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निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

by साहिब बन्दगी

Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)

DevanagariHindipublished112 pages

बहुत कोमल हृदय है आपका

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भी आ सकती है। तब किसी का भगवान नहीं बचाता है। कोई नहीं कहता है कि मेरे भगवान ने रक्षा नहीं की। पर साहिब-बंदगी वाला कोई बीमार हो गया तो कहते हैं कि देखते हैं कि कैसे बचाता है साहिब!

सच तो यह है कि आप तो अपने बंदों को मौत के मुँह से निकालकर भी बचा लेते हैं, पर उनका भगवान नहीं बचा पाता है। क्योंकि सद्गुरु की महिमा तो परमात्मा से भी बड़ी है।

तो उस माई ने कहा-साहिब जी! आप कृपा करना। आपने कहा कि चिंता मत कर, 24 घण्टे बाद यह होश में आयेगा। आप किसी को आशीर्वाद भी नहीं देते हैं। ठीक 24 घण्टे बाद वो हिला।

बहुत कोमल हृदय है आपका

स्वभाव की दृष्टि से देखा जाए तो आप जैसा स्वभाव किसी का मिल नहीं पायेगा। बाहर से आप भले ही कभी कठोर दिखें, पर भीतर से आप अत्यंत ही कोमल हृदय के हैं। शिष्यों के दोषों को निकालने के लिए आप बाहर से कुम्हार की तरह शब्द की चोट-पर-चोट करते हैं, पर ऐसे समय में भीतर से उसे अपनी सुरति का सहारा दे देते हैं। जैसे माँ बच्चे को डाँट तो देती है, मार भी देती है; पर मारने के बाद जब उसे पता चलता है कि गलती से ज़्यादा मार दिया है या बच्चा दुखी हो गया है तो उसे प्यार भी करती है। ऐसे ही आप भी करते हैं। आपको प्यार निभाना अच्छा आता है। आप जैसे कोई निभा नहीं सकता है। जिसकी आपसे नहीं निभ सकती, उसकी किसी और से निभ नहीं सकती है। क्योंकि आपके जैसे कोमल हृदय कोई होगा ही नहीं, क्योंकि आपके जैसा सबमें आत्मा को देखकर व्यवहार करने वाला कोई होगा ही नहीं।

आपकी वाणी बड़ी ही प्यारी है

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आपकी वाणी ही बड़ी प्यारी है

एक बार आप मिजोरम में थे तो एक मेजर ने आपको भजन गाते सुन लिया। वो कहने लगा कि आप रोज़ गाया करें; आपकी वाणी बड़ी प्यारी है। लोग आपको फ़ोन करते हैं तो छोड़ते नहीं हैं। आपको पिण्डा छुड़ाने के लिए कहना पड़ता है कि सुरति रखना, अच्छा, साहिब-बंदगी। सत्य है कि आपकी वाणी ही ऐसी है कि कोई कितना भी आपके सत्संग सुने, बोर नहीं हो सकता है।

आपकी आँखें भी सबसे निराली हैं

यदि कोई आपके दर्शन करना चाहता है तो उसे आँखों में ही देखना है। यदि नज़र नहीं मिले तो समझो कि दर्शन नहीं हुए।

यदि कोई कहे कि वो आपकी तस्वीर बना सकता है तो यह बिलकुल झूठ होगा। क्योंकि कोई भी आपकी पूर्ण तस्वीर नहीं बना सकता है। सब कुछ बन सकता है पर आँखें कोई नहीं बना पायेगा। क्योंकि आँखों के बीच में ही आपका वास होता है।

यह शरीर तो केवल समझाने के लिए आपने लिया है। सच यह है कि आप माँ के पेट से आए ही नहीं। यह परम सत्य है। पर जो अद्भुत बुद्धिमान लोग हैं, वे ही इस सच्चाई को समझ सकते हैं। वैसे तो आपके केवल क्रिया-कलापों को देखकर ही कोई समझ सकता है कि आप मानव नहीं हो सकते हैं। फिर नाम पाकर यह शंका भी अवश्य ही मिट जाती है। यह बात दो तरह से जानी जा सकती है। या तो कोई आपके क्रिया-कलापों, आपके व्यवहार, आपके ज्ञान को देखकर समझ सकता है या फिर कोई नाम लेकर खोजी बन जाए तो वो समझ जायेगा।

परम पुरुष ने काल-पुरुष की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे बहुत लंबे समय तक तीन लोक का राज्य करने का जो शब्द दिया वो न कटे,

महात्मा लोग भी समझ रहे हैं आपको

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इस कारण सभी हंसों को एक साथ न लेकर युक्ति-युक्ति द्वारा उन्हें सतलोक ले जाने के लिए वह परम सत्ता जीवों को लेने आया करती है। इसी सत्ता को कबीर साहिब के रूप में भी आना पड़ा था। यह एक परम सत्य है। पर इस रहस्य को कोई बिरला ही समझ पाता है।

...तो आँखों में चूंकि आपका वास रहता है, इसलिए आँखें कोई नहीं बना सकता है। इसलिए बंदगी के समय भी आपसे आँखें ही मिलाई जाती हैं। इसलिए-

नज़र मिलाना आओ जब-जब, वो ही मिलन द्वारा है।
आँखों में ही बैठ यह साहिब, चुन-चुन हंसन तारा है॥

महात्मा लोग भी समझ रहे हैं आपको

आपकी वाणी की नक़ल भी हो चुकी है। बड़े-2 पंथों के महात्मा आपकी वाणी को तोड़-मरोड़कर कह रहे हैं। यदि उनके सन् 2000 से पहले वाले सत्संग सुनें जाएँ तो उनकी वाणी में, उनके विचारों में, उनकी फ़िलासफ़ी में बहुत अंतर मिल जायेगा। जबकि एक सच्चे महात्मा की वाणी कभी बदलती नहीं है। बदलेगी तो तभी जब उसमें कमी होगी, उसे अपनी वाणी पर संदेह होगा, आत्म-अनुभव नहीं होगा। जो आँखों देखी बात करता है, वो जो आज कहेगा, 50 साल बाद भी वही कहेगा। तो आपके ज्ञान, आपकी वाणी को सुनकर महात्मा लोगों को पता चलने लग गया है कि आप क्या चीज़ हैं। कुछ महात्मा आपसे नाम की दीक्षा भी चाहते हैं कुछ महात्मा आप से छुपके से दीक्षा ले चुके हैं और शिष्यों को भी दिलाना चाहते हैं ताकि वे खुद भी संसार-सागर से पार हो सकें और उनके शिष्य भी। यह बात कठिन ज़रूर लगेगी, पर परम-सत्य है। सबकी यह बात आप मंजूर नहीं करते हैं। इसका कारण आप ही जानते हैं।

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संत अभिलाष दास जी ने कई पुस्तकें लिखी हैं, भारतवर्ष में मशहूर हैं। कबीर पंथी होने के कारण उन्होंने साहिब की वाणियों की टीका भी किया है। जब एक बार उन्होंने आपके प्रवचन सुने तो बड़े प्रभावित हुए। कबीर साहिब की वाणी का बहुत ज्ञान होने के कारण शायद उन्हें महसूस हो गया कि कबीर साहिब अपना दिया हुआ शब्द पूरा करने के लिए आ गये हैं। उन्होंने आपको अपना आश्रम ही दे दिया, कहा कि आप ही इसे संभालो। फिर कुछ समय बाद आपके दर्शन करने राँजड़ी में आए और आपको दो और आश्रम दे दिये।

एक माहत्मा का दूसरे महात्मा को समर्पण करना कोई आसान काम नहीं है। उसने पहले आपको बहुत परखा, तभी धीरे-2 सर्वस्व आपको समर्पित करते जा रहे हैं।

एक बार जब वो राँजड़ी में आपके दर्शनों को आए तो कहा कि घूमने जाना है। आपने आश्रम की गाड़ी दी; एक ड्राइवर भी दिया। उनके शिष्य भी साथ थे। आपके कार्य को देखकर अपने शिष्यों से बोले कि देखो, कैसे सेनापति की तरह कार्य चल रहा है! तब उन्होंने आपके चरणों की ओर देख मन-ही-मन बंदगी की ओर चल पड़े। जब वापिस आने लगे तो शिष्यों ने कहा कि हम वापिस राँजड़ी नहीं जायेंगे.... बहुत थक गये हैं। महात्मा जी के मुख से निकला कि गुरु जी का शब्द है कि मिलते जाना, इसलिए मैं उनका शब्द नहीं काट सकता; आप जाओ। वो महात्मा अकेले आए। क्योंकि वो आपको कुछ-कुछ समझ चुके थे कि आप संत नहीं बल्कि संतों की खान बनकर धरती पर आ गये हैं।

साहिब शब्द न काटिहौं, बोले संत अभिलाष।
बोले संत अभिलाष, हे शिष्यो! तुम जाओ;
हम तो रहेंगे, कुछ दिन साहिब पास ॥
दर्शन तो हम पायेंगे, न चाहें कोई साथ।

साहिब कबीर धरती पर उतर आए है

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50 साहिब बन्दगी

पहुँचे राँजड़ी, कीने दर्शन आप,
मन ही मन प्रणाम कर, दीये आश्रम वार ॥
साहिब शब्द न काटिहौं, बोले संत अभिलाष ॥

साहिब कबीर धरती पर उतर आए हैं

दुनिया के अंदर बड़े-२ विद्वान हैं, पर आपकी यह विशेषता है कि जो भी कहते हैं, उसका असर पड़ता है। क्योंकि आप जो भी कहते हैं, पहले स्वयं अनुकरण करते हैं।

एक दिन एक ने आपसे फ़ोन पर कहा कि अध्यात्म की जितनी गहराई में आप बात करते हैं, कोई नहीं करता है। जो आप बातें कहते हैं, वो आपकी अपनी अनुभूति है या फिर वंचक ज्ञान है? आपने उससे कहा कि तुम्हारी अनुभूति क्या कह रही है? आपने कहा कि मैं जो भी बोल रहा हूँ, सब अनुभूतियाँ हैं।

इस तरह बड़े -२ प्रवक्ता हैं, कहते हैं, पर खुद नहीं करते हैं। मुम्बई में जब शांति-सम्मेलन हुआ था तो बड़े-२ धर्म प्रवक्ता इकट्ठा हुए थे। वो मामूली धर्म-सम्मेलन नहीं था। दलाईलामा जी, शंकराचार्य जी, और भी धर्मों के बड़े-२ सभी आए थे। सबने बोला। आपकी भी बारी आई। सब कागज़ पर लिखकर लाए थे कि क्या बोलना है। पर आप दिमाग़ से बोलते ही नहीं हैं, पढ़ी-लिखी बातें बोलते नहीं हैं। आप तो हृदय से बोलते हैं, और जो भी हृदय से बात होती है, उसका असर पड़ता है।

तो बड़े-२ बुद्धिजीवी बात कर रहे थे विश्वशांति की। कोई कुछ कह रहा था तो कोई कुछ। आपने अपनी बात कही। बाद में वहाँ के व्यवस्थापक जी ने अपने विचार रखे। उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने कहा कि मधु परमहंस जी की बात सुनकर ऐसा लगा मानो कबीर धरती पर उतर आया है।

इसलिए शरीर धारण करना पड़ता है परम पुरुष को

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यानी उसे इतने सारे धार्मिक अगुआ लोगों में से आप ही में साहिब का नूर नज़र आया; आपमें ही उन्हें संत मत की झलक दिखाई दी; आपमें ही उन्हें साहिब की शिक्षा की सही तस्वीर दिखाई पड़ी। यदि गहराई में विचार किया जाए तो पता चलेगा कि यदि सद्गुरु उस परम-पुरुष का दर्पण हैं तो आप उस दर्पण के भी दर्पण हैं। आपमें ही एक सद्गुरु की झलक मिल सकती है; आप ही में एक सच्चे संत की झलक मिल सकती है।

देख तुम्हें लगता सबको,
है धरा पर उतर कबीर आया।
वो कबीर
जो
काया से दूर,
जिसका न कोई मात पिता,
आत्म में झलके
जिसका नूर,
अमर लोक का है जो स्वामी,
अपने हंसों की ख़ातिर
जो
ले अवतार युग-युग आया।
आज फिर,
अपने हंसों को लेने
उतर धरा पर कबीर आया॥

इसलिए शरीर धारण करना पड़ता है परम पुरुष को

सत्य पुरुष युग-युग इस संसार में जीवों के कल्याण के लिए आते हैं। एक समय आप बिना शरीर धारण किए ही गुप्त रूप से दुनिया को

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अमर लोक की बात समझाने लगे। जिसे भी समझाने की कोशिश करते, वो ही डर जाता, सोचता कि न जाने यह कौन है ! और न ही कोई आपकी बात पर विश्वास करता। इसलिए मजबूर होकर परम पुरुष को शरीर रूप में प्रगट होकर समझाना पड़ता है या किसी निर्मल शरीर को धारण करके फिर समझाना पड़ता है। पर आप माँ के पेट से शरीर लेकर नहीं आते बल्कि कोई ऐसा शरीर, जो निर्मल हो, उसे एक ठिकाने पर लगाकर उसके शरीर को दुनिया को समझाने की ख़ातिर धारण कर लेते हैं और फिर आप संतों का सृजन करते हैं ताकि जब आप उस शरीर को छोड़ दें तो उन संतों के शरीर में बैठकर फिर आप अमर लोक का संदेश संसार को देते रहें। यही कारण है कि संत और आपमें कोई भेद नहीं रह जाता है। आप उन्हीं में समाए होते हैं। आगे चलकर जब किसी के बेटे उनकी गद्दी पर आ जाते हैं भाव पिता के बाद बेटे को गद्दी मिलती है, या खून के रिशते में गद्दी दी जाती है तो संत मत लुप्त हो जाता है और निरंजन बीच में आ जाता है। बाहर से अमर लोक होता है, पर अन्दर से काल निरंजन। इसके लिए साहिब जी ने कहा-

बीज बुन्दु नहीं चले गुरवाई।
नाद बिन्द से चले गुरवाई॥

इसलिए जब-जब ये स्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं तो सत्य पुरुष को पुनः स्वयं कोई शरीर ढूँढ़ना पड़ता है, जिसमें रह रही आत्मा को उसके निजधाम पहुँचा कर आप उसमें आ सकें।

जब आप संसार के जीवों को सद्गुरु की महिमा बताते हैं, उन्हें परम-पुरुष का ही रूप बताकर उनकी भक्ति करने को कहते हैं तो दुनिया कहती है कि एक इंसान की भक्ति करने को कह रहे हैं। पर इस रहस्य को कोई भी समझ नहीं पाता है। आप सद्गुरु को परम-पुरुष से यानी अपने से भी बड़ा इसलिए कहते हैं, क्योंकि आप ऐसे अपने सही

आपका नाम सबसे निराला है

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रूप में किसी इंसान को समझा नहीं पाते हैं, कोई भी आपकी बात नहीं मानता है। एक अन्य भी तरीका है, पर उससे सब जीव आपमें समा जायेंगे, इसलिए आप हमेशा एक पर्दे से जीव को समझाते हैं, ताकि काल निरंजन को दिये हुए शब्द को काटे बिना आप सब जीवों को एक-साथ न ले जाकर युक्ति-युक्ति रूप से थोड़े-थोड़े जीवों को अमर-लोक ले जाएँ। ... तो आप युक्ति-युक्ति वाला तरीका ही अपनाते हैं। पर यह तरीका एक इंसानी रूप में ही ठीक रहता है। इंसानी रूप में आकर जब सद्गुरु समझाते हैं तो जीव समझ भी जाते हैं। जीवों को युक्ति-युक्ति रूप से समझाने का जो काम सत्य पुरुष बिना शरीर के नहीं कर पाते हैं, वो काम संतों के शरीर के माध्यम से ही हो पाता है, इसलिए आप संतों को परम-पुरुष से बड़ा दर्जा देते हैं। हमारे साहिब जी इस शरीर से नितान्त ही परे रहते हैं। आप तो केवल शरीर में दिखाई देते हैं, पर वास्तव में आप अपने स्वरूप में ही हर समय समाए रहते हैं। यह बड़ी ही अटपटी बात है, जो कहने में नहीं आ रही है।

आपका नाम सबसे निराला है

आप आमतौर पर एक बात कहते हैं कि जो वस्तु मेरे पास है, वो किसी के पास नहीं है। वो वस्तु नाम ही है। सच है, जो नाम आपके पास है, वो किसी के पास नहीं है।

सन् 2002 में जब मुम्बई में शांति सम्मेलन हुआ तो देश के चुनिन्दा लोगों को बुलाया गया। दलाई लामा जैसे धार्मिक अगुआ भी उसमें शामिल थे। इसी तरह सिक्खों के, मुसलमानों के, ईसाइयों के पादरी आदि भी थे और विभिन्न पंथों, मत-मतान्तरों के अगुआ लोगों को निमंत्रण दिया गया था। आपको भी उसमें बुलाय गया। आपने भी सोचा कि चलो देखते हैं।

वहाँ बोलने को अपने-2 विचार प्रकट करने का विषय था कि

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वर्तमान में छल, कपट, पाप, अहिंसा, अशांति का वातावरण हो गया है। आखिर क्या किया जाए, जिससे मनुष्य इन सब पाप-कर्मों से दूर हो जाए और एक नेक इंसान बने।

बड़े-2 महात्माओं ने अपने-अपने विचार रखे। किसी ने कहा कि जाप करो, शांति हो जाएगी; किसी ने कहा कि योग करो; किसी ने कहा नमाज़ पढ़ो; किसी ने कहा कि तीर्थ करो। आपने सबकी बात सुनी। आपको घोर आश्चर्य इस बात का हुआ कि कोई एक भी मूल कारण नहीं जानता था। कोई नहीं जानता था कि मनुष्य पाप कर्म क्यों कर रहा है; कोई नहीं जानता था कि मनुष्य अच्छा कैसे हो सकता है; कोई एक भी आध्यात्मिक शक्तियों से परिचित नहीं था; कोई एक भी विदेह नाम से परिचित नहीं था। उन्हें नहीं पता था कि यह आदमी अपनी ताक़त से नहीं सुधर सकता है। कबीर साहिब ने यही तो समझाया है-

कितने तपसी तप कर डारे, काया डारी गारा।
गृह छोड़ भये सन्यासी, तऊ न पावत पारा॥

यानी जिन्होंने इतनी कठिन तपस्या की कि काया को गला दिया, वो भी नहीं समझ पाए। फिर आम इंसान को इन चीज़ों से सुधारने की कोशिश करने वाले कितने अज्ञानी थे!

वास्तव में मन ही इंसान से पाप कर्म करवा रहा है। यही निरंजन है। इस बात का किसी को पता नहीं था। फिर सत्य-पुरुष का सच्चा नाम ही मनुष्य को इस मन से बचाकर अच्छा बना सकता है। यही उसे पार भी करेगा। इंसान के मन को निर्मल करने वाली कोई वस्तु है तो परम पुरुष का सच्चा नाम, जो सद्गुरु के पास होता है। सद्गुरु से ही इस नाम को पाया जा सकता है। यह वाणी से परे विदेह नाम होता है। यह स्वयं परम सत्ता होती है। बाकी जो गुरु लोग होते हैं, उनके पास काया का नाम होता है, जो निरंजन का नाम है। सब नाम निरंजन के हैं, पर परम पुरुष का यह विदेह नाम किसी संत के पास ही हो सकता है। जिसके पास यह

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नाम हो, वो जानता है कि इसी से मनुष्य के मन को साफ़ करके उसे अच्छा बनाया जा सकता है।

नाम बिना हृदय शुद्ध न होई। कोटिन भांति करे जो कोई॥

साहिब की वाणियाँ इस बात को स्पष्ट कर रही हैं कि नाम के बिना मन अच्छा नहीं हो सकता है, चाहे कोई करोड़ों उपाय क्यों न कर ले। फिर जो अन्य उपायों का सुझाव दे तो यही समझना चाहिए कि उसके पास नाम का होना तो दूर, उसे इस नाम के बारे में कोई ख़बर ही नहीं है।

बाकी जितने भी गुरु लोग हैं, वो जो नाम दे रहे हैं, वो निरंजन का है। निरंजन यानी मन। मन के नाम द्वारा मन को ही मारने की बात सोची भी कैसे जा सकती है! इसलिए मन को मारने के लिए जो परम पुरुष का सच्चा नाम चाहिए, वो केवल सद्गुरु के ही पास मिल सकता है। यह नाम किसी बिरले संत के पास ही होता है। जब-जब दुनिया इस नाम से बेख़बर हो जाती है तब-तब कबीर साहिब यह नाम लेकर निरंजन के संसार में आते हैं और जीवों को यह नाम रूपी अमोलक वस्तु देकर उनके मन को निर्मल करके उन्हें अपने देश अमर लोक ले जाते हैं।

हरेक अपने गुरु के लिए बढ़ा-चढ़ाकर कहता है। इसलिए आपकी सही तस्वीर संसार के सामने रख पाना बड़ा कठिन कार्य हो जाता है। पर सत्य है कि आप ही साहिब हैं। इसमें कुछ भी बढ़ा-चढ़ाकर कहने वाली बात नहीं है। यह एक परम रहस्य है। आपसे नाम पाकर कुछ हद तक इस रहस्य को समझा जा सकता है। जो खोजी होगा, वो अवश्य ही इस रहस्य को समझ जायेगा।

कहने का भाव है कि अभी तक यह नाम किसी के पास नहीं है। यह आपसे ही प्राप्त किया जा सकता है। इस नाम के दाता इस युग में अभी तक आप ही हैं अन्य कोई नहीं। आपका नाम सबसे निराला है। आपका नाम काल के चंगुल से छुड़ाने वाला है। आपना नाम इंसान को निर्मल

अभियान चलाया

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करने वाला है। आपका नाम पाकर हरेक नामी के हृदय से बस यही शब्द निकलते होंगे। चाहे वो वाणी में प्रकट न कर पाए, पर अंदर-ही-अंदर वो ज़रूर गुणगुनाता है-

बड़ा ही अद्भुत नाम तुम्हारा,
साहिब सच सच कहते हैं।
मैं न कहता आप न कहते,
साहिब सब यह कहते हैं॥
जब से साहिब नाम मिला है,
इच्छा कोई रही न बाकी,
चिंता सारी भाग चुकी है,
नाम सुधा पीकर हम साहिब,
खोए खोए रहते हैं।
मैं न कहता आप न कहते,
साहिब सब यह कहते हैं॥
जो जन आते शरण आपकी,
काल से मुक्ति वे जन पाते,
वे फिर आपमें और आप उनमें,
सदा सदा फिर रहते हैं॥
मैं न कहता आप न कहते,
साहिब सब यह कहते हैं॥

अभियान चलाया

जब आप मात्र 20 साल के थे तो आपने सोचा कि देश-विदेश के महात्माओं के पास जाता हूँ, देखता हूँ कि कौन कहाँ तक पहुँचा हुआ है। आप बड़े-बड़े महात्माओं से मिले, जिनकी लाखों की संगत थी। पर

आपका ज्ञान देख वैज्ञानिक भी दंग रह गये

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जब गोष्ठी हुई तो आपने पाया कि किसी को भी अमर लोक का ज्ञान नहीं था। आप जाते ही पहले कहते कि मैंने जो पाना था, पा चुका हूँ; मुझे केवल यह बता दो कि आप अंदर की दुनिया में कहाँ तक गये हो? तो आपने पाया कि किसी को भी आंतरिक दुनिया का ज्ञान नहीं था; अमर लोक बहुत दूर की बात है। कुछ केवल पढ़-सुन कर बोल रहे थे। आप समझ गये कि ये झूठ बोल रहे हैं।

आपका ज्ञान देख वैज्ञानिक भी दंग रह गये

सोलन में आपका प्रोग्राम था। यूनिवर्सिटी के सभी छात्र और प्रोफेसर भी थे। उन्होंने सोचा कि यह बाबा जी हैं, ऐसे ही होंगे। उन्होंने आपसे बड़े सवाल पूछे। लोगों ने धर्मशास्त्र तो पढ़े हैं, पर अधूरे। आप एकाग्र होकर सबकुछ करते हैं। इसलिए धर्मशास्त्रों का आपको ज्ञान भी सबसे अच्छा है। बाद में आपने एक वैज्ञानिक से पूछा कि पेड़ की ज़मीन में नमी क्यों है? वो वनस्पतिशास्त्र का वैज्ञानिक था। वो बोला कि छाया से। आपने कहा कि ऐसा करना कि मकान के नीचे से भी ज़मीन खोदना। वहाँ की ज़मीन खुश्क होगी। पर पेड़ के नीचे की ज़मीन में नमी मिलेगी।

पहले वो कह रहे थे कि अध्यात्म कुछ नहीं है, विज्ञान ही सब कुछ है। पर जब आप विज्ञान से अध्यात्म की ओर चले तो सब दंग रह गये।

तो आपने उसे समझाया कि पेड़ अपने नजदीक 10 मीटर तक सूर्य की किरणों को नहीं आने देता। उसकी पत्तियों में यह गुण हैं। क्योंकि वो जानता है कि यदि ऐसा नहीं किया तो वो नष्ट हो जायेगा। इसलिए आत्म-रक्षा के लिए वो किरणों को दूर फेंकता है। यह काम मकान नहीं कर सकता है। इसलिए हमारे पूर्वज लोग पेड़ की छाया में आराम करते थे, क्योंकि वे ठंडक महसूस करते थे।

वाणी पर पूरा कण्ट्रोल रहता है आपका

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सब आपकी बातें सुनकर हैरान रह गये। वो तो पी.एच.डी थे, पर आपका तो विषय भी नहीं था वनस्पति शास्त्र। आपने उसी से संबंधित ही सवाल पूछे। वो नहीं बता पाए। आपने उन्हें समझाया। फिर वे सहमत हुए, कहा कि आप ठीक कह रहे हैं।

वाणी पर पूरा कण्ट्रोल रहता है आपका

आपका अपनी वाणी पर पूरा कण्ट्रोल रहता है। फिजूल नहीं बोलते हैं आप। आपने कभी किसी को आशीर्वाद नहीं दिया। किसी भी बेकार बात को नहीं बोलते हैं। कई लोग डोगरी में बड़ी बातें बोलते हैं, जो अन्य भाषा में गाली हो जाती है। इस तरह अन्य भाषाओं के कुछ शब्द यहाँ गाली बन जाते हैं। इसलिए शब्द सोच-विचार कर बोलना चाहिए। आपकी वाणी में कभी गाली नहीं निकलती है। आपकी हर बात सत्य होती है। आप सत्लोक में रहते हैं और सत्य की बात ही करते हैं।

आप दीन दुखियों के हैं

अगर देखा जाए तो दो तरह के लोग आपके पास आते हैं। 90 प्रतिशत तो बीमार, असहाय, परेशान लोग होते हैं, पर 10 प्रतिशत लोग होते हैं, जो शौकिया आते हैं।

10 साल पहले की बात है, एक महाजन ने आपको रामगढ़ में ज़मीन दी। जब आप बाद में वहाँ आश्रम बनवाने पहुँचे तो एक नामी लड़का आपके पास आया, कहा कि क्या कर रहे हैं गुरुजी? आपने कहा कि ज़मीन ख़रीदी है, आश्रम बनवा रहा हूँ। उसने कहा-गुरु जी, सब आपका ही है, कोई बात नहीं, पर जहाँ आप आश्रम बनवा रहे हैं, वो तो मेरी ज़मीन है; आपने किससे ज़मीन ख़रीदी है? आपने कहा कि फलाने महाजन ने ज़मीन दी थी। उसने कहा कि उसकी तो वहाँ छपड़ी में है। आपने महाजन से मिलकर कहा कि आपने बताई यह थी, पर है आपकी

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जगह वहाँ छपड़ी में। महाजन ने कहा-महाराज! मैं कोई खेती-बाड़ी तो करता नहीं हूँ; लोगों ने मिट्टी निकाल-2 कर इसे खाली कर दिया है। आपने कहा कि यह ठीक नहीं है; वापिस लो। तो उसने कहा कि लिखा-पढ़ी करके दे दो। आपने सोचा कि पहले भी लिखा-पढ़ी करके ली थी, अब वापिस भी लिखा-पढ़ी करके देंगे तो पैसे लगेंगे, इसलिए आपने कहा रहने दो लिखा-पढ़ी को छपड़ी वाली को ही ठीक कर लेंगे। आपने अपने लोगों को कहा कि इसे भरते हैं; एक ट्रेक्टर आश्रम का देता हूँ, एक आप किसी सौखे नामी का ले लो और इसे भर दो। तो एक ने कहा कि यहाँ कोई सौखा नामी नहीं है। सब ऐसे ही हैं। उसने कहा कि जो सौखे-सौखे थे, उन्हें एक दूसरे पंथ वाले ले गये। किसी को कहा कि चल वहाँ, जत्थेदार बना देंगे, किसी को कहा कि फलाना बना देंगे। फिर गुरु जी, जो खाने-पीने वाले थे, वो एक दूसरे पंथ वाले ले गये, कहा कि जो मरजी खाओ-पीओ, मौज-मस्ती करो और भक्ति भी करो। फिर आपके लिए बचे ही लूले, लँगड़े, बीमार। अब आपका प्रचार भी यही कर रहे हैं; कोई पागल दिखता है तो कहते हैं कि चल राँजड़ी; फिर कोई भूत-प्रेत वाला दिखता है तो कहते हैं कि चल राँजड़ी। आपने कहा कि वो भी ठीक हैं।

बाकी देखते हैं कि अच्छे कपड़े पहने हुए हैं तो छाँटते जाते हैं; पैसे, रुतबे आदि को देखकर छाँटते हैं। आप सीधा आँखों में देखते हैं; आप श्रद्धा, प्रेम और रूहानियत को देखते हैं। वो अंदर की आस्था नहीं देख रहे हैं, बाहरी भेष-भूषा देख रहे हैं। वो यह देख रहे हैं कि हमें क्या दे सकता है! आप देखते हैं कि मुझसे क्या ले सकता है!

एक नामी अपने ससुराल गया तो वहाँ अपनी सास को समझाकर लाया। वो 60 साल से दूसरे पंथ में मशहूर थी; बड़ी ज्ञानी थी; कई लोगों को भी नाम दिलवाया था। जब वो आपसे नाम ले लिया तो नामी के एक दोस्त ने उनसे कहा कि आपने यह क्या किया, इतनी इज्जत थी आपकी

इसलिए जगह-जगह आश्रम बनवाते हैं आप

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वहाँ। इतने बड़े पंथ को छोड़कर आप साहिब-बंदगी में चली गयीं। आपको क्या अंतर दिखा वहाँ? माई ने बड़ा प्यारा जवाब दिया, कहा कि वो महाराज है सौखों का और राँजड़ी वाला है औखों का।

राँजड़ी में सुबह-सुबह कई परेशान, बीमार आते हैं; अपनी-2 समस्याएँ लाते हैं। आप यह नहीं देखते कि यह ग़रीब है या अमीर; आप सबकी सुनते हैं। आपमें किसी तरह की भेद-दृष्टि नहीं है। आप तो केवल आने वाले का प्रेम, उसका विश्वास, उसकी प्रार्थना को ही देखते हैं।

इसलिए जगह जगह आश्रम

बनवाते हैं आप

आपने जो इतने अधिक आश्रमों को निर्माण करवाया, जगह-जगह आश्रम बनवाए, इसके पीछे भेद है। डोडा की एक माई ने आपसे नाम लिया। वो भक्त थी। पर कुछ महीने वो सत्संग में नहीं आई। बहुत देर बाद जब मिली तो आपने न आने का कारण पूछा। माई ने कहा कि गुरु जी, इतनी दूर से राँजड़ी आने में बहुत पैसे लगते हैं; मैं ग़रीब हूँ। आपने उसी समय फैसला किया कि वहाँ आश्रम बनवाऊँगा।

ऐसे ही मण्डी के एक महात्मा जी ने नाम लिया। उनके शिष्यों ने भी नाम ले लिया। पर कुछ समय न देखा तो आपने महात्मा जी से पूछा कि आपके चेले अब नहीं आ रहे हैं, क्या बात है? तो उन्होंने बताया कि मण्डी से राँजड़ी तक पहुँचने में 700 रूपये लगते हैं और तीन दिन लग जाते हैं। इसलिए आप खुद हरेक जगह आश्रम बनवाकर वहाँ जा रहे हैं।

ऐसे फिर आप जगह-जगह पहले आश्रम बनवाने लगे और फिर भक्तों को इकट्ठा करने लगे। 10-10, 15-15 कि. मी. की दूरी पर आपने आश्रम बनवाए। ग़रीब संगत आपके दर्शन करने नहीं पहुँच पाती है, यह सोचकर सद्गुरु जी स्वयं उन्हें दर्शन देने प्रत्येक आश्रम में जाते हैं।

सिद्धांत के इतने पके हैं आप

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सिद्धांत के इतने पक्के हैं आप

आपने एक ज़मीन ख़रीदी। 8 लाख की ज़मीन थी। फ़र्द कटवाना था तो पटवारी 10 हज़ार माँग रहा था और बड़े अधिकार से माँग रहा था घूस। आपने अपने नामी तहसीलदार से कहा कि घूस नहीं देना है, यह तय है; चाहे फ़र्द न हो, मंजूर है। आपने 8 लाख दाँव पर लगा दिये, पर 10 हज़ार घूस नहीं दी। सिद्धांत ख़त्म हो रहा था, इसलिए किया।


इंस्पेक्टर बोला-

दो साल नौकरी आपने की है

सच है, कर्त्ता केवल आप ही हैं, बाकी सब तो माध्यम बन जाते हैं। अंतर केवल इतना है कि कोई-कोई इस रहस्य को समझ नहीं पाता है जबकि कुछ इस बात को समझ जाते हैं, महसूस कर लेते हैं।

सुरेंद्र सिंह इंस्पेक्टर को दिमाग़ी नुक़्स हो गया था। वो आपके पास आया; कहा-गुरु महाराज! अब नौकरी नहीं करनी है। आपने उसकी आँख में देखा। आप जान गये कि क्या बात है। आपने कहा कि नौकरी पूरी करो। उसके 2 साल रह गये थे। आपने उसे चाॅबी भर दी। पर आपने ऐसा नहीं कहा कि चाॅबी भर दी है, जाओ। यह नहीं बोला कि तथास्तु।

वो पूरी नौकरी करके आया तो एक लाख रूपया लाकर चरणों में रखा। वो बोला कि मैं आपसे बेइमानी कर रहा हूँ। यह दो साल नौकरी आपने की है। मैं बेइमान बनकर आपको केवल बेसिक तनख़्वाह दे रहा हूँ।


वापिस आना ही पड़ता है

आपको कोई छोड़ नहीं सकता है। चाहे छोड़कर चला जाए, पर फिर वापिस आना पड़ता है। यदि हज़ारों गुरु भी कर आए तो भी वापिस आपके पास आना पड़ेगा।

केवल श्रद्धा देखते हैं आप

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62 साहिब बन्दगी

आपकी अपने हरेक नामी पर नज़र रहती है। आपको पता रहता है कि कौन कितनी देर नहीं आया। एक लड़का था। उसका सेक्शन ऑफिसर का टेस्ट था। वो बोला कि दो बार फेल हो चुका हूँ, यह तीसरा आखिरी चाँस है। वो कुदरतन फेल हो गया। सोचा कि छोड़ो, नहीं जाना है। 5-6 महीने नहीं आया। फिर बाद में आया तो आप सत्संग कर रहे थे कि साहिब का द्वार नहीं छोड़ना है। वो उठा-बोला कि छोड़ना क्या है, छोड़ ही नहीं पाते हैं। फिर बाद में नियम ही बदल गया कि तीन बार के बाद भी दे सकते हैं। फिर दुबारा टेस्ट दिया तो पास हो गया।

केवल श्रद्धा देखते हैं आप

एक माई आपके पास आई, कहा कि बच्चे का नाम रखना है। आपने पूछा कि लड़का है या लड़की। वो बोली कि लड़का है। आपने कहा कि इसका नाम 'अनाम' रखो। वो चली गयी। लेकिन फिर पाँच मिनट बाद वापिस आई, कहा कि नाम बदल दो। आपने कहा कि फिर 'अजय' है इसका नाम। माई 5 मिटन बाद फिर आई, कहा कि यह लड़की है। आपने कहा कि पहले बताना था न। पर आप उससे नाराज़ नहीं हुए, बल्कि मुस्कराते हुए नाम बदल कर रख दिया। यानी वो समझ नहीं पा रही थी। जब वो बाहर जा रही थी तो कोई पूछ रहा था कि क्या नाम रखा है? वो जब बता रही थी तो वो कह रहा होगा कि यह तो लड़कों वाला नाम है। तब वो फिर वापिस आ रही थी। पर आप ऐसे लोगों की केवल श्रद्धा ही देखते हैं, भाषा नहीं समझ पा रही थी कि क्या हुआ!

आपकी तान निराली है

बाहर बहुत से संगीत बज रहे हैं, बड़े सुरों से गीत गाए जा रहे हैं। अंदर में भी बड़े बाजे बज रहे हैं, बड़ी निराली धुनें हो रही हैं, जिनकी तुलना में बाहर की धुनें कुछ भी नहीं हैं। वो बड़ी ही प्यारी धुनें हैं। हर

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निराले सद्गुरु
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तरह के वाद्य यंत्र बज रहे हैं। इन बाहर और भीतर दोनों से परे आप जो प्रेम की तान छेड़ते हैं, उसकी तुलना में दोनों तान फीकी पड़ जाती हैं। जो एक बार आपकी तान सुन ले, वो आपका प्रेमी होगा-ही-होगा। वो प्रेम की तान है। वो आत्मा तक जाती है। उसे आत्मा ग्रहण करती है।

कान के रास्ते से वो तान अंदर में आती है। यह भी कई तरह की है। एक तो आते ही विरह उत्पन्न कर देती है जबकि एक प्रेम की तान है, जो प्रेम भाव को उत्पन्न करती है। इनके अलावा कुछ तान सिग्नल देती हैं। मान लो कि आप सत्संग में किसी को बुलाना चाहते हैं तो एक गुप्त तरीके के साथ-२ वो खास तरह की तान सुनाकर भी बुलाते हैं।

जब प्रेम की ये तान आप सुनाते हैं तो शरीर की सुध भूल जाती है। जब तक वो तान रहती है, अपने में ही समाए रखती है। कभी वो तान पल-भर के लिए आती है तो कभी कुछ लंबे समय के लिए भी रह जाती है।

संगीत का प्रेमी उस तान को सुनकर निश्चय ही संगीत की हर तान भूल जायेगा। अनहद शब्द का प्रेमी उसे सुनकर अनहद शब्द को सुनना नहीं चाहेगा। वो तान ऐसी है कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। बस, यों समझ लेना चाहिए कि जैसे प्रेम बताने में नहीं आता, ऐसे वो प्रेम की तान बताई नहीं जा सकती है।

फिर एक जो आप सुरति को पकड़कर अपना शब्द सुनाते हैं, उसकी तो बात ही नहीं की जा सकती है। वो सुनने वाला तो खो ही जायेगा। फिर उसे कहीं भी चैन नहीं आ सकता है। उसी का दीवाना वो हो जायेगा। वो इतना मीठा है कि उसके लिए कुछ भी कहा नहीं जा सकता है। इसलिए यह तो परम सत्य है कि आपकी हर बात निराली है। आप इस संसार के हो ही नहीं। आप स्वयं ही सब कुछ हैं, पर यह बात बोलने से दुनिया मानेगी नहीं, विश्वास नहीं करेगी, शायद इसलिए आप भी 'साहिब-साहिब' बोल रहे हैं।

आपका भोजन भी सबसे निराला है

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64 <p align="right">साहिब बन्दगी</p>

जो जन आया शरण आपकी, भ्रम सब उसका काट निकाला।
अपनी मीठी तान सुना, आपने उसे मधुमय कर डाला॥

आपका भोजन भी सबसे निराला है

जो भोजन आप खाते हैं, कोई नहीं खा सकता है। आप तो बस इस शरीर रूपी घोड़े को स्वस्थ रखने के लिए भोजन लेते हैं। आपको स्वाद से कोई मतलब नहीं है। आपके भोजन को निगल पाना भी आम इंसान के लिए बहुत कठिन हो जायेगा।

एक बार आपके भाई ने आपसे कहा कि मैं आपको परमात्मा मानता हूँ। आपने कहा कि तुम्हारा यह मानने का आधार क्या है? उन्होंने कहा कि मैं आपकी आध्यात्मिक गहराई को नाप नहीं पाया हूँ, पर कुछ चीज़ें मैंने आपमें देखी हैं। पहले तो आपको दुनिया का कोई शौक नहीं है। आपके पास मन नाम की कोई चीज़ ही नहीं है। उन्होंने बहुत बातें कहीं। फिर कहा एक बार मैंने आपका बचा हुआ भोजन खा लिया। मुझे 7-8 मिर्च खानी पड़ीं, तब जाकर वो भोजन मैं गले से नीचे उतार पाया। आपके भोजन में कोई नमक, कोई स्वाद नहीं, कैसे खाते हो!

आप दुनिया का कोई भी मज़ा नहीं लेते हैं। इन मज़ों की ज़रूरत केवल उसी को होती है, जिसे आत्मा का आनन्द नहीं मिला हो।

बड़ा अन्याय किया जाता है आपके साथ

आपके साथ हर समय अन्याय ही होता रहा है। समाज में पाखण्डियों का ही बोलबाला होने के कारण ही यह सब होता रहा है। 30 जनवरी सन् 2008 की बात है। गाँधी जी की 60वीं पुण्यतिथि थी। आपको जम्मू के मुबारक मण्डी में आमंत्रित किया गया। वहीं पर आपको सन् 2003 को सन् 2002 का गाँधी शांति पुरस्कार भी दिया गया था। तब भी आपके साथ कुछ शैतान लोगों ने ऐसा ही किया था।

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निराले सद्गुरु 65

इस बार ऐसा था कि वहाँ पर दो माइक लगे थे। एक छोटा माइक था, जहाँ से स्कूली बच्चे गाँधी के विचारों का प्रचार कर रहे थे और दूसरा बड़ा मॉइक था, जो बड़े आमंत्रित लोगों के बोलने के लिए था।

जब तक सारे आमंत्रित लोग न पहुँच गये, तब तक बच्चे उस छोटे मॉइक से बोले जा रहे थे। जैसे ही आप पहुँचे, आपको भी उस छोटे मॉइक पर बोलने के लिए बुला लिया गया। अब उस मॉइक से सभी तक आवाज़ नहीं पहुँच पा रही थी और फिर उस समय शोर भी बहुत था; नारे लगाए जा रहे थे। आपने तो भी वहीं से बोला। अब भी अन्दर में चालाक लोगों का दिल नहीं भरा तो बीच-बीच में आपको रोकना शुरू कर दिया और आने वाले के लिए सूचित करते रहे और ऐसे ही बीच में ही आपको रोक दिया गया और आपकी बात अधूरी ही रह गयी।

बाद में जब सब लोग आ गये तो आपको दिखावे के लिए मात्र उनके साथ बिठाया गया। सबको उस बड़े मॉइक पर बोलने का अवसर प्रदान किया गया जबकि आपको केवल वहाँ बिठाए रखा, बोलने का अवसर वहाँ से नहीं दिया गया, जहाँ से आपकी आवाज़ सब सुन सकें, आप अपनी बात सब तक पहुँचा सकें। क्या यह नाइंसाफ़ी नहीं थी। क्या यह चालाकी नहीं थी! पर फिर भी आपकी शालीनता तो देखो, जाते समय आपने दोनों हाथ जोड़कर उसे धन्यवाद किया, जिसने आपको उस माइक पर बोलने का अवसर नहीं दिया और बच्चों वाले माइक से बोलने को कहा।

यह केवल एक किस्सा नहीं है। हर बार जहाँ भी आपको आमंत्रित किया जाता है, पाखण्डियों की टीम इकट्ठा होकर साज़िश रच लेती है और कुछ ऐसा कर दिया जाता है कि आपको बोलने का अधिक अवसर नहीं दिया जाता। पाखण्डी जानते हैं कि आपको