रहे, शोभासम्पन्न होवे और शास्त्रोंका विशेष ज्ञान प्राप्त करे ॥ ७ ॥

आपद्द्वारेषु युक्तः स्याज्जलप्रस्रवणेष्विव ।
शैलवर्षोदकानीव द्विजान् सिद्धान् समाश्रयेत् ।
अर्थकामः शिखां राजा कुर्याद्धर्मध्वजोपमाम् ॥ ८ ॥
बाढ़के समय जिस ओरसे जल बहकर गाँवोंको डुबा देनेका संकट उपस्थित कर दे, उस स्थानपर जैसे लोग मजबूत बाँध बाँध देते हैं, उसी प्रकार जिन द्वारोंसे संकट आनेकी सम्भावना हो, उन्हें सुदृढ़ बनाने और बंद करनेके लिये राजाको सतत सावधान रहना चाहिये। जैसे पर्वतोंपर वर्षा होनेसे जो पानी एकत्र होकर नदी या तालाबके रूपमें रहता है, उसका उपयोग करनेके लिये लोग उसका आश्रय लेते हैं, उसी प्रकार राजाको सिद्ध ब्राह्मणोंका आश्रय लेना चाहिये तथा जिस प्रकार धर्मका ढोंगी सिरपर जटा धारण करता है, उसी तरह राजाको भी अपना स्वार्थ सिद्ध करनेकी इच्छासे उच्च लक्षणोंको धारण करना चाहिये ॥ ८ ॥

नित्यमुद्यतदण्डः स्यादाचरेदप्रमादतः ।
लोके चायव्ययौ दृष्ट्वा बृहद्वृक्षमिकास्रवत् ॥ ९ ॥
वह सदा अपराधियोंको दण्ड देनेके लिये उद्यत रहे, प्रत्येक कार्य सावधानीके साथ करे, लोगोंके आय-व्यय देखकर ताड़के वृक्षसे रस निकालनेकी भाँति उनसे धनरूपी रस ले (अर्थात् जैसे उस रसके लिये पेड़को काट नहीं दिया जाता, उसी प्रकार प्रजाका उच्छेद न करे) ॥ ९ ॥

मृजावान् स्यात् स्वयूथ्येषु भौमानि चरणैः क्षिपेत् ।
जातपक्षः परिस्पन्देत् प्रेक्षेद् वैकल्यमात्मनः ॥ १० ॥
राजा अपने दलके लोगोंके प्रति विशुद्ध व्यवहार करे। शत्रुके राज्यमें जो खेतीकी फसल हो, उसे अपने दलके घोड़ों और बैलोंके पैरोंसे कुचलवा दे। अपना पक्ष बलवान् होनेपर ही शत्रुओंपर आक्रमण करे और अपनेमें कहाँ कैसी दुर्बलता है, इसका भलीभाँति निरीक्षण करता रहे ॥ १० ॥

दोषान् विवृणुयाच्छत्रोः परपक्षान् विधूनयेत् ।

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काननेष्विव पुष्पाणि बहिरर्थान् समाचरन् ॥ ११ ॥ शत्रुके दोषोंको प्रकाशित करे और उसके पक्षके लोगोंको अपने पक्षमें आनेके लिये विचलित कर दे। जैसे लोग जंगलसे फूल चुनते हैं, उसी प्रकार राजा बाहरसे धनका संग्रह करे ॥ ११ ॥

उच्छ्रितान् नाशयेत् स्फीतान् नरेन्द्रानचलोपमान् । श्रयेच्छायामविज्ञातां गुप्तं रणमुपाश्रयेत् ॥ १२ ॥ पर्वतके समान ऊँचा सिर करके अविचलभावसे बैठे हुए धनी नरेशोंको नष्ट करे। उनको जताये बिना ही उनकी छायाका आश्रय ले अर्थात् उनके सरदारोंसे मिलकर उनमें फूट डाल दे और गुप्तरूपसे अवसर देखकर उनके साथ युद्ध छेड़ दे ॥ १२ ॥

प्रावृषीवासितग्रीवो मज्जेत निशि निर्जने । मायूरेण गुणेनैव स्त्रीभिश्चालक्षितश्चरेत् ॥ १३ ॥ जैसे मोर आधी रातके समय एकान्त स्थानमें छिपा रहता है, उसी प्रकार राजा वर्षाकालमें शत्रुओंपर चढ़ाई न करके अदृश्यभावसे ही महलमें रहे। मोरके ही गुणको अपनाकर स्त्रियोंसे अलक्षित रहकर विचरे ॥ १३ ॥

न जह्याच्च तनुत्राणं रक्षेदात्मानमात्मना । चारभूमिष्वभिगतान् पाशांश्च परिवर्जयेत् ॥ १४ ॥ अपने कवचको कभी न उतारे। स्वयं ही शरीरकी रक्षा करे। घूमने-फिरनेके स्थानोंपर शत्रुओंद्वारा जो जाल बिछाये गये हों, उनका निवारण करे ॥ १४ ॥

प्रणयेद् वापि तां भूमिं प्रणश्येद् गहने पुनः । हन्यात्क्रुद्धानतिविषास्तान् जिह्मगतयोऽहितान् ॥ १५ ॥ राजा सुयोग समझे तो जहाँ शत्रुओंका जाल बिछा हो, वहाँ भी अपने-आपको ले जाय। यदि संकटकी सम्भावना हो तो गहन वनमें छिप जाय तथा जो कुटिल चाल चलनेवाले हों, उन क्रोधमें भरे हुए शत्रुओंको अत्यन्त विषैले सर्पोंके समान समझकर मार डाले ॥ १५ ॥

नाशयेद् बलबर्हाणि संनिवासान् निवासयेत् । सदा बर्हिनिभः कामं प्रशस्तं कृतमाचरेत् । सर्वतश्चाददेत् प्रज्ञां पतंगं गहनेष्विव ॥ १६ ॥ शत्रुकी सेनाकी पाँख काट डाले—उसे दुर्बल कर दे, श्रेष्ठ पुरुषोंको अपने निकट बसावे। मोरके समान स्वेच्छानुसार उत्तम कार्य करे—जैसे मोर अपने पंख फैलाता है, उसी प्रकार अपने पक्ष (सेना और सहायकों) का विस्तार करे। सबसे बुद्धि—सद्विचार ग्रहण करे और जैसे टिड्डियोंका दल जंगलमें जहाँ गिरता है, वहाँ वृक्षोंपर पत्तेतक नहीं छोड़ता, उसी प्रकार शत्रुओंपर आक्रमण करके उनका सर्वस्व नष्ट कर दे ॥ १६ ॥

एवं मयूरवद् राजा स्वराज्यं परिपालयेत् ।

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आत्मवृद्धिकरीं नीतिं विदधीत विचक्षणः ॥ १७ ॥
इसी प्रकार बुद्धिमान् राजा अपने स्थानकी रक्षा करनेवाले मोरके समान अपने राज्यका भलीभाँति पालन करे तथा उसी नीतिका आश्रय ले, जो अपनी उन्नतिमें सहायक हो ॥ १७ ॥

आत्मसंयमनं बुद्ध्या परबुद्ध्यावधारणम् ।
बुद्ध्या चात्मगुणप्राप्तिरेतच्छास्त्रनिदर्शनम् ॥ १८ ॥
केवल अपनी बुद्धिसे मनको वशमें किया जाता है। मन्त्री आदि दूसरोंकी बुद्धिके सहयोगसे कर्तव्यका निश्चय किया जाता है और शास्त्रीय बुद्धिसे आत्मगुणकी प्राप्ति होती है। यही शास्त्रका प्रयोजन है ॥ १८ ॥

परं विश्वासयेत् साम्ना स्वशक्तिं चोपलक्षयेत् ।
आत्मनः परिमर्शेन बुद्धिं बुद्ध्या विचारयेत् ॥ १९ ॥
राजा मधुर वाणीद्वारा समझा-बुझाकर अपने प्रति दूसरेका विश्वास उत्पन्न करे। अपनी शक्तिका भी प्रदर्शन करे तथा अपने विचार और बुद्धिसे कर्तव्यका निश्चय करे ॥ १९ ॥

सान्त्वयोगमतिः प्राज्ञः कार्याकार्यप्रयोजकः ।
निगूढबुद्धेर्धीरस्य वक्तव्ये वा कृतं तथा ॥ २० ॥
राजामें सबको समझा-बुझाकर युक्तिसे काम निकालनेकी बुद्धि होनी चाहिये। वह विद्वान् होनेके साथ ही लोगोंको कर्तव्यकी प्रेरणा दे और अकर्तव्यकी ओर जानेसे रोके अथवा जिसकी बुद्धि गूढ़ या गम्भीर है, उस धीर पुरुषको उपदेश देनेकी आवश्यकता ही क्या है? ॥ २० ॥

स निकृष्टां कथां प्राज्ञो यदि बुद्ध्या बृहस्पतिः ।
स्वभावमेष्यते तप्तं कृष्णायसमिवोदके ॥ २१ ॥
वह बुद्धिमान् राजा बुद्धिमें बृहस्पतिके समान होकर भी किसी कारणवश यदि निम्न श्रेणीकी बात कह डाले तो उसे चाहिये कि जैसे तपाया हुआ लोहा पानीमें डालनेसे शान्त हो जाता है, उसी तरह अपने शान्त स्वभावको स्वीकार कर ले ॥ २१ ॥

अनुयुञ्जीत कृत्यानि सर्वाण्येव महीपतिः ।
आगमैरुपदिष्टानि स्वस्य चैव परस्य च ॥ २२ ॥
राजा अपने तथा दूसरेको भी शास्त्रमें बताये हुए समस्त कर्मोंमें ही लगावे ॥ २२ ॥

मृदुशीलं तथा प्राज्ञं शूरं चार्थविधानवित् ।
स्वकर्मणि नियुञ्जीत ये चान्ये च बलाधिकाः ॥ २३ ॥
कार्यसाधनके उपायको जाननेवाला राजा अपने कार्योंमें कोमल-स्वभाव, विद्वान् तथा शूरवीर मनुष्यको तथा अन्य जो अधिक बलशाली व्यक्ति हों, उनको नियुक्त करे ॥ २३ ॥

अथ दृष्ट्वा नियुक्तानि स्वानुरूपेषु कर्मसु ।
सर्वांस्ताननुवर्तेत स्वरांस्तन्त्रीरिवायता ॥ २४ ॥

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जैसे वीणाके विस्तृत तार सातों स्वरोंका अनुसरण करते हैं, उसी प्रकार राजा अपने कर्मचारियोंको योग्यता-नुसार कर्मोंमें संलग्न देख उन सबके अनुकूल व्यवहार करे ॥ २४ ॥

धर्माणामविरोधेन सर्वेषां प्रियमाचरेत् ।
ममायमिति राजा यः स पर्वत इवाचलः ॥ २५ ॥
राजाको चाहिये कि सबका प्रिय करे, किंतु धर्ममें बाधा न आने दे। प्रजागणको 'यह मेरा ही प्रियगण है' ऐसा समझनेवाला राजा पर्वतके समान अविचल बना रहता है ॥ २५ ॥

व्यवसायं समाधाय सूर्यो रश्मीनिवायतान् ।
धर्ममेवाभिरक्षेत् कृत्वा तुल्ये प्रियाप्रिये ॥ २६ ॥
जैसे सूर्य अपनी विस्तृत किरणोंका आश्रय ले सबकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार राजा प्रिय और अप्रियको समान समझकर सुदृढ़ उद्योगका अवलम्बन करके धर्मकी ही रक्षा करे ॥ २६ ॥

कुलप्रकृतिदेशानां धर्मज्ञान् मृदुभाषिणः ।
मध्ये वयसि निर्दोषान् हिते युक्तानविकलवान् ॥ २७ ॥
अलुब्धान् शिक्षितान् दान्तान् धर्मेषु परिनिष्ठितान् ।
स्थापयेत् सर्वकार्येषु राजा धर्मार्थरक्षिणः ॥ २८ ॥
जो लोग कुल, स्वभाव और देशके धर्मको जानते हों, मधुरभाषी हों, युवावस्थामें जिनका जीवन निष्कलंक रहा हो, जो हितसाधनमें तत्पर और घबराहटसे रहित हों, जिनमें लोभका अभाव हो, जो शिक्षित, जितेन्द्रिय, धर्मनिष्ठ तथा धर्म एवं अर्थकी रक्षा करनेवाले हों, उन्हींको राजा अपने समस्त कार्योंमें लगावे ॥ २७-२८ ॥

एतेन च प्रकारेण कृत्यानामागतिं गतिम् ।
युक्तः समनुतिष्ठेत तुष्टश्चारैरुपस्कृतः ॥ २९ ॥
इस प्रकार राजा सदा सावधान रहकर राज्यके प्रत्येक कार्यका आरम्भ और समाप्ति करे। मनमें संतोष रखे और गुप्तचरोंकी सहायतासे राष्ट्रकी सारी बातें जानता रहे ॥ २९ ॥

अमोघक्रोधहर्षस्य स्वयं कृत्यान्ववेक्षितुः ।
आत्मप्रत्ययकोशस्य वसुदैव वसुन्धरा ॥ ३० ॥
जिसका हर्ष और क्रोध कभी निष्फल नहीं होता, जो स्वयं ही सारे कार्योंकी देखभाल करता है तथा आत्म-विश्वास ही जिसका खजाना है, उस राजाके लिये यह वसुन्धरा (पृथ्वी) ही धन देनेवाली बन जाती है ॥ ३० ॥

व्यक्तश्चानुग्रहो यस्य यथार्थश्चापि निग्रहः ।
गुप्तात्मा गुप्तराष्ट्रश्च स राजा राजधर्मवित् ॥ ३१ ॥

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जिसका अनुग्रह सबपर प्रकट है तथा जिसका निग्रह (दण्ड देना) भी यथार्थ कारणसे होता है, जो अपनी और अपने राज्यकी सुरक्षा करता है, वही राजा राजधर्मका ज्ञाता है ।। ३१ ।।

नित्यं राष्ट्रमवेक्षेत गोभिः सूर्य इवोदितः ।
चरान् स्वनुचरान् विद्यात् तथा बुद्ध्या स्वयं चरेत् ।। ३२ ।।
जैसे सूर्य उदित होकर प्रतिदिन अपनी किरणोंद्वारा सम्पूर्ण जगत्‌को प्रकाशित करते (या देखते) हैं, उसी प्रकार राजा सदा अपनी दृष्टिसे सम्पूर्ण राष्ट्रका निरीक्षण करे। गुप्तचरोंको बारंबार भेजकर राज्यके समाचार जाने तथा स्वयं अपनी बुद्धिके द्वारा भी सोच-विचारकर कार्य करे ।। ३२ ।।

कालं प्राप्तमुपादद्यान्नार्थं राजा प्रसूचयेत् ।
अहन्यहनि संदुह्यान्महीं गामिव बुद्धिमान् ।। ३३ ।।
बुद्धिमान् राजा समय पड़नेपर ही प्रजासे धन ले। अपनी अर्थ-संग्रहकी नीति किसीके सम्मुख प्रकट न करे। जैसे बुद्धिमान् मनुष्य गायकी रक्षा करते हुए ही उससे दूध दुहता है, उसी प्रकार राजा सदा पृथ्वीका पालन करते हुए ही उससे धनका दोहन करे ।। ३३ ।।

यथा क्रमेण पुष्पेभ्यश्चिनोति मधु षट्पदः ।
तथा द्रव्यमुपादाय राजा कुर्वीत संचयम् ।। ३४ ।।
जैसे मधुमक्खी क्रमशः अनेक फूलोंसे रसका संचय करके शहद तैयार करती है, उसी प्रकार राजा समस्त प्रजाजनोंसे थोड़ा-थोड़ा द्रव्य लेकर उसका संचय करे ।। ३४ ।।

यद्धि गुप्तावशिष्टं स्यात् तद्वित्तं धर्मकामयोः ।
संचयान्न विसर्गी स्याद् राजा शास्त्रविदात्मवान् ।। ३५ ।।
जो धन राज्यकी सुरक्षा करनेसे बचे, उसीको धर्म और उपभोगके कार्यमें खर्च करना चाहिये। शास्त्रज्ञ और मनस्वी राजाको कोषागारके संचित धनसे द्रव्य लेकर भी खर्च नहीं करना चाहिये ।। ३५ ।।

नार्थमल्पं परिभवेन्नावमन्येत शात्रवान् ।
बुद्ध्या तु बुद्धयेदात्मानं न चाबुद्धिषु विश्वसेत् ।। ३६ ।।
थोड़ा-सा भी धन मिलता हो तो उसका तिरस्कार न करे। शत्रु शक्तिहीन हो तो भी उसकी अवहेलना न करे। बुद्धिसे अपने स्वरूप और अवस्थाको समझे तथा बुद्धिहीनोंपर कभी विश्वास न करे ।। ३६ ।।

धृतिर्दाक्ष्यं संयमो बुद्धिरात्मा
धैर्यं शौर्यं देशकालाप्रमादः ।
अल्पस्य वा बहुनो वा विवृद्धौ
धनस्यैतान्यष्ट समिन्धनानि ।। ३७ ।।

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धारणाशक्ति, चतुरता, संयम, बुद्धि, शरीर, धैर्य, शौर्य तथा देश-कालकी परिस्थितिसे असावधान न रहना—ये आठ गुण थोड़े या अधिक धनको बढ़ानेके मुख्य साधन हैं अर्थात् धनरूपी अग्निको प्रज्वलित करनेके लिये ईंधन हैं ।। ३७ ।।

अग्निः स्तोको वर्धतेऽप्याज्यसिक्तो
बीजं चैकं रोहसहस्रमेति ।
आयव्ययौ विपुलौ संनिशाम्य
तस्मादल्पं नावमन्येत वित्तम् ।। ३८ ।।

थोड़ी-सी भी आग यदि घीसे सिंच जाय तो बढ़कर बहुत बड़ी हो जाती है। एक ही छोटे-से बीजको बो देनेपर उससे सहस्रों बीज पैदा हो जाते हैं। इसी प्रकार महान् आय-व्ययके विषयमें विचार करके थोड़े-से भी धनका अनादर न करे ।। ३८ ।।

बालोऽप्यबालः स्थविरो रिपुर्यः
सदा प्रमत्तं पुरुषं निहन्यात् ।
कालेनान्यस्तस्य मूलं हरेत
कालज्ञाता पार्थिवानां वरिष्ठः ।। ३९ ।।

शत्रु बालक, जवान अथवा बूढ़ा ही क्यों न हो, सदा सावधान न रहनेवाले मनुष्यका नाश कर डालता है। दूसरा कोई धनसम्पन्न शत्रु अनुकूल समयका सहयोग पाकर राजाकी जड़ उखाड़ सकता है। इसलिये जो समयको जानता है, वही समस्त राजाओंमें श्रेष्ठ है ।। ३९ ।।

हरेत कीर्तिं धर्ममस्योपरुन्ध्या-
दर्थे दीर्घं वीर्यमस्योपहन्यात् ।
रिपुर्द्वेष्टा दुर्बलो वा बली वा
तस्माच्छत्रोर्नैव हीयेद् यतात्मा ।। ४० ।।

द्वेष रखनेवाला शत्रु दुर्बल हो या बलवान्, राजाकी कीर्ति नष्ट कर देता है, उसके धर्ममें बाधा पहुँचाता है तथा अर्थोपार्जनमें उसकी बढ़ी हुई शक्तिका विनाश कर डालता है; इसलिये मनको वशमें रखनेवाला राजा शत्रुको ओरसे लापरवाह न रहे ।। ४० ।।

क्षयं वृद्धिं पालनं संचयं वा
बुद्ध्वाप्युभौ संहतौ सर्वकामौ ।
ततश्चान्यन्मतिमान् संदधीत
तस्माद् राजा बुद्धिमत्तां श्रयेत ।। ४१ ।।

हानि, लाभ, रक्षा और संग्रहको जानकर तथा सदा परस्पर सम्बन्धित ऐश्वर्य और भोगको भी भलीभाँति समझकर बुद्धिमान् राजाको शत्रुके साथ संधि या विग्रह करना चाहिये; इस विषयपर विचार करनेके लिये बुद्धिमानोंका सहारा लेना चाहिये ।। ४१ ।।

बुद्धिर्दीप्ता बलवन्तं हिनस्ति

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बलं बुद्ध्या पाल्यते वर्धमानम् ।
शत्रुर्बुद्ध्या सीदते वर्धमानो
बुद्धेः पश्चात् कर्म यत्तत् प्रशस्तम् ॥ ४२ ॥
प्रतिभाशालिनी बुद्धि बलवान्‌को भी पछाड़ देती है। बुद्धिके द्वारा नष्ट होते हुए बलकी भी रक्षा होती है। बढ़ता हुआ शत्रु भी बुद्धिके द्वारा परास्त होकर कष्ट उठाने लगता है। बुद्धिसे सोचकर पीछे जो कर्म किया जाता है, वह सर्वोत्तम होता है ॥ ४२ ॥

सर्वान् कामान् कामयानो हि धीरः
सत्त्वेनाल्पेनाप्नुते हीनदोषः ।
यश्चात्मानं प्रार्थयतेऽर्थ्यमानैः
श्रेयःपात्रं पूर्यते च नाल्पम् ॥ ४३ ॥
जिसने सब प्रकारके दोषोंका त्याग कर दिया है, वह धीर राजा यदि किसी वस्तुकी कामना करे तो वह थोड़ा-सा बल लगानेपर भी अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जो आवश्यक वस्तुओंसे सम्पन्न होनेपर भी अपने लिये कुछ चाहता है अर्थात् दूसरोंसे अपनी इच्छा पूरी करानेकी आश रखता है, वह लोभी और अहंकारी नरेश अपने श्रेयका छोटा-सा पात्र भी नहीं भर सकता ॥

तस्माद् राजा प्रगृहीतः प्रजासु
मूलं लक्ष्म्याः सर्वशो ह्याददीत ।
दीर्घं कालं ह्यपि सम्प्रीड्यमानो
विद्युत्सम्पातमपि वा नोर्जितः स्यात् ॥ ४४ ॥
इसलिये राजाको चाहिये कि वह सारी प्रजापर अनुग्रह करते हुए ही उससे कर (धन) वसूल करे। वह दीर्घकालतक प्रजाको सताकर उसपर बिजलीके समान गिरकर अपना प्रभाव न दिखाये ॥ ४४ ॥

विद्या तपो वा विपुलं धनं वा
सर्वं ह्येतद् व्यवसायेन शक्यम् ।
बुद्ध्यायत्तं तन्निवसेद् देहवत्सु
तस्माद् विद्याद् व्यवसायं प्रभूतम् ॥ ४५ ॥
विद्या, तप तथा प्रचुर धन—ये सब उद्योगसे प्राप्त हो सकते हैं। वह उद्योग प्राणियोंमें बुद्धिके अधीन होकर रहता है; अतः उद्योगको ही समस्त कार्योंकी सिद्धिका पर्याप्त साधन समझे ॥ ४५ ॥

यत्रासते मतिमन्तो मनस्विनः
शक्रो विष्णुर्यत्र सरस्वती च ।
वसन्ति भूतानि च यत्र नित्यं
तस्माद् विद्वान् नावमन्येत देहम् ॥ ४६ ॥

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अतः जहाँ ज्ञानेन्द्रियोंमें बुद्धिमान् एवं मनस्वी महर्षि निवास करते हैं,* जिसमें इन्द्रियोंके अधिष्ठातृदेवताके रूपमें इन्द्र, विष्णु एवं सरस्वतीका निवास है तथा जिसके भीतर सदा सम्पूर्ण प्राणी वास करते हैं, अर्थात् जो शरीर समस्त प्राणियोंके जीवन-निर्वाहका आधार है, विद्वान् पुरुषको चाहिये कि उस मानव-देहकी अवहेलना न करे।।

लुब्धं हन्यात् सम्प्रदानेन नित्यं लुब्धस्तृप्तिं परवित्तस्य नैति । सर्वो लुब्धः कर्मगुणोपभोगे योऽर्थैर्हीनो धर्मकामौ जहाति ॥ ४७ ॥

राजा लोभी मनुष्यको सदा ही कुछ देकर दबाये रखे; क्योंकि लोभी पुरुष दूसरेके धनसे कभी तृप्त नहीं होता। सत्कर्मोंके फलस्वरूप सुखका उपभोग करनेके लिये तो सभी लालायित रहते हैं; परंतु जो लोभी धनहीन है, वह धर्म और काम दोनोंको त्याग देता है ॥ ४७ ॥

धनं भोगं पुत्रदारं समृद्धिं सर्वं लुब्धः प्रार्थयते परेषाम् । लुब्धे दोषाः सम्भवन्तीह सर्वे तस्माद् राजा न प्रगृह्णीत लुब्धम् ॥ ४८ ॥

लोभी मनुष्य दूसरोंके धन, भोग-सामग्री, स्त्री-पुत्र और समृद्धि सबको प्राप्त करना चाहता है। लोभीमें सब प्रकारके दोष प्रकट होते हैं; अतः राजा उसे अपने यहाँ किसी पदपर स्थान न दे ॥ ४८ ॥

संदर्शनेन पुरुषं जघन्यमपि चोदयेत् । आरम्भान् द्विषतां प्राज्ञः सर्वार्थांश्च प्रसूदयेत् ॥ ४९ ॥

बुद्धिमान् राजा नीच मनुष्यको देखते ही अपने यहाँसे दूर हटा दे और यदि उसका वश चले तो वह शत्रुओंके सारे उद्योगों तथा कार्योंका विध्वंस कर डाले ॥ ४९ ॥

धर्मान्वितेषु विज्ञाता मन्त्री गुप्तश्च पाण्डव । आप्तो राजा कुलीनश्च पर्याप्तो राजसंग्रहे ॥ ५० ॥

पाण्डुनन्दन! धर्मात्मा पुरुषोंमें जो विशेषरूपसे सम्पूर्ण विषयोंका ज्ञाता हो, उसीको मन्त्री बनावे और उसकी सुरक्षाका विशेष प्रबन्ध करे। प्रजाका विश्वास-पात्र और कुलीन राजा नरेशोंको वशमें करनेमें समर्थ होता है ॥

विधिप्रयुक्तान् नरदेवधर्मा- नुक्तान् समासेन निबोध बुद्ध्या । इमान् विदध्याद् व्यतिसृत्य यो वै राजा महीं पालयितुं स शक्तः ॥ ५१ ॥

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राजाके जो शास्त्रोक्त धर्म हैं, उन्हें संक्षेपसे मैंने यहाँ बताया है। तुम अपनी बुद्धिसे विचार करके उन्हें हृदयमें धारण करो। जो उन्हें गुरुसे सीखकर हृदयमें धारण करता और आचरणमें लाता है, वही राजा अपने राज्यकी रक्षा करनेमें समर्थ होता है॥ ५१॥ अनीतिजं यस्य विधानजं सुखं हठप्रणीतं विधिवत्प्रदृश्यते। न विद्यते तस्य गतिर्महीपते- र्न विद्यते राज्यसुखं ह्यनुत्तमम्॥ ५२॥ जिन्हें अन्यायसे उपार्जित, हठसे प्राप्त तथा दैवके विधानके अनुसार उपलब्ध हुआ सुख विधिके अनुरूप प्राप्त हुआ-सा दिखायी देता है, राजधर्मको न जाननेवाले उस राजाकी कहीं गति नहीं है तथा उसका परम उत्तम राज्यसुख चिरस्थायी नहीं होता॥ ५२॥ धनैर्विशिष्टान् मतिशीलपूजितान् गुणोपपन्नान् युधि दृष्टविक्रमान्। गुणेषु दृष्ट्वा न चिरादिवात्मवान् यतोऽभिसंधाय निहन्ति शात्रवान्॥ ५३॥ उक्त राजधर्मके अनुसार संधि-विग्रह आदि गुणोंके प्रयोगमें सतत सावधान रहनेवाला नरेश धनसम्पन्न, बुद्धि और शीलके द्वारा सम्मानित, गुणवान् तथा युद्धमें जिनका पराक्रम देखा गया है, उन वीर शत्रुओंको भी कूटकौशलपूर्वक नष्ट कर सकता है॥ ५३॥ पश्येदुपायन् विविधैः क्रियापथै- र्न चानुपायेन मतिं निवेशयेत्। श्रियं विशिष्टां विपुलं यशो धनं न दोषदर्शी पुरुषः समश्नुते॥ ५४॥ राजा नाना प्रकारकी कार्यपद्धतियोंद्वारा शत्रु-विजयके बहुत-से उपाय ढूँढ़ निकाले। अयोग्य उपायसे काम लेनेका विचार न करे, जो निर्दोष व्यक्तियोंके भी दोष देखता है, वह मनुष्य विशिष्ट सम्पत्ति, महान् यश और प्रचुर धन नहीं पा सकता॥ ५४॥ प्रीतिप्रवृत्तौ विनिवर्तितौ यथा सुहृत्सु विज्ञाय निवृत्य चोभयोः। यदेव मित्रं गुरुभारमावहेत् तदेव सुस्निग्धमुदाहरेद् बुधः॥ ५५॥ सुहृदोंमेंसे जो दो मित्र प्रेमपूर्वक साथ-साथ एक कार्यमें प्रवृत्त होते हों और साथ-ही-साथ उससे निवृत्त होते हों, उन्हें अच्छी तरह जानकर उन दोनोंमेंसे जो मित्र लौटकर मित्रका गुरुतर भार वहन कर सके, उसीको विद्वान् पुरुष अत्यन्त स्नेही मित्र मानकर दूसरोंके सामने उसका उदाहरण दें॥ ५५॥

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एतान् मयोक्तांश्च राजधर्मान् नृणां च गुप्तौ मतिमादधत्स्व । अवाप्स्यसे पुण्यफलं सुखेन सर्वो हि लोको नृप धर्ममूलः ॥ ५६ ॥

नरेश्वर! मेरे बताये हुए इन राजधर्मोंका आचरण करो और प्रजाके पालनमें मन लगाओ। इससे तुम सुखपूर्वक पुण्यफल प्राप्त करोगे; क्योंकि सम्पूर्ण जगत्का मूल धर्म ही है ॥ ५६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि राजधर्मकथने विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें राजधर्मका वर्णनविषयक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२० ॥


* 'इमावेव गौतमभरद्वाजौ' इत्यादि श्रुतिके अनुसार सम्पूर्ण ज्ञानेन्द्रियोंका गौतम, भरद्वाज, वसिष्ठ और विश्वामित्र आदि महर्षियोंसे सम्बन्ध सूचित होता है।