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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

२४२ * संक्षिप्त नारदपुराण *

सत्य, अनायुष्, अपुंस्, मत, भ्रमर, दीर्घपात्, धनाढ्य, सोम्य, अगर्ह, तादृक्, स्वर्ण, बहु—ये शब्द भी तीनों लिङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं¹ ॥४६॥
सर्वं विश्वोभये चोभौ अन्यान्यतरेतराणि च ॥४७॥
डतरो डतमो नेमस्त्वत्समौ त्वसिमावपि।
पूर्वः परावरौ चैव दक्षिणश्चोत्तराधरौ ॥४८॥
अपरः स्वोऽन्तरस्त्यत्तद्यदेतत्किमसमावयम्।
युष्मदस्मच्च प्रथमश्वरमोऽल्पस्त्यार्धकः ॥४९॥
नेमः कतिपयो द्वे निपाताः स्वरादयस्तथा।
उपसर्गविभक्तिस्वरप्रतिरूपाश्चाव्ययाः ॥५०॥

अब सर्वनामशब्दोंको सूचित करते हैं—सर्व, विश्व, उभय, उभ, अन्य, अन्यतर, इतर, डतर, डतम, नेम, त्व, त्वत्, सम, सिम, पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अधर, अपर, स्व, अन्तर, त्यत्, तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदस्, किम्, एक, द्वि, युष्मद्, अस्मद्, भवत्। ये सर्वनाम हैं और इनके रूप प्रायः² सर्व-शब्दके समान ही हैं। प्रथम, चरम, तय, अल्प, अर्ध, कतिपय और नेम—इन शब्दोंके प्रथमाके बहुवचनमें दो रूप होते हैं यथा—प्रथमे प्रथमाः, चरमे चरमाः इत्यादि।

स्वरादि और निपात तथा उपसर्ग, विभक्ति एवं स्वरके प्रतिरूपक शब्द अव्ययसंज्ञक होते हैं॥४७-५०॥

तद्धिताश्चाप्यपत्यार्थे पाण्डवाः श्रैधरस्तथा।
गार्ग्यो नाडायनात्रेयौ गाङ्गेयः पैतृष्वस्त्रीयः ॥५१॥
अब तद्धित-प्रत्ययान्त शब्दोंका उल्लेख करते


१. 'सत्य' शब्द जब सामान्यतः सत्य भाषणके अर्थमें आता है, तब नपुंसक होता है और विशेषणरूपमें प्रयुक्त होनेपर विशेष्यके अनुसार तीनों लिङ्गोंमें प्रयुक्त होता है। इसके पुँल्लिङ्गरूप—सत्यः सत्यौ सत्याः—इत्यादि रामवत् हैं। स्त्रीलिङ्गरूप—राधाके समान हैं—सत्या सत्ये सत्याः। नपुंसकरूप—'सत्यम् सत्ये सत्यानि' हैं। शेष रामवत्। 'अनायुष्' शब्दका अर्थ है आयुहीन। पुँल्लिङ्गमें—'अनायुः, अनायुषौ, अनायुषः' इत्यादि। स्त्रीलिङ्गमें भी ये ही रूप हैं। नपुंसकलिङ्गमें 'अनायुः अनायुषी अनायूंषि' इत्यादि। 'अपुंस्' का अर्थ है, पुरुषरहित। पुँल्लिङ्गमें—अपुमान् इत्यादि, स्त्रीलिङ्गमें 'अपुंस्का' आदि तथा नपुंसकमें 'अपुम्' इत्यादि रूप होते हैं। मतका अर्थ है—'अभिमत, राय' आदि। 'मतः', मता। मतम्' ये क्रमशः पुँल्लिङ्ग आदिके रूप हैं। 'भ्रमर'का अर्थ है भौंरा या घूमकर शब्द करनेवाला। पुँल्लिङ्गमें भ्रमरः, स्त्रीलिङ्गमें भ्रमरी, नपुंसकमें भ्रमरम्, इत्यादि रूप होते हैं। जिसके पैर बड़े हों, वह 'दीर्घपात्' हैं। तीनों लिङ्गोंमें 'दीर्घपात्' यही प्रथम रूप है। 'धनाढ्य' का अर्थ है धनी। धनाढ्यः, धनाढ्या, धनाढ्यम्—ये क्रमशः तीनों लिङ्गोंके प्रथम रूप हैं। 'सोम्य' का अर्थ है शान्त, मृदु स्वभाववाला। रूप धनाढ्यके ही तुल्य है। 'अगर्ह' का अर्थ है निन्दारहित। रूप पूर्ववत् है। 'तादृश्' शब्दका अर्थ है, 'वैसा'। इसके 'तादृक् तादृशौ तादृशः' इत्यादि पुँल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्गमें रूप होते हैं, नपुंसकमें तादृक् तादृशी तादृशि रूप होते हैं। स्वर्णका अर्थ है सोना। रूप धनाढ्यवत् है। तीनों लिङ्गोंमें 'बहु' के रूप क्रमशः बहवः। बह्व्यः। बहूनि इत्यादि हैं।
२. प्रायः इसलिये कहा गया कि कुछ शब्दोंके रूपमें कहीं-कहीं अन्तर है। जैसे पूर्व पर अवर दक्षिण अपर उत्तर अधर—ये व्यवस्था और असंज्ञामें ही सर्वनाम माने जाते हैं। जहाँ संज्ञा हो अथवा व्यवस्थाभिन्न अर्थमें इन शब्दोंका प्रयोग हो वहाँ इनका रूप 'सर्व' शब्दके समान न होकर 'राम' शब्दके समान हो जाता है। यथा—दक्षिणाः गायकाः, उत्तराः कुरवः। यहाँ दक्षिण-शब्द कुशल अर्थमें और उत्तर-शब्द देशकी संज्ञामें प्रयुक्त हुए हैं। व्यवस्था और असंज्ञामें यद्यपि ये सर्वनामसंज्ञक होते हैं, तथापि प्रथमाके बहुवचनमें तथा पञ्चमी और सप्तमीके एकवचनमें इनकी सर्वनामसंज्ञा वैकल्पिक होती है। अतः उन स्थलोंमें दो-दो रूप होते हैं—एक सर्ववत् दूसरा रामवत्। यथा—'पूर्वे पूर्वाः, पूर्वस्मात्, पूर्वात्, पूर्वस्मिन् पूर्वे' इत्यादि। शेष सभी रूप सर्ववत् हैं। ज्ञाति और धनसे भिन्न अर्थमें 'स्व' शब्दका रूप भी पूर्वादि शब्दोंके समान ही होता है। बाह्य और परिधानीय (पहननेयोग्य वस्त्र) अर्थमें प्रयुक्त अन्तर शब्दका रूप भी पूर्वादिके ही समान होता है। डतर और डतम शब्द प्रत्यय हैं। अतः तदन्त शब्द ही यहाँ सर्वादिमें गृहीत होते हैं, यथा—यतर यतम ततर ततम कतर कतम इत्यादि।

पूर्वभाग-द्वितीय पाद २४३

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २४३

हैं। निम्नाङ्कित शब्द अपत्यवाचक संज्ञाके रूपमें प्रयुक्त होते हैं। पाण्डव, श्रैधर, गार्ग्य, नाडायन, आत्रेय, गाङ्गेय, पैतृष्वस्रीय¹ ॥ ५१ ॥

देवतायें चेदमर्थे हैन्द्रं ब्राह्मो हविर्बलिः । क्रियायुजोः कर्मकर्त्रोधौरेयः कौङ्कुमं तथा ॥ ५२ ॥

निम्नाङ्कित शब्द देवतार्थक और इदमर्थक प्रत्ययसे युक्त हैं। यथा—ऐन्द्रं हविः, ब्राह्मो बलिः²। क्रियामें संयुक्त कर्म और कर्तासे तद्धित प्रत्यय होते हैं—धुरं वहति इति धौरेयः। जो धुर् अर्थात् भारको वहन करे, वह धौरेय है। यहाँ धुर् शब्द कर्म है और वहन-क्रियामें संयुक्त भी है, अतः उससे 'एय' यह तद्धित प्रत्यय हुआ। आदि स्वरकी वृद्धि हुई और 'धौरेय' शब्द सिद्ध हुआ। इसी प्रकार कुङ्कुमेन रक्तं वस्त्रम्—इसमें कुङ्कुम शब्द 'रँगना' क्रियाका कर्ता है और वह उसमें संयुक्त भी है। अतः उससे तद्धित अण् प्रत्यय होकर आदिपदकी वृद्धि हुई और 'कौङ्कुम' शब्द सिद्ध हुआ ॥ ५२ ॥

भवाद्यर्थे तु कानीनः क्षत्रियो वैदिकः स्वकः । स्वार्थे चौरस्तु तुल्यार्थे चन्द्रवन्मुखमीक्षते ॥ ५३ ॥

अब 'भव' आदि अर्थोंमें होनेवाले तद्धित प्रत्ययोंका उदाहरण देते हैं—कन्यायां भवः कानीनः। जो अविवाहिता कन्यासे उत्पन्न हुआ हो, उसे 'कानीन'³ कहते हैं। क्षत्रस्यापत्यं जातिः क्षत्रियः। क्षत्रकुलसे उत्पन्न उसी जातिका बालक 'क्षत्रिय'⁴ कहलाता है। वेदे भवः वैदिकः। इक्-प्रत्यय और आदि स्वरकी वृद्धि हुई है। स्व एव स्वकः। यहाँ स्वार्थमें 'क' प्रत्यय है। चोर एव चौरः, स्वार्थमें अण् प्रत्यय हुआ है। तुल्य-अर्थमें वत् प्रत्यय होता है। यथा—चन्द्रवन्मुखमीक्षते—चन्द्रमाके समान मुख देखता है। चन्द्र+वत्=चन्द्रवत् ॥ ५३ ॥

ब्राह्मणत्वं ब्राह्मणता भावे ब्राह्मण्यमेव च । गोमान्धनी च धनवानस्त्यर्थे प्रमितौ कियान् ॥ ५४ ॥

भाव-अर्थमें त्व, ता और य प्रत्यय होते हैं यथा—ब्राह्मणस्य भावः ब्राह्मणत्वम्, ब्राह्मणता, ब्राह्मण्यम्। अस्त्यर्थमें मतुप् और इन् प्रत्यय होते हैं—गौः अस्यास्ति इति गोमान्। धनमस्यास्ति इति धनी (जिसके पास गौ हो, वह 'गोमान्', जिसके पास धन हो, वह 'धनी' है⁵)। अकारान्त, मकारान्त तथा मकारोपध शब्दसे एवं झयन्त शब्दसे परे मत्के 'म' का 'व' हो जाता है—यथा धनमस्यास्ति इति धनवान्। परिमाण-अर्थमें 'इदम्', 'किम्', 'यत्', 'तत्', 'एतत्'—इन शब्दोंसे वतुप् प्रत्यय होता है, किंतु 'इदम्' और 'किम्' शब्दोंसे परे वतुप्के वकारका 'इय्' आदेश हो जाता है। दृक्, दृश्, वतु—ये परे हों तो इदम्के स्थानमें 'ई' तथा 'किम्' के स्थानमें 'कि' हो जाते हैं। किं परिमाणं यस्य स कियान्—यहाँ परिमाण-अर्थमें वतुप्-


१. इनके क्रमशः अर्थ इस प्रकार हैं—पाण्डुपुत्र, श्रीधर-पुत्र, गर्गकी संतानपरम्परा, नडगोत्रमें उत्पन्न संतान, अत्रि-पुत्र, गङ्गापुत्र (भीष्म) तथा बुआका पुत्र। यहाँ प्रथम दोमें अण्, तीसरेमें यञ्, चौथेमें आयन, पाँचवें, छठेमें एय और सातवेंमें ईय प्रत्यय हुए हैं। प्रत्येकमें आदि स्वरकी वृद्धि हुई है। तद्धित शब्दोंमें 'कृत्तद्धितसमासाश्च' (कृदन्त, तद्धितान्त और समासकी प्रातिपदिक संज्ञा होती है) इस नियमसे प्रातिपदिक संज्ञा करके सु आदि विभक्तियाँ आती हैं। २. ऐन्द्रं हविः का अर्थ है—इस हविष्यके देवता इन्द्र हैं। ब्राह्मो वलिः का अर्थ है—यह ब्रह्माके लिये वलि है। एकमें देवता-अर्थमें अण् प्रत्यय हुआ है और दूसरेमें 'तस्य इदम्' (उसका यह) इस अर्थमें अण् प्रत्यय हुआ है। दोनोंमें आदि स्वरकी वृद्धि हुई है। ३. महर्षि व्यास और कर्ण कानीन थे। कन्या-शब्दसे अण् होनेपर कन्या-शब्दके स्थानमें कनीन आदेश होता है और आदिपदकी वृद्धि होनेसे कानीन बनता है। ४. क्षत्र+इय=क्षत्रियः । 'त्र' के 'अ' का लोप होकर वह 'इय' के 'इ' में मिला है। ५. मतुपमें उपका लोप हो जाता है, फिर धीमान्-शब्दकी तरह रूप चलते हैं। धनिन् शब्दका रूप दण्डिन्-शब्दके समान समझना चाहिये।

२४४* संक्षिप्त नारदपुराण *

प्रत्यय, इयादेश तथा 'कि'-भाव करनेसे कियान् बनता है। इसका अर्थ है—'कितना' ॥ ५४॥

जातार्थे तुन्दिलः श्रद्धालौरुन्नत्ये तु दन्तुरः ।
स्रग्वी तपस्वी मेधावी मायाव्यस्त्यर्थ एव च ॥ ५५ ॥

अब जातार्थमें होनेवाले प्रत्ययोंका उदाहरण देते हैं। तुन्दः संजातः अस्य तुन्दिलः। जिसको तोंद हो जाय, उसे 'तुन्दिल' कहते हैं। तुन्द+इल = तुन्दिल। श्रद्धा संजाता अस्य इति श्रद्धालुः। श्रद्धा+आलु। (इसी प्रकार दयालु, कृपालु आदि बनते हैं।) दाँतोंकी ऊँचाई व्यक्त करनेके लिये दन्त शब्दसे उर-प्रत्यय होता है। उन्नताः दन्ता अस्य इति दन्तुरः (ऊँचे दाँतवाला)। अस्, माया, मेधा तथा स्रज्—इन शब्दोंसे अस्त्यर्थमें विन् प्रत्यय होता है। इनके उदाहरण क्रमसे तपस्वी, मायावी, मेधावी (बुद्धिमान्) और स्रग्वी हैं। स्रग्वीका अर्थ माला धारण करनेवाला है ॥ ५५ ॥

वाचालश्चैव वाचाटो बहुकुत्सितभाषिणि ।
ईषदपरिसमाप्तौ कल्पब्देशीय एव च ॥ ५६ ॥

खराब बातें अधिक बोलनेवालेके अर्थमें वाच् शब्दसे 'आल' और 'आट' प्रत्यय होते हैं। कुत्सितं बहु भाषते इति वाचालः, वाचाटः। ईषत् (अल्प) और असमाप्तिके अर्थमें कल्पप्, देश्य और देशीय प्रत्यय होते हैं ॥ ५६ ॥

कविकल्पः कविदेश्यः प्रकारवचने तथा।
पटुजातीयः कुत्सायां वैद्यपाशः प्रशंसने ॥ ५७ ॥
वैद्यरूपो भूतपूर्वे मतो दृष्टचरो मुने ।
प्राचुर्यादिष्वन्नमयो मृन्मयः स्त्रीमयस्तथा ॥ ५८ ॥

जैसे—ईषत् ऊनः कविः कविकल्पः, कविदेश्यः, कविदेशीयः। जहाँ प्रकार बतलाना हो, वहाँ किम् और सर्वनाम आदि शब्दोंसे 'था' प्रत्यय होता है। तेन प्रकारेण तथा। तत्+था=तथा। त्यदादि शब्दोंका अन्तिम हल् निवृत्त होकर वे अकारान्त हो जाते हैं, विभक्ति परे रहनेपर। (था, दा, त्र, तस् आदि प्रत्यय विभक्तिरूप माने गये हैं)। इस नियमके अनुसार तत्के स्थानमें त हो जानेसे 'तथा' बना। जहाँ किसी विशेष प्रकारके व्यक्तिका प्रतिपादन हो, वहाँ जातीय प्रत्यय होता है। यथा—पटुप्रकारः—पटुजातीयः। पटु-शब्दसे जातीय प्रत्यय हुआ। किसीकी हीनता प्रकाशित करनेके लिये संज्ञाशब्दसे पाश प्रत्यय होता है। जैसे—कुत्सितो वैद्यः वैद्यपाशः (खराब वैद्य)। प्रशंसा-अर्थमें रूप प्रत्यय होता है। यथा—प्रशस्तो वैद्यः वैद्यरूपः (उत्तम वैद्य)। मुनिवर नारदजी ! भूतपूर्व अर्थको व्यक्त करनेके लिये चर प्रत्यय होता है। यथा—पूर्वं दृष्टो दृष्टचरः (पहलेका देखा हुआ)।

प्राचुर्य (अधिकता) और विकारार्थ आदि व्यक्त करनेके लिये मय प्रत्यय होता है। जैसे—अन्नमयो यज्ञः। जिसमें अधिक अन्न व्यय किया जाय, वह अन्नमय यज्ञ है। यहाँ अन्न-शब्दसे मयट् प्रत्यय हुआ। इसी प्रकार मृन्मयः अश्वः (मिट्टीका घोड़ा) तथा स्त्रीमयः पुरुषः इत्यादि उदाहरण समझने चाहिये ॥ ५७-५८ ॥

जातार्थे लज्जितोऽत्यर्थे श्रेयाञ्छ्रेष्ठश्च नारद।
कृष्णतरः शुक्लमः किम् आख्यानतोऽव्ययात् ॥ ५९ ॥
किन्तरां चैवातितरामपि ह्युच्चैस्तरामपि।
परिमाणे जानुदघ्नं जानुद्वयसमित्यपि ॥ ६० ॥

जात-अर्थमें तारकादि शब्दोंसे इत प्रत्यय होता है। यथा—लज्जा संजाता अस्य इति लज्जितः* (जिसके मनमें लज्जा पैदा हो गयी हो, उसे लज्जित कहते हैं)। नारदजी ! यदि बहुतोंमेंसे किसी एककी अधिक विशेषता बतानी हो तो तम और इष्ठ प्रत्यय होते हैं और दोमेंसे एककी विशेषता बतलानी हो तो तर और ईयसु प्रत्यय होते हैं। ईयसुमें उकार इत्संज्ञक है। अयम् एषां अतिशयेन प्रशस्यः


* ईकार और तद्धित परे रहनेपर असंज्ञक इवर्ण और अवर्णका लोप हो जाता है, इस नियमके अनुसार 'लज्जा+इत' इस स्थितिमें 'अ'का लोप हो जाता है।

पूर्वभाग-द्वितीय पाद २४५

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २४५

श्रेष्ठः^१ (यह इन सबमें अधिक प्रशंसनीय है, अतः श्रेष्ठ है)। द्वयोः प्रशस्य श्रेयान् (दोमेंसे जो एक अधिक प्रशंसनीय है, वह श्रेयान् कहलाता है। यहाँ भी प्रशस्य+ईयस्=श्रेयस् (पूर्ववत् श्र आदेश हुआ)। इसके रूप इस प्रकार हैं—श्रेयान् श्रेयांसौ श्रेयांसः। श्रेयांसम् श्रेयांसौ श्रेयसः। श्रेयसा श्रेयोभ्याम् श्रेयोभिः इत्यादि। इसी प्रकार जो दोमेंसे एक अधिक कृष्ण है, उसे कृष्णतर और जो बहुतोंमेंसे एक अधिक शुक्ल है, उसे शुक्लतम कहते हैं। कृष्ण+तर=कृष्णतर। शुक्ल+तम=शुक्लतम। किम्, क्रियावाचक शब्द (तिङन्त) और अव्ययसे परे जो तम और तर प्रत्यय हैं, उनके अन्तमें आम् लग जाता है। उदाहरणके लिये किंतराम्, अतितराम् तथा उच्चैस्तराम् इत्यादि प्रयोग हैं। प्रमाण (जल आदिके माप) व्यक्त करनेके लिये द्वयस, दघ्न और मात्र प्रत्यय होते हैं। जानु प्रमाणम् अस्य इति जानुदघ्नं जलम् (जो घुटनेतक आता हो, उस जलको जानुदघ्न कहते हैं) जानु+दघ्न=जानुदघ्न। इसी प्रकार जानुद्वयसम् और जानुमात्रम्—ये प्रयोग भी होते हैं॥ ५९-६० ॥

जानुमात्रं च निर्द्धारि बहूनां च द्वयोः क्रमात्।
कतमः कतरः संख्येयविशेषावधारणे ॥ ६१ ॥
द्वितीयश्च तृतीयश्च चतुर्थः षष्ठपञ्चमौ।
एकादशः कतिपयथः कतिथः कति नारद ॥ ६२ ॥

दोमेंसे एकका और बहुतोंमेंसे एकका निश्चय करनेके लिये 'किम्' 'यत्' और 'तत्' शब्दोंसे क्रमशः डतर और डतम प्रत्यय होते हैं। यथा—भवतोः कतरः^२ श्यामः (आप दोनोंमें कौन श्याम है?) भवतां कतमः श्रीरामः? (आपलोगोंमें कौन श्रीराम हैं?)। संख्या (गणना) करनेयोग्य वस्तुविशेषका निश्चय करनेके लिये द्वि-शब्दसे द्वितीय, त्रि-शब्दसे तृतीय^३, चतुर्-शब्दसे चतुर्थ और षष्-शब्दसे षष्ठ रूप बनते हैं। इनका अर्थ क्रमशः इस प्रकार है—दूसरा, तीसरा, चौथा और छठा। पञ्चन्, सप्तन्, अष्टन्, नवन् और दशन्—इन शब्दोंके 'न्' कारको मिटाकर 'म'कार बढ़ जाता है, जिससे पञ्चम, सप्तम, अष्टम, नवम, दशम रूप बनते हैं। एकादशन्से अष्टादशन्तक उक्त अर्थमें 'न्' कारका लोप होकर सभी शब्द अकारान्त हो जाते हैं, जिनके 'राम' शब्दके समान रूप होते हैं। यथा एकादशः द्वादशः इत्यादि। नारदजी! कति और कतिपय शब्दोंसे थ-प्रत्यय होता है, जिससे कतिथः और कतिपयथः पद बनते हैं ॥ ६१-६२ ॥

विंशश्च विंशतितमस्तथा शततमादयः।
द्वेधा द्वैधा द्विधा संख्या प्रकारेऽथ मुनीश्वर ॥ ६३ ॥

बीसवेंके अर्थमें विंशः और विंशतितमः^४—ये दो रूप होते हैं। शत आदि संख्यावाचक शब्दोंसे (तथा मास, अर्धमास एवं संवत्सर शब्दोंसे) नित्य 'तम' प्रत्यय होता है। यथा—शततमः (एकशततमः, मासतम्ः, अर्धमासतमः, संवत्सरतमः)। मुनीश्वर! क्रियाके प्रकारका बोध करानेके लिये संख्यावाचक


१. प्रशस्य+इष्ठ=श्रेष्ठ (प्रशस्य-शब्दके स्थानमें 'श्र'आदेश हो जाता है, फिर गुण करनेसे श्रेष्ठ-शब्द बनता है)।
२. किम्+डतर, किम्+डतम। यहाँ डकार इत्संज्ञक है। डित् प्रत्यय परे रहनेपर पूर्ववर्ती शब्दके टिभागका लोप होता है। अन्तिम स्वर और उसके बादके हल् अक्षर भी 'टि' कहलाते हैं। 'किम्' में 'क' छोड़कर 'इम्' भाग 'टि' है। उसका लोप हुआ। क्+अतर=क्+अतम मिलकर 'कतर' और 'कतम' शब्द बने। इसी प्रकार यतर, यतम, ततर, ततम—ये शब्द भी बनते हैं। ३. 'त्रि+तीय' इस अवस्थामें 'त्रि' के स्थानमें सम्प्रसारण-पूर्वरूप होकर 'तृतीय' रूप बनता है। ४. इससे आगेकी सभी संख्याओंमें इसी प्रकारके दो रूप होते हैं। साठवेंके अर्थमें केवल 'षष्टितम' शब्द बनता है। उससे आगेकी संख्याओंमें भी यदि आदिमें दूसरी संख्याका प्रयोग न हो तो केवल तम प्रत्ययका विधान है। यथा—सप्ततितमः, अशीतितमः, नवतितमः इत्यादि। आदिमें संख्या लग जानेपर तो 'विंशः विंशतितमः' की भाँति दो-दो रूप होते ही हैं—जैसे एकषष्ठः एकषष्टितमः इत्यादि।

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शब्दसे स्वार्थमें 'धा' प्रत्यय होता है—जैसे (एकधा) द्विधा, त्रिधा इत्यादि^१ ॥ ६३॥
क्रियावृत्तौ पञ्चकृत्वो द्विस्त्रिर्बहुश इत्यपि।
द्वितयं त्रितयं चापि संख्यायां हि द्वयं त्रयम्॥ ६४॥
क्रियाकी आवृत्तिका बोध करानेके लिये कृत्वस् प्रत्यय होता है और 'स्' कारका विसर्ग हो जाता है। यथा—पञ्चकृत्वः^२ (पाँच बार), द्विः^३, त्रिः (दो बार, तीन बार)। बहु-शब्दसे 'था, शस् एवं कृत्वस्' तीनों ही प्रत्यय होते हैं—यथा बहुधा, बहुशः, बहुकृत्वः। संख्याके अवयवका बोध करानेके लिये 'तय' प्रत्यय होता है। उदाहरणके लिये द्वितय, त्रितय, चतुष्टय और पञ्चतय आदि शब्द हैं। द्वि और त्रि शब्दोंसे आगे जो 'तय' प्रत्यय है, उसके स्थानमें विकल्पसे अय हो जाता है; फिर द्वि और त्रि शब्दके इकारका लोप होनेसे द्वय, त्रय शब्द बनते हैं॥ ६४॥
कुटीरश्च शमीरश्च शुण्डारोऽल्पार्थके मतः।
स्त्रैणः पौंस्र्नस्तुण्डिभश्च वृन्दारककृषीवलौ॥ ६५॥
कुटी, शमी और शुण्डा शब्दसे छोटेपनका बोध करानेके लिये 'र' प्रत्यय होता है। छोटी कुटीको कुटीर कहते हैं। कुटी+र=कुटीरः। इसी प्रकार छोटी शमीको शमीर और छोटी शुण्डाको शुण्डार कहते हैं। शुण्डा-शब्द हाथीकी सूँड़ और मद्यशाला (शराबखाने)-का बोधक है। स्त्री और पुंस् शब्दोंसे नञ् प्रत्यय होता है। आदि स्वरकी वृद्धि होती है। ञकार इत्संज्ञक है। नके स्थानमें ण होता है। इस प्रकार स्त्रैण शब्द बनता है। जिस पुरुषमें स्त्रीका स्वभाव हो तथा जो स्त्रीमें अधिक आसक्त हो, उसे स्त्रैण कहते हैं। पुंस्+न, आदिवृद्धि=पौंस्र्न (पुरुषसम्बन्धी)। तुण्डि आदि शब्दोंसे अस्त्यर्थमें 'भ' प्रत्यय होता है। तुण्डि+भ=तुण्डिभः (बढ़ी हुई नाभिवाला)। शृङ्ग और वृन्द शब्दोंसे अस्त्यर्थमें 'आरक' प्रत्यय होता है। शृङ्ग+आरक=शृङ्गारकः (पर्वत)। वृन्द+आरक= वृन्दारकः (देवता)। रजस् और कृषि आदि शब्दोंसे 'बल' प्रत्यय होता है, रजस्वला स्त्री, कृषीवलः (किसान)॥ ६५॥
मलिनो विकटो गोमी भौरिकिबिधमुक्तटम्।
अवटीटोऽवनाटश्च निविडं चेक्षुशाकिनम्॥ ६६॥
निविरीसमैषुकारिभक्तं विद्याचणस्तथा।
विद्याचञ्चुर्बहुतिथं पर्वतः शृङ्गिणस्तथा॥ ६७॥
स्वामी विषमं रूप्यं चोपेत्यकाधित्यका तथा।
चिल्लश्च चिपिटं चिक्कं वातूलं कुतुपस्तथा॥ ६८॥
बलूलश्च हिमेलुश्च कहिकश्चोपडस्ततः।
ऊर्णायुश्च मरुत्तश्चैकाकी चर्मण्वती तथा॥ ६९॥
ज्योत्स्ना तमिस्राऽष्ठीवच्च कक्षीवद्रुमण्वती।
आसन्दीवच्च चक्रीवत्तूष्णीकां जल्पत्क्यपि॥ ७०॥
मल-शब्दसे अस्त्यर्थमें इन प्रत्यय होता है। मलम् अस्यास्ति इति मलिनः (मलयुक्त)। मल+इन अकार-लोप=मलिन। सम्, प्र, उद् और वि—इनसे कट प्रत्यय होता है,—यथा संकटः, प्रकटः, उत्कटः, विकटः। गो-शब्दसे मिन्-प्रत्यय होता है। अस्त्यर्थमें—गो+मिन्=गोमी (जिसके पास गौएँ हों, वह पुरुष) ज्योत्स्ना (चाँदनी), तमिस्रा (अँधेरी रात), शृङ्गिण, (शृङ्गवाला), ऊर्जस्विन् (ओजस्वी), ऊर्जस्वल, गोमिन्, मलिन और मलीमस (मलिन)—


१. द्वि और त्रि शब्दोंके इकारका विकल्पसे एकार भी हो जाता है। यथा—द्वेधा, त्रेधा। द्वि और त्रि शब्दोंसे 'धम्' प्रत्यय और आदिस्वरकी वृद्धि—ये दो कार्य और भी होते हैं। यथा—द्वैधम्, त्रैधम्।
२. था, धा, त्र, तस्, कृत्वस् आदि प्रत्यय जिन शब्दोंके अन्तमें लगते हैं, वे तद्धितान्त अव्यय माने जाते हैं। ३. द्वि, त्रि और चतुर् शब्दोंसे कृत्वस् न होकर केवल 'सुच्' प्रत्यय होता है। इसमें केवल 'स' रहता है और 'उ'कार तथा 'च्'कारकी 'इत्संज्ञा' हो जाती है। प्रयोगमें सकारका विसर्ग हो जाता है। चतुर्-शब्दके आगे स 'स'का लोप होता है और 'र' का विसर्ग हो जाता है। इस प्रकार क्रमशः द्विः त्रिः चतुः—ये रूप बनते हैं। ये तीनों अव्यय हैं।

पूर्वभाग-द्वितीय पाद २४७

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २४७

ये शब्द मत्वर्थमें निपातनसिद्ध हैं। ‘भौरिकिविधम्’ इसकी व्युत्पत्ति यों है—भौरिकीणां विषयो देशः—भौरिकिविधम् (भौरिकि नामवाले वर्ग-विशेषके लोगोंका देश)। ऐषुकारीणाम् विषयो देशः—ऐषुकारिभक्तम् (ऐषुकारि—बाण बनानेवाले लोगोंका देश)। इन दोनों उदाहरणोंमें क्रमशः ‘विध’ एवं ‘भक्त’ प्रत्यय हुए हैं। भौरिक्यादि तथा ऐषुकार्यादि शब्दोंसे ‘विध’ एवं ‘भक्त’ प्रत्यय होनेका नियम है। उत्कटम्—इसकी सिद्धिका नियम पहले बताया गया है, नासिकाकी निचाई व्यक्त करनेके लिये ‘अव’ उपसर्गसे ‘टीट’, ‘नाट’ और ‘भ्रट’ प्रत्यय होते हैं। तथा नि उपसर्गसे ‘विड’ और ‘विरीस’ प्रत्यय होते हैं। इसके सिवा ‘नि’से ‘इन’ और ‘पिट’ प्रत्यय भी होते हैं। ‘इन’-प्रत्यय परे होनेपर ‘नि’के स्थानमें चिक् आदेश हो जाता है और ‘पिट’प्रत्यय परे होनेपर ‘नि’के स्थानमें ‘चि’ आदेश होता है। मूलोक्त उदाहरण इस प्रकार हैं—अवटीटः, अवनाटः (अवभ्रटः)=नीची नाकवाला पुरुष। निविडम् (नीची नाक), निविरीसम्, चिकिनम्, चिपिटम्, चिक्कम्—इन सबका अर्थ नीची नाक है। जिसके आँखसे पानी आता हो, उसको ‘चिल्ल’ और ‘पिल्ल’ कहते हैं। ल प्रत्यय है और क्लिन्न-शब्द प्रकृति है—जिसके स्थानमें चिल्ल और पिल्ल आदेश हुए हैं। पैदा करनेवाले खेतके अर्थमें पैदावार-वाचक शब्दसे शाकट और शाकिन प्रत्यय होते हैं। जैसे ‘इक्षुशाकटम्’ ‘इक्षुशाकिनम्’। उसके द्वारा विख्यात है, इस अर्थमें चञ्चु और चण प्रत्यय होते हैं। जो विद्यासे विख्यात है, उसे ‘विद्याचण’ और ‘विद्याचञ्चु’ कहते हैं। बहु आदि शब्दोंसे ‘तिथ’ प्रत्यय होता है, पूरण अर्थमें। बहूनां पूरणम् इति=बहुतिथम्। शृङ्खिण-शब्द पर्वतका वाचक है, इसे निपात-सिद्ध बताया जा चुका है। ऐश्वर्यवाचक स्व-शब्दसे आमिन् प्रत्यय होता है—स्व+आमिन्=स्वामी (अधीश्वर या मालिक)। ‘रूप’ शब्दसे आहत और प्रशंसा अर्थमें ‘य’ प्रत्यय होता है। यथा विषमम्, आहतं वा रूपमस्यास्तीति—रूप्यः कार्षापणः (खराब पैसा), रूप्यम् आभूषणम् (खराब आभूषण) इत्यादि। ‘उप’ और ‘अधि’ से त्यक प्रत्यय होता है, क्रमशः समीप एवं ऊँचाईकी भूमिका बोधक होनेपर। पर्वतके पासकी भूमिको ‘उपत्यका’ (तराई) कहते हैं और पर्वतके ऊपरकी (ऊँची) भूमिको ‘अधित्यका’ कहते हैं। ‘वात’ शब्दसे ‘ऊल’ प्रत्यय होता है, असहन एवं समूहके अर्थमें। वातं न सहते वातूलः। जो हवा न सह सके, वह ‘वातूल’ है। वात+ऊल, अलोप=वातूलः। वातके समूह (आँधी)-को भी ‘वातूल’ कहते हैं। ‘कुतू’ शब्दसे ‘डुप’ प्रत्यय होता है, डकार इत्संज्ञक, टिलोप। ह्रस्वा कुतूः कुतुपः (चमड़ेका तैलपात्र—कुप्पी)। बलं न सहते (बल नहीं सहता)—इस अर्थमें बल-शब्दसे ‘ऊल’-प्रत्यय होता है। बल+ऊल=बलूलः। हिमं न सहते (हिमको नहीं सहता) इस अर्थमें हिमसे एलु प्रत्यय होता है। हिम+एलु=हिमेलुः। अनुकम्पा-अर्थमें मनुष्यके नामवाचक शब्दसे ‘इक’ एवं ‘अड’ आदि प्रत्यय होते हैं तथा स्वरादि प्रत्यय परे रहनेपर पूर्ववर्ती शब्दके द्वितीय स्वरसे आगेके सभी अक्षर लुप्त हो जाते हैं। यदि द्वितीय स्वर सन्धि-अक्षर हो तो उसका भी लोप हो जाता है। इन सब नियमोंके अनुसार ये दो उदाहरण हैं—अनुकम्पितः कहोडः=कहिकः। अनुकम्पितः उपेन्द्रदत्तः=उपडः। ‘ऊर्णायुः’ का अर्थ है ऊनवाला जीव (भेड़ आदि) अथवा ऊनी कम्बल आदि। ‘ऊर्णा’से युस् प्रत्यय होकर ‘ऊर्णायुः’ बना है। पर्व और मरुत् शब्दोंसे त प्रत्यय होता है। पर्व+त=पर्वतः (पहाड़)। मरुत्+त=मरुत्तः (मरुआ नामक पौधा अथवा महाराज मरुत्त)। एक शब्दसे असहाय-अर्थमें आकिन्, कन् और उसका लुक्, ये तीनों कार्य बारी-बारीसे होते हैं। एक+आकिन्=एकाकी। एक+क=एककः।

२४८ * संक्षिप्त नारदपुराण *


कन्का लोप होनेपर एकः। इन सबका अर्थ— अकेला, असहाय है। चर्मण्वती एक नदीका नाम है। (इसमें चर्मन् शब्दसे मतुप्, मकारका वकारादेश, नलोपका अभाव और णत्व आदि कार्य निपातसिद्ध हैं। स्त्रीलिङ्गबोधक ङीप् प्रत्यय हुआ है)। 'ज्योत्स्ना' और 'तमिस्रा' निपात-सिद्ध हैं, यह बात गोमीके प्रसङ्गमें कही गयी है। इसी प्रकार अष्ठीवत्, कक्षीवत्, रुमण्वत्, आसन्दीवत् तथा चक्रीवत्—ये शब्द भी निपात-सिद्ध हैं। यथा—आसन्दीवान् ग्रामः, अष्ठीवान् नाम ऋषिः, चक्रीवान् नाम राजा, कक्षीवान् नाम ऋषिः, रुमण्वान् नाम पर्वततः। तूष्णीं शब्दसे काम् प्रत्यय होता है, अकच्के प्रकरणमें। तूष्णीकाम् आस्ते (चुप बैठता है)। मित् कार्य अन्तिम स्वरके बाद होता है। तिङन्त, अव्यय और सर्वनामसे 'टि' के पहले अकच् होता है, चकार इत्संज्ञक है। इस नियमके अनुसार 'जल्पति' इस तिङन्त पदके इकारसे पहले अकच् होनेसे 'जल्पतकि' (बोलता है) रूप बनता है॥ ६६—७०॥

कंवः कम्भश्च कंयुश्च कन्तिः कन्तुस्तथैव च।
कन्तः कंयश्च शंवश्च शम्भः शंयुस्तथा पुनः ॥ ७१ ॥
शन्तिः शन्तुः शन्तशंयौ तथाहंयुः शुभंयुवत् ।

कम् और शम्—ये मकारान्त अव्यय हैं। कम्का अर्थ जल और सुख है, शम्का अर्थ सुख है। इन दोनोंसे सात प्रत्यय होते हैं—व, भ, युस्, ति, तु, त और यस्। युस् और यस्का सकार इत्संज्ञक है। इन सबके उदाहरण क्रमशः इस प्रकार हैं— कंवः, कम्भः, कंयुः, कन्तिः, कन्तुः, कन्तः, कंयः। शंवः, शंभः, शंयुः, शन्तिः, शन्तुः, शन्तः, शंयः। अहम्—यह मकारान्त अव्यय अहंकारके अर्थमें प्रयुक्त होता है और शुभम्—यह मकारान्त अव्यय शुभ-अर्थमें है। इनसे 'युस्'-प्रत्यय होता है, सकार इत्संज्ञक है। अहम्+यु=अहंयुः (अहंकारवान्), शुभम्+यु= शुभंयुः (शुभयुक्त पुरुष) ॥ ७१ ॥

भवति बभूव भविता भविष्यति भवतद्भवद्वेच्चापि ॥ ७२ ॥
भूयादभूद्भविष्यल्लादावेतानि रूपाणि।
अत्ति जघासात्तात्स्यत्त्वाद्दद्यादद्विरघसदात्स्यत् ॥ ७३ ॥

(अब तिङन्तप्रकरण प्रारम्भ करके कुछ धातुओंके रूपोंका दिग्दर्शन कराते हैं। वैयाकरणोंने दस प्रकारके धातु-समुदाय माने हैं, उन्हें 'नवगणी या दसगणी' के नामसे जाना जाता है। उनके नाम हैं—भ्वादि, अदादि, जुहोत्यादि, दिवादि, स्वादि, तुदादि, रुधादि, तनादि, क्र्यादि तथा चुरादि। भ्वादिगणके सभी धातुओंके रूप प्रायः एक प्रकार एवं एक शैलीके होते हैं, दूसरे-दूसरे गणोंके धातु भी अपने-अपने ढंगमें एक ही तरहके होते हैं। यहाँ सभी गणोंके एक-एक धातुके नौ लकारोंमें एक-एक रूप दिया जाता है। शेष धातु और उनके रूपोंका ज्ञान विद्वान् गुरुसे प्राप्त करना चाहिये।) 'भू' धातुके लट् लकारमें 'भवति भवतः भवन्ति' इत्यादि रूप बनते हैं। लिट् लकारमें 'बभूव बभूवतुः बभूवुः' इत्यादि, लुट्में 'भविता भवितारौ भवितारः' इत्यादि, लृट्में 'भविष्यति भविष्यतः भविष्यन्ति' इत्यादि, लोट्में 'भवतु भवतात् भवताद्, भवताम् भवन्तु इत्यादि, लङ्लकारमें 'अभवत् अभवताम् अभवन्' इत्यादि। विधिलिङ्में 'भवेत् भवेताम् भवेयुः' इत्यादि, आशिष् लिङ्में भूयात् 'भूयास्ताम् भूयासुः' इत्यादि लुङ्में 'अभूत् अभूताम् अभूवन्' इत्यादि तथा लृङ् लकारमें 'अभविष्यत् अभविष्यताम् अभविष्यन्' इत्यादि—ये सब रूप होते हैं। 'भू' धातुका अर्थ सत्ता है, 'भवति'का अर्थ 'होता है'—ऐसा किया जाता है। अब अदादि गणके 'अद्' धातुका पूर्ववत् प्रत्येक लकारमें एक-एक रूप दिया जाता है, 'अद्' धातु भक्षण अर्थमें प्रयुक्त होता है। अत्ति। जघास। अत्ता। अत्स्यति। अत्तु। आदत्। अद्यात्। अद्यात्। अघसत्। आत्स्यत् ॥ ७२-७३ ॥

जुहोति जुहाव जुहवाञ्चकार होता होष्यति जुहोतु।
अजुहोज्जुहुयाद्दूयादहौषीदहोष्यद्धीव्यति ।
दिदेव देविता देविष्यति दीव्यतु चादीव्यद्दीव्येद्दीव्याद्वै ॥ ७४ ॥

पूर्वभाग-द्वितीय पाद २४९

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २४९

अदेवीददेविष्यत्सुनोति सुषाव सोता सोष्यति वै।
सुनोत्सुनोत् सुनुयात्सूयादसावीदसोष्यत् तुदति च ॥७५॥
तुतोद तोत्ता तोत्स्यति तुदत्वतुदत्तुदेत्तुद्याद्धि।
अतौत्सीदतोत्स्यदिति च रुणद्धि रुरोध रोद्धा रोत्स्यति वै॥७६॥
रुणद्ध्वरुणद्रुन्ध्याद्रुध्यादरौत्सीदरोत्स्यच्च ।
तनोति ततान तनिता तनिष्यति तनोत्वतनोत्तनुयाद्धि॥७७॥
तन्यादतनीच्चातानीदतनिष्यत् क्रीणाति चिक्राय क्रेता
क्रेष्यति क्रीणात्विति च। अक्रीणात् क्रीणीयात्
क्रीयादक्रैषीदक्रेष्यच्चोरयति चोरयामास चोरयिता
चोरयिष्यति चोरयत्वचोरयच्चोरयेच्चोर्याद-
चूचुरदचोरयिष्यदित्येवं दश वै गणाः॥७८॥

जुहोत्यादि गणमें 'हु' धातु प्रधान है। इसका प्रयोग अग्निमें आहुति डालनेके अर्थमें या देवताको तृप्त करनेके अर्थमें होता है। इसका प्रत्येक लकारमें रूप इस प्रकार है—जुहोति। जुहाव, जुहवाञ्चकार, जुहवाम्बभूव, जुहवामास। होता। होष्यति। जुहोतु। अजुहोत्। जुहुयात्। हूयात्। अहौषीत्। अहोष्यत्। दिवादि गणमें 'दिव' धातु प्रधान है। इसके अनेक अर्थ हैं—क्रीडा, विजयकी इच्छा, व्यवहार, द्युति, स्तुति, मोद, मद, स्वप्न, कान्ति और गति। इसके रूप पूर्ववत् विभिन्न लकारोंमें इस प्रकार हैं—दीव्यति। दिदेव। देविता। देविष्यति। दीव्यतु। अदीव्यत्। दीव्येत्। दीव्यात्। अदेवीत्। अदेविष्यत्। स्वादिगणमें 'सु' धातु प्रधान है। यह मूलतः 'षूञ्' धातुके नामसे प्रसिद्ध है। इसका अर्थ है अभिषव अर्थात् नहलाना, रस निचोड़ना, नहाना एवं सोमरस निकालना। रूप इस प्रकार हैं—सुनोति। सुषाव। सोता। सोष्यति। सुनोतु। असुनोत्। सुनुयात्। सूयात्। असावीत्। असोष्यत्। ये परस्मैपदके रूप हैं; आत्मनेपदमें सुनते, 'सुषुवे' इत्यादि रूप होते हैं। तुदादिगणमें 'तुद्' धातु प्रधान है, जिसका अर्थ है पीड़ा देना। रूप इस प्रकार हैं—तुदति। तुतोद। तोत्ता। तोत्स्यति। तुदतु। अतुदत्। तुदेत्। तुद्यात्। अतौत्सीत्। अतोत्स्यत्। रुधादिगणमें 'रुध्' धातु प्रधान है, जिसका अर्थ है—रूँधना, बाड़ लगाना, घेरा डालना या रोकना। रूप इस प्रकार हैं—रुणद्धि। रुरोध। रोद्धा। रोत्स्यति। रुणद्धु। अरुणत्। रुन्ध्यात्। रुद्ध्यात्। अरौत्सीत्। अरोत्स्यत्।१ तनादिगणमें 'तन्' धातु प्रधान है। इसका अर्थ है विस्तार करना, फैलाना; रूप इस प्रकार हैं—तनोति। ततान। तनिता। तनिष्यति। तनोतु। अतनोत्। तनुयात्। तन्यात्। अतनीत्, अतानीत्। अतनिष्यत्२। क्र्यादिमें क्री-धातु प्रधान है—जिसका अर्थ है खरीदना, एक द्रव्य देकर दूसरा द्रव्य लेना। रूप इस प्रकार हैं—क्रीणाति। चिक्राय। क्रेता। क्रेष्यति। क्रीणातु। अक्रीणात् क्रीणीयात्। क्रीयात्। अक्रैषीत्३। अक्रेष्यत्। चुरादिगणमें 'चुर्' धातु प्रधान है, जिसका अर्थ है चुराना; रूप इस प्रकार हैं—चोरयति। चोरयामास, चोरयाञ्चकार, चोरयाम्बभूव। चोरयिता। चोरयिष्यति। चोरयतु। अचोरयत्। चोरयेत्। चोर्यात्। अचूचुरत्। अचोरयिष्यत्४। इस प्रकार ये धातुओंके दस गुण माने गये हैं॥७४-७८॥

प्रयोजके भावयति सनीच्छायां बुभूषति।
क्रियासमभिहारे तु पण्डितो बोभूयते मुने॥७९॥


१. यह उभयपदीय धातु है। मूलमें केवल परस्मैपदीय रूप दिया गया है। इसका आत्मनेपदीय रूप इस प्रकार है—रुन्धे। रुरुधे। रोद्धा। रोत्स्यते। रुन्धाम्। अरुन्ध। रुन्धीत। रोत्सीष्ट। अरुद्ध। अरोत्स्यत।
२. यह भी उभयपदीय धातु है। इसका आत्मनेपदीय रूप इस प्रकार है—तनुते। तेने। तनिता। तनिष्यते। तनुताम्। अतनुत। तन्वीत। तनिषीष्ट। अतत, अतनिष्ट। अतनिष्यत।
३. इसका आत्मनेपदीय रूप इस प्रकार है—क्रीणीते। चिक्रिये। क्रेता। क्रेष्यते। क्रीणीताम्। अक्रीणीत। क्रीणीत। क्रेषीष्ट। अक्रेष्ट। अक्रेष्यत।
४. इसका आत्मनेपदीय रूप इस प्रकार है—चोरयते। चोरयाञ्चक्रे, चोरयामासे, चोरयाम्बभूवे। चोरयिता। चोरयिष्यते। चोरयताम्। अचोरयत। चोरयेत। चोरयिषीष्ट। अचूचुरत। अचोरयिष्यत।

२५० * संक्षिप्त नारदपुराण *

प्रयोजकके व्यापारमें प्रत्येक धातुसे णिच् प्रत्यय होता है। 'च'कार और 'ण'कार इत्संज्ञक हैं। णिच् प्रत्यय परे रहनेपर स्वरान्त अङ्गकी वृद्धि होती है। भू से णिच् करनेपर भू+इ बना; फिर वृद्धि और आव् आदेश करनेपर भावि बना, उससे धातुसम्बन्धी अन्य कार्य करनेपर भावयति रूप बनता है। जो कर्ताको प्रेरणा दे, उसे प्रयोजक कहते हैं। जैसे—'चैत्रः पण्डितो भवति' (चैत्र पण्डित होता है), 'तं मैत्रः अध्यापनादिना प्रेरयति' (उसे मैत्र पढ़ाने आदिके द्वारा पण्डित होनेमें प्रेरणा देता है)। इस वाक्यमें चैत्र प्रयोज्य कर्ता है और मैत्र प्रयोजक कर्ता है। इस प्रयोजकके व्यापारमें ही णिच् प्रत्यय होता है; इसलिये उसीके अनुसार प्रथम, मध्यम आदि पुरुषकी व्यवस्था एवं क्रिया होती है। प्रयोज्य कर्ता प्रयोजकके व्यापारमें कर्म बन जाता है, इसलिये उसमें द्वितीया विभक्ति होती है और प्रयोजक कर्तामें प्रथमा विभक्ति। यथा—'मैत्रः चैत्रं पण्डितं भावयति' (मैत्र चैत्रको पण्डित बनानेमें योग देता है)। इसी प्रकार अन्य धातुओंसे भी प्रेरणार्थक प्रत्यय होता है। यथा—'छात्रः पठति, गुरुः प्रेरयति इति गुरुः छात्रं पाठयति' (छात्र पढ़ता है, गुरु उसे प्रेरित करता है; इसलिये गुरु छात्रको पढ़ाता है)।

इच्छा-अर्थमें 'सन्' प्रत्यय होता है 'भवितुम् इच्छति बुभूषति' (होनेकी इच्छा करता है)। इसी प्रकार पठ्, गम् आदि अन्य धातुओंसे भी इच्छा-अर्थमें पिपठिषति (पढ़नेकी इच्छा करता है), जिगमिषति (जाना चाहता है)—इत्यादि सन्नन्त रूप होते हैं। मुने! क्रिया-समभिहारमें एक स्वरवाले हलादि धातुसे 'यङ्' प्रत्यय होता है, इस नियमके अनुसार भू-धातुसे यङ्प्रत्यय होनेपर धातुका द्वित्व होता है; क्योंकि सन् और यङ् परे रहनेपर धातुके द्वित्व होने (एकसे दो हो जाने)-का नियम है। फिर धातु-प्रत्ययसम्बन्धी अन्य कार्य करनेपर बोभूयते रूप बनता है। यथा—'देवदत्तः पण्डितो बोभूयते' (देवदत्त बड़ा भारी पण्डित हो रहा है)। 'बार-बार' या 'अधिक' अर्थका बोध कराना ही क्रियासमभिहार कहलाता है। इस तरहके प्रयोगको यङन्त कहते हैं। पठ् और गम् आदि धातुओंसे यङ्-प्रत्यय करनेपर पापठ्यते, (बार-बार या बहुत पढ़ता है)। जङ्गम्यते (बार-बार या बहुत जाता है) इत्यादि रूप होते हैं॥७९॥

तथा यङ्लुकि विप्रेन्द्र बोभवीति च पठ्यते।
पुत्रीयतीत्यात्मनीच्छायां तथाचारेऽपि नारद।
अनुदात्तङितो धातोः क्रियाविनिमये तथा ॥८०॥

यङ्-प्रत्ययका लुक् (लोप होना) भी देखा जाता है। उस दशामें बोभवीति, बोभोति, पापठीति और जङ्घमीति इत्यादि रूप होते हैं। इन रूपोंको यङ्लुगन्त रूप कहते हैं। अर्थ यङन्तके ही समान होते हैं। 'आत्मनः पुत्रम् इच्छति' (अपने लिये पुत्र चाहता है)। इस वाक्यसे पुत्रकी इच्छा व्यक्त होती है। ऐसे स्थलोंमें इच्छा-क्रियाके कर्मभूत शब्दसे क्यच्-प्रत्यय होता है। ककार और चकारकी इत्संज्ञा होती है। उपर्युक्त उदाहरणमें पुत्र-शब्दसे क्यच्-प्रत्यय करनेपर पुत्र+य इस अवस्थामें पुत्रमें 'त्र'के अकारका इ हो जाता है, फिर 'पुत्रीय' की धातुसंज्ञा करके तिङन्तके समान रूप चलते हैं। इस प्रकार 'पुत्रीयति' इत्यादि रूप होते हैं। 'पुत्रीयति'का अर्थ है—अपने लिये पुत्र चाहता है। ऐसे प्रयोगको नामधातु कहते हैं। नारदजी! कर्मभूत उपमानवाचक शब्दसे आचार-अर्थमें भी क्यच् होता है। यथा—'पुत्रमिवाचरति पुत्रीयति छात्रम्' (गुरुजी छात्रके साथ पुत्रका-सा बर्ताव करते हैं)।

अब आत्मनेपदका प्रकरण आरम्भ करते हैं। जिस धातुमें अनुदात्त स्वर और ङकारकी इत्संज्ञा

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | २५१ ---|---

होती है, उससे आत्मनेपदके प्रत्यय होते हैं। यथा—एधते, वर्धते इत्यादि। ये अनुदात्तेत् हैं। त्रैङ् पालने—यह ङित् धातु है, इसके केवल आत्मनेपदमें 'त्रायते' इत्यादि रूप होते हैं। जहाँ क्रियाका विनिमय व्यक्त होता हो, वहाँ भी आत्मनेपद होता है। यथा—व्यतिलुनीते (दूसरेके योग्य लवनरूप कार्य दूसरा करता है) ॥८०॥

निविशादेस्तथा विप्र विजानीह्यात्मनेपदम्।
परस्मैपदमाख्यातं शेषात् कर्तरि शाब्दिकैः ॥८१॥

विप्रवर ! निपूर्वक 'विश्' एवं वि और परापूर्वक 'जि' इत्यादि धातुओंसे भी आत्मनेपद ही जानो। यथा—निविशते, विजयते, पराजयते इत्यादि। भाव और कर्ममें प्रत्यय होनेपर भी आत्मनेपद ही होता है। आत्मनेपदके जितने निमित्त हैं, उन्हें छोड़कर शेष धातुओंसे कर्तामें परस्मैपद होता है—ऐसा वैयाकरणोंका कथन है॥८१॥

ञित्स्वरितेतश्च उभे यक्च स्याद्भावकर्मणोः।

जिन धातुओंमें 'स्वरित' और 'ञ्' की इत्संज्ञा हुई हो, उनसे परस्मैपद और आत्मनेपद दोनों होते हैं। यथा—'खनति, खनते। श्रयति, श्रयते' इत्यादि।

(अब भाव-कर्म-प्रकरण आरम्भ करते हैं—) भाव और कर्ममें धातुसे यक् प्रत्यय होता है। भावमें प्रत्यय होनेपर क्रियामें केवल औत्सर्गिक एकवचन होता है और सदा प्रथम पुरुषके ही एकवचनका रूप लिया जाता है। उस दशामें कर्ता तृतीयान्त होता है। भू धातुसे भावमें प्रत्यय करनेपर 'भूयते' रूप होता है। वाक्यमें उसका प्रयोग इस प्रकार है—'त्वया मया अन्यैश्च भूयते।' सकर्मक धातुसे कर्ममें प्रत्यय होनेपर कर्म उक्त हो जाता है, अतः उसमें प्रथमा विभक्ति होती है और अनुक्त कर्तामें तृतीया विभक्तिका प्रयोग होता है। कर्ताके अनुसार ही क्रियामें पुरुष और वचनकी व्यवस्था होती है। यथा—'चैत्रः आनन्दमनुभवति इति कर्मणि प्रत्यये चैत्रेणानन्दोऽनुभूयते', (चैत्रसे आनन्दका अनुभव किया जाता या आनन्द भोगा जाता है) चैत्रस्त्वामनुभवति, चैत्रेण त्वमनुभूयसे, (चैत्रसे तुम अनुभव किये जाते हो) चैत्रो मामनुभवति, चैत्रेणाहमनुभूये' (चैत्रसे मैं अनुभव किया जाता हूँ) इत्यादि उदाहरण भाव-कर्मके हैं।

सौकर्यातिशयं चैव यदा द्योतयितुं मुने॥८२॥
विवक्ष्यते न व्यापारो लक्ष्ये कर्तुस्तदापरे।
लभन्ते कर्तृतां पश्य पच्यते ह्योदनः स्वयम्॥८३॥
साध्वसिश्छिनत्त्येवं स्थाली पचति वै मुने।
धातोः सकर्मकात् कर्तृकर्मणोरपि प्रत्ययाः ॥८४॥

मुने! जब अतिशय सौकर्य प्रकाशित करनेके लिये लक्ष्यमें कर्ताके व्यापारकी विवक्षा नहीं रह जाती, तब कर्म और करण आदि दूसरे कारक ही कर्तृभावको प्राप्त होते हैं। यथा—'चैत्रो वह्निना स्थाल्यामोदनं पचति' (चैत्र आगसे बटलोईमें भात पकाता है)—इस वाक्यमें जब चैत्रके कर्तृत्वकी विवक्षा न रहे और करण आदिके कर्तृत्वकी विवक्षा हो जाय तो वे ही कर्ता हो जाते हैं और तदनुकूल क्रिया होती है। यथा—'वह्निः पचति' (आग पकाती है)। यहाँ करण ही कर्तारूपमें प्रयुक्त हुआ है। 'स्थाली पचति' (बटलोई पकाती है)—यहाँ अधिकरण ही कर्ताके रूपमें प्रयुक्त हुआ है। 'ओदनः स्वयं पच्यते' (भात स्वयं पकता है)—यहाँ कर्म ही कर्तारूपमें प्रयुक्त हुआ है। जब कर्म ही कर्तारूपमें प्रयुक्त हो तो कर्तामें लकार होता है; परंतु कर्मवद्भाव होनेसे यक् और आत्मनेपद आदि ही होते हैं। अतः 'पचति' न होकर 'पच्यते' रूप होता है। ऐसे प्रयोगको कर्म-कर्तृप्रकरणके अन्तर्गत मानते हैं। दूसरा उदाहरण इस प्रकार है—'असिना साधु छिनत्ति' (तलवारसे अच्छी तरह काटता है)—इस वाक्यमें उपर्युक्त नियमानुसार करणमें कर्तृत्वकी विवक्षा होनेपर

२५२* संक्षिप्त नारदपुराण *

ऐसा वाक्य बनेगा—‘साधु असिश्छिनत्ति' (तलवार अच्छा काटती है)। मुने! सकर्मक धातु भी कर्मकर्तृमें अकर्मक हो जाता है, अतः उससे भाव तथा कर्तामें भी लकार होता है। यथा भावे—पच्यते ओदनेन। कर्तरि—पच्यते ओदनः। सम्प्रदान और अपादान कारकोंमें कर्तृत्वकी विवक्षा कभी नहीं की जाती, क्योंकि यह अनुभवके विरुद्ध है। सामान्य स्थितिमें सकर्मक धातुसे ‘कर्ता' और 'कर्म'में प्रत्यय होते हैं ॥ ८२—८४ ॥

तस्माद् वाकर्मकाद्विप्र भावे कर्तरि कीर्तिताः।
फलव्यापारयोरेकनिष्ठतायामकर्मकः ॥ ८५ ॥
धातुस्तयोर्धर्मभेदे सकर्मक उदाहृतः।
गौणे कर्मणि दुह्वादेः प्रधाने नीहृकृष्वहाम् ॥ ८६ ॥
बुद्धिभक्षार्थयोः शब्दकर्मकाणां निजेच्छया।
प्रयोज्यकर्मण्यन्येषां ण्यन्तानां लादयो मताः ॥ ८७ ॥

विप्रवर! वही धातु यदि अकर्मक हो तो उससे 'भाव' और 'कर्ता' में प्रत्यय कहे गये हैं।

सभी धातुओंके फल और व्यापार—ये दो अर्थ हैं। ये दोनों जहाँ एकमात्र कर्तामें ही मौजूद हों, उन धातुओंको अकर्मक कहते हैं। जैसे—भू-धातुका अर्थ सत्ता है। सत्ताका तात्पर्य है—आत्मधारणानुकूल व्यापार। इसमें आत्मधारणरूप फल और तदनुकूल व्यापार दोनों केवल कर्तामें ही स्थित हैं; अतः भू-धातु अकर्मक है।

जहाँ फल और व्यापार दोनों भिन्न-भिन्न धर्मोंमें स्थित हों, वहाँ धातुको सकर्मक माना गया है। जैसे—'पच्' धातुका अर्थ है—विक्लेत्त्यनुकूल व्यापार (चावल आदिको गलानेके अनुरूप प्रयत्न)। इसमें विक्लेत्ति (गलना) यह फल है, जो चावलमें होता है और इसके अनुकूल जो चूल्हेमें आग जलाने आदिका व्यापार है, वह कर्तामें है; अतः 'पच्' धातु सकर्मक हुआ है। 'दुह' आदि* धातुओंके दो कर्म होते हैं। यथा—'गां दोग्धि पयः' (गायसे दूध दुहता है)—इसमें गाय गौण कर्म है और दूध प्रधान कर्म। दुह आदि धातुओंके गौण कर्ममें ही प्रत्यय होता है। यथा—'गौर्दुह्यते पयः, बलिर्याच्यते वसुधाम्' इत्यादि। नी, हृ, कृष् और वह्—इन चार धातुओंके प्रधान कर्ममें प्रत्यय होता है। यथा—'अजां ग्रामं नयति'—इस वाक्यमें अजा प्रधान कर्म और ग्राम गौण कर्म है। प्रधान कर्ममें प्रत्यय होनेपर वाक्यका स्वरूप इस प्रकार होगा—'अजा ग्रामं नीयते।' ज्ञानार्थक और भक्षणार्थक धातुओंके एवं शब्दकर्मक धातुओंके ण्यन्त होनेपर उनसे प्रधान या अप्रधान किसी भी कर्ममें अपनी इच्छाके अनुसार प्रत्यय कर सकते हैं। यथा—'बोध्यते माणवकं धर्मः, माणवको धर्मम् इति वा।' अन्य गत्यर्थक एवं अकर्मक धातुओंके ण्यन्त होनेपर उनके प्रयोज्य कर्ममें लकार आदि प्रत्यय माने गये हैं। यथा—'मासमास्यते माणवकः' ॥ ८५-८७ ॥

फलव्यापारयोर्धातुराश्रये तु तिङः स्मृताः।
फले प्रधानं व्यापारस्तिङर्थस्तु विशेषणम् ॥ ८८ ॥

धातु फल और व्यापाररूप अर्थोंका बोधक होता है। जैसे—भू-धातु आत्मधारणरूप फल और तदनुकूल व्यापारका बोधक है। फल और व्यापार दोनोंका जो आश्रय है, उसमें अर्थात् कर्ता एवं कर्ममें (तथा भावमें भी) तिङ्-प्रत्यय होते हैं, फलमें व्यापारकी ही प्रधानता है, तिङर्थरूप जो फल है वह उस व्यापारका विशेषण होता है। जैसे—'पचति'—इस क्रियाद्वारा चावल आदिके गलनेका प्रतिपादन होता है। यहाँ विक्लेत्तिरूप फलके अनुकूल जो अग्निप्रज्वालन और फूत्कारादि व्यापार हैं, उनके आश्रयभूत कर्तामें प्रत्यय हुआ है। 'ओदनः पच्यते' इत्यादिमें फलाश्रयभूत कर्ममें


*दुह्, याच्, पच्, दण्ड्, रुध्, प्रच्छ्, चि, ब्रू, शास्, जि, मथ्, मुष्—ये दुह् आदिके अन्तर्गत हैं, इनके दो कर्म होते हैं। इसी प्रकार नी, हृ, कृष् और वह्—इनके भी दो कर्म होते हैं।

पूर्वभाग-द्वितीय पाद २५३

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २५३

तिङ् प्रत्यय होनेके कारण ओदनमें प्रथमा विभक्ति है॥८८॥
एधितव्यमेधनीयमिति कृत्ये निदर्शनम्।
भावे कर्मणि कृत्याः स्युः कृतः कर्तरि कीर्तिताः॥८९॥
कर्ता कारक इत्याद्या भूते भूतादि कीर्तितम्।
गम्यादि गम्ये निर्दिष्टं शेषमद्यतने मतम्॥९०॥
(अब कृदन्त-प्रकरण प्रारम्भ करते हैं—कृत्-प्रत्यय जिसके अन्तमें हो, वह कृदन्त है। ण्वुल्, तृच्, अच् आदि प्रत्यय 'कृत्' कहलाते हैं। कृत्-प्रत्ययोंमेंसे जो कृत्य, क्त और खलर्थ प्रत्यय हैं, वे केवल भाव और कर्ममें ही होते हैं। तव्यत्, तव्य, अनीयर्, केलिमर् आदि प्रत्यय कृत्य कहलाते हैं। घञ् आदि प्रत्यय भाव, करण और अधिकरणमें होते हैं। सामान्यतः कृत्-प्रत्यय 'कर्ता' में प्रयुक्त होते हैं। यहाँ पहले कृत्य प्रत्ययोंके उदाहरण देते हैं—) एधितव्यम् और एधनीयम्—ये कृत्य प्रत्ययके उदाहरण हैं। 'कृत्य' भाव और कर्ममें तथा 'कृत्' कर्तामें बताये गये हैं। 'त्वया मया अन्यैश्च एधितव्यम्', यहाँ भावमें तव्य और अनीयर् प्रत्यय हुए हैं। कर्ममें प्रत्ययका उदाहरण इस प्रकार समझना चाहिये। 'छात्रेण पुस्तकं पठनीयम्' 'ग्रन्थः पठितव्यः' इत्यादि कर्ममें प्रत्यय होनेसे कर्तामें तृतीया विभक्ति और कर्ममें प्रथमा विभक्ति हुई है। कर्ता, कारकः इत्यादि 'कृत्' प्रत्ययके उदाहरण हैं। यथा— 'रामः कर्ता' 'ब्रह्मा कारकः' यहाँ कर्तामें 'तृच्' और 'ण्वुल्' प्रत्यय हुए हैं। 'वु'के स्थानमें अक् आदेश होता है। ण्, ल्, च् आदिकी इत्संज्ञा होती है। 'क्त' और 'क्तवतु' ये प्रत्यय भूतकालमें होते हैं। यथा—'भूतः भूतवान्' इत्यादि; और 'गम्य' आदि शब्द भविष्यत् अर्थमें निर्दिष्ट हुए हैं। शेष शब्द वर्तमान कालमें प्रयुक्त होने योग्य माने गये हैं ॥८९-९०॥
अधिस्त्रीत्यव्ययीभावे यथाशक्ति च कीर्तितम्।
रामाश्रितस्तत्पुरुषे धान्यार्थो यूपदारु च॥९१॥
व्याघ्रभी राजपुरुषोऽक्षशौण्डो द्विगुरुच्यते।
पञ्चगवं दशग्रामी त्रिफलेति तु रूढितः॥९२॥
(अब समासका प्रकरण आरम्भ करते हैं—) समास चार प्रकारके माने गये हैं—अव्ययीभाव, तत्पुरुष, बहुव्रीहि और द्वन्द्व। 'तत्पुरुष' का एक विशिष्ट भेद 'कर्मधारय' और कर्मधारयका एक विशिष्ट भेद 'द्विगु' है। भूतपूर्वः इत्यादि स्थलोंमें जो समास है, उसका कोई नाम नहीं निर्देश किया जा सकता। अतः उसे केवल समासमात्र जानना चाहिये। जिसमें प्रथम पद अव्यय हो, वह समास अव्ययीभाव होता है। अथवा अव्ययीभावके अधिकारमें जो समासविधायक वचन हैं, उनके अनुसार जहाँ समास हुआ है, वह अव्ययीभाव समास है। अव्ययीभाव अव्ययसंज्ञक होता है। अतः सभी विभक्तियोंमें उसका समान रूप है। अकारान्त अव्ययीभावमें विभक्तियोंका 'अम्' आदेश हो जाता है, परंतु पञ्चमी विभक्तिको छोड़कर ऐसा होता है। तृतीया और सप्तमीमें भी अम्भाव वैकल्पिक है। यथा अपदिशम्, अपदिशे इत्यादि। अधिस्त्रि और यथाशक्ति आदि पद अव्ययीभाव समासके अन्तर्गत बताये गये हैं। द्वितीयान्तसे लेकर सप्तम्यन्त तकके पद सुबन्तके साथ समस्त होते हैं और वह समास तत्पुरुष होता है। तत्पुरुषके उदाहरण इस प्रकार हैं—रामम्+आश्रितः=रामाश्रितः। धान्येन+अर्थः=धान्यार्थः यूपाय+दारु=यूपदारु। व्याघ्रात्+भीः= व्याघ्रभीः राज्ञः+पुरुषः=राजपुरुषः। अक्षेषु+शौण्डः=अक्षशौण्डः इत्यादि। जिसमें संख्यावाचक शब्द पूर्वमें हो, वह 'द्विगु' कहा गया है। 'पञ्चानां गवां समाहारः पञ्चगवम्।' 'दशानां ग्रामाणां समाहारः दशग्रामी (यहाँ स्त्रीलिङ्गसूचक 'ङीप्' प्रत्यय हुआ है)। 'त्रयाणां फलानां समाहारः त्रिफला' (इसमें स्त्रीत्वसूचक 'टाप्' प्रत्यय हुआ है)। त्रिफला-शब्द आँवले, हर्रे और बहेड़ेके लिये रूढ़ (प्रसिद्ध) है॥९१-९२॥

२५४ * संक्षिप्त नारदपुराण *

नीलोत्पलं महाषष्ठी तुल्यार्थे कर्मधारयः। अब्राह्मणो नञि प्रोक्तः कुम्भकारादिकः कृतः ॥ ९३ ॥

समानाधिकरण तत्पुरुषकी 'कर्मधारय' संज्ञा होती है। उसके दोनों पद प्रायः विशेष्य-विशेषण होते हैं। विशेषणवाचक शब्दका प्रयोग प्रायः पहले होता है। 'नीलं च तत् उत्पलं च=नीलोत्पलम्, महती चासौ षष्ठी च=महाषष्ठी।' जहाँ 'न' शब्द किसी सुबन्तके साथ समस्त होता है, वह 'नञ् तत्पुरुष' कहलाता है। 'न ब्राह्मणः अब्राह्मणः' इत्यादि। कुम्भकार आदि पदोंमें 'उपपद तत्पुरुष' समास है ॥ ९३ ॥

अन्यार्थे तु बहुव्रीहौ ग्रामः प्राप्तोदको द्विज। पञ्चगू रूपवद्भार्यो मध्याह्नः ससुतादिकः ॥ ९४॥

विप्रवर! जहाँ अन्य अर्थकी प्रधानता हो, उस समासकी बहुव्रीहिमें गणना होती है। 'प्राप्तम् उदकं यं स प्राप्तोदको ग्रामः' (जहाँ जल पहुँचा हो, वह ग्राम 'प्राप्तोदक' है)। इसी तरह—'पञ्च गावो यस्य स पञ्चगुः। रूपवती भार्या यस्य स रूपवद्भार्यः।' मध्याह्नः-पद तत्पुरुष समास है। 'सुतेन सह आगतः ससुतः' आदि पद बहुव्रीहि समासके अन्तर्गत हैं ॥ ९४ ॥

समुच्चये गुरुं चेशं भजस्वान्वाचये त्वट। भिक्षामानय गां चापि वाक्यमेवानयोर्भवेत् ॥ ९५ ॥

चार्थमें द्वन्द्व समास होता है। 'च' के चार अर्थ हैं—समुच्चय, अन्वाचय, इतरेतरयोग और समाहार। परस्पर निरपेक्ष अनेक पदोंका एकमें अन्वय होना 'समुच्चय' कहलाता है। समुच्चयमें 'ईशं गुरुं च भजस्व' यह वाक्य है। इसमें ईश और गुरु दोनों स्वतन्तरूपसे 'भज' इस क्रियापदसे अन्वित होते हैं। ईश-पदका क्रियाके साथ अन्वय हो जानेपर पुनः क्रियापदकी आवृत्ति करके गुरुपदका भी उसमें अन्वय होता है। यही उन दोनोंकी निरपेक्षता है। समास साकाङ्क्ष पदोंमें होता है। अतः समुच्चय-वाक्यमें द्वन्द्व समास नहीं होता है। जहाँ एक प्रधान और दूसरा अप्रधानरूपसे अन्वित हो, वहाँ अन्वाचय होता है—जैसे 'भिक्षामट गाञ्चानय' इस वाक्यमें भिक्षाके लिये गमन प्रधान है और गौका लाना अप्रधान या आनुषङ्गिक कार्य है। अतः एकार्थीभावरूप सामर्थ्य न होनेसे अन्वाचयमें भी द्वन्द्व समास नहीं होता। समुच्चय और अन्वाचयमें वाक्यमात्रका ही प्रयोग होता है ॥ ९५ ॥

इतरेतरयोगे तु रामकृष्णौ समाहृतौ। रामकृष्णं द्विज द्वौ द्वौ ब्रह्म चैकमुपास्यते ॥ ९६ ॥

उद्भूत अवयव-भेद-समूहरूप परस्पर अपेक्षा रखनेवाले सम्मिलित पदोंका एकधर्मावच्छिन्नमें अन्वय होना इतरेतरयोग कहलाता है। अतः इसमें सामर्थ्य होनेके कारण समास होता है, यथा—'रामकृष्णौ भज' इस वाक्यमें 'रामश्च कृष्णश्च=रामकृष्णौ' इस प्रकार समास है। इतरेतरयोग द्वन्द्वमें समस्यमान पदार्थगत संख्याका समुदायमें आरोप होता है। इसलिये वहाँ द्विवचनान्त या बहुवचनान्तका प्रयोग देखा जाता है। समूहको समाहार कहते हैं। वहाँ अवयवगत भेद तिरोहित होता है। यथा—'रामश्च कृष्णश्चेत्यनयोः समाहारः रामकृष्णम्।' समाहार द्वन्द्वमें अवयवगत संख्या समुदायमें आरोपित नहीं होती। इसलिये एकत्व-बुद्धिसे एकवचनान्तका प्रयोग किया जाता है। समाहारमें नपुंसकलिङ्ग होता है। विप्रवर! इतरेतरयोगमें राम और कृष्ण दोनों दो हैं और समाहारमें उनकी एकता है, इसलिये कि ब्रह्मरूपसे उन्हें एक मानकर उनकी उपासना की जाती है ॥ ९६ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे व्याकरणनिरूपणं नाम द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | २५५ ---|---

निरुक्त-वर्णन

सनन्दनजी कहते हैं—अब मैं निरुक्तका वर्णन करता हूँ, जो वेदका कर्णरूप उत्तम अङ्ग है। यह वैदिक धातुरूप है, इसे पाँच प्रकारका बताया गया है॥ १॥ उसमें कहीं वर्णका आगम होता है, कहीं वर्णका विपर्यय होता है, कहीं वर्णोंका विकार होता है और कहीं वर्णका नाश माना गया है॥ २॥ नारद ! जहाँ वर्णोंके विकार अथवा नाशद्वारा जो धातुके साथ विशेष अर्थका प्रकाशक संयोग होता है, वह पाँचवाँ उत्तम योग कहा गया है॥ ३॥ वर्णके आगमसे 'हंसः'१ पदकी सिद्धि होती है। वर्णोंके विपर्यय (अदल-बदल)—से 'सिंहः'२ पद सिद्ध होता है। वर्णविकारसे 'गूढोत्मा'३ की सिद्धि होती है। वर्णनाशसे 'पृषोदरः'४ सिद्ध होता है॥ ४॥ 'भ्रमर'५ आदि शब्दोंमें पाँचवाँ योग समझना चाहिये। वेदोंमें लौकिक नियमोंका विकल्प या विपर्यय कहा गया है। यहाँ 'पुनर्वसु'६ पदको उदाहरणके रूपमें रखना चाहिये॥ ५॥ 'नभस्वत्'-में 'वत्' प्रत्यय परे रहते भसंज्ञा हो जानेसे 'स'का रुत्व नहीं हुआ। (वार्तिक भी है—'नभोऽङ्गिरोमनुषां वत्युपसंख्यानम्') 'वृषन् अश्वो यस्य सः' इस विग्रहमें बहुव्रीहि समास होनेपर 'वृषन्+अश्वः' इस अवस्थामें अन्तर्वर्तिनी विभक्तिका आश्रय लेकर पदसंज्ञा करके नकारका लोप प्राप्त था, किंतु 'वृषण्वश्वयोः' इस वार्तिकके नियमानुसार भसंज्ञा हो जानेसे न लोप नहीं हुआ; अतः 'वृषणश्वः' यही वैदिक प्रयोग है। (लोकमें 'वृषाश्वः' होता है।) कहीं-कहीं आत्मनेपदके स्थानमें परस्मैपदका प्रयोग होता है। यथा—'प्रतीपमन्य ऊर्मिर्युध्यति' यहाँ 'युध्यते' होना चाहिये, किंतु परस्मैपदका प्रयोग किया गया है। 'प्र' आदि उपसर्ग यदि धातुके पहले हों तो उनकी उपसर्ग एवं गतिसंज्ञा होती है; किंतु वेदमें वे धातुके बादमें या व्यवधान देकर प्रयुक्त होनेपर भी 'उपसर्ग' एवं 'गति' कहलाते हैं—यथा 'हरिभ्यां याह्योक आ। आ मन्द्रैरिन्द्र हरिभिर्याहि।' यहाँ 'आयाहि' के अर्थमें 'याहि+आ' का व्यवहित तथा पर प्रयोग है। दूसरे उदाहरणमें आ+याहिके बीचमें बहुत-से पदोंका व्यवधान है॥ ६॥ वेदमें विभक्तियोंका विपर्यास देखा जाता है, जैसे—'दध्ना जुहोति'; यहाँ 'दधि' शब्द 'हु' धातुका कर्म है, उसमें द्वितीया होनी चाहिये, किंतु 'तृतीया च होश्छन्दसि' इस नियमके अनुसार कर्ममें तृतीया हो गयी है। 'अभ्युत्साद्यामकः' इसमें अभि+उत्पूर्वक 'सद्' धातुसे लुङ् लकारमें 'आम्' और 'अक'-का अनुप्रयोग हुआ है (लोकमें 'अभ्युदषीषदत्' रूप बनता है)। 'मा त्वाग्निर्ध्वनयीत्' इसमें 'नोनयति ध्वनय०' इत्यादि वैदिक सूत्रके द्वारा च्लिके चङ्भावका निषेध होता है। माङ्के योगमें 'अट्


१. 'हन्तीति हंसः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार हन्-धातुके आगे ('वृत्तॄवदिहनि०' इत्यादि उणादि सूत्रसे) 'स'का आगम होनेसे 'हंस' शब्द बनता है। २. 'हिंसि हिंसायाम्' इस धातुसे 'हिनस्तीति' इस व्युत्पत्तिके अनुसार कर्त्रर्थमें अच् प्रत्यय करनेपर पहले 'हिंसः' बनता है, फिर 'पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्'के आदेशानुसार 'ह' के स्थानमें 'स' और 'स' के स्थानमें 'ह' आ जानेसे 'सिंहः' पद सिद्ध होता है। ३. 'गूढ+आत्मा' इस अवस्थामें 'आ' विकृत हो 'उ' के रूपमें परिणत हुआ और गुण होनेसे 'गूढोत्मा' बना। (एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते)। ४. 'पृषोदरः' में 'पृषद्+उदरः' यह पदच्छेद है। 'पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्'के आदेशानुसार यहाँ तकारका लोप (नाश) हुआ तथा गुण होनेसे 'पृषोदरः' सिद्ध हुआ है। ५. 'भ्रमतीति भ्रमरः' यहाँ 'भ्रमु अनवस्थाने'से 'अर्तिकमिश्रमिचमिदेविवाशिभ्यश्चित्' इस उणादि सूत्रके अनुसार 'अर' प्रत्यय होनेसे 'भ्रमर' शब्द सिद्ध होता है। किन्हीं विद्वानोंके मतमें 'भ्रमन् रौति' इस व्युत्पत्तिके अनुसार 'भ्रमर' शब्द बनता है। इसमें 'भ्रम्+अतृ+रु+अच्' इस अवस्थामें 'तृ'का लोप 'रु'में उका लोप करनेसे 'भ्रमर'की सिद्धि होती है। ६. लौकिक प्रयोगमें 'पुनर्वसु' शब्द नित्य द्विवचनान्त है, किंतु वेदमें 'छन्दसि पुनर्वस्वोरेकवचनम्'के नियमानुसार इसका एकवचनान्त प्रयोग भी होता है।

२५६ * संक्षिप्त नारदपुराण *


आट्' न होनेसे 'ध्वनयीत्' रूप हुआ है (लोकमें घटादि ध्वन धातुका रूप 'अदिध्वनत्' होता है और चुरादिका रूप 'अदध्वनत्' होता है)। 'ध्वनयीत्' इत्यादि प्रमुख उदाहरण हैं। 'निष्टर्क्य०' इत्यादि प्रयोग वेदमें निपातनसे सिद्ध होते हैं। 'छन्दसि निष्टर्क्य' इत्यादि सूत्र इसमें प्रमाण हैं। यहाँ 'निस्पूर्वक कृत्' धातुसे 'ऋदुपधाच्च' सूत्रके अनुसार 'क्यप्' प्राप्त था; परंतु 'ण्यत्' प्रत्यय हुआ है; साथ ही 'कृत' में आदि-अन्तका विपर्यय होनेसे 'तृक' रूप बना। फिर गुण होनेसे तर्क्स हुआ। 'निस्'के 'स्' का षत्व हुआ और ष्टुत्व होकर 'निष्टर्क्य' सिद्ध हुआ। 'गृभाय' इत्यादि प्रयोग वैकल्पिक 'शायच्' होनेसे बनते हैं। हृ-धातुसे शायच् हुआ और 'हृग्रहोर्भश्छन्दसि' के आदेशानुसार 'ह' के स्थानमें 'भ' हो गया तो 'गृभाय' बना—'गृभाय जिह्वया मधु' ॥ ७ ॥ शास्त्रकार सुप्, तिङ्, उपग्रह (परस्मैपद-आत्मनेपद), लिङ्ग, पुरुष, काल, हल्, अच्, स्वर, कर्तृ, (कारक) और यङ्—इन सबका व्यत्यय (विपर्यय) चाहते हैं, वह भी बाहुलकसे सिद्ध होता है ॥८॥ 'रात्री' शब्दमें 'रात्रेश्चाजसौ' (पा० सू० ४। १। ३१) इस नियमके अनुसार रात्रि-शब्दसे ङीप्-प्रत्यय हुआ है। (लोकमें 'कृदिकारादक्तिनः 'से ङीष् होकर अन्तोदात्त होता है।) 'विभ्वी' में भी विभु-शब्दसे 'भुवश्च' के नियमानुसार ङीष् हुआ है। 'कद्रूः' पदमें 'कद्रुकमण्डल्वोश्छन्दसि' से ऊङ्-प्रत्यय हुआ है। 'आविष्ट्यो वर्धते' इत्यादि स्थलोंमें 'अविष्ट्यस्योपसंख्यानं छन्दसि' के नियमानुसार 'आविस्' अव्यय से 'त्यप्' यह तद्धित-प्रत्यय हुआ है। 'वाजसनेयिनः' में 'वाजसनेयेन प्रोक्तमधीयते' इस व्युत्पत्तिके अनुसार वाजसनेय-शब्दसे 'शौनकादिभ्यश्छन्दसि' सूत्रके द्वारा 'णिनि' प्रत्यय हुआ है ॥ ९ ॥ 'कर्णेभिः' में 'बहुलं छन्दसि' के नियमानुसार 'भिस्' के स्थानमें 'ऐस्' आदेश नहीं हुआ है। 'यशोभगयः' पदमें 'वेशोयश आदेर्भागाद् यल्' इस सूत्रसे 'यल्' प्रत्यय हुआ है। इत्यादि उदाहरण जानने चाहिये। 'चतुरक्षरम्' पदसे चार अक्षरवाले 'आश्रावय' 'अस्तु श्रौषट्' आदि पदोंकी ओर संकेत किया गया है। अक्षर-समूह वाच्य हो तो 'छन्दस्' शब्दसे 'यत्' प्रत्यय होता है—'छन्दस्यः' यह उदाहरण है। 'देवासः' में 'आज्जसेरसुकू' इस नियमके अनुसार 'असुक्' का आगम हुआ है। 'सर्वदेव' शब्दसे स्वार्थमें 'तातिल्' प्रत्यय होता है। 'सविता नः सुवतु सर्वदेवतातिम्' इस उदाहरणमें 'सर्वदेव' शब्दसे 'तातिल्' प्रत्यय होनेपर 'सर्वदेवताति' शब्दकी सिद्धि होती है। 'युष्मद्', 'अस्मद्' शब्दोंसे सादृश्य-अर्थमें 'वतुप्' प्रत्यय होता है। इस नियमसे 'त्वावतः' पदकी सिद्धि हुई है। 'त्वावतः' का पर्याय है 'त्वत्सदृशान्' (तुम्हारे सदृश) ॥ १० ॥ 'उभयाविनम्' इत्यादि पदोंमें 'बहुलं छन्दसि' के नियमसे मत्वर्थमें विनि प्रत्यय हुआ है। 'छन्दोविन्प्रकरणे०' इत्यादि नियमसे उभय शब्दके अकारका दीर्घ होनेसे 'उभयाविनम्' रूप बना है। प्रत्न, पूर्व आदि शब्दोंसे इवार्थमें 'थाल्' प्रत्यय होता है, इस नियमसे 'प्रत्नथा' बनता है। इसी प्रकार 'पूर्वथा' आदि भी हैं। वेदमें 'ऋच्' शब्द परे होनेपर त्रिका सम्प्रसारण होता है और उत्तरपदके आदिका लोप हो जाता है। 'तिस्र ऋचो यस्मिन्' तत् तृचं सूक्तम्। जिसमें तीन ऋचाएँ हों, उस सूक्तका नाम 'तृच्', है। 'त्रि+ऋच्' इस अवस्थामें 'त्रि'का सम्प्रसारण होनेपर 'तृ' बना और ऋच्के ऋका लोप हो गया तो 'तृचम्' सिद्ध हो गया। 'इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथाम्' यहाँ 'अप' उपसर्गके साथ 'स्पृध' धातुके लङ् लकारमें प्रथम पुरुषके द्विवचनका रूप है। 'अपस्पृधेथाम्' यह निपातनसे सिद्ध होता है। रेफका सम्प्रसारण और अलोप निपातनसे ही होता है। माङ्का योग न होनेपर भी अडागमका अभाव हुआ है (लोकमें इसका रूप 'अपास्पर्धेथाम्' होता है)। 'वसुभिर्नो अव्यात्' इत्यादिमें

पूर्वभाग-द्वितीय पाद २५७

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २५७

'अव्यादवद्या०' इत्यादि सूत्रके अनुसार व्यपर 'अ' परे होनेपर एङ् (ओ)-का प्रकृतिभाव हुआ है। 'आपो अस्मान् मातरः' इत्यादि प्रयोग भी 'आपो जुषाणो०' आदि नियमके अनुसार प्रकृति-भावसे सिद्ध होते हैं। आकार परे रहनेपर 'आपो' आदिमें प्रकृतिभाव होता है॥ ११॥ 'समानो गर्भः सगर्भस्तत्र भवः सगर्भ्यः।' यहाँ 'समानस्य सः' इत्यादि सूत्रसे समानका 'स' आदेश हुआ है। 'सगर्भसयूथसनुताद् यत्' से यत्-प्रत्यय हुआ है। 'अष्टापदी' यहाँ 'छन्दसि च'-के नियमानुसार उत्तरपद परे रहते अष्टन्‌के 'न'का 'आ' आदेश हो गया है। 'ऋतौ भवम् ऋत्त्व्यम्'—जो ऋतुमें हो, उसे 'ऋत्त्व्य' कहते हैं। 'ऋत्त्व्यास्त्व्यः' इत्यादि सूत्रसे निपातन करनेपर 'ऋत्त्व्यम्' पदकी सिद्धि होती है। अतिशयेन 'ऋजु' इति 'रजिष्ठम्'—जो अत्यन्त ऋजु (कोमल या सरल) हो, उसे 'रजिष्ठ' कहा गया है। 'विभाषर्जोश्छन्दसि' के नियमानुसार इष्ठ, इमन् और ईयस् परे रहनेपर ऋजुके 'ऋ'के स्थानमें 'र' होता है। 'ऋजु+इष्ठ' इस अवस्थामें ऋके स्थानमें 'र' तथा उकार लोप होनेसे 'रजिष्ठ' शब्द बना है। 'त्रिपञ्चकम्'—त्रीणि पञ्चकानि यत्र तत् 'त्रिपञ्चकम्' इस विग्रहके अनुसार बहुव्रीहि समास करनेपर 'त्रिपञ्चकम्' की सिद्धि होती है। 'हिरण्ययेन सविता रथेन' इस मन्त्र-वाक्यमें 'ऋत्त्व्यास्त्व्य' आदि सूत्रके अनुसार हिरण्य-शब्दसे 'मयट्' प्रत्यय और उसके 'म'- का लोप निपातन किया जाता है। इससे 'हिरण्यय' शब्दकी सिद्धि होती है। 'इतरम्'—वेदमें इतर शब्दसे 'अड्ड' का निषेध है। अतः 'सु' का 'अम्' आदेश होनेसे 'इतरम्' पद सिद्ध होता है। यथा—'वार्त्रघ्नमिरतम्'। 'परमे व्योमन्' यहाँ 'व्योमनि' रूप प्राप्त था; किंतु 'सुपां सुलुक्' इत्यादि नियमसे ङि-विभक्तिका लुक् हो गया॥ १२॥ 'उर्विया' की जगह 'उरुणा' रूप प्राप्त था। 'टा' का 'इया' आदेश होनेसे 'उर्विया' रूप बना। 'इयाडियाजीकाराणामुपसंख्यानम्' इस वार्तिकसे यहाँ 'इयाज्' हुआ है। 'स्वप्रया'के स्थानमें 'स्वप्रेन' यह रूप प्राप्त था, किंतु 'सुपां सुलुक०' इत्यादि नियमके अनुसार 'टा' का 'अयाच्' हो गया; अतः 'स्वप्रया' रूप बना। 'वारयध्वम्' रूप प्राप्त था, किंतु 'ध्वमो ध्वात्' सूत्रसे 'ध्वम्' के स्थानमें 'ध्वात्' आदेश होनेसे 'वारयध्वात्' हो गया। 'अदुहत' के स्थानमें 'अदुह' यह वैदिक प्रयोग है। 'लोपस्त आत्मनेपदेषु' इस सूत्रसे तलोप और 'बहुलं छन्दसि' से रुटका आगम हुआ है। 'वै' पादपूर्तिके लिये है। 'अवधिषम्' यह रूप प्राप्त था, इसके स्थानमें 'वधीं' रूप हुआ है। यहाँ 'अम्'का 'म्' आदेश और अडागमका अभाव तथा 'ईट्' का आगम हुआ है—वधीं वृत्रम्। 'यजध्वैनं'—यहाँ 'यजध्वम्+एनम्' इस दशामें 'ध्वम्' के 'म्' का लोप होकर वृद्धि होनेसे उक्त रूपकी सिद्धि हुई है। 'तमो भरन्त एमसि'—यहाँ 'इमः'के स्थानमें 'इदन्तो मसि' इस सूत्रके अनुसार 'एमसि' रूप हुआ है। 'स्विन्नः स्नात्वी मलादिव'— इस मन्त्रमें 'स्नात्वा' रूप प्राप्त था; किंतु 'स्नात्यादयश्च'—इस सूत्रके अनुसार उसके स्थानमें 'स्नात्वी' निपातन हुआ। 'गत्वाय'—गत्वाके स्थानमें 'क्त्वो यक्' सूत्रके अनुसार 'यक्'का आगम होनेसे उक्त पद सिद्ध होता है। 'अस्थभिः' में अस्थि-शब्दके 'इ'को 'अनङ्' आदेश होकर नलोप हो गया है। 'छन्दस्यपि दृश्यते' इस नियमसे हलादि विभक्ति परे रहनेपर भी 'अनङ्' आदेश होता है॥ १३॥ 'गोनाम्' यहाँ आम्-विभक्ति परे रहते नुट्का आगम हुआ है। किसी छन्दके पादान्तमें गो-शब्द हो तो प्रायः षष्ठी-बहुवचनमें वहाँ नुट्का आगम हो जाता है। 'अपरिह्वुताः' यहाँ 'हु ह्वरेश्छन्दसि'से प्राप्त हुए ''हु' आदेशका अभाव निपातित हुआ है। 'ततुरिः', 'जगुरिः' इत्यादि पद भी 'बहुलं छन्दसि' के नियमसे निपातनद्वारा सिद्ध होते हैं। 'ग्रसिताम्' 'ग्रसु' अदनेका निष्ठान्त रूप है। यहाँ

२५८ * संक्षिप्त नारदपुराण *

इट्का निषेध प्राप्त था, किंतु निपातनसे इट् हो गया है। इसी प्रकार 'स्कभित' आदिको भी समझना चाहिये। 'पश्वे' यहाँ 'जसादिषु छन्दसि वा वचनं०' इत्यादिसे वैकल्पिक घि-संज्ञा होनेके कारण घि-संज्ञाके अभावमें यण् होनेसे 'पश्वे' रूप बना है। इसी तरह 'दधद्' यह दधातिके स्थानमें निपातित हुआ है; लेट्का रूप है। 'दधद्रत्नानि दाशुषे' यह मन्त्र है। 'बभूथ' यह लिट् लकारके मध्यम पुरुषका एकवचन है। वेदमें इसके 'इट्' का अभाव निपातित हुआ है। 'प्रमिणन्ति'—यहाँ 'प्रमीणन्ति' रूप प्राप्त था। 'मीनातेर्निगमे' सूत्रसे ह्रस्व हो गया। 'अवीवृधत्'—'नित्यं छन्दसि' से चङ् परे रहते उपधा ऋवर्णका 'ऋ'-भाव नित्य होता है॥१४॥ 'मित्रयुः' यहाँ दीर्घका निषेध होता है। 'दुष्ट इवाचरति' इस अर्थमें क्यच् परे रहते दुष्ट शब्दका 'दुरस्' आदेश होता है। 'दुरस्युः' यह निपातनात् सिद्ध रूप है। इसी प्रकार 'द्रविणस्युः' इत्यादि भी है। वेदमें 'क्त्वा' परे रहते हा धातुका 'हि' आदेश विकल्पसे होता है। 'हि' आदेश न होनेपर 'घुमास्था०' इत्यादि सूत्रसे 'आ' के स्थानमें 'ई' हो जाता है; अतः 'हित्वा' और 'हीत्वा' दोनों रूप होते हैं। 'सु' पूर्वक धा-धातुसे 'क्त'प्रत्यय परे होनेपर 'इत्व' निपातन किया जाता है; इससे 'सुधितम्' रूप बनता है—यथा 'गर्भं माता सुधितं वक्षणासु।' 'दार्धर्ति', 'दर्दति' और 'दर्धर्षि' आदि रूप निपातनसे सिद्ध हैं। ये 'धृ'-धातुके यङ्लुगन्त रूप हैं। 'स्ववद्भिः' अव-धातुसे असुन् करनेपर 'अवस्' रूप होता है। 'शोभनमवो येषां ते स्ववसः, तैः स्ववद्भिः' यह उसकी व्युत्पत्ति है। 'स्ववःस्वतवसोरुषसश्चेष्यते' इस वार्तिकसे भकारादि प्रत्यय परे रहते 'स्ववस्' आदि शब्दोंके 'स्' का 'त्' हो जाता है। प्रसवार्थक 'सू' धातुके लिट्में 'ससूवेति निगमे' सूत्रसे 'ससूव' यह निपातसिद्ध रूप है। यथा—'गृष्टिः ससूव स्थविरम्'। 'सुधित' इत्यादि सूत्रसे 'धत्स्व' के स्थानमें 'धिश्व' निपातित होता है—'धिश्व वज्रं दक्षिण इन्द्रहस्ते' ॥१५॥ 'प्रप्रायमग्निः' यहाँ 'प्रसमुपोदः पादपूरणे' से पादपूर्तिके लिये 'प्र' उपसर्गका द्वित्व हो गया है। 'हरिवते हर्यश्वाय' यहाँ 'छन्दसीरः' से 'मतुप्' के 'म' का 'व' हुआ है। 'अक्षण्वन्तः' में अक्षि-शब्दसे मतुप्, 'छन्दस्यपि दृश्यते' से अनङ्-आदेश तथा 'अनो नुट्' से 'नुट्' का आगम हुआ है। 'सुपथिन्तरः' में 'नाद्घस्य' से 'नुट्' का आगम विशेष कार्य है। 'रथीतरः' में 'ईद्रथिनः' से 'ई' हुआ है। 'नसत्तम्' में नञ्पूर्वक सद्-धातुसे निष्ठामें नत्वका अभाव निपातित हुआ है। इसी प्रकार सूत्रोक्त 'निषत्त' आदि शब्दोंको जानना चाहिये। 'अम्रैव'—इसमें 'अम्रस्' शब्द ईषत् अर्थमें है। वेदमें सकारका वैकल्पिक रेफ निपातित हुआ है। 'भुवरथो इति' यहाँ 'भुवश्च महाव्याहृतेः' से भुवस्के 'स्'का 'र्' हुआ है॥१६॥ 'ब्रूहि' यहाँ 'ब्रूहि प्रेष्य०' इत्यादि सूत्रसे उकार प्लुत हुआ है। यथा—अग्नयेऽनुब्रू३हि। 'अद्यामावास्येत्या३त्थ' यहाँ 'निगृह्यानुयोगे च' इस सूत्रसे वाक्यके 'टि'का प्लुतभाव होता है। 'अग्नीत्प्रेषणे परस्य च' इस सूत्रसे आदि और परका भी प्लुत होता है। उदाहरणके लिये 'ओ३श्रा ३ वय' इत्यादि पद है। इन सबमें प्लुत हुआ है। 'दाश्वान्' आदि पद क्वसु-प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। 'स्वतवान्' शब्दके नकारका विकल्पसे 'रु' होता है, पायु-शब्द परे रहनेपर—स्वतवाँः पायुरग्ने।' 'त्रिभिष्ट्वं देव सवितः।' यहाँ 'त्रिभिस्+त्वम्' इस दशामें 'युष्मत्तत्ततक्षुष्वन्तःपादम्' इस सूत्रमें 'स्' के स्थानमें 'ष्' होकर ष्टुत्व होनेसे 'त्रिभिष्ट्वम्' बनता है। 'नृभिष्टः' यहाँ 'स्तुतस्तोमयोश्छन्दसि' इस सूत्रसे 'नृभिस्' के 'स्' का 'ष्' होकर ष्टुत्व हुआ है॥१७॥ 'अभीषुणः' यहाँ 'सुञः' सूत्रसे 'स्' का 'ष्' हुआ है। 'ऋताषाहम्' में 'सहेः पृतनर्त्तीभ्यां च' इस सूत्रसे 'स्'का मूर्धन्य आदेश हुआ है। 'न्यषीदत्' यहाँ भी 'निव्यभिभ्योऽङ्ग्व्यवाये वा

पूर्वभाग-द्वितीय पाद

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २५९

छन्दसि' इस सूत्रसे 'स' का मूर्धन्य हुआ है। 'नृमणाः' इस पदमें 'छन्दस्युदवग्रहात्' सूत्रसे 'न' का 'ण' हुआ है। बाहुलक चार प्रकारके होते हैं—कहीं प्रवृत्ति होती है, कहीं अप्रवृत्ति होती है, कहीं वैकल्पिक विधि है और कहीं अन्यथाभाव होता है। इस प्रकार सम्पूर्ण वैदिक पद-समुदाय सिद्ध है। क्रियावाची 'भू' 'वा' आदि शब्दोंकी 'धातु' संज्ञा जाननी चाहिये। 'भू' आदि धातु परस्मैपदी माने गये हैं॥ १८-१९॥ 'एध' आदि छत्तीस धातु उदात्त एवं आत्मनेपदी हैं (इन्हें 'अनुदात्तेत्' माना गया है)। मुने! 'अत' आदि सैंतीस धातु परस्मैपदी हैं॥ २०॥ शी-कृ आदि बयालीस धातु आत्मनेपदमें परिगणित हुए हैं। फक्क आदि पचास धातु उदात्तेत् (परस्मैपदी) कहे गये हैं॥ २१॥ वर्च आदि इक्कीस धातु अनुदात्तेत् (आत्मनेपदी) बताये गये हैं। 'गुप्' आदि बयालीस धातु 'उदात्तेत्' (परस्मैपदी) कहे गये हैं॥ २२॥ 'घिणि' आदि दस धातु शाब्दिकोंद्वारा 'अनुदात्तेत्' कहे गये हैं। 'अण्' आदि सत्ताईस धातु 'उदात्तेत्' बताये गये हैं॥ २३॥ 'अय' आदि चौंतीस धातु वैयाकरणोंद्वारा अनुदात्तेत् (आत्मनेपदी) माने गये हैं। 'मव्य' आदि बहत्तर धातु उदात्तानुबन्धी कहे गये हैं॥ २४॥ 'धावु' धातु अकेला ही 'स्वरितेत्' कहा गया है। 'क्षुध्' आदि बावन धातु 'अनुदात्तेत्' कहे गये हैं॥ २५॥ 'घुषिर्' आदि अठासी धातु 'उदात्तेत्' माने गये हैं। 'द्युत' आदि बाईस धातु 'अनुदात्तेत्' स्वीकार किये गये हैं॥ २६॥ घटादिमें तेरह धातु 'षित्' और 'अनुदात्तेत्' कहे गये हैं। तदनन्तर 'ज्वर' आदि बावन धातु उदात्त बताये गये हैं॥ २७॥ 'राजू' धातु 'स्वरितेत्' है। उसके बाद 'भ्राजू' भ्राशू और भ्लाशू'—ये तीन धातु 'अनुदात्तेत्' कहे गये हैं। तदनन्तर 'स्यमु' धातुसे लेकरं आगे सभी आद्युदात्त एवं उदात्तेत् (परस्मैपदी) हैं॥ २८॥ फिर एकमात्र 'षह' धातु 'अनुदात्तेत्' तथा अकेला 'रम' धातु 'आत्मनेपदी' है। उसके बाद 'सद' आदि तीन धातु 'उदात्तेत्' हैं। फिर 'कुच' आदि चार धातु भी 'उदात्तेत्' (परस्मैपदी) ही हैं॥ २९॥ इसके बाद 'हिक्क' आदि पैंतीस धातु 'स्वरितेत्' हैं। 'श्रिय्' धातु स्वरितेत् है। 'भृञ्' आदि चार धातु भी स्वरितेत् ही हैं॥ ३०॥ 'धेट्' आदि छियालीस धातु परस्मैपदी कहे गये हैं। 'स्मिङ्' आदि अठारह धातु आत्मनेपदी माने गये हैं॥ ३१॥ फिर 'पूङ्' आदि तीन धातु अनुदात्तेत् कहे गये हैं। 'ह्व' धातु परस्मैपदी है। फिर 'गुप'से लेकर तीन धातु आत्मनेपदी हैं॥ ३२॥ 'रम' आदि धातु अनुदात्तेत् हैं और 'जिक्ष्विदा' उदात्तेत् है। स्कम्भु आदि पंद्रह धातु परस्मैपदी हैं॥ ३३॥ 'कित' धातु 'उदात्तेत्' है। 'दान' 'शान'—ये दो धातु उभयपदी हैं। 'पच' आदि नौ धातु स्वरितेत् (उभयपदी) हैं। वे परस्मैपदी (और आत्मनेपदी दोनों) माने गये हैं॥ ३४॥ फिर तीन स्वरितेत् धातु हैं। परिभाषणार्थक 'वद' और 'वच' धातु परस्मैपदी हैं। ये एक हजार छः धातु भ्वादि कहे गये हैं॥ ३५॥

'अद' और 'हन्' धातु परस्मैपदी कहे गये हैं। 'द्विष' आदि चार धातु स्वरितेत् माने गये हैं॥ ३६॥ यहाँ केवल 'चक्षिङ्' धातु आत्मनेपदी कहा गया है। फिर 'ईर' आदि तेरह धातु अनुदात्तेत् हैं॥ ३७॥ मुने! वैयाकरणोंने 'षूङ्' और 'शीङ्'—इन दो धातुओंको आत्मनेपदी कहा है। फिर 'षु' आदि सात धातु परस्मैपदी बताये गये हैं॥ ३८॥ मुनीश्वर! यहाँ एक 'ऊर्णुञ्' धातु स्वरितेत् कहा गया है। 'द्यु' आदि तीन धातु परस्मैपदी बताये गये हैं॥ ३९॥ नारद! केवल 'ष्टुञ्' धातुको शाब्दिकोंने उभयपदी कहा है॥ ४०॥ 'रा' आदि अठारह धातु परस्मैपदी माने गये हैं। नारद! फिर केवल 'इङ्' धातु आत्मनेपदी कहा गया है॥ ४१॥ उसके बाद 'विद' आदि चार धातु परस्मैपदी माने गये हैं। 'जिष्वप् शये' यह धातु परस्मैपदी कहा गया है॥ ४२॥ मुने! 'श्वस'

२६० * संक्षिप्त नारदपुराण *


आदि धातु मैंने तुम्हें परस्मैपदी कहे हैं। 'दीधीङ्' और 'वेवीङ्'—ये दो धातु आत्मनेपदी माने गये हैं॥ ४३॥ 'षस' आदि तीन धातु 'उदात्तेत्' हैं। मुनिश्रेष्ठ! 'चर्करीतं च' यह यङ्लुगन्तका प्रतीक है। यह अदादि माना गया है। 'हृङ्' धातु अनुदात्तेत् कहा गया है॥ ४४॥ इस प्रकार अदादि गणमें तिहत्तर धातु बताये गये हैं।

'हु' आदि चार धातु (हु, भी, ह्री और पृ) परस्मैपदी माने गये हैं॥ ४५॥ 'भृञ्' धातु स्वरितेत् और 'ओहाक्' धातु उदात्तेत् है। 'माङ्' और 'ओहाङ्'—ये दोनों धातु अनुदात्तेत् हैं। दानार्थक 'दा' और धारणार्थक 'धा'—इनमें स्वरितकी इत्संज्ञा हुई है॥ ४६॥ 'णिजिर्' आदि तीन धातु स्वरितेत् कहे गये हैं। 'घृ' आदि बारह धातु परस्मैपदी माने गये हैं॥ ४७॥ इस प्रकार ह्वादि (जुहोत्यादि) गणमें बाईस धातु कहे गये हैं।

'दिव्' आदि पचीस धातु परस्मैपदी कहे गये हैं॥ ४८॥ नारद! 'षूङ्' आदि 'दूङ्'—ये आत्मनेपदी हैं। 'षूङ्' आदि सात धातु ओदित् और आत्मनेपदी माने गये हैं॥ ४९॥ विप्रवर! 'लीङ्' आदि धातु यहाँ आत्मनेपदी बताये गये हैं। श्यति (शो) आदि चार धातु परस्मैपदी हैं॥ ५०॥ मुने! 'जनी' आदि पंद्रह धातु आत्मनेपदी हैं। 'मृष' आदि पाँच धातु 'स्वरितेत्' कहे गये हैं॥ ५१॥ 'पद' आदि ग्यारह धातु आत्मनेपदी हैं। यहाँ वृद्धि-अर्थमें ही अकर्मक 'राध' धातुका ग्रहण है। यह स्वादि और चुरादिगणमें भी पढ़ा गया है॥ ५२॥ राध आदि तेरह धातु उदात्तेत् कहे गये हैं। तत्पश्चात् रध आदि आठ धातु परस्मैपदी बताये गये हैं॥ ५३॥ शम आदि छियालीस धातु उदात्तेत् कहे गये हैं। इस प्रकार दिवादिमें एक सौ चालीस धातु माने गये हैं॥ ५४॥

'सु' आदि नौ धातु स्वरितेत् कहे गये हैं। मुने! 'दु' आदि सात धातु परस्मैपदी बताये गये हैं॥ ५५॥ 'अश' और 'ष्टिष' ये दो धातु अनुदात्तेत् कहे गये हैं। यहाँ 'तिक' आदि चौदह धातुओंको परस्मैपदी माना गया है॥ ५६॥ विप्रवर! स्वादिगणमें कुल बत्तीस धातु बताये गये हैं।

मुनिश्रेष्ठ! 'तुद' आदि छः स्वरितेत् हैं॥ ५७॥ 'ऋषी' धातु उदात्तेत् है और 'जुषी' आदि चार धातु आत्मनेपदी हैं। 'व्रश्च' आदि एक सौ पाँच धातु उदात्तेत् कहे गये हैं॥ ५८॥ मुनीश्वर! यहाँ केवल 'गुरी' धातु अनुदात्तेत् बताया गया है। 'णू' आदि चार धातु परस्मैपदी माने गये हैं॥ ५९॥ 'कुङ्' धातुको 'अनुदात्तेत्' कहा गया है। यहीं कुतादिगणकी पूर्ति हुई है। 'पृङ्' और 'मृङ्'—ये आत्मनेपदी धातु हैं। 'रि' और 'पि' से छः धातुतक परस्मैपदमें गिने गये हैं॥ ६०॥ 'दृङ्', 'धृङ्'—ये दो धातु आत्मनेपदी कहे गये हैं। मुने! 'प्रच्छ' आदि सोलह धातु परस्मैपदी बताये गये हैं॥ ६१॥ मुने! फिर 'मिल' आदि छः धातु स्वरितेत् कहे गये हैं। इसके बाद 'कृती' आदि तीन धातु परस्मैपदी हैं॥ ६२॥ इस प्रकार तुदादिमें एक सौ सत्तावन धातु हैं।

'रुध' आदि नौ धातु स्वरितेत् हैं। 'कृती' धातु परस्मैपदी है। 'जिइन्धी'से तीन धातुतक अनुदात्तेत् कहे गये हैं। तत्पश्चात् 'शिष पिष' आदि बारह धातु उदात्तेत् हैं। इस प्रकार रुधादि-गणमें कुल पचीस धातु हैं॥ ६३-६४॥

'तनु' धातुसे लेकर सात धातु 'स्वरितेत्' कहे गये हैं। 'मनु' और 'वनु'—ये दोनों आत्मनेपदी हैं। 'कृञ्' धातु स्वरितेत् कहा गया है॥ ६५॥ विप्रवर! इस प्रकार वैयाकरणोंने तनादिगणमें दस धातुओंकी गणना की है।

'क्री' आदि सात धातु उभयपदी हैं। मुनीश्वर! 'स्तम्भु' आदि चार सौत्र (सूत्रोक्त) धातु परस्मैपदी कहे गये हैं। 'क्रूञ्' आदि बाईस धातु उदात्तेत् कहे गये हैं॥ ६६-६७॥ 'वृङ्' धातु आत्मनेपदी है। 'श्रन्थ' आदि इक्कीस धातु परस्मैपदी हैं और 'ग्रह' धातु स्वरितेत् है॥ ६८॥ इस प्रकार विद्वानोंने क्र्यादिगणमें बावन धातु गिनाये हैं।

चुर आदि एक सौ छत्तीस धातु जित्

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | २६१ ---|---

(उभयपदी) माने गये हैं॥ ६९॥ मुने! चित आदि अठारह (या अड़तीस?) आत्मनेपदी माने गये हैं। 'चर्च' से लेकर 'धृष' धातुतक 'जित्' (उभयपदी) कहे गये हैं॥ ७०॥ इसके बाद अड़तालीस अदन्त धातु भी उभयपदी ही हैं। 'पद' आदि दस धातु आत्मनेपदमें परिगणित हुए हैं॥ ७१॥ यहाँ सूत्र आदि आठ धातुओंको भी मनीषी पुरुषोंने उभयपदी कहा है। प्रातिपदिकसे धात्वर्थमें णिच् और प्रायः सब बातें इष्ठ प्रत्ययकी भाँति होती हैं। तात्पर्य यह कि 'इष्ठ' प्रत्यय परे रहते जैसे प्रातिपदिक, पुंवद्भाव, रभाव, टिलोप, विन्मतुब्लोप, यणादिलोप, प्र, स्थ, स्फ आदि आदेश और भसंज्ञा आदि कार्य होते हैं, उसी प्रकार 'णि' परे रहते भी सब कार्य होंगे॥ ७२॥ 'उसे करता है, अथवा उसे कहता है' इस अर्थमें भी प्रातिपदिकसे णिच् प्रत्यय होता है। प्रयोजक व्यापारमें प्रेषण आदि वाच्य हों तो धातुसे णिच् होता है। कर्तृ-व्यापारके लिये जो करण है, उससे धात्वर्थमें णिच् होता है। चित्र आदि आठ धातु उदात्तेत् हैं। किंतु 'संग्राम' धातुको शब्दशास्त्रके विद्वानोंने अनुदात्तेत् माना है। स्तोभ आदि सोलह धातु अदन्त धातुओंके निदर्शन हैं॥ ७३-७४॥ 'बहुलमेतन्निदर्शनम्'—इसमें जो बहुल शब्द आया है, उससे अन्य जो सूत्रोक्त लौकिक और वैदिक धातु हैं, उन सबका ग्रहण होता है। सभी धातु सब गणोंमें हैं और सबके अनेक अर्थ हैं॥ ७५॥ इन धातुओंके अतिरिक्त सनादि* प्रत्यय जिनके अन्तमें हों, उनकी भी धातु-संज्ञा होती है। नामधातु भी धातु ही हैं। नारद! इस प्रकार अनन्त धातुओंकी उद्भावना हो सकती है। यहाँ संक्षेपसे सब कुछ बताया गया है। इसका विस्तार तत्सम्बन्धी ग्रन्थोंमें है॥ ७६॥

(उपदेशावस्थामें एकाच् अनुदात्त धातुसे परे वलादि आर्धधातुकको इट्का आगम नहीं होता। जिनमें यह निषेध लागू होता है, उन धातुओंको 'अनिट्' कहते हैं। उन्हीं अनिट् या एकाच् अनुदात्त धातुओंका यहाँ संग्रह किया जाता है—) अजन्त धातुओंमें—ऊकारान्त, ऋकारान्त, यु, रु, क्ष्णु, शीङ्, स्रु, नु, क्षु, श्वि, डीङ्, श्रिञ्, वृङ्, वृञ्—इन सबको छोड़कर शेष सभी अनुदात्त (अर्थात् अनिट्) माने गये हैं॥ ७७॥ शक्ल्, पच्, मुच्, रिच्, वच्, विच्, सिच्, प्रच्छ्, त्यज्, निजिर्, भज्, भञ्ज्, भुज्, भ्रस्ज्, मस्ज्, यज्, युज्, रुज्, रञ्ज्, विजिर्, स्वञ्ज्, सञ्ज्, सृज्॥ ७८॥ अद्, क्षुद्, खिद्, छिद्, तुद्, नुद्, पद्, भिद्, विद् (सत्ता), विद् (विचारणे), शद्, सद्, स्विद्, स्कन्द्, हद्, क्रुध्, क्षुध्, बुध्॥ ७९॥ बन्ध्, युध्, रुध्, राध्, व्यध्, शुध्, साध्, सिध्, मन् (दिवादि), हन्, आप्, क्षिप्, क्षुप्, तप्, तिप्, स्तृप्, दृप्॥ ८०॥ लिप्, लुप्, वप्, शप्, स्वप्, सृप्, यभ्, रभ्, लभ्, गम्, नम्, यम्, रम्, क्रुश्, दंश्, दिश्, दृश्, मृश्, रिश्, रुश्, लिश, विश्, स्पृश्, कृष्॥ ८१॥ त्विष्, तुष्, द्विष्, दुष्, पुष्, पिष्, विष्, शिष्, शुष्, श्लिष्, घस्, वस्, दह, दिह, दुह, नह, मिह्, रुह्, लिह तथा वह॥ ८२॥ ये हलन्तोंमें एक सौ दो धातु अनुदात्त माने गये हैं। 'च' आदिकी निपात संज्ञा होती है। 'प्र' आदि उपसर्ग 'गति' कहलाते हैं। भिन्न-भिन्न दिशा, देश और कालमें प्रकट हुए शब्द अनेक अर्थोंके बोधक होते हैं। विप्रवर! वे देश-कालके भेदसे सभी लिङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं। यहाँ गणपाठ, सूत्रपाठ, धातुपाठ तथा अनुनासिकपाठ— 'पारायण' कहा गया है। नारद! वैदिक और लौकिक सभी शब्द नित्यसिद्ध हैं॥ ८३—८५॥ फिर वैयाकरणोंद्वारा जो शब्दोंका संग्रह किया जाता है, उसमें उन शब्दोंका पारायण ही मुख्य


* सन्, क्यच्, काम्यच्, क्यङ्, क्यष्, आचारक्विप्, णिच्, यङ्, यक्, आय, ईयङ्, णिङ्—ये बारह प्रत्यय सनादि कहलाते हैं।