भारतकोश
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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१६४- पद्मोद्भवके प्रसङ्गमें मनुद्वारा भगवान् विष्णुसे सृष्टिसम्बन्धी विविध प्रश्न और भगवान्‌का उत्तर

  • अध्याय १६२ * | ६७७ -|-

| अस्त्रैः प्रज्वलितैः सिंहमावृणोदसुरोत्तमः।<br>विवस्वान् घर्मसमये हिमवन्तमिवांशुभिः॥ २९<br>स ह्यामर्षानिलोद्भूतो दैत्यानां सैन्यसागरः।<br>क्षणेन प्लावयामास मैनाकमिव सागरः॥ ३०<br>प्रासैः पाशैश्च खड्गैश्च गदाभिर्मुसलैस्तथा।<br>वज्रैरशनिभिश्चैव साग्निभिश्च महाद्रुमैः॥ ३१<br>मुद्गरैर्भिन्दिपालैश्च शिलोलूखलपर्वतैः।<br>शतघ्नीभिश्च दीप्ताभिर्दण्डैरपि सुदारुणैः॥ ३२<br>ते दानवाः पाशगृहीतहस्ता<br>महेन्द्रवज्राशनितुल्यवेगाः।<br>समन्ततोऽभ्युद्यतबाहुकायाः<br>स्थितास्त्रिशीर्षा इव नागपाशाः॥ ३३<br>सुवर्णमालाकुलभूषिताङ्गाः<br>पीतांशुकाभोगविभाविताङ्गाः।<br>मुक्तावलीदामसनाथकक्षा<br>हंसा इवाभान्ति विशालपक्षाः॥ ३४<br>तेषां तु वायुप्रतिमौजसां वै<br>केयूरमौलीबलयोत्कटानाम्।<br>तान्युत्तमाङ्गान्युभितो विभान्ति<br>प्रभातसूर्यांशुसमप्रभाणि ॥ ३५<br>क्षिपद्भिरुग्रैर्ज्वलितैर्महाबलै-<br>र्महास्त्रपूगैः सुसमावृत्तो बभौ।<br>गिरिर्यथा संततवर्षिभिर्घनैः<br>कृतान्धकारान्तरकन्दरो द्रुमैः॥ ३६<br>तैर्हन्यमानोऽपि महास्त्रजालै-<br>र्महाबलैर्दैत्यगणैः समेतैः।<br>नाकम्पताजौ भगवान् प्रताप-<br>स्थितः प्रकृत्या हिमवानिवाचलः॥ ३७<br>संत्रासितास्तेन नृसिंहरूपिणा<br>दितेः सुताः पावकतुल्यतेजसा।<br>भयाद् विचेलुः पवनोद्धुताङ्गा<br>यथोर्मयः सागरवारिसम्भवाः॥ ३८ | उस असुरश्रेष्ठने नरसिंहको प्रज्वलित अस्त्रोंद्वारा ऐसा आच्छादित कर दिया, जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें सूर्य अपनी किरणोंसे हिमवान् पर्वतको ढक लेते हैं। दैत्योंका वह सेनारूपी सागर क्रोधरूपी वायुसे उच्छ्वलित हो उठा और क्षणमात्रमें ही वहाँकी भूमिपर इस प्रकार छा गया, जैसे सागर मैनाक पर्वतको डुबाकर उबल उठा था। फिर तो वे भाला, पाश, तलवार, गदा, मुसल, वज्र, अग्निसहित अशनि, विशाल वृक्ष, मुद्गर, भिन्दिपाल, शिला, ओखली, पर्वत, प्रज्वलित शतघ्नी (तोप) और अत्यन्त भीषण दण्डसे नरसिंहपर प्रहार करने लगे॥ २९-३२॥<br><br>उस समय महेन्द्रके वज्र एवं अशनिके समान वेगशाली वे दानव हाथमें पाश लिये हुए चारों ओर अपनी भुजाओं और शरीरोंको ऊपर उठाये हुए स्थित थे, जो तीन शिखावाले नागपाशकी तरह दीख रहे थे। उनके शरीर सोनेकी मालाओंसे विभूषित थे, उनके अङ्गोंपर पीला रेशमी वस्त्र शोभा पा रहा था तथा कटिबंध मोतियोंकी लड़ियोंसे संयुक्त थे, जिससे वे विशाल पंखधारी हंसकी भाँति शोभा पा रहे थे। केयूर, मुकुट और कंकणसे सुशोभित उन उत्कट पराक्रमी एवं वायुके समान ओजस्वी दानवोंके मस्तक प्रातःकालीन सूर्यकी किरणोंकी कान्ति-सदृश चमक रहे थे। उन महाबली दानवोंद्वारा चलाये गये भयंकर एवं उद्दीप्त महान् अस्त्रसमूहोंसे आच्छादित हुए भगवान् नरसिंह उसी प्रकार शोभा पा रहे थे, मानो निरन्तर वर्षा करनेवाले बादलों और वृक्षोंसे अन्धकारित किये गये गुफाओंसे युक्त पर्वत हो। संगठित हुए उन महाबली दैत्योंद्वारा महान् अस्त्रसमूहोंसे आघात किये जानेपर भी प्रतापशाली भगवान् नरसिंह युद्धस्थलमें विचलित नहीं हुए, अपितु प्रकृतिसे अटल रहनेवाले हिमवान्की तरह अडिग होकर डटे रहे। अग्निके समान तेजस्वी नृसिंहरूपधारी भगवान् विष्णुके द्वारा डराये गये दैत्यगण भयके कारण उसी प्रकार विचलित हो गये, जैसे समुद्रके जलमें उठी हुई लहरें वायुके थपेड़ोंसे क्षुब्ध हो जाती हैं॥ ३३-३८॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नारसिंहप्रादुर्भावो नाम द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नारसिंहप्रादुर्भाव नामक एक सौ बासठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६२ ॥

६७८* मत्स्यपुराण *

एक सौ तिरसठवाँ अध्याय

नरसिंह और हिरण्यकशिपुका भीषण युद्ध, दैत्योंको उत्पातदर्शन, हिरण्यकशिपुका अत्याचार, नरसिंहद्वारा हिरण्यकशिपुका वध तथा ब्रह्माद्वारा नरसिंहकी स्तुति


सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
खरश्वानमुखाश्चैव मकराशीविषाननाः।<br>ईहामृगमुखाश्चान्ये वराहमुखसंस्थिताः॥ १<br><br>बालसूर्यमुखाश्चान्ये धूमकेतुमुखास्तथा।<br>अर्धचन्द्रार्धवक्त्राश्च अग्निदीप्तमुखास्तथा॥ २<br><br>हंसकुक्कुटवक्त्राश्च व्यादितास्या भयावहाः।<br>सिंहास्या लेलिहानाश्च काकगृध्रमुखास्तथा॥ ३<br><br>द्विजिव्हाका वक्रशीर्षास्तथोल्कामुखसंस्थिताः।<br>महाग्राहमुखाश्चान्ये दानवा बलदर्पिताः॥ ४<br><br>शैलसंवर्ष्मणस्तस्य शरीरे शरवृष्टिभिः।<br>अवध्यस्य मृगेन्द्रस्य न व्यथां चक्रुराहवे॥ ५<br><br>एवं भूयो परान् घोरानसृजन् दानवेश्वराः।<br>मृगेन्द्रस्योपरि क्रुद्धा निःश्वसन्त इवोरगाः॥ ६<br><br>ते दानवशरा घोरा दानवेन्द्रसमीरिताः।<br>विलयं जग्मुराकाशे खद्योता इव पर्वते॥ ७<br><br>ततश्चक्राणि दिव्यानि दैत्याः क्रोधसमन्विताः।<br>मृगेन्द्रायासृजन्नाशु ज्वलितानि समन्ततः॥ ८<br><br>तैरासीद् गगनं चक्रैः सम्पतद्भिरितस्ततः।<br>युगान्ते सम्प्रकाशद्भिश्चन्द्रादित्यग्रहैरिव॥ ९<br><br>तानि सर्वाणि चक्राणि मृगेन्द्रेण महात्मना।<br>ग्रस्तान्युदीर्णानि तदा पावकार्चिःसमानि वै॥ १०<br><br>तानि चक्राणि वदने विशमानानि भान्ति वै।<br>मेघोदरदरीष्वेव चन्द्रसूर्यग्रहा इव॥ ११ऋषियो! उन दानवोंमें किन्हींके मुख गधे और कुत्तेके समान थे तो कुछ मकर और सर्पके-से मुखवाले थे। किन्हींके मुख भेड़िया-सदृश तो कुछके सूअर-जैसे थे। कुछ उदयकालीन सूर्यके समान तो कुछ धूमकेतु-से मुखवाले थे। किन्हींके मुख अर्धचन्द्र तथा किन्हींके अग्निकी तरह उद्दीप्त थे। किन्हींका मुख आधा ही था। किन्हींके मुख हंस और मुर्गेके समान थे। किन्हींके मुख फैले हुए थे, जो बड़े भयावने लग रहे थे। कुछ सिंहके-से मुखवाले दानव जीभ लपलपा रहे थे। किन्हींके मुख कौओं और गीधों-जैसे थे। किन्हींके मुखमें दो जिह्वाएँ थीं, किन्हींके मस्तक टेढ़े थे और कुछ उल्का-सरीखे मुखवाले थे। किन्हींके मुख महाग्राह-सदृश थे। इस प्रकार वे बलाभिमानी दानव रणभूमिमें पर्वतके समान सुदृढ़ शरीरवाले उन अवध्य मृगेन्द्रके शरीरपर बाणोंकी वृष्टि करके उन्हें पीड़ित न कर सके। तब क्रुद्ध हुए सर्पकी भाँति निःश्वास छोड़ते हुए वे दानवेश्वर नरसिंहके ऊपर पुनः दूसरे भयंकर बाणोंकी वृष्टि करने लगे, परंतु दानवेश्वरोंद्वारा छोड़े गये वे भयंकर बाण उसी प्रकार आकाशमें विलीन हो जाते थे, जैसे पर्वतपर चमकते हुए जुगनू। तत्पश्चात् क्रोधसे भरे हुए दैत्य शीघ्र ही नरसिंहके ऊपर चारों ओरसे चमकते हुए दिव्य चक्रोंकी वर्षा करने लगे। इधर-उधर गिरते हुए उन चक्रोंसे आकाशमण्डल ऐसा दीख रहा था, मानो युगान्तके समय प्रकाशित हुए चन्द्रमा, सूर्य आदि ग्रहोंसे युक्त हो गया हो। अग्निकी लपटोंके समान उठते हुए उन सभी चक्रोंको महात्मा नरसिंह निगल गये। उस समय उनके मुखमें प्रविष्ट होते हुए वे चक्र मेघोंकी घनघोर घटामें घुसते हुए चन्द्र, सूर्य एवं अन्यान्य ग्रहोंकी भाँति सुशोभित हो रहे थे॥ १—११॥
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो भूयः प्रासृजदूर्जिताम्।<br>शक्तिं प्रज्वलितां घोरां धौतशस्त्रतडित्प्रभाम्॥ १२तदनन्तर दैत्यराज हिरण्यकशिपुने भगवान् नरसिंहपर पुनः अपनी भयंकर शक्ति छोड़ी, जो चमकीली, अत्यन्त शक्तिशाली और धुली होनेके कारण बिजली-सी चमक
* अध्याय १६३ *६७९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तामापतन्तीं सम्प्रेक्ष्य मृगेन्द्रः शक्तिमुज्ज्वलाम्।<br>हुङ्कारेणैव रौद्रेण बभञ्ज भगवांस्तदा॥ १३<br><br>रराज भग्ना सा शक्तिर्मृगेन्द्रेण महीतले।<br>सविस्फुलिङ्गा ज्वलिता महोल्केव दिवश्च्युता॥ १४<br><br>नाराचपङ्क्तिः सिंहस्य प्राप्ता रेजेऽविदूरतः।<br>नीलोत्पलपलाशानां मालेवोज्ज्वलदर्शना॥ १५<br><br>स गर्जित्वा यथान्यायं विक्रम्य च यथासुखम्।<br>तत्सैन्यमुत्सारितवांस्तृणाग्राणीव मारुतः॥ १६<br><br>ततोऽश्मवर्षं दैत्येन्द्रा व्यसृजन्त नभोगताः।<br>नगमात्रैः शिलाखण्डैर्गिरिशृङ्गैर्महाप्रभैः॥ १७<br><br>तदश्मवर्षं सिंहस्य महन्मूर्धनि पातितम्।<br>दिशो दश विशीर्णा वै खद्योतप्रकरा इव॥ १८<br><br>तदाश्मौघैर्दैत्यगणाः पुनः सिंहमरिन्दमम्।<br>छादयांचक्रिरे मेघा धाराभिरिव पर्वतम्॥ १९<br><br>न च तं चालयामासुर्दैत्यौघा देवसत्तमम्।<br>भीमवेगोऽचलश्रेष्ठं समुद्र इव मन्दरम्॥ २०रही थी। तब उस उज्ज्वल शक्तिको अपनी ओर आती हुई देखकर भगवान् नरसिंहने अपने भयंकर हुंकारसे ही उसे तोड़कर टूक-टूक कर दिया। नरसिंहद्वारा तोड़ी गयी वह शक्ति ऐसी शोभा पा रही थी, जैसे आकाशमें भूतलपर गिरी हुई चिनगारियोंसहित प्रज्वलित महान् उल्का हो। नरसिंहके निकट पहुँची हुई (दैत्योंद्वारा छोड़े गये) बाणोंकी उज्ज्वल वर्णवाली पंक्ति नीले कमल-दलकी मालाकी तरह शोभा पा रही थी। यह देखकर भगवान् नरसिंहने न्यायतः पराक्रम प्रदर्शित कर सुखपूर्वक गर्जना की और उस दानवसेनाको वायुद्वारा उड़ाये गये क्षुद्र तिनकोंकी तरह खदेड़ दिया। तदुपरान्त दैत्येश्वरगण आकाशमें स्थित होकर पत्थरकी वर्षा करने लगे। पत्थरोंकी वह वर्षा नरसिंहके विशाल मस्तकपर गिरकर चूर-चूर हो जुगनुओंके समूहकी भाँति दसों दिशाओंमें बिखर गयी। तब दैत्यगणोंने पुनः पर्वत-सरीखे शिलाखण्डों, पर्वत-शिखरों और पत्थरोंसे उन शत्रुसूदन नरसिंहको इस प्रकार आच्छादित कर दिया, जैसे मेघ जलकी धाराओंद्वारा पर्वतको ढक देते हैं। फिर भी वह दैत्यसमुदाय उन देवश्रेष्ठ नरसिंहको उसी प्रकार विचलित नहीं कर सका, जैसे भयंकर वेगशाली समुद्र पर्वतश्रेष्ठ मन्दरको नहीं डिगा सका॥ १२–२०॥
ततोऽश्मवर्षे विहते जलवर्षमनन्तरम्।<br>धाराभिरक्षमात्राभिः प्रादुरासीत्समन्ततः॥ २१<br><br>नभसः प्रच्युता धारास्तिग्मवेगाः समंततः।<br>आवृत्य सर्वतो व्योम दिशश्चोपविशस्तथा॥ २२<br><br>धारा दिवि च सर्वत्र वसुधायां च सर्वशः।<br>न स्पृशन्ति च ता देवं निपतन्त्योऽनिशं भुवि॥ २३<br><br>बाह्यतो ववृषुर्वर्षं नोपरिष्टाच्च ववृषुः।<br>मृगेन्द्रप्रतिरूपस्य स्थितस्य युधि मायया॥ २४<br><br>हतेऽश्मवर्षे तुमुले जलवर्षे च शोषिते।<br>सोऽसृजद् दानवो मायामग्निवायुसमीरिताम्॥ २५<br><br>महेन्द्रस्तोयदैः सार्धं सहस्राक्षो महाद्युतिः।<br>महता तोयवर्षेण शमयामास पावकम्॥ २६तदनन्तर पत्थरोंकी वृष्टिके विफल हो जानेपर चारों ओर मूसलाधार जलकी वृष्टि होने लगी। चारों ओर आकाशसे गिरती हुई वे तीव्र वेगशाली धाराएँ सब ओरसे आकाश, दिशाओं तथा विदिशाओंको आच्छादित करके लगातार भूतलपर गिर रही थीं। यद्यपि वे धाराएँ आकाश तथा पृथ्वीपर सर्वत्र सब प्रकारसे व्याप्त थीं, तथापि वे भगवान् नरसिंहका स्पर्श नहीं कर पा रही थीं। युद्धभूमिमें मायाद्वारा मृगेन्द्रका रूप धारण करनेवाले भगवान्के ऊपर वे धाराएँ नहीं गिर रही थीं, अपितु बाहर चारों ओर वर्षा कर रही थीं। इस प्रकार जब वह शिलावृष्टि नष्ट कर दी गयी और घनघोर जलवृष्टि सोख ली गयी, तब दानवराज हिरण्यकशिपुने अग्नि और वायुद्वारा प्रेरित मायाका विस्तार किया, किंतु परम कान्तिमान् सहस्र नेत्रधारी महेन्द्रने बादलोंके साथ वहाँ आकर जलकी घनघोर वृष्टिसे उस अग्निको शान्त कर

१६५- चारों युगोंकी व्यवस्थाका वर्णन

६८० * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्यां प्रतिहतायां तु मायायां युधि दानवः।<br>असृजद् घोरसंकाशं तमस्तीव्रं समन्ततः॥ २७<br>तमसा संवृते लोके दैत्येष्वात्तायुधेषु च।<br>स्वतेजसा परिवृतो दिवाकर इवावभौ॥ २८<br>त्रिशिखां भृकुटीं चास्य ददृशुर्दानवा रणे।<br>ललाटस्थां त्रिशूलाङ्कां गङ्गां त्रिपथगामिव॥ २९दिया। युद्धस्थलमें उस मायाके नष्ट हो जानेपर उस दानवने चारों ओर भयंकर दीखनेवाले घने अन्धकारकी सृष्टि की। उस समय सारा जगत् अन्धकारसे ढक गया और दैत्यगण अपना-अपना हथियार लिये डटे रहे। उसके मध्य अपने तेजसे घिरे हुए भगवान् नरसिंह सूर्यकी तरह शोभा पा रहे थे। दानवोंने रणभूमिमें नरसिंहके ललाटमें स्थित त्रिशूलकी-सी आकारवाली उनकी त्रिशिखा भृकुटिको देखा, जो त्रिपथगा गङ्गाकी तरह प्रतीत हो रही थी॥ २१—२९॥
ततः सर्वासु मायासु हतासु दितिनन्दनाः।<br>हिरण्यकशिपुं दैत्यं विवर्णाः शरणं ययुः॥ ३०<br>ततः प्रज्वलितः क्रोधात् प्रदहन्निव तेजसा।<br>तस्मिन् क्रुद्धे तु दैत्येन्द्रे तमोभूतमभूज्जगत्॥ ३१<br>आवहः प्रवहश्चैव विवहोऽथ ह्युदावहः।<br>परावहः संवहश्च महाबलपराक्रमाः॥ ३२<br>तथा परिवहः श्रीमानुत्पातभयशंसाः।<br>इत्येवं क्षुभिताः सप्त मरुतो गगनेचराः॥ ३३<br>ये ग्रहाः सर्वलोकस्य क्षये प्रादुर्भवन्ति वै।<br>ते सर्वे गगने दृष्टा व्यचरन्त यथासुखम्॥ ३४<br>अयोगतश्चाप्यचरद् योगं निशि निशाकरः।<br>सग्रहः सह नक्षत्रै राकापतिररिन्दमः॥ ३५<br>विवर्णतां च भगवान् गतो दिवि दिवाकरः।<br>कृष्णं कबन्धं च तथा लक्ष्यते सुमहद्दिवि॥ ३६<br>अमुञ्चच्चार्चिषां वृन्दं भूमिवृत्तिर्विभावसुः।<br>गगनस्थश्च भगवानभीक्ष्णं परिदृश्यते॥ ३७<br>सप्त धूम्रनिभा घोरा सूर्याद्दिवि समुत्थिताः।<br>सोमस्य गगनस्थस्य ग्रहास्तिष्ठन्ति शृङ्गगाः॥ ३८<br>वामे तु दक्षिणे चैव स्थितौ शुक्रबृहस्पती।<br>शनैश्चरो लोहिताङ्गो ज्वलनाङ्गासमद्युती॥ ३९<br>समं समधिरोहन्तः सर्वे ते गगनेचराः।<br>शृङ्गानि शनकैर्घोरा युगान्तावर्तिनो ग्रहाः॥ ४०इस प्रकार सभी मायाओंके नष्ट हो जानेपर तेजोहीन दैत्य अपने स्वामी हिरण्यकशिपुकी शरणमें गये। यह देख वह अपने तेजसे जगत्को जलाता-सा क्रोधसे प्रज्वलित हो उठा। उस दैत्येन्द्रके क्रुद्ध होनेपर सारा जगत् अन्धकारमय हो गया। पुनः आवह, प्रवह, विवह, उदावह, परावह, संवह तथा श्रीमान् परिवह—ये महान् बल एवं पराक्रमसे सम्पन्न आकाशचारी सातों वायुमार्ग उत्पातके भयकी सूचना देते हुए क्षुब्ध हो उठे। समस्त लोकोंके विनाशके अवसरपर जो ग्रह प्रकट होते हैं, वे सभी आकाशमें दृष्टिगोचर होकर सुखपूर्वक विचरण करने लगे। राहुने अमा एवं पूर्णिमाके बिना ही ग्रहणका दृश्य उपस्थित कर दिया। रातमें नक्षत्रों और ग्रहोंसहित राकापति शत्रुसूदन चन्द्रमा और दिनमें भगवान् सूर्य कान्तिहीन हो गये तथा आकाशमें अत्यन्त विशाल काले रंगका कबन्ध (धूमकेतु) दिखायी देने लगा। भगवान् अग्नि एक ओर पृथ्वीपर रहकर चिनगारियाँ छोड़ने लगे और दूसरी ओर वे निरन्तर आकाशमें भी स्थित दिखायी दे रहे थे। आकाशमण्डलमें धुएँकी-सी कान्तिवाले सात भयंकर सूर्य प्रकट हो गये। ग्रहगण आकाशमें स्थित चन्द्रमाके शिखरपर स्थित हो गये। उनके वामभागमें शुक्र और दाहिने भागमें बृहस्पति स्थित हो गये। अग्निके समान कान्तिमान् शनैश्चर और मङ्गल भी दृष्टिगोचर हुए। युगान्तके समय प्रकट होनेवाले वे सभी भयंकर ग्रह शनैः-शनैः एक साथ शिखरोंपर आरूढ़ हो आकाशमें विचरण करने लगे॥ ३०—४०॥
चन्द्रमाश्च सनक्षत्रैर्ग्रहैः सह तमोनुदः।<br>चराचरविनाशाय रोहिणीं नाभ्यनन्दत॥ ४१<br>गृह्यते राहुणा चन्द्र उल्काभिरभिहन्यते।<br>उल्काः प्रज्वलिताश्चन्द्रे विचरन्ति यथासुखम्॥ ४२इसी प्रकार अन्धकारका विनाश करनेवाले चन्द्रमा नक्षत्रों और ग्रहोंके साथ रहकर चराचर जगत्का विनाश करनेके लिये रोहिणीका अभिनन्दन नहीं कर रहे थे। राहु चन्द्रमाको ग्रस्त कर रहा था और उल्काएँ उन्हें मार भी रही थीं। प्रज्वलित उल्काएँ चन्द्रलोकमें सुखपूर्वक

* अध्याय १६३ * । ६८१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देवानामपि यो देवः सोऽप्यवर्षत शोणितम्।<br>अपतनगनादुल्का विद्युद्रूपा महास्वनाः॥ ४३<br>अकाले च द्रुमाः सर्वे पुष्पन्ति च फलन्ति च।<br>लताश्च सफलाः सर्वा ये चाहुर्दैत्यनाशनम्॥ ४४<br>फलैः फलान्यजायन्त पुष्पैः पुष्पं तथैव च।<br>उन्मीलन्ति निमीलन्ति हसन्ति च रुदन्ति च॥ ४५<br>विक्रोशन्ति च गम्भीरा धूमयन्ति ज्वलन्ति च।<br>प्रतिमाः सर्वदेवानां वेदयन्ति महत् भयम्॥ ४६<br>आरण्यैः सह संसृष्टा ग्राम्याश्च मृगपक्षिणः।<br>चक्रुः सुभैरवं तत्र महायुद्धमुपस्थितम्॥ ४७<br>नद्यश्च प्रतिकूलानि वहन्ति कलुषोदकाः।<br>न प्रकाशन्ति च दिशो रक्तरेणुसमाकुलाः॥ ४८<br>वानस्पत्यो न पूज्यन्ते पूजनार्हाः कथञ्चन।<br>वायुवेगेन हन्यन्ते भज्यन्ते प्रणमन्ति च॥ ४९विचरण कर रही थीं। जो देवताओंका भी देवता (इन्द्र) है, वह रक्तकी वर्षा करने लगा। आकाशसे बिजलीकी-सी कान्तिवाली उल्काएँ भयंकर शब्द करती हुई पृथ्वीपर गिरने लगीं। सभी वृक्ष असमयमें ही फूलने और फलने लगे तथा सभी लताएँ फलसे युक्त हो गयीं, जो दैत्योंके विनाशकी सूचना दे रही थीं। फलोंसे फल तथा फूलोंसे फूल प्रकट होने लगे। सभी देवताओंकी मूर्तियाँ कभी आँख फाड़कर देखतीं, कभी आँखें बंद कर लेतीं, कभी हँसती थीं तो कभी रोने लगती थीं। वे कभी जोर-जोरसे चिल्लाने लगती थीं, कभी गम्भीररूपसे धुआँ फेंकती थीं तो कभी प्रज्वलित हो जाती थीं। इस प्रकार वे महान् भयकी सूचना दे रही थीं। उस समय ग्रामीण मृग-पक्षी वन्य मृग-पक्षियोंसे संयुक्त होकर अत्यन्त भयंकर महान् युद्ध करने लगे। गंदे जलसे भरी हुई नदियाँ उलटी दिशामें बहने लगीं। रक्त और धूलसे व्याप्त दिशाएँ दिखायी नहीं दे रही थीं। पूजनीय वृक्षोंकी किसी प्रकार पूजा (रक्षा) नहीं हो रही थी। वे वायुके झोंकेसे प्रताडित हो रहे थे, झुक जाते थे और टूट भी जाते थे॥ ४१—४९॥
यदा च सर्वभूतानां छाया न परिवर्तते।<br>अपराह्नगते सूर्ये लोकानां युगसंक्षये॥ ५०<br>तदा हिरण्यकशिपोर्दैत्यस्योपरि वेश्मनः।<br>भाण्डागारायुधागारे निविष्टमभवन्मधु॥ ५१<br>असुराणां विनाशाय सुराणां विजयाय च।<br>दृश्यन्ते विविधोत्पाता घोरा घोरनिदर्शनाः॥ ५२इस प्रकार लोकोंके युगान्तके समय सूर्यके अपराह्नसमयमें पहुँचनेपर जब सभी प्राणियोंकी छायामें कोई परिवर्तन नहीं दीखने लगा, तब दैत्यराज हिरण्यकशिपुके महल, भाण्डारागार और आयुधागारके ऊपर मधु टपकने लगा। इस प्रकार असुरोंके विनाश और देवताओंकी विजयके लिये भयकी सूचना देनेवाले अनेकों प्रकारके भयंकर उत्पात दिखायी दे रहे थे।
एते चान्ये च बहवो घोरोत्पाताः समुत्थिताः।<br>दैत्येन्द्रस्य विनाशाय दृश्यन्ते कालनिर्मिताः॥ ५३ये तथा इनके अतिरिक्त और भी बहुत-से भयंकर उत्पात, जो कालद्वारा निर्मित थे, दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपुके विनाशके लिये प्रकट हुए दीख रहे थे।
मेदिन्यां कम्पमानायां दैत्येन्द्रेण महात्मना।<br>महीधरा नागगणा निपेतुरमितौजसः॥ ५४<br>विषज्वालाकुलैर्वक्त्रैर्विमुञ्चन्तो हुताशनम्।<br>चतुःशीर्षाः पञ्चशीर्षाः सप्तशीर्षाश्च पन्नगाः॥ ५५<br>वासुकिस्तक्षकश्चैव कर्कोटकधनञ्जयौ।<br>एलामुखः कालियश्च महापद्मश्च वीर्यवान्॥ ५६<br>सहस्रशीर्षो नागो वै हेमतालध्वजः प्रभुः।<br>शेषोऽनन्तोमहाभागो दुष्प्रकम्प्यः प्रकम्पितः॥ ५७महान् आत्मबलसे सम्पन्न दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपुद्वारा पृथ्वीके प्रकम्पित किये जानेपर पर्वत तथा अमित तेजस्वी नागगण गिरने लगे। वे चार, पाँच अथवा सात सिरवाले नाग विषकी ज्वालासे व्याप्त मुखोंद्वारा अग्नि उगलने लगे। वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, धनञ्जय, एलामुख, कालिय, पराक्रमी महापद्म, एक हजार फणोंवाला सामर्थ्यशाली नाग हेमतालध्वज तथा महान् भाग्यशाली अनन्त शेषनाग—इन सबका काँपना यद्यपि अत्यन्त कठिन था, तथापि ये सभी काँप उठे।

१६६- महाप्रलयका वर्णन

६८२ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दीप्तान्यन्तर्जंलस्थानि पृथिवीधरणानि च।<br>तदा क्रुद्धेन महता कम्पितानि समन्ततः॥५८<br>नागास्तेजोधराश्चापि पातालतलचारिणः।<br>हिरण्यकशिपुर्द्दैत्यस्तदा संस्पृष्टवान् महीम्॥५९<br>संदष्टौष्ठपुटः क्रोधाद्वारह इव पूर्वजः।उसने चारों ओर जलके भीतर स्थित रहनेवाले उदीप्त पर्वतोंको भी अत्यन्त क्रोधवश कँपा दिया। उस समय पाताललोकमें विचरण करनेवाले तेजस्वी नाग भी प्रकम्पित हो उठे। इस प्रकार दैत्यराज हिरण्यकशिपु क्रोधवश दाँतोंसे होंठोंको दबाये हुए जब पृथ्वीपर खड़ा हुआ तो वह पूर्वकालमें प्रकट हुए वाराहकी तरह दीख रहा था॥५०—५९१/२॥
नदी भागीरथी चैव शरयूः कौशिकी तथा॥६०<br>यमुना त्वथ कावेरी कृष्णवेणा च निम्नगा।<br>सुवेणा च महाभागा नदी गोदावरी तथा॥६१<br>चर्मण्वती च सिन्धुश्च तथा नदनदीपतिः।<br>कमलप्रभवश्चैव शोणो मणिनिभोदकः॥६२<br>नर्मदा शुभतोया च तथा वेत्रवती नदी।<br>गोमती गोकुलाकीर्णा तथा पूर्वसरस्वती॥६३<br>मही कालमही चैव तमसा पुष्पवाहिनी।<br>जम्बूद्वीपं रत्नवटं सर्वरत्नोपशोभितम्॥६४<br>सुवर्णप्रकटं चैव सुवर्णकरमण्डितम्।<br>महानदं च लौहित्यं शैलकाननशोभितम्॥६५<br>पत्तनं कोशकरणमृषिवीरजनाकरम्।<br>मागधाश्च महाग्रामा मुण्डाः शृङ्गास्तथैव च॥६६<br>सुह्मा मल्ला विदेहाश्च मालवाः काशिकोसलाः।<br>भवनं वैनतेयस्य दैत्येन्द्रेणाभिकम्पितम्॥६७<br>कैलासशिखराकारं यत् कृतं विश्वकर्मणा।<br>रक्ततोयो महाभीमो लौहित्यो नाम सागरः॥६८<br>उदयश्च महाशैल उत्थितः शतयोजनम्।<br>सुवर्णवेदिकः श्रीमान् मेघपङ्क्तिनिषेवितः॥६९<br>भ्राजमानोऽर्कसदृशैर्जातरूपमयैर्द्रुमैः।<br>शालैस्तालैस्तमालैश्च कर्णिकारैश्च पुष्पितैः॥७०<br>अयोमुखश्च विख्यातः पर्वतो धातुमण्डितः।<br>तमालवनगन्धश्च पर्वतो मलयः शुभः॥७१<br>सुराष्ट्राश्च सबाहीकाः शूराभीरास्तथैव च।<br>भोजाः पाण्ड्याश्च वङ्गाश्च कलिङ्गास्ताम्रलिप्तकाः॥७२<br>तथैवोण्ड्राश्च पौण्ड्राश्च वामचूडाः सकेरलाः।<br>क्षोभितास्तेन दैत्येन सदेवाश्चाप्सरोगणाः॥७३इसी प्रकार भागीरथी नदी, सरयू, कौशिकी, यमुना, कावेरी, कृष्णवेणा नदी, महाभागा, सुवेणा, गोदावरी नदी, चर्मण्वती, सिन्धु, नद और नदियोंका स्वामी, कमल उत्पन्न करनेवाला तथा मणिसदृश जलसे परिपूर्ण शोण, पुण्यसलिला नर्मदा, वेत्रवती नदी, गोकुलसे सेवित होनेवाली गोमती, प्राचीसरस्वती, मही, कालमही, तमसा, पुष्पवाहिनी, जम्बूद्वीप, सम्पूर्ण रत्नोंसे सुशोभित रत्नवट, सुवर्णकी खानोंसे युक्त सुवर्णप्रकट, पर्वतों और काननोंसे सुशोभित महानद लौहित्य, ऋषियों और वीरजनोंका उत्पत्तिस्थानस्वरूप कोशकरण नामक नगर, बड़े-बड़े ग्रामोंसे युक्त मागध, मुण्ड, शृङ्ग, सुह्म, मल्ल, विदेह, मालव, काशी, कोसल—इन सबको तथा गरुडके भवनको, जो कैलासके शिखरकी-सी आकृतिवाला था तथा जिसे विश्वकर्माने बनाया था, उस दैत्येन्द्रने प्रकम्पित कर दिया। रक्तरूपी जलसे भरा हुआ महान् भयंकर लौहित्य सागर तथा जो स्वर्णमयी वेदिकासे युक्त, शोभाशाली, मेघकी पङ्क्तियोंद्वारा सुसेवित और सूर्य-सदृश एवं स्वर्णमय खिले हुए साल, ताल, तमाल और कनेरके वृक्षोंसे सुशोभित है, वह सौ योजन ऊँचा महान् पर्वत उदयाचल, धातुओंसे विभूषित अयोमुख नामक विख्यात पर्वत, तमाल-वनके गन्धसे सुवासित सुन्दर मलय पर्वत, सुराष्ट्र, बाहीक, शूर, आभीर, भोज, पाण्ड्य, वङ्ग, कलिङ्ग, ताम्रलिप्तक, उण्ड्र, पौण्ड्र, केरल—इन सबको तथा देवों और अप्सराओंके समूहोंको उस दैत्यने क्षुब्ध कर दिया॥६०–७३॥
अगस्त्यभवनं चैव यदगम्यं कृतं पुरा।<br>सिद्धचारणसङ्घैश्च विप्रकीर्णं मनोहरम्॥७४इसी प्रकार जो पहले अगम्य कर दिया गया था तथा सिद्धों और चारणोंके समूहोंसे व्याप्त,
  • अध्याय १६३ * | ६८३ ---|---:

| विचित्रनानाविहगं सुपुष्पितमहाद्रुमम्।<br>जातरूपमयैः शृङ्गैरप्सरोगणनादितम्॥ ७५<br>गिरिपुष्पितकश्चैव लक्ष्मीवान् प्रियदर्शनः।<br>उत्थितः सागरं भित्त्वा विश्रामश्चन्द्रसूर्ययोः।<br>रराज सुमहाशृङ्गैर्गगनं विलिखन्निव॥ ७६<br>चन्द्रसूर्यांशुसङ्काशैः सागराम्बुसमावृतैः।<br>विद्युत्वान् सर्वतः श्रीमानायतः शतयोजनम्॥ ७७<br>विद्युतां यत्र सङ्घाता निपात्यन्ते नगोत्तमे।<br>ऋषभः पर्वतश्चैव श्रीमान् वृषभसंज्ञितः॥ ७८<br>कुञ्जरः पर्वतः श्रीमान् यत्रागस्त्यगृहं शुभम्।<br>विशालाक्षश्च दुर्धर्षः सर्पाणामालयः पुरी॥ ७९<br>तथा भोगवती चापि दैत्येन्द्रेणाभिकम्पिता।<br>महासेनो गिरिश्चैव पारियात्रश्च पर्वतः॥ ८०<br>चक्रवांश्च गिरिश्रेष्ठो वाराहश्चैव पर्वतः।<br>प्राग्ज्योतिषपुरं चापि जातरूपमयं शुभम्॥ ८१<br>यस्मिन् वसति दुष्टात्मा नरको नाम दानवः।<br>मेघश्च पर्वतश्रेष्ठो मेघगम्भीरनिःस्वनः॥ ८२<br>षष्टिस्तत्र सहस्राणि पर्वतानां द्विजोत्तमाः।<br>तरुणादित्यसंकाशो मेरुस्तत्र महागिरिः॥ ८३<br>यक्षराक्षसगन्धर्वैर्नित्यं सेवितकन्दरः।<br>हेमगर्भो महाशैलस्तथा हेमसंखो गिरिः॥ ८४<br>कैलासश्चैव शैलेन्द्रो दानवेन्द्रेण कम्पिताः। | मनोहर, नाना प्रकारके रंग-विरंगे पक्षियोंसे युक्त और पुष्पोंसे लदे हुए महान् वृक्षोंसे सुशोभित था, उस अगस्त्य-भवनको भी कँपा दिया। इसके बाद जो लक्ष्मीवान्, प्रियदर्शन और अपने अत्यन्त ऊँचे शिखरोंसे आकाशमें रेखा-सी खींच रहा था तथा चन्द्रमा और सूर्यको विश्राम देनेके लिये सागरका भेदन कर बाहर निकला था, वह पुष्पितक गिरि अपने स्वर्णमय शिखरोंसे शोभा पा रहा था। फिर चन्द्रमा और सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले एवं सागरके जलसे घिरे हुए शिखरोंसे युक्त शोभाशाली विद्युत्वान् पर्वत था, जो सब ओरसे सौ योजन विस्तृत था। उस पर्वतश्रेष्ठपर बिजलियोंके समूह गिराये जाते थे। वृषभ नामसे पुकारा जानेवाला शोभासम्पन्न ऋषभ पर्वत तथा शोभाशाली कुंजर पर्वत, जिसपर महर्षि अगस्त्यका सुन्दर आश्रम था। सर्पोंका दुर्धर्ष निवासस्थान विशालाक्ष तथा भोगवती पुरी—ये सभी दैत्येन्द्रद्वारा प्रकम्पित कर दिये गये। द्विजवरो! वहाँ महासेन गिरि, पारियात्र पर्वत, गिरिश्रेष्ठ चक्रवान्, वाराह पर्वत, स्वर्णनिर्मित रमणीय प्राग्ज्योतिषपुर, जिसमें नरक नामक दुष्टात्मा दानव निवास करता है, बादलोंके समान गम्भीर शब्द करनेवाला पर्वतश्रेष्ठ मेघ आदि साठ हजार पर्वत थे, वहीं मध्याह्नकालीन सूर्यके समान प्रकाशमान विशाल पर्वत मेरु था, जिसकी कन्दराओंमें यक्ष, राक्षस और गन्धर्व नित्य निवास करते थे। महान् पर्वत हेमगर्भ, हेमसंख गिरि तथा पर्वतराज कैलास—इन सबको भी दानवेन्द्र हिरण्यकशिपुने कँपा दिया॥ ७४-८४ ½ ॥ | | हेमपुष्करसंछन्नं तेन वैखानसं सरः॥ ८५<br>कम्पितं मानसं चैव हंसकारण्डवाकुलम्।<br>त्रिशृङ्गपर्वतश्चैव कुमारी च सरिद्वरा॥ ८६<br>तुषारचयसंच्छन्नो मन्दरश्चापि पर्वतः।<br>उशीरबिन्दुश्च गिरिश्चन्द्रप्रस्थस्तथाद्रिराट्॥ ८७<br>प्रजापतिगिरिश्चैव तथा पुष्करपर्वतः।<br>देवाभ्रपर्वतश्चैव तथा वै रेणुको गिरिः॥ ८८<br>क्रौञ्चः सप्तर्षिशैलश्च धूप्रवर्णश्च पर्वतः।<br>एते चान्ये च गिरयो देशा जनपदास्तथा॥ ८९<br>नद्यः ससागराः सर्वाः सोऽकम्पयत दानवः।<br>कपिलश्च महीपुत्रो व्याघ्रवांश्चैव कम्पितः॥ ९० | हिरण्यकशिपुने स्वर्ण-सदृश कमल-पुष्पोंसे आच्छादित वैखानस सरोवर तथा हंसों और बतखोंसे भरे हुए मानसरोवरको भी कम्पित कर दिया। इसके बाद त्रिशृङ्ग पर्वत, नदियोंमें श्रेष्ठ कुमारी नदी, तुषारसमूहसे आच्छादित मन्दर पर्वत, उशीरविन्दु गिरि, पर्वतराज चन्द्रप्रस्थ, प्रजापति गिरि, पुष्कर पर्वत, देवाभ्र पर्वत, रेणुक गिरि, क्रौंच पर्वत, सप्तर्षिशैल तथा धूप्रवर्ण पर्वत—इनको तथा इनके अतिरिक्त अन्यान्य पर्वतों, देशों, जनपदों तथा सागरोंसहित सभी नदियोंको उस दानवने कम्पित कर दिया। साथ ही महीपुत्र कपिल और व्याघ्रवान् भी काँप उठे। |

१६७- भगवान् विष्णुका एकार्णवके जलमें शयन, मार्कण्डेयको आश्चर्य तथा भगवान् विष्णु और मार्कण्डेयका संवाद

६८४* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
खेचराश्च सतीपुत्राः पातालतलवासिनः।<br>गणस्तथा परो रौद्रो मेघनामाङ्कुशायुधः॥ ९१<br>ऊर्ध्वगो भीमवेगश्च सर्व एवाभिकम्पिताः।<br>गदी शूली करालश्च हिरण्यकशिपुस्तदा॥ ९२<br>जीमूतघनसङ्काशो जीमूतघननिःस्वनः।<br>जीमूतघननिर्घोषो जीमूत इव वेगवान्॥ ९३<br>देवारिर्दितिजो वीरो नृसिंहं समुपाद्रवत्।<br>समुत्पत्य ततस्तीक्ष्णैर्मृगेन्द्रेण महानखैः॥ ९४<br>तदोंकारसहायेन विदार्य निहतो युधि।आकाशचारी एवं पाताललोकमें निवास करनेवाले सतीके पुत्र, अङ्कुशको अस्त्ररूपमें धारण करनेवाला परम भयंकर मेघ नामक गण तथा ऊर्ध्वग और भीमवेग—ये सभी कँपा दिये गये। तदनन्तर जो गदा और त्रिशूल धारण किये हुए था, जिसकी आकृति बड़ी विकराल थी, जो देवताओंका शत्रु, घने बादलके समान कान्तिमान्, घने बादल-जैसा बोलनेवाला, घने बादल-सदृश गरजनेवाला और बादल-सा वेगशाली था, उस दितिनन्दन वीरवर हिरण्यकशिपुने भगवान् नरसिंहपर आक्रमण किया। तब युद्धस्थलमें ओंकारकी सहायतासे भगवान् नरसिंहने आकाशमें उछलकर अपने तीखे विशाल नखोंसे उनके वक्षःस्थलको विदीर्ण कर उसे मार डाला॥ ८५—९४ १/२॥
मही च कालश्च शशी नभश्च<br>ग्रहाश्च सूर्यश्च दिशश्च सर्वाः।<br>नद्यश्च शैलाश्च महार्णवाश्च<br>गताः प्रसादं दितिपुत्रनाशात्॥ ९५<br>ततः प्रमुदिता देवा ऋषयश्च तपोधनाः।<br>तुष्टुवुर्नामभिर्दिव्यैरादिदेवं सनातनम्॥ ९६<br>यत्त्वया विहितं देव नारसिंहमिदं वपुः।<br>एतदेवार्चयिष्यन्ति परावरविदो जनाः॥ ९७इस प्रकार उस दितिपुत्र हिरण्यकशिपुके मौतके मुखमें चले जानेसे पृथ्वी, काल, चन्द्रमा, आकाश, ग्रहगण, सूर्य, सभी दिशाएँ, नदियाँ, पर्वत और महासागर प्रसन्न हो गये। तदनन्तर हर्षसे फूले हुए देवता और तपोधन ऋषिगण दिव्य नामोंद्वारा उन अविनाशी आदि देवकी स्तुति करते हुए कहने लगे—'देव! आपने जो यह नरसिंहका शरीर धारण किया है, इसकी पूर्वापरके ज्ञाता लोग अर्चना करेंगे'॥ ९५—९७॥
ब्रह्मोवाच<br>भवान् ब्रह्मा च रुद्रश्च महेन्द्रो देवसत्तमः।<br>भवान् कर्ता विकर्ता च लोकानां प्रभवाव्ययः॥ ९८<br>परां च सिद्धिं च परं च देवं<br>परं च मन्त्रं परमं हविश्च।<br>परं च धर्मं परमं च विश्वं<br>त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ ९९<br>परं शरीरं परमं च ब्रह्म<br>परं च योगं परमां च वाणीम्।<br>परं रहस्यं परमां गतिं च<br>त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ १००<br>एवं परस्यापि परं पदं यत्<br>परं परस्यापि परं च देवम्।<br>परं परस्यापि परं च भूतं<br>त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ १०१ब्रह्माजीने कहा—देव! आप ही ब्रह्मा, रुद्र और देवश्रेष्ठ महेन्द्र हैं। आप ही लोकोंके कर्ता, संहर्ता और उत्पत्तिस्थान हैं। आपका कभी विनाश नहीं होता। आपको ही परमोत्कृष्ट सिद्धि, परात्पर देव, परम मन्त्र, परम हवि, परम धर्म, परम विश्व और आदि पुराणपुरुष कहा जाता है। आपको ही परम शरीर, परम ब्रह्म, परम योग, परमा वाणी, परम रहस्य, परम गति और अग्रजन्मा पुराण पुरुष कहा जाता है। इसी प्रकार जो परात्पर पद, परात्पर देव, परात्पर भूत और सर्वश्रेष्ठ पुराणपुरुष है, वह आप ही हैं।
* अध्याय १६४ *६८५
परं परस्यापि परं रहस्यं<br>  परं परस्यापि परं महत्त्वम्।<br>परं परस्यापि परं महद्द्यत्<br>  त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ १०२<br>परं परस्यापि परं निधानं<br>  परं परस्यापि परं पवित्रम्।<br>परं परस्यापि परं च दान्तं<br>  त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ १०३<br>एवमुक्त्वा तु भगवान् सर्वलोकपितामहः।<br>स्तुत्वा नारायणं देवं ब्रह्मलोकं गतः प्रभुः॥ १०४<br>ततो नदत्सु तूर्येषु नृत्यन्तीष्वप्सरःसु च।<br>क्षीरोदस्योत्तरं कूलं जगाम हरिरीश्वरः॥ १०५<br>नारसिंहं वपुर्देवः स्थापयित्वा सुदीप्तिमत्।<br>पौराणं रूपमास्थाय प्रययौ गरुडध्वजः॥ १०६<br>अष्टचक्रेण यानेन भूतयुक्तेन भास्वता।<br>अव्यक्तप्रकृतिर्देवः स्वस्थानं गतवान् प्रभुः॥ १०७जो परात्पर रहस्य, परात्पर महत्त्व और परात्पर महत्तत्त्व है, वह सब आप अग्रजन्मा पुराणपुरुषको ही कहा जाता है। आप सर्वश्रेष्ठ पुराणपुरुषको परसे भी परम निधान, परसे भी परम पवित्र और परसे भी परम उदार कहा जाता है। ऐसा कहकर सम्पूर्ण लोकोंके पितामह सामर्थ्यशाली भगवान् ब्रह्मा नारायणदेवकी स्तुति कर ब्रह्मलोकको चले गये। उस समय तुरहियाँ बज रही थीं और अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं। इसी बीच जगदीश्वर श्रीहरि क्षीरसागरके उत्तर तटपर जानेके लिये उद्यत हुए। वहाँसे जाते समय भगवान् गरुडध्वजने परम कान्तिमान् उस नरसिंह-शरीरको जगत्में स्थापित कर अपने पुराने रूपको धारण कर लिया था। फिर अव्यक्त प्रकृतिवाले भगवान् विष्णु पञ्चभूतोंसे युक्त एवं चमकीले आठ पहियेवाले रथपर सवार हो अपने निवास स्थानको चले गये॥ ९८—१०७॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे हिरण्यकशिपुवधो नाम त्रिषष्ठ्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें हिरण्यकशिपु-वध नामक एक सौ तिरसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६३॥


एक सौ चौंसठवाँ अध्याय

पद्मोद्भवके प्रसङ्गमें मनुद्वारा भगवान् विष्णुसे सृष्टिसम्बन्धी विविध प्रश्न और भगवान्का उत्तर

ऋषय ऊचुः<br>कथितं नरसिंहस्य माहात्म्यं विस्तरेण च।<br>पुनस्तस्यैव माहात्म्यमन्यद्विस्तरतो वद॥ १<br>पद्मरूपमभूदेतत् कथं हेममयं जगत्।<br>कथं च वैष्णवी सृष्टिः पद्ममध्येऽभवत् पुरा॥ २**ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! आप भगवान् नरसिंहके माहात्म्यका तो विस्तारपूर्वक वर्णन कर चुके, अब पुनः उन्हीं भगवान्के दूसरे माहात्म्यको विस्तारपूर्वक बतलाइये। भला, पूर्वकालमें स्वर्णमय कमलसे यह जगत् कैसे उत्पन्न हुआ था और उस कमलमेंसे वैष्णवी सृष्टि कैसे प्रादुर्भूत हुई थी?॥ १-२॥
सूत उवाच<br>श्रुत्वा च नरसिंहस्य माहात्म्यं रविनन्दनः।<br>विस्मयोत्फुल्लनयनः पुनः पप्रच्छ केशवम्॥ ३**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! भगवान् नरसिंहके माहात्म्यको सुनकर सूर्यपुत्र मनुके नेत्र आश्चर्यसे उत्फुल्ल हो उठे, तब उन्होंने पुनः भगवान् केशवसे प्रश्न किया॥ ३॥
मनुरुवाच<br>कथं पाद्मे महाकल्पे तव पद्ममयं जगत्।<br>जलार्णवगतस्येह नाभौ जातं जनार्दन॥ ४**मनुने पूछा—**जनार्दन! 'पाद्मकल्प' में जब आप इस जलार्णवके मध्यमें स्थित थे, तब आपकी नाभिसे यह पद्ममय जगत् कैसे उत्पन्न हुआ था?
६८६* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रभावात् पद्मनाभस्य स्वपतः सागराम्भसि।<br>पुष्करे च कथं भूता देवाः सर्षिगणाः पुरा॥ ५<br>एनमाख्याहि निखिलं योगं योगविदां पते।<br>शृण्वतस्तस्य मे कीर्तिं न तृप्तिरुपजायते॥ ६<br>कियता चैव कालेन शेते वै पुरुषोत्तमः।<br>कियन्तं वा स्वपिति च कोऽस्य कालस्य सम्भवः॥ ७<br>कियता वाथ कालेन ह्युत्तिष्ठति महायशाः।<br>कथं चोत्थाय भगवान् सृजते निखिलं जगत्॥ ८<br>के प्रजापतयस्तावदासन् पूर्वं महामुने।<br>कथं निर्मितावांश्चैव चित्रं लोकं सनातनम्॥ ९<br>कथमेकार्णवे शून्ये नष्टस्थावरजङ्गमे।<br>दग्धे देवासुरनरे प्रनष्टोरगराक्षसे॥ १०<br>नष्टानिलानले लोके नष्टाकाशमहीतले।<br>केवलं गह्वरीभूते महाभूतविपर्यये॥ ११<br>विभुर्महाभूतपतिर्महातेजा महाकृतिः।<br>आस्ते सुरवरश्रेष्ठो विधिमास्थाय योगवित्॥ १२<br>शृणुयां परया भक्त्या ब्रह्मैनेतदशेषतः।<br>वक्तुमर्हसि धर्मिष्ठ यशो नारायणात्मकम्॥ १३<br>श्रद्धया चोपविष्टानां भगवन् वक्तुमर्हसि॥ १४पूर्वकालमें समुद्रके जलमें शयन करनेवाले भगवान् पद्मनाभके प्रभावसे उस कमलमें ऋषिगणोंसहित देवगण कैसे उत्पन्न हुए थे? योगवेत्ताओंके अधीश्वर! इस सम्पूर्ण योगका वर्णन कीजिये; क्योंकि भगवान्की कीर्तिका वर्णन सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है। (कृपया यह बतलाइये कि) भगवान् पुरुषोत्तम कितने समयके पश्चात् शयन करते हैं? कितने कालतक सोते हैं? इस कालका उद्भव (निर्धारण) कहाँसे होता है? फिर वे महायशस्वी भगवान् कितने समयके बाद निद्रा त्यागकर उठते हैं? निद्रासे उठकर वे भगवान् किस प्रकार सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं? महामुने! पूर्वकालमें कौन-कौन-से प्रजापति थे? इस विचित्र सनातन लोकका निर्माण किस प्रकार किया गया था? महाप्रलयके समय जब स्थावर-जङ्गम-सभी प्राणी नष्ट हो जाते हैं, देवता, राक्षस और मनुष्य जलकर भस्म हो जाते हैं, नागों और राक्षसोंका विनाश हो जाता है, लोकमें अग्नि, वायु, आकाश और पृथ्वीतलका सर्वथा लोप हो जाता है, उस समय पञ्चमहाभूतोंका विपर्यय हो जानेपर केवल घना अन्धकार छाया रहता है, तब उस शून्य एकार्णवके जलमें सर्वव्यापी, पञ्चमहाभूतोंके स्वामी, महातेजस्वी, विशालकाय, सुरेश्वरोंमें श्रेष्ठ एवं योगवेत्ता भगवान् किस प्रकार विधिका सहारा लेकर स्थित रहते हैं? ब्रह्मन्! यह सारा प्रसङ्ग मैं परम भक्तिके साथ सुनना चाहता हूँ। धर्मिष्ठ! आप इस नारायण-सम्बन्धी यशका वर्णन कीजिये। भगवन्! हमलोग श्रद्धापूर्वक आपके समक्ष बैठे हैं, अतः आप इसका अवश्य वर्णन कीजिये॥ ४—१४ ॥
मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
नारायणस्य यशसः श्रवणे या तव स्पृहा।<br>तद्वंश्यान्वयभूतस्य न्याय्यं रविकुलर्षभ॥ १५<br>शृणुष्वादिपुराणेषु वेदेभ्यश्च यथा श्रुतम्।<br>ब्राह्मणानां च वदतां श्रुत्वा वै सुमहात्मनाम्॥ १६<br>यथा च तपसा दृष्ट्वा बृहस्पतिसमद्युतिः।<br>पराशरसुतः श्रीमान् गुरुद्वैपायनोऽब्रवीत्॥ १७<br>तत्तेऽहं कथयिष्यामि यथाशक्ति यथाश्रुति।<br>यद्विज्ञातुं मया शक्यमृषिमात्रेण सत्तमाः॥ १८<br>कः समुत्सहते ज्ञातुं परं नारायणात्मकम्।<br>विश्वायनश्च यद् ब्रह्मा न वेदयति तत्त्वतः॥ १९सूर्यकुलसत्तम! नारायणकी यशोगाथा सुननेमें जो आपकी विशेष स्पृहा है, यह नारायणके वंशजोंके कुलमें उत्पन्न होनेवाले आपके लिये उचित ही है। मैंने पुराणों, वेदों तथा प्रवचनकर्ता श्रेष्ठ महात्मा ब्राह्मणोंके मुखसे जैसा सुना है तथा बृहस्पतिके समान कान्तिमान् पराशरनन्दन गुरुदेव श्रीमान् कृष्णद्वैपायन व्यासजीने तपोबलसे साक्षात्कार करके जैसा मुझे बतलाया है, वही मैं अपनी जानकारीके अनुसार यथाशक्ति आपसे वर्णन कर रहा हूँ, सावधानीपूर्वक श्रवण कीजिये। द्विजवरो! जिसे ऋषियोंमें केवल मैं ही जान सकता हूँ। जिसे विश्वके आश्रयस्थान ब्रह्मा भी तत्त्वपूर्वक नहीं जानते, नारायणके उस परम तत्त्वको जाननेके लिये दूसरा कौन उत्साह कर सकता है।
* अध्याय १६४ *६८७
तत्कर्म विश्ववेदानां तद्रहस्यं महर्षिणाम्।<br>तमिज्यं सर्वयज्ञानां तत्तत्त्वं सर्वदर्शिनाम्।<br>तदध्यात्मविदां चिन्त्यं नरकं च विकर्मिणाम्॥ २०<br>अधिदैवं च यद्दैवमधियज्ञं सुसंज्ञितम्।<br>तद्भूतमधिभूतं च तत्परं परमर्षिणाम्॥ २१<br>स यज्ञो वेदनिर्दिष्टस्तत्तपः कवयो विदुः।<br>यः कर्ता कारको बुद्धिमर्नः क्षेत्रज्ञ एव च॥ २२<br>प्रणवः पुरुषः शास्ता एकश्चेति विभाव्यते।<br>प्राणः पञ्चविधश्चैव ध्रुव अक्षर एव च॥ २३<br>कालः पाकश्च पक्ता च द्रष्टा स्वाध्याय एव च।<br>उच्यते विविधैर्देवः स एवायं न तत्परम्॥ २४<br>स एव भगवान् सर्वं करोति विकरोति च।<br>सोऽस्मान् कारयते सर्वान् सोऽत्येति व्याकुलीकृतान्॥ २५<br>यजामहे तमेवाद्यं तमेवेच्छाम निर्वृताः।<br>यो वक्ता यच्च वक्तव्यं यच्चाहं तद् ब्रवीमि वः॥ २६<br>श्रूयते यच्च वै श्राव्यं यच्चान्यत् परिजल्प्यते।<br>याः कथाश्चैव वर्तन्ते श्रुतयो वाथ तत्पराः।<br>विश्वं विश्वपतिर्यश्च स तु नारायणः स्मृतः॥ २७<br>यत्सत्यं यदमृतमक्षरं परं यत्-<br>यद्भूतं परममिदं च यद्भविष्यत्।<br>यत् किंचिच्चरमचरं यदस्ति चान्यत्<br>तत् सर्वं पुरुषवरः प्रभुः पुराणः॥ २८वही समस्त वेदोंका कर्म है। वही महर्षियोंका रहस्य है। सम्पूर्ण यज्ञोंद्वारा पूजनीय वही है। वही सर्वज्ञोंका तत्त्व है। अध्यात्मवेत्ताओंके लिये वही चिन्तनीय और कुकर्मियोंके लिये नरकस्वरूप है। उसीको अधिदेव, देव और अधियज्ञ नामसे अभिहित किया जाता है। वही भूत, अधिभूत और परमर्षियोंका परम तत्त्व है॥१५-२१॥<br><br>वेदोंद्वारा निर्दिष्ट यज्ञ वही है। विद्वान्लोग उसे तपरूपसे जानते हैं। जो कर्ता, कारक, बुद्धि, मन, क्षेत्रज्ञ, प्रणव, पुरुष, शास्ता और अद्वितीय कहा जाता है तथा विभिन्न देवता जिसे पाँच प्रकारका प्राण, अविनाशी ध्रुव, काल, पाक, पक्ता (पचानेवाला), द्रष्टा और स्वाध्याय कहते हैं, वह यही है। इसके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। वे ही भगवान् सम्पूर्ण जगत्के उत्पादक हैं और वे ही संहारक भी हैं। वे ही हम सब लोगोंको उत्पन्न करते हैं और अन्तमें व्याकुल करके नष्ट कर देते हैं। हमलोग उन्हीं आदि पुरुषकी यज्ञद्वारा आराधना करते हैं और निवृत्तिपरायण होकर उन्हींको प्राप्त करनेकी इच्छा करते हैं। जो वक्ता है, जो वक्तव्य है, जिसके विषयमें मैं आपलोगोंसे कह रहा हूँ, जो सुना जाता है, जो सुनने योग्य है, जिसके विषयमें अन्य सारी बातें कही जाती हैं, जो कथाएँ प्रचलित हैं, श्रुतियाँ जिसके परायण हैं, जो विश्वस्वरूप और विश्वका स्वामी है, वही नारायण कहा गया है। जो सत्य है, जो अमृत है, जो अक्षर है, जो परात्पर है, जो भूत है और जो भविष्यत् है, जो चर-अचर जगत् है, इसके अतिरिक्त अन्य जो कुछ है, वह सब कुछ सामर्थ्यशाली एवं सर्वश्रेष्ठ पुराणपुरुष ही है॥२२-२८॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावे चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रादुर्भाव-प्रसङ्गमें एक सौ चौंसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६४॥


६८८ * मत्स्यपुराण *


एक सौ पैंसठवाँ अध्याय

चारों युगोंकी व्यवस्थाका वर्णन

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तु कृतं युगम्।<br>तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा रविनन्दन ॥ १<br>यत्र धर्मश्चतुष्पादस्त्वधर्मः पादविग्रहः।<br>स्वधर्मनिरताः सन्तो जायन्ते यत्र मानवाः ॥ २<br>विप्राः स्थिता धर्मपरा राजवृत्तौ स्थिता नृपाः।<br>कृष्यामभिरता वैश्याः शूद्राः शुश्रूषवः स्थिताः ॥ ३<br>तदा सत्यं च शौचं च धर्मश्चैव विवर्धते।<br>सद्भिर्बाचरितं कर्म क्रियते ख्यायते च वै॥ ४<br>एतत्कार्त्तयुगं वृत्तं सर्वेषामपि पार्थिव।<br>प्राणिनां धर्मसङ्गानामपि वै नीचजन्मनाम् ॥ ५<br>त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते।<br>तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा परिकीर्त्यते ॥ ६<br>द्वाभ्यामधर्मः पादाभ्यां त्रिभिर्धर्मो व्यवस्थितः।<br>यत्र सत्यं च सत्त्वं च त्रेताधर्मो विधीयते ॥ ७<br>त्रेतायां विकृतिं यान्ति वर्णास्त्वेते न संशयः।<br>चतुर्वर्णस्य वैकृत्याद्यान्ति दौर्बल्यमाश्रमाः ॥ ८<br>एषा त्रेतायुगगतिर्विचित्रा देवनिर्मिता।<br>द्वापरस्य तु या चेष्टा तामपि श्रोतुमर्हसि ॥ ९रविनन्दन! कृतयुगकी अवधि चार हजार दिव्य वर्षोंकी बतलायी जाती है और उसकी संध्या उससे दुगुनी शती अर्थात् आठ सौ वर्षोंकी होती है। उस युगमें धर्म अपने चारों पादोंसे विद्यमान रहता है और अधर्म चतुर्थांशमात्र रहता है। उस युगमें उत्पन्न होनेवाले मानव अपने धर्ममें निरत रहते हैं। ब्राह्मण धर्म-पालनमें तत्पर रहते हैं। क्षत्रिय राज-धर्ममें स्थित रहते हैं। वैश्य कृषिकर्ममें लगे रहते हैं और शूद्र सेवाकार्यमें तल्लीन रहते हैं। उस समय सत्य, शौच और धर्मकी अभिवृद्धि होती है। सभी लोग सत्पुरुषोंद्वारा आचरित कर्मका अनुकरण करते हैं और उसकी प्रशंसा करते हैं। पार्थिव! कृतयुगका यह आचार सभी प्राणियोंमें पाया जाता है, चाहे वे धर्मप्राण विप्र आदि हों अथवा नीच जातिके हों। इसके बाद तीन हजार दिव्य वर्षोंका त्रेतायुग कहलाता है। उसकी संध्या उससे दुगुनी शती अर्थात् छः सौ वर्षकी कही गयी है। इस युगमें धर्म तीन चरणोंसे और अधर्म दो पादोंसे स्थित रहता है। उस समय त्रेताधर्म सत्य और सत्त्वगुणप्रधान माना जाता है। इसमें संदेह नहीं कि त्रेतायुगमें ये ब्राह्मणादि चारों वर्ण (कुछ) विकृत हो जाते हैं और इनके विकृत हो जानेके कारण चारों आश्रम भी दुर्बलताको प्राप्त हो जाते हैं। भगवान्द्वारा निर्मित त्रेतायुगकी यह विचित्र गति है। अब द्वापरयुगकी जो चेष्टा है, उसे भी सुनिये॥ १—९॥
द्वापरं द्वे सहस्रे तु वर्षाणां रविनन्दन।<br>तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा युगमुच्यते ॥ १०<br>तत्र चार्थपराः सर्वे प्राणिनो रजसा हताः।<br>सर्वे नैष्कृतिकाः क्षुद्रा जायन्ते रविनन्दन ॥ ११<br>द्वाभ्यां धर्मः स्थितः पद्भ्यामधर्मस्त्रिभिरुत्थितः।<br>विपर्ययाच्छनैर्धर्मः क्षयमेति कलौ युगे ॥ १२<br>ब्राह्मण्यभावस्य ततस्तथौत्सुक्यं विशीर्यते।<br>व्रतोपवासास्त्यज्यन्ते द्वापरे युगपर्यये ॥ १३रविनन्दन! द्वापरयुग दो हजार दिव्य वर्षोंका होता है। उसकी संध्या चार सौ वर्षोंकी कही जाती है। सूर्यपुत्र! उस युगमें रजोगुणसे ग्रस्त सभी प्राणी अर्थपरायण होते हैं। उस युगमें जन्म लेनेवाले सभी प्राणी निष्कर्मी एवं क्षुद्र विचारवाले होते हैं। उस समय धर्म दो चरणोंसे स्थित रहता है और अधर्मकी वृद्धि तीन चरणोंसे होती है। इस प्रकार धीरे-धीरे परिवर्तन होनेके कारण कलियुगमें धर्म नष्ट हो जाता है। द्वापरयुगके परिवर्तनके समय लोगोंमें ब्राह्मणोंके प्रति आस्था नष्ट हो जाती है और लोग व्रत-उपवास आदिको छोड़ बैठते हैं। उस समय

१६८- पञ्चमहाभूतोंका प्राकट्य तथा नारायणकी नाभिसे कमलकी उत्पत्ति

* अध्याय १६५ *६८९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तथा वर्षसहस्रं तु वर्षाणां द्वे शते अपि।<br>संध्यया सह संख्यातं क्रूरं कलियुगं स्मृतम्॥ १४<br>यत्राधर्मश्चतुष्पादः स्याद् धर्मः पादविग्रहः।<br>कामिनस्तपसा हीना जायन्ते तत्र मानवाः॥ १५<br>नैवातिसात्त्विकः कश्चिन्न साधुर्न च सत्यवाक्।<br>नास्तिका ब्रह्मभक्ता वा जायन्ते तत्र मानवाः॥ १६<br>अहंकारगृहीताश्च प्रक्षीणस्नेहबन्धनाः।<br>विप्राः शूद्रसमाचाराः सन्ति सर्वे कलौ युगे॥ १७<br>आश्रमाणां विपर्यासः कलौ सम्परिवर्तते।<br>वर्णानां चैव संदेहो युगान्ते रविनन्दन॥ १८क्रूर कलियुगका प्रवेश होता है, जिसकी संख्या संध्याके दो सौ वर्षोंसहित एक हजारकी बतलायी गयी है। उस युगमें अधर्म चारों पादोंसे प्रभावी हो जाता है और धर्म चतुर्थांशमात्र रह जाता है। उस युगमें जन्म लेनेवाले मानव कामपरायण और तपस्यासे हीन होते हैं। कलियुगमें उत्पन्न होनेवाले मानवोंमें न तो कोई अत्यन्त सात्त्विक होता है और न साधुस्वभाव एवं सत्यवादी ही होता है। सभी नास्तिक हो जाते हैं और अपनेको परब्रह्मका भक्त बतलाते हैं। लोग अहंकारके वशीभूत और प्रेमबन्धनसे रहित हो जाते हैं। कलियुगमें सभी ब्राह्मण शूद्रके समान आचरण करने लगते हैं। रविनन्दन ! कलियुगमें आश्रमोंमें भी परिवर्तन हो जाता है। युगान्तका समय आनेपर तो लोगोंमें वर्णोंका भी संदेह उत्पन्न हो जाता है॥ १०—१८॥
विद्याद् द्वादशसाहस्रीं युगाख्यां पूर्वनिर्मिताम्।<br>एवं सहस्रपर्यन्तं तदहर्ब्राह्ममुच्यते॥ १९<br>ततोऽहनि गते तस्मिन् सर्वेषामेव जीविनाम्।<br>शरीरनिर्वृत्तिं दृष्ट्वा लोकसंहारबुद्धितः॥ २०<br>देवतानां च सर्वासां ब्रह्मादीनां महीपते।<br>दैत्यानां दानवानां च यक्षराक्षसपक्षिणाम्॥ २१<br>गन्धर्वाणामप्सरसां भुजङ्गानां च पार्थिव।<br>पर्वतानां नदीनां च पशूनां चैव सत्तम।<br>तिर्यग्योनिगतानां च सत्त्वानां कृमिणां तथा॥ २२<br>महाभूतपतिः पञ्च हृत्वा भूतानि भूतकृत्।<br>जगत्संहरणार्थाय कुरुते वशसं महत्॥ २३<br>भूत्वा सूर्यश्चक्षुषी चाददानो<br>भूत्वा वायुः प्राणिनां प्राणजालम्।<br>भूत्वा वह्निर्दहन् सर्वलोकान्<br>भूत्वा मेघो भूय उग्रोऽप्यवर्षत्॥ २४महीपते ! इस प्रकार पूर्वकालमें निर्मित बारह हजारकी युग-संख्या जाननी चाहिये। इस प्रकार जब एक हजार चतुर्युगी बीत जाती है, तब ब्रह्माका एक दिन कहा जाता है। ब्रह्माके उस दिनके व्यतीत हो जानेपर जीवोंके उत्पादक महाभूतपति श्रीहरि सभी प्राणियोंके शरीर-मोक्षको देखकर लोकसंहारकी भावनासे ब्रह्मा आदि सभी देवताओं, दैत्यों, दानवों, यक्षों, राक्षसों, पक्षियों, गन्धर्वों, अप्सराओं, नागों, पर्वतों, नदियों, पशुओं, तिर्यग्योनिमें उत्पन्न हुए जीवों तथा कीटोंके पञ्चमहाभूतोंका विनाश कर जगत्का संहार करनेके निमित्त महान् विनाशकारी दृश्य उत्पन्न कर देते हैं। उस समय वे सूर्य बनकर सभीके नेत्रोंकी ज्योति नष्ट कर देते हैं, वायुरूप होकर जीवोंके प्राणसमूहको समेट लेते हैं, अग्निका रूप धारणकर सभी लोकोंको जलाकर भस्म कर देते हैं तथा मेघ बनकर पुनः भयंकर वृष्टि करते हैं॥ १९—२४॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावे पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रसङ्गमें एक सौ पैंसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६५॥

१६९- नाभिकमलसे ब्रह्माका प्रादुर्भाव तथा उस कमलका साङ्गोपाङ्ग वर्णन

६९०* मत्स्यपुराण *

एक सौ छाछठवाँ अध्याय

महाप्रलयका वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मत्स्य उवाच<br><br>भूत्वा नारायणो योगी सत्त्वमूर्तिर्विभावसुः।<br>गभस्तिभिः प्रदीप्ताभिः संशोषयति सागरान्॥ १<br><br>ततः पीत्वार्णवान् सर्वान् नदीः कूपांश्च सर्वशः।<br>पर्वतानां च सलिलं सर्वमादाय रश्मिभिः॥ २<br><br>भित्त्वा गभस्तिभिश्चैव महीं गत्वा रसातलम्।<br>पातालजलमादाय पिबते रसमुत्तमम्॥ ३<br><br>मूत्रासृक् क्लेदमन्यच्च यदस्ति प्राणिषु ध्रुवम्।<br>तत्सर्वमरविन्दाक्ष आदत्ते पुरुषोत्तमः॥ ४<br><br>वायुश्च भगवान् भूत्वा विधुन्वानोऽखिलं जगत्।<br>प्राणापानसमानाद्यान् वायूनाकर्षते हरिः॥ ५<br><br>ततो देवगणाः सर्वे भूतान्येव च यानि तु।<br>गन्धो घ्राणं शरीरं च पृथिवीं संश्रिता गुणाः॥ ६<br><br>जिह्वा रसश्च स्नेहश्च संश्रिताः सलिले गुणाः।<br>रूपं चक्षुर्विपाकश्च ज्योतिरेवाश्रिता गुणाः॥ ७<br><br>स्पर्शः प्राणश्च चेष्टा च पवने संश्रिता गुणाः।<br>शब्दः श्रोत्रं च खान्येव गगने संश्रिता गुणाः॥ ८<br><br>लोकमाया भगवता मुहूर्तेन विनाशिता।मत्स्यभगवान्ने कहा— रविनन्दन! तदनन्तर वे सत्त्वमूर्ति योगी नारायण सूर्यका रूप धारण कर अपनी उद्दीप्त किरणोंसे सागरोंको सोख लेते हैं। इस प्रकार सभी सागरोंको सुखा देनेके पश्चात् अपनी किरणोंद्वारा नदियों, कुओं और पर्वतोंका सारा जल खींच लेते हैं। फिर वे किरणोंद्वारा पृथ्वीका भेदन करके रसातलमें जा पहुँचते हैं और वहाँ पातालके उत्तम रसरूप जलका पान करते हैं। तत्पश्चात् कमलनयन पुरुषोत्तम नारायण प्राणियोंके शरीरमें निश्चितरूपसे रहनेवाले मूत्र, रक्त, मज्जा तथा अन्य जो गीले पदार्थ होते हैं, उन सबके रसको ग्रहण कर लेते हैं। तदुपरान्त भगवान् श्रीहरि वायुरूप होकर सम्पूर्ण जगत्को प्रकम्पित करते हुए प्राण, अपान, समान, उदान और व्यानरूप पाँचों प्राणवायुओंको खींच लेते हैं। तदनन्तर सभी देवगण, पाँचों महाभूत, गन्ध, घ्राण, शरीर—ये सभी गुण पृथ्वीमें विलीन हो जाते हैं। जिह्वा, रस, स्नेह (चिकनाहट)—ये सभी गुण जलमें लीन हो जाते हैं। रूप, चक्षु, विपाक (परिणाम)—ये गुण अग्निमें मिल जाते हैं। स्पर्श, प्राण, चेष्टा—ये सभी गुण वायुका आश्रय ग्रहण कर लेते हैं। शब्द, श्रोत्र, इन्द्रियाँ—ये सभी गुण आकाशमें विलीन हो जाते हैं। इस प्रकार भगवान् नारायण दो ही घड़ीमें सारी लोकमायाको विनष्ट कर देते हैं॥ १—८ १/२ ॥
मनो बुद्धिश्च सर्वेषां क्षेत्रज्ञश्चेति यः श्रुतः॥ ९<br><br>तं वरेण्यं परमेष्ठी हृषीकेशमुपाश्रितः।<br>ततो भगवतस्तस्य रश्मिभिः परिवारितः॥ १०<br><br>वायुनाक्रम्यमाणासु द्रुमशाखासु चाश्रितः।<br>तेषां संघर्षणोद्भूतः पावकः शतधा ज्वलन्॥ ११<br><br>अदहच्च तदा सर्वं वृतः संवर्तकोऽनलः।<br>सपर्वतद्रुमान् गुल्माँल्लतावल्लीस्तृणानि च॥ १२<br><br>विमानानि च दिव्यानि पुराणि विविधानि च।<br>यानि चाश्रयणीयानि तानि सर्वाणि सोऽदहत्॥ १३<br><br>भस्मीकृत्य ततः सर्वांल्लोकाँल्लोकगुरुर्हरिः।<br>भूयो निर्वापयामास युगान्तेन च कर्मणा॥ १४तदनन्तर जो सभी प्राणियोंका मन, बुद्धि और क्षेत्रज्ञ कहा जाता है, वह अग्नि उन सर्वश्रेष्ठ हृषीकेशके निकट पहुँचता है और उन भगवान्‌की किरणोंसे युक्त हो वायुद्वारा आक्रान्त वृक्षोंकी शाखाओंका आश्रय ग्रहण करता है। वहाँ वृक्षोंके संघर्षसे उत्पन्न हुई वह अग्नि सैकड़ों ज्वालाएँ फेंकने लगती है। फिर उससे घिरा हुआ संवर्तक अग्नि सबको जलाना आरम्भ करती है। वह पर्वतीय वृक्षोंसहित गुल्मों, लताओं, वल्लियों, घास-फूसों, दिव्य विमानों, अनेकों नगरों तथा अन्यान्य जो आश्रय लेनेयोग्य स्थान होते हैं, उन सबको जलाकर भस्म कर देती है। इस प्रकार लोकोंके गुरुस्वरूप श्रीहरि समस्त लोकोंको जलाकर पुनः युगान्तकालिक कर्मद्वारा समूची सृष्टिका विनाश कर देते

* अध्याय १६६ * ६९१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सहस्रवृष्टिः शतधा भूत्वा कृष्णो महाबलः।<br>दिव्यतोयेन हविषा तर्पयामास मेदिनीम्॥ १५<br><br>ततः क्षीरनिकायेन स्वादुना परमाम्भसा।<br>शिवेन पुण्येन मही निर्वाणमगमत्परम्॥ १६<br><br>तेन रोधेन संछन्ना पयसां वर्षतो धरा।<br>एकार्णवजलीभूता सर्वसत्त्वविवर्जिता॥ १७हैं। तदुपरान्त महाबली विष्णु सैकड़ों-हजारों प्रकारकी वृष्टिका रूप धारण कर दिव्य जलरूपी हविसे पृथ्वीको तृप्त कर देते हैं। तब उस दूध-सदृश स्वादिष्ट कल्याणकारक पुण्यमय उत्तम जलसे पृथ्वी परम शान्त हो जाती है। बरसते हुए जलके उस घेरेसे आच्छादित हुई पृथ्वी समस्त प्राणियोंसे रहित हो एकार्णवके जलके रूपमें परिणत हो जाती है॥ ९-१७॥
महासत्त्वान्यपि विभुं प्रविष्टान्यमितौजसम्।<br>नष्टार्कपवनाकाशे सूक्ष्मे जगति संवृते॥ १८<br><br>संशोषमात्मना कृत्वा समुद्रानपि देहिनः।<br>दग्ध्वा सम्प्लाव्य च तथा स्वपित्येकः सनातनः॥ १९<br><br>पौराणं रूपमास्थाय स्वपित्यमितविक्रमः।<br>एकार्णवजलव्यापी योगी योगमुपाश्रितः॥ २०<br><br>अनेकानि सहस्राणि युगान्येकार्णवाम्भसि।<br>न चैनं कश्चिदव्यक्तं व्यक्तं वेदितुमर्हति॥ २१<br><br>कश्चैव पुरुषो नाम किं योगः कश्च योगवान्।<br>असौ कियन्तं कालं च एकार्णवविधिं प्रभुः।<br>करिष्यतीति भगवानिति कश्चिन्न बुध्यते॥ २२<br><br>न द्रष्टा नैव गमिता न ज्ञाता नैव पार्श्वगः।<br>तस्य न ज्ञायते किंचित्तमृते देवसत्तमम्॥ २३<br><br>नभः क्षितिं पवनमपः प्रकाशं<br>प्रजापतिं भुवनधरं सुरेश्वरम्।<br>पितामहं श्रुतिनिलयं महामुनिं<br>प्रशाम्य भूयः शयनं ह्यरोचयत्॥ २४उस समय सूर्य, वायु और आकाशके नष्ट हो जानेपर तथा सूक्ष्म जगत्के आच्छादित हो जानेपर महान्-से-महान् जीव-जन्तु भी अमित ओजस्वी एवं सर्वव्यापी नारायणमें प्रविष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार वे सनातन भगवान् स्वयं अपने द्वारा समुद्रोंको सुखाकर, देहधारियोंको जलाकर तथा पृथ्वीको जलमें निमग्न करके अकेले शयन करते हैं। अमित पराक्रमी, एकार्णवके जलमें व्याप्त रहनेवाले एवं योगबलसम्पन्न नारायण योगका आश्रय ले उस एकार्णवके जलमें अपना पुराना रूप धारण कर अनेकों हजार युगोंतक शयन करते हैं। उस समय कोई भी इन अव्यक्त नारायणको व्यक्तरूपसे नहीं जान सकता। वह पुरुष कौन है ? उसका क्या योग है ? वह किस योगसे युक्त है ? वे सामर्थ्यशाली भगवान् कितने समयतक इस एकार्णवके विधानको करेंगे ? इसे कोई नहीं जानता। उस समय न कोई उन्हें देख सकता है, न कोई वहाँ जा सकता है, न कोई उन्हें जान सकता है और न कोई उनके निकट पहुँच सकता है। उन देवश्रेष्ठके अतिरिक्त दूसरा कोई भी उनके विषयमें कुछ भी नहीं जान सकता। इस प्रकार आकाश, पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि, प्रजापति, पर्वत, सुरेश्वर, पितामह ब्रह्मा, वेदसमूह और महर्षि—इन सबको प्रशान्त कर वे पुनः शयनकी इच्छा करते हैं॥ १८-२४॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावे षट्पष्ठ्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रादुर्भाव-प्रसङ्गमें एक सौ छाठठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६६॥

साथ वार्तालाप और भगवान्‌द्वारा वध

६९२ * मत्स्यपुराण *


एक सौ सड़सठवाँ अध्याय

भगवान् विष्णुका एकार्णवके जलमें शयन, मार्कण्डेयको आश्चर्य तथा भगवान् विष्णु और मार्कण्डेयका संवाद

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्‌ने कहा—
एवमेकार्णवीभूते शेते लोके महाद्युतिः।<br>प्रच्छाद्य सलिलेनोर्वीं हंसो नारायणस्तदा॥ १<br>महतो रजसो मध्ये महार्णवसरःसु वै।<br>विरजस्कं महाबाहुमक्षयं ब्रह्म यं विदुः॥ २<br>आत्मरूपप्रकाशेन तमसा संवृतः प्रभुः।<br>मनः सात्त्विकमाधाय यत्र तत्सत्यमासत॥ ३<br>याथातथ्यं परं ज्ञानं भूतं तद् ब्रह्मणा पुरा।<br>रहस्यारण्यकोद्दिष्टं यच्चौपनिषदं स्मृतम्॥ ४<br>पुरुषो यज्ञ इत्येतद्यत्परं परिकीर्तितम्।<br>यश्चान्यः पुरुषाख्यः स्यात् स एष पुरुषोत्तमः॥ ५<br>ये च यज्ञकरा विप्रा ये चर्त्विज इति स्मृताः।<br>अस्मादेव पुरा भूता यज्ञेभ्यः श्रूयतां तथा॥ ६<br>ब्रह्माणं प्रथमं वक्त्रादुद्गातारं च सामगम्।<br>होतारमपि चाध्वर्युं बाहुभ्यामवसृजत् प्रभुः॥ ७<br>ब्रह्मणो ब्राह्मणाच्छंसि प्रस्तोतारं च सर्वशः।<br>तौ मित्रावरुणौ पृष्ठात् प्रतिप्रस्तारमेव च॥ ८<br>उदरात् प्रतिहर्तारं पोतारं चैव पार्थिव।<br>अच्छावाकमथोरुभ्यां नेष्टारं चैव पार्थिव॥ ९<br>पाणिभ्यामथ चाग्नीध्रं सुब्रह्मण्यं च जानुतः।<br>ग्रावस्तुतं तु पादाभ्यामुन्नेतारं च याजुषम्॥ १०राजर्षे ! इस प्रकार जगत्‌के एकार्णवके जलमें निमग्न हो जानेपर परम कान्तिमान् हंसस्वरूपी नारायण पृथ्वीको जलसे भलीभाँति आच्छादित कर विशाल रेतीले टापूके मध्यमें स्थित उस महार्णवके सरोवरमें शयन करते हैं। उन्हीं महाबाहुको रजोगुणरहित अविनाशी ब्रह्म कहा जाता है। अन्धकारसे आच्छादित हुए भगवान् अपने स्वरूपके प्रकाशसे प्रकाशित हो मनको सत्त्वगुणमें स्थापितकर वहाँ विराजित होते हैं। वे ही सत्यस्वरूप हैं। यथार्थ परम ज्ञान भी वे ही हैं, जिसका पूर्वकालमें ब्रह्मा ने अनुभव किया था। वे ही आरण्यकोंद्वारा उपदिष्ट रहस्य और उपनिषत्प्रतिपादित ज्ञान हैं। उन्हींको परमोत्कृष्ट यज्ञपुरुष कहा गया है। इसके अतिरिक्त जो दूसरा पुरुष नामसे विख्यात है, वह पुरुषोत्तम भी वे ही हैं। जो यज्ञपरायण ब्राह्मण और जो ऋत्विज् कहे गये हैं, वे सभी पूर्वकालमें इन्हींसे उत्पन्न हुए थे। अब यज्ञोंके विषयमें सुनिये। राजन् ! उन प्रभुने सर्वप्रथम मुखसे ब्रह्मा और सामगान करनेवाले उद्गाताको, दोनों भुजाओंसे होता और अध्वर्युको, ब्रह्मासे ब्राह्मणाच्छंसी और प्रस्तोताको, पृष्ठभागसे मैत्रावरुण और प्रतिप्रस्तोताको, उदरसे प्रतिहर्ता और पोताको, ऊरुओंसे अच्छावाक् और नेष्टाको, हाथोंसे आग्नीध्रको, जानुओंसे सुब्रह्मण्यको तथा पैरोंसे ग्रावस्तुत और यजुर्वेदी उन्नेताको उत्पन्न किया॥ १—१०॥
एवमेवैष भगवान् षोडशैव जगत्पतिः।<br>प्रवक्तॄन् सर्वयज्ञानामृत्विजोऽसृजदुत्तमान्॥ ११इस प्रकार इन जगदीश्वर भगवान्‌ने सम्पूर्ण यज्ञोंके प्रवक्ता सोलह श्रेष्ठ ऋत्विजोंको उत्पन्न किया।
तदेष वै वेदमयः पुरुषो यज्ञसंस्थितः।<br>वेदाश्चैतन्मयाः सर्वे साङ्गोपनिषदक्रियाः॥ १२ये ही वेदमय पुरुष यज्ञोंमें भी स्थित रहते हैं। सभी वेद और उपनिषदोंकी साङ्गोपाङ्ग क्रियाएँ इन्हींके स्वरूप हैं।
स्वपित्येकार्णवे चैव यदाश्चर्यमभूत् पुरा।<br>श्रूयन्तां तद्यथा विप्रा मार्कण्डेयकुतूहलम्॥ १३विप्रवरो! पूर्वकालमें एकार्णवके जलमें शयन करते समय मार्कण्डेय मुनिको कुतूहल उत्पन्न करनेवाली एक आश्चर्यजनक घटना घटित हुई थी। अब आप उसे सुनिये।
गीर्णो भगवतस्तस्य कुक्षावेव महामुनिः।<br>बहुवर्षसहस्रायुस्तस्यैव वरतेजसा॥ १४भगवान्‌द्वारा निगले गये महामुनि मार्कण्डेय उन्हींकी कुक्षिमें उन्हींके श्रेष्ठ तेजसे कई हजार वर्षोंकी आयुतक भ्रमण करते

* अध्याय १६७ *
६९३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अटंस्तीर्थप्रसङ्गेन पृथिवीं तीर्थगोचराम्।<br>आश्रमाणि च पुण्यानि देवतायतनानि च॥ १५<br><br>देशान् राष्ट्राणि चित्राणि पुराणि विविधानि च।<br>जपहोमपरः शान्तस्तपो घोरं समास्थितः॥ १६<br><br>मार्कण्डेयस्ततस्तस्य शनैर्वक्त्राद् विनिःसृतः।<br>स निष्क्रामन् न चात्मानं जानीते देवमायया ॥ १७<br><br>निष्क्रम्याप्यस्य वदनादेकार्णवमथो जगत्।<br>सर्वतस्तमसाच्छन्नं मार्कण्डेयोऽन्ववैक्षत ॥ १८<br><br>तस्योत्पन्नं भयं तीव्रं संशयश्चात्मजीविते।<br>देवदर्शनसंहृष्टो विस्मयं परमं गतः॥ १९रहे। वे तीर्थयात्राके प्रसङ्गसे तीर्थोंको प्रकट करनेवाली पृथिवी, पुण्यमय आश्रमों, देव-मन्दिरों, देशों, राष्ट्रों और अनेकों रमणीय नगरोंको देखते हुए जप और होममें तत्पर रहकर शान्तभावसे घोर तपस्यामें लगे हुए थे। तत्पश्चात् मार्कण्डेय मुनि धीरे-धीरे भ्रमण करते हुए भगवान्‌के मुखसे बाहर निकल आये, किंतु देवमायाके वशीभूत होनेके कारण वे अपनेको मुखसे निकला हुआ न जान सके। भगवान्‌के मुखसे बाहर निकलनेपर मार्कण्डेयजीने देखा कि सारा जगत् एकार्णवके जलमें निमग्न है और सब ओर अन्धकार छाया हुआ है। यह देखकर उनके मनमें महान् भय उत्पन्न हो गया और उन्हें अपने जीवनमें भी संशय दिखायी पड़ने लगा। इसी समय हृदयमें भगवान्‌का दर्शन होनेसे प्रसन्नता तो हुई, साथ ही महान् आश्चर्य भी हुआ॥११—१९॥
चिन्तयन् जलमध्यस्थो मार्कण्डेयो विशङ्कितः।<br>किं नु स्यान्मम चिन्तेयं मोहः स्वप्नोऽनुभूयते ॥ २०इस प्रकार जलके मध्यमें स्थित मार्कण्डेय मुनि शंकित चित्तसे विचार करने लगे कि यह मेरी आकस्मिक चिन्ता है या मेरी बुद्धिपर मोह छा गया है अथवा मैं स्वप्नका अनुभव कर रहा हूँ?
व्यक्तमन्यतमो भावस्तेषां सम्भावितो मम।<br>न हीदृशं जगत्क्लेशमयुक्तं सत्यमर्हति ॥ २१परंतु यह तो स्पष्ट है कि मैं इनमेंसे किसी एक भावका अनुभव तो अवश्य कर रहा हूँ; क्योंकि इस प्रकार क्लेशसे रहित जगत् सत्य नहीं हो सकता।
नष्टचन्द्रार्कपवने नष्टपर्वतभूतले।<br>कतमः स्यादयं लोक इति चिन्तामवस्थितः ॥ २२जब चन्द्रमा, सूर्य और वायु नष्ट हो गये तथा पर्वत और पृथ्वीका विनाश हो गया, तब यह कौन-सा लोक हो सकता है? वे इस प्रकारकी चिन्तासे ग्रस्त हो गये।
ददर्श चापि पुरुषं स्वपन्तं पर्वतोपमम्।<br>सलिलेऽर्धमथो मग्नं जीमूतमिव सागरे ॥ २३इतनेमें ही उन्हें वहाँ एक पर्वत-सरीखा विशालकाय पुरुष शयन करता हुआ दीख पड़ा, जिसके शरीरका आधा भाग सागरमें बादलकी तरह जलमें डूबा हुआ था।
ज्वलन्तमिव तेजोभिर्भायुक्तमिव भास्करम्।<br>शर्वर्यां जाग्रतमिव भासन्तं स्वेन तेजसा ॥ २४वह अपने तेजसे किरणयुक्त सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहा था। अपने तेजसे उद्भासित होता हुआ वह रात्रिके अन्धकारमें जाग्रत्-सा दीख रहा था।
देवं द्रष्टुमिहायातः को भवानिति विस्मयात्।<br>तथैव स मुनिः कुक्षिं पुनरेव प्रवेशितः॥ २५तब मार्कण्डेय मुनि आश्चर्ययुक्त हो उस देवको देखनेके लिये ज्यों ही उसके निकट जाकर बोले—'आप कौन हैं?' त्यों ही उसने पुनः उन्हें अपनी कुक्षिमें समेट लिया।
सम्प्रविष्टः पुनः कुक्षिं मार्कण्डेयोऽतिविस्मयः।<br>तथैव च पुनर्भूयो विजानन् स्वप्नदर्शनम् ॥ २६पुनः कुक्षिमें प्रविष्ट हुए मार्कण्डेयको परम विस्मय हुआ। वे बाह्य जगत्को पूर्ववत् स्वप्नदर्शन ही मान रहे थे।
स तथैव यथापूर्वं यो धरामटते पुरा।<br>पुण्यतीर्थजलोपेतां विविधान्याश्रमाणि च॥ २७वे उस कुक्षिके अन्तर्गत जैसे पहले पृथ्वीपर विचरण कर रहे थे, उसी प्रकार पुनः भ्रमण करने लगे। उन्होंने पुण्यमय तीर्थजलसे भरी हुई नदियों, अनेकों

१७१- ब्रह्माके मानस पुत्रोंकी उत्पत्ति, दक्षकी बारह कन्याओंका वृत्तान्त, ब्रह्माद्वारा सृष्टिका विकास तथा विविध देवयोनियोंकी उत्पत्ति

६९४* मत्स्यपुराण *

| ऋतुभिर्यजमानांश्च समाप्तवरदक्षिणान्।<br>अपश्यद्देवकुक्षिस्थान्याजकाञ्छतशो द्विजान्॥ २८<br><br>सद्वृत्तमास्थिताः सर्वे वर्णा ब्राह्मणपूर्वकाः।<br>चत्वारश्चाश्रमाः सम्यग्यथोद्दिष्टा मया तव॥ २९ | आश्रमों तथा कुक्षिके भीतर स्थित सैकड़ों याजक ब्राह्मणोंको देखा, जो कहीं यज्ञोंद्वारा यजन कर रहे थे और कहीं यज्ञ समाप्त होनेके पश्चात् उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त थे। जैसा मैंने तुम्हें पहले बतलाया है, उसके अनुसार ब्राह्मण आदि सभी वर्णों तथा चारों आश्रमोंके लोग सम्यक् प्रकारसे सदाचारका पालन करते थे॥ २८—२९॥ | | एवं वर्षशतं साग्रं मार्कण्डेयस्य धीमतः।<br>चरतः पृथिवीं सर्वां न कुक्ष्यन्तः समीक्षितः॥ ३०<br><br>ततः कदाचिदथ वै पुनर्वक्त्राद्विनिःसृतः।<br>गुप्तं न्यग्रोधशाखायां बालमेकं निरैक्षत॥ ३१<br><br>तथैवार्णवजले नीहारेणावृताम्बरे।<br>अव्यग्रः क्रीडते लोके सर्वभूतविवर्जिते॥ ३२<br><br>स मुनिर्विस्मयाविष्टः कौतूहलसमन्वितः।<br>बालमादित्यसंकाशं नाशक्नोदभिवीक्षितुम्॥ ३३<br><br>स चिन्तयंस्तथैकान्ते स्थित्वा सलिलसन्निधौ।<br>पूर्वदृष्टमिदं मन्ये शङ्कितो देवमायया॥ ३४<br><br>अगाधसलिले तस्मिन् मार्कण्डेयः सुविस्मयः।<br>प्लवंस्तथार्तिमगमद् भयात् संत्रस्तलोचनः॥ ३५<br><br>स तस्मै भगवानाह स्वागतं बालयोगवान्।<br>बभाषे मेघतुल्येन स्वरेण पुरुषोत्तमः॥ ३६<br><br>मा भैर्वत्स न भेतव्यमिहैवायाहि मेऽन्तिकम्।<br>मार्कण्डेयो मुनिस्त्वाह बालं तं श्रमपीडितः॥ ३७ | इस प्रकार बुद्धिमान् मार्कण्डेयके सौ वर्षोंसे भी अधिक कालतक समूची पृथ्वीपर भ्रमण करते रहनेपर भी उन्हें उस कुक्षिका अन्त न दीख पड़ा। तत्पश्चात् किसी समय वे पुनः उस पुरुषके मुखसे बाहर निकल आये। उस समय उन्होंने बरगदकी शाखामें छिपे हुए एक बालकको देखा, जो उसी प्रकारके एकार्णवके जलमें, यद्यपि आकाश नीहारसे आच्छादित था तथा जगत् समस्त प्राणियोंसे शून्य हो गया था, तथापि निश्चिन्तभावसे खेल रहा था। यह देखकर मार्कण्डेय मुनि आश्चर्यचकित हो गये। उनके मनमें उसे जाननेके लिये कुतूहल उत्पन्न हो गया, किंतु वे सूर्यके समान तेजस्वी उस बालककी ओर देखनेमें असमर्थ हो गये। तब जलके निकट एकान्त स्थानमें स्थित होकर विचार करते हुए मार्कण्डेयजी देवमायाके प्रभावसे सशङ्कित हो उसे पहले देखा हुआ मानने लगे। परम विस्मित हुए मार्कण्डेय उस अथाह जलमें तैरते हुए कष्टका अनुभव करने लगे तथा भयके कारण उनके नेत्र कातर हो गये। तब बालयोगी भगवान् पुरुषोत्तम मेघ-सदृश गम्भीर स्वरसे मार्कण्डेयसे स्वागतपूर्वक बोले—'वत्स! डरो मत, तुम्हें डरना नहीं चाहिये। यहाँ मेरे निकट आओ।' तदुपरान्त थके-माँदे मार्कण्डेय मुनि उस बालकसे बोले॥ ३०—३७॥ | | मार्कण्डेय उवाच<br><br>को मां नाम्ना कीर्तयति तपः परिभवन्मम।<br>दिव्यं वर्षसहस्त्राख्यं धर्षयन्निव मे वयः॥ ३८<br><br>न ह्येष वः समाचारो देवेष्वपि ममोचितः।<br>मां ब्रह्मापि हि देवेशो दीर्घायुरिति भाषते॥ ३९<br><br>कस्तमो घोरमासाद्य मामद्य त्यक्तजीवितः।<br>मार्कण्डेयेति मामुक्त्वा मृत्युमीक्षितुमर्हति॥ ४० | मार्कण्डेयजीने कहा— यह कौन है, जो मेरी तपस्याका तिरस्कार करता हुआ मेरा नाम लेकर पुकार रहा है? यह एक हजार दिव्य वर्षोंवाली मेरी आयुका भी अपमान-सा कर रहा है। देवताओंमें भी किसीको मेरे प्रति ऐसा व्यवहार करना उचित नहीं है; क्योंकि देवेश्वर ब्रह्मा भी मुझे 'दीर्घायु' कहकर ही पुकारते हैं। जीवनसे हाथ धोनेवाला ऐसा कौन है, जो घोर अज्ञानान्धकारका आश्रय लेकर आज मुझे 'मार्कण्डेय' ऐसा कहकर मृत्युका मुख देखना चाहता है?॥ ३८—४०॥ | | सूत उवाच<br><br>एवमाभाष्य तं क्रोधान्मार्कण्डेयो महामुनिः।<br>तथैव भगवान् भूयो बभाषे मधुसूदनः॥ ४१ | सूतजी कहते हैं— ऋषियो! महामुनि मार्कण्डेय क्रोधवश उस बालकसे ऐसा कहकर चुप हो गये। तब भगवान् मधुसूदन पुनः उसी प्रकार बोले॥ ४१॥ |

* अध्याय १६७ *६९५

| श्रीभगवानुवाच | श्रीभगवान्ने कहा—'वत्स! मैं पुराणप्रसिद्ध हृषीकेश | | अहं ते जनको वत्स हृषीकेशः पिता गुरुः।<br>आयुष्प्रदाता पौराणः किं मां त्वं नोपसर्पसि॥ ४२ | ही तुम्हें जन्म देनेवाला तुम्हारा पिता और गुरु हूँ। मैंने ही तुम्हें दीर्घायु प्रदान किया है, तुम मेरे निकट क्यों नहीं | | मां पुत्रकामः प्रथमं पिता तेऽङ्गिरसो मुनिः।<br>पूर्वमाराधयामास तपस्तीव्रं समाश्रितः॥ ४३ | आ रहे हो? तुम्हारे पिता अङ्गिरा मुनिने पहले पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे कठोर तपका आश्रय ले मेरी आराधना | | ततस्त्वां घोरतपसा प्रावृणोदमितौजसम्।<br>उक्तवानहमात्मस्थं महर्षिममितौजसम्॥ ४४ | की थी और उस घोर तपस्याके परिणामस्वरूप तुम्हारे-जैसे अमित ओजस्वी पुत्रका वरदान माँगा था, तब मैंने उन आत्मज्ञानमें लीन एवं अमित पराक्रमी महर्षिको वरदान दिया था। अन्यथा तुम्हारे अतिरिक्त पञ्चभूतात्मक | | कः समुत्सहते चान्यो यो न भूतात्मकात्मजः।<br>द्रष्टुमेकार्णवगतं क्रीडन्तं योगवर्त्मना॥ ४५ | शरीरधारीका पुत्र दूसरा कौन है, जो एकार्णवके जलमें योगमार्गका आश्रय लेकर क्रीडा करते हुए मुझे देखनेका | | ततः प्रहृष्टवदनो विस्मयोत्फुल्ललोचनः।<br>मूर्ध्नि बद्धाञ्जलिपुटो मार्कण्डेयो महातपाः॥ ४६ | साहस कर सकता है? यह सुनकर महातपस्वी मार्कण्डेयका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और उनके नेत्र विस्मयसे उत्फुल्ल हो गये। तब वे लोकपूजित दीर्घायु मुनि मस्तकपर | | नामगोत्रे ततः प्रोच्य दीर्घायुर्लोकपूजितः।<br>तस्मै भगवते भक्त्या नमस्कारमथाकरोत्॥ ४७ | हाथ जोड़कर नाम और गोत्रका उच्चारण करके भक्तिपूर्वक उन भगवान्‌को नमस्कार करते हुए बोले॥ ४२-४७॥ | | मार्कण्डेय उवाच | **मार्कण्डेयजीने कहा—**अनघ! मैं आपकी इस | | इच्छेयं तत्त्वतो मायामिमां ज्ञातुं तवानघ।<br>यदेकार्णवमध्यस्थः शेषे त्वं बालरूपवान्॥ ४८ | मायाको तत्त्वपूर्वक जानना चाहता हूँ, जो आप बालकका रूप धारण करके इस एकार्णवके जलके मध्यमें स्थित होकर शयन करते हैं। ऐश्वर्यशाली प्रभो! आप लोकमें | | किं संज्ञश्चैव भगवाँल्लोके विज्ञायसे प्रभो।<br>तर्कये त्वां महात्मानं को ह्यन्यः स्थातुमर्हति॥ ४९ | किस नामसे विख्यात होते हैं? मैं आपको एक महान् आत्मबल-सम्पन्न पुरुष मानता हूँ, अन्यथा दूसरा कौन इस प्रकार स्थित रह सकता है॥ ४८-४९॥ | | श्रीभगवानुवाच | **श्रीभगवान् बोले—**ब्रह्मन्! मैं सभी प्राणियोंको | | अहं नारायणो ब्रह्मन् सर्वभूः सर्वनाशनः।<br>अहं सहस्त्रशीर्षाख्यैः पदैरभिसंज्ञितः॥ ५० | उत्पन्न करनेवाला तथा सबका विनाशक नारायण हूँ। जो सहस्रशीर्ष आदि नामोंसे अभिहित होता है, वह मैं ही | | आदित्यवर्णः पुरुषो मखे ब्रह्ममयो मखः।<br>अहमग्निर्हव्यवाहो यादसां पतिरव्ययः॥ ५१ | हूँ। मैं ही आदित्यवर्ण पुरुष और यज्ञमें ब्रह्ममय यज्ञ हूँ। मैं ही हव्यको वहन करनेवाला अग्नि और जल-जन्तुओंका अविनाशी स्वामी हूँ। इन्द्रपदपर स्थित रहनेवाला | | अहमिन्द्रपदे शक्रो वर्षाणां परिवत्सरः।<br>अहं योगी युगाख्यश्च युगान्तावर्त एव च॥ ५२ | इन्द्र तथा वर्षोंमें परिवत्सर मैं हूँ। मैं ही योगी, युग नामसे प्रसिद्ध और युगोंका अन्त करनेवाला हूँ। समस्त | | अहं सर्वाणि सत्त्वानि दैवतान्यखिलानि तु।<br>भुजङ्गानामहं शेषस्तार्क्ष्यो वै सर्वपक्षिणाम्॥ ५३ | प्राणी और सम्पूर्ण देवता मेरे ही स्वरूप हैं। मैं सर्पोंमें शेषनाग और सम्पूर्ण पक्षियोंमें गरुड हूँ। मैं सभी प्राणियोंका | | कृतान्तः सर्वभूतानां विश्वेषां कालसंज्ञितः।<br>अहं धर्मस्तपश्चाहं सर्वाश्रमनिवासिनाम्॥ ५४ | अन्त करनेवाला तथा लोकोंका काल हूँ। चारों आश्रमोंमें निवास करनेवाले मनुष्योंका धर्म और तप मैं ही हूँ। मैं | | अहं चैव सरिद्दिव्या क्षीरोदश्च महार्णवः।<br>यत्तत्सत्यं च परममहमेकः प्रजापतिः॥ ५५ | दिव्य नदी गङ्गा और दुग्धरूपी जलसे भरा हुआ महासागर हूँ। जो परम सत्य है, वह मैं हूँ। मैं ही एकमात्र प्रजापति हूँ। |

६९६ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अहं सांख्यमहं योगोऽप्यहं तत्परमं पदम्।<br>अहमिज्याक्रिया चाहमहं विद्याधिपः स्मृतः॥ ५६<br>अहं ज्योतिरहं वायुरहं भूमिरहं नभः।<br>अहमापः समुद्राश्च नक्षत्राणि दिशो दश॥ ५७<br>अहं वर्षमहं सोमः पर्जन्योऽहमहं रविः।<br>क्षीरोदसागरे चाहं समुद्रे वडवामुखः॥ ५८मैं ही सांख्य, मैं ही योग और मैं ही वह परमपद हूँ। मैं ही यज्ञकी क्रिया और मैं ही विद्याका अधिपति कहलाता हूँ। मैं ही अग्नि, मैं ही वायु, मैं ही पृथ्वी, मैं ही आकाश, मैं ही जल, समुद्र, नक्षत्र और दसों दिशाएँ हूँ। मैं ही वर्ष, मैं ही चन्द्रमा, मैं ही बादल तथा मैं ही रवि हूँ। क्षीरसागरमें शयन करनेवाला मैं ही हूँ। मैं ही समुद्रमें बडवाग्नि हूँ॥ ५०—५८॥
वह्निः संवर्तको भूत्वा पिबंस्तोयमयं हविः।<br>अहं पुराणः परमं तथैवाहं परायणम्॥ ५९<br>अहं भूतस्य भव्यस्य वर्तमानस्य सम्भवः।<br>यत्किञ्चित् पश्यसे विप्र यच्छृणोषि च किञ्चन॥ ६०<br>यल्लोके चानुभवसि तत्सर्वं मामनुस्मर।<br>विश्वं सृष्टं मया पूर्वं सृज्यं चाद्यापि पश्य माम्॥ ६१<br>युगे युगे च स्रक्ष्यामि मार्कण्डेयाखिलं जगत्।<br>तदेतदखिलं सर्वं मार्कण्डेयावधारय॥ ६२<br>शुश्रूषर्मम धर्मांश्च कुक्षौ चर सुखं मम।<br>मम ब्रह्मा शरीरस्थो देवैश्च ऋषिभिः सह॥ ६३<br>व्यक्तमव्यक्तयोगं मामवगच्छासुरद्विषम्।<br>अहमेकाक्षरो मन्त्रस्त्र्यक्षरश्चैव तारकः॥ ६४<br>परस्त्रिवर्गादोंकारस्त्रिवर्गार्थनिदर्शनः ।<br>एवमादिपुराणेशो वदन्नेव महामतिः॥ ६५<br>वक्त्रमाहूतवानाशु मार्कण्डेयं महामुनिम्।<br>ततो भगवतः कुक्षिं प्रविष्टो मुनिसत्तमः।<br>स तस्मिन् सुखमेकान्ते शुश्रूषुर्हसमव्ययम्॥ ६६<br>योऽहमेव विविधतनुं परिश्रितो<br>महार्णवे व्यपगतचन्द्रभास्करे।<br>शनैश्चरन् प्रभुरपि हंससंज्ञितो-<br>ऽसृजज्जगद्विरहितकालपर्यये॥ ६७मैं ही संवर्तक अग्नि बनकर जलरूप हविका पान करता हूँ। जैसे मैं पुराण-पुरुष हूँ, उसी प्रकार मैं सबके लिये आश्रयदाता भी हूँ। भूत, भविष्य और वर्तमानका उत्पत्तिस्थान मैं हूँ। विप्रवर! तुम जो कुछ देख रहे हो, जो कुछ सुन रहे हो और लोकमें जिसका अनुभव कर रहे हो, उस सबमें मेरा ही स्मरण करो। मार्कण्डेय! पूर्वकालमें मैंने ही विश्वकी सृष्टि की थी और इस समय भी सृष्टिकर्ता मुझे ही समझो। मार्कण्डेय! प्रत्येक युगमें मैं ही सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि करता हूँ, अतः तुम इन सबका रहस्य इस प्रकार जानो। यदि तुम मेरे धर्मोंको सुनना चाहते हो तो मेरी कुक्षिमें प्रवेश करके सुखपूर्वक विचरण करो। देवताओं और ऋषियोंके साथ ब्रह्मा मेरे शरीरमें ही विद्यमान हैं। मुझे ही व्यक्त (प्रकट) और अव्यक्त (अप्रकट) योगवाला तथा असुरोंका शत्रु समझो। मैं ही एक अक्षर तथा तीन अक्षरोंवाला तारक मन्त्र हूँ। त्रिवर्गसे परे तथा त्रिवर्गके अभिप्रायको निर्दिष्ट करनेवाला ओंकार मैं ही हूँ। आदि पुराणेश महाबुद्धिमान् भगवान् इस प्रकार कह ही रहे थे कि उन्होंने शीघ्र ही महामुनि मार्कण्डेयको अपने मुखमें समेट लिया। तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय भगवान्‌की कुक्षिमें प्रविष्ट हो गये और उस एकान्त स्थानमें अविनाशी हंसधर्मको सुननेकी इच्छासे सुखपूर्वक विचरण करने लगे। (इतनेमें ही ऐसी ध्वनि सुनायी पड़ी—) मैं ही वह हूँ, जो चन्द्रमा और सूर्यसे रहित महार्णवके जलमें विविध शरीर धारण कर समर्थ होते हुए भी शनैः-शनैः विचरण करता हूँ और हंस नामसे पुकारा जाता हूँ तथा काल-परिवर्तनके समाप्त होनेपर पुनः जगत्‌की सृष्टि करता हूँ॥ ५९—६७॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावे सप्तषष्ठ्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रादुर्भाव-प्रसङ्गमें एक सौ सड़सठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६७॥